Thursday, June 4, 2026

फिल्म देखकर रो पड़े अल्बर्ट आइंस्टीन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जब दो महान हस्तियां एक दूसरे से मिलती हैं तो उनमें जो संवाद होता है, वह बड़ा ही रोचक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक होता है। कभी किसी ने महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से किसी ने पूछा था कि वह फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों में से किससे मिलना पसंद करेंगे? तब उन्होंने जवाब दिया था कि वह मूक फिल्मों के हास्य कलाकार चार्ली चैपलिन से मिलना पसंद करेंगे। 

बीसवीं सदी के महान वैज्ञानिकों में अल्बर्ट आइंस्टीन की चर्चा होती है। मानव समाज की सेवा करने में अल्बर्ट आइंस्टीन का कोई मुकाबला नहीं था। वहीं चार्ली चैपलिन ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया था। वह फर्श से अर्श तक पहुंचे थे। उनकी फिल्मों में संवाद न होते हुए भी भावनाएं बड़ी बारीकी से प्रकट हो जाती थीं। 

बात 2 फरवरी 1931 की है। लास एंजिल्स में चार्ली चैपलिन की फिल्म सिटी लाइट्स का प्रीमियर शो रखा गया था। इस शो में अल्बर्ट आइंस्टीन भी पहुंचे थे। संयोग से चार्ली चैपलिन भी अपनी फिल्म का शो देखने थिएटर में आए हुए थे। इन दोनों महान हस्तियों को देखते ही भीड़ पागल हो गई। वह उनके स्वागत में शोर मचाने लगी। लोग उनको देखने और हाथ मिलाने के लिए बेताब हो गए। 

तब आइंस्टीन ने चैपलिन से कहा कि आपकी कला में मुझे सबसे ज्यादा जो बात पसंद है, वह है आपकी सार्वभौमिकता। आप एक शब्द नहीं बोलते, फिर भी पूरी दुनिया आपको समझती है। तब चैपलिन ने तपाक से कहा कि यह सच है। लेकिन आपकी प्रसिद्धि इससे भी बड़ी है। दुनिया आपकी तब भी तारीफ करती है, जब कोई आपको समझता ही नहीं है! फिल्म देखने के दौरान चैपलिन यह देखकर दंग रह गए कि अंतिम दृश्य देखकर आइंस्टीन की आंखों में आंसू आ गए थे।

कब तक सरपंचों, पार्षदों के हक का उपयोग करते रहेंगे पति?

 

अशोक मिश्र

आए दिन अखबारों में खबरें छपती रहती हैं कि सरपंच पति ने बैठक में भाग लिया और लोगों को आश्वासन दिया कि पंचायत के अंतर्गत आने वाली सड़कों की मरम्मत कराई जाएगी। ऐसी ही कुछ खबरें पार्षद पति के संबंध में आती रहती हैं। सरपंच पति या पार्षद पति कोई संवैधानिक पद नहीं है। जब किसी पंचायत की सरपंच कोई महिला चुनी जाती है, तो लोग उसके पति को सरपंच पति कहने लगते हैं। 

यही हाल वार्डों में किसी महिला के पार्षद चुने जाने पर होता है। आमतौर पर देखने में यह आता है कि जब कोई महिला सरपंच या पार्षद अथवा अन्य पदों पर चुनी जाती है, तो प्राय: उसके पति ही सारा कामकाज संभालते हैं। कई मामलों में महिला सरपंच के पति स्वयं को सरपंच प्रतिनिधि बताकर सरकारी बैठकों, प्रशासनिक कार्यों और सुनवाई की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। सच तो यह है कि ऐसी स्थिति महिलाओं को मिले सांविधानिक अधिकारों और पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने की मूल भावना के विपरीत है। 

दरअसल, पंचायतों में महिला आरक्षण की पहल का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को जाता है जिन्होंने 1989 में पहली बार संसद में 64वां संविधान संशोधन विधेयक पेश कर पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था। बाद में पंचायती राज में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण, पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से दिलवाया, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था। ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निहितार्थ यह था कि देश में सबसे ज्यादा पिछड़ी स्त्री जाति को भी उनकी उन्नति के मार्ग पर चलाने का प्रयास किया जाए।

 घरों से निकल जब महिलाएं कार्य क्षेत्र में आएंगी, तो वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगी और महिलाओं को भी जागरूक करेंगी। लेकिन कुछ मामलों में ऐसा नहीं हुआ। पुरुषों ने अपनी पत्नियों को घर पर बिठा दिया और उनका पति होने के नाते शासन करने लगे। अभी हाल ही में हरियाणा राज्य सूचना आयोग ने महिला सरपंच की जगह उनके पति द्वारा सरकारी बैठकों और सूचना का अधिकार में पैरवी करने पर कड़ा संज्ञान लिया था। 

आयोग ने स्पष्ट किया था कि महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों या प्रॉक्सी की भागीदारी पूरी तरह से गैर-कानूनी है। हरियाणा में ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। गुरुग्राम जैसे नगर निगमों ने भी महिला पार्षदों की जगह उनके पतियों के बैठक में बोलने या हस्तक्षेप करने की प्रथा के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। महिलाओं को यदि अपनी स्थिति में सुधार लाना है, तो उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों का खुद पालन करना होगा। तभी महिला सशक्तिकरण का सपना साकार होगा।

Wednesday, June 3, 2026

विश्वास करने लायक आदमी कौन है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमें अपने जीवन में केवल उस आदमी पर विश्वास करना चाहिए जो आपकी परेशानी सुनकर आपकी मदद करे और किसी दूसरे के सामने उसका जिक्र तक न करे। इस संबंध में एक रोचक कथा है। किसी राज्य में गुरुकुल में उस सत्र के शिष्यों की पढ़ाई का आखिरी दिन था। 

सारे शिष्य बहुत प्रसन्न थे कि  अब उन्हें घर जाने को मिलेगा। बस, कुलपति का अंतिम उपदेश देना बाकी था जो शिक्षा सत्र खत्म होने का अनिवार्य अंग था। सारे शिष्य एक जगह उपस्थित थे। तभी वहां पर कुलपति भी आ गए। उन्होंने लकड़ी के बने हुए तीन गुड्डे देते हुए कहा कि तुम्हें इनमें अंतर बताना है। सबने उन तीनों गुड्डों को देखा, लेकिन अंतर नहीं बता सके। 

तभी एक शिष्य ने कहा कि अरे, इन गुड्डों में तो छेद है। तब कुलपति ने कहा कि सही बात है। उन्होंने एक तार देते हुए कहा कि इन तीनो गुड्डों के छेद में डालो। एक गुड्डे के कान के पास छेद था। उसमें तार डालने पर वह दूसरे कान से बाहर निकल गया। दूसरे गुड्डे के कान में तार डालने पर मुंह से तार निकल गया। तीसरे गुड्डे के कान में तार डालने पर वह कहीं से नहीं निकला। न कान से, न मुंह से, वह पेट में चला गया।

तब कुलपति ने कहा कि तुम सबके जीवन में तीन तरह के लोग मिलेंगे। एक तो इस कान से सुनेंगे और दूसरे कान से निकाल देंगे। तुम्हें ऐसे लोगों पर विश्वास नहीं करना है। दूसरे तरह के वह लोग होंगे जो आपकी बात सुनेंगे और दूसरों को बताएंगे। तुम्हें ऐसे लोगों से भी दूर रहना है। 

तीसरे तरह के लोग आपकी समस्या को सुनेंगे, संभव होगा तो मदद करेंगे और पेट में रख लेंगे। किसी से बताएंगे नहीं। तुम्हें ऐसे ही लोगों पर विश्वास करना है। इसके बाद कुलपति ने सबको घर जाने की इजाजत दे दी।

अरावली क्षेत्र में चेकडैम बनाकर रोका जा सकता है बरसाती पानी

अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र को बचाने की मुहिम काफी दिनों से चलाई जा रही है। अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन और पेड़ों की कटाई की वजह से बरसात के दिनों में पानी बहकर नालों और नदियों में बह जाता है। पहले अरावली पर्वत पर उगे पेड़-पौधे और पहाड़ों में पड़ी दरारें बरसाती पानी को सोखकर इलाके को रिचार्ज करती रहती थीं। लेकिन जैसे-जैसे पेड़ों की कटान होती गई और छोटी-छोटी पहाड़ियों को अवैध रूप से खनन करके मिटाया गया भूमि का रिचार्ज होना बंद हो गया। 

ऐसी स्थिति में अरावली क्षेत्र में बरसाती पानी के सरंक्षण के लिए फरीदाबाद महानगर विकास प्राधिकरण ने बहुत अच्छी योजना बनाई है। उसने बुढ़िया नाले पर छोटे बांध बनाकर जल का प्रबंधन करने की योजना तैयार की है। बुढ़िया नाले में चेक डैम बनाने से पहले उसका विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। रिपोर्ट मिलने के बाद चेकडैम बनाने की योजना तैयार की जाएगी। यह कदम अरावली क्षेत्र में जल और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। पूरे अरावली क्षेत्र में आने वाले गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, चरखीदादरी, नारनौल और रेवाड़ी जैसे शहरों में लगातार भू-जल दोहन के चलते भू जल स्तर बहुत अधिक नीचे चला गया है। 

कई दशक पहले तक इन शहरों के भू जल स्तर को अरावली की पहाड़ियां रिचार्ज करती थीं, लेकिन जैसे-जैसे पहाड़ियां अवैध खनन और पेड़ों की अवैध कटाई की वजह से बरबाद होती गईं, भूमि का रिचार्ज होना कम होता गया। विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला में प्रतिवर्ष होने वाली वर्षा का एक तिहाई हिस्सा अवशोषित करने की क्षमता है। पहाड़ियों से वर्षा जल का 10-12 प्रतिशत हिस्सा बहकर निकल जाता है। पहाड़ियों से बहकर निकला यह पानी आसपास के इलाकों के लिए भूजल पुनर्भरण का काम करता है। 

अरावली पर्वतमाला से बहने वाले वर्षा जल को अवशोषित करने और वाष्पीकरण के कारण होने वाले नुकसान को कम करने के लिए, ढलान वाले इलाकों से बहने वाले पानी को संग्रहित करने के लिए वर्षा जल संरचनाएं बनाई जाती हैं। हरियाणा उन क्षेत्रों में आता है जहां भूजल का स्तर बहुत तेजी से घट रहा है। इन क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए लगभग 60-70 लाख रुपये की औसत लागत से लगभग 300 जल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए। 

अरावली क्षेत्र में हर साल बह जाने वाले पानी को यदि चेकडैम के जरिये रोका जाए, तो इससे न केवल भूजल स्तर में सुधार हो सकता है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में जल की उपलब्धता भी बढ़ाई जा सकती है। फरीदाबाद महानगर विकास प्राधिकरण की यही करने की योजना है। यदि इस योजना को गुरुग्राम,रेवाड़ी, नूंह, नारनौल जैसे जिलों में लागू किया जाए, तो बरसात के दिनों में बह जाने वाले पानी के एक बड़े हिस्से को संरक्षित किया जा सकता है।

Tuesday, June 2, 2026

चेखव और मैक्सिम गोर्की की मुलाकात

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

वैसे तो रूस में कई महान साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने अपने समय की सामाजिक स्थिति को अपनी रचनाओं में उकेरा है। ऐसे ही दो महान साहित्यकार अन्तोन पाव्लविच चेखव और मैक्सिम गोर्की ने अपनी रचनाओं से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। चेखव कथाकार होने के साथ-साथ नाटककार भी थे। मैक्सिम गोर्की और अन्तोन पाव्लविच चेखव में समानता यह थी कि दोनों ने समाज के दबे कुचले लोगों को अपनी रचनाओं का आधार बनाया। मैक्सिम गोर्की ने तो अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया था।

चेखव के मामले में ऐसी बात नहीं थी। उन्होंने चिकित्सक होते हुए भी साहित्य रचना की। गोर्की चेखव की बड़ी इज्जत करते थे। एक बार गोर्की अपने समकालीन साहित्यकार चेखव से मिलने उनके घर गए। दोनों में काफी बातें हुईं। बातचीत के दौरान गोर्की ने चेखव से पूछा कि समाज के विभिन्न वर्गों में से किस वर्ग को सबसे ज्यादा प्रमुखता देते हैं। 

चेखव कुछ देर तक सोचते रहे, फिर बोले कि मैं सबसे ज्यादा तवज्जो शिक्षकों को देता हूं। शिक्षक निस्संदेह पूजनीय और सर्वश्रेष्ठ होते हैं। गोर्की ने पूछा कि शिक्षक में ऐसी क्या खास बात है? चेखव ने कहा कि शिक्षक के ही कंधे पर यह दायित्व होता है कि वह किसी भी देश के बच्चों को पढ़ाकर योग्य नागरिक बनाए। गोर्की ने पूछा कि तो आप शिक्षकों के लिए क्या करना चाहते हैं? 

चेखव ने कहा कि यदि मेरे पास बहुत सारा पैसा हो, तो मैं शिक्षकों के लिए मकान के साथ-साथ एक बहुत बड़ा पुस्तकालय बनवा दूं ताकि वह अपने शिष्यों को बेहतरीन शिक्षा दे सकें। चेखव की यह बात सुनकर गोर्की काफी प्रसन्न हुए। चेखव ने 44 साल की उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह दिया था।

नागरिकों के जागरूक होने पर ही नशा मुक्ति अभियान को मिलेगी सफलता

अशोक मिश्र

हरियाणा में नशा करने वालों की संख्या बढ़ रही है। नशीले पदार्थोँ का कारोबार उन क्षेत्र में भी होने लगा है जो अभी तक नशे से अप्रभावित थे। कुछ साल पहले तक पंजाब से लगते दो-तीन जिलों या दिल्ली से सटे गुरुग्राम और फरीदाबाद में नशीले पदार्थों के बिकने की खबरें आती थीं लेकिन अब दक्षिण हरियाणा भी नशे की चपेट आने लगा है। विडंबना यह है कि सबसे पहले नशा मुक्त जिला घोषित होने वाले चरखी दादरी को नशा धीरे-धीरे अपनी जकड़ में लेने लगा है। 

अधिकतर युवा इसका शिकार बन रहे हैं। माता पिता के साथ परिवारों की परेशानियां एक बड़े संकट के रूप में उभरने लगी है। चरखी दादरी जिले में बढ़ते नशे के खिलाफ समसपुर गांव के लोग बेमियादी धरने पर बैठ हुए हैं। धरना पिछले 13 दिनों से चल रहा है। फोगाट खाप के साथ-साथ आसपास के गांवों ने भी सामूहिक रूप से धरने का समर्थन किया है। राज्य में नशे का विस्तार बड़ी तेजी से हो रहा है। 

पिछले दिनों महिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी के सामने फतेहाबाद जिले की कुछ महिलाओं ने इस बात का खुलासा किया कि उन्होंने अपने पति और ससुराल वालों के नशा बेचने के विरोध में उन्हें छोड़ दिया है। अपने पति और ससुराल को छोड़ने पर अधिकारी इन महिलाओं की काउंसिलिंग कर रहे थे। हालांकि प्रदेश सरकार नशा तस्करी और नशीले पदार्थों की बिक्री रोकने की हर संभव कोशिश कर रही है। राज्य में नशा तस्करी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के तहत पिछले पांच वर्षों में लगभग 33 हजार नशा तस्करों को गिरफ्तार किया जा चुका है। 

उन्हें जेल की सलाखों के पीछे बंद किया जा चुका है। नशीली दवाओं और पदार्थों के खिलाफ लड़ाई को सफल बनाने के लिए, उत्तरी क्षेत्र में नशीले पदार्थों  के खतरे से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए, आंकड़ों और सूचनाओं के आदान-प्रदान हेतु पंचकूला में एक अंतरराज्यीय नशीली दवाओं पदार्थों को नियंत्रित करने के लिए सचिवालय पहले ही स्थापित किया जा चुका है। इसके बावजूद नशा तस्कर नए-नए तरीके अपनाकर हरियाणा राज्य नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को चकमा देने में सफल हो जाते हैं। 

पेन किलर के इंजेक्शन, स्मैक, हैरोइन, गांजा, पारा, कूल लिप, नशीली गोलियों के कैप्सूल आदि कई तरह के नशे का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। पुलिस साल दर साल नशीले पदार्थों की भारी मात्रा जब्त करती है, उन्हें नष्ट करती है। नशा मुक्ति केंद्रों के माध्यम से लोगों को सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन नशा तस्कर पुलिस और सरकार के इस प्रयास को विफल कर देते हैं। पारंपरिक प्राकृतिक नशीले पदार्थों जैसे अफीम और गांजा से आगे बढ़कर नशेड़ी अक्सर ट्रामडोल, टैपेंटाडोल और अन्य गोलियों को पीसकर इंजेक्शन के जरिये ले रहे हैं। राज्य सरकार नशा मुक्ति का प्रयास अपने स्तर से कर रही है, लेकिन लोगों को भी इस मामले में जागरूक होना पड़ेगा।

Monday, June 1, 2026

निरंतर बहते और चलते रहना ही जीवन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हार और जीत जीवन के दो पहलू हैं। दोनों का समान रूप से स्वागत करना चाहिए। हारने पर निराश होकर बैठ जाना कतई उचित नहीं है, लेकिन सफलता मिलने पर इतराना और घमंड करना भी गलत है। एक बार की बात है। एक लड़का हाई स्कूल की परीक्षा में फेल हो गया। 

फेल होने पर उसके सहपाठियों ने उसका खूब मजाक उड़ाया। स्कूल से जब वह घर लौटा तो बहुत हताश था। साथियों का उपहास उड़ाना उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। इसके चलते वह भारी तनाव में आ गया। उसके पिता ने जब उसकी हालत देखी तो समझाया कि बेटा! जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों से विचलित होकर जो हताश हो जाते हैं, वह जीवन में कुछ नहीं कर पाते हैं। 

तुम फेल होने पर इतने दुखी मत हो। विफलता सिखाती है कि जीवन में कैसे सफल हुआ जाए। इसलिए तुम परेशान होने की जगह नए जोश के साथ जुट जाओ और अगली परीक्षा में सफल होकर दिखाओ। लेकिन इतने से भी लड़के को संतोष नहीं हुआ। एक दिन आत्महत्या करने के इरादे से घर से निकल गया। रास्ते में उसे एक बौद्ध मंदिर दिखाई पड़ा जिसके अंदर से आवाज आ रही थी। 

वह उत्सुकतावश मंदिर के अंदर गया। मंदिर में एक भिक्षुक कह रहा था कि पानी गंदा क्यों नहीं होता है, क्योंकि वह बहता रहता है। पानी की बूंदें झरने से निकलकर नदी में, नदी से महानदी में और महानदी से समुद्र में मिल जाती हैं क्योंकि वह बहता रहता है। कोई भी बाधा पानी को नहीं रोक पाती है क्योंकि पानी बहता रहता है। बहना और चलना ही जीवन है। 

यह सुनकर लड़के ने आत्महत्या का विचार त्याग दिया और मन में ठान लिया कि वह सफल होकर दिखाएगा। आगे चलकर वह एक बहुत प्रसिद्ध राजनेता बना।

महामारी की तरह बढ़ता जा रहा महिलाओं-पुरुषों में मोटापा

अशोक मिश्र

हरियाणा में महिला और पुरुष दोनों मोटापे का शिकार हो रहे हैं। अभी हाल में ही जारी की गई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की छठी रिपोर्ट में जो खुलासा हुआ है, वह चिंताजनक है। प्रदेश की हर तीसरी किशोरी और महिला तथा हर चौथा पुरुष और किशोर का वजन तयशुदा पैमाने से अधिक है। सन 2019 से 21 में जहां 15 से 49 साल के आयुवर्ग में हरियाणा में करीब 33.1 प्रतिशत महिलाएं मोटापे की शिकार थीं, तो वहीं अब 37.3 प्रतिशत महिलाएं मोटापे की समस्या से जूझ रही हैं।

यही हाल हरियाणा के पुरुषों का है। राज्य के 33.9 प्रतिशत पुरुष मोटापे की मार से त्रस्त हैं। पुरुषों और महिलाओं में मोटापा बढ़ने का कारण मधुमेह और रक्तचाप जैसी बीमारी है। माना जाता है कि रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियों का कारण लोगों की बदलती जीवन शैली है। मोटापा, मधुमेह (डायबिटीज) और रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। सबसे पहला कारण तो यह है कि हरियाणा में जंकफूड का इस्तेमाल दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। 

जंकफूड का सेवन करने से शरीर और रक्तनलिकाओं में वसा का जमाव बढ़ता जा रहा है। इससे मोटापे के साथ-साथ रक्तचाप की समस्या बढ़ती जाती है। शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने से हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं और शरीर इंसुलिन का सही उपयोग नहीं कर पाता है। प्रदेश में जब जंकफूड का चलन नहीं था, तो लोग अपने घर में बना हुआ ताजा भोजन करते थे। इस भोजन में संतुलित तेल और घी का उपयोग किया जाता था। दूध-दही का सेवन भरपूर किया जाता था। 

संतुलित भोजन करने से स्त्री और पुरुष को डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और मोटापे की समस्या नहीं होती थी। लोग चुस्त दुरुस्त रहते थे। वह दिनभर मेहनत करते थे। जिसकी वजह से शरीर में गया वसा खर्च हो जाता था। पुरुष बाहर मेहनत करता था, तो महिलाएं घर का काम करती थीं। लेकिन जैसे-जैसे समाज बदला, खान-पान बदल  गए। लोगों की दिनचर्या बदल गई। पहले जहां लोग सुबह उठकर सैर करने जाते थे। उसके बाद खेतों में, कार्य स्थल पर खूब कड़ी मेहनत करते थे। 

उसके बाद समय में मिला तो लोग विभिन्न तरह के खेलों में भाग लेते थे। इससे उनके शरीर में विषाक्त तत्व निकल जाते थे और शरीर भी अच्छा बना रहता था। महिलाएं भी घर बाहर के काम करते हुए खूब परिश्रम करती थीं। लेकिन जैसे ही दिनचर्या बदली, कई तरह की परेशानियों ने शरीर में घर कर लिया। सुबह उठने की जगह सूरज निकलने पर उठने और देर रात तक जागने की आदत ने शरीर को रोगी बना दिया। शारीरिक श्रम से तो जैसे पीछा ही छुड़ा लिया गया। अब अगर पांच सौ मीटर दूर चलना है, तो लोग स्कूटर, कार पर जाते हैं। पैदल चलने की आदत ही नहीं रही। हरियाणा में नशीले पदार्थ के सेवन ने हालात को और भी ज्यादा खराब कर दिया। 

Sunday, May 31, 2026

भक्ति से ज्यादा महत्व सेवा का है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे धर्म ग्रंथों में सेवा को भक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण बताया गया है। कहते हैं कि समाज में उस व्यक्ति को ज्यादा सम्मान प्राप्त होता है, जो सेवा करता है। भक्ति करने वाला भी सम्मान का अधिकारी होता है, लेकिन सेवक और भक्त दोनों एक साथ हों, तो स्वाभाविक है कि सेवक को ज्यादा मान मिलेगा। 

इस संबंध में एक कथा है। कहते हैं कि किसी देश के राजा के दरबार में एक व्यक्ति ने एक सवाल पूछा कि राजन! किसी मनुष्य के जीवन में भक्ति और सेवा में किसका महत्व ज्यादा है? राजा और उनके दरबारी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए। राजा ने उस व्यक्ति से कहा कि आप मुझे कुछ दिन का समय दें, मैं विचार करके आपके सवाल का जवाब दूंगा। 

इस घटना को कुछ दिन बीत गए। एक दिन राजा अकेले ही घूमने के लिए निकल पड़ा। उसने अपने साथ किसी भी अंगरक्षक को नहीं लिया। संयोग से राजा रास्ता भटक गया। दिन भर भटकने के बाद उसे बहुत तेज प्यास लगी। तभी कुछ दूरी पर उसे एक संत की कुटिया दिखाई दी। वह किसी तरह वहां पहुंचा और ‘पानी-पानी’ कहते हुए राजा मुर्छित हो गया। संत ने उस समय समाधि लगा रखी थी। 

संत के कानों में ‘पानी-पानी’ की पुकार पड़ी तो उसकी समाधि टूट गई। संत ने तत्काल पानी लाकर राजा को पिलाया। राजा को जब होश  आया, तो उसे पता चला कि उसकी वजह से संत की समाधि भंग हो गई है। उसने कहा कि अब मुझे प्रायश्चित करना होगा। 

तब संत ने कहा कि आपको प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं है। मुझे आपको पानी पिलाने के बाद जो संतुष्टि मिली, वह समाधि लगाने के बाद भी नहीं मिलती। भक्ति करने से ज्यादा महत्वपूर्ण सेवा करना है। यह सुनकर राजा को उस व्यक्ति के सवाल का जवाब मिल गया।

अस्पताल गेट पर होने वाला प्रसव नारी गरिमा के साथ खिलवाड़

अशोक मिश्र

प्रकृति ने संतान को जन्म देने और वंश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी मादाओं को सौंपी है। हर मादा को प्रकृति द्वारा सौंपा गया यह गुरुतर दायित्व उसे महान बनाता है। प्रसव नर जीवों पर मादा द्वारा किया गया सबसे बड़ा एहसान है। विज्ञान कहता है कि जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती है, तो उसे 57 डेल दर्द (दर्द मापक इकाई) होता है। यह दर्द एक साथ बीस हड्डियों के टूटने के बराबर माना गया गया है। ऐसी स्थिति में अगर किसी महिला को प्रसव के दौरान उचित चिकित्सा सुविधा न मिले, तो कल्पना की जा सकती है कि उसने कितनी पीड़ा सही होगी। 

फरीदाबाद के सेक्टर तीन के प्रजनन एवं स्वास्थ्य शिशु केंद्र में 15-16 मई की रात एक महिला को अस्पताल के पार्किंग में बच्चे को जन्म देना पड़ा। परिजन जब गर्भवती स्त्री को लेकर अस्पताल पहुंचे थे, तो अस्पताल का गेट बंद था। पीड़ा बढ़ने पर मजबूरन स्त्री को प्रसव के लिए पार्किंग एरिया में ले जाना पड़ा और टार्च की रोशनी में उसकी सास ने प्रसव कराया। प्रसव होने के करीब आधे घंटे बाद स्टाफ नर्स और अन्य लोग पहुंचे। मां बनना हर स्त्री का सपना होता है। मातृत्व सुख से बढ़कर किसी स्त्री के लिए दूसरा कोई सुख नहीं होता है। 

ऐसी स्थिति में महिला को यदि पार्किंग के खुले वातावरण में प्रसव के लिए मजबूर होना पड़े, तो उसके लिए कितना कष्टकारक रहा होगा। उस स्त्री की गरिमा को तार-तार होना पड़ा। किसी भी लोकतांत्रिक देश में गर्भवती स्त्री को प्रसव के लिए तत्काल, सुरक्षित और गरिमापूर्ण चिकित्सा सुविधा उसका मानवीय अधिकार होता है। अस्पताल में कार्यरत नर्स और चिकित्सकों की लापरवाही के कारण महिला की गरिमा को क्षति पहुंची। अब मानवाधिकार आयोग ने इस मामले को लेकर सीएमओ को  नोटिस जारी करके स्पष्टीकरण मांगा है। 

हर बार की तरह इस मामले में भी कुछ दिन हो-हल्ला मचेगा, फिर सब कुछ शांत हो जाएगा, लेकिन जिस महिला को यह कष्ट झेलना पड़ा है, वह इस घटना को आजीवन नहीं भूल पाएगी। आमतौर पर देखा जाता है कि सरकारी अस्पतालों के बाहर प्रसव (डिलीवरी) होने और अव्यवस्था की स्थिति का मुख्य कारण रात के समय आपातकालीन सेवाओं में लापरवाही, चिकित्सा स्टाफ की कमी और उचित समन्वय का अभाव है। रात के समय अस्पतालों के आपातकालीन वार्ड या लेबर रूम भी बंद पाए जाते हैं।

 ऐसी स्थिति में जरूरत पड़ने पर जल्दी से गेट भी नहीं खुलता है जिसकी वजह से कई बार महिला को गेट पर ही या अस्पताल परिसर में ही कहीं खुले में प्रसव के लिए मजबूर होना पड़ता है। कई मामलों में मरीज को समय पर एम्बुलेंस तक नहीं मिल पाती है जिससे ऐसी स्थिति पैदा होती है। कई बार अंतिम समय में बड़े अस्पताल के लिए रेफर करने पर हालात विकट हो जाते हैं और अस्पताल आने-जाने के दौरान रास्ते में ही प्रसव हो जाता है।