Wednesday, April 8, 2026

बच्ची से दुष्कर्म मामले में पुलिस का रवैया रहा संवेदनहीन


अशोक मिश्र

बलात्कार का मामला हमेशा संवेदनशील माना जाता रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था से पहले भी जब समाज में सामंती व्यवस्था थी, तब भी यह संवेदनशील ही रहा है। इन दिनों गुरुग्राम की तीन साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार का मामला चर्चा में है। इस मामले में सुप्रीमकोर्ट ने जो रवैया अख्तियार किया है, उससे समाज में यह संदेश जरूर गया है कि लोगों को अगर अदालतों पर भरोसा होता है, तो वह कतई गलत नहीं है। 

अदालतों में बैठे न्यायमूर्ति किसी भी हालत में पीड़ित को न्याय दिलाकर ही रहते हैं। गुरुग्राम के सेक्टर 54 की एक सोसायटी में रहने वाली तीन साल की एक बच्ची के साथ दो नौकरानियों और उनके एक पुरुष साथी ने दो महीने तक कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया। बच्ची को डराया धमकाया भी गया। जब उत्पीड़न कुछ ज्यादा ही होने लगा, तो चार फरवरी को बच्ची ने अपने साथ हो रहे अमानवीय कृत्य की जानकारी अपनी मां को दी। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। जब कोई मामला पुलिस तक पहुंचता है, तो लोगों को यह विश्वास होता है कि पुलिस अब दोषियों को पकड़कर न्याय दिलाएगी। 

लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। पुलिस ने बच्ची का बयान लेते वक्त आरोपियों को भी वहीं खड़े रहने की इजाजत दी। आरोपियों की मौजूदगी में बच्ची घबराई रही। मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर ने भी लापरवाही बरती। कुल मिलाकर जब यह मामला सुप्रीमकोर्ट के सामने आया, तो सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश यह जानकर दंग रह गए कि इतने संवेदनशील मामले में कितनी लापरवाही बरती गई। 

सुप्रीमकोर्ट पुलिस, डॉक्टर सहित उस घटना से जुड़े सभी पक्षों की लापरवाही पर न केवल नाराज हुआ, बल्कि कड़ी फटकार लगाई। सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में एक विशेष जांच टीम गठित करने के साथ-साथ बच्ची का बयान दोबारा लेने का आदेश दिया है। टीम में महिला अधिकारी अनिवार्य रूप से रहेगी। सादी वर्दी में बच्ची के घर जाकर पुलिस जांच करेगी। 

बच्ची से बातचीत करते समय मनोचिकित्सक और चाइल्ड काउंसलर भी मौजूद रहेंगे ताकि बच्ची सहज होकर अपनी बात कह सके। जिस तरह सुप्रीमकोर्ट ने अपनी संवेदनशीलता परिचय देते हुए मामले को सुलझाने का प्रयास किया है, वह वंदनीय है। सच तो यह है कि दुराचार किसी भी महिला या बच्ची के साथ किया गया हो, उसकी पीड़ा पीड़िता को आजीवन भोगती है। वह बलात्कार के दंश से जीवन भर उबर नहीं पाती है। वह काफी प्रयास के बावजूद एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन नहीं गुजार पाती है। 

उसका अतीत उसे चैन से जीने नहीं देता है। दुख की बात तो यह है कि ज्यादातर मामले में समाज पीड़िता को ही दोषी मानकर उपेक्षा करता है। उसकी खिल्ली उड़ाता है। उसे प्रताड़ित करता है। यही वजह है कि ज्यादातर मामलों में पीड़िता न्यायालय की चौखट तक नहीं पहुंच पाती है।

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