Saturday, June 13, 2026

मैंने तीनों को पिंजरे से स्वतंत्र कर दिया


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गुलामी किसी को पसंद नहीं होती है। वह चाहे इंसान हो या जीव-जंतु। दुनिया भर में लोगों को पशु और पक्षियों को पालने का शौक होता है। वह किस्म-किस्म के जानवरों और पक्षियों को पालते हैं। उन्हें पिंजरे या कमरे में रखते हैं। यदि सच कहा जाए, तो यह प्रवृत्ति इन पशु-पक्षियों के स्वतंत्र जीवन जीने के अधिकार का हरण है। 

किसी नगर में एक व्यक्ति रहता था। उसका एक किशोर बेटा था। वह व्यक्ति काफी धनवान था। रुपये पैसे की कमी नहीं थी, तो वह अपने बेटे की हर मनोकामना को पूरा करने का प्रयत्न करता था। एक दिन की बात है। वह आदमी जब अपने काम से घर लौटा, तो उसके बेटे ने पूछा, पिता जी, यह जानवर, पशु-पक्षी हमारे दोस्त नहीं हो सकते हैं क्या? उस व्यक्ति ने कहा, क्यों नहीं हो सकते हैं। इनसे दोस्ती करना बहुत अच्छी बात है। 

पुत्र ने कहा कि पिता जी, मैं घर में आने वाली गिलहरियों, चिड़ियों, तोतों के साथ दोस्ती करना चाहता हूं, लेकिन जैसे ही मैं इनके पास जाने की कोशिश करता हूं, यह उड़ जाती हैं। पिता ने अपने पुत्र से कहा कि मैं कल तुम्हारे लिए कुछ दोस्त लेकर आऊंगा। जब तुम्हारा मन हो उनके साथ तुम खेलते रहना। 

यह सुनकर बेटा बहुत खुश हुआ। अगले दिन पिता अपने पुत्र के लिए तीन पिंजरे लाया जिसमें तोता, कबूतर और गौरेया बंद थीं। बेटा काफी खुश हुआ। उसने पूछा कि पिता जी यह सब उदास क्यों हैं? पिता ने कहा कि कुछ दिन बाद यह उदास नहीं रहेंगी। यह नई-नई पिंजरे में आई हैं, इसलिए उदास हैं। 

दो दिन बाद पिता ने देखा कि तीनों पिंजरे खाली हैं। उसने पुत्र से पूछा, तो पुत्र ने कहा कि यह सब पिंजरे में रहने की वजह से उदास थीं, तो मैंने उन्हें स्वतंत्र कर दिया। स्वतंत्र होने के बाद काफी देर तक पेड़ पर बैठकर वह तीनों चहकते रहे।

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