बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
रवींद्रनाथ टैगोर केवल प्रख्यात कवि ही नहीं, बल्कि चित्रकार, संगीतकार और दार्शनिक थे। उनके परिवार में संगीतकार और उपन्यासकार भी थे। रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 9 मई 1871 को जोड़ासाकों ठाकुरबाड़ी में हुआ था। उनकी दो रचनाएं भारत में जन गण मन और बांग्लादेश में आमार सोनार बांग्ला राष्ट्रगान बनीं। रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबल पुरस्कार भी हासिल हुआ था।एक बार की बात है। एक शिष्य टैगोर के पास आया। वह बहुत ही चिंतित दिख रहा था। टैगोर ने अपने शिष्य से कहा कि तुम बहुत चिंतित दिखाई देते हो? क्या परेशानी है? मुझे बताओ, शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं। शिष्य ने कहा कि हां, गुरुदेव! मैं सचमुच बहुत दुखी हूं। रात भर मुझे नींद नहीं आती है।
चिंता की वजह से मेरा मन अशांत रहता है। समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? टैगोर ने कहा कि तुम बताओ, चिंतित क्यों हो? उस शिष्य ने कहा कि गुरुदेव, मेरे मन में हमेशा चिंतन-मनन चलता रहता है। कई बार मैं यह सोचकर परेशान हो जाता हूं कि जब इस संसार की समस्त आत्माओं को जीवन-मरण से छुटकारा मिल जाएगा, तब क्या होगा? यह पृथ्वी तो जीवन विहीन हो जाएगी?
टैगोर ने उसकी बात को ध्यान से सुना और फिर बोले, यह संसार असीमित है। परिवर्तन इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है। एक दिन पृथ्वी जीवन रहित हो जाएगी, ऐसा सोचना अज्ञानता है। तुम्हारा सवाल भविष्य से जुड़ा है। भविष्य में कब किसके साथ क्या होगा? इसके विषय में कौन बता सकता है। लोग भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान बरबाद कर लते हैं। व्यक्ति को अपने वर्तमान के बारे में सोचना चाहिए। यह सुनकर शिष्य संतुष्ट होकर चला गया।








