बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
भारतीय नारियों में उर्मिला और यशोधरा का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उर्मिला के पति लक्ष्मण अपने बड़े भाई राम के पथ का अनुगमन करने के लिए स्वेच्छा से चौदह वर्ष के वनवास पर गए थे। यशोधरा के पति सिद्धार्थ मानव कल्याण के लिए पत्नी का परित्याग करके चले गए थे।इन दोनों महिलाओं की पीड़ा एक समान थी। चौदह साल बाद उर्मिला को अपने पति का सान्निध्य प्राप्त हुआ, लेकिन बारह साल बाद यशोधरा के पति सिद्धार्थ आए तो, लेकिन एक भिक्षु के रूप में, जो अब उसका नहीं, पूरे मानव समाज के लिए समर्पित हो चुका था। यशोधरा ने जब सुना कि उसके पति नगर में आए हैं,तो वह अपने ससुर महाराज शुद्धोधन की तरह महल के बाहर उनसे मिलने नहीं गई। ससुराल और नैहर दोनों कुल के हिसाब से वह राजकुल की क्षत्राणी थी। अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी। गर्व तो होना ही था।
महात्मा बुद्ध यशोधरा के अंत:पुर में पधारे। यशोधरा ने अपने पति को देखा, भिक्षुक रूप में। उन्हें देखते ही दांपत्य जीवन की तमाम स्मृतियां जीवंत हो उठीं। बुद्ध ने उसके त्याग को आदर प्रदान करते हुए कहा, यशोधरे! कुशल से तो हो? यशोधरा बुद्ध की आवाज सुनकर गदगद हो उठी। उसने कहा- हां, स्वामी! बुद्ध बोले, स्वामी नहीं, भिक्षु कहो यशोधरे! मैं अपना धर्म निभाने आया हूं। तुम कुछ भिक्षा दोगी। यशोधरा ने कहा, भंते! आप भी पूर्व संबंधों के आधार पर कुछ प्रतिदान कर सकेंगे?
बुद्ध ने कहा कि भिक्षु धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं हो, तो अवश्य करूंगा। यह सुनकर यशोधरा ने कहा कि तो फिर पुत्र राहुल को अपने पितृ कुल की परंपरा का निर्वाह करने का अधिकार प्रदान कीजिए। इतना कहकर उसने अपने पुत्र राहुल को पुकारा और कहा, जाओ बेटा, अपने पितृ कुल की परंपरा का अनुसरण करो। बुद्ध की शरण, धर्म की शरण में और संघ की शरण में जाओ। इस तरह उस महाविदुषी ने मानव कल्याण के लिए एक और महात्याग किया।