Saturday, March 25, 2017

तुम्हारी भौजाई ने घुघुरी बनाया है, आ जाना

अशोक मिश्र
जब से उन्होंने कनफुसकी की है, तब से सारा देश सन्न है! कयासों का बाजार गर्म है। अखबारी और चैनली लाल बुझक्कड़ों से लेकर गली-कूचे तक के गपोड़ियों और ठेलुओं के अपने-अपने कयास हैं, अपने-अपने विश्लेषण हैं। पत्रकारिता की खाल ओढ़कर किसी ज्योतिषी की तरह भविष्यवाणी करने वाले लाल बुझक्कड़ तभी से यह खोजने की कवायद कर रहे हैं कि आखिर मामले की पूंछ कहां है? पूंछ पारिवारिक है या राजनीतिक, बेटे की चिंता से जुड़ा है या जवानी के दिनों में की गई खुराफात के उजागर हो जाने की चिंता।
उस्ताद गुनाहगार तो बड़े दावे के साथ कह रहे हैं, ‘मूर्ख हो तुम लोग, जो इन्हें एक दूसरे का विरोधी मानते हो। अरे ये सब एक ही थाली के बैगन हैं। जब इनमें से कोई एक देश का भाग्यविधाता होता है, तो दोनों, तीनों...या यों कहें कि सभी एक दूसरे को राजनीतिक मंच पर भले ही रावण, अहिरावण या महिरावण बताते हों, लेकिन पर्दे के पीछे गलबहियां डालकर हंसते हैं, खिलखिलाते हैं, एक दूसरे के कंधे पर सिर रखकर अपनी-अपनी भूली-बिसरी प्रेमिकाओं की याद में आंसू बहाते हैं, स्याह-सफेद कारनामों का हल खोजने की जुगत भिड़ाते हैं। यह कानाफूसी किसी विपदा को टालने का अनुरोध करने के लिए की गई थी।’
मेरे पत्रकार मित्र राम लुभाया अपने किसी सूत्र के हवाले से कहते हैं कि उन्होंने कान में सिर्फ इतना कहा था, ‘गुरु! तुम्हीं अच्छे रहे, जो न इधर फंसे, न उधर। मुझे देखो, मेरी तो हालत तो ‘दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय’ वाली हो रही है। कभी ये कुर्ता पकड़कर खींचती है, तो कभी दूसरी वाली के बाल-बच्चे। भाई-पट्टीदारी के झगड़े में मेरी हालत फुटबाल जैसी हो गई है, जिसे हर कोई किक लगाना चाहता है, ताकि ‘गोल’ हो जाऊं। ‘माया’, ‘मोह’ ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।’
लेकिन असली बात कोई नहीं जानता, सिवा मेरे। आपको राज की बात बताता हूं किसी से कहिएगा नहीं। कान में पुराने पहलवान ने नए पहलवान से सिर्फ इतना ही कहा था, ‘गुरु! फुरसत हो, तो आज शाम को घर आना। तुम्हारी भाभी ने मसालेदार घुघुरी बनाई है। ठंडी-ठंडी छाछ के साथ घुघुरी खाने का मजा ही कुछ और है।’ पहलवान ने जब पोते की शादी की थी, तो उन्होंने दूसरे अखाड़े का होते हुए नए पहलवान को शादी में शरीक होने का न्यौता भेजा था। नए पहलवान आए और राजनीतिक वैर-भाव भुलाकर बहू-पोते को आशीर्वाद के साथ-साथ गिफ्ट-शिफ्ट भी दिया था। वैसे भी लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था की राजनीति में मतभेद होते हैं, मनभेद नहीं। यह तो हम-आप जैसे बज्रमूरख होते हैं, जो इनके चक्कर में अपने पड़ोसी से मारकर लेते हैं। जिस बात को लेकर बड़े-बड़े लाल बुझक्कड़ जो कयास लगा रहे हैं, वैसी कोई बात नहीं है। बस, घुघुरी खाने का न्यौता भर है।

श्रंगार के दोहे

अधर-अधर मिलकर कभी, प्रिये हुए थे एक
प्रणय ग्रंथ के अनपढ़े, बांचे पृष्ठ अनेक।
वसुधा पर झरती रही, टप-टप, टप-टप मेह।
रहे पयोधर अनमने, अलसायी-सी देह।
प्रेम कभी मत तौलिए, मन पर पड़ती चोट।
लाख निकटता फिर बढ़े, रह जाती है खोट।
मन कस्तूरी हो गया, प्रिय का पा सानिध्य।
विकसा पंकज प्रेम का, कुछ न रहा मालिन्य।
तप्त अधर जब भी मिले, हुई चंदनी देह।
मधुकर-सा मन हो गया, द्राक्षासव-सा देह।
प्रीत पतिंगे की अमर, दीपक को सब दोष।
परस्वारथ जलता रहा, मिला यही परितोष।

Monday, March 6, 2017

बौराती प्रकृति, कुत्ते और राम लुभाया

अशोक मिश्र
फागुन में पहले प्रकृति बौराती थी। फिर आम्र मंजरियां बौराती थीं। फिर पोपले मुंह और पिलपिले शरीर वाले सत्तर-पचहत्तर साल की उम्र वाले ‘बाबा’ बौराते थे। इनके बौराते ही भौजाइयां बौरा जाती थीं। फिर तो देवर, सालियां-सलहजें, ननद-ननदोई के बौराने का एक सिलसिला ही शुरू हो जाता था। हंसी-ठिठोली के नाम पर श्लील-अश्लील का जैसे भेद ही मिट जाता था। फागुनी बयार शरीर में मादकता, कामुकता या छिछोरेपन का ऐसा संचार करती थी कि सारी मान-मर्यादाएं बिला जाती थीं। फागुनी बयार अब भी चलती है, लेकिन अब बाबा, भौजाइयां, साली-सहलजों की बजाय कुत्ते बौराते हैं, राजनीति बौराती है, नेता बौराते हैं और बौराते हैं मेरे वरिष्ठ पत्रकार साथी राम लुभाया।
वैसे राम लुभाया तो बारहों महीने बौराये रहते हैं। अभी कल की बात है। सुबह आफिस आए, तो मैंने लपकर अभिवादन किया, ‘सर जी गुड मार्निंग...।’ राम लुभाया ने अपनी पीठ पर टंगा छोटा सा बैग मेज पर पटका और घूमकर झल्लाते हुए बोले, ‘क्या है... अरे हो गया एक दिन गुड मार्निंग..अब रोज-रोज आते ही मेरे सिर पर काहे दे मारते हैं गुडमार्निंग? एक तो रात भर मोहल्ले के कुत्तों ने सोने नहीं दिया, सुबह थोड़ी देर के लिए झपकी भी आई, तो एक मरघिल्ली सी खबर छूटने की वजह से सुबह-सुबह संपादक जी हौंकते रहे। जीना हराम हो गया है मेरा।’ जैसे बरसात में किसी बच्चे के छू लेने पर केंचुआ सिकुड़ जाता है, उसी तरह राम लुभाया की बात सुनकर मैं सिमट गया। शायद राम लुभाया को अपनी गलती का एहसास हुआ। बोले, ‘यार..क्या बताऊं। इधर जब से चुनावी बयार बहने लगी है, तब से सारे मोहल्ले के कुत्ते मेरे दरवाजे पर रात दस-ग्यारह बजे के बाद इकट्ठा हो जाते हैं। दरवाजे के सामने का खुला हिस्सा चुनावी सभा में तब्दील हो जाता है। कुत्ते मुंह उठाकर मानो भाषण देने लगते हैं। कोई नाली के इस पार, तो कोई नाली के उस पार। अगर उनकी भाषा मेरी समझ में आती, तो शायद यही कहते होंगे-प्यारे कुत्ता भाइयों! हमारी पार्टी की सरकार बनी, तो विकास की हड्डियां सबको मिलेंगी। सबको कहीं भी टांग उठाकर सूसू करने की स्वतंत्रता होगी।’
राम लुभाया अब अपनी रौ में आ गए थे। बोले, ‘तब तक दूसरा मुंह उठाकर भौंकता है, झुट्ठे हैं ये विकास की बात करने वाले। ये हम कुत्तों को छोटा-बड़ा, नस्ल, रंग के नाम पर लड़ाते हैं और मौज करते हैं। हमारी सरकार में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता है। हमारी सरकार बनी, तो सबको किसी के भी घर में घुसकर रोटी और बोटी चुराने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।’ राम लुभाया थोड़ी देर सांस लेने के लिए रुके। फिर बोले, ‘रात में जब देखा कि इस कुत्ता सभा के चलते सोने को नहीं मिलेगा, तो मैंने उठाया डंडा। चुपके से गेट खोला और पिल पड़ा इन कुत्तों पर। खूब लठियाया। तीनों गली के कुत्तों को खूब धोया। ससुरों! मेरा दरवाजा छोड़कर कहीं और करो अपनी चुनावी सभा। आदमी अगर कुत्तों के चुनाव में वोट दे सकता, तो मैं कतई तुम कुत्तों को वोट नहीं देता।’ इतना कहकर राम लुभाया फिस्स से हंस दिए।

Sunday, February 19, 2017

बड़ी उलझन है भाई

अशोक मिश्र
कहते हैं कि मानो तो देव, नहीं तो पत्थर तो हैं ही। मानिए तो बहुत बड़ी उलझन है, न मानिए, तो यह कोई समस्या ही नहीं है। जब समस्या ही नहीं, तो फिर यह ‘…किंतु, ..परंतु, ..आह, ..वाह’ जैसी बातें निरर्थक हैं। लेकिन मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी समस्या है। एकदम जम्मू-कश्मीर विवाद की तरह, जिसे जितना सुलझाओ, उतनी ही उलझती जाती है। मेरे सामने सवाल यह नहीं है कि किसको चुनें। मुद्दा यह है कि किसे नकार दें। कौन अच्छा है, कौन बेकार..यह तय कर पाना, कोई आसान काम है क्या? ऐसी ऊहापोह जैसी स्थिति तो उन लड़कियों के सामने भी पैदा नहीं हुई होगी जिन्हें प्रेमी और माता-पिता द्वारा सुझाए गए दस-बारह लड़कों में से किसी एक को जीवन साथी के रूप में चुनना हो। समस्या यह है कि मन किसी एक के नाम पर स्थिर नहीं हो पा रहा है। एक से बढ़कर एक प्रत्याशी हैं चुनाव मैदान में। कोई किसी गुण में बेजोड़ है, तो कोई किसी दूसरे गुण में अद्वितीय। किसी के नाम पर हत्या के बारह मुकदमे चल रहे हैं, तो कोई पांच हत्या, दो हत्या के प्रयास के आरोप में जमानत पर है। बलात्कार के मामले की सजा तो पांच साल पहले ही काट चुका है।
अब कल ही वोट मांगने आए, प्रत्याशी की खूबियां सुनें। बेचारे ने सात बार सिर्फ एक ही उद्योगपति से रंगदारी वसूली, तो नामाकूल व्यापारी ने पुलिस बुलाकर पकड़वा दिया। यह तो कहिए कि थाने की पुलिस शरीफ निकली। व्यापारी के घर से पकड़कर लाई और थाने में चाय-पानी कराकर बेचारे को विदा कर दिया, वरना बेचारा तो गया था न तेरह के भाव। व्यापारी को कौन समझाए कि जहां गुड़ होगा, वहीं तो चीटें आएंगे। और चीटें आएंगे, तो कुछ न कुछ गुड़ खाएंगे ही। इसमें भला आपत्तिजनक और गैरकानूनी क्या है? पिछले हफ्ते एक पार्टी का उम्मीदवार मेरी गली में प्रचार कर रहा था, उसके सुदर्शन चेहरे पर अर्ध चंद्राकार चाकू का निशान इस तरह सुशोभित हो रहा, मानो चुनाव में विजय के लिए उसने द्वितीया के चांद पर अपना माथा पटका हो और चंद्रमा ने आशीर्वाद के रूप में अपने अर्धचंद्राकार स्वरूप की छाप लगा दी हो। उसे देखकर तो मन में श्रद्धा का भाव इस तरह उमड़ा पड़ रहा था, जैसे ज्यादा भूखा आदमी किसी शादी समारोह में खाने का मौका पा जाए और अजर-गजर जो भी मिलता जाए, खाता जाए और बाद में वह खाया-पिया बार-बार उमड़-घुमड़कर बाहर आने को आतुर हो।
जब ऐसे ऊर्जावान, प्रतिभावान, दयावान, बली, बाहुबलि उम्मीदवार हों, तो मन ऊहापोह की स्थिति में होगा ही। उस पर तो घबराहट और बढ़ जानी ही है, जब उम्मीदवारों के दादा ने अप्रत्यक्ष धमकी दे रखी हो कि सारी जन्मकुंडली है हमारे पास, सबकी पोल खोल दूंगा। दिक्कत यही है कि किसको नकार दें। सब एक से बढ़कर एक सुपरलेटिव डिग्री के हैं। हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, भ्रष्टाचारी हैं, दलाल हैं, शोषक हैं, दोहक हैं, उत्पीड़क हैं। मजा यह कि न ऊधौ कम हैं, न माधौ। विडंबना यह है कि इन्हीं में से किसी एक को चुनना है। बड़ी उलझन है भाई! क्या करूं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं।

Monday, February 13, 2017

प्रेम बाड़ी उपजे, प्रेम हाट बिकाय

अशोक मिश्र
एक दिन मैं ऑफिस से कुछ जल्दी घर चला आया। मैंने देखा कि मेरा तेरह वर्षीय बेटा और उसका हमउम्र दोस्त राकेश, दोनों बरामदे में बैठे बातचीत कर रहे थे। मेरा बेटा अपने दोस्त से कह रहा था, ‘देख, तू चाहे कुछ भी कहे, लेकिन चार-पांच साल बाद मैं अमेरिका जरूर जाऊंगा।’ उसके दोस्त ने कहा, ‘हायर स्टडी के लिए? यह तो बहुत अच्छी बात है। यार, वहां पढ़ाई के लिए जाना तो मैं भी चाहता हूं। वहां की डिग्रियों की सचमुच बड़ी वैल्यू है।’  मेरे बेटे ने मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘हायर स्टडी के लिए नहीं बुद्धू, प्रेम की पढ़ाई करने के लिए। कल ही एक अखबार में खबर आई है कि अमेरिका में एक कंपनी अब लोगों को प्रेम करना सिखाएगी। यह एकदम नई किस्म की पढ़ाई है। जिसकी डिग्री और कहीं नहीं दी जाती है। अपनी गर्लफ्रेंड या ब्वायफ्रेंड को कैसे एसएमएस किया जाए, फेसबुक पर कैसी पोस्ट डाली जाए, ट्विटर पर क्या लिखा जाए, ऐसा क्या लिखा जाए कि वह इंप्रेस हो जाए, इसकी वहां शिक्षा दी जाएगी।’
मेरे बेटे के दोस्त ने आश्चर्य से मुंह फाड़ा, ‘अच्छा? तू यह सब पढ़ने अमेरिका जाएगा? अबे तुझे इसके लिए अमेरिका जाने की क्या जरूरत है? यह सब पढ़ाई तो तू यहां भी कर सकता है। इसके लिए अपने देश में कितने लवगुरु हैं न!’ मेरे बेटे ने जवाब दिया, ‘चल मान लिया थोड़ी देर के लिए कि मैं लवगुरु से पढ़ भी लूं, लेकिन क्या वह डिग्री देंगे? और फिर उस डिग्री की वैल्यू क्या रहेगी? सोच, छह-सात साल बाद जब मैं अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी से बीएल (बैचलर ऑफ लव) या एमएल (मास्टर ऑफ लव) की डिग्री लेकर लौटूंगा, तो मेरी गर्लफ्रेंड पर क्या इंप्रेशन जमेगा। मेरी तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी।’
मेरा बेटा कुछ और कहता, इससे पहले मुझे एक निगोड़ी खांसी आ गई। मेरा कुलदीपक और उसका दोस्त दोनों सकपका गए और बरामदे से निकल कर सड़क पर आ खड़े हो गए। बेटे की बातें सुनकर मुझे कबीरदास याद आ गए। बेचारे कबीरदास यह रटते-रटते मर गए कि प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।‘ कबीरदास के जमाने में तो प्रेम की खेती शायद होती भी नहीं थी। कुछ माफिया टाइप के लोग छोटे-मोटे पैमाने पर प्रेम की खेतीबाड़ी करते भी थे, तो उनको कोई पूछना भी नहीं था। उन दिनों प्रेम हॉट-बाजारों में भी नहीं बिकता था। हालांकि राजा-महाराजा बाकायदा मीना बाजार लगवाते थे, लेकिन वह आम लोगों की पहुंच से बाहर की बात थी। प्रेम के खरीदारों की संख्या तो तब बहुत सीमित थी। लेकिन आज तो कबीरदास की पूरी थ्योरी ही उलटी जा रही थी। प्रेम की न केवल खेती की जा रही है, बल्कि उसे हॉट-बाजार में खरीदा-बेचा जा रहा है। कबीरदास की थ्योरी पर मैं आगे कुछ और सोचता-विचारता कि घरैतिन रसोई से बाहर निकली और बोली, ’किस कलमुंही की याद में यहां बुत बने खड़े हो?‘ घरैतिन की बात सुनते ही मैं चौंक गया और फुर्ती से घर के अंदर घुस गया।

Sunday, February 12, 2017

बनन में बागन में झुट्ठौ न बगरयो बसंत है

अशोक मिश्र
अब तो पता ही नहीं चलता कि कब मुआ वसंत आया और चला गया। दरवाजे पर, खेतों में, बागों में, गली-कूचों में न कहीं वसंत की आहट सुनाई देती है, न पदचिह्न। ईमेल के जमाने में मुआ चिट्ठी पत्री हो गया, अगोरते रहो साल भर। आता भी है, तो ह्वाट्स ऐप, लैपटॉप, फेसबुक, ट्विटर पर किसी पोस्ट के आने पर जिस तरह मोबाइल पर एलार्म रिंग बजती है, उसी तरह रस्म अदायगी के तौर पर वसंत पंचमी के दिन पीले कपड़े पहने, पीले फूल हाथों में लिए ‘वर दे वीणावादिनि वर दे..’ गाते बच्चे-बच्चियों को देखकर पता चलता है कि वसंत आ गया है। हालांकि दिन-रात आंखें गड़ाने की वजह से मिचमिची आंखों और फॉस्टफूड खाने से पियराये इन बच्चे-बच्चियों के चेहरों पर थोड़ी मस्ती, थोड़ी शरारत के भाव नदारद ही रहते हैं। ऐसे में कैसे समझा जाए कि वसंत या तो कहीं आसपास है या आ चुका है। अब तो वसंत के आने पर जी में वह फुरफुरी ही नहीं उठती, जो कुछ दशक पहले तक दूर से ही किसी नवयौवना या नवयुवक को देखते ही युवा लड़के-लड़कियों के मन में उठती थी। चेहरा एकदम पलास हो जाता था। आंखें हजार सूरज की रोशनी लिए चमकने लगती थीं। नख लेकर शिख तक मद छा जाता था। बसंत और फाल्गुन में तो बूढ़ी भौजाइयां, बूढ़े बाबा तक मदांध होने लगते थे। आम के साथ-साथ लोग बौराने लगते थे। अंतरतम में कहीं गहरे छिपी बैठी साल भर की दमित इच्छाएं और वासनाएं जैसे अंगड़ाइयां लेने लगती थीं। मन से हुलास-उल्लास तो जैसे बिला गए हैं। न तो नौजवानों में कहीं वसंत दिखता है, न प्रौढ़ों और बुजुर्गों में। कई बार तो लगता है, महाकवि पद्माकर झुट्ठै लिख गए हैं कि बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरयो बसंत है। अब वसंत आता भी है, तो दबे पांव। आता है, तो उसके आने पर थोड़ी बहुत रस्म अदायगी होती है और चुपचाप विदा हो जाता है, जैसे कुघड़ी में आया हुआ मेहमान। मेहमान के आने पर अब जिस तरह किसी को खुशी नहीं होती है, वैसे ही प्रकति और मानव से निरादरित वसंत अपने प्राचीन गौरव को याद करता हुआ थके पथिक की तरह चला जा रहा होगा। प्राचीन वसंतकालीन विरहिणी नायिका की तरह बिसूरता होगा अरण्य में बैठकर। हां, अब वैलेंटाइन्स डे आता है, पूरे गाजे-बाजे के साथ। बाजार के चक्कर में वसंत मात खा गया। वैलेंनटाइन्स डे के साथ बाजार है, क्रेता हैं, विक्रेता हैं, उन्मुक्तता है, विलासिता है, मादकता है। वसंत के नाम पर मुरझाए हुए चेहरों को वैलेंटाइन्स डे के नाम पर किस तरह चहकना है, यह बाजार ने सिखा दिया है। वैलेंटाइन्स डे ने प्रतिबद्धता तो जैसे खत्म ही कर दी है। इसको प्रपोज करो, उसको किस करो, फलां को टेडी बियर दो और वैलेंटाइन्स डे किसी और के साथ मनाओ। अगले साल वैलेंटाइन्स डे पर किसी दूसरे, तीसरे, चौथे को वैलेंटाइन चुनने की अबाध स्वतंत्रता है।

Wednesday, January 25, 2017

मतदाताओं का मजा, ले गए अलीरजा

अशोक मिश्र
विधानसभा चुनाव की रणभेरी क्या बजी, तरह-तरह के डमरू, बंदर-बंदरिया लेकर मदारी की तरह उम्मीदवार लगे करतब दिखाने। वे अपना करतब दिखाने में मस्त हैं। उन्हें मजा आ रहा है। मजा आए भी क्यों न! यदि चुनाव जीते, तो सत्ता सुंदरी के वरण का मौका जो मिलेगा। ये उम्मीदवार सिर्फ डमरू, बंदर-बंदरिया या जमूरे के भरोसे ही चुनाव जीतने की कोशिश में नहीं हैं। इन्होंने अपनी-अपनी पीठ पर एक ढोल भी बांध रखी है। जहां भी इन्हें मतदाता दिखा बजाने लगते हैं-मैं सबसे बहुत अच्छा हूं। मैं यह करूंगा, वह करूंगा। एक मैं ही ईमानदार हूं, बाकी सब बेईमान हैं।
इन उम्मीदवारों को भले ही चुनाव में मजा आ रहा हो, लेकिन जब से चुनाव आयोग अंग्रेजों के जमाने का जेलर बना है, तब से मतदाताओं का सारा मजा अली रजा ले गए। मुझे याद है कि दस-बीस साल पहले चुनाव के दौरान कितना मजा आता था। चुनाव से डेढ़-दो महीना पहले ही गली-मोहल्ले में दली-निर्दली सबके बैनर-पोस्टर लग जाते थे। किस्म-किस्म के पंपलेट, बुकलेट बांटे जाते थे। चुनाव खत्म होते-होते घर में दस-बीस किलो रद्दी इकट्ठा हो जाती थी। घरैतिन केरोसिन खत्म हो जाने पर उसी पंपलेट, बुकलेट और पोस्टर आदि से चाय और दूध गरम कर लेती थीं। घर के बच्चों को दूध और मुझे चाय नसीब हो जाती थी। पूरा घर उम्मीदवारों को जीभर कर आशीष देता था। रात-बिरात गाटरवा, पिंटुआ, बबलुआ, रमेशवा, सुरेशवा को उकसाकर, टाफी-कंपट, चना-चबैना का लालच देकर झंडे, बैनर उतरवा लिए जाते थे।
दलियों-निर्दलियों के ये झंडे-बैनर घरैतिन के बूटीक कला में पारंगत होने के जीवंत उदाहरण के रूप में काफी दिनों तक घर में शोभायमान रहते थे। बच्चों से लेकर घर के बड़े-बूढ़ों तक की जांघिया-कच्छे बनाने में ये झंडे-बैनर काम आते थे। घर के बच्चे यदि ज्यादा ऊर्जावान हुए, तो तकिए की लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई बढ़ जाया करती थी।
उन दिनों जब तक विधानसभा या लोकसभा के चुनाव चलते थे, लंपटों, निठल्लों, कामचोरों की मौज ही मौज हुआ करती थी। घर में भले ही फाकाकशी की नौबत हो, लेकिन उम्मीदवारों और उनके चिंटुओं-पिंटुओं की बदौलत चाय-पानी, पूड़ी-तरकारी से लेकर कच्ची-पक्की का जुगाड़ हो जाता था। हां, बस इलाके में रहने वाले उम्मीदवारों के खास चमचों की थोड़ी लल्लो-चप्पो करनी पड़ती थी। अब वह सुख तो जैसे  सपना हो गया। ललिता पवार की तरह खूसट सास बना चुनाव आयोग राई-रत्ती का हिसाब-किताब मांग रहा है। सच्ची बात बता दो कि फलां को कच्ची दी, अमुक को पक्की, तो परचा खारिज। भला बताओ, यह भी कोई बात हुई।

Sunday, January 22, 2017

भ्रष्टाचार मुक्त भारत या भ्रष्टाचार युक्त भारत

-अशोक मिश्र
जी हां! यह आपको ही तय करना है कि आपको कैसा भारत चाहिए? नेता, अधिकारी, मंत्री-संत्री क्या कहते हैं, वे कैसा भारत चाहते हैं, यह सवाल कम से कम हम आपके लिए बहुत मायने नहीं रखता है। हमें आपको तय करना है िक हमें कैसा भारत चाहिए? वैसेे तो नेता, मंत्री, विधायक कभी नहीं कहेंगे कि भ्रष्टाचार युक्त भारत चाहिए। वे हमेशा खुले में भ्रष्टाचार का ही विरोध करेंगे, लेकिन जब भीतरखाने लेन-देन की बात आती है, तो उनका भ्रष्टाचार युक्त भारत के प्रति प्रेम जागृत हो जाता है। मैं आपको कम से कम बीसियों फायदे भ्रष्टाचार युक्त भारत के गिना सकता हूं। आप भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ ही फायदे गिनाकर चुप रहने को मजबूर हो जाएंगे।
सच पूछिए, तो जो मजा भ्रष्टाचार युक्त भारत में रहने में है, वह भ्रष्टाचार मुक्त भारत में कहां है? सोचिए, अगर भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो गया, तो लगे रहिए लोन की लाइन में। करते रहिए अपनी बारी आने का इंतजार। तब बैंक के मैनेजर से लेकर बाबू तक आपसे यही कहते फिरेंगे, अपनी बारी का इंतजार करें। पांच करोड़ बाइस लाख बत्तीस हजार सात सौ इक्यासवां नंबर है आपका। जब नंबर आएगा, आपको सूचित कर दिया जाएगा। करते रहिए पूरी जिंदगी इंतजार। इंतजार करते-करते आपका तो इस दुनिया से टिकट कटेगा, कटेगा, आपको नाती-पोते बूढ़े हो जाएंगे, तब भी नंबर नहीं आएगा। अभी आप पांच सौ का पत्ता पकड़ाइए, चाहे जिस तरह का लोन ले लीिजए। अरे घर-कुरिया से लेकर चूहे-बिल्ली पर भी लोन हाजिर है, बस आप उनके िहस्से का ख्याल रखें।
आप आज जो इतना खूबसूरत भारत, वाइब्रेंट भारत देख रहे हैं, उसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका भ्रष्टाचार की है। अगर भ्रष्टाचार नहीं होता, तो आपके इलाको एक भी बिजली का खंबा, एक भी नाली, एक भी सड़क, एक भी पार्क मयस्सर होता कि नहीं, कौन जानता है? खंबा भोपाल से आता, सीमेंट गुजरात से आती, जमीन खोदने वाला केरल से आता, तब कहीं जाकर आपके इलाके में एक खंबा गड़ पाता। सब कुछ नियम, कायदे, कानून के मुताबिक होना होता, तो आज भी आपके मोहल्ले में सड़क तो होती ही नहीं, आप भी नाव पर बैठकर मुख्य सड़क तक जाते। अगर राष्ट्रीय या प्रांतीय राजमार्ग वालों की मेहबानी से आपके जिले का नंबर आया होता तो। अभी तो दो किमी सड़क बनाने को जितना पैसा पास होता है, तो भले ही बीस फीसदी नेता, मंत्री, संत्री की जेब में जाता हो। बीस फीसदी ठेकेदार कमाता हो, दस-पांच फीसदी पैसा इधर-उधर खर्च होता हो। पचास-साठ फीसदी रकम में भले ही टूटी-फूटी, ऊबड़-खाबड़ सड़क बनती तो है, वरना अब तक इंतजार करते रहते कि अलीगढ़ तक सड़क बन गई है, अब आगरा का नंबर है।

Sunday, January 8, 2017

कालातीत होते हैं ‘मोहल्ला पुराण’

-अशोक मिश्र
अगर आपसे पूछा जाए कि पुराण कितने हैं, तो आप अपने बचपन में रटा हुआ ‘अष्टादश पुराणेषु..’ सुना देेंगे। जी नहीं, इन पुराणों के अलावा एक पुराण होता है ‘मोहल्ला पुराण’।  यह पुराण वाचिक परंपरा का वाहक होता है। वाचिक और श्रव्य परंपरा में समय-असमय, रात-विरात हर मोहल्ले में ‘मोहल्ला पुराण’ का लेखन अनवरत चलता रहता है। समय के अदृश्य पृष्ठ पर मोहल्लावासी मौखिक रूप से मोहल्ला पुराण लिखते रहते हैं। इस पुराण के पुराने पृष्ठ दिन, सप्ताह, महीने में खुद ब खुद काल कवलित होते रहते हैं और नए पृष्ठ स्वत: जुड़ते चले जाते हैं। मोहल्ला वालों में लेखकीय गुण या उनका संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, पाली, पाकृत जैसी भाषाओं में प्रवीण होना कतई जरूरी नहीं है। कानाफूसी, बतकूचन या अफवाह फैलाने की कला में निष्णात स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध इसके रचनाकार हो सकते हैं। बस, रचनाकार के पास चटपटी, मसालेदार खबरों का अकूत कोष होना चाहिए।
किसका किससे टांका भिड़ा है। किसने अपने अड़ोसी या पड़ोसी को कुत्ता, गधा, बदतमीज, नकारा, आवारा, पागल या घमंडी कहा, तो अड़ोसी या पड़ोसी ने ऐसा कहने वाले की मां-बहन, बेटी से अंतरंग रिश्ते कायम किए। पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी, तिवारी जी, कुशवाहा जी आदि जितने भी ‘जी’ टाइप के व्यक्ति हैं, उनके घर की कलह या प्रणय कथाओं का वाचन-श्रवण मोहल्ला पुराण की दैनिक, साप्ताहिक या मासिक कतई अनैतिक नहीं माना जाता है। नैतिकता-अनैतिकता जैसी वाहियात दर्शन और सिद्धांत मोहल्ला पुराण में वर्ज्य माने जाते हैं। किसकी बहन, बेटी, मां सुबह घर से निकली थी और देर रात को घर वापस आई थी। पड़ोसी के घर में आज सब्जी बनी थी या कढ़ाई पनीर िकसी होटल से आया था। मिसेज वर्मा की रामू की अम्मा, प्रदीप की भाभी, शकुंतला की ननद से लड़ाई होने वाली है। ऐसी खबरें मोहल्ला पुराण में सबसे ऊपर स्थान पाती हैं।
जैसे कोई ठीक-ठीक यह नहीं बता सकता कि ‘अट्ठारह पुराण’कब लिखे गए और किसने लिखा, ठीक उसी तरह मोहल्ला पुराण भी कालातीत हैं। जब से समाज अस्तित्व में आया है, तब से मोहल्ला पुराण में रोज कुछ न कुछ जोड़ा-घटाया जा रहा है। इससे पहले जब आबादी कम थी, लोग गांवों या नगरों में रहते थे, तब इसे गांव या नगर पुराण कहते रहे होंगे। बाद में जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ,  नगर, कस्बा, मोहल्ला और गांव के नाम पर इसका नामकरण होता गया। मोहल्ला या गांव पुराण में ऐसे-ऐसे चुटीले और व्यंग्यीले (कुछ-कुछ रंगीले जैसा) प्रसंग रोज दर्ज होते रहते हैं, जिसको पढ़कर दुनिया भर के व्यंग्यकारों की चुटैया खड़ी हो जाए। अगर देश के व्यंग्यकार मोहल्ला पुराण के लेखकों से कुछ सीख सकें, तो व्यंग्य का बहुत भला होगा।

Tuesday, January 3, 2017

बाप के जूते में बेटे के पांव

-अशोक मिश्र
बाप तो आखिरकार बाप ही होता है। बेटा बेटा होता है। बाप के आगे बेटे की क्या बिसात है। अगर आप माई बापों ने इस कहावत को रट्टा मारकर याद कर रखा है कि तो भूल जाइए। सच पूछिए, तो भूल जाने में ही भलाई है। अगर आप आसानी से नहीं भूले, तो बेटे भुलवा देंगे और आपको यह कहावत याद करा देंगे कि बेटे किसी के भी कान काट सकते हैं। अब आपको इस मुहावरे का अर्थ बताने की भी जरूरत है? टीपू ने कितनी खूबसूरती से नेताजी के कान काटे, यह सारी दुनिया देख-सुन रही है। उसने तो बाप के ही कान नहीं काटे, चाचा, अंकल सबके नाक-कान बिना उस्तरे के ही रेत दिया। हाय..हाय कर रहे हैं बेचारे। लखनऊ से दिल्ली तक दौड़ लगा रहे हैं। सबको अपने कटे कान दिखा रहे है, लेकिन बाप-बेटे की लड़ाई में अपनी टांग अड़ाए कौन? इस मामले में जिसकी भी टांग टूटी है या टूटेगी, उन्होंने जरूर पिता-पुत्र के पचड़े में अपनी टांग फंसाई होगी।
आप इतिहास उठाकर देख लें। जिस बेटे ने अपने बाप-दादाओं के कान काटे, उसी का नाम इतिहास में दर्ज हुआ है। इतिहास में नाम दर्ज कराने की पहली शर्त यही है कि वह अपने बाप से चार जूता आगे निकले। भला बताइए, अगर आप लोहिया के सिद्धांतों को धता बता सकते हैं। उनके सिद्धांतों के नाम पर सात-आठ चेले-चपाटों के साथ पार्टी खड़ी कर सकते हैं। फिर चेले-चपाटों को ठेंगा दिखाकर उस पार्टी के भी टुकड़े करा सकते हैं, तो अब बुढ़ौती में आपकी पार्टी और आपके साथ भी तो वही इतिहास दोहराया जा सकता है। अब काहे को दैया-दैया कर रहे हो, चच्चा! दई (विधाता) दई सो कुबूल। वैसे तो यह ध्रुव सत्य है कि आज जो बाप है, कभी वह बेटा था। जो आज बेटा है, वह कभी न कभी बाप बनेगा। बाप-बेटे की यह उठापटक सनातनी है। जिस बेटे ने बाप को गच्चा दिया, तो समझो, दुनिया को गच्चा देने में प्रवीण हो गया। अगर बुढ़ापे में अपने ही बेटे से गच्चा खा गया, तो दुनिया को दिखाने को भले चीखता-चिल्लाता हो, लेकिन भीतर ही भीतर वह खुश होता रहता है-वाह बेटा! इस पुरातन गच्चावादी परंपरा को कितनी खूबसूरती से आगे बढ़ाया है।
अगर आप चाहते हैं कि आपका बेटा बुढ़ापे में आपको गच्चा न दे, आपके और आपके बेटे के बीच जूते में दाल न बंटे, तो यह बात अच्छी तरह गांठ बांध लें कि बेटा किसी भी हालत में आपके जूते में पांव डालने ही न पाए। बचपन में ही जब वह आपके जूते में पांव डालने की कोशिश करे, तो उसे बरज दें, मना कर दें। यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो जिस दिन आपके जूते में बेटे का पैर फिट हुआ, उसी दिन से समझ लीजिए कि अब आप बाप-बेटे के बीच जूते में दाल बंटने के दिन आ गए हैं। जूतमपैजार अवश्यंभावी है। इसे टाला नहीं जा सकता है। अब अगर समाजवादी बाप-बेटे में जूतमपैजार हो रही है, तो किम आश्चर्यम!