बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
इस संसार में कोई भी पूर्ण नहीं है। कुछ न कुछ कमियां हर प्राणी में होती है। हर प्राणी में कोई न कोई खूबी भी होती है। हर प्राणी का इस प्रकृति में कोई न कोई उपयोग है। किसी जंगल में एक मोर रहता था। वह अपने प्राकृतिक स्वभाव की वजह से नाचता बहुत अच्छा था। एक दिन जब रिमझिम-रिमझिम बरसात हो रही थी, तो वह मोर नाचने लगा। बरसात होती रही और मोर मगन होकर नाचता रहा।जब मोर नाच रहा था, तो उसके नृत्य को देखने वाला वैसे तो कोई नहीं था, लेकिन झाड़ियों के पीछे छिपा हुआ एक कछुआ जरूर नाच देख रहा था। जब जी भरकर मोर नाच चुका, तो कछुआ झाड़ियों से निकला। वह अपने धीमे कदमों से मोर के पास पहुंचा और कहा, मोर भाई! आप नाचते बहुत अच्छा हैं। मैं संयोग से झाड़ियों के पीछे से आपका नृत्य देख रहा था। कछुए की बात सुनकर मोर उदास हो गया।
उसकी उदासी देखकर कछुए ने कहा, भाई इतना अच्छा नाचने के बाद भी आप उदास क्यों हैं? क्या परेशानी है? मोर ने कहा कि मेरा शरीर तो बहुत सुंदर है, लेकिन मेरे पैर और आवाज बहुत भद्दी है। मेरी आवाज सुनते ही सारे जीव-जंतु भाग जाते हैं। जबकि कोयल की आवाज कितनी मधुर है। सभी प्रसन्न होकर उसकी आवाज को सुनते हैं।
तब कछुए ने कहा कि भाई, इसके लिए उदास मत हो। मैं जमीन पर कछुए के मुकाबले में धीमे चलता हूं, लेकिन यदि पानी में दौड़ हो, तो कौन जीतेगा, यह तो तुम जानते हो। हर प्राणी में कोई न कोई कमी होती है। किसी की आवाज अच्छी है, तो शरीर अच्छा नहीं है। कोमल कंठ से गाने वाली कोयल कितनी काली होती है, यह तो आप जानते ही होंगे। कोयल को भी अपने कालेपन पर अफसोस होता होगा। यह सुनकर मोर की उदासी दूर हो गई और वह फिर नाचने लगा।