बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
यदि कोई व्यक्ति किसी का विश्वास तोड़ता है, तो वह सबसे अधम किस्म का प्राणी होता है। विश्वासघात करने वाले व्यक्ति की सच्चाई और ईमानदारी पर कभी कोई व्यक्ति भरोसा नहीं कर पाता है। आदमी वैसे तो किसी पर बहुत जल्दी विश्वास नहीं करता है, लेकिन अगर किसी कारणवश विश्वास कर लिया, तो उसका विश्वास नहीं तोड़ना चाहिए। एक बार की बात है।किसी राज्य में डाकुओं का एक दल रहता था। वह दल आने जाने वाले व्यापारियों को लूटता था और अपने खर्चे भर का रखकर बाकी धन वह गरीबों में बांट दिया करता था। डाकुओं का यह दल कभी किसी गरीब या असहाय को नुकसा नहीं पहुंचाता था। व्यापारियों या धनवानों को लूटते समय भी यही कोशिश करते थे कि किसी को चोट न पहुंचाई जाए। एक दिन उधर से व्यापारियों का एक दल गुजरा।
उस दल में कई व्यापारी थे जिन्होंने बड़ी मेहनत से धन कमाया था। डाकुओं ने व्यापारियों के दल पर हमला किया और लूटपाट करने लगे। इसी बीच एक व्यापारी डाकुओं की निगाह बचाकर निकल भागा। थोड़ी ही दूरी पर एक तंबू में घुसा और वहां बैठे साधु को रपयों और सोने-चांदी से भरी थैली को सौंपते हुए कहा कि आप इसे अपने पास रख लीजिए। कल आकर ले जाऊंगा।
अगले दिन व्यापारी तंबू में पहुंचा तो देखा कि साधु बना व्यक्ति डाकुओं का सरदार है। वह लूटे गए धन को आपस में बांच रहा था। यह देखकर व्यापारी लौटने लगा। तब सरदार ने व्यापारी को आवाज लगाते हुए कहा कि तुम अपनी थैली ले जाओ। जैसी दे गए थे, वैसी ही रखी है। व्यापारी अपना धन लेकर चला गया तो डाकुओं ने सरदार से कहा कि आपने उसका धन क्यों लौटा दिया। सरदार ने कहा कि उसने विश्वास करके मुझे धन सौंपा था। उसका विश्वास कैसे टूटने देता।


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