Monday, December 26, 2016

कवि की आलोचक से मुलाकात

अशोक मिश्र
इसे संयोग कहिए या दुर्योग, जनकवि ‘रसिक’ जी की मुलाकात प्रख्यात आलोचक ‘कवि दहल’ से हो ही गई। दोनों यथा नामे, तथा गुणे। एक की कविता में सिर्फ रस की ही उत्पत्ति होती है, तो दूसरे की आलोचना से कवि दहल जाया करते हैं। कुछ ही दिन पहले कविदहल जी जनकवि रसिक जी को अपनी आलोचना से दहला चुके थे। तब से रसिक जी पगलाए सांड की तरह पूरे शहर में कविदहल को ढूंढ रहे थे। आखिरकार दोनों की मुलाकात हो ही गई। रसिक जी कवि दहल को देखते ही गुर्राये, ‘कल का छोरा...आलोचक की दुम बना फिरता है। क्या लिखा था तूने अखबार में, मैं घसकटा छंद लिखता हूं। मेरी कविताओं में किसी भी रस की निष्पत्ति नहीं होती है। चल..माना, मैं घसकटा छंद लिखता हूं, तू एक छंद लिखकर दिखा।’
रसिक जी को साक्षात सामने देखकर कविदहल के पसीने छूट गए। घिघियाए स्वर में बोले, ‘कपड़ा अच्छा सिला या बुरा, इसको परखने के लिए दर्जी होना कोई जरूरी थोड़े न है।’ कविदहल ने तर्क पेश किया। रसिक जी ने मुंह खोलकर थूक की बौछार की, ‘मेरी कविता की इस पंक्ति में तुझे क्या खामी नजर आती है-‘प्रिये! तुम्हारे विरह में दुख गड़ता है।’ अपनी आलोचना में क्या लिखा था तूने-दुख न हो गया खूंटा हो गया, जो बेध्यानी से आते-जाते पांव में गड़ता है। अबे..तुझे विरह का दुख गड़ता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम, लेकिन मुझे तो गड़ता है। क्या कर लेगा तू। चालीस साल से जनकवि हूं, आज तक किसी की िहम्मत नहीं हुई अंगुली उठाने की। तू अब मेरी कविताओं की व्याख्या करेगा? तू जानता है, एक-एक पंक्तियों का सृजन करने के लिए किस-किस पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ता है। किस-किस से प्रेरणा लेनी पड़ती है। कभी बीवी से प्रेरणा लेनी पड़ती है, तो कभी प्रेमिकाओं की शरण में जाना पड़ता है। कभी साली-सलहज ही प्रेरक हो जाती हैं। इधर-उधर तांकना-झांकना पड़ता है, तब कहीं चार पंक्ति की कविता में रसोत्पत्ति होती है। और तू है कि पल भर में सारे किए धरे पर पानी फेर देता है आलोचना के नाम पर। तू आलोचक है या कसाई। तुझे तनिक भी दया नहीं आती..कविता की निर्मम शवपरीक्षा करते हुए।’
कविदहल ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा, ‘रसिक जी..पिछले चालीस साल से तीन कविताएं लिए कवि सम्मेलनों से लेकर अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के दफ्तर में दनदनाते हुए घूम रहे हैं। जहां देखो वहीं, या तो विरह में दुख आपके गड़ने लगता है या फिर ‘डमड डमड डिमिड डिमिड’ करके शंकर जी की बारात गाने लगते हैं। कुछ नया कीजिए। अब तो कविता को अपने चंगुल से मुक्त कर दीजिए।’ इतना कहकर युवा आलोचक कविदहल किसी दूसरे कवि की तलाश में चलता बना।

Monday, December 12, 2016

श्मशानघाट में राग-विराग

वे मुझसे श्मशानघाट में मिले। मुझे देखते ही लपक कर मेरे पास आए। बोले, ‘यही वह जगह है जहां आदमी को एहसास होता है कि यह जगत मिथ्या है, भ्रम है। यहां आकर इंसान राग-विराग, ईर्ष्या-द्वेष, निंदा-प्रशंसा आदि मानवीय गुणों-अवगुणों से मुक्ति पा लेता है। राजा-रंक सभी एक समान हो जाते हैं। या यों कहिए कि श्मशान घाट में सच्चा समाजवाद स्थापित हो जाता है। मैं तो जब भी श्मशान घाट में जाता हूं, तो अपने को सांसारिक मोह-माया से मुक्त पाता हूं। कोई कामना, कोई इच्छा बाकी नहीं रह जाती है। जैसे कि अब हूं। ऐसा लगता है कि यहां आने के बाद ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं और परम ब्रह्म के दर्शन हो जाते हैं।’
मैंने पास में अंतिम संस्कार के लिए तैयार किए जा रहे एक शव की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘आपके रिश्तेदार थे?’ वे अंतरिक्ष की ओर निहारते हुए निर्लिप्त भाव से बोले, ‘हां..बहुत अच्छे थे, लेकिन परम दर्जे के स्वार्थी भी थे। पैसे के आगे इन्होंने जीवन भर मां को मां नहीं समझा,
बीवी को बीवी, बेटी-बेटों को बेटी-बेटा नहीं समझा। बस, जैसे एक ही धुन सवार थी, पैसा कमाना है, सभी सुखों को तिलांजलि देकर बस पैसा कमाते गए। इतना कमाया कि हमारे सभी रिश्तेदारों में सबसे अमीर हो गए।’
मैंने उत्सुक भाव से पूछा, ‘इनकी मौत कैसे हुई? बीमार थे?’ ‘नहीं भाई..हार्ट अटैक से मर गए। जब से नोटबंदी हुई है, तब से काफी बेचैन थे। डॉक्टर ने काफी प्रयास किया कि वे बेचैन न रहें, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे, उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। कल रात बेचैनी इतनी बढ़ी थी कि इन्हें हार्ट अटैक पड़ा। कोई कुछ कर पाता कि उससे पहले थोड़ी ही देर में टें बोल गया ससुर का नाती...हरामखोर..बेहूदा।’
मैंने विस्मय से उन्हें देखा। थोड़ी देर पहले श्मशान घाट में राग-विराग से मुक्त होने और परम ब्रह्म का दर्शन कर लेने का दावा करने वाला व्यक्ति अपने दिवंगत रिश्तेदार के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा था। हालांकि, भारतीय संस्कृति में बुरे आदमी को भी अच्छा बताने की परंपरा रही है।
मैं कुछ बोलता, उससे पहले वे बोल उठे, ‘चार करोड़ रुपये पड़े के पड़े रह गए..साथ कुछ नहीं गया..दो हाथ का यह कफन भी अभी जल कर खाक हो जाए। एक हफ्ते पहले मैंने इस ससुरे से कहा था, तुम्हारे पास इतना पैसा है, पांच-दस लाख रुपये मुझे दे दो, मैं इसे ठिकाने लगा लूंगा। अपने एक दूसरे रिश्तेदार का मामला सुलटा कर चार लाख रुपये कमा चुका हूं। मैंने सोचा था, इससे भी पांच-दस लाख रुपये कमा लूंगा, लेकिन ससुरे ने जान दे दी, रोकड़ा नहीं दिया।’ इतना कहकर उन्होंने जमीन पर थूक दिया, मानो उन्होंने रिश्तेदार  और शव के पास चले गए। मैं सन्न खड़ा उन्हें देखता रहा।

Sunday, December 11, 2016

तू भी चर, मैं भी चरूं

-अशोक मिश्र
थे तो वे दोनों गधे ही। उनकी मुलाकात अचानक हुई थी। अचानक हुई मुलाकात थोड़ी देर बाद मित्रता में बदल गई। बात यह थी कि मोहरीपुर के पास स्थित कालोनी के पार्क का खुला गेट देखकर एक गधा घुसा और जल्दी-जल्दी चरने लगा। थोड़ी देर बाद पता नहीं कहां से दूसरा गधा भी आ पहुंचा। पहले वाला गधा बाद में आने वाले गधे को देखकर भड़क उठा। उसने दुलत्ती झाड़ते हुए ‘ढेंचू-ढेंचू’ का गर्दभ राग अलापा और गुर्राया, ‘अबे..तुझे कोई दूसरा पार्क या खेत नहीं मिला था चरने के लिए? इतना बड़ा देश पड़ा है चरने के लिए, तू वहीं क्यों आ गया जहां पहले से मैं चर रहा था।’
बाद में आने वाले गधे ने लपकर एक खूबसूरत फूल के पौधे को दांतों से पकड़कर उखाड़ा और चबाते हुए बोला, ‘सचमुच..इन्सान अगर हिकारत से हमें ‘गधा’ कहते हैं, तो कोई गलत नहीं कहते। हम गधे हैं, गधे थे और भविष्य में भी गधे ही रहेंगे। इतने बड़े पार्क में अगर एक दिन मैंने चर लिया, तो कहां का पहाड़ टूट पड़ा। इंसानों को देखो। वे जब देश, प्रदेश, जिला या तहसील को चारागाह समझकर चरते हैं, तो आपस में मिल बांटकर चरते हैं। ‘थोड़ा तू चर, थोड़ा मैं चरता हूं’ वाले सिद्धांत पर बड़ी ईमानदारी से अमल करते हैं। एक हम हैं कि मुट्ठी भर घास के लिए आपस में दुलत्ती झाड़ रहे हैं। लानत है हम गधों पर इस प्रवृत्ति पर।’
पहले वाला गधा उसका गर्दभ राग सुनकर थोड़ा शर्मिंदा हुआ और पहले की अपेक्षा थोड़ा नर्म आवाज में बोला, ‘ठीक है..ठीक है..बहुत ज्यादा भाव मत खा। आज पेटभर चर ले और निकल ले।’ पहले वाले गधे का पेट थोड़ा बहुत पहले से ही भरा हुआ था, वह पार्क में लगे पेड़-पौधों को चुन-चुनकर चर रहा था, जबकि बाद वाला गधे को शायद कई दिनों से घास नहीं मिली थी। वह बिना कुछ सोचे-बिचारे बस चरता जा रहा था। जब थोड़ा पेट भर गया, तो उसने मुंह उठाया और पहले वाले गधे के पास जाकर बोला,‘भाई! यह बताओ, आज पार्क का रखवाला यानी माली नहीं दिखाई दे रहा है? कालोनी में भी चहल-पहल नहीं दिखाई दे रही है। मामला क्या है?’
‘यह सब किसी नोटबंदी का कमाल है। सुना है कि इस देश के प्रधानमंत्री ने नोटबंदी लागू की है। तब से सारे लोग परेशान हैं। अमीर भी, गरीब भी। चोर भी, उचक्के भी। सज्जन भी, दुर्जन भी। बेईमान भी, शाह भी। जो भ्रष्टाचारी हैं, बेईमान हैं, वे अपने नोट को तीरे-थाहे (सुरक्षित करने) लगाने में लगे हैं। जो ईमानदार हैं, वे सुबह से लेकर शाम तक लाइन में लगे हुए हैं। जितने दिन यह कतारबंदी चलेगी, उतने दिन तक समझो, हम गधों की मौज है।’ इतना कहकर पहले वाला गधा चरने लगा। पहले गधे को चरता देखकर दूसरा भी चरने लगा।

Sunday, November 20, 2016

ये मुई सोनम गुप्ता..कौन लड़की है?

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अशोक मिश्र
मेरे एक मित्र हैं रामभूल उपाध्याय। अधेड़ावस्था के अंतिम दहलीज पर खड़े हैं। वे थोड़ा रसिक किस्म के जीव हैं। महिलाओं से और महिलाओं के बारे में बातें करना उनका पसंदीदा शगल है। जब भी कोई उनकी रसिकता पर अंगुली उठाता है, तो वे बड़े गर्व से कहते हैं, ‘हई बात तुम सब अच्छी तरह से जान लो। मैं रसिक हूं, अय्याश नहीं। रसिक तो बड़े-बड़े कवि, साहित्यकार, राजनेता, दार्शनिक, विचारक भी रहे हैं। इन लोगों का आज तक किसी ने टेंटुआ नहीं पकड़ा। रामभूल थोड़ा रसिक क्या हुए, सारे जमाने में ढिंढोरा पिट गया।’ कल सब्जी खरीदते समय रामभूल मिल गए। मुझे देखते ही मुस्कुराए और बांह पकड़कर बोले, ‘चाय पियोगे?’ मैंने मना कर दिया, तो आग्रहपूर्वक बोले, ‘चलो..सुखई की दुकान पर चलकर पकौड़ी खाते हैं।’ उनके आग्रह से मैं चौंक गया। मैंने सोचा, ‘चलो..जब उपधिया जी इतना मान मनुहार कर रहे हैं, तो उनसे कुछ खर्च ही करा लेता हूं।’
उन्होंने सुखई की दुकान पर सबसे पहले कोने की जगह तलाशी। दो फुल प्लेट पकौड़ी के साथ चाय का आर्डर दिया। मैंने पूछा, ‘उपधिया जी..बात क्या है? मछली के आगे चाय-पकौड़ी का चारा क्यों डाला जा रहा है?’ मेरी बात सुनकर रामभूल गंभीर हो गए, ‘हई बताओ..ई मुई सोनम गुप्ता..कौन लड़की है? औ ई बेवफाई का क्या चक्कर है जी?’ उनकी बात सुनकर मैं मुस्कुराया, ‘आपको सोनम गुप्ता की इतनी चिंता क्यों है?’ वे फुसफुसाए, ‘मने.. फेसबुकवा पर इतना हो-हल्ला हो रहा है, इसलिए पूछा। बेचारी की इतनी छीछालेदर हो रही है। मालूम नहीं, किन विषम परिस्थितियों में बेचारी ने बेवफाई का फैसला लिया होगा? प्रेमी से बेवफाई की या पति से? वह विवाहिता है या कुंवारी? विवाहिता है, तो बाल-बच्चेदार है या निपूती है। मुझे बड़ी दया आ रही है बेचारी पर। ई बताओ..तुम्हारे मोहल्ले में तो नहीं रहती है?’ इस दौरान सुखई चाय-पकौड़ी रखकर जा चुका था। मैं अपने हिस्से की पकौड़ी भकोस गया। अब उनके हिस्से पर हाथ साफ कर रहा था। मैंने पकौड़ी मुंह में डालते हुए कहा, ‘अगर मेरे मोहल्ले में रहती हो, तो?’
रामभूल ने गहरी सांस ली, ‘तो बेचारी को समझाऊंगा। इतने लोगों से बेचारी अकेले जूझ रही है। संकट के समय में कोई तो ऐसा हो उसके पास जिसके कंधे पर सिर रखकर रो सके, किसी को अपना समझ सके।’ मैंने कहा, ‘माफ कीजिए, सोनम गुप्ता एक कोडवर्ड है जिसका मतलब है सोने को छिपा दो। सरकार उस पर धावा बोलने वाली है।’ इतना सुनते ही वे झटके से उठे, ‘मुझे जरा जल्दी है, मैं जा रहा हूं। तुम ऐसा करना चाय पकौड़ी का भुगतान कर देना।’ इतना कहकर वे चलते बने।

Friday, November 18, 2016

आग लगा के जमालो दूर खड़ी

अशोक मिश्र
एक हैं जमालो। जमालो का संबंध ‘चौंका’ संप्रदाय से है। बात-बात पर चौंकना और दूसरों को चौंका देना, उनका शगल है। उनके पेट में पूरे गांव की खबरें दिन भर खदबदाया करती हैं। गांव-जंवार की खबरें उन तक न पहुंचे, ऐसा हो ही नहीं सकता। इस बात को आप यों समझें कि गांव वालों के लिए वे करमचंद जासूस हैं। किसके घर में दाल पकी, किसके घर में भूजे से काम चला और कौन रात में भूखे पेट सोया, सब राई-रत्ती जमालो को खबर रहती है। एक दिन गजब हो गया। पता नहीं किसने जमालो को परधानी का चुनाव लड़ने की सलाह दे दी। वे मान भी गईं। उस पर कोढ़ में खाज वाली कहावत तब चरितार्थ हुई कि वे परधानी का चुनाव भी जीत गईं। जीतते ही चौपाल पर जमालो ने घोषणा की कि अगर गांव के लोग दस घंटे काम करेंगे, तो वे ग्यारह घंटे काम करेंगी। अगर वे चौबीस घंटे काम करेंगे, तो वे पच्चीस घंटे लगातार काम करने के बाद ही पानी पियेंगी।
लोगों ने खूब तालियां बजाई। भीड़ में से एक युवक ने कहा, परधानिन जी! दिन तो चौबीस घंटे का ही होता है..आप पच्चीस घंटे कैसे काम करेंगी? जमालो ने उसे डपट दिया, खबरदार! जो परधानिन कहा। मैं पराधान सेवक हूं। उस दिन से जब भी जमालो गांव की जनता को संबोधित करतीं, खुद को  परधान सेवक कहती थीं। जमालो की एक खूबी यह थी कि वे भीड़ जमा कर लेने में दक्ष थीं। मदारी की तरह डमरू बजाते ही लोग उनकी बात सुनने के लिए अपना काम-धाम छोड़कर जमा हो जाते हैं।
एक दिन पता नहीं कहां से जमालो को सूचना मिली कि गांववालों ने फूस की झोपड़ियों में कालाधन छिपा रखा है। बस, जमालो के दिमाग में खब्त सवार हो गया िक गांव के हित में झोपड़ियों में छिपा कालाधन बाहर लाना है। गांव का हर हालत में विकास करवाना है। पहले तो उन्होंने गांव वालों से चिरौरी की कि भइया..डेहरी, (मिट्टी की बखार जिसमें अनाज रखा जाता है), हांड़ी-गगरी में जो तुमने गांव के विकास में लगने वाला कालाधन छिपाकर रखा है, वह मेरे पास जमा कर दो। गांव के बड़े लोग उनकी बात सुनकर मुंह छिपाकर हंसते और गरीब चिरौरी करते कि परधानिन जी! यहां जहर खाने को पैसे नहीं है, आप कालाधन की बात कर रही हैं।
एक दिन गांव में वह हुआ जिसकी किसी को आशंका तक नहीं थी। गांव में जितनी भी झोपड़ियां थीं, वे धू-धू कर जलने लगीं। लोग बदहवास से अपने-अपने घर की आग बुझाने में जुट गए। जमालो ऊंची जगह पर खड़ी होकर कहने लगीं, जिसकी भी झोपड़ियां जल रही हैं, वे मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। इतनी सर्दी में मैंने तापने की व्यवस्था तो कर दी।

Saturday, October 22, 2016

सड़क पर चलने की तमीज

अशोक मिश्र
मेरे एक मित्र हैं राम भूल उपाध्याय। कहते हैं कि राम ने जब उन्हें गढ़ा, तो मर्त्यलोक में भेजना ही भूल गया। काफी दिनों बाद याद आई, तो ढकेल दिया धरती पर, जाओ ऐश करो। तो कुल लब्बोलुआब यह है कि कल रात खबर मिली कि किसी से टकराकर राम भूल उपाध्याय चोटिल हो गए हैं और अस्पताल में हैं। मैं भागा-भाग अस्पताल पहुंचा, तो देखा कि उपाध्याय जी दहाड़ रहे थे, ‘यहां से हटाओ इसे ..मैं इससे पट्टी नहीं बंधवाना चाहता।’ मैंने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘क्या हुआ उपाध्याय जी..आप क्यों अस्पताल में गदर मचाए हुए हैं? बात क्या है?’
उपाध्याय जी दहाड़े, ‘देखने से ही हई नर्स नर्स नहीं लगती है। देखो तो किस तरह सज-संवर कर आई है। यह क्या इलाज करेगी मेरा।’ मैंने कहा, ‘छोड़िए...यह सब बातें। आप यह बताइए कि यह हादसा हुआ कैसे? कहां टकरा गए थे? पहले भी आपसे कहा है कि गाड़ी चलाते समय औरतों को घूर-घूरकर देखना बंद कीजिए, लेकिन आप हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं लेते हैं।’ मेरी बात सुनकर रामभूल उपाध्याय एकदम से आग बबूला हो गए,‘अरे क्या बताएं! नालायक को सड़क पर चलने की तमीज ही नहीं है। यह गोरखपुर तो अब चलने के लायक नहीं रहा। छोटे-बड़े का लिहाज ही नहीं रहा। बताओ भला..छोटे-छोटे लौंडे सर्र-सर्र मोटरसाइकिल आगे से निकाल ले जाते हैं। इन लौंडे-लपाड़ियों के चक्कर में मैं कई बार तो गिरते-गिरते बचा हूं।’
मैंने उपाध्याय जी को टोकते हुए कहा, ‘आप यह बताइए कि सड़क पर आपने ठोंका किसे? आपको चोट तो ज्यादा नहीं लगी? गाड़ी तो सही सलामत है न!’ उपाध्याय जी अपना दर्द भूलकर बोले, ‘गाड़ी को नुकसान तो हुआ है, बहुत हुआ है।’ उन्होंने यह बात कुछ इस तरह से कही कि मैं तय नहीं कर पाया, उन्हें टांग टूटने का अफसोस ज्यादा है या गाड़ी के टूटने का।
‘अरे आप बात तो बताइए, हुआ कैसे?’ मैं भी मामला जानने को उत्सुक था। वे कुछ देर बाद बुदबुदाए, ‘ये समधिन भी न..’ मैंने बात काटी, ‘अब आपकी टांग टूटने में समधिन कहां से कूद पड़ीं।’ उपाध्याय जी झल्लाए स्वर में बोले, ‘मैं टकराया भी तो समधिन के कारण था। मैं घर जा रहा था, अचानक समधिन की याद आ गई। उनकी मृगनयनी आंखों को याद करने में इतना खो गया कि सामने से आता वह दिखा ही नहीं।’ अब मेरा धैर्य जवाब देने लगा था। मैंने झल्लाए स्वर में कहा,‘भगवन! आप टकराये किससे थे?’ ‘अरे यार! बरगदवां के पास सांड से टकरा गया था। ससुरा दायीं ओर चला आ रहा था। ससुरे साड़ तक को तो सड़क पर चलने की तमीज ही नहीं है।’ उपाध्याय जी की बात सुनते ही मैं ठहाका लगाकर हंस पड़ा।

Wednesday, January 6, 2016

प्रभु जी! यात्रियों की आदत मत बिगाडि़ए...

-अशोक मिश्र
हद हो गई यार! हमारे रेलमंत्री को लोगों ने क्या पैंट्री कार का इंचार्ज, गब्बर सिंह या सखी हातिमताई समझ रखा है? जिसे देखो, वही ट्वीट कर रहा है, 'प्रभु जी! मैं फलां गाड़ी से सफर कर रही हूं। गाड़ी में मेरे बच्चे ने गंदगी फैला दी है। जरा अपने किसी सफाई कर्मचारी को भेज दीजिए न, बहुत दिक्कत हो रही है।Ó कोई एसएमएस भेजकर गुहार लगा रहा है, 'मंत्री जी, मैं एक विकट समस्या में फंस गई हूं। बात दरअसल यह है कि मेरा बच्चा दूध नहीं पी रहा है, आकर एक कंटाप जड़ दीजिए तो, शायद आपके ही डर से दूध पी ले। मैं तो समझाते-समझाते थक गई हूं।' कोई फेसबुक पर लिख रहा है, 'प्रभु जी! जल्दी-जल्दी में टिकट नहीं ले पाई थी, जरा चार टिकट का प्रबंध करवा दीजिए, प्लीज।' इस देश का तो भगवान ही मालिक है। एक बार प्रभु जी ने किसी की मदद क्या कर दी, लोगों ने उन्हें फोकटिया समझ लिया है। अरे देश के रेल मंत्री हैं, कोई मामूली बात है। उनके सामने सौ झंझट हैं, हजारों लफड़े हैं। कहीं रेल की पटरियां बिछवानी हैं, तो कहीं रेल इंजन कारखाना लगवाना है। उन्हें यह भी देखना है कि क्या किया जाए जिससे रेलवे को फायदा हो। प्रभु जी के सामने एक अजीब मुसीबत है। रेलवे को घाटा हो जाए, तो विरोधी दल वाले नाकों में दम कर देंगे। अक्षमता का आरोप लगाएंगे। 'रेल मंत्री इस्तीफा दो..रेल मंत्री इस्तीफा दो' का नारा लगाएंगे। अगर रेल विभाग फायदे में आ गया, तो झट से दूसरा आरोप विरोधी दलों के पास तैयार है। रेल मंत्री ने तो  रेल यात्रियों को एकदम से दुह लिया। इतना किराया बढ़ा दिया कि बेचारे यात्रियों का दम ही निकल गया। कर लो बात..फायदा हो, तब भी विरोध, नुकसान हो, तब भी विरोध। किसी भी तरह उन्हें चैन नहीं। ऊपर से रेल विभाग में इतने सारे मुलाजिम हैं, वे भी आए दिन हाय-हाय करते रहते हैं, 'तनख्वाह बढ़ाओ..तनख्वाह बढ़ाओ।' इतना बड़ा देश है, रेलवे का इतना बड़ा महकमा है। सब को सुधारना है। अब अगर ऐसे ही लोग ट्विटर पर, फेसबुक पर डिमांड करने लगेंगे, तो फिर हो गया काम। सुधर गई रेलवे की दशा-दिशा।
और प्रभु जी! आपसे बस इतनी ही शिकायत है कि आप इस देश की जनता को काहे इतना भाव दे रहे हैं। आपने रेलगाड़ी में महिला से बदतमीजी कर रहे शोहदों को पकड़वा दिया, बहुत बढिय़ा किया। आप बस ऐसे ही कामों पर ध्यान दीजिए। कोई शोहदा, चोर-डाकू यात्रियों को परेशान न करने पाए। बाकी एसएमएस, ट्विटर या फेसबुक से दूध-दही मंगाने वालों को भाव मत दीजिए। आप इन लोगों की फितरत को नहीं जानते हैं। अंगुली पकड़ाएंगे, तो ये 'पहुंचा' पकडऩे को तैयार रहते हैं। आपने भले ही दया भावना या अपनी जिम्मेदारी समझकर किसी के ट्वीट पर उसकी मदद की हो, उसके बेटी-बेटे के लिए दूध की व्यवस्था कर दी हो, लेकिन प्लीज...आगे से ऐसा मत कीजिए। जो लोग जनरल और स्लीपर कंपार्टमेंट में गाय-बैल की तरह ठसाठस भरकर यात्रा के आदी हैं, उनको आप मुफ्तखोर मत बनाइए। ये हैं ही इसी काबिल। इनकी तो मानसिकता है कि चमड़ी चली जाए, दमड़ी न जाए।  सभी गाडिय़ों में स्लीपर और एसी के इतने डिब्बे लगाए गए हैं, लेकिन यात्रा करेंगे जनरल डिब्बे में। तो मरो। अब हाथ पकड़कर कोई स्लीपर या एसी टिकट खरीदवाने से रहा। अगर इनको ट्विटर या फेसबुक पर चलती ट्रेन में कुछ मंगाने की लत लग गई, तो कल ये आपको ट्वीट करके चिकन-बिरयानी की डिमांड करेंगे। बियर, ह्विस्की, रम के लिए एसएमएस करेंगे। फिर चखना भी मांगेंगे। आप कहां-कहां तक इनकी डिमांड पूरी करेंगे। आप आजिज आ जाएंगे। यह देश और रेलवे विभाग जैसे चल रहा है, चलने दीजिए, प्लीज!

Monday, January 4, 2016

नए वर्ष में व्यंग्यकारों के तारे-सितारे

-अशोक मिश्र
नया साल व्यंग्यकारों के लिए बड़ा चौचक रहने वाला है। नए वर्ष में व्यंग्यकारों की कुंडली के सातवें घर में बैठा राहु पांचवें घर के बुध से राजनीतिक गठबंधन कर रहा है। अत: संभव है कि प्रधानमंत्री और देश के 66 फीसदी राज्यों के मुख्यमंत्री व्यंग्यकार हो जाएं या फिर राजनीतिक उठापटक के चलते व्यंग्यकार ही प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री हो जाएं। वैसे इनके व्यंग्यकार होने की संभावना सिर्फ 57 फीसदी ही है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की कुंडली के नौवें घर में बैठा राहु दूसरे घर में बैठे केतु से मिल उलट-फेर करने के मूड में है। बस, यही गठबंधन उनके खिलाफ साजिश रच सकता है। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री और सभी मुख्यमंत्री राज्य के दो दर्जन व्यंग्यकारों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लें या फिर उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दे दें, तो राहु और केतु के गठबंधन के प्रभाव को कम किया जा सकता है। वैसे 43 फीसदी संभावना यह भी है कि नए वर्ष में व्यंग्यकारों को साहित्य से लेकर देश की राजनीति तक का कबाड़ा करने का मौका हासिल हो। इसके लिए  उन्हें प्रति सप्ताह 'सत्ता प्राप्ति महायज्ञ' करना होगा। 
अब तक जो संपादक व्यंग्य के नाम पर मुंह सिकोड़ लेते थे, उन्हें असाहित्यिक मानते थे, व्यंग्यकारों को समाज का सबसे निकम्मा व्यक्ति मानते थे, उनके मनोभावों में परिवर्तन होगा। ऐसा व्यंग्यकारों की कुंडली के पहले घर में बैठे शुक्र महाराज की कृपा के चलते होगा। शुक्र प्रबल होने के चलते पूरे वर्ष पुरुष व्यंग्यकारों पर 'पत्नीयात पिटन योग' (पत्नी से पीटे जाने का योग) प्रभावी रहेगा। इसलिए पुरुष व्यंग्यकारों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी चेलियों और प्रेमिकाओं से दो कोस दूर रहें। चेलियों या प्रेमिकाओं के आसपास भी पाए जाने पर पत्नी से पीटे जाने का खतरा पूरे वर्ष बना रहेगा। 
पुरुष व्यंग्यकार जातक अपनी सालियों और सलहजों से चार फुट दूरी से बात करें, शिष्ट हास-परिहास की इजाजत नौवें घर में बैठे बृहस्पति महाराज दे रहे हैं, लेकिन जहां ज्यादा लल्लो-चप्पो की, तो ससुराल में ही पत्नी के क्रोध रूपी आरडीएक्स से मान-सम्मान के परखच्चे उड़ जाने का अंदेशा है। महिला व्यंग्यकार जातकों को सलाह दी जाती है कि वे अपने देवरों, ननदोइयों और जीजाओं से बतियाने, हंसी-ठिठोली करने से नए वर्ष में परहेज करें, वरना पति के अविवाहित साली से प्रेम  प्रदर्शित करने के प्रबल योग हैं। इस वर्ष उनकी कुंडली के नौवें घर में बैठा बृहस्पति चौथे घर में बैठे मंगल से 'रहस्य उद्घाटक योग' बना रहा है।
नए वर्ष में व्यंग्यकारों के तारे-सितारे इतने प्रबल हैं कि वे हर पत्रिका, अखबार, टीवी चैनलों तक पर पूरे वर्ष छाये रहेंगे। चैनलों पर चलने वाले बहस-मुबाहिसे में उन्हें राजनेताओं से ज्यादा रुतबा हासिल होगा। वे जो कुछ कह देंगे, वही फाइनल होगा। पत्र-पत्रिकाओं में तो उनके जो जलवे होंगे, उसका कहना ही क्या है। कुछ संपादक तो अपने संपादकीय पेज से लेख, चिट्ठी-पत्री और संपादकीय गायब करके सिर्फ व्यंग्य ही छापेंगे। नियमित व्यंग्य लिखने वालों को अग्रिम भुगतान ही नहीं करेंगे, बल्कि वे पत्र-पत्रिकाएं जो अब तक कम संसाधन और रुपये-पैसे की कमी का रोना रोकर व्यंग्यकारों को टरका देती थीं, वे भी सारे खर्चे रोककर पहले व्यंग्यकारों का मानदेय देंगी और उसके बाद छपाई का भुगतान करेंगी। देश में प्रकाशित होने वाले सभी भाषाओं के दैनिक समाचार पत्र पहले पेज पर व्यंग्य ही छापा करेंगे। देश की पत्रकारिता में नया वर्ष 'व्यंग्य क्रांति' की सूत्रपात करेगा। नया वर्ष व्यंग्यकारों के लिए इतना प्रबल है कि देश के जितने भी सरकारी-गैर सरकारी सम्मान हैं, उनके नाम बदल दिए जाएंगे। सारे सम्मान या तो व्यंग्यकारों के नाम पर दिए जाएं या फिर व्यंग्यकारों को ही दिए जाएंगे। व्यंग्यकारों को बस इतना एहतियात बरतना होगा कि वे फिलहाल साल भर एक दूसरे की टांग-खिंचाई अभियान को तत्काल स्थगित कर दें या फिर हमेशा के लिए विराम लगा दें।