Sunday, April 12, 2026

मौत का भय है, तो क्रांतिकारी क्यों बना?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख सेनानी अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख कर्ताधर्ता थे। बिस्मिल लोगों में देश प्रेम पैदा करने वाली कविताएं भी लिखा करते थे। उनकी रचनाओं को ब्रिटिश हुकूमत जब्त भी कर चुकी थी। 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर शहर के खिरनीबाग मुहल्ले में जन्मे रामप्रसाद अपने पिता मुरलीधर और माता मूलमती की दूसरी सन्तान थे। 

उनसे पूर्व एक पुत्र पैदा होते ही मर चुका था। राम प्रसाद बिस्मिल में ग्यारह साल की उम्र से क्रांतिकारी भावनाएं जाग्रत हो चुकी थीं। कांग्रेस, स्वराज पार्टी आदि में कुछ वर्षों तक काम करने के बाद वह अंतत: एचआरए की कानपुर में हुई बैठक में शामिल हुए और अंतत: एचआरए के ही होकर रह गए। 

इस बैठक में शचींद्रनाथ सान्याल, योगेश चंद्र चटर्जी जैसे तमाम क्रांतिकारी शामिल हुए थे। 9 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर रेलवे स्टेशन से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाना लूट लिया। 

बिस्मिल को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी की सजा सुनाई। फांसी से पहले राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी मां को पत्र लिखकर धैर्य रखने को कहा। जब उनकी जेल में आखिरी बार उनसे मिलने आईं, तो बिस्मिल रोने लगे। तब उनकी मां ने कहा कि जब तुम्हें मौत का इतना ही डर था, तो क्रांतिकारी क्यों बने? बिस्मिल ने कहा कि मुझे मौत का भय नहीं है। मैं आपकी सेवा नहीं कर सका, इसका अफसोस है। 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी।

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