Sunday, April 23, 2017

एक पोस्ट कीन्हें बिना

अशोक मिश्र
इस देश में कभी हुआ करता था त्रेतायुग। अरे सतयुग के बाद आने वाला त्रेतायुग। उस त्रेतायुग में पैदा हुए थे शंकर सुवन केशरी नंदन। इस देवात्मा को हनुमान जी भी कहा जाता है। हनुमान जी ने अपनी आधी जिंदगी कैसे भी व्यतीत की हो, लेकिन जबसे उनका परिचय रामचंद्र जी से हुआ, तब से उन्हें बस एक ही धुन सवार थी- रामकाज कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम। करणीय, अकरणीय, लभ्य, अलभ्य जो कुछ भी था, वह सब कुछ रामकाज ही था। सीता की खोज में जाते समय मैनाक पर्वत ने जब वानर शिरोमणि हनुमान से विश्राम करने को कहा, तो उन्होंने विनयपूर्वक मैनाक के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्हें तो बस एक ही धुन थी किसी भी प्रकार हो, रामकाज करना है। यह धुन ही थी जिसने उन्हें रामचंद्र का सखा, भक्त, भाई, सचिव सब कुछ बना दिया था। उनके सखा भाव, भक्तिभाव को देखकर बाद में जनकनंदिनी भी कुछ हद तक ईष्यालु हो उठी थीं। भारतीय नारी कैसे सहन कर सकती है कि कोई उसके पति के प्रति उससे भी ज्यादा साख्यभाव रखे, भक्तिभाव रखे। वे अतुलित बलधारी होते हुए रामचंद्र के प्रति विनीत थे। वे भगवान थे, महावीर थे। उनकी लीला और महिमा अपरंपार थी। उनकी किसी से तुलना भी नहीं हो सकती है।
वह त्रेतायुग था, लेकिन यह कलियुग है। उस युग में अंजनि पुत्र महावीर थे, तो इस युग में फेसबुकवीर हैं। त्रेतायुग में भक्तिभाव का हनुमान जी बढ़कर दूसरा कोई उदाहरण खोजने पर भी नहीं मिलता, लेकिन कलियुग में फेसबुक के प्रति अनन्य भक्तिभाव लिए कोटि-कोटि फेसबुकवीर हैं, फेसबुक वीरांगनाएं हैं। इन वीरों और वीरांगनाओं की बस एक ही धुन है-‘एक पोस्ट कीन्हें बिना मोहि।’ इनकी भी भक्ति भाव, सखा भाव अप्रतिम है। ये फेसबुक की आभासी दुनिया में स्वच्छंद विचरण करते हैं, निशि-वासर, प्रात:काल, संध्याकाल, जैसे समय इनके स्वच्छंद विचरण के लिए कोई मायने नहीं रखते हैं। फेसबुक वीर और वीरांगनाएं रक्तसंबंधों, सामाजिक संबंधों को आभासी दुनिया के स्वच्छंद विचरण में बाधक मानकर उसी तरह विरक्त रहते हैं, जैसे कि कोई उच्च कोटि का साधक मोह, माया, काम, क्रोध से विरक्त रहकर परमानंद की खोज में लगा रहता है। फेसबुक वीर-वीरांगनाएं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे विकारों से विरक्त होकर बस एक पोस्ट की खोज में लगे रहते हैं। आभासी दुनिया में जहां कहीं मनोवांछित पोस्ट मिली या अपनी चौर्यकला की बदौलत किसी अन्य की मौलिक रचना को हस्तगत किया और स्वरचना प्रदर्शित करते हुए अपने फेसबुक पर पोस्ट की या प्रातिभ प्रदर्शन कर सर्जना करके पोस्ट की, तो उन्हें वैसे ही परमानंद की अनुभूति होती है, जैसे किसी साधक को लक्ष्य प्राप्त होने पर होती होगी। इन वीर-वीरांगनाओं के बाल-बच्चे, माता-पिता, पति-पत्नी और अन्य सांसारिक नाते-रिश्तेदार इनके फेसबुक प्रेम के प्रति ईर्ष्याभाव रखते हैं। फेसबुक वीरों को फेसबुकीय जगत में एक नायिका की तलाश चिरंतन काल से रही है। नायिका भेद से इन्हें रंचमात्र मतलब नहीं होता है। लुभावना चित्र देखते ही ‘इनबाक्स’ में पैठकर रसानुभूति करने लगते हैं। हां, आभासी दुनिया में वीरांगनाएं किस हेतु-अहेतु के लिए विचरती हैं, इस पर अभी अनुसंधान जारी है।

Tuesday, April 11, 2017

ज्यादा अंगरेजी न बूको, समझे

अशोक मिश्र
राजमार्ग से थोड़ा हटकर खुले मदिरालय प्रांगण में परम विपरीत विचारधारा वाले दल के कर्मठ कार्यकर्ता मिले। दोनों परम मद्यप थे, परंतु पूर्व परिचित भी। दोनों ने एक दूसरे पर इतनी तीव्रता से दृष्टिपात किया कि एक बार लगा, दोनों के चक्षु अपने-अपने कोटरों से बाहर गिर पड़ेंगे। फिर एक ने दूसरे का पाणिग्रहण कर काष्ठासन (बेंच) पर बिठाते हुए कहा, ‘भ्रात! यह सत्य है कि तुम्हारे दल के विचारों से हमारा दल रंचमात्र सहमत नहीं है, किंतु मदिरालय में क्या दल और क्या दलदल, क्या मत और क्या मतांतर, सब निरर्थक हैं। अत: हे भ्रातृश्रेष्ठ! आओ, हम सकल मतभेद का परित्याग कर प्रसन्न मन से मदिरापान करें।’
दूसरे दल के कार्यकर्ता के अधरों पर स्मित हास्य प्रस्फुटित होने लगा। उसने मदिरा विक्रेता को आसव पेश करने का संकेत किया। तीन-तीन चषक मदिरापान के बाद दोनों मद्यप मुखर हो उठे। एक मद्यप ने चषक उठाकर लंबा घूंट भरा और मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘भ्राताश्री! आपको तो यह ज्ञात ही होगा कि आदिकाल से लेकर पांच सदी पूर्व तक भारत की विश्व में प्रतिष्ठा जगत्गुरु की रही है। ज्ञान गुरु होने का मूल कारण भारतीय पुरुषों का सुर होना रहा है। सुर अर्थात वे लोग जो सुरापान करते थे और असुर अर्थात वे लोग जो सुरापान नहीं करते थे। उस समय सुरापान करके जो व्यक्ति सुर में गायन करते थे, वे ही कालांतर ससुर कहे गए। जो थोड़ा भद्दा गाते थे, वे भसुर कहे जाते थे। लेकिन इन मूढ़मति भाषा विज्ञानियों को क्या कहूं, इन्होंने ससुर और भसुर का अर्थ ही अनुलोम-विलोम जैसा कर दिया। असुरों में लंपट, लबार, चोर, कामी बहुतायत में पाए जाते थे। किंतु सुरापान करने वालों में ऐसी प्रवृत्तियां रंचमात्र नहीं पाई जाती थीं।’
इतना कहकर संभाषण करने वाले मद्यप ने अपना चषक उठाकर सारी सुरा उदरस्थ की और फिर बोला, ‘भगवत्कृपा से अब फिर से हम अपनी पुरातन संस्कृति की ओर लौट रहे हैं। शराब या वाइन शॉपों के कायांतरण की प्रक्रिया बस शुरू होने वाली है। इनके नाम सुरालय, मदिरालय या मद्यशाला रखने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।’ 
यह सुनते ही दूसरे वाले ने पहले तो चषक के कंठ तक मदिरा भरी, फिर उदरस्थ किया और फिर आवेश में रिक्त चषक को भूमि पर पटकते हुए कहा, ‘तेरी तो..यह जो संस्कृत निष्ठ भाषा छांट रहा है, वह बंद कर और शुद्ध हिंदी में सुन। सरकार बन गई है न! चुपचाप शासन कर। आज तेरी सरकार एंटी रोमियो स्क्वायड बना रही है, भ्रष्टाचार की जांच कर रही है, करे। शौक से करे। कौन सा सौ-दो सौ साल तक तुम्हारी पार्टी राज करेगी। कहा भी गया है कि कभी नाव पानी पर, कभी पानी नाव पर। आज तुम्हारी सरकार है, कल हमारी थी। हो सकता है, परसों, नरसों, तरसों हमारी सरकार बने या न भी बने। कोई दूसरा शासन करे, तब..? तब तुम भी हमारी तरह भीगी बिल्ली बने ‘म्याउं..म्याउं’ कर रहे होगे। इसलिए ज्यादा अंगरेजी न बूको। समझे।’ इतना कहकर वह मद्यप उठा, मदिरा विक्रेता को पैसे दिए बिना अपने गंतव्य की ओर चला गया।

Monday, April 3, 2017

अब पतियों पर भी गिरेगी गाज

अशोक मिश्र
सुबह सोकर उठा ही था कि मुसद्दी लाल किसी आतंकवादी की तरह घर में घुस आए। आते ही बिना कोई दुआ-सलाम किए गोला-बारी करने लगे, ‘पंडी जी, अब तो जीने की तमन्ना ही नहीं रही। जब हुस्न पर ही पहरा हो, तो फिर जीने का क्या फायदा? आप किसी के हुस्न का ठीक से दीदार नहीं कर सकते, उससे बातें नहीं कर सकते, उससे छेड़छाड़ नहीं कर सकते, तो फिर इतनी सुंदर दुनिया में रहने का क्या मतलब है? आप पल-दो पल के लिए किसी पार्क, मॉल या रेस्त्रां में नहीं जा सकते, किसी चौराहे पर खड़े बतरस का आनंद नहीं उठा सकते? भला बताओ, यह भी कोई बात हुई?’ मुसद्दी लाल की बात सुनकर मैं भौंचक रह गया। मैंने पूछा, ‘बात क्या है, मुसद्दी भाई?’
मुसद्दी लाल गहरी सांस छोड़ते हुए बोले, ‘पंडी जी, चलो मान लिया कि शोहदों, मनचलों को रोकने के लिए आपने एंटी रोमिया स्क्वाड बना लिया। उन्हें श्लील-अश्लील हरकत करने और प्रताड़ित करने से रोक दिया। लेकिन आप प्यार पर ही पहरा बिठा देंगे। हुस्न का दीदार बंद करा देंगे? यह कहां का जहांगीरी इंसाफ है, भई! मेरे एक मित्र सीएम साहब के खास हैं। कल बता रहे थे कि मुख्यमंत्री जी जल्दी ही एंटी हसबैंड स्क्वाड बनने वाले हैं। पति छेड़छाड़ निरोधक अधिनियम पारित होने वाला है। अब पति अपनी बीवियों से चुहुल नहीं कर पाएंगे, उन्हें घूर नहीं पाएंगे।
पार्क और रेस्त्रां तो छोड़ो, घर में भी पति अपनी घरैतिन से छेड़छाड़ नहीं कर सकेगा। हर पति को थाने जाकर शपथपत्र पर दस्तखत करके थानेदार के समक्ष शपथ लेनी होगी कि मैं फलां वल्द फलां शपथ लेता हूं कि आज से मैं अपनी बीवी से न चुहुल करूंगा, न उसे छेडूंगा। साली, सलहजों, भाभियों को बहन-बेटी के समान मानते हुए न तो उनसे किसी किस्म का मजाक करूंगा, न उनके मजाक का जवाब दूंगा। पूर्व में जिन रिश्तों के तहत छेड़छाड़, चुहुलबाजी, हंसी-मजाक के विशेषाधिकार पुरुषों को प्राप्त थे, उन्हें मैं स्वेच्छा से त्याग रहा हूं। मैं यह भी शपथ लेता हूं कि यदि बीवी, साली, सलहज, भाभी आदि चुहुल करती हैं, छेड़छाड़ करती हैं, चिकोटी काटती हैं, तो उसे प्रसन्नतापूर्वक सहन करूंगा, प्रतिवाद नहीं करूंगा।’
इतना कहकर मुसद्दी लाल ने गहरी सांस ली। फिर बोले, ‘पंडी जी! आप ही बताएं, यदि ऐसा हो गया, तो क्या होगा?’ मैंने कहा, ‘आप चिंता न करें, मुसद्दी लाल जी। ऐसा कोई अधिनियम पारित हुआ, तो सबसे पहले महिलाएं ही इसके विरोध में सड़कों पर उतरेंगी। छेड़छाड़, चुहुलबाजी, नैन-मटक्का हर इंसान के जीवन में प्रेरक का काम करते हैं। यह मानव स्वभाव का अभिन्न अंग है, इसे कोई कानून खत्म नहीं कर सकता है। अच्छा बताओ, महिलाएं घर से निकलते समय सजती क्यों हैं? ताकि लोग उन्हें देखें, उनके सौंदर्य को सराहें। अगर ऐसा हुआ, तो अरबों-खरबों रुपये के सौंदर्य प्रसाधन बेकार हो जाएंगे। बाजार चौपट हो जाएगा।’यह सुनते ही मुसद्दी लाल उठे और बिना चाय-पानी पिये अपने घर चले गए।

Saturday, March 25, 2017

तुम्हारी भौजाई ने घुघुरी बनाया है, आ जाना

अशोक मिश्र
जब से उन्होंने कनफुसकी की है, तब से सारा देश सन्न है! कयासों का बाजार गर्म है। अखबारी और चैनली लाल बुझक्कड़ों से लेकर गली-कूचे तक के गपोड़ियों और ठेलुओं के अपने-अपने कयास हैं, अपने-अपने विश्लेषण हैं। पत्रकारिता की खाल ओढ़कर किसी ज्योतिषी की तरह भविष्यवाणी करने वाले लाल बुझक्कड़ तभी से यह खोजने की कवायद कर रहे हैं कि आखिर मामले की पूंछ कहां है? पूंछ पारिवारिक है या राजनीतिक, बेटे की चिंता से जुड़ा है या जवानी के दिनों में की गई खुराफात के उजागर हो जाने की चिंता।
उस्ताद गुनाहगार तो बड़े दावे के साथ कह रहे हैं, ‘मूर्ख हो तुम लोग, जो इन्हें एक दूसरे का विरोधी मानते हो। अरे ये सब एक ही थाली के बैगन हैं। जब इनमें से कोई एक देश का भाग्यविधाता होता है, तो दोनों, तीनों...या यों कहें कि सभी एक दूसरे को राजनीतिक मंच पर भले ही रावण, अहिरावण या महिरावण बताते हों, लेकिन पर्दे के पीछे गलबहियां डालकर हंसते हैं, खिलखिलाते हैं, एक दूसरे के कंधे पर सिर रखकर अपनी-अपनी भूली-बिसरी प्रेमिकाओं की याद में आंसू बहाते हैं, स्याह-सफेद कारनामों का हल खोजने की जुगत भिड़ाते हैं। यह कानाफूसी किसी विपदा को टालने का अनुरोध करने के लिए की गई थी।’
मेरे पत्रकार मित्र राम लुभाया अपने किसी सूत्र के हवाले से कहते हैं कि उन्होंने कान में सिर्फ इतना कहा था, ‘गुरु! तुम्हीं अच्छे रहे, जो न इधर फंसे, न उधर। मुझे देखो, मेरी तो हालत तो ‘दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय’ वाली हो रही है। कभी ये कुर्ता पकड़कर खींचती है, तो कभी दूसरी वाली के बाल-बच्चे। भाई-पट्टीदारी के झगड़े में मेरी हालत फुटबाल जैसी हो गई है, जिसे हर कोई किक लगाना चाहता है, ताकि ‘गोल’ हो जाऊं। ‘माया’, ‘मोह’ ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।’
लेकिन असली बात कोई नहीं जानता, सिवा मेरे। आपको राज की बात बताता हूं किसी से कहिएगा नहीं। कान में पुराने पहलवान ने नए पहलवान से सिर्फ इतना ही कहा था, ‘गुरु! फुरसत हो, तो आज शाम को घर आना। तुम्हारी भाभी ने मसालेदार घुघुरी बनाई है। ठंडी-ठंडी छाछ के साथ घुघुरी खाने का मजा ही कुछ और है।’ पहलवान ने जब पोते की शादी की थी, तो उन्होंने दूसरे अखाड़े का होते हुए नए पहलवान को शादी में शरीक होने का न्यौता भेजा था। नए पहलवान आए और राजनीतिक वैर-भाव भुलाकर बहू-पोते को आशीर्वाद के साथ-साथ गिफ्ट-शिफ्ट भी दिया था। वैसे भी लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था की राजनीति में मतभेद होते हैं, मनभेद नहीं। यह तो हम-आप जैसे बज्रमूरख होते हैं, जो इनके चक्कर में अपने पड़ोसी से मारकर लेते हैं। जिस बात को लेकर बड़े-बड़े लाल बुझक्कड़ जो कयास लगा रहे हैं, वैसी कोई बात नहीं है। बस, घुघुरी खाने का न्यौता भर है।

श्रंगार के दोहे

अधर-अधर मिलकर कभी, प्रिये हुए थे एक
प्रणय ग्रंथ के अनपढ़े, बांचे पृष्ठ अनेक।
वसुधा पर झरती रही, टप-टप, टप-टप मेह।
रहे पयोधर अनमने, अलसायी-सी देह।
प्रेम कभी मत तौलिए, मन पर पड़ती चोट।
लाख निकटता फिर बढ़े, रह जाती है खोट।
मन कस्तूरी हो गया, प्रिय का पा सानिध्य।
विकसा पंकज प्रेम का, कुछ न रहा मालिन्य।
तप्त अधर जब भी मिले, हुई चंदनी देह।
मधुकर-सा मन हो गया, द्राक्षासव-सा देह।
प्रीत पतिंगे की अमर, दीपक को सब दोष।
परस्वारथ जलता रहा, मिला यही परितोष।

Monday, March 6, 2017

बौराती प्रकृति, कुत्ते और राम लुभाया

अशोक मिश्र
फागुन में पहले प्रकृति बौराती थी। फिर आम्र मंजरियां बौराती थीं। फिर पोपले मुंह और पिलपिले शरीर वाले सत्तर-पचहत्तर साल की उम्र वाले ‘बाबा’ बौराते थे। इनके बौराते ही भौजाइयां बौरा जाती थीं। फिर तो देवर, सालियां-सलहजें, ननद-ननदोई के बौराने का एक सिलसिला ही शुरू हो जाता था। हंसी-ठिठोली के नाम पर श्लील-अश्लील का जैसे भेद ही मिट जाता था। फागुनी बयार शरीर में मादकता, कामुकता या छिछोरेपन का ऐसा संचार करती थी कि सारी मान-मर्यादाएं बिला जाती थीं। फागुनी बयार अब भी चलती है, लेकिन अब बाबा, भौजाइयां, साली-सहलजों की बजाय कुत्ते बौराते हैं, राजनीति बौराती है, नेता बौराते हैं और बौराते हैं मेरे वरिष्ठ पत्रकार साथी राम लुभाया।
वैसे राम लुभाया तो बारहों महीने बौराये रहते हैं। अभी कल की बात है। सुबह आफिस आए, तो मैंने लपकर अभिवादन किया, ‘सर जी गुड मार्निंग...।’ राम लुभाया ने अपनी पीठ पर टंगा छोटा सा बैग मेज पर पटका और घूमकर झल्लाते हुए बोले, ‘क्या है... अरे हो गया एक दिन गुड मार्निंग..अब रोज-रोज आते ही मेरे सिर पर काहे दे मारते हैं गुडमार्निंग? एक तो रात भर मोहल्ले के कुत्तों ने सोने नहीं दिया, सुबह थोड़ी देर के लिए झपकी भी आई, तो एक मरघिल्ली सी खबर छूटने की वजह से सुबह-सुबह संपादक जी हौंकते रहे। जीना हराम हो गया है मेरा।’ जैसे बरसात में किसी बच्चे के छू लेने पर केंचुआ सिकुड़ जाता है, उसी तरह राम लुभाया की बात सुनकर मैं सिमट गया। शायद राम लुभाया को अपनी गलती का एहसास हुआ। बोले, ‘यार..क्या बताऊं। इधर जब से चुनावी बयार बहने लगी है, तब से सारे मोहल्ले के कुत्ते मेरे दरवाजे पर रात दस-ग्यारह बजे के बाद इकट्ठा हो जाते हैं। दरवाजे के सामने का खुला हिस्सा चुनावी सभा में तब्दील हो जाता है। कुत्ते मुंह उठाकर मानो भाषण देने लगते हैं। कोई नाली के इस पार, तो कोई नाली के उस पार। अगर उनकी भाषा मेरी समझ में आती, तो शायद यही कहते होंगे-प्यारे कुत्ता भाइयों! हमारी पार्टी की सरकार बनी, तो विकास की हड्डियां सबको मिलेंगी। सबको कहीं भी टांग उठाकर सूसू करने की स्वतंत्रता होगी।’
राम लुभाया अब अपनी रौ में आ गए थे। बोले, ‘तब तक दूसरा मुंह उठाकर भौंकता है, झुट्ठे हैं ये विकास की बात करने वाले। ये हम कुत्तों को छोटा-बड़ा, नस्ल, रंग के नाम पर लड़ाते हैं और मौज करते हैं। हमारी सरकार में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता है। हमारी सरकार बनी, तो सबको किसी के भी घर में घुसकर रोटी और बोटी चुराने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।’ राम लुभाया थोड़ी देर सांस लेने के लिए रुके। फिर बोले, ‘रात में जब देखा कि इस कुत्ता सभा के चलते सोने को नहीं मिलेगा, तो मैंने उठाया डंडा। चुपके से गेट खोला और पिल पड़ा इन कुत्तों पर। खूब लठियाया। तीनों गली के कुत्तों को खूब धोया। ससुरों! मेरा दरवाजा छोड़कर कहीं और करो अपनी चुनावी सभा। आदमी अगर कुत्तों के चुनाव में वोट दे सकता, तो मैं कतई तुम कुत्तों को वोट नहीं देता।’ इतना कहकर राम लुभाया फिस्स से हंस दिए।

Sunday, February 19, 2017

बड़ी उलझन है भाई

अशोक मिश्र
कहते हैं कि मानो तो देव, नहीं तो पत्थर तो हैं ही। मानिए तो बहुत बड़ी उलझन है, न मानिए, तो यह कोई समस्या ही नहीं है। जब समस्या ही नहीं, तो फिर यह ‘…किंतु, ..परंतु, ..आह, ..वाह’ जैसी बातें निरर्थक हैं। लेकिन मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी समस्या है। एकदम जम्मू-कश्मीर विवाद की तरह, जिसे जितना सुलझाओ, उतनी ही उलझती जाती है। मेरे सामने सवाल यह नहीं है कि किसको चुनें। मुद्दा यह है कि किसे नकार दें। कौन अच्छा है, कौन बेकार..यह तय कर पाना, कोई आसान काम है क्या? ऐसी ऊहापोह जैसी स्थिति तो उन लड़कियों के सामने भी पैदा नहीं हुई होगी जिन्हें प्रेमी और माता-पिता द्वारा सुझाए गए दस-बारह लड़कों में से किसी एक को जीवन साथी के रूप में चुनना हो। समस्या यह है कि मन किसी एक के नाम पर स्थिर नहीं हो पा रहा है। एक से बढ़कर एक प्रत्याशी हैं चुनाव मैदान में। कोई किसी गुण में बेजोड़ है, तो कोई किसी दूसरे गुण में अद्वितीय। किसी के नाम पर हत्या के बारह मुकदमे चल रहे हैं, तो कोई पांच हत्या, दो हत्या के प्रयास के आरोप में जमानत पर है। बलात्कार के मामले की सजा तो पांच साल पहले ही काट चुका है।
अब कल ही वोट मांगने आए, प्रत्याशी की खूबियां सुनें। बेचारे ने सात बार सिर्फ एक ही उद्योगपति से रंगदारी वसूली, तो नामाकूल व्यापारी ने पुलिस बुलाकर पकड़वा दिया। यह तो कहिए कि थाने की पुलिस शरीफ निकली। व्यापारी के घर से पकड़कर लाई और थाने में चाय-पानी कराकर बेचारे को विदा कर दिया, वरना बेचारा तो गया था न तेरह के भाव। व्यापारी को कौन समझाए कि जहां गुड़ होगा, वहीं तो चीटें आएंगे। और चीटें आएंगे, तो कुछ न कुछ गुड़ खाएंगे ही। इसमें भला आपत्तिजनक और गैरकानूनी क्या है? पिछले हफ्ते एक पार्टी का उम्मीदवार मेरी गली में प्रचार कर रहा था, उसके सुदर्शन चेहरे पर अर्ध चंद्राकार चाकू का निशान इस तरह सुशोभित हो रहा, मानो चुनाव में विजय के लिए उसने द्वितीया के चांद पर अपना माथा पटका हो और चंद्रमा ने आशीर्वाद के रूप में अपने अर्धचंद्राकार स्वरूप की छाप लगा दी हो। उसे देखकर तो मन में श्रद्धा का भाव इस तरह उमड़ा पड़ रहा था, जैसे ज्यादा भूखा आदमी किसी शादी समारोह में खाने का मौका पा जाए और अजर-गजर जो भी मिलता जाए, खाता जाए और बाद में वह खाया-पिया बार-बार उमड़-घुमड़कर बाहर आने को आतुर हो।
जब ऐसे ऊर्जावान, प्रतिभावान, दयावान, बली, बाहुबलि उम्मीदवार हों, तो मन ऊहापोह की स्थिति में होगा ही। उस पर तो घबराहट और बढ़ जानी ही है, जब उम्मीदवारों के दादा ने अप्रत्यक्ष धमकी दे रखी हो कि सारी जन्मकुंडली है हमारे पास, सबकी पोल खोल दूंगा। दिक्कत यही है कि किसको नकार दें। सब एक से बढ़कर एक सुपरलेटिव डिग्री के हैं। हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, भ्रष्टाचारी हैं, दलाल हैं, शोषक हैं, दोहक हैं, उत्पीड़क हैं। मजा यह कि न ऊधौ कम हैं, न माधौ। विडंबना यह है कि इन्हीं में से किसी एक को चुनना है। बड़ी उलझन है भाई! क्या करूं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं।

Monday, February 13, 2017

प्रेम बाड़ी उपजे, प्रेम हाट बिकाय

अशोक मिश्र
एक दिन मैं ऑफिस से कुछ जल्दी घर चला आया। मैंने देखा कि मेरा तेरह वर्षीय बेटा और उसका हमउम्र दोस्त राकेश, दोनों बरामदे में बैठे बातचीत कर रहे थे। मेरा बेटा अपने दोस्त से कह रहा था, ‘देख, तू चाहे कुछ भी कहे, लेकिन चार-पांच साल बाद मैं अमेरिका जरूर जाऊंगा।’ उसके दोस्त ने कहा, ‘हायर स्टडी के लिए? यह तो बहुत अच्छी बात है। यार, वहां पढ़ाई के लिए जाना तो मैं भी चाहता हूं। वहां की डिग्रियों की सचमुच बड़ी वैल्यू है।’  मेरे बेटे ने मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘हायर स्टडी के लिए नहीं बुद्धू, प्रेम की पढ़ाई करने के लिए। कल ही एक अखबार में खबर आई है कि अमेरिका में एक कंपनी अब लोगों को प्रेम करना सिखाएगी। यह एकदम नई किस्म की पढ़ाई है। जिसकी डिग्री और कहीं नहीं दी जाती है। अपनी गर्लफ्रेंड या ब्वायफ्रेंड को कैसे एसएमएस किया जाए, फेसबुक पर कैसी पोस्ट डाली जाए, ट्विटर पर क्या लिखा जाए, ऐसा क्या लिखा जाए कि वह इंप्रेस हो जाए, इसकी वहां शिक्षा दी जाएगी।’
मेरे बेटे के दोस्त ने आश्चर्य से मुंह फाड़ा, ‘अच्छा? तू यह सब पढ़ने अमेरिका जाएगा? अबे तुझे इसके लिए अमेरिका जाने की क्या जरूरत है? यह सब पढ़ाई तो तू यहां भी कर सकता है। इसके लिए अपने देश में कितने लवगुरु हैं न!’ मेरे बेटे ने जवाब दिया, ‘चल मान लिया थोड़ी देर के लिए कि मैं लवगुरु से पढ़ भी लूं, लेकिन क्या वह डिग्री देंगे? और फिर उस डिग्री की वैल्यू क्या रहेगी? सोच, छह-सात साल बाद जब मैं अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी से बीएल (बैचलर ऑफ लव) या एमएल (मास्टर ऑफ लव) की डिग्री लेकर लौटूंगा, तो मेरी गर्लफ्रेंड पर क्या इंप्रेशन जमेगा। मेरी तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी।’
मेरा बेटा कुछ और कहता, इससे पहले मुझे एक निगोड़ी खांसी आ गई। मेरा कुलदीपक और उसका दोस्त दोनों सकपका गए और बरामदे से निकल कर सड़क पर आ खड़े हो गए। बेटे की बातें सुनकर मुझे कबीरदास याद आ गए। बेचारे कबीरदास यह रटते-रटते मर गए कि प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।‘ कबीरदास के जमाने में तो प्रेम की खेती शायद होती भी नहीं थी। कुछ माफिया टाइप के लोग छोटे-मोटे पैमाने पर प्रेम की खेतीबाड़ी करते भी थे, तो उनको कोई पूछना भी नहीं था। उन दिनों प्रेम हॉट-बाजारों में भी नहीं बिकता था। हालांकि राजा-महाराजा बाकायदा मीना बाजार लगवाते थे, लेकिन वह आम लोगों की पहुंच से बाहर की बात थी। प्रेम के खरीदारों की संख्या तो तब बहुत सीमित थी। लेकिन आज तो कबीरदास की पूरी थ्योरी ही उलटी जा रही थी। प्रेम की न केवल खेती की जा रही है, बल्कि उसे हॉट-बाजार में खरीदा-बेचा जा रहा है। कबीरदास की थ्योरी पर मैं आगे कुछ और सोचता-विचारता कि घरैतिन रसोई से बाहर निकली और बोली, ’किस कलमुंही की याद में यहां बुत बने खड़े हो?‘ घरैतिन की बात सुनते ही मैं चौंक गया और फुर्ती से घर के अंदर घुस गया।

Sunday, February 12, 2017

बनन में बागन में झुट्ठौ न बगरयो बसंत है

अशोक मिश्र
अब तो पता ही नहीं चलता कि कब मुआ वसंत आया और चला गया। दरवाजे पर, खेतों में, बागों में, गली-कूचों में न कहीं वसंत की आहट सुनाई देती है, न पदचिह्न। ईमेल के जमाने में मुआ चिट्ठी पत्री हो गया, अगोरते रहो साल भर। आता भी है, तो ह्वाट्स ऐप, लैपटॉप, फेसबुक, ट्विटर पर किसी पोस्ट के आने पर जिस तरह मोबाइल पर एलार्म रिंग बजती है, उसी तरह रस्म अदायगी के तौर पर वसंत पंचमी के दिन पीले कपड़े पहने, पीले फूल हाथों में लिए ‘वर दे वीणावादिनि वर दे..’ गाते बच्चे-बच्चियों को देखकर पता चलता है कि वसंत आ गया है। हालांकि दिन-रात आंखें गड़ाने की वजह से मिचमिची आंखों और फॉस्टफूड खाने से पियराये इन बच्चे-बच्चियों के चेहरों पर थोड़ी मस्ती, थोड़ी शरारत के भाव नदारद ही रहते हैं। ऐसे में कैसे समझा जाए कि वसंत या तो कहीं आसपास है या आ चुका है। अब तो वसंत के आने पर जी में वह फुरफुरी ही नहीं उठती, जो कुछ दशक पहले तक दूर से ही किसी नवयौवना या नवयुवक को देखते ही युवा लड़के-लड़कियों के मन में उठती थी। चेहरा एकदम पलास हो जाता था। आंखें हजार सूरज की रोशनी लिए चमकने लगती थीं। नख लेकर शिख तक मद छा जाता था। बसंत और फाल्गुन में तो बूढ़ी भौजाइयां, बूढ़े बाबा तक मदांध होने लगते थे। आम के साथ-साथ लोग बौराने लगते थे। अंतरतम में कहीं गहरे छिपी बैठी साल भर की दमित इच्छाएं और वासनाएं जैसे अंगड़ाइयां लेने लगती थीं। मन से हुलास-उल्लास तो जैसे बिला गए हैं। न तो नौजवानों में कहीं वसंत दिखता है, न प्रौढ़ों और बुजुर्गों में। कई बार तो लगता है, महाकवि पद्माकर झुट्ठै लिख गए हैं कि बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरयो बसंत है। अब वसंत आता भी है, तो दबे पांव। आता है, तो उसके आने पर थोड़ी बहुत रस्म अदायगी होती है और चुपचाप विदा हो जाता है, जैसे कुघड़ी में आया हुआ मेहमान। मेहमान के आने पर अब जिस तरह किसी को खुशी नहीं होती है, वैसे ही प्रकति और मानव से निरादरित वसंत अपने प्राचीन गौरव को याद करता हुआ थके पथिक की तरह चला जा रहा होगा। प्राचीन वसंतकालीन विरहिणी नायिका की तरह बिसूरता होगा अरण्य में बैठकर। हां, अब वैलेंटाइन्स डे आता है, पूरे गाजे-बाजे के साथ। बाजार के चक्कर में वसंत मात खा गया। वैलेंनटाइन्स डे के साथ बाजार है, क्रेता हैं, विक्रेता हैं, उन्मुक्तता है, विलासिता है, मादकता है। वसंत के नाम पर मुरझाए हुए चेहरों को वैलेंटाइन्स डे के नाम पर किस तरह चहकना है, यह बाजार ने सिखा दिया है। वैलेंटाइन्स डे ने प्रतिबद्धता तो जैसे खत्म ही कर दी है। इसको प्रपोज करो, उसको किस करो, फलां को टेडी बियर दो और वैलेंटाइन्स डे किसी और के साथ मनाओ। अगले साल वैलेंटाइन्स डे पर किसी दूसरे, तीसरे, चौथे को वैलेंटाइन चुनने की अबाध स्वतंत्रता है।

Wednesday, January 25, 2017

मतदाताओं का मजा, ले गए अलीरजा

अशोक मिश्र
विधानसभा चुनाव की रणभेरी क्या बजी, तरह-तरह के डमरू, बंदर-बंदरिया लेकर मदारी की तरह उम्मीदवार लगे करतब दिखाने। वे अपना करतब दिखाने में मस्त हैं। उन्हें मजा आ रहा है। मजा आए भी क्यों न! यदि चुनाव जीते, तो सत्ता सुंदरी के वरण का मौका जो मिलेगा। ये उम्मीदवार सिर्फ डमरू, बंदर-बंदरिया या जमूरे के भरोसे ही चुनाव जीतने की कोशिश में नहीं हैं। इन्होंने अपनी-अपनी पीठ पर एक ढोल भी बांध रखी है। जहां भी इन्हें मतदाता दिखा बजाने लगते हैं-मैं सबसे बहुत अच्छा हूं। मैं यह करूंगा, वह करूंगा। एक मैं ही ईमानदार हूं, बाकी सब बेईमान हैं।
इन उम्मीदवारों को भले ही चुनाव में मजा आ रहा हो, लेकिन जब से चुनाव आयोग अंग्रेजों के जमाने का जेलर बना है, तब से मतदाताओं का सारा मजा अली रजा ले गए। मुझे याद है कि दस-बीस साल पहले चुनाव के दौरान कितना मजा आता था। चुनाव से डेढ़-दो महीना पहले ही गली-मोहल्ले में दली-निर्दली सबके बैनर-पोस्टर लग जाते थे। किस्म-किस्म के पंपलेट, बुकलेट बांटे जाते थे। चुनाव खत्म होते-होते घर में दस-बीस किलो रद्दी इकट्ठा हो जाती थी। घरैतिन केरोसिन खत्म हो जाने पर उसी पंपलेट, बुकलेट और पोस्टर आदि से चाय और दूध गरम कर लेती थीं। घर के बच्चों को दूध और मुझे चाय नसीब हो जाती थी। पूरा घर उम्मीदवारों को जीभर कर आशीष देता था। रात-बिरात गाटरवा, पिंटुआ, बबलुआ, रमेशवा, सुरेशवा को उकसाकर, टाफी-कंपट, चना-चबैना का लालच देकर झंडे, बैनर उतरवा लिए जाते थे।
दलियों-निर्दलियों के ये झंडे-बैनर घरैतिन के बूटीक कला में पारंगत होने के जीवंत उदाहरण के रूप में काफी दिनों तक घर में शोभायमान रहते थे। बच्चों से लेकर घर के बड़े-बूढ़ों तक की जांघिया-कच्छे बनाने में ये झंडे-बैनर काम आते थे। घर के बच्चे यदि ज्यादा ऊर्जावान हुए, तो तकिए की लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई बढ़ जाया करती थी।
उन दिनों जब तक विधानसभा या लोकसभा के चुनाव चलते थे, लंपटों, निठल्लों, कामचोरों की मौज ही मौज हुआ करती थी। घर में भले ही फाकाकशी की नौबत हो, लेकिन उम्मीदवारों और उनके चिंटुओं-पिंटुओं की बदौलत चाय-पानी, पूड़ी-तरकारी से लेकर कच्ची-पक्की का जुगाड़ हो जाता था। हां, बस इलाके में रहने वाले उम्मीदवारों के खास चमचों की थोड़ी लल्लो-चप्पो करनी पड़ती थी। अब वह सुख तो जैसे  सपना हो गया। ललिता पवार की तरह खूसट सास बना चुनाव आयोग राई-रत्ती का हिसाब-किताब मांग रहा है। सच्ची बात बता दो कि फलां को कच्ची दी, अमुक को पक्की, तो परचा खारिज। भला बताओ, यह भी कोई बात हुई।