बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध का प्रिय शिष्य आनंद था। आनंद महात्मा बुद्ध का चचेरा भाई थी। गौतम बुद्ध के जीवन के अंतिम 25 वर्षों तक साये की तरह उनके साथ रहा। आनंद के पिता राजा शुक्लोदना (अमितोदना) महात्मा बुद्ध के चाचा थे। आनंद का बड़ा भाई देवदत्त था। पक्षी वाले प्रसंग में इसी देवदत्त की चर्चा होती है। प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों जैसे सुत्त पिटक आदि में आनंद को अत्यंत प्रखर बुद्धि का बताया गया है। उन्होंने तथागत के उपदेशों को अक्षरश: याद रखा था। पाली परंपरा के अनुसार, आनंद के प्रथम गुरु बेलट्ठसीस और पुन्ण मंतानीपुत्त थे । पुन्ण के उपदेशों से ही आनंद को सोतापन्न की अवस्था प्राप्त हुई, जो ज्ञानोदय से पूर्व की अवस्था है। आनंद ने बाद में पुन्ण के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध और आनंद एक सघन वन से गुजर रहे थे। दोनों किसी बात पर चर्चा भी करते जा रहे थे। एकाएक आनंद ने पूछा, भगवन! आपने बहुत सारा ज्ञान अर्जित किया है। क्या आप मुझे अपना समस्त ज्ञान दे चुके हैं? बुद्ध ने जवाब देने की जगह आनंद से ही सवाल पूछ लिया, यह बताओ आनंद, इस वन में कितने सूखे पत्ते गिरे होंगे। हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं, उस वृक्ष से कितने सूखे पत्ते गिरे हैं और कितने सूखे पत्ते अभी ऊपर लटक रहे हैं?
आनंद इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए। तब तथागत ने उनसे कहा कि दुनिया में ज्ञान का अथाह भंडार है। मैं उस अथाह भंडार से कितना ग्रहण कर पाया मैं नहीं कह सकता हूं। मैं तुम लोगों को कितना दे पाया, यह भी नहीं कह सकता हूं। इस अथाह ज्ञान सागर से जितना ग्रहण कर सको, उतना ग्रहण कर लो। संपूर्ण ज्ञान तो कोई एक व्यक्ति ग्रहण ही नहीं कर सकता है।