बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
भारत को स्वाधीन कराने में हमारे देश के न जाने कितने वीर पुत्रों और पुत्रियों ने अपना बलिदान दिया है। कहते हैं कि इंसान जैसे ही गुलाम होता है, वैसे ही उसमें स्वतंत्र होने की प्रबल इच्छा पैदा हो जाती है। अंग्रेजों की गुलामी के साथ ही साथ हमारे देश में स्वाधीनता की आवाज बुलंद होने लगी थी। ऐसे ही एक वीर आदिवासी थे बुद्धू जिन्होंने छोटानागपुर इलाके में विद्रोह किया।
उनके विद्रोह को कोल विद्रोह या लकड़ा विद्रोह के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजों के खिलाफ हुई इस बगावत में बुद्धू भगत ने अपने दो पुत्रों हलधर भगत और गिरिधर भगत के साथ शहादत दी थी। इनके साथ ही करीब डेढ़ सौ आदिवासियों ने अपने प्राण न्यौछावर किए थे। रांची के सिलागई गांव में 17 फरवरी 1792 में पैदा हुए बुद्धू भगत ने बचपन से ही तीर-धनुष, गुलेल से सटीक निशाना लगाना सीख लिया था।
उन्होंने बचपन से ही अंग्रेजों का आदिवासियों के साथ होने वाला अत्याचार देखा था। इससे उनके भीतर विद्रोह की आग धधकने लगी थी। जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की, तो अपने साथियों से उन्होंने कहा कि हमारे जंगल ही हमारे लिए मददगार हैं। उन्होंने अपने साथियों से तीर, पत्थर और गुलेल से हमला करने को कहा। इसका नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों के लिए बुद्धू भगत एक चुनौती बन गए क्योंकि लाख कोशिश के बावजूद वह उन्हें पकड़ नहीं सके थे।
1832 में बुद्धू भगत को शिकस्त देने के लिए अंग्रेज कप्तान इम्फे बड़ी फौज लेकर आया और सिलागई गांव के पास ही उन्हें घेर लिया। उनके साथ अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। अंत में जिस गांव में बुद्धू भगत पैदा हुए थे, उसी गांव में उन्होंने अपने साथियों के साथ शहादत पाई। बुद्धू भगत ने अपनी जान देकर स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया।
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