Monday, September 28, 2026

चिकित्स की जरूरत वहां, बीमारियां जहां

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ज्यादातर भ्रमण में ही रहते थे। वह केवल वर्षाकाल में ही एक जगह टिकते थे। वर्षाकाल में यात्रा आसान भी नहीं होती है। रास्ते जोखिम भरे और नदियां उफान पर होती हैं। ऐसी स्थिति में गौतम बुद्ध तीन महीने के लिए एक स्थान पर रुक जाते थे। जब उन्होंने भिक्षुक संघ की स्थापना की, तो उन्होंने नियम बनाया कि हर भिक्षु अपनी सुविधा और इच्छानुसार लोगों में धर्म प्रचार के लिए जा सकता है। 

वह अपनी इच्छित जगह पर जाकर लोगों को आत्म कल्याण और जीवन को सुखमय बनाए रखने के लिए प्रेरित करेगा। बौद्ध की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करेगा। यदि वह अपने इस कार्य में विफल हो जाता है, तो उसके स्थान पर कोई नया भिक्षुक भेजा जाएगा। पहले वाले भिक्षुक को आश्रम बुला लिया जाएगा और उसे प्रशिक्षण दिया जाएगा। एक दिन सभी भिक्षुओं को अपने अपने इच्छित स्थान के लिए निकलना था। 

गौतम बुद्ध के परम प्रिय शिष्य आनंद ने उस स्थान को चुना जहां पहले भी लोग धर्म का प्रचार प्रसार करने का प्रयास कर चुके थे और विफल रहे थे। वहां मौजूद लोगों ने आश्चर्य से उन्हें देखा और कहा, वहां के लोग किसी भी साधु-संत या विचारक को टिकने नहीं देते हैं। लोग किसी को भिक्षा भी नहीं देते हैं और आपस में लड़ते ही रहते हैं। वहां जाकर आप क्या करेंगे? आपको भी हो सकता है कि कुछ दिनों बाद विफल होकर लौटना पड़े।  

इस पर आनंद ने गंभीर होकर कहा कि चिकित्सक की जरूरत वहीं सबसे ज्यादा होती है, जहां बीमारियां होती हैं। धर्म का प्रचार करने की जरूरत वहां है जहां अधार्मिक लोग रहते हों। मेरी भी सबसे ज्यादा जरूरत उसी गांव में है, जहां के लोग बुराइयों से घिरे हुए हैं। यह सुनकर सारे लोग शांत हो गए।

नशे के खिलाफ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन में दौड़े लोग

अशोक मिश्र

आज फरीदाबाद में नशा मुक्ति के संदेश के साथ हुई हाफ मैराथन महज एक दौड़ नहीं थी, वह एक सामाजिक घोषणा थी। यह उस सामाजिक बुराई के खिलाफ घोषणा है जिसने हमारे प्रदेश के युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों को अपनी गिरफ्त में सदियों से जकड़ रखा है। सूरजकुंड मेला ग्राउंड से शुरू हुई इस नशा-मुक्त हरियाणा फरीदाबाद नमो मैराथन-2026 में 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर और 21 किलोमीटर की तीन श्रेणियां रखी गई थीं और आयोजकों के अनुसार जनसैलाब ऐसा उमड़ा कि एक साथ 1.35 लाख से अधिक लोगों ने दौड़ लगाई। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी रविवार की सुबह सूरजकुंड पहुंचे और ‘ड्रग-फ्री हरियाणा’ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन-2026 को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। 

इस दौरान भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन ने लोगों का उत्साह बढ़ाया। सच यह है कि कोई भी मैराथन सीधे किसी के हाथ से नशे की पुड़िया नहीं छीनती। इसका प्रभाव तत्काल और मापने योग्य नहीं होता। कितने लोगों ने इस दौड़ के बाद नशा छोड़ा, इसका कोई रजिस्टर नहीं बनता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि यह निरर्थक है। नशा एक अकेलेपन की बीमारी है, जो अंधेरे में पनपती है। जब सवा लाख लोग सुबह-सुबह सड़क पर एक साथ दौड़ते हैं, भारत माता की जय के जयघोष के साथ, तो वह अंधेरा टूटता है। युवा देखता है कि ऊर्जा का विकल्प भी है। दौड़, पसीना, समूह का उत्साह, यह सब नशे के विरुद्ध एक सकारात्मक नशा है। 

यह जागरूकता की पहली सीढ़ी है, अंतिम इलाज नहीं। ऐसी प्रतियोगिताओं का औचित्य इसी प्रतीकात्मक शक्ति में है कि राज्य यह कहना चाह रहा है कि हम लड़ रहे हैं और तुम अकेले नहीं हो। हरियाणा में 18 हजार 847 नशा पीड़ित हैं। यह तो केवल दर्ज आंकड़ा है। जमीन पर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। पंजाब से सटे होने के कारण ड्रग रूट, बेरोजगारी का दबाव, जिम और बॉडी बनाने के भ्रम में स्टेरॉयड और फिर नशे की ओर फिसलन और तेजी से बढ़ता शहरी अकेलापन, यह सब मिलकर हरियाणा को एक नए तरह के संकट में डाल रहा है। 

नशा मुक्ति अभियान को सफल बनाना है तो उसे दौड़ से आगे ले जाना होगा। इसे शर्म से निकालकर बीमारी के रूप में देखना सिखाना होगा। जैसे बुखार के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही नशे के लिए भी डॉक्टर के पास जाना होगा। इसके लिए हर प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर गोपनीय काउंसलिंग हो। स्कूलों में उत्तर रटाने के बजाय सवाल पूछने की आदत और जीवन कौशल सिखाना होगा, तनाव से कैसे निपटें, ना कैसे कहें। 

प्रयोगशालाओं को मंदिरों के बराबर सम्मान देना होगा। जब तक बच्चा यह नहीं देखेगा कि वैज्ञानिक सोच से भी जीवन सुधरता है, तब तक वह चमत्कारिक समाधान की ओर ही भागेगा। फरीदाबाद की यह दौड़ एक अच्छी शुरुआत है, पर दौड़ना ही काफी नहीं है, टिके रहना भी सीखना होगा।

Sunday, September 27, 2026

सुख-दुख में समान रहने का अभ्यास


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने जीवन भर लोगों को यह समझाने का प्रयास किया है कि लालसा ही हमारे दुखों का मूल है। जब हम जरूरत से ज्यादा संग्रह करते हैं, तो हमें उन वस्तुओं के प्रति मोह हो जाता है। जब वह वस्तु किसी कारण से नष्ट हो जाए या चोरी चली जाए, तो उसे हमें दुख होता है। हमें भविष्य या अतीत के बारे में सोचकर दुखी नहीं होना चाहिए। जो पल आप जी रहे हैं, वही आपका है। यदि वर्तमान को ही अच्छी तरह से जी लिया जाए, तो वह भविष्य को भी सुधारने की क्षमता रखता है। 

महात्मा बुद्ध के इस जीवन दर्शन को क्षणवाद के नाम से जाना जाता है। यदि हम अपने जीवन के बारे में विचार करें, तो महात्मा बुद्ध की बात सही नजर आती है। हम जीवन में अतीत या भविष्य को सोचकर परेशान होते रहते हैं, इससे वर्तमान जीवन का आनंद भी नहीं उठा पाते हैं। इसी तरह महात्मा बुद्ध इंसान को सुख और दुख में समान रहने का उपदेश दिया करते थे। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध कहीं जा रहे थे। उनके मन में पता नहीं क्या आया, वह अच्छी भली पगडंडी को छोड़कर नीचे चलने लगे। नीचे कंटीली झाड़ियां थीं। उस पर चलने से बुद्ध के पैरों में कांटे चुभने लगे। उनके साथ चल रहे लोग आश्चर्यचकित रह गए। उनके शिष्य आनंद ने पूछा, तात! आप पगडंडी छोड़कर कंटीले रास्ते पर क्यों चल रहे हैं। 

बुद्ध ने जवाब देते हुए कहा कि इंसान को इस पगडंडी पर सुख और दुख दोनों भोगने पड़ते हैं। सुखों के प्रति आशक्ति रखने से जब इंसान दुख में पड़ता है, तो वह अत्यंत दुखी हो जाता है। मैं कंटीले रास्ते पर इसलिए चल रहा हूं ताकि सुख और दुख का अभ्यास बना रहे। यह सुनकर उनके साथ चलने वाले समझ गए कि महात्मा बुद्ध उन्हें क्या समझाना चाहते हैं।

कीटनाशकों और रासायनिक खादों के ज्यादा उपयोग से बचें


अशोक मिश्र

हरियाणा की खेती हरित क्रांति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है और आज भी यह देश में रासायनिक आदानों के सर्वाधिक उपयोग वाले राज्यों में से एक है। सामान्य वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार फसल की जरूरत, मिट्टी परीक्षण और फसल चक्र के आधार पर ही खाद और कीटनाशक का उपयोग होना चाहिए, जिसमें संतुलित एनपीके लगभग 150 से 170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास माना जाता है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। पंजाब के बाद हरियाणा देश में सर्वाधिक कीटनाशक उपयोग करने वाला राज्य बन गया है। 

2000 से 2021 के बीच तकनीकी ग्रेड कीटनाशकों की वार्षिक खपत 4000 से 5025 टन के बीच स्थिर रूप से ऊंची रही है। इस अत्यधिक उपयोग का फसल और मिट्टी पर सीधा प्रभाव दिखता है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन से पौधा बढ़ता तो तेजी से है पर जड़ें कमजोर होती हैं, फसल कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है और किसान फिर और कीटनाशक डालता है, यह एक दुष्चक्र बन जाता है। मिट्टी में जैविक कार्बन घटता है, सूक्ष्म जीव मरते हैं, जलधारण क्षमता कम होती है और जमीन सख्त हो जाती है। 

इससे पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से दाने का भराव और पोषण गुणवत्ता दोनों गिरते हैं। अधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों का मानव शरीर पर प्रभाव दो तरीकों से होता है, प्रत्यक्ष छिड़काव के दौरान और अप्रत्यक्ष भोजन, पानी और दूध के जरिये। हरियाणा में किए गए अध्ययन में केवल दो से चार प्रतिशत किसान ही मास्क, दस्ताने और जूते जैसे सुरक्षात्मक कपड़े पहनते हैं, इसलिए त्वचा और सांस के जरिये अवशोषण आम है। जब ये अवशेष लंबे समय तक शरीर में जाते हैं तो वे अंत:स्रावी तंत्र को बाधित करते हैं यानी हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करने वाले रसायनों के रूप में काम करते हैं। 

हरियाणा और पंजाब दोनों में अत्यधिक रासायनिक खादों के उपयोग को कैंसर के मामलों का प्रमुख कारण माना गया है, जिसे पंजाब की कुख्यात कैंसर ट्रेन के उदाहरण से समझा जाता है जो रोगियों को लेकर जाती है। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री ने भी हरियाणा और पंजाब में कैंसर वृद्धि को अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जोड़ा है। अत्यधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों से जुड़े रोगों की सूची लंबी है। 

सरकारी स्वास्थ्य निगरानी में कैंसर के अलावा बांझपन, प्रजनन संबंधी विकार, गुर्दे की विफलता, तंत्रिका तंत्र के विकार, सांस की पुरानी बीमारियां, त्वचा रोग, दृष्टि दोष और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं बार-बार सामने आई हैं। एक ग्रामीण स्वास्थ्य अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि कीटनाशक विभिन्न पुराने रोगों जैसे कैंसर, बांझपन, गुर्दे की विफलता, प्रजनन समस्याओं और तंत्रिका विकारों से जुड़े हैं। 


Saturday, September 26, 2026

जो चलता ही नहीं, वह थकेगा कैसे?

बोधिवृक्ष़

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध आत्म ज्ञान प्राप्त करने में छह साल लगे। बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। वह सिद्धार्थ से बुद्ध कहे जाने लगे। इसके बाद उन्होंने अपना सबसे पहला उपदेश सारनाथ में दिया। कहते हैं कि जब उन्होंने अपना पहले उपदेश दिया था, तो उस समय केवल पांच शिष्य ही उपस्थित थे। 

इसके बाद तो मानो तथागत को एक तरह का जुनून सवार हो गया। वह चल पड़े पूरे भारतवर्ष को आत्म ज्ञान देने। वह चलते ही रहते थे। जहां रात हो गई, वहीं रुक गए। भिक्षा मांगकर खा लिया। किसी से भिक्षा नहीं मिली, तो भूखे रहकर रात गुजार ली। बस एक ही जुनून सवार था कि सबको आत्म ज्ञान देकर सबको मुक्ति दिलानी है। महात्मा बुद्ध का परम शिष्य आनंद भी उनके साथ गांव-गांव, शहर-शहर डोल रहा था। 

एक दिन उसने महात्मा बुद्ध से कहा कि जब से आपको ज्ञान प्राप्त हुआ है, आप सतत चलते ही रहते हैं। आप इससे थके या उकताए हुए नहीं प्रतीत होते हैं। आप रुकते भी नहीं हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि आपको थोड़ा विश्राम करना चाहिए? अपने शिष्य की बात सुनकर बुद्ध ने कहा कि जो चलेगा, वही थकेगा। जो चलेगा ही नहीं, वह थकेगा कैसे? बुद्ध का यह उत्तर सुनकर आनंद चकरा गया। 

उसने कहा कि मैंने आपको नित्य अपनी आंखों से चलते देखा है। यह सुनकर महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले, आनंद तुमने जिसको चलते हुए देखा है, वह शरीर है। बाहर से यह चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर की आत्मा तो स्थिर है। जब आत्मा चली ही नहीं तो थकेगी कैसे? शरीर तो आत्मा की छाया है। छाया के चलने से कोई थकता है क्या? बुद्ध की बात सुनकर आनंद समझ गया कि भंते  उसे क्या समझाना चाहते हैं।

दबे पांव हरियाणा में पांव जमाती जा रही हैं फेफड़े की बीमारियां


अशोक मिश्र

हरियाणा की मिट्टी में हमेशा से मेहनत और संघर्ष की खुशबू बसी रही है। खेतों में काम करने वाले किसान, कारखानों में पसीना बहाने वाले मजदूर, स्कूल जाते नन्हे बच्चे, सबकी सांसों में इस धरती की ताकत समाई हुई थी। लेकिन आज वही सांसें बोझ बनती जा रही हैं। अस्पतालों के गलियारों में खांसी की आवाजें गूंज रही हैं, ऑक्सीजन सिलेंडरों की मांग बढ़ रही है और युवाओं-बच्चों के फेफड़े कमजोर पड़ते जा रहे हैं। यह कोई अचानक आई आपदा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे गहराता जख्म है जो हर घर को छू रहा है। फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां अस्थमा, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और खासकर ट्यूबरकुलोसिस तेजी से फैल रही हैं। 

इनमें युवा और बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। आंकड़े कहते हैं कि फरीदाबाद जैसे स्मार्ट सिटी में ही फेफड़ों के कैंसर के मरीज एक साल में 22 प्रतिशत बढ़ गए, रोगी 1201 से बढ़कर 1515 तक पहुंच गएऔर कई जिलों में एक्यूआई 342 जैसे गंभीर स्तर तक पहुंच गया है, जहां अस्पतालों की ओपीडी में 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। सर्दियों में पराली का धुआं, दिवाली पर पटाखों का गुबार, पूरे साल फैक्ट्रियों से निकलता जहर और सड़कों पर गाड़ियों का धुआं, ये सब मिलकर एक अदृश्य चादर बन गए हैं। 

यह चादर बिना मास्क के हमारे फेफड़ों में उतर जाती है और वहीं जम जाती है। फेफड़े के रोगों के फैलने के एक नहीं, कई कारण एक-दूसरे में गूंथे हुए हैं। सबसे बड़ा कारण वह हवा है जो हम सांस के साथ पी रहे हैं। दूसरा कारण वह गरीबी और अनदेखी है जो टीबी को पालती है कमजोर पोषण, तंग घर, देर से जांच, और अधूरा इलाज। तीसरा कारण हमारी आदत है, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का और चूल्हे का धुआं। और चौथा, सबसे दर्दनाक कारण, वह चुप्पी है जो हम एक खांसी को दो हफ्ते से ज्यादा खींचने पर भी ओढ़ लेते हैं।  

एक अध्ययन के अनुसार हरियाणा में मौतों का एक बड़ा हिस्सा खराब हवा से जुड़ा पाया गया है। प्रदूषण फेफड़ों की सुरक्षात्मक परत को नष्ट करता है, जिससे संक्रमण आसानी से पकड़ लेता है। बच्चे और युवा, जिनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। हमें समझना होगा कि प्रदूषण और संक्रमण अलग-अलग दुश्मन नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रदूषण फेफड़े को कमजोर करता है, और कमजोर फेफड़े पर संक्रमण आसानी से घर बना लेता है। 

अगर हमें सच में अपने बच्चों को बचाना है तो हमें सिर्फ टीबी की दवा नहीं, साफ हवा का भी इलाज करना होगा, और सिर्फ सरकारी योजना नहीं, एक पड़ोसी का हाथ भी थामना होगा ताकि कोई मरीज अकेला न छूट जाए। हरियाणा की धरती उपजाऊ है, लोग मेहनती हैं। अगर प्रदूषण पर लगाम लगे, पराली प्रबंधन बेहतर हो, जागरूकता घर-घर पहुंचे और इलाज समय पर पूरा हो, तो सांसें फिर से हल्की हो सकती हैं। 


Friday, September 25, 2026

वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग दिया था। उनका गृह त्याग उस युग की सबसे परिवर्तनकारी घटना साबित हुई थी। एक ऐसा राजकुमार जिसके पास सुख-सुविधा के सारे उपकरण मौजूद हों, उस समय की सबसे सुंदर स्त्री उनकी पत्नी हो। एक पुत्र भी हो जिसको अभी राजकुमार सिद्धार्थ ने ठीक से उसे देखा भी नहीं था। 

ऐसे में वह दूसरों के दुखों से द्रवीभूत होकर संन्यासी हो जाए, सचमुच यह एक अद्भुत घटना थी। लोगों के कल्याण के लिए ऐश्वर्य त्याग देना, सचमुच बड़े साहस का काम है। गृह त्याग के बाद सिद्धार्थ ने छह साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अपने शरीर को विभिन्न तरह के कष्ट दिए, लेकिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। बोधगया में निरंजना नदी के किनारे पीपल वृक्ष के नीचे 49 दिनों तक कठोर तपस्या की। 

इस तपस्या के ही दौरान एक दिन कुछ महिलाएं बड़े ही मधुर स्वर में गाती हुई जा रही थीं। उन दिनों जब महिलाएं लंबी यात्रा करती थीं, तो थकान मिटाने के लिए कुछ समूह में गाती हुई जलती थीं, ताकि थकान की अनुभूति न हो। वह स्त्रियां गा रही थीं जिसका मतलब था कि वीणा के तारों को इतना ढीला मत छोड़ो कि उससे मधुर ध्वनि ही न निकल सके। वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वह टूट जाएं। 

महिलाओं का गायन सिद्धार्थ के कानों में पड़ा, तो वह समझ गए कि शरीर को कष्ट देना तपस्या नहीं है। उसी दिन उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त हुआ और राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए। उन्हें समझ में आ गया था कि अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए शरीर को कष्ट देना उचित नहीं है। संयमित जीवन, खान-पान, विश्राम, निद्रा आदि से आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने सारनाथ में पहला उपदेश दिया।

हर अतिक्रमण के खिलाफ होनी चाहिए लगातार कठोर कार्रवाई


अशोक मिश्र

हरियाणा में सड़कों, बाजारों और गलियों में फैला अतिक्रमण अब एक आम दृश्य बन चुका है। चाहे शहर हो या कस्बा, लगभग हर जगह फुटपाथों पर दुकानें, ठेलों की कतारें, निर्माण सामग्री के ढेर और अनधिकृत निर्माण नजर आते हैं। इससे आम नागरिकों को रोजाना भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। सड़कें संकरी हो जाती हैं, यातायात जाम लगता है और पैदल चलने वालों के लिए जगह नहीं बचती। 

बाजारों में खरीदारी के दौरान भीड़ और अव्यवस्था के कारण समय और मेहनत दोनों बर्बाद होते हैं। यह समस्या सिर्फ व्यवस्था की नहीं है, यह सीधे तौर पर जनजीवन, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी है। सड़कों पर दुकानदारों द्वारा सामान बाहर तक लगा देना, रेहड़ी-पटरी वालों का स्थायी रूप से एक ही जगह घेर लेना, मकान मालिकों द्वारा रैंप और चबूतरे को सड़क तक बढ़ा देना और बिल्डरों द्वारा पार्किंग की जगह पर दुकानें बना देना, ये सब इसी अतिक्रमण के अलग-अलग रूप हैं। 

परिणाम सामने है। सड़कों की चौड़ाई आधी रह जाती है। दो गाड़ियों के निकलने की जगह पर एक भी मुश्किल से निकल पाती है। पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ बचा ही नहीं, इसलिए वे सड़क पर चलने को मजबूर होते हैं और यही छोटी सी लापरवाही बड़े सड़क हादसों का कारण बन जाती है। एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपात सेवाएं जाम में फंस जाती हैं। बाजारों की स्थिति और भी बदतर है। त्योहारों पर तो आलम यह होता है कि ग्राहक दुकान तक पहुंच ही नहीं पाता है। 

भीड़, अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग मिलकर खरीदारी को एक सजा बना देते हैं। बेरोजगारी, बढ़ती आबादी और शहरी योजनाओं की कमी इन प्रवृत्तियों को और मजबूत बनाती है। इनके खिलाफ कार्रवाई सख्त और निरंतर होनी चाहिए। नगर निगम और नगर महापालिका को नियमित अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाना चाहिए। उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाना, बार-बार दोषी पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई करना और जरूरत पड़ने पर निर्माण सामग्री या सामान जब्त करना आवश्यक है। 

ऐसा नहीं है कि जिलों में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है, लेकिन जो होती है, वह ज्यादातर दिखावटी और मौसमी होती है। अगर प्रशासन लगातार निगरानी रखे, दोषियों को समान रूप से सजा दे और वैकल्पिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तो स्थिति में सुधार संभव है। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी कि सार्वजनिक जगह किसी की निजी संपत्ति नहीं है। जब तक समाज में यह चेतना नहीं आएगी कि अतिक्रमण न केवल अवैध है बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन भी है, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। हरियाणा जैसे विकासशील राज्य में अगर शहरी प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए और नियमों को बिना भेदभाव लागू किया जाए तो सड़कें, बाजार और गलियां फिर से सुचारु और सुरक्षित हो सकती हैं।

Thursday, September 24, 2026

मुझे इसकी लीला देखने का सुयोग नहीं मिलेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ, तो पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन ने राज महल को पूरी तरह सजाया। दूर-दूर से राजा, सामंत, श्रेष्ठि और नागरिक राज कुमार सिद्धार्थ के दर्शन करने और आशीर्वाद देने आए। महाराज शुद्धोदन और महारानी महामाया अत्यंत प्रसन्न थे। महात्मा बुद्ध से जुड़े कुछ ग्रंथों के मुताबिक लुंबिनी में एक उद्यान में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ था और उनकी मां महामाया की तत्काल मृत्यु हो गई थी। 

ज्यादातर लोग मानते हैं कि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद उनकी मां की मृत्यु हुई थी। खैर, राजकुमार सिद्धार्थ को देखने जब दूर-दूर से लोग आ रहे थे, तो उन्हीं दिनों हिमालय से एक वृद्ध साधु उन्हें देखने आया। जब नवजात सिद्धार्थ को उस साधु के सामने लाया गया। पिता ने साधु के चरणों में सिद्धार्थ को रखते हुए कहा कि महात्मन! इस बच्चे को आशीर्वाद दें कि यह यशस्वी हो, दीर्घायु हो, प्रतापी हो। 

साधु पहले तो कुछ क्षण तक निर्निमेष उन्हें देखता रहा और फिर वह फूट-फूटकर रोने लगा। महाराज शुद्धोदन यह देखकर घबरा गए। उन्होंने आशंकित होकर साधु से पूछा, कुछ अपशकुन की आशंका है क्या, मान्यवर। आप मुझे बताएं क्या बात है? महाराज की बात सुनकर कुछ देर तक चुप रहा और फिर बोला, महाराज! किसी प्रकार के अपशकुन की आशंका नहीं है। आप चिंतित न हों। 

मैं तो यह सोचकर रो रहा हूं कि जिसे खोजते-खोजते सारी उम्र बीत गई, उसका जन्म अब हो रहा है। मैं इस बालक की लीलाओं को नहीं देख पाऊंगा। मैं इनके चरणों में बैठकर आत्म ज्ञान हासिल नहीं कर पाऊंगा, यही सोचकर मुझे रोना आ गया। महाराज, आप धन्य हैं जो ऐसे यशस्वी बालक के पिता हैं। यह कहकर साधु चला गया।

हरियाणा में नार्को टेरर नेटवर्क का पर्दाफाश एटीएस की बड़ी सफलता


अशोक मिश्र

हरियाणा एंटी टेररिस्ट स्क्वाड ने बहुत ही काबिले तारीफ काम किया है। उसने देश के सामने एक अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा  किया है। घटना 13 सितंबर 2026 की है। इस दिन सुबह पंचकूला के सेक्टर-11 स्थित अलिफ लैला क्लब में फायरिंग हुई। फायरिंग में एक युवती घायल हुई। पुलिस ने मामले की जब जांच शुरू की, तो मामला पहले आपसी झगड़े का लगा, लेकिन जब हरियाणा पुलिस की जांच आगे बढ़ी, तो सारी परतें खुलती चली गईं। इस जांच को गंभीरता को देखते हुए एंटी टेररिस्ट स्क्वाड को जिम्मा सौंपा गया। वहीं से अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा हुआ। 

एटीएस ने अब तक तीन मौके से, एक एसएएस नगर से और तीन लुधियाना से कुल मिलाकर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि आरोपी अमेरिका सहित विदेश में बैठे हैंडलरों के निर्देश पर काम कर रहे थे। ये हैंडलर स्थानीय लोगों को रहने की जगह, वाहन और पैसा उपलब्ध कराते थे ताकि सीमा पार से ड्रोन के जरिए आने वाले नशीले पदार्थों, हथियारों और ड्रग मनी को निर्धारित जगहों तक पहुंचाया जा सके।  यह घटना बताती है कि नार्कोटिक्स का कारोबार और आतंकी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ गई हैं। 

नशीले पदार्थों की तस्करी से कमाए गए पैसे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों और हथियारों की खरीद में हो रहा है। स्थानीय नार्को कारोबारी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़कर आतंकियों के लिए काम कर रहे हैं या उनके साथ मिलकर साझा हित साध रहे हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सिर्फ छापेमारी काफी नहीं है। यह बात हरियाणा एटीएस भी जानती है। इसलिए एटीएस ने सबसे पहले फाइनेंशियल और ड्रोन ट्रेल को तोड़ने जैसा काम शुरू किया है। सप्लाई चेन, हथियार के स्रोत और विदेशी हैंडलरों के पैसे का रास्ता खंगाला जा रहा है। 

दूसरी ओर एटीएस ने दक्षिण हरियाणा के नूंह, पलवल, फरीदाबाद, गुरुग्राम बेल्ट में इंटेलिजेंस को मजबूत करना शुरू कर दिया है, जहां सीसीटीवी, किराएदार सत्यापन और साइबर पेट्रोलिंग को एक साथ क्रियान्वित करना शुरू कर दिया है। फरीदाबाद के अल-फलाह जैसे संस्थानों में अपनी जड़ें जमा रहे आतंकियों के मामले दिखाते हैं कि पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी ऑनलाइन ग्रूमिंग का शिकार हो रहे हैं, इसलिए मदरसों, यूनिवर्सिटीज और यूट्यूब इन्फ्लुएंसर इकोसिस्टम पर निगरानी के साथ-साथ सामुदायिक पुलिसिंग जरूरी है। 

एटीएस ने इस पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। हरियाणा एटीएस का गठन जून 2026 में हुआ। यह सीआईडी के अधीन काम करता है। पंचकूला तथा गुरुग्राम में इसके केंद्र हैं। इसमें एनएसजी जैसी कमांडो फोर्स, इंटेलिजेंस विंग, जांच इकाई और काउंटर-रैडिकलाइजेशन सेल शामिल हैं। गठन के कुछ ही महीनों में पंचकूला क्लब फायरिंग मामले में नार्को-टेरर नेटवर्क का पदार्फाश इसकी पहली बड़ी सफलता है।