बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महाराष्ट्र के पैठण में संत एकनाथ का जन्म 1533 में हुआ था। कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास की तरह इनका भी जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था। संयोग से इनके माता रुक्मिणी और पिता सूर्य नारायण की मृत्यु भी इनके जन्म के कुछ समय बाद हो गई थी। इनका पालन पोषण इनके दादा चक्रपाणि की देख-रेख में हुआ था।चक्रपाणि के पिता संत भानुदास बिट्ठल के अनन्य भक्त थे। संत एकनाथ ने भी अपने पड़दादा संत भानुदास के ही मार्ग का अनुसरण किया। महाराष्ट्र में सबसे बड़े संत के रूप में पूजे जाने वाले संत एकनााथ ने उन्हीं लोगों को दीक्षा दी जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्वों को पूरा कर लिया था। वे लोग भी एकनाथ के शिष्य बने जिन्होंने सांसारिक दायित्वों को स्वीकार ही नहीं किया था।
अपने गुरु जनार्दन स्वामी के आदेश पर एकनाथ ने गृहस्थ जीवन स्वीकार किया था। एक दिन की बात है। एक गृहस्थ उनके पास आया और बोला, गुरुजी, मुझे अपना शिष्य स्वीकार कीजिए। मुझे दीक्षा दीजिए। मैं सांसारिक मोह त्यागकर संन्यास धारण करना चाहता हूं।
संत एकनाथ ने उससे पूछा कि क्या तुमने अपने गृहस्थ जीवन के सभी दायित्वों को पूरा कर लिया है? क्या तुम्हारे परिवार ने तुम्हें संन्यास धारण करने की अनुमति प्रदान कर दी है? उस आदमी ने कहा कि गुरु जी, मैं अपनी पत्नी और बच्चों को सोते समय छोड़कर आया हूं।
एकनाथ ने उस व्यक्ति को फटकारते हुए कहा कि अरे अज्ञानी, तू किस भगवान की आराधना, सेवा करेगा। असली भगवान को तो तू घर ही छोड़कर चला आया है। तेरा परिवार ही भगवान का स्वरूप है। ऐसे में तेरा संन्यास विफल ही रहेगा। यह सुनकर गृहस्थ को अपनी गलती का एहसास हुआ और क्षमा मांगते हुए अपने घर को लौट गया।

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