<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808</id><updated>2012-01-24T06:44:06.252-08:00</updated><category term='उपन्यास-भाग-2'/><category term='पुस्तक समीक्षा'/><category term='बाल दिवस'/><category term='नुक्कड़ नाटक'/><category term='व्यंग्य'/><category term='उपन्यास-भाग 1'/><category term='समीक्षा'/><category term='लेख-जैव विविधता'/><category term='गीता विवाद'/><category term='lekh'/><category term='vyangya'/><title type='text'>कतरब्योंत</title><subtitle type='html'>मैंने तो पाया है कि सच बोलने पर कतर दी जाती है जुबां</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>92</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-2336705614518582173</id><published>2012-01-23T01:42:00.001-08:00</published><updated>2012-01-23T01:44:42.116-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>भोजन-भजन करो भरि पेटा</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family: arial; font-size: 14px; line-height: 25px; "&gt;अशोक &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: arial; font-size: 14px; line-height: 25px; "&gt;मिश्र &lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family: arial; font-size: 14px; line-height: 25px; "&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;किसी गांव में एक पंडित जी रहते थे। उनके कई यजमान सरकारी और गैर सरकारी विभागों में बड़े पदों पर विराजमान थे। मौका लगने पर ये थोड़ी-बहुत रिश्वत तो ले लेते थे, लेकिन रिश्वत के पीछे भागते नहीं थे। जब भी पंडित जी अपने यजमानों के यहां जाते, तो वे अपनी सामर्थ्य भर उनकी आवभगत करते और दक्षिणा देकर विदा कर देते। पंडित जी इसे बुरा भी नहीं मानते थे। एक दिन पंडित जी अपने घर के बाहर खटिया डाले सोच ही रहे थे कि आज किस यजमान के यहां जाऊं, तब तक एक व्यक्ति ने आकर उनके चरण स्पर्श किए और कहा, ‘पंडित जी, आज मेरे घर में सत्यनारायण भगवान की कथा है। कथा बांचने और गुरुमंत्र देने के लिए आपको बुलाने आया हूं।’&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;पंडित जी नए यजमान की महंगी गाड़ी देखकर काफी प्रसन्न हुए। उन्हें लगा कि आज सत्यनारायण भगवान की कृपा से अच्छी कमाई हो जाएगी। पंडित जी ने सबसे पहले यजमान के बारे में पूरी जानकारी जुटाई। गुरु जी को पता चला कि यजमान केंद्र सरकार के एक मलाईदार विभाग में क्लर्क है। काफी समय से वह उसी पद पर जमा हुआ है। जब भी उसके प्रमोशन की बात चलती, तो वह कुछ ले-देकर अपना प्रमोशन रुकवा देता। पंडित जी यजमान की गाड़ी में बैठकर उसके घर गए। आलीशान घर, बीस-पच्चीस तोले सोने और हीरे के जेवरात से लदी-फंदी उसकी घरवाली, विदेश से पढ़कर लौटे पुत्र-पुत्रियों को देखकर पंडित जी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक क्लर्क ‘राजा-महाराजा’ की तरह रह सकता है। पंडित जी ने प्रसन्न मन से सत्यनारायण की कथा बांची और भोजन के लिए बैठे। उसी समय यजमान और उसकी पत्नी ने पंडित जी से अनुरोध किया कि वे उसे गुरुमंत्र देकर उन्हें पक्का चेला बना लें। जैसे ही गुरुमंत्र की बात चली, पंडित जी का सत्य बोध जाग उठा। उन्होंने यजमान के कान में कहा,‘जो कोई सूक्ष्म करे आहारा, न बल घटे, न पाकै बारा। अर्थात् जो व्यक्ति रिश्वत रूपी आहार सूक्ष्म रूप (यानी कम मात्रा में) से ग्रहण करता है, उसका न तो आत्मबल घटता है, न ही उसके बाल पकते हैं (यानी, आत्मबल के चलते वह जल्दी बूढ़ा नहीं होता।)’&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;नए शिष्य बने यजमान ने पूरी तरह से भक्तिभाव से इस तत्व को ग्रहण किया और उसी दिन से रिश्वत आदि लेना बंद कर दिया। इस घटना को छह महीने बीत गए। एक दिन पंडित जी ने सोचा कि चलो, अपने नए शिष्य का हाल-चाल ले आएं। उसके घर पहुंचे, तो सब कुछ उनकी आशा के विपरीत था। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;पता चला कि रिश्वतखोरी बंद करते ही उनके विभाग के दूसरे भ्रष्ट अधिकारियों ने उसके खिलाफ जांच आयोग बिठाकर उसे जेल भिजवा दिया था। कुछ ही दिन पहले वह जेल से जमानत पर छूटा था। इस चक्कर में उसकी सारी जमापूंजी भी खर्च हो गई। पंडित जी को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा, ‘अरे बेवकूफ! मैंने तुम्हें सूक्ष्म रूप से रिश्वत ग्रहण करने को कहा था, बिल्कुल बंद करने को नहीं। अच्छा सुनो! मैं तुम्हें एक नया गुरुमंत्र देता हूं-भोजन भजन करो भरि पेटा, नाहीं तो मरि जैइहो बेटा! इस मंत्र का निहितार्थ यह है कि रिश्वत को भोजन बनाकर अपने वरिष्ठ अधिकारियों का खूब भजन (यानी गुणगान) करो। यदि ऐसा नहीं किया, तो एक तो तुम्हारे अधिकारी तुम्हें चैन से जीने नहीं देंगे। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: 14px;"&gt;दूसरे, रिश्वत न लेने पर ऐश्वर्यविहीन होने की कुंठा पालने से होने वाले उच्च रक्तचाप के चलते तुम शीघ्र ही इस दुनिया से विदा हो जाओगे।’ यह गुरु मंत्र सुनते ही यजमान ने लपककर पंडित जी के चरणस्पर्श किए और बोला, ‘क्या गुरु जी! आपको यही गुरुमंत्र पहले देना था न! बेकार में इतनी जिल्लत सही। अधिकारियों की आंख में खटका, सो अलग।’ इतना कहकर उसने पंडित जी को काफी दान-दक्षिणा देकर विदा किया। कुछ दिन बाद पंडित जी को पता चला कि उनका यह शिष्य पहले की तरह नौकरी पाकर ऐश्वर्यवान हो गया है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-2336705614518582173?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/2336705614518582173/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_3495.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2336705614518582173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2336705614518582173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_3495.html' title='भोजन-भजन करो भरि पेटा'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-966771688149336838</id><published>2012-01-21T02:45:00.000-08:00</published><updated>2012-01-21T04:33:54.987-08:00</updated><title type='text'>पूंजीवादी संसदीय चुनाव एक धोखा है</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-EzH9SMihylw/TxqZxYOUy5I/AAAAAAAAAVE/kUMp3err2D8/s1600/R%255B1%255D.S.P.I.%2528M.-L.%2529%2527S%2BGENERAL%2BSECERATRY%2BaANAND%2BPRAKASH%2BMISHRA%2B1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-EzH9SMihylw/TxqZxYOUy5I/AAAAAAAAAVE/kUMp3err2D8/s200/R%255B1%255D.S.P.I.%2528M.-L.%2529%2527S%2BGENERAL%2BSECERATRY%2BaANAND%2BPRAKASH%2BMISHRA%2B1.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5700037351985957778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की अधिघोषणा हो चुकी है। छोटी-बड़ी सभी पार्टियां अधिक से अधिक सीटें हासिल करने के लिए दलीय जोड़-तोड़ की कवायद में लगी हैं। इस आपाधापी के बीच एक ऐसी पार्टी भी मैदान में उतरी है, जो बेहिचक मतदाताओं से अपील करने जा रही है कि यदि वे उसकी विचारधारा से सहमत हों, तो सक्रिय सहयोग करें। यदि सहमत न हों, तो कृपया मत देकर भ्रमित न करें। यह पार्टी है, भारत की क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी आरएसपीआई (एमएल), जिसने उत्तर प्रदेश में एक दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों से अपने प्रत्याशी खड़े करने का निर्णय लिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री आनंद प्रकाश मिश्र के इलाहाबाद आगमन पर रीतेश श्रीवास्तव ने उनसे विस्तृत वार्ता की। पेश हैं प्रमुख अंश&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; विधानसभा के इस चुनाव में आपकी पार्टी की क्या भूमिका होगी?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; पिछले चुनाव की भांति इस बार भी पार्टी उत्तर प्रदेश के लगभग एक दर्जन प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों से अपने प्रत्याशी खड़े कर रही है। पार्टी प्रत्याशी न तो मतदाताओं से वोट की भीख मांगेंगे, न कोई चुनावी वादे करेंगे और न ही हम किसी राजनीतिक पार्टी या मोर्चे से गठबंधन करेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; आपकी पार्टी तो संसदीय चुनावों को आमजनों के लिए धोखा बताती है, फिर प्रत्याशी क्यों?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; जी हां, हमारी पार्टी की स्पष्ट मान्यता है कि जब तक पूंजीवादी व्यवस्था कायम रहेगी, पूंजी की सत्ता रहेगी, तब तक इन चुनावों से श्रमिक, शोषितजनों का हित पूरा होना संभव नहीं। पूंजी के ही हित पूरे होंगे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; क्रांति से आपका क्या मतलब है?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; देखिए, क्रांति का अर्थ खून-खराबा, रक्तपात या जातीय-व्यक्तिगत हिंसा नहीं है। जैसा कि कुछ माओवादी संगठन समझते-करते हैं। क्रांति का अर्थ भी शहीद भगत सिंह ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि मौजूदा पूंजीवादी आर्थिक सामाजिक राजनीतिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन जरूरी है। मौजूदा पूंजीवादी आर्थिक ढांचे में सारा सामाजिक उत्पादन मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसे बेचकर मुनाफा कमाने के लिए होता है। हमारा उद्देश्य ठीक इससे उलट ऐसे आर्थिक ढांचे का निर्माण करना है, जिसमें समाज का सारा उत्पादन मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए हो। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; क्या यह संभव है?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; यह संभव-असंभव की बात नहीं है। क्योंकि समाज को आगे ले जाने का यही एकमात्र मार्ग है। विश्व की पूंजीवादी ताकतों ने तमाम षडयंत्रों से आज इसी मार्ग को अवरुद्घ कर रखा है। जिसके कारण मानवीय जीवन की उपजी विकराल समस्याओं के चलते पूरा विश्व ही मिट जाने के कगार पर पहुंच गया है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; फिर क्रांति कब और कैसे होगी?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;  देखिए, क्रांति किसी व्यक्ति अथवा पार्टी के न तो चाहने मात्र से होती है और न ऊपर से थोपी जा सकती है। जैसा कि माओवादी नक्सलपंथी सोचते हैं। क्रांति तो राजनीतिक क्रियाशीलता की पराकाष्ठा होती है। इसके लिए आम श्रमिक शोषितजन खासतौर पर मजदूर वर्ग के बीच क्रांतिकारी समाजवादी चेतना को ले जाना होगा। श्रमिक शोषितजन आंदोलन के साथ समाजवादी चेतना को जोड़ना होगा। यही काम हमारी पार्टी पूरी दृढ़ता के साथ कर रही है और इसलिए वह चुनाव के दौरान प्रत्याशी भी खड़ा करती है, न कि झूठे वादे कर चुनाव जीतने के लिए। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; इस चुनाव में पार्टी के मुद्दे क्या होंगे?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;  पहला मुद्दा जाति, धर्म, वर्ण, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र, अगड़ा-पिछड़ा, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक आदि विघटनकारी समाजघाती प्रवृत्तियों के बल पर संचालित पूंजीवादी हिंसात्मक वर्ग, राजनीति-राजनीतिक षडयंत्रों का भंडाफोड़ करना है। मजदूर वर्ग में समाजवादी चेतना का प्रसार करना, जिससे उन का विकास संभव हो। राज्यों के विभाजन और कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी पार्टी अपना मुद्दा बनाएगी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; उत्तर प्रदेश को चार छोटे राज्यों मे बांटने का मुद्दा उठा है, उस पर आपका क्या कहना है?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; हमारी पार्टी इसका प्रबल विरोध करेगी। क्योंकि बड़े राज्य को बांटकर छोटा राज्य बनाने से खेत खलिहान या कल-कारखाने नहीं बढ़ते। केवल नेताशाही-नौकरशाही बढ़ती है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt; भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संदर्भ में आपकी पार्टी का क्या नजरिया है?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; देखिए, यह आंदोलन मध्यमवर्गीय ताकतों द्वारा आम लोगों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटाने के लिए नियोजित किया गया है। कोई मनुष्य भ्रष्टाचारी और बेईमान होकर जन्म नहीं लेता। सब कुछ इसी समाज से ग्रहण करता है। अतएव इस सामाजिक राजनीतिक आर्थिक ढांचे को बदलकर ही इसकी बुराइयों को दूर किया जा सकता है। कानून बना देने से यदि अपराध खत्म हो जाते, तो हत्या, चोरी, डकैती जैसे अपराध कब के खत्म हो चुके होते। आतंकवाद, अराजकतावाद की तरह भ्रष्टाचार भी पूंजीवाद की उपज है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-966771688149336838?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/966771688149336838/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/966771688149336838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/966771688149336838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_21.html' title='पूंजीवादी संसदीय चुनाव एक धोखा है'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-EzH9SMihylw/TxqZxYOUy5I/AAAAAAAAAVE/kUMp3err2D8/s72-c/R%255B1%255D.S.P.I.%2528M.-L.%2529%2527S%2BGENERAL%2BSECERATRY%2BaANAND%2BPRAKASH%2BMISHRA%2B1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-4679000107322618428</id><published>2012-01-17T01:21:00.000-08:00</published><updated>2012-01-17T01:43:35.063-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>चार गो भतार ले के लड़े 'सतभतरी'</title><content type='html'>&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; line-height: 115%; "&gt;&lt;span  &gt;अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span &gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;कल सुबह-सुबह मुसद्दीलाल गली में खुली पंसारी की दुकान के सामने मिल गए। ठंड में भी वे पसीने-पसीने हो रहे थे। उनकी हालत देखकर मुझे ताज्जुब हुआ। मैंने पूछा&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, '&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;अमां मियां! किसी मैराथन दौड़ से भाग लेकर आ रहे हैं क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;इस उम्र में इतनी भागदौड़ अच्छी नहीं होती।&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span &gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;मेरी बात सुनकर सांस को काबू में करते हुए मुसद्दीलाल बोले&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, '&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;चाय पत्ती खत्म हो गई थी। उसे लेने आया था। आओ&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;घर चलकर चाय पीते हैं।&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने घर की राह ली। घर में पहुंचकर बातचीत कब लोकगायक बालेश्वर के गीतों से जुड़ गई&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;पता ही नहीं चला। मुसद्दीलाल ने अचानक पूछ लिया&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, '&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;यार! बालेश्वर के एक गीत की लाइन है &lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;चार गो भतार ले के लड़े सतभतरी।&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;  &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;इसका क्या मतलब है। मैं कई दिनों से इस पर दिमाग खपा रहा हूं&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;लेकिन अर्थ है कि पकड़ में ही नहीं आ रहा है।&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span &gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;मुसद्दीलाल के इस सवाल पर मैं ठिठक गया। बात ईरान की हो रही हो और कोई होनोलूलू के बारे में पूछ बैठे&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;तो किसी की भी बोलती बंद हो जाएगी। थोड़ी देर बाद मैंने समझाने का प्रयास किया&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, '&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;अगर इसका सीधा सादा राजनीतिक अर्थ निकाला जाए&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;तो यह है कि सात पतियों (यूपीए&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;एनडीए&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;वाम मोर्चा&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;तीसरा मोर्चा...जैसे गठबंधन) वाली सत्ता सुंदरी अपने चार पतियों को लेकर चुनाव मैदान में है। अब आपको तो यह मालूम ही है कि हमारे देश की सत्ता सुंदरी पिछले कुछ दशकों से एक भतारी (एक पार्टी की सरकार वाली) नहीं रह गई है। हर चुनाव के बाद कुछ पार्टियां गठबंधन बनाकर सत्ता सुंदरी के स्वामी बन जाते हैं। बाकी दल उसके प्रेमी की तरह सत्तारूढ़ दलों पर विभिन्न आरोप लगाकर संतोष कर लेते हैं।&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span &gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;मुसद्दीलाल ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, '&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;क्या इसका यह मतलब है&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;मैं तो इसे गाली समझ बैठा था।&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span &gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;देखो मियां! अगर तुम &lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;भतार&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;' &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;शब्द से बिदक रहे हो&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;तो यह शब्द संस्कृत के &lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;भर्तार&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;' &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;यानी भरण-पोषण करने वाला (पति&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;स्वामी) से आया है। यह शब्द अपने आप में बुरा नहीं है&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;लेकिन इसका उपयोग अगर गाली देने में किया जाए&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;तो बुरा जरूर है। इसमें शब्द का कोई दोष नहीं है। अब अगर किसी महिला से यह कहा जाए कि उसके एक पति है&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;तो यह महिला के लिए गौरव की बात होगी। लेकिन उसे अगर सतभतरी (सात पतियों वाली) कहा जाए&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;तो यह निश्चित रूप से गाली है। आज देश के जो हालात हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;उसमें राजनीति खुद एक गाली है। जिस देश में लोकतंत्र की आड़ में गुंडे&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;बदमाश&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;भ्रष्टाचारी&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;बलात्कारी और देश से विश्वासघात करने वाले चुनाव लड़कर सत्ता का सुख&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt; &lt;span style="font-family: arial; line-height: 25px; text-align: -webkit-auto; "&gt;भोगते &lt;/span&gt;हों&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;वहां की जनता के लिए यह विडंबना किसी गाली से कम है क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;अब देखिए न! पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;सभी सत्ता सुंदरी के स्वयंवर में जीतने की प्रत्याशा से मरे जा रहे हैं। वे हत्यारों&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों को अपने साथ करने और उन्हें अपनी पार्टी का टिकट देकर जितवाने की हर संभ व कोशिश कर रहे हैं। एक भ्रष्ट और लुटेरी पार्टी का बदनाम मंत्री निकाले जाने पर दूसरी पार्टी में जाते ही दूध का धुला हो जाता है। ऐसे दौर में किसी &lt;span style="font-family: arial; line-height: 25px; text-align: -webkit-auto; "&gt;सभ्य &lt;/span&gt; और ईमानदार व्यक्ति को नेता कह दीजिए&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;वह उसी तरह गुस्सा हो जाता है&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;जैसे उसे कोई भद्दी गाली दी गई हो।&lt;/span&gt;&lt;span style="line-height: 115%; font-family: '4C Gandhi'; "&gt;' &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="line-height: 115%; font-family: Mangal; "&gt;मेरी इस बात से मुसद्दीलाल संतुष्ट हो गए और मैं चाय पीकर अपने घर चला आया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:18.0pt;line-height: 115%;font-family:&amp;quot;4C Gandhi&amp;quot;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-4679000107322618428?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/4679000107322618428/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_17.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/4679000107322618428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/4679000107322618428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_17.html' title='चार गो भतार ले के लड़े &apos;सतभतरी&apos;'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-2408351957041136832</id><published>2012-01-12T03:10:00.000-08:00</published><updated>2012-01-12T03:17:53.311-08:00</updated><title type='text'>‘राग दरबारी’ को लेकर मलाल भी था</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-orIKN4IB6Gw/Tw7BRhzBbXI/AAAAAAAAAU0/dYMlHi5JGO4/s1600/IMG_6456.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-orIKN4IB6Gw/Tw7BRhzBbXI/AAAAAAAAAU0/dYMlHi5JGO4/s200/IMG_6456.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696703085544566130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;span &gt;प्रख्यात उपन्यासकार एवं व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे। उपन्यास ‘राग दरबारी’ के माध्यम से ग्रामीण जीवन में आने वाली मूल्यहीनता को जिस प्रामाणिकता और साहस के साथ श्री शुक्ल जी ने उकेरा, वह अद्वितीय है। पिछले दिनों स्व. श्रीलाल शुक्ल जी को लखनऊ के एक अस्पताल में 45वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ज्ञानपीठ अकादमी से जुड़े प्रख्यात साहित्यकार और व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ से राष्ट्रीय साप्ताहिक ‘हमवतन’ के स्थानीय संपादक अशोक मिश्र ने बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;आप इन दिनों ज्ञानपीठ से जुड़े हुए हैं, इसलिए सबसे पहले स्व. श्रीलाल शुक्ल जी को दिए गए ज्ञानपीठ पुरस्कार से ही बात शुरू करते हैं। श्रीलाल जी को तब ज्ञानपीठ दिया गया, जब वे मरणासन्न हालत में थे। एक मरणासन्न युगदृष्टा साहित्यकार ऐसी हालत में न   तो उस सम्मान से उत्साहित होकर कोई नवसृजन कर सकता है, न ही उस सम्मान का आनंद उठा सकता है। आपको यह सब कुछ गलत नहीं लगता है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- आपका कहना बहुत हद तक सही है, लेकिन ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करने की एक अपनी प्रक्रिया है। ज्ञानपीठ प्रदान करने वाली समिति किसी एक ही भाषा के साहित्यकारों पर विचार नहीं करती है। सभी भाषा के मूर्धण्य साहित्यकारों को ध्यान में रखना पड़ता है। एक बार जब किसी भाषा के साहित्यकार को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाता है, तो उस भाषा के साहित्यकारों पर तीन साल तक विचार नहीं होता। वरिष्ठ साहित्यकार और व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल और वरिष्ठ कहानीकार अमरकांत जी को एक साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार इस बार इसीलिए दिया गया कि पता नहीं, अगली बार जब हिंदी भाषा के साहित्यकारों पर विचार हो और उस समय तक इन दोनों वरिष्ठ साहित्यकारों में से पता नहीं, कौन रहे और कौन न रहे। देखिए, आज श्रीलाल शुक्ल जी हम सबका साथ भी छोड़ गए।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;क्या आपको नहीं लगता कि श्रीलाल शुक्ल जी या अमरकांत जी को ज्ञानपीठ देने में काफी देर हो गई?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- हिंदी भाषा में इतने अच्छे-अच्छे और कालजयी रचनाकार हैं कि उनके चयन में काफी देर हो जाती है। हां, यदि वरिष्ठ साहित्यकारों, अब श्रीलाल शुक्ल जी को ही उदाहरण लें, को अगर उन्हें कुछ साल पहले ज्ञानपीठ मिला होता, तो वे इसका सुख उठा सकते थे। आज से लगभग छह साल पहले जब श्रीलाल शुक्ल जी अस्सी साल के हुए थे, तभी से वे बीमार रहने लगे थे। कभी स्मृति लोप के शिकार हो जाते थे, तो कभी कोई दूसरी बीमारी हो जाती थी। यदि तभी उन्हें यह पुरस्कार मिल जाता, तो शायद अच्छा होता।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;कहा जाता है कि श्रीलाल जी को तो पुरस्कार देने पड़े हैं। विभिन्न पुरस्कार देने वाली समितियां या संस्थाएं उन्हें सम्मानित करके अपना सम्मान बढ़ा गई हैं। आप इससे कितना सहमत हैं?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- ऐसी बात नहीं है। उनकी पहचान सिर्फ ‘राग दरबारी’ से ही नहीं है। अपनी पहली कृति ‘अंगद का पांव’ भी काफी चर्चित रही है। उनकी रचनाओं में भाषा और सरोकारों का जो लालित्य है, वह बेजोड़ है। तुलसी दास ने जीवनभर राम कथा कही, लेकिन ‘रामचरित मानस’ लिखकर उन्होंने जो हासिल किया, उसका कोई मुकाबला नहीं है। कोई पुरस्कार भी नहीं। जिस तरह तुलसी दास के ‘रामचरित मानस’, मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ का कोई साम्य नहीं है, उसी तरह श्रीलाल शुक्ल जी के ‘राग दरबारी’ का कोई साम्य नहीं है। यह व्यंग्य प्रधान उपन्यास लिखकर श्री शुक्ल जी ने जिन ऊंचाइयों को छू लिया था, वह अद्वितीय है। ‘राग दरबारी’ एक विलक्षण कृति है। उसमें ग्रामीण भारत का जो विवेचन हुआ है, वह अद्भुत है। अपने जीवनकाल में श्रीलाल शुक्ल जी ने बातचीत के दौरान कई बार इस बात पर खेद व्यक्त किया कि ‘राग दरबारी’ ने उनकी दूसरी कृतियों को दबा दिया। ‘मकान’,  ‘विश्रामपुर का संत’ और  ‘राग विराग’ जैसी रचनाओं की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी कि ‘राग दरबारी’ की हुई।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;‘राग दरबारी’ का शिवपालगंज तो आज पूरे भारत में दिखाई देता है। देश के लगभग सभी गांवों की वही दशा है, जो लगभग 45-46 साल पहले लिखे गए व्यंग्य उपन्यास ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल जी ने ‘शिवपालगंज’ नामक गांव को दर्शाया था।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- दरअसल, श्रीलाल शुक्ल जी भविष्य दृष्टा थे। ‘राग दरबारी’ का शिवपालगंज ही नहीं, बल्कि वे सभी संस्थाएं, जिनका चित्रण श्री शुक्ल जी ने किया था, आज भी उसी रूप में दिखाई देती हैं। चाहे वह स्कूल-कालेजों की राजनीति और भ्रष्टाचार हो, मठों-मंदिरों को लेकर चल रही उठापटक हो या फिर राजनीतिक संस्थाओं का विकृत रूप, सभी पक्षों पर शुक्ल जी ने सम्यक दृष्टि डाली और उसका जैसे एक्सरे करके सबके सामने पेश कर दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;व्यंग्य लेखन क्षेत्र में कभी हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल की त्रयी काफी मशहूर थी। दुर्भाग्य से त्रयी के तीनों मजबूत स्तंभ ढह चुके हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि व्यंग्य क्षेत्र का सिंहासन आज खाली हो चुका है। उस सिंहासन का कोई वारिस दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- देखिए, श्रीलाल शुक्ल जी के जाने के बाद एक रिक्तता तो जरूर आई है, लेकिन सिंहासन खाली होने जैसी बात नहीं है। पहले की तरह योजनाबद्ध और तैयारी करके व्यंग्य लिखने वाले साहित्यकार भी नहीं रहे। अखबारों में छिटपुट व्यंग्य लिखा जा रहा है, लेकिन इनमें लिखने वालों से कहा जाता है कि दो सौ-ढाई सौ शब्दों में लिखकर दीजिए। ऐसे में कोई क्या बढ़िया व्यंग्य लिखेगा! व्यंग्य पर भी एक व्यंग्य यह है कि आज का व्यंग्यकार ‘अटल जी के घुटने पर’, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के अनशन पर लिख रहा है। ऐसे व्यंग्यकारों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं। हरिशंकर परसार्इं जैसी विदग्ध दृष्टि, समाज और व्यंग्य की समझ, शरद जोशी जैसी चुटीली और पैनी भाषा आज के व्यंग्यकारों में दिखाई देती है क्या? व्यंग्य लिखने के लिए सबसे पहले साहस की जरूरत होती है। जब तक साहित्यकार में सच लिखने का साहस नहीं होगा, वह उच्च कोटि का साहित्यकार नहीं हो सकता। जहां तक व्यंग्य विधा की बात है, आज भी कुछ लोग अच्छा लिख रहे हैं। ज्ञान चतुर्वेदी, गोपाल चतुर्वेदी अच्छा लिख रहे हैं। दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया की कहानियों में व्यंग्य भरपूर है। ये साहित्यकार इसे एक अलग विधा के रूप में न अपनाकर कहानियों में ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। हां, कुछ लोग इसे एक विधा मानकर लिख रहे हैं।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;एक   बार बातचीत के दौरान राजनीतिक दलों के संदर्भ में श्रीलाल शुक्ल जी ने कहा था कि मैं सड़क के बीच कुछ कदम हटकर बार्इं ओर खड़ा हूं। इसको आप किस रूप में लेते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- हां, यह बात उन्होंने अखिलेश से हुई बातचीत में कही थी। यह बातचीत तद्भव में छपी भी थी। बात यह है कि वे कभी किसी लेखक संघ या संगठन से जुड़े तो नहीं रहे, लेकिन जनवादी विचारधारा से उनका जुड़ाव जरूर था। आज के समय में जो भी लिख रहा है, वह वाम ओरिएंटेड होगा ही। उसका वाम विचारधारा से जुड़ाव नैसर्गिक है। लेकिन यह भी सही है कि किसी पार्टी का कार्ड होल्डर हो जाने से कोई लेखक नहीं हो जाता है। यदि ऐसा होता, तो आज हर गली-कूचे में लेखक ही लेखक दिखाई देते।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;श्रीलाल शुक्ल जी का सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य उपन्यास  ‘राग दरबारी’ है, तो दूसरी तरफ ‘आदमी का जहर’ जैसा जासूसी उपन्यास भी।  इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- एक बार उनसे इस मुद्दे पर बातचीत हुई थी। श्री शुक्ल जी का कहना था कि ‘आदमी का जहर’ या ‘सीमाएं टूटती हैं’ जैसा उपन्यास मनहूसियत से मुक्ति पाने के लिए लिखे गए थे। वे कहते थे कि हिंदी साहित्यकारों की छवि ऐसी बना दी गई है कि वह जैसे कुछ और लिख ही नहीं सकता। ‘आदमी का जहर’ आप पढ़ें, तो उसमें भी किस्सागोई है। ‘राग दरबारी’ को सामने रखकर उनकी अन्य रचनाओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;strong style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: transparent; "&gt;अगर आप श्रीलाल जी के संपूर्ण साहित्य का गंभीर विवेचन करें, तो उसमें व्यक्ति, समाज और तंत्र किसी न किसी रूप में जरूर मौजूद है। इसके पीछे आप क्या कारण मानते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 0px; outline-style: initial; outline-color: initial; font-size: 13px; vertical-align: baseline; background-image: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; background-color: rgb(255, 255, 255); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;- संपूर्ण तंत्र को जिस तरह श्री लाल शुक्ल जी ने समझा, उनकी इस समझ की तारीफ करनी होगी। पहले आईपीएस और बाद में आईएएस अधिकारी होने के नाते भी तंत्र को उन्होंने बखूबी समझा। आज तंत्र या राजनीतिक भ्रष्टाचार पर लिखने वाले कितने लोग हैं और उनकी रचनाओं में कितनी गहराई है, यह सबके सामने है। लेकिन श्रीलाल शुक्ल जी यह समझते थे कि किसी गरीब व्यक्ति की अप्लीकेशन कहां-कहां अटकती है, कहां-कहां बिना कुछ लिए-दिए काम नहीं होगा? वे कुछ भी लिखने से पहले पूरी तैयारी करते थे, उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल करते थे, तब कहीं जाकर वे लिखना शुरू करते थे। संयोग से उनका जीवन भी इस पूरे तंत्र के एक अंग के रूप में बीता। इसका उन्होंने अपने लेखन में भरपूर उपयोग किया।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1em; margin-right: 0px; margin-bottom: 1em; margin-left: 0px; padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; outline-width: 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line-height: 20px; text-align: -webkit-auto; "&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-2408351957041136832?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/2408351957041136832/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2408351957041136832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2408351957041136832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_12.html' title='‘राग दरबारी’ को लेकर मलाल भी था'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-orIKN4IB6Gw/Tw7BRhzBbXI/AAAAAAAAAU0/dYMlHi5JGO4/s72-c/IMG_6456.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-5711131430310076518</id><published>2012-01-06T22:53:00.000-08:00</published><updated>2012-01-06T22:54:41.072-08:00</updated><title type='text'>जिहाल-ए-मस्ती, मकुन-ब-रंजिश</title><content type='html'>&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: 4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;Ashok mishra&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: 4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;जिहाल-ए-मस्ती&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language: HI"&gt;मकुन-ब-रंजिश&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: 4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;बहार-ए-हिज्रां&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language: HI"&gt;बेचारा दिल है&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: 4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;सुनाई देती है जिसकी धड़कन&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: 4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;तुम्हारा दिल या हमारा दिल है।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: 4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;मेरे एक साथी ने इसका तर्जुमा (अनुवाद) कुछ इस तरह किया। एक प्रेमी-प्रेमिका हैं जो जिहाल-ए गांव में आए दिन मस्तियां करते रहते थे जिसकी वजह से मकुन गांव के लोग रंजिश रखने लगे। ऐसे में दोनों के मिलने-जुलने में बाधा पड़ने से बहार वाली रातें भी हिज्र (विरह) की रात बन गई और ऐसे में दोनों के दिल बेचारे मन मसोस कर रह गए। मिलने जुलने और मस्ती न हो पाने से प्रेमी युगल उच्चरक्तचाप के रोगी हो गए और एक दिन जब एक मेले में दोनों की मुलाकात हुई&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:4CGandhi;mso-hansi-font-family: 4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;तो वे यह नहीं समझ पाए कि यह दिल जो जोर-जोर से धड़क रहा है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:4CGandhi;mso-hansi-font-family: 4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;वह किसका है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:4CGandhi; mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;प्रेमी ने आखिर प्रेमिका से पूछ ही लिया कि यह धड़कन से सुनाई दे रही है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:4CGandhi; mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;वह तुम्हारी है या मेरी।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: 4CGandhi;mso-hansi-font-family:4CGandhi;mso-bidi-language:HI"&gt;मेरा ख्याल है कि आप भी इस तर्जुमा से सहमत होंगे।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-5711131430310076518?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/5711131430310076518/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_06.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5711131430310076518'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5711131430310076518'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post_06.html' title='जिहाल-ए-मस्ती, मकुन-ब-रंजिश'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-3602803795939103491</id><published>2012-01-02T23:44:00.000-08:00</published><updated>2012-01-02T23:54:22.109-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>मनरेगा बनाती करोड़पति</title><content type='html'>&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span &gt;&lt;i&gt;&lt;span&gt;-&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;अशोक &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;span&gt;&lt;i&gt;मिश्र&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;मैं सुबह अखबार पढ़ने में तल्लीन था। त&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भी सुपुत्र चिंटू ने सवाल दागा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;पापा! अच्छा यह बताइए&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;लोग करोड़पति कैसे बन जाते हैं। चुनाव जीतने से पहले तक कुछ हजार या लाख रुपये की औकात रखने वाला विधायक&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;सांसद&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;मंत्री ऐसे कौन-से मंत्र का जाप करता है कि वह देखते ही देखते करोड़पति हो जाता है। इन लोगों के घर में पैसे का कोई पेड़ उग आता है क्या&lt;/span&gt;?’&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;मैंने अखबार एक ओर रखते हुए कहा&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;बेटा! मनरेगा इन लोगों को करोड़पति बनती है।&lt;/span&gt;’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;मेरे जवाब से चिंटू संतुष्ट नहीं हुआ। बोला&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;पर पापा...अपने पड़ोस में रहने वाले मुसद्दीलाल अंकल &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भी तो मनरेगा कार्ड होल्डर हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;लेकिन वे करोड़पति नहीं बने&lt;/span&gt;?’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;मैंने उदासीन संप्रदाय के धर्मोपदेशक की तरह कहा&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;बेटा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;यह बात मैं नहीं कहता&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;सरकार और सरकारी आंकड़ा कहता है। अब देखो न! आज ही अखबार में एक सरकारी विज्ञापन छपा है। इसके मुताबिक कोई सुनील कुमार हैं जो पहले बेरोजगार थे। मनरेगा के तहत कंप्यूटर आपरेटर बनते ही करोड़पति हो गए।&lt;/span&gt;’ &lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;तो फिर मुसद्दीलाल अंकल क्यों नहीं करोड़पति बने&lt;/span&gt;?’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;बेटा कारण जाने को पूरी तरह उत्सुक था&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;और फिर अफसर-वफसर&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;सांसद-विधायक&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;मंत्री-संतरी कैसे करोड़ों में खेलने लगते हैं।&lt;/span&gt;’&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;तुम्हारे मुसद्दीलाल अंकल ने मेहनत नहीं की होगी। बिना मेहनत किए इस दुनिया में कुछ &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भी हासिल नहीं होता। अ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भी तुम जिन लोगों की बात कर रहे थे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;वे कितनी मेहनत करते हैं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;मालूम है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;पहले मनरेगा के तहत अपना नाम रजिस्टर पर दर्ज करवाते हैं। कार्ड होल्डर बनते हैं। फिर जमीन खोदते हैं। गर्मी हो&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;बरसात हो या कड़ाके की ठंड&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;हानि-ला&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-theme-font: minor-bidi;mso-bidi-language:HI"&gt;भ&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt; की परवाह किए बिना ये अनवरत कार्य करते रहते हैं। इन्हें अगर जमीन खोदने का मौका मिले&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;तो यह नहीं देखते कि जमीन कहां की है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;उत्तर प्रदेश की है या महाराष्ट्र की। बंगाल की है या केरल की। एकदम साधु भा&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;व से जमीन खोदते रहते हैं। इन्हें कभी&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt; भा&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;षा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;प्रांत या जाति के नाम पर लड़ते देखा है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;इनका एक मात्र ध्येय होता है कि किसी &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भी तरह करोड़पति बनना है। इनकी आंख अर्जुन की तरह &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भ्रष्टाचार की कड़ाही पर टंगी मछली पर टिकी होती है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-theme-font:minor-bidi;mso-bidi-language: HI"&gt;भ&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;ले ही उसके लिए कितनी &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भी मेहनत करनी पड़े। ये मेहनत करने से कभी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt; पीछे नहीं हटते।&lt;/span&gt;’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;मैं अपने कुलदीपक चिंटू को समझा रहा था।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;लेकिन लोगों को लड़ाते तो हैं&lt;/span&gt;?’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;चिंटू का अगला सवाल था।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;मैंने बेटे को समझाया&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;बेटा! ये अपनी कमाई बढ़ाने में इतने तल्लीन रहते हैं कि इन्हें फालतू बातें सोचने या करने का मौका ही नहीं मिलता है। अच्छा मान लो कि अपनी मेहनत और लगन से करोड़पति बनने वाले ये लोग किसी से कहें कि आपस में लड़ो&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;तो क्या इसमें उनका कोई कुसूर है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;यह तो लोगों की नासमझी और बेवकूफी है कि वे किसी के कहने पर लड़ पड़ते हैं।&lt;/span&gt;’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;मुझे लगा कि मेरी बात बेटे की समझ में आ रही है। मैंने अपनी बात अच्छी तरह से समझाने के इरादे से कहा&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;जो लोग मंत्रियों&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;सांसदों&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;विधायकों&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;अधिकारियों&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;क्लर्कों और चपरासियों के करोड़पति-अरबपति बनने पर चिढ़ते हैं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;कुढ़ते हैं या हो-हल्ला मचाते हैं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;वे या तो नादान हैं या फिर काहिल और कामचोर। लूट-खसोट&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-theme-font:minor-bidi;mso-bidi-language: HI"&gt;भ&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;्रष्टाचार जैसी बातें वही करते हैं जो कुछ नहीं कर सकते। ऐसे लोग अपने परिवार पर ही नहीं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;देश-प्रदेश पर बोझ होते हैं। अरे&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;जो आदमी एक छोटा-सा &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt;भ्रष्टाचार नहीं कर सकता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;वह क्या खाक समाजसेवा करेगा। जो करोड़पति या अरबपति होगा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;वही किसी को दस-बीस हजार या लाख की मदद करेगा। जिसके पास फटी गुदड़ी होगी&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;वह क्या खाक किसी को सुख दे पाएगा। इसलिए बेटा! खूब पढ़ो या नहीं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;लेकिन मनरेगा कार्ड होल्डर होकर सुनील कुमार की तरह करोड़पति बन जाओ&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;मेरी और तुम्हारी मम्मी की यही इच्छा है।&lt;/span&gt;’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;बेटे चिंटू ने मेरे पैर छूकर कहा&lt;/span&gt;, ‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;पापा! आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन मिलता रहा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI"&gt;तो यह मनरेगा एक दिन जरूर मुझे करोड़पति बनाएगी।&lt;/span&gt;’&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span &gt;&lt;i&gt;(&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;व्यंग्यकार साप्ताहिक &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;हमवतन&lt;/span&gt;’ &lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;के स्थानीय संपादक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-3602803795939103491?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/3602803795939103491/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3602803795939103491'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3602803795939103491'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='मनरेगा बनाती करोड़पति'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-712433905172526930</id><published>2011-12-26T23:58:00.001-08:00</published><updated>2011-12-26T23:59:18.664-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गीता विवाद'/><title type='text'>दो संस्कृतियों को न समझ पाने की नादानी</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदू धर्म ग्रंथ भगवद्गीता को लेकर इन दिनों भारत और रूस में एक विवाद चरम पर है। दरअसल यह विवाद श्रीमद्भागवत पर नहीं बल्कि इस्कॉन समूह के संस्थापक भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की लिखी पुस्तक ‘भगवद गीता एज इट इज’ पर है। रूस के क्रिश्चयन आथोर्डोक्स चर्च से जुड़े कुछ लोगों ने इसी साल जून के महीने में साइबेरिया की अदालत में एक मुकदमा दायर करके इसे खतरनाक और चरमपंथ को बढ़ावा देने वाला बताया है। इस विवाद की परिणति क्या होगी? इस विवाद के चलते भारत-रूस संबंधों पर क्या फर्क पड़ेगा जैसे मुद्दों पर विचार करने से पूर्व अगर हम इस तथ्य की पड़ताल करें कि आजादी के बाद भारत के सोवियत गणराज्य का कई दशकों तक पिछल्लगू बनने के बाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने से क्या हासिल हुआ? अगर हम गौर करें, तो आजादी के बाद कथित समाजवादी जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बनने वाली सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर वहां की सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में बहुत कुछ उधार लिया। हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति और आचार-विचार को सीखने-समझने को वहां से भी साहित्यकार, कलाकार, रंगकर्मी और अधिकारी आते रहे, हमारे देश से भी बहुत बड़ी संख्या में लोग जाते रहे। भारत-रूस से आने जाने वाले ये सामाजिक और सांस्कृतिक कर्मी प्राप्त ज्ञान को वहां की परिस्थितियों के अनुरूप आम जनता की भाषा में ढालकर लोगों को समझाने और बतलाने में नाकाम रहे। इसी नाकामी का नतीजा है वर्तमान गीता विवाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीमद्भागवत का भारतीय जीवन में क्या महत्व है? इसका दर्शन भारतीय जीवन को किस तरह प्रभावित करता है या सचमुच यह चरमपंथी दर्शन है? इस पर विचार करने की बजाय अगर सिर्फ विवाद पर ही बात की जाए, तो इसके पीछे दो सभ्यता ओं, संस्कृतियों और जीवन दर्शन में अंतर को न समझ पाने का मामला है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि एशिया महाद्वीप में सबसे पहली सभ्यता का विकास वोल्गा नदी के किनारे हुआ था। यह वोल्गा नदी रूस में उतना ही महत्व रखती है जितनी कि भारत में गंगा। वोल्गा नदी के किनारे विकसित हुई सभ्यता के कुछ लोगों ने जब चारागाह और भोजन की तलाश में अफगानिस्तान के रास्ते भारत की ओर रुख किया और वे भारतीय उपमहाद्वीप में बसते चले गए। अगर हम इस बात को स्वीकार कर लें, तो वोल्गा नदी के किनारे विकसित सभ्यता की ही एक शाखा भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान आदि में फली-फूली और विकसित हुई। यह भी सही है कि एक ही मूल की सभ्यताएं जब दो जगहों पर पुष्पित-पल्लवित हो रही थीं, तो वे अपने मूल से अलग होकर भी किसी हद तक जुड़ी हुई थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्द, आचरण, मान्यताएं और परंपराओं में काफी हद तक समानता थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उन शब्दों, आचरणों, मान्यताओं और परंपराओं का स्थान नए शब्द, मान्यताएं, परंपराएं लेती गर्इं। बाद में तो एक समय ऐसा आया, जब इन दोनों सभ्यताओं को जोड़ने वाली चीजें ही अप्रासंगिक होकर मिट गईं। रहन-सहन, बोली-भाषा, आचार-विचार और प्रशासनिक व्यवस्था में जमीन-आसमान का अंतर आ गया। हमारे देश के प्रमुख ग्रंथ वहां के जनजीवन में अपना महत्व खो बैठे। ऐसे में कोई जरूरी नहीं है कि हमारे देश की प्रमुख मानी जाने वाली गीता, रामायण जैसे ग्रंथ रूस या दुनिया के किसी अन्य देश के लिए महत्वपूर्ण हों। आखिर हमारे देश की कितनी फीसदी आबादी रूस, चीन, अमेरिका, मिस्र या अफगानिस्तान आदि देशों के धर्म ग्रंथों, धार्मिक आचार-विचार या मान्यताओं के बारे में जानती है। बमुश्किल एकाध फीसदी से भी कम। ऐसे में किसी व्यक्ति या समूह विशेष की नादानी को उस देश की सरकार या बहुसंख्यक आबादी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ऐसी ही नादानी के उदाहरण अपने ही देश में बहुत मिल जाएंगे। हमारे देश के वामपंथी दलों को ही लें। जब भी बात दर्शन की चलती है, वे मानवतावादी दार्शनिक कार्ल मार्क्स, रूसी क्रांति के अगुवा वी. लेनिन और चीनी क्रांति के नायक मात्से तुंग के दर्शन को अपनाने की बातें करते हैं। किसी भी देश के दर्शन की अच्छाइयों को ग्रहण करने में कोई बुराई नहीं है। कार्ल मार्क्स और लेनिन के क्रांतिकारी विचार आज भी सामयिक हैं, लेकिन जब हमारे देश के वामपंथी दल भारतीय जीवन शैली, विशेष काल-परिस्थितियों को ध्यान में रखे बगैर रूढ़िवादी तरीके से लागू करने की बात करते हैं, तो हंसी आती है। वे यह नहीं सोचते कि जिस युग में मानवतावादी लेनिन ने रूसी क्रांति का आह्वान करते हुए कहा था कि यदि क्रांतिकारी तत्व वेश्यालयों में मिलता है, तो कामरेडों को वहां भी जाना चाहिए। क्या आज की परिस्थितियों में ऐसा संभव है? कतई नहीं। ऐसी नादानी करने से हमें बचना चाहिए। गीता हमारे देश के लिए पवित्र वस्तु हो सकती है, लेकिन दुनिया के सभी देश उसे सिर माथे पर उठाए फिरें, ऐसा न तो संभव है, न व्यावहारिक। हां, इस विवाद का कूटनीतिक हल निकाला जा सकता है और ऐसा होना भी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-712433905172526930?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/712433905172526930/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_2305.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/712433905172526930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/712433905172526930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_2305.html' title='दो संस्कृतियों को न समझ पाने की नादानी'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-3512597870527155508</id><published>2011-12-26T23:50:00.000-08:00</published><updated>2011-12-26T23:51:28.175-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>नएवर्ष का स्वागत कीजिए, जनाब!</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लीजिए जनाब! महीने, सप्ताह और दिनों की चहारदीवारी पर पैर रखकर कूदता-फांदता नया वर्ष आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। उठिए, उठकर माशूका की तरह लपककर उसका मुंह चूमिए, हंसकर स्वागत कीजिए। नया साल है भई! आपके लिए नई आशाओं, नई कामनाओं और योजनाओं की सौगात लेकर आया है। भूल जाइए कि पिछले साल आपने कितनी रातें भूखे रहकर और सुबह की रोटी की जुगाड़ में सोचते-विचारते गुजारी हैं। यह भी भूल जाइए कि अभी आपको अपने बेटे या बेटी के स्कूल की फीस देनी है। बीवी की शॉल छेद के चलते ‘चलनी’ बन चुकी है और उसमें अब पैबंद लगाने की गुजांइश ही नहीं बची है। यह भी सही है कि महंगाई की मार ने आपकी कमर को लाठी जैसी सीधी रखने की जगह धनुष की तरह दोहरी कर दी है। अब अगर महंगाई का दबाव कुछ और बढ़ा, तो यह बिल्कुल ही टूट जाएगी। अगर यह टूटती है, टूट जाने दीजिए। लेकिन नए साल का स्वागत करने में पीछे रह गए, तो आपके अड़ोसी-पड़ोसी साल भर ताना मारेंगे। बीवी-बच्चों को तो उनके बीच ही रहना होता है, साल भर वे एहसास-ए-कमतरी (इन्फीरियारिटी कॉम्प्लेक्स) के चलते घुट-घुट कर जिएंगे। बच्चे नए साल के बाद जब स्कूल जाएंगे, तो वे अपने सहपाठियों को कैसे बताएंगे कि उनके डैडी उन्हें किस डिस्कोथेक या बार में ले गए। उन्होंने दिसंबर का आखिरी दिन कैसे सेलिब्रेट किया? पापा पड़ोस वाली आंटी के साथ कैसे नाचे? मम्मी बाजू वाले अंकल के साथ डिस्को करती हुई कितनी ‘क्यूट’ लग रही थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई मेरे! भले ही आपकी जेब ‘ठनठन गोपाल’ बोल रही हो, लेकिन आपके पास ‘प्लास्टिक मनी’ यानी क्रेडिट कार्ड तो है न! फिर काहे की चिंता। जानते हैं, मेरी गली के पीछे वाले पीपल के पेड़ के पास जो •िाखारी बैठता है, वह भी क्रेडिट कार्ड होल्डर है। पिछले हफ्ते उसने परेड के सामने भीख मांगने वाली माशूका को पजेरो गिफ्ट किया है। अगर आपके पास यह सब कुछ नहीं है, तो आपसे बड़ा घोंचू इस दुनिया में कोई दूसरा नहीं है। वैसे आपके पास एक मौका है। अभी नया साल आने में कुछ घंटों की देर है, आप चाहें तो किसी बैंक कर्मी या उसके दलाल से टांका  भिड़ा लें और फिर क्या! आपकी पांचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में होगा। मैंने आपको नए साल का मौज-मस्ती के साथ स्वागत करने का बेहतरीन आइडिया दे दिया है। अब देर किस बात की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाइए, नया साल सेलिब्रेट कीजिए। भूल जाइए कि इस देश में कितने घोटाले हुए हैं। राजा, राडिया से लेकर सुखराम तक ने अपनी कितनी पुश्तों के सुख से जीने की व्यवस्था कर ली है। यदि मौका लगे, तो आप भी एकाध लंबा हाथ मारिए और देश को ठेंगे पर रखते हुए परिवार और मोहल्लेवालोंको ‘हैप्पी न्यू इयर’ कहें। मेरी तो यही दुआ है कि नया वर्ष आप सबके लिए शुभ हो। उनके लिए भी शुभ हो, जो किसी का गला काटकर अमीर बने हैं। नया साल उनके लिए भी मंगलमय हो, जो अपना गला कटाने के बावजूद जी रहे हैं। नया साल जहां राजा, राडिया, कनिमोझी जैसे भूतपूर्व और वर्तमान मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के लिए शुभ हो, तो वहीं रोज अपना खून-पसीना बहाने के बावजूद लुगाई की फटी धोती को नई में न बदल पाने वालों के लिए मंगलमय हो। लूटने वालों को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं। लुटने वालों को भी नया साल मुबारक हो। हो सके, तो आप भी मेरे लिए बस इतनी कामना कीजिएगा कि सबके सुखी हो जाने के बाद मुझे भी थोड़ा बहुत सुख हासिल हो जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-3512597870527155508?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/3512597870527155508/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3512597870527155508'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3512597870527155508'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_26.html' title='नएवर्ष का स्वागत कीजिए, जनाब!'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-5478178960346001857</id><published>2011-12-20T00:38:00.000-08:00</published><updated>2011-12-20T00:41:07.512-08:00</updated><title type='text'>मटुकनाथ-जूली लव कोचिंग सेंटर</title><content type='html'>अशोक मिश्र&lt;br /&gt;कोहरे की रजाई ओढ़े अगहनी सूरज की तरह मैं भी अपने बिस्तर पर अलसाया पड़ा था कि किसी फिल्मी गीत के पहले अंतरे की आखिरी लाइन ‘जूली ओ जूली...’ मेरे कानों में शहद घोलती-सी घुसी। मैं चौंक उठा कि इतना भावविभर होकर कौन जूली को टेरता फिर रहा है? यह आवाज घर के किसी सदस्य की थी नहीं। सो, मेरा चौंकना स्वाभाविक था। मेरी निगाहें दरवाजे की ओर उठीं, तो देखा कि पड़ोसी मुसद्दीलाल ‘आ जा रे, ओ मेरे दिलवर आ जा...’ गाते हुए किसी घुसपैठिये की तरह घुसे चले आ रहे थे। पड़ोसी मुसद्दीलाल की गिनती मोहल्ले के श्रेष्ठ रसिकजनों में होती है। मुसद्दीलाल को नायिका •ोद से लेकर प्रेम और शृंगार के सभी पक्षों का गंभीर ज्ञान है। मोहल्ले की फलां स्त्री या अमुक कन्या नवोढ़ा नायिका है या विदग्धा, यह मुसद्दीलाल उसे देखते ही झट से बता देते हैं।&lt;br /&gt;मैंने बिस्तर पर ही थोड़ा-सा स्थान बनाते हुए उन्हें बैठने का इशारा किया, ‘यह जूली भाभी जी की कोई सहेली या उनकी बहन है क्या? जिसको ‘हे खग, हे मृग.......’ की तर्ज पर मोहल्ले में खोजते फिर रहे हो?’ मेरी बात सुनते ही मुसद्दीलाल के चेहरे पर छाया शृंगार रस का भाव वीर रस में बदल गया। वे गुर्राते हुए बोले, ‘तुम हमेशा खीर में नमक डालकर सारा गुड़ गोबर कर देते हो। तुम्हें इसमें क्या मजा आता है!’&lt;br /&gt;मुसद्दीलाल के तेवर देखकर मैं सिटपिटा गया, ‘भाई साहब! आप यह बताने की कृपा करेंगे कि यह जूली कौन है? आप तो जानते ही हैं कि औरतों के मामले में मैं बचपन से ही निरा •ोंदू रहा हूं।’ मेरी बात सुनकर मुसद्दीलाल ने गहरी सांस ली और बोले, ‘ताज्जुब है कि तुम जूली को नहीं जानते। जूली लवगुरु मटुकनाथ की रानी ‘पद्मिनी’ है, जाने जिगर है, जाने बहार है जिसके लिए लवगुरु अपनी पत्नी से पिटे, अपने योग्य शिष्यों की मार खाई, बगलोल नारायण कालेज (बीएन कालेज, पटना) की मास्टरी गंवाई। अब उसी मास्टरी को लवगुरु और उनकी जाने जां जूली अपनी हिम्मत और संघर्ष की बदौलत हासिल करने में सफल हो गए हैं। अब वे कालेज में फिर से पढ़ाने जा रहे हैं। उनकी कक्षा में पढ़ने के लिए देशभर से रसिक और प्रेमीजन पटना पहुंच रहे हैं। मैं आपको भी पटना चलने का न्यौता देने आया था।’&lt;br /&gt;मैं कुछ कहता कि बगल के कमरे से मेरे सुपुत्र चुन्नू बाबू नमूदार हुए। मुसद्दीलाल और कुलभूषण चुन्नू बाबू की आंखें मिली। आंखों ही आंखों में एक गुप्त इशारा हुआ, जिसे मैं समझ नहीं पाया। चुन्नू बाबू बोले, ‘डैडी! मुझे पांच हजार रुपये चाहिए, पटना जा रहा हूं।’ यह सुनते ही मैं उछल पड़ा।&lt;br /&gt;‘क्या कहा.....पटना जाना है! वहां क्या है? चुपचाप पढ़ाई करो, परीक्षाएं सिर पर आ रही हैं।’ मुझे गुस्सा आ गया।&lt;br /&gt;‘पढ़ने ही तो जा रहा हूं।’ मेरे कुल तिलक चुन्नू का आवेशरहित जवाब था।&lt;br /&gt;‘पढ़ने जा रहे हो! वहां कौन-सी पढ़ाई होगी? मैं भी तो जानूं जरा?’&lt;br /&gt;‘लवगुरु से प्रेम पुराण पढ़ूंगा, जूली से नायिका •ोद सीखूंगा। सुना है कि ‘मटुकनाथ-जूली लव कोचिंग सेंटर’ में पढ़ने के लिए अमेरिका, कनाड़ा और आस्ट्रेलिया से भारी संख्या में लड़के-लड़कियां आ रहे हैं। डैड...आप तो जानते ही हैं कि सीटें लिमिटेड हैं। अंकल ने अपना और मेरे एडमिशन का जुगाड़ •िाड़ा लिया है। सिर्फ पांच हजार रुपये महीने में काम चल जाएगा।’ चुन्नू बाबू एक ही सांस में सारी बातें कह गए। मैं उल्लुओं की तरह बैठा उसका चेहरा देखता रहा। मुसद्दीलाल मेरी दशा देखकर मंद-मंद मुस्कुराते रहे। मैं समझ गया कि इन दोनों में साठगांठ हो गई है। मैंने अपना ब्रह्मास्त्र फेंका, ‘अरी भागवान! सुनती हो, तुम्हारा लाडला क्या कह रहा है। लवगुरु से प्रेम पुराण पढ़ने जा रहा है। जरा इस नामाकूल को समझाओ।’ &lt;br /&gt;इधर मैंने पत्नी को हांक लगाई, उधर वह चेहरे पर बत्तीस इंची मुस्कान समेटे कमरे में घुसी। उसने हाथों की ट्रे को टेबल पर रखते हुए कहा, ‘चुन्नू के पापा! जाने दीजिए उसे पटना। अगर वह प्रेम में विशेषज्ञता हासिल करना चाहता है, तो बुरा क्या है। एक फिल्म में राजकपूर कह गए हैं कि प्यार कर ले, नई तो यूं ही मर जाएगा। प्यार कर ले.....अगर मेरा बेटा प्यार सीखने जाना चाहता है, तो जाने दीजिए।’&lt;br /&gt;घरैतिन की बात सुनकर मैंने कहा, ‘अरी पागल! तू यह क्यों भूल जाती है कि प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय। क्या सदियों से प्रेम करना सिखाया जाता रहा है? यह तो समय आने पर इंसान खुद ही सीख जाता है।’&lt;br /&gt;‘पता नहीं किस दुनिया में रहते हैं आप। आजकल तो प्रेम बाड़ी में उपजता भी है और हाट में बिकता भी है। यह थ्योरी कब की बदल चुकी है। आप यह बताइए, सुबह उठकर मेरा बेटा स्कूल जाता है, शाम को तीन-चार बजे लौटता है। खाने-पीने के बाद वह ट्यूशन पढ़ने चला जाता है। शाम को छह सात बजे लौटता है, तो फिर एकाध घंटे के लिए खेलने चला जाता है। उसके बाद तुम सिर पर Þडंडा लेकर सवार हो जाते हो कि चलो पढ़ो। ऐसे में वह प्रेम का पाठ कब पढ़े। मोहल्ले के लड़के-लड़कियां ऐसे-ऐसे नायाब लव लेटर्स लिखते हैं कि अब आपको क्या बताऊं। उनकी काबिलियत और अपने बेटे की अज्ञानता पर मुझे कितनी शर्म आती है, यह आप क्या जानें। मोहल्ले में शर्म से मेरा सिर झुक जाता है।’ इतना कहकर घरैतिन ने खूंटे में बांध रखे पांच हजार रुपये निकाले और बेटे को देते हुए कहा, ‘लो बेटा! पांच हजार रुपये। इस महीने इतने में काम चलाओ। अगले महीने की फीस और खर्चे के छह हजार रुपये तुम्हारे डैडी तनख्वाह मिलने पर तुम्हारे खाते में ट्रांसफर करा देंगे।’ पैसा हाथ में आते ही बेटे ने बेमन से मेरा पैर छुआ और अपनी मम्मी को ‘बॉय’ करता हुआ निकल गया। उसके साथ ही पड़ोसी मुसद्दीलाल भी चलते बने।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-5478178960346001857?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/5478178960346001857/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_9077.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5478178960346001857'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5478178960346001857'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_9077.html' title='मटुकनाथ-जूली लव कोचिंग सेंटर'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-5522731391052187555</id><published>2011-12-20T00:36:00.000-08:00</published><updated>2011-12-20T00:38:21.900-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>ह्वाय दिस कोलावेरी डी!</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;दिल्ली के किसी पार्क में एक गधा गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए मुलायम घास चर रहा था। गधे के घास चरने की स्टाइल बता रही थी कि वह दिल्ली का रहने वाला है। तभी रखवाले की निगाह बचाकर गांव से आया एक दूसरा गधा पार्क में घुस आया। आते ही उसने न इधर देखा, न उधर। मुलामय घास को किसी भुक्खड़ की तरह भकोसने लगा। यह देखकर पार्क के बीचोबीच में बड़ी शान से चर रहा दिल्लीवासी गधा ‘ढेंचू-ढेंचू’ की आवाज करता हुआ दूसरे गधे की ओर दौड़ा। एक बार तो लगा कि वह दुलत्ती झाड़ ही देगा, लेकिन पास जाकर वह गुर्राया, ‘अबे बेवकूफ! तू कहां से घुस आया। जल्दी से दो-चार गफ्फे मार ले और चलता बन। अगर गेटकीपर ने देख लिया, तो तेरी वजह से मुझे भी बाहर जाना पड़ेगा।’ &lt;br /&gt;बाद में आया गधा दीन स्वर में बोला, ‘भइया! बड़ी मुश्किल से कई दिनों बाद हरी और मुलायम घास दिखी है। आज तो पेट भर खा लेने दो।’&lt;br /&gt;‘आज तो पेटभर खा लेने दो....बाप का माल है क्या?..’ दिल्लीवाले गधे ने हिकारतभरी नजरों से उसे देखते हुए कहा, ‘ठीक है, जल्दी से थोड़ी घास चरो और चलते-फिरते नजर आओ।’&lt;br /&gt;कुछ देर दोनों चरने के बाद पार्क से बाहर आ गए। पार्क के साइड में बने फुटपाथ पर दोनों खड़े पगुराते रहे। थोड़ी देर बाद दिल्ली वाला गधा पंचम सुर में दुलत्तियां झाड़कर गाने लगा, ‘ह्वाय दिस कोलावेरी डी।’ गांव से आए गधे को पार्क की मुलायम घास अब भी लुभा रही थी। वह एक बार फिर थोड़ी घास खाने की फिराक में था। उसने दिल्लीवाले गधे के गाने में व्यवधान डालते हुए कहा, ‘घास कितनी मुलायम है। काश कि पूरे देश में ऐसे ही चारागाह होते, तो हमें चारा के लिए गली-गली भटकना नहीं पड़ता।’&lt;br /&gt;गाने में व्यवधान पड़ने से झल्लाया गधा बोला, ‘अबे गधे! चारागाह तो पूरा देश है। देखते नहीं, इनसानों को। वे चरते तो अपने क्षेत्र में हैं, लेकिन पगुराने आते हैं दिल्ली। इनसानों के पगुराने के अड्डे हैं संसद और राज्यों की विधानसभाएं। मजे की बात तो यह है कि ये लोग पगुराने के पैसे भी लेते हैं। हां, इनमें होड़ इस बात की होती है कि कौन पक्ष में बैठकर पगुराएगा, कौन विपक्ष में। ये लोग जब चरकर अघा जाते हैं, तो ये देशी बनियों को चारागाह सौंप देते हैं चरने के लिए। ये बनिये गांव के गली-कूंचे से लेकर शहर के पॉश इलाकों में अपनी दुकान सजाकर बैठ जाते हैं। इन बनियों के भी कई गुट हैं, कई पार्टियां हैं, कई झंडे हैं। कुछ नेता नामधारी इंसान कभी इनको समर्थन देते हैं, तो कभी उनको।’&lt;br /&gt;‘तब तो सभी इंसानों की मौज होगी। सभी चरते होंगे।’ देहाती गधे ने उत्सुकता जताई।&lt;br /&gt;‘नहीं जी...गरीब कहे जाने वाले इंसान बेचारे मारे-मारे फिरते हैं। सुना है कि एफडीआई आने वाली है। यह क्या बला है, मुझे नहीं मालूम। लेकिन अपने मालिक के बेटे के मुंह से जो सुना है, उसके मुताबिक अपने देश के चारागाह में चरने के लिए अब विदेशी कंपनियां भी आएंगी। इक्यावन फीसदी अब ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां चरेंगी और उन्चास फीसदी देशी कंपनियां।’ इतना कहकर लयात्मक ढंग से दुलत्तियां झाड़कर दिल्लीवाला गधा एक बार फिर से गाने लगा, ‘ह्वाय दिस कोलावेरी कोलावेरी कोलावेरी डी।’ और देहाती गधा पार्क में घुसकर चरने लगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-5522731391052187555?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/5522731391052187555/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_4548.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5522731391052187555'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5522731391052187555'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_4548.html' title='ह्वाय दिस कोलावेरी डी!'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-5473467543005841272</id><published>2011-12-20T00:30:00.000-08:00</published><updated>2011-12-20T00:35:38.912-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>परलोक में आरटीआई</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;आदरणीय भगवान जी, सादर प्रणाम। मैं यह नहीं जानता कि परलोक में सूचना का अधिकार कानून लागू है या नहीं। आप यह तो अच्छी तरह जानते होंगे कि मृत्युलोक में इसकी बदौलत कल तक केंचुओं की तरह रेंगने वाली जनता ने देश के बड़े-बड़े सियासी शेरों की मिट्टी पलीद कर रखी है। आरटीआई का नाम सुनते ही बड़े-बड़े सूरमाओं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। हां, तो भगवान जी सबसे पहले यह बताएं कि परलोक में जनलोकपाल, आरटीआई, राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकॉल जैसे कानून लागू है या नहीं। वहां सी या डी ग्रेड के कर्मचारियों को माल झटकने की कितनी छूट है? यहां का हाल तो यह है कि देश की विभन्न पार्टियां लोकपाल में भी आरक्षण की बात कर रही हैं। हालांकि मैं यह नहीं जान पाया हूं कि ये पार्टियां और उनके वरिष्ठ नेता भ्रष्टाचार में आरक्षण चाहते हंे या भ्रष्टाचार रोकने को बनने वाली समिति में। भगवन! आपको तो पता होगा कि मृत्युसोत में गांधीवादी अन्ना हजारे की बड़ी धाक है। वे पहले तो भूख हड़ताल करते हैं, फिर पांच सितारा अस्पताल में जाकर चेकअप करवाते हैं। गांधीवादी होते हुए भी गांधी जी की तरह पैदल नहीं, हवाई जहाज से आते-जाते हैं। उनके चेले-चपाटे भी ठीक उनके ही नक्शेकदम पर चलते हैं। परलोक में अन्ना जैसी कोई शख्सियत पहुंची या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं, परलोक का काम-काज अभी तक महात्मा गांधी से ही चल रहा है।&lt;br /&gt;भगवान साथ ही यह जानकारी भी प्रेषित करें कि अगर परलोक का कोई मुलाजिम या अधिकारी किसी आत्मा या वहीं के निवासियों से रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाए, तो क्या उस पर वैसे ही मुकदमा चलता है, जैसा हमारे देश में होता है। हमारे देश में तो सालों मुकदमे चलते रहते हैं और देश की संपदा लूटकर अपने घर भर लेने वाला मौज करता रहता है।  बहुत हुआ, तो महीने-दो महीने के लिए वातावरण बदलने की तरह तिहाड़ जेल चले गए। कुछ दिनों बाद जमानत का ढोंग रचकर बाहर आए, तो फिर पूरी जिंदगी गुजर जाती है और मुकदमे का फैसला नहीं हो पाता है। भगवान जी, आप तो सर्वज्ञानी हैं, सबके मन की बात समझते हैं। मैं एक छोटा-मोटा पाकेटमार हूं। ए. राजा, कनिमोझी, सुखराम जैसा लंबा हाथ मारने को जिंदगी भर तरसता रहा। कभी किसी का पाकेट मार लिया, तो कुछ दिन तक पेट भरने का जरिया हो जाता है। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि जब मैं परलोक में आई, तो कोई लंबा हाथ मारने का मौका आप ही मुहैया करा दें। जो इच्छा यहां जीते-जी पूरी नहीं हो सकी, उसे मरने के बाद परलोक में पूरी कर लूं, तो आपके निजाम में कोई फर्क तो पड़ने वाला नहीं है। आखिर ‘इस लोक और उस लोक’ में आपकी इजाजत के बिना कोई पत्ता भी नहीं हिलता। यह बात हमें बचपन से ही पुजारी काका बताते चले रहे थे। अभी कुछ दिन पहले ही वे परलोक गए हैं, आप चाहें तो उन्हें बुलाकर पूछ लें। जब मृत्युलोक में भ्रष्टाचार, चोरी, लूट-खसोट, हत्या-बलात्कार जैसे अपराधों में आपकी सहमति है, तो वहां एक बार मुझे लंबा हाथ मारने का मौका देने से कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा। हमारे देश की से आपके परलोक में सोशल साइट्स पर सरकारी नियंत्रण है या नहीं। अगर लागू है, तो उसका प्रारूप क्या है? वहां आरटीआई की फीस किस मुद्रा में जमा होगी, यह भी मुझे नहीं मालूम है। अगर आप चाहें, तो यह फीस मैं रुपये में चुका दूं या फिर आप जिस मुद्रा में चाहें, वह मुद्रा परलोक आने पर लेता आऊंगा। आशा है कि आप मुझे हफ्ते-दस दिन में यह सारी जानकारियां जरूर उपलब्ध करा देंगे। आपका ही-मुजरिम।&lt;br /&gt;(व्यंग्यकार साप्ताहिक हमवतन के स्थानीय संपादक हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-5473467543005841272?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/5473467543005841272/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_8573.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5473467543005841272'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5473467543005841272'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_8573.html' title='परलोक में आरटीआई'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8629409761895531522</id><published>2011-12-20T00:28:00.001-08:00</published><updated>2011-12-21T02:25:48.830-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुस्तक समीक्षा'/><title type='text'>नारी मन के अंतरद्वंद्व की गाथा ‘सोफी’</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-xOp5fxWTGaI/TvBHbjoZ9qI/AAAAAAAAATg/sFyo-IBq3wM/s1600/sofi.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 144px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-xOp5fxWTGaI/TvBHbjoZ9qI/AAAAAAAAATg/sFyo-IBq3wM/s200/sofi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5688124868115691170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;वाकई विश्वास नहीं होता कि कोई लेखिका अपने पहले ही उपन्यास में नारी मन के अंतरद्वंद्व को इतनी साफगोई और विश्वसनीयता के साथ उकेरती हुई अपने पाठकों को अ•िाभूत कर देगी। प्रीति रमोला गुसांई ‘मृणालिनी’ के पहले उपन्यास ‘सोफी’  की शुरुआत प्रमुख पात्र लंदन निवासी सोफी के सौतेले बेटे जैमी डिसूजा के शिमला वापसी से होती है। वह शिमला में उन जगहों पर जाकर अपने बचपन की यादों को ताजा करना चाहता है। शिमला के लाल कोठी में पहुंचने पर उसका केयरटेकर उसे खरीददार समझकर पूरी कोठी दिखाता है। वहां उसे वह पत्थर दिखाई देता है, जिसके सामने बचपन में जैसी ने गिड़गिड़ाने के अंदाज में कभी अपनी सौतेली मां सोफी की सुरक्षा, उसके न भटकने की फरियाद की थी। वह उस पत्थर को लेकर पठानकोट की ओर यात्रा शुरू करता है और यहीं से फ्लैशबैक में पूरी कहानी चलती रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरा उपन्यास शिमला और पठानकोट के बीच घूमता रहता है। शिमला के प्रसिद्ध जगहों की विवेचना से यह तो पता लगता है कि लेखिका का यहां से गहरा जुड़ाव रहा है। उपन्यास ‘सोफी’ एक ईसाई परिवार के मुखिया मि. एंटनी और उनके पुत्र रोड्रिक के बीच चलने वाली अहम और सामंतवादी प्रवृत्ति के टकराव की गाथा है। धनलोलुप और अंग्रेजों के चाटुकार मि. एंटनी ने अपनी युवावस्था के दौरान भारतीय क्रांतिकारियों  के खिलाफ मुखबिरी करके काफी धन कमाया और राय साहब की पदवी पाई। उनकी आकांक्षा की थी कि उनका पुत्र उनके नक्शेकदम पर चलकर उनकी संपत्ति को और बढ़ाए। लेकिन विडंबना यह है कि वह मुंबई की एक तवायफ से प्रेम कर बैठा और दो लड़कियों और एक बेटे जैमी का बाप बन गया। सामंती प्रवृत्ति के एंटनी अपने बेटे के ऐसा करने से टूट गए। उन्होंने अपने सारे संबंध बेटे से तोड़ लिए। पठानकोट में लकड़ियों से बनी एक आलीशान हवेली में अकेले रहने वाले एंटनी को अपने वंश वृद्धि की उम्मीद तब दिखाई दी, जब अपनी पत्नी और दोनों लड़कियों की हादसे में मौत से टूटा रौड्रिक अपने इकलौते बेटे जैमी के साथ पिता के घर में आकर रहने लगा। उसके पिता जैमी को अपना पौत्र मानने को तैयार नहीं हैं। इसी दौरान माली की लड़की सोफी एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत ग्यारह वर्षीय जैमी के कमरे में सो जाती है और उसी दौरान नशे में धुत रौड्रिक आकर उसी कमरे में सो जाता है। सुबह लोग अस्तव्यस्त हालत में जब उसे रौड्रिक और सोफी को कमरे से निकलते देखते हैं, तो उनके बीच अवैध संबंधों की चर्चा शुरू हो जाती है। और शिकारी की तरह घात में बैठे एंटनी अपने बेटे को सोफी से विवाह करने को बाध्य कर देते हैं। एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ व्याह दी जाती है सोलह साल की सोफी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि उपन्यास की कथा वस्तु पर विचार करें, तो यह पिता-पुत्र के बीच के टकराव और पति का प्रतिरोधस्वरूप पत्नी को शादी के बाद सोफी को त्याज्य रखने की व्यथा कथा है। शादी के चार साल बाद सोफी के जीवन में प्रवेश करता है जयंत। जयंत सोफी के सौतेले बेटे जैमी को ट्यूशन पढ़ाने आता है। उसका सान्निध्य पाकर एक बार फिर मरी हुई कामनाएं और काम उद्वेग सिर उठाने लगते हैं। वह एक दिन...सिर्फ एक दिन अपने मन मुताबिक जीवन जीना चाहती है। इसी दौरान रौड्रिक मुंबई अपने परिवार सहित मुंबई जाता है, तो जयंत भी दुबई में नौकरी मिलने की वजह से फ्लाइट पकड़ने मुंबई जाता है। पानी के जहाज पर नववर्ष के अवसर पर होने वाले एक प्रोग्राम के चार टिकट खरीदकर रौड्रिक के पास पहुंचे जयंत को पता चलता है कि रौड्रिक बीमार है और वह इस कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकेगा। वह सोफी और जैमी को जयंत के साथ कार्यक्रम में भाग लेने को बाध्य करता है और वहां पहुंचकर दोनों उस रंगीनियों में खो जाते हैं। अपनी सौतेली मां को अपने ट्यूटर जयंत के सामने काम याचना करते देख जैमी विचलित हो जाता है। कुछ दिनों बाद सोफी के गर्भवती होने और इस रहस्य को रहस्य बनाए रखने के लिए पिता को ढकेलकर मार देने वाले सोलह वर्षीय जैमी जिस अंदाज में पिता के अंतिम संस्कार के अवसर पर वह दुनिया के सामने जयंत के बच्चे को अपने पिता की संतान बताता है, वह कुछ ज्यादा ही नाटकीय लगता है। बाद में मि. एंटनी जैमी और उसकी  सौतेली मां सोफी को पठानकोट ले जाते हैं। अपनी सारी संपत्ति का वारिस वह सोफी के बच्चे को बता देते हैं। यह कथा इसी तरह आगे बढ़ती है और बाद में सोफी के सामने अपने वायदे के अनुसार जयंत काफी पैसा कमाकर दुबई से लौटता है, लेकिन वह जयंत को पहचानने से इनकार कर देती है। पढ़ाई के नाम पर दिल्ली और फिर बाद में लंदन गए जैमी को अब अपनी सौतेली मां से उतनी ही घृणा है जितनी वह अपने पिता से करता था। बाद में सोफी मर जाती है और उसकी कब्र के पास अकसर आकर बैठने वाला पागल जयंत भी एक दिन मर जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, उपन्यास ‘सोफी’ में जहां नारी मन के आवेगों, उद्वेगों की सफल प्रस्तुति है, वहीं सौतेली मां और जैमी के बीच उपजे ममत्व की पराकाष्ठा कुछ अतिरंजित ही लगती है। कोई पुत्र अपनी काम पिपासु सौतेली मां और उसके नाजायज बच्चे को बचाने के लिए अपने पिता की हत्या कर दे, तो हमारा समाज उसे किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराता है। उपन्यास की भाषा में वह प्रवाह नहीं है जो होनी चाहिए। उपन्यास पढ़ते समय भाषागत त्रुटियां खटकती हैं। अंग्रेजियत का भाव प्रबल होने और हिंदी को आत्मसात न कर पाने की वजह से ऐसा हुआ होगा। कई जगह तो भाषा और व्याकरण का अनाड़ीपन साफ झलक जाता है। अगर अंग्रेजी शब्दों को उस तरह लिखा जाता, जिसे हिंदी में जिस तरह लिया जाता है, तो शायद अच्छा होता। अब उदाहरण स्वरूप एक शब्द ‘लंडन’ को लें। अंग्रेजी से आया यह शब्द हिंदी में ‘लंदन’ के रूप में स्वीकार्य है। प्रूफ की गलतियां भी काफी हैं। इस पर ध्यान देने की जरूत थी। आशा है कि आगामी रचनाओं में लेखिका  इस बात का ध्यान रखेगी। उपन्यास का मुखपृष्ठ आकर्षक है। यदि पूरा उपन्यास एक फांट में होता, तो शायद इसकी खूबसूरती और बढ़ जाती। चौर सौ चार पृष्ठों का यह उपन्यास फांट का साइज कम करके घटाया जा सकता था। तब शायद इसका मूल्य दौ सौ रुपये से कुछ कम हो जाता और कुछ ज्यादा पाठकों तक पहुंचने में सफल होता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8629409761895531522?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8629409761895531522/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8629409761895531522'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8629409761895531522'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post_20.html' title='नारी मन के अंतरद्वंद्व की गाथा ‘सोफी’'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-xOp5fxWTGaI/TvBHbjoZ9qI/AAAAAAAAATg/sFyo-IBq3wM/s72-c/sofi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-5894115484964843132</id><published>2011-12-10T01:04:00.000-08:00</published><updated>2011-12-10T01:12:20.307-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>जूते में गुन बहुत है</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-BoRvLf1VZbI/TuMiVQBjcVI/AAAAAAAAATU/dSF-z4tBK2o/s1600/joot%2Bme%2Bgun%2Bbahoot.JPG" onblur="try 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पहिए और हथियार का आविष्कार किया और आधुनिक मानव समाज की नींव पड़ी। मेरे खयाल से यह धारणा बिल्कुल बकवास है। यह इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों की कल्पना की उड़ान है। भला पहिया और हथियार से विकास का क्या नाता-रिश्ता है। थोथे तकरीरों से इन समाजशास्त्रियों ने दुनिया को बहुत दिनों तक बेवकूफ बनाया। अब दुनिया को यह बताने का समय आ गया है कि बंदर का चलने के काम से दो हाथों को अलग कर लेने की घटना क्रांतिकारी नहीं थी, बल्कि बाकी बचे दो पैरों की सुरक्षा के लिए जूते का आविष्कार कर लेना, बंदर और उसके बाद आदमी के लिए वरदान साबित हुआ। उस पर गजब यह हुआ कि जूते का उपयोग जब पांवों की सुरक्षा के साथ-साथ दूसरे कामों में होने लगा, तो मानो मानव समाज अंधकार युग से निकलकर प्रकाश युग में प्रवेश कर गया। आदमी के दिमाग पर सदियों से छाया अंधकार 'जूता हाथ` में लेते ही उसी तरह छंट गया, जैसे जेठ-बैसाख में हवा चलने से देखते ही देखते बदली छंट जाती है। काफी दिनों तक समाज में जूते का जोर रहा, बात-बात पर जूता चलता रहा।&lt;/span&gt;  &lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;लेकिन जैसा कि प्रकृति का नियम है। यह पूरा संसार द्वंद्वमय तत्वों से निर्मित है। कुछ लोग जूते के खिलाफ बोलने लगे। उन्हें जूता असुंदर और विकास विरोधी लगने लगा, तो उन्होंने लाठी को अपना लिया। विडंबना देखिए, कल तक जिस जूते की पूजा की जाती थी, वह जूता घर के किसी कोने में उपेक्षित सा पड़ा रहने लगा। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में एक जूता मिला है, जिसकी कार्बन डेटिंग के आधार पर वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि यह गिरधर कविराय का जूता है। कोई इस बात से सहमत हो या नहीं, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वह यकीनन गिरधर कविराय का ही जूता है। गिरधर कविराय शुरुआती दिनों में जूते के ही हिमायती थे। जूता दर्शन में उनकी लोकप्रियता का डंका पूरे इलाके में बजता था। इसे देखकर उस समय के प्रतिष्ठित जूताबाज भी उनकी चमचई करने को लालायित रहते थे। लेकिन एक दिन क्या हुआ कि उनकी भिड़ंत किसी लट्ठबाज से हो गई। उसकी लाठी में गिरधर के जूते से ज्यादा दमखम था। सो, उसने दो लट्ठ गिरधर की पीठ पर जमाया, तो बेचारे लाठीवादी हो गए। उनके लाठीवादी होते ही समाज में लाठी का बोलबाला हो गया। इसे 'जूता युग` का अवसान काल भी कहा जा सकता है। देखते ही देखते लाठी की समाज में तूती बोलने लगी। कोई भी लाठी के बल किसी की भी भैंस खोल लेता था। तभी से यह कहावत समाज में मशहूर हो गया, जिसकी लाठी उसकी भैंस। सारे नियम-कानून लाठी की लंबाई और मजबूती के आधार पर तय किए जाते थे। जूते के मोह से विरक्त हुए गिरधर कविराय ने फतवा जारी कर दिया, 'लाठी में गुन बहुत है, सदा राखिए पास।` उनके इस फतवे का व्यापक असर हुआ और हर आदमी लाठी रखने के साथ ही साथ लाठी की भाषा बोलने लगा। उस युग की प्राथमिकता लाठी थी। लाठी ने न जाने कितने युद्ध कराए, न जाने कितने प्रपंच रचे, लेकिन वह भी समय के हाथों पराजित हुआ। लाठी युग का खात्मा होकर रहा।&lt;/span&gt;  &lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;जैसे दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन। इस देश में यह मानने वाले आपको करोड़ों लोग मिल जाएंगे, जो मानते हैं कि सबसे पहले 'सतयुग` आया, उसके बाद द्वापर और इसके बाद त्रेता और फिर कलियुग। अब कलियुग की अंतिम सांस चल रही है, इससे बाद सतयुग का ही नंबर है। ठीक इसी प्रकार मानव समाज ने जूता युग से लाठी युग में प्रवेश किया। फिर लाठी युग खत्म हुआ, तो एक बार फिर जूता युग आ गया। समाज के विकास का चक्रीय सिद्धांत तो यही कहता है। आज समाज में जूते-चप्पल की गूंज चारों ओर सुनाई दे रही है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा अभागा होगा जिसने जूता-चप्पल का शाश्वत उपयोग कभी न किया हो। आज के जूता-चप्पलवादी युग में गिरधर कविराय पैदा हुए होते, तो उनकी एकाध कुंडलियां जूता-चप्पल की प्रशंसा में जरूर होतीं।&lt;/span&gt;  &lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;आज के जूता-चप्पलवादी युग का बेसिक फंडा है कि जूता जितना बड़ा होगा, पॉलिस उतनी ही खर्च होगी। कुछ लोग हमेशा अपना जूता बड़ा करने के चक्कर में लगे रहते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो विरोधी दल के विधायकों और सांसदों को आश्वस्त करते रहते हैं, तुऔहारे जूते में जितनी पॉलिस लगेगी, उसका खर्च मैं दूंगा। चिंता मत करो। बस जब मैं कहूं, तो आपको अपना जूता चमकाना होगा और यह जूता 'चमकौव्वल` तुऔहें उस पाले में रहकर नहीं, इस पाले में रहकर करना होगा। कई बार तो यह पाला बदल मनोरंजक हो जाता है। पाला बदलकर पॉलिस का जुगाड़ करने वाला नेता भी जब देखता है कि उसका जूता ही फटने वाला है, तो पॉलिस देने वाले को ठेंगा दिखाकर अपने मूल पाले में जा बैठता है या फिर नया जूता गांठ लेता है। राजनीति की भाषा में इसी को 'राजनीतिक दलों का जूतम-पैजार` कहा जाता है। विधानसभाओं के अंदर और बाहर नेताओं के बीच होने वाली जूतम-पैजार से देश का बच्चा-बच्चा वाकिफ है। यह तो जूता-चप्पलवादी युग की पहली पहचान है। उत्तर प्रदेश और बिहार की विधानसभाएं जूतम-पैजार के स्वर्णिम दौर से कई बार गुजर चुकी हैं।&lt;/span&gt;  &lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;एक साल पहले एक पूर्व (तब वर्तमान) मुख्यमंत्री की चप्पल को लेकर खूब चर्चा हुई थी। नासमझ मीडिया वालों ने मामूली सी बात का बतंगड़ बना दिया था। बात केवल इतनी थी कि विधायकों का विधानसभा में मजमा लगा हुआ था। संयोग से तत्कालीन मुख्यमंत्री ने देखा कि उस विधायक की चप्पल मुख्यमंत्री के चप्पल से ज्यादा चमक रही थी। सो, उन्होंने इशारे से पूछा थी कि वह किस कंपनी की पॉलिस यूज करता है। लेकिन विधानसभा में मच रहे शोर-शराबे की वजह से वह (अब भूतपूर्व) मुख्यमंत्री की बात सुन नहीं पाया था। मजबूर होकर मुख्यमंत्री जी को चप्पल दिखाकर दो-तीन बार यह बात सांकेतिक भाषा में पूछनी पड़ी। लेकिन उस नासमझ विधायक को क्या कहा जाए कि उसने तड़ से मुख्यमंत्री जी पर आरोप म़ दिया कि वे उसे चप्पल दिखा रही थीं। मीडिया भी पूर्वाग्रह के चलते मामले को तूल देता रहा। आखिरकार मुख्यमंत्री जी को कहना पड़ा, 'चल तू ऐसा समझता है, तो ऐसा ही सही। जा जो कुछ कर सकता है, तो कर ले। देखूं, तेरी पार्टी में क्या बिगाड़ लेती है।` पाठकों, सच बताऊं। वह विधायक उस समय तो कुछ नहीं कर पाया था, लेकिन बाद में उसकी पार्टी ने बहुत कुछ कर दिखाया। मुख्यमंत्री को चुनाव में वह धोबिया पाट मारा कि वह चारों खाने चित हो गईं। अब बेचारी विपक्ष में बैठकर अपने चप्पल को चमकाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन पता नहीं क्यों, वह चमकती ही नहीं है। शायद इसी को कहते हैं करम का लेखा।&lt;/span&gt;  &lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;जूते का महत्व सिर्फ राजनीति में ही नहीं, सामाजिक कार्यों में भी है। शादी-विवाह के समय दूल्हे से भी ज्यादा कीमती जूता ही होता है। दूल्हा अपनी इज्जत की तरह अपने जूते को छिपाता घूमता है और उसकी नई नवेली सालियां हाथ धोकर जूते के पीछे पड़ी रहती हैं। अगर खुदा न खास्ता, सालियों के हाथ में जूता लग गया, तो फिर शुरू हो जाता है उच्च स्वर में गायन 'पैसे ले लो, जूते दे दो।` उधर, दोनों समधियों में लेन-देन का मामला ठीकठाक निपट गया, तो समझो गनीमत है। वरना अगर बात बिगड़ जाए, तो जूता चलने में देर ही कितनी लगती है। पुलिस वाले भी हर बात में कानून को जूते की नोक पर रखते हैं। अभी कल ही एक पुलिस वाले ने चौराहे पर एक रिक्शेवाले को रोककर पहले तो खूब गालियां सुनाई, दो-चार डंडे लगाए और दिहाड़ी छीनने के बाद यह कहते हुए भगा दिया, 'जा! तू जाकर शिकायत कर दे अपने बाप से। जानता नहीं, कानून को में जूते की नोक पर रखता हूं। ज्यादा चबड़-चबड़ किया, तो तुझे और तेरे बाप को लगाऊंगा चार जूते कि तबीयत हरी हो जाएगी।` बेचारा रिक्शा वाला फटे जूते की तरह अपना मुंह लेकर बड़बड़ाता हुआ अपने रास्ते चला गया। छबीली भी जब मुझसे खफा होती है, तो बड़े प्यार से कहती है, 'तुम जैसे निखट्टू से प्यार करे मेरी जूती।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="date-posts" style="font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;&lt;div class="post-outer"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-5894115484964843132?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/5894115484964843132/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5894115484964843132'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5894115484964843132'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='जूते में गुन बहुत है'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-BoRvLf1VZbI/TuMiVQBjcVI/AAAAAAAAATU/dSF-z4tBK2o/s72-c/joot%2Bme%2Bgun%2Bbahoot.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-2029389405720298121</id><published>2011-10-11T00:45:00.001-07:00</published><updated>2011-10-11T01:09:48.365-07:00</updated><title type='text'>दुनिया के रिश्वतखोरों! एक हो</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काफी दिनों बाद उस्ताद गुनाहगार से भेट नहीं हुई थी। सोचा कि उनसे मुलाकात कर लिया जाए। सो, एक दिन उनके गरीबखाने में पहुंच गया। घर पहुंचने पर देखा कि गुनाहगार के चारों ओर कुछ कागज बिखरे पड़े हैं। वे काम में इतने व्यस्त थे कि मेरे आने की उन्हें भनक तक नहीं लगी। एक कागज उठाकर पहले तो वे कुछ देर तक उसे घूरते रहे और फिर एक कागज पर कुछ नोट करते हुए बोले, ‘दिल्ली में पेट्रोल के दाम में बढ़ोतरी हुई चार रुपये छियालिस पैसे, मुंबई में सात रुपये बत्तीस पैसे। इसका मतलब है कि मुंबई में खसरा-खतौनी की नकल मांगने पर बिटामिन ‘आर’ की कीमत पैंतीस रुपये से बढ़कर पैंसठ रुपये होगी और दिल्ली में बिटामिन ‘आर’ की कीमत पचास रुपये होगी।’ &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैं चौंक गया। मन ही मन सोचने लगा कि यह मुई बिटामिन ‘आर’ क्या बला है? मुझसे रहा नहीं गया। मैंने गुनाहगार को दंडवत प्रणाम करते हुए कहा, ‘उस्ताद! यह बिटामिन ‘आर’ क्या है?’ मुझे देखकर गुनाहगार चौंके और हड़बड़ी में हाथ का कागज छिपाने लगे। मुझसे पूछा, ‘तुम कब आए?’ मैंने हंसते हुए कहा, ‘जब से आप पेट्रोल के दाम और बिटामिन ‘आर’ को किसी नामाकूल फार्मूले पर कस रहे थे। मेरी बात सुनकर उन्होंने गहरी सांस ली और मुझे बैठने का इशारा किया और फिर बोले, ‘बात यह है कि जब-जब पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं, सभी जरूरी चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। ऐसे में ‘सुविधा शुल्क’ यानी बिटामिन ‘आर’ की कीमत भी बढ़ जाता है। देश भर के आफिसों में बाकायदा एक सूची सबको दे दी जाती है कि आज से फलां काम के इतने और फलां काम के इतने रुपये लिए जाएं। हर बार यह सूची बनाने का जिम्मा मुझे दे दिया जाता है। कल से जुटा पड़ा हूं, लेकिन अभी  तक सूची बन नहीं पाई है।’&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा, ‘बिटामिन आर मतलब रिश्वत?’ गुनाहगार ने चेहरे पर कोई भाव लाए बिना कहा, ‘रिश्वत होगी तुम्हारे लिए, हम सबके लिए तो बिटामिन ‘आर’ है। बिटामिन आर का सेवन करते ही कर्मचारी में अपार ऊर्जा का संचार होता है, वह आलस्य किए बिना काम झटपट निबटा देता है, अधिकारी भी बिटामिन आर की झलक पाते ही अपना सारा जरूरी काम-धाम छोड़कर उस फाइल पर चिड़िया बिठा देते हैं। जिस बिटामिन ‘आर’...तुम्हारे शब्दों में कहें, तो रिश्वतखोरी को अन्ना दादा जैसे लोग इतनी हिकारत की नजर से देखते हैं, अगर इसका प्रचलन हिंदुस्तान में न होता, तो उसका इतना विकास न हुआ होता। भ्रष्टाचार की बदौलत जो सड़क पांच-छह महीने में बन जाती है, उसी सड़क की फाइल रिश्वत न मिलने पर सालों अटकी रहती।’ &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;‘तो क्या रिश्वतखोरी इस देश के भाग्य में हमेशा के लिए लिख गया है?’ यह सवाल पूछते समय मैं काफी निराश हो गया था। ‘बिल्कुल...जब तक सरकारी और गैर सरकारी आफिसों में बिटामिन ‘आर’ खिलाकर कर्मचारियों को मोटा किया जाता रहेगा, तब तक देश का विकास द्रुत गति से होता रहेगा। मैं तो कहता हूं कि सरकार और ट्रेड यूनियनों को नया नारा गढ़ना चाहिए, दुनिया के रिश्वतखोरों! एक हों।’ यह कहकर उस्ताद गुनाहगार ने अपना कागज समेटा और चाय बनाने के लिए किचन में चले गए। चाय पीने के बाद मैं भी अपने घर लौट आया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-2029389405720298121?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/2029389405720298121/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/10/blog-post_11.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2029389405720298121'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2029389405720298121'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/10/blog-post_11.html' title='दुनिया के रिश्वतखोरों! एक हो'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-1710786028456298406</id><published>2011-10-11T00:30:00.000-07:00</published><updated>2011-10-11T00:42:52.438-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vyangya'/><title type='text'>कहो फलाने अब का होई</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" &gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सुबह मार्निंग वॉक को निकला, तो सोचा कि उस्ताद मुजरिम से मिल लिया जाए। सो, वॉक से लौटते समय उनके ‘गरीबखाने’ पर पहुंच गया। मुझे देखते ही मुजरिम प्रसन्न हो गए और बोले, ‘आओ...आओ..बड़े मौके पर आए। तुम्हें अभी थोड़ी देर पहले ही याद कर रहा था। बात दरअसल यह है कि कविता की कुछ पंक्तियों का अर्थ मेरी समझ में नहीं आ रहा है। तुम काव्यप्रेमी हो। इसलिए संभव है कि तुम उसका अर्थ बता सको। कविता की लाइनें हैं  ‘कहो फलाने अब का होई...। अब तौ छूटल घाट धोबिनिया, पटक-पटक कै धोई। कहो फलाने अब का होई...।’ &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस्ताद मुजरिम की बात सुनकर पलभर को मेरा दिमाग भक्क से उड़ गया। कुछ देर तक सोचा-विचारा। फिर मैंने कहा, ‘उस्ताद! ये पंक्तियां किस कवि की है, यह तो मैं नहीं बता सकता। मेरा अंदाजा है कि यह उत्तर प्रदेश के किसी पुराने लिखाड़ कवि की है। हां, इन पंक्तियों के अर्थ संदर्भ बदल जाने पर बदल जाते हैं। अगर हम इसे कबीर के रहस्यवादी दर्शन से जोड़ें, तो इसका तात्पर्य यह है कि इस धरती पर पापाचार और अनैतिक कृत्यों को देख-सुनकर एक आत्मा बिलबिला उठती है और वह दूसरी आत्मा से कहती है कि हे भाई! भगवान ने हमें इस धरती पर लोगों का भला करने को भेजा था, वह तो हम माया, मोह, भाई-भतीजावाद के चंगुल में फंसकर भूल गए। अब आखिरी समय आ पहुंचा है, अब धोबिन रूपी परमात्मा पाप-पुण्य रूपी घाट पर हमें पटक-पटक कर धोएगी और हमें भी चौसठ करोड़ योनियों में भटकने के लिए भेज देगी। वह आत्मा    भयातुर होकर कहती है कि हे  भाई! अब हम लोगों का क्या होगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इतना कहकर मैं सांस लेने के लिए रुका और फिर कहना शुरू किया, ‘इसके दूसरे अर्थ में पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सार छिपा है। इन पंक्तियों की गहन मीमांसा करने पर यह अर्थ निकलता है कि एक सांसद या मंत्री दूसरे सांसद या मंत्री से कहता है कि हे भाई! हम लोगों का क्या हश्र होगा। इस बार चुनाव आने पर जनता रूपी धोबिन पोलिंग बूथ रूपी घाट पर हमारे पक्ष में मतदान न करके हमें पटक देगी और आज जो नेता विपक्ष में बैठे हैं, वे हम सब लोगों द्वारा किए गए  भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच आयोग गठित कर हमारे कृत्यों को धो देंगे।’ इतना कहकर मैं सांस लेने के लिए रुका। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेरी बात सुनकर मुजरिम मंद-मंद मुस्कुराते रहे और फिर बोले, ‘तुम जैसा योग्य शिष्य पाकर मैं धन्य हो गया। इन पंक्तियों की तुमने जो सुंदर व्याख्या की है, वह काव्य के बड़े-बड़े महारथियों के लिए भी दुरूह हो सकता था। मैं तुम्हारी व्याख्या से संतुष्ट हूं।’ इतना कहकर उस्ताद मुजरिम ने मुझे चाय बनाने का निर्देश दिया और सोफे पर बैठकर खर्राटे लेने लगे। चाय बनाने के निर्देश पर कुढ़ता हुआ मैं किचन में चला गया।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-1710786028456298406?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/1710786028456298406/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1710786028456298406'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1710786028456298406'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='कहो फलाने अब का होई'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-3045421536253955563</id><published>2011-09-01T06:04:00.000-07:00</published><updated>2011-09-01T06:08:10.953-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lekh'/><title type='text'>अभी सिर्फ नींद टूटी है, जागना बाकी है</title><content type='html'>&lt;br /&gt;-अशोक मिश्र&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आज पूरे देश में चारों तरफ बस अन्ना ही अन्ना छाए हुए हैं। जिसे देखो वही, अन्ना हजारे और उनके जनसरोकारों को लेकर किए गए आंदोलन पर न केवल चर्चा कर रहा है, बल्कि अपनी समझ के मुताबिक राय भी व्यक्त कर रहा है। इसका कारण है। कारण यह है कि करोड़ों लोग इस आंदोलन से किसी न किसी रूप में जुड़े थे। कोई अपना काम-काज छोड़कर दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचा था, तो कोई अपनी ही गली में सिर्फ कैंडल जलाकर रह गया। कुछ लोग फैशन के तहत अन्ना से जुड़े, तो कोई सचमुच चाहता था कि अन्ना हजारे सफल हों और देश से भ्रष्टाचार का खात्मा होगा। इस जन जुड़ाव के चलते अन्ना हजारे पिछले कुछ दिनों में जनांदोलन के एक प्रतीक के रूप में उभर कर सबके सामने आए। यह जन जुड़ाव ही था कि सरकार को मजबूर होकर अवकाश के दिन संसद आहूत करके ध्वनिमत से तीनों प्रस्तावों को पारित करना पड़ा। लोकतंत्र में ‘लोक’ की शक्ति का एहसास पहली बार महसूस हुआ। इससे पहले तो पूरा ‘इंडिया’ सुशुप्तावस्था में था। अन्ना हजारे के आंदोलन ने हमें ठीक उसी तरह झकझोर कर आंखें खोलने पर मजबूर कर दिया, जैसे कोई शरारती बच्चा किसी बात पर नाराज होकर शतरंज की बिछी बिसात को झकझोर कर रख दे और शतरंज खेलने वाले अकबका कर रह जाएं। अन्ना के आंदोलन से पहले हमारे समाज की मानसिकता ‘मूंदहु आंख कतहु कुछ नाहीं’ वाली थी। हम सबके अंतर में एक बात घर कर गई थी कि हम लाख कोशिश कर लें, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई जैसी अन्य समस्याओं को दूर कर पाना हमारे वश में नहीं हैं। इसके लिए हम अपने को दोषी मानने की बजाय सभी जिम्मेदारियों को केंद्र या राज्य सरकारों, उनके प्रशासनिक अमलों पर थोपकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते थे। हम यह मान बैठे थे कि समाज को स्वस्थ और सुरक्षित रखना सिर्फ सरकार और सरकारी नुमाइंदों का काम है, लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन ने इस मिथक को तोड़ा। कहने का मतलब यह है कि इस आंदोलन से समाज की नींद जरूर टूटी है, लेकिन अभी पूरी तरह जागना बाकी है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उन्होंने जेपी के बाद सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा करके यह समझाया कि यदि साध्य और साधन जनसरोकारों से जुड़ते हों, तो सरकार को झुकने को बाध्य किया जा सकता है। जरूरत तो उस जड़ता को तोड़ने की है, जो सांप बनकर हमारे मन और समाज में कुंडली मारकर बैठा है। और अन्ना हजारे ने यही किया। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;संसद में उनकी तीनों मांगों, नागरिक संहिता, केंद्रीय और राज्य कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने और सभी राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना पर प्रस्ताव पारित हो चुका है। अब उस पर स्थायी समिति विचार करेगी। इसके बाद ही यह कानून के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त हथियार बन सकेगा। दरअसल, महत्वपूर्ण यह नहीं है कि संसद में कौन-सा बिल पेश किया गया, भ्रष्टाचार के खिलाफ संसद में कौन-सा कानून पारित किया गया। सबसे अहम वह व्यवस्था है, जो भ्रष्टाचार को जन्म देती है। भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली व्यवस्था के ध्वंस और उन्मूलन की बात की जानी चााहिए। जब तक हम ऐसी सामाजिक व्यवस्था को नहीं गढ़ लेते, जो भ्रष्टाचार को प्रश्रय न दे, तब तक अन्ना हजारे जैसे लोग सिर्फ आंदोलन करते रहेंगे, गरीबी, बेकारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को रोकने की कवायद के नाम पर कुछ तमाशे होते रहेंगे और देश के चंद मुट्ठी भर लोग करोड़ों जनता के श्रम से पैदा की गई अतिरिक्त पूंजी (मुनाफे) का उपभोग करते रहेंगे, शोषण और दोहन के साथ-साथ भ्रष्टाचार का तांडव होता रहेगा। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि अन्ना की लड़ाई बेकार गई। अन्ना के माध्यम से छेड़े गए इस जनांदोलन का सबसे सार्थक पहलू यह है कि अब हम लड़ना सीख रहे हैं। बस जरूरत इस बात की है कि इस लड़ने की कला का उपयोग उस व्यवस्था के खिलाफ करना है, जो भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री का उद्गम कहां है, इसकी तलाश अभी बाकी है। वैसे भी अन्ना हजारे के अनशन तोड़ने और संसद में तीनों प्रस्ताव पारित होने के बाद भी कुछ सवाल हैं जिनका उत्तर मिलना अभी बाकी है। सबसे पहले तो यह तय होना शेष है कि जब लोकपाल विधेयक कानून बन जाएगा, तो उसका स्वरूप क्या होगा? लोकपाल नामक संस्था किसके प्रति जवाबदेह होगी? उसको संचालित करने के लिए पैसा कहां से आएगा? लोकपाल, संसद और न्यायालय के बीच तारत्मय कैसे स्थापित होगा? थोड़ी देर के लिए यदि मान लिया जाए कि लोकपाल संस्था का ही कोई अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाए, तो फिर उसके खिलाफ कैसी और किस हद तक कार्रवाई होगी? इस जैसे कुछ और भी सवाल हैं जिनका जवाब मिलने में समय लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-3045421536253955563?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/3045421536253955563/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3045421536253955563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3045421536253955563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='अभी सिर्फ नींद टूटी है, जागना बाकी है'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-5423679419151513470</id><published>2011-08-28T23:22:00.000-07:00</published><updated>2011-08-29T00:20:13.808-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vyangya'/><title type='text'>स्वर्ग में भर्ती</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;मेरी जगह आप भी होते, तो चौंक गए होते। वजह यह थी कि मेरे सामने एक अनिंद्य ‘सुंदरी’ खड़ी मुस्कुरा रही थी। मैंने पहले समझा कि कोई भूतनी मुझ पर सवार होने आई है। यह सोचते ही मेरे पूरे शरीर में भय का संचार होने लगा। बचपन में जब भी किसी भूत या भूतनी से मुठभेड़ हो जाती थी, तो हम लोग एकमात्र ब्रह्मास्त्र ‘हनुमान चालीसा’ का जोर-जोर से पाठ शुरू कर देते थे। चूंकि मेनका एकाएक मेरे सामने आ खड़ी हुई थी, इसलिए मैं भय और हड़बड़ी में ‘हनुमान चालीसा’ ही भूल गया। लाख सोचा, लेकिन मौके पर याद ही नहीं आया। अब क्या करूं? तभी मुझे एक उपाय सूझा। जब रत्नावली की एक घुड़की सुनकर तुलसी दास जैसे साधारण गृहस्थ महाकवि हो सकते हैं, ‘रामचरित मानस’ जैसा महाकाव्य रच सकते हैं, तो क्या मैं अपनी घरैतिन के नाम का जाप करके भूतनी को नहीं भगा सकता। बस फिर क्या था? मैं आंखें बंद और हाथ जोड़कर जोर-जोर से घरैतिन के नाम का जाप करने लगा। लेकिन यह क्या! वह ‘सुंदरी’भागने की जगह खड़ी मंद-मंद मुस्कुराती रही।&lt;br /&gt;उसने मेरे कंधे को थपथपाते हुए कहा, ‘चलिए, आपको ‘यमराज सर’ ने बुलाया है।’&lt;br /&gt;मैंने विनीत स्वर में कहा, ‘देवि! आप कौन हैं? मुझे यमराज सर ने क्यों बुलाया है?’&lt;br /&gt;सुंदरी ने किंचित रोष भरे स्वर में कहा, ‘ताज्जुब है, तुम मुझे नहीं पहचानते? मैं ‘सनातन सुंदरी’ मेनका हूं। यमराज सर ने तत्काल तुम्हें तलब किया है। क्यों बुलाया है, यह तुम उन्हीं से पूछना।’ ‘मरता क्या न करता’ वाली दशा में मुझे यमराज सर के हुजूर में पेश होना पड़ा। यमराज आफिस के बाहर कुछ पुण्यात्माएं खड़ी ‘जिंदाबाद-मुर्दाबाद’ के नारे लगा रही थीं। एक पुण्यात्मा ने मेनका को देखते ही चीखकर कहा, ‘जवानी से लेकर बूढ़ापे तक संयमित जीवन जीने, दान-पुण्य करके भी हमें स्वर्ग में क्या मिला। वही लाखों साल की बूढ़ी रंभाएं, मेनकाएं, उर्वशियां। अरे हमने विभिन्न मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर लाखों-करोड़ों रुपये के सोने-चांदी इसलिए नहीं दान किए थे कि जब मैं स्वर्ग में आऊं, तो राजा मनु से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक जीवित रहने वाली अप्सराएं हमारा स्वागत करें। वैसे भी ये अप्सराएं देवों, दानवों, असुरों और ऋषियों की सेवा करने से फुरसत पाएं, तो हमारा मनोरंजन करें। सत्ता और बाहुबल की हनक के बल पर देवों और असुरों ने इन अप्सराओं को हथिया लिया है। अगर जल्दी ही नई अप्सराओं की भर्ती नहीं हुई, तो हम स्वर्ग में हड़ताल कर देंगे। स्वर्ग सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे।’ मुझे लगा कि यह पुण्यात्मा पृथ्वी पर जरूर नेता रही होगी।&lt;br /&gt;मेनका ने मुझसे कहा था, ‘ये बागी हैं, इनकी बातें मत सुनो।’ तब तक यमराज का दफ्तर आ चुका था। मुझे देखते ही यमराज ने कहा, ‘आओ! तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था। रास्ते में तुमने देख ही लिया होगा कि यहां हड़ताल के आसार हैं। मामला क्या है? यह भी तुम्हारे संज्ञान में आ चुका होगा। अत: हमने फैसला किया है कि मर्त्यलोक की कुछ सुंदरियों को अप्सरा नियुक्त किया जाए। अप्सराओं का चयन एक कमेटी करेगी जिसके तुम अध्यक्ष मनोनीत किए गए हो। हम पर पक्षपात का आरोप न लगे, इसलिए तुम्हें बुलाकर अध्यक्ष बनाना पड़ा।’&lt;br /&gt;यमराज की बात सुनकर मैं हक्की-बक्की भूल गया। मैंने कांपते स्वर में पूछा, ‘सर! तो इन सनातन सुंदरियों का क्या होगा?’ यमराज मेरे सामने पहली बार मुस्कुराये, ‘मेनका ने वीआरएस के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए एप्लीकेशन दिया है। रंभा पहले से ही नोटिस पीरियड में चल रही है। अगले हफ्ते तक नोटिस पीरियड खत्म हो जाएगा। उसे इंद्र सर ने अपनी विशेष सेवा में ले लिया है। रिटारमेंट के बाद उसकी तनख्वाह इंद्र सर देंगे। उर्वशी को कोई न कोई आरोप लगाकर सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा। उसकी तैयारी कर ली गई है। बस, यहां का माहौल थोड़ा ठीक हो जाए।’‘’ यमराज द्वारा महत्व दिए जाने से मैं गदगद हो गया। मैंने हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहा, ‘सर...मुझे क्या करना होगा?’&lt;br /&gt;यमराज कुछ कहते इससे पहले मेनका बोल पड़ी, ‘मर्त्यलोक की कुछ सुंदरियां बुलाई गई हैं, आप चित्रगुप्त जी, नारद जी और वरुण देव जी के साथ बैठकर उन सुंदरियों में से योग्य पात्रों का सलेक्शन कर लें।’ इतना कहकर मेनका ने चलने का इशारा किया। मैं मेनका के साथ एक बड़े से हाल में पहुंचा। वहां रूस, अमेरिका, चीन, जापान आदि देशों की विश्वविख्यात रूप गर्विता सुंदरियां बैठी अपनी मधु मुस्कान बिखेरती वातावरण को नैसर्गिक सुषमा प्रदान कर रही थीं। मैंने चारों तरफ इस उम्मीद से नजर दौड़ाई कि भारत की कौन-कौन सी सुंदरियां बुलाई गई हैं। मैंने सोचा कि जिन सुंदिरयों ने मुझे भाव नहीं दिया है, कभी गले नहीं लगाया, आज उनका चयन कर उन पर एक एहसान लाद दूंगा, ताकि जब मैं स्वर्ग आऊं, तो वे मेरी विशेष सेवा करें। लेकिन यह क्या? भारत की एक भी सुंदरी उनमें नहीं थी। मैंने मेनका से पूछा, ‘भारत से सुंदरियां नहीं बुलाई गईं?’&lt;br /&gt;मेनका ने इधर उधर देखा और फिर फुसफुसाती हुई बोली, ‘वो क्या है सर...पिछली बार जब भी भर्ती हुई थी, तो सारी अप्सराएं देवभूमि भारत से थीं। स्वर्ग के देव, दानव भारतीय सुंदरियों की सेवा लेते-लेते ऊब चुके हैं। सो, इस बार अमेरिका, चीन, जापान और रूस की सुंदरियों को मौका देने पर विचार किया गया है। यमराज और इंद्र सर भी यही चाहते हैं।’&lt;br /&gt;यह सुनते ही मुझे ताव आ गया। मैं चिल्लाया, ‘यह तो भारत का अपमान है। वहां एक से बढ़कर एक सुंदरियां मौजूद हैं। इन सुंदरियों के आगे तो मेनका, रंभा, उर्वशी जैसी अप्सराएं पानी भरती नजर आएं। राखी सावंत, मल्लिका सहरावत, मलाइका अरोड़ा खान को बुलाओ। उनके बिना तो यह सलेक्शन ही पूरा नहीं होगा। मेरे सामने से हटो। मैं जाकर यमराज से पूछता हूं कि यह भेदभाव उन्होंने क्यों किया।’ इतना कहकर मैंने मेनका को ढकेलकर आगे बढ़ना चाहा। लेकिन यह क्या! मुझे धप्प की आवाज के साथ किसी के गिरने का एहसास हुआ। मैं चौंक गया। मैंने देखा कि मैं अपने बिस्तर पर हूं और घरैतिन नीचे गिरी चिल्ला रही थीं, ‘हाय राम...मर गई।’ अब आप समझ सकते हैं कि हुआ क्या था?&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-5423679419151513470?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/5423679419151513470/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/08/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5423679419151513470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5423679419151513470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/08/blog-post_28.html' title='स्वर्ग में भर्ती'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8037286881448244680</id><published>2011-08-02T02:14:00.000-07:00</published><updated>2011-08-02T02:34:52.426-07:00</updated><title type='text'>स्लटवॉक यानी मार्च टुवार्ड्स फ्रीडम</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;छबीली को देखकर मेरी आंखें फटी रह गईं।  क्या गजब का लुक था! उसने क्या पहन रखा था, यह तो मैं नहीं जानता। या यों कहें कि औरतों के परिधानों की जानकारी के मामले में मैं बचपन से ही घोंचू रहा हूं। लेकिन उसने जो कुछ भी पहन रखा था, वह मल्लिका सहरावत, राखी सावंत या मलाइका अरोड़ा खान जैसी पटाखा हीरोइनें भी शायद पहनने से इनकार कर दें। उसकी वेशभूषा देखकर मेरी आंखें आवारगी पर उतारू हो गईं। ये नामुराद आंखें उसके शरीर पर कहां-कहां भटक रही थीं, अब आपसे क्या बताऊं। यदि मेरी इकलौती घरैतिन इस मौके पर साथ होती, तो यकीन मानिए, आंखों की आवारगी के चलते मैं बीच चौराहे पर ही बीवी से पिट चुका होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उसे घूरते हुए पूछा, ‘शॉपिंग करने जा रही हो?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘नहीं...‘स्लटवॉक’ में शामिल होने जा रही हूं। तुम जैसे बेशर्मों के खिलाफ मोर्चा निकालने। तुम्हारी बेशर्मी तो मैं पिछले बीस साल से ही देख रही हूं...इस वक्त भी तुम उसी तरह दीदे फाड़-फाड़कर मुझे घूर रहे हो, जैसे पांच दिन से भूखा भिखारी हलवाई की दुकान में कड़ाही से निकल रही गर्मागरम कचौड़ी को देखता है।’ इतना कहकर छबीली बड़ी अदा से मुस्कुराई। छबीली की बात सुनकर मैं चौंक गया। अब उसके दशहरे के हाथी और राखी सांवत की तरह सज-धजकर निकलने का अर्थ समझ में आ गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने किसी रास्ता भूले पथिक की तरह अकबका कर पूछा, ‘क्या...स्लटवॉक? यह कौन-सी वॉक है? अब तक मार्निंग वॉक, इवनिंग वॉक, नाइट वॉक तो सुना था, लेकिन यह स्लटवॉक किस खेत की मूली है। मैं नहीं जानता!’ छबीली के सामने मैंने अपना अज्ञान प्रकट किया। मेरी अज्ञानता पर छबीली ठहाका लगाकर हंस पड़ी। उसने आंखें मटकाते हुए कहा, ‘स्लटवॉक यानी कि हम औरतों का तुम बेशर्म मर्दों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन। जस्ट लाइक मार्च टुवार्ड्स फ्रीडम। अभी तो हम सिर्फ स्लटवॉक निकालने जा रहे हैं। तुम जैसे बेशर्मों को पहले बातों से समझाएंगे। यदि नहीं माने, तो हमारी लातें किस दिन काम आएंगी। हालांकि हम यह भी जानते हैं कि तुम जैसे बेशर्मों की संख्या इस दुनिया में काफी है। सबको ‘शर्मदार’ बनाने में समय लगेगा। इसलिए हम जब तक अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर लेते, तब तक हर साल इसी दिन हम ‘स्लटवॉक डे’ मनाएंगे।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छबीली की बात सुनकर मैं गंभीर हो गया। चेहरे पर बत्तीस इंची परमहंसी मुस्कान चिपकाते हुए कहा, ‘इसके लिए स्लट बनना क्या जरूरी है? कम से कम कपड़े पहनकर तुम क्या साबित करना चाहती हो कि यदि तुम अपने पर उतारू हो गईं, तो हम मर्दों से ज्यादा बेशर्म हो सकती हो? और फिर ऐसा करने से क्या हम ‘हयादार’ हो जाएंगे?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छबीली ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘देखो। यह बहुत पुरानी कहावत है कि लोहा लोहे को काटता है। तुम कलमघसीटू, बुद्धिबेचू पत्रकार हो। इतना तो तुम समझते ही होगे कि दुनिया भर में सभी लड़कियों को तुम मर्द घूरते रहते हो, लेकिन क्या अब तक कभी किसी अखबार या चैनल पर राखी सावंत, मल्लिका सहरावत या मलाइका अरोड़ा खान जैसी लड़कियों को छेड़ने की खबर आई है? आखिर राखी सावंत जैसी लड़कियां भरे बाजार में भी क्यों नहीं छेड़ी जाती? इसका कारण कभी जानने का प्रयास किया है?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छबीली की बात सुनकर वाकई मेरी बोलती बंद हो गई। मैं कारण सोचने पर मजबूर हो गया, लेकिन लाख बुद्धि भिड़ाने पर कारण मेरी समझ में नहीं आया। मैंने हथियार डालते हुए कहा, ‘माई डियर छबीली! तुम्हीं बता दो कि आखिर राखी को छेड़ने की हिम्मत हम मर्द क्यों नहीं जुटा पाते।’ मैंने अपने चेहरे पर बेचारगी ओढ़ ली। मेरी बात पर छबीली विजयी भाव से मुस्कुराई और चौराहे पर आते-जाते उसे घूर-घूर कर देखते मर्दों पर हेयदृष्टि डालने के बाद बोली, ‘क्योंकि राखी सावंत या मल्लिका बहन तुम लोगों से ज्यादा बेशर्म है। वह जब कम कपड़े पहनकर निकलती है, तुम्हारे चेहरे पर मर्दानगी का भाव जागने की बजाय पसीना छूटने लगता है। जब वह किसी मंच से तुम्हें नामर्द कह देती है, तो तुम आत्महत्या कर लेते हो। अब हम समझ गई हैं कि ईंट का जवाब हाथ जोड़ना नहीं, बल्कि पत्थर मारना है। अब आज से तुम लोग जितनी बेशर्मी दिखाओगे, उससे ज्यादा बेशर्म बनकर हम दिखाएंगी।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छबीली की बात सुनकर वाकई मुझे पसीना आने लगा। मुझे लगा कि ज्यादा देर उसके आसपास खड़ा रहा, तो मेरे मोहल्ले का कोई न कोई व्यक्ति हम दोनों को बातचीत करते देख ही लेगा। अगर खुदा न खास्ता यह बात मेरी घरैतिन को बता चल गई, तो घर लौटने पर मेरा ‘स्लटवॉक’ निश्चित है। मेरे वाले ‘स्लटवॉक’ का अर्थ तो आप समझ ही गए होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8037286881448244680?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8037286881448244680/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8037286881448244680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8037286881448244680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='स्लटवॉक यानी मार्च टुवार्ड्स फ्रीडम'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-3090030368502044830</id><published>2011-06-27T01:26:00.000-07:00</published><updated>2011-06-27T01:28:30.545-07:00</updated><title type='text'>स्वामी जी के राहु-केतु</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज सुबह चाय पिलाने के बाद बेगम ने हाथ में थैला और नेताओं के करेक्टर की तरह सड़े-गले नोट थमाकर फरमान जारी किया, 'ऊंट की तरह गले तक चाय भर चुके हों, तो घर का एक काम कर दीजिए। बाजार से सब्जी खरीद लाइए।Ó बेगम की व्यंग्यात्मक लहजे में कही गई बात चुभ गई। मैंने सचमुच ऊंट की तरह गर्दन ऊंची की और कहा, 'बेगम...जरा सुर में बात किया करो, तुम्हारा पति हूं। अगर तुम्हारा सुर ज्यादा ही बेसुरा हुआ, तो समझो तुम्हारी फाइल बाबा रामदेव की तरह निपटते देर नहीं लगेगी। अभी इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ हूं कि दूसरी न मिल सके।Ó&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बेगम ने मुझे बाहर की ओर ढकेलते हुए कहा, 'जाइए...जाइए...दिग्गी राजा की तरह बहकिए नहीं। जल्दी से सब्जी लेकर आइए, नहीं तो सिर्फ दाल-रोटी खाकर काम चलाना पड़ेगा।Ó मैंने सोचा कि कौन इसके मुंह लगे। सो, थैला और नोट लेकर बाहर निकल आया। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;घर से जैसे ही बाहर निकला, किसी चमचमाती नई बीडब्ल्यूएम की तरह आगे आकर खड़ी हो गई। मैं छबीली को कई बार समझा चुका हूं कि तू भगवान भास्कर की तरह मुझे दर्शन मत दिया कर। लेकिन वह है कि किसी न किसी बहाने मुझसे टकरा ही जाती है। एक तो मेरा मूड पहले से ही बिगड़ा हुआ था। मैं उसे देखते ही भड़क उठा, 'देख छबीली...तुझे देखते ही पता नहीं क्यों मेरा दिल सत्याग्रह करने पर आमादा हो जाता है, दिमाग अनशन पर बैठ जाता है। इसलिए मुझ पर इतनी दया कर कि इस तरह दशहरे का हाथी बनकर मेरे सामने न आया कर।Ó&lt;/div&gt;&lt;div&gt;छबीली मेरी बात सुनकर मुस्कुराई। बोली, 'मेरी मानो, तो अपनी कुंडली लेकर किसी ज्योतिषी के पास चले जाइए। आपका कल्याण हो जाएगा। मुझे लगता है कि आपके ग्रह ठीक नहीं चल रहे हैं।Ó&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैंने तल्ख स्वर में कहा, 'पहले तो तू अपने ग्रहों को संभाल। कभी इनसे नैन मटक्का करते हैं, तो कभी उनसे। तेरी तो वही हालत है कि बुढिय़ा औरों को सीख दे और अपनी खटिया भीतर ले।Ó&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेरी बात सुनकर भी छबीली नहीं भड़की। वह मुस्कुराती हुई बोली, 'आप ग्रहों को कम मत समझिए। अपने योग गुरु स्वामी जी को ही लीजिए। उनकी कुंडली के सातवें घर में बैठा चंद्रमा तीसरे ग्रह में बैठे गुरु से टांका भिड़ा बैठा, तो उन्हें वो करना पड़ा जिसकी उन्होंने कल्पना नहीं की। बेचारे स्वामी जी को आधी रात में कुर्ता-सलवार पहनकर भागना पड़ा। शुक्र और राहु ने पल्टासन किया, तो बेचारे हरिद्वार में बिना खाये-पिये अनशन पर बैठे हैं। सरकार उनकी सुन नहीं रही है।Ó&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;छबीली की बात सुनकर मुझे हंसी आ गई। घरैतिन से हुई 'किच-किचÓ और सब्जी लाने की बात भूलकर उससे बतियाने लगा। मैंने अपने चेहरे पर बत्तीस इंची मुस्कान बिखेरते हुए कहा, 'और क्या गुल खिलाते हैं तुम्हारे ये ग्रह?Ó&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेरी बात सुनकर छबीली उत्साह में आ गई। वह बोली, 'मेरे ग्रह...तुम मेरे ग्रहों की बात छोड़ो। उनकी चाल तो शुरू से ही उलटी रही है। मुझे तो चिंता स्वामी जी के ग्रहों को लेकर हो रही है। बेचारे उधर अनशन पर बैठे हैं और इधर उनके ग्रह ही उनकी भट्ठी बुझाने पर तुले हुए हैं। अब देखिए न! अगर उनके नवें घर में बैठा शनि दूसरे घर में बैठे मंगल एक दूसरे से न टकराते, तो स्वामी जी काहे को रामलीला मैदान में अनशनलीला शुरू करते। बेचारे अनशन पर बैठे इसलिए थे कि वे भी अन्ना हजारे की तरह दूसरे गांधी नहीं, तो तीसरे गांधी बन ही जाएंगे। लोग उनकी जय-जयकार करेंगे। जब वे राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लडेंगे, तो देश की जनता उन्हें सिर आंखों पर बिठाएगी। उनके मन में उपजी लालसा और अहंकार शनि के नवें घर में बैठने से ही है। अगर यह किसी तरह कूद कर चौथे घर में बैठ जाता, तो फिर समझो कि स्वामी जी के बेड़ा पार हो जाता। लेकिन अफसोस की शनि नवें घर में किसी ढीठ किरायेदार की तरह जमकर बैठा हुआ है। अब वह पांचवें घर में बुध के साथ मिलकर उनकी कंपनियों की जांच करा रहा है। उनकी ढंकी छिपी इज्जत का फालूदा बनाकर जनता में बांटने की फिराक में है।Ó इतना कहकर छबीली सांस लेने के लिए रुकी। मैंने उससे कहा, 'अगर स्वामी जी के ग्रह इतने ही कुढंगी चाल चल रहे थे, तो अब तक वे इतने फेमस कैसे हो गए।Ó&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;'उन्हें फेमस तो होना ही था। सच बताऊं। यह उस समय सीधे चल रहे ग्रहों का ही कमाल था कि स्वामी जी खाये-मुटाए तोंदियल लोगों को योग के नाम पर कसरत सिखाकर खूब चांदी कूट रहे थे। ये खाए-अघाए लोग भी योग के नाम पर रत्ती भर चर्बी घटाने के लिए योगगुरु..योगगुरु के नाम की माला जपते फिर रहे थे। स्वामी जी के किसी शिविर में कोई नंगा-भूखा गया हो, तो बताइए। अरे, स्वामी के कुंडली के सातवें घर में पिछले कई दशक से घर जवांई की तरह रहने वाला केतु उन्हें हजारों करोड़ रुपये का स्वामी बना गया। स्वामी जी तो शिविर में आगे बैठने, पीछे बैठने या बीच में बैठने का भी अलग से चार्ज करते थे।Ó छबीली इतना कह हंसी, तभी दरवाजे पर बेगम नजर आईं और मुझे छबीली के साथ देखकर बोलीं, 'अच्छा, तो आप अभी तक यहीं अटके हुए हैं। मैं तो सोच रही थी कि आप लौट रहे होंगे। और जनाब यहां नैन-मटक्का कर रहे हैं।Ó घरैतिन को देखकर मैं यह कहते हुए पतली गली से सब्जी मंडी की ओर दौड़ पड़ा कि 'बेटा! जल्दी से फूट लो, वरना कुंडली के राहू-केतु भरतनाट्यम करने लगेंगे। ये राहु-केतु सीधे चलें, तो बीवी से पिटवाते हैं और उल्टे चलें, तो पड़ोसन से।Ó&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-3090030368502044830?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/3090030368502044830/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/06/blog-post_27.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3090030368502044830'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3090030368502044830'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/06/blog-post_27.html' title='स्वामी जी के राहु-केतु'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-4003968084549933927</id><published>2011-06-27T01:23:00.000-07:00</published><updated>2011-06-27T01:26:44.227-07:00</updated><title type='text'>हाईवे पर 'रामदेव' ढाबा</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पिछले काफी दिनों से पता नहीं क्यों विरक्ति का भाव मन में पैदा हो रहा था। बाबा होने का ख्याल मन में घर करता जा रहा था। वैसे भी बाबाओं के ठाट-बाट देखकर मुझे बाबा होना कोई बुरा नहीं लग रहा था। बाबा तो मैं तब भी बनना चाहता था, जब छबीली से टांका भिड़े दो साल हो गए थे और छबीली का बाप अपनी बेटी का हाथ मुझे सौंपने को तैयार नहीं हो रहा था। अपनी विरक्ति और बाबा बनने की बात छबीली को बताई तो वह उछल पड़ी, 'वाह गुरु! क्या आइडिया सूझा है तुम्हें। तुम बाबा बनो और मैं तुम्हारी चेलिन।'&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैंने डपटते हुए कहा, 'खबरदार! जो तुमने मेरे साथ सटने का प्रयास किया। जब मैं तुम्हारे पीछे पागल बना घूम रहा था, तब तो तुम अपने बाप के पाले में बैठी चोर-सिपाही का गेम खेल रही थी। अब जब मैं भगवान से लौ लगाने जा रहा हूं, तो मेनका बनकर मेरा तप भंग करना चाहती है। तुझे किस आधुनिक इंद्र ने मेरे पीछे लगा दिया है।'&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;'ओए...बाबा की दुम! अन्ना हजारे की तरह ज्यादा भाव मत खा। थोड़ा-सा मुंह क्या लगा लिया, अपने को रामदेव समझने लग पड़ा। मैं तो तेरे साथ क्या, तेरी ही गाड़ी में हरिद्वार तक जाऊंगी। देखती हूं, तू मेरा क्या बिगाड़ लेता है।&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; अब छबीली अपनी औकात में आ गई थी। छबीली जब भी अपनी औकात में आती है, मैं अपनी औकात भूल जाता हूं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सो, मैंने हथियार रखते हुए कहा, 'ठीक है। मेरे साथ चल, लेकिन मेरी प्रमुख चेलिन तू नहीं बनेगी... हां।'&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बात तय हो गई। मैंने अपने पड़ोस में रहने वाले लंगोटिया यार मुसद्दीलाल को पकड़ा और उनकी गाड़ी लेकर हरिद्वार के लिए निकल पड़ा। निकलते समय सोचा था कि यदि अपनी वहां कोई सेटिंग हो गई, तो बाबा बन जाऊंगा। यदि कोई सेटिंग नहीं हुई, तो घूम-फिरकर लौट आऊंगा। हरिद्वार पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो गई। भूख काफी तेज लग आई थी। छबीली के पेट में तो चूहों ने बाकायदा पोस्टर-बैनर लेकर अनशन शुरू कर दिया था। गाड़ी रफ्तार में भागी चली जा रही थी कि एकाएक छबीली जोर से चिल्लाई, 'रोको...गाड़ी रोको...!'&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;ड्राइवर ने हड़बड़ाकर गाड़ी रोक दी। मैंने देखा कि दायीं तरफ एक ढाबा था। ढाबे का नाम था 'रामदेव ढाबा।&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; मैं चौंक गया। मेरे मन में एक संदेह ने सिर उठाया कि कहीं यह ढाबा अपने योगगुरु स्वामी जी का कोई नया वेंचर तो नहीं है। छबीली गाड़ी रुकते ही लपककर फाइव स्टार होटल से भी ज्यादा आलीशान ढाबे पर पहुंची और रिसेप्शन के सामने रखे कीमती सोफे पर ढह गई। रिसेप्शन पर बैठी बाला के अलौकिक सौंदर्य को देखकर मैं दहशत में आ गया। मन ही मन 'राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवनसुत नामा&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; का जाप कर मन में उठ रहे विकारों को दमित करने और 'साधु&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; बनने का प्रयास करते हुए कहा, 'माते! हम दोनों तुच्छ प्राणी बिभुक्षित (भूखे) हैं। हमें भक्षणार्थ को कुछ मिलेगा।'&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;उस बाला ने अमृतमयी वाणी में कहा, 'बिभुक्षित हो, तो पहले अपनी वासनाओं का भक्षण करो, विकारों को उदरस्थ करो। अपनी तृष्णाओं का पान करो। भूख मिट जाएगी।&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; रिसेप्शनिष्ट ने नहले पर दहला जड़ते हुए कहा। यह सुनते ही भूख से बिलबिला रही छबीली बौखला उठी। उसने चिघाड़ते हुए कहा, 'ओ साध्वी की बच्ची! यहां हमारे पेट में चूहे कूद रहे हैं और तू हमें ज्ञान पिला रही है। यह बता तेरे इस ढाबे में खाने को क्या-क्या है?'&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मशीनी अंदाज में उस बाला ने बताना शुरू किया, 'योग कोफ्ता, योग पुलाव, लंबितासन रोटी, विलंबित नॉन, पल्टासन भुजिया, फ्राइड मकरासन दाल विद बटर, नैन-मटक्का चटनी....'&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;'बस...बस...यह तू खाने का आइटम बता रही है या किसी हेल्थ क्लब में सिखाये जा रहे आसनों की जानकारी दे रही है।&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; छबीली के दिमाग का पारा नीचे आने को तैयार ही नहीं था।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;छबीली की बात सुनकर रिसेप्शनिष्ट ने शांत भाव से कहा, 'मैडम...यह हमारे ढाबे का मेन्यू है। यहां परोसे जाने वाले हर व्यंजन का एक औषधिय गुण है। यह आम ढाबे में परोसे जाने वाला खाना नहीं है। अब आप योग कोफ्ता को ही लें। इसे खाने से पहले व्यक्ति भले ही सन्नी देओल की तरह कहता फिरता रहा हो कि जब दस किलो का हाथ पड़ता है, तो आदमी उठता नहीं उठ जाता है। लेकिन योग कोफ्ता खाने के बाद व्यक्ति पुलपुला हो जाता है। अंदर से खाली, लेकिन बाहर से भरा हुआ दिखता है। पल्टासन भुजिया खाने वाली महिलाओं के सिर्फ बेटा ही होगा, इसकी गारंटी हमारा ढाबा लेता है। हमारे ढाबे की नैन मटक्का चटनी खाने से रूठी हुई प्रेमिका या पत्नी अपना गुस्सा थूककर मान जाती है।&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; मैंने हस्तक्षेप किया, 'आज की खास रेसिपी क्या है?'&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;'मंच कूद हलवा, सलवार-कुर्ता पहन खीर...' रिसेप्शनिष्ट ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;छबीली ने मेरा हाथ पकड़कर बाहर खींचते हुए कहा, 'भूख से भले ही मैं मर जाऊं। लेकिन इस ढाबे का पानी तक नहीं पीना है। चलो यहां से।&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; और मैं कटी पतंग के साथ लटकने वाली डोर की तरह छबीली के साथ खिंचता हुआ गाड़ी तक आया और छबीली ने धक्का देकर मुझे गाड़ी में ठूंसा और ड्राइवर से कहा, 'चलो...वापस चलो। हो गई संत और साध्वी बनने की इच्छा पूरी।&lt;/span&gt;'&lt;span class="Apple-style-span"&gt; ड्राइवर ने गाड़ी वापस लौटा दी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-4003968084549933927?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/4003968084549933927/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/4003968084549933927'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/4003968084549933927'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='हाईवे पर &apos;रामदेव&apos; ढाबा'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-1750848389661635047</id><published>2011-04-13T02:49:00.000-07:00</published><updated>2011-04-13T03:15:57.000-07:00</updated><title type='text'>पलटासन के फायदे</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-E1R2mkgEZHA/TaV3yBUapMI/AAAAAAAAATI/_LeOpOrCZhM/s1600/paltasan%2Bcopy.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 158px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-E1R2mkgEZHA/TaV3yBUapMI/AAAAAAAAATI/_LeOpOrCZhM/s200/paltasan%2Bcopy.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5595009813308941506" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(204, 0, 0);"&gt;अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक राजनीतिक पार्टी का प्रशिक्षण शिविर चल रहा था। पार्टी अध्यक्ष घपलानंद अपनी पार्टी के नवांकुरों को समझा रहे थे, ‘राजनीति में पलटासन का विशेष महत्व है। चर्चा में बने रहने के लिए कोई विवादास्पद बयान दो और बाद में जब मामला तूल पकड़ जाए, तो पलट जाओ। आपके पलट जाने पर एक बार फिर मामला गर्माएगा और यह गर्माहट आपको एक बार फिर चर्चा में ला देगा। आपकी छवि और निखर कर जनता के सामने आ जाएगी। इस पलटासन का एक फायदा यह भी होता है कि लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं। उन्हें पता नहीं लग पाता कि आपने जो पहले बयान दिया था, वह सही था या आपके पलटने के बाद दिया गया बयान। आप इस कन्फ्यूजन को अपनी पार्टी के हित में उपयोग कर सकते हैं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक छुटभैये नेता ने सवाल दागा, ‘सर, भारतीय राजनीति के संदर्भ में उदाहरण देते हुए समझाइए, ताकि हम लोग इस आसन को अच्छी तरह से आत्मसात कर सकें।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घपलानंद उस नेता की बात सुनकर मुस्कुराये और बोले, ‘अब देखो, योग गुरु ने लोकपाल बिल प्रारूप कमेटी में भाई-भतीजावाद का मुद्दा उछाला और बाद में जब थुक्का-फजीहत हुई, तो वे पलट गए। कपिल सिब्बल पलटासन के बेहतरीन उदाहरण हैं। पाकिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी भी पलटासन में काफी माहिर हैं। अभी कुछ दिन पहले ये लोग भारत में रहे, भारत का अन्न खाते रहे, तब तक तो भारत उनके लिए बहुत अच्छा था। लेकिन जैसे ही उनके पेट में पाकिस्तानी अन्न पहुंचा, उन्हें भारत के लोग तंगदिल और खुरपेंची नजर आने लगे। इनसे हर राजनीतिक दल के नेता को पलटासन सीखना चाहिए। वैसे तो भारतीय राजनीति का हर बड़ा नेता अपने जीवन में कभी न कभी विवादास्पद बयान देता और बाद में पलट जाता है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दूसरे नवांकुर ने उत्सुकता जाहिर की, ‘अगर पलटासन फेल हो जाए, तो फिर क्या किया जाए?’&lt;br /&gt;पार्टी अध्यक्ष ने खैनी रगड़कर होंठों के नीचे दबाते हुए कहा, ‘वैसे तो पलटासन के फेल होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। लेकिन अगर थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि विशेष काल परिस्थितियों में पलटासन बेअसर साबित होता है, तो बिगड़ी बात को संभालने के लिए कुतर्कासन, मीडिया आरोपासन, चुप्पासन, ढीठासन जैसे कई उपाय हैं जिनका प्रयोग कर विषम परिस्थितियों से निपटा जा सकता है। इन आसनों के बारे में आप लोगों को कल बताया जाएगा, तब तक आप लोग एक दूसरे को विरोधी मानकर खूब कीचड़ उछालिए और पलटासन का अभ्यास कीजिए।’ इतना कहकर अध्यक्ष जी ने प्रशिक्षण शिविर कल तक के लिए स्थगित कर दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-1750848389661635047?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/1750848389661635047/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1750848389661635047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1750848389661635047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_13.html' title='पलटासन के फायदे'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-E1R2mkgEZHA/TaV3yBUapMI/AAAAAAAAATI/_LeOpOrCZhM/s72-c/paltasan%2Bcopy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-1256416623006032609</id><published>2011-04-10T03:32:00.001-07:00</published><updated>2011-04-10T03:32:56.411-07:00</updated><title type='text'>बीवी-बेटे की रिश्वतखोरी भी रुकेगी?</title><content type='html'>अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं गहरी निद्रा में था। अपनी एक अदद बीवी की निगाह बचाकर देर रात तक ऐसे-वैसे चैनल देखने के बाद सोया था। सुबह नौ बजे बीवी ने पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहा, ‘उठिये...सत्य की जीत हो गई। अन्ना दादा देश से भ्रष्टाचार खत्म करने में सफल हो गए।’ मैं चौंक गया। मुझे लगा कि कहीं भूकंप आया है और घरैतिन बचने के लिए कह रही हों। मैं हड़बड़ाकर उठ गया। मैंने कहा, ‘अरे हुआ क्या? सुबह-सुबह पंचम सुर में काहे को अलाप ले रही हो। कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है या भूकंप आया है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीवी ने उत्साहित होकर बताया, ‘यह अखबार देखो, सरकार ने कह दिया है कि वह आगामी लोकसभा सत्र में जन लोकपाल विधेयक को पेश कर देगी। विधेयक मंजूर होते ही समझो भ्रष्टाचारियों के दिन। फटाफट नहा-धो लो, मंदिर चलना है। मैंने मनौती मानी थी कि यदि अन्ना दादा सफल होते हैं, तो मैं मंदिर में 51 रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी।’ यह सुनते ही मैं चौंक गया। मेरे मुंह से यकायक निकला, ‘हे भगवान! भ्रष्टाचार खत्म होने की खुशी में भगवान को रिश्वत। चलो थोड़ी देर के लिए मान लिया कि इस देश में जन लोकपाल विधेयक पारित होकर कानून बन गया। लेकिन क्या बात-बात में भगवान को घूस देने की इस सनातनी परंपरा पर अंकुश लगाया जा सकेगा?’ यह बात वैसे तो मैंने बहुत धीमें सुर में कही थी, लेकिन घरैतिन के कानों का एंटीना कुछ ज्यादा ही सेंसटिव था। उसने तुरंत मेरी बात को कैच कर लिया और नतीजा यह हुआ कि घरैतिन ने तुरंत मुंह फुला लिया। मुझे लगा कि आज का चाय नाश्ता ही नहीं, खाना-पानी भी कट। मैंने खुशामदी लहजे में कहा, ‘अरी भागवान! यह तो मैंने मजाक किया था। आज तुम कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही हो, इसलिए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घरैतिन नहीं मानी। तो सहायता के लिए आठ वर्षीय बेटे टुन्नू को पुकारा। मामला जैसे ही उसकी समझ में आया, वह किसी रिश्वतखोर बाबू की तरह कुटिलता से मुस्कुराया और बोला, ‘आपने कुछ दिन पहले मुझसे वायदा किया था कि खिलौने खरीदने के लिए पांच सौ रुपये देंगे। लेकिन इस बात को आप महिला आरक्षण विधेयक की तरह लटकाते आ रहे हैं। यदि आप अपने वायदे पूरा करें, तो मैं मम्मी को समझाने का प्रयास करूं।’ बेटे की बात पूरी हुई भी नहीं  थी कि बेटी भी बीच में कूद पड़ी। उसने कहा, ‘हां पापा...आप मामले को टरकाने में काफी उस्ताद हैं। आप अपना मतलब निकालने के लिए वायदा तो करते हैं और मतलब निकल जाने पर भूल जाते हैं। आप अपना पिछला वायदा पूरा करने की हामी भरें, तो मैं भी प्रयास करूं।’ ‘मरता क्या न करता’ वाली हालत से मैं दो-चार हो रहा था। बीवी को मनाना था, सो एक बार आश्वासन रूपी ब्रह्मास्त्र आजमाने की सोची। मैंने कहा, ‘ठीक है, आप लोग जो कहेंगे, वह पूरा करूंगा। लेकिन उससे पहले तुम्हारी मम्मी चाय-नाश्ता तो दें। पेट में चूहे कूद रहे हैं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटे ने कुशल अभिनेता की तरह हाथ नचाते हुए काह, ‘नहीं पापा...इस बार आश्वासन की चासनी हम लोग नहीं चाटने वाले। पहले आप एक हजार रुपये निकालिए, तब कोई बात होगी।’ मजबूरन मुझे अपनी टेंट ढीली करनी पड़ी। रुपया पाते ही भाई-बहन कोपभवन की ओर भागे। थोड़ी देर बाद बेटे ने आकर बताया,‘मम्मी...शाम को मंदिर चलकर भगवान को प्रसाद चढ़ाने को तैयार हैं, लेकिन अभी आपको बाजार जाकर वह साड़ी लानी होगी जिसे पिछले हफ्ते पैसे की कमी का रोना रोकर आप मम्मी को टरका चुके हैं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘हे भगवान! यह घर-घर में हो रही रिश्वतखोरी कब रुकेगी? इसके खिलाफ भी कोई बिल संसद में पेश होगा या नहीं?’ इतना कहकर मैंने हाथ-मुंह धोया और साड़ी लाने के लिए निकल पड़ा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-1256416623006032609?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/1256416623006032609/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_10.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1256416623006032609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1256416623006032609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_10.html' title='बीवी-बेटे की रिश्वतखोरी भी रुकेगी?'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-6180942545574572869</id><published>2011-04-09T01:05:00.000-07:00</published><updated>2011-04-09T01:07:03.131-07:00</updated><title type='text'>अब चाहिए जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-W3AoLUmjFTc/TaATgBz4xXI/AAAAAAAAAS4/K25VtXzNBOk/s1600/bahumat.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 126px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-W3AoLUmjFTc/TaATgBz4xXI/AAAAAAAAAS4/K25VtXzNBOk/s200/bahumat.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593492178156963186" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर 97 घंटे तक अनशन करने वाले अन्ना हजारे की सदिच्छा पर शायद ही किसी को कोई अविश्वास हो। उन पर कभी किसी आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप शायद ही लगे हों और यदि लगे भी हों, तो उस पर किसी ने विश्वास नहीं किया होगा क्योंकि अन्ना हजारे ने हमेशा कुछ करके दिखाने में विश्वास किया है, बयानबाजी करने में नहीं। उन्हें जहां भी लगा कि गलत हो रहा है, उसका मुखर विरोध किया। इसके लिए कभी अपने-पराये का भेद भी नहीं किया। शायद यही वजह है कि जब उन्होंने जन लोकपाल विधेयक पारित कराने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का फैसला किया, तो पूरा देश उनके साथ उठ खड़ा हुआ। लेकिन अब जब उन्होंने केंद्र सरकार के आश्वासन पर अपना अनशन तोड़ दिया है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस उद्देश्य को लेकर उन्होंने अनशन किया और जिसे पूरे देश का भरपूर समर्थन मिला, वह उद्देश्य पूरा होगा? सरकार ठीक वैसा ही लोकपाल विधेयक संसद में पेश करेगी, जैसा अन्ना हजारे और देश की आम जनता चाहती है, इसकी क्या गारंटी है। और संसद इस विधेयक को पास भी कर देगी, इसको लेकर आश्वासन देने की स्थिति में शायद कोई नहीं है। थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि ड्राफ्ट कमेटी के सदस्य अन्ना हजारे द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक की मूल अवधारणा से छेड़छाड़ नहीं करेंगे। लेकिन इस भ्रष्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे पास कराना सबसे टेढ़ी खीर होगी।...कहीं इस विधेयक का हश्र महिला आरक्षण विधेयक जैसा ही तो नहीं होगा। जिस तरह दबाव में आकर सरकार ने अन्ना समर्थकों की सभी मांगों को स्वीकार किया है, उससे तो यही लगता है कि वह फिलहाल मसले को कुछ दिनों के लिए टालकर अपने लिए राहत की जुगाड़ में थी। उसने ड्राफ्ट कमेटी में सरकारी और गैर सरकारी सदस्यों की बराबर संख्या की बात भी मान ली है। लेकिन जिस तरह अन्ना हजारे समर्थकों ने आनन-फानन सरकार की बात मान ली है, उससे यह शक पैदा होता है कि कहीं वाहवाही लूटने के लिए तो नहीं जनता के उन्माद और जोश का इस्तेमाल किया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि अन्ना हजारे ने सरकार के झुकने और लोकसभा में विधेयक पेश करने के आश्वासन को आम जनता की जीत बताते हुए कहा कि अब हमारी जिम्मेदारी बढ़ गई है। बिल का मसौदा तैयार करना और उसे मंत्रिमंडल में पास कराना अभी बाकी है। बिल को लोकसभा में पास करवाना भी एक बड़ा काम है। जब तक सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होता, भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात पर कुछ ही लोगों ने ध्यान दिया होगा और वह था अन्ना हजारे के समर्थन में देहरादून में प्रदर्शन करने वाले विख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा और उनके साथियों द्वारा लिया गया एक पोस्टर जिसमें लिखा था कि पूंजीवादी व्यवस्था में भ्रष्टाचार को खत्म करना असंभव है। इस पोस्टर का निहितार्थ यह हुआ कि जब तक मुनाफे पर आधारित बिकाऊ माल की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था रहेगी, तब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। जो व्यवस्था मुनाफा कमाने की इजाजत देती हो, उस व्यवस्था से रिश्वतखोरी, लूट, शोषण-दोहन खत्म हो जाएगा, इसकी कल्पना करना बुद्धिमानी नहीं होगी। शायद सुंदरलाल बहुगुणा और उनके साथियों को इस बात का पूरा विश्वास है कि पंूजीवादी संसदीय जनतंत्र भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। और इस गंगोत्री के रहते किसी भी दल या राजनेता के पाक-साफ रहने की गुंजाइश बहुत ही कम है। इस पूरी व्यवस्था का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करें, तो पता लगता है कि किसी वस्तु के उत्पादन प्रक्रिया में मुनाफा तभी पैदा होता है, जब उत्पादन कार्य में लगे श्रमिकों को उनकी वाजिब मजदूरी से कम दी जाए या उनसे दी गई मजदूरी के बदले ज्यादा समय तक काम लिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जागरूकता लोगों में पैदा हो ही गई है, तो ऐसे में उचित तो यह होगा कि जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का विधेयक पारित कराने का दबाव भी सरकार पर बनाया जाए। वैसे तो इस व्यवस्था में जब तक किसी मंत्री, सांसद या नौकरशाह पर आरोप नहीं लगता या उसके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का खुलासा नहीं होता, तब तक तो वह ईमानदार ही माना जाता है। लेकिन यदि किसी कारणवश उसके घपलों और घोटालों का पर्दाफाश हो भी जाए, तो वह बड़ी बेशर्मी से इसे विरोधियों द्वारा बदनाम करने की बात कहकर पहले तो अपने कुकृत्य को नकारने का प्रयास करता है। इस पर भी यदि बात नहीं बनी, तो सरकार या पार्टी उस व्यक्ति को सरकार या पार्टी से निकालकर मामले की लीपापोती में लग जाती है। कामनवेल्थ गेम्स घोटाले का खुलासा होने से पहले सुरेश कलमाडी ईमानदार नहीं माने जाते थे क्या? 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले का पर्दाफाश होने से पहले तो ए. राजा भी सीना ठोंककर अपने को ईमानदारों की श्रेणी में रखते थे। यह बात किसी व्यक्ति या राजनीतिक पार्टी विशेष पर लागू नहीं होती। यह बात इस पूरी पूंजीवादी व्यवस्था पर लागू होती है जो शोषण पर आधारित है।&lt;br /&gt;सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि ड्राफ्ट कमेटी के सदस्यों में शामिल सरकारी और गैर सरकारी सदस्य किसी भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं रहे हैं, इसकी गारंटी कौन लेगा। चलिए थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए, जनलोकपाल विधेयक पारित भी हो जाएगा और तब? इस व्यवस्था को देखने के लिए जो लोग जिम्मेदार होंगे, वे दूध के धुले होंगे, इसकी भी गारंटी शायद ही कोई लेने को तैयार हो। जब तक शोषण पर आधारित व्यवस्था का खात्मा नहीं होता, तब तक के लिए सिर्फ इतना ही किया जा सकता है कि जन लोकपाल विधेयक के साथ ही जनता अपने जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार भी मांगे। जब तक जनप्रतिनिधियों पर यह तलवार नहीं लटकती रहेगी कि यदि उन्होंने कोई घपला-घोटाला किया, तो जनता न केवल उनसे पद छीन लेगी, वरन उन्हें लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा से वापस बुला लेगी। उन पर जनता की अदालत में मुकदमा चलेगा, वह अलग से। यही बात नौकरशाही के संबंध में भी लागू होनी चाहिए। एक बार अपनी पढ़ाई और योग्यता के बल पर चुने गये नौकरशाह को तभी हटाया जा सकता है, जब उसके खिलाफ पूरी तरह साबित हो जाए कि वह भ्रष्ट है या किसी गैरकानूनी कार्यों में लिप्त रहा है। लेकिन ऐसा होने का उदाहरण शायद ही कोई हो, जब किसी नौकरशाह को भ्रष्टाचार के आरोप में नौकरी से हाथ धोना पड़ा हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-6180942545574572869?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/6180942545574572869/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_09.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6180942545574572869'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6180942545574572869'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_09.html' title='अब चाहिए जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-W3AoLUmjFTc/TaATgBz4xXI/AAAAAAAAAS4/K25VtXzNBOk/s72-c/bahumat.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8876902812294885748</id><published>2011-04-05T23:54:00.000-07:00</published><updated>2011-04-08T23:06:55.638-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>रिश्वत बिना सब सून</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-fhzURWIaetk/TZ_2zyyR2pI/AAAAAAAAASw/GQBtj6Wnwyg/s1600/anna+jpg.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593460631883864722" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 154px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-fhzURWIaetk/TZ_2zyyR2pI/AAAAAAAAASw/GQBtj6Wnwyg/s200/anna%2Bjpg.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;div&gt;-अशोक मिश्र &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;‘भाई साहब! यह अन्ना हजारे क्या बला है?’ कल पीडब्ल्यूडी का एक जूनियर इंजीनियर खन्ना मुझसे पूछ रहा था। ‘भल बताइए, यह भी कोई बात हुई। भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठ गए।’ मैंने उसकी बुद्धि पर तरस खाते हुए कहा, ‘अन्ना हजारे एक बहुत बड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी हनक इतनी है कि मुंबई का बड़े से बड़ा दादा और भाई रोज सुबह शाम पांव छूने आते हैं। केंद्र सरकार तक उनकी ईमानदारी और साफगोई की कसमें खाती है।’ ‘तो इसका मतलब अन्ना हजारे सामाजिक क्षेत्र के दादा हैं, ठीक वैसे ही जैसे आपराधिक क्षेत्र के दादा अपने दाऊद भाई हैं।’ जूनियर इंजीनियर ने अपना ज्ञान बघारा। मैं कुछ बोलता, इससे पहले खन्ना बोल उठा, ‘ यह बताओ, उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठने की क्या जरूरत थी। अगर दाल या सब्जी में से नमक गायब कर दिया जाए, तो दाल या सब्जी कैसी लगेगी। बिल्कुल फीकी, स्वादहीन। इसे खाने में मजा आएगा? अब अगर कोई कहे कि इस दुनिया से सभी रंगों को गायब कर दो, तो दुनिया कैसी लगेगी। रंगहीन दुनिया की कल्पना करके देखो, पसीने छूट जाएंगे। ठीक ऐसे ही कल्पना करो कि इस देश-दुनिया से भ्रष्टाचार खत्म हो गया है, तो फिर क्या इस दुनिया में जीना पसंद करेगा। भ्रष्टाचार खत्म होते ही हम सबके जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा।’ मैंने प्रतिवाद किया, ‘अन्ना दादा जो कुछ कर रहे हैं, वह राष्ट्रहित में है। भ्रष्टाचार खत्म होते ही देश के विकास की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगेगी। सब तरफ खुशहाली और अमीरी छा जाएगी। यह तुम क्यों नहीं सोचते।’ ‘अरे, विकास की गाड़ी दौड़ाने के लिए और भी तो कई रास्ते हैं। उस पर तुम्हारे ये अन्ना दादा चाहे रेलगाड़ी चलाएं, चाहे ट्रक। किसी ने रोका है उन्हें। लेकिन वे हम लोगों के पेट पर लात क्यों मारते हैं। अगर भ्रष्टाचार खत्म हो गया, तो क्या हम-आप जैसे लोग अपने बच्चों को महंगे-महंगे स्कूलों में पढ़ा सकेंगे। उन्हें ऐश करने के लिए ढेर सारे पैसे और मोटर बाइक आदि कहां से लेकर दे पाएंगे। सूखी तनख्वाह से तो दाल-रोटी चल जाए, यही बहुत है। यह बताओ, अन्ना हजारे अपने को गांधीवादी कहते हैं, लेकिन गांधी जी ने तो कभी भ्रष्टाचार का विरोध नहीं किया। अरे, गांधी बाबा तो अपनी बकरी को भी मेवे खिलाते थे, ताकि वह उन्हें बदले में पौष्टिक दूध दे। वे कभी भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी के खिलाफ अनशन पर नहीं बैठे। यदि वे रिश्वतखोरी को बुरा समझते, तो विरोध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने कभी इसका विरोध किया हो, ऐसा कहीं लिखा नहीं है।’ मैं कुछ कहता, इससे पहले खन्ना ने अपनी बाइक उठायी और चलता बना। मैं वहीं खड़ा उसकी बातो पर गौर करता रहा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8876902812294885748?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8876902812294885748/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_05.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8876902812294885748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8876902812294885748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post_05.html' title='रिश्वत बिना सब सून'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-fhzURWIaetk/TZ_2zyyR2pI/AAAAAAAAASw/GQBtj6Wnwyg/s72-c/anna%2Bjpg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8797999883995871878</id><published>2011-04-04T05:56:00.001-07:00</published><updated>2011-04-04T22:48:29.860-07:00</updated><title type='text'>सारा गुड़ गोबर कर दिया</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-style: italic;"&gt;अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘पता नहीं किस का शेर है कि ‘बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, चीरा तो कतरा-ए-खूं निकला।’ पिछले कई महीनों से वर्ल्ड कप भारत जीतेगा, शाबाश धोनी के धुरंधरों, देश की आन, बान-शान...और पता नहीं क्या-क्या  तुम्हीं हो, तुम्हें अट्ठाइस साल पुराना इतिहास दोहराना है। जैसे-जैसे नारे सुनते-सुनते कान पक गए थे। अखबार से लेकर टीवी चैनल तक चीख-चीख कर चिल्ला रहे थे। इस बार विश्व कप हमारा है, हम जीत कर रहेंगे। कोई चैनल वाला इसे महामुकाबला बता रहा था, तो कोई महायुद्ध। और अब, जब यह महामुकाबला जीत लिया, तो आईसीसी वालों की नालायकी देखिए, नकली ट्राफी थमा दी। हद हो गयी यार...सारा गुड़ गोबर कर दिया।’ यह कहते मुसद्दी लाल का चेहरा क्रोध से काला पड़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, ‘ट्रॉफी ट्रॉफी होती है, असली या नकली से कोई फर्क नहीं पड़ता। अब आपको बताऊं। मेरा बेटा है टुन्नू। जब वह हवाई जहाज लेने की जिद करता है  तो क्या उसे मैं असली हवाई जहाज खरीद कर देता हूं। प्लास्टिक का एक खिलौना हवाई जहाज खरीदता हूं और पकड़ा देता हूं। आपने अपने बच्चे को इसी तरह बहलाया होगा, तो आपको मालूम ही होगा कि वह कितना खुश हो जाता है। वह नाचने लगता है। कभी वह दौड़कर अपने खिलौना हवाई जहाज अपनी मम्मी को दिखाता है, तो कभी अपने पड़ोस में रहने वाले दोस्त राजू को। खिलौना दिखाते समय वह उन्हें बरजता भी है, हां...पेंच मत घुमाना...टूट जाएगा। उसके उमंग और उत्साह की तुलना आज के एक अरब इक्कीस करोड़ भारतीयों से कीजिए। लगभग मेरे बेटे टुन्नू जैसी स्थिति पूरे देश की है। कहीं सोनिया गांधी नाच रही हैं, तो कहीं अमिताभ बच्चन। कहीं खुशी से युवराज फफक रहे हैं, तो कहीं सचिन की आंखें गीली हैं। कैप्टन कूल इस खुशी में मुंडन संस्कार करवा रहे हैं। आप सोच नहीं सकते कि हम भारतीयों का खुशी के मारे क्या हाल है। हम विश्व कप विजेता बन गए...यह पूरी दुनिया ने देखा, आंखें फाड़कर देखा। अब आप इसका मजा किरकिरा मत कीजिए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘लेकिन अगर असली ट्रॉफी दे देते, तो आईसीसी वालों का क्या बिगड़ जाता?’ मुसद्दी लाल अब भी बरस रहे थे। उनके क्रोध का पारा नीचे आने को जैसे तैयार ही नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने समझाने वाले लहजे में कहा, ‘भइया बात यह है कि बच्चे जिद कर रहे थे। इस बार हम ही वर्ल्डकप ट्रॉफी लेंगे। आईसीसी के मुखिया शरद पवार ने एक अरब इक्कीस करोड़ बच्चों को बहलाने के लिए एक झुनझुना थमा दिया। अब आप अगर किसी चीज की जिद कर बैठेंगे, तो कोई क्या करेगा। इसीलिए हमारे पूर्वज कहते थे कि अच्छे बच्चों को जिद नहीं करनी चाहिए। अब अगर जिद की है, तो भुगतो।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल थोड़ा नरम पड़े। बोले, ‘यार...मुझे तो अब समझ में आ रहा है कि पाकिस्तान वालों ने सचिन के सात कैच क्यों छोड़ दिये या श्रीलंका वालों ने मैच में ज्यादा रन क्यों नहीं बनाए। जबकि वे इससे पहले के मैचों में अपने विरोधियों के छक्के छुड़ा चुके थे।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसद्दी लाल की बातें अब कुछ रस देने लगी थी। मुझे भी उत्सुकता हुई कि आखिर कौन सी ऐसी बात है जिसे मुसद्दी लाल समझ गए और मैं अभी तक नहीं समझ पाया। मैंने पुचकारने वाले अंदाज में कहा, ‘भाई साहब! बात क्या है! लगता है कि आपने कोई रहस्य पा लिया है। वैसे भी हमारे देश में जो रहस्य पा लेता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है। इस असार संसार के आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाता है। लगता है कि आप भी बुद्धत्व को प्राप्त हो गए हैं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसद्दी लाल ने मुझे घूरते हुए कहा, ‘मेरी बात को हल्के में मत लो। अब तो मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि पाकिस्तान और श्रीलंका की क्रिकेट टीम को यह बात पहले से ही पता थी कि ट्रॉफी नकली है। अब जब वे इस बात को जान चुके थे, तो नकली ट्रॉफी के लिए क्यों अपनी जान लड़ाते। उन्होंने मैच इसी तरह खेला जैसे कोई बुजुर्ग खिलाड़ी किसी बच्चे से कोई खेल खेले और झूठ-मूठ में हार जाए। अपनी इस जीत पर बच्चा खुश हो जाता है। वह इसे अपनी प्रतिभा और खेलने की कला की विजय मानकर इतराता घूमता है। अब आप जरा पाकिस्तान और श्रीलंका के खिलाड़ियों के चेहरे को याद कीजिए। वे हारने के बाद भी दुखी नहीं थे। उनके चेहरे पर शायद इस बात का संतोष था कि वे नकली ट्रॉफी के बेकार में ढोकर अपने देश ले जाने की जहमत से बच गए।’ इतना कहकर मुसद्दी लाल ने एक गिलास पानी पिया और बैठकर आईसीसी वालो को कोसने के पुनीत कर्म में लग गए। मैं उन्हें कोसता छोड़कर अपने घर लौट आया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8797999883995871878?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8797999883995871878/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8797999883995871878'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8797999883995871878'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='सारा गुड़ गोबर कर दिया'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8886067945326754503</id><published>2011-03-24T02:03:00.000-07:00</published><updated>2011-03-24T02:15:54.896-07:00</updated><title type='text'>कुत्तों की खरीद पर आयकर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-1fA99135za8/TYsLsMkj7iI/AAAAAAAAASo/fnowwc70rys/s1600/dog%2Bon%2Blap.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 120px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-1fA99135za8/TYsLsMkj7iI/AAAAAAAAASo/fnowwc70rys/s200/dog%2Bon%2Blap.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5587572616599957026" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;आज श्यामलाल का चेहरा उतरा हुआ था। सब्जी लेते समय मिले, तो उन्होंने बिना चीनी की गुझिया की तरह फीके  अंदाज में अभिवादन किया। मैंने पूछा, ‘भाई श्याम लाल, घर में सब सुख-सांद तो है न! काफी उदास से लग रहे हैं। बात क्या है?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्याम लाल ने फुफकार की तरह गहरी सांस छोड़ी, ‘अच्छा, भाई साहब! एक बात बताइए। सरकारी महकमे के अधिकारियों के पास कोई काम नहीं है क्या? बैठे-ठाले बस फिजूल की बातें सोचते और खुरपेंच करते रहते हैं।’&lt;br /&gt;मैं हंस पड़ा। पूछा, ‘हुअ क्या? कुछ तो बताइए। आप बात तो बताते नहीं है और बस अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाए जा रहे हैं। मामले की पूंछ कुछ पकड़ में आए, तो कुछ सलाह-वलाह दे सकूंगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी इस बात पर श्यामलाल जी कुछ खुले। उन्होंने कहा, ‘बात यह है कि मेरी मुनिया ने चार बच्चे दिए थे। बड़े प्यारे-प्यारे, सुंदर-सुडौल बच्चे। उन बच्चों में से एक को मेरे पड़ोसी के पड़ोसी मेहता जी मांग कर ले गए। दूसरे को मेरे आफिस के सुपरवाइजर कालरा साहब उठा ले गए, बोले कि इसे मैं पालूंगा। बाकी बचे दो बच्चों में से एक को कोई रात में चुरा ले गया। एक मेरे पास है जिस पर मेरे बच्चे के क्लास टीचर की निगाह है। वह रोज शाम को मेरे बेटे को ट्यूशन पढ़ाने आता है और जाते समय उसे बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखता है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘तो इसमें ऐसी कौन सी बात हो गई कि आप अधिकारियों के खिलाफ लट्ठ लिए घूम  रहे हैं। और फिर एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि यह मुनिया कौन है? बकरी है, कुतिया है या फिर कोई महिला है? कौन है यह मुनिया?’ मैंने झल्लाते हुए पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर श्यामलाल जी के चेहरे पर नागवारी के भाव उभरे। उन्होंने कठोर लहजे में कहा, ‘आप इतना भी नहीं समझते! मुनिया मेरे घर की पालतू कुतिया है। उसने चार बच्चे दिए हैं। अब असली समस्या यह है बरखुरदार कि कल ही आयकर विभाग, दिल्ली से एक सरकुलर जारी हुआ है कि कुत्तों की खरीद-फरोख्त बाकायदा रसीद लेकर की जाए। यदि कुत्ते किसी को दान में भी दिए जाएं, तो इसकी भी लिखत-पढ़त जरूरी है।  अब भला बताओ, यह भी कोई बात हुई, कुत्ते न हो गए सोने-चांदी के जेवर हो गए कि लिखत-पढ़त करा लो, ताकि भविष्य में कोई जेवर खराब निकले, तो मामला सुलटाया जा सके।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे श्यामलाल की बात सुनकर काफी गुस्सा आया। श्यामलाल जी की यही एक आदत मुझे खराब लगती है। वे किसी बात को आधा सुनते हैं, बाकी ले उड़ते हैं। मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘भाई साहब, यह सरकुलर गली-कूचे में  हर आते-जाते लोगों को देखकर भौं-भौं करने वाले कुत्तों के लिए नहीं है। कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। यह आदेश उन कुत्तों के लिए है, जो कारों में घूमते हैं, शैंपू से जिनके बाल धोए जाते हैं। जिन्हें उनकी मालकिन या मालकिन की बिटिया गोद में लिए घूमती-फिरती है। ऐसे कुत्तों की खरीद-फरोख्त पर अब रसीद जरूरी होगी। आपकी मुनिया के लिए नहीं, जिसे दिन भर में पूरी एक रोटी भी नसीब नहीं होती है। कार में घूमने और महलनुमा कोठियों में रहने वाले कुत्तों का कारोबार कई सौ करोड़ रुपये सालाना है। अब अगर आयकर विभाग वाले इन कुत्तों की खरीद-फरोख्त पर आयकर वसूलने की फिराक में है, तो आपको क्या तकलीफ है।’ मेरी बात सुनकर श्यामलाल जी सिर्फ इतना ही बोले, ‘अच्छा तो यह बात है। मैं तो बेकार में ही कल से दुबला होता जा रहा था।’ इतना कहकर श्यामलाल खुशी-खुशी सब्जियां खरीदने लगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8886067945326754503?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8886067945326754503/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_24.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8886067945326754503'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8886067945326754503'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_24.html' title='कुत्तों की खरीद पर आयकर'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-1fA99135za8/TYsLsMkj7iI/AAAAAAAAASo/fnowwc70rys/s72-c/dog%2Bon%2Blap.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-5406107008605991604</id><published>2011-03-16T01:21:00.000-07:00</published><updated>2011-03-16T01:22:08.395-07:00</updated><title type='text'>ओटन लगे कपास</title><content type='html'>अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक हैं स्वामी जी। खा-अघाकर मुटा गए तोंदियल धन्ना सेठों और मध्यमवर्गीय लोगों को कसरत कराते-कराते उन्होंने काफी नाम और दाम कमा लिया। उनके कसरत शिविरों में लोग फीस देकर जाते हैं। गरीब को वैसे भी कसरत-फसरत की जरूरत नहीं होती और उसका प्रवेश भी स्वामी जी के कसरत शिविरों में वर्जित रहता है। जैसा कि आमतौर पर होता है, स्वामी जी को एक दिन अहसास हुआ कि अरे! मैं तो ब्रह्म हो गया। मैं जो कुछ कहूंगा, लोग भक्तिभाव से सुनेंगे। तो वे लगे भ्रष्टाचार और कालेधन पर भाषण देने। उन्होंने सोचा, वे राजनीतिक पार्टी बनाएंगे, तो लोग उन्हें चुनकर देश का भाग्यनियंता बना देंगे और वे योग (कसरत) के बल पर देश को भ्रष्टाचार मुक्त बना देंगे। इस ज्ञानोदय के बाद स्वामी जी लगे, प्रवचन देने। फलां व्यक्ति का कालाधन विदेशी बैंकों में जमा है, अमुक व्यक्ति चोर है। जिसके वे कालेधन का मालिक बताते, वह तो तिलमिलाकर रह जाता, लेकिन उसके विरोधियों को एक मौका मिल जाता घेरने का। एक पार्टी के पीछे तो वे हाथ-पैर धोकर पड़े हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक कहावत है न! आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। कहां योग के नाम पर कसरत सिखा रहे थे, कहां योग से सत्ता सुंदरी को भोगने के चक्कर में पड़ गए। उनकी सत्ता भोग लिप्सा और एक ही पार्टी को निशाना बनाने की प्रवृत्ति पर निशाना बन रही पार्टी ने जवाबी हमला कर दिया। स्वामी जी से पूछा जाने लगा कि एक हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ति कहां से आई? जानते हैं स्वामी जी का क्या जवाब था इस पर। स्वामी जी कहते हैं कि उन्होंने जितना भी कमाया, अपनी मेहनत से कमाया। काला धन अगर लिया भी, तो उसे साबुन से धोकर श्वेत धन में बदल दिया था। अब स्वामी जी की इस बात का तोड़ विरोधी खोजने में लगे हुए हैं। हो सके, तो आप भी उनकी मदद करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-5406107008605991604?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/5406107008605991604/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_8846.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5406107008605991604'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/5406107008605991604'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_8846.html' title='ओटन लगे कपास'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8649657180691913193</id><published>2011-03-16T01:20:00.000-07:00</published><updated>2011-03-16T01:21:11.371-07:00</updated><title type='text'>ये क्या हो रहा है?</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने एक फिल्म में गीत गाया था, ये क्या हो रहा है, भाई ये क्या हो रहा है? इसका जवाब यह दिया गया कि कुछ नहीं...कुछ नहीं... बस प्यार हो रहा है। मैंने इस फिल्म को देखा नहीं है। लेकिन गीत के बोल से लगता है कि प्रेमी-प्रेमिका को कुछ ऐसा-वैसा करते पकड़ लेने पर ही उनके मुंह से निकला होगा कि ये क्या हो रहा है? आज हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट पूरे देश से पूछ रही है कि यह क्या हो रहा है और इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है। यही सवाल एक दिन सुबह-सुबह मैंने उस्ताद गुनाहगार के घर जाकर पूछा, तो वे झल्ला उठे। उन्होंने भाभी जी से चाय पिलाने का अनुरोध करते हुए कहा, ‘होने को तो बस केवल भ्रष्टाचार हो रहा है, घपले हो रहे हैं, घोटाले हो रहे हैं। महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहे हैं। इसके अलावा कुछ नहीं हो रहा है। तुम और क्या सुनना चाहते हो? सुबह-सुबह राम का नाम लेने के बजाय मेरे मुंह से खराब बातें ही निकलवा रहे हो।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उस्ताद गुनाहगार को छेड़ा, ‘आप भी अमिताभ बच्चन की तरह लोगों से पूछिए, यह क्या हो रहा है?’&lt;br /&gt;गुनाहगार थोड़े नम्र हुए। बोले, ‘यार! किससे-किससे पूछोगे। सुप्रीम कोर्ट पूछ तो रही है? है कोई जवाब देने वाला? प्रधानमंत्री से पूछो, तो अपनी ईमानदारी का तमगा और मजबूरी का रोना रो देंगे। विपक्षी सिर्फ हाय-हाय करना जानते हैं। उनको भी पता है कि देश में क्या हो रहा है। कुछ उन्होंने किया है, कुछ उनके भाई-बंधु कर रहे हैं और कुछ उनके भविष्य में करने की आशा है। इसी आशा पर उनकी सारी हाय-हाय टिकी है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा, ‘सरकार को कुछ मत कहिए। उसने किया तो है। ए राजा को जेल भेजा, सुरेश कलमाड़ी के किये-कराये पर पानी फेर दिया। बेचारे अब सफाई देते फिर रहे हैं कि मैंने कुछ नहीं किया।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुनाहगार फिर झल्ला उठे, ‘अरे, तो करते न! उन्हें कुछ करने के लिए ही तो जिम्मेदारी सौंपी गई थी। जब कुछ नहीं किया, तो इतना बड़ा घोटाला निकला और अगर कहीं खुदा न खास्ता करते, तो फिर पूरा देश ही कंगाल हो जाता। भगवान बचाए, ऐसे करने वालों से। अगर अपने देश में दो-चार ऐसा करने वाले निकल जाएं, तो फिर देश का बंटाढार ही समझो।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘भाई साहब, ऐसा करने वालों से हमारे देश की धरती कभी खाली नहीं रही है। आजादी के बाद से लेकर आज तक के इन घोटालेबाजों के नाम गिनाऊं क्या?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘रहने दो यार...अपने देश के तो भाग्य नियंता हो गए हैं घोटालेबाज। हम जन-गण-मन के अधिनायक तो यही हैं। इन्हीं का जयगान गाते-गाते इस दुनिया से विदा हो जाएंगे।’ उस्ताद गुनाहगार अब कुछ भावुक और भाग्यवादी से हो चले थे। उन्हें अधिक परेशान करने की बजाय घर की ओर लौट चला। चौराहे पर पहुंचा, तो वहां भीड़ देखकर मैं मामला जानने की नीयत से पास गया, तो पता चला कि एक रिक्शे पर कुछ लड़के गोमती नगर से पालिटेक्निक कालेज तक बड़े ठाठ से बैठकर आये और किराये के नाम पर पांच रुपये पकड़ाकर चल दिए। रिक्शेवाले ने विरोध किया, तो उसे मारा पीटा और उसके पास जो कुछ था, वह भी छीन कर भाग गए। लुटा-पिटा रिक्शावाला तमाशाई भीड़ से पूछ रहा था, ‘भइया, यह क्या हो रहा है? एकदम अंधेर मची है इस देश में। मेहनत भी कराया और जो कुछ था, वह भी लूटकर चलते बने।’ मैं गुनगुनाता हुआ घर लौट आया, ‘यह क्या हो रहा है...भाई...यह क्या हो रहा है?’&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8649657180691913193?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8649657180691913193/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_4862.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8649657180691913193'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8649657180691913193'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_4862.html' title='ये क्या हो रहा है?'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8814994937406535987</id><published>2011-03-16T01:19:00.000-07:00</published><updated>2011-03-16T01:20:05.186-07:00</updated><title type='text'>होली का त्योहार और कर्ज</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस्ताद गुनाहगार कह रहे थे, ‘यार...वर्ल्ड बैंक के ग्लोबल डेवलेपमेंट फाइनेंस की रिपोर्ट कहती है कि हम दुनिया के पांचवें बड़े कर्जदार देश हैं। यह बात हमारे वित्त मंत्री प्रणव दादा बड़े गर्व से लोकसभा में बताते हैं। वैसे तो कर्ज लेने के मामले में अपने दिल्ली वाले मिर्जा गालिब ही बदनाम थे। लेकिन लगता है कि अपने दादा तो उनसे भी चार जूता आगे निकले। मिर्जा गालिब तो कर्ज की दारू पीने के बाद अपनी फाकामस्ती के रंग लाने का इंतजार करते थे। लेकिन हमारी सरकार वर्ल्ड बैंक से भारी भरकम कर्ज लेने के बाद मरभुक्खे मंत्रियों और सांसदों की समिति गठित करके तरह-तरह के आयोजन कराती है, ताकि उनकी फाकामस्ती दूर की जा सके।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जमुहाई रोकते की कोशिश करते हुए कहा, ‘सच? आपकी बात पर विश्वा स नहीं होता है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुनाहगार ने मुझे झिड़कते हुए कहा, ‘जब प्राइमरी वाले गुरु जी कहते थे, इतिहास पढ़ लो, काम आयेगा। तब आपको कुछ दूसरा ही  सूझता था। यदि आपने ठीक से इतिहास पढ़ा होता, तो आपको पता होता कि हम सदियों तक कर्ज मांगने के मामले में विश्व शिरोमणि रहे हैं। हमारे यहां का राष्ट्रीय कर्म कर्ज मांगना था। यदि कर्ज न मिले, तो भीख मांगो। पहले पूरा देश एक दूसरे से भीख या कर्ज मांगता था, लेकिन बाद में यह काम कुछ वर्ण के लोगों को ठेके पर दे दिया गया। बाद में इस ठेके के खिलाफ आवाज उठी, तो यह हक देश के उन निकम्मे और कामचोरों को सौप दिया गया जिसे साधु कहते हैं। चार्वाक महोदय ने तो बाकायदा एक सूत्र पूरे देश को थमा दिया था, ‘ऋणम कृत्व घृतम पिबेत।’ चार्वाक तो कहते थे कि इस शरीर के भस्म हो जाने पर कौन किससे कर्ज की रकम वसूलने आयेगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘क्या...कभी ऐसा भी होता था। लोगों को भीख या कर्ज मांगने में लज्जा भी नहीं आती थी?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुनाहगार ने कहा, ‘काहे की लज्जा। लज्जा और भिक्षा में वैसा ही बैर होता है जैसे सौतों में होता है। अरबों-खरबों का कर्ज लेने वाली सरकार कहीं शर्माती है क्या? रूस और चीन कभी शर्म से पानी-पानी हुए? ऐसी कोई खबर अखबारों में छपी क्या?’ इसके बाद गुनाहगार का स्वर एकाएक अत्यंत मधुर हो उठा। वे बोले, ‘यार तुम्हें तो मालूम है कि अगले कुछ ही दिनों में होली आने वाली है। पिछले कई दिनों से लोगों की पाकेट मार रहा हूं, लेकिन कोई खास रकम मिली नहीं। किसी के पर्स से दो सौ से ज्यादा की रकम निकली नहीं। और तुम जानते ही हो कि इस महंगाई के जमाने में इतनी रकम से होली नहीं मनाई जा सकता है। यदि तुम कुछ मदद कर सको, तो....’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुनाहगार ने पलभर मेरे चेहरे को निहारा, फिर बोले, ‘क्या बताऊं यार, अपने घर का बजट भी बिल्कुल आम बजट की तरह है। होली हो या दीवाली, हमेशा गड़बड़ाया ही रहता है। कभी बच्चे त्योहार के अवसर पर कम बजट का रोना रोते हैं, तो कभी घरैतिन राशन, कपड़े, हारी-बीमारी के मद में कम पैसे को लेकर अपना माथा पीटती है। हर महीने कुछ न कुछ रुपये तो उधारी चुकाने में चला जाता है। अगर तुम कुछ मदद कर सको, तो थोड़े-थोड़े रुपये तुम्हें भी हर महीने वापस करता रहूंगा। वैसे होली पर जब लोग रंग खेलने में मशगूल होंगे, तब मैं अपने ब्लेड का भरपूर उपयोग करूंगा और हो सकता है कि तुम्हारी रकम होली की शाम तक ही वापस हो जाए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसके बाद गुनाहगार ने कर्ज मांगने के वे तमाम लटके झटके अपनाए, जो आम तौर पर सरकारें वर्ल्ड बैंक से कर्ज लेते समय अपनाती हैं। मैं भी दस-बारह हजार रुपये का चूना लगवाकर घर लौट आया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8814994937406535987?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8814994937406535987/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_4734.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8814994937406535987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8814994937406535987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_4734.html' title='होली का त्योहार और कर्ज'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-3982002364597247349</id><published>2011-03-15T03:32:00.000-07:00</published><updated>2011-03-15T03:37:38.325-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नुक्कड़ नाटक'/><title type='text'>हाय राम...लोकतंत्र मर गया</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 102, 102);"&gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(पर्दा उठता है। दो आदमी दिल्ली की सड़कों पर पैदल जाते दिखाई देते हैं। उनके पीछे-पीछे सूत्रधार आता है और जनता की ओर मुंह करके खड़ा हो जाता है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 102);"&gt;सूत्रधार :&lt;/span&gt; यह दिल्ली है। वह दिल्ली जो कई बार उजड़ी और बसी। उजड़ने के दौरान दिल्ली और उसके आस-पास रहने वालों का खून बहा, तो बसने के दौरान श्रमिकों का पसीना। इसी दिल्ली में 15 अगस्त 1947 को पैदा हुई थी लूली-लंगड़ी स्वतंत्रता जिसका अपहरण पैदा होते ही काले बनियों के दलालों ने कर लिया। इसी के कुछ दिन बाद पैदा हुआ लोकतंत्र जिसके सीने पर घोटालों का बदनुमा जन्मजात दाग था। यह लोकतंत्र मर गया, पर कैसे? यह आज तक रहस्य है। तो आइए, आपको रू-ब-रू कराते हैं उस्ताद मुजरिम और टुटपुंजिया पत्रकार से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(इतना कहकर सूत्रधार पर्दे के पीछे चला जाता है। दिल्ली की सड़कों पर उस्ताद मुजरिम और पत्रकार बुद्धिबेचू प्रसाद घूमते दिखाई देते हैं।)&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);"&gt;&lt;br /&gt;पत्रकार बुद्धिबेचू प्रसाद :&lt;/span&gt; हाय...हाय...सुबह से दिल्ली की गलियों की खाक छानते-छानते पैर और दिमाग का कचूमर निकल गया। उस्ताद!  अगर इन दिनों बेरोजगार न होता, तो आपके चंगुल में कतई नहीं आता। (दर्शकों की ओर मुंह करके) भाइयों, आप तो जानते ही होंगे, बेरोजगार आदमी किसी काम का नहीं होता। बेरोजगारी का एक मच्छर आदमी को नपुंसक बना देती है। अभी कुछ ही दिन पहले तो दैनिक ‘बमबम टाइम्स’ की नौकरी से इस्तीफा दिया है।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;&lt;br /&gt;उस्ताद मुजरिम :&lt;/span&gt; बेटा बुद्धिबेचू प्रसाद वल्द कलम खसीटू प्रसाद! सड़कों की खाक छानने के फायदे से अभी तुम वाकिफ नहीं हो। इसी से ऐसी बातें करते हो। अगर सुबह से शाम तक खाली पेट सड़कों की खाक छानी जाए, तो दिमाग रूपी गटर से ढेर सारे नए-नए विचार निकलते हैं। ये विचार किसी भी आदमी की तकदीर बदल देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्धिबेचू प्रसाद : उस्ताद! सुबह की एक चाय की बदौलत आधी दिल्ली की खाक छान आए हैं। दिमाग के गटर से आइडिये के बगूले तो अब तक नहीं फूटे। हां, इतना जरूर हुआ कि पांच घंटे पैदल चलते-चलते टांगों की कचूमर जरूर निकल गई। मुझे तो लग रहा है कि अगर अब दो कदम भी चलना पड़ा, तो गश खाकर गिर पड़ूंगा। वहीं आप हैं कि किसी जिराफ की तरह लंबे डग भरे चले जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(तभी मंच के एक कोने में खड़ी भीड़ नजर पड़ते ही दोनों ठिठक जाते हैं।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : या इलाही ये माजरा क्या है? यहां इतनी भीड़ क्यों लगी हुई है। बेटा बुद्धिबेचू, आओ चलते हैं, देखते हैं कि मामला क्या है? ’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(दोनों लपककर भीड़ के पास पहुंचते हैं। सड़क के बीचोबीच एक लाश पड़ी है और पुलिस के कुछ सिपाही उसके पास खड़े हैं। भीड़ में शामिल एक आदमी फुसफुसाता है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी : साले, पिछले आधे घंटे से खड़े अपने बाप का इंतजार कर रहे हैं। यह नहीं होता कि इसे हटाकर रास्ता साफ करायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : अरे! यहां तो कोई मरा पड़ा है, लगता है कि कोई एक्सीडेंट हुआ है। इस देश में कोई भरोसा नहीं कब एक्सीडेंट हो जाए। (उस आदमी से) ‘शिनाख्त हुई? किसकी लाश है यह? पुलिस कुछ करती क्यों नहीं?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी : (मुस्कुराते हुए) अभी तक तो नहीं हो पाई  है। आप भी देख लें, क्या पता आपका ही कोई परिचित निकल आए। वैसे आपको बता दें, पुलिस अपना काम कर रही है।&lt;br /&gt;मुजरिम : मुझे तो पुलिस कोई काम करती नहीं दिखाई दे रही है। हां, सनातनी काम करती जरूर दिख रही है पुलिस। चुपचाप खड़ी मक्खियां मार रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी : (विरोध करते हुए) जी नहीं, पुलिस अपने काम में बड़ी मुस्तैदी से जुटी हुई है। पुलिस को भीड़ में से एक ऐसे आदमी की तलाश है जिसको बलि का बकरा बनाया जा सके। वह आदमी आप भी हो सकते हैं, मैं भी हो सकता हूं। इस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति पुलिसवालों की निगाह में सिर्फ बकरा है जिसे जब चाहे, जहां चाहे हलाल किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(तब तक मुजरिम भीड़ को चीरकर लाश के पास पहुंच चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : (लाश पर नजर पड़ते ही चिल्लाते हैं) अरे! यह तो लोकतंत्र है! हाय राम...यह क्या हो गया?...लोकतंत्र मर गया?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(मुजरिम की बात सुनते ही ऐं...कहता हुआ एक पुलिस वाला चौंकता है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही : (पिच्च से तंबाकू थूकता हुआ) अबे! तू जानता है इसे? (एक दूसरे पुलिस वाले की तरफ घूमता हुआ)चौबे जी, एक प्रॉब्लम तो इस ससुरे ने साल्व कर दी।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(सिपाही चौबे जी को पास आने का इशारा करता है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम: (रुआंसा होकर) ‘हां साब! मैं शिनाख्त कर सकता हूं इसकी। यह लोकतंत्र है...भारतीय लोकतंत्र...दुनिया का सबसे बड़ा किंतु किसी कोढ़ के रोगी की तरह सड़ांध मारता हमारा प्यारा लोकतंत्र। घपलों और घोटालों का मारा लोकतंत्र। विपक्षी दलों द्वारा पंगु बना दिया गया बेचारा लोकतंत्र।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही : (मुजरिम का कालर पकड़ते हुए) : ‘क्या बकता है बे! जिस लोकतंत्र की सुरक्षा का भार ‘चार कंधों’ पर हो, वह इस तरह लावारिस मर जाए, यह हमारे लिए शर्म की बात है। तू कहीं नशे में तो नहीं है?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : (अपना कॉलर छुड़ाते हुए) आप चारों की वजह से ही तो परेशान था यह! आप में से जिसे भी जब मौका मिलता था, दबोच लेते थे और वह सब कुछ कर डालते थे, जो नहीं करना चाहिए। बेचारा साठ-बासठ साल में ही सात सौ साल का लगने लगा था। इधर कुछ दिनों से तो बहुत परेशान था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही : (जमीन पर डंडा फटकारता है) साफ-साफ बता, बात क्या है? पहेलियां बूझने की न तो अपनी आदत है और न ही यह भाषा अपने पल्ले पड़ती है। डंडे की भाषा जानता हूं और यह समझाना जानता हूं। कहे तो समझाऊं? तेरे जैसों से रोज पाला पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : (पुलिस वाले के तेवर देखकर खुशामदी लहजा अख्तियार करते हुए) साब! जब से यह टू-जी, राडिया-राजा प्रकरण और आदर्श घोटाला हुआ है, तब से कुछ ज्यादा ही बेचैन था। कुछ साल पहले जब कुछ सांसदों ने सवाल पूछने के नाम पर रोकड़ा मांगा था, तब तो एकदम पागल हो गया था लोकतंत्र। अपनी करतूतों से जितनी बार लोकतंत्र के ये चारों स्तंभ दुनिया के सामने नंगे होते थे, जितनी बार भारतीय राजनीति दागदार होती थी, उतने दाग इसके शरीर पर उभर आते थे। साब, आपको विश्वास न हो, तो इसकी कमीज उलटकर देख लें। इसकी पीठ और पेट पर घोटालों और शर्मनाक कांडों के निशान आपको मिल जाएंगे।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(मुजरिम की बात पूरी नहीं हो पाती है कि पुलिस की एक जीप आकर भीड़ के पास रुकती है। उसमें से एसएचओ और कुछ सिपाही उतर कर भीड़ को लाश के आसपास से हटाने लगते हैं। पहले से मौजूद सिपाही एसएचओ को जोरदार सल्यूट मारता है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही : ‘मृतक की शिनाख्त हो चुकी है सर। यह आदमी इसे लोकतंत्र बताता है। बाकी आप दरियाफ्त कर लें, हुजूर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थानेदार : (मुजरिम को पहले ऊपर से नीचे तक निहारता है। फिर कड़क स्वर में पूछता है।) तू क्या  बेचता है और कैसे कह सकता है कि यह लोकतंत्र है? जिस लोकतंत्र की रक्षा में देश-प्रदेशों के सांसद, विधायक, सत्तारूढ़ और गैर सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता, अफसर लगे हुए हों। पूरा का पूरा पुलिस महकमा लगा हुआ हो, वह लोकतंत्र इस तरह सड़क पर लावारिस मरा हुआ पाया जाए, यह कैसे हो सकता  है? अगर सचमुच लोकतंत्र मर गया, तो सबके भूसा भर दूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : (थूक निगलते हुए) हुजूर! मैं कुछ बेचता नहीं, एक मामूली पाकेटमार हूं। मेरा और आपका पेशा लगभग एक जैसा है। जिस काम को आप बड़े पैमाने पर सामूहिक रूप से करते हैं, वही काम मैं छोटे स्तर पर व्यक्तिगत रूप से करता हूं। आप इस काम की पगार लेते हैं, जबकि मैं अगर यह करता पकड़ा जाऊं, तो पब्लिक से लेकर पुलिसवालों तक के जूते खाता हूं। अब तो आप जान ही गए होंगे कि मेरा नाम मुजरिम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : (सांस लेने के लिए पल भर को रुकता है।) इस लोकतंत्र से मेरी पुरानी यारी रही है। हम दोनों एक दूसरे के लंगोटिया यार थे। मजे की बात तो यह है कि हम दोनों की पैदाइश भी एक ही दिन की है। मेरी मां ‘व्यवस्था’ बताती हैं कि जिस समय मैं यानी मुजरिम पैदा हुआ था, खूब हट्टा-कट्टा था, लेकिन यह तो जन्म से ही लंगड़ा था। कहते हैं कि अंग्रेजों और देसी पूंजीपतियों से इसके ‘बापू’ बड़ी सहानुभूति रखते थे। वे नहीं चाहते थे कि विद्रोहिणी क्रांति यानी मेरी मौसी कोई ऐसा बच्चा जने, जो इन दोनों यानी बापू और लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो। इसलिए ‘बापू’ ने गर्भवती ‘क्रांति’ के पेट पर लात मारकर गर्भ गिरा दिया था। बाद में पता नहीं कैसे क्रांति की सौतेली बहन व्यवस्था के गर्भ से यह लंगड़ा लोकतंत्र पैदा हो गया। अंग्रेज पूंजीपतियों ने हम जैसों का खून चूसकर इसको पाला-पोसा। काले बनियों ने बैसाखी के सहारे चलना सिखाया। इसीलिए यह काले बनियों का मुरीद बनकर रह गया। काले बनियों पर जब भी कोई मुसीबत आती थी, यह डेढ़ टांग पर खड़ा होकर अपनी साजिशी तान देने लगता था। साब! मजाल है, कोई मुसीबत इसकी जानकारी में इन काले बनियों का कुछ बिगाड़ सके। यह तो बातचीत के दौरान अक्सर कहा करता था। बनिये इस देश के भाग्यविधाता हैं। भाग्य विधाता का हित सुरक्षित रहे, इसके लिए जरूरी है कि जनता के हित असुरक्षित रहें। उनका भरपूर शोषण होता रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एसएचओ: (आंख पर चढ़ा काला चश्मा उतार कर लाश का मुआयना करता है। कमीज उलटकर लाश के पास बने एक पैदायशी निशान को गौर से देखता है।) हवलदार रामधनी, नोट करो। मृतक की कमर से दो इंच नीचे एक पैदायशी निशान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम : (एसएचओ की बात काटते हुए) हां साब, यह निशान जीप घोटाले का है। हुजूर! आप तो जानते ही होंगे, देश का सबसे पहला घोटाला ही जीप घोटाला था। तब यह पैदा नहीं हुआ था। हां, व्यवस्था के गर्भ में भ्रूण रूप में जरूर आ चुका था। उस समय देश पर अंग्रेजों का शासन था। लेकिन उस घोटाले के पैदायशी निशान इसकी कमर पर उभर आए थे। इसके बाद देश आजाद हो गया। कुछ दिन तक सत्ताधीशों ने चना-चबैना खाकर दिन काटे, लेकिन एक मंत्री से बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने आजाद भारत का पहला घोटाला किया। इस घोटाले का निशान आपको लोकतंत्र के ठीक दिल के पास दिख गया होगा। इसके बाद मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारी मरभुक्खों की तरह लोकतंत्र पर टूट पड़े और लूट-लूट कर खाने लगे। फिर क्या था। जैसे-जैसे घोटाले बढ़ते गए। लोकतंत्र के शरीर पर दाग बढ़ते गए। जितना बड़ा घोटाला, उतने बड़े दाग। लोकतंत्र का चेहरा ही बदरंग हो गया। साब, एक बात बताऊं! हर घोटाले पर इसकी आत्मा कराह उठती थी। कई बार तो मैंने इसे बिलख-बिलखकर रोते देखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एसएचओ : (रोब झाड़ता हुआ) अबे! तू फालतू की राम कहानी छोड़। सबसे पहले तो तू यह बता, यह मरा कैसे?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम: (एसएचओ की बात सुनकर सिटपिटा जाता है।) साब! मैं यह कैसे बता सकता हूं। मैं कोई डॉक्टर तो नहीं हूं। आप लाश का पंचनामा बनाइए, पोस्टमार्टम के लिए भेजिए। कल तक आपको सब पता चल जाएगा। हां, इतना बता सकता हूं...कल रात यह मेरे पास आया था। कुछ बोल नहीं पा रहा था। बीच-बीच में आदर्श..आदर्श...कामनवेल्थ-कामनवेल्थ, राडिया-राजा जैसा कुछ बड़बड़ा रहा था। फिर बोला कि मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहा। इतना कहकर लोकतंत्र कहीं चला गया था। मैंने समझा कि घर गया  होगा। आज सुबह यहां इसकी लाश देखी। मेरा ख्याल है कि यह शर्म से मर गया है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही : (एसएचओ के कान में फुसफुसाता है।) ‘साब! मुझे तो यही कातिल लगता है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एसएचओ : पकड़ लो साले को, यही हत्यारा है। पकड़कर थाने ले चलो और चार्जशीट तैयार करो।&lt;br /&gt;(लोकतंत्र की हत्या के जुर्म में मुजरिम पकड़ लिया जाता है। पत्रकार बुद्धिबेचू प्रसाद चुपचाप वहां से खिसक लेता है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(इस नुक्कड़ नाटक को संस्थाओं को इस शर्त  पर मंचन की अनुमति प्रदान की जाती है कि वे रचियता के रूप में मेरा नाम देंगे। यदि वे कोई संशोधन या सुधार करते हैं, तो इसके बारे में भी जानकारी देंगे।)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-3982002364597247349?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/3982002364597247349/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_15.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3982002364597247349'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/3982002364597247349'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_15.html' title='हाय राम...लोकतंत्र मर गया'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-2998910162811420142</id><published>2011-03-03T23:40:00.000-08:00</published><updated>2011-03-03T23:41:32.753-08:00</updated><title type='text'>विकीलीक्स के फंदे में गुनाहगार</title><content type='html'>&lt;p style="font-weight: bold; font-style: italic; color: rgb(255, 102, 102);"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;कल उस्ताद गुनाहगार  घर आए, तो बहुत घबड़ाए हुए थे।  मैंने उन्हें ठंडा पानी पिलाया  और पूछा, 'क्या बात है उस्ताद!  काफी घबराए हुए से हैं। भाभी  जी ने तलाक तो नहीं दिया है न!'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उस्ताद ने बसंत  ऋतु में ही माथे पर चुहचुहा  आए पसीने को पोछते हुए कहा, 'तुम्हारी  भाभी गयीं मिट्टी का तेल लेने।  तुम्हें इसके अलावा कुछ सूझता  भी है? यहां विकीलीक् स वालों  द्वारा नाक में दम कर देने का  अंदेशा है और तुम हो कि भरी दोपहरिया  में राग विहान गा रहे हो। पहले  तो मुझे यह बताओ कि ये विकीलिक्स  क्या बला है। क्या विकीलीक्स  की पहुंच हर कहीं है? अमेरिका  राष्ट्रपति के बेडरूम से लेकर  अमीनाबाद के मदर चेंज...मेरा  मतलब है कि माता बदल पंसारी  के गोदाम तक...।' &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उस्ताद की बात  सुनकर मैं चौंक गया। उस्ताद  और विकीलीक्स के बीच किसी कनेक्शन  की बात मैं सोच भी नहीं पा रहा  था। काफी दिमाग खपाने के बाद  भी जब नहीं सूझा, तो उस्ताद से  ही पूछ लिया, 'उस्ताद, विकीलीक्स  का आपसे क्या लेना देना। कहां  आप और कहां विकीलीक्स। भारत  के ख्यातिप्राप्त पाकेटमार  का विकीलीक्स जैसे टुटपुंजियां  नेकवर्क से क्या वास्ता?'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उस्ताद ने गहरी  सांस लेते हुए कहा, 'अमां यार!  कुछ भी कहो, विकीलीक्स ने तो  अमेरिका और भारत जैसे देशों  की आंख में अपनी अंगुली घुसेड़  रखी है। पट्ठे ने कैसी-कैसी  बातें उजागर की है। अमेरिका  के राष्ट्रपति विदेशी राष्ट्राध्यक्षों  को यह कहते हैं, वह कहते हैं,  जैसी बातें भी खोल कर रख दी है।  तभी तो अमेरिका वाले तिलमिलाए  घूम रहे हैं। गुरु कहो चाहे  कुछ भी, लेकिन ये विकीलीक्स  वाले हैं बडे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Arial;font-size:85%;"&gt;Þ &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;शातिर।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'लेकिन आप यह बताएं  कि आप विकीलीक्स के मामले में  कहां फिट होते हैं। आपकी टांग  उसमें कैसे फंसी हुई है।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;मेरी बात सुनते  ही उस्ताद एक बार फिर उदास हो  गए। उन्होंने कहा,'कोई जुगाड़   हो, तो विकीलीक्स वालों से मेरी  बात कराओ। अगर विकीलीक्स वालों  के पास मेरे बारे में कोई जानकारी  हो, तो मैं उसे किसी भी कीमत  पर खरीद या वह सूचना लीक करने  से रोकना चाहता हूं।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उस्ताद की बात  सुनकर मुझे कोफ्त हुई। बात  क्या है, यह बताने की बजाय लंतरानी  हांके चले जा रहे हैं। मैंने  थोड़ा तल्ख लहजे में कहा, 'जब  तक मामले की पूंछ मेरी पकड़ में  नहीं आएगी, तब तक मैं आपकी समस्या  का हल नहीं सुझा सकता। आप कम  से कम मुझे तो साफ-साफ बताएं  कि माजरा क्या है। विकीलीक्स  वालों ने आपकी कौन-सी भैंस खोल  दी है। या आपके घर से भेली (गुड़)  चुरा ली है।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उस्ताद ने 'सूं...'  करके गहरी सांस ली और बोले, 'बात  यह है कि तुम्हारी भाभी को शक  है कि मैं बाजू वाली मिसेज सक्सेना  को लाइन मारता हूं। बात दरअसल  यह है कि कुछ दिन पहले घर से  निकलते वक्त मिसेज सक्सेना  से थोड़ी बात हो गई। उसके अगले  दिन मिसेज सक्सेना बाजार में  मिल गईं। ऐसा ही संयोग तब बना,  जब मैं तुम्हारी भाभी जी के  साथ मल्टीप्लैक्स में 'आन मिलो  सजना' देखने गया। वहां मिसेज  सक्सेना को देखते ही बेगम के  कान खड़े हो गए। पता नहीं किस  नामुराद ने तुम्हारी भाभी को  पिछली दो मुलाकातों के बारे  में बता दिया। तब से मैं उसको  खोज रहा हूं। अगर वह मिल जाए,  तो उसके कान के नीचे गरम कर दूं।  इस मामले में तो वही कहावत चरितार्थ  हो रही है कि सूत न कपास, जुलाहे  से लट्ठमलट्ठा। अभी कल ही अखबारों  में पढ़ा है कि विकीलीक्स वालों  की इतनी तगड़ी पहुंच है कि वे  पूरी दुनिया के बारे में राई-रत्ती  खबर रखते हैं। सोचता हूं कि  कहीं विकीलीक्स वालों ने तो  तुम्हारी भाभी के कान नहीं  भरे हैं। अगर उनके पास मेरी  और मिसेज सक्सेना की बात करते  हुए फोटो-सोटो हो और वह बेगम  के हाथ लग गए, तो अपनी लंका लग  जाएगी। यदि कोई सुबूत वगैरह  हो, तो पैसा ले-देकर मामला सुलट  जाए, तो अच्छा है।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उस्ताद गुनाहगार  की बात सुनकर मुझे काफी हंसी  आई। मैंने ठहाका लगाते हुए  कहा, 'उस्ताद! काली भेड़ को खोजना  है, तो अपने इर्द-गिर्द रहने  वालों में तलाशिए। विकीलीक्स  वालों के पास आपके खिलाफ कोई  सुबूत नहीं होगा, इसकी मैं गारंटी  लेता हूं।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;मेरी बात सुनकर  उस्ताद गुनाहगार झटके से उठे  और बोले, 'तुमसे कोई सलाह मांगना  ही बेकार है। जब मैं कहता हूं  कि विकीलीक्स वालों की यह करतूत  हो सकती है, तो आप उसे क्लीन  चिट देने पर तुले हुए हैं। लगता  है कि तुम विकीलीक्स वालों  से पैसा खा गए हो।!' इतना कहकर  वे चलते बने।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-2998910162811420142?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/2998910162811420142/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_03.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2998910162811420142'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2998910162811420142'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post_03.html' title='विकीलीक्स के फंदे में गुनाहगार'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-1039610100436550382</id><published>2011-03-03T23:33:00.000-08:00</published><updated>2011-03-03T23:39:46.904-08:00</updated><title type='text'>छबीली, मुसद्दीलाल और सेंसर</title><content type='html'>&lt;p style="font-style: italic; color: rgb(255, 102, 102);"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;मुसद्दी लाल इन  दिनों बहुत परेशान हैं। उनकी  परेशानी का कारण दिनोंदिन दैनिक  जीवन में उपयोगी साबित होने  वाली तकनीकी वस्तुएं हैं। कल  सुबह होते ही वे मेरे घर में  नमूदार हुए। उनके चेहरे की  भावभंगिमा बता रही थी कि वे  इन दिनों संकट में हैं। उनके  प्रति मुझे  प्रतिद्वंद्वीभाव  वाली सहानुभूति हुई। दरअसल  प्रतिद्वंद्वी भाव इसलिए क्योंकि  जब मैं भी परेशान या बीवी से  पिटा हुआ उनके पास पहुंचता  हूं, तो वे भी सहानुभूति जताते  हुए मंद मुस्कान बिखेरते रहते  हैं। मैंने पूछा,' भाई साहब!  क्या आजकल कुछ गड़बड़ चल रही है।  घर या आफिस में सब कुछ ठीक-ठाक  तो है।' मुसद्दीलाल ने गहरी  सांस लेते हुए कहा, 'यार! यह बताओ,   क्या  टेक्नोलॉजी का इतना  महत्व हो सकता है कि वह किसी  का जीना हराम कर दे। इन दिनों  मैं आधुनिक तकनीक और प्यार  के साइड इफेक्ट का मारा कुत्ते  की तरह कभी इस घाट तो कभी उस  घाट फिर रहा हूं।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;यह कहते-कहते मुझे  लगा कि मुसद्दीलाल अभी रो पड़ेंगे।  मैंने लपककर उनकी पीठ पर सांत्वना  से थपकी देते हुए कहा, 'भाई साहब!  आपकी बात मेरे पल्ले नहीं पड़  रही है। दरअसल आपके साथ दिक्कत  यह है कि आप मुझे अक्लमंद समझ  रहे हैं, लेकिन हूं मैं मंदअक्ल।  जब तक आप मुझे सारी बातें खुलकर  नहीं बताएंगे, तब तक मेरे तो  पल्ले आपकी बात पड़ने से रही।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'अब तुमसे क्या  कहूं। छोटे भाई हो, तुमसे कहते  हुए शर्म आती है। अच्छा एक बात  बताओ...अगर तुम किसी के घर गए  और उसके घर में ऐसा ताला लगा  है या उस घर की दीवारें सेंसर्ड  हों..मेरा कहने का मतलब यह है  कि अगर तुम उस घर के ताले या  दीवार को छुओ और वह जोर-जोर से  बजने लगे, तो क्या तुम चोर हो  जाओगे।' मुसद्दीलाल मेरे सामने  थोड़ा सा खुले।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'नहीं, आप तो उस  घर के मालिक से मिलने गए होंगे...तो  चोर क्यों हुए। लेकिन फिर भी  बात मेरी समझ में नहीं आई।' मैंने  नादान बन जाने में ही भलाई समझी।  मुसद्दी लाल की बातों में अकसर  इतने पेंच रहते हैं कि सामने  वाले को पेंच ही पेंच दिखाई  देते हैं और असली बात गायब होती  है। 'बात दरअसल यह है कि परसों  बीवी के साथ मैं बाजार गया था।  वहां एक मोटरसाइकिल खड़ी थी।  अनायास मेरी बीवी का हाथ उस  मोटरसाइकिल की गद्दी से छू  गया, तो वह मोटरसाइकिल 'टीं...टीं...'  करती हुई तब तक चिल्लाती रही,  जब तक तुम्हारी भाभी ने अपना  हाथ गद्दी से नहीं हटा लिया।  बस, इसी घटना ने तुम्हारी भाभी  के दिमाग में एक खुराफात को  जन्म दिया। उस खुराफात के चलते  मैं डमरू बना घूम रहा हूं।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'भाई जी! अब भी बात  मेरी समझ में नहीं आई?' मैंने  गहरी सांस लेते हुए कहा। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'बात यह है बेवकूफ!  कि तुम्हारी भाभी ने पता नहीं  कहां से वह सेंसर खरीद लिया  और रात में सोते समय मेरी बांह  में एक छोटा-सा चीरा लगाकर उसे  रखवा दिया।' अब मुसद्दीलाल  मायूस हो चले थे। उनकी मायूसी  मुझसे देखी नहीं जा रही थी, लेकिन  इस मामले में मैं कुछ कर पाने  में अपने को असमर्थ पा रहा था।  मैंने कहा, 'तो इससे क्या हुआ!  आप किसी मोटरसाइकिल को छूते  होंगे, तो वह 'टीं..टीं...पीं...पीं...'  जैसी आवाज निकालने  लगती होगी। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'नहीं बेवकूफानंद!  किसी मोटरसाइकिल को नहीं, किसी  महिला को छूते ही घर में रखे  रिसीवर से आवाज आने लगती है।  इससे मेरी बीवी जान जाती है  कि आज में इतनी बार किसी महिला  के संपर्क में आया हूं। अब अगर  राह चलते किसी महिला या लड़की  से भूलवश भी टकरा जाऊं, तो घर  में महाभारत शुरू हो जाती है।  हर बार आवाज आने की कैफियत देनी  पड़ती हैै।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;मैंने तपाक से  कहा, 'तो आप आपरेशन कराकर यह  चिप निकलवा क्यों नहीं देते?'  मैंने उन्हें ज्ञान दिया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;मुसद्दीलाल ने  कहा, 'अजीब अहमक हो तुम! इधर मैंने  चिप निकलवाया, उधर घरैतिन मायके  चल देगी। अब इस उम्र में आधा  दर्जन से ज्यादा बच्चों की  देखभाल मेरे से नहीं हो पाएगी।'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'तो फिर मर्यादा  पुरुषोत्तम राम की तरह एक पत्नी  व्रत का पालन कीजिए।' मैंने  फिर उन्हें ज्ञान देने का कर्तव्य  पूरा किया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;'अबे लल्लू! राम  केवल इसलिए एक पत्नी व्रतधारी  रहे क्योंकि उन्हें दूसरी   कोई मिली नहीं।' इतना कहते हुए  मुसद्दी लाल भड़क उठे, 'पिछले  चौबीस घंटे से छबीली से नहीं  मिल पाया हूं और तुम हो कि थोथा  ज्ञान दे रहे हो मुझे। आज बेटा  मेरे सितारे गर्दिश में हैं।  कल तुम इस सेंसर की गिरफ्त नहीं  आओगे, इसकी क्या गारंटी है! तब  बेटा मैं भी इसी तरह ज्ञान दूंगा।'  इतना कहकर वे अपने घर चले गए।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-1039610100436550382?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/1039610100436550382/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1039610100436550382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/1039610100436550382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='छबीली, मुसद्दीलाल और सेंसर'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8886884668634032129</id><published>2011-02-27T23:20:00.000-08:00</published><updated>2011-02-27T23:29:26.271-08:00</updated><title type='text'>सांसद जी, प्लीज लाइन में आइए</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-6KvUgnRHQy0/TWtOV7_s-cI/AAAAAAAAASg/tL9cmwKf1Io/s1600/amarujala1.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 94px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-6KvUgnRHQy0/TWtOV7_s-cI/AAAAAAAAASg/tL9cmwKf1Io/s200/amarujala1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5578638702217591234" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 102);"&gt;अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरे दफ्तर में घुसते ही टाइम आफिस के पास उपस्थिति रजिस्टर रखा हुआ है। इस  रजिस्टर में आते और जाते समय हम जैसे मजदूरों को दस्तखत करना पड़ता है।  आने और जाने के समय में थोड़ा सा भी हेरफेर हुआ, तो समझो कि मजदूरी कट। उस  दिन काम करने के बावजूद वेतन बट्टे-खाते में गया। यही वजह है कि जिस दिन  कोई घर जाने की जल्दी में अगर ड्यूटी खत्म करने का समय डालना भूल गया, तो  वह घर पहुंचने के बाद फोन करता है, 'अरे सुरेश! यार मैं आते समय टाइम डालना  भूल गया था, जरा बारह पीएम का टाइम डाल देना। रजिस्टर पर पेज नंबर 420  है।' कोई किसी को फोन करता है, तो कोई किसी को। सभी अपने-अपने खासुलखास को  फोन करते हैं।&lt;br /&gt;यह हाल जब मुझे देश की संसद में देखने को मिला, तो मैं समझ गया कि दफ्तर और  संसद में कोई फर्क नहीं है। हुआ क्या कि एक दिन मैं अपने एक परिचित सांसद  की पहुंच की बदौलत संसद में प्रवेश का पास पा गया। पहली बार संसद भवन में  घुसने का रोमांच और गर्व कुछ खास किस्म का होता है। इस बात को वही समझ  सकता है, जिसने पहली बार संसद भवन में प्रवेश करने का हक बड़ी आसानी से  प्राप्त किया हो। मैंने अपना कॉलर ऊंचा किया और सोचा, 'अब मोहल्ले और  दफ्तरवालों को बड़े गर्व से बताऊंगा कि बेटा! मैं भी संसद भवन रिटर्न हूं।'&lt;br /&gt;मुझे संसद भवन में प्रवेश दिलाने वाले सांसद महोदय तो मेरे चकित होकर  चकरबकर देखने के दौरान ही कहां गुम हो गए, मुझे नहीं मालूम। पास हाथ में  पकड़े मैं इधर-उधर भटकने लगा। एक जगह देखा कि रिसेप्शन पर रजिस्टर रखा हुआ  है और सांसद-मंत्री लाइन में लगे हुए हैं। तब तक पीछे वाले एक मुरहे सांसद  ने आगे वालों को ठेल दिया। लाइन बिगड़ गई। पीछे वाले आगे हो गए और आगे वाले  पीछे। आगे से पीछे हो जाने वाले एक सांसद ने आगे हो गए विरोधी दल के नेता  सांसद का कुरता पकड़कर खींचा, तो कुरता 'चर्र...चर्र'  की आवाज करता  हुआ फट गया। इस पर दोनों सांसद गुत्थमगुत्था हो गए। मार्शल ने आकर उन्हें  छुड़ाया। यह देखकर मुझे रेलवे स्टेशन पर टिकट खिड़की पर लगने वाली लाइन याद  आ गई। संसद भवन में मार्शल ठीक उसी तरह बार-बार लाइन लगवा रहा था जिस तरह  डंडे के बल पर रेलवे स्टेशन पर जीआरपी, होमगार्ड्स  या रेलवे पुलिस का  सिपाही लाइन सही करवाता है। मार्शल बार-बार टेढ़ी लाइन को सीधी करवाने के  बाद कहता जाता था, 'सांसद जी, प्लीज लाइन में आइए। दस्तखत कीजिए। यह भत्ता  रजिस्टर शाम तक रखा रहेगा।' यह देखकर मेरी समझ में आ गया कि रेलवे स्टेशन  की टिकट खिड़की, मेरे कार्यालय  में रखा वेतन एवं हाजिरी रजिस्टर, हम कर्मचारियों और सांसदों, मार्शल और होमगार्ड्स के जवान में बेसिक फर्क  कुछ नहीं &lt;span&gt;है।&lt;br /&gt;(28 फरवरी 2011 को अमर उजाला के संपादकीय पेज पर प्रकाशित)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8886884668634032129?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8886884668634032129/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_7945.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8886884668634032129'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8886884668634032129'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_7945.html' title='सांसद जी, प्लीज लाइन में आइए'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-6KvUgnRHQy0/TWtOV7_s-cI/AAAAAAAAASg/tL9cmwKf1Io/s72-c/amarujala1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-2334736908291963863</id><published>2011-02-27T00:07:00.000-08:00</published><updated>2011-03-26T04:44:06.627-07:00</updated><title type='text'>गंधाती, बजबजाती पत्रकारिता को आईना</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-R_9dEmE9YfE/TWoHK2lUoUI/AAAAAAAAASY/iKKoaVSwYy4/s1600/haormonim.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 124px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-R_9dEmE9YfE/TWoHK2lUoUI/AAAAAAAAASY/iKKoaVSwYy4/s200/haormonim.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5578278971483922754" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ही नहीं, जीवन के सभी क्षेत्रों में स्थापित मूल्यों में ह्रास आया है। पत्रकारिता इससे अछूती कैसे रह सकती है। पिछले दो दशकों में राजनीति और पत्रकारिता का बड़ी तेजी से पतन हुआ है। पैसा, चमक-दमक, रुतबा और दलाली का पर्याय बनती पत्रकारिता का खूबसूरत चेहरा ही बदरंग होता नजर आ रहा है। पत्रकारिता जगत में चल रही उठापटक, खींचतान, अखबार  के दफ्तरों में चलने वाली राजनीति का चित्र उकेरता दयानंद पांडेय का उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल रहा है। लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ‘आजाद भारत’ के माध्यम से लखनऊ और दिल्ली की पत्रकारिता की कलई खोलकर उपन्यासकार दयानंद पांडेय ने रख दी है। इस उपन्यास को पढ़ने का आनंद तब द्विगुणित हो जाता है, जब उन पात्रों से आप किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हों। उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ के कई पात्र ऐसे हैं जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं, उनके साथ काम किया है या लखनऊ की पत्रकारिता में कुछ वर्ष सक्रिय रहने की वजह से उन तमाम पात्रों को जानता-पहचानता हूं। उपन्यास में उकेरी गई स्थितियां कमोबेश आज लगभग हर अखबार के दफ्तर में दिखाई देती हैं। अखबार के दफ्तरों में वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों के बीच चलने वाली घृणित राजनीति से मीडिया जगत से जुड़ा हर व्यक्ति वाकिफ होगा। उपन्यासकार एक स्थान पर मीडिया जगत की कलई खोलते हुए लिखता है कि दलाली करना, दुम हिलाना और बात है, अखबार चलाना और बात। उन दिनों अखबारों में  क्या था कि अस्सी परसेंट पत्रकार काम करने वाले होते थे और बीस परसेंट दलाली करने वाले। और यह अनुपात रिपोर्टरों के बीच का ही होता था। डेस्क का कोई इक्का-दुक्का ही दलाल पत्रकार होता। तो यह दलाल पत्रकारिता के नाम पर अखबार मालिकों से लेकर मंत्रियों, अधिकारियों, दारोगाओं तक के आगे जी-हुजूरी और दुम हिलाने में एक्सपर्ट। एक स्थान पर उपन्यासकार जातीय और सिफारिश के बल पर कुर्सी हथिया लेने वाले अक्षम संपादकों पर टिप्पणी करते हुए कहता है, ‘मुकुट जी जिला संवाददाता होने की योग्यता नहीं रखते, लेकिन उनकी किस्मत देखिए कि वह वर्षों से विशेष संवाददाता हैं और विधानसभा कवर करते हैं। और अब यही मुकुट जी कार्यकारी संपादक बनने जा रहे हैं।&lt;br /&gt;उपन्यास की  कथा वस्तु एक हारमोनियम के माध्यम से पिरोई गई है। वस्तुत: हारमोनियम प्रतीक है पत्रकारिता जगत की पेशेगत पवित्रता का, उसकी साफगोई और जन पक्षधरता का, जो वक्त-बेवक्त बजता ही रहता है। लेकिन अफसोस है कि जब संपादक नामधारी गुंडा इसे तोड़ देता है, तो पेशेगत पवित्रता, जनपक्षधरता और साफगोई विपरीत समय जानकर चुप हो जाती है। सुनील कथा का नायक है, उसके माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। आजाद भारत में कभी एक ट्रेडयूनियन होती थी। हालांकि अपने जन्म काल में ट्रेड यूनियन भले ही इस व्यवस्था के खिलाफ रही हो, लेकिन कालांतर में इसका स्वरूप बदला और मिल, कारखानों से लेकर अखबार के दफ्तरों में सक्रिय ट्रेड यूनियनें मालिकों की दलाली ही इनका पेशा बन गया। उपन्यास में ट्रेड यूनियन की कलई पर्त-दर-पर्त प्याज के छिलके की तरह खोली गई है।  इस उपन्यास में संपादक और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चलने वाली उठापटक, भितरघात और आपसी खींचतान का प्रामाणिक खाका खींचा गया है। उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ में मालिक या संपादक बदल जाने पर अखबार आजाद भारत के मुलाजिमों को होने वाली परेशानी, जुझारू और चमचागिरी न कर पाने वाले रिपोर्टरों और डेस्क पर काम करने वालों को क्या-क्या और किस तरह की दिक्कत होती है, उसका खाका नायक सुनील के माध्यम से खींचा गया है। उपन्यास पत्रकारिता के बदलते चरित्र का एक खूबसूरत कोलाज रचता हुआ अपनी यात्रा पूरी करता है।&lt;br /&gt;इस उपन्यास में अखबार के मालिक और संपादक के बदलते संबंधों को अच्छी तरह से रेखांकित किया गया है। आजाद भारत के मालिकान की पहली पीढ़ी अपने ही अखबार के संपादक को फोन करके पूछते थे कि आपके पास समय हो, तो बताइए। हम आपसे मिलना चाहते हैं, एक बहुत जरूरी काम है। लेकिन बाद की पीढ़ी के मालिक संपादक को हुक्म देते हुए कहते कि जरा कोठी पर जल्दी आ जाइए। हमें आपसे कुछ बातें करनीहै। अगर कहीं संपादक का अहम जागा और वह कह बैठा कि अभी तो मैं व्यस्त हूं। अखबार के काम से फुरसत पाकर आपके पास हाजिर हो जाऊंगा। तो मालिकान झिड़क देते कि बाद में मेरे पास फुरसत नहीं है। आजाद भारत में दूसरी पीढ़ी के मालिकों का वर्चस्व कायम होने पर जब ऐसा ही कुछ शुरू हुआ तो पैंतीस साल से दैनिक आजाद भारत में नौकरी करने के बाद अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर बने संपादक को लग गया कि अब नौकरी के दिन पूरे हो गए हैं। वह किसी की सिफारिश या चापलूसी करके तो संपादक बने नहीं थे। कोई लालच या कोई दबाव उनके आगे बेमानी था। वे कभी झुकते नहीं थे। सिद्धातों और पत्रकारिता के मूल्यों को सर्वोपरि समझने वाले संपादक ने जब इस्तीफा दिया, तो आफिस से घर जाते और अपने निजी सामान ले जाते समय उनकी तलाशी ली गयी। उन्हें निजी सामान और किताबें ले जाने की अनुमति नहीं दी गई। संपादक के इस अपमान के विरोध में न तो यूनियन का कोई नेता बोला, न ही पत्रकार और मैनेजमेंट से जुड़े कर्मचारी। यह पत्रकारिता के पतन की शायद पहली सीढ़ी थी। इतना ही नहीं, इस अखबार के साथ-साथ निकल रहे अंग्रेजी अखबार के एडीटर इन चीफ मेहता को भी अखबार मालिकों और राजनीतिज्ञों के तलवे सहलाना या तलवे चाटना पसंद नहीं था। नतीजा यह हुआ कि उनकी अखबार प्रबंधन से आए दिन ठनी रहती। अखबार में जब प्रबंधन और मालिकों का हस्तक्षेप कुछ ज्यादा बढ़ गया, तो उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया। वैसे भी मेहता जी किसी अखबार में दो-तीन साल से ज्यादा टिक नहीं पाते थे। वे अखबार के मामले में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर पाते, तो मालिक उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाता।&lt;br /&gt;संपादक के त्यागपत्र देने के बाद कार्यकारी संपादक बनाए गए मुकुट जी। मुकुट जी का सपना अखबार का संपादक बनना, विधानपरिषद में जाना और पद्मश्री हासिल करना था। लेकिन उनके ये तीनों सपने पूरे नहीं हुए। नया संपादक मुख्यमंत्री की सिफारिश से नियुक्त किया गया। मुख्यमंत्री ने लाखों रुपये के विज्ञापन एडवांस दिलाये। इस संपादक ने सबको साध लिया, मुख्यमंत्री, सरकारी अधिकारियों, अखबार के एमडी और चेयरमैन सबको। नए संपादक ने आजाद भारत के सहयोगी प्र्रकाशन की 125वीं जयंती पर तत्कालीन प्रधाानमंत्री स्व. राजीव गांधी से अखबार के मालिकों की मुलाकात करवाई, तो मालिकों ने इस मौके का फायदा उठाया और दो केमिकल फैक्ट्रियों का लाइसेंस  ले लिया। यह वही समय था, जब अखबार के मालिकों में अपने संपादक या रिपोर्टरों की बदौलत फायदा उठाने की प्रवृत्ति सिर उठा रही थी।&lt;br /&gt;इसके बाद बिहार के मुंगेर निवासी मनमोहन कमल दैनिक आजाद भारत के प्रधान संपादक नियुक्त किए गए। एक कांग्रेसी राज्यपाल की सिफारिश और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष केशरी की बदौलत प्रधान संपादक बने मनमोहन कमल का स्त्री प्रेम विख्यात था। पढ़ाई  के दौरान वैश्य परिवार की लड़की से प्रेम विवाह करने मनमोहन कमल की शोहरत महिला प्रेम के लिए कम नहीं थी। वे चाहे समाचार एजेंसी में रहे हों, किसी साप्ताहिक या दैनिक में, उनके अपनी पी.ए. से लेकर कई तरह की महिलाओ से संबंधों के चर्चे खूब चटखारे लेकर किए जाते रहे। लखनऊ में एक सूचना अधिकारी की पत्नी से उनके संबंधों की कथा अभी पूरी तरह से विस्मृत भी नहीं हुई थी कि एक दिन उसी सूचना अधिकारी की बेटी से संबंधों की कहानी आम हो गई। लोग पीठ पीछे रस ले-लेकर अवैध संबंधों का यह पुराण बाचने लगे। लेकिन मनमोहन कमल सूचना अधिकारी की बेटी को भोग कर अन्य औरतों की तरह किनारे नहीं कर पाए। उन्हें उससे विवाह करना ही पड़ा। जैसे-जैसे उनका कैरियर उछाल पाता जा रहा था, औरतों के प्रति उनकी आशक्ति बढ़ती जा रही थी। उनको कोई कुछ बिगाड़ भी नहीं पा रहा था। उनके कार्यकाल के दौरान ब्यूरो में भी यह बात प्रचलित हो गई थी कि लगभग हर यूनिट या ब्यूरो में किसी सुदर्शना का होना जरूरी था। ताकि जब कभी मनमोहन कमल वहां जाएं, तो उनका सौंदर्यबोध तृप्त हो और उन्हें काम करने में भी आसानी हो। आजाद भारत के लखनऊ यूनिट के पुरुष पत्रकार महिला साथियों की दिनोंदिन होती प्रगति को लेकर चिढ़ते थे। वे आपस में बातचीत करते हुए कहा करते थे कि यार हम लोग भी आपरेशन करवाकर अपना जेंडर चेंज करवा लें। सफलता, प्रमोशन और पैसा तभी मिलेगा। मनमोहन कमल के बारे में एक बात और मशहूर थी कि वे जिस अखबार में जाते हैं, वह अखबार या तो बिक जाता है या फिर बंद हो जाता है। अखबारों को बंद कराने का लांछन उनके आगे आगे चलता था।&lt;br /&gt;मनमोहन कमल थे तो हिंदी भाषा के पत्रकार, पर रहते बड़े ठाठ से थे। बिल्कुल किसी करोड़पति-अरबपति सेठ की तरह। हरदम सफारी सूट में लकदक, सेंट से गमकते हुए। गले में सोने की मोटी सी चेन, हाथों की अंगुलियों में भारी-भरकम हीरे की अंगूठियां। महंगी घड़ी, महंगे कपड़े पहने हुए मनमोहन कमल पत्रकार तो एकदम नहीं लगते थे। हां, वे किसी कारपोरेट सेक्टर के सीईओ की तरह जरूर नजर आते थे। मनमोहन कमल के भीतर मानो चार-पांच किस्म के आदमी निवास करते थे। अपने चैंबर के भीतर का मनमोहन कमल अपने अखबार के मुलाजिमों के लिए झक्की, निर्दयी और तानाशाह होता था। चैंबर से बाहर निकलते ही उसका पूरा व्यक्तित्व बदल जाता था। तब मनमोहन कमल निहायत उदार, प्रजातांत्रिक और भाई चारे वाला चेहरे पर मुस्कान बिखेरता इंसान नजर आता थ। किसी बहते निर्मल पानी की तरह। पुरुषों से और, महिलओं से और। महिलाएं जब उसके चैंबर में जातीं, तो बाहर का लाल बल्ब जल जाता था। इसका मतलब यह था कि कोई भीतर नहीं आए।&lt;br /&gt;इस उपन्यास में एक अंतरकथा और चलती है। भइया जी नामक एक दबंग संपादक की। यह भइया जी वास्तव में कौन है, इसे लखनऊ की पत्रकारिता से जुड़ा लगभग हर व्यक्ति बाखूबी समझता और जानता है। मनमोहन कमल जहां सब कुछ चैंबर के भीतर करते थे, वहीं भइया जी अखबार के दफ्तर में ही सब कुछ कर लेते। वह एक साथ दो-दो औरतों को गोद में बिठा लेते। सबके सामने गालों में चिकोटी काट लेते, किसी के भी आगे-पीछे, जहां कहीं भी मन होता हाथ फेर लेते। लेकिन मजाल है कि कोई इसके खिलाफ बोल सके। मनमोहन कमल भइया जी से इस मायने में पीछे थे कि वे गुंडे नहीं थे। भइया जी की गुंडई की चहुं ओर स्वीकृति पर सुनील जैसे पत्रकार शर्मसार तो थे, लेकिन बंद कमरों में। खुलेआम प्रतिरोध करने का साहस न तो तब किसी पत्रकार में था, अब तो खैर भइया जी और मनमोहन कमल दोनों इस असार संसार को विदा कह चुके हैं। भइयाजी ने अखबार का सरकुलेशन बढ़ाने के लिए हाकरों में शराब बंटवाई, उन्हें विभिन्न तरह के गिफ्ट दिए। लेकिन इस पर भी जो हाकर नहीं मानता, अपने गुंडों से पिटाई करवा देता। नतीजा यह हुआ कि भइया जी का अखबार लखनऊ में सबसे ज्यादा बिकने लगा। अपने संपादकीय विभाग में भी उसकी गुंडई खूब चलती थी।&lt;br /&gt;उपन्यास में बेरोजगार पत्रकारों की बेबसी, उनकी पीड़ा और टूट कर समझौता करने या समझौता न कर पाने की वजह से टूटकर बिखर जाने की अंतरकथा भी साथ-साथ चलती रहती है। इस उपन्यास में एक पात्र है सूर्य प्रताप। वह अपनी लेखनी और खबरों के जरिये आगे बढ़ रहा था। उस समय मुख्यमंत्री से लेकर छुटभैये नेताओं का वह प्रिय रहा। मस्ती और स्वाभिमान से लवरेज पत्रकार सूर्य प्रताप की एक दलित महिला नेता से ठन गई। वह भी समाजवादी मुख्यमंत्री के लिए। जब वही दलित महिला प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी, तो उसका सबसे पहला हमला सूर्य प्रताप पर ही हुआ। मालिकों ने दबाव में आकर उसको इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। बेरोजगारी के दौर में उसने क्या-क्या झेल, इसकी विशद गाथा उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ में। कभी ब्यूरो चीफ रहे सूर्य प्रताप को आजीविका चलाने के लिए स्ट्रिंगर की नौकरी तक करनी पड़ी। यह वह दौर था जब उसके अंदर से टूट-फूट चल रही थी। वह अकेले में बैठकर रोता, लेकिन अपने दुख-दर्द किसी को नहीं बताता। आजाद भारत एक बार फिर बिका, तो सबकी तनख्वाह में भारी कटौती की गई। विरोध प्रदर्शन हुआ। धरने पर बैठे कर्मचारियों की संपादक ने अपने गुंडों से पिटाई करवा दी। उनके तंबू कनात उखाड़ दिये। यह नया संपादक आपराधिक प्रवृत्ति का था। हत्या के चार मुकदमे लंबित थे। यह पत्रकारिता के पतन का चरम था, जब कोई हत्या का आरोपी संपादक बना हो। मैनेजमेंट ने उसे संपादक भी इसी लिए बनाया था ताकि वह पुराने कर्मचारियों को डरा-धमका कर बाहर कर दे। यह हिंदी पत्रकारिता के पतन और पराभव की गाथा रुकी नहीं है। किसी न किसी रूप में आज भी प्रवाहमान है। किसी बदबूदार नाली की तरह बजबजाती, गंधाती पत्रकारिता का सम्यक चत्रिण उपन्यास ‘हारमोनियम के हजार टुकड़े’ में है। अट्ठासी पेज के इस उपन्यास की भाषा और शैली कन्टेंट के हिसाब से बिल्कुल फिट बैठती है। एक बार पढ़ना शुरू करने पर उपन्यास को छोड़ पाना कठिन है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे पराजित लोगों की कथा बड़ी शिद्दत से महसूस की जा सकती है। उपन्यास की छपाई और कागज अच्छा है। इसका मूल्य भी महंगाई के इस दौर में उचित ही प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;उपन्यास : हारमोनियम के हजार टुकड़े&lt;br /&gt;उपन्यासकार : दयानंद पांडेय&lt;br /&gt;प्रकाशक : जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.&lt;br /&gt;               30/35-36, गली नंबर-9, विश्वास नगर, दिल्ली- 32&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-2334736908291963863?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/2334736908291963863/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_27.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2334736908291963863'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/2334736908291963863'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_27.html' title='गंधाती, बजबजाती पत्रकारिता को आईना'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-R_9dEmE9YfE/TWoHK2lUoUI/AAAAAAAAASY/iKKoaVSwYy4/s72-c/haormonim.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-7498024651505898504</id><published>2011-02-23T22:34:00.000-08:00</published><updated>2011-02-23T22:36:29.168-08:00</updated><title type='text'>विक्रम-बेताल की लोकतांत्रिक कथा</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमेशा की तरह विक्रम ने पीपल के पेड़ से बेताल को उतारा और पीठ पर लादकर श्मशान घाट की ओर चल पड़ा। कुछ दूर चलने के बाद पीठ पर लदे बेताल ने कहा, ‘राजन! आपका श्रम भुलाने के लिए कलियुग की एक कथा बताता हूं।  भारत के किसी गांव में छह-सात लड़कों ने मिलकर एक सीधे-सादे गधे को  मार डाला। गधे की मौत पर लड़कों के पिता गांव में रहने वाले एक पंडित जी के पास पहुंचे और इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा।  गधे की मौत की बात सुनते ही पंडित जी को लगा कि इनसे कुछ कमाई की जा सकती है। सो, उन्होंने गंभीरता का स्वांग भरते हुए कहा,‘ बेटा!...गधा जैसे सीधे-सादे और उपयोगी पशु की हत्या अतिपातक की श्रेणी में आती है। इस पाप से मोझ के लिए सभी बच्चों के पिता को एक-एक तोले भार का सोने का गधा बनाकर किसी विद्वान पंडित को दान करना होगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में वहां खड़े एक लड़के ने कहा, ‘पंडित जी! गधा मारने में आपका पुत्र संतोषी भी शामिल था।’ यह सुनते ही पंडित जी को लगा कि यहां तो मामला उल्टे बांस बरेली लदने वाले हो गए हैं। उन्होंने झट से एक दोहा रचकर अतिपातक के आरोपी बच्चों के पिता को सुनाते  हुए कहा, ‘अरे! जहां  पूत संतोषी, वहां गधा मारे कौन दोषी? जब तुम लोगों के साथ मेरा पुत्र संतोषी था, तो सभी बच्चे अतिपातक से अपने आप ही मुक्त हो गए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से कहा, ‘राजन यह बताइए कि भारतीय लोकतंत्र में गधा किसका प्रतीक है? पंडित जी,  संतोषी, बाकी बच्चे और उनके पिता की भारतीय लोकतंत्र में क्या भूमिका है। अगर इन  प्रश्नों का उत्तर जानते हुए भी नहीं दोगे, तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम समझ गया कि बेताल ने उसे प्रश्नों के जाल में फंसा लिया है और यह फिर पीठ से उतरकर फरार होने की फिराक में है। उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘तुम्हारी कथा में आया हुआ गधा भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जनता है। कथा में आए हुए उद्दण्ड लड़कों की तरह देश के मंत्री, सांसद, विधायक और राजनेता पूंजीपतियों के साथ मिलकर जब चाहते हैं, महंगाई बढ़ाकर जनता रूपी गधे को भूखों मरने को मजबूर कर देते हैं। घोटाले, घपले करके कमाया गया काला धन विदेशी बैंको में रखते हैं और जनता के सामने विकास परियोजनाओं के लिए धन न होने का स्वांग रचते हैं। इस देश के मंत्री खेलों के लिए करोड़ों करोड़ रुपये तो फूंक सकते हैं, उसमें घोटाला करते हैं, लेकिन अस्पताल बनवाने, स्कूल खुलवाने और सड़कें बनवाने की बात आते ही हाथ खड़े कर देते हैं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना कहकर विक्रम सांस लेने के लिए रुका और फिर कहने लगा, ‘तुम्हारी कथा में पंडित की भूमिका में प्रधानमंत्री और विभिन्न दलों के राजनेता हैं। वे जब सत्ता में नहीं रहते हैं, तो उन्हें  सत्तारूढ़ दल के हर कामों में गलत ही नजर आता है। घोटाले, भ्रष्टाचार की बात पर संसद नहीं चलने देते, लेकिन जब उनकी सरकार बनती है, या गंदगी के छींटे उनकी ओर उछलते दिखाई देते हैं, तो अपना दामन पाक साफ दिखाने के लिए सरकार को क्लीन चिट देने से भी परहेज नहीं करते। तब इनके चश्मे का नंबर बदल जाता है। उन्हें देश की तब कराहती-भूख से बिलबिलाती जनता नजर नहीं आती है। इनकी आंखों को मोतियाबिंद हो जाता है। जब विपक्ष में बैठे नेताओं को सत्ता सुंदरी का भोग करने को मिलता है, तो वे उन घोटालों, घपलों या विदेशों में जमा काला धन वापस लाने और इन मामलों की जांच कराने की बात भूल जाते हैं। वैसे एक बात बताऊं। उद्दण्ड लड़कों के पिता सरीखे तो मुझे इस देश के बड़े-बड़े दलाल और पूंजीपति नजर आते हैं। वे भ्रष्ट सांसदों, मंत्रियों और अफसरों की दलाली करते हैं, उनके लिए एक माहौल तैयार करते हैं। कई बार पूंजीपति, मंत्री और पूंजीपति मिलकर देश को चूना लगाते हैं, तो कई बार पूंजीपति, मंत्री, अफसर और पत्रकार दलालों की भूमिका में होते हैं। राडिया, राजा मामला भारतीय लोकतंत्र में घटित होने वाला ऐसा ही एक मामला है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम के इतना कहते ही बेताल खुशी से चिल्लाया, ‘राजन! तुमने  बिलकुल सही फरमाया है। लेकिन चूंकि तुमने अपना मौन तोड़ा है, इसलिए मैं तो चला।’ इतना कहकर बेताल विक्रम की पीठ से उतरकर गायब हो गया। विक्रम एक बार फिर पीपल की पेड़ की ओर चल पड़ा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-7498024651505898504?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/7498024651505898504/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_23.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/7498024651505898504'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/7498024651505898504'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_23.html' title='विक्रम-बेताल की लोकतांत्रिक कथा'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-4382917438411871032</id><published>2011-02-20T22:57:00.001-08:00</published><updated>2011-02-20T22:57:31.386-08:00</updated><title type='text'>तुम्हारे बाप का है राज यह मैं जानता हूं</title><content type='html'>&lt;div class="post-header"&gt;  &lt;/div&gt;  &lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;तुम्हारे बाप का है राज यह मैं जानता हूं&lt;br /&gt;कटेगा शीश मेरा आज, यह मैं जानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शांति का पाठ पढ़ाने नगर में आ गए हिजड़े&lt;br /&gt;बजेंगे फिर वही सुरसाज, यह मैं जानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर-मस्जिद की बातें सुनके सुखिया रो पड़ी&lt;br /&gt;लुटेगी फिर उसी की लाज, यह मैं जानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महल में शांति छायी है, नगर के लोग सहमे हैं&lt;br /&gt;गिरेगी झोपड़ी पर गाज, यह मैं जानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम के किस्से किताबों में पढ़ा जब भी पढ़ा है&lt;br /&gt;तुम्हारे प्रेम का क्या राज, यह मैं जानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल खुशियों के खिले होंगे तुम्हारे गांव में&lt;br /&gt;पर नहीं दोगे मुझे आवाज, यह मैं जानता हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-4382917438411871032?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/4382917438411871032/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/4382917438411871032'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/4382917438411871032'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post_20.html' title='तुम्हारे बाप का है राज यह मैं जानता हूं'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-8687855949640652319</id><published>2011-02-19T01:36:00.000-08:00</published><updated>2011-02-19T01:38:16.389-08:00</updated><title type='text'>हाय राम...लोकतंत्र मर गया</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस्ताद मुजरिम के साथ मैं राजधानी दिल्ली की खाक छान रहा था। इन दिनों मैं बेकार जो था। कुछ दिन पहले ही दैनिक ‘दमदम टाइम्स’ की नौकरी से इस्तीफा दिया था। मुजरिम की सलाह थी कि सड़कों की खाक छानने से नए-नए विचार दिमाग रूपी गटर से निकलते हैं और किसी भी आदमी की तकदीर बदल देते हैं। सो, हम दोनों सुबह की एक चाय की बदौलत आधी दिल्ली की खाक छान आए थे। दिमाग के गटर से आइडिये के बगूले तो नहीं फूटे, लेकिन पांच घंटे पैदल चलते-चलते टांगों की कचूमर जरूर निकल गई। मुझे तो लग रहा था कि अगर अब दो कदम भी चलना पड़ा, तो गश खाकर गिर पड़ूंगा। वहीं उस्ताद मुजरिम थे कि किसी जिराफ की तरह लंबे डग भरे चले जा रहे थे। एक चौराहे पर भीड़ देखकर ‘या इलाही ये माजरा क्या है?’ की तर्ज पर हम दोनों उधर ही लपके। मैंने देखा कि सड़क के बीचोबीच एक लाश पड़ी है और पुलिस के कुछ सिपाही उसके पास खड़े अपने बाप...सॉरी...अपने अधिकारी का इंतजार कर रहे हैं। वहां खड़ी भीड़ अपना सनातन धर्म निभा रही थी यानी कानाफूसी कर रही थी।&lt;br /&gt;मैंने एक आदमी से पूछा, ‘शिनाख्त हुई? किसकी लाश है यह? पुलिस कुछ करती क्यों नहीं?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस आदमी ने परमहंसी मुद्रा में जवाब दिया, ‘अभी तक तो नहीं हो पाई  है। आप भी देख लें, क्या पता आपका ही कोई परिचित निकल आए। वैसे आपको बता दें, पुलिस अपना काम कर रही है। भीड़ में से एक ऐसे आदमी की तलाश जारी है जिसको बलि का बकरा बनाया जा सके। वह आदमी आप भी हो सकते हैं, मैं भी हो सकता हूं। इस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति पुलिसवालों की निगाह में सिर्फ बकरा है जिसे जब चाहे, जहां चाहे हलाल किया जा सकता है।’ वह आदमी रौ में बकता जा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक मुजरिम भीड़ को चीरकर लाश के पास पहुंच चुके थे। लाश पर नजर पड़ते ही वह चिल्लाए, ‘अरे! यह तो लोकतंत्र है! हाय राम...यह क्या हो गया?...लोकतंत्र मर गया?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम की बात सुनते ही पुलिस वाले चौंके। एक सिपाही ने तंबाकू थूकते हुए पूछा, ‘अबे! तू जानता है इसे? चौबे जी, एक प्रॉब्लम तो इस ससुरे ने साल्व कर दी।’ पुलिस वाले ने चौबे जी को पास आने का इशारा किया।&lt;br /&gt;मुजरिम रुआंसे हो गए, ‘हां साब! मैं शिनाख्त कर सकता हूं इसकी। यह लोकतंत्र है...भारतीय लोकतंत्र...दुनिया का सबसे बड़ा किंतु किसी कोढ़ के रोगी की तरह सड़ांध मारता हमारा प्यारा लोकतंत्र।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘क्या बकते हो’ कहकर पुलिस वाले ने मुजरिम का कॉलर पकड़ लिया, ‘जिस लोकतंत्र की सुरक्षा का भार ‘चार कंधों’ पर हो, वह इस तरह लावारिस मर जाए, यह हमारे लिए शर्म की बात है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम ने अपना कॉलर छुड़ाते हुए कहा, ‘आप चारों की वजह से ही तो परेशान था यह! आप में से जिसे भी जब मौका मिलता था, दबोच लेते थे और वह सब कुछ कर डालते थे, जो नहीं करना चाहिए। बेचारा साठ साल में ही सात सौ साल का लगने लगा था। इधर कुछ दिनों से तो बहुत परेशान था।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुलिस वाले ने जमीन पर डंडा फटकारते हुए कहा, ‘साफ-साफ बता, बात क्या है? पहेलियां बूझने की न तो अपनी आदत है और न ही यह भाषा अपने पल्ले पड़ती है। डंडे की भाषा जानता हूं और यह समझाना जानता हूं। कहे तो समझाऊं?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुलिस वाले के तेवर देखकर मुजरिम के होश उड़ गए। उन्होंने खुशामदी लहजा अख्तियार करते हुए कहा, ‘साब! जब से कुछ सांसदों ने सवाल पूछने के नाम पर रोकड़ा मांगा था, तब से लोकतंत्र परेशान था। अपनी करतूतों से जितनी बार लोकतंत्र के चारों स्तंभ दुनिया के सामने नंगे हो जाते थे, जितनी बार भारतीय राजनीति दागदार होती थी, उतने दाग इसके शरीर पर उभर आते थे। साब, आपको विश्वास न हो, तो इसकी कमीज उलटकर देख लें। इसकी पीठ और पेट पर घोटालों और शर्मनाक कांडों के निशान मिल जाएंगे।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम अपनी बात कह ही रहे थे कि पुलिस की एक जीप आकर भीड़ के पास रुकी। उसमें से एसएचओ और कुछ सिपाही उतर कर भीड़ को लाश के आसपास से हटाने लगे। पहले से मौजूद एक सिपाही ने एसएचओ को जोरदार सल्यूट मारते हुए कहा, ‘मृतक की शिनाख्त हो चुकी है। यह आदमी इसे लोकतंत्र बताता है। बाकी आप दरियाफ्त कर लें, हुजूर।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थानेदार ने पहले तो ऊपर से नीचे तक पुलिस को निहारा और फिर कड़क कर कहा, ‘तू क्या  बेचता है और कैसे कह सकता है कि यह लोकतंत्र है? जिस लोकतंत्र की रक्षा में देश-प्रदेशों के सांसद, विधायक, सत्तारूढ़ और गैर सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता, अफसर लगे हुए हों। पूरा का पूरा पुलिस महकमा लगा हुआ हो, वह लोकतंत्र इस तरह सड़क पर लावारिस मरा हुआ पाया जाए, यह कैसे हो सकता  है?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम ने थूक निगलते हुए कहा, ‘हुजूर! मैं कुछ बेचता नहीं, एक मामूली पाकेटमार हूं। मेरा और आपका पेशा लगभग एक जैसा है। जिस काम को आप बड़े पैमाने पर सामूहिक रूप से करते हैं, वही काम मैं छोटे स्तर पर व्यक्तिगत रूप से करता हूं। आप इस काम की पगार लेते हैं, जबकि मैं अगर यह करता पकड़ा जाऊं, तो पब्लिक से लेकर पुलिसवालों तक के जूते खाता हूं। अब तो आप जान ही गए होंगे कि मेरा नाम मुजरिम है।’&lt;br /&gt;इतना कहकर मुजरिम सांस लेने के लिए पल भर को रुके। फिर बोले, ‘इस लोकतंत्र से मेरी पुरानी यारी रही है। हम दोनों एक दूसरे के लंगोटिया यार थे। मजे की बात तो यह है कि हम दोनों की पैदाइश भी एक ही दिन की है। मेरी मां ‘व्यवस्था’ बताती हैं कि जिस समय मैं पैदा हुआ था, खूब हट्टा-कट्टा था, लेकिन यह तो जन्म से ही लंगड़ा था। कहते हैं कि अंग्रेजों और देसी पूंजीपतियों से इसके ‘बापू’ बड़ी सहानुभूति रखते थे। वे नहीं चाहते थे कि विद्रोहिणी क्रांति कोई ऐसा बच्चा जने, जो इन दोनों यानी बापू और लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो। इसलिए ‘बापू’ ने गर्भवती ‘क्रांति’ के पेट पर लात मारकर गर्भ गिरा दिया था। बाद में पता नहीं कैसे क्रांति की सौतेली बहन व्यवस्था के गर्भ से यह लंगड़ा लोकतंत्र पैदा हो गया। अंग्रेज पूंजीपतियों ने हम जैसों का खून चूसकर इसको पाला-पोसा। काले बनियों ने बैसाखी के सहारे चलना सिखाया। इसीलिए यह काले बनियों का मुरीद बनकर रह गया। काले बनियों पर जब भी कोई मुसीबत आती, यह डेढ़ टांग पर खड़ा होकर अपनी साजिशी तान देने लगता था। साब! मजाल है, कोई मुसीबत इसकी जानकारी में बनियों का कुछ बिगाड़ सके। यह तो बातचीत के दौरान अक्सर कहा करता था। बनिये इस देश के भाग्यविधाता हैं। भाग्य विधाता का हित सुरक्षित रहे, इसके लिए जरूरी है कि जनता के हित असुरक्षित रहें। उनका भरपूर शोषण होता रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी एसएचओ ने अपनी  आंख पर चढ़ा काला चश्मा उतार कर लाश का मुआयना करना शुरू किया। कमीज उलटकर लाश के पास बने एक पैदायशी निशान को गौर से देखते हुए कहा, ‘हवलदार रामधनी, नोट करो। मृतक की कमर से दो इंच नीचे एक पैदायशी निशान है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हां साब, यह निशान जीप घोटाले का है।’ मुजरिम ने एसएचओ की  बात काटते हुए कहा, ‘हुजूर! आप तो जानते ही होंगे, देश का सबसे पहला घोटाला ही  जीप घोटाला था। तब यह पैदा नहीं हुआ था। हां, व्यवस्था के गर्भ में भ्रूण रूप में जरूर आ चुका था। उस समय तब देश पर अंग्रेजों का शासन था। लेकिन उस घोटाले के पैदायशी निशान इसकी कमर पर उभर आए थे। इसके बाद देश आजाद हो गया। कुछ दिन तक सत्ताधीशों ने चना-चबैना खाकर दिन काटे, लेकिन एक मंत्री से बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने आजाद भारत का पहला घोटाला किया। इस घोटाले का निशान आपको लोकतंत्र के ठीक दिल के पास दिख ही गया होगा। इसके बाद मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारी मरभुक्खों की तरह लोकतंत्र पर टूट पड़े और लूट-लूट कर खाने लगे। फिर क्या था। जैसे-जैसे घोटाले बढ़ते गए। लोकतंत्र के शरीर पर दाग बढ़ते गए। जितना बड़ा घोटाला, उतने बड़े दाग। लोकतंत्र का चेहरा ही बदरंग हो गया। साब, एक बात बताऊं! हर घोटाले पर इसकी आत्मा कराह उठती थी। कई बार तो मैंने इसे बिलख-बिलखकर रोते देखा था।’&lt;br /&gt;एसएचओ ने रोब झाड़ते हुए कहा, ‘अबे! तू फालतू की राम कहानी छोड़। सबसे पहले तो तू यह बता, यह मरा कैसे?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुजरिम एसएचओ की बात सुनकर सिटपिटा गए, ‘साब! मैं यह कैसे बता सकता हूं। म ैं कोई डॉक्टर तो नहीं हूं। आप लाश का पंचनामा बनाइए, पोस्टमार्टम के लिए भेजिए। कल तक आपको सब पता चल जाएगा। हां, इतना बता सकता हूं...कल रात य मेरे पास आया था। कुछ बोल नहीं पा रहा था। बीच-बीच में आदर्श..आदर्श... कामनवेल्थ, राडिया-राजा जैसा कुछ बड़बड़ा रहा था। फिर बोला कि मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहा। इतना कहकर लोकतंत्र कहीं चला गया था। मैंने समझा कि घर गया  होगा। आज सुबह यहां इसकी लाश देखी। मेरा ख्याल है कि यह शर्म से मर गया है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पास खड़ा एक सिपाही अपने एसएचओ के कान में फुसफुसाया, ‘साब! मुझे तो यही कातिल लगता है।’ और फिर मुजरिम लोकतंत्र की हत्या के जुर्म में धर लिए गए। मैंने चुपचाप वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-8687855949640652319?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/8687855949640652319/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8687855949640652319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/8687855949640652319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='हाय राम...लोकतंत्र मर गया'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-557667918811499471</id><published>2011-01-31T22:00:00.000-08:00</published><updated>2011-02-04T23:03:33.698-08:00</updated><title type='text'>कोहिनूर जैसा प्याज</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;-अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 2019 में भारत के किसी मोहल्ले का एक दृश्य। एक घर में मोहल्ले की चार-पांच महिलाएं बैठी पारंपरिक ढंग से गपिया रही हैं। उनके बीच शीशे के एक केस में रखा लगभग एक सौ पचहत्तर ग्राम का लाल सुर्ख प्याज अपने भाग्य पर इतरा रहा है। एक महिला ने प्याज को प्यार से निहारते हुए कहा, ‘बहन! कितने में पड़ा यह कोहिनूर जैसा प्याज?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्याज की मालकिन ने इतराते हुए कहा, ‘दीपो की मम्मी...दो सौ तीस रुपये पाव बिक रहा है इन दिनों प्याज। पौने दो सौ ग्राम प्याज का दाम हिसाब लगाकर देख लो। दुकानदार तो हमें लूट ही लेता...वह तो कहो, मेरी चतुराई काम आ गई। मैंने दुकानदार को डपट दिया। हमें कोई नंगा भूखा समझ रखा है क्या? हफ्ते में एकाध दिन हम भी पचास ग्राम प्याज खाते है। ठीक..ठीक बताओ। तब जाकर सही दाम लगाए। सल्लू के पापा तो बस बिटर-बिटर खड़े मेरा मुंह देखते रहे।’ यह कहकर महिला सांस लेने के लिए रुकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीपो की मम्मी कुछ बोलने का प्रयास करें, उससे पहले ही मिसेज गुप्ता बोल बैठीं, ‘प्याज भी तो देखो...कितना सुर्ख है! लगता है, नासिक वाला है। एक बात कहूं, नासिक वाले प्याजों में एक अजीब-सी गंध आती है। मुझे तो उत्तर प्रदेश वाले प्याज ही अच्छे लगते हैं। मैं तो दो महीने पहले दो सौ पंद्रह ग्राम प्याज लाई थी। नासपीटे दुकानदार ने उत्तर प्रदेश वाला बताकर नासिक का प्याज थमा दिया।’ मिसेज गुप्ता की बात पूरी हो पाती इससे पहले ही मिसेज चौहान बोल उठीं, ‘चल झूठी कहीं की...साल में दो बार ही दीपावली और होली पर तेरे घर में प्याज आता है। कहती है कि दो महीने पहले प्याज लाई थी। यह तो हम लोग हैं, जो हर हफ्ते प्याज खाना अफोर्ड कर सकते हैं।’ दरअसल मिसेज गुप्ता और मिसेज चौहान में दो दिन पहले ही बच्चों को लेकर  खूब झगड़ा हुआ था। ऐसे में मिसेज गुप्ता को नीचा दिखाने का अवसर भला मिसेज चौहान कैसे चूक जातीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हां...हां, तू ही तो मोहल्ले में सबसे बड़ी धन्ना सेठ है। बाकी सब भिखारी बसे हैं। दो महीने पहले ही तो दीपावली थी। मैंने इसमें गलत क्या कहा था। अरे, भूल गई जब तेरा बड़ा दामाद आया था, तो प्याज की पहली परत तुझे उधार दी थी। तब से आज तक उधार तो वापस कर नहीं सकी। बड़ी आई है हर हफ्ते प्याज खाने वाली।’ इतना कहकर मिसेज गुप्ता उठी और अपने घर चली गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी अंदर से मर्दाना आवाज आई, ‘तुम्हारी यह प्याज प्रदर्शनी कब तक चलेगी? इतनी देर से प्याज खुले में रखा है। कहीं सड़ गया, तो समझ लेना। तलाक देकर ही छोड़ूंगा।’ प्याज की मालकिन ने शो केस सहित प्याज उठाया और यह कहते हुए अंदर रख दिया,‘बहन! अब आप लोग चलें, मुझे काफी काम करना है।’ इसी के साथ वह महिला संगोष्ठी खत्म हो गई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-557667918811499471?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/557667918811499471/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post_31.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/557667918811499471'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/557667918811499471'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post_31.html' title='कोहिनूर जैसा प्याज'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-6027709965087031283</id><published>2011-01-23T22:01:00.000-08:00</published><updated>2011-01-23T22:03:46.144-08:00</updated><title type='text'>लालू के बिंदास बोल</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;अपने बिहार शिरोमणि लालू भाई जब भी बोलते हैं, बिंदास बोलते हैं।  उनके बिंदास बोल का मुरीद तो मैं तब से हूं, जब उन्होंने कहा था, ‘तनी कुछ दिन रुका, पटना की सड़कों को हेमामालिनी के गाल की तरह चिकना बना दूंगा।’ हालांकि यह कभी हुआ नहीं। पटना की सड़कें आज भी अपनी किस्मत को रो रही हैं। हां, तब पहली बार लगा था कि चलो, हिंदुस्तान की सियासत में कोई बिंदास बोलने वाला तो पैदा हुआ। जिस समय की बात मैं कर रहा हूं, उस युग में राजनीति की ऐसी भाषा नहीं हुआ करती थी। राजनीतिक दलों पर कड़ी से कड़ी टिप्पणी करने से पहले विरोधी कई बार सोचते थे और तब ‘तोल मोल कर’ बोलते थे। लेकिन लालू भाई ने एक नई भाषा ईजाद की। वैसे अपने लालू भाई जो कुछ भी करते हैं, बिंदास ही करते हैं। चारा घोटाले का आरोप लगा, तो बिंदास बोले, ‘हम कोई पशु-डांगर हैं का, जो चारा खा गए। जावा कहीं और ढूंढा चारा-वारा।’ वैसे तो विश्वास नहीं होता कि लालू भइया ने चारा खाया होगा। लेकिन यह भी उनके कलेजे की बात है कि चारा खाया भी, तो बिंदास खाया। आज तक साबित नहीं हो पाया कि करोड़ों रुपये का चारा कौन खा गया। अब तक तो करोड़ों रुपये यही पता करने में खर्च हो गए कि आखिर वह चारा गया कहां? कौन खा गया, लालू भइया या उनके तबेले में पली भैंसें।&lt;br /&gt;काफी दिनों से  मैं लालू भइया के बिंदास बोल का इंतजार कर रहा था। इधर उनके बोलने की आवृत्ति कुछ कम हो गई है। अब उम्र भी हो गई है। जवानी वाली बात रह भी नहीं। वैसे भी वे बिंदास बोल के लिए नई पीढ़ी को मौका देना चाहते हैं। अफसोस की बात तो यह है कि नई पीढ़ी में इतना जिगरा किसी के पास दिखता नहीं है। सो, कभी-कभार लालू जी बोल देते हैं। उनके बोलने से ही पता चलता है कि अभी वे चुके नहीं हैं। उनकी ऊर्जा अभी बरकरार है। अभी कल ही तो उन्होंने पटना में देश के एक नामी गिरामी स्वामी को कहा है कि वे बौरा गए हैं। ये स्वामी जी कोई स्वामी भीमानंद या नित्यानंद जैसे नहीं हैं। योग के बढ़िया कारोबारी हैं। उनकी देश-विदेश में तूती बोलती है। खूब खा-पीकर मुटा गए लोगों को कपालभाति और कंकालभाति क्रिया समझाते हैं। स्वामी जी का दोष सिर्फ इतना है कि उन्होंने बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों को फांसी देने की मांग की थी। हालांकि स्वामी जी के इस बयान के पीछे मंशा चर्चा में बने रहने की थी, लेकिन उनके बौरा जाने की जानकारी देकर भाई लालू बाजी मार ले गए।&lt;br /&gt;वैसे अगर यह मान लिया जाए कि स्वामी जी सचमुच बौरा गए हैं, तो इसमें उनका भी कोई दोष नहीं है। कुछ ही दिनों में फागुन आने वाला है। जिस प्रकार सूर्य निकलने से पहले रश्मियां आकर यह संकेत दे देती हैं कि सूर्य निकलने वाला है। ऐसा ही फागुन का मामला है। फागुन के सारथि ऋतुराज बसंत तो बस दरवाजे पर दस्तक देने वाले हैं। कहते हैं कि फागुन में बाबा भी बौरा जाते हैं। सत्तर-अस्सी वर्षीय बाबा भी देवर लगने लगते हैं। अंग-अंग कथक और भंगड़ा करने लगता है। बासंती बयार उनकी बूढ़ी हड्डियों को कड़कड़ाने पर मजबूर कर देती है। ऐसे में अगर स्वामी जी भी बौरा गए हैं, तो इसके लिए वे कतई दोषी नहीं हैं। निगोड़ी प्रकृति के फंदे में इस बार स्वामी जी फंसे हैं, कल कोई और फंसेगा। बस फाल्गुन आने दीजिए। पोपले मुंह वाली अस्सी वर्षीया भाभियां कुछ ही दिन पहले ब्याही गई नवयौवनाओं को भी मात न दे दें, तो कहना। भई, कोई कुछ भी कहे, स्वामी जी के बौराने में कम से कम मैं तो उनका दोष नहीं मानता। लालू भाई आपका क्या खयाल है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-6027709965087031283?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/6027709965087031283/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post_23.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6027709965087031283'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6027709965087031283'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post_23.html' title='लालू के बिंदास बोल'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-6227611544040189814</id><published>2011-01-22T03:03:00.000-08:00</published><updated>2011-01-22T03:06:24.559-08:00</updated><title type='text'>बुझ गई ‘स्वामी’ जी की भट्ठी</title><content type='html'>-अशोक मिश्र&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह-सुबह छबीली से चौराहे पर मुलाकात हो गयी। सुनहरी धूप की तरह खिली छबीली खूब सजी-धजी नजर आ रही थी। यह सज-धज किसी जवान स्त्री की नहीं, बल्कि किसी जोगन की तरह थी। उसने माथे पर बड़ा-सा टीका लगाने के साथ किसी स्वामी जी के नाम वाला दुपट्टा ओढ़ रखा था। मैंने हंसते हुए कहा, ‘क्या बात है, ‘साध्वी’ बनने का इरादा है या मेरे प्यार में जोगन? आज से दस-बारह साल पहले जब मैं तेरे साथ जोगी बनकर गली-गली, गांव-गांव घूमने को तैयार था, तब तू भाव ही नहीं देती थी। आज जब एक अदद बीवी घर लाकर बिठा चुका हूं, तो तू मेरे प्यार में जोगन बनने जा रही है?’छबीली ने मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘नासपीटे! तू जब भी मुंह खोलेगा, बुरा ही बोलेगा। तेरे प्यार में जोगन बने मेरा ठेंगा। मैं तो स्वामी मुसद्दीलाल का प्रवचन सुनने जा रही हूं। बड़े सिद्ध महात्मा हैं, उनका प्रवचन सुनने से सारे पाप धुल जाते हैं। तू भी मेरे साथ चल और अपने पाप धो ले।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे छबीली की कमअक्ली पर हंसी आ गयी। मैंने उसे समझाने की नीयत से कहा, ‘पहली बात तो यह है कि मैंने कभी कोई पाप ही नहीं किया है, जिसे धोने की चिंता में घुलता फिरूं। तू भी इन ढोंगी साधुओं के चक्कर में कहां पड़ गयी। ये उस तरह के साधु-महात्मा न होवे हैं, जैसे पहले होते थे। अब तो ज्यादातर संत-महात्माओं में कोई नित्यानंद होता है, तो कोई भीमानंद। कोई भागवताचार्य के वेश में अश्लील सीडी का कारोबार करता है। नाम के साथ या आगे-पीछे ‘आनंद’ शब्द जोड़ लेने से कोई ‘विवेकानंद’ नहीं हो जाता। विवेकानंद बनने के लिए त्याग करना पड़ता है, मोह-माया से विरक्त होना पड़ता है। जिस स्वामी मुसद्दीलाल के तू कसीदे काढ़ रही है, उन्हें मैं जानता हूं। स्वामी मुसद्दीलाल महिला से छेड़छाड़ के जुर्म में दो महीने तक जेल की हवा खा चुका है। पहले यह बस और ट्रेनों में मूंगफली बेचता फिरता था। अब संत बनकर तुम जैसी भक्तिनों को बेच रहा है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर छबीली ने कानों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘शिव॥शिव...तू तो पक्का संत विरोधी है। स्वामी मुसद्दीलाल की तुलना तू इन अधर्मियों से करता है। मुझे अब पक्का विश्वास हो गया है, तू मरने पर नरक जरूर जाएगा। तुझे शर्म नहीं आती, ऐसे महान स्वामियों के बारे में दुष्प्रचार करते हुए।’छबीली की बात सुनकर मेरा मन हुआ कि पागलों की तरह हंसता रहूं। लेकिन मैंने अपनी मनोभावना पर काबू करते हुए मजाक के स्वर में कहा, ‘अगर तू मेरी चेली बनने को तैयार हो जाए, तो मैं भी स्वामी बनने को तैयार हूं। सच्ची...अगर मैं स्वामी बन जाऊं, तो भीमानंद और नित्यानंद जैसे स्वामियों की दुकान बंद हो जाएगी। वैसे भी इस धंधे में अपने पास से कुछ नहीं लगाना पड़ता है। बस॥अगर आप थोड़े से हैंडसम हों, महिलाओं और लड़कियों को अपनी बोलचाल से प्रभावित करने की क्षमता रखते हों, तो समझो कि आपकी धर्म की दुकान चल निकली। इसके साथ ही एकाध बड़े नामी-गिरामी देशी-विदेशी चेले-चपाटे हों, तो समझो ‘सोने में सुहागा’ हो गया। इन तथाकथित बड़ों को अपने साथ जोड़ने का मतलब है कि दुकान चलने की गारंटी मिल गई। अब स्वामी नित्यानंद, भीमानंद या अपने ब्रजवासी भागवताचार्य को ही लो, इनके साथ थोक के भाव विदेशी चेले-चेलियां जुड़े हुए थे। ये देशी-विदेशी चेले इन स्वामियों का मुफ्त प्रचार करते थे।’ मैं सांस लेने के लिए  पलभर को रुका और फिर चेहरे पर परमहंसी मुस्कान लाते हुए कहा, ‘अगर मैं संत या भागवताचार्य बना, तो विदेश दौरे पर तुझे जरूर ले जाऊंगा। तू मेरी चेली बनेगी?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनते ही छबीली हत्थे से उखड़ गयी। बोली, ‘शीशे में अपना मुंह देखकर आ। चला है संत बनने। तू चेहरे से ही असंत लगता है। संत क्या खाक बनेगा।’ हम दोनों के बीच चल रही प्रेम रस से सराबोर वार्ता आगे बढ़ती कि छबीली के पड़ोस में रहने वाला स्वामी मुसद्दीलाल का प्रमुख चेला अभयानंद दिख गया। उसके मुंह पर हवाइयां उड़ रही थी। उसने पास आकर छबीली से कहा, ‘दीदी...तू आश्रम मत जाइयो। अब प्रवचन नहीं होगा। स्वामी जी को पुलिस तस्करी और बलात्कार के आरोप में पकड़ ले गयी है। लगता है कि स्वामी जी की भट्ठी बुझ गई।’ यह सुनते ही छबीली स्वामी मुसद्दीलाल को गालियां देती घर लौट गई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-6227611544040189814?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/6227611544040189814/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post_22.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6227611544040189814'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6227611544040189814'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post_22.html' title='बुझ गई ‘स्वामी’ जी की भट्ठी'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-GC7H652YYh4/TwL3Wu-zpHI/AAAAAAAAATs/pUrFq4WGcsQ/s220/Picture%2B017.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1588059914195644808.post-6874849663375491786</id><published>2011-01-17T22:47:00.000-08:00</published><updated>2011-01-17T23:04:52.891-08:00</updated><title type='text'>डंडा बरसाने को बढ़ जाएगी पुलिस</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अशोक मिश्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उस्ताद मुजरिम ने आते ही मेरे सिर पर बम फोड़ दिया, ‘बेटा! बस कुछ ही दिन की बात है। मैं मुख्यमंत्री बनने वाला हूं। लोग सभाओं में मेरी जय-जयकार किया करेंगे। जनता दरबार में खैरात मांगने के लिए लाइन लगाएंगे। तू भी मेरे सामने हाथ बांधकर खड़ा होगा भिखमंगों की तरह। तब मैं पहचानूँगा या नहीं, इस बारे में मैं अभी कुछ नही कह सकता।’&lt;br /&gt;‘आप क्या कह रहे हैं, मेरी समझ में नहीं आ रहा है।’ मैंने जमुहाई लेते हुए कहा, ‘आपने आज सुबह-सुबह ही शिव की बूटी तो नहीं चढ़ा ली।’&lt;br /&gt;उस्ताद मुजरिम के चेहरे पर परमहंसी मुस्कुराहट आ गयी, ‘कल शाम को दिल्ली में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में प्रधानमंत्री ने ‘अपराधिस्तान’ राज्य बनाने को मंजूरी दे दी है। इधर राज्य का गठन हुआ, उधर मैं मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए राजभवन पहुंच जाऊंगा। तुम तो जानते ही हो, पिछले बीस साल से अपराधिस्तान आंदोलन का नेतृत्व कर रहा हूं। अब तो मौज हो जाएगी। देश के जितने भी छटे हुए गुंडे, बदमाश, जेबकतरे और लंपट हैं, उनको अपराधिस्तान में लाकर बसाऊंगा। सोचो...कितना मजा आएगा, जब किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री सड़कों पर किसी की जेब काटने के बाद गर्व से कहेगा कि आज मैंने पांच लोगों की पाकेटमार कर दो हजार रुपये कमाए।’&lt;br /&gt;उस्ताद की बात सुनकर मैं उकताहट महसूस करने लगा, ‘ जेब और गला तो आज भी केंद्र और प्रदेश के मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारी काटते रहते हैं। यदि अपराधिस्तान में भी यही सब कुछ होगा, तो इसमें नई बात क्या होगी। एक बात मेरी समझ में तो आई नहीं और वह यह कि आज अखबारों में ऐसी कोई खबर तो छपी नहीं है। न ही मंत्रिमंडल की बैठक के बारे में किसी अखबार या चैनल पर कल कोई खबर थी। फिर यह बैठक कहां से हो गई।’मैंने देखा कि मेरी इस बात से उस्ताद मुजरिम के चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा। वे तपाक से बोले, ‘नहीं हुई है, तो आज या कल में हो जाएगी। यह पक्की खबर है कि एकाध दिन में मेरा अपराधिस्तान बनने का सपना पूरा होने वाला है। मेरा सूत्र मुझे गलत खबर नहीं दे सकता है। वैसे आज सुबह ही दिल्ली बात हुई थी। मुझे लगता है कि उसने कहा होगा, कब बैठक होगी और मैंने सुन लिया होगा कि कल बैठक हुई थी। खैर..कोई बात नहीं। जब बीस साल इंतजार किया, तो दो-तीन दिन इंतजार करने में क्या बुराई है।’&lt;br /&gt;मैंने उस्ताद मुजरिम को गौर से देखा। वे इस बात को लेकर जिस तरह आश्वस्त नजर आ रहे थे, उससे मुझे लगा कि शायद उनकी बात सही हो। मैंने कहा, ‘आप कहते हैं कि अपराधिस्तान प्रदेश में मंत्री, मुख्यमंत्री और विधायक से लेकर सरकारी कर्मचारियों को अपराध करने की छूट होगी। मुझे तो लगता है कि यह छूट तो आज भी मिली हुई है। अच्छा आप ही बताइए, इतने घपले-घोटाले हुए, सत्ता और विपक्ष की इतनी ‘तू-तू..मैं-मैं’ हुई, लेकिन आज तक किसी को सजा भी हुई? विपक्ष में रहने वाले भ्रष्टाचार को लेकर सरकार की टांग खींचते हैं। लेकिन जब अपनी सरकार बनती है, तो चुप्पी साध लेते हैं। ये नेता, मंत्री, अधिकारी आदि किसी मायने में मुजरिमों से कम हों, तो बताइए।’ मैंने धारा प्रवाह बोलते हुए कहा, ‘अच्छा उस्ताद, थोड़ी देर के लिए मान लिया कि अपराधिस्तान बनने जा रहा है। तो नये राज्य में ऐसा क्या होगा, जो अन्य राज्यों से अलग होगा।’&lt;br /&gt;मेरी यह बात सुनते ही उस्ताद मुजरिम भड़क उठे, ‘कैसी बेवकूफों जैसी बातें करते हो। अरे, अपराधिस्तान बनते ही उनको उनका अपना मुख्यमंत्री यानी मैं मिल जाऊंगा। राज्य छोटा होने से संसाधनों का दोहन अच्छी तरह से हो सकेगा। राज्य का विकास करने में आसानी होगी। अभी जिन क्षेत्रों में शासन-प्रशासन के हाथ नहीं पहुंच पाते हैं, वहां तक उनकी पहुंच आसान हो जाएगी।’&lt;br /&gt;मुझे लगा कि उस्ताद मुजरिम कुछ ज्यादा ही बोल गए है। उनकी बातें मुझे हाजमोला खाने के बावजूद पच नहीं रही थीं। मैंने तल्ख लहजे में कहा, ‘उस्ताद! एक बात बताऊं। अगर अपराधिस्तान बन गया, तो क्या होगा? हमारे सिर पर डंडा बरसाने के लिए नए प्रदेश के नाम पर पुलिस में भर्तियां होंगी, पुलिस, अर्धसैनिक बल आदि की संख्या बढ़ जाएगी। नया जिला या प्रदेश बनने पर नया कारागार भी बनेगा, ताकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर शांति और सुरक्षा के नाम पर लोगों को उसमें ठूंसा जा सके। अदालत बनेगी, ताकि जनता को कानून के डंडे से हांका जा सके। हम पर डंडा, लाठी बरसाने का आदेश देने वाले आईएएस और पीसीएस अफसर बढ़ जाएंगे। नेताओं, अफसरों और पूंजीपतियों के लिए लूटने-खसोटने के अवसर बढ़ जाएंगे। मंत्रियों और अफसरों का खर्चा जनता की पीठ पर लाद दिया जाएगा। इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा।’ उस्ताद मुजरिम कुछ देर तक मेरी बात सुनकर सोचते रहे। फिर बोले, ‘ बात तो तुम्हारी किसी हद तक सही है, लेकिन इसके बावजूद अपराधिस्तान बनकर रहेगा। मेरा बीस साल का सपना यों ही नहीं टूट सकता।’ इतना कहकर उस्ताद झटके से उठे और बिना चाय पिये चलते बने।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1588059914195644808-6874849663375491786?l=katarbyont.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katarbyont.blogspot.com/feeds/6874849663375491786/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6874849663375491786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1588059914195644808/posts/default/6874849663375491786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katarbyont.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='डंडा बरसाने को बढ़ जाएगी पुलिस'/><author><name>अशोक मिश्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10072193713359769596</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' 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