जब साहित्य को समझने के लायक हुआ तो व्यंग्य पढने में रूचि पैदा हुई. व्यंग्य पढ़ते-पढ़ते कब मैं लिखने भी लगा, पता ही नहीं चला. पिछले १५-१६ वर्षों से व्यंग्य लिख रहा हूँ. कई छोटी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में खूब लिखा. दैनिक स्वतंत्र भारत और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में भी खूब लिखा. कई पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी करने के बाद आठ साल दैनिक अमर उजाला के जालंधर संस्करण में काम करने के बाद लगभग चार महीने रांची में रहा. अब दैनिक जागरण कानपुर में हूँ. मेरा एक व्यंग्य संग्रह 'हाय राम!...लोकतंत्र मर गया' दिल्ली के भावना प्रकाशन से फरवरी 2009 में प्रकाशित हुआ है.कानपुर में उम्मीदों का नया सूरज उगेगा, ऐसी मुझे पूरी आशा है. नई उम्मीद के साथ संघर्ष कर रहा हूँ. मेरा मोबाइल नम्बर है -09235612878
कुत्ते हैं लाल कामरेड
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वैसे तो राजनीती मेसभी दोगले हैं , लेकिन सबसे अधिक ये साले लाल झंडे वाले
कामरेड हैं। साले जो काम ख़ुद करते हैं उसे विकाश के liye ज़रूरी कहते हैं
लेकिन अगर क...