Thursday, October 22, 2026

Why are you eating dirty rice, my child?


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Critics have noted that one of the greatest strengths of Buddhism is its emphasis on the purification of the self. Once an individual achieves this inner purification, they become free from various afflictions—such as envy, malice, attachment, violence, and lust. They learn to value other human beings. 

Perhaps this is why Buddhism flourished so extensively, both within the country and abroad. It was embraced by kings and commoners alike, as it advocates for equality. There is a story about Sariputra. Once, while he was traveling—as Buddhist monks typically did, on foot—he noticed a fisherman’s child picking up and eating grains of rice scattered on the ground. 

Seeing this caused Sariputra great distress. He was, by nature, exceptionally compassionate and guileless; he would even apologize to others when he had committed no fault. It is for this reason that the Buddhist community bestowed upon him the title of 'Dhamma Senapati' (General of the Dhamma). 

He asked the child, "My child, why are you picking up and eating this dirty rice from the ground?" The boy replied, "Respected one, my father is unable to provide for me; he is extremely poor. That is why I am forced to gather and eat rice found on the path." Sariputra asked, 

"Will you come with me? There, you will have food to eat and also get to hear teachings." The boy exclaimed, "That would make my life truly meaningful!" Sariputra brought the child to the Sangha, where he was bathed and given a meal. The boy remained there and made it his home. In time, through his talent and dedication, he attained the status of an Arihant.

तुम गंदे चावल क्यों खा रहे हो, वत्स?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी खूब समालोचकों ने यह बताई है कि वह आत्म शुद्धि को प्रधान मानता है। जब आदमी की आत्म शुद्धि हो जाती है, तो वह कई प्रकार के विकारों से मुक्त हो जाता है। वह ईर्ष्या, द्वेष, राग-अनुराग, हिंसा और काम वासना जैसे विकारों से मुक्त हो जाता है। वह दूसरे इंसानों की कद्र करना सीख जाता है। शायद यही वजह है कि देश-विदेश में बौद्ध धर्म काफी फला फूला। 

इसे राजाओं के साथ-साथ प्रजा ने भी अपनाया क्योंकि बौद्ध धर्म समानता की बात करता है। सारिपुत्र की एक कथा है। एक बार वह कहीं जा रहे थे। बौद्ध भिक्षु सामान्य अवस्था में पैदल ही यात्रा करते थे। रास्ते में सारिपुत्र ने देखा कि मछुआरे का बच्चा रास्ते में पड़े हुए चावल के दानों को बीन बीन कर खा रहा है। यह दृश्य देखकर सारिपुत्र को बहुत पीड़ा हुई। वैसे भी सारिपुत्र काफी दयालु और निष्कपट थे। वह गलती न होने पर भी लोगों से क्षमा मांग लिया करते थे। यही वजह है कि बौद्ध समाज ने उन्हें धम्म सेनापति की उपाधि दे रखी थी। 

उन्होंने उस बच्चे से पूछा, वत्स! रास्ते में पड़े हुए गंदे चावल को बीन-बीनकर क्यों खा रहे हो। उस बच्चे ने जवाब दिया कि मान्यवर! मेरे पिता मेरा पालन पोषण नहीं कर सकते हैं। वह अत्यंत निर्धन हैं। इस वजह से मुझे रास्ते में पड़े चावल को बीनकर खाना पड़ रहा है। 

सारिपुत्र ने कहा कि क्या तुम मेरे साथ चलोगे। वहां तुम्हें खाना मिलेगा और उपदेश भी सुनने को मिलेगा। वह लड़का बोला, इससे तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा। सारिपुत्र उस बच्चे को लेकर संघ में आए और उसको नहलाने धोने के बाद खाना दिया। वह बच्चा वहीं रहने लगा। आगे चलकर उसने अपनी प्रतिभा और तपस्या से अरिहंत की पदवी पर पहुंच गया।

पंजाब-हरियाणा को मिलकर नशे के खिलाफ चलाना होगा अभियान

अशोक मिश्र

इन दिनों पंजाब में नशीले पदार्थों का विरोध करने वाले तीन लोगों की हत्या का मामला काफी गरमाया हुआ है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विजयादशमी के दिन कहा कि पंजाब में चिट्टा दहन होगा। ड्रग माफिया को पंजाब में सरकार बनने के बाद खोज निकालेंगे। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी गाहे-बगाहे पंजाब में बिकने वाले नशीले पदार्थों को लेकर मान सरकार पर हमलावर रहते हैं। सच कहा जाए, तो नशीले पदार्थों की वजह से पंजाब और हरियाणा दोनों परेशान हैं। पंजाब और हरियाणा में नशे का कारोबार लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी समस्या बना हुआ है। 

पंजाब विशेष रूप से समस्या के केंद्र में रहा है। यह पाकिस्तान के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। गोल्डन क्रिसेंट रूट से आने वाले हेरोइन के मुख्य प्रवेश मार्गों में से एक है।  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार पंजाब ड्रग तस्करी के मामलों में देश में सबसे आगे रहा है। अफगानिस्तान में उत्पादित हेरोइन और अफीम का एक बड़ा हिस्सा तस्करी के जरिए पंजाब आता है। यह वही रास्ता है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्डन क्रिसेंट रूट कहा जाता है। ड्रोन, पाइपलाइन, नदी के रास्ते और सीमा पार सुरंगों जैसे नए तरीकों से पिछले कुछ सालों में तस्करी के तरीके और ज्यादा संगठित हुए हैं। 

एक बार पंजाब में दाखिल होने के बाद नशीले पदार्थों की खेप का एक हिस्सा स्थानीय खपत में चला जाता है। इसका एक बड़ा हिस्सा हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल और राजस्थान की तरफ भेज दिया जाता है। हरियाणा इस पूरे नेटवर्क में सिर्फ एक ट्रांजिट रूट नहीं रहा, बल्कि पिछले आठ-दस सालों में खुद एक बड़ा बाजार बन गया है। सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, अंबाला, पानीपत, कुरुक्षेत्र और पंचकूला जैसे जिले हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों के हॉटस्पॉट बने हुए हैं। 

हरियाणा राज्य नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अध्ययनों से पता चलता है कि यहां विभिन्न राज्यों से गांजा, चरस, अफीम, पोस्ता भूसी और सिंथेटिक ड्रग्स पहुंचते हैं। हाल के वर्षों में हरियाणा में भी एनडीपीएस अधिनियम के तहत हजारों मामले दर्ज हुए हैं। सैकड़ों किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं। राज्य पुलिस ने दर्जनों ड्रग कारोबारियों की पहचान की है। डार्क वेब तथा क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े लेन-देन पर भी नजर रखी जा रही है। दोनों राज्यों में यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य, परिवारों की बर्बादी और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाला संकट है। 

बेरोजगारी, सीमा की भौगोलिक स्थिति और संगठित गिरोहों की सक्रियता ने इस कारोबार को बनाए रखा है। पंजाब और हरियाणा दोनों ही इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र और पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं ताकि आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ा जा सके और नशे की लत से प्रभावित लोगों के पुनर्वास पर भी ध्यान दिया जा सके।

Wednesday, October 21, 2026

A Brahmin Strikes Sariputra on the Back

Bodhivriksha

Ashok Mishra

Mahatma Sariputra (or Sariputta) was one of the two foremost disciples of Gautama Buddha, distinguished above all others for his profound wisdom. In the Buddhist tradition, he held the title of 'Dhamma-senapati' (General of the Dhamma). He lived in the kingdom of Magadha in ancient India (near present-day Nalanda in Bihar) around the 6th or 5th century BCE. 

His original name was Upatissa; he came to be known as 'Sariputra' (son of Sari) because his mother’s name was Sari—or Rupsari. His closest friend was Mahamaudgalyayana (Moggallana), who also became one of the Buddha’s two primary male disciples. It is said that both were initially followers of an ascetic named Sanjaya. Later, influenced by the teachings of Assaji—a disciple of the Buddha—they both joined the Sangha of Gautama Buddha. 

Mahatma Sariputra attained Parinirvana (passed away) shortly before the Buddha himself. His relics are preserved within the Sanchi Stupa. Once, as Sariputra was walking somewhere, a Brahmin followed him and struck him forcefully on the back. Sariputra did not look back; he simply continued on his way. Seeing this, the Brahmin felt deep remorse and asked for forgiveness. Sariputra inquired, "For what are you seeking my forgiveness?" 

The Brahmin replied, "I struck you on the back." Sariputra responded, "I have suffered no harm from this, so why do you ask for forgiveness?" The Brahmin said, "That is a testament to your greatness, but I shall only find peace if you grant me your forgiveness." Sariputra replied, "I have forgiven you." The Brahmin then added, "I will truly find peace only if you agree to come to my home." Sariputra said, "If this is what brings you contentment, then so be it." Sariputra went to the Brahmin's house. The Brahmin welcomed him with great hospitality.

ब्राह्मण ने सारिपुत्र की पीठ पर मारा मुक्का

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा सारिपुत्र या सारिपुत्त गौतम बुद्ध के दो सबसे प्रमुख और ज्ञान में अग्रगण्य शिष्यों में से एक थे। उन्हें बौद्ध परंपरा में 'धम्म-सेनापति' की उपाधि प्राप्त थी। प्राचीन भारत के मगध राज्य (वर्तमान बिहार में नालंदा के पास) में लगभग छठी या पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ था। उनका वास्तविक नाम उपतिस्स था। उन्हें सारिपुत्र इसलिए कहा जाता था क्योंकि उनकी माता का नाम शारी या रूपसारी था। 

उनके परम मित्र महामौदगल्यायन (मोग्गल्लान) थे, जो बुद्ध के दूसरे प्रमुख पुरुष शिष्य बने। कहा जाता है कि पहले वे दोनों संजय नामक एक संन्यासी के अनुयायी थे। बाद में बुद्ध के शिष्य 'अस्जित' के उपदेश से प्रभावित होकर ये दोनों गौतम बुद्ध के संघ में शामिल हो गए थे। महात्मा सारिपुत्र का परिनिर्वाण (देहावसान) गौतम बुद्ध से कुछ समय पहले ही हो गया था। 

उनकी अस्थियाँ सांची स्तूप में सुरक्षित रखी गई हैं। एक बार की बात है। सारिपुत्र कहीं जा रहे थे। उनके पीछे एक ब्राह्मण चला आ रहा था। उस ब्राह्मण ने सारिपुत्र की पीठ पर बहुत जोर का मुक्का मारा। सारिपुत्र ने पीछे नहीं देखा। वह आगे चलते रहे। उनके इस व्यवहार पर वह ब्राह्मण बहुत पछताया। उसने उनसे क्षमा मांगी। सारिपुत्र ने उससे पूछा कि आप मुझसे किस बात की क्षमा मांग रहे हैं। 

ब्राह्मण ने कहा कि मैंने आपको मुक्का मारा है। सारिपुत्र बोले कि इससे मेरा कुछ तो बिगड़ा नहीं, तो फिर किस बात की क्षमा मांग रहे हो। ब्राह्मण ने कहा कि यह आपकी महानता है, लेकिन मुझे संतोष तब मिलेगा, जब आप मुझे क्षमा कर देंगे। सारिपुत्र ने कहा कि मैंने आपको क्षमा कर दिया। ब्राह्मण ने कहा कि मुझे संतोष तब मिलेगा, जब आप मेरे घर चलेंगे। सारिपुत्र ने कहा कि यदि तुम्हें इससे ही संतोष मिलता है, तो ऐसा ही सही। सारिपुत्र उस ब्राह्मण के घर गए। उसने उनका खूब सत्कार किया।

संगठित अपराध के लिए सख्त कानूनों की सबसे ज्यादा जरूरत

अशोक मिश्र

मुंबई में 18 अक्टूबर को अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलीबारी हुई। घटना के बाद लारेंस गैंग से जुड़े अनिल पंडित ने जिम्मेदारी लेने वाले आॅडियो जारी किए। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि जेल की सलाखों के पीछे बैठे व्यक्ति का नेटवर्क कैसे सक्रिय रहता है। लॉरेंस बिश्नोई गुजरात की साबरमती सेंट्रल जेल की हाई सिक्योरिटी सेल में कई वर्षों से बंद है। गृह मंत्रालय के आदेश के तहत उसे जेल परिसर से बाहर नहीं निकाला जा सकता है। सभी पूछताछ या कोर्ट की पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही होती है। फिर भी उसका नाम बार-बार हत्या, धमकियों और हमलों में सामने आता रहता है। ऐसा क्यों होता है? 

जांच एजेंसियों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गैंग का दैनिक संचालन अब एक तरह की शैडो कैबिनेट के जरिए हो रहा है। इसमें टायसन बिश्नोई, अनिल पंडित, हरि बॉक्सर, हरमन संधू और हिमांशु सोनीपत जैसे सहयोगी शामिल बताए जाते हैं। ये लोग अमेरिका, कनाडा और यूरोप के विभिन्न ठिकानों से एन्क्रिप्टेड ऐप्स जैसे सिग्नल, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम के माध्यम से स्थानीय शूटरों को निर्देश देते हैं। 

अमेरिकी न्याय विभाग ने अपनी चार्जशीट में इसे 'बिश्नोई आॅर्गनाइज्ड क्राइम ग्रुप' कहा है और बताया है कि यह अब एक इंटरनेशनल क्राइम सिंडिकेट में बदल चुका है। इस सिंडिकेट का सबसे ताजा और चौंकाने वाला चेहरा है अनिल पंडित। पानीपत का रहने वाला यह 32 साल का गैंगस्टर इन दिनों अमेरिका के कैलिफोर्निया में बैठकर दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक एक्सटोर्शन सिंडिकेट आॅपरेट कर रहा है। बिश्नोई जेल में तस्करी से लाए गए मोबाइल और वीओआईपी उपकरणों के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हत्या, वसूली, ड्रग तस्करी और अन्य अपराधों का निर्देशन करता रहता है। 

इसका नेटवर्क भारत के कई राज्यों में फैला हुआ है। इसमें सैकड़ों शार्पशूटर बताए जाते हैं। विदेश में रह रहे सहयोगी छात्र वीजा या अन्य रास्तों से युवाओं की भर्ती, हथियारों की सप्लाई और धन हस्तांतरण की व्यवस्था करते हैं। अमेरिका या कनाडा में बैठा हैंडलर सोशल मीडिया पर धमकी भरी पोस्ट डालता है, भारत में बैठे लोकल शूटर को टारगेट और हथियार का लोकेशन व्हाट्सएप या सिग्नल पर भेजा जाता है, और फिरौती न देने पर दिनदहाड़े फायरिंग करवा दी जाती है। पैसे का लेनदेन हवाला और क्रिप्टो के जरिए होता है ताकि ट्रेस न हो सके। 

सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती सिर्फ जेल के अंदर की निगरानी बढ़ाने की नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से इस पूरे ट्रांसनेशनल नेटवर्क को तोड़ने की है। कानूनी प्रक्रिया को तेज और मजबूत बनाना होगा। गवाह अक्सर डर की वजह से मुकर जाते हैं, इसलिए गवाह सुरक्षा कार्यक्रम को जमीन पर लागू करना, कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से गवाही, और संगठित अपराध के लिए मकोका जैसे सख्त कानूनों के तहत चार्जशीट को मजबूत बनाना जरूरी है। 

Tuesday, October 20, 2026

The Words of Mahatma Buddha Proved True


The Bodhi Tree

Ashok Mishra

Ananda was deeply saddened upon learning that the end of Gautama Buddha’s life was near. Ananda was not only the Buddha’s most beloved disciple but also his cousin. It is said that the Buddha and Ananda were born on the same day, in the same year, and into the same clan; they were of the same age. When Siddhartha renounced his worldly life, he was 29 years old. 

It took him six years thereafter to attain enlightenment. His cousin, Ananda, embraced the monastic life under the Buddha at the age of 37. This implies that when the Buddha passed away, Ananda was also eighty years old. With a heavy heart, Ananda approached the Buddha and asked, "After you are gone, from whom shall I seek wisdom? Who will show me the path forward?" 

A faint smile appeared on the Buddha’s face. In a tone filled with affection, he said, "You have been with me for forty years. If you have not attained wisdom by now, what could you possibly grasp even in forty lifetimes? Ananda, do not be foolish! Countless Buddhas have come before me, and many more will come in the future. Each will fulfill their purpose and depart from this world; nothing is permanent. 

Perhaps it is because of my presence that you have not yet attained enlightenment—my being here may have diminished your own capacity to learn. You might find it easier to learn under a new teacher. Yet, merely finding a teacher is not enough; you must transform yourself. Change yourself, and it is possible that you, too, may attain Buddhahood." Having said this, the Tathagata breathed his last. After the Buddha’s passing, Ananda attained supreme wisdom. The words of Mahatma Buddha proved true.

महात्मा बुद्ध का कथन सत्य साबित हुआ



बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध का अंतिम समय जानकर आनंद बहुत दुखी था। आनंद महात्मा बुद्ध का सबसे प्रिय शिष्य और चचेरा भाई भी था। कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध और आनंद का जन्म एक ही दिन और एक ही वर्ष में एक ही कुल में हुआ था। दोनों सम वयस्क थे। जब सिद्धार्थ ने गृहत्याग किया था, तब उनकी आयु 29 वर्ष की थी। गृह त्याग के बाद छह साल लगे थे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त करने में। चचेरे भाई आनंद ने 37 साल की अवस्था में बुद्ध से परिव्रज्या धारण की थी। 

इसका अर्थ यह निकलता है कि जब गौतम बुद्ध की मृत्यु हुई थी, तब आनंद भी अस्सी साल के हो चुके थे। आनंद बहुत दुखी मन से बुद्ध के पास आए और बोले, आपके जाने के बाद मैं किससे ज्ञान प्राप्त करूंगा? कौन मुझे आगे का रास्ता दिखाएगा। आनंद की बात सुनकर बुद्ध के चेहरे पर क्षीण मुस्कान उभर आई। वह स्नेह सिक्त स्वर में बोले, चालीस साल से तू मेरे साथ है। अब तक तुझे ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, तो चालीस जन्मों में भी तुझे क्या समझ में आएगा। 

आनंद! पागल मत बनो। मुझसे पहले न जाने कितने बुद्ध आए। आगे भी अनेक बुद्ध आएंगे। सब अपना अपना काम करेंगे और इस दुनिया से चले जाएंगे। कोई स्थायी तो रहेगा नहीं। आनंद हो सकता है कि तू मेरी वजह से अब तक ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका है। 

मेरे होने से तेरे सीखने की क्षमता क्षीण हो गई हो। नया गुरु मिलेगा, तो तू आसानी से सीख सकता है। गुरु का मिलना ही पर्याप्त नहीं है, बदलना जरूरी है। तू अपने को बदल। हो सकता है कि तू बुद्धत्व प्राप्त कर ले। इतना कहकर तथागत ने अंतिम सांस ली। बुद्ध के जाने के बाद आनंद ने परम ज्ञान प्राप्त किया। महात्मा बुद्ध का कथन सत्य साबित हुआ।

विजयादशमी की सीख: विजय बाहरी नहीं, आंतरिक होती है

अशोक मिश्र

विजयादशमी भारतीय संस्कृति और परंपरा का वह पर्व है जो केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के गहन मूल्यों का प्रतीक है। विजयादशमी  भारतीय चेतना का वह शाश्वत स्वर है जो हर युग में हमें याद दिलाता है कि अंधकार चाहे कितना भी घना क्यों न हो, प्रकाश की एक लौ उसे चीर ही देती है। आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को जब हम रावण के विशाल पुतले को अग्नि को समर्पित होते देखते हैं, तो वह दृश्य केवल एक पौराणिक कथा का मंचन नहीं होता। वह हमारे भीतर के द्वंद्व का प्रतीक है। 

यह दिन बुराई पर अच्छाई की विजय, अधर्म पर धर्म की जीत और अज्ञान पर ज्ञान की स्थापना का स्मरण दिलाता है।  विजयादशमी हमें सिखाती है कि विजय बाहरी नहीं, आंतरिक होती है। जब हम सत्य के पथ पर चलते हैं, दूसरों के प्रति करुणा रखते हैं और अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं, तभी सच्ची विजयादशमी मनाई जा सकती है।  राम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं, वह मर्यादा के प्रतीक हैं। रावण केवल लंका का राजा नहीं, वह अहंकार है। यह युद्ध केवल त्रेता में नहीं लड़ा गया, यह हर दिन, हर मनुष्य के भीतर लड़ा जाता है। 

लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या के दस मुखों वाला रावण आज भी हमारे भीतर जीवित है। उसे जलाने के लिए बाहर के किसी अग्निबाण की नहीं, भीतर के विवेक की आवश्यकता है। विजयादशमी का दूसरा नाम शक्ति की उपासना का समापन भी है। नौ दिनों तक हमने आदिशक्ति की आराधना की। दसवें दिन उसी शक्ति के विजयिनी रूप का उत्सव मनाया। यह संयोग नहीं कि शस्त्र-पूजन और विद्या-पूजन इसी दिन होता है। 

हमारे ऋषियों ने बहुत पहले समझ लिया था कि शक्ति यदि विवेकहीन हो तो वह विनाश है, और विवेक यदि शक्तिहीन हो तो वह पलायन है। विजयादशमी शक्ति और विवेक के समन्वय का पर्व है। रामायण में भगवान राम द्वारा रावण के वध की कथा हो या देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार, दोनों ही कथाएँ हमें यही संदेश देती हैं कि सत्य और न्याय अंतत: विजयी होते हैं, भले ही मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो। आज के समय में विजयादशमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। 

जब सोशल मीडिया पर असत्य का शोर सत्य से अधिक तेज हो, जब सुविधा की दौड़ में संबंध पीछे छूट रहे हों, जब सफलता को ही एकमात्र मूल्य मान लिया गया हो, तब राम का जीवन हमें धीरज सिखाता है। यह पर्व सिखाता है कि विजय धैर्य माँगती है, अनुशासन माँगती है, और सबसे बढ़कर चरित्र माँगती है। शक्ति का सही उपयोग सेवा और रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि दमन के लिए। दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के साथ शक्ति का स्मरण बना रहता है कि नारी शक्ति समाज की आधारशिला है। विजयादशमी पर हम केवल पुतला न जलाएं, एक संकल्प लें। अपने भीतर के किसी एक रावण को पहचानें और उसे छोड़ने का साहस करें। किसी एक अच्छाई को अपना शस्त्र बनाएं।

Monday, October 19, 2026

don't expect help from anyone

bodhi tree

Ashok Mishra

When Gautam Buddha realized that his death was near, he thought of giving his last sermon to his disciples. Anyway, at the age of eighty the body had become quite weak. Consuming Sukar Maddava was causing stomach ache, dysentery and bleeding. In such a situation, even if any normal person was there, he could have imagined the future apprehension. All the disciples became alert to listen to the last message of Buddha. 

First he preached to the householders. He said in a weak voice that you people should always follow the path of religion. Religion teaches us to live within limits. Religion teaches discipline. Just like a river without a bank becomes unruly. She destroys herself and everyone else, similarly, without being bound by the limits of religion, he destroys himself and others. 

Household disciples, believe in yourself. Don't expect help from anyone else. By believing in yourself, knowledge will blossom in your heart. You become your own lamp. You will not need anyone's orders or instructions. May you be a lamp. No incarnation will come to teach you the right path. You have to find your own way. 

After this he told the separated that you should never live together for more than two days. Never stay at one place for more than three days. The life of a true monk is made for lifelong tourism. Keep sharing whatever good things you have. Your duty is to inspire people to follow the path of religion. Don't get distracted from your work. After this Mahatma Buddha closed his eyes forever.