
Monday, February 27, 2012
मीका को भिजवाऊंगी कालापानी: राखी सावंत

माई नेम इज सनी...
Tuesday, February 21, 2012
भ्रष्टाचार के ‘ब्लैक होल्स’
Friday, February 17, 2012
अथ श्री जूता-चप्पल पुराण
-अशोक मिश्र
‘चप्पल या जूता आपको एक सामान्य सा शब्द लगता होगा, लेकिन अगर आप गौर करें, तो यह शब्द मानव सभ्यता के विकास की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ नजर आएगा। संस्कृत में इसे ‘पदत्राण’ कहते हैं। इसका अर्थ ‘पैरों को मुसीबत से मुक्ति दिलाने वाला’ है। किंवदंती है कि एक बार देव और दानव अपना पुश्तैनी वैर-भाव भुलाकर जगतपिता ब्रह्मा के पास पहुंचे और कहा, ‘भगवन! शिकार करते या कहीं आते-जाते हम लोगों के पैर कंटीली झाड़ियों और पत्थरों के चलते घायल हो जाते हैं। इसके चलते हमें काफी पीड़ा होती है। आप इसका कोई उपाय करें, ताकि इस परेशानी से मुक्ति मिले।’ ब्रह्मा ने पलभर विचार करने के बाद कुटीर और लघु उद्योग मंत्रालय का काम-काज देख रहे विश्वकर्मा जी को तत्काल ब्रह्म लोक में उपस्थिति होने का एसएमएस भेजा। एसएमएस पाते ही ‘पुष्पक एयरलाइंस’ के सबसे तेज गति वाले वायुयान ‘पवन’ से वे ब्रह्मलोक पहुंचे। पहुंचते ही उन्होंने देवों और दानवों को पद पीड़ा से कराहते पाया। उन्हें देखते ही ब्रह्मा ने रोष भरे स्वर में कहा, ‘जल्दी ही इन लोगों के लिए किसी पदत्राण की व्यवस्था करो।’ कहते हैं कि विश्वकर्मा ने सबसे पहले बेल में काफी दिनों तक लगी रहने से पक गई तोरई (बियाड़ हो चुकी) को दबाने के बाद अंगूठे के पास छेद चप्पलनुमा पदत्राण तैयार किया। इसे पहनने के बाद देव-दानवों को काफी राहत महसूस हुई। अब वे चपलता से शिकार और आपसी युद्ध में रत रहने लगे। उनकी चपलता (गति) में वृद्धि हो जाने के कारण कालांतर में यह ‘चप्पल’ कहलाया। बाद में चप्पल बनाने की कला में और निखार आता गया। नए-नए प्रयोग किए जाने लगे। चप्पल को बनाने में भिन्न-भिन्न कालों में तोरई, काठ और चमड़े से लेकर गटापारचा (प्लास्टिक) तक का प्रयोग होता रहा। बाद में इसका उपयोग एकदूसरे के सिर पर बजाने में होने लगा। इससे एक नया शब्द हिंदी साहित्य को मिला और वह था ‘जूतम-पैजार।’
अभी दो साल पहले पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में प्राचीनकाल का एक जूता मिला है। इतिहासकारों को मत है कि यह सिंधुघाटी सभ्यता काल का है। उस जूते के पास पाए गए एक शिलालेख को डिकोड (भाषा को पढ़ने) करने से पता चला कि वह एक भविष्यवाणी है। उसमें कहा गया है कि कलिकाल (कलियुग) में एक समय ऐसा आएगा, जब मनुष्य इसका उपयोग अपने पैरों की सुरक्षा के साथ-साथ राजनीतिक उपयोग भी करेगा। किसी नेता या मंत्री पर जूता फेकने की शुरुआत ईराक का एक पत्रकार करेगा, बाद में इसका व्यापक प्रचार-प्रसार आर्यावर्त (भारत) में होगा। घोर कलयुग में गांधीवादी नेता और समाजसेवी अन्ना हजारे, कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और योग गुरु बाबा रामदेव जैसे अन्य कई विभूतियों पर पदत्राण फेंके जाएंगे जिससे उनकी लोकप्रियता में वृद्धि होगी। वाकई, उस युग के लोग महान भविष्य दृष्टा थे। उनमें भविष्य को देखने, पढ़ने और समझने की शक्ति थी। नहीं तो, आप ही सोचिए, जो घटनाएं आज घटित हो रही हैं, उसका उल्लेख उस शिलालेख में कैसे संभव हो पाया। शिलालेख में दर्ज है कि जिस नेता, समाजसेवी या मंत्री पर जूते-चप्पल फेंके जाएंगे, वह अपने को धन्य मानेगा। भले ही वह मीडिया के सामने निंदा करे, लेकिन उसका दिल गार्डेन-गार्डेन (बाग-बाग) होता रहेगा। कोई भी व्यक्ति जूता या चप्पल फेंकने वाले के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना चाहेगा क्योंकि जूते या चप्पल का प्रक्षेपण उनके राजनीतिक जीवन के लिए संजीवनी का काम करेगा। कई नेता और अधिकारी तो इसी कुंठा में दुबले होते रहेंगे कि पता नहीं, उनका नंबर कब आएगा। कहने का मतलब है कि जूते या चप्पल का प्रक्षेपण व्यक्ति, नेता, राजनीतिक दल और साधु-संतों की लोकप्रियता का पैमाना हो जाएगा। तो पाठकों, आपका क्या विचार है। हो जाए एक बार फिर जूतम पैजार।
Thursday, February 9, 2012
खबरदार! जो वेलेंटाइन डे पर विश किया

अशोक मिश्र
मैं लगभग बारह-तेरह साल की उम्र में ही ‘पंडित’ हो जाना चाहता था। तब मैं छठवीं या सातवीं कक्षा में था। स्कूल के अध्यापक-अध्यापिकाओं से पढ़ाई को लेकर रोज पिट जाता था। अध्यापक-अध्यापिकाएं पीटते समय अकसर कहा करती थीं,‘नालायक, पढ़ने-लिखने पर ध्यान देने की बजाय फालतू कामों में लगा रहता है। पता नहीं कहां से भर्ती हो गया है इस स्कूल में।’ मेरी सहपाठिनें मेरे पंडित होने के प्रयास से परेशान रहती थीं। गाहे-बगाहे इन सहपाठिनों के कुछ हो चुके या होने वाले ‘पंडितों’ से मारपीट हो जाती थी। दबंग या मुझसे ऊंची क्लास में पढ़ने वाली लड़कियों को हाथों तो कई बार ठोंका जा चुका था। मेरे पंडित होने के प्रयास की शिकायतें भी यदा-कदा प्रिंसिपल या क्लास टीचर से हो जाती, तो उस दिन मेरी शामत आ जाती। भरी क्लास में लात-घूंसे खाकर भी वीरों (बेशर्म भी कह सकते हैं) की तरह हंसता रहता। जब स्कूल में दाल नहीं गली, तो मैंने अपने मोहल्ले में पंडित हो जाने के प्रयास शुरू किया। जब सनक ज्यादा हो चली, तो घर में भी शिकायतें आने लगीं। कामिनीं, कांति, कंचन, रामदुलारी अपनी मम्मी, पापा या भाइयों के साथ शिकायतों का पुलिंदा लेकर अम्मा के सामने आने लगी, तो लगने लगा कि मुझे अपने पांडित्य की पोटेंसी कुछ कम करनी होगी, वरना भइया खाल खींचकर भूसा भरने में देर नहीं लगाएंगे। लेकिन कहावत है न! कि एक बार बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी।
एक दिन मैं अनामिका के साथ पंडित होने का प्रयास कुछ ज्यादा ही कर गया। रोती हुई अनामिका घर पहुंची, तो उसके बाबा अनामिका को लेकर मेरे घर पहुंच गए। भइया घर के बाहर ही बैठे थे। मेरी पेशी हुई। मैंने घिघियाते हुए कहा,‘मेरी क्या गलती है। कबीर के कहने पर ही पंडित होने का प्रयास कर रहा हूं।’ शेर की तरह भइया दहाड़े, ‘कौन कबीर? वही कबीर जिसने तेरी किताब फाड़ी थी? अब तू उस शोहदे का साथ करने लगा है?’ भीतर से डरा हुआ मैं सोचने लगा कि यदि रो पड़ूं, तो शायद अपराध की सांद्रता कुछ कम हो जाए। बस फिर क्या था? आंखों से अश्रुधार बह निकली, ‘वो कबीर नहीं, किताब वाले कबीर।’ भइया ने पूछा, ‘किताब वाला कौन-सा कबीर? तुम कहना क्या चाहते हो?’ मैंने कहा, ‘मेरी किताब वाले कबीर..कबीरदास। उन्होंने ही तो लिखा है कि पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित हुआ न कोय। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। मैं अपने किताब में लिखी कबीरदास की बात का अनुसरण करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं तो ढाई आखर पढ़ने की कोशिश अनामिका के साथ कर रहा था।’ इसके बाद आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या हुआ होगा। भइया यह कहते हुए मुझ पर पिल पड़े, ‘अच्छा! तो तू इसीलिए पढ़ाई-लिखाई ताख पर रखकर छिछोरेपन पर उतारू हो गया है।’ इसके बाद भइया ने अनामिका के बाबा को आश्वस्त किया कि आइंदा, ऐसी कोई हरकत इसने की, तो इसकी खाल खींच लूंगा।
मेरी समझ में न तो तब आया था, न अब आया है कि आखिर मेरी पिटाई आखिर क्यों होती थी। मैं तो कबीरदास, सूरदास जैसे दासों और संतों की शिक्षाओं का पालन ही तो कर रहा था। हमारे देश के ही नहीं, दुनिया भर के महापुरुषों और साधु-संतों ने कहा है कि सबसे प्रेम करो। कबीरदास जी को इन लोगों से कई हाथ आगे बढ़कर प्रेम का ढाई आखर पढ़ने की ही सलाह देते हैं। वे तो दावे के साथ कहते हैं कि स्कूल-कालेजों में डिग्रियां लेने और मोटी-मोटी किताबें रटने और पढ़ने से कोई पंडित (विद्वान) नहीं होने वाला है। इसका सबसे सहज और सरल रास्ता यही है कि प्रेम ग्रंथ पढ़कर विद्वान हो जाया जाए। इसलिए अब अगर मैं अपनी सहपाठिनों, मोहल्ले की लड़कियों से प्रेम करता था, तो क्या गलत करता था? मेरी समझ में नहीं आता है कि लोग ‘गुड़’ खाकर ‘गुलगुले’ से परहेज क्यों करते हैं? एक ओर तो वे कहते हैं कि साधु-संतों की शरण में जाओ। उनकी शिक्षाओं को दिल में उतारो, उनका अनुसरण करो। अगर कोई किशोर उनकी शिक्षाओं पर अमल करे, तो उसकी ठुकाई कर दो। भगवान कृष्ण ने भी तो सबसे प्रेम करने का संदेश दिया है। वे खुद भी तो आजीवन हजारों गोपिकाओं के साथ रास लीला रचाते थे। हमारे देश के आधुनिक संत-महात्मा अगर रासलीला रचाएं, तो कोई बात नहीं और अगर मैं किसी से प्रेम करूं, प्रेम का इजहार करूं, तो वह गलत है, पिटाई के योग्य है।
भला हो संत वेलेंटाइन और बाजारवादी शक्तियों का। शायद बाजारवादी शक्तियों ने हम लोगों की किशोरवस्था के दौरान होने वाली दिक्कतों और बाजार की जरूरतों को देखते हुए पहले वेलेंटाइन डे और फिर वीक को इतना प्रचारित कर दिया कि आज छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां अपने मां-बाप, भाई-बहन के सामने भी सीना ठोंककर पंडित हो रही हैं या होने की कोशिश करती हैं। उन्हें मेरी तरह अपने भइया से पिटने की जरूरत नहीं रही। संत वेलेंटाइन की यही खूबी को युवाओं को भा रही है। हालांकि संत वेलेंटाइन और संत कबीरदास से पहले ही हमारे देश में मदनोत्सव मनाने की परंपरा रही है। उस युग में शायद गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज करने वाली रीति समाज में प्रचलित नही थी या फिर इन सब मामलों में सामाजिक नियम इतने कठोर थे कि उदारवादी लोगों ने तय किया होगा कि एक दिन विशेष युवाओं को छिछोरी हरकतें करने की छूट प्रदान की जाए। छिछोरापन करने की छूट के लिए महीना चुना गया फाल्गुन। फाल्गुन आता है, तो अपने साथ मस्ती, उमंग और शरारत साथ लाता है। बाद में लोगों ने विशेष छूट लेकर पूरे महीने को ही ऐसी हरकतों के लिए रिजर्व कर लिया। पोपले मुंह वाले बाबा भी नवविवाहिताओं के देवर लगने लगते हैं। कहा भी जाता है कि फागुन में बाबा देवर लागें। अब फाल्गुन और वेलेंटाइन वीक ने सजनी-सजनियों को बौरा दिया है। बचपन में पंडित होने के प्रयास में पिटने वाला मैं हर साल वेलेंटाइन डे से पूर्व और कई दिन बाद तक वेलेंटाइन की खोज में बौराया घूमता रहता था। इस साल सोचा था कि कोई न कोई वेलेंटाइन मिल ही जाएगी। लेकिन अफसोस है कि इस साल भी मुझ 42 साल के नवयुवक को किसी ने घास नहीं डाली। प्रपोज डे बीत गया, चॉकलेट डे कब आया और कब चला गया, पता ही नहीं चला। किस डे, हग डे जैसे तमाम डे मुझे ठेंगा दिखाकर चलते बने। थक-हारकर आज मैंने फैसला किया है कि मैं अपनी पुरानी वेलेंटाइन (घरैतिन) के साथ वेलेंटाइन डे मनाने उसके पास जा रहा हूं। खबरदार, जो किसी ने अब मुझे फोन या एसएमएस भेजकर वेलेंटाइन डे विश किया।
Tuesday, February 7, 2012
लूट-खसोट पार्टी का घोषणापत्र
Monday, January 23, 2012
भोजन-भजन करो भरि पेटा
Saturday, January 21, 2012
पूंजीवादी संसदीय चुनाव एक धोखा है

Tuesday, January 17, 2012
चार गो भतार ले के लड़े 'सतभतरी'
अशोक मिश्र
कल सुबह-सुबह मुसद्दीलाल गली में खुली पंसारी की दुकान के सामने मिल गए। ठंड में भी वे पसीने-पसीने हो रहे थे। उनकी हालत देखकर मुझे ताज्जुब हुआ। मैंने पूछा, 'अमां मियां! किसी मैराथन दौड़ से भाग लेकर आ रहे हैं क्या? इस उम्र में इतनी भागदौड़ अच्छी नहीं होती।'
मेरी बात सुनकर सांस को काबू में करते हुए मुसद्दीलाल बोले, 'चाय पत्ती खत्म हो गई थी। उसे लेने आया था। आओ, घर चलकर चाय पीते हैं।' मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने घर की राह ली। घर में पहुंचकर बातचीत कब लोकगायक बालेश्वर के गीतों से जुड़ गई, पता ही नहीं चला। मुसद्दीलाल ने अचानक पूछ लिया, 'यार! बालेश्वर के एक गीत की लाइन है 'चार गो भतार ले के लड़े सतभतरी।' इसका क्या मतलब है। मैं कई दिनों से इस पर दिमाग खपा रहा हूं, लेकिन अर्थ है कि पकड़ में ही नहीं आ रहा है।'
मुसद्दीलाल के इस सवाल पर मैं ठिठक गया। बात ईरान की हो रही हो और कोई होनोलूलू के बारे में पूछ बैठे, तो किसी की भी बोलती बंद हो जाएगी। थोड़ी देर बाद मैंने समझाने का प्रयास किया, 'अगर इसका सीधा सादा राजनीतिक अर्थ निकाला जाए, तो यह है कि सात पतियों (यूपीए, एनडीए, वाम मोर्चा, तीसरा मोर्चा...जैसे गठबंधन) वाली सत्ता सुंदरी अपने चार पतियों को लेकर चुनाव मैदान में है। अब आपको तो यह मालूम ही है कि हमारे देश की सत्ता सुंदरी पिछले कुछ दशकों से एक भतारी (एक पार्टी की सरकार वाली) नहीं रह गई है। हर चुनाव के बाद कुछ पार्टियां गठबंधन बनाकर सत्ता सुंदरी के स्वामी बन जाते हैं। बाकी दल उसके प्रेमी की तरह सत्तारूढ़ दलों पर विभिन्न आरोप लगाकर संतोष कर लेते हैं।'
मुसद्दीलाल ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, 'क्या इसका यह मतलब है? मैं तो इसे गाली समझ बैठा था।'
'देखो मियां! अगर तुम 'भतार' शब्द से बिदक रहे हो, तो यह शब्द संस्कृत के 'भर्तार' यानी भरण-पोषण करने वाला (पति, स्वामी) से आया है। यह शब्द अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन इसका उपयोग अगर गाली देने में किया जाए, तो बुरा जरूर है। इसमें शब्द का कोई दोष नहीं है। अब अगर किसी महिला से यह कहा जाए कि उसके एक पति है, तो यह महिला के लिए गौरव की बात होगी। लेकिन उसे अगर सतभतरी (सात पतियों वाली) कहा जाए, तो यह निश्चित रूप से गाली है। आज देश के जो हालात हैं, उसमें राजनीति खुद एक गाली है। जिस देश में लोकतंत्र की आड़ में गुंडे, बदमाश, भ्रष्टाचारी, बलात्कारी और देश से विश्वासघात करने वाले चुनाव लड़कर सत्ता का सुख भोगते हों, वहां की जनता के लिए यह विडंबना किसी गाली से कम है क्या? अब देखिए न! पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, सभी सत्ता सुंदरी के स्वयंवर में जीतने की प्रत्याशा से मरे जा रहे हैं। वे हत्यारों, बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों को अपने साथ करने और उन्हें अपनी पार्टी का टिकट देकर जितवाने की हर संभ व कोशिश कर रहे हैं। एक भ्रष्ट और लुटेरी पार्टी का बदनाम मंत्री निकाले जाने पर दूसरी पार्टी में जाते ही दूध का धुला हो जाता है। ऐसे दौर में किसी सभ्य और ईमानदार व्यक्ति को नेता कह दीजिए, वह उसी तरह गुस्सा हो जाता है, जैसे उसे कोई भद्दी गाली दी गई हो।' मेरी इस बात से मुसद्दीलाल संतुष्ट हो गए और मैं चाय पीकर अपने घर चला आया।
Thursday, January 12, 2012
‘राग दरबारी’ को लेकर मलाल भी था
प्रख्यात उपन्यासकार एवं व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे। उपन्यास ‘राग दरबारी’ के माध्यम से ग्रामीण जीवन में आने वाली मूल्यहीनता को जिस प्रामाणिकता और साहस के साथ श्री शुक्ल जी ने उकेरा, वह अद्वितीय है। पिछले दिनों स्व. श्रीलाल शुक्ल जी को लखनऊ के एक अस्पताल में 45वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ज्ञानपीठ अकादमी से जुड़े प्रख्यात साहित्यकार और व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ से राष्ट्रीय साप्ताहिक ‘हमवतन’ के स्थानीय संपादक अशोक मिश्र ने बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...।
आप इन दिनों ज्ञानपीठ से जुड़े हुए हैं, इसलिए सबसे पहले स्व. श्रीलाल शुक्ल जी को दिए गए ज्ञानपीठ पुरस्कार से ही बात शुरू करते हैं। श्रीलाल जी को तब ज्ञानपीठ दिया गया, जब वे मरणासन्न हालत में थे। एक मरणासन्न युगदृष्टा साहित्यकार ऐसी हालत में न तो उस सम्मान से उत्साहित होकर कोई नवसृजन कर सकता है, न ही उस सम्मान का आनंद उठा सकता है। आपको यह सब कुछ गलत नहीं लगता है?
- आपका कहना बहुत हद तक सही है, लेकिन ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करने की एक अपनी प्रक्रिया है। ज्ञानपीठ प्रदान करने वाली समिति किसी एक ही भाषा के साहित्यकारों पर विचार नहीं करती है। सभी भाषा के मूर्धण्य साहित्यकारों को ध्यान में रखना पड़ता है। एक बार जब किसी भाषा के साहित्यकार को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाता है, तो उस भाषा के साहित्यकारों पर तीन साल तक विचार नहीं होता। वरिष्ठ साहित्यकार और व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल और वरिष्ठ कहानीकार अमरकांत जी को एक साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार इस बार इसीलिए दिया गया कि पता नहीं, अगली बार जब हिंदी भाषा के साहित्यकारों पर विचार हो और उस समय तक इन दोनों वरिष्ठ साहित्यकारों में से पता नहीं, कौन रहे और कौन न रहे। देखिए, आज श्रीलाल शुक्ल जी हम सबका साथ भी छोड़ गए।
क्या आपको नहीं लगता कि श्रीलाल शुक्ल जी या अमरकांत जी को ज्ञानपीठ देने में काफी देर हो गई?
- हिंदी भाषा में इतने अच्छे-अच्छे और कालजयी रचनाकार हैं कि उनके चयन में काफी देर हो जाती है। हां, यदि वरिष्ठ साहित्यकारों, अब श्रीलाल शुक्ल जी को ही उदाहरण लें, को अगर उन्हें कुछ साल पहले ज्ञानपीठ मिला होता, तो वे इसका सुख उठा सकते थे। आज से लगभग छह साल पहले जब श्रीलाल शुक्ल जी अस्सी साल के हुए थे, तभी से वे बीमार रहने लगे थे। कभी स्मृति लोप के शिकार हो जाते थे, तो कभी कोई दूसरी बीमारी हो जाती थी। यदि तभी उन्हें यह पुरस्कार मिल जाता, तो शायद अच्छा होता।
कहा जाता है कि श्रीलाल जी को तो पुरस्कार देने पड़े हैं। विभिन्न पुरस्कार देने वाली समितियां या संस्थाएं उन्हें सम्मानित करके अपना सम्मान बढ़ा गई हैं। आप इससे कितना सहमत हैं?
- ऐसी बात नहीं है। उनकी पहचान सिर्फ ‘राग दरबारी’ से ही नहीं है। अपनी पहली कृति ‘अंगद का पांव’ भी काफी चर्चित रही है। उनकी रचनाओं में भाषा और सरोकारों का जो लालित्य है, वह बेजोड़ है। तुलसी दास ने जीवनभर राम कथा कही, लेकिन ‘रामचरित मानस’ लिखकर उन्होंने जो हासिल किया, उसका कोई मुकाबला नहीं है। कोई पुरस्कार भी नहीं। जिस तरह तुलसी दास के ‘रामचरित मानस’, मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ का कोई साम्य नहीं है, उसी तरह श्रीलाल शुक्ल जी के ‘राग दरबारी’ का कोई साम्य नहीं है। यह व्यंग्य प्रधान उपन्यास लिखकर श्री शुक्ल जी ने जिन ऊंचाइयों को छू लिया था, वह अद्वितीय है। ‘राग दरबारी’ एक विलक्षण कृति है। उसमें ग्रामीण भारत का जो विवेचन हुआ है, वह अद्भुत है। अपने जीवनकाल में श्रीलाल शुक्ल जी ने बातचीत के दौरान कई बार इस बात पर खेद व्यक्त किया कि ‘राग दरबारी’ ने उनकी दूसरी कृतियों को दबा दिया। ‘मकान’, ‘विश्रामपुर का संत’ और ‘राग विराग’ जैसी रचनाओं की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी कि ‘राग दरबारी’ की हुई।
‘राग दरबारी’ का शिवपालगंज तो आज पूरे भारत में दिखाई देता है। देश के लगभग सभी गांवों की वही दशा है, जो लगभग 45-46 साल पहले लिखे गए व्यंग्य उपन्यास ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल जी ने ‘शिवपालगंज’ नामक गांव को दर्शाया था।
- दरअसल, श्रीलाल शुक्ल जी भविष्य दृष्टा थे। ‘राग दरबारी’ का शिवपालगंज ही नहीं, बल्कि वे सभी संस्थाएं, जिनका चित्रण श्री शुक्ल जी ने किया था, आज भी उसी रूप में दिखाई देती हैं। चाहे वह स्कूल-कालेजों की राजनीति और भ्रष्टाचार हो, मठों-मंदिरों को लेकर चल रही उठापटक हो या फिर राजनीतिक संस्थाओं का विकृत रूप, सभी पक्षों पर शुक्ल जी ने सम्यक दृष्टि डाली और उसका जैसे एक्सरे करके सबके सामने पेश कर दिया।
व्यंग्य लेखन क्षेत्र में कभी हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल की त्रयी काफी मशहूर थी। दुर्भाग्य से त्रयी के तीनों मजबूत स्तंभ ढह चुके हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि व्यंग्य क्षेत्र का सिंहासन आज खाली हो चुका है। उस सिंहासन का कोई वारिस दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है।
- देखिए, श्रीलाल शुक्ल जी के जाने के बाद एक रिक्तता तो जरूर आई है, लेकिन सिंहासन खाली होने जैसी बात नहीं है। पहले की तरह योजनाबद्ध और तैयारी करके व्यंग्य लिखने वाले साहित्यकार भी नहीं रहे। अखबारों में छिटपुट व्यंग्य लिखा जा रहा है, लेकिन इनमें लिखने वालों से कहा जाता है कि दो सौ-ढाई सौ शब्दों में लिखकर दीजिए। ऐसे में कोई क्या बढ़िया व्यंग्य लिखेगा! व्यंग्य पर भी एक व्यंग्य यह है कि आज का व्यंग्यकार ‘अटल जी के घुटने पर’, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के अनशन पर लिख रहा है। ऐसे व्यंग्यकारों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं। हरिशंकर परसार्इं जैसी विदग्ध दृष्टि, समाज और व्यंग्य की समझ, शरद जोशी जैसी चुटीली और पैनी भाषा आज के व्यंग्यकारों में दिखाई देती है क्या? व्यंग्य लिखने के लिए सबसे पहले साहस की जरूरत होती है। जब तक साहित्यकार में सच लिखने का साहस नहीं होगा, वह उच्च कोटि का साहित्यकार नहीं हो सकता। जहां तक व्यंग्य विधा की बात है, आज भी कुछ लोग अच्छा लिख रहे हैं। ज्ञान चतुर्वेदी, गोपाल चतुर्वेदी अच्छा लिख रहे हैं। दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया की कहानियों में व्यंग्य भरपूर है। ये साहित्यकार इसे एक अलग विधा के रूप में न अपनाकर कहानियों में ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। हां, कुछ लोग इसे एक विधा मानकर लिख रहे हैं।
एक बार बातचीत के दौरान राजनीतिक दलों के संदर्भ में श्रीलाल शुक्ल जी ने कहा था कि मैं सड़क के बीच कुछ कदम हटकर बार्इं ओर खड़ा हूं। इसको आप किस रूप में लेते हैं?
- हां, यह बात उन्होंने अखिलेश से हुई बातचीत में कही थी। यह बातचीत तद्भव में छपी भी थी। बात यह है कि वे कभी किसी लेखक संघ या संगठन से जुड़े तो नहीं रहे, लेकिन जनवादी विचारधारा से उनका जुड़ाव जरूर था। आज के समय में जो भी लिख रहा है, वह वाम ओरिएंटेड होगा ही। उसका वाम विचारधारा से जुड़ाव नैसर्गिक है। लेकिन यह भी सही है कि किसी पार्टी का कार्ड होल्डर हो जाने से कोई लेखक नहीं हो जाता है। यदि ऐसा होता, तो आज हर गली-कूचे में लेखक ही लेखक दिखाई देते।
श्रीलाल शुक्ल जी का सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य उपन्यास ‘राग दरबारी’ है, तो दूसरी तरफ ‘आदमी का जहर’ जैसा जासूसी उपन्यास भी। इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे?
- एक बार उनसे इस मुद्दे पर बातचीत हुई थी। श्री शुक्ल जी का कहना था कि ‘आदमी का जहर’ या ‘सीमाएं टूटती हैं’ जैसा उपन्यास मनहूसियत से मुक्ति पाने के लिए लिखे गए थे। वे कहते थे कि हिंदी साहित्यकारों की छवि ऐसी बना दी गई है कि वह जैसे कुछ और लिख ही नहीं सकता। ‘आदमी का जहर’ आप पढ़ें, तो उसमें भी किस्सागोई है। ‘राग दरबारी’ को सामने रखकर उनकी अन्य रचनाओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है।
अगर आप श्रीलाल जी के संपूर्ण साहित्य का गंभीर विवेचन करें, तो उसमें व्यक्ति, समाज और तंत्र किसी न किसी रूप में जरूर मौजूद है। इसके पीछे आप क्या कारण मानते हैं।
- संपूर्ण तंत्र को जिस तरह श्री लाल शुक्ल जी ने समझा, उनकी इस समझ की तारीफ करनी होगी। पहले आईपीएस और बाद में आईएएस अधिकारी होने के नाते भी तंत्र को उन्होंने बखूबी समझा। आज तंत्र या राजनीतिक भ्रष्टाचार पर लिखने वाले कितने लोग हैं और उनकी रचनाओं में कितनी गहराई है, यह सबके सामने है। लेकिन श्रीलाल शुक्ल जी यह समझते थे कि किसी गरीब व्यक्ति की अप्लीकेशन कहां-कहां अटकती है, कहां-कहां बिना कुछ लिए-दिए काम नहीं होगा? वे कुछ भी लिखने से पहले पूरी तैयारी करते थे, उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल करते थे, तब कहीं जाकर वे लिखना शुरू करते थे। संयोग से उनका जीवन भी इस पूरे तंत्र के एक अंग के रूप में बीता। इसका उन्होंने अपने लेखन में भरपूर उपयोग किया।




