बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के ही समानरंगभेद और मानवाधिकार के समर्थन में काम करने वाले डेसमंड एमपिलो टूटू को उनके कार्यों के लिए नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। वह दक्षिण अफ्रीका के एक एंग्लिकन बिशप और धर्मशास्त्री थे। टुटू का जन्म दक्षिण अफ्रीका के क्लर्कडॉर्प में एक गरीब परिवार में हुआ था, जहाँ उनकी मिश्रित खोसा और मोत्स्वाना वंश की वंशावली थी।वयस्क होने पर उन्होंने शिक्षक के रूप में प्रशिक्षण लिया और नोमालिजो लेआ शेनक्सेन से विवाह किया जिनसे उनके कई बच्चे हुए। 1962 में वे किंग्स कॉलेज लंदन में धर्मशास्त्र का अध्ययन करने के लिए यूनाइटेड किंगडम चले गए । 1966 में वे दक्षिणी अफ्रीका लौट आए। वह अपने पिता के काफी करीब थे, लेकिन उनके शराब पीने और अपनी पत्नी से मारपीट करने की आदत से वह अपने पिता से नाराज भी रहते थे।
उन दिनों अफ्रीका में रंगभेद चरम पर था। गोरे लोग अश्वेतों के साथ बुरा व्यवहार करते थे। एक बार की बात है। वह बचपन में अपने पिता के साथ कहीं जा रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि सामने से एक श्वेत पादरी ट्रेवर हडलस्टन चले आ रहे हैं। डेसमंड ने देखा कि उनके पिता को देखते ही पादरी ने अपनी टोपी उतारी और अभिवादन किया। यह एक तरह से दक्षिण अफ्रीका में आश्चर्य की बात है।
डेसमंड ने अपने पिता से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति सभी मनुष्य को समान समझता है। रंग के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करता है। बस,यहीं से डेसमंड में रंगभेद की भावना के खिालाफ लड़ने की प्रेरणा मिली। उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़कर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति को खत्म कराया।
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