Thursday, April 30, 2026

चिंता करने से केवल परेशानी बढ़ती है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जब हम किसी काम को बोझ समझते हैं, तो उस काम को करने में कई तरह की परेशानियां आती हैं और हम परेशान हो उठते हैं। काम में मन भी नहीं लगता है। लेकिन जब वही काम हम कर्तव्य समझकर करते हैं, तो भावना बदल जाती है। काम वही रहता है, लेकिन परिणाम बदल जाते हैं। 

यही वजह है कि कहा गया है कि हर काम को कर्तव्य समझकर करना चाहिए ताकि परिणाम बेहतर आए। एक किस्सा है कि किसी राज्य में अकाल पड़ गया। कई साल तक अकाल रहा। इसके नतीजा यह हुआ कि राजा को न तो किसानों से लगान मिला और न ही व्यापारियों से किसी प्रकार का टैक्स। इससे राजकोष भी लगभग खाली हो गया। राजा की यह हालत देखकर भूख-प्यास ही मर गई। 

अब उसे खाना अच्छा लगता था, न पानी। वह हरदम सोचता रहता था कि यदि किसी दुश्मन ने ऐसे समय में हमला कर दिया तो क्या होगा? अपने ही मंत्री ने दुश्मन से हाथ मिला लिया, तो कैसे हालात से निपटा जाएगा। पहले भी एक मंत्री को दुश्मन देश के राजा के साथ पकड़ा गया था। एक दिन महल में राजगुरु आए और उन्होंने राजा की दशा देखकर कहा कि ऐसा करो, राजपाट मुझे सौंप दो। तुम मेरे कर्मचारी की तरह काम करो। 

इसके बाद राजा की हालत बदल गई। अब उसे भूख भी लगने लगी। नींद भी आने लगी। काफी दिन बीत गए। एक दिन राजगुरु फिर राजमहल पधारे। उन्होंने कहा कि राजन! पहले तुम हर काम को बोझ समझकर करते थे, तो चिंता में पड़े रहते थे। लेकिन जैसे ही तुमने राजकाज को कर्तव्य समझकर करना शुरू किया, कई तरह की चिंताएं मिट गईं। चिंता करने से केवल परेशानी बढ़ती है। समाधान खोजने से ही कार्य हल होते हैं।

हरियाणा के 1338 स्कूलों में नर्सरी कक्षा में एक भी प्रवेश नहीं


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने विश्वविद्यालयों में शिक्षा सुधार के लिए विभागाध्यक्षों से पांच साल की प्राथमिकताएं तय करने का निर्देश दिया है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने पांच साल में पांच लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य भी रखा है। उच्च शिक्षा में सुधार लाने की कोशिश करने वाली सरकार को नर्सरी और प्राइमरी शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। 

कुछ दिन पहले हरियाणा की सैनी सरकार ने एक अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच पूरे प्रदेश में प्रवेश उत्सव मनाने का फैसला किया था। प्रवेश उत्सव के सहारे राज्य सरकार नर्सरी कक्षाओं में सौ फीसदी प्रवेश का लक्ष्य रखा था। आंगनबाड़ी केंद्रों और सरकारी स्कूलों में नर्सरी कक्षाओं में सौ प्रतिशत लक्ष्य रखकर प्रदेश के नौनिहालों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया था। शून्य ड्रापआउट के लक्ष्य के साथ-साथ नर्सरी कक्षा में प्रवेश लेने वाले बच्चों का स्वागत बैंडबाजे के साथ करने को कहा गया था। 

इसके लिए स्कूल को भी अच्छी तरह से सजाना था, इसके लिए स्कूल के हेड को पांच हजार रुपये का बजट भी दिया गया था। इसके बाद भी प्रदेश के 1338 स्कूलों में नर्सरी कक्षा में बच्चों का प्रवेश शून्य रहा। 1338 स्कूलों में  एक भी बच्चा प्रवेश लेने नहीं पहुंचा। उच्च शिक्षा में सुधार को तत्पर राज्य सरकार को प्रदेश के सरकारी स्कूलों पर भी ध्यान देना चाहिए। स्कूल चाहे निजी हो या सरकारी, किसी भी बच्चे के भविष्य की  आधारशिला नर्सरी और प्राइमरी कक्षाएं ही होती हैं। 

नर्सरी कक्षा में आने वाला बच्चा बिल्कुल खाली स्लेट की तरह होता है। इन बच्चों को जो पढ़ाया, सिखाया जाएगा, वही उनके भविष्य में काम आएगा। सरकारी स्कूलों की यह दशा साफ संकेत करती है कि नर्सरी में बच्चों का प्रवेश दिलाने का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया। सरकारी स्कूलों की छवि दिनों दिन हरियाणा की जनता के मन में खराब बोती जा रही है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि सरकारी स्कूलों में बैठने, शौचालय और अध्यापकों की कमी की वजह से पढ़ाई अच्छी नहीं होती है। यही कारण है कि लोग अपने खर्चों में कटौती करके निजी स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं।

निजी स्कूलों में सरकारी स्कूलों की अपेक्षा ज्यादा सुविधाएं होती हैं, लोगों के दिमाग में यह बात घर कर गई है। ऐसी स्थिति में सबसे जरूरी यह है कि प्रदेश के 1338 स्कूलों में लोगों ने अपने बच्चे का  एडमिशन कराने के बारे में क्यों नहीं सोचा, इसका पता लगाया जाए। इसके लिए अध्यापकों और अन्य लोगों को जमीनी स्तर पर उतरकर पता लगाना होगा। एक-एक बच्चे के घर जाकर उसके अभिभावकों से बात करनी होगी। जो भी बातें उभर कर सामने आएं, उसके अनुरूप नीतियां बनाकर फिर से प्रयास करना होगा। सरकार को भी इन स्कूलों में स्वच्छ पेयजल, शौचालय और  खेलकूद के लिए जगह और उपकरण की व्यवस्था करनी होगी।

Wednesday, April 29, 2026

देखना चाहता था कि तुम में कितना धैर्य है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर कोई काम धैर्य के साथ किया जाए, तो वह भले ही असंभव लगने वाला हो, आखिरकार पूरा हो ही जाता है। धैर्य के साथ-साथ लगन भी जरूरी होता है। यदि इन दोनों गुणों का समावेश हो जाए, तो व्यक्ति जीवन में काफी सफल हो जाता है। कहते हैं कि जिस व्यक्ति में थोड़ा सा भी धैर्य नहीं होता है, वह जीवन में कोई भी काम सफलतापूर्वक नहीं कर सकता है। 

एक बार की बात है। किसी राज्य में एक गुरुकुल चलता था। वहां काफी संख्या में बच्चे पढ़ते थे। गुरुकुल के आचार्य की बहुत अधिक ख्याति थी। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों के धैर्य की परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने बांस से बनी कुछ टोकरियां मंगाई और अपने शिष्यों को देते हुए कहा कि इन टोकरियों में पानी भरकर लाओ। आश्रम की सफाई करनी है। बांस की टोकरियों को देखकर सारे शिष्य आश्चर्यचकित रह गए।  

उन्हें आचार्य का आदेश विचित्र तो लगा, लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकते थे। अत: वह पास में बहने वाली नदी में गए और उन्होंने टोकरियों में पानी भरा। लेकिन पानी तुरंत ही बहकर निकल गया। सारे शिष्यों ने कई बार प्रयास किया, लेकिन विफल होने पर वह आचार्य के पास लौट आए। उन्होंने कहा कि आचार्य जी, इन टोकरियों में पानी कैसे भरा जा सकता है। 

आचार्य ने देखा कि एक शिष्य वापस नहीं आया था। उन्होंने कहा कि तुम सब इंतजार करो। वह शिष्य नदी से पानी भरने का प्रयास शाम तक करता रहा। इससे पानी में भीगते-भीगते बांस फूल गया और सारे छेद बंद हो गए। जब उसने पानी भरा तो वह नहीं निकला। यह देखकर वह प्रसन्न हुआ और पानी लाकर आचार्य के सामने रख दिया। तब आचार्य ने कहा कि यही तुम लोगों परीक्षा थी। मैं देखना चाहता था कि तुम लोगों में कितना धैर्य है। इस परीक्षा में केवल एक शिष्य ही सफल हुआ।

सड़क पर चलने वालों की जान जोखिम में डालते तेज रफ्तार वाहन


अशोक मिश्र

तेज रफ्तार गाड़ियां सड़कों पर चलने वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित होती जा रही हैं। तेज रफ्तार वाहन से दो तरह के खतरे होते हैं। एक तो जो तेज रफ्तार में वाहन चला रहा होता है, उसकी जान खतरे में होती है। वहीं सड़क पर चलने वाले दूसरे लोग भी खतरे में ही होते हैं। तेज रफ्तार वाहन कब किसी को कुचल दे, किसी वाहन को टक्कर मार दे, इसका पूर्वाभास नहीं होता है। 

आजकल के युवा अपने वाहन को तेज रफ्तार में ही चलाना पसंद करते हैं। नतीजा यह होता है कि वह खुद तो घायल होते ही हैं, दूसरों की जान भी जोखिम में डालते हैं। फरीदाबाद में खेड़ी पुल थाना के अंतर्गत आने वाले कच्चा खेड़ी रोड पर एक महिला अपने दो साल के बच्चे का हाथ पकड़कर पैदल जा रही थी। पीछे से तेज रफ्तार में आ रहे कार चालक ने लापरवाही से बच्चे को टक्कर मार दी। गाड़ी का अगला पहिया बच्चे के सिर से गुजर गया। बच्चे की तत्काल मौत हो गई। 

फरीदाबाद के ही गदपुरी थाने के पास तेज रफ्तार में आगे जा रहे ट्रक ने अचानक ब्रेक मार दी जिससे पीछे से आ रहा आटो बड़ी तेजी से ट्रक से टकरा गया। इस टक्कर में आटो में बैठे एक बुजुर्ग की मौत हो गई। फरीदाबाद के ही समयपुर चुंगी के पास तेज रफ्तार कैंटर ने आगे चल रही बाइक को टक्कर मार दी जिससे बाइक सवार महिला सड़क पर गिर पड़ी और टैंकर महिला के सिर के ऊपर से गुजर गया। पलवल के पृथला गांव के समीप राष्ट्रीय राज मार्ग 19 पर बाइक और पिकअप की टक्कर में बाइक चालक के साथ-साथ दो मासूम बच्चियों की मौत हो गई। 

होडल गे गांव गढ़ी पट्टी में तेज रफ्तार ट्रैक्टर चालक ने बाइक को पीछे से टक्कर मार दी। इस टक्कर की वजह से पानी लेने जा रहे दो भाइयों में से एक की मौत हो गई और दूसरा बुरी तरह घायल हो गया। यह सारी घटनाएं रविवार को ही हुई हैं। जब दो जिलों की यह हालत है, तो हरियाणा के सभी जिलों में होने वाले हादसों का अंदाजा लगाया जा सकता है। वाहन की स्पीड तेज होने की वजह से नुकसान भी बहुत ज्यादा होता है। कई बार तो इंसानी नुकसान बहुत ज्यादा हो जाता है।

एक्सप्रेस वे और फोरलेन सड़कों पर गलत साइड से वाहनों के आने पर रोक नहीं लग पा रही है। इससे सड़क हादसों पर रोक नहीं लग पा रही है। सड़कों की खराब दशा भी ज्यादातर सड़क हादसों के लिए जिम्मेदार है। एक्सप्रेस वे और फोरलेन सड़कों पर सौ-एक सौ बीस की स्पीड में दौड़ रहे वाहन के सामने जब अचानक कोई गाड़ी, इंसान या लावारिस पशु आ जाता है तो ऐसी स्थिति में वाहन को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में सड़क हादसे की आशंका काफी बढ़ जाती है। कई बार अचानक ब्रेक मारने से वाहन उलट जाता है या फिर सामने से आर रहे वाहन से टकरा जाता है। 

Tuesday, April 28, 2026

आचार्य नरेंद्र देव की सादगी और ईमानदारी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आचार्य नरेंद्र देव कांग्रेस में रहते हुए भी समाजवादी विचारधारा को मानते थे। उनका जन्म 30 अक्टूबर 1889 को सीतापुर जिले में एक खत्री परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम अविनाशी लाल खत्री था। उनके पिता के मित्र माधव प्रसाद मिश्र ने इनका नाम अविनाशी लाल से नरेंद्र देव रख दिया था। इनके पिता बलदेव प्रसाद अपने समय के सबसे बड़े वकील थे और कांग्रेस के नेता भी थे। 

देश में लोगों की गरीबी और बदहाली को देखकर किशोरावस्था में ही अविनाशी लाल के मन में समाजवादी विचारधारा घर कर गई थी। आचार्य नरेंद्र देव स्वाधीनता संग्राम सेनानी होने के साथ-साथ पत्रकार, साहित्यकार, पुरातत्व विशेषज्ञ और शिक्षाविद भी थे। बाद में वह मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति भी बनाए गए। एक बार की बात है। 

काशी में ही किसी काम से आचार्य नरेंद्र रिक्शे पर कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें उनके एक परिचित ने देखा, तो उसने रुकने के लिए आवाज दी। उस आदमी ने आचार्य से कहा कि आप रिक्शे से क्यों जा रहे हैं? तब आचार्य ने कहा कि मेरे जैसा मामूली  आदमी रिक्शे पर नहीं जाएगा तो किस पर जाएगा? उस आदमी ने कहा कि आपको तो विश्वविद्यालय की ओर से कार मिली है। 

फिर रिक्शे पर क्यों जा रहे हैं? उन्होंने कहा कि मेरे जैसा साधारण आदमी उसका खर्च नहीं वहन कर सकता है। और फिर, मैं अपने एक बीमार संबंधी को देखने जा रहा हूं। कार विश्वविद्यालय के कामों के लिए मिली है। मैं उसको अपने काम में कैसे इस्तेमाल कर सकता हूं। यह सुनकर वह आदमी उनकी सादगी और ईमानदारी पर मुग्ध हो गया। उसने उन्हें मन ही मन नमन किया और चला गया।

हरियाणा में दहेज की भेंट चढ़ती औरतों को कब मिलेगा न्याय?


अशोक मिश्र

देश में दहेज हत्या कोई नई बात नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक पूरे देश में रोज लगभग बीस से तीस महिलाएं दहेज की बलिवेदी पर चढ़ा दी जाती हैं। हरियाणा भी दहेज हत्या के मामले में अछूता नहीं है। राज्य में दहेज हत्याओं का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। तीन दिन पहले ही पलवल के किठवाड़ी गांव में विवाहिता और उसकी चार साल की बच्ची की निर्मम हत्या कर दी गई। 

मामला दहेज हत्या का बताया जा रहा है। मृतका के भाई का आरोप है कि उसकी बहन मितलेश की शादी साल 2020 में आरोपी धर्मवीर के साथ हुई थी। विवाह के कुछ ही दिनों बाद मितलेश का पति, देवर, सास ननदें जमीन और 25 लाख रुपये मायके से मांगकर लाने के लिए दबाव बनाते थे। मितलेश के साथ मारपीट भी की जाती थी। बार-बार उसे मायके से दहेज लाने के लिए प्रताड़ित किया जाता था। 

25 अप्रैल को ससुराल वालों ने मितलेश के साथ साथ उसकी चार साल की बच्ची की पीट-पीटकर हत्या कर दी। तीन महीने पहले पैदा हुए बेटे को लेकर पिता धर्मवीर फरार है। पुलिस मामले की सच्चाई पता लगाने की कोशिश कर रही है। हरियाणा में दहेज हत्या के मामलों में चिंताजनक आंकड़े सामने आ रहे हैं, जो राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध की गंभीरता को दर्शाते हैं। 

साल 2025 में प्रकाशित एनसीआरबी डेटा पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा में दहेज हत्या के 207 मामले दर्ज किए गए जबकि साल 2021 में दहेज हत्या के 275 मामले दर्ज किए गए थे। वहीं, साल 2020 में 251 और 2019 में 248 मामले सामने आए थे। हरियाणा में दहेज हत्या के अलावा पति या ससुराल वालों द्वारा महिलाओं के साथ क्रूरता (दहेज उत्पीड़न) के भी हजारों मामले सामने आते हैं, जो कई बार हत्या में बदल जाते हैं। दहेज उत्पीड़न और हत्या रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने कड़े कानून बना रखे हैं। इसके बावजूद प्रदेश में दहेज हत्याओं का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। 

दरअसल, प्राचीन काल में जब कोई अपनी बेटी का विवाह करता था, तो नवदंपति को अपनी गृहस्थी को व्यवस्थित करने के लिए लड़की का पिता या भाई अनाज, कपड़े, गृहस्थी के सामान आदि दूल्हे को देता था। यह सब कुछ करने का मकसद यह था कि नवदंपति को अपना वैवाहिक जीवन की शुरुआत में किसी प्रकार की परेशानी न हो। ऐसा करना भी कोई जरूरी नहीं था। लेकिन कालांतर में यही दाय भाग दहेज में कब परिवर्तित हो गया, किसी को पता ही नहीं चला। 

अब तो यह है कि लोग खुलेआम दहेज मांग लेते हैं और लड़की वालों को मजबूरन ऐसा करना पड़ता है। वैसे तो कानूनन दहेज मांगना और देना दोनों अपराध की श्रेणी में आते हैं, लेकिन लोग सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर लड़की वालों को दहेज देने पर मजबूर कर देते हैं।

Monday, April 27, 2026

मूर्ति ने हथौड़ी और छेनी का वार सहा है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमें किसी की उपलब्धि पर कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। कोई भी उपलब्धि या समाज में सम्मान कठिन परिश्रम और विपरीत परिस्थितियों में सघर्ष करने के बाद ही हासिल होती है। बिना किसी प्रकार का संघर्ष किए संयोगवश यदि कोई उपलब्धि हासिल हो जाती है, तो उस पर इतराना भी नहीं चाहिए। 

एक बार की बात है। एक देव प्रतिमा से एक पुष्प ईर्ष्या कर बैठा। उसकी समझ में यह नहीं आता था कि लोग मंदिरों में स्थापित प्रतिमा की पूजा क्यों करते हैं। जबकि वह उस मूर्ति से कहीं ज्यादा सुंदर और सुकोमल है। एक दिन जब मंदिर में मूर्ति पर फूल चढ़ाया गया, तो वह नाराज हो उठा। उसने रोष भरे स्वर में पुजारी से कहा कि तुम इस मूर्ति की पूजा क्यों करते हैं जबकि मैं उस मूर्ति से कहीं ज्यादा सुंदर, कोमल और दर्शनीय हूं। 

पुष्प की बात सुनकर पुजारी हंस पड़ा। उसने पुष्प से कहा कि वह पूज्य इसलिए है क्योंकि उसने मूर्ति बनने के दौरान पीड़ा झेली है। पहले वह एक बदरंग पत्थर था। मूर्तिकार की नजर पड़ने से पहले उसने न जाने कितनी बरसात, धूप, गर्मी और सर्दी बर्दाश्त किया। फिर मूर्तिकार ने उसे काटा छांटा। मूर्ति बनाने के लिए उस पर न जाने कितनी बार हथौड़ी और छेनी का वार सहा है। 

तब कहीं जाकर वह मूर्ति के रूप में ढला है। अगर वह टूट जाता, तो उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। और तुम्हें यह कोमलता, सुंदरता और खुशबू तो प्रकृति ने प्रदान किया है। इसके लिए तुम्हें किसी प्रकार का परिश्रम या संघर्ष नहीं किया है। ऐसी स्थिति में तुम बताओ, पूजा और आदर के योग्य कौन है? तुम या मूर्ति? यह सुनकर पुष्प चुप रह गया। उसकी समझ में यह बात आ गई कि सम्मान या उच्च पद प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

प्रचंड गर्मी में मजदूरों को काम कम मिलने से घर चलाना हुआ मुश्किल

अशोक मिश्र

पूरा देश तप रहा है। कई राज्यों में लू के थपेड़ों ने जनजीवन का अस्त-व्यस्त कर दिया है। बाहर निकलते ही ऐसा लगता है कि किसी ने भट्ठी सुलगा दी हो। इंसान से लेकर पशु-पक्षी तक व्याकुल हैं। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में तापमान 47.4 तक पहुंच गया है। भारत के पांच राज्यों के 14 शहरों में पारा 44 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है। दिल्ली में शनिवार दोपहर को पारा 42.8 डिग्री तक पहुंच गया। 

यह इस साल का सबसे गर्म दिन रहा। हरियाणा भी इससे अछूता नहीं है। सूरज की किरणें लोगों के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं। तापमान में भारी उछाल की वजह से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।  रोहतक में पारा 44.6 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा, जो सामान्य से 5.9 डिग्री अधिक है। रोहतक पूरे देश में छठा सबसे गर्म शहर रहा। प्रदेश के 13 प्रमुख शहरों में अधिकतम तापमान 42 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक रिकॉर्ड किया गया है । इनमें रोहतक (44.6 डिग्री), सिरसा (43.4 डिग्री), हिसार (42.9 डिग्री), नारनौल (42.8 डिग्री) और फरीदाबाद (43.5 डिग्री) जैसे शहर शामिल हैं। 

आशंका व्यक्त की जा रही है कि आने वाले दिनों में तापमान और बढ़ सकता है। प्रचंड गर्मी का सबसे ज्यादा खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ रहा है जो रोज कमाते हैं और खाते हैं। इतनी गर्मी में मजदूरों को काम मिलने में काफी दिक्कत हो रही है। इनके सामने समस्या यह है कि यदि इनको काम नहीं मिला तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा। मकान निर्माण में लगे मजदूरों को तो सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ रही है। मकान बनाने का काम धीमा पड़ रहा है। 

कई जगहों पर भीषण गर्मी न सह पाने और शरीर में पानी की कमी हो जाने की वजह से मजदूर बीमार पड़ गए हैं। गिग वर्कर्स की तो दोपहर में भी भागदौड़ करने के चलते हालत खराब हो रही है। वह लोगों तक सही समय पर अपनी डिलिवरी नहीं दे पा रहे हैं। इससे उन्हें ग्राहकों के साथ-साथ कंपनी वालों से सुनना पड़ता है। सड़कों के किनारे रेहड़ी लगाकर अपने परिवार का पेट पालने वाले भी परेशान हैं। भीषण गर्मी के कारण लोग घर से ही नहीं निकल रहे हैं। इससे उनकी कमाई पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा है। 

हरियाणा में पड़ रही प्रचंड गरमी के दौरान सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है। लोग गर्मी के कारण होने वाले रोगों से पीड़ित होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। चिकित्सकों का लोगों से यही कहना है कि घर से निकलने से परहेज करना चाहिए। यदि बहुत जरूरी काम हो, तो खाली पेज बाहर नहीं निकलें। थोड़ा सा ठोस खाद्य पदार्थ और पानी या छाछ जरूर पीकर निकलें। निकलते समय सिर पर गमछा या रुमाल जरूर डाल लें। शरीर को हलके कपड़ों से ढककर ही बाहर निकलें। चक्कर, कमजोरी या किसी तरह की परेशानी महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

Sunday, April 26, 2026

उसका विश्वास कैसे टूटने देता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यदि कोई व्यक्ति किसी का विश्वास तोड़ता है, तो वह सबसे अधम किस्म का प्राणी होता है। विश्वासघात करने वाले व्यक्ति की सच्चाई और ईमानदारी पर कभी कोई व्यक्ति भरोसा नहीं कर पाता है। आदमी वैसे तो किसी पर बहुत जल्दी विश्वास नहीं करता है, लेकिन अगर किसी कारणवश विश्वास कर लिया, तो उसका विश्वास नहीं तोड़ना चाहिए। एक बार की बात है। 

किसी राज्य में डाकुओं का एक दल रहता था। वह दल आने जाने वाले व्यापारियों को लूटता था और अपने खर्चे भर का रखकर बाकी धन वह गरीबों में बांट दिया करता था। डाकुओं का यह दल कभी किसी गरीब या असहाय को नुकसा नहीं पहुंचाता था। व्यापारियों या धनवानों को लूटते समय भी यही कोशिश करते थे कि किसी को चोट न पहुंचाई जाए। एक दिन उधर से व्यापारियों का एक दल गुजरा। 

उस दल में कई व्यापारी थे जिन्होंने बड़ी मेहनत से धन कमाया था। डाकुओं ने व्यापारियों के दल पर हमला किया और लूटपाट करने लगे। इसी बीच एक व्यापारी डाकुओं की निगाह बचाकर निकल भागा।  थोड़ी ही दूरी पर एक तंबू में घुसा और वहां बैठे साधु को रपयों और सोने-चांदी से भरी थैली को सौंपते हुए कहा कि आप इसे अपने पास रख लीजिए। कल आकर ले जाऊंगा। 

अगले दिन व्यापारी तंबू में पहुंचा तो देखा कि साधु बना व्यक्ति डाकुओं का सरदार है। वह लूटे गए धन को आपस में बांच रहा था। यह देखकर व्यापारी लौटने लगा। तब सरदार ने व्यापारी को आवाज लगाते हुए कहा कि तुम अपनी थैली ले जाओ। जैसी दे गए थे, वैसी ही रखी है। व्यापारी अपना धन लेकर चला गया तो डाकुओं ने सरदार से कहा कि आपने उसका धन क्यों लौटा दिया। सरदार ने कहा कि उसने विश्वास करके मुझे धन सौंपा था। उसका विश्वास कैसे टूटने देता।

यमुना नदी को अगले साल के आखिर तक प्रदूषण मुक्त बनाने की योजना


अशोक मिश्र

देश की सबसे प्रदूषित नदियों में पहला नाम यमुना नदी का है। दिल्ली और आगरा के बीच यमुना नदी का पानी तो छूने लायक भी नहीं रह जाता है। दिल्ली में ही 50 प्रतिशत से अधिक कचरा और औद्योगिक गंदगी मिल जाती है। यहाँ जहरीला फोम यानी झाग बनना आम है। किसी भी महीने में दिल्ली में यमुना नदी के किनारे पहुंच जाएं, तो पानी के ऊपर तैरता झाग दिख जाएगा। इस प्रदूषण के लिए अकेले दिल्ली ही जिम्मेदार नहीं है, इसके लिए हरियाणा भी जिम्मेदार है। 

यही वजह है कि हरियाणा सरकार समय समय पर यमुना नदी की सफाई को लेकर अभियान चलाती रहती है, लेकिन उसके अभियान को नदी में औद्योगिक कचरा और अन्य रासायनिक अपशिष्ट मिलाने वाले उद्योग नाकाम बना देते हैं। यमुना नदी की दशा और दुर्दशा से चिंतित मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने एक बार फिर अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वह नियमों का उल्लंघन कर यमुना में दूषित पानी छोड़ने वाले उद्योगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। 

यमुना नगर के कलेसर जंगल से लेकर पलवल के हसनपुर के बीच 320 से 328 किमी लंबाई में बहने वाली यमुना को प्रदूषण मुक्त करने का फैसला सैनी सरकार ने लिया है। यमुना नदी को लेकर आयोजित समीक्षा बैठक में सीएम सैनी ने अपना इरादा जाहिर करते हुए कहा कि राज्य सरकार अगले साल यानी 2027 के अंत तक यमुना नदी को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त बनाना चाहती है। इसके लिए जो भी कार्रवाई आवश्यक होगी, वह कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए सभी विभागों को आपसी सामंजस्य के साथ तेजी से कार्रवाई करनी होगी। 

आंकड़े बताते हैं कि इन दिनों यमुना नदी कैचमेंट एरिया में 1543 एलएमडी क्षमता के 91 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) संचालित हैं। इनमें से 41 एसटीपी पिछले पांच साल से संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा 11 नए एसटीपी का निर्माण किया जा रहा है। इससे यमुना कैचमेंट एरिया में प्रदूषित जलशोधन की क्षमता में बढ़ोतरी होगी। सीएम ने बैठक में यहां तक कहा कि यमुना नदी को साफ रखने के लिए जहां भी जरूरत होगी, वहां औद्योगिक अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र (ईटीपी) और सामान्य अपशिष्ट उपचार केंद्र (सीईटीपी) स्थापित किए जाएंगे। 

प्रदेश में ड्रेन नंबर छह समेत कई ड्रेन और 117 औद्योगिक इकाइयां यमुना नदी में प्रदूषित जल डाल रही हैं। इन्हें सरकार ने चिह्नित किया है। इन औद्योगिक इकाइयों सहित नालों से होकर यमुना में मिलने वाले प्रदूषित जल को रोकने के लिए अब कड़े कदम उठाए जाएंगे। अब औद्योगिक इकाइयों को एसटीपी से जोड़ना  अनिवार्य किया जाएगा। यमुना नदी में रासायनिक कचरा डालने या बहाने वाली इकाइयों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अवैध डिस्चार्ज पर इन इकाइयों पर जुर्माना लगाने या बंद कर देने का भी प्रदेश सरकार ने फैसला किया है।

Saturday, April 25, 2026

एकाग्रचित्त होकर लक्ष्य पर ध्यान दो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी विवेकानंद हमेशा हर काम को एकाग्रचित्त होकर करने का संदेश दिया करते थे। वह लोगों को जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से ही समझाने का प्रयास करते थे। वैसे स्वामी विवेकानंद खुद अपनी यात्रा के दौरान हुए अनुभवों से सीख लेते थे। 

उन पर विचार करते थे और उसके बाद अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते थे। वह संन्यासी होते हुए भी लोगों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने कई देशों की यात्राएं की थीं। वह जहां भी जाते थे, जिज्ञासु लोग उन्हें घेर लेते थे और धर्म की चर्चा करते थे। 

एक बार की बात वह किसी देश की यात्रा पर थे। वह लोगों से मिलते जुलते हुए घूम रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक पुल पर खड़े हुए कुछ लड़के बहते हुए अंडे के छिलके पर निशाना लगाने की कोशिश कर रहे हैं। उन सभी लड़कों में एक तरह की अघोषित प्रतियोगिता चल रही थी। 

किसी भी लड़के का सटीक निशाना नहीं लग रहा था। स्वामी विवेकानंद कुछ देकर तक लड़कों का यह कौतुक देखते रहे। फिर उन्होंने एक युवक से कहा कि लाओ, बंदूक मुझे दो। एक लड़के ने अपनी बंदूक स्वामी जी को थमा दी। स्वामी जी ने पहला निशाना साधा। एकदम सटीक निशाना लगा। 

इसके बाद उन्होंने दस निशाने लगाए, सारे निशाने सटीक लगे। लड़कों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि आपने यह कैसे कर लिया? स्वामी जी ने कहा कि जब तुम किसी काम को करो, तो अपना पूरा ध्यान उसी काम पर लगाओ। एकाग्रचित्त होकर यदि कोई काम करोगे, तो सफलता जरूर मिलेगी। पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर ही लगा दो। मैंने भी ऐसा ही किया। यही वजह है कि मेरे सारे निशाने ठीक लगे।

मंडियों में अव्यवस्था और गेहूं की धीमी उठान से किसानों में भारी रोष

अशोक मिश्र

हरियाणा में गेहूं की फसल लगभग पूरी तरह कट चुकी है। किसानों ने अपने परिश्रम को नकदी में बदलने के लिए मंडियों की ओर रुख करना बहुत पहले से शुरू कर दिया था। इन दिनों तो मंडियों में किसानों की आमद काफी तेज हो गई है। लेकिन तमाम दावों और वायदों के बावजूद मंडियों की व्यवस्था चरमरा कर रह गई है। किसान अपनी फसल को लेकर मंडियों में पहुंच रहे हैं, लेकिन उनके अनाज खरीदने के लिए या तो कर्मचारी  उपलब्ध नहीं हैं या फिर जो अनाज खरीद लिया गया है, उसकी उठान की कोई मुकम्मल व्यवस्था तक नहीं है। मंडियों की पूरी व्यवस्था अस्त-व्यस्त दिखाई देती है। राज्य भर की मंडियों में चारों ओर गेहूं ही गेहूं दिखाई पड़ रहा है।  प्रदेश की 14 मंडियों में हालात काफी बिगड़े हुए हैं। 

गेहूं का ढेर सड़कों और मंडियों में लगा हुआ है।  इस अनाज का कोई पुरसाहाल नहीं है। राज्यभर की मंडियों से अब तक जो आंकड़ा मिल रहा है, उसके मुताबिक राज्य मंडियों में अब तक 80.39 लाख मीट्रिक टन गेहूं की आवक हुई है। इसमें से 58.28 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद हुई है। बाकी अनाज अभी तक मंडियों में ही पड़ा हुआ है। जहां तक अनाज की उठान का मामला है, अभी तक कुल 30.14 लाख मीट्रिक टन का ही उठान हो पाया है। हालत यह है कि 12 अप्रैल को खरीदा गया गेहूं अभी तक उठाया नहीं गया है। 

आढ़ती एसोसिएशन के प्रधान रघुवीर चट्ठा का कहना है कि छह दिन पहले एसोसिएशन और किसानों ने मंडियों की अव्यवस्था को लेकर रोष जताया था। तब प्रशासन ने आश्वासन देते हुए कहा था कि पहले केंद्र की सड़कों से गेहूं उठाया जाएगा। इसके बाद प्लेटों से गेहूं उठान शुरू किया जाएगा। लेकिन हालत आज तक नहीं सुधर हैं। इससे आढ़तियों में काफी रोष है। 

उठान न होने की वजह से किसानों को भुगतान मिलने में भी देरी हो रही है। धीमी उठान की वजह से 11.3 प्रतिशत भुगतान किसानों को नहीं हो पाया है। किसान अपने खातों को बार-बार चेक करते हैं और फिर मायूस हो जाते हैं। अभी तक 6269.09 करोड़ रुपये में से कुल 2474.93 करोड़ रुपये का ही भुगतान हो पाया है। आढ़तियों का कहना है कि उठान प्रक्रिया जानबूझकर धीमी की जा रही है। 

इतना ही नहीं, आढ़तियों से प्रति कट्टा सात रुपये की अवैध वसूली की जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस तरह हर सीजन में लगभग पचास लाख रुपये का खेल किया जाता है। मंडियों में पैदा हुई अव्यवस्था के चलते आढ़तियों और किसानों में भारी रोष भी देखने को मिल रहा है। किसान संगठनों ने धीमी उठान और मंडियों में अव्यवस्था को लेकर आंदोलन की चेतावनी दी है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि वह ट्रांसपोर्टरों, माल ढुलाई और उठान से जुड़ी एजेंसियों पर कठोर कार्रवाई करे, ताकि काम में तेजी आए।

Friday, April 24, 2026

मेरे पास एक ही फटा पुराना वस्त्र है

फोटो साभार गूगल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अट्ठारहवीं शताब्दी में इसाइयत धर्मजागरण के क्षेत्र में सबसे ज्यादा चर्चित रहे संत जान वेस्ली का जन्म 17 जून 1703 में इंग्लैंड में हुआ था। वह एक पादरी, धर्मशास्त्री और ईसाई प्रचारक थे। उन्हें मेथोडिस्ट संप्रदाय का संस्थापक और जनक माना जाता है। उनके पिता सैमुअल वेस्ली और माता सुजाना वेस्ली धार्मिक प्रवृत्ति के थे। इसका प्रभाव जान वेस्ली पर भी पड़ा। 

उन्होंने अपने भाई चार्ल्स वेस्ली के साथ मिलकर एक होली क्लब भी बनाया था जिसमें वह नियमित प्रार्थना, बाइबिल का अध्ययन और लोगों के प्रति सदभाव रखना सिखाया करते थे। वह चर्च या किसी के घर में उपदेश देने की जगह खुले में उपदेश देना पसंद करते थे। एक बार की बात है। एक दिन जॉन वेस्ली अपने घर बैठे कुछ सोच रहे थे। तभी  उनके घर में काम करने वाली एक महिला आई। 

महिला उदास थी। उसकी परेशानी उसके चेहरे से झलक रही थी। जब वेस्ली ने उससे उदासी का कारण पूछा, तो उसने बताया कि उसके पास पहनने के लिए एक ही फटा पुराना वस्त्र है। इसकी वजह से वह बाहर नहीं निकल पाती है। यह बात सुनकर उन्होंने एक बार उस महिला के वस्त्रों को देखा और फिर उनकी नजर अपने कमरे में टंगे पर्दों पर गई। पर्दे काफी कीमती थे। 

महिला की दशा देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने उस महिला को वस्त्र खरीदने के लिए पैसे दिए। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य ही बना लिया दूसरों की मदद करने का। धीरे-धीरे  उन्होंने लोगों को यह कहना शुरू किया कि कमाओ, बचाओ और दान कर दो। उन्होंने अपनी भी संपत्ति काफी हद तक दान कर दी थी। यही वजह है कि ईसाई धर्मावलंबियों में वह आज भी याद किए जाते हैं।

हरियाणा को औद्योगिक हब बनाने की तैयारी में सैनी सरकार


अशोक मिश्र

कोई प्रदेश कितना समृद्ध और विकसित है, इसका पता उस प्रदेश में लगने वाले उद्योगों से चलता है। उद्योग ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यह रीढ़ जितनी मजबूत होगी, उस प्रदेश में उतने ही ज्यादा रोजगार के अवसर सृजित होंगे। राज्य में प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी होगी। ज्यादा से ज्यादा उद्योगों के लगने से लोग खुशहाल होंगे। 

अगर किसी राज्य को उद्योग लगाने वाले पूंजीपतियों और उद्यमियों को अपनी ओर आकर्षित करना है, तो उसे सबसे पहले अपने यहां सड़कों का बेहतरीन जाल बिछाना होगा। अच्छी क्वालिटी की सड़कें व्यापार और उद्योगों के लिए बहुत अधिक सहायक साबित होती हैं। सड़कें अच्छी होने से उत्पादित माल को जल्दी और सुरक्षित रूप से एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाया जा सकता है। 

बीते दिन मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने दिल्ली में इन्हीं सब मुद्दों को लेकर देश-विदेश के उद्योगपतियों से काफी विस्तार से बातचीत की। बातचीत के दौरान सीएम सैनी ने उद्योगपतियों से बस यही अनुरोध किया कि वह हरियाणा में उद्योग लगाकर अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी बेहतर उत्पाद बनाएं। भारतीय उत्पादों की ग्लोबल मार्केट में धूम मचनी चाहिए।  कंपनियां ऐसे उत्पाद बनाए कि मेक इन इंडिया का मतलब बेहतर गुणवत्ता हो। दरअसल, सैनी सरकार आटो, मैन्यूफैक्चरिंग, इलेक्ट्रानिक्स और अन्य सेक्टरों से जुड़े उद्योगपतियों से मुलाकात की थी। 

उन्होंने देश-विदेश से आए उद्योगपतियों से नई औद्योगिक नीति के लिए सुझाव भी मांगे थे। सीएम सैनी ने उद्योगपतियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि औद्योगिक निवेश के लिए हरियाणा सबसे बेहतरीन राज्य है। आज चाहे उद्योगों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात हो, चाहे सड़क कनेक्टिविटी की बात हो या मूलभूत सुविधाओं की बात हो, हर क्षेत्र में हरियाणा अव्वल है। औद्योगिक क्षेत्र के लिए बेहतर से बेहतर सुविधाएं दी जा रही हैं। सिंगल विंडो सिस्टम से कागजी कार्यवाही को संपन्न किया जा रहा है। 

हरियाणा में उद्योगों के लिए बेहतरीन इको सिस्टम है, तभी देश की बड़ी बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की पहली पसंद हरियाणा है। हरियाणा जल्द ही अपनी नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी लेकर आ रहा है, उसे लेकर उद्योगपतियों से सीधा संवाद हो रहा है। इससे इस पॉलिसी को और बेहतर बनाया जाएगा ताकि उद्योग ज्यादा से ज्यादा लाभ उठा सके और प्रदेश अधिक तरक्की कर सके। 

यह सच है कि यदि हरियाणा में उद्योग लगाने की मुहिम में सैनी सरकार सफल हो जाती है, तो 2047 में विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में हरियाणा के उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। इसी वजह से हरियाणा सरकार ने अपना विजन डॉक्यूमेंट पेश किया है। प्रदेश में औद्योगिक विकास होगा तो इससे प्रदेश की ग्रोथ भी बढ़ेगी और लोगों को अधिक से अधिक रोजगार भी मिलेगा। 

जब लाखों पौधे हर साल रोपे जाते हैं तो क्यों नहीं बढ़ रहा वन क्षेत्र?


अशोक मिश्र

दो दिन पहले पृथ्वी दिवस था। पूरी दुनिया में पृथ्वी दिवस सन 1970 से मनाया गया था। इसका उद्देश्य मानव जीवन के लिए अनिवार्य संसाधनों को नष्ट होने से बचाना और पृथ्वी को हरा भरा रखना। हरियाणा में भी पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है। इस बार भी हरियाणा में पौधरोपण को लेकर ढेर सारी योजनाएं बनाई गई हैं। कुछ पर अमल किया जा चुका है, तो कुछ पर अमल होना अभी बाकी है। कहा जा रहा है कि हरियाणा में बीते कुछ वर्षों में जिला प्रशासन और जनभागीदारी से अरावली की पहाड़ियों, जल स्रोतों और शहरी पर्यावरण को दुरुस्त करने के लिए कई स्तरों पर कार्य किया गया है। 

हरियाणा में जल संरक्षण के लिए 55 गांवों में 115 सोक पिट तैयार किए जा रहे हैं जिनका उद्देश्य अतिरिक्त पानी को सोखकर जल स्तर को बनाए रखना है। मिशन अमृत सरोवर के तहत पुराने तालाबों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है, उन्हें सुधारा जा रहा है ताकि बरसात के दिनों में अतिरिक्त पानी को संग्रहीत किया जा सके। इसके अलावा अटल भूजल योजना के तहत किसानों को प्रेरित किया जा रहा है कि वह टपका विधि से अपने फसलों की सिंचाई करें ताकि कम से कम पानी का उपयोग करके फसलों से अधिक लाभ उठाया जा सके। अरावली क्षेत्र में भी हरित आवरण बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाया जा रहा है। 

दुर्गम पहाड़ियों पर सीड बॉल का छिड़काव करके वहां हरित आवरण बढ़ाने की कोशिश हो रही है। सीड बॉल बरसात के दिनों में उग आते हैं और दुर्गम जगहों पर इस तरह नए पौधों को उगाया जाता है। सरकारी आंकड़ा बताता है कि पिछले साल अरावली और उसके आसपास के शहरी क्षेत्र में कुल एक लाख 63 हजार 517 पौधों को लगाया गया था। सरकार हर साल लाखों पौधों को सरकारी कर्मचारियों और निजी संस्थाओं के माध्यम से लगवाती है, इसके बावजूद प्रदेश में वन क्षेत्र अगर घटता जा रहा है, तो फिर सवाल यह है कि इतने अधिक प्रयास करने के बावजूद वन क्षेत्र बढ़ क्यों नहीं रहा है। 

भारतीय वन सर्वेक्षण की ताजा द्विवार्षिक रिपोर्ट के अनुसार फरीदाबाद, पलवल और नूंह जिलों में कुल मिलाकर करीब चार फीसदी तक वन क्षेत्र कम हुआ है। यह आंकड़ा किसी भी पर्यावरण प्रेमी के लिए चिंता की बात है। वन क्षेत्र कम होने से अरावली पहाड़ियों के इर्द-गिर्द बसे शहरों का तापमान बढ़ रहा है। रिकार्ड बताते हैं कि फरीदाबाद जिले में कुल 78.43 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से 1.08 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। वर्तमान में यहां 25.98 वर्ग किलोमीटर मध्यम घना जंगल और 52.45 वर्ग किलोमीटर खुला जंगल बचा है। 

इसी तरह पलवल जिले में भी 0.21 वर्ग किलोमीटर हरियाली कम हुई है। सबसे भयावह स्थिति नूंह जिले की है जहां 108.96 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से रिकॉर्ड 4.05 वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो चुका है। जंगलों के इस तरह सिमटने का सीधा असर शहर की हवा और सेहत पर पड़ना तय है। 


Wednesday, April 22, 2026

जब सच हुई ज्योतिषी की भविष्यवाणी

21 अप्रैल 2026 को प्रभात खबर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

व्यंग्य

अशोक मिश्र

आज मैं अपनी टूटी हुई बायीं कलाई लेकर अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा हुआ हूं। साथ में मेरी दाईं कनपटी भी सूजी हुई है। बात यह है कि कल सुबह जैसे ही सोकर उठा, मेरे प्रतिवेशी प्रसिद्ध ज्योतिषी थंगाबली घर पर पधारे। उनको देखते ही मैं समझ गया कि आज मेरा दिन खराब जाएगा। जब भी उनके सुबह दर्शन हुए हैं, बुरा दिन बीता है। 

मुझे देखते ही थंगाबली ईरानी मिसाइल की तरह धड़ाम से फटे और बोले, देखो! आज तुम्हारे ग्रह दशा ठीक नहीं है। तुम्हारी कुंडली में आज 'पिटनयोग' योग है। 'प' अक्षर से शुरू होने वाले रिश्तों से तो खासतौर पर सावधान रहना। इतना कहकर वह रफूचक्कर हो गए।

सुबह-सुबह जगाए जाने मूड खराब हो गया। सोचा कि जाग ही गया हूं तो मार्निंग वॉक कर लेता हूं। काफी दिन हुए उगता सूरज नहीं देखा है। सो, पहुंच गया पार्क। मैं गेट पर पहुंचा ही था कि तबीयत चकाचक हो गई। छाया के दर्शन जो हो गए थे। मैं उसके पास पहुंचा। आशिकाना लहजे में कहा, हाय छम्मकछल्लो! सूर्योदय के साथ-साथ पूर्णिमा की चांद भी उदित हो गया। यह तो चमत्कार हो गया। 

इतना कहकर मैंने विकल प्रेमी की तरह उसे गले लगा लिया। अभी मैं ठीक से उसे गले भी नहीं लगा पाया था कि मेरी दायीं कनपटी झनझना उठी। मानो इजरायल की भटकती हुई कोई मिसाइल कनपटी से टकरा गई हो। मैंने कनपटी सहलाई। छाया ने वॉकिंग स्टिक से अमेरिका की तरह प्रहार किया था। गुर्राती हुई बोली, अभी तो एक ही स्टिक मारी है। आइंदा इश्क फरमाया, तो मुंह तोड़ दूंगी। नाती-पोतों को खिलाने की उम्र में चला है इश्क लड़ाने। नासपीटे! तुम्हें शर्म नहीं आती है। इतना कहकर छाया स्टिक टेकती हुई पार्क से चली गई।

तभी मुझे ज्योतिषी थंगाबली की बात याद आई। उन्होंने कहा था कि 'प' अक्षर से शुरू होने वाले रिश्तों से सावधान रहना। 'प' अक्षर यानी प्रेमिका। मैं वॉक करने की जगह काफी देर तक पार्क की मुलायम घास पर बैठा रहा। काफी देर बाद जब होश ठिकाने आए, तो मैं उठकर घर की ओर चल दिया। घर का दरवाजा खोलकर जैसे ही अंदर हुआ, बरामदे से सनसनाता हुआ बेलन मेरे मुंह की ओर आया। 

बचने के लिए मैंने अपनी बायीं कलाई ढाल की तरह बेलन के आगे कर दिया। कलाई तो शहीद हो गई, लेकिन मेरा थोबड़ा रक्तरंजित होने से बच गया। तभी घरैतिन ट्रंप की तरह गरजती हुई आई और बोली, आपको कुछ शर्म-हया है या सब बेचकर खा गए हैं? बुढ़ापे में इश्कियाए घूमते रहते हैं। 

मैं अपनी सफाई में कुछ पाता कि घरैतिन एक बार फिर गरजीं-तुम बाहर क्या-क्या गुल खिलाते हो, मुझे पता ही नहीं चलता, अगर छाया दीदी आकर तुम्हारी करतूतों का कच्चा चिट्ठा न खोलतीं। जिंदगी भर तो हथेली पर दिल लेकर 'तू भी ले...तू भी ले' करते रहे। अब तो अपनी इज्जत का ख्याल करिए। मैं तो आजिज आ गई हूं, इस आदमी की छिछोरी हरकतों से। मैं चुपचाप कमरे में आ गया। यहां भी पत्नी से पिटा। कुछ देर बाद कनपटी और कलाई सूजने लगी, तो बेटा-पत्नी अस्पताल में भर्ती कराकर यह कहते हुए चले गए कि ठीक हो जाना, तो घर चले आना।


मैं समझ गया कि मां महान क्यों है?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मां के लिए दुनिया की सभी भाषाओं में जो भी शब्द हैं, उस भाषा के सबसे पवित्र शब्द हैं। मां की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है। मां का अपनी संतान के प्रति प्रेम बिल्कुल निस्वार्थ होता है। वह किसी लालसा या लोभ के लिए न तो अपने बच्चे को जन्म देती है और न ही जीवन में वह अपनी संतान से कोई अपेक्षा रखती है। 

एक बार स्वामी विवेकानंद से एक जिज्ञासु व्यक्ति ने पूछा कि स्वामी जी! मां की महिमा दुनिया भर के ग्रंथों में गाई गई है। ऐसा क्यों? मां इतनी महान क्यों है? यह बात सुनकर स्वामी विवेकानंद मुस्कुराए और बोले, एक काम करो। अभी तुरंत जाकर पांच सेर का एक पत्थर ले आओ। 

वह व्यक्ति पत्थर ले आया। स्वामी जी ने कहा कि एक कपड़े की सहायता से इस पत्थर को अपने पेट पर बांध लो। चौबीस घंटे तक इसे बांधे रखना। एक पल के लिए भी इसे अपने पेट से अलग मत करना। वह व्यक्ति चला गया। शाम तक वह पेट पर पत्थर लादे-लादे पस्त हो गया। 

अब उसे तो चलने-फिरने उठने बैठने में भी परेशानी होने लगी। किसी तरह दूसरे दिन की सुबह हुई और वह भागा-भागा स्वामी विवेकानंद के पास पहुंचा और बोला, एक सवाल का जवाब पाने के लिए अगर इतना कष्ट उठाना है, तो मुझे नहीं चाहिए अपने सवाल का जवाब। 

तब स्वामी जी ने समझाते हुए कहा कि तुम्हारी हालत दस-बारह घंटे में ही बिगड़ गई, जबकि मां लगभग इतना ही बोझ पेट में लेकर नौ महीने तक रहती है। वह अपने काम भी करती है, लेकिन किसी से शिकायत नहीं करती है। यही वजह है कि दुनिया में मां की महिमा गाई जाती है। यह बात सुनकर वह व्यक्ति स्वामी जी के चरणों में गिर गया और बोला, स्वामी जी, मैं समझ गया कि मां महान क्यों है?

बाढ़ से निपटने की तैयारियों में अभी से जुटी हरियाणा सरकार


अशोक मिश्र

अभी बरसात का मौसम आने में दो-ढाई महीने की देरी है, लेकिन सैनी सरकार ने यमुना नदी का जलस्तर बढ़ने पर हरियाणा के निचले जिलों में पानी भर जाने की आशंका के चलते अभी से तैयारियों करने का निर्देश दिया है। वैसे तो सैनी सरकार ने जनवरी में ही नदी तटबंधों की मरम्मत और बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी सभी परियोजनाओं की नियमित मानीटरिंग करने को कहा था। 

जनवरी में ही मुख्यमंत्री ने प्रदेश की 388 बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के लिए 637 करोड़ की मंजूरी भी प्रदान कर दी थी। इसमें जिला उपायुक्तों द्वारा प्रस्तावित की गई 102 करोड़ रुपये की 59 परियोजनाएं भी शामिल थीं। शासन स्तर पर इस बार पहले से ही चौकसी बरतने की तैयारी है ताकि पिछले साल अगस्त में हरियाणा और पंजाब में आई बाढ़ से हुए नुकसान की कहानी दोहराई न जा सके। 

यही वजह है कि इस बार बाढ़ जैसी समस्या का स्थायी समाधान करने की तैयारी की जा रही है। हरियाणा के कई जिलों में तालाब निर्माण, नदियों की सुरक्षा दीवारों को मजबूत करने से लेकर रेस्क्यू बोट की मरम्मत आदि शुरू हो चुकी है। सरकार ने यमुना नदी के किनारे बसे संवेदनशील गांवों में रेस्क्यू और राहत कार्यों को मजबूत करने पर जोर दिया है। इसके तहत 15 फीट लंबी एल्युमीनियम की नाव पहले से तैयार रखी जाएंगी ताकि आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। 

इन नाव के जरिये जलभराव या बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जाएगा। साथ ही राहत टीमों को भी मौके पर तेजी से काम करने में मदद मिलेगी। सरकार ने  प्रशासन के सामने साफ तौर पर लक्ष्य निर्धारित कर दिया है कि मानसून शुरू होने से पहले सभी काम पूरे कर लिए जाएं। तालाब, सुरक्षा दीवार और रेस्क्यू व्यवस्था पूरी तरह तैयार रखे जाएं ताकि बरसात के दिनों में निचले इलाकों में पानी भर जाने पर वहां के लोगों को तत्काल फायदा पहुंचाया जा सके। 

ज्यादा बारिश होने पर यदि इन इलाकों में जलभराव की समस्या पैदा होती है, तो किसी भी आपात स्थिति में तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू किए जा सकें। हरियाणा के कई जिलों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। फसलों को काफी नुकसान हुआ था। किसानों के सामने तो भूखों मरने तक की नौबत आ गई थी। बाढ़ के चलते खड़ी फसलों का नुकसान तो हुआ ही था, खेतों में काफी दिनों तक पानी भरा रहने की वजह से अगली फसल बोने में भी काफी देरी हुई। 

कई जगहों पर तो नमी ज्यादा होने की वजह से बीज अंकुरित कम हुए या बिल्कुल ही नहीं हुए। सैनी सरकार ऐसी स्थिति दोबारा नहीं चाहती है। यही कारण है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में ताबाल निर्माण करवाकर बाढ़ के प्रभाव को कम करना चाहती है। तालाब निर्माण से इलाके का जलस्तर भी  बढ़ेगा और लोगों को अपनी जरूरतों के लिए पानी भी समय पर उपलब्ध हो सकेगा।

संभलिए, मुट्ठी में फंसी रेत की तरह फिसल रहा समय

संजय मग्गू

अक्सर बातचीत के दौरान लोग यह बात दोहराते हैं कि पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान। सचमुच समय बलवान भी है और कीमती भी। समय अगर एक बार अतीत बन गया, तो फिर वह कभी वर्तमान नहीं बन सकता है। जो बीत गया, सो बीत गया। अक्सर जब लोग अपने चौथेपन की अवस्था में पहुंचते हैं, तो उन्हें इस बात का अफसोस होता है कि उनके पास वैसे तो बहुत कुछ है, लेकिन समय नहीं है। समय की कमी है। पछतावा भी होता है कि समय उनके ही हाथ से यों फिसल गया, जैसे मुट्ठी में दबी रेत धीरे-धीरे फिसल जाती है और पता ही नहीं चलता है कि कब रेत फिसल कर गिर चुकी है और मुट्ठी खाली है। 

अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि लोगों के पास समय बहुत है। लोग ऐसी-ऐसी बातों पर घंटों बहस करते हुए मिल जाएंगे जिससे उनका कोई लेना देना नहीं है। युद्ध में ईरान जीतेगा या अमेरिका, इसी बात को लेकर घंटों बहस करते हुए बिता देंगे,जबकि सच तो यह है कि कोई भी युद्ध जीते, उनका कोई लेना-देना न ईरान से है, न ही अमेरिका या इजरायल से। यह आदत गांव और शहर सब जगह समान रूप से पाई जाती है। गांवों में तो निरर्थक बातों पर बहस के दौरान लाठी-डंडे तक चल जाते हैं। 

भाई से भाई की, पड़ोसी से पड़ोसी की दुश्मनी तक हो जाती है, कारण वही बेकार की बहस। चौथेपन में समय की कमी का रोना रोने वाला इंसान नहीं जानता है कि प्रकृति ने उसे खूब समय दिया था। हम इंसानों को जीने लायक प्रकृति द्वारा दिया गया समय कम नहीं था। केवल कुछ ही जीवों को प्रकृति ने हमसे ज्यादा समय जीने के लिए दिया है, लेकिन हमने उसे व्यर्थ गंवा दिया। समय की चिंता इंसान इसलिए नहीं करता है क्योंकि वह अदृश्य है। मूर्तिमान नहीं है। दिखाई नहीं पड़ता है। 

धन, संपत्ति, महल-अट्टालिकाएं, रुतबा, पद दृश्यमान हैं, इसलिए इंसान सबसे ज्यादा कदर इनकी करता है, लेकिन चूंकि समय दिखाई नहीं देता है, इसलिए उसकी कोई कदर ही नहीं होती है। यही समय की खूबी है। गुजर गए समय को वापस धन, दौलत देकर भी वापस नहीं लाया जा सकता है। अगर इंसान समय को  कंजूसी से खर्च करता, तो शायद उसके पास करने के लिए बहुत सा समय बच गया होता। कहने का मतलब यह है कि समय को तो बीतना ही है। 

लेकिन हमने जो समय व्यर्थ में गंवा दिया, अगर उस समय में हमने कोई सार्थक काम कर लिया होता, तो अफसोस नहीं होता। अपना, अपने परिवार, देश और समाज के लिए अपना समय खर्च कर सकते थे। लेकिन नहीं। यह बात तब समझ में नहीं आती है, जब खूब समय होता है। इंसान को चिंता तब होती है, जब समय का अभाव होता है। ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। अब तो बैठकर बस बिसूरना ही है।

Tuesday, April 21, 2026

नींद में ही दुनिया को अलविदा कह गए थे चैपलिन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लंदन में 16 अप्रैल 1889 को पैदा हुए चार्ली चैपलिन ने अपने दर्द को ही ताकत बनाकर दुनिया को हंसाया। फिल्मी परदे पर बिना कुछ कहे केवल अपनी भावभंगिमाओं से उन्होंने लोगों को न केवल हंसाया बल्कि रुलाया भी खूब। चैपलिन का जीवन बड़ी गरीबी में संघर्ष करते हुए बीता। 

उनके पिता शराबी थे और घर की जिम्मेदारी उठाने की जगह हमेशा शराब के नशे में धुत रहते थे। चैपलिन की माता और पिता दोनों संगीत क्षेत्र से जुड़े हुए थे। जब चैपलिन किशोरावस्था में पहुंचे तब तक उनके पिता की अत्यधिक शराब पीने की वजह से मौत हो गई। उनकी मां मानसिक रोगी हो गई थीं क्योंकि कंठनली में विकार आ जाने की वजह से गायिका और अभिनेत्री का करियर खत्म हो गया था। 

इसलिए उनकी मां का ज्यादातर समय अस्पताल में रहना पड़ता था। अभिनय से उनको बचपन से ही प्यार था। वह कम उम्र में ही थिएटर करने लगे। उससे जो आय होती थी, उसी से उनका खर्चा चलता था। जैसे-जैसे चैपलिन बड़े होते गए, उनके अभिनय में निखार आता गया। 

अंतत: फिल्मों में काम करने की नीयत से चैपलिन अमेरिका पहुंचे। जब उन्हें फिल्मों में काम करने मौका मिला, तो  उन्होंने दुनिया को खूब हंसाया। उन दिनों मूक फिल्मों का दौर था। चैपलिन का मशहूर किरदार द ट्रैंप छोटी मूंछ, ढीली ढाली पैंट, टोपी और छड़ी ही उनकी पहचान हो गई।   

उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भोगा था, जिया था, उसको द माडर्न टाइम्स और द किड जैसी फिल्मों में अच्छी तरह व्यक्त किया। उनका एक वाक्य पूरी दुनिया में मशहूर था कि जिस दिन आप हंसे नहीं, वह दिन व्यर्थ गया। इस महान कलाकार की स्विट्जरलैंड के वेवे में 25 दिसम्बर 1977 को नींद में मृत्यु हो गई।

अरावली की पहाड़ियों में घटता वन क्षेत्र चिंता का विषय

अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है।नतीजा यह हो रहा है कि अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र लगातार घटता जा रहा है। वन माफिया जहां अरावली क्षेत्र में अवैध पेड़ों की कटाई करके उसे खोखला बना रहे हैं, वहीं खनन माफिया भी वन क्षेत्र को कम करने के लिए जिम्मेदार हैं। अवैध रूप से होने वाले खनन के दौरान उस क्षेत्र में लगे पेड़ पौधे भी नष्ट हो रहे हैं जिसकी वजह से वन क्षेत्र काफी कम हो  रहा है। 

भारतीय वन सर्वेक्षण की ताजा द्विवार्षिक रिपोर्ट के अनुसार फरीदाबाद, पलवल और नूंह जिलों में कुल मिलाकर करीब चार फीसदी तक वन क्षेत्र कम हुआ है। यह आंकड़ा किसी भी पर्यावरण प्रेमी के लिए चिंता की बात है। वन क्षेत्र कम होने से अरावली पहाड़ियों के इर्द-गिर्द बसे शहरों का तापमान बढ़ रहा है। रिकार्ड बताते हैं कि फरीदाबाद जिले में कुल 78.43 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से 1.08 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। वर्तमान में यहां 25.98 वर्ग किलोमीटर मध्यम घना जंगल और 52.45 वर्ग किलोमीटर खुला जंगल बचा है। 

इसी तरह पलवल जिले में भी 0.21 वर्ग किलोमीटर हरियाली कम हुई है। सबसे भयावह स्थिति नूंह जिले की है जहां 108.96 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से रिकॉर्ड 4.05 वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो चुका है। जंगलों के इस तरह सिमटने का सीधा असर शहर की हवा और सेहत पर पड़ना तय है। वन क्षेत्र के घटने का कारण अरावली पहाड़ियों की गोद में बसाए जाने वाले मैरिज होम्स और रिसार्ट भी हैं। 

अरावली के जंगलों में काफी बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण किया जा रहा है। कुछ महीने पहले सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर स्थानीय निकायों ने अरावली क्षेत्र में अवैध तरीके से बनाए गए रिसॉर्ट और मैरिज होम्स को ढहा दिया गया था। हालांकि इस दौरान भी कुछ रसूखदार लोगों के अवैध निर्माणों को छोड़ देने का आरोप भी लगा था। इसके बावजूद यह सच है कि अरावली क्षेत्र में कंक्रीट का जंगल उगाया जा रहा है। 

पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि कंक्रीट का जंगल इसी तरह उगता रहा, तो बहुत जल्दी अरावली क्षेत्र का पर्यावरण प्रभावित होगा। यदि वन क्षेत्र इसी तरह घटता रहा तो न केवल तापमान में बेतहाशा वृद्धि होगी बल्कि जैव विविधता और भू-जल स्तर पर भी इसके विनाशकारी परिणाम देखने को मिलेंगे। यह सच है कि अरावली की पहाड़ियां गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए फेफड़े की तरह काम करती हैं। 

यदि अवैध वन कटान और खनन पर रोक नहीं लगाई गई, तो जैव विविधता बुरी तरह प्रभावित होगी। चार राज्यों में तापमान वृद्धि के कारण आम जन जीवन बुरी तरह प्रभावित होगा। यदि अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र बढ़ाना है, तो अवैध निर्माण के साथ-साथ अवैध कटान और खनन को रोकना होगा।

Monday, April 20, 2026

पिकासो ने गर्टूड स्टाइन को भेंट की पेंटिंग

बोधिवृक्ष 
अशोक मिश्र 
 
बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रसिद्ध चित्रकारों में पाब्लो रुइज पिकासो का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। इनका जन्म 25 अक्टूबर 1881 को दक्षिणी स्पेन में हुआ था। इनके पिता भी एक प्रसिद्ध चित्रकार थे। सात वर्ष की आयु में पिता ने इनका प्रारंभिक प्रशिक्षण शुरू कर दिया था। पिकासो ने कम उम्र में ही अपनी अद्वितीय कला का प्रदर्शन किया था। 
यही वजह है कि उन्हें कम उम्र में ही ख्याति मिलनी शुरू हो गई थी। एक बार की बात है। वह पेरिस की यात्रा पर गए हुए थे। पेरिस उन दिनों कला का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। वहां पर अपने समय के सबसे प्रसिद्ध चित्रकार और मूर्तिकार रहा करते थे। 
उन दिनों पिकासो की आजीविका का साथ चित्रकला ही था। एक दिन वह खाली बैठे थे, तो उनके पास गर्टूड स्टाइन नाम की लड़की आई। उसके मन में चित्र कला को लेकर ढेर सारे सवाल थे। उन्होंने बड़े धैर्य से उसकी बातें सुनी और उसके सवालों का जवाब दिया।  
उसी दौरान उन्होंने उसे एक चित्र बनाकर भेंट किया। बाद में दोनों के बीच दोस्ती हो गई। जब पिकासो की ख्याति ज्यादा हो गई, तो एक दिन अमेरिकी कला संग्रहकर्ता अल्बर्ट बान ने गर्टूड से पूछा कि उसने पिकासो को यह चित्र बनाने के लिए कितना भुगतान किया था। 
गर्टुड ने बताया कि यह चित्र पिकासो ने भेंट की थी। बान ने उस पेंटिंग को खरीदने की इच्छा जताई, लेकिन गर्टूड ने उसे बेचने से इनकार कर दिया। हालांकि उस पेंटिंग के उसे लाखों डॉलर मिल सकते थे। दरअसल, उन दिनों किसी द्वारा भेंट में दी गई चीजें अमूल्य हुआ करती थीं। लोग उसे अपने जी जान से ज्यादा सुरक्षा करते थे। भेंट में दी गई वस्तु का मूल्य नहीं, केवल भावना देखी जाती थी।

आखिर कब रुकेगी कापी-किताब, ड्रेस के नाम पर निजी स्कूलों की लूट

अशोक मिश्र

वैसे तो सरकार हर साल जब स्कूलों का नया सत्र शुरू होता है, तो दावा करती है कि अभिभावकों को स्कूलों द्वारा की जा रही मनमानी और लूट से बचाया जाएगा। अभिभावकों के साथ लूट नहीं होने दी जाएगी, लेकिन कुछ दिनों तक संबंधित अधिकारी चुस्ती-फुर्ती दिखाते हैं और फिर सब कुछ ठंडा पड़ जाता है। इस साल भी प्रदेश सरकार अभिभावकों को निश्चित दुकानों से ड्रेस और कापी-किताबें खरीदने के लिए मजबूर कर रहे निजी स्कूलों पर अंकुश लगाने की तैयारी कर रही है। 

सरकार ने साफ कर दिया है कि यदि निजी स्कूलों में किसी बच्चे की पीठ पर लदे बैग में निर्धारित भार से अधिक कापी-किताबें पाई गईं, तो उस स्कूल के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अभिभावकों को ऐसी परेशानी से निजात दिलाने और स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए जिला शिक्षाधिकारियों और मौलिक शिक्षा अधिकारी की जवाबदेही तय कर दी गई है। सरकार ने पहली कक्षा से लेकर दसवीं तक के बच्चों के लिए एक मानक भार तय कर दिया है। 

लेकिन अकसर देखा गया है कि रेफरेंस बुक के नाम पर अभिभावकों को इतनी ज्यादा मात्रा में पुस्तकें खरीदने पर मजबूर किया जाता है कि वह परेशान हो जाते हैं। बस्ते का बोझ भी काफी हद तक बढ़ जाता है। छोटे-छोटे बच्चों की पीठ पर लदा भारी भरकम बस्ता उनके लिए कई तरह की मुसीबतें पैदा कर देता है। अधिकतर बच्चे छोटी ही उम्र में पीठ दर्द की शिकायत करते हुए पाए जाते हैं। उनकी रीढ़ की हड्डी भी पीठ पर भारी बस्ता लादने की वजह से थोड़ी झुक जाती है। 

यह स्थिति आगे चलकर उन्हें जीवन भर परेशान करती है। कई जिलों में स्कूल परिसर में स्कूल प्रबंधन ने मनमााने रेट पर पुस्तकों और ड्रेस आदि बेचना शुरू कर दिया है। माता-पिता को स्कूल से ही जरूरत की सारी चीजें लेने के लिए बाध्य किया जा रहा है। कई पुराने और अप्रासंगिक रेफरेंस बुक्स बच्चों पर थोपी जा रही हैं जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के अनुरूप नहीं बताई जाती हैं। वैसे तो शिक्षा विभाग ने ऐसे मामलों पर शिकायत मिलने के बाद जिला शिक्षा अधिकारियों और मौलिक शिक्षा अधिकारियों को कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। कुछ मामलों में कार्रवाई हुई भी है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

 इसके लिए पूरे प्रदेश स्तर पर कम से कम डेढ़ दो महीने तक लगातार अभियान चलाने की जरूरत है। हालांकि नियमों का उल्लंघन करने वाले निजी स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करने के सख्त आदेश दिए गए हैं। कुछ स्कूलों ने इस बार अपनी ड्रेस में भी बदलाव कर दिया है। हर साल स्कूल ड्रेस में बदलाव होने से अभिभावकों पर एक अतिरिक्त बोझ पड़ जाता है, जबकि पुरानी ड्रेस जारी रखकर अभिभावकों को अतिरिक्त खर्चे से बचाया जा सकता है, लेकिन ऐसी स्थिति में निजी स्कूलों को अतिरिक्त कमाई नहीं हो पाएगी।

Sunday, April 19, 2026

कभी अविश्वसनीय बात पर विश्वास मत करो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ग्रंथों में जितनी भी बातें लिखी हुई हैं, उनको पढ़ने के बाद अगर जीवन में उतारा न जाए, तो वह सारा ज्ञान मिथ्या होता है। ज्ञान का उपयोग ही सबसे उचित होता है। एक बार की बात है। एक राजा की बहुत सुंदर वाटिका थी। उस वाटिका में अंगूर की बेलें लगी हुई थीं। 

राजा को उस वाटिका से खाने के लिए ढेर सारा मीठा-मीठा अंगूर मिला करता था। कुछ दिनों बाद एक चिड़िया उस वाटिका में रोज आने लगी। वह मीठे-मीठे अंगूरों को खाकर खट्टे या अधपके अंगूरों को नीचे गिरा दिया करती थी। वाटिका का माली चिड़िया की इस करतूत से बहुत परेशान हो गया। उसने चिड़िया को पकड़ने का बहुत प्रयास किया, लेकिन उसे पकड़ने में सफल नहीं हुआ। 

एक दिन आजिज आकर माली ने यह बात राजा को बताई। अगले दिन राजा वाटिका में आकर छिप गया और जैसे ही चिड़िया आई, राजा ने उसे पकड़ लिया। राजा जब उसे मारने लगा, तो चिड़िया ने कहा कि हे राजा! तुम मुझे मत मारो। मैं तुम्हें ज्ञान की चार बातें बताती हूं। राजा ने कहा कि तुरंत बताओ। चिड़िया ने कहा कि पहली बात तो यह है कि हाथ आए शत्रु को कभी जिंदा मत छोड़ो। 

राजा ने कहा-दूसरी बात बता। चिड़िया ने कहा कि कभी असंभव बात पर विश्वास मत करो। तीसरी बात यह है कि अतीत को याद करके पश्चाताप मत करो। इतना कहकर चिड़िया ने कहा कि मेरा दम घुट रहा है। थोड़ा ढील दो, ताकि मैं चौथी बात कह सकूं। राजा ने जैसे ही हथेली ढीली की, चिड़िया उड़कर डाल पर जा बैठी और कहा कि मेरे पेट में दो अनमोल हीरे हैं। 

अब राजा पछताने लगा। तब चिड़िया ने कहा कि आपने मेरी चारों ज्ञान की बातें नहीं मानी। मैं आपकी शत्रु थी, आपने जिंदा छोड़ दिया। हीरे की काल्पनिक बात को जानकर पछता रहे हैं।

क्रॉस वोटिंग करने वाले पांचों एमएलए का निलंबन एक स्मार्ट फैसला


अशोक मिश्र

पिछले 16 मार्च को राज्यसभा की दो सीटों पर हुए चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग करने वाले पांच कांग्रेसी विधायकों को निलंबित करके पार्टी ने अब गेंद इनके पाले में डाल दी है। निलंबित होने के बाद पुनहाना के विधायक मोहम्मद इलियास, हथीन से मोहम्मद इसराइल चौधरी, नारायण गढ़ से शैली चौधरी, रतिया से जनरैल सिंह और साढौरा से रेनू बाला पार्टी की बैठकों और कार्यक्रमों में भाग नहीं ले सकेंगे। पार्टी की गतिविधियों से एक तरह से इनका नाता टूट गया है। 

निलंबन के दौरान यदि किसी मामले को लेकर पार्टी ह्विप जारी करती है, तो इन पांचों विधायकों को पार्टी ह्विप को मानना ही पड़ेगा और उसके मुताबिक कार्य करना पड़ेगा। पार्टी ने इन पांचों विधायकों बर्खास्त न करके इन्हें अपने से अलग भी कर दिया है और इन्हें स्वतंत्र भी नहीं छोड़ा है। अब अगर पार्टी उन्हें बर्खास्त कर देती तो ह्विप मानने की बाध्यता ही खत्म हो जाती। वह किसी दूसरे दल में भी चले जाते तो उनकी विधायकी बरकरार रहती। दूसरे दल को अपना समर्थन भी दे सकते थे। 

लेकिन अब अगर उन्होंने ह्विप नहीं माना या दूसरे दल में चले गए, तो उनकी विधायकी चली जाएगी। ऐसी स्थिति में उनकी सीटों पर दोबारा उपचुनाव होंगे। पार्टी ने इन्हें निलंबित करके पार्टी से बर्खास्त करने और निलंबन खत्म करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रख लिया है। राज्यसभा चुनाव में क्रॉास वोटिंग करने के आरोपी विधायकों का निलंबन कांग्रेस का स्मार्ट फैसला मानना जा रहा है। 

कांग्रेस ने यह फैसला करके एक तरह से दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी में किसी तरह की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। क्रॉस वोटिंग के बाद प्रदेश अनुशासन समिति ने पांचों कांग्रेस विधायकों को नोटिस जारी करके जवाब मांगा था। इनमें से तीन विधायकों शैली चौधरी, जनरैल सिंह और रेनूबाला ने अपना जवाब समिति को समय पर ही सौंप दिया था। 

लेकिन मोहम्मद इसराइल चौधरी और मोहम्मद इलियास ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा। कांग्रेस से निलंबित किए गए लगभग पांचों विधायकों ने पार्टी के फैसले से ऐतराज जताया है। सभी का यही कहना है कि वह कुछ ही दिनों में अपने समर्थकों के पास जाएंगे, उनसे विचार विमर्श करेंगे, उसके बाद ही कोई फैसला लेंगे। स्वाभाविक है कि पांचों विधायकों को निलंबित करने का फैसला हाईकमान की मर्जी से लिया गया है। 

इसके बावजूद कहना उचित होगा कि हरियाणा कांग्रेस पर जिस तरह गुटबाजी हावी है, उसको देखते हुए करमवीर बौद्ध का राज्यसभा सांसद चुना जाना ही किसी चमत्कार से कम नहीं है। प्रदेश कांग्रेस में हुड्डा गुट की तूती बोलती है। ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता इनके साथ हैं, लेकिन कुमारी सैलजा प्रदेश में कांग्रेस की सबसे बड़ी दलित नेता हैं। इनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। 

Saturday, April 18, 2026

गैस और तेल की कमी भी बढ़ते प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण

अशोक मिश्र

पिछले एक महीने से दिल्ली एनसीआर को प्रदूषण से राहत मिली हुई थी। लेकिन प्रदूषण बढ़ने की वजह से एक बार फिर इमरजेंसी के लिए बनाए गए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान वन को फिर लागू कर दिया गया है। एनसीआर के अंतर्गत आने वाले जिलों सहित पूरे राज्य के अधिकतर जिले पिछले कई दिनों से प्रदूषण की चपेट में हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले दो दिन दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण की चपेट में रहेगा। हरियाणा में भी प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ रहा है। 

ग्रेप वन लागू होने के बाद दिल्ली एनसीआर में निर्माण कार्य और तोड़फोड़ पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। जिन साइटों पर ऐसे कार्य चल रहे हैं, उन्हें सुरक्षात्मक कदम उठाने होंगे। सड़कों की सफाई करते समय पानी का छिड़काव करना होगा और सफाई मशीनों से करनी होगी ताकि किसी प्रकार से धूल न उड़े। निर्माण सामग्री लाने-ले जाने वाले ट्रकों को भी सामग्री ढक कर ही रखना होगा। इस बीच खुले में कूड़ा-करकट जलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 

हरियाणा में कई जगहों पर यह देखा गया है कि लोग घरों से निकला कूड़ा स्थानीय निकायों द्वारा संचालित कूड़ा इकट्ठा करने वाली गाड़ियों में डालने की जगह रात में जला देते हैं। इससे प्रदूषण बढ़ता है। होटलों और रेस्टोरेंट में तंदूर में लकड़ी का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। इस बीच हरियाणा और दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने का कारण एलपीजी की कमी को भी माना जा रहा है। 

जब से अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच लड़ाई शुरू हुई है, तब से एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति में बाधा आई है। इस वजह से लोगों को छोटे सिलेंडर में गैस भरवाने में दिक्कत आ रही है। गैस के विकल्प में लोगों ने लकड़ी, कोयले और उपलों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इस वजह से भी प्रदूषण का स्तर काफी हद तक बढ़ा है। 

वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की सप्लाई बाधित होने की वजह से दिल्ली एनसीआर में कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट ने होटल, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को आंशिक राहत प्रदान की है। सीएक्यूएम ने गैस की कमी को देखते हुए वैकल्पिक ईंधन के उपयोग की इजाजत दे दी है। कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट ने 13 मार्च 2026 को आदेश जारी किया था कि 13 अप्रैल के बाद वैकल्पिक ईंधन हाई स्पीड डीजल, बायोमास, रिफ्यूज्ड डेरिवेड फ्यूल पेलेट्स का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। 

लेकिन अब सीएक्यूएम ने अपने आदेश को थोड़ा ढीला किया है। हरियाणा और दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण की वजह से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा हो रही हैं।  प्रदूषण के चलते बच्चे और बुजुर्ग खासतौर पर प्रभावित हो रहे हैं। सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।  आंखों में जलन और फेफड़ों में संक्रमण के रोगी ज्यादा अस्पताल पहुंच रहे हैं।