Tuesday, June 20, 2017

लौह पुरुष के अंतिम सपने का बिखर जाना

अशोक मिश्र
लौह पुरुष को रात भर नींद नहीं आई। उनकी पीड़ा का पारावार नहीं है। उन्हें आज पहली बार अपनी भलमनसाहत पर अफसोस हुआ। वट वृक्ष रूपी जो दल आज जब भारतीय राजनीति में अनंत शाखाएं फैलाए गर्वोन्नत खड़ा है, उसका बीजारोपण उन्होंने ही किया था। जब यह पौधा उगा था, तब लौह पुरुष और उनके एक अन्य साथी के रूप में दो ही पत्तियां इसमें थीं। लौहपुरुष और उनके साथी ने दल को अपनी जिजीविषा, मेहनत और कर्मठता के साथ धर्मवादी विचारधारा को सड़ा गलाकर खाद-पानी बनाया, उस वट वृक्ष को पुष्पित-पल्लवित किया। और उनका दुर्भाग्य देखिए कि एकाएक वट वृक्ष का माली ही बदल गया। उनकी प्रतिबद्धता और नीयत पर सवाल उठाए जाने लगे। नए माली ने पूरे बाग पर कब्जा कर लिया। यह वही माली था, जिसे कभी उसकी कारगुजारियों से नाराज होकर लौह पुरुष के साथी राजनीतिक वनवास दे देना चाहते थे। लेकिन यह लौह पुरुष ही थे, जो उसके सामने ढाल बनकर सामने खड़े हो गए थे।
उस माली ने बाग पर कब्जा करने के बाद सबसे पहले लौहपुरुष के पर कतरे। लौह पुरुष छटपटाकर रह गए। नए माली ने न केवल उन्हें बाग की चहारदीवारी से बाहर खदेड़ दिया, बल्कि उन्हें राजनीतिक वनवास ही दे दिया। लौह पुरुष को यह उम्मीद थी कि नया माली शायद उन्हें लौह पुरुष से शिखर पुरुष बना दे, लेकिन आज उनका यह अंतिम सपना भी टूटकर बिखर गया। वैसे सपने तो उनके कई टूटे, लेकिन यह सोचकर संतोष कर लिया, चलो..प्रधान नहीं बन पाए, तो क्या हुआ डिप्टी तो बन ही गए थे। लौहपुरुष की उपाधि तो जनता ने बड़े आदर-सम्मान के साथ दे ही दी। कहां सोचा था कि एक दिन इतिहास रचेंगे। इतिहास में नाम दर्ज हो जाएगा। नाम तो अब भी दर्ज होगा लौह पुरुष का, लेकिन हाशिये पर ढकेल दिए गए बेचारे पुरुष के तौर पर।


एक बहुत पुरानी कहावत है-जाके पैर न फटी बिंवाई, सो क्या जाने पीर पराई। लौह पुरुष का दर्द वही जान सकता है, जिसके सपने मुट्ठी से झरती रेत की तरह हाथ से निकल गए हों। भाग्य की विडंबना देखिए, जिस दल रूपी वट वृक्ष की रक्षा के लिए बेचारे लौह पुरुष जिंदगी भर कउआ हंकनी करते रहे, उसी दल के मालियों ने उन्हें यह सिला दिया। उनका आखिरी सपना भी बड़ी बेमुरौवत्ती से तोड़ दिया। आज लौह पुरुष को ठीक वैसे ही अफसोस हो रहा है, जैसे मुगल बादशाह औरंगजेब को अपनी जिंदगी की आखिरी रात में हजारों लोगों के कत्लेआम का पछतावा था। दल को खड़ा करने के लिए लौह पुरुष पूरे देश में यात्रा लेकर घूमे-फिरे, सोमनाथ तक गए। तब उम्र के हिसाब से भले ही पक्के यानी अधेड़ रहे हों, लेकिन उनका जोश और जुनून बिल्कुल कच्चा था। पूरे देश के भक्तों ने उनके इस कउआ हंकनी पर जोर-शोर से तालियां पीटी, बधाइयां दी थीं। पूरा देश लहालोट हो रहा था। उनके आगे-पीछे लोग बिछे जा रहे थे। वे जिधर मुंह उठाकर चल देते, हजारों-लाखों की भीड़ साथ चल पड़ती थी। ...और आज वह दिन है कि लौह पुरुष अपने कमरे में लेटे आंतरिक पीड़ा से कराह रहे हैं और कोई उनकी पीड़ा पर मरहम रखने वाला नहीं है।

Wednesday, June 14, 2017

‘हॉफ गर्लफ्रेंड’ के चक्कर में पिटे मुसद्दी लाल

अशोक मिश्र
आज सुबह पड़ोसी मुसद्दी लाल फटे और बदरंग भीगे जूते जैसा मुंह सुजाये मेरे घर में नमूदार हुए। वे किसी सड़क हादसे का शिकार हुए वाहन की तरह टूटे-फूटे दिख रहे थे। उनका नेशनल हाईवे जैसा सुदर्शनी चेहरा किसी गिट्टी युक्त कच्ची सड़क जैसा हो गया था। आंखों और गालों के पास की सूजन ठीक वैसे ही उभरी दिखाई दे रही थी, जैसे किसी ऊबड़खाबड़ सड़क के किनारे जगह-जगह नाली की गाद निकालकर सूखने के लिए कामचोर सफाई कर्मचारी ने रख दी हो। मैंने सहानुभूति जताते हुए कहा, ‘अरे भाई साहब..यह क्या हुआ? आपकी यह हालत कैसे हुई? कहीं आपने अपना स्कूटर कहीं ठोक तो नहीं दिया?’
मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल ने फेफड़े में गहरी सांस इस तरह खींची, मानो सारी पृथ्वी की हवा सोखकर ही मानेंगे। पहले तो वे थोड़ी देर तक अपने सूजे गाल को सहलाते रहे, जैसे कोई बुजुर्ग टॉफी या चाकलेट लेने की जिद के कारण पिटे हुए बच्चे का गाल सहलाकर उसे चुप कराने की कोशिश करता है, फिर बोले, ‘हॉफ गर्लफ्रेंड’ के चक्कर में बीवी से पिट गया, यार! मेरी बीवी भी न…एकदम अकल से पैदल है। अकल के पीछे लट्ठ लिए घूमती रहती है। सारी दुनिया बदल गई। अपना देश बदल रहा है। इंडिया से न्यू इंडिया, डिजिटल इंडिया, और न जाने कैसे-कैसे इंडिया हो रहा है। देश के युवा फुल गर्लफ्रेंड, हॉफ गर्लफ्रेंड, क्वार्टर गर्लफ्रेंड की अवधारणा को बहुत पीछे छोड़कर माइक्रो और मिनी गर्लफ्रेंड/ब्वायफ्रेंड तक आ गए हैं। लेकिन वह कमबख्त अभी तक करवाचौथ, पतिव्रता, पत्नीव्रता जैसी वाहियात बातों में उलझी हुई है।’
मैंने मुसद्दी लाल से कहा, ‘आप बातों की जलेबी तलने की बजाय साफ-साफ बताइए कि मामला क्या है? यह लाल बुझक्कड़ों की तरह पहेलियां बुझाना बंद कीजिए, समझे आप। वैसे एक बात बताऊं। इस बुढ़ापे में भी आप छबीली से नैनमटक्का करने से बाज नहीं आते हैं। यह मैं कई बार देख चुका हूं।’ मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल सिटपिटा गए। फिर गला खंखारकर बोले, ‘बात दरअसल यह है कि कल शाम को सब्जी खरीदते समय छबीली से मुलाकात हो गई थी। पता नहीं, मुझ पर क्या खब्त सवार हुई। मैं उससे बतियाने लगा। बात करते-करते हम दोनों सड़क के किनारे उगे पीपल के पेड़ के नीचे खड़े हो गए। वह मेरी पत्नी को दीदी कहती है, इसलिए मैंने साली समझकर इतना कहा था कि तुम मेरी हॉफ गर्लफ्रेंड बनोगी? मेरे प्रस्ताव को सुनकर वह नासपीटी हंस पड़ी। उसके लजाने, शरमाने और दांतों तले अंगुली दबाने को मैंने उसकी सहमति समझकर हाथ पकड़ लिया। इस पर भी उसने आपत्ति नहीं जताई। थोड़ी बहुत रसीली बातों के बाद हमने सब्जी खरीदी और घर आ गए। इस बीच छबीली ने आकर तुम्हारी भाभी को हॉफ गर्लफ्रेंड वाली बात बता दी। इसके अलावा क्या-क्या बताया राम जाने।’
इतना कहकर मुसद्दी लाल बोले, ‘तभी से बीवी ने पांचजन्य फूंक रखा है। घर कुरुक्षेत्र बना हुआ है। हम दोनों कौरव-पांडवों की तरह युद्धरत हैं। मेरे क्षत-विक्षत अंग देख रहे हो, यह सब छबीली को हॉफ गर्लफ्रेंड बनने का प्रस्ताव देने का नतीजा है।’ इतना कहकर मुसद्दी लाल कराहने लगे, मैं उन्हें निरीह भाव से देखता रहा।

Tuesday, May 23, 2017

बीवी-बॉस के चक्कर में घनचक्कर पुरुष

अशोक मिश्र
स्त्री जीवन भर तीन ‘प’ यानि पिता, पति और पुत्र नामक रिश्ते से मु
क्त नहीं हो पाती। इनमें से एक न एक ‘प’ का दखल उसके जीवन में हमेशा बना ही रहा है। काल भले ही कोई रहा हो। सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग या वर्तमान कलयुग। चलिए थोड़ी देर के लिए मान लिया कि किसी स्त्री ने शादी नहीं की। शादी नहीं की, तो दो ‘प’ यानि पति और पुत्र की गुंजाइश ही नहीं रही। मान लिया कि शादी की भी और उसने किसी पुत्र को जन्म नहीं दिया। फिर भी पिता और पति रूपी ‘प’ तो मौजूद ही रहे न उसके जीवन में। अब यह मत कहिएगा कि पिता के बिना भी किसी स्त्री या पुरुष का जीवन हो सकता है। हां, कई बार ऐसा होता है कि किसी स्त्री को अपने पिता के बारे में ज्ञात न हो, लेकिन पिता का अस्तित्व ही न हो, ऐसा कहीं हो सकता है? स्त्री के पास दो ‘प’ यानी पति और पुत्र से मुक्त रहने का विकल्प हमेशा रहा है। यह भी सच है कि सौ में से निन्नान्वे स्त्रियां सज्ञान होते ही पति और पुत्र की कामना से तीरथ, व्रत में रत हो जाती हैं।
अब पुरुष की नियति देखिए। वह भी जीवन भर स्त्रियों की तरह दो ‘ब’ यानी बीवी और बॉस से मुक्त नहीं हो पाता है। स्त्रियों की तरह वह भी जवान होते ही एक ‘ब’ यानि बीवी के ख्वाब देखने लगता है। कंचे, गुल्ली-डंडा, ताश आदि खेलने की उम्र में वह बेचारा अपने वजन से दो गुना ज्यादा भारी बस्ता पीठ पर लादकर इस कामना के साथ स्कूल जाता है कि बड़े होकर एक अदद अच्छी बीवी और एक सहृदय बॉस मिलेगा। बचपन से ही उसके दिमाग में यह बात ठूंस-ठूंसकर बैठा दी जाती है कि बेटा! अगर अच्छी तरह से पढ़ाई-लिखाई नहीं की, तो जीवन में अच्छी बीवी और अच्छे बॉस को तरस जाओगे। यही समीकरण स्त्रियों पर भी लागू होता है। अच्छा पति और बॉस चाहिए, तो सारी किताबें घोंट जाओ, अच्छे नंबर लाओ। ज्ञानी बनो या भाड़ में जाओ, लेकिन मार्कशीट में नंबर कम नहीं दिखाने चाहिए।
भाग्य की विडंबना देखिए। पुरुष इन दोनों अर्थात बीवी और बॉस को प्रसन्न करने के चक्कर में जीवन भर घनचक्कर बना रहता है। पति या कर्मचारी के हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी बीवी या बॉस खुश हुए हों, ऐसा कोई उदाहरण हाल-फिलहाल में नहीं दिखाई देता है। आप किसी भी बॉस से बात करके देखिए, वह अपने अधीनस्थों के काम-काज से कभी खुश नहीं दिखाई देगा। एक अजीब सी खिन्नता उसके चेहरे पर विराजमान रहती है। कितना भी कमाइए, घर भर दीजिए, लेकिन बीवी को हमेशा लगता है कि उसका पति दुनिया का सबसे बड़ा निखट्टू है। कार्ल मार्क्स का द्वंद्वात्मकता का सिद्धांत यहां पूरी तरह लागू होता है। बीवी और बॉस का अस्तित्व तभी तक है, जब तक पति और अधीनस्थ का अस्तित्व है। यही तर्क स्त्री और पुरुष के संदर्भ में दिया जा सकता है। स्त्री को पुरुष बिना चैन नहीं और पुरुष तो स्त्री के लिए हर युग में जन्मजाती तौर बेचैन रहा है।

Tuesday, May 9, 2017

‘लालबत्ती’ ने ‘हूटर’ को दिया जन्म


अशोक मिश्र
जब देश आजाद हुआ और पहली सरकार बनी, तब सबसे विकट समस्या यह थी कि इस मुई ‘लालबत्ती’ का क्या किया जाए? ‘लालबत्ती’ का जन्म तो अंग्रेजों के समय में ही हो गया था, लेकिन तब उसके आशिक सिर्फ अंग्रेज ही हुआ करते थे। हां, भारतीय लोग बस दूर से ही ‘लालबत्ती’ के नित्य निखरते सौंदर्य को देखकर ललचाते और हाथ मलकर रह जाते। आजादी के बाद जैसे-जैसे ‘लालबत्ती’ का रूप-यौवन दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा था, उसके आशिकों की तादात भी बढ़ती जा रही थी। ‘लालबत्ती’ के आशिक कहीं गृहयुद्ध पर आमादा न हो जाएं, यही सोचकर ‘लालबत्ती’ का विवाह इस शर्त के साथ राजनीति से करा दिया गया कि जब तक सत्ता सुंदरी तुम पर मेहरबान है, तभी तक तुम इस ‘लालबत्ती’ का मनचाहा उपभोग करने के अधिकारी हो। खबरदार, तुम इसके आजीवन उपभोग की उम्मीद कतई न करना और न ही कभी ‘लालबत्ती’ उम्मीद से होने पाए।
लेकिन शायद यह नियति को मंजूर नहीं था या ‘लालबत्ती’ के किसी आशिक की करतूत कि राजनीति और ‘लालबत्ती’ के वैवाहिक जीवन के 67 साल बाद ‘लालबत्ती’ उम्मीद से हो गई। ‘लालबत्ती’ के उम्मीद से होने की खबर फैलते ही आशिकों के दिल बैठ गए। कुछ आशिक तो गश खाकर पड़े। होश आया, तो लगा छाती पीटने। सदमाग्रस्त आशिक लगे अवांट-बंवाट बकने। कुछ के मुंह से बकते-बकते झाग भी निकलने लगा। ‘लालबत्ती’ के कुछ चतुर आशिकों ने अपने थोबड़े का भूगोल सुधारा। मुंह पर ठंडे पानी का छींटा मारा, क्रीम-पॉवडर लीपने-पोतने के बाद चार बार बचे-खुचे बालों पर कंघी फेरा और टीवी चैनल्स पर चलने वाली डिबेट्स में भाग लेने आ गए, ‘अच्छा हुआ, ‘लालबत्ती’ से पीछा छूटा। 67 साल की बुढ़िया से मोहभंग होने लगा था। अब कम से कम बिना किसी मोहग्रस्तता के जनसेवा तो कर सकूंगा। ‘लालबत्ती’ के चलते में गरीब, असहाय जनता की सेवा से वंचित था। अच्छा हुआ, मुई ‘लालबत्ती’ से पिंड छूटा।’
‘लालबत्ती’ की काफी गहन जांच पड़ताल के बाद प्रधान दाई ने घोषणा की कि ‘लालबत्ती’ पूरे दिन से है, एक मई तक कुछ हो सकता है। उन्होंने यह संभावना व्यक्त की कि ‘लालबत्ती’ की गर्भकाल में यदि ठीक-ठाक देखभाल की जाए, तो यह स्वस्थ ‘ईपीआई’ कल्चर को जन्म दे सकती है। पूरा देश दिल थामकर ‘लालबत्ती’ के प्रसव का इंतजार करने लगा।
आखिर एक मई का वह बहुप्रतीक्षित दिन आ पहुंचा। पूरे देश की निगाह ‘लालबत्ती’ पर लगी हुई थी। सभी ‘ईपीआई’ का जन्मोत्सव मनाने की तैयारी में जुट गए। कुछ तो बाकायदा गोला-बारूद से लैस हो गए। समय पर ‘लालबत्ती’ के प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उसे अस्पताल लाया गया। पूरे चौबीस घंटे की मेहनत के बाद लेबर रूम से डॉक्टर निकली और उदास स्वर में घोषणा की, ‘लालबत्ती’ ने सीजेरियन ऑपरेशन से ‘हूटर’ को जन्म दिया है।’ यह सुनते ही लालबत्ती के आशिकों के चेहरे खिल उठे। वह समझ गए कि लालबत्ती भले ही बेवफा हो गई हो, लेकिन अब हूटर का उपयोग करके भौकाल कायम रखा जा सकता है। ‘लालबत्ती’ नहीं, न सही। हूटर तो है कम से कम भौकाल टाइट रखने को।

Tuesday, May 2, 2017

गधे तो वाकई गधे होते हैं

अशोक मिश्र
गधे तो वाकई गधे होते हैं। एकदम सीधे-सादे, मेहनती और संतोषी। गधे के यही तीन गुण उसको महान बना देते हैं। सीधा इतना कि मालिक बात-बेबात दो लट्ठ लगा भी दे, तो बिलबिलाकर ‘ढेंचू-ढेंच’ कर लेगा और फिर निरपेक्ष भाव से काम में लग जाएगा या चरने लगेगा। मेहनत के बारे में तो कहना ही क्या। इंसान को उसकी औकात से थोड़ा ज्यादा काम बता दो, तो तत्काल कह बैठता है, ‘गधा समझ लिया है क्या? कि लाद दिया एक गधे भर का काम।’ कहने का भाव यह है कि गधे जितना काम कोई कर ही नहीं सकता। संतोष के मामले में इस चराचर जगत में गधे का मुकाबला कोई जीव कर ही नहीं सकता है, न एक कोशिकीय, न बहुकोशिकीय। सिधाई, मेहनत और संतोष मिलकर किसी गधे को गधा बना देते हैं, उसे गधत्व (गधापन) प्रदान करते हैं। जिस तरह संतत्व, बुद्धत्व, वीरत्व एक भाव है, एक विशेषण है, ठीक उसी तरह गधत्व भी एक खास किस्म की प्रवृत्ति का बोध कराता है। यह अमूर्त होते हुए भी प्राचीनकाल से ही इंसानों में भी मूर्तमान होता रहा है।
यह गधत्व ही है जिसकी बदौलत आप किसी भी व्यक्ति को देखते ही कह देते हैं, ‘अरे! यह तो पूरा गधा है।’ अब आप चीनियों की बुद्धिमत्ता देखिए। वे पाकिस्तान से गधे आयात करने जा रहे हैं। मानो पूरी दुनिया में पाकिस्तानी गधे और उनका गधत्व ही उच्चकोटि का है। अब चीनियों को कौन समझाए कि पाकिस्तान से गधों का आयात करके ही वे उच्चकोटि के गधत्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। मेरे एक पाकिस्तानी मित्र हैं ‘कमरटुट्ट’। एक बार किसी बात पर खफा होकर उनकी बेगम ने उनकी कमर पर पाद प्रहार किया था, जिससे कमर में लचक आ गई। बस तभी से उनका नाम कमरटुट्ट पड़ गया। लोग उनका असली नाम ही भूल गए। टेलीपैथी (मानसिक तरंगों) से हम रोज बातचीत जरूर करते हैं। एक दिन ‘चीन द्वारा पाकिस्तानी गधों के आयात’पर बातचीत होने लगी, तो उन्होंने बड़े गर्व से बताया, ‘जानते हैं, एशिया महाद्वीप में पाकिस्तानी गधे हमेशा से ही उच्चकोटि के रहे हैं।
पाकिस्तान में चाहे लोकतांत्रिक सरकार रही हो या सेना की तानाशाही वाली, सबने गधों को संरक्षण प्रदान किया है। पूरी दुनिया में सबसे शुद्ध गधत्व पाकिस्तान का ही रहा है। हमारे यहां एक से बढ़कर एक गधे हुए हैं जिनके गधत्व की पूरी दुनिया में धूम रही है। कई बार तो अमेरिका, रूस, चीन, जापान से लेकर होनोलूलू द्वीप समूह तक के नागरिक हमारे देश के गधों का गधत्व देखकर आश्चर्यचकित रह गए हैं। यही वजह है कि चीन मुंहमांगी कीमत पर हमारे गधों का आयात कर रहा है। वैसे गुणवत्ता में पाकिस्तानी खच्चर भी किसी से कम नहीं हैं, लेकिन जितनी ख्याति पाकिस्तानी गधों की रही है, वैसी ख्याति खच्चरों को नहीं मिल पाई। या कहिए कि पाकिस्तानी खच्चरों की ब्रांडिंग ठीक से नहीं की गई। अगर ब्रांडिंग हुई होती, तो पाकिस्तानी खच्चरों का निर्यात करके पाक अमीर हो गया होता।’ अब कमरटुट्ट की बात पर मैं बोलूं भी तो क्या बोलूं? आप लोग ही बताएं।

फिर गए हवाई चप्पलों के दिन

-अशोक मिश्र
ठीक उसी तरह ‘कि पहले अंडा आया कि मुर्गी’ की तरह यह सवाल भी मौजू है कि पहले जूते आए या चप्पल। जूते का ही संशोधित रूप चप्पल है या चप्पल की ही अगली पीढ़ी का नुमाइंदा है जूता। मेरा ख्याल है कि ऊंचे-नीचे, पथरीले-रेतीले रास्तों पर चलने से होने वाली दिक्कत से बचने के लिए आदमी ने सबसे पहले जिस चीज की कल्पना की होगी, वह खड़ाऊं ही रही होगी। अब तक सबसे ज्यादा प्रसिद्ध खड़ाऊं रामचंद्र जी की ही रही है, जिसे उनके छोटे भाई भरत ने सिंहासन पर रखकर अमर कर दिया। खड़ाऊं का ही संशोधित रूप चप्पल है, इसे मानने में शायद ही किसी को आपत्ति हो। खड़ाऊं पहनकर चलने-भागने में होने वाली दिक्कतों ने चप्पल का ईजाद किया। हां, आजादी के कई दशक पहले से लेकर आजादी के बाद के दो-ढाई दशक तक पूरे देश में गटापारची (प्लास्टिक) चप्पलों का राज रहा है, लेकिन जैसे ही रबड़ की चप्पलें बाजार में आईं, गटापारची चप्पलों का पराभव हो गया। ठीक वैसे ही जैसे दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार और मनोज कुमार का स्टारडम राजेश खन्ना के आते ही क्षीण हो गया था।
हवाई चप्पल भी बहुत दिनों तक लोगों के दिलों पर राज नहीं कर सकी। किसिम-किसिम की सैंडिलों और जूते-जूतियों ने हवाई चप्पलों को उनकी औकात बता दी। जिस गटापारची या हवाई चप्पलों को पहनकर लोग शादी-विवाह, नाते-रिश्तेदारी में आते-जाते थे, उसको पहनकर घर से बाहर निकलना, हास्यास्पद हो गया। गटापारची चप्पल तो जहां बिला गए, वहीं हवाई चप्पलों का दायरा घर तक ही सीमित कर दिया गया।
कहते हैं न कि बारह साल बाद घूरे के भी दिन फिर जाते हैं। हवाई चप्पलों के भी दिन फिर गए हैं। कल तक बड़े-बड़े शापिंग मॉल्स, बड़े-बड़े शूज स्टोर्स से लेकर गांव-कस्बों में खुली ‘मटुकनाथ जूता स्टोर’ टाइप दुकानों में इतराने वाले ब्रांडेड जूते-चप्पल अपनी किस्मत को रो रहे हैं। उन्हें कोई पूछ ही नहीं रहा है। मानो हवाई चप्पलों के सामने उनकी कोई औकात ही न बची हो। हवाई चप्पल खरीदने को भीड़ उमड़ी पड़ रही है। भले ही अभी हवाई यात्रा का जुगाड़ न हो पाया हो, लेकिन निरहू प्रसाद से लेकर कल्लो भटियारिन तक हवाई चप्पल खरीद कर रख लेना चाहते हैं। क्या पता किस दिन हवाई यात्रा का कोई जुगाड़ भिड़ ही जाए। ऐन मौके पर हवाई चप्पल न मिले, तब? नासपीटा घुरहुआ उस दिन दुकान बंद रखे, तो क्या होगा? हवाई यात्रा का सपना तो ‘टांय-टांय फिस्स’ हो जाएगा। आज हवाई चप्पल पहनकर हवाई यात्रा करने की इजाजत मिली है, कल हवाई यात्रा के लिए हवाई चप्पल अनिवार्य कर दिया गया, तो? सरकार कुछ भी कर सकती है। सरकार सरकार है। उसका कोई हाथ पकड़ सकता है भला। गरीब नवाज तो कल यह भी कह सकते हैं कि चड्ढी-बनियान पहनकर भी लोग हवाई यात्रा कर सकते हैं, बस चड्ढी-बनियान फटी न हो। दुकानदार भी मौके की नजाकत देखकर हवाई चप्पल की कालाबाजारी कर रहे हैं। साठ-सत्तर रुपल्ली में बिकने वाली हवाई चप्पल आकाश कुसुम होती जा रही है। अभी कल ही एक खबर छपी थी कि जूते की दुकान का ताला तोड़कर चोर पचास जोड़ी हवाई चप्पल चुरा ले गए। ब्रांडेड और लक्जरियस जूते, सैंडिल्स चोर से हाथ जोड़कर विनती करते रहे, लेकिन चोर ने उनकी एक नहीं सुनी।

Tuesday, April 25, 2017

स्वर्ग जैसे ‘न्यू इंडिया’ में नंगे-अधनंगे किसान

अशोक मिश्र
हमारे देश के मजदूर-किसान भी न..एकदम बौड़म हैं बौड़म। धेले भर की अकल नहीं और अकल के पीछे लट्ठ लिए बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। किसानों को गुमान है कि वे देश के अन्नदाता हैं। मजदूरों को वहम है कि वे भाग्यविधाता हैं। अरे! वह दिन गए, जब किसान अन्नदाता और मजदूर भाग्य विधाता हुआ करता था। अब तो सारा देश भारत से ‘इंडिया’ और अब ‘इंडिया’ से ‘न्यू इंडिया’ होने जा रहा है। पूरी दुनिया आश्चर्य चकित होकर इस ‘न्यू इंडिया’ का चमकता ग्लोसाइन देख रही है। वाह..वाह कर रही है। दुनिया भर के बड़े-बड़े कारपोरेट घराने भारी-भरकम थैलियां लेकर दौड़े चले आ रहे हैं। उन्हें विश्वास है कि अगर कहीं बाजार है, सस्ता श्रम है, लूट-खसोट में सहायक होने वाले लेबर लॉ हैं, शोषण-दोहन की अपार संभावनाएं हैं, अनपढ़ और लतखोर मजदूर-किसान हैं, तो वह ‘न्यू इंडिया’ में ही हैं। ‘न्यू इंडिया’ तो जैसे कारपोरेट व्यापारियों का स्वर्ग है। न्यू इंडिया का चमकता चेहरा देखकर हमारे राजनीतिक भाग्य विधाता आत्ममुग्ध हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी फाइव स्टार होटल में आयोजित फैशन शो के दौरान अपनी नग्न-अर्धनग्न चिकनी काया पर पड़ती कैमरों की लाइट्स देखकर मॉडल्स भावविभोर होती हैं। इन आत्ममुग्ध और भावविभोर मॉडल्स को उस क्षण तो यही लगता है कि उनकी कंचनी काया और कैमरों की फ्लैश लाइट्स ही शाश्वत सत्य है, बाकी सब मिथ्या है।
ऐसी चमक-दमक वाली ‘न्यू इंडिया’ में हमारे देश के किसानों को देखिए, सुपरसोनिक विमानों की रेस में अपनी बैलगाड़ी दौड़ाए चले जा रहे हैं। ये किसान समझ क्यों नहीं पा रहे हैं कि मुंशी प्रेमचंद का युग बीत चुका है। ‘होरी’ और ‘धनिया’ रहे होंगे कभी किसानों के रोल मॉडल, लेकिन ‘न्यू इंडिया’ के आईकॉन बड़े-बड़े कारपोरेट घराने हैं, अबानी हैं, अडानी हैं, विजय माल्या हैं। अब ‘होरी’ और ‘धनिया’ होने के कोई मायने नहीं है। अब तो धरना-प्रदर्शन करने, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ या ‘फलाने-ढिमकाने मुर्दाबाद’ के नारे लगाने के दिन हवा हो गए। न्यू इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, सिटडाउन इंडिया, धमकाऊ इंडिया, लतियाऊ इंडिया का जमाना है। जंतर-मंतर पर पैंतीस-चालीस दिन तक धरना देने और गू-मूत खाने-पीने वाले किसान अगर अपने साथियों के नरमुंडों के साथ बस एक प्यारी सी सेल्फी लेते और फेसबुक, ह्वाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर डाल देते, तो फिर देखते तमाशा। कम से कम दस-बीस हजार लाइक्स मिलते, चार-पांच हजार कमेंट्स मिलते ही मिलते। ठेंगा, स्माइलिंग फेस जैसे इमोजीज की तो बात ही छोड़ दीजिए। दो-तीन हजार ठेलुए टाइप के फेसबुकिये उसे शेयर करते ही करते। फिर क्या..फिर तो पूरी दुनिया में तलहलका मच जाता। डिजिटल वर्ल्ड में एक रक्तहीन क्रांति हो जाती। सरकार को झुकना पड़ता, नहीं तो फेसबुकिये, ह्वट्सएपिये, इंस्टाग्रामिये, ट्विटरिस्टवे इतना हंगामा खड़ा कर देते। किसानों की वह पोस्ट इतनी वायरल होती कि आभासी दुनिया में तहलका मच जाता। केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक की इतनी छीछालेदर और ‘थू-थू’ होती कि वह मारे शर्म के किसानों के सारे ऋण माफ कर देती। अब अगर मजदूर-किसान इक्कीसवीं सदी में पांचवीं सदी की लड़ाई का तरीका अख्तियार करेंगे, तो लोग और सरकार घंटा ध्यान देंगे।

Sunday, April 23, 2017

एक पोस्ट कीन्हें बिना

अशोक मिश्र
इस देश में कभी हुआ करता था त्रेतायुग। अरे सतयुग के बाद आने वाला त्रेतायुग। उस त्रेतायुग में पैदा हुए थे शंकर सुवन केशरी नंदन। इस देवात्मा को हनुमान जी भी कहा जाता है। हनुमान जी ने अपनी आधी जिंदगी कैसे भी व्यतीत की हो, लेकिन जबसे उनका परिचय रामचंद्र जी से हुआ, तब से उन्हें बस एक ही धुन सवार थी- रामकाज कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम। करणीय, अकरणीय, लभ्य, अलभ्य जो कुछ भी था, वह सब कुछ रामकाज ही था। सीता की खोज में जाते समय मैनाक पर्वत ने जब वानर शिरोमणि हनुमान से विश्राम करने को कहा, तो उन्होंने विनयपूर्वक मैनाक के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्हें तो बस एक ही धुन थी किसी भी प्रकार हो, रामकाज करना है। यह धुन ही थी जिसने उन्हें रामचंद्र का सखा, भक्त, भाई, सचिव सब कुछ बना दिया था। उनके सखा भाव, भक्तिभाव को देखकर बाद में जनकनंदिनी भी कुछ हद तक ईष्यालु हो उठी थीं। भारतीय नारी कैसे सहन कर सकती है कि कोई उसके पति के प्रति उससे भी ज्यादा साख्यभाव रखे, भक्तिभाव रखे। वे अतुलित बलधारी होते हुए रामचंद्र के प्रति विनीत थे। वे भगवान थे, महावीर थे। उनकी लीला और महिमा अपरंपार थी। उनकी किसी से तुलना भी नहीं हो सकती है।
वह त्रेतायुग था, लेकिन यह कलियुग है। उस युग में अंजनि पुत्र महावीर थे, तो इस युग में फेसबुकवीर हैं। त्रेतायुग में भक्तिभाव का हनुमान जी बढ़कर दूसरा कोई उदाहरण खोजने पर भी नहीं मिलता, लेकिन कलियुग में फेसबुक के प्रति अनन्य भक्तिभाव लिए कोटि-कोटि फेसबुकवीर हैं, फेसबुक वीरांगनाएं हैं। इन वीरों और वीरांगनाओं की बस एक ही धुन है-‘एक पोस्ट कीन्हें बिना मोहि।’ इनकी भी भक्ति भाव, सखा भाव अप्रतिम है। ये फेसबुक की आभासी दुनिया में स्वच्छंद विचरण करते हैं, निशि-वासर, प्रात:काल, संध्याकाल, जैसे समय इनके स्वच्छंद विचरण के लिए कोई मायने नहीं रखते हैं। फेसबुक वीर और वीरांगनाएं रक्तसंबंधों, सामाजिक संबंधों को आभासी दुनिया के स्वच्छंद विचरण में बाधक मानकर उसी तरह विरक्त रहते हैं, जैसे कि कोई उच्च कोटि का साधक मोह, माया, काम, क्रोध से विरक्त रहकर परमानंद की खोज में लगा रहता है। फेसबुक वीर-वीरांगनाएं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे विकारों से विरक्त होकर बस एक पोस्ट की खोज में लगे रहते हैं। आभासी दुनिया में जहां कहीं मनोवांछित पोस्ट मिली या अपनी चौर्यकला की बदौलत किसी अन्य की मौलिक रचना को हस्तगत किया और स्वरचना प्रदर्शित करते हुए अपने फेसबुक पर पोस्ट की या प्रातिभ प्रदर्शन कर सर्जना करके पोस्ट की, तो उन्हें वैसे ही परमानंद की अनुभूति होती है, जैसे किसी साधक को लक्ष्य प्राप्त होने पर होती होगी। इन वीर-वीरांगनाओं के बाल-बच्चे, माता-पिता, पति-पत्नी और अन्य सांसारिक नाते-रिश्तेदार इनके फेसबुक प्रेम के प्रति ईर्ष्याभाव रखते हैं। फेसबुक वीरों को फेसबुकीय जगत में एक नायिका की तलाश चिरंतन काल से रही है। नायिका भेद से इन्हें रंचमात्र मतलब नहीं होता है। लुभावना चित्र देखते ही ‘इनबाक्स’ में पैठकर रसानुभूति करने लगते हैं। हां, आभासी दुनिया में वीरांगनाएं किस हेतु-अहेतु के लिए विचरती हैं, इस पर अभी अनुसंधान जारी है।

Tuesday, April 11, 2017

ज्यादा अंगरेजी न बूको, समझे

अशोक मिश्र
राजमार्ग से थोड़ा हटकर खुले मदिरालय प्रांगण में परम विपरीत विचारधारा वाले दल के कर्मठ कार्यकर्ता मिले। दोनों परम मद्यप थे, परंतु पूर्व परिचित भी। दोनों ने एक दूसरे पर इतनी तीव्रता से दृष्टिपात किया कि एक बार लगा, दोनों के चक्षु अपने-अपने कोटरों से बाहर गिर पड़ेंगे। फिर एक ने दूसरे का पाणिग्रहण कर काष्ठासन (बेंच) पर बिठाते हुए कहा, ‘भ्रात! यह सत्य है कि तुम्हारे दल के विचारों से हमारा दल रंचमात्र सहमत नहीं है, किंतु मदिरालय में क्या दल और क्या दलदल, क्या मत और क्या मतांतर, सब निरर्थक हैं। अत: हे भ्रातृश्रेष्ठ! आओ, हम सकल मतभेद का परित्याग कर प्रसन्न मन से मदिरापान करें।’
दूसरे दल के कार्यकर्ता के अधरों पर स्मित हास्य प्रस्फुटित होने लगा। उसने मदिरा विक्रेता को आसव पेश करने का संकेत किया। तीन-तीन चषक मदिरापान के बाद दोनों मद्यप मुखर हो उठे। एक मद्यप ने चषक उठाकर लंबा घूंट भरा और मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘भ्राताश्री! आपको तो यह ज्ञात ही होगा कि आदिकाल से लेकर पांच सदी पूर्व तक भारत की विश्व में प्रतिष्ठा जगत्गुरु की रही है। ज्ञान गुरु होने का मूल कारण भारतीय पुरुषों का सुर होना रहा है। सुर अर्थात वे लोग जो सुरापान करते थे और असुर अर्थात वे लोग जो सुरापान नहीं करते थे। उस समय सुरापान करके जो व्यक्ति सुर में गायन करते थे, वे ही कालांतर ससुर कहे गए। जो थोड़ा भद्दा गाते थे, वे भसुर कहे जाते थे। लेकिन इन मूढ़मति भाषा विज्ञानियों को क्या कहूं, इन्होंने ससुर और भसुर का अर्थ ही अनुलोम-विलोम जैसा कर दिया। असुरों में लंपट, लबार, चोर, कामी बहुतायत में पाए जाते थे। किंतु सुरापान करने वालों में ऐसी प्रवृत्तियां रंचमात्र नहीं पाई जाती थीं।’
इतना कहकर संभाषण करने वाले मद्यप ने अपना चषक उठाकर सारी सुरा उदरस्थ की और फिर बोला, ‘भगवत्कृपा से अब फिर से हम अपनी पुरातन संस्कृति की ओर लौट रहे हैं। शराब या वाइन शॉपों के कायांतरण की प्रक्रिया बस शुरू होने वाली है। इनके नाम सुरालय, मदिरालय या मद्यशाला रखने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।’ 
यह सुनते ही दूसरे वाले ने पहले तो चषक के कंठ तक मदिरा भरी, फिर उदरस्थ किया और फिर आवेश में रिक्त चषक को भूमि पर पटकते हुए कहा, ‘तेरी तो..यह जो संस्कृत निष्ठ भाषा छांट रहा है, वह बंद कर और शुद्ध हिंदी में सुन। सरकार बन गई है न! चुपचाप शासन कर। आज तेरी सरकार एंटी रोमियो स्क्वायड बना रही है, भ्रष्टाचार की जांच कर रही है, करे। शौक से करे। कौन सा सौ-दो सौ साल तक तुम्हारी पार्टी राज करेगी। कहा भी गया है कि कभी नाव पानी पर, कभी पानी नाव पर। आज तुम्हारी सरकार है, कल हमारी थी। हो सकता है, परसों, नरसों, तरसों हमारी सरकार बने या न भी बने। कोई दूसरा शासन करे, तब..? तब तुम भी हमारी तरह भीगी बिल्ली बने ‘म्याउं..म्याउं’ कर रहे होगे। इसलिए ज्यादा अंगरेजी न बूको। समझे।’ इतना कहकर वह मद्यप उठा, मदिरा विक्रेता को पैसे दिए बिना अपने गंतव्य की ओर चला गया।

Monday, April 3, 2017

अब पतियों पर भी गिरेगी गाज

अशोक मिश्र
सुबह सोकर उठा ही था कि मुसद्दी लाल किसी आतंकवादी की तरह घर में घुस आए। आते ही बिना कोई दुआ-सलाम किए गोला-बारी करने लगे, ‘पंडी जी, अब तो जीने की तमन्ना ही नहीं रही। जब हुस्न पर ही पहरा हो, तो फिर जीने का क्या फायदा? आप किसी के हुस्न का ठीक से दीदार नहीं कर सकते, उससे बातें नहीं कर सकते, उससे छेड़छाड़ नहीं कर सकते, तो फिर इतनी सुंदर दुनिया में रहने का क्या मतलब है? आप पल-दो पल के लिए किसी पार्क, मॉल या रेस्त्रां में नहीं जा सकते, किसी चौराहे पर खड़े बतरस का आनंद नहीं उठा सकते? भला बताओ, यह भी कोई बात हुई?’ मुसद्दी लाल की बात सुनकर मैं भौंचक रह गया। मैंने पूछा, ‘बात क्या है, मुसद्दी भाई?’
मुसद्दी लाल गहरी सांस छोड़ते हुए बोले, ‘पंडी जी, चलो मान लिया कि शोहदों, मनचलों को रोकने के लिए आपने एंटी रोमिया स्क्वाड बना लिया। उन्हें श्लील-अश्लील हरकत करने और प्रताड़ित करने से रोक दिया। लेकिन आप प्यार पर ही पहरा बिठा देंगे। हुस्न का दीदार बंद करा देंगे? यह कहां का जहांगीरी इंसाफ है, भई! मेरे एक मित्र सीएम साहब के खास हैं। कल बता रहे थे कि मुख्यमंत्री जी जल्दी ही एंटी हसबैंड स्क्वाड बनने वाले हैं। पति छेड़छाड़ निरोधक अधिनियम पारित होने वाला है। अब पति अपनी बीवियों से चुहुल नहीं कर पाएंगे, उन्हें घूर नहीं पाएंगे।
पार्क और रेस्त्रां तो छोड़ो, घर में भी पति अपनी घरैतिन से छेड़छाड़ नहीं कर सकेगा। हर पति को थाने जाकर शपथपत्र पर दस्तखत करके थानेदार के समक्ष शपथ लेनी होगी कि मैं फलां वल्द फलां शपथ लेता हूं कि आज से मैं अपनी बीवी से न चुहुल करूंगा, न उसे छेडूंगा। साली, सलहजों, भाभियों को बहन-बेटी के समान मानते हुए न तो उनसे किसी किस्म का मजाक करूंगा, न उनके मजाक का जवाब दूंगा। पूर्व में जिन रिश्तों के तहत छेड़छाड़, चुहुलबाजी, हंसी-मजाक के विशेषाधिकार पुरुषों को प्राप्त थे, उन्हें मैं स्वेच्छा से त्याग रहा हूं। मैं यह भी शपथ लेता हूं कि यदि बीवी, साली, सलहज, भाभी आदि चुहुल करती हैं, छेड़छाड़ करती हैं, चिकोटी काटती हैं, तो उसे प्रसन्नतापूर्वक सहन करूंगा, प्रतिवाद नहीं करूंगा।’
इतना कहकर मुसद्दी लाल ने गहरी सांस ली। फिर बोले, ‘पंडी जी! आप ही बताएं, यदि ऐसा हो गया, तो क्या होगा?’ मैंने कहा, ‘आप चिंता न करें, मुसद्दी लाल जी। ऐसा कोई अधिनियम पारित हुआ, तो सबसे पहले महिलाएं ही इसके विरोध में सड़कों पर उतरेंगी। छेड़छाड़, चुहुलबाजी, नैन-मटक्का हर इंसान के जीवन में प्रेरक का काम करते हैं। यह मानव स्वभाव का अभिन्न अंग है, इसे कोई कानून खत्म नहीं कर सकता है। अच्छा बताओ, महिलाएं घर से निकलते समय सजती क्यों हैं? ताकि लोग उन्हें देखें, उनके सौंदर्य को सराहें। अगर ऐसा हुआ, तो अरबों-खरबों रुपये के सौंदर्य प्रसाधन बेकार हो जाएंगे। बाजार चौपट हो जाएगा।’यह सुनते ही मुसद्दी लाल उठे और बिना चाय-पानी पिये अपने घर चले गए।

Saturday, March 25, 2017

तुम्हारी भौजाई ने घुघुरी बनाया है, आ जाना

अशोक मिश्र
जब से उन्होंने कनफुसकी की है, तब से सारा देश सन्न है! कयासों का बाजार गर्म है। अखबारी और चैनली लाल बुझक्कड़ों से लेकर गली-कूचे तक के गपोड़ियों और ठेलुओं के अपने-अपने कयास हैं, अपने-अपने विश्लेषण हैं। पत्रकारिता की खाल ओढ़कर किसी ज्योतिषी की तरह भविष्यवाणी करने वाले लाल बुझक्कड़ तभी से यह खोजने की कवायद कर रहे हैं कि आखिर मामले की पूंछ कहां है? पूंछ पारिवारिक है या राजनीतिक, बेटे की चिंता से जुड़ा है या जवानी के दिनों में की गई खुराफात के उजागर हो जाने की चिंता।
उस्ताद गुनाहगार तो बड़े दावे के साथ कह रहे हैं, ‘मूर्ख हो तुम लोग, जो इन्हें एक दूसरे का विरोधी मानते हो। अरे ये सब एक ही थाली के बैगन हैं। जब इनमें से कोई एक देश का भाग्यविधाता होता है, तो दोनों, तीनों...या यों कहें कि सभी एक दूसरे को राजनीतिक मंच पर भले ही रावण, अहिरावण या महिरावण बताते हों, लेकिन पर्दे के पीछे गलबहियां डालकर हंसते हैं, खिलखिलाते हैं, एक दूसरे के कंधे पर सिर रखकर अपनी-अपनी भूली-बिसरी प्रेमिकाओं की याद में आंसू बहाते हैं, स्याह-सफेद कारनामों का हल खोजने की जुगत भिड़ाते हैं। यह कानाफूसी किसी विपदा को टालने का अनुरोध करने के लिए की गई थी।’
मेरे पत्रकार मित्र राम लुभाया अपने किसी सूत्र के हवाले से कहते हैं कि उन्होंने कान में सिर्फ इतना कहा था, ‘गुरु! तुम्हीं अच्छे रहे, जो न इधर फंसे, न उधर। मुझे देखो, मेरी तो हालत तो ‘दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय’ वाली हो रही है। कभी ये कुर्ता पकड़कर खींचती है, तो कभी दूसरी वाली के बाल-बच्चे। भाई-पट्टीदारी के झगड़े में मेरी हालत फुटबाल जैसी हो गई है, जिसे हर कोई किक लगाना चाहता है, ताकि ‘गोल’ हो जाऊं। ‘माया’, ‘मोह’ ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।’
लेकिन असली बात कोई नहीं जानता, सिवा मेरे। आपको राज की बात बताता हूं किसी से कहिएगा नहीं। कान में पुराने पहलवान ने नए पहलवान से सिर्फ इतना ही कहा था, ‘गुरु! फुरसत हो, तो आज शाम को घर आना। तुम्हारी भाभी ने मसालेदार घुघुरी बनाई है। ठंडी-ठंडी छाछ के साथ घुघुरी खाने का मजा ही कुछ और है।’ पहलवान ने जब पोते की शादी की थी, तो उन्होंने दूसरे अखाड़े का होते हुए नए पहलवान को शादी में शरीक होने का न्यौता भेजा था। नए पहलवान आए और राजनीतिक वैर-भाव भुलाकर बहू-पोते को आशीर्वाद के साथ-साथ गिफ्ट-शिफ्ट भी दिया था। वैसे भी लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था की राजनीति में मतभेद होते हैं, मनभेद नहीं। यह तो हम-आप जैसे बज्रमूरख होते हैं, जो इनके चक्कर में अपने पड़ोसी से मारकर लेते हैं। जिस बात को लेकर बड़े-बड़े लाल बुझक्कड़ जो कयास लगा रहे हैं, वैसी कोई बात नहीं है। बस, घुघुरी खाने का न्यौता भर है।

श्रंगार के दोहे

अधर-अधर मिलकर कभी, प्रिये हुए थे एक
प्रणय ग्रंथ के अनपढ़े, बांचे पृष्ठ अनेक।
वसुधा पर झरती रही, टप-टप, टप-टप मेह।
रहे पयोधर अनमने, अलसायी-सी देह।
प्रेम कभी मत तौलिए, मन पर पड़ती चोट।
लाख निकटता फिर बढ़े, रह जाती है खोट।
मन कस्तूरी हो गया, प्रिय का पा सानिध्य।
विकसा पंकज प्रेम का, कुछ न रहा मालिन्य।
तप्त अधर जब भी मिले, हुई चंदनी देह।
मधुकर-सा मन हो गया, द्राक्षासव-सा देह।
प्रीत पतिंगे की अमर, दीपक को सब दोष।
परस्वारथ जलता रहा, मिला यही परितोष।

Monday, March 6, 2017

बौराती प्रकृति, कुत्ते और राम लुभाया

अशोक मिश्र
फागुन में पहले प्रकृति बौराती थी। फिर आम्र मंजरियां बौराती थीं। फिर पोपले मुंह और पिलपिले शरीर वाले सत्तर-पचहत्तर साल की उम्र वाले ‘बाबा’ बौराते थे। इनके बौराते ही भौजाइयां बौरा जाती थीं। फिर तो देवर, सालियां-सलहजें, ननद-ननदोई के बौराने का एक सिलसिला ही शुरू हो जाता था। हंसी-ठिठोली के नाम पर श्लील-अश्लील का जैसे भेद ही मिट जाता था। फागुनी बयार शरीर में मादकता, कामुकता या छिछोरेपन का ऐसा संचार करती थी कि सारी मान-मर्यादाएं बिला जाती थीं। फागुनी बयार अब भी चलती है, लेकिन अब बाबा, भौजाइयां, साली-सहलजों की बजाय कुत्ते बौराते हैं, राजनीति बौराती है, नेता बौराते हैं और बौराते हैं मेरे वरिष्ठ पत्रकार साथी राम लुभाया।
वैसे राम लुभाया तो बारहों महीने बौराये रहते हैं। अभी कल की बात है। सुबह आफिस आए, तो मैंने लपकर अभिवादन किया, ‘सर जी गुड मार्निंग...।’ राम लुभाया ने अपनी पीठ पर टंगा छोटा सा बैग मेज पर पटका और घूमकर झल्लाते हुए बोले, ‘क्या है... अरे हो गया एक दिन गुड मार्निंग..अब रोज-रोज आते ही मेरे सिर पर काहे दे मारते हैं गुडमार्निंग? एक तो रात भर मोहल्ले के कुत्तों ने सोने नहीं दिया, सुबह थोड़ी देर के लिए झपकी भी आई, तो एक मरघिल्ली सी खबर छूटने की वजह से सुबह-सुबह संपादक जी हौंकते रहे। जीना हराम हो गया है मेरा।’ जैसे बरसात में किसी बच्चे के छू लेने पर केंचुआ सिकुड़ जाता है, उसी तरह राम लुभाया की बात सुनकर मैं सिमट गया। शायद राम लुभाया को अपनी गलती का एहसास हुआ। बोले, ‘यार..क्या बताऊं। इधर जब से चुनावी बयार बहने लगी है, तब से सारे मोहल्ले के कुत्ते मेरे दरवाजे पर रात दस-ग्यारह बजे के बाद इकट्ठा हो जाते हैं। दरवाजे के सामने का खुला हिस्सा चुनावी सभा में तब्दील हो जाता है। कुत्ते मुंह उठाकर मानो भाषण देने लगते हैं। कोई नाली के इस पार, तो कोई नाली के उस पार। अगर उनकी भाषा मेरी समझ में आती, तो शायद यही कहते होंगे-प्यारे कुत्ता भाइयों! हमारी पार्टी की सरकार बनी, तो विकास की हड्डियां सबको मिलेंगी। सबको कहीं भी टांग उठाकर सूसू करने की स्वतंत्रता होगी।’
राम लुभाया अब अपनी रौ में आ गए थे। बोले, ‘तब तक दूसरा मुंह उठाकर भौंकता है, झुट्ठे हैं ये विकास की बात करने वाले। ये हम कुत्तों को छोटा-बड़ा, नस्ल, रंग के नाम पर लड़ाते हैं और मौज करते हैं। हमारी सरकार में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता है। हमारी सरकार बनी, तो सबको किसी के भी घर में घुसकर रोटी और बोटी चुराने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।’ राम लुभाया थोड़ी देर सांस लेने के लिए रुके। फिर बोले, ‘रात में जब देखा कि इस कुत्ता सभा के चलते सोने को नहीं मिलेगा, तो मैंने उठाया डंडा। चुपके से गेट खोला और पिल पड़ा इन कुत्तों पर। खूब लठियाया। तीनों गली के कुत्तों को खूब धोया। ससुरों! मेरा दरवाजा छोड़कर कहीं और करो अपनी चुनावी सभा। आदमी अगर कुत्तों के चुनाव में वोट दे सकता, तो मैं कतई तुम कुत्तों को वोट नहीं देता।’ इतना कहकर राम लुभाया फिस्स से हंस दिए।

Sunday, February 19, 2017

बड़ी उलझन है भाई

अशोक मिश्र
कहते हैं कि मानो तो देव, नहीं तो पत्थर तो हैं ही। मानिए तो बहुत बड़ी उलझन है, न मानिए, तो यह कोई समस्या ही नहीं है। जब समस्या ही नहीं, तो फिर यह ‘…किंतु, ..परंतु, ..आह, ..वाह’ जैसी बातें निरर्थक हैं। लेकिन मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी समस्या है। एकदम जम्मू-कश्मीर विवाद की तरह, जिसे जितना सुलझाओ, उतनी ही उलझती जाती है। मेरे सामने सवाल यह नहीं है कि किसको चुनें। मुद्दा यह है कि किसे नकार दें। कौन अच्छा है, कौन बेकार..यह तय कर पाना, कोई आसान काम है क्या? ऐसी ऊहापोह जैसी स्थिति तो उन लड़कियों के सामने भी पैदा नहीं हुई होगी जिन्हें प्रेमी और माता-पिता द्वारा सुझाए गए दस-बारह लड़कों में से किसी एक को जीवन साथी के रूप में चुनना हो। समस्या यह है कि मन किसी एक के नाम पर स्थिर नहीं हो पा रहा है। एक से बढ़कर एक प्रत्याशी हैं चुनाव मैदान में। कोई किसी गुण में बेजोड़ है, तो कोई किसी दूसरे गुण में अद्वितीय। किसी के नाम पर हत्या के बारह मुकदमे चल रहे हैं, तो कोई पांच हत्या, दो हत्या के प्रयास के आरोप में जमानत पर है। बलात्कार के मामले की सजा तो पांच साल पहले ही काट चुका है।
अब कल ही वोट मांगने आए, प्रत्याशी की खूबियां सुनें। बेचारे ने सात बार सिर्फ एक ही उद्योगपति से रंगदारी वसूली, तो नामाकूल व्यापारी ने पुलिस बुलाकर पकड़वा दिया। यह तो कहिए कि थाने की पुलिस शरीफ निकली। व्यापारी के घर से पकड़कर लाई और थाने में चाय-पानी कराकर बेचारे को विदा कर दिया, वरना बेचारा तो गया था न तेरह के भाव। व्यापारी को कौन समझाए कि जहां गुड़ होगा, वहीं तो चीटें आएंगे। और चीटें आएंगे, तो कुछ न कुछ गुड़ खाएंगे ही। इसमें भला आपत्तिजनक और गैरकानूनी क्या है? पिछले हफ्ते एक पार्टी का उम्मीदवार मेरी गली में प्रचार कर रहा था, उसके सुदर्शन चेहरे पर अर्ध चंद्राकार चाकू का निशान इस तरह सुशोभित हो रहा, मानो चुनाव में विजय के लिए उसने द्वितीया के चांद पर अपना माथा पटका हो और चंद्रमा ने आशीर्वाद के रूप में अपने अर्धचंद्राकार स्वरूप की छाप लगा दी हो। उसे देखकर तो मन में श्रद्धा का भाव इस तरह उमड़ा पड़ रहा था, जैसे ज्यादा भूखा आदमी किसी शादी समारोह में खाने का मौका पा जाए और अजर-गजर जो भी मिलता जाए, खाता जाए और बाद में वह खाया-पिया बार-बार उमड़-घुमड़कर बाहर आने को आतुर हो।
जब ऐसे ऊर्जावान, प्रतिभावान, दयावान, बली, बाहुबलि उम्मीदवार हों, तो मन ऊहापोह की स्थिति में होगा ही। उस पर तो घबराहट और बढ़ जानी ही है, जब उम्मीदवारों के दादा ने अप्रत्यक्ष धमकी दे रखी हो कि सारी जन्मकुंडली है हमारे पास, सबकी पोल खोल दूंगा। दिक्कत यही है कि किसको नकार दें। सब एक से बढ़कर एक सुपरलेटिव डिग्री के हैं। हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, भ्रष्टाचारी हैं, दलाल हैं, शोषक हैं, दोहक हैं, उत्पीड़क हैं। मजा यह कि न ऊधौ कम हैं, न माधौ। विडंबना यह है कि इन्हीं में से किसी एक को चुनना है। बड़ी उलझन है भाई! क्या करूं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं।

Monday, February 13, 2017

प्रेम बाड़ी उपजे, प्रेम हाट बिकाय

अशोक मिश्र
एक दिन मैं ऑफिस से कुछ जल्दी घर चला आया। मैंने देखा कि मेरा तेरह वर्षीय बेटा और उसका हमउम्र दोस्त राकेश, दोनों बरामदे में बैठे बातचीत कर रहे थे। मेरा बेटा अपने दोस्त से कह रहा था, ‘देख, तू चाहे कुछ भी कहे, लेकिन चार-पांच साल बाद मैं अमेरिका जरूर जाऊंगा।’ उसके दोस्त ने कहा, ‘हायर स्टडी के लिए? यह तो बहुत अच्छी बात है। यार, वहां पढ़ाई के लिए जाना तो मैं भी चाहता हूं। वहां की डिग्रियों की सचमुच बड़ी वैल्यू है।’  मेरे बेटे ने मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘हायर स्टडी के लिए नहीं बुद्धू, प्रेम की पढ़ाई करने के लिए। कल ही एक अखबार में खबर आई है कि अमेरिका में एक कंपनी अब लोगों को प्रेम करना सिखाएगी। यह एकदम नई किस्म की पढ़ाई है। जिसकी डिग्री और कहीं नहीं दी जाती है। अपनी गर्लफ्रेंड या ब्वायफ्रेंड को कैसे एसएमएस किया जाए, फेसबुक पर कैसी पोस्ट डाली जाए, ट्विटर पर क्या लिखा जाए, ऐसा क्या लिखा जाए कि वह इंप्रेस हो जाए, इसकी वहां शिक्षा दी जाएगी।’
मेरे बेटे के दोस्त ने आश्चर्य से मुंह फाड़ा, ‘अच्छा? तू यह सब पढ़ने अमेरिका जाएगा? अबे तुझे इसके लिए अमेरिका जाने की क्या जरूरत है? यह सब पढ़ाई तो तू यहां भी कर सकता है। इसके लिए अपने देश में कितने लवगुरु हैं न!’ मेरे बेटे ने जवाब दिया, ‘चल मान लिया थोड़ी देर के लिए कि मैं लवगुरु से पढ़ भी लूं, लेकिन क्या वह डिग्री देंगे? और फिर उस डिग्री की वैल्यू क्या रहेगी? सोच, छह-सात साल बाद जब मैं अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी से बीएल (बैचलर ऑफ लव) या एमएल (मास्टर ऑफ लव) की डिग्री लेकर लौटूंगा, तो मेरी गर्लफ्रेंड पर क्या इंप्रेशन जमेगा। मेरी तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी।’
मेरा बेटा कुछ और कहता, इससे पहले मुझे एक निगोड़ी खांसी आ गई। मेरा कुलदीपक और उसका दोस्त दोनों सकपका गए और बरामदे से निकल कर सड़क पर आ खड़े हो गए। बेटे की बातें सुनकर मुझे कबीरदास याद आ गए। बेचारे कबीरदास यह रटते-रटते मर गए कि प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।‘ कबीरदास के जमाने में तो प्रेम की खेती शायद होती भी नहीं थी। कुछ माफिया टाइप के लोग छोटे-मोटे पैमाने पर प्रेम की खेतीबाड़ी करते भी थे, तो उनको कोई पूछना भी नहीं था। उन दिनों प्रेम हॉट-बाजारों में भी नहीं बिकता था। हालांकि राजा-महाराजा बाकायदा मीना बाजार लगवाते थे, लेकिन वह आम लोगों की पहुंच से बाहर की बात थी। प्रेम के खरीदारों की संख्या तो तब बहुत सीमित थी। लेकिन आज तो कबीरदास की पूरी थ्योरी ही उलटी जा रही थी। प्रेम की न केवल खेती की जा रही है, बल्कि उसे हॉट-बाजार में खरीदा-बेचा जा रहा है। कबीरदास की थ्योरी पर मैं आगे कुछ और सोचता-विचारता कि घरैतिन रसोई से बाहर निकली और बोली, ’किस कलमुंही की याद में यहां बुत बने खड़े हो?‘ घरैतिन की बात सुनते ही मैं चौंक गया और फुर्ती से घर के अंदर घुस गया।

Sunday, February 12, 2017

बनन में बागन में झुट्ठौ न बगरयो बसंत है

अशोक मिश्र
अब तो पता ही नहीं चलता कि कब मुआ वसंत आया और चला गया। दरवाजे पर, खेतों में, बागों में, गली-कूचों में न कहीं वसंत की आहट सुनाई देती है, न पदचिह्न। ईमेल के जमाने में मुआ चिट्ठी पत्री हो गया, अगोरते रहो साल भर। आता भी है, तो ह्वाट्स ऐप, लैपटॉप, फेसबुक, ट्विटर पर किसी पोस्ट के आने पर जिस तरह मोबाइल पर एलार्म रिंग बजती है, उसी तरह रस्म अदायगी के तौर पर वसंत पंचमी के दिन पीले कपड़े पहने, पीले फूल हाथों में लिए ‘वर दे वीणावादिनि वर दे..’ गाते बच्चे-बच्चियों को देखकर पता चलता है कि वसंत आ गया है। हालांकि दिन-रात आंखें गड़ाने की वजह से मिचमिची आंखों और फॉस्टफूड खाने से पियराये इन बच्चे-बच्चियों के चेहरों पर थोड़ी मस्ती, थोड़ी शरारत के भाव नदारद ही रहते हैं। ऐसे में कैसे समझा जाए कि वसंत या तो कहीं आसपास है या आ चुका है। अब तो वसंत के आने पर जी में वह फुरफुरी ही नहीं उठती, जो कुछ दशक पहले तक दूर से ही किसी नवयौवना या नवयुवक को देखते ही युवा लड़के-लड़कियों के मन में उठती थी। चेहरा एकदम पलास हो जाता था। आंखें हजार सूरज की रोशनी लिए चमकने लगती थीं। नख लेकर शिख तक मद छा जाता था। बसंत और फाल्गुन में तो बूढ़ी भौजाइयां, बूढ़े बाबा तक मदांध होने लगते थे। आम के साथ-साथ लोग बौराने लगते थे। अंतरतम में कहीं गहरे छिपी बैठी साल भर की दमित इच्छाएं और वासनाएं जैसे अंगड़ाइयां लेने लगती थीं। मन से हुलास-उल्लास तो जैसे बिला गए हैं। न तो नौजवानों में कहीं वसंत दिखता है, न प्रौढ़ों और बुजुर्गों में। कई बार तो लगता है, महाकवि पद्माकर झुट्ठै लिख गए हैं कि बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरयो बसंत है। अब वसंत आता भी है, तो दबे पांव। आता है, तो उसके आने पर थोड़ी बहुत रस्म अदायगी होती है और चुपचाप विदा हो जाता है, जैसे कुघड़ी में आया हुआ मेहमान। मेहमान के आने पर अब जिस तरह किसी को खुशी नहीं होती है, वैसे ही प्रकति और मानव से निरादरित वसंत अपने प्राचीन गौरव को याद करता हुआ थके पथिक की तरह चला जा रहा होगा। प्राचीन वसंतकालीन विरहिणी नायिका की तरह बिसूरता होगा अरण्य में बैठकर। हां, अब वैलेंटाइन्स डे आता है, पूरे गाजे-बाजे के साथ। बाजार के चक्कर में वसंत मात खा गया। वैलेंनटाइन्स डे के साथ बाजार है, क्रेता हैं, विक्रेता हैं, उन्मुक्तता है, विलासिता है, मादकता है। वसंत के नाम पर मुरझाए हुए चेहरों को वैलेंटाइन्स डे के नाम पर किस तरह चहकना है, यह बाजार ने सिखा दिया है। वैलेंटाइन्स डे ने प्रतिबद्धता तो जैसे खत्म ही कर दी है। इसको प्रपोज करो, उसको किस करो, फलां को टेडी बियर दो और वैलेंटाइन्स डे किसी और के साथ मनाओ। अगले साल वैलेंटाइन्स डे पर किसी दूसरे, तीसरे, चौथे को वैलेंटाइन चुनने की अबाध स्वतंत्रता है।

Wednesday, January 25, 2017

मतदाताओं का मजा, ले गए अलीरजा

अशोक मिश्र
विधानसभा चुनाव की रणभेरी क्या बजी, तरह-तरह के डमरू, बंदर-बंदरिया लेकर मदारी की तरह उम्मीदवार लगे करतब दिखाने। वे अपना करतब दिखाने में मस्त हैं। उन्हें मजा आ रहा है। मजा आए भी क्यों न! यदि चुनाव जीते, तो सत्ता सुंदरी के वरण का मौका जो मिलेगा। ये उम्मीदवार सिर्फ डमरू, बंदर-बंदरिया या जमूरे के भरोसे ही चुनाव जीतने की कोशिश में नहीं हैं। इन्होंने अपनी-अपनी पीठ पर एक ढोल भी बांध रखी है। जहां भी इन्हें मतदाता दिखा बजाने लगते हैं-मैं सबसे बहुत अच्छा हूं। मैं यह करूंगा, वह करूंगा। एक मैं ही ईमानदार हूं, बाकी सब बेईमान हैं।
इन उम्मीदवारों को भले ही चुनाव में मजा आ रहा हो, लेकिन जब से चुनाव आयोग अंग्रेजों के जमाने का जेलर बना है, तब से मतदाताओं का सारा मजा अली रजा ले गए। मुझे याद है कि दस-बीस साल पहले चुनाव के दौरान कितना मजा आता था। चुनाव से डेढ़-दो महीना पहले ही गली-मोहल्ले में दली-निर्दली सबके बैनर-पोस्टर लग जाते थे। किस्म-किस्म के पंपलेट, बुकलेट बांटे जाते थे। चुनाव खत्म होते-होते घर में दस-बीस किलो रद्दी इकट्ठा हो जाती थी। घरैतिन केरोसिन खत्म हो जाने पर उसी पंपलेट, बुकलेट और पोस्टर आदि से चाय और दूध गरम कर लेती थीं। घर के बच्चों को दूध और मुझे चाय नसीब हो जाती थी। पूरा घर उम्मीदवारों को जीभर कर आशीष देता था। रात-बिरात गाटरवा, पिंटुआ, बबलुआ, रमेशवा, सुरेशवा को उकसाकर, टाफी-कंपट, चना-चबैना का लालच देकर झंडे, बैनर उतरवा लिए जाते थे।
दलियों-निर्दलियों के ये झंडे-बैनर घरैतिन के बूटीक कला में पारंगत होने के जीवंत उदाहरण के रूप में काफी दिनों तक घर में शोभायमान रहते थे। बच्चों से लेकर घर के बड़े-बूढ़ों तक की जांघिया-कच्छे बनाने में ये झंडे-बैनर काम आते थे। घर के बच्चे यदि ज्यादा ऊर्जावान हुए, तो तकिए की लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई बढ़ जाया करती थी।
उन दिनों जब तक विधानसभा या लोकसभा के चुनाव चलते थे, लंपटों, निठल्लों, कामचोरों की मौज ही मौज हुआ करती थी। घर में भले ही फाकाकशी की नौबत हो, लेकिन उम्मीदवारों और उनके चिंटुओं-पिंटुओं की बदौलत चाय-पानी, पूड़ी-तरकारी से लेकर कच्ची-पक्की का जुगाड़ हो जाता था। हां, बस इलाके में रहने वाले उम्मीदवारों के खास चमचों की थोड़ी लल्लो-चप्पो करनी पड़ती थी। अब वह सुख तो जैसे  सपना हो गया। ललिता पवार की तरह खूसट सास बना चुनाव आयोग राई-रत्ती का हिसाब-किताब मांग रहा है। सच्ची बात बता दो कि फलां को कच्ची दी, अमुक को पक्की, तो परचा खारिज। भला बताओ, यह भी कोई बात हुई।

Sunday, January 22, 2017

भ्रष्टाचार मुक्त भारत या भ्रष्टाचार युक्त भारत

-अशोक मिश्र
जी हां! यह आपको ही तय करना है कि आपको कैसा भारत चाहिए? नेता, अधिकारी, मंत्री-संत्री क्या कहते हैं, वे कैसा भारत चाहते हैं, यह सवाल कम से कम हम आपके लिए बहुत मायने नहीं रखता है। हमें आपको तय करना है िक हमें कैसा भारत चाहिए? वैसेे तो नेता, मंत्री, विधायक कभी नहीं कहेंगे कि भ्रष्टाचार युक्त भारत चाहिए। वे हमेशा खुले में भ्रष्टाचार का ही विरोध करेंगे, लेकिन जब भीतरखाने लेन-देन की बात आती है, तो उनका भ्रष्टाचार युक्त भारत के प्रति प्रेम जागृत हो जाता है। मैं आपको कम से कम बीसियों फायदे भ्रष्टाचार युक्त भारत के गिना सकता हूं। आप भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ ही फायदे गिनाकर चुप रहने को मजबूर हो जाएंगे।
सच पूछिए, तो जो मजा भ्रष्टाचार युक्त भारत में रहने में है, वह भ्रष्टाचार मुक्त भारत में कहां है? सोचिए, अगर भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो गया, तो लगे रहिए लोन की लाइन में। करते रहिए अपनी बारी आने का इंतजार। तब बैंक के मैनेजर से लेकर बाबू तक आपसे यही कहते फिरेंगे, अपनी बारी का इंतजार करें। पांच करोड़ बाइस लाख बत्तीस हजार सात सौ इक्यासवां नंबर है आपका। जब नंबर आएगा, आपको सूचित कर दिया जाएगा। करते रहिए पूरी जिंदगी इंतजार। इंतजार करते-करते आपका तो इस दुनिया से टिकट कटेगा, कटेगा, आपको नाती-पोते बूढ़े हो जाएंगे, तब भी नंबर नहीं आएगा। अभी आप पांच सौ का पत्ता पकड़ाइए, चाहे जिस तरह का लोन ले लीिजए। अरे घर-कुरिया से लेकर चूहे-बिल्ली पर भी लोन हाजिर है, बस आप उनके िहस्से का ख्याल रखें।
आप आज जो इतना खूबसूरत भारत, वाइब्रेंट भारत देख रहे हैं, उसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका भ्रष्टाचार की है। अगर भ्रष्टाचार नहीं होता, तो आपके इलाको एक भी बिजली का खंबा, एक भी नाली, एक भी सड़क, एक भी पार्क मयस्सर होता कि नहीं, कौन जानता है? खंबा भोपाल से आता, सीमेंट गुजरात से आती, जमीन खोदने वाला केरल से आता, तब कहीं जाकर आपके इलाके में एक खंबा गड़ पाता। सब कुछ नियम, कायदे, कानून के मुताबिक होना होता, तो आज भी आपके मोहल्ले में सड़क तो होती ही नहीं, आप भी नाव पर बैठकर मुख्य सड़क तक जाते। अगर राष्ट्रीय या प्रांतीय राजमार्ग वालों की मेहबानी से आपके जिले का नंबर आया होता तो। अभी तो दो किमी सड़क बनाने को जितना पैसा पास होता है, तो भले ही बीस फीसदी नेता, मंत्री, संत्री की जेब में जाता हो। बीस फीसदी ठेकेदार कमाता हो, दस-पांच फीसदी पैसा इधर-उधर खर्च होता हो। पचास-साठ फीसदी रकम में भले ही टूटी-फूटी, ऊबड़-खाबड़ सड़क बनती तो है, वरना अब तक इंतजार करते रहते कि अलीगढ़ तक सड़क बन गई है, अब आगरा का नंबर है।

Sunday, January 8, 2017

कालातीत होते हैं ‘मोहल्ला पुराण’

-अशोक मिश्र
अगर आपसे पूछा जाए कि पुराण कितने हैं, तो आप अपने बचपन में रटा हुआ ‘अष्टादश पुराणेषु..’ सुना देेंगे। जी नहीं, इन पुराणों के अलावा एक पुराण होता है ‘मोहल्ला पुराण’।  यह पुराण वाचिक परंपरा का वाहक होता है। वाचिक और श्रव्य परंपरा में समय-असमय, रात-विरात हर मोहल्ले में ‘मोहल्ला पुराण’ का लेखन अनवरत चलता रहता है। समय के अदृश्य पृष्ठ पर मोहल्लावासी मौखिक रूप से मोहल्ला पुराण लिखते रहते हैं। इस पुराण के पुराने पृष्ठ दिन, सप्ताह, महीने में खुद ब खुद काल कवलित होते रहते हैं और नए पृष्ठ स्वत: जुड़ते चले जाते हैं। मोहल्ला वालों में लेखकीय गुण या उनका संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, पाली, पाकृत जैसी भाषाओं में प्रवीण होना कतई जरूरी नहीं है। कानाफूसी, बतकूचन या अफवाह फैलाने की कला में निष्णात स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध इसके रचनाकार हो सकते हैं। बस, रचनाकार के पास चटपटी, मसालेदार खबरों का अकूत कोष होना चाहिए।
किसका किससे टांका भिड़ा है। किसने अपने अड़ोसी या पड़ोसी को कुत्ता, गधा, बदतमीज, नकारा, आवारा, पागल या घमंडी कहा, तो अड़ोसी या पड़ोसी ने ऐसा कहने वाले की मां-बहन, बेटी से अंतरंग रिश्ते कायम किए। पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी, तिवारी जी, कुशवाहा जी आदि जितने भी ‘जी’ टाइप के व्यक्ति हैं, उनके घर की कलह या प्रणय कथाओं का वाचन-श्रवण मोहल्ला पुराण की दैनिक, साप्ताहिक या मासिक कतई अनैतिक नहीं माना जाता है। नैतिकता-अनैतिकता जैसी वाहियात दर्शन और सिद्धांत मोहल्ला पुराण में वर्ज्य माने जाते हैं। किसकी बहन, बेटी, मां सुबह घर से निकली थी और देर रात को घर वापस आई थी। पड़ोसी के घर में आज सब्जी बनी थी या कढ़ाई पनीर िकसी होटल से आया था। मिसेज वर्मा की रामू की अम्मा, प्रदीप की भाभी, शकुंतला की ननद से लड़ाई होने वाली है। ऐसी खबरें मोहल्ला पुराण में सबसे ऊपर स्थान पाती हैं।
जैसे कोई ठीक-ठीक यह नहीं बता सकता कि ‘अट्ठारह पुराण’कब लिखे गए और किसने लिखा, ठीक उसी तरह मोहल्ला पुराण भी कालातीत हैं। जब से समाज अस्तित्व में आया है, तब से मोहल्ला पुराण में रोज कुछ न कुछ जोड़ा-घटाया जा रहा है। इससे पहले जब आबादी कम थी, लोग गांवों या नगरों में रहते थे, तब इसे गांव या नगर पुराण कहते रहे होंगे। बाद में जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ,  नगर, कस्बा, मोहल्ला और गांव के नाम पर इसका नामकरण होता गया। मोहल्ला या गांव पुराण में ऐसे-ऐसे चुटीले और व्यंग्यीले (कुछ-कुछ रंगीले जैसा) प्रसंग रोज दर्ज होते रहते हैं, जिसको पढ़कर दुनिया भर के व्यंग्यकारों की चुटैया खड़ी हो जाए। अगर देश के व्यंग्यकार मोहल्ला पुराण के लेखकों से कुछ सीख सकें, तो व्यंग्य का बहुत भला होगा।

Tuesday, January 3, 2017

बाप के जूते में बेटे के पांव

-अशोक मिश्र
बाप तो आखिरकार बाप ही होता है। बेटा बेटा होता है। बाप के आगे बेटे की क्या बिसात है। अगर आप माई बापों ने इस कहावत को रट्टा मारकर याद कर रखा है कि तो भूल जाइए। सच पूछिए, तो भूल जाने में ही भलाई है। अगर आप आसानी से नहीं भूले, तो बेटे भुलवा देंगे और आपको यह कहावत याद करा देंगे कि बेटे किसी के भी कान काट सकते हैं। अब आपको इस मुहावरे का अर्थ बताने की भी जरूरत है? टीपू ने कितनी खूबसूरती से नेताजी के कान काटे, यह सारी दुनिया देख-सुन रही है। उसने तो बाप के ही कान नहीं काटे, चाचा, अंकल सबके नाक-कान बिना उस्तरे के ही रेत दिया। हाय..हाय कर रहे हैं बेचारे। लखनऊ से दिल्ली तक दौड़ लगा रहे हैं। सबको अपने कटे कान दिखा रहे है, लेकिन बाप-बेटे की लड़ाई में अपनी टांग अड़ाए कौन? इस मामले में जिसकी भी टांग टूटी है या टूटेगी, उन्होंने जरूर पिता-पुत्र के पचड़े में अपनी टांग फंसाई होगी।
आप इतिहास उठाकर देख लें। जिस बेटे ने अपने बाप-दादाओं के कान काटे, उसी का नाम इतिहास में दर्ज हुआ है। इतिहास में नाम दर्ज कराने की पहली शर्त यही है कि वह अपने बाप से चार जूता आगे निकले। भला बताइए, अगर आप लोहिया के सिद्धांतों को धता बता सकते हैं। उनके सिद्धांतों के नाम पर सात-आठ चेले-चपाटों के साथ पार्टी खड़ी कर सकते हैं। फिर चेले-चपाटों को ठेंगा दिखाकर उस पार्टी के भी टुकड़े करा सकते हैं, तो अब बुढ़ौती में आपकी पार्टी और आपके साथ भी तो वही इतिहास दोहराया जा सकता है। अब काहे को दैया-दैया कर रहे हो, चच्चा! दई (विधाता) दई सो कुबूल। वैसे तो यह ध्रुव सत्य है कि आज जो बाप है, कभी वह बेटा था। जो आज बेटा है, वह कभी न कभी बाप बनेगा। बाप-बेटे की यह उठापटक सनातनी है। जिस बेटे ने बाप को गच्चा दिया, तो समझो, दुनिया को गच्चा देने में प्रवीण हो गया। अगर बुढ़ापे में अपने ही बेटे से गच्चा खा गया, तो दुनिया को दिखाने को भले चीखता-चिल्लाता हो, लेकिन भीतर ही भीतर वह खुश होता रहता है-वाह बेटा! इस पुरातन गच्चावादी परंपरा को कितनी खूबसूरती से आगे बढ़ाया है।
अगर आप चाहते हैं कि आपका बेटा बुढ़ापे में आपको गच्चा न दे, आपके और आपके बेटे के बीच जूते में दाल न बंटे, तो यह बात अच्छी तरह गांठ बांध लें कि बेटा किसी भी हालत में आपके जूते में पांव डालने ही न पाए। बचपन में ही जब वह आपके जूते में पांव डालने की कोशिश करे, तो उसे बरज दें, मना कर दें। यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो जिस दिन आपके जूते में बेटे का पैर फिट हुआ, उसी दिन से समझ लीजिए कि अब आप बाप-बेटे के बीच जूते में दाल बंटने के दिन आ गए हैं। जूतमपैजार अवश्यंभावी है। इसे टाला नहीं जा सकता है। अब अगर समाजवादी बाप-बेटे में जूतमपैजार हो रही है, तो किम आश्चर्यम!