बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
हमारे पास मित्र कितने है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन तमाम मित्रों में से सच्चा मित्र कौन है, इससे फर्क पड़ता है। इसीलिए कहा जाता है कि किसी से भी मित्रता करते समय उसकी सच्चाई और मित्र के प्रति प्रेम कितना है, यह देखना चाहिए। मित्र सद्गुणी हो, तभी मित्रता करनी चाहिए। सच्चा मित्र संकट के समय साथ नहीं छोड़ता है।एक कथा है। किसी नगर में एक बुजुर्ग व्यक्ति रहता था। उसके पुत्र को अपने मित्रों पर बहुत गर्व था। उसके कई मित्र थे। लेकिन उसके पिता का एक ही मित्र था। बेटा जब भी बात चलती, तो वह अपने मित्रों की बड़ाई करते हुए थकता नहीं था। वह अपने पिता का उपहास भी उड़ाता था कि उनके एक ही मित्र है। एक दिन पिता ने अपने बेटे से कहा कि चलो, हम दोनों अपने अपने मित्र की परीक्षा लेते हैं। बेटा तैयार हो गया।
पिता-पुत्र दोनों बेटे के घर में रात के दो बजे पहुंचे। बेटे ने अपने दोस्त का दरवाजा खटखटाया। कई बार आवाज दी। लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई। कुछ देर बाद बेटे ने फिर दरवाजा खटखटाते हुए अपने मित्र का नाम लेकर आवाज दी। अंदर से बेटे के मित्र ने अपनी मां से कहा कि कह दो, मैं घर पर नहीं हूं। बेटा बहुत निराश हो गया। उसके बाद उसका पिता अपने दोस्त के घर ले गया।
दरवाजा खटखटाया, तो दो मिनट बाद अंदर से आवाज आई, रुको मित्र! दरवाजा खोलता हूं। दरवाजा खुलते ही पिता-पुत्र ने देखा कि दरवाजा खोलने वाले के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी। पिता ने अपने मित्र से पूछा, यह क्या है? मित्र ने जवाब दिया कि इतनी रात को आए हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें पैसे की जरूरत है। या फिर तुम्हारी किसी से लड़ाई हो गयी है। अगर पैसे की जरूरत है, तो यह थैली ले जाओ। यदि किसी से लड़ाई हुई है, तो यह तलवार लेकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूं। यह सुनकर पुत्र की समझ में मित्रता की परिभाषा आ गई।
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