Thursday, May 7, 2026

तुम अपने श्वेत दोस्त के साथ नहीं खेल सकते


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्वेत अश्वेत का भेदभाव कोई नया नहीं है। आज दुनिया में कोई भी किसी के साथ रंग या नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहा है। अमेरिका, अफ्रीका और कई यूरोपीय देशों में नस्लभेद की भावना बहुत गहरे तक समाई हुई थी। काले लोगों को हर जगह अपमानित होना पड़ता था। 

गोरे लोग कई बार तो अपनी सीमाएं लांघकर काले लोगों को अपमानित करते थे। अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बड़ी मजबूती से लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर का जन्म 15 जनवरी 1929 को अटलांटा में हुआ था। उनके पिता पादरी थे। पिता की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी थी, इसलिए मार्टिन को बचपन में आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन बचपन में हुई एक घटना ने उनके बालमन पर बहुत प्रभाव डाला। 

जब वह छह साल के हुए और उन्हें स्कूल जाना पड़ा, तो पता चला कि पड़ोस में रहने वाले एक व्यापारी के पुत्र को गोरों के स्कूल में जाना होगा और मार्टिन को काले लोगों के स्कूल में। स्कूल जाने से पहले वह दोनों एक साथ खेलते थे, लेकिन बाद में दोनों को एक दूसरे के साथ खेलने से रोक दिया गया। इस घटना का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। 

बाद में उन्होंने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ जोरदार संघर्ष शुरू किया। उनके इस काम में आठवीं कक्षा में पढ़ाने वाली टीचर ब्रैडली ने नागरिक अधिकार की लड़ाई में उनका बहुत साथ दिया। टीचर की ही प्रेरणा से वह  अमेरिका में वंचितों को न्याय दिलाने में सफल हुए। उन्होंने जीवन भर रंगभेद के खिलाफ संघर्ष किया। 4 अप्रैल 1968 को एक हत्यारे ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर की गोली मारकर हत्या कर दी।

हरियाणा में कुपोषण की समस्या से जूझ रहीं गर्भवती महिलाएं

अशोक मिश्र

हरियाणा में गर्भवती महिलाएं कुपोषण की समस्या से जूझ रही हैं। इसकी वजह से कम वजन के शिशु पैदा हो रहे हैं। ऐसे में कम वजन के पैदा होने वाले शिशुओं में से कुछ एक साल की उम्र में ही मौत का शिकार हो जाते हैं। अगर फरीदाबाद जिले की ही रिपोर्ट पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि दस महीने में जिले में कुल 44395 नवजात बच्चों के वजन की जांच की गई,  जिसमें से 6803 बच्चों का वजन ढाई किग्रा से कम पाया गया। 945 बच्चों का वजन 1.8 किग्रा से भी कम पाया गया। 

इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में गर्भवती महिलाओं के पोषण की क्या स्थिति है। भारत सरकार के पोषण ट्रैकर पोर्टल के अनुसार वर्ष 2025 में हरियाणा में पांच साल तक की उम्र के करीब 13.82 लाख बच्चों की जांच की गई। इनमें करीब 35 फीसदी बच्चे कुपोषित मिले। बच्चों के सेहत में ध्यान में रखकर केंद्र ने हरियाणा सरकार को व्यापक जागरूकता अभियान चलाने और पोषण अभियान पर विशेष दिशा-निर्देश दिए थे। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों की ऊंचाई, वजन, शरीर की बनावट को भी मापा गया, जिसमें करीब 22 फीसदी बच्चे बौनापन, सात फीसदी कम वजन, करीब तीन फीसदी कमजोर और तीन फीसदी के करीब अत्यधिक वजन यानि मोटापा के शिकार पाए गए। 

हरियाणा में पांच साल से कम उम्र के लगभग 40 प्रतिशत बच्चे कम वजन और कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी चिंताजनक है। अध्ययनों के अनुसार, बच्चों में कम वजन के मुख्य कारणों में मां में खून की कमी (एनीमिया) और गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी प्रमुख है। हालांकि राज्य सरकार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैय्या कराने की हरसंभव कोशिश कर रही है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आशा कार्यकर्ताओं के सहारे गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। सैनी सरकार 'मिशन पोषण 2.0' के तहत धन का आवंटन बढ़ा रही है, लेकिन सरकार के काफी प्रयास करने के बावजूद व्यवस्थागत खामियां दूर नहीं हो पा रही हैं। हरियाणा के घरों में खाने-पीने की कमी नहीं है। लेकिन बच्चों को क्या डाइट लेनी चाहिए, क्या नहीं, इस जानकारी का अभिभावकों में अभाव है। ज्यादातर लोग डेढ़ या दो साल तक बच्चे को दूध ही पिलाते हैं, जबकि छह महीने के बाद बच्चे को ऊपरी खाना शुरू कर देना चाहिए।

 मां बाप का मानना रहता है कि बच्चे को दूध पिलाओ, वो सारा दिन ऐसा करते हैं, जिसकी वजह से अन्य पोषक तत्वों की कमी रह जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत सारी गर्भवती महिलाएं अपनी जांच कराने में भी लापरवाही बरतती हैं। जिसके कारण उन्हें पता ही नहीं चल पता है कि उनमें किस पोषक तत्व की कमी है। नतीजा यह होता है कि उनका बच्चा कमजोर पैदा होता है।

Wednesday, May 6, 2026

मेरा बेटा अनपढ़ है, खेती करता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

माता-पिता की सेवा करना, इनसान का परम कर्तव्य है। हमारे मां-बाप ने बहुत कष्ट उठाकर हमारा पालन-पोषण किया है। यदि हम उनके किसी काम न आए, तो फिर हमारा जीवन व्यर्थ है। एक बार की बात है। कुएं पर चार महिलाएं पानी भरने आईं। बात काफी पुरानी है। तब लोग पीने के पानी के लिए कुएं के पानी पर ही निर्भर रहते थे। चारों महिलाओं में बातचीत होने लगी। 

महिलाओं की बातचीत के दौरान चर्चा बेटों को लेकर चल निकली। एक महिला ने बड़े गर्व से अपने बेटे के बारे में बताते हुए कहा कि मेरा बेटा विश्वविद्यालय से पढ़कर आया है। पढ़ाई खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद उसे उसी विश्वविद्यालय में नौकरी मिल गई है। अब वह वहां पढ़ाने लगा है। तभी दूसरी महिला ने उसकी बात को काटते हुए कहा कि सुनो तो, मेरा बेटा वैज्ञानिक है। उसने विज्ञान की पढ़ाई की है। 

पढ़ने में वह काफी तेज है। कुछ ही दिनों बाद वह अपनी मेहनत और लगन से एक बड़ा वैज्ञानिक बन जाएगा। पूरी दुनिया में उसका नाम होगा। मैं भी कितनी भाग्यशाली हूं कि मेरा बेटा वैज्ञानिक है।  इतना कहकर दूसरी महिला चुप हुई, तो तीसरी महिला ने कहा कि मेरा बेटा भी पढ़ा-लिखा है। पड़ोस के गांव में पढ़ाता भी है। चौथी महिला चुप रही, तो महिलाओं ने उससे अपने बेटे के बारे में बताने को कहा। 

चौथी महिला ने संकोच में कहा, मेरा बेटा पढ़ा-लिखा नहीं है। वह खेती करता है। चारों महिलाएं पानी का घड़ा लेकर चल दीं। रास्ते में तीनों महिलाओं के बेटे मिलें। उन्होंने नमस्ते किया और आगे बढ़ गए। तभी चौथी महिला का बेटा आया और उसने अपनी मां से घड़ा लेता हुआ बोला, मां! पानी की जरूरत थी, तो मैं ला देता। आपने इतनी तकलीफ क्यों की? उस लड़के की बात को सुनकर तीनों महिलाएं समझ गई कि अनपढ़ होते हुए भी यह लड़का आज्ञाकारी है। तीनों महिलाओं का सिर लज्जा से झुक गया।

पर्यावरण बचाना है तो कंक्रीट का जंगल उगाने से बचना होगा

अशोक मिश्र

पंचकूला में सर्व समाज द्वारा आयोजित जनसभा में भाजपा के मेयर प्रत्याशी श्याम लाल बंसल के पक्ष में वोट का आह्वान करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हमारा लक्ष्य कंक्रीट के जंगल बनाना नहीं, बल्कि शहर को स्वच्छ बनाना है। सीएम सैनी ने बात तो पते की कही है, लेकिन क्या वास्तव में हरियाणा में ऐसा हो रहा है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि शहरों को हमेशा स्वच्छ रहना चाहिए। स्वच्छ शहर में रहने वाले व्यक्ति भी शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। 

हवा, पानी भी प्रदूषणरहित रहती है। इसके लिए जरूरी है कि शहरों की नालियां, सड़कें और गलियां स्वच्छ रहें। इधर उधर कूड़ा करकट न फेंके जाएं। स्थानीय निकायों और निजी संस्थाएं हर गली मोहल्ले से कचरा एकत्रित करके उसका समुचित निस्तारण करें। लोग नियत स्थान पर ही कूड़ा-करकट फेंकें। प्लास्टिक सहित अन्य कूड़ा करकट को आग न लगाया जाए। यह बात सीएम सैनी की बिल्कुल सही है, लेकिन जहां तक कंक्रीट का जंगल उगाने की बात है। राज्य में हर साल कंक्रीट के जंगल उगाए जा रहे हैं। 

कालोनियों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें कुछ वैध होती हैं, तो कुछ अवैध। सीमेंट की सड़कें बनाई जा रही हैं। खेती योग्य जमीनों पर कांप्लेक्स और कालोनियां बसाई जा रही हैं। राज्य में खेती और वन क्षेत्र का रकबा दिनों दिन कम होता जा रहा है। कालोनियों, घरों और सड़कों का रकबा बढ़ता जा रहा है। उद्योग-धंधे लगाए जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में उद्योग-धंधे नहीं लगने चाहिए। 

बिल्कुल लगने चाहिए, लेकिन वह इस तरह लगाए जाएं ताकि हमारे पर्यावरण को कतई नुकसान न पहुंचे। कारखाने और उद्योग मानकों पर खरे उतरने वाले होने चाहिए। इन उद्योगों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के निस्तारण और नियंत्रण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। उद्योगों से निकला रासायनिक कचरा नदियों और नालों में बहाया जाता है जिसकी वजह से नदियां प्रदूषित हो रही हैं। जिन स्थानों पर कालोनियां, घर, बाजार या उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं, उन स्थानों पर पहले से लगे पेड़-पौधों को काट दिया जाता है। 

राज्य में  इन सभी उद्योगों, कालोनियों और घरों  के निर्माण में सीमेंट का उपयोग किया जाता है। जब गर्मी का मौसम होता है, तो सीमेंट से बनी इमारतें और सड़कें सूरज की गर्मी को अवशोषित कर लेती हैं। रात में वह इस गर्मी को मुक्त करती हैं। इस तरह रिलीज होने वाली गर्मी हमारे ही वायु मंडल में रह जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि वायुमंडल गर्म रहने से हमारी पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है।

प्रकृति विज्ञानियों का कहना है कि आज से तीन-चार दशक पहले शहरों और गांवों में बनने वाले कच्ची मिट्टी और फूस से बनने वाले घर उर्ष्मा का परावर्तित कर देते थे जिससे पृथ्वी का तापमान नहीं बढ़ने पाता था।

अंतत: इंडिया गठबंधन के सारे पीएम मटेरियल ध्वस्त

संजय मग्गू

याद कीजिए, 23 जून 2023 को पटना में जब विपक्षी दलों के नेताओं का जमावड़ा हुआ था, तब नीतीश कुमार की भावभंगिमा क्या थी? यह बैठक नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई थी। दूसरी बैठक 17-18 जुलाई 2023 को कर्नाटक के बेंगलुरु में मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में हुई। तब नीतीश कुमार और उनके चेले-चपाटे उन्हें पीएम मटेरियल कहकर हवाई किले बांध रहे थे। 

बाद में जब विपक्षी दलों ने एकजुट होकर कांग्रेस को इंडिया गठबंधन का नेता चुना, तो उसके कुछ ही दिनों बाद नीतीश कुमार ने अपनी राह अलग कर ली। इसके बाद बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद को पीएम मटेरियल माना। वह कांग्रेस के नेतृत्व में भाजपा से लड़ने को तैयार नहीं थीं। क्षेत्रीय दल भी बेमन से इंडिया गठबंधन में शामिल हुए। आम आदमी पार्टी के केजरीवाल भी कांग्रेस को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्न: वाली स्थिति थी।  

इंडिया गठबंधन में अपने आपको पीएम मटेरियल या कांग्रेस को अपने नेतृत्व लायक न समझने वाले नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन आज कहां हैं? और कांग्रेस? सन 2023 के मुकाबले कांग्रेस आज कहीं ज्यादा मजबूत होकर उभरी है। तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। चौथी में बनने जा रही है। तब नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन में पीएम का चेहरा बनने से कमतर पर राजी नहीं थे, लेकिन भाजपा में क्या गए। मुख्यमंत्री पद तो गया ही, केवल राज्यसभा सांसद बनकर रह गए। केजरीवाल आज भारतीय राजनीति में अप्रांसगिक होते प्रतीत हो रहे हैं।

सात राज्यसभा सांसदों को भाजपा ने हड़प लिया। दिल्ली की सत्ता भी चली गई। पंजाब सरकार कब और कितने दिन चलेगी? अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या हालत होगी? कौन जानता है। उत्तर भारत में अपने बयानों से कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर देने वाले एमके स्टालिन चुनाव हार गए हैं। तमिलनाडु में सन 1971 के बाद पैदा हुई द्रविड़ राजनीति को पलीता लग चुका है। जोसेफ विजय तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं। कोई ताज्बुब नहीं है कि कांग्रेस स्टालिन का दामन छोड़कर विजय थलापति के साथ खड़ी हो जाए। वैसे उसे यह बहुत पहले कर लेना चाहिए था। 

रही बात ममता बनर्जी की। आज उन्होंने प्रेस काफ्रेंस में कहा कि मेरा लक्ष्य बिल्कुल साफ है। अब मैं एक आम व्यक्ति की तरह इंडिया गठबंधन को मजबूत करूंगी। अभी मेरे पास कोई पद नहीं है, इसलिए मैं एक सामान्य नागरिक हूं। ममता को चुनाव हारने के बाद इंडिया गठबंधन याद आ रहा है। अगर दो साल पहले ममता, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन, उमर अब्दुल्ला जैसे लोग अपना अहम त्यागकर खुले मन से इंडिया गठबंधन में शामिल हुए होते, तो शायद इस तरह अधोगति को प्राप्त नहीं हुए होते। 

लेकिन उस समय तो सब पीएम मटेरियल बनने का ख्याब देख रहे थे। भाजपा ने एक-एक करके सबको निपटा दिया। अब पीएम मोदी ने अखिलेश की ओर इशारा किया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में देखते हैं क्या होता है?

Tuesday, May 5, 2026

सोफी को गणित प्रेम ने कर दिया अमर


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मैरी सोफी जर्मेन एक फ्रांसीसी गणितज्ञ, दार्शनिक और भौतिक विज्ञानी थीं। इनका जन्म 1 अप्रैल 1776 को फ्रांस के पेरिस में हुआ था। इनके पिता एंब्रोइस फ्रांकोइस एक धनी रेशम व्यापारी थे। कुछ लोगों के अनुसार  सुनार थे। सोफी की बचपन से ही गणित में रुचि थी। 

इनके पिता को सोफी का गणित विषय में रुचि लेना कतई पसंद नहीं था। जब सोफी तेरह साल की थीं, उन्हीं दिनों क्रांतिकारियों ने बैस्टिल जेल पर हमला किया। चार घंटे की लड़ाई में 94 लोगों की मौत हुई। अंतत: क्रांतिकारियों ने बैस्टिल पर कब्जा कर लिया। इस कारण पूरे पेरिस में कर्फ्यू जैसा माहौल था। 

लोगों के घर से बाहर निकलने पर एक तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस मौके का फायदा सोफी ने अपने पिता की लाइब्रेरी में गणित की पुस्तकें पढ़ने में उठाया। गणित की पुस्तकों में इनका मन रमता गया। इसी दौरान इनके हाथ में जेई मोंटूक्ला की आर्किमिडीज की मौत की कहानी आई। इससे इनका गणित के प्रति आकर्षण और बढ़ गया। 

इनके पिता ने इनकी गणित की पढ़ाई बंद करने के कई प्रयास किए। रात में इन्हें ओढ़ने-पहनने के लिए गर्म कपड़े नहीं दिए जाते थे। आग जलाने की भी इजाजत नहीं थी। फिर भी सोफी मोमबत्ती जलाकर चुपचाप पढ़ाई करती रहीं। इनके जीवन में बदलाव तब आया जब 1794 में फ्रांस में एक प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थान एकोल पॉलिटेक्निक खुला। 

इस संस्थान की खास बात यह थी कि संस्थान में महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता था। तब सोफी ने एक नकली नाम मोंसियूर ले ब्रांक के नाम से अपने नोट्स यहां के प्रोफसरों को भेजना शुरू कर दिया। प्रोफेसर जोसेफ- लुई लांग्रेस इनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए। बाद में इन्हें गणित में योगदान के लिए पेरिस विज्ञान अकादमी का ग्रैंड प्राइज दिया गया।

कब तक जान गंवाते रहेंगे बिना सुरक्षा उपकरण सीवर में उतरने वाले कर्मचारी

अशोक मिश्र

शहरों की स्वच्छता को लेकर राज्य सरकार और सरकारी संस्थाएं बड़े-बड़े दावे करने से नहीं चूकती हैं। स्वच्छता रैंकिंग में अव्वल आने के लिए सरकारें कई तरह की योजनाएं बनाती हैं, लेकिन शहरी स्वच्छता का दम भरने वाली सरकारें यह भूल जाती हैं कि जिनकी बदौलत शहर स्वच्छ होते हैं, उनकी जिंदगी गंदगी और गंदे वातावरण में ही बीत जाती है। शहरों की गंदगी कई बार उनके लिए जानलेवा साबित होती है। इनकी मौत पर दो-चार दिन बयानबाजी होती है और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। 

रविवार को फरीदाबाद के सेक्टर 84 में बीपीटीपी की सड़क के पास सीवर की सफाई में उतरे दो कर्मचारी  राजेंद्र और सुनील की मौत दम घुटने से हो गई। दोनों बीपीटीपी बिल्डर कंपनी के कर्मचारी थे। कंपनी ने इन दोनों कर्मचारियों को बिना सुरक्षा उपकरण के ही सीवर में उतार दिया था। दो दिन पहले ही पलवल में भी सीवर की जहरीली गैस की वजह से एक सफाई कर्मचारी की मौत हो गई थी।

 नूंह जिले के फिरोजपुर झिरका में 15 अप्रैल को सीवर की जहरीली गैस में दम घुटने से दो कर्मचारियों की मौत हो गई थी। ठेकेदार और निजी कंपनियां बिना गैस डिटेक्टर, मास्क या आॅक्सीजन सिलेंडर के ही सीवर में कर्मचारियों को उतार देते हैं। हालांकि सीवर मौतों को रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने दिसंबर 2022 में एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी जारी की थी जिसके अनुसार सीवर की सफाई मुख्य रूप से मशीनों से ही की जाएगी, न कि इंसानों द्वारा। 

इसके बावजूद आए दिन ऐसी घटनाएं प्रदेश में हो रही हैं। पिछले 5 वर्षों (2021 से 2025) में हरियाणा में सीवर/सेप्टिक टैंक साफ करते समय 43 श्रमिकों की मौत हुई है। कुछ अन्य सरकारी आंकड़ों में 2017 से 2026 के बीच हरियाणा में 76 मौतों का जिक्र है, जो देश में सर्वोच्च में से एक है। ऐसी लगातार होती घटनाएं साफ संकेत देती हैं कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि खतरनाक और स्थापित होती जा रही व्यवस्था बन चुकी है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में होती मौतें बार-बार यह सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर कब तक गरीब मजदूर अपनी जान की कीमत पर हमारी स्वच्छता की जिम्मेदारी ढोते रहेंगे? 

संवैधानिक अधिकारों और मानव गरिमा की रक्षा के दावों के बीच भी इन घटनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर अगर बात की जाए तो कानूनों और न्यायिक आदेशों की मौजूदगी के बावजूद जमीन पर बदलाव न दिखना इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है। 2013 का मैनुअल स्कैवेंजिंग निषेध और पुनर्वास अधिनियम इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मैकेनाइज्ड सफाई अनिवार्य करते हुए मृतक परिवारों को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। लेकिन कानून और नियमों पर अमल होता कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।

Monday, May 4, 2026

नहीं बहन! तुम्हारे प्रेम में स्वार्थ था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सच्चा प्रेम कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है। किसी को पीड़ा नहीं देता है।  सच्चा प्रेम करने वाला किसी से बदला लेने की बात भी नहीं सोचता है। सच्चे प्रेम में दया, करुणा, प्रेम और प्राणी मात्र के लिए सद्भावना रखता है। सच्चा प्रेम करने वाला ऊंच-नीच और अमीर-गरीब की भावना से भी ऊपर होता है। एक बार की बात है। स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गए हुए थे। 

वह जहां भी जाते थे, लोग उनसे अपनी शंकाओं का समाधान करने के लिए पहुंच जाते। स्वामी रामतीर्थ यथासंभव हर किसी की समस्याओं का समाधान करने का भरपूर प्रयास करते थे। उन्हीं दिनों एक महिला स्वामी रामतीर्थ के पास पहुंची। वह अपनी पीड़ा को भीतर ही दबाए बैठी हुई थ। उस महिला को देखते ही स्वामी रामतीर्थ समझ कि महिला इस समय अपार दुख में है। 

वह कुछ नहीं बोले। बस उसे सरल और अपार स्नेह भाव से देखते रहे। वह महिला स्वामी जी के स्नेहभाव वाली दृष्टि को देखकर एकाएक रोने लगी। वह काफी देर तक रोती रही। स्वामी रामतीर्थ कुछ नहीं बोले। बस, उसे पहली की तरह स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखते रहे। काफी देर रोने के बाद उसने अपने हृदय की पीड़ा स्वामी जी के सामने खोलकर रख दी। उसने बताया कि वह प्रेम में छली गई है। उसने जिससे सच्चा प्रेम किया था, वह उसे छोड़कर चला गया। 

उसने स्वामी जी से पूछा कि क्या सच्चा प्रेम मिलना बहुत दुष्कर है। स्वामी जी ने प्रेम भाव से कहा कि सच्चा प्रेम हासिल थोड़ा कठिन है। उस महिला ने कहा कि क्या मेरा प्रेम सच्चा नहीं था। स्वामी जी ने कहा कि बहन! तुम्हारे प्रेम में स्वार्थ था। तुमने जिसस प्रेम किया वह कुटिल था। प्रेम तो दया, करुणा और सेवा के रूप में प्रकट होता है। यह सुनकर महिला चली गई और एक अस्पताल में नर्स का काम करने लगी।

‘जल जीवन है’ रटने से नहीं पानी को बचाने से दूर होंगी समस्याएं

अशोक मिश्र

जल ही जीवन है। यह लगभग सभी लोग बचपन से ही रटते आए हैं। पहली और दूसरी कक्षा में भी टीचर्स बच्चों को यह सूत्र वाक्य रटा देती हैं। उनका उद्देश्य यह है कि बच्चा अभी से जल की महत्ता को समझे और जीवन में जल को बरबाद न होने दे। कुछ बच्चे इस बात को याद रखते हैं, जीवन में जल की महत्ता को समझते हुए उसका संरक्षण करने की कोशिश करते हैं। 

कुछ बच्चे नहीं समझते और जीवन भर जल को बरबाद होते हुए देखते हैं, लेकिन जल संरक्षण की दिशा में कोई प्रयास नहीं करते हैं। जल जीवन है, यह बात उस समय लोगों को समझ में आती है, जब 38-40 डिग्री तापमान में कंठ सूख रहा होता है और एक घूंट पीने लायक ठंडा पानी मिल जाता है। जल सचमुच जीवन है। पूरा उत्तर भारत इन दिनों तप रहा है। हरियाणा में भी कई जिलों में औसत तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास है। कई जिलों में पानी को लेकर लोग चिंतित हैं। 

घरों में पानी की पर्याप्त सप्लाई नहीं हो रही है। बड़ी-बड़ी कालोनियों में रहने वाले लोग पानी के बिना परेशान हैं। जो लोग आज पानी को लेकर हायतौबा मचा रहे हैं, वह लोग सर्दी और बरसात के दिनों में पानी की चिंता ही नहीं करते हैं।  उनके घर या कालोनी की सड़क के किनारे लगा नल खुला है और पानी बह रहा है, तो उन्हें कोई चिंता नहीं होती है। उनसे यह भी नहीं होता है कि वह रुककर बहते पानी को रोक दें। उन्हें अपने काम पर जाना है और फिर सड़कों पर नल से बह रहे पानी को रोकना उनका काम तो है नहीं। वह किसी के नौकर हैं क्या? जो दूसरों का काम करें।

ऐसे लोग अगर बस एक मिनट का कष्ट उठा लें, तो नल से बहने वाले सैकड़ों लीटर पानी को बरबाद होने से बचा सकते हैं। यह उनका नागरिक कर्तव्य है कि अगर किसी ने गलती से या जानबूझकर नल को खुला छोड़ दिया है, तो वह अपना थोड़ा सा समय खर्च करके पानी को बरबाद होने से रोक दें। सर्दियों और बरसात के दिनों में पानी की जरूरत कम हो जाती है। बरसात के दिनों में नालियों के माध्यम से बह जाने वाले पानी को यदि किसी तालाब, कुंडों और बावड़ियों में संरक्षित कर लिया जाए, तो उसका उपयोग गर्मी के दिनों में किया जा सकता है।

बरसात में आसमान से बरसने वाले पानी को यदि पूरी तरह संरक्षित कर लिया जाए, तो इससे भूगर्भ जल स्तर भी बढ़ेगा और गर्मियों में पानी की किल्लत भी नहीं होगी। बरतन और कपड़े धोने के बाद उस पानी का उपयोग पेड़-पौधों को सींचने में किया जा सकता है। यदि घर के सामने पार्क हो और उसमें फल-फूल वाले पौधे लगे हों, तो उस पानी का  उपयोग सिंचाई में किया जा सकता है। आरओ से वेस्ट के रूप में निकलने वाले पानी का उपयोग कपड़े, बर्तन धोने के साथ-साथ अन्य कामों में किया जा सकता है। अधिकतर लोग इस पानी को नाली में बहा देते हैं।

Sunday, May 3, 2026

कभी राजा पर भी विपत्ति आ सकती है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजा भोज परमार राजवंश के शासक थे। कहते हैं कि इन्होंने भोजपुर नगर बसाया था। प्रारंभ में भोजपुर का नाम भोजपाल नगर था। यह परमार वंशी राजा सिंधुल के पुत्र थे। इनकी माता का नाम सावित्री था। जब यह पांच साल के थे, तो इनके माता-पिता की मौत हो गई थी और राज्य का भार इनके चाचा मुंज के कंधों पर आ गया था। 

राज्य के लोभ में मुंज ने इन्हें मारने का आदेश दे दिया था, लेकिन बधिक की दयालुता से यह बच गए थे। बाद में मुंज का भी हृदय परिवर्तन हुआ। वह राजपाट भोज को सौंपकर जंगल में रहने चला गया। यह एक बहुश्रुत कथा है। एक दिन की बात है। 

राजा भोज अपने महल में भोजन कर रहे थे, तभी कहीं से एक मधुमक्खी उड़ती हुई आई और राजा के सामने बैठकर उसने स्वभावगत अपने हाथ-पैर रगड़ते हुए सिर पर लगाने लगी। राजा भोज ने पुरोहित से इसका मतलब पूछा, तो पुरोहित ने कहा कि यह कहना चाह रही है कि मैंने इतनी मेहनत से मधु इकट्ठा किया था, जिसे लोग लूटकर ले गए। इसलिए आप जैसे राजाओं को संचय नहीं करना चाहिए। 

उस दिन से राजा भोज ने गुणी व्यक्तियों और निर्धनों को दान करना शुरू कर दिया। कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति राजा भोज के यहां से खाली हाथ नहीं जाता था। भोज के दोनों हाथ राजकोष लुटाने से कोषाध्यक्ष चिंतित हो गया। उसने एक दिन राजकोष के दरवाजे पर लिखा-राजा को आपात स्थिति के लिए धन बचाकर रखना चाहिए। 

कभी कभी दुर्भाग्य से धनवानों पर भी विपत्ति आ सकती है। यह पढ़कर भोज ने लिखवाया कि यदि दुर्भाग्य से धनवानों पर विपत्ति आ सकती है, तो संचित कोष भी नष्ट हो सकता है। इसके बाद कोषाध्यक्ष ने कभी चिंता नहीं की। राजा भोज पहले की तरह दान करते रहे।