Tuesday, October 20, 2026

The Words of Mahatma Buddha Proved True


The Bodhi Tree

Ashok Mishra

Ananda was deeply saddened upon learning that the end of Gautama Buddha’s life was near. Ananda was not only the Buddha’s most beloved disciple but also his cousin. It is said that the Buddha and Ananda were born on the same day, in the same year, and into the same clan; they were of the same age. When Siddhartha renounced his worldly life, he was 29 years old. 

It took him six years thereafter to attain enlightenment. His cousin, Ananda, embraced the monastic life under the Buddha at the age of 37. This implies that when the Buddha passed away, Ananda was also eighty years old. With a heavy heart, Ananda approached the Buddha and asked, "After you are gone, from whom shall I seek wisdom? Who will show me the path forward?" 

A faint smile appeared on the Buddha’s face. In a tone filled with affection, he said, "You have been with me for forty years. If you have not attained wisdom by now, what could you possibly grasp even in forty lifetimes? Ananda, do not be foolish! Countless Buddhas have come before me, and many more will come in the future. Each will fulfill their purpose and depart from this world; nothing is permanent. 

Perhaps it is because of my presence that you have not yet attained enlightenment—my being here may have diminished your own capacity to learn. You might find it easier to learn under a new teacher. Yet, merely finding a teacher is not enough; you must transform yourself. Change yourself, and it is possible that you, too, may attain Buddhahood." Having said this, the Tathagata breathed his last. After the Buddha’s passing, Ananda attained supreme wisdom. The words of Mahatma Buddha proved true.

महात्मा बुद्ध का कथन सत्य साबित हुआ



बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध का अंतिम समय जानकर आनंद बहुत दुखी था। आनंद महात्मा बुद्ध का सबसे प्रिय शिष्य और चचेरा भाई भी था। कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध और आनंद का जन्म एक ही दिन और एक ही वर्ष में एक ही कुल में हुआ था। दोनों सम वयस्क थे। जब सिद्धार्थ ने गृहत्याग किया था, तब उनकी आयु 29 वर्ष की थी। गृह त्याग के बाद छह साल लगे थे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त करने में। चचेरे भाई आनंद ने 37 साल की अवस्था में बुद्ध से परिव्रज्या धारण की थी। 

इसका अर्थ यह निकलता है कि जब गौतम बुद्ध की मृत्यु हुई थी, तब आनंद भी अस्सी साल के हो चुके थे। आनंद बहुत दुखी मन से बुद्ध के पास आए और बोले, आपके जाने के बाद मैं किससे ज्ञान प्राप्त करूंगा? कौन मुझे आगे का रास्ता दिखाएगा। आनंद की बात सुनकर बुद्ध के चेहरे पर क्षीण मुस्कान उभर आई। वह स्नेह सिक्त स्वर में बोले, चालीस साल से तू मेरे साथ है। अब तक तुझे ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, तो चालीस जन्मों में भी तुझे क्या समझ में आएगा। 

आनंद! पागल मत बनो। मुझसे पहले न जाने कितने बुद्ध आए। आगे भी अनेक बुद्ध आएंगे। सब अपना अपना काम करेंगे और इस दुनिया से चले जाएंगे। कोई स्थायी तो रहेगा नहीं। आनंद हो सकता है कि तू मेरी वजह से अब तक ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका है। 

मेरे होने से तेरे सीखने की क्षमता क्षीण हो गई हो। नया गुरु मिलेगा, तो तू आसानी से सीख सकता है। गुरु का मिलना ही पर्याप्त नहीं है, बदलना जरूरी है। तू अपने को बदल। हो सकता है कि तू बुद्धत्व प्राप्त कर ले। इतना कहकर तथागत ने अंतिम सांस ली। बुद्ध के जाने के बाद आनंद ने परम ज्ञान प्राप्त किया। महात्मा बुद्ध का कथन सत्य साबित हुआ।

विजयादशमी की सीख: विजय बाहरी नहीं, आंतरिक होती है

अशोक मिश्र

विजयादशमी भारतीय संस्कृति और परंपरा का वह पर्व है जो केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के गहन मूल्यों का प्रतीक है। विजयादशमी  भारतीय चेतना का वह शाश्वत स्वर है जो हर युग में हमें याद दिलाता है कि अंधकार चाहे कितना भी घना क्यों न हो, प्रकाश की एक लौ उसे चीर ही देती है। आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को जब हम रावण के विशाल पुतले को अग्नि को समर्पित होते देखते हैं, तो वह दृश्य केवल एक पौराणिक कथा का मंचन नहीं होता। वह हमारे भीतर के द्वंद्व का प्रतीक है। 

यह दिन बुराई पर अच्छाई की विजय, अधर्म पर धर्म की जीत और अज्ञान पर ज्ञान की स्थापना का स्मरण दिलाता है।  विजयादशमी हमें सिखाती है कि विजय बाहरी नहीं, आंतरिक होती है। जब हम सत्य के पथ पर चलते हैं, दूसरों के प्रति करुणा रखते हैं और अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं, तभी सच्ची विजयादशमी मनाई जा सकती है।  राम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं, वह मर्यादा के प्रतीक हैं। रावण केवल लंका का राजा नहीं, वह अहंकार है। यह युद्ध केवल त्रेता में नहीं लड़ा गया, यह हर दिन, हर मनुष्य के भीतर लड़ा जाता है। 

लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या के दस मुखों वाला रावण आज भी हमारे भीतर जीवित है। उसे जलाने के लिए बाहर के किसी अग्निबाण की नहीं, भीतर के विवेक की आवश्यकता है। विजयादशमी का दूसरा नाम शक्ति की उपासना का समापन भी है। नौ दिनों तक हमने आदिशक्ति की आराधना की। दसवें दिन उसी शक्ति के विजयिनी रूप का उत्सव मनाया। यह संयोग नहीं कि शस्त्र-पूजन और विद्या-पूजन इसी दिन होता है। 

हमारे ऋषियों ने बहुत पहले समझ लिया था कि शक्ति यदि विवेकहीन हो तो वह विनाश है, और विवेक यदि शक्तिहीन हो तो वह पलायन है। विजयादशमी शक्ति और विवेक के समन्वय का पर्व है। रामायण में भगवान राम द्वारा रावण के वध की कथा हो या देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार, दोनों ही कथाएँ हमें यही संदेश देती हैं कि सत्य और न्याय अंतत: विजयी होते हैं, भले ही मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो। आज के समय में विजयादशमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। 

जब सोशल मीडिया पर असत्य का शोर सत्य से अधिक तेज हो, जब सुविधा की दौड़ में संबंध पीछे छूट रहे हों, जब सफलता को ही एकमात्र मूल्य मान लिया गया हो, तब राम का जीवन हमें धीरज सिखाता है। यह पर्व सिखाता है कि विजय धैर्य माँगती है, अनुशासन माँगती है, और सबसे बढ़कर चरित्र माँगती है। शक्ति का सही उपयोग सेवा और रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि दमन के लिए। दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के साथ शक्ति का स्मरण बना रहता है कि नारी शक्ति समाज की आधारशिला है। विजयादशमी पर हम केवल पुतला न जलाएं, एक संकल्प लें। अपने भीतर के किसी एक रावण को पहचानें और उसे छोड़ने का साहस करें। किसी एक अच्छाई को अपना शस्त्र बनाएं।

Monday, October 19, 2026

don't expect help from anyone

bodhi tree

Ashok Mishra

When Gautam Buddha realized that his death was near, he thought of giving his last sermon to his disciples. Anyway, at the age of eighty the body had become quite weak. Consuming Sukar Maddava was causing stomach ache, dysentery and bleeding. In such a situation, even if any normal person was there, he could have imagined the future apprehension. All the disciples became alert to listen to the last message of Buddha. 

First he preached to the householders. He said in a weak voice that you people should always follow the path of religion. Religion teaches us to live within limits. Religion teaches discipline. Just like a river without a bank becomes unruly. She destroys herself and everyone else, similarly, without being bound by the limits of religion, he destroys himself and others. 

Household disciples, believe in yourself. Don't expect help from anyone else. By believing in yourself, knowledge will blossom in your heart. You become your own lamp. You will not need anyone's orders or instructions. May you be a lamp. No incarnation will come to teach you the right path. You have to find your own way. 

After this he told the separated that you should never live together for more than two days. Never stay at one place for more than three days. The life of a true monk is made for lifelong tourism. Keep sharing whatever good things you have. Your duty is to inspire people to follow the path of religion. Don't get distracted from your work. After this Mahatma Buddha closed his eyes forever.

किसी से सहायता की अपेक्षा मत करना

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ने जब यह समझ लिया कि अब उनकी मृत्यु निकट ही है, तब उन्होंने अपने शिष्यों को अंतिम उपदेश देने की बात सोची। वैसे भी अस्सी साल की आयु में शरीर काफी क्षीण हो चुका था। सूकर मद्दव को ग्रहण करने से पेट दर्द, पेचिस और रक्तस्राव हो रहा था। ऐसी स्थिति में कोई भी सामान्य इंसान होता तो भी वह भावी आशंका की कल्पना कर सकता था। सारे शिष्य बुद्ध का अंतिम संदेश को सुनने के लिए सतर्क हो गए। 

पहले उन्होंने गृहस्थों को उपदेश दिया। उन्होंने क्षीण आवाज में कहा कि आप लोग हमेशा धर्म का मार्ग पकड़े रहना। धर्म मर्यादा में रहना सिखाता है। धर्म अनुशासन सिखाता है। जैसे कोई बिना तट की सरिता उच्छृंखल हो जाती है। वह अपना और सबका विनाश करती है, वैसे ही बिना धर्म की मर्यादा में बंधे वह अपना और दूसरों का नुकसान करता है। 

गृहस्थ शिष्यों अपने ऊपर विश्वास करो। किसी दूसरे की सहायता की अपेक्षा मत करो। अपने ऊपर विश्वास करने से तुम्हारे हृदय में ज्ञान का प्रस्फुटन होगा। तुम अपना दीपक खुद बनो। तुम्हें किसी के आदेश-निर्देश की आवश्यकता नहीं होगी। अप्प दीपो भव। कोई अवतार नहीं आएगा, तुम्हें सत्मार्ग की शिक्षा देने। तुम्हें अपना रास्ता खुद ही खोजना होगा। 

इसके बाद उन्होंने विरक्तों से कहा कि तुम एक साथ दो से ज्यादा कभी साथ मत रहना। तीन दिन से ज्यादा एक स्थान पर कभी मत ठहरना। सच्चे साधु का जीवन आजीवन पर्यटन के लिए बना है। जो अच्छी बातें हैं, वह बांटते चले। लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना ही तुम्हारा कर्म है। अपने कर्म से विचलित मत होना। इसके बाद महात्मा बुद्ध ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद ली।

धार्मिक आयोजनों में मची भगदड़ के लिए अव्यवस्था जिम्मेदार

अशोक मिश्र

कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में हुई भगदड़ ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। उन्नीस निर्दोष जिंदगियां असमय काल कवलित हो गईं। इनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। यह लोग मां दुर्गा से अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर आए थे, लेकिन व्यवस्थागत भारी चूक ने इन्हें मौत की नींद सुला दिया। भारी बारिश, भीड़ का अचानक दबाव, संकरी निकासी और कुप्रबंधन ने उत्सव को त्रासदी में बदल दिया। हर साल कोई न कोई हादसा होता है, कभी कुंभ में, कभी मंदिर की सीढ़ियों पर, कभी जागरण में, कभी दुर्गा पूजा पंडाल में जमा भीड़ हादसे का शिकार होती है। ऐसी घटनाओं की एक लंबी सूची है।  

भारत में धार्मिक आयोजनों का पैमाना बहुत बड़ा होता है। लाखों श्रद्धालु आस्था के आवेश में एकत्र होते हैं। पंडाल, मेले या तीर्थ स्थलों पर अस्थायी व्यवस्थाएं होती हैं, जहां प्रवेश-निकास के रास्ते अक्सर संकरे और अपर्याप्त होते हैं। ऐसे अवसरों पर भक्तों में अनुशासन की कमी और सुरक्षा नियमों की अनदेखी आम बात है।  प्रशासन भी धर्म के मामले में सख्ती बरतने से बचता है, क्योंकि कहीं आस्था पर चोट का आरोप न लग जाए। परिणामस्वरूप लाखों लोग एक संकरी गली में, एक छोटे पंडाल में, एक ही समय में प्रवेश करने लगते हैं और एक छोटी सी अफवाह, एक फिसलन, एक बिजली जाने की घटना पूरे जनसमूह को भगदड़ में बदल देती है। 

इस बात में कोई दम नहीं है कि ऐसे हादसे केवल धार्मिक आयोजनों में ही होते हैं।  भगदड़ या भीड़ संबंधी हादसे सिर्फ धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं हैं। फुटबॉल मैचों, संगीत समारोहों, राजनीतिक रैलियों, शॉपिंग मॉल या यहां तक कि स्कूल कॉलेज के कार्यक्रमों में भी ऐसी घटनाएं दुनिया भर में होती रहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि स्टेडियम और रेलवे स्टेशनों पर भी ऐसी ही त्रासदियां हुई हैं। समस्या आस्था की नहीं, अव्यवस्था की है। अगर किसी राजनीतिक रैली या फिल्मी स्टार के शो में इतनी ही भीड़ हो और व्यवस्थाएं कमजोर हों, तो वहां भी ऐसा हादसा हो सकता है और कई बार ऐसे हादसे हुए भी हैं। 

मूल कारण व्यवस्थागत लापरवाही है। अपर्याप्त पुलिस बल, संकरी राहें, गलत घोषणाएं और आपात स्थिति के लिए तैयारी की कमी है। जब व्यवस्था ही श्रद्धालुओं या समर्थकों की संख्या के हिसाब से नहीं बनाई गई, तो दोष श्रद्धा या  समारोह पर डाल देना प्रशासन की जवाबदेही से बचना है।  वास्तव में हमें आस्था या आयोजन के प्रकार पर दोष मढ़ने के बजाय व्यवस्था सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। भक्ति तभी पूर्ण होती है जब भक्त सुरक्षित घर लौटे। अगर पंडाल की सुंदरता के साथ-साथ उसकी सुरक्षा भी उतनी ही चर्चित होने लगे, तभी हम कह पाएंगे कि हमने उन उन्नीस लोगों की मौत से कुछ सीखा है। कोलकाता की शनिवार रात हुई घटना ने फिर याद दिलाया है कि उत्सव की खुशी तभी सार्थक है जब हर जीवन सुरक्षित रहे। आस्था को सम्मान देते हुए सुरक्षा को सर्वोपरि रखना ही सही रास्ता है।


Sunday, October 18, 2026

It Is Not Right to Disappoint a Seeker

Bodhivriksha

Ashok Mishra

According to Buddhist texts and historical evidence, Gautama Buddha passed away (attained Mahaparinirvana) in 483 BCE in Kushinagar (Kushinara) at the age of 80. Buddhist scriptures (such as the Mahaparinirvana Sutta) recount that during his travels, in the city of Pava, a blacksmith named Chunda offered a meal to Gautama Buddha. 

This meal included a specific dish known as 'sukara-maddava'. Following this meal, the Buddha began to suffer from dysentery, abdominal pain, and internal bleeding, which ultimately led to his death. Some scholars suggest that 'sukara-maddava' was not pork, but rather a type of mushroom that had become toxic. It is said that as the Buddha’s health deteriorated, his accompanying disciples grew deeply concerned. Ananda tended to him, yet his condition did not improve. 

Meanwhile, upon learning of the Buddha’s state, many people rushed to Kushinagar, and a large crowd gathered. Among them was a seeker named Subhadra, who had traveled a great distance hoping to find answers to his lingering doubts. He asked Ananda about the Buddha and requested an audience with him. Ananda explained the situation to Subhadra and declined his request to meet the Buddha. 

From within his hut, the Buddha overheard this exchange. He called for Ananda and remarked that it was not right to let any seeker leave in disappointment while he was still alive. Upon learning this, Subhadra decided it would not be appropriate to meet the Buddha. He paid silent homage to the Buddha’s greatness and, without hearing any formal teachings, went to sit among a group of wandering ascetics.

किसी जिज्ञासु को निराश करना उचित नहीं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध ग्रंथों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, गौतम बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) 483 ईसा पूर्व में कुशीनगर (कुशीनारा) में 80 वर्ष की आयु में हुई थी। बौद्ध ग्रंथों (जैसे महापरिनिर्वाण सुत्त) के अनुसार, अपनी यात्रा के दौरान पावा नगर में 'चुंद' नामक लोहार ने गौतम बुद्ध को भोजन कराया था। इस भोजन में 'सूकर-माद्दव' नामक एक विशेष खाद्य पदार्थ था। 

इस भोजन के बाद महात्मा बुद्ध को पेचिश, पेट में दर्द और रक्तस्राव होने लगा था जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि सूकर माद्दव सुअर का मांस नहीं बल्कि मशरूम था जो विषैला हो गया था। कहा जाता है कि जब गौतम बुद्ध की तबीयत बिगड़ गई तो उनके साथ चल रहे तमाम शिष्य चिंतित हो उठे। आनंद ने उनकी सेवा-सुश्रुषा की, इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे। 

इस बीच जिसको भी गौतम बुद्ध के बारे में पता चला, वह भागता हुआ कुशीनगर पहुंचा। एक भारी भीड़ जमा हो गई। तभी एक जिज्ञासु सुभद्र बहुत दूर से चलकर अपनी कुछ शंकाओं के समाधान के लिए वहां पहुंचा। उसने आनंद से गौतम बुद्ध के बारे में पूछा और मिलने की विनती की। आनंद ने सुभद्र को सारा हाल कह सुनाया और बुद्ध से मिलाने से इंकार कर दिया। कुटिया के भीतर बुद्ध यह वार्तालाप सुन रहे थे। 

उन्होंने आनंद को बुलाया और कहा कि मेरे जीवित रहते किसी जिज्ञासु को निराश होकर यहां से जाने देना ठीक नहीं है। सुभद्र ने जब यह जाना तो उसने गौतम बुद्ध से मिलना उचित नहीं समझा। उसने बुद्ध की महानता को मन ही मन प्रणाम किया और बिना कुछ उपदेश सुने ही वह परिव्राजकों की शिष्ट टोली में जाकर बैठ गया।

लोकतंत्र में रिजीम चेंज शब्द पर नहीं, इरादे पर बहस होनी चाहिए

अशोक मिश्र

रिजीम चेंज को लेकर इन दिनों देश की सियासत गरम है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर वार-पलटवार कर रहे हैं। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। हर बार यह सवाल बड़े जोरशोर से उठाया जाता है कि क्या किसी सरकार को बदलने की बात करना, उसकी वकालत करना या खुलेआम इसकी मांग करना लोकतंत्र में गुनाह है। इस शब्द के इर्द-गिर्द इतना शोर इसीलिए मचा हुआ है क्योंकि इसके दो बिल्कुल अलग अर्थ एक साथ चल रहे हैं। विपक्ष इसे लोकतंत्र की सबसे स्वाभाविक प्रक्रिया मानता है। 

उसका तर्क  सीधा है कि चुनाव, आंदोलन, आलोचना, अविश्वास प्रस्ताव, ये सब रिजीम चेंज के ही संवैधानिक औजार हैं। अगर सरकार अच्छा काम नहीं कर रही है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या संवैधानिक संस्थाओं को अपने प्रभाव में लेकर काम कर रही है,तो विपक्ष का काम ही है जनता के सामने विकल्प रखना और कहना कि इस रिजीम को बदलो। इस अर्थ में रिजीम चेंज कहना न तो असंवैधानिक है, न राष्ट्र-विरोधी। यह तो मतदाता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। लोकतंत्र में कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती, सत्ता बदलना ही लोकतंत्र की आत्मा है। जब सत्ता पक्ष ही हर आलोचना को रिजीम चेंज की साजिश बताकर देशद्रोह के खांचे में डाल देता है, तो वह दरअसल असहमति को ही अपराध बना रहा होता है। 

दूसरा पक्ष, जो आमतौर पर सत्ता में होता है, इस शब्द को एक अलग ही नजरिये से देखता है। उसका तर्क  है कि रिजीम चेंज का मतलब ही भू-राजनीति में बदलाव है। जब यह कहा जाता है कि फलां देश में रिजीम चेंज होना चाहिए, तो इसका इतिहास विदेशी हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंधों और अस्थिरता से जुड़ा रहा है। जब देश में कुछ नेता या समूह उसी शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, तो आशंका पैदा होती है कि क्या यह सिर्फ चुनावी नारा है या बाहरी ताकतों से सहानुभूति और आंतरिक अस्थिरता को न्योता देना है। 

चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की बात से देश की साख, निवेश का माहौल और संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है। जनता ने पांच साल के लिए जनादेश दिया है, उसे रोज-रोज की बयानबाजी से कमजोर करना जनादेश का अपमान है। सच इन दोनों अतियों के बीच कहीं है। रिजीम चेंज की बात करना बुरा नहीं है, बुरा हो सकता है उसका तरीका और उसकी मंशा। अगर यह बात वोट की चोट से, संवैधानिक दायरे में, बेहतर नीति और बेहतर नेतृत्व का वादा लेकर कही जा रही है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करती है। 

यही तो विपक्ष का धर्म है। लेकिन अगर यह बात संस्थाओं को ध्वस्त करके, अफवाह, हिंसा या विदेशी मंचों पर जाकर देश को कठघरे में खड़ा करके कही जा रही है, तो यह चिंता का विषय बन जाती है। सवाल यह होना चाहिए कि उसके पीछे का रास्ता क्या सुझाया गया है-बैलेट का या किसी और चीज का। लोकतंत्र में शब्द नहीं, इरादे पर बहस होनी चाहिए।

Saturday, October 17, 2026

The Celestial Maiden Said, You Are a Thief of Fragrance

Bodhivriksha

Ashok Mishra

Mahatma Buddha always endeavored to ensure that none of his actions or behaviors caused distress to anyone. He sought to set an example for society through his exemplary conduct. Nevertheless, there were times when he, too, would inadvertently commit an error. Whenever someone pointed out such a mistake, he would express his gratitude. 

Once, while he was meditating by the side of a lotus pond, a cool, fragrant breeze—carrying the scent of the lotus blossoms—wafted toward him. He was deeply absorbed in meditation, feeling a profound sense of joy and spiritual immersion. At that moment, a celestial maiden appeared by the pond. She remarked to Gautama Buddha, "You did not seek permission from the owner of the pond to enjoy the fragrance of these lotuses. By inhaling this scent without consent, you are, in effect, stealing it. You are a 'thief of fragrance'."


 Before Buddha could respond, a village girl arrived, stepped into the pond, began plucking the lotus flowers, and muddied the water. Buddha observed, "That village girl has soiled the entire pond and damaged the flowers; yet, you stand there silently, while accusing me of being a 'thief of fragrance'." The celestial maiden replied, "You are a highly respected figure in society—a man well-versed in the Dharma and the principles of righteous conduct. 

That girl, however, is naive and uneducated; she lacks such knowledge, and therefore, her transgression is forgivable. But for someone like you—who understands the principles of righteousness—to act in such a manner is not excusable." Hearing this, Buddha bowed his head in shame. He apologized to the celestial maiden and promised never to repeat such a mistake.