Monday, December 26, 2016

कवि की आलोचक से मुलाकात

अशोक मिश्र
इसे संयोग कहिए या दुर्योग, जनकवि ‘रसिक’ जी की मुलाकात प्रख्यात आलोचक ‘कवि दहल’ से हो ही गई। दोनों यथा नामे, तथा गुणे। एक की कविता में सिर्फ रस की ही उत्पत्ति होती है, तो दूसरे की आलोचना से कवि दहल जाया करते हैं। कुछ ही दिन पहले कविदहल जी जनकवि रसिक जी को अपनी आलोचना से दहला चुके थे। तब से रसिक जी पगलाए सांड की तरह पूरे शहर में कविदहल को ढूंढ रहे थे। आखिरकार दोनों की मुलाकात हो ही गई। रसिक जी कवि दहल को देखते ही गुर्राये, ‘कल का छोरा...आलोचक की दुम बना फिरता है। क्या लिखा था तूने अखबार में, मैं घसकटा छंद लिखता हूं। मेरी कविताओं में किसी भी रस की निष्पत्ति नहीं होती है। चल..माना, मैं घसकटा छंद लिखता हूं, तू एक छंद लिखकर दिखा।’
रसिक जी को साक्षात सामने देखकर कविदहल के पसीने छूट गए। घिघियाए स्वर में बोले, ‘कपड़ा अच्छा सिला या बुरा, इसको परखने के लिए दर्जी होना कोई जरूरी थोड़े न है।’ कविदहल ने तर्क पेश किया। रसिक जी ने मुंह खोलकर थूक की बौछार की, ‘मेरी कविता की इस पंक्ति में तुझे क्या खामी नजर आती है-‘प्रिये! तुम्हारे विरह में दुख गड़ता है।’ अपनी आलोचना में क्या लिखा था तूने-दुख न हो गया खूंटा हो गया, जो बेध्यानी से आते-जाते पांव में गड़ता है। अबे..तुझे विरह का दुख गड़ता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम, लेकिन मुझे तो गड़ता है। क्या कर लेगा तू। चालीस साल से जनकवि हूं, आज तक किसी की िहम्मत नहीं हुई अंगुली उठाने की। तू अब मेरी कविताओं की व्याख्या करेगा? तू जानता है, एक-एक पंक्तियों का सृजन करने के लिए किस-किस पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ता है। किस-किस से प्रेरणा लेनी पड़ती है। कभी बीवी से प्रेरणा लेनी पड़ती है, तो कभी प्रेमिकाओं की शरण में जाना पड़ता है। कभी साली-सलहज ही प्रेरक हो जाती हैं। इधर-उधर तांकना-झांकना पड़ता है, तब कहीं चार पंक्ति की कविता में रसोत्पत्ति होती है। और तू है कि पल भर में सारे किए धरे पर पानी फेर देता है आलोचना के नाम पर। तू आलोचक है या कसाई। तुझे तनिक भी दया नहीं आती..कविता की निर्मम शवपरीक्षा करते हुए।’
कविदहल ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा, ‘रसिक जी..पिछले चालीस साल से तीन कविताएं लिए कवि सम्मेलनों से लेकर अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के दफ्तर में दनदनाते हुए घूम रहे हैं। जहां देखो वहीं, या तो विरह में दुख आपके गड़ने लगता है या फिर ‘डमड डमड डिमिड डिमिड’ करके शंकर जी की बारात गाने लगते हैं। कुछ नया कीजिए। अब तो कविता को अपने चंगुल से मुक्त कर दीजिए।’ इतना कहकर युवा आलोचक कविदहल किसी दूसरे कवि की तलाश में चलता बना।

Monday, December 12, 2016

श्मशानघाट में राग-विराग

वे मुझसे श्मशानघाट में मिले। मुझे देखते ही लपक कर मेरे पास आए। बोले, ‘यही वह जगह है जहां आदमी को एहसास होता है कि यह जगत मिथ्या है, भ्रम है। यहां आकर इंसान राग-विराग, ईर्ष्या-द्वेष, निंदा-प्रशंसा आदि मानवीय गुणों-अवगुणों से मुक्ति पा लेता है। राजा-रंक सभी एक समान हो जाते हैं। या यों कहिए कि श्मशान घाट में सच्चा समाजवाद स्थापित हो जाता है। मैं तो जब भी श्मशान घाट में जाता हूं, तो अपने को सांसारिक मोह-माया से मुक्त पाता हूं। कोई कामना, कोई इच्छा बाकी नहीं रह जाती है। जैसे कि अब हूं। ऐसा लगता है कि यहां आने के बाद ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं और परम ब्रह्म के दर्शन हो जाते हैं।’
मैंने पास में अंतिम संस्कार के लिए तैयार किए जा रहे एक शव की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘आपके रिश्तेदार थे?’ वे अंतरिक्ष की ओर निहारते हुए निर्लिप्त भाव से बोले, ‘हां..बहुत अच्छे थे, लेकिन परम दर्जे के स्वार्थी भी थे। पैसे के आगे इन्होंने जीवन भर मां को मां नहीं समझा,
बीवी को बीवी, बेटी-बेटों को बेटी-बेटा नहीं समझा। बस, जैसे एक ही धुन सवार थी, पैसा कमाना है, सभी सुखों को तिलांजलि देकर बस पैसा कमाते गए। इतना कमाया कि हमारे सभी रिश्तेदारों में सबसे अमीर हो गए।’
मैंने उत्सुक भाव से पूछा, ‘इनकी मौत कैसे हुई? बीमार थे?’ ‘नहीं भाई..हार्ट अटैक से मर गए। जब से नोटबंदी हुई है, तब से काफी बेचैन थे। डॉक्टर ने काफी प्रयास किया कि वे बेचैन न रहें, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे, उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। कल रात बेचैनी इतनी बढ़ी थी कि इन्हें हार्ट अटैक पड़ा। कोई कुछ कर पाता कि उससे पहले थोड़ी ही देर में टें बोल गया ससुर का नाती...हरामखोर..बेहूदा।’
मैंने विस्मय से उन्हें देखा। थोड़ी देर पहले श्मशान घाट में राग-विराग से मुक्त होने और परम ब्रह्म का दर्शन कर लेने का दावा करने वाला व्यक्ति अपने दिवंगत रिश्तेदार के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा था। हालांकि, भारतीय संस्कृति में बुरे आदमी को भी अच्छा बताने की परंपरा रही है।
मैं कुछ बोलता, उससे पहले वे बोल उठे, ‘चार करोड़ रुपये पड़े के पड़े रह गए..साथ कुछ नहीं गया..दो हाथ का यह कफन भी अभी जल कर खाक हो जाए। एक हफ्ते पहले मैंने इस ससुरे से कहा था, तुम्हारे पास इतना पैसा है, पांच-दस लाख रुपये मुझे दे दो, मैं इसे ठिकाने लगा लूंगा। अपने एक दूसरे रिश्तेदार का मामला सुलटा कर चार लाख रुपये कमा चुका हूं। मैंने सोचा था, इससे भी पांच-दस लाख रुपये कमा लूंगा, लेकिन ससुरे ने जान दे दी, रोकड़ा नहीं दिया।’ इतना कहकर उन्होंने जमीन पर थूक दिया, मानो उन्होंने रिश्तेदार  और शव के पास चले गए। मैं सन्न खड़ा उन्हें देखता रहा।

Sunday, December 11, 2016

तू भी चर, मैं भी चरूं

-अशोक मिश्र
थे तो वे दोनों गधे ही। उनकी मुलाकात अचानक हुई थी। अचानक हुई मुलाकात थोड़ी देर बाद मित्रता में बदल गई। बात यह थी कि मोहरीपुर के पास स्थित कालोनी के पार्क का खुला गेट देखकर एक गधा घुसा और जल्दी-जल्दी चरने लगा। थोड़ी देर बाद पता नहीं कहां से दूसरा गधा भी आ पहुंचा। पहले वाला गधा बाद में आने वाले गधे को देखकर भड़क उठा। उसने दुलत्ती झाड़ते हुए ‘ढेंचू-ढेंचू’ का गर्दभ राग अलापा और गुर्राया, ‘अबे..तुझे कोई दूसरा पार्क या खेत नहीं मिला था चरने के लिए? इतना बड़ा देश पड़ा है चरने के लिए, तू वहीं क्यों आ गया जहां पहले से मैं चर रहा था।’
बाद में आने वाले गधे ने लपकर एक खूबसूरत फूल के पौधे को दांतों से पकड़कर उखाड़ा और चबाते हुए बोला, ‘सचमुच..इन्सान अगर हिकारत से हमें ‘गधा’ कहते हैं, तो कोई गलत नहीं कहते। हम गधे हैं, गधे थे और भविष्य में भी गधे ही रहेंगे। इतने बड़े पार्क में अगर एक दिन मैंने चर लिया, तो कहां का पहाड़ टूट पड़ा। इंसानों को देखो। वे जब देश, प्रदेश, जिला या तहसील को चारागाह समझकर चरते हैं, तो आपस में मिल बांटकर चरते हैं। ‘थोड़ा तू चर, थोड़ा मैं चरता हूं’ वाले सिद्धांत पर बड़ी ईमानदारी से अमल करते हैं। एक हम हैं कि मुट्ठी भर घास के लिए आपस में दुलत्ती झाड़ रहे हैं। लानत है हम गधों पर इस प्रवृत्ति पर।’
पहले वाला गधा उसका गर्दभ राग सुनकर थोड़ा शर्मिंदा हुआ और पहले की अपेक्षा थोड़ा नर्म आवाज में बोला, ‘ठीक है..ठीक है..बहुत ज्यादा भाव मत खा। आज पेटभर चर ले और निकल ले।’ पहले वाले गधे का पेट थोड़ा बहुत पहले से ही भरा हुआ था, वह पार्क में लगे पेड़-पौधों को चुन-चुनकर चर रहा था, जबकि बाद वाला गधे को शायद कई दिनों से घास नहीं मिली थी। वह बिना कुछ सोचे-बिचारे बस चरता जा रहा था। जब थोड़ा पेट भर गया, तो उसने मुंह उठाया और पहले वाले गधे के पास जाकर बोला,‘भाई! यह बताओ, आज पार्क का रखवाला यानी माली नहीं दिखाई दे रहा है? कालोनी में भी चहल-पहल नहीं दिखाई दे रही है। मामला क्या है?’
‘यह सब किसी नोटबंदी का कमाल है। सुना है कि इस देश के प्रधानमंत्री ने नोटबंदी लागू की है। तब से सारे लोग परेशान हैं। अमीर भी, गरीब भी। चोर भी, उचक्के भी। सज्जन भी, दुर्जन भी। बेईमान भी, शाह भी। जो भ्रष्टाचारी हैं, बेईमान हैं, वे अपने नोट को तीरे-थाहे (सुरक्षित करने) लगाने में लगे हैं। जो ईमानदार हैं, वे सुबह से लेकर शाम तक लाइन में लगे हुए हैं। जितने दिन यह कतारबंदी चलेगी, उतने दिन तक समझो, हम गधों की मौज है।’ इतना कहकर पहले वाला गधा चरने लगा। पहले गधे को चरता देखकर दूसरा भी चरने लगा।