Wednesday, April 1, 2026

सुकरात बोले, मैं तो सबसे बड़ा अज्ञानी हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अपने ज्ञान का घमंड कभी नहीं करना चाहिए। विनम्रता और लोगों को अपने से उच्च मानना, सच्चे ज्ञानी की निशानी है। जो वास्तव में ज्ञानी होता है, उसे अपने ज्ञान का अभिमान कभी नहीं होता है। वह हमेशा लोगों की भलाई करता रहता है, लेकिन बदले में वह आभार व्यक्त कराना भी नहीं चाहता है। 

बात उस समय की है, जब यूनान में सुकरात के ज्ञान की दूर-दूर तक चर्चा थी। उन्हीं दिनों एक संत भी ऐसे थे जो ज्ञानी थे और सुकरात उनकी बहुत प्रशंसा करते थे। एक दिन एक व्यक्ति उस संत के पास पहुंचा और संत से कहा कि महात्मा जी, मैं अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहता हूं। आप कोई ऐसी शिक्षा या ज्ञान दें जिससे मेरा जीवन बेहतर हो जाए। 

उस व्यक्ति बात सुनकर संत ने कहा कि भाई, मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूं। मैं आपको ज्ञान कैसे दे सकता हूं। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने आपका बहुत नाम सुना है। आपकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है और आप अपने को साधारण व्यक्ति बता रहे हैं। इस पर संत ने कहा कि यदि तुम सचमुच ज्ञान पाना चाहते हो, तो सुकरात के पास चले जाए। 

वह यूनान के सबसे ज्ञानी व्यक्ति हैं। वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुंचा। उसने सारी बात बताते हुए कहा कि वह जीवन को बेहतर बनाने का मंत्र सीखना चाहता है। इस पर सुकरात ने कहा कि जिस संत ने तुम्हें मेरे पास भेजा  है। वह कम से कम साधारण मनुष्य तो हैं। मैं साधारण मनुष्य भी नहीं हूं। मैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूं। वह व्यक्ति फिर संत के पास पहुंचा, तो संत ने कहा कि जब सुकरात जैसा ज्ञानी अपने को अज्ञानी कह रहा है, तो यह उनके ज्ञानी होने का प्रमाण है। यह सुनकर उस व्यक्ति ने इसे ही जीवन को बेहतर बनाने का पहला पाठ मान लिया।

सोशल मीडिया छीन रहा बच्चों की मानसिक ताकत और सुकून

अशोक मिश्र

वैसे तो सोशल मीडिया का अगर सदुपयोग किया जाए, तो यह बहुत ही कारगर साबित हो सकती है। विचारों के आदान-प्रदान के साथ-साथ सोशल मीडिया लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखने का बहुत सशक्त माध्यम है। लेकिन इसके दुरुपयोग के खतरे भी कम नहीं है। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। यह एक तरह से लत साबित होता जा रहा है जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास बाधित होता जा रहा है। 

हरियाणा के जिला अस्पतालों में अब ऐसे बहुत सारे मामले सामने आने लगे हैं जिनसे पता चलता है कि बच्चे एक लंबा समय सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं जिसके दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। राज्य के जिलों में जिला नागरिक अस्पतालों में आए बच्चों की समस्याओं को गंभीरता से जांचने के बाद पता चलता है कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने की वजह से उनका फोकस पढ़ाई से हट रहा है। 

वह जो कुछ स्कूल, कोचिंग या घर पर पढ़ रहे हैं, वह उन्हें याद नहीं हो रहा है। ज्यादातर बच्चे शारीरिक रूप से भले ही अपने क्लास में मौजूद हों, लेकिन दिमागी रूप से वह सोशल मीडिया पर ही होते हैं। यही वजह है कि उनके टीचर्स जो कुछ क्लास में पढ़ाते हैं, वह उनके भेजे में नहीं घुस रहा है। ऐसी अवस्था में उनकी याददाश्त भी प्रभावित हो रही है। 

बच्चे खुद भूलने की आदत से परेशान हैं, लेकिन वह सोशल मीडिया का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं। अपने बच्चों की ऐसी स्थिति देखकर पैरेंटस भी काफी परेशान हो रहे हैं। बच्चों की ऐसी स्थिति के लिए कई सामाजिक और पारिवारिक कारण जिम्मेदार हैं। अगर माता-पिता दोनों कामकाजी हैं या घर का वातावरण अशांत है, तो मां-पिता अपने बच्चों को मोबाइल में उलझाए रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं। घरों में रहने वाली महिलाएं भी अपने बच्चे को मोबाइल या लैपटॉप या डेस्कटॉप देकर अपने लिए थोड़ी देर का सुकून खोजने में लग जाती हैं। 

इसी का नतीजा है कि बच्चे अब सोशल मीडिया के आदी होते जा रहे हैं। बच्चे बाहर जाकर खेलने कूदने की जगह घर में ही रहकर सोशल मीडिया पर ही अपने लिए मनोरंजन तलाश रहे हैं। पहले बच्चे अपना ज्यादातर समय गली-मोहल्लों और पार्कों में खेलते-कूदते बिताते थे जिसकी वजह से वह मानसिक और शारीरिक रूप से ज्यादा मजबूत रहते थे। वह स्कूल में भी अच्छा प्रदर्शन करते थे। 

लेकिन आज के हालात में जब स्कूल और घर में बच्चों को बेवजह डांटा-फटकारा जाता है, तो वह तनावग्रस्त हो जाते हैं। उस तनाव से मुक्ति पाने के लिए बच्चे सोशल मीडिया पर समय बिताना उचित समझते हैं। यदि अपने बच्चों का भविष्य सुधारना है, तो सबसे पहले अभिभावकों, अध्यापकों को बच्चों से संवाद कायम करना होगा। उनकी समस्याओं को समझना होगा। उनकी दूसरे बच्चों से तुलना बंद करनी होगी, तभी वह सोशल मीडिया के जंजाल से मुक्त होंगे।