Saturday, October 3, 2026

What is the rationale behind worshipping the directions?


Bodhi Vriksha

Ashok Mishra

Mahatma Buddha was always rational; he is also considered an atheist. He endorsed only those ideas that withstood the test of logic. He steered clear of hypocrisy and futile argumentation. This is precisely why the number of his followers and disciples kept growing day by day. Once, while traveling along the path to Rajagriha with his disciples, he observed a householder—fresh from a bath and still in wet clothes—bowing in reverence to all the cardinal directions. 

This practice puzzled Buddha; he wondered what the actual rationale behind worshipping these directions could be. Eventually, he asked the householder, "Sir, what is the significance of worshipping these six directions? Why should they be worshipped?" The householder was taken aback by the question, unsure of how to respond. He admitted, "I have no knowledge regarding this." Buddha remarked, "What is the benefit of worshipping without understanding the rationale?" 

The man replied, "Bhante, please explain to me why these directions should be worshipped." Buddha smiled and said, "The directions for worship are different. The East is associated with parents and the head of the household. The South represents the teacher, while the West signifies the wife and son. The North represents friends and associates. The downward direction signifies the servant, and the upward direction represents the Brahmin and the Shramana." 

The householder asked, "Why worship the servant? It is they who serve us." Buddha explained, "Worshipping servants means treating them well and behaving towards them with affection. Simply folding one's hands in return for their service is not worship; treating them with love is true worship." Bowing to the Buddha, the householder said, "Today, you have bestowed true knowledge upon me."

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दिशाओं की पूजा करने का औचित्य क्या है?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध हमेशा तर्कशील रहे। उन्हें अनीश्वरवादी भी माना जाता है। जो बात तर्क की कसौटी पर खरी उतरती थी, उसी बात को वह प्रश्रय देते थे। पाखंड और वितंडावाद से वह बहुत दूर रहते थे। यही वजह है कि उनके समर्थकों और शिष्यों की संख्या दिन रात बढ़ती जाती थी। 

एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों के साथ राजगृह के पथ पर जा रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गृहस्थ नहाने के बाद भीगे कपड़ों में ही सभी दिशाओं को प्रणाम करता जा रहा है। यह बात महात्मा बुद्ध की समझ में नहीं आई। उन्होंने सोचा कि इन दिशाओं को प्रणाम करने का आखिर औचित्य क्या है? उन्होंने आखिरकार उस गृहस्थ से पूछ ही लिया। बुद्ध ने पूछा, महाशय! इन छह दिशाओं की पूजा करने का निहितार्थ क्या है? इनकी पूजा क्यों करनी चाहिए? 

गृहस्थ उनकी बात सुनकर भौंचक्का रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि वह क्या जवाब दे। उसने कहा, मुझे इस बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। बुद्ध ने कहा कि बिना औचित्य जाने पूजा करने से क्या लाभ है? उस व्यक्ति ने कहा कि भंते! आप ही समझा दीजिए कि इन दिशाओं की पूजा क्यों करनी चाहिए। तब बुद्ध मुस्कुराए और बोले, पूजा करने की दिशाएं भिन्न हैं। माता-पिता और गृहपति के लिए पूर्व दिशा मानी गई है। आचार्य की दिशा दक्षिण, पत्नी और पुत्र की दिशा पश्चिम मानी गई है। मित्रादि के लिए उत्तर दिशा मानी जाती है। सेवक के लिए नीचे वाली दिशा और ब्राह्मण, श्रमण के लिए ऊंचाई वाली दिशा मानी गई है। 

गृहस्थ ने कहा कि सेवक की पूजा क्यों? वह तो हम लोगों की पूजा करते हैं। बुद्ध ने कहा कि सेवकों की पूजा का मतलब उनके साथ सद्व्यवहार, वात्सल्यपूर्ण आचरण करना है। उनकी सेवा के बदले हाथ जोड़ना पूजा नहीं है। उनसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना ही पूजा है। गृहस्थ ने बुद्ध को नमन करते हुए कहा कि आज मुझे सच्चा ज्ञान प्रदान किया।

पार्कों में अतिक्रमण ने बच्चों के जीवन से छीन लिया खेल

अशोक मिश्र

हरियाणा के विभिन्न जिलों में पार्कों की गिनती कम नहीं है। बच्चों के खेलने के लिए बहुत अधिक जगह है। कागजों पर हर जगह पर्याप्त पार्क हैं, पार्कों में खेलने के उपकरण हैं। हर कॉलोनी, हर सेक्टर, हर गाँव में पार्क  दर्ज हैं, पर जमीन पर उतर कर देखो, तो सच्चाई आँखों में चुभती है। कहीं पार्क की चारदीवारी के भीतर किसी ने अपना सामान रख लिया है, कहीं किसी दबंग ने पक्का कमरा बना लिया है। कहीं दुकान सज गई है। जो थोड़ी बहुत हरियाली बची थी, वहाँ अब टाइल-पत्थर की पूजा-वेदी बन गई है, अगरबत्ती की खुशबू तो है पर बच्चों की किलकारी गायब है। 

सोच कर देखिए, जिस जगह पर कभी बच्चे दौड़ते थे, आज वहाँ अतिक्रमण का ताला लगा है। जहाँ अतिक्रमण नहीं हुआ, वहाँ के हालात तो और निराशा जनक हैं। पार्क में झूले तो खड़े हैं, पर उनकी चेन जंग खा चुकी है। फिसलपट्टी टूटी हुई है, झूला हिलाओ तो पूरा ढांचा कांपता है। किसी पार्क में एक ही झूला बचा है, जिस पर बारी के लिए बच्चों में झगड़ा होता है। कई पार्क  तो ऐसे हैं जहाँ झूला लगा ही नहीं, सिर्फ नाम का घास का टुकड़ा है, जिसमें कचरा और काँटे ज्यादा हैं। खेल की जगह कम। बच्चा वहाँ जाए भी तो खेले क्या? एक उम्मीद स्कूलों से बंधती है, लेकिन उनकी भी दशा पार्कों से कम बदतर नहीं है। 

स्कूलों में भी वही सूना मंजर है। नए-नए भवन बन गए, कमरे बन गए, पर खेल का मैदान कहीं खो गया। जहाँ थोड़ा बहुत मैदान बचा भी है, वहां घंटी तो बजती है पर खेलने की नहीं। अध्यापक कहते हैं सिलेबस पूरा करना है। अभिभावक कहते हैं सबसे ज्यादा नंबर लाने हैं। बच्चा बेचारा बस्ते के बोझ में दबा, कक्षा की चारदीवारों में कैद है। वह भीतर ही भीतर घुटता है। खिड़की से बाहर मैदान को देखता रहता है। उसका मन भागना चाहता है, पर उसे बैठना पड़ता है। अध्यापक का अनुशासन उसके मन की छटपटाहट पर भारी पड़ता है। गाँवों और मोहल्लों में तो हालत और कठिन है। 

पहले जहां जोहड़ के पास, बाखल में, खाली पड़ी जमीन पर बच्चे गुल्ली-डंडा, पिट्ठू, कबड्डी खेल लेते थे, वहाँ अब प्लॉट कट गए हैं, मकान खड़े हो गए हैं। खेलने लायक एक इंच जमीन नहीं बची। नतीजा, हमारे बच्चे सड़क पर खेलने को मजबूर हैं। गली में दो ईंटों से विकेट बनता है, सड़क पर आती गाड़ी के हॉर्न से खेल रुकता है। माँ का दिल हर पल डरता है कि कहीं कुछ हो न जाए। 

क्या यही बचपन है जो हमें उनको देना था? शायद नहीं। हमें उन्हें स्वस्थ जीवन देना था। जब बच्चा दौड़ेगा नहीं, कूदेगा नहीं, गिरेगा-उठेगा नहीं, तो उसका शरीर कैसे बनेगा। उसकी सांस कैसे गहरी होगी, उसकी आँखों में वह चमक कहाँ से आएगी? आज छोटे-छोटे बच्चों की आँखों पर चश्मा है, पीठ झुकी हुई है, थकान जल्दी आती है, क्योंकि उनके जीवन से खेल ही छीन लिया गया है। बच्चों को खेलने की जगह देना कोई एहसान नहीं है, यह उनका हक है, उनकी सांस है, उनका बचपन है।

Friday, October 2, 2026

A wise person's mistake cannot be forgiven, my child!



The Bodhi Tree

Ashok Mishra

Mahatma Buddha used to impart spiritual teachings to people and show them the path to liberation. He would periodically test his disciples and keep a watch on their daily lives. If they made a mistake, he would explain—with great affection and through examples—where and why they had erred. Consequently, the disciples would easily grasp his teachings. 

Once, Mahatma Buddha was traveling with his disciples. Along the way, he would occasionally ask a disciple a question or respond to someone's words. As they walked, they reached the edge of a garden where there was a pond. The pond was filled with blooming lotus flowers. Buddha gazed at the lotuses with deep affection; the sight of the flowers in the garden and the pond brought him great joy. 

Just then, one of his disciples ran to the pond, plucked a flower, and offered it to Buddha. Buddha accepted the flower but explained, "Plucking a flower grown through someone else's hard work is very wrong. Before plucking a flower, one should seek permission from the person who cultivated it." Meanwhile, a man arrived, began plucking lotuses from the pond, and tossed them aside. 

The disciple said, "Master! You are saying nothing to the man who has completely altered the appearance of the pond." Buddha replied, "If a person commits such an act driven by worldly desire or greed, it stems from ignorance. However, when a wise person commits the same act, it is a sin. The man who has marred the pond is ignorant; his mistake can be forgiven, but yours cannot." The disciple understood Buddha's words.

ज्ञानी का अपराध क्षम्य नहीं है, वत्स!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने लोगों को धर्म दीक्षा दी। उन्होंने लोगों को मुक्ति के मार्ग बताए। वह अपने शिष्यों को भी समय-समय पर परखते रहते थे। उनके दैनिक जीवन पर निगाह रखते थे। अगर उनसे कोई गलती होती थी तो वह बड़े प्रेम से उदाहरण देकर समझाते थे कि उनसे कहां गलती हुई और क्यों हुई? शिष्य भी बुद्ध की बात को इस तरह आसानी से समझ जाते थे। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध  अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। बीच बीच में वह अपने किसी शिष्य से कुछ पूछ लेते, तो किसी की बात का उत्तर दे देते थे। चलते-चलते वह एक बाग के किनारे पहुंचे। उस बाग के किनारे एक तालाब था। तालाब में खूब ढेर सारे कमल के फूल खिले हुए थे। तालाब में खिले कमल के फूलों को वह बड़े प्रेम से निहारने लगे। उन्हें बाग और तालाब में खिले फूलों को देखने में अत्यंत आनंद आ रहा था। 

तभी उनके एक शिष्य ने दौड़कर तालाब से एक फूल तोड़ लिया और लाकर बुद्ध को भेंट कर दिया। बुद्ध ने फूल तो स्वीकार कर लिया, लेकिन समझाते हुए बोले, किसी की मेहनत से उपजाए गए फूल को तोड़ना बहुत गलत है। जिसने इन फूलों को उगाया है, तोड़ने से पहले उसकी अनुमति लेनी चाहिए। इस बीच एक व्यक्ति आया और वह तालाब में खिले फूलों को तोड़-तोड़ कर फेंकने लगा। 

शिष्य ने कहा कि भगवन! आप उस व्यक्ति को कुछ नहीं कह रहे हैं जिसने तालाब का स्वरूप ही बदल दिया है। बुद्ध ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति वासना, तृष्णा में डूबकर कोई काम करता है, तो वह उसका अज्ञान है। लेकिन जब वही काम ज्ञानी व्यक्ति करता है, तो वह पाप है। जिसने तालाब का स्वरूप बिगाड़ा, वह अज्ञानी है। उसका अपराध क्षमा हो सकता है, लेकिन तुम्हारा नहीं। शिष्य महात्मा बुद्ध की बात समझ गया।


हरियाणा में हवा तब साफ होगी जब पूरे साल किए जाएंगे प्रयास


अशोक मिश्र


हरियाणा, खासकर फरीदाबाद, पलवल, रेवाड़ी और गुरुग्राम बेल्ट में पटाखा उद्योग केवल दिवाली का कारोबार नहीं है। यह हजारों परिवारों की रोजी रोटी है। छोटे कारखाने, पैकेजिंग यूनिट, ट्रांसपोर्ट और खुदरा दुकानदार, सब इसी त्यौहारी सीजन पर टिके हैं। जब दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर पूर्ण बैन की तलवार लटकती है, तो सबसे पहला असर इन जिलों के गोदामों पर पड़ता है, माल जब्त होता है। लाइसेंस रद्द होने का डर रहता है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से कि बैन नहीं, बल्कि रेगुलेशन होना चाहिए, पटाखा उद्योग को कानूनी स्थिरता मिलेगी। 

समयबद्ध बिक्री और ग्रीन पटाखों को बढ़ावा मिलने से उद्योग बंद नहीं होगा बल्कि रूप बदलेगा। इससे हरियाणा में ग्रीन पटाखा निर्माण की नई इकाइयां लग सकती हैं, जो कम धुएं वाले और वैज्ञानिक फॉर्मूले से बने होंगे। इससे रोजगार भी बचेगा और प्रदूषण का तर्क भी कमजोर होगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में ही टिप्पणी की है कि पटाखों पर चौबीस घंटे का पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। इसके लिए समय तय करना सरकार का काम है। सुप्रीमकोर्ट ने ऐसा कहकर एक बड़े संवैधानिक संतुलन को साफ किया है। 

अदालत ने माना है कि पर्यावरण संरक्षण जरूरी है लेकिन आजीविका और व्यापार के अधिकार को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है। प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से पांच कारक जिम्मेदार हैं। सबसे पहले नंबर पर वाहनों का धुआं, खासकर डीजल वाहन और पुराने वाहन आता है। उद्योगों और ईंट भट्टों से निकलने वाला धुआं भी प्रदूषण के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। सड़क और निर्माण की धूल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित होती है। कूड़ा जलाना और घरेलू ईंधन भी प्रदूषण को फैलाने में अपनी अहम भूमिका निभाता है। पराली जलाना भी प्रदूषण के लिए कम खतरनाक नहीं है। इनमें से कोई भी कारक अकेले दिवाली जैसा नहीं दिखता इसलिए उस पर उतना शोर नहीं मचता, लेकिन ये बारह महीने जहर घोलते हैं। 

पराली जलाने के लिए केवल किसान को दोषी ठहराकर हम समस्या से बच नहीं सकते। किसान पराली इसलिए जलाता है क्योंकि उसके पास अगली फसल बोने के लिए 15-20 दिन का ही समय होता है और पराली हटाने की मशीन महंगी है। यदि इस समस्या से निजात मिल जाए तो उसे पराली जलाने का कोई शौक नहीं है। हरियाणा सरकार इस दिशा में पिछले कुछ वर्षों से कई उपाय कर रही है, जिसे मानना होगा। 

पराली न जलाने पर प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि, कस्टम हायरिंग सेंटर के जरिए हैप्पी सीडर और सुपर सीडर मशीनों पर 80 प्रतिशत तक सब्सिडी, पराली से बायो-सीएनजी और बिजली बनाने के प्लांट लगाना, और पराली खरीद की व्यवस्था शुरू करना। इसके अलावा वाहनों के लिए इलेक्ट्रिक वाहन नीति, पुराने डीजल वाहनों पर सख्ती, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के लिए एंटी स्मॉग गन अनिवार्य करना और ग्रैप के नियमों को लागू करना भी शामिल है। फरीदाबाद और गुरुग्राम में प्रदूषण हॉटस्पॉट की पहचान कर वहां विशेष निगरानी भी की जा रही है।


Thursday, October 1, 2026

वह तुम्हारी जान भी ले सकते हैं, वत्स!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के बनाए संघ में कोई भी शामिल हो सकता था। किसी भी जाति विशेष पर कोई प्रतिबंध नहीं था। लेकिन भिक्षुक संघ में शामिल होने से पहले व्यक्ति को अपनी जातीय उच्चता, ऊंच-नीच की भावना को त्यागना पड़ता था। उसके लिए कई तरह की कठिन परीक्षाएं भी होती थीं। 

संघ में सभी जातियों के मिल जुलकर रहते थे। कई बार भिक्षुक बनने से पहले सामाजिक स्तर पर सबसे निचले पायदान पर रहा व्यक्ति भी संघ में उच्च स्थिति प्राप्त कर लेता था, लेकिन संघ के भिक्षुओं में कोई दुर्भावना नहीं होती थी। एक बार की बात है। धर्म दीक्षा का समापन हुआ, तो उसमें भाग लेने वाले नवबौद्ध अपनी अपनी रुचि के मुताबिक परिव्रज्या के लिए चले गए। 

उनमें देववर्धन नामक भिक्षु भी था। वह बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुआ और कलिंग जाकर संघ का प्रचार करने की इच्छा जताई। उसकी इच्छा जानकर बुद्ध ने शीश पर आशीर्वाद का हाथ फेरते हुए कहा, वत्स! कलिंग में जाना उचित नहीं है क्योंकि वहां के लोग बहुत क्रूर, अधर्मी और ईष्यालु हैं। वह तुम्हें बहुत तरीके से सताएंगे। गालियां देंगे। देववर्धन ने कहा, भगवन! वह मुझे गालियां ही देंगे, मुझे मारे पीटेंगे तो नहीं। बुद्ध ने कहा कि वह मारपीट भी कर सकते हैं। तब देववर्धन ने कहा कि उनकी मारपीट से शरीर को थोड़ी चोट ही पहुंचेगी। मार तो नहीं डालेंगे। 

बुद्ध ने कहा कि वह तुम्हारी जान भी ले सकते हैं। मैंने देखा है वह बहुत क्रूर हैं। तब भी देववर्धन अड़ा रहा। बोला, पुण्य कार्य करते हुए मुझे अपने प्राण देने पड़े, तो मैं समझूंगा कि यह शरीर सार्थक हो गया। बुद्ध ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम कलिंग धर्म प्रचार कर सकोगे। तुममें सच्ची सेवा भावना है।

खुले बोरवेल, मैनहोल को हत्या की कोशिश मानने पर ही रुकेंगी घटनाएं


अशोक मिश्र

फरीदाबाद के सीही गांव में रविवार शाम करीब सात बजे तीन साल की बच्ची नेहा ट्रैक्टर पर खेलते समय फिसल कर खुले बोरवेल में गिर गई। करीब 200 से 250 फीट गहरा बोरवेल पिछले 15 साल से बंद पड़ा था। दस घंटे तक एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, हरियाणा पुलिस, नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने रेस्क्यू चलाया। सोमवार सुबह करीब चार बजे बोरवेल से निकाली गई बच्ची के शरीर में कोई हलचल नहीं थी। अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। यह कोई इकलौता हादसा नहीं है। 

एक जुलाई 2026 को अंबाला के धनोरा गांव में खुले बोरवेल में चार साल के बच्चे की 21 घंटे के आॅपरेशन के बाद मौत हो गई थी। उससे पहले पलवल की गांधी कॉलोनी में चार साल की बच्ची की घर के सामने खुले मैनहोल में गिरकर मौत हो गई थी। अप्रैल 2023 में गुरुग्राम में सोहना रोड पर खुले सीवर में गिरकर एक व्यक्ति की मौत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुख्य सचिव, पुलिस आयुक्त और नगर निगम आयुक्त को नोटिस जारी किया था। पिछले साल जुलाई में फरीदाबाद में ही सुरक्षा सुपरवाइजर की कार खुले नाले में गिरने से डूबकर मौत हो गई। 

बोरवेल, मैनहोल, गड्ढे और नाले सभी मौत के दरवाजे हैं जिनमें एक बार कोई गिरा तो उसे जिंदा निकालना लगभग असंभव हो जाता है। हरियाणा जैसे तेजी से शहरीकृत हो रहे राज्य में यह समस्या और भी विकराल है क्योंकि यहां खेती के लिए अवैध बोरवेल, शहरों में पुराने नगर निगम के बोरवेल और चोरी हो चुके लोहे के मैनहोल के ढक्कन एक साथ जानलेवा जाल बनाते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के नियम इस मामले में बेहद साफ हैं कि बोरवेल खोदने से 15 दिन पहले जिला कलेक्टर या सरपंच को लिखित सूचना देनी होगी। निर्माण के दौरान कंटीले तार की फेंसिंग लगानी होगी। स्टील की प्लेट को बोल्ट से कसकर ढकना होगा और बोरवेल सूखने या बंद होने पर उसे नीचे से ऊपर तक मिट्टी, रेत, बोल्डर और कंकड़ से पूरी तरह भरना होगा और सरकारी विभाग से सर्टिफिकेट लेना होगा। 

लेकिन राज्य में शायद ही ऐसा होता हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बंद बोरवेल को भरने का सर्टिफिकेट लेना जरूरी है, लेकिन हकीकत में पंचायत से लेकर नगर निगम तक कोई भी विभाग सक्रिय सर्वे नहीं करता। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण को गुरुग्राम जैसे शहरों में दर्जनों बिल्डरों और फैक्ट्रियों के अवैध भूजल दोहन पर कार्रवाई कर बोरवेल सील करने पड़ते हैं, क्योंकि बिना अनुमति के बोरवेल खोदे जाते हैं। 

एक बोरवेल को सही तरीके से भरने में 15 से 20 हजार रुपये लगते हैं, किसान या प्लॉट मालिक इसे बेकार खर्च मानकर खुला छोड़ देता है और लोहे के मैनहोल ढक्कन कबाड़ में बेच दिए जाते हैं। जब तक ऐसे मामलों में लापरवाही नहीं बल्कि हत्या की कोशिश जैसा अपराध नहीं माना जाएगा, तब तक सीही की नेहा जैसी बच्चियों की चीखें 10 घंटे के रेस्क्यू के बाद खामोशी में बदलती रहेंगी।

Wednesday, September 30, 2026

ज्ञान का सागर तो अथाह है, आनंद!


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध का प्रिय शिष्य आनंद था। आनंद महात्मा बुद्ध का चचेरा भाई थी। गौतम बुद्ध के जीवन के अंतिम 25 वर्षों तक साये की तरह उनके साथ रहा। आनंद के पिता राजा शुक्लोदना (अमितोदना) महात्मा बुद्ध के चाचा थे। आनंद का बड़ा भाई देवदत्त था। पक्षी वाले प्रसंग में इसी देवदत्त की चर्चा होती है। 

प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों जैसे सुत्त पिटक आदि में आनंद को अत्यंत प्रखर बुद्धि का बताया गया है। उन्होंने तथागत के उपदेशों को अक्षरश: याद रखा था। पाली परंपरा के अनुसार, आनंद के प्रथम गुरु बेलट्ठसीस और पुन्ण मंतानीपुत्त थे । पुन्ण के उपदेशों से ही आनंद को सोतापन्न की अवस्था प्राप्त हुई, जो ज्ञानोदय से पूर्व की अवस्था है। आनंद ने बाद में पुन्ण के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध  और आनंद एक सघन वन से गुजर रहे थे। दोनों किसी बात पर चर्चा भी करते जा रहे थे। एकाएक आनंद ने पूछा, भगवन! आपने बहुत सारा ज्ञान अर्जित किया है। क्या आप मुझे अपना समस्त ज्ञान दे चुके हैं? बुद्ध ने जवाब देने की जगह आनंद से ही सवाल पूछ लिया, यह बताओ आनंद, इस वन में कितने सूखे पत्ते गिरे होंगे। हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं, उस वृक्ष से कितने सूखे पत्ते गिरे हैं और कितने सूखे पत्ते अभी ऊपर लटक रहे हैं? 

आनंद इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए। तब तथागत ने उनसे कहा कि दुनिया में ज्ञान का अथाह भंडार है। मैं उस अथाह भंडार से कितना ग्रहण कर पाया मैं नहीं कह सकता हूं। मैं तुम लोगों को कितना दे पाया, यह भी नहीं कह सकता हूं। इस अथाह ज्ञान सागर से जितना ग्रहण कर सको, उतना ग्रहण कर लो। संपूर्ण ज्ञान तो कोई एक व्यक्ति ग्रहण ही नहीं कर सकता है।

अब हरियाणा में खेत और घर तक पहुंचेगा ड्रोन कैपिटल का सपना

अशोक मिश्र

हरियाणा को ड्रोन कैपिटल बनाने की दिशा में सरकार ने अब कदम बढ़ा दिया है। 28 सितंबर को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि देश-विदेश में ड्रोन की बढ़ती जरूरतों तथा विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगिता को देखते हुए हरियाणा में ड्रोन निर्माण के क्षेत्र में रिसर्च पर विशेष फोकस किया जाएगा। हरियाणा को 'ड्रोन कैपिटल' बनाया जाएगा। यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि एक औद्योगिक रणनीति है। जब पूरी दुनिया में ड्रोन बनाने की होड़ लगी है, चीन बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहा है, अमेरिका और इजरायल रक्षा ड्रोन में आगे हैं, ऐसे में हरियाणा की योजना फायदेमंद इसलिए है क्योंकि वह केवल खरीददार नहीं, निर्माता बनने की सोच रहा है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा ड्रोन आयातक न बनकर यदि हिसार जैसे हब से युवाओं को निर्माण और ट्रेनिंग देगा तो लागत घटेगी, मेंटेनेंस लोकल होगा और युवाओं का पलायन रुकेगा। केंद्र की उदार ड्रोन नीति, पीएलआई योजना और हरियाणा की औद्योगिक जमीन, गुरुग्राम-मानेसर का इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरिडोर इस सपने को व्यावहारिक बनाते हैं। हिसार के सिसाय में देश के पहले और दक्षिण एशिया के सबसे बड़े ड्रोन प्रशिक्षण संस्थान और ड्रोन विनिर्माण यूनिट का ई-शुभारंभ हो चुका है, जहाँ अब तक 252 ड्रोन पायलट तथा 136 ड्रोन तकनीशियन तैयार किये जा चुके हैं। 

युवाओं के लिए इसका लाभ बहुस्तरीय है। दृश्या जैसी सरकारी कंपनी विभिन्न विभागों के उम्मीदवारों को ड्रोन पायलट ट्रेनिंग दे रही है। ड्रोन दीदी योजना के तहत पांच हजार महिलाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य है ही, साथ ही हरियाणा ड्रोन उद्यमी योजना के तहत अनुसूचित जाति वर्ग के 18 से 45 वर्ष के 500 युवाओं को बिल्कुल मुफ्त ड्रोन पायलट ट्रेनिंग, डीजीसीए सर्टिफिकेशन और ड्रोन खरीदने के लिए रियायती ऋण की सुविधा दी जा रही है। फसल निगरानी, कीटनाशक छिड़काव, स्वास्थ्य सेवाओं में दवा पहुंचाना, ट्रैफिक मॉनिटरिंग, आपदा प्रबंधन में राहत सामग्री गिराना और शादी-समारोह की फोटोग्राफी से लेकर घर की छत की लीकेज जांच तक ड्रोन आम जीवन में प्रवेश कर रहा है। 

कृषि क्षेत्र में ड्रोन का उपयोग सबसे अधिक व्यावहारिक है। हरियाणा कृषि विभाग ने एग्रीशक्ति नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत एक लाख एकड़ जमीन पर ड्रोन से एग्रोकेमिकल छिड़काव का लक्ष्य रखा है। परंपरागत स्प्रे में मजदूर को एक एकड़ में घंटों लगते हैं और जहर का असर शरीर पर पड़ता है, ड्रोन 10 मिनट में एक एकड़ कर देता है, 70 प्रतिशत पानी बचता है। 

निजी जीवन में ड्रोन का सीधा उपयोग कम है, पर अप्रत्यक्ष उपयोग बढ़ा है। जैसे-जैसे ड्रोन की लागत घटेगी और सर्विस मॉडल मजबूत होगा, आम किसान और आम नागरिक भी इसे मोबाइल की तरह किराये पर ले सकेगा, तभी हरियाणा का ड्रोन कैपिटल का सपना खेत और घर दोनों तक पहुंचेगा।

Tuesday, September 29, 2026

मैं अमरता की खेती करता हूं, वत्स!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ने जब भिक्षुक संघ का गठन किया, तो यह नियम बनाया कि हर भिक्षुक अपने भोजन के लिए भिक्षा मांगेगा। कुछ ग्रंथों में तो यह भी कहा गया है कि बौद्ध भिक्षु केवल एक ही घर से भिक्षा मांगेगा और जो कुछ उसे उस घर से मिलेगा, उसी पर  उसे उस दिन गुजारा करना पड़ेगा। 

अपने लिए भिक्षा मांगने के नियम से केवल बीमार और बहुत ज्यादा बुजुर्ग भिक्षु को ही छूट मिलती थी। गौतम बुद्ध अपने लिए नियम से भिक्षा मांगने जाया करते थे। संघ में रहने वाले भिक्षुओं को खाने-पीने के लिए एक बर्तन और पहनने के लिए दो वस्त्र ही मिलते थे। वस्त्र पुराना या फट जाने पर उसे फेंका नहीं जाता था, बल्कि यदि उसको दूसरे काम में उपयोग किया जाता था। वस्त्र तभी फेंका जाता था, जब वह किसी काम का नहीं रह जाता था। 

एक बार की बात है। गौतम बुद्ध काशी में उपदेश देने के लिए पहुंचे थे। नियम के अनुसार गौतम बुद्ध भिक्षा मांगने निकले। वह पहुंच गए काशी के एक संपन्न किसान के दरवाजे पर। उन्होंने भिक्षा के लिए गुहार लगाई। किसान घर से बाहर निकला और उसने कहा, मैं खेती पर दिन रात परिश्रम करता हूं। बीज बोता हूं। फसल की रखवाली करता हूं, तब जाकर मुझे खाने के लिए अनाज मिलता है। आप बिना खेती किए अनाज पाना चाहते हैं। 

बुद्ध ने कहा कि मैं आत्मा की खेती करता हूं। ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूं। उस फसल को तपस्या के जल से सींचता हूं। विनय मेरे हल की नोक, विचार शीलता फल है। मैं अमरता की खेती करता हूं, जहां न दुख है, न संताप। यह सुनकर किसान समझ गया कि उसके सामने युग प्रवर्तक महात्मा बुद्ध खड़े हैं। उसने गौतम को प्रणाम किया और भिक्षा लाकर दी।

सड़क हादसों का कारण बन रहे लावारिस पशु, जिम्मेदार कौन?

अशोक मिश्र

पलवल में 24 सितंबर की रात दो सांडों की लड़ाई से बचने के प्रयास में डिपो संचालक सुनील पांडेय की मौत हो गई। अभी लोग डिपो संचालक की मौत को भूल भी नहीं पाए थे कि ठीक दो दिन बाद 26 सितंबर को अमरपुर गांव के पास मोहना-अमरपुर मार्ग पर हुई दूसरी घटना ने हरियाणा की सड़कों पर लावारिस पशुओं के खतरे को फिर से सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। चांदहट थाना क्षेत्र में शनिवार शाम लावारिस पशु को बचाने के प्रयास में बाइक अनियंत्रित होकर सड़क किनारे पेड़ से टकरा गई। 

इस हादसे में बाइक सवार राजवीर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि हरकेश ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। ये दोनों घटनाएं अलग-अलग लगती हैं, लेकिन इनका मूल कारण एक ही है, सड़क पर बेसहारा गोवंश की मौजूदगी और उनका अनियंत्रित व्यवहार। हरियाणा में यह समस्या अब रोज की हकीकत बन चुकी है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो प्रदेश में हर महीने औसतन 10 लोग ऐसे हादसों में जान गंवा देते हैं। पिछले पांच महीनों में ही फरीदाबाद सहित पूरे प्रदेश में 17 लोगों की मौत लावारिस पशुओं के कारण हुए हादसों में हो चुकी है। 

ऐसी घटनाओं के लिए किसी एक व्यक्ति या निकाय को दोषी नहीं माना जा सकता है। सबसे पहली जिम्मेदारी तो उन पशुपालकों की है जो दूध देना बंद करने पर गाय को लावारिस छोड़ देते हैं। नंदी को तो पैदा होने के कुछ ही दिनों बाद खुला छोड़ दिया जाता है। इसके बाद नंबर आता है स्थानीय निकायों और पंचायतों का जिनके पास लावारिस पशुओं को पकड़ने की जिम्मेदारी है। 

यह संस्थाएं कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति ही करती हैं। पांच महीने में पूरे प्रदेश में पशु को सड़क पर छोड़ने वालों से केवल 62,600 रुपये जुर्माना वसूला गया है। यह आंकड़ा स्थानीय निकायों और पंचायतों की कारगुजारी का सबसे बेहतरीन प्रमाण है। लोगों में दंड का डर जैसे रह ही नहीं गया है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है जो दशकों से इस समस्या को अस्थायी समाधान करके अब तक टालती आ रही है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कई बार कहा है कि प्रदेश में बेसहारा गोवंश सड़कों पर नजर नहीं आना चाहिए, लेकिन सड़कों पर स्थिति जस की तस है। 

व्यवस्था से जुड़े लोग सीएम को भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। राज्य में होने वाले इन हादसों को रोका जा सकता है। लेकिन केवल नारे लगाने या एक-दो हफ्ते अभियान चलाने से बात नहीं बनेगी। सबसे पहले तो पशु की पहचान और मालिक की जवाबदेही तय करना बहुत जरूरी है। टैगिंग का विचार एकदम सही दिशा में है, लेकिन जब तक हर पशु की टैगिंग और आधार-लिंक्ड डाटाबेस नहीं बनता और जुर्माना वसूली वाकई सख्त नहीं होती, लोग पशु छोड़ते रहेंगे। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाए। केवल दान से काम चलने वाला नहीं है।

Monday, September 28, 2026

चिकित्स की जरूरत वहां, बीमारियां जहां

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ज्यादातर भ्रमण में ही रहते थे। वह केवल वर्षाकाल में ही एक जगह टिकते थे। वर्षाकाल में यात्रा आसान भी नहीं होती है। रास्ते जोखिम भरे और नदियां उफान पर होती हैं। ऐसी स्थिति में गौतम बुद्ध तीन महीने के लिए एक स्थान पर रुक जाते थे। जब उन्होंने भिक्षुक संघ की स्थापना की, तो उन्होंने नियम बनाया कि हर भिक्षु अपनी सुविधा और इच्छानुसार लोगों में धर्म प्रचार के लिए जा सकता है। 

वह अपनी इच्छित जगह पर जाकर लोगों को आत्म कल्याण और जीवन को सुखमय बनाए रखने के लिए प्रेरित करेगा। बौद्ध की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करेगा। यदि वह अपने इस कार्य में विफल हो जाता है, तो उसके स्थान पर कोई नया भिक्षुक भेजा जाएगा। पहले वाले भिक्षुक को आश्रम बुला लिया जाएगा और उसे प्रशिक्षण दिया जाएगा। एक दिन सभी भिक्षुओं को अपने अपने इच्छित स्थान के लिए निकलना था। 

गौतम बुद्ध के परम प्रिय शिष्य आनंद ने उस स्थान को चुना जहां पहले भी लोग धर्म का प्रचार प्रसार करने का प्रयास कर चुके थे और विफल रहे थे। वहां मौजूद लोगों ने आश्चर्य से उन्हें देखा और कहा, वहां के लोग किसी भी साधु-संत या विचारक को टिकने नहीं देते हैं। लोग किसी को भिक्षा भी नहीं देते हैं और आपस में लड़ते ही रहते हैं। वहां जाकर आप क्या करेंगे? आपको भी हो सकता है कि कुछ दिनों बाद विफल होकर लौटना पड़े।  

इस पर आनंद ने गंभीर होकर कहा कि चिकित्सक की जरूरत वहीं सबसे ज्यादा होती है, जहां बीमारियां होती हैं। धर्म का प्रचार करने की जरूरत वहां है जहां अधार्मिक लोग रहते हों। मेरी भी सबसे ज्यादा जरूरत उसी गांव में है, जहां के लोग बुराइयों से घिरे हुए हैं। यह सुनकर सारे लोग शांत हो गए।

नशे के खिलाफ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन में दौड़े लोग

अशोक मिश्र

आज फरीदाबाद में नशा मुक्ति के संदेश के साथ हुई हाफ मैराथन महज एक दौड़ नहीं थी, वह एक सामाजिक घोषणा थी। यह उस सामाजिक बुराई के खिलाफ घोषणा है जिसने हमारे प्रदेश के युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों को अपनी गिरफ्त में सदियों से जकड़ रखा है। सूरजकुंड मेला ग्राउंड से शुरू हुई इस नशा-मुक्त हरियाणा फरीदाबाद नमो मैराथन-2026 में 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर और 21 किलोमीटर की तीन श्रेणियां रखी गई थीं और आयोजकों के अनुसार जनसैलाब ऐसा उमड़ा कि एक साथ 1.35 लाख से अधिक लोगों ने दौड़ लगाई। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी रविवार की सुबह सूरजकुंड पहुंचे और ‘ड्रग-फ्री हरियाणा’ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन-2026 को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। 

इस दौरान भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन ने लोगों का उत्साह बढ़ाया। सच यह है कि कोई भी मैराथन सीधे किसी के हाथ से नशे की पुड़िया नहीं छीनती। इसका प्रभाव तत्काल और मापने योग्य नहीं होता। कितने लोगों ने इस दौड़ के बाद नशा छोड़ा, इसका कोई रजिस्टर नहीं बनता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि यह निरर्थक है। नशा एक अकेलेपन की बीमारी है, जो अंधेरे में पनपती है। जब सवा लाख लोग सुबह-सुबह सड़क पर एक साथ दौड़ते हैं, भारत माता की जय के जयघोष के साथ, तो वह अंधेरा टूटता है। युवा देखता है कि ऊर्जा का विकल्प भी है। दौड़, पसीना, समूह का उत्साह, यह सब नशे के विरुद्ध एक सकारात्मक नशा है। 

यह जागरूकता की पहली सीढ़ी है, अंतिम इलाज नहीं। ऐसी प्रतियोगिताओं का औचित्य इसी प्रतीकात्मक शक्ति में है कि राज्य यह कहना चाह रहा है कि हम लड़ रहे हैं और तुम अकेले नहीं हो। हरियाणा में 18 हजार 847 नशा पीड़ित हैं। यह तो केवल दर्ज आंकड़ा है। जमीन पर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। पंजाब से सटे होने के कारण ड्रग रूट, बेरोजगारी का दबाव, जिम और बॉडी बनाने के भ्रम में स्टेरॉयड और फिर नशे की ओर फिसलन और तेजी से बढ़ता शहरी अकेलापन, यह सब मिलकर हरियाणा को एक नए तरह के संकट में डाल रहा है। 

नशा मुक्ति अभियान को सफल बनाना है तो उसे दौड़ से आगे ले जाना होगा। इसे शर्म से निकालकर बीमारी के रूप में देखना सिखाना होगा। जैसे बुखार के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही नशे के लिए भी डॉक्टर के पास जाना होगा। इसके लिए हर प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर गोपनीय काउंसलिंग हो। स्कूलों में उत्तर रटाने के बजाय सवाल पूछने की आदत और जीवन कौशल सिखाना होगा, तनाव से कैसे निपटें, ना कैसे कहें। 

प्रयोगशालाओं को मंदिरों के बराबर सम्मान देना होगा। जब तक बच्चा यह नहीं देखेगा कि वैज्ञानिक सोच से भी जीवन सुधरता है, तब तक वह चमत्कारिक समाधान की ओर ही भागेगा। फरीदाबाद की यह दौड़ एक अच्छी शुरुआत है, पर दौड़ना ही काफी नहीं है, टिके रहना भी सीखना होगा।

Sunday, September 27, 2026

सुख-दुख में समान रहने का अभ्यास


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने जीवन भर लोगों को यह समझाने का प्रयास किया है कि लालसा ही हमारे दुखों का मूल है। जब हम जरूरत से ज्यादा संग्रह करते हैं, तो हमें उन वस्तुओं के प्रति मोह हो जाता है। जब वह वस्तु किसी कारण से नष्ट हो जाए या चोरी चली जाए, तो उसे हमें दुख होता है। हमें भविष्य या अतीत के बारे में सोचकर दुखी नहीं होना चाहिए। जो पल आप जी रहे हैं, वही आपका है। यदि वर्तमान को ही अच्छी तरह से जी लिया जाए, तो वह भविष्य को भी सुधारने की क्षमता रखता है। 

महात्मा बुद्ध के इस जीवन दर्शन को क्षणवाद के नाम से जाना जाता है। यदि हम अपने जीवन के बारे में विचार करें, तो महात्मा बुद्ध की बात सही नजर आती है। हम जीवन में अतीत या भविष्य को सोचकर परेशान होते रहते हैं, इससे वर्तमान जीवन का आनंद भी नहीं उठा पाते हैं। इसी तरह महात्मा बुद्ध इंसान को सुख और दुख में समान रहने का उपदेश दिया करते थे। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध कहीं जा रहे थे। उनके मन में पता नहीं क्या आया, वह अच्छी भली पगडंडी को छोड़कर नीचे चलने लगे। नीचे कंटीली झाड़ियां थीं। उस पर चलने से बुद्ध के पैरों में कांटे चुभने लगे। उनके साथ चल रहे लोग आश्चर्यचकित रह गए। उनके शिष्य आनंद ने पूछा, तात! आप पगडंडी छोड़कर कंटीले रास्ते पर क्यों चल रहे हैं। 

बुद्ध ने जवाब देते हुए कहा कि इंसान को इस पगडंडी पर सुख और दुख दोनों भोगने पड़ते हैं। सुखों के प्रति आशक्ति रखने से जब इंसान दुख में पड़ता है, तो वह अत्यंत दुखी हो जाता है। मैं कंटीले रास्ते पर इसलिए चल रहा हूं ताकि सुख और दुख का अभ्यास बना रहे। यह सुनकर उनके साथ चलने वाले समझ गए कि महात्मा बुद्ध उन्हें क्या समझाना चाहते हैं।

कीटनाशकों और रासायनिक खादों के ज्यादा उपयोग से बचें


अशोक मिश्र

हरियाणा की खेती हरित क्रांति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है और आज भी यह देश में रासायनिक आदानों के सर्वाधिक उपयोग वाले राज्यों में से एक है। सामान्य वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार फसल की जरूरत, मिट्टी परीक्षण और फसल चक्र के आधार पर ही खाद और कीटनाशक का उपयोग होना चाहिए, जिसमें संतुलित एनपीके लगभग 150 से 170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास माना जाता है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। पंजाब के बाद हरियाणा देश में सर्वाधिक कीटनाशक उपयोग करने वाला राज्य बन गया है। 

2000 से 2021 के बीच तकनीकी ग्रेड कीटनाशकों की वार्षिक खपत 4000 से 5025 टन के बीच स्थिर रूप से ऊंची रही है। इस अत्यधिक उपयोग का फसल और मिट्टी पर सीधा प्रभाव दिखता है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन से पौधा बढ़ता तो तेजी से है पर जड़ें कमजोर होती हैं, फसल कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है और किसान फिर और कीटनाशक डालता है, यह एक दुष्चक्र बन जाता है। मिट्टी में जैविक कार्बन घटता है, सूक्ष्म जीव मरते हैं, जलधारण क्षमता कम होती है और जमीन सख्त हो जाती है। 

इससे पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से दाने का भराव और पोषण गुणवत्ता दोनों गिरते हैं। अधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों का मानव शरीर पर प्रभाव दो तरीकों से होता है, प्रत्यक्ष छिड़काव के दौरान और अप्रत्यक्ष भोजन, पानी और दूध के जरिये। हरियाणा में किए गए अध्ययन में केवल दो से चार प्रतिशत किसान ही मास्क, दस्ताने और जूते जैसे सुरक्षात्मक कपड़े पहनते हैं, इसलिए त्वचा और सांस के जरिये अवशोषण आम है। जब ये अवशेष लंबे समय तक शरीर में जाते हैं तो वे अंत:स्रावी तंत्र को बाधित करते हैं यानी हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करने वाले रसायनों के रूप में काम करते हैं। 

हरियाणा और पंजाब दोनों में अत्यधिक रासायनिक खादों के उपयोग को कैंसर के मामलों का प्रमुख कारण माना गया है, जिसे पंजाब की कुख्यात कैंसर ट्रेन के उदाहरण से समझा जाता है जो रोगियों को लेकर जाती है। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री ने भी हरियाणा और पंजाब में कैंसर वृद्धि को अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जोड़ा है। अत्यधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों से जुड़े रोगों की सूची लंबी है। 

सरकारी स्वास्थ्य निगरानी में कैंसर के अलावा बांझपन, प्रजनन संबंधी विकार, गुर्दे की विफलता, तंत्रिका तंत्र के विकार, सांस की पुरानी बीमारियां, त्वचा रोग, दृष्टि दोष और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं बार-बार सामने आई हैं। एक ग्रामीण स्वास्थ्य अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि कीटनाशक विभिन्न पुराने रोगों जैसे कैंसर, बांझपन, गुर्दे की विफलता, प्रजनन समस्याओं और तंत्रिका विकारों से जुड़े हैं। 


Saturday, September 26, 2026

जो चलता ही नहीं, वह थकेगा कैसे?

बोधिवृक्ष़

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध आत्म ज्ञान प्राप्त करने में छह साल लगे। बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। वह सिद्धार्थ से बुद्ध कहे जाने लगे। इसके बाद उन्होंने अपना सबसे पहला उपदेश सारनाथ में दिया। कहते हैं कि जब उन्होंने अपना पहले उपदेश दिया था, तो उस समय केवल पांच शिष्य ही उपस्थित थे। 

इसके बाद तो मानो तथागत को एक तरह का जुनून सवार हो गया। वह चल पड़े पूरे भारतवर्ष को आत्म ज्ञान देने। वह चलते ही रहते थे। जहां रात हो गई, वहीं रुक गए। भिक्षा मांगकर खा लिया। किसी से भिक्षा नहीं मिली, तो भूखे रहकर रात गुजार ली। बस एक ही जुनून सवार था कि सबको आत्म ज्ञान देकर सबको मुक्ति दिलानी है। महात्मा बुद्ध का परम शिष्य आनंद भी उनके साथ गांव-गांव, शहर-शहर डोल रहा था। 

एक दिन उसने महात्मा बुद्ध से कहा कि जब से आपको ज्ञान प्राप्त हुआ है, आप सतत चलते ही रहते हैं। आप इससे थके या उकताए हुए नहीं प्रतीत होते हैं। आप रुकते भी नहीं हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि आपको थोड़ा विश्राम करना चाहिए? अपने शिष्य की बात सुनकर बुद्ध ने कहा कि जो चलेगा, वही थकेगा। जो चलेगा ही नहीं, वह थकेगा कैसे? बुद्ध का यह उत्तर सुनकर आनंद चकरा गया। 

उसने कहा कि मैंने आपको नित्य अपनी आंखों से चलते देखा है। यह सुनकर महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले, आनंद तुमने जिसको चलते हुए देखा है, वह शरीर है। बाहर से यह चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर की आत्मा तो स्थिर है। जब आत्मा चली ही नहीं तो थकेगी कैसे? शरीर तो आत्मा की छाया है। छाया के चलने से कोई थकता है क्या? बुद्ध की बात सुनकर आनंद समझ गया कि भंते  उसे क्या समझाना चाहते हैं।

दबे पांव हरियाणा में पांव जमाती जा रही हैं फेफड़े की बीमारियां


अशोक मिश्र

हरियाणा की मिट्टी में हमेशा से मेहनत और संघर्ष की खुशबू बसी रही है। खेतों में काम करने वाले किसान, कारखानों में पसीना बहाने वाले मजदूर, स्कूल जाते नन्हे बच्चे, सबकी सांसों में इस धरती की ताकत समाई हुई थी। लेकिन आज वही सांसें बोझ बनती जा रही हैं। अस्पतालों के गलियारों में खांसी की आवाजें गूंज रही हैं, ऑक्सीजन सिलेंडरों की मांग बढ़ रही है और युवाओं-बच्चों के फेफड़े कमजोर पड़ते जा रहे हैं। यह कोई अचानक आई आपदा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे गहराता जख्म है जो हर घर को छू रहा है। फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां अस्थमा, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और खासकर ट्यूबरकुलोसिस तेजी से फैल रही हैं। 

इनमें युवा और बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। आंकड़े कहते हैं कि फरीदाबाद जैसे स्मार्ट सिटी में ही फेफड़ों के कैंसर के मरीज एक साल में 22 प्रतिशत बढ़ गए, रोगी 1201 से बढ़कर 1515 तक पहुंच गएऔर कई जिलों में एक्यूआई 342 जैसे गंभीर स्तर तक पहुंच गया है, जहां अस्पतालों की ओपीडी में 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। सर्दियों में पराली का धुआं, दिवाली पर पटाखों का गुबार, पूरे साल फैक्ट्रियों से निकलता जहर और सड़कों पर गाड़ियों का धुआं, ये सब मिलकर एक अदृश्य चादर बन गए हैं। 

यह चादर बिना मास्क के हमारे फेफड़ों में उतर जाती है और वहीं जम जाती है। फेफड़े के रोगों के फैलने के एक नहीं, कई कारण एक-दूसरे में गूंथे हुए हैं। सबसे बड़ा कारण वह हवा है जो हम सांस के साथ पी रहे हैं। दूसरा कारण वह गरीबी और अनदेखी है जो टीबी को पालती है कमजोर पोषण, तंग घर, देर से जांच, और अधूरा इलाज। तीसरा कारण हमारी आदत है, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का और चूल्हे का धुआं। और चौथा, सबसे दर्दनाक कारण, वह चुप्पी है जो हम एक खांसी को दो हफ्ते से ज्यादा खींचने पर भी ओढ़ लेते हैं।  

एक अध्ययन के अनुसार हरियाणा में मौतों का एक बड़ा हिस्सा खराब हवा से जुड़ा पाया गया है। प्रदूषण फेफड़ों की सुरक्षात्मक परत को नष्ट करता है, जिससे संक्रमण आसानी से पकड़ लेता है। बच्चे और युवा, जिनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। हमें समझना होगा कि प्रदूषण और संक्रमण अलग-अलग दुश्मन नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रदूषण फेफड़े को कमजोर करता है, और कमजोर फेफड़े पर संक्रमण आसानी से घर बना लेता है। 

अगर हमें सच में अपने बच्चों को बचाना है तो हमें सिर्फ टीबी की दवा नहीं, साफ हवा का भी इलाज करना होगा, और सिर्फ सरकारी योजना नहीं, एक पड़ोसी का हाथ भी थामना होगा ताकि कोई मरीज अकेला न छूट जाए। हरियाणा की धरती उपजाऊ है, लोग मेहनती हैं। अगर प्रदूषण पर लगाम लगे, पराली प्रबंधन बेहतर हो, जागरूकता घर-घर पहुंचे और इलाज समय पर पूरा हो, तो सांसें फिर से हल्की हो सकती हैं। 


Friday, September 25, 2026

वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग दिया था। उनका गृह त्याग उस युग की सबसे परिवर्तनकारी घटना साबित हुई थी। एक ऐसा राजकुमार जिसके पास सुख-सुविधा के सारे उपकरण मौजूद हों, उस समय की सबसे सुंदर स्त्री उनकी पत्नी हो। एक पुत्र भी हो जिसको अभी राजकुमार सिद्धार्थ ने ठीक से उसे देखा भी नहीं था। 

ऐसे में वह दूसरों के दुखों से द्रवीभूत होकर संन्यासी हो जाए, सचमुच यह एक अद्भुत घटना थी। लोगों के कल्याण के लिए ऐश्वर्य त्याग देना, सचमुच बड़े साहस का काम है। गृह त्याग के बाद सिद्धार्थ ने छह साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अपने शरीर को विभिन्न तरह के कष्ट दिए, लेकिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। बोधगया में निरंजना नदी के किनारे पीपल वृक्ष के नीचे 49 दिनों तक कठोर तपस्या की। 

इस तपस्या के ही दौरान एक दिन कुछ महिलाएं बड़े ही मधुर स्वर में गाती हुई जा रही थीं। उन दिनों जब महिलाएं लंबी यात्रा करती थीं, तो थकान मिटाने के लिए कुछ समूह में गाती हुई जलती थीं, ताकि थकान की अनुभूति न हो। वह स्त्रियां गा रही थीं जिसका मतलब था कि वीणा के तारों को इतना ढीला मत छोड़ो कि उससे मधुर ध्वनि ही न निकल सके। वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वह टूट जाएं। 

महिलाओं का गायन सिद्धार्थ के कानों में पड़ा, तो वह समझ गए कि शरीर को कष्ट देना तपस्या नहीं है। उसी दिन उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त हुआ और राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए। उन्हें समझ में आ गया था कि अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए शरीर को कष्ट देना उचित नहीं है। संयमित जीवन, खान-पान, विश्राम, निद्रा आदि से आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने सारनाथ में पहला उपदेश दिया।

हर अतिक्रमण के खिलाफ होनी चाहिए लगातार कठोर कार्रवाई


अशोक मिश्र

हरियाणा में सड़कों, बाजारों और गलियों में फैला अतिक्रमण अब एक आम दृश्य बन चुका है। चाहे शहर हो या कस्बा, लगभग हर जगह फुटपाथों पर दुकानें, ठेलों की कतारें, निर्माण सामग्री के ढेर और अनधिकृत निर्माण नजर आते हैं। इससे आम नागरिकों को रोजाना भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। सड़कें संकरी हो जाती हैं, यातायात जाम लगता है और पैदल चलने वालों के लिए जगह नहीं बचती। 

बाजारों में खरीदारी के दौरान भीड़ और अव्यवस्था के कारण समय और मेहनत दोनों बर्बाद होते हैं। यह समस्या सिर्फ व्यवस्था की नहीं है, यह सीधे तौर पर जनजीवन, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी है। सड़कों पर दुकानदारों द्वारा सामान बाहर तक लगा देना, रेहड़ी-पटरी वालों का स्थायी रूप से एक ही जगह घेर लेना, मकान मालिकों द्वारा रैंप और चबूतरे को सड़क तक बढ़ा देना और बिल्डरों द्वारा पार्किंग की जगह पर दुकानें बना देना, ये सब इसी अतिक्रमण के अलग-अलग रूप हैं। 

परिणाम सामने है। सड़कों की चौड़ाई आधी रह जाती है। दो गाड़ियों के निकलने की जगह पर एक भी मुश्किल से निकल पाती है। पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ बचा ही नहीं, इसलिए वे सड़क पर चलने को मजबूर होते हैं और यही छोटी सी लापरवाही बड़े सड़क हादसों का कारण बन जाती है। एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपात सेवाएं जाम में फंस जाती हैं। बाजारों की स्थिति और भी बदतर है। त्योहारों पर तो आलम यह होता है कि ग्राहक दुकान तक पहुंच ही नहीं पाता है। 

भीड़, अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग मिलकर खरीदारी को एक सजा बना देते हैं। बेरोजगारी, बढ़ती आबादी और शहरी योजनाओं की कमी इन प्रवृत्तियों को और मजबूत बनाती है। इनके खिलाफ कार्रवाई सख्त और निरंतर होनी चाहिए। नगर निगम और नगर महापालिका को नियमित अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाना चाहिए। उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाना, बार-बार दोषी पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई करना और जरूरत पड़ने पर निर्माण सामग्री या सामान जब्त करना आवश्यक है। 

ऐसा नहीं है कि जिलों में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है, लेकिन जो होती है, वह ज्यादातर दिखावटी और मौसमी होती है। अगर प्रशासन लगातार निगरानी रखे, दोषियों को समान रूप से सजा दे और वैकल्पिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तो स्थिति में सुधार संभव है। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी कि सार्वजनिक जगह किसी की निजी संपत्ति नहीं है। जब तक समाज में यह चेतना नहीं आएगी कि अतिक्रमण न केवल अवैध है बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन भी है, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। हरियाणा जैसे विकासशील राज्य में अगर शहरी प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए और नियमों को बिना भेदभाव लागू किया जाए तो सड़कें, बाजार और गलियां फिर से सुचारु और सुरक्षित हो सकती हैं।

Thursday, September 24, 2026

मुझे इसकी लीला देखने का सुयोग नहीं मिलेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ, तो पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन ने राज महल को पूरी तरह सजाया। दूर-दूर से राजा, सामंत, श्रेष्ठि और नागरिक राज कुमार सिद्धार्थ के दर्शन करने और आशीर्वाद देने आए। महाराज शुद्धोदन और महारानी महामाया अत्यंत प्रसन्न थे। महात्मा बुद्ध से जुड़े कुछ ग्रंथों के मुताबिक लुंबिनी में एक उद्यान में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ था और उनकी मां महामाया की तत्काल मृत्यु हो गई थी। 

ज्यादातर लोग मानते हैं कि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद उनकी मां की मृत्यु हुई थी। खैर, राजकुमार सिद्धार्थ को देखने जब दूर-दूर से लोग आ रहे थे, तो उन्हीं दिनों हिमालय से एक वृद्ध साधु उन्हें देखने आया। जब नवजात सिद्धार्थ को उस साधु के सामने लाया गया। पिता ने साधु के चरणों में सिद्धार्थ को रखते हुए कहा कि महात्मन! इस बच्चे को आशीर्वाद दें कि यह यशस्वी हो, दीर्घायु हो, प्रतापी हो। 

साधु पहले तो कुछ क्षण तक निर्निमेष उन्हें देखता रहा और फिर वह फूट-फूटकर रोने लगा। महाराज शुद्धोदन यह देखकर घबरा गए। उन्होंने आशंकित होकर साधु से पूछा, कुछ अपशकुन की आशंका है क्या, मान्यवर। आप मुझे बताएं क्या बात है? महाराज की बात सुनकर कुछ देर तक चुप रहा और फिर बोला, महाराज! किसी प्रकार के अपशकुन की आशंका नहीं है। आप चिंतित न हों। 

मैं तो यह सोचकर रो रहा हूं कि जिसे खोजते-खोजते सारी उम्र बीत गई, उसका जन्म अब हो रहा है। मैं इस बालक की लीलाओं को नहीं देख पाऊंगा। मैं इनके चरणों में बैठकर आत्म ज्ञान हासिल नहीं कर पाऊंगा, यही सोचकर मुझे रोना आ गया। महाराज, आप धन्य हैं जो ऐसे यशस्वी बालक के पिता हैं। यह कहकर साधु चला गया।

हरियाणा में नार्को टेरर नेटवर्क का पर्दाफाश एटीएस की बड़ी सफलता


अशोक मिश्र

हरियाणा एंटी टेररिस्ट स्क्वाड ने बहुत ही काबिले तारीफ काम किया है। उसने देश के सामने एक अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा  किया है। घटना 13 सितंबर 2026 की है। इस दिन सुबह पंचकूला के सेक्टर-11 स्थित अलिफ लैला क्लब में फायरिंग हुई। फायरिंग में एक युवती घायल हुई। पुलिस ने मामले की जब जांच शुरू की, तो मामला पहले आपसी झगड़े का लगा, लेकिन जब हरियाणा पुलिस की जांच आगे बढ़ी, तो सारी परतें खुलती चली गईं। इस जांच को गंभीरता को देखते हुए एंटी टेररिस्ट स्क्वाड को जिम्मा सौंपा गया। वहीं से अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा हुआ। 

एटीएस ने अब तक तीन मौके से, एक एसएएस नगर से और तीन लुधियाना से कुल मिलाकर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि आरोपी अमेरिका सहित विदेश में बैठे हैंडलरों के निर्देश पर काम कर रहे थे। ये हैंडलर स्थानीय लोगों को रहने की जगह, वाहन और पैसा उपलब्ध कराते थे ताकि सीमा पार से ड्रोन के जरिए आने वाले नशीले पदार्थों, हथियारों और ड्रग मनी को निर्धारित जगहों तक पहुंचाया जा सके।  यह घटना बताती है कि नार्कोटिक्स का कारोबार और आतंकी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ गई हैं। 

नशीले पदार्थों की तस्करी से कमाए गए पैसे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों और हथियारों की खरीद में हो रहा है। स्थानीय नार्को कारोबारी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़कर आतंकियों के लिए काम कर रहे हैं या उनके साथ मिलकर साझा हित साध रहे हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सिर्फ छापेमारी काफी नहीं है। यह बात हरियाणा एटीएस भी जानती है। इसलिए एटीएस ने सबसे पहले फाइनेंशियल और ड्रोन ट्रेल को तोड़ने जैसा काम शुरू किया है। सप्लाई चेन, हथियार के स्रोत और विदेशी हैंडलरों के पैसे का रास्ता खंगाला जा रहा है। 

दूसरी ओर एटीएस ने दक्षिण हरियाणा के नूंह, पलवल, फरीदाबाद, गुरुग्राम बेल्ट में इंटेलिजेंस को मजबूत करना शुरू कर दिया है, जहां सीसीटीवी, किराएदार सत्यापन और साइबर पेट्रोलिंग को एक साथ क्रियान्वित करना शुरू कर दिया है। फरीदाबाद के अल-फलाह जैसे संस्थानों में अपनी जड़ें जमा रहे आतंकियों के मामले दिखाते हैं कि पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी ऑनलाइन ग्रूमिंग का शिकार हो रहे हैं, इसलिए मदरसों, यूनिवर्सिटीज और यूट्यूब इन्फ्लुएंसर इकोसिस्टम पर निगरानी के साथ-साथ सामुदायिक पुलिसिंग जरूरी है। 

एटीएस ने इस पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। हरियाणा एटीएस का गठन जून 2026 में हुआ। यह सीआईडी के अधीन काम करता है। पंचकूला तथा गुरुग्राम में इसके केंद्र हैं। इसमें एनएसजी जैसी कमांडो फोर्स, इंटेलिजेंस विंग, जांच इकाई और काउंटर-रैडिकलाइजेशन सेल शामिल हैं। गठन के कुछ ही महीनों में पंचकूला क्लब फायरिंग मामले में नार्को-टेरर नेटवर्क का पदार्फाश इसकी पहली बड़ी सफलता है। 


Wednesday, September 23, 2026

और राज कुमार बदल गया



बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के ही जीवनकाल में एक राजा था। वह बहुत ही दयालु और प्रजापालक था। उसकी महारानी भी अपने महाराज के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी। लेकिन इस राज दंपति को एक ही कष्ट था। उनका पुत्र बहुत ही क्रूर और उदंड था। वह अपनी मनमानी हरकतों से पूरी प्रजा को परेशान किए रहता था। राजा ने उसे बहुत सुधारने की कोशिश की। 

महारानी भी अपने पुत्र को समय समय पर सुधारने का प्रयत्न करती रहती थी। राज्य की प्रजा को अपने राजा और महारानी से बहुत प्रेम था, लेकिन वह राजकुमार से घृणा करती थी। राज्य की जनता में राजकुमार के प्रति विरोध बढ़ता जा रहा था। किसी तरह यह बात महात्मा बुद्ध के कानों तक पहुंची। उन्होंने राजकुमार को सुधारने का फैसला किया। वह उस राजा के राज्य में पहुंचे। 

महात्मा बुद्ध ने राज कुमार को अपने पास बुलाने की अपेक्षा खुद उसके पास पहुंचे। राजा-रानी ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया। मौका देखकर बुद्ध ने राज कुमार बातचीत करते हुए टहलने लगे। वह टहलते-टहलते एक नीम के पौधे के पास पहुंचे और राज कुमार से कहा कि तुम इस पेड़ के पत्ते को देखो तो कैसा है? राज कुमार ने नीम का एक पत्ता तोड़कर मुंह में डाला। चबाते ही उसने क्रोध में आकर उस पौधे को जड़ से उखाड़ डाला।

 महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस पौधे क्यों उखाड़ डाला? राज कुमार ने कहा कि जब यह पौधा है, तो इतना कड़वा है। बड़ा होगा, तो यह विष की तरह कड़वा होगा। महात्मा बुद्ध ने कहा कि यदि तुम्हारे व्यवहार से क्रुद्ध होकर जनता भी वैसा व्यवहार करे, जैसा तुमने नीम के साथ किया है, तो क्या होगा? यह सुनकर राज कुमार अवाक रह गया। उसकी समझ में आ गया था कि महात्मा बुद्ध उसे क्या समझाना चाहते हैं। उसी दिन से राजकुमार बदल गया।

अरावली क्षेत्र में शोर शराबा करने वाले बाइक राइडर्स पर अंकुश जरूरी

अशोक मिश्र

सेव अरावली जैसी संस्थाओं ने अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए सराहनीय कार्य किया है। इस संस्था ने अब फरीदाबाद पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर अरावली क्षेत्र के शांत और संवेदनशील वन क्षेत्र में वीकेंड पर स्टंट करने और मॉडिफाइड बाइकों से तेज आवाज करने वाले राइडर्स ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनकी यह मांग जायज भी है। इन बाइक राइडर्स की वजह से अरावली क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। अरावली पर्वत श्रृंखला जो लगभग 150 करोड़ वर्ष पुरानी है, गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक फैली हुई है। 

यह पाँच राज्यों के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करती है। थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकना, मानसून को थामना, भूजल स्तर को बनाए रखना और दिल्ली-एनसीआर जैसे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र के लिए फेफड़ों का काम करना, ये सभी कार्य अरावली करती है। लेकिन आज जो व्यवस्था पूरे उत्तर-पश्चिम भारत को प्रदूषण से बचा रही थी, वही खुद वायु प्रदूषण, धूल, अवैध खनन, कचरा डंपिंग और सबसे नया खतरा ध्वनि प्रदूषण का शिकार बन रही है। खनन, अतिक्रमण, शहरीकरण और बढ़ते मानवीय दबाव के अलावा हाल के वर्षों में सप्ताहांत पर आने वाले ग्रुप बाइकर्स का शोर-शराबा भी इसके संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। 

ट्रस्ट का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर से बड़ी संख्या में आने वाले ये बाइकर्स लगातार हॉर्न बजाते, मॉडिफाइड साइलेंसर से तेज आवाज निकालते और अत्यधिक गति से दौड़ते हुए वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास में ध्वनि प्रदूषण, व्यवधान, भय और तनाव पैदा करते हैं। आसपास के गांवों में भी बुजुर्गों और ग्रामीणों को इससे परेशानी होती है तथा सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। वन्य जीवों पर इस तरह के शोर का प्रभाव बहुआयामी होता है। जानवर शोर को खतरे के संकेत के रूप में ग्रहण करते हैं। वे पहले सतर्क होते हैं, फिर स्थिति का आकलन करते हैं और अंतत: भाग खड़े होते हैं। 

वैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया है कि लगातार ध्वनि प्रदूषण से वन्य जीवों में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता घटती है, हृदय गति बिगड़ती है और वे अपना प्राकृतिक आवास छोड़कर आबादी वाले इलाकों की ओर भागने लगते हैं। आवागमन बढ़ने से सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ती है, जिससे धूल उड़ती है, मिट्टी का कटाव होता है, वनस्पति नष्ट होती है और वन्य जीव गलियारे खंडित हो जाते हैं। सेव अरावली जैसी संस्थाओं की मांगें इस दिशा में दबाव बना रही हैं कि सामान्य यातायात नियमों से आगे बढ़कर पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाए जाएं। 

बढ़ते आवागमन और शोर से होने वाले सूक्ष्म लेकिन दीर्घकालिक नुकसान को भी गंभीरता से लिया जाना आवश्यक है, ताकि यह पर्वतमाला न केवल मानव आबादी बल्कि वन्य जीवों के लिए भी सुरक्षित बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा तथा संतुलित पर्यावरण उपलब्ध कराया सके।


Tuesday, September 22, 2026

मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ के संबंध में यह बहुप्रचलित घटना है। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन की दो पत्नियां थीं, महामाया और महाप्रजापति गौतमी। महामाया और गौतमी दोनों सगी बहनें थीं। महामाया ने एक ही पुत्र सिद्धार्थ को जन्म दिया था और कुछ ही दिनों बाद उनकी मौत हो गई थी, जबकि गौतमी ने पुत्र नंद और पुत्री नंदा को जन्म दिया था। एक बार की बात है। 

राजकुमार सिद्धार्थ राजवन में टहल रहे थे। उनके साथ मंत्री पुत्र देवदत्त भी था। इतने में सिद्धार्थ ने राजहंसों को आकाश में उड़ते हुए देखा। उन्होंने देवदत्त से कहा कि देखो, राजहंस आकाश में विचरते हुए कितने सुंदर लग रहे हैं। यह देखकर देवदत्त ने अपने तरकश से तीर निकाला और धनुष पर चढ़ाकर प्रत्यंचा खींच दी। तीर जाकर आकाश में उड़ रहे एक राजहंस के लगा और वह जमीन पर आ गिरा। 

घायल हंस को देखकर सिद्धार्थ का मन चीत्कार कर उठा। वह आंखों में अश्रु लिए उस हंस के पास पहुंचे और उसे उठाकर तीर निकाला और उसे बचाने का जो भी उपाय संभव था, वह किया। देवदत्त ने हंस पर अपना अधिकार बताते हुए मांगा। राजकुमार सिद्धार्थ ने हंस को देने से मनाकर दिया। राजपुत्र होने से देवदत्त उस समय तो सिद्धार्थ से कुछ नहीं कह सका, लेकिन उसने हंस पर अधिकार जताने के लिए राजा के यहां मामला पहुंचा दिया। राजदरबार में दोनों ने अपना-अपना पक्ष रखा। 

सिद्धार्थ ने कहा कि मारने वाले से बचाने वाले का अधिकार ज्यादा होता है। अपने ही पुत्र का मामला होने से राजा शुद्धोदन फैसला नहीं कर पा रहे थे। अंत में उन्होंने हंस को मंगाया और उसे राज दरबार में छोड़ दिया। कहा कि यह हंस जिसके पास चला जाएगा, हंस पर उसका अधिकार होगा। अंतत: हंस सिद्धार्थ के पास गया और इस तरह हंस पर राजकुमार सिद्धार्थ का अधिकार हुआ।