Wednesday, August 14, 2019

सिर्फ देह नहीं होते हैं पिता

-अशोक मिश्र
कभी बूढ़े नहीं होते पिता
बेटे की नजर में
भले ही हो गई हो काया जर्जर, रोगग्रस्त
तब भी पिता अपने बेटे का होता है सबसे बड़ा अवलंबन।
गरीबी, बेकारी, भुखमरी, टीबी, कैंसर से जूझता बूढ़ा पिता
तब भी बूढ़ा नहीं होता अपने बच्चों की नजर में।
बच्चे उसे हमेशा समझते हैं जवान
मिल्खा सिंह की तरह तेज तर्रार धावक
मिल्खा सिंह आज भले ही हो गए हों बूढ़े
पर पिता मिल्खा सिंह आज भी जवान है, युवा है।
पिता
सिर्फ पिता नहीं होते किसी बेटे के लिए
और न ही सिर्फ देह होते हैं
और भी बहुत कुछ होते हैं पिता
घुप्प अंधियारी रातों में
उनींदी आंखों में चमक उठते हैं पिता
किसी जुगून की तरह
ज्वार-भाटा से थरथराते समुद्र के किनारे
प्रकाश स्तंभ की तरह
टाफियां, खिलौने, जमीन-जायदाद न दिला पाने वाले
पिता की बेबसी और लाचारी
महसूसते हैं बच्चे खुद पिता बनने के बाद।
जैसे माता कुमाता नहीं होती
ठीक उसी तरह
कभी बुरा नहीं होता पिता
पिता भले ही हो नाकारा, रोगी, जुआरी, अय्यास
कमा कर न लाता हो एक भी धेला घर में
पिता तब भी बुरा नहीं होता
जब वह बिना किसी गलती के पीटता है अपने बेटे को।
पिता न कभी बूढा होता है, न कभी बुरा होता है।
पिता सिर्फ एक पिता होता है
और एक दिन
जब चल देते हैं पिता
इस संसार से
तब वह छोड़ जाते हैं अपने पीछे
कभी न भरा जाने वाला एक शून्य
अनंत शून्य।

(हमारे सीनियर साथी राजीव कुमार के पिता की मृत्यु पर विनम्र श्रद्धांजलि)

Sunday, April 8, 2018

मानव कितना पतित हो गया?


अशोक मिश्र

मानव कितना पतित हो गया?
संबंधों के महाकाश में
स्वार्थ भानु नव उदित हो गया।
मानव कितना पतित हो गया?

लो मर्यादा का बंध तोड़
शुचि प्रेम, दया, सत्कर्म छोड़
मानव की पशु से लगी होड़
हैं अंतहीन यह भाग दौड़
दुराचार की प्रवहमान सरि
देख आज उर व्यथित हो गया
मानव कितना पतित हो गया?

फिरता बन जीवन क्रीत दास
अभिलाषाएं हैं सब निराश
है शेष कहां अब मधुर हास
रे मानव मन के आस-पास
है युग संचित सत्कर्म व्यर्थ
अपकर्म ही जब फलित हो गया
मानव कितना पतित हो गया?

दुराचारियों से सदाचार
सीखेगा मानव सद्विचार?
कैसा युग? विडंबना अपार
जन हृद वीणा के छिन्नतार
हुआ पराभव आज पुण्य का
पाप मुखर मुदित हो गया
मानव कितना पतित हो गया?

तोड़ो कारा, तोड़ो बंधन
पलभर को भी रुके चिंतन
सुन लो धरती मां का क्रंदन
मत खोजो कोई अवलंबन
पर निस्पंद समाज देखकर
आज प्रवासी चकित हो गया
मानव कितना पतित हो गया?
रचना काल 1995 

Wednesday, March 21, 2018

व्यंग्य पढ़ते-पढ़ते व्यंग्यकार हो गया

सद्य: प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘दीदी तीन जीजा पांच’ का आत्मकथ्य

-अशोक मिश्र
क्या लिखूं....कुछ लिखना, वह भी अपने बारे में बड़ा मुश्किल होता है। हां, अपने बारे में सिर्फ इतना कह सकता हूं कि व्यंग्यकार मैं बाई चांस बन गया हूं, ऐसा भी नहीं है। हां, मैं यह कहने का साहस जरूर रखता हूं कि मैंने अपने दिवंगत पिता का. रामेश्वर दत्त च्मानवज् या भइया का. आनंद प्रकाश मिश्र की व्यंग्य परंपरा को आगे बढ़ाया है, यह भी सही नहीं है। सच तो यह है कि उनके मार्ग पर चलने का साहस ही अपने में नहीं पैदा कर सका। मेरे पिता रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य रहे। बाबू जी ने आजीवन लगभग पैंतीस वर्षों तक पार्टी मुखपत्र साप्ताहिक च्क्रांतियुगज् में अनवरत मुजरिम के नाम से लैटर टू एडिटर की तर्ज पर व्यंग्य कालम च्तुम बहुत वैसे हो, सच बात भी कह देते होज् लिखा था। तब शायद सातवीं या आठवीं का छात्र रहा होऊंगा, जब पहली बार क्रांतियुग का वह व्यंग्य कालम पढ़ा था। बड़ा मजा आया। फिर तो एक लत सी लग गई मुजरिम को पढ़ने की। क्रांतियुग की भाषा बड़ी क्लिष्ट हुआ करती थी, अब भी है। बड़ी-बड़ी मार्क्सवादी लेनिनवादी अवधारणाएं तो पल्ले नहीं पड़ती थीं, लेकिन संपादक के नाम से मुजरिम का लिखा गया पत्र सहज और बोधगम्य हुआ करता था। व्यंग्य अपने लक्ष्य पर तीक्ष्ण प्रहार करता था। बाद में भइया का भी व्यंग्य पढ़ने लगा। वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में गुनाहगार के नाम से व्यंग्य लिखते थे। कई समाचार पत्रों में तो उन्होंने कई वर्षों तक इसी नाम से व्यंग्य लिखा। पिता और बड़े भाई की अंगुली पकड़कर व्यंग्य लिखना कब शुरू किया, यह याद नहीं है।
हां, बात सन 1986 या 1987 की है। लखनऊ में लीला सिनेमा के पास एक सांध्य दैनिक सरहदी निकलना शुरू हुआ था। उस अखबार के मालिक कोई भंडारी थे, शायद इंदुभूषण भंडारी या नरेंद्र भंडारी। उनके पिता कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्र या प्रदेश सरकार में मंत्री रहे थे। एनडी तिवारी के खास माने जाते थे। सांध्य दैनिक सरहदी के संपादक थे स्व. चचा अशोक रजनीकर और समाचार संपादक भैया आनंद प्रकाश मिश्र नियुक्त किए गए। मैं भी दैनिक सरहदी में गाहे-बगाहे जाने लगा। चचा रजनीकर लखनऊ यूनिवर्सिटी में मेरे पिता जी के एमए (अंग्रेजी) में क्लासफैलो थे। जहां तक मुझे याद है, बाद में सांध्य दैनिक सरहदी का आफिस जियामऊ चला गया और कुछ ही दिनों बाद बंद हो गया।  इसके बाद जियामऊ से ही साप्ताहिक अवध स्काई लाइन का प्रकाशन शुरू हुआ जिसके संपादक थे पप्पू अलवी और कार्यकारी संपादक थे भैया यानी आनंद प्रकाश मिश्र। लगभग आठ-नौ साल तक अवध स्काई लाइन प्रकाशित हुआ और बाद में यह भी बंद हो गया।
बाद में जब पिता जी दिवंगत हुए, तो पार्टी की जरूरतों को समझते हुए भइया ने पत्रकारिता को अलविदा कह दिया और पूरी तरह से आरएसपीआई (एम-एल) का काम करने लगे। अवध स्काई लाइन के दिनों में ही व्यंग्य के नाम पर कुछ जोड़ने घटाने लगा था। कुछ छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने भी लगा था, लेकिन जिस अखबार या पत्रिका में व्यंग्य छपता, उसकी प्रति घर लेकर नहीं जाता था। बाद में एकाध बार बड़ी हिम्मत करके प्रकाशित व्यंग्य को घर ले गया और यह जताने की कोशिश की कि मैं भी व्यंग्य की दुनिया में नाली-दुनाली बंदूक नहीं, अब तोप गया हूं। बाबू जी तो मेरा व्यंग्य पढ़ते और नाक से च्हूं.....ज् आवाज निकालते और लंबी चुप्पी साध जाते। मैं भी भीतर ही भीतर कुढ़ता कि जिस व्यंग्य को पढ़कर मेरे मित्र और परिचित लहालोट हो जाते हैं, वह इनके मन ही नहीं भाता है। ऐसा भी नहीं था कि मैं उन दिनों दूसरे व्यंग्यकारों को पढ़ता नहीं था। शरद जोशी, श्री लाल शुक्ल, केपी सक्सेना आदि व्यंग्यकारों को बड़े मनोयोग से पढ़ता था। लेकिन मैंने कभी इन वरिष्ठ व्यंग्यकारों की तरह बनना चाहा। मेरे व्यंग्य के नायक तो बाबू जी और भइया थे। आज भी हैं। मैं बस बाबू जी या भइया की तरह व्यंग्य लिखना चाहता था। मेरा व्यंग्य पढ़कर बाबू जी तो कोई टिप्पणी नहीं करते थे, लेकिन भइया पूरे उत्साह पर गर्म राख फेर देते थे। व्यंग्य में न जाने कैसी-कैसी गलतियां निकाल देते थे कि मुझे लगता कि अरे यार! सचमुच कूड़ा व्यंग्य लिखा है। लेकिन मैंने हार नहीं मानी, तो भइया भी कभी आलोचक की भूमिका से पीछे हटे नहीं। आज भी कमजोर व्यंग्य प्रकाशित होने पर डांट पड़ ही जाती है।
मेरे घर में बाबू जी और भइया व्यंग्य, कहानी, कविता, दर्शन, इतिहास की पुस्तकें लाते ही रहते थे। हिंदी, बांग्ला (बांग्ला भाषा में भी और हिंदी अनुवाद भी), उर्दू के साथ-साथ रूसी साहित्य का भंडार हुआ करता था उन दिनों हमारे घर में। बाबू जी बांग्ला और उर्दू के भी अच्छे जानकार थे। कुरआन शरीफ भी बहुत दिनों तक हमारे घर में रही है, जब तक हम लोग लखनऊ के आलमबाग थाना क्षेत्र के छोटा बरहा मोहल्ले में रहते थे। खैर...। व्यंग्य एक दोधारी तलवार है। देश, समाज और परिवेश में व्याप्त विसंगतियों से सबसे पहले व्यंग्यकार ही आहत होता है, उसी का सीना चाक होता है, तब वह अपनी उस पीड़ा को, जो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक विसंगतियों की देन होती हैं, लेकर व्यंग्य के माध्यम से अपने पाठक के सामने प्रस्तुत होता है। व्यंग्य की यह परिभाषा, यह निहितार्थ भइया ने ही समझाया है। वे अक्सर कहा करते हैं जिस विसंगति से व्यंग्यकार खुद पीड़ित नहीं होता है, उस विसंगति पर लिखने वाला खुद को तो छलता ही है, अपने पाठक को भी छलता है। जिसने पीड़ा का अनुभव ही नहीं किया, वह उस पीड़ा को अपने पाठकों तक कैसे पहुंचा सकता  है। दूसरों को पीड़ित देखकर उसका वर्णन तो किया जा सकता है, लेकिन दूसरों का अनुभव और स्व अनुभव में कुछ तो फर्क आ ही जाएगा।
व्यंग्य संग्रह आपके हाथों में है। व्यंग्य कैसे हैं? यह तो पाठक ही बताएंगे। पाठकों से बढ़कर कोई अदालत नहीं होती है किसी भी लेखक के लिए। पाठक कहें कि पास, तो पास। नहीं तो फेल। हां, मैं आभारी हूं न्यूज फॉक्स के संपादक श्री रामेंद्र कुमार सिन्हा जी और अमर उजाला जालंधर में संपादक रहे श्री निशीथ जोशी जी (वर्तमान में सपादक नवोदय टाइम्स, देहरादून) का, जिन्होंने समय-समय पर अपने सुझावों से व्यंग्य को और निखारने में मदद की। मैं कृतज्ञ हूं अपनी दो बड़ी भाभियों श्रीमती शशि मिश्रा और श्रीमती मधु मिश्रा के साथ-साथ दद्दा श्री विनोद कुमार मिश्र जी का, जो अब तक मुझे एक संबल प्रदान करते आ रहे हैं। छोटे भाई राजेश मिश्र, विप्लव मिश्र और अनुज वधु सावित्री मिश्रा के सहयोग को भी भुलाया नहीं जा सकता है। इसके साथ ही वनिका पब्लिकेशन्स की कर्ता-धर्ता श्रीमती डॉ. नीरज सुधांशु शर्मा जी का भी आभारी हूं जिनके सहयोग के बिना यह व्यंग्य संग्रह आपके हाथों तक पहुंच ही नहीं सकता था। पाठकों की प्रतिक्रिया की अपेक्षा सदैव रहेगी।


Thursday, March 1, 2018

होली में गुझिया बटोरने की ललक

बचपन की यादें-5

अशोक मिश्र

होली..होली शब्द आते ही याद आ जाती है लखनऊ के आलमबाग थाना क्षेत्र में स्थित मोहल्ला छोटे बरहा की होली। बात शायद 1980 के एकाध साल पहले या एकाध साल बाद की है। तब सातवीं-आठवीं पढ़ता था। होली का उत्साह तब सबसे ज्यादा बच्चों में होता था। होली का असली मजा तो बच्चे ही उठाते थे। आज की तरह तब पढ़ाई और इम्तहान का इतना दबाव और बोझ भी नहीं होता था। होलिका गाड़ने के साथ ही हम बच्चों की मस्ती और होली पर क्या-क्या करेंगे इसकी योजनाएं बनने लगती थीं। किसको रंगना है, कितना रंगना है, कालिख लगानी है या सफेदा, किसको छोड़ देना है, किसको थोड़ा लगाना है, इसकी योजनाएं बनाते-बनाते सारा दिन बीत जाता था। अंगुलियों पर गिने जाते थे दिन..इतने दिन बचे हैं होली के। रंग, अबीर, गुलाल किसकी दुकान से खरीदना है, पिछले साल किस दुकानदार ने आठ आने लेकर चार आने  भर का ही रंग दिया था, किसने चार आने में छह आने भर का रंग दिया था, इसको याद किया जाता था। रामू, टिर्रू, गॉटर, सलीम की योजनाएं अलग, तो अपनी अलग। छोटे भाइयों की योजनाएं अलग। सबके अपनी-अपनी योजनाएं, सबकी अपनी-अपनी मंडली। बरहा जूनियर हाई स्कूल में पढ़ने वाले कुछ सहपाठियों के साथ भी योजनाएं बनती और बिगड़ती थीं। टार्च वाली बैटरी की कालिख निकाली जाती, उसे पत्थर पर रखकर पत्थर से ही पीसा जाता। कभी बस्ते में तो कभी छत पर छिपाकर पूरी कालिख रखी जाती। कालिख निकालने-पीसने के चक्कर में शर्ट-पैंट रंग जाती, तो अम्मा के हाथों मार भी खाता। अम्मा जैसे-जैसे कपड़े धोती जातीं, उसी अनुपात में हाथ भी साफ करती जातीं।
होलिका दहन वाली रात में ही सिर, मुंह, हाथ, पैर में कड़ुवा तेल लगाकर सोते थे, ताकि सुबह उठते ही कोई कालिख या सफेदा पोत दे, तो छुड़ाने में दिक्कत न आए। सुबह उठते ही सबसे पहले भरपेट नाश्ता करते। नाश्ते में भी पूड़ी, कचौड़ी या पापड़ तो बिल्कुल कम..गुझिया ज्यादा खाऊं, यही कोशिश रहती थी मेरी। बाकी भाई तो जो मिल जाता खा लेते, उसके बाद स्वाभाविक उल्लास के साथ होली खेलने निकल जाते। होली त्यौहार का सबसे बड़ा आकर्षण तो हमारे लिए हुड़दंग मचाना और गुझिया खाना ही था। गुझिया हमारे परिवार मे लगभग सबको बहुत पसंद है। बाबू जी (अब दिवंगत), भइया, दद्दा..सबको गुझिया आज भी बहुत लुभाती है। बारह एक बजे तक इतना हुड़दंग मचाते, इतना रंगते-रंगे जाते कि पूरे साल भर की कसर पूरी हो जाती थी। कई बार तो इतनी कालिख, सफेदा और रंग लग जाता था कि छुड़ाते समय रोना आ जाता। मुंह एकदम काले बंदर जैसा हो जाता। पूरे चेहरे पर बस आंखें या दांत चमकते थे। बाकी सारा शरीर काला और रंग-बिरंगा दिखता था। खूब टूटकर और छककर होली खेली जाती थी। हिंदू-मुसलमान का कोई भेद नहीं था। जितने उत्साह में छोटे बरहा के राजू, रामू, टिर्रू, सुरेश होली खेलते थे, उतने ही उत्साह में सलीम और स्कूल में हशीम अंसारी होली खेलते थे। होली में सलीम की अम्मी तो बाहर नहीं निकलती थीं, लेकिन मोहल्ले भर के बच्चों के बाल काटने वाले सलीम के अब्बा जरूर रंग दिए जाते थे।
होली खेलने के बाद बारी आती थी होली मिलने का। तब लखनऊ में आठ दिन तक होली मिलन समारोह चलता रहता था। उस समय की परंपरा के अनुसार, होली के आठवें दिन तक लोगों को अपने घरों में गुझिया जरूर रखनी पड़ती थी। आठवें का मेला खत्म, समझो गुझिया खत्म। कई घरों में यदि गुझिया आठवें के मेले से पहले खत्म होने वाली होती थी, तो वह घर होली मिलने आने वालों के आने से पहले ही गुझिया बनाकर तैयार कर लेता था। होली खेलने के बाद नहा-धोकर नए कपड़े बड़े चाव से पहने जाते थे। अम्मा डांटती थीं कि अभी नए कपड़े मत पहनो, कोई रंग डाल देगा। चार बजने दो, उसके बाद पहनना। खाना-पानी के बाद कपड़े पहनना, लेकिन तब अम्मा की यह बात बहुत बुरी लगती थी। कई बार अम्मा की बात सच भी साबित हो जाती थी। सज-धज कर बाहर निकले और किसी की छत से ‘फच्च’ से पीठ-पेट पर आकर रंग भरा गुब्बारा फूटता और कपड़े रंग से सराबोर हो जाते। रुआंसे से घर लौट आते। कपड़ों का सत्यानाश होते देखकर अम्मा का पारा चढ़ जाता। भइया भी रिसिया जाते। ऐसा नहीं कि यह मेरे साथ होता था। भइया को छोड़कर हम सभी भाइयों में से किसी के साथ ऐसा हो जाता था। भइया के डर से हम लोग यदि नए कपड़े नहीं पहनते थे, तो चार बजने की समय सीमा का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते। घड़ी की सुई लगता था कि जैसे बहुत सुस्त हो जाती थी उन दिनों। हम सभी भाइयों की निगाह बार-बार घड़ी पर ही रहती थी। जैसे ही चार बजते हम सभी नए कपड़ों पर टूट पड़ते। कपड़े-लत्ते पहनकर गर्व से सीना उठाए घर से बाहर निकलते। कई बार तो लड़कों की मंडली घर के बाहर ही इंतजार करती रहती। हम भाइयों में से कोई निकलकर उस मंडली से कहता, बस आधा घंटा रह गया है चार बजने में। बस..पंद्रह मिनट रह गए हैं..। हम अभी आते हैं।

मंडली भी कैसी...एकदम शंकर जी की बारात जैसी। नाक बहाते बच्चों से लेकर हाई स्कूल, इंटर के छात्र तक। हर उम्र, हर जाति के बच्चे। मोहल्ले में अपनी-अपनी रुचि और दोस्ती-दुशमनी के अनुसार कई मंडलियां बनाई जाती थीं। कई बार तो होली की शुरुआत में कोई इस मंडली में होता, तो शाम को दूसरी मंडली में। दो दिन बाद तीसरी मंडली में। यह मंडली फिर तय करती कि किसके घर जाना है। आप सोचिए, सुबह ठीकठाक नाश्ता करके रंग खेलने निकलते थे हम भाई भर। दोपहर में नहाने-धोने के बाद पूड़ी, कचौड़ी, कई तरह की सब्जियां और अन्य पकवान आदि खाने के मात्र दो-ढाई घंटे के बाद ही होली मिलने निकल जाते थे। होली मिलन के लिए जाने वाली मंडली में कम से कम मेरे लिए उन दिनों नमकीन, पापड़ या मिठाई खाना नहीं होता था। मैं सीधा गुझिया पर ही टूटता था। पहले दिन तो जब तक गुंजाइश होती गुझिया ही खाता। उसके बाद किसी के घर भी होली मिलने जाने पर दो गुझिया उठाता और एक-एक हाथ में रख लेता। आपको बता दें। होली मिलने के लिए निकली मेरे मोहल्ले की बाल मंडली को इस बात से कतई मतलब नहीं होता था कि जिस घर में हम सब होली मिलने जा रहे हैं, उस घर के किसी प्राणी को हम में से कोई जानता पहचानता है भी या नहीं। उन दिनों हमारा एकमात्र लक्ष्य होता था कि जब तक पेट इजाजत दे, तब तक सुबह से शाम तक होली मिलन कार्यक्रम चलाए रखना है। कई बार तो होली मिलन कार्यक्रम बीच में ही रोककर हम में से कोई भी घर जाकर निवृत्त हो आता और तब तक मंडली रास्ते में खड़ी उसका इंतजार करती रहती थी। होली के अगले दिन से खट्टी डकारें आने लगती थीं। लेकिन मेरा गुझिया बटोरो अभियान जारी रहता। पेट खराब होने के कारण गुझिया खाना तो बंद हो जाता था, लेकिन लोगों की निगाह बचाकर एक या दो गुझिया जेब में पहुंचाना नहीं भूलता। जब जेब भर जाती, तो उसे बस्ते में रख आता। कई बार ऐसा भी होता कि किताब-कापियों के बोझ से गुझिया दब जाती। कापियां-किताबें गुझियामय हो जाती थीं। अम्मा देखती, तो पहले जीभर कर ठोंकती, फिर कापियां-किताबें निकालकर उन पर नए कागज चढ़ाए जाते। बस्ता धोया जाता। अम्मा गुर्राती हुई कहतीं-खबरदार..अब अगर बस्ते में गुझिया रखी तो....हाथ-पैर तोड़ दूंगी। भइया तो ठुकाई पहले करते, समझाते बाद में। बाबू जी पहले तो कुछ नहीं बोलते-लेकिन ठुकाई-पिटाई के बाद जब पस्त होकर कहीं बैठा रो रहा होता, तो वे समझाने आ जाते। कहते-अरे, गुझिया दिन में चार-पांच से ज्यादा खाओगे, तो नहीं पचेगी। पेट खराब हो जाएगा। होली में लोगों के घरों में जाते हो, तो जाओ। मैं रोकूंगा नहीं, लेकिन खाने-पीने में संयम बरतो। मैं भी कहता-मैं पापड़, चिप्स, कचरी, नमकीन थोड़े न खाता हूं। गुझिया ही तो खाता हूं, वह भी एक या दो। जब पेटभर जाता है, तो अपने हिस्से की गुझिया जेब में रख लेता हूं। तो क्या बुरा करता हूं। आठवां का मेला बीत जाएगा, तो मैं एक-एक करके खाता रहूंगा। यह सुनकर कई बार तो बाबू जी ठहाका लगाकर हंसते, कई बार सिर्फ मुस्कुराकर रह जाते। कहते-तब तक यह खराब नहीं हो जाएगा? इतनी गर्मी में इतने दिन की बासी गुझिया खाना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है। इसके बावजूद तब बाबू जी की बात हमारी समझ में कहां आती थी। हम तो हर साल अपनी हरकत से बाज ही नहीं आते थे। उन दिनों किसी के यहां भी होली मिलने यानी होली मिलने के बहाने बच्चों के गुझिया, पापड़, चिप्स, नमकीन खाने की आदत, रवायत को स्टेट्स सिंबल से नहीं जोड़ा जाता था। तब लोगों में यह भावना नहीं पनपी थी कि लोग उनके बच्चों को देखकर क्या कहेंगे? उसके घर में जाकर गुझिया खाकर बेटे या बेटी ने तो नाक ही कटा दी। अब तो सब कुछ कैलकुलेटेड हो गया है। बच्चे या परिवार के सदस्य किसके-किसके यहां जाएंगे, किसके यहां नहीं, यह सब कुछ हैसियत के हिसाब से तय हो जाते हैं। उन दिनों स्कूलों में भी होली की दस दिन की छुट्टियां होती थीं। आज जब मैं अपने बेटे को यह बताता हूं, तो वह आश्चर्यचकित होकर कहता है-अच्छा...।