Monday, February 27, 2012

मीका को भिजवाऊंगी कालापानी: राखी सावंत

पिछले सप्ताह बॉलीवुड की बिंदास और बोल्ड हीरोइन राखी सावंत अपने अजीज मित्र के विवाह समारोह में भाग लेने दिल्ली आईं। समारोह में देश के कई नामी-गिरामी सांसद, मंत्री, सामाजिक कार्यकर्ता और साधु-संत भी आमंत्रित थे। वर-वधू को आशीर्वाद देने पहुंचने वालों में योग गुरु रामदेव, गांधीवादी समाज सेवी अन्ना हजारे और प्रसिद्ध गायक मीका भी थे। इस अवसर पर अशोक मिश्र ने फाल्गुन महीने के मद्देनजर राखी सावंत से कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत की। पेश हैं बातचीत के कुछ प्रमुख अंश।

आपकी नजर में देश की प्रमुख समस्या क्या है? गरीबी, बेकारी, भुखमरी या फिर कुछ और?
-(मादक अंगड़ाई लेती हुई) मेरी नजर में सबसे प्रमुख समस्या है हमारे युवाओं में बढ़ती नपुंसकता। देश में जिधर भी नजर डालती हूं, मुझे एकाध छोड़कर कोई मर्द नजर नहीं आता है। इसका प्रमाण अगर आपको चाहिए, तो आप दैनिक अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों को ही ले सकते हैं। इन विज्ञापनों को देखकर आपको भी लगता होगा कि कहीं पूरा देश ही नपुंसक तो नहीं हो गया है! आप ही बताइए, दुनिया के किसी और देश के अखबारों में क्या ऐसे विज्ञापन छपते हैं और वह भी इतनी मात्रा में? मैं तो दुनिया के लगभग हर देश में गई हूं। वहां के अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को देखा है, इक्का-दुक्का को छोड़कर अन्य अखबारों में इन विज्ञापनों की इतनी भरमार नहीं होती है।
आपकी नजर में वे एकाध मर्द कौन हैं? उनके नाम का खुलासा करेंगी?
-देखिए, इस बात को मैं ‘आफ द रिकार्ड’ तो बता सकती हूं, लेकिन ‘आन द रिकार्ड’ बताना मेरे लिए संभव नहीं है। इस देश के पहले मर्द तो अन्ना हजारे हैं, दूसरे अपने योग गुरु हैं, तीसरे इमरान हाशमी हैं। (पाठकों, आपके लिए भी यह ‘आफ द रिकार्ड’ ही है।)
अगर आपको देश का सांस्कृतिक राजदूत तय करने का अधिकार दे दिया जाए, तो आप किसे मौका देंगी?
-इस मामले में मैं थोड़ी उदार हूं। सांस्कृतिक राजदूत किसी एक की जगह महाद्वीपीय आधार पर मैं यह नियुक्ति करूंगी। अब जैसे संयुक्त राष्ट्र के लिए सनी लियोन से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता है। अफ्रीकी देशों के लिए बहन मल्लिका शहरावत ठीक रहेंगी। यूरोपीय देशों की सांस्कृतिक राजदूत एशियाई मूल की वीना मलिक को बनाकर देखिए, इन देशों की जनसंख्या विस्फोट जैसी समस्या चुटकी बजाते ही हल होती है या नहीं। एक ‘खास’ संस्कृति का प्रचार-प्रसार इतनी तेजी से होगा कि लोगों को कुछ सोचने और करने का मौका ही नहीं मिलेगा। वैश्विक सांस्कृतिक राजदूत का पद मैं अपने पास ही रखना चाहूंगी। इसके लिए मुझे अपने से बेहतर कोई दूसरा नहीं दिखता है। (थोड़ी देर बाद) अरे मैं तो पूनम पांडे को तो भूल ही गई। पूनम पांडे को मैं हर विदेशी दौरे पर भारतीय क्रिकेट टीम के साथ भेजूंगी ताकि टीम का मनोबल बना रहे।
अगर आपको किसी दो को काले पानी भेजने को कहा जाए, तो आप यह सौभाग्य किसे प्रदान करेंगी?
-फर्स्ट आफ आल तो मैं पंजाबी गायक मीका को कालापानी भिजवाऊंगी। दूसरी हैं मलाइका अरोड़ा खान।
इन दोनों पर यह कृपा क्यों?
-(शर्माने की कोशिश करती हुईं) पहली बात तो यह है कि मीका को ठीक से ‘चुम्मा’ लेना नहीं आता है। उस बेवकूफ ने एक बार मेरा चुंबन लिया था। दो दिन तक मेरे होंठ सूजे रहे। अरे! उस नालायक को पहले से प्रैक्टिस करके मेरे पास आना चाहिए था। मलाइका अरोड़ा खान से मेरी पुरानी अदावत है। वह मेरे आइटम सांग पर गिद्ध जैसी नजर रखती है। अब देखिए न! फिल्म ‘दबंग’ में बदनाम मुझे होना था और बदनाम हो गई वह। अच्छा आप ही बताइए, यह मेरे साथ नाइंसाफी है या नहीं।
मीका की बात छोड़िए, लेकिन मलाइका अरोड़ा खान के छोटे-छोटे बच्चे हैं। अगर उन्हें कालेपानी भेज दिया गया, तो उनके बच्चों का क्या होगा? इस बारे में कुछ सोचा है?
-मैं हूं न! मैं दूंगी उन बच्चों को मां का प्यार। उन्हें पूरी जिंदगी मां की कमी नहीं खलेगी।
और उसके पति को?
-जब मेरी सेकेंड हैंड गाड़ियों में कोई रुचि नहीं है, तो फिर पति के मामले में मैं सेकेंड हैंड कैसे चूज कर सकती हूं। कुंवारे के नाम पर तो मैं स्वामी रामदेव को भी स्वीकार कर सकती हूं। चलिए छोड़िए इस मुद्दे को। कोई और बात करते हैं फिल्मी दुनिया से इतर। राजनीतिक सवाल करें। यह मेरा प्रिय विषय रहा है।
थोड़ी देर के लिए अगर यह मान लिया जाए कि किसी ऐसे द्वीप के अस्तित्व का पता चले जिस पर किसी भी देश का अधिकार न हो और वहां का राष्ट्राध्यक्ष आपको बना दिया जाए, तो किस गीत को वहां के राष्ट्रगीत का दर्जा देंगी?
-एक बहुत पुराना गाना है ‘लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए।’ इसी गीत को बचपन से सुन-सुनकर मैं जवान हुई थी। मेरी मम्मी बताती हैं कि यह गीत जब कहीं गाया या ग्रामोफोन पर बजता सुनाई देता था, तो मैं नाचने लगती थी। बड़ी होने पर मैं इस गीत को किसी कार्यक्रम में पेश करके बुजुर्गों को झूमने पर मजबूर कर देना चाहती थी। इस देश में ‘लो ब्लड प्रेशर’ के जितने भी वृद्ध पुरुष मरीज हैं, उनके सामने अगर यह गाना पेश कर देती, तो उनका रोग एक ही लटके-झटके में हमेशा के लिए दूर हो जाता। लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हो पाया। इससे पहले इस गीत की पैरोडी गाकर मलाइका अरोड़ा खान ने महफिल लूट ली। अब वह ऐसे मरीजों का इलाज कर रही है, लेकिन उसमें भी वह बात नहीं है, जो मेरे गाने में होता!
इस बार होली आप किसके साथ मनाने जा रही हैं?
-एवरग्रीन देवानंद साहब के साथ इस बार होली मनाने का प्रोग्राम फिक्स था, लेकिन बेचारे जन्नतनशीं हो गए। ले-देकर अब मीका ही बचा है। उसी को इस बार रंग-गुलाल लगाऊंगी।
युवाओं को होली पर कोई संदेश देना चाहती हैं?
-हां, वे होली को खूब मस्ती के साथ मनाएं। अपनी रोजमर्रा की दिक्कतों को ताख पर रखकर खूब पिएं, जितना वे पिएंगे, सरकार को उतना ही राजस्व मिलेगा। उसी राजस्व से देश का विकास होगा। हमें देश के विकास में अपना योगदान देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। युवाओं के लिए बस यही एक संदेश है।

माई नेम इज सनी...

अशोक मिश्र

इंद्रलोक में होलिकोत्सव की धूम मची हुई थी। ज्यादातर देवगण रंग और गुलाल से सराबोर थे। वातावरण में रंग, अबीर-गुलाल के साथ-साथ देव कन्याओं का यौवन भी छलका पड़ रहा था। इंद्रलोक में उपस्थित युवाओं के कदम ही नहीं, नेत्र भी बहक रहे थे। देव, गंधर्व, नाग और यक्ष कन्याओं को देख होरिहारों की टोली में से कोई मतवाला देव गा उठा, ‘नक्बेसर कागा ले भागा..अरे मोरा सैंया अभागा न जागा। उड़ि कागा मोरी बिंदिया पे बैठा..अरे बिंदिया पे बैठा। मोरे माथे का रस सब ले भागा...मोरा सैंया अभागा न जागा।’ मतवाले देव ने हाथ उठाकर कोरस गान के लिए भीड़ को ललकारा, लेकिन किसी ने साथ नहीं दिया। पवन देव, अग्नि देव और कामदेव इस हुड़दंग से अलग एक कोने में खड़े किसी गुप्त मंत्रणा में लीन थे। कामदेव के पृथ्वीवासी एक अनन्य भक्त ने पिछले दिनों अमेरिकी सुरा की एक पेटी भेंट की थी। कामदेव ने कुछ बोतलें होलिकोत्सव के लिए बचा रखी थीं। उसी सुरा को तीन खाली बोतलों में सोडा और पानी मिलाकर कामदेव ने अपने दोनों मित्रों को दे दिया था जिसे इन तीनों ने अपने कुर्ते की जेब में छिपा लिया था।

ये तीनों होलिकोत्सव में उपस्थित हुड़दंगियों की निगाह बचाकर बीच-बीच में एकाध घूंट मार लेते थे। देवराज इंद्र पिचकारी लिए दबे पांव अपनी प्रिय नृत्यांगना रंभा के पास पहुंचे और उसकी चोली पर दे मारी पिचकारी की धार। रंभा ने कटाक्ष भरे नयनों से पहले देवराज को निहारा और ‘डर्टी पिक्चर’ की विद्या बालन की तरह मटकती हुई बोली, ‘क्या देवराज! आपको होली खेलने का शौक तो बहुत है, लेकिन आपकी ‘पिचकारी’ में रंग ही नहीं है। ‘दो बूंद जिंदगी की’ की तरह थोड़ा-सा रंग उड़ेल कर ही संतोष कर लिया? पिचकारी में कम से कम इतना रंग तो हो कि मेरी चोली भीग जाए।’ यह देख देवराज के पुत्र जयंत ने गब्बर सिंह वाली स्टाइल में रंभा से कहा, ‘अरी ओ छमिया! तुझे रंग खेलने का बहुत शौक है, तो मेरे पास आ। मेरी ‘पिचकारी’ में रंग भी है और दम भी।’ देवराज पर हुए कटाक्ष को सुनकर देवगण ठहाका लगाकर हंस पड़े। बूढ़े देवराज खिसिया गए। हुड़दंगियों की भीड़ से हटकर देवराज ने ताली बजाई। तभी पवन, अग्नि, कामदेव और अश्विनी कुमार के साथ देवराज का सारथी मातलि प्रकट हुए। सुरा और क्रोध के चलते देवराज की जुबान लड़खड़ा रही थी, वे बोल नहीं पा रहे थे।

कामदेव बोले, ‘यह रंभा अपने को समझती क्या है? मर्त्यलोक में तो एक से बढ़कर एक सुंदरियां हैं।वे अगर यहां आ जाएं, तो अप्सराएं ही नहीं, देवी शती और रति भी उनके सौंदर्य के आगे पानी भरने लगेंगी।’ पवन देव ने कहा, ‘अगर मर्त्यलोक से किसी को बुलाना ही है, मल्लिका शहरावत, विद्या बालन, कैटरीना कैफ, मलाइका अरोड़ा और पाकिस्तानी नायिका वीना मलिक को बुलाइए। मेरी तो मर्त्यलोक में काफी पहुंच है। पिछले दिनों मैंने अपने एक दूत से एक सीडी मंगवाई थी। कसम से! क्या गजब की सीडी थी। सीडी की हीरोइन राजस्थान में नर्स थी। यदि उसका पुनर्जन्म न हुआ हो, तो उसे भी बुलाया जा सकता है।’ देवराज या अन्य कोई कुछ कहता कि तभी वातावरण में खड़ताल के साथ आवाज गूंजी, ‘नारायण.......नारायण...आप लोग भारतवंशी ‘सनी लियोन’ को भूल ही गए। क्या गजब का फीगर है? एकदम मस्त। बुलाना है, तो उसे बुलाइए।’ हवा में कुछ बवंडर सा उठा और जब यह साफ हुआ, तो सबने देखा कि शरीर पर ढेर सारा पेंट, कालिख, रंग, अबीर-गुलाल और कीचड़ से सने देवर्षि नारद झूम रहे हैं।

उन्होंने झूमते और आंखें मिचमिचाते हुए कहा, ‘नारायण..नारायण..सनी लियोन तो एकदम पटाखा है, क्या माल है नारायण... एक खास इंडस्ट्री की सबसे महंगी हीरोइन है। नारायण..नारायण....अगर वह इंडस्ट्री यहां लग जाए, तो मजा आ जाए।’ देवराज इंद्र ने सनी लियोन को होलिकोत्सव में सदेह पेश किए जाने का आदेश दिया। कुछ ही देर बाद अपने नाज-ओ-अदा के साथ सनी लियोन होलिकोत्सव में पेश हुईं। सनी लियोन को देखते ही सारे देवगण होली खेलने को ‘जोगीरा सररररररर’ गाते हुए उसकी ओर लपके। वह कुछ देर सोचती रही और फिर गाने लगी, ‘माई नेम इज सनी..सनी की जवानी। इफ यू डू हैंडसम पेमेंट, तो तेरे हाथ भी आनी। माई नेम इज सनी...।’ यह बोल सुनते ही देवगण पगला गए। अपने हाथों में इंद्रलोक की करंसी, स्वर्णाभूषण और हीरे लेकर सनी लियोन पर लुटाने लगे। थोड़ी ही देर में वातावरण काफी गर्म हो उठा। अव्यवस्था फैलती देख देवराज ने होलिकोत्सव के समाप्त होने की घोषणा के साथ लियोन को निजी कक्ष में तत्काल उपस्थित होने का आदेश दिया। इससे देवगणों में अंसतोष फैल गया और वे देवराज इंद्र के महल के सामने उग्र प्रदर्शन करने लगे। अंतत: मजबूर होकर देवराज को लाठीचार्ज और पूरे देवलोक में कर्फ्यू लगाने का आदेश देना पड़ा।

Tuesday, February 21, 2012

भ्रष्टाचार के ‘ब्लैक होल्स’

अशोक मिश्र
‘बड़े बाबू! अब क्या होगा? सुना है, सरकार ने भ्रष्टाचार को खत्म करने का पक्का निश्चय कर लिया है।’ नगर निगम दफ्तर में जूनियर क्लर्क बच्ची बाबू ने अपने सीनियर छैलबिहारी के सामने अपनी व्यथा प्रकट की। बड़े बाबू छैल बिहारी थोड़ी देर तक सामने पड़ी फाइलों को घूरते रहे। फिर बोले, ‘बच्ची बाबू! आप भी एकदम बच्चे बन जाते हैं कभी-कभी। भ्रष्टाचार सनातनी व्यवस्था है। यह सतयुग, त्रेतायुग और द्वापर में फलता-फूलता रहा है। तुम ‘हनुमान चालीसा’ तो रोज गाकर पढ़ते हो। तुमने शायद ध्यान नहीं दिया, हनुमान चालीसा में तो साफ लिखा है, ‘होत न आज्ञा बिन पैसारे।’ यह शब्द ‘पैसारे’ वास्तव में ‘पैसा रे’ है। कबीरदास का रहस्यवाद तुमने पढ़ा है? तुम अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे हो, इसीलिए तुम ‘पैसा...पैसा’ करते रहते हो। मैं तो साहित्य का विद्यार्थी रहा हूं। कबीरदास का रहस्यवाद मैंने खूब समझा है। रहस्यवादी कबीरदास ने अपने एक दोहे में कहा है, ‘साहब ते सब होत हैं, बंदे ते कछु नाहि। राई ते पर्वत करे, पर्वत राई माहि।’ इसका मतलब समझते हो? कबीरदास जी कहते हैं कि यदि साहब को पर्याप्त उत्कोच (रिश्वत) मिल जाए, तो वे असंभव काम को भी चुटकी बजाते ही संभव बना देते हैं। बच्ची बाबू! जब यह उत्कोच की सनातनी व्यवस्था तीनों युग में नहीं बदली, तो वह कलियुग में कैसे बदल जाएगी? और फिर तुम ही सोचो। भ्रष्टाचार बिना यह दुनिया कितनी फीकी-फीकी और बेरंग हो जाएगी। अगर सूखी तनख्वाह पर ही काम चलाना होता, तो हम अपने बेटे-बेटियों को इतनी भारी-भरकम फीस देकर महंगे स्कूल-कालेजों में क्यों पढ़ाते? हम सभी यही सोचकर बेटे-बेटियों की पढ़ाई में इन्वेस्ट करते हैं कि एक दिन हमारे बेटे-बेटियां इन्वेस्ट की गई रकम का पचास-साठ गुना कमाकर हमारा घर भरेंगे। अगर ऊपरी कमाई का जरिया ही खत्म हो गया, तो हम अपने बाल-बच्चों को कान्वेंट स्कूलों में कैसे पढ़ा पाएंगे? फिर इस दुनिया में जीने का चार्म ही खत्म हो जाएगा। हम सौ बरस तक जीने की कामना ही क्यों करेंगे।’ छैल बिहारी की बात सुनकर बच्ची बाबू को थोड़ी राहत मिली। वे बोले, ‘वही तो...मैं कहूं कि यह चमत्कार सरकार कैसे कर सकती है। कल प्रधानमंत्री अपने भाषण में कह रहे थे कि भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए सरकार सख्त से सख्त कानून लाएगी। सच बताऊं बड़े बाबू। मैं तो डर ही गया था। आज एक प्रॉपर्टी की डीलिंग में बाइस लाख मिलने हैं। आप सब को हिस्सा देने के बाद मेरी झोली में साढ़े तीन लाख आएंगे। मैंने तो सोच भी लिया है कि इसका क्या करूंगा? बहुत दिनों से बीवी स्वीटजरलैंड जाने की जिद कर रही थी। सोचता हूं, इस बार लगा ही आऊं टूर।’
छैल बिहारी ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘बच्ची बाबू! आप भी ‘ब्लैक होल’ के दर्शन करने जाना चाहते हैं। हो आइए, बड़ी अच्छी जगह है। हमारे देश के नेता, मंत्री, विधायक अपनी ब्लैक मनी को उसी ब्लैक होल में डालकर चैन की वंशी बजा रहे हैं। मैं भी दो बार जा चुका हूं।’ बच्ची बाबू ने चौंकते हुए कहा, ‘क्या मतलब? मैं कुछ समझ नहीं पाया।’ बड़े बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘बच्ची बाबू! स्वीटजरलैंड के बैंक हम भ्रष्टाचारियों के लिए पृथ्वी पर बने छोटे-मोटे ‘ब्लैक होल’ के समान हैं। ब्लैक होल जानते हो न! अंतरिक्ष में पृथ्वी से करोड़ों गुना बड़े-बड़े होल्स को ब्लैक होल कहते हैं, जिसमें अगर हमारे सूरज से भी कोई बड़ा तारा समा जाए, तो उसका पता नहीं चलेगा। स्वीटजरलैंड के बैंकों में चाहे जितना पैसा ले जाओ, सब कुछ ब्लैक होल की तरह हजम। सरकार चाहे जितना सिर पटक ले, जो कुछ स्वीटजर बैंकों में समा गया, उसका बाहर निकलना असंभव है।’
बडेÞ बाबू की बात सुनकर बच्ची बाबू झेंप गए। बोले, ‘अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो बस ऐसे ही घूमने जाने की सोच रहा हूं। मेरे पड़ोस में रहने वाले धनीराम पिछले दिनों स्वीटजर लैंड हो आए हैं। वहां की रंगीनियों का जो खाका उन्होंने खींचा है, उससे मेरा मन भी थोड़ा रंगीन हो चला है। उसी रंगीनी का स्वाद चखने जाना चाहता हूं।’ इसके बाद दोनों काफी देर तक हंसते रहे।

Friday, February 17, 2012

अथ श्री जूता-चप्पल पुराण

-अशोक मिश्र

चप्पल या जूता आपको एक सामान्य सा शब्द लगता होगा, लेकिन अगर आप गौर करें, तो यह शब्द मानव सभ्यता के विकास की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ नजर आएगा। संस्कृत में इसे पदत्राणकहते हैं। इसका अर्थ पैरों को मुसीबत से मुक्ति दिलाने वालाहै। किंवदंती है कि एक बार देव और दानव अपना पुश्तैनी वैर-ाव ुलाकर जगतपिता ब्रह्मा के पास पहुंचे और कहा, ‘गवन! शिकार करते या कहीं आते-जाते हम लोगों के पैर कंटीली झाड़ियों और पत्थरों के चलते घायल हो जाते हैं। इसके चलते हमें काफी पीड़ा होती है। आप इसका कोई उपाय करें, ताकि इस परेशानी से मुक्ति मिले।ब्रह्मा ने पलर विचार करने के बाद कुटीर और लघु उद्योग मंत्रालय का काम-काज देख रहे विश्वकर्मा जी को तत्काल ब्रह्म लोक में उपस्थिति होने का एसएमएस भेजा। एसएमएस पाते ही पुष्पक एयरलाइंसके सबसे तेज गति वाले वायुयान पवनसे वे ब्रह्मलोक पहुंचे। पहुंचते ही उन्होंने देवों और दानवों को पद पीड़ा से कराहते पाया। उन्हें देखते ही ब्रह्मा ने रोष रे स्वर में कहा, ‘जल्दी ही इन लोगों के लिए किसी पदत्राण की व्यवस्था करो।कहते हैं कि विश्वकर्मा ने सबसे पहले बेल में काफी दिनों तक लगी रहने से पक गई तोरई (बियाड़ हो चुकी) को दबाने के बाद अंगूठे के पास छेद चप्पलनुमा पदत्राण तैयार किया। इसे पहनने के बाद देव-दानवों को काफी राहत महसूस हुई। अब वे चपलता से शिकार और आपसी युद्ध में रत रहने लगे। उनकी चपलता (गति) में वृद्धि हो जाने के कारण कालांतर में यह चप्पलकहलाया। बाद में चप्पल बनाने की कला में और निखार आता गया। नए-नए प्रयोग किए जाने लगे। चप्पल को बनाने में भिन्न-भिन्न कालों में तोरई, काठ और चमड़े से लेकर गटापारचा (प्लास्टिक) तक का प्रयोग होता रहा। बाद में इसका उपयोग एकदूसरे के सिर पर बजाने में होने लगा। इससे एक नया शब्द हिंदी साहित्य को मिला और वह था जूतम-पैजार।

ी दो साल पहले पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में प्राचीनकाल का एक जूता मिला है। इतिहासकारों को मत है कि यह सिंधुघाटी सभ्यता काल का है। उस जूते के पास पाए गए एक शिलालेख को डिकोड (ाषा को पढ़ने) करने से पता चला कि वह एक विष्यवाणी है। उसमें कहा गया है कि कलिकाल (कलियुग) में एक समय ऐसा आएगा, जब मनुष्य इसका उपयोग अपने पैरों की सुरक्षा के साथ-साथ राजनीतिक उपयोग ी करेगा। किसी नेता या मंत्री पर जूता फेकने की शुरुआत ईराक का एक पत्रकार करेगा, बाद में इसका व्यापक प्रचार-प्रसार आर्यावर्त (ारत) में होगा। घोर कलयुग में गांधीवादी नेता और समाजसेवी अन्ना हजारे, कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी, ाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और योग गुरु बाबा रामदेव जैसे अन्य कई विूतियों पर पदत्राण फेंके जाएंगे जिससे उनकी लोकप्रियता में वृद्धि होगी। वाकई, उस युग के लोग महान विष्य दृष्टा थे। उनमें विष्य को देखने, पढ़ने और समझने की शक्ति थी। नहीं तो, आप ही सोचिए, जो घटनाएं आज घटित हो रही हैं, उसका उल्लेख उस शिलालेख में कैसे संव हो पाया। शिलालेख में दर्ज है कि जिस नेता, समाजसेवी या मंत्री पर जूते-चप्पल फेंके जाएंगे, वह अपने को धन्य मानेगा। ले ही वह मीडिया के सामने निंदा करे, लेकिन उसका दिल गार्डेन-गार्डेन (बाग-बाग) होता रहेगा। कोई ी व्यक्ति जूता या चप्पल फेंकने वाले के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना चाहेगा क्योंकि जूते या चप्पल का प्रक्षेपण उनके राजनीतिक जीवन के लिए संजीवनी का काम करेगा। कई नेता और अधिकारी तो इसी कुंठा में दुबले होते रहेंगे कि पता नहीं, उनका नंबर कब आएगा। कहने का मतलब है कि जूते या चप्पल का प्रक्षेपण व्यक्ति, नेता, राजनीतिक दल और साधु-संतों की लोकप्रियता का पैमाना हो जाएगा। तो पाठकों, आपका क्या विचार है। हो जाए एक बार फिर जूतम पैजार।

Thursday, February 9, 2012

खबरदार! जो वेलेंटाइन डे पर विश किया

अशोक मिश्र

मैं लगग बारह-तेरह साल की उम्र में ही पंडितहो जाना चाहता था। तब मैं छठवीं या सातवीं कक्षा में था। स्कूल के अध्यापक-अध्यापिकाओं से पढ़ाई को लेकर रोज पिट जाता था। अध्यापक-अध्यापिकाएं पीटते समय अकसर कहा करती थीं,‘नालायक, पढ़ने-लिखने पर ध्यान देने की बजाय फालतू कामों में लगा रहता है। पता नहीं कहां से र्ती हो गया है इस स्कूल में।मेरी सहपाठिनें मेरे पंडित होने के प्रयास से परेशान रहती थीं। गाहे-बगाहे इन सहपाठिनों के कुछ हो चुके या होने वाले पंडितोंसे मारपीट हो जाती थी। दबंग या मुझसे ऊंची क्लास में पढ़ने वाली लड़कियों को हाथों तो कई बार ठोंका जा चुका था। मेरे पंडित होने के प्रयास की शिकायतें ी यदा-कदा प्रिंसिपल या क्लास टीचर से हो जाती, तो उस दिन मेरी शामत आ जाती। री क्लास में लात-घूंसे खाकर ी वीरों (बेशर्म ी कह सकते हैं) की तरह हंसता रहता। जब स्कूल में दाल नहीं गली, तो मैंने अपने मोहल्ले में पंडित हो जाने के प्रयास शुरू किया। जब सनक ज्यादा हो चली, तो घर में ी शिकायतें आने लगीं। कामिनीं, कांति, कंचन, रामदुलारी अपनी मम्मी, पापा या ाइयों के साथ शिकायतों का पुलिंदा लेकर अम्मा के सामने आने लगी, तो लगने लगा कि मुझे अपने पांडित्य की पोटेंसी कुछ कम करनी होगी, वरना इया खाल खींचकर ूसा रने में देर नहीं लगाएंगे। लेकिन कहावत है न! कि एक बार बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी।

एक दिन मैं अनामिका के साथ पंडित होने का प्रयास कुछ ज्यादा ही कर गया। रोती हुई अनामिका घर पहुंची, तो उसके बाबा अनामिका को लेकर मेरे घर पहुंच गए। इया घर के बाहर ही बैठे थे। मेरी पेशी हुई। मैंने घिघियाते हुए कहा,‘मेरी क्या गलती है। कबीर के कहने पर ही पंडित होने का प्रयास कर रहा हूं।शेर की तरह इया दहाड़े, ‘कौन कबीर? वही कबीर जिसने तेरी किताब फाड़ी थी? अब तू उस शोहदे का साथ करने लगा है?’ ीतर से डरा हुआ मैं सोचने लगा कि यदि रो पड़ूं, तो शायद अपराध की सांद्रता कुछ कम हो जाए। बस फिर क्या था? आंखों से अश्रुधार बह निकली, ‘वो कबीर नहीं, किताब वाले कबीर।इया ने पूछा, ‘किताब वाला कौन-सा कबीर? तुम कहना क्या चाहते हो?’ मैंने कहा, ‘मेरी किताब वाले कबीर..कबीरदास। उन्होंने ही तो लिखा है कि पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित हुआ न कोय। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। मैं अपने किताब में लिखी कबीरदास की बात का अनुसरण करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं तो ढाई आखर पढ़ने की कोशिश अनामिका के साथ कर रहा था।इसके बाद आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या हुआ होगा। इया यह कहते हुए मुझ पर पिल पड़े, ‘अच्छा! तो तू इसीलिए पढ़ाई-लिखाई ताख पर रखकर छिछोरेपन पर उतारू हो गया है।इसके बाद इया ने अनामिका के बाबा को आश्वस्त किया कि आइंदा, ऐसी कोई हरकत इसने की, तो इसकी खाल खींच लूंगा।

मेरी समझ में न तो तब आया था, न अब आया है कि आखिर मेरी पिटाई आखिर क्यों होती थी। मैं तो कबीरदास, सूरदास जैसे दासों और संतों की शिक्षाओं का पालन ही तो कर रहा था। हमारे देश के ही नहीं, दुनिया र के महापुरुषों और साधु-संतों ने कहा है कि सबसे प्रेम करो। कबीरदास जी को इन लोगों से कई हाथ आगे बढ़कर प्रेम का ढाई आखर पढ़ने की ही सलाह देते हैं। वे तो दावे के साथ कहते हैं कि स्कूल-कालेजों में डिग्रियां लेने और मोटी-मोटी किताबें रटने और पढ़ने से कोई पंडित (विद्वान) नहीं होने वाला है। इसका सबसे सहज और सरल रास्ता यही है कि प्रेम ग्रंथ पढ़कर विद्वान हो जाया जाए। इसलिए अब अगर मैं अपनी सहपाठिनों, मोहल्ले की लड़कियों से प्रेम करता था, तो क्या गलत करता था? मेरी समझ में नहीं आता है कि लोग गुड़खाकर गुलगुलेसे परहेज क्यों करते हैं? एक ओर तो वे कहते हैं कि साधु-संतों की शरण में जाओ। उनकी शिक्षाओं को दिल में उतारो, उनका अनुसरण करो। अगर कोई किशोर उनकी शिक्षाओं पर अमल करे, तो उसकी ठुकाई कर दो। गवान कृष्ण ने ी तो सबसे प्रेम करने का संदेश दिया है। वे खुद ी तो आजीवन हजारों गोपिकाओं के साथ रास लीला रचाते थे। हमारे देश के आधुनिक संत-महात्मा अगर रासलीला रचाएं, तो कोई बात नहीं और अगर मैं किसी से प्रेम करूं, प्रेम का इजहार करूं, तो वह गलत है, पिटाई के योग्य है।

ला हो संत वेलेंटाइन और बाजारवादी शक्तियों का। शायद बाजारवादी शक्तियों ने हम लोगों की किशोरवस्था के दौरान होने वाली दिक्कतों और बाजार की जरूरतों को देखते हुए पहले वेलेंटाइन डे और फिर वीक को इतना प्रचारित कर दिया कि आज छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां अपने मां-बाप, ाई-बहन के सामने ी सीना ठोंककर पंडित हो रही हैं या होने की कोशिश करती हैं। उन्हें मेरी तरह अपने इया से पिटने की जरूरत नहीं रही। संत वेलेंटाइन की यही खूबी को युवाओं को ा रही है। हालांकि संत वेलेंटाइन और संत कबीरदास से पहले ही हमारे देश में मदनोत्सव मनाने की परंपरा रही है। उस युग में शायद गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज करने वाली रीति समाज में प्रचलित नही थी या फिर इन सब मामलों में सामाजिक नियम इतने कठोर थे कि उदारवादी लोगों ने तय किया होगा कि एक दिन विशेष युवाओं को छिछोरी हरकतें करने की छूट प्रदान की जाए। छिछोरापन करने की छूट के लिए महीना चुना गया फाल्गुन। फाल्गुन आता है, तो अपने साथ मस्ती, उमंग और शरारत साथ लाता है। बाद में लोगों ने विशेष छूट लेकर पूरे महीने को ही ऐसी हरकतों के लिए रिजर्व कर लिया। पोपले मुंह वाले बाबा ी नवविवाहिताओं के देवर लगने लगते हैं। कहा ी जाता है कि फागुन में बाबा देवर लागें। अब फाल्गुन और वेलेंटाइन वीक ने सजनी-सजनियों को बौरा दिया है। बचपन में पंडित होने के प्रयास में पिटने वाला मैं हर साल वेलेंटाइन डे से पूर्व और कई दिन बाद तक वेलेंटाइन की खोज में बौराया घूमता रहता था। इस साल सोचा था कि कोई न कोई वेलेंटाइन मिल ही जाएगी। लेकिन अफसोस है कि इस साल ी मुझ 42 साल के नवयुवक को किसी ने घास नहीं डाली। प्रपोज डे बीत गया, चॉकलेट डे कब आया और कब चला गया, पता ही नहीं चला। किस डे, हग डे जैसे तमाम डे मुझे ठेंगा दिखाकर चलते बने। थक-हारकर आज मैंने फैसला किया है कि मैं अपनी पुरानी वेलेंटाइन (घरैतिन) के साथ वेलेंटाइन डे मनाने उसके पास जा रहा हूं। खबरदार, जो किसी ने अब मुझे फोन या एसएमएस भेजकर वेलेंटाइन डे विश किया।

Tuesday, February 7, 2012

लूट-खसोट पार्टी का घोषणापत्र

अशोक मिश्र

उस्ताद मुजरिम ने गर्जना की, ‘प्यारे अपराधी साथियो! भाजपा, कांग्रेस, बसपा और सपा सहित पाव-पाव, छंटाक-छंटाक भर की पार्टियों ने अपने घोषणा पत्रों में दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और सवर्णों के हितों की बात की, उनके लिए कई तरह की घोषणाएं कीं। उन्हें तरह-तरह के सब्जबाग दिखाए। किसी ने लैपटॉप देने को कहा, तो किसी ने जाति और धर्म के नाम पर आरक्षण दिलाने की घुट्टी पिलाई। कोई उत्तर प्रदेश को स्वर्ग और दलितों को स्वर्गवासी बना देने का दम भर रहा है। छोटी-बड़ी सभी पार्टियों का घोषणा-पत्र आप उठाकर देख लें, प्रदेश की अस्सी फीसदी जनता के लिए लोकलुभावन वायदे हैं। हालांकि उन्हें पूरा नहीं होना है। लेकिन मैं अपने अपराधी भाइयों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि अगर आपने हमारे ‘अंतर्राष्ट्रीय लूट-खसोट मोर्चा’ के प्रत्याशियों को समर्थन दिया, उसे मौके पर रसद और चाकू से लेकर हैंडग्रेनेड और बम, पिस्तौल उपलब्ध कराते रहे, तो हम आपको पूरा प्रदेश खुलेआम चरने की छूट देंगे।’

उस्ताद मुजरिम लखनऊ में ‘अंतर्राष्ट्रीय लूट-खसोट मोर्चा’ की ओर से आयोजित जनसभा में बोल रहे थे। पिछले दिनों ही दिल्ली में तस्करों, हत्यारों, पॉकेटमारों, बलात्कारियों और गैरकानूनी कार्य करने वाले अपराधियों के दलों, गिरोहों को मिलाकर एक ‘अंतर्राष्ट्रीय लूटखसोट मोर्चा’ खड़ा किया गया था। इस मोर्चे ने उत्तर प्रदेश की ज्यादातर सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। मोर्चा ने सभी राजनीतिक पार्टियों के घोषणा-पत्र जारी हो जाने के बाद अपना घोषणा-पत्र जारी करने का फैसला लिया था। मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव मुजरिम ने घोषणापत्र जारी करने के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘हमें अच्छी तरह से मालूम है कि कुछ सीटों पर मतदान हो चुका है, लेकिन हम आपको यह आश्वस्त करना चाहते हैं कि विपक्षी चाहे जितना जोर लगा ले, लेकिन जीत हमारी होगी। प्रदेश की ज्यादातर सीटों पर हमारे प्रत्याशी जीतेंगे और हम देखना, एक दिन शान से सरकार बनाएंगे। जिन सीटों पर अपने मोर्चे के प्रत्याशी नहीं जीते, वहां भी प्रकारांतर से जीत अपनी ही होगी। ये दूसरे दलों में रहते हुए भी हमारे जैसे हैं।’

‘साथियो! हम वादा करते हैं कि अगर सूबे में हमारे मोर्चे की सरकार बनी, तो कट्टा, चाकू और देसी बम उद्योग को कुटीर उद्योग का दर्जा दिया जाएगा। इस उद्योग से जुड़े अपराधियों को उद्यमी मानते हुए उन्हें रियायती दरों पर ऋण, जमीन और मशीनें मुहैया कराई जाएंगी। हत्या और तस्करी के आरोपियों को मुकदमा लड़ने के लिए मुफ्त वकील की सुविधा मुहैया कराने के साथ पकड़े जाने से लेकर सजा खत्म होने तक पांच हजार रुपये मासिक पेंशन दी जाएगी।’ इतना कहकर उस्ताद मुजरिम सांस लेने के लिए रुके और फिर नारे लगाने वाले अंदाज में हाथ हवा में लहराते हुए बोले, ‘हमारी सरकार पॉकेटमारी, चाकूबाजी, राहजनी, भीड़ से बचने जैसी कला में नई पीढ़ी को पारंगत बनाने के लिए प्राइमरी से विश्वविद्यालय स्तर तक के कोर्स चलाएगी। इसमें विशेष निपुण छात्रों को स्कॉलरशिप भी दी जाएगी। हम देश-प्रदेश की अपराधी जनता को यह आश्वासन देते हैं कि हमारी सरकार पुलिस की भर्ती पर रोक लगाएगी, ताकि हमारे अपराधी साथी बेखौफ अपने काम को अंजाम दे सकें। साथियो, मेरा तजुर्बा है कि पुलिस बल के रहने का कोई फायदा वैसे भी नहीं है। यह हम अपराधियों को कम, गरीब और शरीफ जनता को ज्यादा सताती है। पुलिस व्यवस्था खत्म करने से हम अपराधियों के साथ-साथ आम जनता भी राहत की सांस ले सकेगी। इससे हमारी आमदनी भी बढ़ेगी, क्योंकि आम जनता से झटक कर जो भी लाते हैं, उसका आधे से ज्यादा हिस्सा पुलिस वाले झटक ले जाते हैं।

मित्रो! एक बात हम आप लोगों को साफ बता देते हैं, महिलाओं से छेड़छाड़ और उनके साथ दुष्कर्म करने वालों को हमारा मोर्चा कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। महिलाओं के सम्मान के साथ खिलवाड़ हमें स्वीकार नहीं है। हम अपराधियों के भी कुछ उसूल होते हैं।’ इतना कहकर उस्ताद मुजरिम ने सभा बर्खास्त कर दी।

Monday, January 23, 2012

भोजन-भजन करो भरि पेटा

अशोक मिश्र

किसी गांव में एक पंडित जी रहते थे। उनके कई यजमान सरकारी और गैर सरकारी विभागों में बड़े पदों पर विराजमान थे। मौका लगने पर ये थोड़ी-बहुत रिश्वत तो ले लेते थे, लेकिन रिश्वत के पीछे भागते नहीं थे। जब भी पंडित जी अपने यजमानों के यहां जाते, तो वे अपनी सामर्थ्य भर उनकी आवभगत करते और दक्षिणा देकर विदा कर देते। पंडित जी इसे बुरा भी नहीं मानते थे। एक दिन पंडित जी अपने घर के बाहर खटिया डाले सोच ही रहे थे कि आज किस यजमान के यहां जाऊं, तब तक एक व्यक्ति ने आकर उनके चरण स्पर्श किए और कहा, ‘पंडित जी, आज मेरे घर में सत्यनारायण भगवान की कथा है। कथा बांचने और गुरुमंत्र देने के लिए आपको बुलाने आया हूं।’

पंडित जी नए यजमान की महंगी गाड़ी देखकर काफी प्रसन्न हुए। उन्हें लगा कि आज सत्यनारायण भगवान की कृपा से अच्छी कमाई हो जाएगी। पंडित जी ने सबसे पहले यजमान के बारे में पूरी जानकारी जुटाई। गुरु जी को पता चला कि यजमान केंद्र सरकार के एक मलाईदार विभाग में क्लर्क है। काफी समय से वह उसी पद पर जमा हुआ है। जब भी उसके प्रमोशन की बात चलती, तो वह कुछ ले-देकर अपना प्रमोशन रुकवा देता। पंडित जी यजमान की गाड़ी में बैठकर उसके घर गए। आलीशान घर, बीस-पच्चीस तोले सोने और हीरे के जेवरात से लदी-फंदी उसकी घरवाली, विदेश से पढ़कर लौटे पुत्र-पुत्रियों को देखकर पंडित जी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक क्लर्क ‘राजा-महाराजा’ की तरह रह सकता है। पंडित जी ने प्रसन्न मन से सत्यनारायण की कथा बांची और भोजन के लिए बैठे। उसी समय यजमान और उसकी पत्नी ने पंडित जी से अनुरोध किया कि वे उसे गुरुमंत्र देकर उन्हें पक्का चेला बना लें। जैसे ही गुरुमंत्र की बात चली, पंडित जी का सत्य बोध जाग उठा। उन्होंने यजमान के कान में कहा,‘जो कोई सूक्ष्म करे आहारा, न बल घटे, न पाकै बारा। अर्थात् जो व्यक्ति रिश्वत रूपी आहार सूक्ष्म रूप (यानी कम मात्रा में) से ग्रहण करता है, उसका न तो आत्मबल घटता है, न ही उसके बाल पकते हैं (यानी, आत्मबल के चलते वह जल्दी बूढ़ा नहीं होता।)’

नए शिष्य बने यजमान ने पूरी तरह से भक्तिभाव से इस तत्व को ग्रहण किया और उसी दिन से रिश्वत आदि लेना बंद कर दिया। इस घटना को छह महीने बीत गए। एक दिन पंडित जी ने सोचा कि चलो, अपने नए शिष्य का हाल-चाल ले आएं। उसके घर पहुंचे, तो सब कुछ उनकी आशा के विपरीत था।

पता चला कि रिश्वतखोरी बंद करते ही उनके विभाग के दूसरे भ्रष्ट अधिकारियों ने उसके खिलाफ जांच आयोग बिठाकर उसे जेल भिजवा दिया था। कुछ ही दिन पहले वह जेल से जमानत पर छूटा था। इस चक्कर में उसकी सारी जमापूंजी भी खर्च हो गई। पंडित जी को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा, ‘अरे बेवकूफ! मैंने तुम्हें सूक्ष्म रूप से रिश्वत ग्रहण करने को कहा था, बिल्कुल बंद करने को नहीं। अच्छा सुनो! मैं तुम्हें एक नया गुरुमंत्र देता हूं-भोजन भजन करो भरि पेटा, नाहीं तो मरि जैइहो बेटा! इस मंत्र का निहितार्थ यह है कि रिश्वत को भोजन बनाकर अपने वरिष्ठ अधिकारियों का खूब भजन (यानी गुणगान) करो। यदि ऐसा नहीं किया, तो एक तो तुम्हारे अधिकारी तुम्हें चैन से जीने नहीं देंगे।

दूसरे, रिश्वत न लेने पर ऐश्वर्यविहीन होने की कुंठा पालने से होने वाले उच्च रक्तचाप के चलते तुम शीघ्र ही इस दुनिया से विदा हो जाओगे।’ यह गुरु मंत्र सुनते ही यजमान ने लपककर पंडित जी के चरणस्पर्श किए और बोला, ‘क्या गुरु जी! आपको यही गुरुमंत्र पहले देना था न! बेकार में इतनी जिल्लत सही। अधिकारियों की आंख में खटका, सो अलग।’ इतना कहकर उसने पंडित जी को काफी दान-दक्षिणा देकर विदा किया। कुछ दिन बाद पंडित जी को पता चला कि उनका यह शिष्य पहले की तरह नौकरी पाकर ऐश्वर्यवान हो गया है।

Saturday, January 21, 2012

पूंजीवादी संसदीय चुनाव एक धोखा है

उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की अधिघोषणा हो चुकी है। छोटी-बड़ी सभी पार्टियां अधिक से अधिक सीटें हासिल करने के लिए दलीय जोड़-तोड़ की कवायद में लगी हैं। इस आपाधापी के बीच एक ऐसी पार्टी भी मैदान में उतरी है, जो बेहिचक मतदाताओं से अपील करने जा रही है कि यदि वे उसकी विचारधारा से सहमत हों, तो सक्रिय सहयोग करें। यदि सहमत न हों, तो कृपया मत देकर भ्रमित न करें। यह पार्टी है, भारत की क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी आरएसपीआई (एमएल), जिसने उत्तर प्रदेश में एक दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों से अपने प्रत्याशी खड़े करने का निर्णय लिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री आनंद प्रकाश मिश्र के इलाहाबाद आगमन पर रीतेश श्रीवास्तव ने उनसे विस्तृत वार्ता की। पेश हैं प्रमुख अंश

विधानसभा के इस चुनाव में आपकी पार्टी की क्या भूमिका होगी?
पिछले चुनाव की भांति इस बार भी पार्टी उत्तर प्रदेश के लगभग एक दर्जन प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों से अपने प्रत्याशी खड़े कर रही है। पार्टी प्रत्याशी न तो मतदाताओं से वोट की भीख मांगेंगे, न कोई चुनावी वादे करेंगे और न ही हम किसी राजनीतिक पार्टी या मोर्चे से गठबंधन करेंगे।
आपकी पार्टी तो संसदीय चुनावों को आमजनों के लिए धोखा बताती है, फिर प्रत्याशी क्यों?
जी हां, हमारी पार्टी की स्पष्ट मान्यता है कि जब तक पूंजीवादी व्यवस्था कायम रहेगी, पूंजी की सत्ता रहेगी, तब तक इन चुनावों से श्रमिक, शोषितजनों का हित पूरा होना संभव नहीं। पूंजी के ही हित पूरे होंगे।
क्रांति से आपका क्या मतलब है?
देखिए, क्रांति का अर्थ खून-खराबा, रक्तपात या जातीय-व्यक्तिगत हिंसा नहीं है। जैसा कि कुछ माओवादी संगठन समझते-करते हैं। क्रांति का अर्थ भी शहीद भगत सिंह ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि मौजूदा पूंजीवादी आर्थिक सामाजिक राजनीतिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन जरूरी है। मौजूदा पूंजीवादी आर्थिक ढांचे में सारा सामाजिक उत्पादन मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसे बेचकर मुनाफा कमाने के लिए होता है। हमारा उद्देश्य ठीक इससे उलट ऐसे आर्थिक ढांचे का निर्माण करना है, जिसमें समाज का सारा उत्पादन मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए हो।
क्या यह संभव है?
यह संभव-असंभव की बात नहीं है। क्योंकि समाज को आगे ले जाने का यही एकमात्र मार्ग है। विश्व की पूंजीवादी ताकतों ने तमाम षडयंत्रों से आज इसी मार्ग को अवरुद्घ कर रखा है। जिसके कारण मानवीय जीवन की उपजी विकराल समस्याओं के चलते पूरा विश्व ही मिट जाने के कगार पर पहुंच गया है।
फिर क्रांति कब और कैसे होगी?
देखिए, क्रांति किसी व्यक्ति अथवा पार्टी के न तो चाहने मात्र से होती है और न ऊपर से थोपी जा सकती है। जैसा कि माओवादी नक्सलपंथी सोचते हैं। क्रांति तो राजनीतिक क्रियाशीलता की पराकाष्ठा होती है। इसके लिए आम श्रमिक शोषितजन खासतौर पर मजदूर वर्ग के बीच क्रांतिकारी समाजवादी चेतना को ले जाना होगा। श्रमिक शोषितजन आंदोलन के साथ समाजवादी चेतना को जोड़ना होगा। यही काम हमारी पार्टी पूरी दृढ़ता के साथ कर रही है और इसलिए वह चुनाव के दौरान प्रत्याशी भी खड़ा करती है, न कि झूठे वादे कर चुनाव जीतने के लिए।
इस चुनाव में पार्टी के मुद्दे क्या होंगे?
पहला मुद्दा जाति, धर्म, वर्ण, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र, अगड़ा-पिछड़ा, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक आदि विघटनकारी समाजघाती प्रवृत्तियों के बल पर संचालित पूंजीवादी हिंसात्मक वर्ग, राजनीति-राजनीतिक षडयंत्रों का भंडाफोड़ करना है। मजदूर वर्ग में समाजवादी चेतना का प्रसार करना, जिससे उन का विकास संभव हो। राज्यों के विभाजन और कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी पार्टी अपना मुद्दा बनाएगी।
उत्तर प्रदेश को चार छोटे राज्यों मे बांटने का मुद्दा उठा है, उस पर आपका क्या कहना है?
हमारी पार्टी इसका प्रबल विरोध करेगी। क्योंकि बड़े राज्य को बांटकर छोटा राज्य बनाने से खेत खलिहान या कल-कारखाने नहीं बढ़ते। केवल नेताशाही-नौकरशाही बढ़ती है।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संदर्भ में आपकी पार्टी का क्या नजरिया है?
देखिए, यह आंदोलन मध्यमवर्गीय ताकतों द्वारा आम लोगों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटाने के लिए नियोजित किया गया है। कोई मनुष्य भ्रष्टाचारी और बेईमान होकर जन्म नहीं लेता। सब कुछ इसी समाज से ग्रहण करता है। अतएव इस सामाजिक राजनीतिक आर्थिक ढांचे को बदलकर ही इसकी बुराइयों को दूर किया जा सकता है। कानून बना देने से यदि अपराध खत्म हो जाते, तो हत्या, चोरी, डकैती जैसे अपराध कब के खत्म हो चुके होते। आतंकवाद, अराजकतावाद की तरह भ्रष्टाचार भी पूंजीवाद की उपज है।

Tuesday, January 17, 2012

चार गो भतार ले के लड़े 'सतभतरी'

अशोक मिश्र

कल सुबह-सुबह मुसद्दीलाल गली में खुली पंसारी की दुकान के सामने मिल गए। ठंड में भी वे पसीने-पसीने हो रहे थे। उनकी हालत देखकर मुझे ताज्जुब हुआ। मैंने पूछा, 'अमां मियां! किसी मैराथन दौड़ से भाग लेकर आ रहे हैं क्या? इस उम्र में इतनी भागदौड़ अच्छी नहीं होती।'

मेरी बात सुनकर सांस को काबू में करते हुए मुसद्दीलाल बोले, 'चाय पत्ती खत्म हो गई थी। उसे लेने आया था। आओ, घर चलकर चाय पीते हैं।' मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने घर की राह ली। घर में पहुंचकर बातचीत कब लोकगायक बालेश्वर के गीतों से जुड़ गई, पता ही नहीं चला। मुसद्दीलाल ने अचानक पूछ लिया, 'यार! बालेश्वर के एक गीत की लाइन है 'चार गो भतार ले के लड़े सतभतरी।' इसका क्या मतलब है। मैं कई दिनों से इस पर दिमाग खपा रहा हूं, लेकिन अर्थ है कि पकड़ में ही नहीं आ रहा है।'

मुसद्दीलाल के इस सवाल पर मैं ठिठक गया। बात ईरान की हो रही हो और कोई होनोलूलू के बारे में पूछ बैठे, तो किसी की भी बोलती बंद हो जाएगी। थोड़ी देर बाद मैंने समझाने का प्रयास किया, 'अगर इसका सीधा सादा राजनीतिक अर्थ निकाला जाए, तो यह है कि सात पतियों (यूपीए, एनडीए, वाम मोर्चा, तीसरा मोर्चा...जैसे गठबंधन) वाली सत्ता सुंदरी अपने चार पतियों को लेकर चुनाव मैदान में है। अब आपको तो यह मालूम ही है कि हमारे देश की सत्ता सुंदरी पिछले कुछ दशकों से एक भतारी (एक पार्टी की सरकार वाली) नहीं रह गई है। हर चुनाव के बाद कुछ पार्टियां गठबंधन बनाकर सत्ता सुंदरी के स्वामी बन जाते हैं। बाकी दल उसके प्रेमी की तरह सत्तारूढ़ दलों पर विभिन्न आरोप लगाकर संतोष कर लेते हैं।'

मुसद्दीलाल ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, 'क्या इसका यह मतलब है? मैं तो इसे गाली समझ बैठा था।'

'देखो मियां! अगर तुम 'भतार' शब्द से बिदक रहे हो, तो यह शब्द संस्कृत के 'भर्तार' यानी भरण-पोषण करने वाला (पति, स्वामी) से आया है। यह शब्द अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन इसका उपयोग अगर गाली देने में किया जाए, तो बुरा जरूर है। इसमें शब्द का कोई दोष नहीं है। अब अगर किसी महिला से यह कहा जाए कि उसके एक पति है, तो यह महिला के लिए गौरव की बात होगी। लेकिन उसे अगर सतभतरी (सात पतियों वाली) कहा जाए, तो यह निश्चित रूप से गाली है। आज देश के जो हालात हैं, उसमें राजनीति खुद एक गाली है। जिस देश में लोकतंत्र की आड़ में गुंडे, बदमाश, भ्रष्टाचारी, बलात्कारी और देश से विश्वासघात करने वाले चुनाव लड़कर सत्ता का सुख भोगते हों, वहां की जनता के लिए यह विडंबना किसी गाली से कम है क्या? अब देखिए न! पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, सभी सत्ता सुंदरी के स्वयंवर में जीतने की प्रत्याशा से मरे जा रहे हैं। वे हत्यारों, बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों को अपने साथ करने और उन्हें अपनी पार्टी का टिकट देकर जितवाने की हर संभ व कोशिश कर रहे हैं। एक भ्रष्ट और लुटेरी पार्टी का बदनाम मंत्री निकाले जाने पर दूसरी पार्टी में जाते ही दूध का धुला हो जाता है। ऐसे दौर में किसी सभ्य और ईमानदार व्यक्ति को नेता कह दीजिए, वह उसी तरह गुस्सा हो जाता है, जैसे उसे कोई भद्दी गाली दी गई हो।' मेरी इस बात से मुसद्दीलाल संतुष्ट हो गए और मैं चाय पीकर अपने घर चला आया।

Thursday, January 12, 2012

‘राग दरबारी’ को लेकर मलाल भी था

प्रख्यात उपन्यासकार एवं व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे। उपन्यास ‘राग दरबारी’ के माध्यम से ग्रामीण जीवन में आने वाली मूल्यहीनता को जिस प्रामाणिकता और साहस के साथ श्री शुक्ल जी ने उकेरा, वह अद्वितीय है। पिछले दिनों स्व. श्रीलाल शुक्ल जी को लखनऊ के एक अस्पताल में 45वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ज्ञानपीठ अकादमी से जुड़े प्रख्यात साहित्यकार और व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ से राष्ट्रीय साप्ताहिक ‘हमवतन’ के स्थानीय संपादक अशोक मिश्र ने बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...।

आप इन दिनों ज्ञानपीठ से जुड़े हुए हैं, इसलिए सबसे पहले स्व. श्रीलाल शुक्ल जी को दिए गए ज्ञानपीठ पुरस्कार से ही बात शुरू करते हैं। श्रीलाल जी को तब ज्ञानपीठ दिया गया, जब वे मरणासन्न हालत में थे। एक मरणासन्न युगदृष्टा साहित्यकार ऐसी हालत में न तो उस सम्मान से उत्साहित होकर कोई नवसृजन कर सकता है, न ही उस सम्मान का आनंद उठा सकता है। आपको यह सब कुछ गलत नहीं लगता है?

- आपका कहना बहुत हद तक सही है, लेकिन ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करने की एक अपनी प्रक्रिया है। ज्ञानपीठ प्रदान करने वाली समिति किसी एक ही भाषा के साहित्यकारों पर विचार नहीं करती है। सभी भाषा के मूर्धण्य साहित्यकारों को ध्यान में रखना पड़ता है। एक बार जब किसी भाषा के साहित्यकार को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाता है, तो उस भाषा के साहित्यकारों पर तीन साल तक विचार नहीं होता। वरिष्ठ साहित्यकार और व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल और वरिष्ठ कहानीकार अमरकांत जी को एक साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार इस बार इसीलिए दिया गया कि पता नहीं, अगली बार जब हिंदी भाषा के साहित्यकारों पर विचार हो और उस समय तक इन दोनों वरिष्ठ साहित्यकारों में से पता नहीं, कौन रहे और कौन न रहे। देखिए, आज श्रीलाल शुक्ल जी हम सबका साथ भी छोड़ गए।

क्या आपको नहीं लगता कि श्रीलाल शुक्ल जी या अमरकांत जी को ज्ञानपीठ देने में काफी देर हो गई?

- हिंदी भाषा में इतने अच्छे-अच्छे और कालजयी रचनाकार हैं कि उनके चयन में काफी देर हो जाती है। हां, यदि वरिष्ठ साहित्यकारों, अब श्रीलाल शुक्ल जी को ही उदाहरण लें, को अगर उन्हें कुछ साल पहले ज्ञानपीठ मिला होता, तो वे इसका सुख उठा सकते थे। आज से लगभग छह साल पहले जब श्रीलाल शुक्ल जी अस्सी साल के हुए थे, तभी से वे बीमार रहने लगे थे। कभी स्मृति लोप के शिकार हो जाते थे, तो कभी कोई दूसरी बीमारी हो जाती थी। यदि तभी उन्हें यह पुरस्कार मिल जाता, तो शायद अच्छा होता।

कहा जाता है कि श्रीलाल जी को तो पुरस्कार देने पड़े हैं। विभिन्न पुरस्कार देने वाली समितियां या संस्थाएं उन्हें सम्मानित करके अपना सम्मान बढ़ा गई हैं। आप इससे कितना सहमत हैं?

- ऐसी बात नहीं है। उनकी पहचान सिर्फ ‘राग दरबारी’ से ही नहीं है। अपनी पहली कृति ‘अंगद का पांव’ भी काफी चर्चित रही है। उनकी रचनाओं में भाषा और सरोकारों का जो लालित्य है, वह बेजोड़ है। तुलसी दास ने जीवनभर राम कथा कही, लेकिन ‘रामचरित मानस’ लिखकर उन्होंने जो हासिल किया, उसका कोई मुकाबला नहीं है। कोई पुरस्कार भी नहीं। जिस तरह तुलसी दास के ‘रामचरित मानस’, मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ का कोई साम्य नहीं है, उसी तरह श्रीलाल शुक्ल जी के ‘राग दरबारी’ का कोई साम्य नहीं है। यह व्यंग्य प्रधान उपन्यास लिखकर श्री शुक्ल जी ने जिन ऊंचाइयों को छू लिया था, वह अद्वितीय है। ‘राग दरबारी’ एक विलक्षण कृति है। उसमें ग्रामीण भारत का जो विवेचन हुआ है, वह अद्भुत है। अपने जीवनकाल में श्रीलाल शुक्ल जी ने बातचीत के दौरान कई बार इस बात पर खेद व्यक्त किया कि ‘राग दरबारी’ ने उनकी दूसरी कृतियों को दबा दिया। ‘मकान’, ‘विश्रामपुर का संत’ और ‘राग विराग’ जैसी रचनाओं की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी कि ‘राग दरबारी’ की हुई।

‘राग दरबारी’ का शिवपालगंज तो आज पूरे भारत में दिखाई देता है। देश के लगभग सभी गांवों की वही दशा है, जो लगभग 45-46 साल पहले लिखे गए व्यंग्य उपन्यास ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल जी ने ‘शिवपालगंज’ नामक गांव को दर्शाया था।

- दरअसल, श्रीलाल शुक्ल जी भविष्य दृष्टा थे। ‘राग दरबारी’ का शिवपालगंज ही नहीं, बल्कि वे सभी संस्थाएं, जिनका चित्रण श्री शुक्ल जी ने किया था, आज भी उसी रूप में दिखाई देती हैं। चाहे वह स्कूल-कालेजों की राजनीति और भ्रष्टाचार हो, मठों-मंदिरों को लेकर चल रही उठापटक हो या फिर राजनीतिक संस्थाओं का विकृत रूप, सभी पक्षों पर शुक्ल जी ने सम्यक दृष्टि डाली और उसका जैसे एक्सरे करके सबके सामने पेश कर दिया।

व्यंग्य लेखन क्षेत्र में कभी हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल की त्रयी काफी मशहूर थी। दुर्भाग्य से त्रयी के तीनों मजबूत स्तंभ ढह चुके हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि व्यंग्य क्षेत्र का सिंहासन आज खाली हो चुका है। उस सिंहासन का कोई वारिस दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है।

- देखिए, श्रीलाल शुक्ल जी के जाने के बाद एक रिक्तता तो जरूर आई है, लेकिन सिंहासन खाली होने जैसी बात नहीं है। पहले की तरह योजनाबद्ध और तैयारी करके व्यंग्य लिखने वाले साहित्यकार भी नहीं रहे। अखबारों में छिटपुट व्यंग्य लिखा जा रहा है, लेकिन इनमें लिखने वालों से कहा जाता है कि दो सौ-ढाई सौ शब्दों में लिखकर दीजिए। ऐसे में कोई क्या बढ़िया व्यंग्य लिखेगा! व्यंग्य पर भी एक व्यंग्य यह है कि आज का व्यंग्यकार ‘अटल जी के घुटने पर’, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के अनशन पर लिख रहा है। ऐसे व्यंग्यकारों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं। हरिशंकर परसार्इं जैसी विदग्ध दृष्टि, समाज और व्यंग्य की समझ, शरद जोशी जैसी चुटीली और पैनी भाषा आज के व्यंग्यकारों में दिखाई देती है क्या? व्यंग्य लिखने के लिए सबसे पहले साहस की जरूरत होती है। जब तक साहित्यकार में सच लिखने का साहस नहीं होगा, वह उच्च कोटि का साहित्यकार नहीं हो सकता। जहां तक व्यंग्य विधा की बात है, आज भी कुछ लोग अच्छा लिख रहे हैं। ज्ञान चतुर्वेदी, गोपाल चतुर्वेदी अच्छा लिख रहे हैं। दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया की कहानियों में व्यंग्य भरपूर है। ये साहित्यकार इसे एक अलग विधा के रूप में न अपनाकर कहानियों में ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। हां, कुछ लोग इसे एक विधा मानकर लिख रहे हैं।

एक बार बातचीत के दौरान राजनीतिक दलों के संदर्भ में श्रीलाल शुक्ल जी ने कहा था कि मैं सड़क के बीच कुछ कदम हटकर बार्इं ओर खड़ा हूं। इसको आप किस रूप में लेते हैं?

- हां, यह बात उन्होंने अखिलेश से हुई बातचीत में कही थी। यह बातचीत तद्भव में छपी भी थी। बात यह है कि वे कभी किसी लेखक संघ या संगठन से जुड़े तो नहीं रहे, लेकिन जनवादी विचारधारा से उनका जुड़ाव जरूर था। आज के समय में जो भी लिख रहा है, वह वाम ओरिएंटेड होगा ही। उसका वाम विचारधारा से जुड़ाव नैसर्गिक है। लेकिन यह भी सही है कि किसी पार्टी का कार्ड होल्डर हो जाने से कोई लेखक नहीं हो जाता है। यदि ऐसा होता, तो आज हर गली-कूचे में लेखक ही लेखक दिखाई देते।

श्रीलाल शुक्ल जी का सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य उपन्यास ‘राग दरबारी’ है, तो दूसरी तरफ ‘आदमी का जहर’ जैसा जासूसी उपन्यास भी। इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे?

- एक बार उनसे इस मुद्दे पर बातचीत हुई थी। श्री शुक्ल जी का कहना था कि ‘आदमी का जहर’ या ‘सीमाएं टूटती हैं’ जैसा उपन्यास मनहूसियत से मुक्ति पाने के लिए लिखे गए थे। वे कहते थे कि हिंदी साहित्यकारों की छवि ऐसी बना दी गई है कि वह जैसे कुछ और लिख ही नहीं सकता। ‘आदमी का जहर’ आप पढ़ें, तो उसमें भी किस्सागोई है। ‘राग दरबारी’ को सामने रखकर उनकी अन्य रचनाओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है।

अगर आप श्रीलाल जी के संपूर्ण साहित्य का गंभीर विवेचन करें, तो उसमें व्यक्ति, समाज और तंत्र किसी न किसी रूप में जरूर मौजूद है। इसके पीछे आप क्या कारण मानते हैं।

- संपूर्ण तंत्र को जिस तरह श्री लाल शुक्ल जी ने समझा, उनकी इस समझ की तारीफ करनी होगी। पहले आईपीएस और बाद में आईएएस अधिकारी होने के नाते भी तंत्र को उन्होंने बखूबी समझा। आज तंत्र या राजनीतिक भ्रष्टाचार पर लिखने वाले कितने लोग हैं और उनकी रचनाओं में कितनी गहराई है, यह सबके सामने है। लेकिन श्रीलाल शुक्ल जी यह समझते थे कि किसी गरीब व्यक्ति की अप्लीकेशन कहां-कहां अटकती है, कहां-कहां बिना कुछ लिए-दिए काम नहीं होगा? वे कुछ भी लिखने से पहले पूरी तैयारी करते थे, उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल करते थे, तब कहीं जाकर वे लिखना शुरू करते थे। संयोग से उनका जीवन भी इस पूरे तंत्र के एक अंग के रूप में बीता। इसका उन्होंने अपने लेखन में भरपूर उपयोग किया।