Monday, April 27, 2026

मूर्ति ने हथौड़ी और छेनी का वार सहा है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमें किसी की उपलब्धि पर कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। कोई भी उपलब्धि या समाज में सम्मान कठिन परिश्रम और विपरीत परिस्थितियों में सघर्ष करने के बाद ही हासिल होती है। बिना किसी प्रकार का संघर्ष किए संयोगवश यदि कोई उपलब्धि हासिल हो जाती है, तो उस पर इतराना भी नहीं चाहिए। 

एक बार की बात है। एक देव प्रतिमा से एक पुष्प ईर्ष्या कर बैठा। उसकी समझ में यह नहीं आता था कि लोग मंदिरों में स्थापित प्रतिमा की पूजा क्यों करते हैं। जबकि वह उस मूर्ति से कहीं ज्यादा सुंदर और सुकोमल है। एक दिन जब मंदिर में मूर्ति पर फूल चढ़ाया गया, तो वह नाराज हो उठा। उसने रोष भरे स्वर में पुजारी से कहा कि तुम इस मूर्ति की पूजा क्यों करते हैं जबकि मैं उस मूर्ति से कहीं ज्यादा सुंदर, कोमल और दर्शनीय हूं। 

पुष्प की बात सुनकर पुजारी हंस पड़ा। उसने पुष्प से कहा कि वह पूज्य इसलिए है क्योंकि उसने मूर्ति बनने के दौरान पीड़ा झेली है। पहले वह एक बदरंग पत्थर था। मूर्तिकार की नजर पड़ने से पहले उसने न जाने कितनी बरसात, धूप, गर्मी और सर्दी बर्दाश्त किया। फिर मूर्तिकार ने उसे काटा छांटा। मूर्ति बनाने के लिए उस पर न जाने कितनी बार हथौड़ी और छेनी का वार सहा है। 

तब कहीं जाकर वह मूर्ति के रूप में ढला है। अगर वह टूट जाता, तो उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। और तुम्हें यह कोमलता, सुंदरता और खुशबू तो प्रकृति ने प्रदान किया है। इसके लिए तुम्हें किसी प्रकार का परिश्रम या संघर्ष नहीं किया है। ऐसी स्थिति में तुम बताओ, पूजा और आदर के योग्य कौन है? तुम या मूर्ति? यह सुनकर पुष्प चुप रह गया। उसकी समझ में यह बात आ गई कि सम्मान या उच्च पद प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

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