Monday, June 29, 2026

पुरानी नाक वापस आ जाए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कई बार इंसान के पास अपना भाग्य संवारने का बेहतरीन मौका होता है, लेकिन वह अपनी मूर्खता और लालच के चलते अपना भला नहीं कर पाता है। अवसर की उपयोगिता नहीं समझ पाने की वजह से ही ऐसा होता है। अवसर बीत जाने के बाद वह पछताता है, लेकिन अब किया क्या जा सकता है। इसी वजह से कहा गया है कि इंसान को अवसर को पहचानना आना चाहिए और उसका कैसे लाभ उठाया जा सकता है, इतनी समझ होनी चाहिए। 

एक कथा है। किसी गरीब व्यक्ति ने देवता की खूब आराधना की। देवता प्रसन्न हो गए। उन्होंने उस व्यक्ति को एक पासा देते हुए कहा कि तुम इस पासे से तीन वरदान मांग सकते हो। वह व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुआ। वह पासा को लेकर अपने घर गया। उसने सारी बात अपनी पत्नी को बताई। यह सुनकर पत्नी बहुत खुश हुई। उसने अपने पति से कहा कि हम लोग काफी गरीब हैं। इसलिए हमें इस पासे से खूब धन दौलत मांगनी चाहिए ताकि हमारी गरीबी दूर हो सके। 

पति ने कहा, नहीं। हमारी नाक चपटी है। इसकी वजह से लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं। हमें इस पासे से सुंदर नाक मांगनी चाहिए। इतना कहकर उसने पासा फेंका और तीन बार कहा कि सुंदर नाक दे दो। तीन नाकें आकर उसके शरीर पर चिपक गई और उसकी अपनी नाक गायब हो गई। उसने दूसरी बार पासा फेंका और कहा, नाक गायब हो जाए। सारी नाक गायब हो गई। अब उसके पास एक ही अवसर बचा था। 

मजबूर होकर उसने तीसरी बार पासा फेंका और कहा कि मेरी पुरानी नाक वापस आ जाए। पुरानी नाक वापस आ गई और अब पासा बेकार हो चुका था। उस व्यक्ति ने अपनी मूर्खता से तीन बेहतरीन अवसर को खो दिया।

कांग्रेस के नए प्रदेश प्रभारी के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां


अशोक मिश्र

हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी रहे बीके हरिप्रसाद के कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनकी जगह संजय दत्त को लाया गया है। कांग्रेस में इन दिनों बदलाव की बयार बह रही है। कांग्रेस हाईकमान ने 26 जून को उत्तर प्रदेश, हरियाणा और ओडीसा में नए प्रदेश प्रभारी नियुक्त किए  हैं। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक उत्तर प्रदेश में किया गया बदलाव माना जा रहा है। पार्टी ने अविनाश पांडेय को हटाकर राजेंद्र पाल गौतम को नया प्रभारी नियुक्त किया है। गौतम दलित समुदाय से हैं और माना जा रहा है कि वह कांग्रेस के साथ दलित समुदाय को जोड़ने में सफल हो सकते हैं। राजेंद्र पाल गौतम आम आदमी पार्टी से आए हैं। 

उत्तर प्रदेश कांग्रेस में अविनाश पांडेय को हटाने को लेकर असंतोष की लहर दिखाई दे रही है। जहां तक हरियाणा की बात है। बीके हरिप्रसाद के स्थान पर संजय दत्त की नियुक्ति से बहुत ज्यादा फर्क पड़ता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। संजय दत्त महाराष्ट्र से हैं और कांग्रेस में वह कई पदों पर काम कर चुके हैं। संजय दत्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतना और उनके विश्वास को कायम रखना है ताकि वह खुले मन से काम कर सकें। 

संजय दत्त के सामने इससे भी बड़ी चुनौती हरियाणा कांग्रेस में सक्रिय गुटों को एक मंच पर लाकर उनमें समन्वय स्थापित करना है। सन 2024 में विधानसभा चुनावो के दौरान भूपेंद्र हुड्डा, कुमारी सैलजा, रणदीप सुरजेवाला तीनों अपने को सीएम पद का दावेदार बताते हुए थक नहीं रहे थे। इन तीनों गुटों के कांग्रेस में अपने-अपने विधायक हैं और अपने जिलाध्यक्ष। हरियाणा कांग्रेस की सबस बड़ी दिक्कत यही है कि जैसे ही प्रदेश कांग्रेस में अध्यक्ष या प्रभारी की नियुक्ति होती है, उस पर किसी न किसी गुट का ठप्पा लग जाता है। उसे हुड्डा, सैलजा या सुरजेवाला गुट का बताने की मुहिम शुरू हो जाती है। 

सब उसे अपने-अपने पाले में खींचने में लग जाते हैं। संजय दत्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इन तीनों गुटों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर पाते हैं या नहीं। यदि तीनों गुट एक साथ मिल जुलकर काम करें, तो सन 2029 का चुनाव जीतना मुश्किल नहीं होगा। लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा संगठन है। अधिकतर जिलों में जिलाध्यक्ष की नियुक्ति ही नहीं हुई है। जिला, ब्लॉक, न्याय पंचायत स्तर पर संगठन है ही नहीं। ऐसी स्थिति में विधानसभा चुनाव में सफलता हासिल होगी, कहना मुश्किल है। 

वैसे तो हरियाणा के नए प्रदेश प्रभारी संजय दत्त के पास खोने को कुछ नहीं है। उन्हें सब कुछ जीरो से शुरू करना है। अगर वह प्रदेश में संगठन खड़ा करने में सफल हो गए, तो उनके सामने किसी प्रकार की शायद ही कोई चुनौती खड़ी होगी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह कांग्रेस हाईकमान को निष्पक्षता से हरियाणा कांग्रेस की वर्तमान हालत बता पाते हैं या नहीं।

Sunday, June 28, 2026

सुश्रुत ने की दुनिया में पहली प्लास्टिक सर्जरी

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि शल्य चिकित्सा के जनक सुश्रुत  थे। सुश्रुत  का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व कन्नौज में हुआ था। इनके गुरु धन्वंतरि थे। सुश्रुत के जन्म के समय को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कोई इन्हें ईसा पूर्व पहली शताब्दी का मानते हैं। एक बार की बात है। वह कहीं जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक हिरन घायल पड़ा हुआ है। 

उन्होंने उस हिरन के घाव पर औषधियों का लेप लगाया और उसकी देखभाल की। जब हिरन ठीक हो गया, तो उसे जंगल में छोड़ दिया। तभी उनके मन में आया कि जब औषधियों से जानवरों को ठीक किया जा सकता है, तो इंसानों की बीमारियों को क्यों नहीं ठीक किया जा सकता है। 

उन्होंने अपने गुरु प्रसिद्ध चिकित्सक धन्वंतरि से इस बारे में बात की, तो धन्वंतरि ने कहा कि बेटा! चिकित्सा केवल एक काम नहीं है, यह दुखी इंसानों को आराम पहुंचाने का महान कार्य है। उसी समय से उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में निपुणता हासिल करने के लिए शल्य क्रिया सीखने की कोशिश करनी शुरू कर दी। इसके लिए वह तरबूज, कद्दू और खीरा आदि पर चीरा लगाते और उसे सिलने की कोशिश करते। 

कई बार सिलाई अच्छी नहीं होती थी। लेकिन बार-बार प्रयास करने से वह धीरे-धीरे निपुण हो गए। काफी समय बाद एक दिन जब वह आराम कर रहे थे तो उनके दरवाजे पर एक घायल सैनिक आया। उसकी युद्ध में नाक कट गई थी। वह चिंतित था कि अब वह पहले जैसा नहीं दिखेगा। सुश्रत ने उसे धीर बंधाया। उन्होंने चेहरे की त्वचा से नई नाक बनाई और उसकी कटी नाक पर लगा दी। धीरे-धीरे सैनिक स्वस्थ हो गया। यह शायद दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी थी। इस घटना के बाद सुश्रुत अमर हो गए?

बिजली कट से लोग परेशान उद्योगों को हो रहा नुकसान

अशोक मिश्र

प्री मानसून बरसात नहीं होने की वजह से हरियाणा में गर्मी कम नहीं हो रही है। पूरे राज्य में पारा लगभग 40 के आसपास ही बना हुआ है। न्यूनतम तापमान भी 26 डिग्री के आसपास ही दर्ज किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में गर्मी और उमस बढ़ती जा रही है। गर्मी की वजह से होने वाली बीमारियों के चलते अस्पतालों में मरीजों की भरमार है। उल्टी, दस्त, पेट दर्द और कई प्रकार के संक्रामक रोगों के शिकार मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। ऐसी स्थिति बार-बार लगने वाले कट से मरीज ही नहीं, आम लोग भी काफी परेशानी झेल रहे हैं। 

अघोषित कट की वजह से जहां लोगों को परेशानी हो रही है, वहीं उद्योग-धंधों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। हरियाणा में बिजली की मांग हर साल नई ऊंचाई छू रही है। हरियाणा पावर परचेज सेंटर (एचपीपीसी) के अनुसार 2026-27 की गर्मी में पीक डिमांड 16,454 मेगावाट तक पहुंच सकती है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण का अनुमान भी 16,337 मेगावाट है।  पिछले साल 2025 की गर्मी में अधिकतम मांग 15,300 मेगावाट थी। यानी एक साल में 1,150 मेगावाट से ज्यादा का उछाल आया है। राज्य में  जैसे जैसे बिजली खपत बढ़ रही है, वैसे-वैसे उपलब्धाता भी काफी तेजी से बढ़ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य के पास ताप-विद्युत (थर्मल), गैस और नवीकरणीय ऊर्जा को मिलाकर 16,552 मेगावाट से ज्यादा की बिजली उपलब्ध है। 

इसका लक्ष्य 9,929 मेगावाट परंपरागत और 6,622 मेगावाट नवीकरणीय यानी हाइड्रो, सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोत हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि सन 2030 तक अधिकतम मांग 19,481 मेगावाट तक पहुंच जाएगी। सरकार के मुताबिक राज्य के पास कुल मिलाकर पर्याप्त बिजली उपलब्ध है, लेकिन मई-जून जैसी भीषण गर्मियों में कुछ उच्च खपत वाले दिनों में पीक डिमांड और ऊर्जा की कमी भी देखी गई। सरकार उपलब्धता बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रही है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने फतेहाबाद में परमाणु ऊर्जा परियोजना और भी कई थर्मल विस्तार परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। 

इसके बावजूद शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में बार-बार लगने वाले अघोषित बिजली कट  सारी हकीकत बयान कर देते हैं। पंद्रह जून की मियाद खत्म होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने धान की फसल बोनी शुरू कर दी है। फसल की सिंचाई के लिए पानी चाहिए। इसके लिए ट्यूबवेल चलाना पड़ेगा। बिजली न आने से सिंचाई प्रभावित हो रही है। हालांकि यह भी सही है कि प्रचंड गर्मी के चलते ट्रांसफार्मर आदि जल्दी गर्म हो जाते हैं और उनमें आग लगने की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। इसके बावजूद लगने वाले बिजली कट से उद्योगों को भी भारी नुकसान हो रहा है। मशीनें बंद रहने से जहां उत्पादन प्रभावित होता है, वहीं कामगार भी खाली बैठे रहते हैं।

चल हट नासपीटे!

-अशोक मिश्र
जेठ की भरी दुपहरिया में पैदल डग भरते हुए रामभूल उपाध्याय कार्यालय की ओर चले जा रहे थे। उनका पूरा शरीर स्वेदयुक्त होकर चिपचिपायमान हो रहा था। आधी दूरी तय करने के बाद उनकी हिम्मत जवाब दे गई, तो वे नीम के एक पेड़ के नीचे खड़ा होकर सुस्ताने लगे। वायुदेव की कृपा से जैसे ही स्वेद बिंदु सूखे। उन्होंने काक प्रवृत्ति अख्तियार कर ली। उन्हें नीम वृक्ष से मात्र दस कदम की दूरी पर महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अमर काव्य कृति ‘वह तोड़ती पत्थर’ की नायिका के दर्शन हो गए। वह पत्थर तोड़ने की बजाय सड़क के किनारे बोरी बिछाकर धूप में बैठी सब्जियां बेच रही थी। श्याम वर्णी काया पर चमकती पसीने की बूंदें, पैरों की फटी बिवाइयां, अस्त व्यस्त केश, तंबाकू या गुटखा चबाने से चितकबरी हो गईं दंतावलियां मिलकर पीड़ा और करुणा का एक कोलाज रच रहे थे। रामभूल के मन में उसके प्रति सहानुभूति की विलुप्त सरस्वती अनायास बह निकली।
रामभूल सोचने लगा। अगर यह महिला सुबह-शाम महकउवा साबून से नहाए, बालों में बढ़िया क्वालिटी का शैंपू लगाए, तो इसकी काया कैसी निखर उठेगी। अगर गोरेपन की क्रीम भी सुबह, दोपहर, शाम और रात को नियमित रूप से लगाए, तो यह गोरी दिखाई देने लगेगी। विज्ञापन में तो हीरोइन क्रीम लगाने से पहले तो एकदम उल्टे तवे जैसी दिखती है। मगर क्रीम बनाने वालों का कमाल देखिए, इधर क्रीम हाथ, पैर और चेहरे पर पुता, उधर कालापन संघनित कोहरे की तरह गायब होने लगता है। पैंतीस-चालीस सेंकेड के विज्ञापन में जितनी गोरी होती हीरोइन को दिखाया जाता है, अगर उसका चालीस फीसदी यह सब्जी बेचने वाली गोरी हो जाए, तो इसके चेहरे की लुनाई और त्वचा की चिकनाई थोड़ा और निखर उठेगी। और अगर कहीं यह एलेवेरा-फेलोवेरा का जेल लगाकर सुबह-शाम मुंह धोए, कुछ तेल-फुलेल, इत्र-वित्र लगा ले, तो इसकी कंचनी काया के आकर्षण में ही ग्राहक सौ-पचास रुपये की सब्जी ज्यादा खरीद लेंगे।
रामभूल उपाध्याय आई टॉनिक लेने की गरज से सब्जी वाली के नजदीक गए और बोले, ’इधर पेड़ की छाया में क्यों नहीं लगा लेती अपनी दुकान?’ उसने उदासीन भाव से कहा, ’जिसके घर के सामने यह पेड़ है, उस घर की औरत वहां दुकान लगाने पर झगड़ा करती है।’ रामभूल ने शब्दों में शहद घोलते हुए कहा, ’तो फिर बांस-बल्ली लगाकर पन्नी-वन्नी क्यों नहीं तान लेती?’ रामभूल की बात सुनकर चेहरे पर रंचमात्र क्रोध का भाव झलका, ’पुलिस और नगर पालिका वाले बांस-बल्ली, छानी-छप्पर उजाड़ जाते हैं। सब्जियां छितरा देते हैं, नालियों में फेंक जाते है। उन्हें इकट्ठा कर धोती हूं और बेचती हूं।’
‘धूप में बैठने से देखो तुम्हारा शरीर काला पड़ गया है। कंडे की आंच में भुना हुआ भांटा लग रही हो।’ रामभूल ने उसकी श्याम वर्णी काया को निहारते हुए कहा, ‘अगर तुम अपने शरीर का ख्याल रखो। ब्यूटी पार्लर में जाकर पेडिक्योर, मेनिक्योर, आईब्रो सेटिंग करवा लो, फिर देखो, ग्राहकों की संख्या कैसे बढ़ती है।’ यह सुनकर उसने अपने अस्त व्यस्त कपड़ों को संभाला और गुर्राती हुई बोली-‘चल हट नासपीटे! तुम जैसों को रोज धनिये के साथ फ्री बेच लेती हूं। बड़ा आया सहानुभूति जाने वाला।’ यह सुनते ही रामभूल ने चुपचाप खिसक लेने में ही भलाई समझी।
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Saturday, June 27, 2026

रंगभेद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के ही समानरंगभेद  और मानवाधिकार के समर्थन में काम करने वाले डेसमंड एमपिलो टूटू को उनके कार्यों के लिए नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था।  वह दक्षिण अफ्रीका के एक एंग्लिकन बिशप और धर्मशास्त्री थे। टुटू का जन्म दक्षिण अफ्रीका के क्लर्कडॉर्प में एक गरीब परिवार में हुआ था, जहाँ उनकी मिश्रित खोसा और मोत्स्वाना वंश की वंशावली थी। 

वयस्क होने पर उन्होंने शिक्षक के रूप में प्रशिक्षण लिया और नोमालिजो लेआ शेनक्सेन से विवाह किया जिनसे उनके कई बच्चे हुए। 1962 में वे किंग्स कॉलेज लंदन में धर्मशास्त्र का अध्ययन करने के लिए यूनाइटेड किंगडम चले गए । 1966 में वे दक्षिणी अफ्रीका लौट आए। वह अपने पिता के काफी करीब थे, लेकिन उनके शराब पीने और अपनी पत्नी से मारपीट करने की आदत से वह अपने पिता से नाराज भी रहते थे। 

उन दिनों अफ्रीका में रंगभेद चरम पर था। गोरे लोग अश्वेतों के साथ बुरा व्यवहार करते थे। एक बार की बात है। वह बचपन में अपने पिता के साथ कहीं जा रहे थे।  तभी उन्होंने देखा कि सामने से एक श्वेत पादरी ट्रेवर हडलस्टन चले आ रहे हैं। डेसमंड ने देखा कि उनके पिता को देखते ही पादरी ने अपनी टोपी उतारी और अभिवादन किया। यह एक तरह से दक्षिण अफ्रीका में आश्चर्य की बात है। 

डेसमंड ने अपने पिता से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति सभी मनुष्य को समान समझता है। रंग के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करता है। बस,यहीं से डेसमंड में रंगभेद की भावना के खिालाफ लड़ने की प्रेरणा मिली। उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़कर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति को खत्म कराया।

क्षणिक आवेश में होने वाले अपराध पर कैसे लगे अंकुश?

अशोक मिश्र

नेहा कुमारी का अपराध केवल इतना था कि उसने अपने पति अमित को ड्यूटी पर जाने को कहा था। अमित उस दिन ड्यूटी पर नहीं जाना चाहता था। बस, इसी बात पर अमित ने छह महीने की गर्भवती अपनी पत्नी की हत्या कर दी। पहले उसने चुन्नी से नेहा का गला दबाया। उसके बाद पानी से भरी बाल्टी में उसका मुंह दबाकर मार डाला। बिहार के मुजफ्फरनगर की रहने वाली नेहा एक महीने पहले अपने पति के साथ फरीदाबाद के पल्ला थाना क्षेत्र स्थित पंचशील कालोनी में रहने आई थी। 

पत्नी की हत्या का आरोपी अमित फरार है। आज नहीं तो कल अमित गिरफ्तार किया जाएगा। उस पर अपनी पत्नी और गर्भस्थ शिशु की हत्या का मुकदमा चलेगा। भले ही हत्या का आरोपी अमित और मारी गई नेहा बिहार के मूल निवासी रहे हों, लेकिन हरियाणा में भी इस तरह की हत्याएं होती रहती हैं। यह किसी एक प्रांत या जिले की कहानी नहीं है। लगभग पूरे देश में ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। अक्सर देखा गया है कि मानसिक दबाव, अहंकार, शराब की लत और घरेलू विवाद के चलते पुरुष अपनी पत्नी की हत्या कर बैठते हैं। 

इस तरह की घटनाओं में होता यह है कि कई बार पति का इरादा पत्नी की हत्या करने का नहीं होता है, लेकिन वह उत्तेजना में आकर हत्या कर बैठता है। वह अनचाहे ऐसी जगह पर वार कर बैठता है जिससे पत्नी की मौत हो जाती है। कई बार पति अपनी पत्नी के किरदार पर शक करते हैं और इस शक में आकर हत्या जैसा कदम उठाते हैं। कई बार तो बात इससे उलट भी होती है। पत्नी को अपने पति के चरित्र पर शक होता है या उसे प्रमाण मिल जाता है, तो अपनी पत्नी से छुटकारा पाने के लिए वह हत्या जैसा कुकृत्य कर बैठता है। 

हरियाणा में घरेलू हिंसा व्यवस्थित और दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति का हिस्सा है। शराब या दूसरे किस्म के नशे आदी लोग पत्नी के विरोध करने पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मारपीट के साथ-साथ हत्या जैसी घटनाएं भी घटित हो जाती हैं। एक आंकड़े के अनुसार, प्रदेश में लगभाग 37 प्रतिशत महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें से शायद ही कोई महिला घरेलू हिंसा रोकने के लिए कदम उठाती हो। वह इसे भाग्य का लिखा या नियति मानकर चुपचाप सहती रहती है।

 नीति आयोग की सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू हिंसा के कारण महिलाएं आत्महत्या या अचानक हुए हमलों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शिकार होती हैं। हरियाणा सरकार ने पिछले पांच-छह साल में कन्या भ्रूण हत्या रोककर यह साबित कर दिया है कि कानून से बदलाव लाया जा सकता है। अब जरूरत यह है कि स्त्री के खिलाफ किसी भी प्रकार का अपराध होने पर आरोपी को सख्त से सख्त सजा दी जाए।

Friday, June 26, 2026

फुटबाल के सितारे तुलसीदास बलराम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तुलसीदास बलराम को भारतीय फुटबॉल को स्वर्ण युग में लाने का श्रेय दिया जाता है। बलराम का जन्म 4 अक्टूबर, 1936 को ब्रिटिश-अधिकृत हैदराबाद के सिकंदराबाद के पास अम्मुगुडा गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। गरीबी के बावजूद बचपन से ही उन्हें फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था। तमाम परेशानियों के बावजूद बलराम ने लल्लागुडा वर्कशॉप ग्राउंड में फुटबॉल खेलना शुरू किया। 

उन्होंने शुरुआती दौर से ही हैदराबादी शैली के वन-टच फुटबॉल का अभ्यास किया। सिकंदराबाद लीग में सिविलियंस और आर्मी इलेवन के बीच हुए एक मैच के दौरान उन्हें पहचान मिली। उस समय उनके परिवार की हालत यह थी कि फुटबॉल मैच खेलने के लिए उनके पास जूते नहीं थे। बिना जूतों के फुटबॉल मैच खेलना लगभग असंभव था। आखिरकार बहुत सोच-समझकर वह सिकंदराबाद के ही एक जूते बनाने वाले के पास पहुंचे। 

उन्होंने जूते बनाने वाले को अपनी सारी स्थिति बताई। उससे कहा कि यदि उसे जूते नहीं मिले, तो वह टूर्नामेंट नहीं खेल पाएगा। उससे कोई पुराना जूता देने की विनती की। जूता बनाने वाले ने कहा कि उसके पास कोई पुराना जूता नहीं है। अगर वह कहीं से पुलिस का पुराना जूता ले आए, तो वह उसे पहनने लायक बना देगा। काफी प्रयास के बाद उसकी मुलाकात एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी से हुई। 

उसकी व्यथा-कथा सुनकर पुलिसकर्मी ने अपना पुराना जूता दिया। मरम्मत करने वाले ने दो रुपये में जूता ठीक कर दिया। उस टूर्नामेंट में बलराम ने गोल पर गोल मारकर सबको हैरान कर दिया। बाद में प्रसिद्ध कोच सैयद अब्दुल के मार्गदर्शन में वह 1956 में संतोष ट्राफी और मेलबर्न ओलंपिक तक पहुंचा। बलराम ने भारत के लिए कुल 33 मैच खेले और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 12 गोल किए।  बलराम का निधन 16 फरवरी 2023 को 86 वर्ष की आयु में हुआ।

खुले में बचा-खुचा खाना फेंकने वालों पर लगे भारी भरकम जुर्माना

अशोक मिश्र

घर के बाहर अगर किसी महिला का बच्चा खेल रहा है, तो उसे हर समय यही डर बना रहता है कि उसका बच्चा सुरक्षित है या नहीं। हरियाणा के किसी भी जिले में सुबह सड़कों पर टहलना, बच्चों का पार्कों में खेलना, अकेले कहीं आना जाना दुश्वार हो रहा है। हर मां को यही डर सताता रहता है कि घर से बाहर निकले उसके बच्चों को कहीं कुत्ता काट न ले। फरीदाबाद हो या गुरुग्राम, सोनीपत हो या कुरुक्षेत्र, सब जगह एक जैसे हालात हैं। पिछले पांच साल में कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। 

कुत्ते के काटने पर जब घायल व्यक्ति सरकारी अस्पताल पहुंचता है, तो उसे एक लंबी लाइन मिलती है। निजी अस्पतालों में एंटी रैबीज का इंजेक्शन पांच हजार से कम में नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में गरीब आदमी के लिए पांच हजार रुपये खर्च कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। फिर भी किसी तरह गरीब आदमी इंजेक्शन के लिए पैसे का जुगाड़ करता है। पशुपालन विभाग द्वारा 2019 से 2023 तक किए गए एक अध्ययन के अनुसार, राज्य में आवारा कुत्तों की संख्या लगभग 1.8 मिलियन होने का अनुमान है। 

एक अनुमान के मुताबिक, पूरे हरियाणा में प्रतिवर्ष 1.43 लाख से अधिक कुत्ते के काटने के मामले होते हैं, लेकिन इनमें से सरकारी रजिस्टर पर काफी कम ही दर्ज हो पाते हैं। इसलिए वास्तविक आंकड़ों का पता ही नहीं चल पाता है। बहुत सारे लोग कुत्ते के काटने पर झाड़-फूंक में लग जाते हैं या फिर निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं।  प्रदेश में नगर निगम की एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल योजना केवल कागजों पर ही चल रही है। सन 2023 में फरीदाबाद नगर निगम ने दावा किया था कि जिले में 15 हजार कुत्तों की नसबंदी की गई थी। 

अभी हाल में ही दावा किया गया कि इस वर्ष लगभग सात हजार कुत्तों की नसबंदी की गई है। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि हर गली में हर महीने कई पिल्ले पैदा हो रहे हैं। कुत्तों का सबसे बड़ा अड्डा कूड़े का ढेर होता है। लोग, होटल या ढाबा चलाने वाले लोग अपने घर और रेस्टोरेंट का बचा हुआ कचरा, सड़ी रोटियां, मांस के टुकड़े आदि कूड़े के ढेर पर फेंक देते हैं। 

नगर निगम नियमित रूप से कूड़ा कचरा नहीं उठाता है जिसकी वजह  से कूड़े के ढेर के आसपास कुत्तों के झुंड जमा हो जाते हैं। उधर से गुजरने वाले लोगों पर कुत्तों का झुंड हमला करता है। बहुत सारे लोग डाग लवर होने का दम भरते हैं। घर से ही बचा खुचा खाना सड़क पर डाल देते हैं। जब इनके द्वारा पाले गए कुत्ते किसी को काट लेते है, तो यही डाग लवर यह कहकर अपनी जान छुड़ा लेते हैं कि इन लोगों ने कुत्ते को उकसाया होगा। उसको पत्थर मारा होगा। ऐसे लोगों से यही अपील की जा सकती है कि यदि कुत्तों से प्यार है तो सड़क पर नहीं, तय जगह खिलाओ। खुले में खाना फेंकने वालों पर भारी भरकम जुर्माना लगना चाहिए। 

Wednesday, June 24, 2026

एक दीपक से जले सैकड़ों दीपक

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया में जितने भी बदलाव हुए हैं, उनकी शुरुआत एक छोटे से कदम से ही हुई है। किसी भी देश, समाज में जब भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है, तो उसके पीछे किसी व्यक्ति का छोटा सा प्रयास ही रहा होगा। इसके बाद उस व्यक्ति के साथ लोग जुड़ते गए होंगे और समाज, देश में बहुत भारी परिवर्तन आया होगा। यह बात ध्रुव सत्य है। बदलाव की प्रक्रिया किसी एक से शुरू होती है और वह पूरे समाज को प्रभावित करती है। 

इस संबध में एक बहुत ही रोचक प्रसंग है। किसी गांव में एक बुजुर्ग रहता था। वह घोर आशावादी था। निराशा के क्षणों में भी वह आशा का दामन नहीं छोड़ता था। वह शाम होने पर अपने घर के दरवाजे पर रोज एक दीपक जलाता था। लोग उसको पागल समझते थे। बुजुर्ग दीपक जलाने के बाद उसे देखता रहता था, जब तक दीपक बुझ नहीं जाता था। 

एक दिन एक युवक से रहा नहीं गया और वह बुजुर्ग के पास पहुंचकर उससे बोला, बाबा! केवल एक दीपक जलाने से क्या होगा? पूरे गांव में तो रोशनी नहीं हो जाएगी। बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा कि अंधेरा खत्म करना मेरा काम नहीं है। दीपक जलाने से कम से कम कहीं तो उजाला है। 

एक दिन गांव में बहुत तेज आंधी आई। लोगों ने देखा कि बुजुर्ग का दीपक तेज आंधी में भी जल रहा है। युवक फिर बुजुर्ग के पास गया और पूछा, बाबा! आपका दीपक कैसे जल रहा है? बुजुर्ग ने कहा कि मैंने अपने दोनों हाथों से दीपक को बुझने से बचाया था।  युवक ने कहा कि बाबा, इस एक दीपक से पूरी दुनिया का अंधेरा दूर नहीं हो सकता। 

बुजुर्ग ने कहा कि मेरे मन में तो अंधेरा नहीं है। इससे प्रभावित होकर युवक ने भी दीपक जलाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते कुछ दिनों में सभी गांव वालों ने दीपक जलाना शुरू कर दिया। कल तक जो गांव अंधेरे में डूबा रहता था, आज वह दीपकों की रोशनी से जगमगा रहा था।

किसी हादसे का इंतजार न करें बचाव की कर लें पूरी तैयारियां


 अशोक मिश्र

गरमी के दिनों में आगजनी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। मार्च से लेकर जून तक देश में कई बड़े हादसे हो चुके हैं। सोमवार को ही लखनऊ के अलीगंज इलाके में स्थित कोचिंग संस्थान में लगी आग से 15 लोगों की जान चली गई। इनमें सबसे ज्यादा छात्र-छात्राएं थीं। डिजिटल लॉक डोर नहीं खुलने और चारों ओर धुआं भर जाने की वजह से इन स्टूडेंट का दम घुट गया और मौत हो गई। 

कुछ स्टूडेंट्स ने जान बचाने के लिए बाहर छलांग लगा दी। बुरी तरह घायल होकर अस्पताल में भर्ती हैं। इसी तरह 3 जून को सुबह दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में अवैध रूप से संचालित हो रहे फ्लोरिश होटल एवं गेस्ट हाउस में लगी आग में 21 लोगों की मौत हो गई। इनमें से ज्यादातर विदेशी नागरिक थे। गुरुग्राम के ही आठ लोगों की मौत हुई थी जो एक ही परिवार के थे। मई महीने में दिल्ली के विवेक विहार में कमरे में लगे एसी का कंप्रेशर फटने से लगी आग में नौ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। 

पिछले साल जुलाई 2025 में फरीदाबाद के सेक्टर-16 स्थित एक निजी कोचिंग सेंटर  में आग लगी थी। कोचिंग सेंटर में लगी आग का कारण शार्ट सर्किट बताया गया था। संतोष की बात यह है कि समय रहते आग बुझा ली गई और जनहानि नहीं हुई। मई 2025 में करनाल जिले के एक कोचिंग सेंटर में भी आग लगने की घटना हुई थी, लेकिन समय रहते आग पर काबू पा लिया गया था। कोचिंग सेंटर में जब आग लगी थी, तब पांच सौ स्टूडेंट वहां मौजूद थे। हरियाणा के प्रत्येक जिले में सैकड़ों कोचिंग संस्थान चलाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ द ज्ञानम, आईसीएस कोचिंग सेंटर, करियर पॉवर, राइस एकेडमी जैसे चर्चित संस्थान हैं। 

जिलों में वैध-अवैध रूप से संचालित होने वाले कोचिंग संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए हरियाणा सरकार ने 'हरियाणा रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन आॅफ प्राइवेट कोचिंग इंस्टिट्यूट्स बिल' लागू किया है। संस्थानों के लिए अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र और उचित वेंटिलेशन वाले बुनियादी ढांचे का होना अनिवार्य है। संस्थानों में फर्स्ट-आइड किट और आपातकालीन चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। परिसरों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाना और सुरक्षा गार्ड तैनात करना शामिल है। 

छात्रों की शिकायतों को सुनने और समाधान करने के लिए एक आंतरिक शिकायत निवारण समिति का गठन की बात भी कही गई। पूरे राज्य में हजारों संख्या में संचालित वैध-अवैध कोचिंग संस्थान नियमों का कितना पालन करते हैं, यह जांच का विषय है। कई जिलों में तो कोचिंग संस्थान ऐसी जगहों पर संचालित हो रहे हैं, जब पर आपदा आने पर फायर ब्रिगेड या पुलिस की गाड़ियों का पहुंच पाना असंभव है। कोचिंग संस्थानों में आपदा के समय निकलने के लिए दूसरा रास्ता भी नहीं है। ऐसे संस्थानों में कोई भी हादसा हो सकता है।

Tuesday, June 23, 2026

संन्यासी मार्टिन लूथर ने दिया अहिंसा का संदेश

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर किसी ने कोई पाप किया है, उसके पापों के परिणाम से छुटकारा पोप या चर्च नहीं दे सकते हैं। दुनिया में अगर किसी के पापों के लिए कोई माफी या सजा दे सकता है, तो वह ईसा ही पाप मुक्ति दे हैं। जर्मन संन्यासी, पादरी और धर्म प्रचारक मार्टिन लूथर ने खुलेआम पोप की आलोचना करते हुए यह बात कही थी। संन्यासी मार्टिन लूथर का जन्म  1483 को जर्मनी में हुआ था। 

उनके पिता हैंस लूथर एक खदान में मजदूर थे। हैंस लूथर के आठ बच्चे थे जिसमें मार्टिन दूसरे थे। उन्होंने चर्च के पादरियों के अविवाहित रहने का भी विरोध किया। और सन 1524 ई. में उन्होंने कैथरिन बोरा से विवाह किया। तब तक रोम सन 1520 में लूथर का कैथोलिक चर्च से बहिष्कार की घोषणा कर चुका था। इस बहिष्कार के बाद ही वह एक नए संप्रदाय का नेतृत्व करने लगे थे। 

इससे जर्मनी के लोग उनसे काफी नाराज रहते थे। वह जहां भी जाते उनका विरोध किया जाता था। एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। उनकी धर्म की नई व्याख्या से नाराज लोगों ने उन पर और उनके शिष्यों का विरोध किया। इस दौरान उन पर पत्थर भी फेंके गए। वह लोग जहां भी जाते थे, लोग उनका विरोध करने के लिए आ खड़े होते थे। 

इससे परेशान एक शिष्य ने लूथर से कहा कि इन लोगों को इनकी ही भाषा में जवाब देना चाहिए। संत लूथर ने कहा कि यदि हम भी उनके जैसा ही व्यवहार करने लगे, तो फिर उनमें और हम में क्या फर्क रह जाएगा। वे हमसे नाराज हैं। हम अपने प्रेम, सद्भाव और सहिष्णुता से ही उनके क्रोध को कम या समाप्त कर सकते हैं। यह सुनकर शिष्यों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने हिंसा न करने का संकल्प लिया।

जल भंडार नहीं बचाया तो भविष्य में झेलना पड़ेगा गंभीर जल संकट

अशोक मिश्र

राष्ट्रीय भूजल सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े बहुत डराने वाले हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की हालत आंकड़ों के मुताबिक काफी खराब हो चुकी है। देश में भूजल संकट के सबसे बड़े हॉटस्पॉट यही तीनों राज्य हैं। अगर हालात पर बहुत जल्दी काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले वर्षों में इन तीनों राज्यों की जनता पानी के लिए त्राहि-त्राहि करेगी और सरकार कुछ नहीं कर पाएगी। हरियाणा में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। प्रदेश में हर साल 14 अरब घन मीटर पानी की कमी हो रही है। 

राज्य साल दर साल सूखता जा रहा है। राज्य की औसत भूजल दोहन दर 135.96 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। कुरुक्षेत्र जैसे जिलों में भूजल दोहन की दर रिकॉर्ड 228 प्रतिशत तक पहुंच गई है। शहर में भूजल की उपलब्धता काफी चिंताजनक है। शहरों में पानी की कुल मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। गर्मी के दिनों हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि लोगों की पानी की जरूरतों को पूरा करना स्थानीय निकायों के लिए काफी मुश्किल हो जाता है। लोगों को पीने का पानी भी टैंकरों से खरीदना पड़ता है। हरियाणा में शहर ही नहीं, 7,287 गांवों में से 3,041 गांव जल संकट से जूझ रहे हैं।

राज्य के कुल 141 ब्लॉकों में से 91 ब्लॉक अत्यधिक शोषित श्रेणी में आ गए हैं। 14 जिलों में पानी का स्तर 30 मीटर से भी ज्यादा नीचे गिर चुका है। प्रदेश की वार्षिक जल मांग लगभग 34.96 लाख करोड़ लीटर है, जबकि उपलब्ध जल भंडार सिर्फ 20.93 लाख करोड़ लीटर ही है। विशेषज्ञों का मनाना है कि हरियाणा में गंभीर जल संकट के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार खेतों में लगे ट्यूबवेल हैं। किसान इन कृषि ट्यूबवेलों का अंधाधुंध उपयोग करके बहुत सारा पानी बरबाद कर देते हैं। खेतों में जरूरत से कहीं ज्यादा पानी भर देते हैं जिसकी वजह से गर्मी के मौसम में बहुत सारा पानी वाष्पित हो जाता है। 

हरियाणा में वर्षा जल का संचयन भी कम हो पाता है। वैसे बरसात भी अन्य राज्यों की अपेक्षा कम होती है जिसकी वजह से भूजल रिचार्ज दर भी काफी कम है। राज्य में तेज होता शहरीकरण और अत्यधिक जनसंख्या का दबाव पानी के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। राज्य के जिलों में स्थापित होने वाली औद्योगिक इकाइयों में भी पानी की भारी खपत होती है जिसकी वजह से भूजल स्तर काफी गिरता जा रहा है। 

गंभीर पानी संकट से बचने का एक ही उपाय है कि प्रदेश के किसान, उद्योगपति और नागरिक प्रदेश सरकार की नीतियों पर अमल करें। पानी का उपयोग करें, लेकिन उसे बरबाद होने से हर हालत में बचाएं। जहां तक संभव हो, बरसात के पानी का संरक्षण करें। इसके लिए जरूरी है कि सौ वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल में बने मकानों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य रूप से लगाएं। यदि वर्षा जल को बचाया नहीं गया, तो आने वाले दिनों भीषण जलसंकट का सामना करना पड़ सकता है।

Monday, June 22, 2026

मछली ने भुगता जिद करने का परिणाम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जिद हमेशा नुकसानदायक होती है। यदि कोई किसी काम से होने वाले नुकसान के बारे में बताए, तो उसकी बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि बताने वाले व्यक्ति की बात सही लगे, तो उस पर अमल करना चाहिए। ऐसे मामले में जिद नहीं करनी चाहिए। जिद करने से हमेशा नुकसान ही होता है। 

हठधर्मिता हर मामले में काम नहीं आती है। किसी गांव के तालाब में तीन मछलियां रहती थीं। इन तीनों मछलियों का जन्म भी इसी तालाब में हुआ था। एक ही तालाब में रहने की वजह से तीनों में काफी गहरी दोस्ती थी। इनमें से एक मछली काफी तेज तर्रार और बुद्धिमान थी। 

वह अपनी सहेलियों को समय-समय पर चेताती रहती थी ताकि वे किसी मुसीबत में न फंस जाएं। दूसरी मछली बुद्धिमान मछली से कम बुद्धि वाली थी। लेकिन उसे मूर्ख नहीं कहा जा सकता था। वह पहली मछली की बात मानती थी, लेकिन बात मानने से पहले वह अच्छी तरह से विचार कर लेती थी। उसे बुद्धिमान मछली की बातें अच्छी और सच्ची लगती थीं। 

तीसरी मछली काफी जिद्दी थी। वह अपनी ही धुन में लगी रहती थी। कई बार वह अपनी जिद की वजह से मुसीबत में फंसते-फंसते बची थी। लेकिन हर बार बुद्धिमान मछली ने उसे किसी न किसी तरह से बचाया था। इसके बावजूद उसकी आदत नहीं बदली थी। एक दिन बुद्धिमान मछली ने देखा कि तालाब के किनारे मछुआरा आया हुआ है। 

बुद्धिमान मछली ने अपनी दोनों सहेलियों को सचेत किया और तालाब के कोने में जाने से मनाकर दिया। जिद्दी मछली ने उसकी बात नहीं सुनी। वह जैसे ही तालाब में गई मछुआरे के फैलाए जाल में फंस गई। अब जिद्दी मछली पछताने लगी, लेकिन अब क्या किया जा सकता था। जिद्दी मछली ने लाख प्रयास किया, लेकिन जाल से बाहर न आ सकी।

फुटपाथ पर चलने का अधिकार लोगों को दिलाएगा कौन?

अशोक मिश्र

सड़कों पर पैदल चलने वालों का सुरक्षित घर पहुंचना भी करिश्मा है। सड़क हो, मेट्रो स्टेशन हो या रेलवे स्टेशन इनके अगल-बगल से गुजरने वाली सड़कों से फुटपाथ अक्सर गायब होता है। ऐसा नहीं है कि फुटपाथ बनाए नहीं जाते हैं। बनाए जाते हैं, लेकिन इन पर रेहड़ी-पटरी वालों का कब्जा होता है। दुकानदार अपनी दुकान के सामने सामान सजाकर बैठ जाते हैं जिससे पैदल चलने वालों के लिए जगही नहीं बचती है। पैदल चलने वालों को मजबूर होकर उस सड़क पर चलना पड़ता है जिस पर तेज रफ्तार गाड़ियां आ जा रही होती हैं। 

ऐसे में कई बार हादसे भी होते हैं। इन हादसों में कुछ लोग घायल होते हैं, तो कुछ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। कई जगहों पर फुटपाथ टूटे-फूटे होते हैं, चलने लायक ही नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में पैदल चलने वाला कहां जाए। उसके पास एक ही विकल्प बचता है, सड़क पर चले। इन्हीं सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 19 जून 2026 को सुप्रीमकोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि  पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। 

अदालत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित और बाधा रहित फुटपाथ पर चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसे मोटर वाहनों की सुविधा से पहले संरक्षण मिलना चाहिए। सवाल उठता है कि पैदल चलने वालों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा। यह जिम्मेदारी राज्य सरकार के अधीन आने वाले शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और पंचायतों की है। इन संस्थाओं को फुटपाथों का निर्माण, रखरखाव और अतिक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, क्योंकि पैदल चलना सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन का अभिन्न हिस्सा है। इस अधिकार की रक्षा करना सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी होगी। यदि किसी नागरिक को सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध नहीं कराया जाता या उसके इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संविधान और अन्य कानूनों के तहत अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। 

वैसे तो राज्य सरकार के अधीन काम करने वाली संस्थाएं सुप्रीमकोर्ट के फैसले से पहले भी फुटपाथों पर हुए अतिक्रमण को हटाने का काम करती रही हैं। स्थानीय निकायों द्वारा अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाए जाते रहे हैं, लेकिन फुटपाथों पर से रेहड़ी-पटरी को हटाया गया, फुटपाथ पर रखे दुकानदारों के सामान को जब्त किया गया,  कुछ ही समय बाद हालात पहले जैसे हो जाते हैं। 

इधर अतिक्रमण हटाने वाले गए, उधर फिर फुटपाथ पर रेहड़ी पटरी वालों ने कब्जा कर लिया। जैसे ही अतिक्रमण विरोधी अभियान शुरू होता है, खबर फैलते ही सारे कब्जाधारी सतर्क हो जाते हैं। अभियान चलाने वालों को कब्जे दिखाई ही नहीं देते हैं, लेकिन उनके जाते ही फिर फुटपाथ पर दुकानें सज जाती हैं।

Sunday, June 21, 2026

विन्या! तेरे दोस्त में अतिथि का रूप देखती हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गांधीवादी नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनोबा भावे का वास्तविक नाम विनायक नरहरि भावे था। वह चित्तपावन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। बचपन से ही विनोबा भावे को गणित और रसायन विज्ञान में रुचि थी। उनकी सूझबूझ भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली थी। विनोबा भावे के दो भाई और थे। उन्हें विनोबा नाम महात्मा गांधी ने दिया था। 

बाद में यही नाम प्रचलित हो गया और विनायक नरहरि को लोग कालांतर में भूल गए। उनकी मां रुक्मिणी बाई विदुषी महिला थीं। लेकिन वह भक्तिभाव में हमेशा डूबी रहती थीं। इसका प्रभाव उनके तीनों बेटों पर पड़ा था। बाद में विनोबा भावे ने संन्यास ग्रहण किया और महात्मा गांधी ने उन्हें संत विनोबा कहकर संबोधित किया। विनोबा के बचपन की एक घटना है। 

बताया जाता है कि बचपन में विनोबा का एक साथी उनके साथ ही रहता था। वह उनके साथ ही पढ़ने जाता था। ऐसा कहा जाता है। उन दिनों रात में कुछ खाना बच जाया करता था। उनकी मां बासी भोजन को विनोबा को खाने के लिए दे दिया करती थीं। उनके दोस्त को हमेशा ताजा भोजन दिया करती थीं। यह देखकर एक दिन विनोबा ने अपनी मां से कहा कि मां, तू मेरे साथ भेदभाव करती है। मुझे रोज बासी खाना नाश्ते में देती है और मेरे दोस्त को ताजा व गरम खाना। 

उनकी मां दुखी हो गईं। उन्होंने कहा कि विन्या (मां का दिया नाम) मैं भी इंसान हूं और मुझसे भी गलती हो सकती है। तू मेरा बेटा है और तेरे दोस्त में मैं अतिथि वाला भाव देखती हूं। अतिथि को भला बासी भोजन कैसे दिया जा सकता है। वैसे विनोबा ने यह बात मजाक में कही थी, लेकिन मां को यह बात चुभ गई थी। विनोबा ने जीवन भर अपनी मां की सीख पर अमल किया।

हरियाणा में वर्षा जल संचयन के लिए सबको करनी होगी कोशिश

अशोक मिश्र

उत्तर भारत में मानसून आने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। वैसे भी हरियाणा के कुछ जिलों में छिटपुट बरसात हो भी रही है। प्रदेश सरकार ने राज्य में जलभराव रोकने के लिए नाले, नालियों और सीवरेज सिस्टम आदि की सफाई करने के आदेश बहुत पहले ही दे दिए थे। सभी जिलों में इस पर काम चल भी रहा है। कुछ जिलों में काम पूरा हो गया है, तो कुछ जिलों में अभी काम जारी है। 

वहीं, बरसात के दिनों में वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए भी कई योजनाओं पर काम हो रहा है। राज्य सरकार ने सौ वर्ग मीटर या इससे अधिक छत वाले वाले प्लाट पर बने मकान के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य कर रखा है। इसके बाद भी ज्यादातर ऐसे मकानों में या तो रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगे ही नहीं है या फिर दिखावे के लिए बीस-पच्चीस मीटर गहरा पाइप लगाकर खानापूर्ति कर ली गई है। इससे वर्षा जल ऊपरी सतह में ही रह जा रहा है और भूगर्भ जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। 

हरियाणा जैसे प्रदेश की आज हालत यह है कि राज्य में हर साल 14 अरब घन मीटर पानी की कमी हो रही है। राज्य साल दर साल सूखता जा रहा है। शहर में भूजल की उपलब्धता कम होती जा रही है और पानी की कुल मांग बढ़ती जा रही है, जिससे लोगों की पानी की जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। राज्य के 7,287 गांवों में से 3,041 गांव जल संकट से जूझ रहे हैं। यदि वर्षा जल को नदियों में मिलने से बचाया नहीं गया, तो आने वाले दिनों हालात और भी बदतर होने की आशंका है। 

हरियाणा में जल संकट की स्थिति से निपटने के लिए व्यावहारिक समाधान खोजने होंगे। ऐसे में वर्षा जल संचयन सबसे कारगर उपाय है। राज्य सरकार का दावा है कि जल संचयन के मामले में हरियाणा दूसरे राज्यों के मुकाबले में बेहतर काम कर रहा है।  जल प्रबंधन के शानदार प्रदर्शन के लिए हरियाणा को राष्ट्रीय स्तर पर बेस्ट स्टेट इन वाटर मैनेजमेंट का पुरस्कार भी मिल चुका है। तो फिर हरियाणा में पानी की इतनी भारी कमी क्यों है? सरकारी आंकड़ा कहता है कि राज्य में 68,000 से अधिक जल संरक्षण ढांचे बनाए जा चुके हैं और लगभग 2,215 से अधिक तालाबों का जीर्णोद्धार किया जा चुका है। 

कुछ दिनों पहले सिंचाई एवं जल संसाधन तथा महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रुति चौधरी ने कहा था कि पहली बार हरियाणा में लगभग 5,700 करोड़ रुपये की लागत से विश्व बैंक समर्थित एकीकृत जल प्रबंधन परियोजना (इंटीग्रेटेड  वाटर प्लान) लागू की जा रही है, जो पूरे प्रदेश के लिए गेम चेंजर साबित होगी। इंटीग्रेटेड वाटर प्लान से यह उम्मीद तो पैदा होती है कि निकट भविष्य में प्रदेश को जल समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा, लेकिन यह भी सही है कि अभी हालात अच्छे नहीं हैं। इसके लिए शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में सबको मिलकर वर्षा जल संचयन में हाथ बंटाना होगा। तभी पानी की किल्लत को दूर किया जा सकता है।

Saturday, June 20, 2026

कुछ तुम्हारे जैसी, कुछ तुमसे अच्छी


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इंसान अगर संतोषी हो, तो उसे किसी भी अवस्था में नींद आ सकती है। वह कहीं भी सो सकता है,लेकिन यदि संतोष नहीं है, तो उसे राजसी पलंग पर भी नींद नहीं आएगी। एक बार की बात है। एक साधु घूमते-घूमते किसी शहर में पहुंच गया। शहर में प्रवेश करते समय रात हो गई थी। सर्दी के दिन थे। लोग अपने घर का दरवाजा बंद करके सोने चले गए थे। अब रात में साधु किसके घर का दरवाजा खटखटाता। 

उसके पास ओढ़ने का कपड़ा भी नहीं था। उसने आसपास नजर दौड़ाई, तो भड़भूजे की दुकान नजर आई। भड़भूजे की भट्ठी थोड़ी गर्म थी। सो, साधु ने सोचा कि इसी भट्ठी में किसी तरह रात गुजार लूं। वह उसी में सो गया।  संयोग से पास में ही राजा का महल भी था। 

सुबह उठते ही राजा ने अपने नौकरों से पूछा, रात कैसे बीती? तब तक साधु भी जाग गया था। उसने राजा का प्रश्न सुना, तो बोला, कुछ तुम्हारे जैसी, कुछ तुम्हारे से अच्छी। राजा ने फिर एक बार यही प्रश्न दोहराया। साधु ने फिर वही उत्तर दिया। राजा चकित रह गया कि यह कौन है, जो उसके सवालों का उत्तर दे रहा है। राजा ने कहा कि सवालों का जवाब देने वाले को यहां ले आओ। 

सैनिक साधु को खोजते हुए जब भट्ठी के पास पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि आपको राजा ने बुलाया है। साधु  के शरीर में राख और कालिख लगी हुई थी। राजा ने पूछा कि मेरे जैसी और मेरे से बेहतर रात कैसे बीती? साधु ने कहा कि आप राज महल में नर्म बिस्तर पर सोए। मैं भट्ठी की गर्म राख पर सोया। हम दोनों जब सो गए, तो एक समान हो गए। सुबह उठते ही आपको राज्य की चिंता सताने लगी, जबकि मैं जब सुबह उठा, तो चिंता मुक्त था। सो मेरी रात आपसे अच्छी बीती। राजा साधु की बात सुनकर संतुष्ट हो गया।

लोगों की लापरवाही के चलते बढ़ रहीं आग लगने की घटनाएं


अशोक मिश्र

फरीदाबाद के मेवला महाराज औद्योगिक क्षेत्र में गुरुवार को आग लगने से जूता फैक्टरी का गोदाम जलकर खाक हो गया। हालांकि राहत की बात यह है कि आग लगने से किसी की मौत नहीं हुई है। गर्मी के दिनों में हरियाणा में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। घर, फैक्टरी, होटल, दुकान, खेत में पड़ी फसल आदि में थोड़ी सी लापरवाही के चलते आग विकराल रूप धारण कर लेती है। गरमी के दिनों में आग लगने का कारण किसानों का गेहूं के अवशेष को खेत में ही जला देना भी है। 

किसान गेहूं के अवशेष का दूसरा उपयोग करने की जगह जब जला देते हैं, तो हवा के माध्यम से उड़ने वाली चिन्गारी दूसरे खेतों में रखी फसल, फसल के अवशेष आदि को भारी नुकसान पहुंचाती है। पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2026 में गेहूं की कटाई के मौसम में हरियाणा में खेतों में आग लगने की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इस वर्ष मामलों की संख्या 2025 की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है। पिछले साल राज्य में 1,745 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इस साल 1,610 मामलों की यह वृद्धि मात्र एक वर्ष में लगभग 92 प्रतिशत की बढ़ोतरी  को दर्शाती है। इससे पर्यावरण प्रदूषण और पराली जलाने पर रोक लगाने संबंधी नियमों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। 

हरियाणा में 2024 में 3077, 2023 में 1887 और 2022 में 2872 कृषि अग्निकांड हुए थे। खेतों में आग लगने के मामले में अधिकारी मानते हैं कि खेतों में आग लगने की अधिकतर घटनाएं आकस्मिक थीं और शॉर्ट सर्किट के कारण हुईं। हां, कुछ मामलों में किसानों ने जानबूझकर पराली में आग लगाई, जो बाद में तेज गर्म हवाओं और शुष्क मौसम के कारण आसपास के खेतों में तेजी से फैल गई। गर्मी के मौसम में वातावरण शुष्क होने की वजह सेआग बड़ी तेजी से फैलती है। 

घर, फैक्टरी, होटल या दूसरी जगहों पर लोगों की लापरवाही के चलते आग लग जाती है। कई बार बिजली के तारों की वजह से पैदा हुई चिन्गारी सब कुछ स्वाहा कर देती है। मार्च से लेकर जून-जुलाई तक सबसे ज्यादा आगजनी की घटनाएं होती हैं। ऐसी स्थिति में अग्नि शमन एवं आपातकालीन सेवाओं का महत्व काफी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में सरकार को चाहिए कि वह दमकल विभाग को पर्याप्त कर्मचारी, आधुनिक संसाधन और मजबूत व्यवस्था उपलब्ध कराए। 

वर्तमान में प्रदेश में 89 फायर स्टेशन संचालित हैं, जो मुख्यत: शहरी क्षेत्रों तक सीमित हैं। कस्बों, उपमंडलों, ग्रामीण इलाकों और नए औद्योगिक क्षेत्रों में अग्नि सुरक्षा के संसाधन अपेक्षाकृत कम हैं। इस स्थिति से बचने के लिए सैनी सरकार ने 59 नए फायर स्टेशन खोलने का फैसला लिया था। इस योजना पर तेजी से काम चल रहा है। इससे आपात स्थितियों में रिस्पॉन्स टाइम में उल्लेखनीय कमी आएगी। योजना का सबसे बड़ा प्रभाव एनसीआर क्षेत्र में दिखेगा, जहां 20 नए फायर स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। 

Friday, June 19, 2026

मित्रता की परिभाषा समझाने वाला दोस्त

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे पास मित्र कितने है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन तमाम मित्रों में से सच्चा मित्र कौन है, इससे फर्क पड़ता है। इसीलिए कहा जाता है कि किसी से भी मित्रता करते समय उसकी सच्चाई और मित्र के प्रति प्रेम कितना है, यह देखना चाहिए। मित्र सद्गुणी हो, तभी मित्रता करनी चाहिए। सच्चा मित्र संकट के समय साथ नहीं छोड़ता है। 

एक कथा है। किसी नगर में एक बुजुर्ग व्यक्ति रहता था। उसके पुत्र को अपने मित्रों पर बहुत गर्व था। उसके कई मित्र थे। लेकिन उसके पिता का एक ही मित्र था। बेटा जब भी बात चलती, तो वह अपने मित्रों की बड़ाई करते हुए थकता नहीं था। वह अपने पिता का उपहास भी उड़ाता था कि उनके एक ही मित्र है। एक दिन पिता ने अपने बेटे से कहा कि चलो, हम दोनों अपने अपने मित्र की परीक्षा लेते हैं। बेटा तैयार हो गया। 

पिता-पुत्र दोनों बेटे के घर में रात के दो बजे पहुंचे। बेटे ने अपने दोस्त का दरवाजा खटखटाया। कई बार आवाज दी। लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई। कुछ देर बाद बेटे ने फिर दरवाजा खटखटाते हुए अपने मित्र का नाम लेकर आवाज दी। अंदर से बेटे के मित्र ने अपनी मां से कहा कि कह दो, मैं घर पर नहीं हूं। बेटा बहुत निराश हो गया। उसके बाद उसका पिता अपने दोस्त के घर ले गया। 

दरवाजा खटखटाया, तो दो मिनट बाद अंदर से आवाज आई, रुको मित्र! दरवाजा खोलता हूं। दरवाजा खुलते ही पिता-पुत्र ने देखा कि दरवाजा खोलने वाले के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी। पिता ने अपने मित्र से पूछा, यह क्या है? मित्र ने जवाब दिया कि इतनी रात को आए हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें पैसे की जरूरत है। या फिर तुम्हारी किसी से लड़ाई हो गयी है। अगर पैसे की जरूरत है, तो यह थैली ले जाओ। यदि किसी से लड़ाई हुई है, तो यह तलवार लेकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूं। यह सुनकर पुत्र की समझ में मित्रता की परिभाषा आ गई।

सड़क हादसों के सबसे बड़े कारण हैं थकान और झपकी


अशोक मिश्र

मंगलवार को पलवल में अलग-अलग सड़क हादसों में चार युवकों सहित पांच लोगों की मौत हो गई। इन हादसों का कारण वाहन को तेज रफ्तार से चलाना था। हरियाणा में ऐसे हादसे आए दिन होते रहते हैं। तेज रफ्तार वाहन चलाने वाले चालक इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं करते हैं कि वह अपने साथ-साथ सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की भी जान जोखिम में डाल रहे हैं। 

तेज रफ्तार वाहन चलाने का आनंद लेने वाले अगर ऐसा सोच लें, तो शायद प्रदेश क्या पूरे देश में होने वाले सड़क हादसों की संख्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। तेज रफ्तार से चल रहा वाहन जब किसी दूसरे वाहन से टकराता है, तो चोट दोनों को लगती है और नुकसान दोनों को होता है। जो चालक ट्रैफिक नियमों का पालन करते हुए अपने गंतव्य की ओर जा रहा था, उसकी क्या गलती थी जिसकी सजा उसे भुगतनी पड़ी। गलती तो उस वाहन चालक की थी जो ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करते हुए तेज गति से वाहन चला रहा था। हरियाणा सरकार और ट्रैफिक पुलिस विभिन्न माध्यमों से आए दिन लोगों को जागरूक करती रहती है कि वह सड़क पर चलते समय ट्रैफिक नियमों का पालन करें। 

वाहन को निर्धारित गति सीमा में ही चलाएं। सड़क पर बने संकेतकों को ध्यान में रखें, उसके अनुसार वाहन संचालित करें, लेकिन लोग ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करते हैं और अपने साथ-साथ दूसरों की जान को संकट में डालते हैं। अक्सर देखने में आता है कि लंबी दूरी तक सफर करने वाले वाहन ज्यादातर हादसे का शिकार होते हैं। लंबी दूरी के वाहन चालकों के लिए सबसे बड़ा खतरा थकान और नींद है। बस और ट्रक चालक कई बार लगातार घंटों तक वाहन चलाते रहते हैं। 

वह चाहते हैं कि थोड़ा रुक कर कहीं विश्राम कर लें, लेकिन समय पर माल या सवारियों को पहुंचाने की जिम्मेदारी उन्हें विश्राम नहीं लेने देती है। ऐसी स्थिति में पर्याप्त विश्राम नहीं मिलने पर उनकी एकाग्रता कम हो जाती है। ऐसे में चूक होने की आशंका काफी बढ़ जाती है। कई बार तो कुछ सेकंड की झपकी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन जाती है। यह देखने में आया है कि ज्यादातर हादसे रात या सुबह होते हैं। ऐसे समय को विशेष रूप से जोखिम भरा माना जाता है। यह वह समय होता है, जब शरीर स्वाभाविक रूप से विश्राम चाहता है। यदि चालक को विश्राम न मिले, तो चालक को नींद आने की आशंका काफी बढ़ जाती है। 

निजी परिवहन कंपनियों, सरकारी परिवहन संस्थाओं और वाहन मालिकों की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे अपने वाहन चालकों के कार्य के घंटों को नियंत्रित करें, उन्हें आराम करने का पर्याप्त अवसर दें। उन्हें इंसान समझें, रोबोट नहीं। केवल आर्थिक लाभ के लिए लगातार वाहन चलवाना मानव जीवन के साथ खिलवाड़ है।

Thursday, June 18, 2026

जोड़ने वाले को सिर पर बिठाना चाहिए

प्रतीकात्मक चित्र

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो समाज और देश को जोड़े रखता है, वह और कुछ न करते हुए भी आदरणीय होता है। घर, परिवार, समाज और देश जब जुड़ा रहेगा, तो उस देश की उन्नति होगी। लोग समृद्ध होंगे। व्यापार फले-फूलेगा। लोगों को मधुर वाणी और सद्कर्मों से जोड़ा जा सकता है। दुनिया में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने हमेशा देश और समाज को जोड़ने की बात की है। 

इस संबंध में एक बहुत ही रोचक कथा सुनाता हूं। किसी शहर में एक दर्जी रहता था। वह अपनी दुकान पर आते समय अपने बेटे को भी साथ ले लेता था। बेटे का स्कूल रास्ते में ही पड़ता था। पहले वह अपने बेटे को स्कूल छोड़ता और फिर दुकान पर चला आता। अपना काम करता। एक दिन उसके बेटे के स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गई तो वह अपने पिता की दुकान पर चला गया। 

उसने देखा कि उसके पिता कैंची से नाप के अनुसार कपड़े काट रहे हैं। कभी कपड़े को इधर काटते हैं, तो कभी उधर। कपड़े काटने के बाद वह कैंची को अपने पैर के नीचे दबा लेते हैं। इसके बाद वह कपड़े की सिलाई करने लगते हैं। सुई में धागा डालने के बाद कपड़े की सिलाई करते हैं। सिलाई के दौरान यदि कपड़े की कतरब्योंत करनी हो, तो सुई को अपने सिर की टोपी में खोंस लेते हैं। जब तक बेटा अपने पिता की दुकान में रहा, यही देखता रहा। 

चलते समय उसने पूछा, पिताजी! कैंची को तो आप पैर के नीचे दबा लेते हैं, लेकिन सुई को टोपी में क्यों खोंस लेते हैं। पिता ने गंभीर होकर कहा, बेटा! कैंची हमेशा काटने का काम करती है, लेकिन सुई हमेशा जोड़ती है। काटने वाले को हमेशा पैरों के नीचे दबा कर रखना चाहिए, लेकिन जो जोड़ता है, उसे सिर माथे पर बिठाना चाहिए।

समय बचाने के लिए रेलवे ट्रैक पार करना मौत को दावत देना है

अशोक मिश्र

कैथल में रेल इंजन की चपेट में आने से एक बुजुर्ग की मौत हो गई। सुबह पांच बजे वह आदमी नए रेलवे हाल्ट के नजदीक रेलवेलाइन से गुजर रहा था। जैसे ही वह व्यक्ति लाइन को पार करने लगा, इंजन की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई। ट्रेन के इंजन की चपेट में आकर अपनी जान गंवाने वाले व्यक्ति की पहचान पूंडरी निवासी साहब सिंह के रूप में हुई है। रेल लाइन पार करते समय होने वाला हादसा लोगों की लापरवाही और हड़बड़ी के कारण होता है। 

अकसर देखने में आता है कि ट्रेन के आने के समय रेलवे क्रांसिंग का फाटक बंद कर दिया जाता है। इसके बावजूद लोग अगर पैदल हैं, तो उसके नीचे से झुककर रेल पटरी को क्रास कर जाते हैं। दोपहिया वाहन को आड़ा-तिरछा करके निकालने की कोशिश की जाती है। ऐसी स्थिति में अकसर हादसे हो जाते हैं। लोग ध्यान नहीं देते हैं और जब तक रेल पटरी पार करते हैं, तब तक स्पीड से ट्रेन आ जाती है और लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। हरियाणा में रेलवे ट्रैक पार करते समय हुए हादसों के अधिकांश मामले असावधानी, शॉर्टकट अपनाने और फुटओवर ब्रिज का इस्तेमाल न करने के कारण होते हैं। 

सरकारी और फोरेंसिक आंकड़ों के अनुसार, इन हादसों में 80 प्रतिशत मौतें लापरवाही की वजह से होती हैं, जबकि  बाकी बचे 20 प्रतिशत मामले आत्महत्या के होते हैं। देखने में यह आया है कि पारिवारिक कलह, प्रेम में असफल होने या किसी दूसरी तरह के दबाव के चलते जब आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं, तो वह रेल की पटरी पर लेटकर अपनी जान गंवा देना आसान समझते हैं। 

अगर हरियाणआ के मामलों का विश्लेषण किया जाए, तो रेल की पटरी पर मरने वाले कुल लोगों में से 92-96 प्रतिशत युवा पुरुष होते हैं। इनमें भी सबसे अधिक प्रभावित आयु वर्ग 21 से 40 वर्ष के बीच है।  यह भी देखने में आया है कि 52-55 प्रतिशत ट्रैक हादसे शाम 6 बजे से लेकर सुबह 6 बजे के बीच होते हैं। इन बारह घंटों में रोशनी और दृश्यता सबसे कम होती है। इसके कारण रेल पार करते समय सामने से आ रही ट्रेन दिखाई नहीं पड़ती है और हादसा हो जाता है। इन हादसों में अधिकांश मौतों का कारण सिर पर गंभीर चोट या अंगों का कुचला जाना है।  ऐसे हादसों में सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सा कमर से नीचे का अंग होता है। 

हरियाणा में नहीं, बल्कि दूसरे प्रदेशों में लोग समय बचाने के लिए शॉर्टकट अपनाते हैं। लोग भारी सामान के साथ पैदल चलने में परेशानी होने या पैदल पार पुल तक जाने में दिक्कत या आलस के कारण अक्सर रेलवे ट्रैक पार करते हैं। कई जगहों पर रेलवे ट्रैक के आर-पार उचित पुल या सब-वे न होना भी इसका एक बड़ा कारण है। लोग निर्धारित पुल या सब-वे का उपयोग करने के बजाय एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म या कॉलोनी के दूसरी ओर जाने के लिए सीधा ट्रैक पार करना आसान समझते हैं।

Wednesday, June 17, 2026

पुरस्कार का असली विजेता कौन है?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सेवा भावना ग्रंथों या पुस्तकों से नहीं उपजती है। सेवा करने के लिए किसी विशेष अवसर की भी जरूरत नहीं होती है। जब भी मौका मिले, सेवा जरूर करनी चाहिए। प्राचीनकाल में एक संत ने बच्चों में सेवा भावना जगाने के लिए एक विद्यालय खोला। उनके विद्यालय खोलने का उद्देश्य ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण करना था, जो समाज की सेवा कर सकें। 

उन्होंने अपने विद्यालय में बच्चों को सभी विषयों की शिक्षा देने के साथ-साथ लोगों की सेवा करने की भी प्रेरणा दी। वह हर विद्यार्थी से यही उम्मीद करते थे कि वह सभी जीव जंतुओं की सेवा करेगा। विद्यालय चलते हुए काफी दिन बीत गए थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि यह देखा जाए कि हमारे शिष्यों ने अब तक कितना सीखा है। उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। वाद-विवाद का विषय था-जीवों पर दया और प्राणी मात्र की सेवा। 

प्रतियोगिता शुरू हुई। किसी ने कहा कि प्राणी मात्र की सेवा के लिए संसाधनों का होना बहुत जरूरी है। जीवों पर भी दया करने के लिए इंसान में सेवा भावना का होना बहुत जरूरी है। कुछ विद्यार्थियों ने इसके विपरीत मत व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सेवा के लिए केवल भावना होनी चाहिए, संसाधन अपने आप जुट जाते हैं। जब प्रतियोगिता के पुरस्कार का समय आया, तो संत ने एक ऐसा छात्र को विजेता घोषित किया जो उपस्थित नहीं था। 

सबने इसका विरोध किया, तब संत ने कहा कि मैंने प्रतियोगिता के समय जानबूझकर एक घायल बिल्ली को द्वार पर छोड़ दिया था। सबने उस बिल्ली को देखा और अंदर आ गए, लेकिन एक छात्र ने उस बिल्ली की सेवा की, उसके घाव पर औषधि का लेप किया। कुछ स्वस्थ होने पर वह बिल्ली को सुरक्षित जगह पर छोड़ आया। ऐसे में आप लोग बताएं पुरस्कार का विजेता कौन है? यह सुनकर सबके सिर शर्म से झुक गए।

हरियाणा में साढ़े तीन लाख लोग अकेले रहने को अभिशप्त


अशोक मिश्र

अकेलापन महसूस करना और अकेले रहना, दोनों अगल-अलग बाते हैं। कई लोग भरे पूरे परिवार में रहते हैं, हंसते-बोलते, बतियाते हैं, लेकिन मन से वह कुछ समय के लिए ही सही अपने को अकेला महसूस करते हैं। ऐसा तब होता है, जब व्यक्ति का अपने परिवार से जुड़ाव कम होता है। वह अपने परिवार के प्रति आत्मीय नहीं रह जाता है। वहीं, बहुत सारे लोग ऐसे भी होते हैं, जो किन्हीं परिस्थितियों के कारण अकेले रह जाते हैं। हरियाणा में 3.54 लाख से अधिक लोग अकेले रह रहे हैं। 

अकेले रहने वाले इन नागरिकों की पहचान के लिए सत्यापन अभियान चलाया गया है। इस अभियान के माध्यम से उनकी पात्रता और आय से संबंधित आंकड़े इकट्ठे किए जा रहे हैं। परिवार पहचान पत्र में 354215 लोगों ने अपने को अकेला दर्शाया है। इनमें से 1,90,112 लोगों की सालाना आय 1.80 लाख रुपये से कम दिखाई गई है। अब तक 1,66,240 एकल व्यक्तियों का बीपीएल श्रेणी में सफलतापूर्वक सत्यापन किया जा चुका है। बाकी बचे लाभार्थियों का सत्यापन कार्य जारी है। वैसे तो इस सत्यापन का वास्तविक उद्देश्य यही बताया गया है कि सत्यापन के माध्यम से पात्र व्यक्तियों तक सरकारी सुविधाओं को पहुंचाया जाए। 

समय समय पर सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचाया जाए, ताकि अकेले रहने वाले लोगों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। समाज में सबसे ज्यादा परेशानी का सामना अकेले रहने वाले लोग ही करते हैं। पत्नी या पति की मौत हो जाने, तलाक लेने या दूसरे कारणों से अकेले रहने वालों के सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं। पति या पत्नी की मौत हो चुकी है, अवस्था भी ढल रही है। निस्संतान हैं या संतान की शादी हो चुकी है और वह दूसरे शहर या देश में रह रहा है। 

ऐसी स्थिति में यदि अकेले रहने वाले व्यक्ति के साथ कुछ अघटित घटता है, तो उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं होता है। कई बार ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं कि अकेले रहने वाले की किन्हीं परिस्थितियों में मौत हो गई। पड़ोसियों को तब पता चला,जब उसकी लाश से बदबू उठने लगी। बुढ़ापे में अकेले रहना कितना कष्टकारक है, यह वही जान सकता है जो अकेला रहने को अभिशप्त है। बीमारी के दौरान उसकी मदद करने वाला कोई नहीं होता है। 

कई तरह की बीमारियों से जूझता व्यक्ति ऐसी अवस्था में किससे मदद मांगने जाए। लोग अकेले व्यक्ति को देखते ही मुंह फेर लेते हैं कि कहीं ऐसा न हो, मेडिकल स्टोर से दवा लाने को कह दे। या बाजार से सब्जी अथवा खाने-पीने का सामान लाने को कह दे। कई बार तो बेटा-बेटी, बहू अपने परिवार के बुजुर्ग को अकेले रहने को ही बाध्य कर देते हैं। वह यह नहीं सोचते हैं कि एक दिन वह भी बुजुर्ग होंगे और उनके बच्चों ने उन्हें घर से निकाल दिया, तो वह क्या करेंगे।

Tuesday, June 16, 2026

गधे बचे रहेंगे, तो श्रम बचा रहेगा

व्यंग्य

अशोक मिश्र

गुनाहगार उदास बैठे थे. मैंने उनसे पूछा, क्या हुआ, उस्ताद! किसी ने आपकी भैंस खोल ली है क्या? जो उदास बैठे हैं. उस्ताद ने जिराफ की तरह गर्दन उठाई और बोले, अच्छा यह बताओ? गधा तुम्हारी नजर में क्या है? मैंने अपनी छप्पन इंची छाती फुलाई और जोशीले स्वर में कहा, इस दुनिया का सबसे निकृष्टतम जीव अगर कोई है, तो वह गधा है. गधे से बड़ा गधा कोई दूसरा प्राणी हो ही नहीं सकता. मालिक ने जो बचा खुचा घास भूसा डाल दिया, तो उससे ही गधे ने संतोष कर लिया. न कोई विरोध, न कोई प्रदर्शन. अगर मालिक उसे दाना-पानी देना भूल गया, तो भी ढेंचू-ढेंचू करके आभार जता दिया. जब मालिक को काम लेना हुआ, तो लाद दिया गधे पर गधे भर का बोझ. ढोते रहो बिना कोई उज्र किए. इस संसार में गधा भी कोई प्राणी है.

आज ही प्रभात खबर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित व्यंग्य
गुनाहगार ने पहले तो आश्चर्य से मुझे देखा और फिर बोले, और क्या कहना है तुम्हें गधे के बारे में. मैंने तपाक से कहा, कहना क्या है! इंसानों में जो सबसे ज्यादा नकारा, निकम्मा, काहिल और कामचोर होता है, उसे गधा ही कहा जाता है. बेवकूफ इंसान को तो हर कोई देखते ही कह बैठता है, गधे हो क्या? अरे! यह तो पूरा गधा है. बेवकूफ आदमी को गधे की उपमा ही इसीलिए दी गई क्योंकि गधा भी पूरा बेवकूफ होता है.

काफी देर से उदास बैठे गुनाहगार के चेहरे पर अब क्रोध की लालिमा छाने लगी थी. उन्होंने तल्ख लहजे में मुझे घूरते हुए कहा कि तुम गधे की मेहनती प्रवृत्ति का अपमान कर रहे हो. जानते हो, गधा श्रम का प्रतीक है. दुनिया भर में गधा हमेशा सम्मान का पात्र रहा है. वह जीवन भर परिश्रम करता है. मालिक जिस दशा में रखता है, उसी दशा में रह लेता है, लेकिन मजाल है कि वह रत्ती भर चूं करे. यही उसकी खासियत है. श्रम की महत्ता सदियों से रही है, आगे भी रहेगी. गधे का अपमान करने का मतलब है कि श्रम का अपमान करना. श्रम की ही वजह से आज यह  खूबसूरत दुनिया वजूद में है. श्रम चाहे इंसान का हो या गधे का, सम्माननीय है.

सांस लेने के लिए गुनाहगार पल भर के लिए रुके. फिर बोले, तुम जानते हो, डायनासोर की ही तरह कुछ दशकों बाद गधे विलुप्त हो जाएंगे. यदि गधे विलुप्त हो गए, तो तुम जैसे निकृष्ट इंसानों को गधे की उपमा कैसे दी जाएगी. गधों के विलुप्त होने का मतलब है कि श्रम का विलुप्त हो जाना है. ऐसा हुआ, तो यह कोई छोटी-मोटी घटना नहीं होगी. पूरी प्रकृति में वैसा ही बदलाव आएगा जैसा डायनासोरों के विलुप्त होने पर आया था. यही सोचकर सरकार ने गधों को पालने पर लाखों रुपये देने की घोषणा की है. सोचता हूं कि गांव में जितने भी खेत हैं, उनमें एक गधा बाड़ा बनवाऊं और सौ-सवा सौ गधे पाल लूं. उन गधों की देखभाल के लिए तुम जैसा कोई गधा नौकर रख लूं. गधों को विलुप्त होने से बचाना, इंसानी फर्ज है. गधे बचे रहेंगे, तो श्रम बचा रहेगा, मालिक के प्रति वफादारी बची रहेगी. यह हंसती-खिलखलाती दुनिया बची रहेगी. वरना सब चौपट ही समझो.