Sunday, December 20, 2015

ग्लोबल वॉर्मिंग का स्थायी समाधान

-अशोक मिश्र
आप लोग यह बताएं कि दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का अपर चैंबर खाली है क्या? अगर खाली नहीं होता, तो इतनी मामूली-सी बात को लेकर पेरिस में काहे मगजमारी करते। फोकट में अपनी-अपनी सरकारों का इत्ता रुपया-पैसा और टाइम खोटा किया। पेरिस के निवासियों को परेशान किया सो अलग। वह भी ग्लोबल वॉर्मिंग के नाम पर। अरे भाई! ग्लोबल-फ्लोबल  वॉर्मिंग समस्या का समाधान वहां नहीं है, जहां आप ढूंढ रहे हैं। यहां है..हमारे देश भारत में। जिंदगी भर दुनिया भर में घूम-घूमकर बैठकें करो, समिट करो, सेमिनार करो, लेकिन समस्या का हल मिलेगा, तो सिर्फ भारत में। भारत ऐसे ही विश्व गुरु थोड़े न कहा जाता है। हमारे देश का ज्ञान-विज्ञान हर युग में पूरी दुनिया में सबसे आगे और उन्नत रहा है। जब सारी दुनिया कच्छा  पहनने को तरस रही थी, तब हमारे देश के बच्चे मंगल, बुध और बृहस्पति पर जाकर कबड्डी खेला करते थे। शुक्र ग्रह पर उडऩे वाली पतंगों को लूटने के लिए नेप्चूयन और शुक्र ग्रह तक जाना पड़ता था। तो कहने का लब्बोलुआब यह है कि हर समस्या का समाधान हमारे देश में मौजूद है। समस्या कोई भी हो, चुटकी बजाते हल खोजने में माहिर अगर कोई है, हम ही लोग हैं। पूरी दुनिया कोई भी आविष्कार कर ले, लेकिन हमारे एक आविष्कार के आगे बेकार..। हमारे यहां जब से 'जुगाड़Ó का आविष्कार हुआ है, तब से दुनिया के सारे आविष्कार उसके आगे फेल हैं।
ग्लोबल वॉर्मिंग पर हमारे देश के ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले जुगाड़ खोज निकाला था। वह था मौन। मियां-बीवी का मौन। वे इस बात को अच्छी तरह से समझ गए थे कि जब भी मियां-बीवी आपस में संवाद करेंगे, ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या पैदा होगी। तब वे ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए कभी कभी मियां-बीवी संवाद पर रोक लगा देते थे। आज अगर समस्या ज्यादा बड़ी लग रही है, तो दस साल तक पूरी दुनिया में पति-पत्नी संवाद पर प्रतिबंध लगा दीजिए। फिर देखिए, ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या छूमंतर हो जाती है कि नहीं। यह भारत का सदियों पुराना आजमाया हुआ नुस्खा है। इसकी प्रामाणिकता और सत्यता को कोई चुनौती नहीं दे सकता है।
हमारे एक प्राचीन ग्रंथ में तो साफ-साफ लिखा है कि मोटरगाडिय़ों, वातानुकूलन यंत्र (एसी), कल-कारखानों से निकलने वाले धुएं और दूसरे जीवाश्म को जलाने से उतना ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्र्जन नहीं होता है, जितना पति-पत्नी संवाद के समय हानिकारक गैसे का उत्सर्जन होता है। इस पृथ्वी पर अगर पति-पत्नी पुल वॉल्यूम पर एक दूसरे पर चीख-चिल्ला रहे हों, तो उस समय 22 वातानुकूलन यंत्र, 38 चारपहिया वाहन और 4 कल-कारखानों जितनी कार्बन डाई आक्साइड गैस का उत्सर्जन होता है। अगर पत्नी पति के देर से घर आने के चलते चीखती-चिल्लाती है, तो सवा टन कार्बन डाई आक्साइड गैस का उत्सर्जन होता है। अगर पति अड़ोस-पड़ोस की महिलाओं से नैन-मटक्का करता है, तो ढाई टन कार्बन डाई आक्साइड गैस उत्सर्जित होती है। अगर पति बेवफा निकल जाए, तो ग्रीन हाउस गैसों के साथ-साथ चिमटा, बेलन, कप-प्लेट, बर्तन आदि प्रक्षेपित होने लगते हैं और घर का वातावरण गरम हो जाने से हीलियम, मीथेन, पराबैगनी किरणों का भी उत्सर्जन होने लगता है। पत्नी के दिमाग का पारा जिस अनुपात में बढ़ा होता है, कार्बन डाईआक्साइड के भारी उत्सर्जन के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण की मात्रा में भी अभिवृद्धि होने लगती है।
दस साल तक पति-पत्नी संवाद  पर कठोर प्रतिबंध के बावजूद यदि  ग्लोबल वॉर्मिंग में अपेक्षित सुधार कि इससे बात नहीं बनने वाली, तो पति-पत्नी संवाद के साथ-साथ सास-बहू, देवरानी-जिठानी, ननद-भौजाई संवाद पर भी प्रतिबंध लगा दो। फिर देखो कमाल। खट से पृथ्वी ठंडी होती है कि नहीं।
आपको अगर इस बात पर विश्वास नहीं है, तो हमारे यहां का प्राकृत, पालि या संस्कृत साहित्य उठाकर देख लो, सैकड़ों श्लोक मिल जाएंगे जिनका निहितार्थ यह है कि सप्ताह में कम से कम छह दिन प्रत्येक दंपती को मौन व्रत रखना चाहिए। पति-पत्नी संवाद पर प्रतिबंध लगाकर न केवल घर के वातावरण को गर्म होने से रोका जा सकता है, बल्कि पूरी पृथ्वी को गर्म होने से बचाया जा सकता है। 

Tuesday, December 8, 2015

भुक्खड़ नहीं होते ईमानदार

-अशोक मिश्र
केजरी भाई लाख टके की बात कहते हैं। अगर आदमी भूखा रहेगा, तो ईमानदार कैसे रहेगा? भुक्खड़ आदमी ईमानदार हो सकता है भला। हो ही नहीं सकता। आप किसी तीन दिन के भूखे आदमी को जलेबी की रखवाली करने का जिम्मा सौंप दो। फिर देखो क्या होता है? पहले तो वह ईमानदार रहने की कोशिश करेगा। देश, समाज, परिवार और गांव-गिरांव की नैतिकता की दुहाई देगा। अपने होंठों पर जुबान फेरेगा। भूख से लडऩे की कोशिश करेगा। और जब...भूख बर्दाश्त से बाहर हो जाएगी, तो...? तो वह मन ही मन या फिर जोर से चीख कर कहेगा, 'ऐसी की तैसी में गई ईमानदारी। पहले पेट पूजा, फिर काम दूजा।' सच है कि मुरदों की कोई ईमानदारी नहीं होती है। जब आदमी जिंदा रहेगा, तभी न ईमानदार रहेगा। मरे हुए आदमी के लिए क्या ईमानदारी, क्या बेईमानी..सब बराबर है। वैसे भी भूख और ईमानदारी में जन्म जन्मांतर का बैर है। हमारे पुराने ग्रंथों में भी कहा गया है कि बुभुक्षितम किम न करोति पापम!
इस सत्य को बहुत पहले हमारे ऋषि-मुनि, त्यागी-तपस्वी समझ-बूझ गए थे। तभी तो उन्होंने कहा कि भूखे भजन न होय गोपाला। यह लो अपनी कंठी-माला। कहते हैं कि एक बार ऐसी ही स्थिति महात्मा बुद्ध के सामने आ पड़ी। उनका एक शिष्य भूखे आदमी को अहिंसा का संदेश दे रहा था। उसका ध्यान ही नहीं लग रहा था। शिष्य उस आदमी के कान पकड़कर महात्मा बुद्ध के सामने ले गया। महात्मा बुद्ध तो अंतरयामी थे। समझ गए कि भूखे भजन न होय गोपाला। फिर क्या था, पहले भर पेट उस आदमी को फास्टफूड खिलाया। जब उस आदमी ने तृप्त होने के बाद डकार ली, तो महात्मा बुद्ध बोले, अब ले जाओ। इसे जी भरकर अहिंसा का संदेश दो। बस, इत्ती सी बात को लोग बूझ ही नहीं रहे हैं। हमारे केजरी भइया ने यह बात बूझी, तो लोग हल्ला मचा रहे हैं। घर के आगे धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। कर रहे हो विरोध-प्रदर्शन तो करते रहो, केजरी भइया की बला से। 
भला बताओ, यह भी कोई बात हुई। इतनी ज्ञान-ध्यान की बात केजरी भाई कह रहे हैं और लोग हैं कि खाली-पीली विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। ये लोग इस बात को समझ ही नहीं पाते हैं कि केंद्र से लेकर राज्यों तक, गांव से लेकर शहर तक भ्रष्टाचार, अनाचार, रिश्वत खोरी, लूट-खसोट सिर्फ इसलिए है क्योंकि केंद्र और विभिन्न राज्यों के कर्मचारियों का पेट ही नहीं भरता। इन्हें अगर इतनी तनख्वाह मिलने लगे कि वे अपनी धर्मपत्नी, अधर्म पत्नी, गर्लफ्रेंड्स या ब्वायफ्रेंड्स, अपने जायज-नाजायज बेटे-बेटियों को अमेरिका, स्वीटजरलैंड, इंग्लैंड, जापान घुमाने ले जा सकें, उन्हें बढिय़ा-बढिय़ा विदेशी कपड़े, परफ्यूम, शराब खरीदवा सकें, तो वे क्यों रिश्वत लेंगे। किसी फाइल को क्यों अटकाएंगे। चपरासी से लेकर बड़का अधिकारी तक ऑडी-फेरारी से आफिस आए-जाए, तो वह क्या सौ-पचास रुपये की टुच्ची रिश्वत लेगा।
अब आप लोग ही बताइए, बारह-पंद्रह हजार रुपये की तनख्वाह कोई तनख्वाह होती है। वैसे ढाई-तीन लाख रुपये भी कोई बड़ी रकम नहीं होती है। अरे इत्ती मामूली रकम से दिल्ली जैसी महंगी जगह में विधायकों का महीने भर गुजारा चल पाएगा? हमारे मोहल्ले में रहने वाले गुनाहगार शाम को अपनी टांके वाली प्रेमिका कल्लो भटियारिन को किसी मामूली होटल में भी लंच-डिनर कराने ले जाते हैं, तो दस-पंद्रह हजार के चपेट में आ जाते हैं। अरे विधायकों की भी कोई इज्जत है कि नहीं। किसी अरजेंट मीटिंग में जाना है और एल्लो..गाड़ी न पेट्रोल है, न पेट्रोल का पैसा। ऐसा कहीं कोई विधायक होता है। और फिर विधायकी का चुनाव कोई समाज सेवा के लिए लड़े थे क्या? होना तो यह चाहिए था कि कोई भी सांसद, मंत्री, बड़ा अधिकारी हो, तो उसे पद ग्रहण करते ही दस-बारह करोड़ रुपये उसके खाते में डाल दिए जाएं, ताकि वह ईमानदार रह सके। देश में ईमानदारी बची रहेगी, तो देश बचा रहेगा।
http://epaper.dainiktribuneonline.com/660408/Dainik-Tribune-Local-Edition/DT_09_December_2015#page/8/1

कहां नहीं है असहिष्णुता?

-अशोक मिश्र
इंटरमीडिएट की राजनीति शास्त्र की परीक्षा में पूछा गया था, असहिष्णुता क्या है, उदाहरण सहित विस्तार से समझाओ। बकलोल चंद इंटर कालेज के एक परीक्षार्थी ने लिखा-असहिष्णुता इस संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त है। एक क्या हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं। अगर हम धार्मिक आधार पर देखें, तो मानव जीवन की उत्पत्ति ही असहिष्णुता का परिणाम है, वरना स्वर्ग लोक की हजारों, लाखों अप्सराओं, हूरों को छोड़कर इस पृथ्वी पर कौन आना चाहता है। अब मैं अपना ही उदाहरण दूं। मैं जब बच्चा था, घुटनों के बल चलता था, मिट्टी खाना चाहता था, पानी में छपछपैया खेलना चाहता था। लेकिन हमारे मां-बाप, भाई-बहन, दादा-दादी असहिष्णु और मैं सहिष्णु था। वे मेरे हाथ में जैसे ही मिट्टी देखते थे, छीन कर फेंक देते थे। यही असहिष्णुता है, इंटॉलरेंस है। थोड़ा बड़ा हुआ, कंचे खेलने में मजा आता था, पतंग उड़ाने को जी करता था। गिल्ली-डंडा उन दिनों सबसे बढिय़ा खेल था, लेकिन असहिष्णु मां-बाप थे कि नहीं, खेलना नहीं है। पढ़ो 'अ' से अनार। खाक 'अ' से अनार।
स्कूलों में मास्टर तो सबसे बड़े वाले असहिष्णु हैं। मन तो खेल के मैदान में रमा हुआ है और रटा रहे हैं हिस्ट्री, ज्याग्रफी और मैथमेटिक्स के उबाऊ सूत्र। मेरा वश चले, तो इस दुनिया के सभी अध्यापकों, माताओं-पिताओं, भाइयों-बहनों, दादा-दादियों और पड़ोसियों को एक निर्जन द्वीप पर ले जाकर छोड़ दूं और कहूं कि लो..यहीं बैठकर अपने हुकुम डुलाओ पेड़, पौधों, हवा-पानी पर। थोड़ा बड़ा हुआ..मतलब जवान हुआ। लड़कियों से बातें करना, उनके आगे-पीछे घूमना, उनके नाज-नखरे उठाने का मन करता है, लेकिन सारी दुनिया मुझे असहिष्णु लगती है। घर वाले और बाहर वालों का वश चले, तो मेरा इस देश में रहना मुहाल कर दें। अभी तो यह हाल है, कल को मेरी शादी होगी। तब तो मेरे सामने असहिष्णुता का महासागर लहराएगा। तनिक भी मुंडी इधर-उधर डोली कि शुरू हो गई जंग। तुमने उसे क्यों देखा, इधर-उधर क्या देख रहे हो। शाम को किससे बतिया रहे थे। मतलब कि मैं पति न हुआ, गुलाम हो गया। इसके बाद उत्तर पुस्तिका में कुछ नहीं लिखा हुआ था। लगता है कि कुछ लिखने का समय नहीं बचा था और पुस्तिका छीन ली गई थी।

Wednesday, December 2, 2015

वो देवता तो नहीं थे, पर...

भाग-दो
अशोक मिश्र
बप्पा से लोग जरा भिड़ते कम थे। क्रोधी इतने कि एकदम परशुराम के अवतार। जो बात ठान ली तो ठान ली। एक बार मेरे मामा को बैल की जरूरत थी। मेरी ननिहाल रानीजोत मेरे गांव नथईपुरवा से मात्र दो-ढाई किमी की दूरी पर स्थित है। पहले तो पूरब-दक्षिण दिशा में गांव के बाहर आकर देखता था, तो मेरे मामा का घर धुंधला-धुंधला दिखाई देता था। पर अब नहीं दिखता। तो बात यह हो रही थी कि मेरे बड़े मामा स्व. अलखराम तिवारी मेरे बप्पा से पांच या साढ़े छह सौ रुपये में बछड़ा हांक ले गए, लेकिन पैसा नहीं दिया। यह पैसा बहुत दिनों तक पड़ा रहा। बाद में किसी बात को लेकर बप्पा और मेरे मामाओं में मनमुटाव हो गया, तो वे कई सालों तक रानीजोत नहीं गए। हर साल होली, दिवाली और अन्य तीज-त्यौहारों पर रानीजोते से आइसु (भोजन का निमंत्रण) आता, लेकिन वे नहीं जाते। लोगों को भी बाद में यह पता चल गया कि भग्गन मिसिर रानीजोत वालों से नाराज हैं। गांव-जंवार को लोगों ने जब रानीजोत वालों को हूंसना (निंदा करने का पर्यायवाची शब्द) शुरू किया, तो एक साल होली या दिवाली की सुबह (ठीक से याद नहीं) राजितराम तिवारी (अब स्वर्गीय) आकर दुआरे पर रोने लगे। बप्पा जितने क्रोधी, उतने ही नरम। उनके रोने से बप्पा पिघल गए। उन्होंने आइसु जीमने आने का आश्वासन देकर मामा को विदा कर दिया। शाम को वे न्यौता खाने भी गए। हां, उन्होंने अम्मा को उनके भाइयों की इस हरकत के लिए कभी उलाहना नहीं दिया।
बात शायद 1983 की है। उन दिनों मई का महीना था। हम सभी भाई रात में आंगन में खटिया डारे सो रहे थे। रात के दस-ग्यारह बजे होंगे। बप्पा घर के बाहर खटिया पर निखड़हरे यानी बिना कुछ बिछाए लेटे हुए थे। अचानक दरवाजा खटखटाया गया।
'ओ आनंद कै महतारी..आनंद कै महतारी..सोई गईउ का..?'
उन्नींदी सी अम्मा चौंक गई, 'का होय काकी?' इतना कहकर वह उठ बैठीं। यह बड़की काकी थीं। हम सब उन्हें बड़ी काकी कहते हैं, लेकिन वे रिश्ते में हमारी दादी हैं। चूंकि बाबूजी, दादू, दादा और सभी बुआ उन्हें काकी कहती थीं, तो हम लोग भी काकी कहते थे। अभी इधर कुछ सालों से यह संबोधन बदला है और अब हम लोग बड़ी आजी कहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम लोग अपने बड़े बाबा को बप्पा कहते थे। वे बड़ी किस कारण थीं, यह हम आज तक नहीं जान पाए हैं। हां, इन दिनों शायद वे गांव की महिलाओं में सबसे बुजुर्ग हैं। इसी साल मई-जून में जब गांव गया था, तो बड़ी काकी..ओह..बड़ी आजी से मिला था। उनकी स्मृति अब उतनी काम नहीं करती है। अल्जाइमर की रोगी की तरह..बात करते-करते यह भूल जाती हैं कि वे क्या कह रही थीं?
तो बात उस घटना की हो रही थी। मेर घर के ठीक बगल में पहलवान बाबा का घर है। इन दिनों उनके भांजे और उनका परिवार रहता है। पहलवान बाबा के आंगन और मेरे आंगन से एक छोटा सा स्थान ऐसा छोड़ा गया था, जो हमेशा खुला रहता था। उस हिस्से में दरवाजा कभी नहीं लगा था। अभी कुछ साल पहले जब हमारे यहां घर बनने लगा और पांच-पांच, छह-छह महीने तक कोई भी गांव में रहने की स्थिति में नहीं रह गया, तो बड़कऊ काका (पहलवान बाबा के भांजे) की सहमति से दीवार उठा दी गई। अब उनके घर में भी बहू-बेटियां होने की वजह से यह जरूर सा हो गया था। तो उसी चोर दरवाजे से बड़ी काकी हमारे आंगन में आ खड़ी हुईं। उनके हाथ में एक बड़ी सी लाठी थी, जिसके एक सिरे पर लोहे का मोटा सा ठोस छल्ला लगा था। वह हाथ में लाठी लिए दादी की खटिया के पास आ खड़ी हुईं और बोली, 'तू सबे सोवत हौ, गांव मा डकहा (डाकू) आय गे हैं।'
बड़ी काकी की बात सुनकर दादी ने एकदम उपहासजनक लहजे में कहा, 'जाय देव बडी..तुहूं बहुत डरपोक हौ..कहां डकहा आय गे हैं?'
'नाहीं अम्मा...सही ओढ़ाझार की ओर डकहा आए हैं। सड़किया पर रोशनी होत है। हमै लागत है कि चार-पांच मिला (आदमी) हैं, वै कांदभारी (एक गांव) और ओढ़ाझार की ओर से आवात हैं।' यह कहकर काकी ने अंधेरे में ही अपने चेहरे पर शायद चुहचुहा आए पसीने को पोंछा। आपको बता दें कि बड़ी काकी को वैवाहिक सुख ज्यादा दिन नहीं मिला था। वे काफी कम ही समय में विधवा हो गई थीं। उनके एक बेटी फुलमता बुआ हैं। वैसे तो फुलमता बुआ की ससुराल बगल के ही गांव नेतुआ में है, लेकिन अब बुआ-फूफा और उनका परिवार नथईपुरवा में ही रहता है।
तब तक अम्मा बोली, 'काकी..कहूं नाही डकहा आवत हैं। जाय कै चुप्पै सोइ रहौ।' बड़ी काकी जिद भरे स्वर में बोली, 'नाहीं आनंद कै महतारी..सचमुच डकहा आय गे है। अब तौ भगवानै बेड़ा पार लगइहैं।' एक बड़ी काकी ही उन दिनों अम्मा को 'आनंद कै महतारी' कहती थीं, बाकी औरतें बड़कू की अम्मा या अरुन कै अम्मा कहकर संबोधित करती थीं। या फिर काकी, बड़की अम्मा, बड़की दीदी आदि।
बड़ी काकी बात सुनकर हम लोगों की फूंक सरक गई। छोटा भाई राजेश जो चारपाई पर किनारे लेटा हुआ था, झट से बीच वाली चारपाई पर जाकर लेट गया और चुपचाप लेटा रहा। मैंने थोड़ी हिम्मत दिखाई, 'बड़ी काकी जब डकहा अहैं, तो पहले पच्छूं टोला (पश्चिमी टोला) की ओर ही तौ अइहैं।'
काकी बोलीं, 'अब का बताई..न जाने कौने तरफ से गांव मा घुसैं। अच्छा अम्मा..अब चलित है। सब लोग अंगना मा जागत रहौ और जब गुहार होइ, तो सब लोग लाठी, फरसा, बल्लम जौन मिले, लैके तुरंत फारिग ह्वै जाओ।' इतना कहकर वे पहलवान बाबा के आंगन की ओर चलीं। तभी दरवाजे पर आवाज आई, 'दादी..बड़की दीदी..दरवाजा खोलो..'
यह लाल जी की आवाज थी। लाल जी बोले, तो चचेरे भाई डॉक्टर अरविंद कुमार मिश्र, गोंडा जिले के सुप्रसिद्ध चिकित्सक और कुछ रोगों के विशेषज्ञ।  लाल जी दादू यानी प्रोफेसर कामेश्वर नाथ मिश्र जी के बड़े बेटे। पीछे से भइया की भी आवाज आने लगी। दुआरे पर चहल-पहल मच गई। भइया बोले, तो बड़कू..यानी आनंद प्रकाश मिश्र..।
(शेष..फिर..)

मौत, अभी मत आना मेरे पास

मौत
अभी मत आना मेरे पास
फुरसत नहीं है 
तुम्हारे साथ चलने की
लेकिन यह मत समझना
कि मैं डरता हूं तुमसे
कई काम पड़े हैं बाकी अभी
वो जो गिलहरी
बना रही है अपने बच्चों के लिए घरौंदा
ठीक से बन तो जाए।
फुरसत नहीं है मुझे
तब तक/ जब तक
इस धरती पर भूखा सोता है
एक भी बच्चा, स्त्री, पुरुष।
अभी श्रम की सत्ता
पूंजी की सत्ता को नहीं कर पाई है परास्त
पूंजी की सत्ता के खिलाफ
बिछा तो लूं विद्रोह की बारूद
कर लूं तैयार एक हरावल दस्ता
पूंजी की सत्ता के खिलाफ।
फिर तुम्हारे साथ
मैं खुद चल पडूंगा सहर्ष
मुझे मत डराओ अपनी थोथी कल्पनाओं से
स्वर्ग-नर्क, पुनर्जन्म
या फिर उन कपोल कल्पित कथाओं से
जो रच रखे हैं
तुम्हारे नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने।
मैं जानता हूं
मृत्यु कुछ नहीं
एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में
रूपांतरण मात्र है, बस।
मौत कहां होगी मेरी
मैं तो एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में
बदलकर भी रहूंगा जीवित
विचार के रूप में
किस्सों के रूप में
कहानियों के रूप में
लेकिन हां,
मत आना अभी
फुरसत नहीं है मेरे पास
बच्चे थोड़ा बड़े तो हो जाएं।

सेल्फी वाला पत्रकार नहीं हूं

-अशोक मिश्र
घर पहुंचते ही मैंने अपने कपड़े उतारे और पैंट की जेब से मोबाइल निकालकर चारपाई पर पटक दिया। मोबाइल देखते ही घरैतिन की आंखों में चमक आ गई। दूसरे कमरे से बच्चे भी सिमट आए थे। घरैतिन ने मोबाइल फोन झपटकर उठा लिया और उसमें कुछ देखने लगीं। मोबाइल को इस तरह झपटता देखकर मेरा माथा ठनका। मैं समझ गया कि घरैतिन का सर्च अभियान चालू हो गया है। जिस तरह बच्चों ने मुझे घेर लिया था, उससे लग रहा था कि मैं जैसे कोई आतंकवादी होऊं, घरैतिन और बच्चे सुरक्षा कर्मी, जो मुझे घेरे में लेने का प्रयास कर रहे हों। इसकी तत्काल प्रतिक्रिया हुई। मैंने उनके हाथ से लगभग मोबाइल फोन  छीन ही लिया। 
मोबाइल फोन अपने हाथ से जाते ही घरैतिन मनुहार करते हुए बोलीं, 'दिखा दीजिए न! अब छिपा क्यों रहे हैं?'  'क्या..? मैं क्या छिपा रहा हूं?' घरैतिन की बात सुनकर मैं सतर्क हो गया। उसने जिस तरह झपटकर सोफे पर रखा गया मोबाइल उठाया था, मैं समझ गया कि दाल में कुछ काला जरूर है। अगर पूरी दाल ही काली हो, तो कोई ताज्जुब नहीं। मेरे इतना कहते ही घरैतिन ने अपना सुर बदल लिया, 'चलिए..अब जल्दी से सेल्फी वाली तस्वीर दिखा दीजिए। ज्यादा इठलाइए मत। मैंने तो मोहल्ले की सभी औरतों को बता भी दिया है कि गॉटर के पापा सेल्फी वाली तस्वीर लेकर आने वाले हैं।'
मैं कुछ बोलता, इससे इससे पहले मेरा बेटा गॉटर बोल उठा, 'हां पापा! मैंने भी अपने स्कूल के दोस्तों को बता दिया है कि मेरे पापा पीएम तक से हाथ मिलाते हैं। उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं। पापा..जल्दी से व्हाट्सएप से सेल्फी वाली तस्वीर मुझे दीजिए, मैं अपने दोस्तों को शेयर करूं।' बेटे गॉटर की बात सुनते ही मैंने उसे घुड़क दिया, 'मेरे पास कोई सेल्फी-वेल्फी नहीं है, समझे तुम लोग। मैं सेल्फी वाला पत्रकार नहीं हूं।'
मेरी बात सुनते ही घरैतिन गुर्राईं, 'फिर कैसे पत्रकार हैं आप? जिंदगी भर कलम ही घसीटते रहिएगा आप। आप पीएम के साथ एक सेल्फी नहीं ले पाए, तो कौन सा पहाड़ तोड़ लेेंगे आप अपनी पत्रकारिता के बल-बूते पर।' मैंने घरैतिन और बच्चों को समझाने का प्रयास किया, 'देखो..पीएम के साथ सेल्फी लेना और बात है, पत्रकारिता करना और बात। फिर उतनी भीड़ में घुसने की मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ी। जानती ही हो, भीड़ देखकर मेरा बीपी हाई हो जाता है?'
घरैतिन ने मुंह बिचकाते हुए कहा, 'हुंह..भीड़ देखकर मेरा बीपी हाई हो जाता है। और जब वर्माइन, शुक्लाइन, चौधराइन आ जाती हैं, तो आपका बीपी नहीं उबाल खाता है, तब तो औरतों को टुकुर-टुकुर निहारते रहते हैं। जब से सुना था कि प्रधानमंत्री जी पत्रकारों से मिलेंगे, तब से एक उमंग थी कि चलो गॉटर के पापा भी पीएम साहब से मिलकर सेल्फी लेंगे। वर्माइन जब भी किटी पार्टी में आती है, तो बताती है कि उसके हब्बी  फलां मंत्री से मिले, अलां सांसद से मिले, इस विधायक से गलबहियां डाली। सोचा था, मैं भी अपने हब्बी की तस्वीर दिखाकर उसकी बोलती बंद कर दूंगी, लेकिन आपने तो सारे मनसूबे पर पानी फेर दिया।' 
हां पापा..अगर आप बस एक..एक सेल्फी ले लेते तो क्या बिगड़ जाता। आप सोचिए, वह सेल्फी मेरा कितना रुतबा बढ़ा देती। जब मैं स्कूल जाती, तो सारी सहेलियां अदब से पेश आतीं। टीचर्स भी मुझे मेरी गलती पर डांट से पहले सौ बार सोचतीं कि इसके पापा की पीएम तक पहुंच है, कहीं मेरी शिकायत न करें। सोचिए..पापा..सोचिए, आपने सेल्फी न लेकर कितना कुछ खोया है।' मेरी बेटी ने तमतमाते हुए कहा। अपने पर हो रहे हमलों से मेरा बीपी हाई हो गया, मैं चिल्लाया, 'बस..बहुत हो चुका..मुझे अब कोई ज्ञान न दे। मुझे जो उचित लगा, मैंने किया। समझे आप लोग।' मेरी बात सुनकर घरैतिन मुंह बनाती हुई किचन में चली गईं। बच्चे भी उदास मन से बैठकर पढ़ाई करने लगे।

Thursday, November 26, 2015

गले पड़ गए गुनाहगार

अशोक मिश्र
केजरीवाल जी ने लाख टके की बात कही है। अब अगर कोई गले पड़ ही जाए, तो क्या किया जा सकता है। अब इसे विरोधी कुछ और समझते हैं, तो समझते रहें। सच बताऊं, मैं तो केजरीवाल जी की बात से सौ फीसदी नहीं, चार सौ बीस फीसदी सहमत हूं। अब कल का ही वाकया सुनाऊं। घरैतिन ने पांच सौ रुपल्ली थमाकर हजार रुपये का इस्टीमेट थमाकर कटरा बाजार भेज दिया। 
कटरा बाजार की सब्जी मंडी में मिल गए उस्ताद गुनाहगार। वे खरीद तो रहे थे आलू, लेकिन पता नहीं किसको चकर-मकर देखते जा रहे थे। तभी उनकी निगाह मुझ पर पड़ गई। मैंने भी संयोग से उन्हें देख लिया, तो चुपके से खिसक लेने की सोची। अपनी सोच को क्रियान्वित कर पाता कि उससे पहले वे लपके और मुझे गले लगा लिया। मैं भौंचक किसी मोम के पुतले की तरह उनके गले लगा रहा। आसपास सब्जी खरीदने वाले लोग और दुकानदार मुझे इस तरह देखने लगे, मानो बिहार के शपथ ग्रहण समारोह में दो विपरीत ध्रुव गले मिल रहे हों। 
अब आप बताइए, इसमें मेरी क्या गलती थी। यह मैं जानता हूं कि उस्ताद गुनाहगार एक निहायत शरीफ, रहम दिल और अपने पेशे के प्रति समर्पित पाकेटमार हैं। उनका दावा है कि उन्होंने कभी किसी महिला, बच्चे और गरीब की पाकेट नहीं मारी है। उनका दावा है कि यदि अंगुलियों में फंसी ब्लेड सलामत रहे, तो वे किसी की भी पाकेट मार सकते हैं। वैसे उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश प्रधानमंत्री जी का बटुआ मार कर बाद में उन्हें गिफ्ट करने का है। ऐसा करके वे अपनी प्रतिभा और कला से प्रधानमंत्री जी को प्रभावित करना चाहते हैं। शायद इसी बहाने 'मेक इन इंडिया' में उनके लिए कोई रोजगार मुहैय्या हो जाए।
जब से उस्ताद गुनाहगार मेरे गले पड़े हैं, लोग मुझे अविश्वास की नजर से देखने लगे हैं। सुबह ही पड़ोस में रहने वाले मेरे धुर विरोधी वर्मा जी मुझे सुनाते हुए अपनी पत्नी से कह रहे थे, सुनती हो! अब यह मोहल्ला शरीफों के रहने लायक नहीं रहा। अब तो ठग, उठाईगीर, पाकेटमार ही रहेंगे यहां। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि लोगों को कैसे समझाऊं? और लोग हैं कि समझने को तैयार ही नहीं हैं। http://epaper.amarujala.com/ac/20151127/08

Wednesday, November 25, 2015

रूसी भाषा में शपथ लूं, तो चलेगा?

-अशोक मिश्र
बंगाल में बड़े भाई को कहा जाता है दादा। ऐसा मैंने सुना है। उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में दादा पिताजी के बड़े भाई को कहते हैं। बड़े भाई के लिए शब्द 'दद्दा' प्रचलित है। समय, काल और परिस्थितियों के हिसाब से शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। आज दादा का मतलब क्या है, यह समझाने की नहीं, समझने बात है। वैसे अब दादा का समानार्थी कहिए, पर्यायवाची कहिए, नेताजी हो गया है। मेरे गांव नथईपुरवा में रहते हैं मुसद्दी लाल। पहले वे दो-चार चेले-चपाटों के बल पर दादा बने, फिर नेता बन गए। कुछ रुतबा और ओहदा बढ़ा, तो ग्राम पंचायती का चुनाव लड़ गए। अपने चेले-चपाटों की दबंगई और मतदाताओं की कायरता की कृपा से वे जीत भी गए। वे जब भी मुझसे मिलते हैं, तो विनम्रता की साक्षात प्रतिमूर्ति बन जाते हैं। जिस दिन ग्राम पंचायत चुनाव का परिणाम निकला, तो उनके समर्थकों ने हवा में ही दनादन सौ-पांच सौ फायरिंग की और उन्हें कंधे पर उठा लिया। इससे पहले वे फूल-मालाओं से लादे जा चुके थे।
यह जुलूस जब गांव की सीमा में घुसा, तो संयोग से मैं अपने घर के बाहर बैठा गन्ना चूस रहा था। मुझे देखते ही मुसद्दी लाल अपने चेले-चपाटों के कंधे से कूद पड़े और लपककर साक्षात दंडवत प्रणाम किया। बोले, 'दादा..आप आशीर्वाद दीजिए, हम ग्राम पंचायत का चुनाव जीत गए हैं। यह बताइए, चुनाव जीतने के बाद शपथ-वपथ भी लेना पड़ेगा क्या?' मैंने फौरन से पेशतर जवाब दिया, 'हां..शपथ तो लेना ही होगा।' 
मुसद्दी लाल ने पूछा, 'हिंदी में लेना होगा या अंग्रेजी में?' मैंने कहा, 'नहीं जिस भाषा में आप चाहें..।' वे मेरी बात सुनकर मुस्कुराए, 'रूसी भाषा में शपथ ले सकता हूं?' मैंने कहा, 'हां ले सकते हो? लेकिन रूसी भाषा तुम्हें आती कहा हैं?' मुसद्दी लाल ने कान खुजाते हुए कहा, 'अरे...मुझे नहीं आती है, आपकी यह बात मैंने मान ली। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि जो ससुरा शपथ-वपथ दिला रहा होगा, उसे भी रूसी आती ही होगी। बात यह है दादा...रूसी में अपेक्षित, उपेक्षित, सम्यक, संपर्क, संसूचित, सूचित जैसे शब्द तो नहीं होंगे न...। फिर रूसी में चाहे जो कुछ पढ़ लो, बोल दो, कौन जानेगा कि सही है या गलत। और फिर मन ही मन पढऩे का आप्शन भी तो होगा कि नहीं।'  
इतना कहकर मुसद्दी लाल ने अपने समर्थकों की ओर देखा, तो कुछ समर्थकों ने तालियां बजानी शुरू कर दी, तो कुछ जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। लग रहा था कि हर कोई मुसद्दी लाल की निगाह में अपना नंबर बढ़ाना चाह रहा हो। थोड़ी देर लोगों के चुप होने का इंतजार किया, फिर मैंने कहा, 'मन ही मन शपथ पढऩे का आप्शन नहीं है। बोलना पड़ता है माइक के सामने। वैसे जोर से पढऩे या मन ही मन बोलने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। अब अगर आपने अपेक्षित को उपेक्षित पढ़ भी लिया, तो क्या फर्क पड़ेगा। आपके मतदाताओं की अपेक्षा होगी कि आप अपने इलाके का विकास करेंगे, लेकिन होगा यह कि आप उनके हितों की उपेक्षा ही करेंगे। सबसे पहले अपने हित देखेंगे कि लोगों के? आप रूसी, जापानी, अंग्रेजी का झंझट छोडि़ए। किसी अच्छे ट्यूटर का बंदोबस्त करके थोड़ी बहुत हिंदी लिखना पढऩा सीख लीजिए। शब्दों का सही-सही उच्चारण भी सीख लीजिए। आज पंचायती का चुनाव जीता है, कल विधायकी का भी जीत सकते हैं। अगर खुदा मेहरबान हो, तो गधा पहलवान हो ही जाता है। विधायकी जीत गए, तो कल सीएम, डिप्टी सीएम, मंत्री, संतरी कुछ भी बन सकते हैं। तब भी शपथ लेना ही पड़ेगा, तो क्यों न अभी से सारे कील-कांटे दुरुस्त कर लें।'
दोस्तो! मुझसे बस सलाह देने की यही गलती हो गई। मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल पसर गए। बोले, 'दादा..आपसे बेहतर कौन हिंदी पढ़ाएगा और देखिए..इनकार मत कीजिएगा।' अब पिछले पंद्रह दिन से मुसद्दी लाल को हिंदी पढ़ा रहा हूं। आंगन में मुसद्दी लाल कुर्सी डाल हिंदी पढ़ते हैं और उनके समर्थक हाथों में पिस्तौल-राइफल लिए घर को चारों ओर से तब तक घेरे रहते हैं, जब तक मुसद्दी लाल हिंदी पढ़कर चले नहीं जाते। कुपात्र को सलाह देने का नतीजा भुगत रहा हूं।

Wednesday, November 18, 2015

कुत्तों की कोई इज़्ज़त है कि नहीं?

अशोक मिश्र
सुबह सोकर उठा ही था कि घरैतिन ने नेताओं के चरित्र की तरह सड़े-गले नोट पकड़ाते हुए कहा, 'जरा दौड़कर बगल वाली गली से दूध का पैकेट लेते आइए। फिर आपको गर्मागर्म चाय पिलवाती हूं।' मैंने कहा, 'क्या यार! सुबह-सुबह चाय पिलाने की बजाय काम थमा रही हो। पहले चाय तो पिलाओ, आंख तो खुले, फिर ला दूंगा दूध।' 
घरैतिन ने हाथ नचाते हुए कहा, 'अगर घर में दूध होता, तो मुझे कोई शौक नहीं है आपसे दूध मंगाने का। एक पैकेट दूध लाने जाएंगे, दो पैकेट के पैसे गिरा आएंगे।' घरैतिन का ताना सुनकर मन मारकर मुझे घर से निकलना ही पड़ा। भुनभुनाते हुए घर से निकला ही था कि मोहल्ले भर की रोटियों पर पलने वाला एक मरियल सा कुत्ता 'पीलू' मुझ पर गुर्रा उठा, 'तुम कमीने हो, टुच्चे हो, गंदे हो..। वाहियात हो। नामाकूल हो।' मैं कुछ कहता, इससे पहले उसने अपनी बात में संशोधन किया, 'मेरा मतलब तुम नहीं..पूरी की पूरी मानव जाति..।' 
पीलू की बात सुनकर मेरे भीतर का इंसान जागा। एक तो घरैतिन ने पहले से ही मूड का कबाड़ा कर रखा था, उस पर पीलू का गुर्राना बर्दाश्त नहीं हुआ। मैं बोल उठा, 'अबे कुत्ते के पिल्ले, तेरी यह हिम्मत कि तू हम इंसानों को गाली दे। भला-बुरा कहे। तेरी औकात ही क्या है? हमारी ही रोटी पर पलता है और हम पर ही भौंकता है।' पीलू ने लंबी-सी जीभ लपलपाते हुए कहा, 'बस..यही तो..यही समझाना चाह रहा था कि जब किसी को गाली दी जाती है, तो उसे ऐसे ही बुरा लगता है। तुम इंसान अपने आप को समझते क्या हो? हर बात में हम कुत्तों की तौहीन करते रहते हो। हमारी भी कोई इज्जत है कि नहीं। आपको जब भी कोई गाली देनी होती है, हम कुत्ते ही आप इंसानों को क्यों सूझते हैं। अरे हम भी भगवान के बनाए हुए जीव हैं। हम तो नहीं जाते, तुम इंसानों को गाली देने। तुम्हारे नेता भी जब मुंह खोलते हैं, तो हम कुत्तों को ही गाली देते हैं। यह अच्छी बात तो नहीं है न।'
मेरे गुस्से का झाग पीलू की बात सुनकर थोड़ा-थोड़ा नीचे आने लगा था। पीलू ने पूछा, 'तुम्हें किसने पैदा किया है?' उसके इस सवाल पर हंसी आ गई, 'वैसे तो इस दुनिया का हर प्राणी अपने बाप की औलाद होता है, लेकिन कहते हैं कि हर प्राणी को ऊपर वाला यानी भगवान पैदा करता है।' पीलू की गुर्राहट अब कम होती जा रही थी, 'जिस भगवान ने हर प्राणी को पैदा किया है, उसमें हम कुत्ते आते हैं कि नहीं? तुम इंसान अपने आपको तुर्रम खां क्यों समझते हो? माना कि हम तुम्हारी तरह नहीं रह सकते, लेकिन हम जानवरों में न ईष्र्या है, न द्वेष है, न संपत्ति के लिए भाई-भाई का खून बहाने की ललक..न हम राजनीति करते हैं, न सत्ता के लिए कोई कर्म, धत्कर्म करते हैं। झूठ बोलना तो हमें आता नहीं। तुम्हारी दी गई रोटी पर पलते हैं, तो तुम्हारे घर की चौकीदारी भी करते हैं। हम तो सिर्फ भौंकते हैं, लेकिन तुम इंसान हर बात पर हम कुत्तों की तौहीन करते हो। तुम इंसान भले ही अपने आपको कुछ भी समझो, लेकिन दुनिया के बाकी प्राणियों से किसी मायने में ऊंचे नहीं हो। भोले और निष्पाप तो बिल्कुल नहीं। आज से यह हम कुत्तों की तुम इंसानों के लिए चेतावनी है कि हमारे नाम पर गालियां देना बंद नहीं किया और हम कुत्ते अपनी औकात पर आ गए, तो तुम इंसानों को कहीं ठिकाना नहीं मिलेगा। हर महीने रैबीज का इंजेक्शन लगवाते-लगवाते थक जाओगे, लेकिन हम काटने से नहीं थकेंगे। इस पर भी बात नहीं बनी, तो धरना-प्रदर्शन करेंगे।' इतना कहकर पीलू भौंकता हुआ कूड़े के ढेर पर कुछ खाने को तलाशने लगा। मैं पीलू की बात पर विचार करता हुआ खरामा-खरामा दूध की दुकान पर पहुंच गया कि यार पीलू बात तो सही कह रहा था।

एक पत्र पार्वती नंदन गणेश जी के नाम

अशोक मिश्र
आदरणीय पार्वती नंदन, सादर प्रणाम। मुझे विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस बार आप भूलोक पर दीपावली मनाने की सोच रहे हैं। तो भगवन! आपका दासानुदास होने के नाते सबसे पहली विनती तो यह है कि आप अपना यह कार्यक्रम तत्काल स्थगित कर दें। आपका भूलोक आना खतरे से खाली नहीं है। राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां आपके आगमन के अनुकूल नहीं हैं। आप तो प्रथम पूज्य हैं, सर्वज्ञानी हैं, ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं। आपको भूलोक आने की सलाह किस ने दी है। चलिए, थोड़ी देर के लिए मान लिया कि आप आ भी जाते हैं, तो क्या करेंगे? यहां इतना प्रदूषण है कि आपका सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा। कहां कैलाश और स्वर्गलोक का प्रदूषणरहित वातावरण और कहां इतना प्रदूषित वातावरण कि सांस लेना भी मुश्किल। वह तो भगवन हम लोग हैं, जो इस प्रदूषण के आदी हो चुके हैं। अब तो अगर कभी भूल-चूक से ऐसी जगह पहुंच जाते हैं, जहां प्रदूषण का स्तर कम हो, तो बेचैनी सी होने लगती है। पूरे देश में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर दिल्ली में भी हमें कोई दिक्कत नहीं होती है। हां, यह सोचकर कभी-कभी मन घबरा जाता है कि यदि कल सरकार ने दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने की ठान ली, तो लाखों-करोड़ों लोग बिना प्रदूषण के वैसे ही मर जाएंगे।
भगवन! एक भक्त हूं और भक्त अपने भगवान को मुसीबत में देख सकता है भला! मान लिया कि आप मेरे घर आएं, मैं आपको आपका प्रिय मोदक भी तो नहीं खिला सकूंगा। मोदक के नाम पर जो कुछ बेचा जा रहा है, वह मोदक नहीं, कुछ और ही होता है। उसमें न चीनी होती है, न बेसन होता है, न घी या वनस्पति तेल होता है। सब कुछ सिंथेटिक होता है। गणेश जी! मुझे नहीं मालूम कि इससे पहले आप कब पृथ्वी पर आए थे, लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि अब भारत में दूध-दही और घी की नदियां नहीं बहती है। यहां तो अमीर अपने खेतों में उगाई गई सब्जियां, अनाज, फल और अपने फार्म में पाली गई गाय-भैंसों का दूध, दही और घी उपयोग में लाते हैं। बाकी 98 प्रतिशत जनता तो सिंथेटिक का उपयोग करती हैं। सिंथेटिक दूध, सिंथेटिक दही, सिंथेटिक पनीर, सिंथेटिक घी। और तो और भगवन...अब तो चीन देश की कृपा से प्लास्टिक के चावल, गेहूं, दालें ही हमारा आहार हैं। सब्जियों और फलों का तो पूछिए नहीं। अब आप ही सोचिए, अगर आप भूले-चूके मुझ जैसे किसी  गरीब की कुटिया में पहुंच गए और उसने अपना आतिथ्य धर्म निभाया, तो क्या होगा? यह सब चीजें खाने के बाद आपके पेट में जो परमाणु बम की तरह के 'गुडुम-गुडुम..ठुस्स..फुस्स' की आवाज करते हुए विस्फोट होंगे, उसको कितनी देर झेल पाएंगे?
और पार्वती नंदन, अगर आप इन स्थितियों से न भी गुजरें, तो दूसरे किस्म का खतरा आपके सिर पर मडंराएगा। आप देवाधिदेव भगवान शंकर के पुत्र हैं। आप 'श्री' यानी 'लक्ष्मी' जी के साथ दीपावली के दिन विराजते हैं। आप सिर से लेकर पांव तक आभूषण से लदे-फंदे रहते हैं। भगवान भला करे, अगर कहीं किसी पुलिसवाले से टकरा गए, तो सबसे पहले वह थाने ले जाएगा।  कुछ पुरानी फाइलें तलाशी जाएंगी और उन फाइलों में चोरी गई जेवरात से आपके जेवर मिलाए जाएंगे और फिर..भगवन! आगे आप सोच सकते हैं। अगर इससे भी बच गए, तो तमाम लफड़े हैं। इनकम टैक्स, सेल्सटैक्स, ईडी, ऊडी जैसे न जाने कितने विभाग हैं, जिनकी गिरफ्त में एक बार आए, तो फिर भगवन ये आपका पीछा कैलाश तक नहीं छोडऩे वाले हैं। तो हे प्रथम पूज्य गौरी सुत गणेश! आपसे यही प्रार्थना है कि आप फिलहाल इस बार आना कैंसिल करें और अगर स्थितियां सामान्य होती हैं, तो फिर मैं पत्र लिखकर सूचित करूंगा। आपका परमभक्त और कृपाकांक्षी-उस्ताद गुनहगार।

Wednesday, November 4, 2015

चरित्र पर तो नहीं पुती कालिख!

-अशोक मिश्र
जब मैं उस्ताद गुनाहगार के घर पहुंचा, तो वे भागने की तैयारी में थे। हड़बड़ी में उन्होंने शरीर पर कुर्ता डाला और उल्टी चप्पल पहनकर बाहर आ गए। संयोग से तभी मैं पहुंच गया, अभिवादन किया। उन्होंने अभिवादन का उत्तर दिए बिना मेरी बांह पकड़ी और खींचते हुए कहा, 'चलो..सामने वाले पार्क में बैठकर बतियाते हैं। अभी घर में ठहरना उचित नहीं है।' मैं भौंचक..ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। जब भी घर गया, तो उन्होंने बड़े प्यार और आदर से घर में बिठाया, चाय-नाश्ते की तो बात ही छोडि़ए, बिना खाना खिलाए आने ही नहीं दिया। अब तो हालत यह है कि जब भी मैं उनके घर आता हूं, घरैतिन मान लेती हैं कि मैं खाना खाकर ही आऊंगा। मगर आज..एक अजीब सी हड़बड़ी में थे। खैर...मैं भी उनके साथ हो लिया। 
पार्क में पहुंचकर उन्होंने तीन-चार बार खूब गहरी सांस ली, मानो प्राणायाम कर रहे हों। थोड़ी देर बाद बोले, 'उफ...बाल-बाल बच गया!' उनकी बात सुनकर मैं घबरा गया, 'क्या बात कह रहे हैं भाई साहब? कोई हादसा हुआ था क्या? कहीं चोट-वोट तो नहीं लगी?'
उन्होंने पार्क में बनी सीमेंट की बेंच पर बैठते हुए कहा, 'अरे यार..चोट-वोट की बात नहीं है। इसकी कभी परवाह की है मैंने? तुम बात को इस तरह समझो कि आज तमाशा बनने से बच गया। तमाशा बनता तो अखबारों में फोटू-शोटू छपता, चेले-चपाटे कहते कि उस्ताद का मुंह काला हो गया। मुंह काला हो जाता, तो किसी को क्या मुंह दिखाता?' बात की पूंछ मेरी पकड़ में नहीं आ रही थी। मैंने उकताए स्वर में कहा, 'उस्ताद! बात क्या है? साफ-साफ बताइए, वरना मैं चला।'
गुनाहगार सामने देखते हुए खोये-खोये से अंदाज में बोले, 'यार क्या बताऊं? मैंने कभी तुम्हारी भाभी के खिलाफ बयान भी नहीं दिया। पिछले चार-पांच हफ्तों से कोई ऐसी-वैसी हरकत भी नहीं की, पिछले शनिवार को जब साली आई थी, तो उससे भी ज्यादा लप्पो-झप्पो नहीं की। फिर क्यों मुंह पर कालिख पोतना चाहती है?' मैंने उस्ताद गुनाहगार की बांह पकड़कर झिंझोड़ते हुए कहा, 'मामला क्या है? कैसी कालिख, कैसा मुंह? यह क्या गड़बड़झाला है, उस्ताद?'
उस्ताद गुनाहगार झिंझोड़े जाने से सहज हो गए। बोले, 'यार! यही तो..यही गुत्थी तो पिछले चार घंटे से सुलझा रहा हूं। एक सिरा सुलझता है, तो दूसरा उलझ जाता है। यह गुत्थी न होकर भारत-पाक सीमा विवाद हो गया। दोनों सीमा पर फायरिंग करते हैं, फिर बातचीत का सिलसिला शुरू होता है, लगता है कि बस..बस समस्या सुलझने वाली है और फिर एकाएक कोई पेच फंस जाता है और वार्ता टूट जाती है। फिर सीमा पर गोली-बारी शुरू हो जाती है।' 
उस्ताद की बात सुनकर मैंने माथा पीट लिया, 'अरे उस्ताद! इस बात की क्या गारंटी है कि भाभी जी ने स्याही आपके मुंह पर पोतने के लिए मंगाई है। हो सकता है किसी दूसरे काम के लिए मंगाया हो। और फिर..मुंह पर आपके अगर कालिख पुत ही जाएगा, तो क्या हो जाएगा! बस, चरित्र पर कालिख नहीं पुतनी चाहिए। चेहरा काला हो, तो चलेगा, लेकिन चरित्र काला हो, तो नक्को...कतई नहीं चलेगा। आजकल जो चेहरे पर कालिख पोतने का फैशन चल निकला है न, वह फितूर है इंसान के दिमाग का। मैं जानता हूं, आपका चरित्र इस देश के नेताओं से कहीं ज्यादा उजला है।' 
मेरी बात से उस्ताद गुनाहगार का आत्मविश्वास लौट आया, कहने लगे, 'यार! तुम तो जानते हो, मैं पाकेटमार हूं। लेकिन कभी किसी गरीब, बेबस और ईमानदार का पाकेट नहीं मारा। महिलाओं और बच्चों की जेब पर मेरी ब्लेड कभी नहीं चली। आज जब बीवी को स्याही मंगाते सुना, तो मैं डर गया और घर से भाग खड़ा हुआ।' 
तभी गुनाहगार के पड़ोसी वर्मा का बेटा एक डिब्बा लिए हुआ आया और बोला, 'अंकल.. यह स्याही का डिब्बा आंटी ने तिवराइन आंटी के यहां दे आने को कहा है। तिवराइन आंटी के स्कूल में हो रहे एक नाटक में भाग लेने वाले बच्चों के चेहरे पर यह स्याही पोती जाएगी।' इतना कहकर और डिब्बे को गुनाहगार के हाथों में थमाकर वह रफूचक्कर हो गया। हम दोनों बेवकूफों की तरह उस बच्चे को जाता हुआ देखते रहे।

Wednesday, October 28, 2015

पिता तुल्य है मेरा बेटा!

अशोक मिश्र
गांव के रिश्ते से मुसई तो वैसे भाई लगते हैं, लेकिन हैं दोस्त की तरह। उनके मुंह से बयान तो ऐसे निकलते हैं, मानो फुलझडिय़ां छूट रही हों। गांव-जवार की कोई भी बात पता चली नहीं कि खट से एक बयान हाजिर, एकदम भगवा ब्रांड की तरह। बयान भी ऐसे कि सुनने वाले की कनपटी लाल हो जाए। पहले तो सुनकर कान में काफी देर 'सांय..सांय' की आवाज घूमती रहे, फिर वह दिमाग वाया दिल तक होकर पहुंचे, तो दिमाग का दही हो जाए। मुसई भाई बोलते समय न आगा देखते हैं, न पीछा। जो मुंह में आया तुरंत बाहर। किसी मल्टीनेशनल कंपनी के प्रोडक्ट के विज्ञापनों की तर्ज पर 'इधर ऑर्डर करो, उधर कंपनी का सेल्समैन प्रोडक्ट हाथ में लिए कालबेल बजा रहा होगा। तुरंत की तुरंत डिलीवरी।' उनके बयान से किसी को अच्छा लगेगा या बुरा, उनकी बला से। कोई कुढ़ता है, तो कुढ़ता रहे। वे तो मस्त हाथी की तरह डायलाग डिलिवरी में सतत लगे रहते हैं। 
लोग तो कहते हैं कि अगर मुसई भाई राजनीति में होते, तो बड़े-बड़े नेताओं के कान काटते। आज जो देश की राजनीति में बड़े तुर्रम खां बने घूमते हैं, वे उनके आगे पानी भरते। नेता चाहे जातिवादी हो, धर्मवादी हों, अधर्मवादी हों, दक्षिणपंथी हों, वामपंथी हों, सेक्युलरवादी हों, असेक्युलरवादी हों, लेकिन उनके घाघवाद के सामने सब बेकार। घाघ इतने कि आपकी आंखों से काजल चुरा लें और आपको भनक तक नहीं लगे। वे चुनावी राजनीति में कितना सफल होते, यह तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन जितने वोट बटोरू नेता हैं, उनका तंबू उखाड़ देने की काबिलियत जरूर मुसई में है। वे अच्छे से अच्छे नेताओं को टके के भाव बेच देने की काबिलियत रखते हैं। लेकिन एक छोटे से गांव में राजनीति की कितनी गुंजाइश हो सकती है। सो, मुसई भाई टैलेंटेड होते हुए भी सबके निशाने पर हैं। उनके बयानवीर होने का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है, उनके बेटे बलभद्र को। बेचारा हर समय आशंकित रहता है कि पता नहीं, कब और कहां से उलाहना आ आए। अगर दो-चार लोग उसके घर की ओर आते दिखते हैं, तो वह दहल जाता है कि पता नहीं आज कौन-सा बयान उसके पिता ने जारी कर दिया है। वैसे मुसई भाई को पल्टासन भी बहुत अच्छी तरह से आता है। बयान देने की कला में वे जितने सिद्धहस्त हैं, उतने ही माहिर वे बयान देने के बाद मुकर जाने में भी हैं। हजार क्या लाखों लोग कहते रहें कि आपने मेरे सामने यह बात कही थी, लेकिन वे नहीं मानेंगे, तो नहीं मानेंगे। कर लो उनका जो भी कर सकते हो।
अभी पिछले दिनों की बात है। नथईपुरवा गांव के एक आदमी की बेटी रात में रामलीला देखने गई, तो सुबह तक घर नहीं आई। मुसई के संज्ञान में जैसे ही मामला आया, तुरंत बयान जारी कर दिया, 'भाग गई होगी किसी के साथ।' मुसई का इतना कहना था कि घरों से लाठियां निकल पड़ीं। मच गया गांव में गदर। मुसई के सुपुत्र बलभद्र ने उग्र लोगों के सामने हाथ जोड़े, पांव पकड़े। तब जाकर किसी तरह मामला शांत हुआ। बाद में पता चला कि रामलीला देखने गई लड़की बगल के गांव में ब्याही बुआ के घर सोने चली गई थी। बलभद्र अपने पिता की बांह पकड़कर खींचता हुआ घर लाया और काफी थुक्का-फजीहत की। बस हाथ नहीं उठाया, बाकी जितना वह 'हत्तेरी की, धत्तेरे की' कर सकता था, उसने किया। समझाया-बुझाया, हाथ-पैर जोड़े। गांव-जवार और घर-परिवार की दुहाई दी। थोड़ी देर बाद जब वह घर से बाहर निकले, तो पहले की ही तरह चौचक। बेटे का सारा समझाना-बुझाना, डांटना-डपटना, सब धूल की तरह झाड़ कर पहले की तरह बिंदास लग रहे थे। लोगों ने हंसते हुए पूछ लिया, 'क्यों मुसई भाई, बचवा ने तो खूब हत्तेरे-धत्तेरे की होगी?' मुसई ने रोष भरे स्वर में कहा, 'पिता तुल्य है मेरा बेटा! वह जो कुछ कहेगा, मुझे मानना होगा। तुम लोग कौन होते हो, बीच में टांग अड़ाने वाले।' इतना कहकर वे खेतों की ओर निकल गए।

Tuesday, October 27, 2015

समाज के चेहरे से मुखौटा नोचती कहानियां

स्निग्धा श्रीवास्तव
व्यवस्था चाहे देश की हो, समाज की हो, राजनीति की हो या फिर घर, स्कूल से लेकर सभी छोटी-बड़ी इकाइयों की हो, अगर मामूली सी भी गड़बड़ी आई, तो पूरी व्यवस्था चौपट ही समझो। प्रसिद्ध पत्रकार, कहानीकार और उपन्यासकार दयानंद पांडेय की 'व्यवस्था पर चोट करती सात कहानियां' में यही बात उभर कर सामने आई हैं। ये सात कहानियां सिर्फ कहानियां नहीं हैं, बल्कि समाज के वे सात चेहरे हैं, जो पूरे समाज का खाका खींचते हैं। इन कहानियों में अलग-अलग पात्रों के जरिये लोंगो की विवशता को दर्शाने की कोशिश की गई है, सामाजिक अव्यवस्था के शिकार होते हैं। कहानीकार दयानंद पांडेय ने यह भी बताने की कोशिश की है कि समाज का हर व्यक्ति अच्छाई-बुराई के भंवरजाल में फंसा छटपटा रहा है। पहली कहानी है, मुजरिम चांद। कहानी में एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए कई तरह की जिल्लत बर्दाश्त करनी पड़ती है क्योंकि उसने नेचुरल कॉल के चलते राज्यपाल का ट्वालेट इस्तेमाल कर लिया था। इस कहानी में ग्रामीण पत्रकारों की व्यथा-कथा के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था का चेहरा भी बेनकाब होता है। कहानी 'फेसबुक में फंसे चेहरे' बताती है कि अब दुनिया धीरे-धीरे नहीं, बल्कि बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। पहले लोग घरेलू झगड़ों, आस-पड़ोस की बातें तथा पंचायत में व्यस्त रहते थे, मगर अब लोग इंटरनेट, व्हाट्सअप और फेसबुक में उलझ गए हैं। खाना खाएं या नहीं, व्हाट्सअप पर स्टेटस बदलने की जल्दबाजी जरूर रहती है। साथ ही यह चिंता रहती है कि स्टेटस क्या दें? फेसबुक पर तो लोग कमाल करते है, वे अपने स्टेटस कुछ ऐसे देते हैं-स्लीपिंग विद रवि, राम, राधा, राजेश ईटीसी। या फिर फीलिंग लव विद अनुरंजन, भावेश, श्याम, ईटीसी। ऐसे ही एक महोदय हैं राम सिंगार जी। राम सिंगार जी फेसबुक पर लड़कियों की फोटो पर कमेंट आने से और अपनी फोटो पर कमेंट न आने से परेशान हैं। उन्हें खुद फेसबुक खोलना नहीं आता, लेकिन वे इसके बिना रह भी नहीं सकते हैं। अजीब विडंबना है। इससे बचने के लिए वे अपने गांव जाते है, मगर फिर वापस वहां से फोटो खिंचवाकर फेसबुक पर ही अटक कर रह जाते हैं।
इस कहानी संग्रह की एक विचारणीय कहानी है 'देहदंश।' कहानी देहदंश राजनीति में महिलाओं की स्थिति का बेहद कटु किंतु साफगोई से किया गया विवेचन है। नेता जी राजनीति में सब कुछ पा लेना चाहते हैं। सत्ता का लालच उन्हें अच्छाई-बुराई का भी आभास नहीं होने देता है।  यहां तक की उनकी पत्नी एक मंत्री की अभद्रता का शिकार हो जाती है, लेकिन उन्हें कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हां, पत्नी यानी मिश्राइन जरूर इसे सदमे की तरह लेती हैं, लेकिन फिर वे भी माहौल में ढल जाती हैं। असल में मिश्रा- मिश्राइन सिर्फ कहानी के दो पात्र ही नहीं है, अपितु वे राजनीति के स्याह-सफेद पहलुओं के जीते-जागते उदाहरण हैं जिनसे आज समाज गुजर रहा है। राजनीति में ऐसे कई नेता हैं, जो न सिर्फ औरतों का इस्तेमाल करते है, उन्हें बुरी तरह भोगते हैं, बल्कि अपनी सद्चरित्रता का चोला भी पहने रहते हैं।  मिश्रा और मिश्राइन के घावों को कुरेदने में मीडिया भी पीछे नहीं रहता है। राजनीति, पत्रकारिता की शवपरीक्षा करती हुई यह कहानी समाज के चेहरे से छद्म मुखौटा खींच लेने का दुस्साहस करती है। राजनीति और पत्रकारिता के लिए स्त्री की हैसियत एक देह से बढ़कर नहीं है, यह कहानी 'देहदंश' बांचती हुई चलती है।
कहते हैं कि इन्सान चाहे जितनी कामयाबी हासिल कर ले, रोजी-रोटी के लिए दूर देश में बस जाए, लेकिन उसके मन में कहीं न कहीं बचपन में वापस जाने की इच्छा मौजूद रहती है। ऐसा ही है कुछ, कहानी 'सुंदर लड़कियों वाला शहर' में। इसके दो पात्र शरद और प्रमोट को सालों बाद परिस्थितियां अपने गांव वापस ले आती हैं। बचपन से पढऩे में होशियार शरद शहर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, लेकिन प्रमोद शुरू से ही लड़कियों पर ही अटका रहता है। दोनों इस कहानी में अपने बचपन की यादों में, लड़कियों में डूबते उतराते हैं। 
कहानी 'हवाई पट्टी के हवा सिंह' चुनावी दौरे पर गए एक नेता के हवाई दौरे की कहानी है। हवाई पट्टी के क्षतिग्रस्त होने के बावजूद पायलट के हवाई जहाज उतारने और अनियंत्रित भीड़ के व्यवहार की कहानी बयां हुई है इस कहानी में। कहानी 'प्लाजा' इस संग्रह की अच्छी कहानियों में से एक है। यह वर्तमान समाज में फैली बेरोजगारी से पीडि़त राकेश व्यथा-कथा ही नहीं, पूरे समाज की व्यथा कथा बनकर रह जाती है। 'संगम के शहर की एक लड़की', 'चना जोर गरम वाले चतुर्वेदी जी' जैसी कहानियां काफी मार्मिक हैं। कुल मिलाकर पूरा कहानी संग्रह पठनीय है।

कहानी संग्रह : व्यवस्था पर चोट करती सात कहानियां
कहानीकार : दयानंद पांडेय
प्रकाशक : शाश्वत प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स
1/10781, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32
मूल्य : 400 रुपये 

Saturday, October 24, 2015

राजनीति में चीयरलीडर्स

-अशोक मिश्र
आज सुबह स्पोर्ट्स पेज पर छपी एक चीयरलीडर की तस्वीर बड़े गौर से देख ही रहा था। तस्वीर थी भी इतनी मादक कि नजर पड़ते ही वहीं की वहीं ठिठक जाती थी। मैं तस्वीर की मादकता पर लहालोट हो ही रहा था कि बारह वर्षीय बेटे गॉटर प्रसाद ने सवाल दाग दिया, 'पापा! मैंने हॉकी, कबड्डी और क्रिकेट जैसे खेलों में चीयरलीडर्स को तो टीवी चैनलों पर ठुमकते देखा है। क्या राजनीति में भी चीयरलीडर्स होती या होते हैं?' स्कूल की तैयारी करते हुए बेटे ने यह सवाल किया, तो पहले मैं सकपका गया। फिर सवाल की गंभीरता पर विचार किया, तो लगा कि यह सवाल तो पूरी राजनीति के करेक्टर को ही पारिभाषित करने वाला है।
मैंने कहा, 'बेटा! अब तो राजनीति में सिर्फ चियरलीडर्स ही हैं, नेता तो बचे ही कहां हैं? नेता नाम की प्रजाति कभी हिंदुस्तान में हुआ करती थी, लेकिन परिस्थितियां अनुकूल न होने से यह पूरी प्रजाति ही विलुप्त हो गई है। तुम इस बात को इस तरह से समझ सकते हो कि नेताओं ने चीयरलीडर्स के रूप में कायांतरण कर लिया है। चीयरलीडर्स खुद भले ही कम कपड़ों में रहे, लेकिन वह दूसरों का मनोरंजन करती हुई दूसरों को शालीन रहने का संदेश देती हैं। वैसे भी इन चीयरलीडर्स के कपड़े कतई अशालीन नहीं होते। वहीं राजनीतिक चीयरलीडर्स..तौबा..तौबा। थेथरई और नंगई को ही ये जामा (कपड़े) बनाकर पहने रहते हैं। वैसे तो सत्ता के गलियारे तक उसी नेता की पहुंच हो पाती है, जो भ्रष्टाचार के दलदल में डुबकी लगा चुका होता है। संसदीय जनतंत्र को इसीलिए भ्रष्टाचार की गंगोत्री कहा जाता है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री में नहाए बिना तो राजनीतिक मोक्ष ही प्राप्त नहीं होता है। अगर कोई इस बात को उठाने का साहस भी दिखाए, तो नेता मानेंगे ही नहीं। अगर कोई इनकी इस नंगई पर आपत्ति जताता है, तो बड़ी मासूमियत से कह देते हैं। राजनीति तो एक हमाम है। हमाम में भला नंगे नहीं रहेंगे, तो क्या सूट-बूट पहनकर चहलकदमी करेंगे। राजनीति करने आए हैं तो राजनीति ही न करेंगे। राजनीति में कपड़ों का भला क्या काम। नैतिकता, शुचिता, कर्तव्यपरायणता जैसी बातें किताबी हैं। किताबी बातों से चुनाव नहीं जीते जाते हैं। चुनाव जीतने के लिए चाहिए, छल, बल, धन और समीकरण। समीकरण फिट करने के लिए खुद भी नंगा होना पड़ता है, दूसरों को भी करना पड़ता है। कभी दंगा करना पड़ता है, तो कभी दंगा कराना पड़ता है। राजनीति बगाों का खेल नहीं है। कभी गर्दन काटनी पड़ती है, तो कभी गर्दन कट जाती है।'
इतना कहकर मैंने बेटे पर नजर डाली, वह शायद मेरी बात समझ नहीं पा रहा था। मैंने समझाया, 'देखो.. चियरलीडर्स के पहनावे और हावभाव पर ध्यान दो। उनकी तुलना नेताओं से करो, तो बात समझ में आ जाएगी? नेताओं के कपड़े भले ही चियरलीडर्स की तरह रंग-बिरंगे न होकर सफेद हों, लेकिन इनका मन और कर्म बहुत बदरंगा होता है। चुनाव के दौरान इन नेताओं को नाचते देखा है न, जैसे किसी मदारी की बंदरिया नाचती है। वोट हथियाने के लिए क्या-क्या नहीं करते ये लोग। अपने विरोधियों को राक्षस, ब्रह्मपिशाच, हत्यारा, भ्रष्टाचारी और न जाने क्या-क्या कहते हैं, ताकि उन्हें वोट मिल सके।' 
मेरे बेटे को शायद बात थोड़ी-थोड़ी समझ में आने लगी थी। वह बोला, 'हां पापा! बिहार चुनाव के दौरान नेताओं ने कैसे-कैसे गंदे आरोप एक दूसरे पर लगाए। पापा, आप तो बताते थे कि पहले चुनावों के दौरान नीतियों की आलोचना की जाती थी, लेकिन अब तो लोग परिवार वालों पर कीचड़ उछालते हैं। इन्हें कीचड़ बहुत अच्छा लगता है क्या? यह खुद तो कीचड़ में लोटते रहते हैं, दूसरों को भी उसी कीचड़ में खींच लेते हैं। मजेदार बात यह है कि इस कीचड़ में पक्षी भी लोटते हैं, विपक्षी भी लोटते हैं।' मेरा बेटा कुछ और कहता कि बाहर से बस के हॉर्न की आवाज सुनाई दी। बेटे ने अपना स्कूल बैग उठाया और स्कूल चला गया।

Thursday, October 8, 2015

मुंगेरी लाल के पांव में बंधी बिलार

अशोक मिश्र
बचपन में जब मैं दिन भर घूमने के बाद शाम को घर आता था, तो मेरी मां कहती थीं कि इसके पैर में बिलार (बिल्ली) बंधी है। घर में पैर रुकता ही नहीं है। तब मैं उनकी इस कहावत का ठीक-ठीक अर्थ नहीं जानता था। मगर अब अपने पड़ोसी मुसद्दीलाल के सुपुत्र मुंगेरी लाल की घुमक्कड़ प्रवृत्ति को देखकर बता सकता हूं कि पैर में बिलार बांधने का क्या मतलब होता है। मुसद्दी लाल अपने जीवन में जिले से बाहर कभी नहीं गए। एक बार उनका कोई रिश्तेदार मार-पीट के मामले में थाने में बंद हो गया था, तो उसकी जमानत देने जरूर वे जिला मुख्यालय तक गए थे। उन्होंने पूरी जिंदगी काट दी, लेकिन मजाल है कि वे अपने गांव-जवार के बाहर गए हों। एक उनके सुपुत्र मुंगेरी लाल हैं। घर में पांव रुकते ही नहीं हैं। कभी अपनी ननिहाल, तो कभी चाची, मामी, भाभी के मायके में ही नजर आते हैं। इन सबसे ऊब गए, तो चल दिया अपनी और गांव के रिश्ते बुआ, मौसी, बहन और बेटियों की ससुराल। अपने घर में चुपचाप रहने वाला मुंगेरी लाल रिश्तेदारियों में पहुंचते ही मुखर हो उठता है।
अभी हाल का ही वाकया है। चाची के मायके में पहुंचने पर हुई खातिरदारी से मुग्ध मुंगेरी लाल ने जब अगले दिन चाची के भतीजे-भतीजियों को चाय और बिस्कुट खाते देखा, तो उसके मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा,  'अरे! तुम लोग चाय में बिस्कुट भिगोकर खा रहे हो, मेरे यहां ऐसा हुआ होता, तो बवाल मच जाता। मेरे पिता जी पीट-पीटकर भुरकुस निकाल देते।' यह उसकी आदत में है। अपने घर की बुराई और दूसरों की बड़ाई करने में उसे एक अजीब सा आनंद आता है। वह अक्सर अपनी रिश्तेदारों से कहा करता है, 'अरे मौसी! आपने झाड़ू दरवाजे के पीछे खड़ा करके रखा है, हम लोग ऐसा करते, तो मेरी मां झाडू से पीटती। बुआ! शत्रुघ्न खड़ा होकर पानी पी रहा है, अगर मैं कही ऐसा करता हुआ पकड़ा जाऊं, तो समझो कयामत ही आ जाएगी।' कहने का मतलब यह है कि उसे अपने घर की हर बात, हर काम में खोट ही नजर आता है। दूसरों का कोई भी काम हो, उसे प्रशंसनीय लगता है। वह खुले आम कहता भी है, आप लोग ऐसा कर रहे हैं, मेरे यहां ऐसा होता, तो वैसा हो जाता। घर के लोग आसमान सिर पर उठा लेते, कयामत आ जाती, प्रलय तो समझो आई ही आई थी।
कहने के मतलब यह है कि वह नाते-रिश्तेदारियों में अपने ही घर की पोल खोलता रहता है। लोग उसकी बातें सुनकर मंद-मंद मुस्कुराते हैं। कुछ लोग तो जान-बूझकर उसे उकसाते हैं कि वह कुछ बोले। मुंगेरी लाल अपने मां-बाप, भाई, बहन, भाभी आदि से सीधे मुंह बात नहीं करता है। लेकिन अगर किसी रिश्तेदारी में पहुंच गया, तो सबसे पहले उस घर के बड़े-बुजुर्ग के लपककर चरण स्पर्श करता है, उन्हें भाव विभोर होकर गले से लगा लेता है। अगर कोई उस समय फोटो-शोटो खींच रहा हो और कोई दूसरा फोटो के शानदार एंगल में बाधा बन रहा हो, तो वह बड़ी बेमुरौव्वती से उस आदमी को पकड़कर किनारे भी कर देता है। लंतरानी हांकना, तो मुंगेेरी लाल जैसे मां के पेट से सीखकर आया है, अभिमन्यु की तरह। बात-बात पर रिश्तेदारों से कहता है, 'मौसा जी! साठ साल के हो गए मेरे पिता को पैदा हुए, लेकिन कुछ भी नहीं किया। आज आप जो मेरे घर को चमकता-दमकता देख रहे हैं, वह सारी शाइनिंग मेरी वजह से है। मैंने किया है वह सब कुछ। मेरी मां, बाप, भाई-बहन तो बस गोबर जैसे हैं। जितना खा सके, खाया। बच गया तो टोला-पड़ोसियों को बांट दिया। मैंने अपने 'स्किल' से घर को 'स्टार्टअप' करके 'स्टैंडअप' किया है। मेरे परिवारवालों ने तो अपने ही घर को मोहल्ले-टोले वालों की मदद से लूट खाया।'
मुंगेरी कल ही भाई की ससुराल से लौटा, तो बड़ा खुश था। सुबह-सुबह भेंट हो गई, तो मैंने पूछ लिया, 'और मुंगेरी..क्या हालचाल है?' मुंगेरी ने कहा, 'क्या बताएं चच्चा..अपने घर के लोग हैं न! एकदम बौड़म। भाई की ससुराल में जाकर देखो..क्या सलीके से रहते हैं। दिल खुश हो जाता है। यही बात अगर यहां कह दू, तो लोग मुंह नोचने को तैयार हो जाते हैं।' इतना कहकर मुंगेरी ने बाइक स्टार्ट की रफूचक्कर हो गया।

महान होना है, तो बीवी से पिटो

अशोक मिश्र
अपने घर के बाहर रुआंसे से बैठे मुसई भाई आकाश की ओर निहार रहे थे, मानो भगवान से किसी बात की उलाहना दे रहे हों। मैंने पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रखा, तो वे चौंक उठे। मैंने सहानुभूति जताते हुए पूछ ही लिया, 'आखिर बात क्या है मुसई भाई? आप इस तरह गमगीन क्यों बैठे हो? भाभी से कोई लड़ाई-झगड़ा हो गया है क्या? किसी ने कुछ कह-सुन दिया हो, तो बताओ, उसकी अभी टांग तोड़ देता हूं, लेकिन अगर यहां भाभी जी का मामला है, तो भइया तुम जानो, तुम्हारी बीवी जाने। उस पचड़े में मैं नहीं पडऩे वाला।' 
मेरी बात पर मुसई भाई की आंखें डबडबा आईं। बोले, 'अब सहन नहीं होता। अरे यार! बात-बात पर बीवी पीट देती है। अभी कल ही सब्जी थोड़ी ज्यादा तीखी हो गई, तो बीवी ने पीट दिया। भला बताओ, अगर सब्जी में थोड़ी मिर्च ज्यादा हो गई, तो कौन सी आफत आ गई? एक दिन तीखी सब्जी नहीं खा सकती थीं।'
मुसई भाई की बात सुनकर मैं हंस पड़ा, अरे मुसई! आप भी न...एकदम बौड़म हैं। आपको दुनियादारी की राई-रत्ती भी जानकारी नहीं है। अगर भाभी जी ने आपको पीटा है, तो इसके लिए आपको खुशी मनानी चाहिए, भंगड़ा पाना चाहिए, नाचना-गाना चाहिए कि आप बहुत जल्दी महान होने वाले हैं।'
मेरी बात सुनकर मुसई ने मेरी ओर निरीह भाव से निहारा, तो मैंने उन्हें समझाया, 'देखो..बिल क्लिंटन को जानते हो। अमेरिका के राष्ट्रपति हुआ करते थे। बड़े धाकड़ राष्ट्रपति थे, लेकिन वे अपनी बीवी से पिट जाते थे। इस बात का खुलासा इस महान राष्ट्रपति की जीवनी लिखने वाले महान लेखक ने की है। उनकी सारी महानता के पीछे उनकी पीटने वाली बीवी थी। महाकवि कालिदास, महाकवि भक्त शिरोमणि तुलसीदास महान कैसे बने?  वे महान पैदा ही हुए थे। इन्हें बस प्रेरणा की जरूरत थी। उस युग में पति और पत्नी के रिश्ते आज की तरह थोड़े न हुआ करते थे। दोनों अपनी-अपनी मर्यादा का पालन करते थे। बस, प्रेरणा के लिए इन दोनों महान भक्त कवियों को उनकी पत्नी थोड़ा-बहुत ऐसा-वैसा कह दिया, तो आज के युग में जी रहे लोगों ने अपने हिसाब से उसका अर्थ निकाल लिया। बात का बतंगड़ बना दिया।' इतना कहकर मैं सांस लेने के लिए रुका।
'यह तो तुम जानते ही हो। सारी दुनिया को थर्रा देने वाले हिटलर, मुसोलिनी..सबके सब अपनी बीवी और प्रेमिकाओं के सामने भीगी बिल्ली बन जाते थे। सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी। आपने कई बार 'मेरा भारत महान' का नारा लगाया होगा। आपने सोचा है कि यह नारा क्यों दिया गया। इस नारे का संबंध इस कहावत से है कि हर महान पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है। बचपन में वह हाथ होता है, मां का, बहन का, भाभी का। और बड़े होने पर इनका स्थान ले लेती है बीवी। महान पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ.. अब आप पीटने की मुद्रा का ध्यान करें। तो भइया, मेरा भारत महान इसलिए है क्योंकि इस देश की विवाहिताएं अपने पति को पीट-पीटकर महान बना देती हैं। कहा भी गया है, 'जो नर पीटे जात हैं बीवी से सौ बार/ उनके महान बनने में लगै न तनिकौ बार।' यहां बार का मतलब देर से है।'
मैंने उनकी पीठ थपथपाते हुए कहा, 'इस दुनिया में जितने भी महान लोग हैं, उनकी जीवनी उठाकर पढ़ लीजिए। वे घर से बाहर भले ही बहुत बड़े तीरंदाज रहे हों, लेकिन घर में घुसते ही वे कांपने लगते थे। बीवी या प्रेमिका अगर कहती थी, अभी तो रात है, तो मजाल है कि वे दिन कहने का साहस दिखा जाएं। जिन्होंने साहस दिखाया, वे महान बने हों, तो बताओ। हर महान व्यक्ति अपने जीवन में एकाध बार बीवी से पिटता जरूर है। अगर खुदा न खास्ता आप पिट गए, तो कौन सा आकाश टूट पड़ा। मैं भी तो हफ्ते में एकाध बार पिट जाता हूं। चलिए, उठिए और घर जाकर पहले की तरह काम-काज निबटाइए, हंसी-खुशी आफिस जाइए। मेरे तसल्ली देने से मुसई भाई का दुख कम हुआ। वे खरामा-खरामा घर में घुस गए। 

Thursday, September 17, 2015

मेढक तौलने की कवायद

अशोक मिश्र
आपने कभी मेढक को तुलते देखा है। एक तो बड़ी मशक्कत के बाद पकड़ में आता है। चलो, किसी तरह पकड़ में भी आ गया, तो उस पर काबू रखना तो और भी कठिन। इतना चिकना कि जरा सा हाथ ढीला पड़ा, तो फिसल जाता है। फिर उसे तौलने के लिए तराजू पर रखा और दूसरे को उठाकर रखने चले नहीं कि पहला 'धप्प' से पलड़े के बाहर। दूसरे को पकड़कर तराजू पर रखने के बाद पहले को पकडऩे चले, तो दूसरा भी धप्प से बाहर। मतलब यह कि इस दुनिया में सबसे कठिन काम है तराजू पर जिंदा मेढक तौलना। अब कोई महारथी हो और वह बिना हाथ-पांव बांधे, ऐसा करने में सफल हो जाए, तो निस्संदेह वह मेढक तौलने का नोबेल पुरस्कार पाने का हकदार है।
कुछ ऐसा ही हो रहा है बिहार में। बिहार का हर राजनीतिक दल गठबंधन रूपी तराजू पर तुलने को तैयार है, लेकिन होड़ इस बात की है कि उसका ही पलड़ा भारी रहे। अब देखिए न! कुछ महीने पहले चार-पांच दलों को मिलाकर एक महागठबंधन बना था। वैसे तो इस महागठबंधन का हर दल 'मुंडे-मुंडे मर्तिभिन्न:' वाली कहावत चरितार्थ कर रहा था। लेकिन इस महागठबंधन में शामिल दलों ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी दलों के विजय के भय को रस्सी बनाकर अपने पांवों में बांध ली और चुनावी तराजू पर तुलने के लिए बैठ गए। पांवों में बंधी रस्सी ढीली थी या पांवों में जानबूझकर रस्सी ढीली बांधी गई थी, दो दल मेढकों की तरह कूद ही गए, धप्प। एक दल के मुखिया ने तो समधियाने का भी ख्याल नहीं रखा। सारा रायता ही बिखेर दिया।
अब बात करते हैं दूसरे गठबंधन की। इस गठबंधन के सबसे बड़ा दल अपने को बड़ा भाई कहता है। सभी अपनी हैसियत के हिसाब से मंझले, संझले और छोटे भाई बने हुए हैं। अभी हाल ही में बड़े भाई ने अपने से छोटे दलों की मीटिंग बुलाई और कहा, 'देखो भइया..मैं बड़ा हूं। मेरे पास राष्ट्रीय जनाधार है, एक से बढ़कर एक शानदार, जानदार और लोकलुभावन जुमले हैं, केंद्र में सत्ता है, तो मेरा सबसे बड़ा हिस्सा बनता है कि नहीं।' छोटे दलों ने हुंकारा भरा, 'बनता है..बिल्कुल बनता है।' तो बड़े दल ने कहा, 'तो भइया 243 सीटों में से 160 मैं अपने पास रख लेता हूं। बाकी 40 मंझले भइया को दे देता हूं, 23 संझले भइया के और बाकी 20 छोटे भइया के। बोलो मंजूर है?' यह सुनते ही मंझले भइया तो खुश हो गए, लेकिन संझले और छोटे का मुंह बन गया। संझले और छोटे ने खड़े होते हुए कहा, 'सारा हिस्सा तुम्हीं दोनों रख लो, मैं तो चला'
यह सुनते ही बड़े भइया ने दोनों का हाथ पकड़कर बिठा लिया, 'अरे सुनो तो! अगर कोई बात है, तो हम से कहो। मैं बैठा हू न! चलो अच्छा..मंझले को 30 सीटें दे देते हैं, मंझले को 28 और छोटे को 25 देने की घोषणा करता हूं। अब तो खुश?' इतना कहना था कि मंझले भाई ने गुर्राते हुए कहा, 'खबरदार..जो मेरी सीटों में कमी की..। मेरे पास क्या नहीं है, दाता हैं, मतदाता हैं..। अब तक कई बार बिहार की बैंड बजाने के बाद केंद्र में भी कई बार बैंड बजा चुका हूं। तुम्हारी यह जुर्रत..मेरी सीटें कम करने चले हो।' तब छोटे भाई ने बड़े से कहा, 'आप बड़े हैं, तो अपनी सीटों में से कुछ दीजिए न! हम लोगों की सीटों में से ही कतरब्योंत करके हमें बेवकूफ बनाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं।' इतना सुनते ही बड़े भाई ने कहा, 'देखो! मेरी तो 160 सीटों में से आधी सीट भी कम नहीं होगी। गठबंधन में रहना है, तो रहो..नहीं तो अपना रास्ता नापो।' बड़े भाई के उखड़ते ही संझले और छोटे ने बात संभालने की कोशिश की। इसके बाद कई दौर की बैठक हुई, कई फार्मूले ईजाद किए गए, लेकिन बात नहीं बननी थी, तो नहीं बनी। हर बार मीटिंग इस निर्देश के साथ बर्खास्त होती रही कि हम भले ही भीतर-भीतर लड़ते रहें, लेकिन बाहर वालों के सामने दांत निपोरना नहीं छोड़ेंगे। सुना है कि कल उनकी एक बार फिर मीटिंग होने वाली है।

Monday, September 14, 2015

पुलिस भी अब हो गई महान

अशोक मिश्र
पहले कुछ भी रही हो, लेकिन अब 'हमारा भारत महान' की तर्ज पर 'हमारी पुलिस महान' हो गई है। अब तो देशवासी पुलिसिया शराफत और कर्तव्यनिष्ठा की कसमें तक खाते हैं। दूसरे विभागों में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों को नसीहत दी जा रही है कि पुलिस वालों की तरह विनम्र और कर्तव्य पारायण होना सीखो। अब पुलिस वालों की कर्तव्य परायणता देखिए। अधिकारियों ने कहा, जंतर-मंतर पर जितने भी भूतपूर्व सैनिक धरने पर बैठे हैं, उनको तितर-बितर कर दो। आदेश भर की देर थी, पुलिस वाले जुट गए अपने कार्य को पूरी निष्ठा से अंजाम देने में। किसी का सिर फोड़ा, तो किसी की टांग तोड़ी, लेकिन मजाल है कि कोई भूतपूर्व सैनिक उसके सामने टिक पाया हो। अपना काम बेहद ईमानदारी से करके पुलिस लौट गई।
कुछ दिन बाद पुलिस अधिकारियों के मन में अपराध बोध पैदा हुआ कि भूतपूर्व हों या वर्तमान, ये सैनिक हैं तो हमारे ही भाई-बंधु। हमारे ही देश के नागरिक। इनकी ही बदौलत तो हमारी सीमाएं सुरक्षित रही हैं। बस, फिर क्या था? पहुंच गए पुलिस अधिकारी जंतर-मंतर। पूर्व सैनिकों से माफी मांगने। आखिर पुलिस वाले भी तो इंसान ही होते हैं। उनमें भी तो भावनाएं होती हैं। वे किसी इंसान की जब हड्डी पसली एक कर देते हैं, तो उन्हें कोई अच्छा थोड़े न लगता है। उत्तर प्रदेश में जब कांग्रेस के नेता बब्बर साहब की दो-चार पसलियां चटकाई, तो उन्हें सहारा देकर पुलिस वाले ही तो अस्पताल ले गए। अब इससे ज्यादा महानता का क्या सुबूत चाहिए।
बलात्कार चाहे थाने में हो या थाने के बाहर। हमारे देश की पुलिस हमेशा बाप-बड़े भाई की भूमिका में रही है। पीडि़ता को थाने में बिठा लिया, आरोपी को पकड़ मंगाया, पीडि़ता के सामने आरोपी को तीन-चार थप्पड़ लगाए और पीडि़ता से कहा, 'लो जी! सजा दे दी। अब आप भी माफ कर दो। बच्चे हैं गलती हो गई।' चोर-पाकेटमारों को पकड़ा और जिसका सामान चोरी या छीना गया था, उसे उसका सामान वापस दिला दिया, हो गया न्याय। अब इससे ज्यादा...क्या बच्चे की जान लोगे? ऐसा किसी और देश में होता हो, तो बताओ। इतनी महान किसी दूसरे देश की पुलिस हो, तो आलोचना करो, वरना अब अपनी चोंच बंद रखो।

धीरज रखो, सबका विकास होई

अशोक मिश्र
गांव पहुंचा, तो रास्ते में मिल गए मुसई काका। मैंने उन्हें देखते ही प्रणाम किया, तो उन्होंने किसी लोक लुभावन सरकार की तरह आशीर्वाद से लाद दिया। मैंने देखा कि  जिंदगी भर गटापारचा (प्लास्टिक) की चप्पल पहनने वाले मुसई काका स्पोट्र्स शूज पहने मुस्कुरा रहे हैं। मैंने मजाक करते हुए कहा, 'नथईपुरवा तो बहुत विकास कर गया है, गटापारची चप्पल से स्पोट्र्स शूज तक।' मेरी बात सुनते ही मुसई काका हंस पड़े और मेरा हाथ पकड़कर सड़क के किनारे बनी पुलिया पर छांव के नीचे घसीट ले गए और पुलिस पर बैठने का इशारा किया। बोले, 'विकास की बात भले किया। मैं तो तुमसे पूछने ही वाला था कि हम लोगों का विकास कब होगा? यह विकास-विकास तो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। जो भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बनता है, तो सबसे पहले विकास करने की बात करता है। यह विकास आखिर है क्या? और कैसे होगा?'
मैंने अपने चेहरे पर बत्तीस इंची परमहंसी मुस्कान सजा ली, 'काका! बचपन से लेकर पूरी जवानी तक आपने गटापारचा की चप्पल पहनकर काट ली, जवानी में जब आप बंगाल, पंजाब कमाने जाते थे, तो काकी को आपका हाल-खबर मिलने में महीनों लग जाते थे, लेकिन अब देखिए, आप बुढ़ापे में स्पोट्र्स शूज पहनकर घूम रहे हैं। परदेश कमाने जाते हैं, तो घर से निकलते ही बस स्टैंड तक पहुंचने से लेकर जहां आप मजदूरी करते हैं, वह तक पहुंचने की राई-रत्ती खबर जो फोन पर देते रहते हैं, वह विकास नहीं है क्या? चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरे अस्पताल, घर-घर में दिन भर चिल्लपों मचाते टेलीविजन सेट। यही तो विकास है काका।'
मुसई काका ने अपनी गुद्दी खुजलाई। कुछ सकुचाते हुए बोले, 'बेटा! हम आधा पेट खाए, फटी धोती पहन के जिंदगी काटे, तब जाकर चार पैसा जोड़ पाए और टीवी-फीवी, मोबाइल वगैरह खरीद पाए। इसमें सरकार का क्या है? पैसा लगाया, तो यह सुविधा मिल गई। सरकार हमारा विकास कब करेगी?' मुसई काका ने तो मुझे फंसा ही दिया। मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, 'काका! यह बताओ, जब सरकार कहती है कि सबका विकास करना उसका पहला काम है, तो वह पहला काम कर रही है। आजादी के बाद से कर रही है। अब तक करती आ रही है। आपने यह तो सुना कि वह सबका विकास करेगी, लेकिन यह नहीं सुना कि वह अल्पसंख्यकों का सबसे पहले विकास करेगी। कहती है कि नहीं?' अब फंसने की बारी मुसई काका की थी।
मुसई काका ने असमंजस भरे स्वर में कहा, 'हां...कहती तो है, लेकिन इस देश के अल्पसंख्यक तो आजादी के बाद से अब तक वैसे ही हैं, जैसे पहले थे। उनमें राई-रत्ती फर्क आया हो, तो बताओ।' मैंने मुस्कुराते हुए कहा, 'काका! आप अल्पसंख्यक किसको मानते हैं?'
'अरे हम सब ही तो हैं अल्पसंख्यक।' मुसई काका झुंझला उठे। मैंने कहा, 'नहीं।।देश में न हिंदू अल्पसंख्यक हैं, न मुस्लिम। न सिख अल्पसंख्यक हैं, न जैन, पारसी, ईसाई, बौद्ध। अल्पसंख्यक हैं, तो इस देश के पूंजीपति, उद्योगपति, अफसर और नेता। आप सोचिए काका, इस देश की एक सौ इक्कीस करोड़ की आबादी में पूंजीपतियों, उद्योगपतियों, अफसरों, नेताओं की आबादी कितनी होगी? मुश्किल से कुल आबादी का एक फीसदी।।अब सरकार पहले इन अल्पसंख्यकों का विकास करेगी कि आप जैसे बहुसंख्यकों का। पहले इन लोगों का विकास हो जाने दो, आपका भी करेगी। जब सरकार ने कहा है, तो विकास जरूर करेगी। काका, धीरज रखो।' इतना कहकर मैं आगे बढ़ गया। काका चिल्लाए, 'ऐसे तो तीन-चार सौ साल में भी हम लोगों का नंबर नहीं आएगा। तब तक तो मुझे मरे हुए चार-साढ़े चार सौ साल हो चुके होंगे।' मैंने पलटकर जवाब दिया, 'तो इसमें सरकार क्या करे? सरकार ने कोई ठेका ले रखा है आप लोगों का।Ó इतना कहकर मैं लंबे डग भरता हुआ घर चला आया।

Tuesday, September 1, 2015

विकास का फट गया ढोल

अशोक मिश्र
आपने ढोल देखा है! अरे वही जिसे औरतें शादी-ब्याह, मूडऩ, छेदन या तीज-त्योहारों पर बड़ी उमंग और उत्साह के साथ बजाती थीं। अब तो औरतों को ठीक से ढोल बजाना ही नहीं आता। शादी-ब्याह में भी अब तो सिर्फ रस्म अदायगी होती है, वह भी गांव-देहातों में। शहरों में तो ढोल का अब कोई काम ही नहीं रहा। जी हां, मैं वही ढोल हूं। बात दरअसल यह है कि शादी-ब्याह, तीज-त्योहारों पर ढोल की जैसे-जैसे उपयोगिता घटती गई, राजनीति में इसकी उपयोगिता वैसे-वैसे बढ़ती गई। अब आप कहेंगे कि मैं क्या ऊटपटांग बक रहा हंू? तो साहब..बात यह है कि जिस दिन आजादी मिली, नेहरू जी ने अपनी पीठ पर एक ढोल बांध लिया और लगे पीटने, 'मुझे इस देश में समाजवाद लाना है। मुझे इस देश को स्वर्ग बनना है।' जब तक वे जिंदा रहे, यह समाजवाद का ढोल बजता ही रहा। मजाल है कि कोई उनके इस ढोल को छू भी ले। जब वे जनता के दुख से दुखी हो, तो बड़ी जोर-जोर से समाजवादी ढोल पीटने लगते, जनता समझ जाती कि जिल्ले सुबहानी उनके दुख से आज दुखी हैं। उसके बाद तो यह परंपरा हो गई। जो भी प्रधानमंत्री बनता, अपनी पीठ पर एक ढोल बांध लेता, वह ढोल बजाता, उसके लगुए-भगुओं में से कोई बीन बजाता, तो कोई ढफली। नतीजा, यह होता कि इस कौवा रोर में जनता यह नहीं जान पाती थी कि उसे ध्यान किस पर देना है, ढोल पर, बीन पर या ढफली पर। वह बेवकूफों की तरह मुंह बाए नेताओं और मंत्रियों का यह करिश्मा देखती रहती थी। 
अपने देश में एक प्रधानमंत्री तो ऐसी हुई हैं, जिन्होंने 'कांग्रेस लाओ, गरीबी मिटाओ' का ढोल इतनी बार बजाया कि जनता ही बहरी हो गई। उसके बाद तो किसिम-किसिम के ढोल ईजाद कर लिए गए। जैसे-जैसे राजनीति में भ्रष्टाचार, अनाचार, भाई-भतीजावाद, प्रांतवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता बढ़ती गई, ढोल का आकार-प्रकार बदलता गया। 
अभी जो जिल्ले सुबहानी दिल्ली में  हैं, वे विकास का ढोल तब से पीट रहे हैं, जब वे किसी राज्य के जिल्ले सुबहानी थे। उन्होंने अपनी पीठ पर 'जन धन योजना', 'मेक इन इंडिया', 'स्टैंड अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया', 'स्किल इंडिया' जैसे न जाने कितने अंग्रेजी नाम वाले ढोल बांध रखा है। जब मर्जी होती है, तो वे कोई एक ढोल बजाने लगते हैं, जब मर्जी होती है, तो सारे ढोल एक साथ पीटने लगते हैं। सवा साल-डेढ़ साल पहले उन्होंने 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' का ढोल पीटा था, लेकिन उनके साथियों ने खाया भी और दूसरो को खिलाया भी। उनका एक ढोल था कि आन नहीं मिटने देंगे। लेकिन यह ढोल कुछ ऐसे बजा कि आज रोज आन मिट रही है, वे टुकुर-टुकुर निहार रहे हैं। वे जब ढोल बजाने से ऊब जाते हैं, तो मन की बात करने लगते हैं। इससे भी मन भर जाता है, तो वे फिर विकास का ढोल पीटने लगते हैं। वे यह भी नहीं देखते हैं कि ढोल की डोरियां कब की ढीली हो चुकी हैं। उन्हें कसने की जरूरत है। भला आप लोग ही बताइए, ऐसी हालत में मैं भला ढोल कब तक बजता? जब बर्दाश्त नहीं हुआ, तो मैं फूट गया। तब से जिल्ले सुबहानी परेशान हैं। एक-एक कर सारे ढोल फूट गए, तो जिल्ले सुबहानी की खुल गई पोल।

Sunday, August 30, 2015

स्मार्ट सिटी में बगलोल चंद

अशोक मिश्र
अपने एक मित्र हैं बगलोल चंद। मेरे गांव नथईपुरवा में रहते हैं। वे न केवल नाम से बगलोल हैं, काम और बुद्धि से भी बगलोल हैं। कहो आम, तो समझते इमली हैं। एक दिन फोन आया और बात घूम-फिर कर देसी घी तक पहुंच गई। मैंने उन्हें बताया कि शहर में देसी घी खाने क्या आंख में लगाने को नहीं मिलता है। उन्होंने आश्वस्त किया कि वे मेरी इस समस्या को जल्दी हल कर देंगे। मैंने समझा, वे हर महीने किलो-दो किलो देसी घी भिजवा दिया करेंगे। एक दिन सुबह पत्नी ने उठाया, 'उठिए...बगलोल भाई साहब आए हैं।' मैंने झल्लाते हुए कहा, 'तो कौन सी आफत आ गई। उन्हें  चाय-पानी पिला, मैं थोड़ी देर बाद उनसे मिलता हूं।'
पत्नी ने परेशान स्वर में कहा, 'आफत भी उनके साथ आई है। देखिए तो सही। बगलोल भाई साहब दरवाजे पर खड़े हैं।' मैं बाहर निकला, तो देखा कि वे एक भैंस के साथ खड़े हैं। मैंने पूछा, 'यह क्या तमाशा है? भैंस यहां क्यों ले आए हो?' बगलोल चंद ने मासूमियत से जवाब दिया, 'भइया! आप ने ही तो कहा था, शहर में दूध-दही की किल्लत है, तो हम 'राम प्यारी' को आपकी खातिर यहां ले आए। अब देसी घी आंख में  लगाइए और जीभर कर खाइए।' उनका जवाब सुनकर मैंने माथा पीट लिया। तो ऐसे हैं अपने बगलोल चंद।
बगलोल चंद पिछले कुछ दिनों से एक ही बात की रट लगाए हुए हैं, 'भइया! बस एक बार किसी स्मार्ट सिटी में घुमवा दो। जीवन सफल हो जाए। बड़ी तमन्ना है स्मार्ट सिटी घूमने की।' 
बार-बार के निवेदन से आजिज आकर मैंने एक रविवार को उन्हें बुला ही लिया।  शाम को सबसे नजदीक वाले स्मार्ट सिटी में लेकर जा पहुंचा। स्मार्ट सिटी में बने एक पार्क के किनारे हम दोनों खड़े होकर आसपास का नजारा देखने लगे। पार्क की दशा देखकर बगलोल चंद वैसे ही विह्वल हो गए, जैसे किसी अभिनेता-अभिनेत्री को सामने पाकर उसके प्रशंसक भाव विभोर हो जाते हैं। वे चारों तरफ देखते हुए बोले, 'भइया...हमारे वेद-पुराण में स्वर्ग के बारे में जैसा लिखा गया है, ठीक वैसा ही यहां सब कुछ दिखाई दे रहा है। वेद-पुराण में लिखा है कि स्वर्ग में लाखों-करोड़ों सूर्य की रश्मियां हर ओर जगमग-जगमग करती रहती हैं। वहां न किसी को प्यास लगती है, न भूख। बस, मन हमेशा मनोरंजन में ही लगा रहता है। तभी तो वहां मेनका, उर्वशी, रंभा जैसी लाखों-करोड़ों अप्सराओं की व्यवस्था है। तभी तो हर कोई स्वर्ग जाना चाहता है।' 
पार्क में हर आयु वर्ग के जोड़े मिलकर सचमुच स्वर्ग का एक सुंदर और अलौकिक कोलाज रच रहे थे। एक जोड़े की ओर इशारा करते हुए बगलोल चंद ने कहा, 'भइया..वो जो लोग मनोरंजन में लगे हुए हैं। उसमें पुरुष जरूर कोई पुण्यात्मा होगी। और वह लड़की कोई अप्सरा।'
मैंने हंसते हुए कहा, 'ये कोई अप्सरा-वप्सरा नहीं है। यह स्मार्ट सिटी है। यहां सब कोई स्मार्ट है। पहनावे में, आचरण में, विचार में, लूट-खसोट में, ठगी-बेईमानी में। सब में लोग स्मार्ट हैं। यहां जरा सी निगाह चूकी नहीं कि आंख से काजल क्या पूरी आंख ही गायब हो जाती है।' जब मैं यह कह रहा था, तभी बगलोल चंद ने अपनी जेब से चूना-तंबाकू निकाला और हथेली पर दोनों को मिलाकर दस-बारह बार रगडऩे के बाद ठोंका-पीटा, फिर हथेली से उठाकर होंठों के नीचे दबा लिया। होंठों के बीच तंबाकू दबाने के बाद उन्होंने मुझसे कहा, 'तुम यहीं खड़े रहो, मैं थोड़ा निबटकर आता हूं।'
मैं कुछ कहता कि वे तत्काल आगे बढ़ गए। काफी देर बीतने के बाद जब बगलोल चंद नहीं लौटे, तो मैंने उन्हें खोजना शुरू किया। काफी खोजने पर भी वे नहीं मिले। मैं घबरा रहा था। चार-पांच घंटे बाद मैंने उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने का फैसला कर पूछते-पाछते पुलिस थाने पहुंचा, तो देखा, एक कोने में बगलोल चंद बैठे बिसूर रहे हैं। मैंने उनको डपटते हुए कहा, 'तुम कहां गायब हो गए? यहां क्यों बैठे हो, घर नहीं चलना है?' तभी एक सब इंस्पेक्टर ने गुर्राते हुए कहा, 'दस हजार जुर्माना अदा कर दो, इस बगलोल को ले जाओ।' मैंने पूछा, 'क्या मतलब? किस बात के दस हजार रुपये? कैसा जुर्माना?' इंस्पेक्टर ने कहा, 'पब्लिक प्लेस में लघुशंका करने का।' बहुत हाय-हाय, खींच-तान के बावजूद इंस्पेक्टर एक भी रुपया कम करने को तैयार नहीं हुआ। तो मजबूरन एटीएम से पैसा निकालकर जमा करना पड़ा। मैंने निकलते समय इंस्पेक्टर से पूछा, यहां कोई टॉयलेट-वायलेट है कि नहीं? इंस्पेक्टर ने बताया कि स्मार्ट सिटीज में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती है। मैं बगलोल चंद के साथ जल्दी से थाने से यह सोचते हुए बाहर आ गया कि स्मार्ट सिटी के लोगों को शायद लघु या दीर्घ शंका की जरूरत नहीं पड़ती होगी, तभी न इसकी व्यवस्था नहीं की  गई है।

Monday, August 24, 2015

अंकल ...चंदा दो

अशोक मिश्र
मैं सोकर ही उठा था कि दस-बारह लड़कों ने मेरा घर घेर लिया। मैंने सवालिया निगाहों से उनकी ओर देखा, तो उनका गुंडा नुमा नेता अपने झुंड से बाहर आया। उसने साफ सुथरे फर्श पर पान की पीक थूकते हुए कहा, 'अंकल..चंदा दो।Ó सुबह-सुबह चंदा मांगने की बात से मैं उखड़ गया, 'तुमने मेरे घर को किसी कंपनी का दफ्तर समझ रखा है क्या कि मुंह उठाया और चले आए चंदा मांगने। मैं किसी पार्टी-शार्टी को चंदा-वंदा नहीं देता। भाग जाओ।Ó नेता नुमा गुंडा गुर्राया, 'चंदा तो आपके पुरखे भी देंगे, आप क्या चीज हैं।Ó
बात आगे बढ़ती कि तभी घरैतिन बाहर निकल आईं। पत्नी को देखते ही गुंडा नुमा नेता ने झुककर उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा, 'आंटी..देखिए न! हजार-पांच सौ रुपये के होली के चंदे के लिए अंकल किस तरह हुज्जत कर रहे हैं। आप समझाइए न इनको।Ó घरैतिन ने पांच सौ रुपये का नोट आगे बढ़ाते हुए कहा, 'अरे बेटा! जाने दो। सठियाया आदमी ऐसा ही होता है।Ó और फिर मुझे घूर कर देखा।
चंदा मांगने आए लड़कों के चेहरे पर पांच सौ का नोट देखते ही एक चमक आ गई। लड़के ने नोट को उलट-पलट कर देखने लगा। मुझसे रहा नहीं गया, 'अबे! नोट को ऐसे क्या देख रहा है?Ó 'कुछ नहीं अंकल! देख रहा था कि कहीं कालाधन तो नहीं है। लोग आजकल काले धन को ही चंदे में देते हैं। अच्छा यह बताइए, आप इनकम टैक्स तो देते हैं न। पैन कार्ड तो होगा ही।Ó मैं गुस्से से उबल पड़ा, 'हां..हां..यह काला धन ही है। वापस कर दे मेरा पैसा। हवाला के जरिये अभी थोड़ी देर पहले स्विटजरलैंड से मंगाया है।Ó मेरी बात सुनते ही लड़के हंस पड़े। उनमें से एक ने कहा, 'अंकल! आप एक बात बताइए। आपने जो यह पांच सौ का नोट होली के चंदे में दिया है, वह किस दिन की कमाई का है? मेरा मतलब है कि इस महीने की सैलरी का है या पिछले महीने का। या फिर उससे भी पिछले महीने का? आप अपनी बचत में से दे रहे हैं या फिर आंटी की बचत का? इनकम टैक्स पेयर तो आप हैं कि नहीं? आपने पैनकार्ड बनवा रखा है कि अभी बनवाना है? आधार कार्ड तो होगा न आपके पास?Ó
'अबे! तुम लोग चंदा मांगने आए हो या चंदे के बहाने डकैती डालने की खातिर रैकी करने।Ó मैं उबल पड़ा। 'वो क्या है न, अंकल! आजकल बड़ा ध्यान रखना पड़ता है। पहले सब कुछ कितना आसान था होली का चंदा मांगना। जिसके घर चंदा मांगने गए, थोड़ी बहुत हुज्जत के साथ चंदा दे देता था। मान लीजिए नहीं दिया चंदा, तो उसकी कुर्सी-मेज, पलंग रात में उठाकर होली में डाल दिया। थोड़ी दारू ज्यादा हो गई, तो मार-पीटकर ली। होली बीती, तो माफी मंगा ली। लेकिन अब चंदा न मिलने से ज्यादा लफड़े वाला काम चंदा मिलना हो गया है। सब कुछ ध्यान रखना पड़ा है। आप तो सब कुछ समझते ही हैं अंकल। आपको क्या बताना।Ó इतना कहकर चंदा मांगने वाला का हुजूम आगे बढ़ गया।

Wednesday, August 12, 2015

दिल्ली में तो रामराज्य है

 अशोक मिश्र
हाई स्कूल के एक छात्र ने 'केंद्र और दिल्ली सरकार के शांतिपूर्ण सहअस्तित्वÓ पर निबंध लिखा, 'दिल्ली में जब से लोकपाल बिल पास हुआ है, एकदम रामराज्य कायम हो गया है। राज्य सरकार के मंत्री, विधायक और नेता ही नहीं, विपक्ष में बैठे विधायक तक पहली तारीख को जनता के सामने अपनी कमाई का ब्यौरा पेश कर देते हैं। केंद्र और राज्य सरकार के बीच तो ऐसे संबंध हैं, जो कि बड़े भाई की सरकार केंद्र में हो और छोटे भाई की सरकार राज्य में। प्रधानमंत्री जी को जब भी किसी मामले में विचार-विमर्श करना होता है, तो वे अपनी पार्टी के सदस्यों के साथ-साथ दिल्ली सरकार के मुखिया को भी बिठा लेते हैं। उनकी बातों को गौर से सुनते हैं और अगर लगा कि छोटे भाई यानी कि दिल्ली सरकार के मुखिया की बात में दम है, तो वे तुरंत उसे लागू भी कर देते हैं। अगर प्रधानमंत्री जी किसी काम से मुख्यमंत्री जी के घर के आसपास से गुजर रहे हों, तो वे उनके यहां जाकर कुछ देर बैठते हैं। मुख्यमंत्री जी भी प्रधानमंत्री जी को बिना कुछ खिलाए-पिलाए वापस नहीं जाने देते हैं।Ó दोनों भाई जब भी मीडिया के सामने आपसी संबंधों की चर्चा करते हैं, तो एक दूसरे की तारीफ के पुल बांधते ही रहते हैं। गले मिलते हुए फोटो खिंचवाते हैं।Ó
उस छात्र ने आगे लिखा, 'दिल्ली में एक 'एलजीÓ होता है। एलजी का फुलफॉर्म क्या होता है, मुझे नहीं मालूम। लेकिन सुनते हैं कि मुख्यमंत्री जी अपना राजकाज चलाने में इनसे बहुत सहयोग लेते हैं। 'एलजीÓ जी भी बड़े उदारमना हैं। जब भी पुलिस से संबंधित कोई मामला आता है, तो मुख्यमंत्री जी पुलिस अधिकारियों से कहते हैं कि एलजी साहब से पूछो क्या करना है। जब पुलिस वाले एलजी साहब के पास जाते है, तो एलजी साहब कहते हैं कि मुख्यमंत्री जी से पूछो। इस मामले में उनके ही आदेश चलेंगे। बेचारी पुलिस इन दोनों लोगों के अतिशय प्रेम के चक्कर में फंसकर वही करती है, जो उसे सुहाता है। कई बार तो यह सुहाना आम जनता पर ही भारी पड़ जाता है। लेकिन मजाल है कि दिल्ली की जनता इन तीनों लोगों के आपसी प्रेम और भाईचारे पर तनिक भी नाराज हो।Ó निबंध तो बहुत बड़ा था, लेकिन यह उसका सार-संक्षेप है।

Wednesday, August 5, 2015

अब छबीली भी बनेगी शिक्षामंत्री

अशोक मिश्र
मेरे मोहल्ले में रहती है छबीली। पूरे मोहल्ले के दिलों की धड़कन है छबीली। युवाओं के दिल की धड़कने उसे देखते ही बढ़ जाती है, चेहरे पर रौनक आ जाती है। लेकिन महिलाएं जब उसे अपने घर  के आसपास देखती हैं, तो इस भय से उनके दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं कि कहीं रमुआ के पापा तो लप्पो-छप्पो नहीं कर रहे थे इसके साथ। आज घर पहुंचा तो देखा कि दशहरे के हाथी की तरह सजी-संवरी छबीली विराजमान है। घरैतिन से मूक नजरों से  भीतर ही भीतर प्रसन्न होते हुए सवाल किया, तो वह बोली, 'आप यहीं आकर बैठिए, मैं जरा चाय-पानी की व्यवस्था करती हूं।' मैं हैरान रह गया कि कल तक छबीली के नाम से भड़कने वाली घरैतिन आज मुझे उसके साथ बैठने को कह रही हैं, तो जरूर कोई लोचा है। 
मैंने उसके सामने बैठते हुए उसे भरपूर नजरों से निहारा, तो वह मुस्कुराई। बोली, 'जीजू...आप जानते ही हैं कि बहुत जल्दी मंत्रिमंडल का विस्तार होने वाला है। मैं आपसे यह पूछने आई हूं कि अगर बैक डोर से मेरी मंत्रिमंडल में इंट्री होती है, तो कौन सा विभाग मांगू।'
यह एक और धमाका था मेरे लिए। कल तक पार्टी का झंडा उठाकर चलने वाली छबीली मंत्री बनने जा रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि जो मुझे देखकर बिदक जाया करती थी, वह आज जीजू कहकर संबोधित कर रही है। मैंने कहा, 'तुम कौन सा विभाग लेना चाहती हो।' उसने तपाक से मुस्कुराते हुए कहा, शिक्षा विभाग। उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि मेरी कनपटी के नीचे बम विस्फोट हुआ है। 'छन्न' से कान बज उठा। वह इठलाती हुई बोली, 'बात यह है जीजू....बचपन में मैंने मास्टरों की बहुत मार खाई है। मास्टरों की मारने-पीटने और परीक्षा के दौरान कड़ाई करने के चलते ही मैं दसवीं में पांच बार फेल हुई और झख मारकर मेरे बाबू जी ने एक फटीचर के साथ मुझे बांध दिया।'
उसकी बात सुनकर मैं भौंचक रह गया। सोचने लगा कि इस देश के कुछ शिक्षा मंत्री तो पहले से ही शिक्षा व्यवस्था का कबाड़ा करने पर तुले हुए हैं, अब अगर यह भी उनमें शामिल हो गई, तो भगवान ही मालिक है इस देश-प्रदेश के नौनिहालों का। मैंने कहा, 'अरे नहीं..तुम कोई दूसरा विभाग देख लो, बच्चों को बख्श दो, यह उन पर बहुत बड़ी मेहरबानी होगी। वैसे भी शिक्षा मंत्री को बहुत पढ़ा लिखा होना चाहिए।'
मेरी बात सुनकर छबीली बमक गई, रोष भरे शब्दों में बोली, 'क्यों जीजू...जब मध्य प्रदेश में बिना पढ़े-लिखे लोग पीएचडी कर सकते हैं, डॉक्टर बन सकते हैं, फर्जी डिग्री हथिया कर मंत्री, सांसद और विधायक बन सकते हैं, तो मैं शिक्षा मंत्री क्यों नहीं बन सकती। झारखंड की वह बहन भी तो शिक्षा मंत्री है, जो प्रदेश को देश बना देती है। आखिर मेरे शिक्षा मंत्री बनने में क्या बुराई है।'
'देख..छबीली..शिक्षा मंत्री का पद बहुत जिम्मेदारी का पद है। यह देश-प्रदेश के नौनिहालों के भविष्य का सवाल है। तू दूसरा कोई भी विभाग ले ले, लेकिन यह विभाग तो भूलकर भी न लेना।' मैंने समझाने की कोशिश की।
मेरे इतना कहते ही वह कुछ रुष्ट स्वर में बोली, 'आप मुझे बेवकूफ समझते हैं। आप को मेरा टेस्ट लेना हो, तो ले लीजिए। आप तीन सवाल पूछिए और अगर मैं जवाब नहीं दे पाई, तो अपना इरादा बदल दूंगी। मैंने उसके यह कहते ही तपाक से पूछा, 'सिकंदर कौन था?' वह भी उसी तत्परता से बोली, 'जीजू..था नहीं, है कहिए। मेरी मौसी की बड़ी बेटी के देवर हैं सिकंदर बाबू। उनकी शादी मेरी बड़ी बुआ की देवरानी की बहन से हुई है। क्या पर्सनॉल्टी है उनकी..एकदम रणबीर कपूर लगते हैं।'
मैं उसका जवाब सुनकर सहम गया। मैंने धीमे स्वर में पूछा, 'और पोरस?' मेरा सवाल सुनकर पहले तो छबीली शरमाई और बोली, 'क्या जीजू..अब आप ठिठोली करने लगे। पोरस नहीं..पौरुष..यह तो उसमें काफी कूट-कूटकर भरा है। एकदम चौड़ा सीना, भरी-भरी मांसल बाहें, चौड़ा माथा..मेरी बड़ी बुआ की देवरानी के घरवालों ने तो उसे देखते ही पसंद कर लिया था। उसे देखकर न..कोई भी लड़की उस पर लट्टू हो सकती है। आपको सच बताऊं..कभी मैं भी लट्टू हुई थी, लेकिन मुए ने घास ही नहीं डाली।' छबीली का जवाब सुनकर मैं तीसरा सवाल करने का साहस नहीं जुटा पाया। मुझे चुप देखकर छबीली प्रसन्नता से उछल पड़ी और हांक लगाकर बोली, 'जिज्जी..मैंने जीजू को भी संतुष्ट कर दिया है। अब वे भी मान गए हैं। मैं अभी जाकर मुख्यमंत्री जी को बताती हूं कि मुझे शिक्षा विभाग ही चाहिए।' इतना कहकर वह दनदनाती हुई घर से निकल गई। घरैतिन हांक लगाती रह गईं, 'अरी चाय तो पीती जा..।' मैं तब से इस इंतजार में हूं कि मेरी साली छबीली साहिबा कब शिक्षा मंत्री बनती हैं और मैं लोगों पर रोब गांठ सकूं कि खबरदार! जो कभी तीन-पांच किया, तो साली से कहकर 'तीयां-पांचा' करवा दूंगा।

Wednesday, July 29, 2015

'सेर' को मिल गया 'सवा सेर'

अशोक मिश्र
जिस कार्यालय में मैं दिन भर खबरों की कतरब्योंत करता हूं, उसी आफिस में काम करता है अच्छन प्रसाद। बीस-बाइस साल का चेहरे से भोला-भाला लगने वाला लड़का। हल्की-हलकी दाढ़ी,  ऊपर की ओर संवारे गए बाल। रंग न बहुत गोरा, न बहुत काला। स्वस्थ किंतु पतला-दुबला शरीर। पहली ही नजर में देखने पर एक 'अच्छे' लड़के की छवि मन-मस्तिष्क में उभरती है। एक दिन मैं किसी गंभीर समस्या पर कुछ लिखने का मूड बनाकर बैठा ही था कि वह अपना सिर खुजाता नमूदार हो गया। मैंने उसकी ओर प्रश्नवाचक निगाह से देखा, तो उसने पूछा, 'सर! अगर आप डिस्टर्ब न हों, तो एक बात पूछूं। बहुत दिनों से पूछना चाहता हूं।' मैंने गुर्राते हुए कहा, 'सारे मूड का सत्यानाश करके पूछता है कि डिस्टर्ब तो नहीं हो रहे हैं। चल, अब बक भी दे जो बकना है..मुंह बाये खड़ा देख क्या रहा है।'
अच्छन प्रसाद ने धीमे स्वर में पूछा, 'सर..ये मुंबई वाले ये हीरोइनें तो रोज नहाती होंगी?'
उसकी बात सुनकर मुझे गुस्सा आ गया। भला बताओ..कहां मैं राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार कर रहूा हूं, ईरान-तूरान से लेकर साइबेरिया तक, भारत से लेकर अमेरिका तक के लोगों को एक नई रोशनी से रू-ब-रू कराने की जुगत में लगा हुआ हूं और यह कमबख्त हीरोइनों के नहाने-धोने पर ही अटका हुआ है। मैंने गुर्राते हुए कहा, 'हां..नहाती-धोती हैं, तो तुझे क्या?' उसने फिर मासूमियत भरे लहजे में पूछा, 'सर...अमेरिका, लंदन, फ्रांस की हीरोइनें भी नहाती-धोती होंगी? मेरा मतलब अंग्रेजी फिल्मों की हीरोइनें....?'
उसकी बात सुनकर मेरा पारा चढ़ गया। मैंने लगभग डपटते हुए कहा, 'तू कहना क्या चाहता है? तेरी बात मेरे पल्ले तो पड़ नहीं रही है? जो कुछ पूछना है, साफ-साफ पूछ और फूट ले यहां से। बात को जलेबी की तरह घुमा मत।' मेरी तल्ख आवाज को सुनकर वह सिटपिटा गया। फिर थोड़ी देर वह बोला, 'सर...क्या कभी ऐसा आविष्कार हो सकता है कि आदमी के शरीर का कोई हिस्सा मशीन में डाला जाए और वह साबुन-शैंपू बन जाए।'
उसकी बात मेरे सिर के ऊपर से गुजर गई। मैंने कुछ देर तक उसकी बात के मायने-मतलब निकालने की कोशिश की। काफी मशक्कत के बाद भी मेरे अक्ल के दरवाजे नहीं खुले, तो मैंने गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा, 'भाई मेरे!...तेरे कहने का मतलब क्या है? साफ-साफ बता।' 
अच्छन प्रसाद  ने कहा, 'सर..बात यह है कि टीवी पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक हीरोइन नहा रही है..साबुन उठाती है और पूरे शरीर पर साबुन लगाने लगती है। तो सर..मेरे मन में ख्याल आया कि अगर मैं वह साबुन होता, तो..। बस सर...यह ख्याल आते ही सोचा कि आपसे पूछ लूं कि कहीं कोई ऐसे आविष्कार की गुंजाइश बनती दिख रही हो, तो मैं इस जन्म में आशा रखूं, वरना...।' अच्छन प्रसाद की बात सुनते ही मेरे भीतर का आक्रोश किसी शक्तिशाली हैंड ग्रेनेड की तरह फट पड़ा। मैं चीखा, 'अबे भाग जा, वरना तेरी वो गत करूंगा कि तीन दिन तक हल्दी पियेगा।'
अच्छन प्रसाद तो मूड का कबाड़ा करके खिसक गया। सारा दिन मूड उखड़ा-उखड़ा सा रहा। काम पूरा न होने की वजह से क्रोध में संपादक जी ने गिरधर की कुंडलियों का पाठ किया, वह अलग है। तब से मैं अच्छन प्रसाद को देखते ही किनारा काट जाता हूं। एक दिन मैं अपना काम खत्म करके घर जा रहा था। आफिस के गेट पर ही अच्छन प्रसाद दिख गए। मैंने कतराकर निकल जाने में ही भलाई समझी। मुझे देखते ही अच्छन प्रसाद ने लगभग सैल्यूट की मुद्रा में लंबा नमस्कार किया। बोला, 'सर..सर...एक बात बताइए, बराक ओबामा हिंदू हैं क्या?' उसकी कम अक्ली पर मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने कहा, 'यह तुमसे किसने कह दिया?' उसने कहा, 'सर जी..आज अपने अखबार में छपा है, इसलिए मुझे लगा कि बराक ओबामा हिंदू हैं।'
'अबे मंदअक्ल..अपने अखबार में यह कहां लिखा है कि बराक ओबामा हिंदू हैं।' मैंने खीझते हुए कहा। अच्छन प्रसाद ने बड़े सलीके से उत्तर दिया, 'सर जी..अपने अखबार के पहले पन्ने पर छपा है कि बराक ओबामा ने कहा, हे भगवान! तेरा लाख-लाख आभार...हमने अमेरिका की गिरती अर्थव्यवस्था को संभाल लिया। अब अगर वे हिंदू न होते, तो भगवान को आभार क्यों जताते?' अच्छन प्रसाद की बात सुनकर मैं अपना माथा पकड़कर वहीं बैठ गया। मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'अरे यार! तू मुझे 'पकाता' क्यों रहता है? मेरा पीछा छोड़ दे..मेरे भाई..मैं तो आजिज आ गया हूं, तुझसे।'
अच्छन प्रसाद के चेहरे पर पहली बार मुझे मुस्कान दिखी। वह मुस्कुराते हुए बोला, 'सर... आप भी तो पकाते रहते हैं, कभी व्यंग्य के नाम पर, तो कभी लेख के नाम पर। सर..आप 'पकाएं', तो यह आपकी प्रतिभा और मैं 'पकाऊं' तो मेरा पागलपन। सोचिए सर, आपके इन सड़े-गले व्यंग्यों और लेखों को पढ़कर हमारे पाठकों को कितनी कोफ्त होती होगी।' इतना कहकर अच्छन प्रसाद तो आफिस में चले गए और मैं गेट पर खड़ा रहा। मन तो यही कर रहा था कि अपना सिर सामने की दीवार पर दे मारूं।