बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
सेवा भावना ग्रंथों या पुस्तकों से नहीं उपजती है। सेवा करने के लिए किसी विशेष अवसर की भी जरूरत नहीं होती है। जब भी मौका मिले, सेवा जरूर करनी चाहिए। प्राचीनकाल में एक संत ने बच्चों में सेवा भावना जगाने के लिए एक विद्यालय खोला। उनके विद्यालय खोलने का उद्देश्य ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण करना था, जो समाज की सेवा कर सकें।उन्होंने अपने विद्यालय में बच्चों को सभी विषयों की शिक्षा देने के साथ-साथ लोगों की सेवा करने की भी प्रेरणा दी। वह हर विद्यार्थी से यही उम्मीद करते थे कि वह सभी जीव जंतुओं की सेवा करेगा। विद्यालय चलते हुए काफी दिन बीत गए थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि यह देखा जाए कि हमारे शिष्यों ने अब तक कितना सीखा है। उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। वाद-विवाद का विषय था-जीवों पर दया और प्राणी मात्र की सेवा।
प्रतियोगिता शुरू हुई। किसी ने कहा कि प्राणी मात्र की सेवा के लिए संसाधनों का होना बहुत जरूरी है। जीवों पर भी दया करने के लिए इंसान में सेवा भावना का होना बहुत जरूरी है। कुछ विद्यार्थियों ने इसके विपरीत मत व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सेवा के लिए केवल भावना होनी चाहिए, संसाधन अपने आप जुट जाते हैं। जब प्रतियोगिता के पुरस्कार का समय आया, तो संत ने एक ऐसा छात्र को विजेता घोषित किया जो उपस्थित नहीं था।
सबने इसका विरोध किया, तब संत ने कहा कि मैंने प्रतियोगिता के समय जानबूझकर एक घायल बिल्ली को द्वार पर छोड़ दिया था। सबने उस बिल्ली को देखा और अंदर आ गए, लेकिन एक छात्र ने उस बिल्ली की सेवा की, उसके घाव पर औषधि का लेप किया। कुछ स्वस्थ होने पर वह बिल्ली को सुरक्षित जगह पर छोड़ आया। ऐसे में आप लोग बताएं पुरस्कार का विजेता कौन है? यह सुनकर सबके सिर शर्म से झुक गए।
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