बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
इंसान अगर संतोषी हो, तो उसे किसी भी अवस्था में नींद आ सकती है। वह कहीं भी सो सकता है,लेकिन यदि संतोष नहीं है, तो उसे राजसी पलंग पर भी नींद नहीं आएगी। एक बार की बात है। एक साधु घूमते-घूमते किसी शहर में पहुंच गया। शहर में प्रवेश करते समय रात हो गई थी। सर्दी के दिन थे। लोग अपने घर का दरवाजा बंद करके सोने चले गए थे। अब रात में साधु किसके घर का दरवाजा खटखटाता।उसके पास ओढ़ने का कपड़ा भी नहीं था। उसने आसपास नजर दौड़ाई, तो भड़भूजे की दुकान नजर आई। भड़भूजे की भट्ठी थोड़ी गर्म थी। सो, साधु ने सोचा कि इसी भट्ठी में किसी तरह रात गुजार लूं। वह उसी में सो गया। संयोग से पास में ही राजा का महल भी था।
सुबह उठते ही राजा ने अपने नौकरों से पूछा, रात कैसे बीती? तब तक साधु भी जाग गया था। उसने राजा का प्रश्न सुना, तो बोला, कुछ तुम्हारे जैसी, कुछ तुम्हारे से अच्छी। राजा ने फिर एक बार यही प्रश्न दोहराया। साधु ने फिर वही उत्तर दिया। राजा चकित रह गया कि यह कौन है, जो उसके सवालों का उत्तर दे रहा है। राजा ने कहा कि सवालों का जवाब देने वाले को यहां ले आओ।
सैनिक साधु को खोजते हुए जब भट्ठी के पास पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि आपको राजा ने बुलाया है। साधु के शरीर में राख और कालिख लगी हुई थी। राजा ने पूछा कि मेरे जैसी और मेरे से बेहतर रात कैसे बीती? साधु ने कहा कि आप राज महल में नर्म बिस्तर पर सोए। मैं भट्ठी की गर्म राख पर सोया। हम दोनों जब सो गए, तो एक समान हो गए। सुबह उठते ही आपको राज्य की चिंता सताने लगी, जबकि मैं जब सुबह उठा, तो चिंता मुक्त था। सो मेरी रात आपसे अच्छी बीती। राजा साधु की बात सुनकर संतुष्ट हो गया।
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