Thursday, April 16, 2026

हेनरी ड्यूनेंट ने की रेडक्रॉस की स्थापना


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रेडक्रॉस की स्थापना करने और शांति का पहला नोबल पुरस्कार पाने वाले जीन हेनरी ड्यूनेंट का जन्म 8 मई 1828 को जेनेवा में हुआ था। इनके माता-पिता जेनेवा के सम्मानित नागरिकों में गिने जाते थे। इनके पिता जीन जैक्स ड्यूनेंट एक जेल और अनाथालय में काम करते थे। 

वहीं, इनकी मां एंटोनेट ड्यूनेंट-कोलाडोन बीमार और गरीबों के लिए काम करती थीं। माता-पिता के कार्यों का प्रभाव बचपन से ही हेनरी पर पड़ा। एक बार की बात है। हेनरी के मन में आया कि नेपोलियन बोनापार्ट से मिला जाए। नेपोलियन बोनापार्ट की ख्याति उन दिनों एक महान सेनापति के रूप में थी। इसके लिए वह जेनेवा से पेरिस पहुंचा। 

वहां पहुंचने पर उसे पता चला कि नेपोलियन युद्ध के मोर्चे पर हैं। वह उनसे मिलने युद्ध के मोर्चे पर गया। उस समय भीषण युद्ध चल रहा था। वह पहाड़ी की चोटी से जंग देखने लगा। उसने देखा कि सैकड़ों सैनिक घायल पड़े हैं। कोई इधर कराह रहा है, तो कोई उधर रो रहा है। उनकी कोई देखभाल करने वाला नहीं है। यह देखकर हेनरी का मन द्रवित हो गया। 

वह बिना कुछ सोचे, युद्ध में घायल सैनिकों की सेवा सुश्रषा करने लगा। वह भूल गया कि वह नेपोलियन से मिलने आया था। जंग खत्म होने के बाद उसने कुछ युवकों का दल रेडक्रॉस नाम से बनाया जो निस्वार्थ जंग के समय घायल सैनिकों की सेवा कर सकें। उसने रेडक्रॉस को अंतर्राष्ट्रीय जगत में मान्यता दिलाई। मानवता के प्रति उसकी सेवाओं को देखते हुए शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। 

यही नहीं बाद में रेडक्रॉस संस्था को भी तीन बार नोबेल पुरस्कार हासिल हुआ। 30 अक्टूबर 1910 को 82 साल की उम्र में हेनरी का निधन हो गया।

गर्मी बढ़ने के साथ अस्पतालों में बढ़ने लगे उल्टी-दस्त के मरीज


अशोक मिश्र

हरियाणा में गर्मी का असर अब दिखाई देने लगा है। बच्चे और बुजुर्ग गर्मी से होने वाली बीमारियों से पीड़ित होकर अस्पतालों में पहुंचने लगे हैं। अस्पताल में पहुंचने वालों में ज्यादातर लोग उल्टी और दस्त से पीड़ित पाए गए हैं। डायरिया, वायरल फीवर और अन्य मौसमी बीमारियां भी प्रदेश में फैलने लगी हैं। दिन और रात के तापमान में लगभग बीस से तेईस डिग्री सेल्सियस का अंतर होने से लोगों में संक्रमण तेजी से फैल रहा है।  

आंखों में खुजली, पानी आना, पलकों का सूजना जैसी समस्याएं भी लोगों में देखने को मिल रही है। लोगों के बीमार पड़ने के और भी कई कारण सामने आ रहे हैं। दूषित पानी पीना, ज्यादा देर से कटे-फटे फल खाना, खुले में बिकने वाले पदार्थ का सेवन करना, साफ सफाई का ध्यान न रखना भी लोगों के बीमार होने का कारण है। छोटे बच्चे ऐसी परिस्थिति में जल्दी बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। 

 गर्मियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में हर आदमी को सावधानी बरतनी चाहिए। अप्रैल का महीना आधा बीत चुका है। हरियाणा का औसत तापमान 36 डिग्री के आसपास है। कुछ ही दिनों में राज्य में औसत तापमान चालीस डिग्री के आसपास पहुंचने की संभावना है। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में तो आज ही तापमान 42 डिग्री पहुंच चुका है। 

राजस्थान में भी कुछ इलाकों में तापमान 41 डिग्री है। ऐसी स्थिति में लोगों को चाहिए कि वह बहुत आवश्यक होने पर ही धूप में घर से बाहर निकलें। बाहर निकलते समय भी छाता जरूर साथ रखें। बदन का ढककर ही बाहर निकलें। इसके साथ ही साथ पानी जरूर साथ में रखना चाहिए ताकि गर्मी की वजह से पसीने के रूप में शरीर से निकलने वाले पानी की कमी को पूरा किया जा सके। बदलते मौसम में अपना ख्याल रखना बहुत जरूरी है। अभी मई और जून महीने की प्रचंड गर्मी आनी बाकी है। 

वैसे तो अप्रैल से लेकर जून-जुलाई तक हमेशा प्रचंड गर्मी पड़ती रही है। लेकिन आज से चार-पांच दशक पहले हरियाणा सहित उत्तर भारत में वन क्षेत्र का क्षेत्रफल अधिक हुआ करता था। इस वजह से हर थोड़ी-थोड़ी दूर पर लोगों को राहत देने के लिए कोई न कोई पेड़ अवश्य हुआ करता था। सड़कों के किनारे किनारे फल और छाया देने वाले पेड़ लगाए जाते थे ताकि हवा में मौजूद ग्रीन हाउस गैसों को पेड़-पौधे अवशोषित करते रहें और आक्सीजन को मुक्त करते रहें। 

उन दिनों प्रचंड गर्मी होते हुए भी लोगों को इतनी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था। कस्बों  और गांवों में ज्यादातर लोगों के मकान घासफूस और मिट्टी के बने होते थे। इसकी वजह से ऊष्मा परावर्तित होकर लौट जाती थी। अब सीमेंट और शीशे के बने मकान ऊष्मा को अवशोषित कर लेते हैं। इसकी वजह से पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। प्रदेश में वन क्षेत्र भी काफी हद तक घट गया है।

जनता बदलाव के मूड में आती है, तो कोई तिकड़म काम नहीं आता


संजय मग्गू

दो दिन से हंगरी में जश्न का माहौल है। हंगरी की सत्ता पर पिछले सोलह साल से काबिज विक्टर आॅर्बन चुनाव हार गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के प्रिय विक्टर आॅर्बन को उनके ही पुराने साथी पीटर मग्यार ने हरा दिया। अप्रैल में हंगरी में होने वाले चुनाव से पांच दिन पहले अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस तो विक्टर आर्बन के चुनाव प्रचार में भी गए थे और विक्टर को जिताने का आह्वान किया था। 

जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप के पक्ष में कहा था, अबकी बार ट्रंप सरकार। विक्टर आर्बन की पराजय बताती है कि जब जनता बदलाव का मूड बना लेती है, तो वह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेती है। पिछले 16 वर्षों में विक्टर ने न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक अपने कब्जे में ले लिया था। हंगरी की न्यायपालिका वही बोलती थी जो विक्टर कहते थे या विक्टर के फायदे में होता था। मामला कुछ भी हो विक्टर की पार्टी फिदेस के ही पक्ष में न्यायालय का फैसला होता था। 

हंगरी के पीएम विक्टर ने पूरे सिस्टम पर कब्जा कर लिया था। देश की अस्सी फीसदी मीडिया पर विक्टर का कब्जा था। विक्टर के खिलाफ न कोई खबर छपती थी और न ही दिखाई जाती थी। दिन रात मीडिया पर विक्टर वंदना ही गाई जाती थी। उनकी साफ सुथरी छवि बनाने और दिखाने में मीडिया संस्थान एक दूसरे से होड़ लगाते थे। चुनाव आयोग को मजबूर कर दिया था कि वह ऐसे-ऐसे नियम बनाएं जिससे विक्टर और उनकी पार्टी फिदेस को ही फायदा हो। जनता के लिए फिदेस उम्मीदवारों को ही चुनने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा गया था। इस बार छद्म मिश्रित सदस्यीय बहुमत प्रणाली (सूडो मिक्स्ड मेंबर मेजोरिटी सिस्टम) से हुए चुनाव में भी तिस्जा पार्टी को दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ है। 

विक्टर ने विपक्षी पार्टी तिस्जा के सदस्यों पर मुकदमे दर्ज कराए, उन्हें जेल भेजा। विरोधियों के प्रति अपनी घृणा को व्यक्त करने में उसे तनिक भी संकोच नहीं होता था। हंगरी की जनता में धार्मिक उन्माद पैदा करने के लिए यहां तक कहा गया कि ईसाई धर्म खतरे में है। लेकिन जब जनता बदलाव का मन बना लेती है, तो सारी तरकीबें धरी रह जाती हैं। अपने देश हंगरी को महान बनाने का दावा करने वाले विक्टर को अपनी कुटिलता और कब्जा किए गए पूरे सिस्टम पर बहुत अधिक भरोसा था। 

लेकिन जैसे ही हंगरी में बदलाव की आंधी चली और उनका सारा सिस्टम तिनके की तरह उड़ गया। विक्टर की करारी हार ट्रंप, नेतन्याहू और पुतिन जैसे तानाशाह प्रवृत्ति वाले शासकों के गाल पर एक करारे तमाचे के समान है। यह लोग भी अपने देश में अपने आपको सर्वशक्तिमान समझते हैं। इनकी इजाजत के बिना पत्ता तक नहीं हिलता है, लेकिन इन्हें यह याद रखना होगा कि जिस दिन जनता का मूड बदला, इन्हें इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने में जनता तनिक भी देर नहीं लगाएगी।

Wednesday, April 15, 2026

अपने जूठे बर्तन धोने में कैसी शर्म?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक हेनरी फोर्ड का जन्म 30 जुलाई 1863 में मिशिगन के एक फार्म हाउस में हुआ था। उन्होंने ही अमेरिका के मध्यम आयवर्ग के लोगों  के कार खरीदने के सपने को पूरा करने का रास्ता सुझाया था। हेनरी फोर्ड ने सन 1903 में फोर्ड मोटर कंपनी की स्थापना की। 

आटोमोबाइल क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाकर उन्होंने सस्ती कारों को लांच करने साहस किया और देखते ही देखते कुछ वर्षों में हेनरी फोर्ड अमेरिका के सबसे अमीर आदमी बन गए। उनकी ख्याति दुनिया भर में फैल गई थी। भारत में भी फोर्ड कंपनी ने अपनी कार लांच की थी। उनकी सफलता से भारत के कई उद्योगपति काफी प्रभावित थे। ऐसे ही एक उद्योगपति ने देश में मोटर कारखाना लगाने का विचार किया। 

उन्होंने सोचा कि मोटरकार खाना लगाने से पहले अगर इस बारे में फोर्ड मोटर कंपनी के मालिक हेनरी फोर्ड से सलाह मशविरा कर लिया जाए, तो बेहतर होगा। यही सोचकर उन्होंने अमेरिका की यात्रा की। कई दिनों तक भागदौड़ करने के बाद फोर्ड से मिलने का समय तय हुआ।  

फोर्ड की कंपनी के अधिकारी ने भारतीय उद्योगपति से कहा कि दिन में तो आपके लिए समय निकाल पाना संभव नहीं है। कल शाम को आप घर पर मिल सकते हैं। अगले दिन शाम को उद्योगपति फोर्ड के घर पहुंचा तो देखा कि एक बुजुर्ग अपने जूठे बरतन धो रहा है। उन्होंने फोर्ड से मिलने की बात कही। उस बुजुर्ग ने उन्हें बिठाया और थोड़ी देर बाद उसने आकर कहा कि मैं ही फोर्ड हूं। 

उद्योगपति ने कहा कि आप अपने जूठे बरतन धो रहे थे। फोर्ड ने कहा कि जब मैं अमीर नहीं था, तब भी अपना काम खुद करता था। आज भी मैं अपना काम खुद करना पसंद करता हूं। अपना काम करने में कैसी शर्म।

मजदूरों को मशीन की जगह इंसान समझे सरकार और पूंजीपति


अशोक मिश्र

पिछले कुछ दिनों से वेतन बढ़ोतरी न होने से मजदूरों में असंतोष फैलता जा रहा है। नोएडा में सोमवार को मजदूरों ने साढ़े तीन सौ से अधिक फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ की, डेढ़ सौ से अधिक गाड़ियों में आग लगा दी, पुलिस पर पथराव किया। पुलिस को गाड़ियों को पलट दिया गया। इससे एक दिन पहले गुरुग्राम के मानेसर में भी मजदूरों ने हिंसक प्रदर्शन किया था। नोएडा और मानेसर मामले में पुलिस ने काफी संख्या में मजदूरों को गिरफ्तार किया है। 

यह भी जानकारी सामने आ रही है कि कुछ अराजक तत्व मजदूरों की आड़ में फैक्ट्री में आग लगाकर और मैनेजर की हत्या करके माहौल को बिगाड़ना चाहते थे। यह खुलासा ह्वाट्सएप चैट से हुआ है। स्वाभाविक है कि पुलिस ऐसे अराजक लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। सोमवार को फरीदाबाद और पलवल में भी मजदूरों ने प्रदर्शन किया और नेशनल हाईवे को जाम कर दिया। 

दोनों जिलों में संतोषजनक बात यह रही कि मजदूरों ने न तो उत्तेजना फैलाने वाली बात की और न ही माहौल को बिगड़ने दिया। उन्होंने शांतिपूर्वक प्रदर्शन किया और बाद में अधिकारियों के समझाने पर वह प्रदर्शन स्थगित करने के लिए मान भी गए। हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में होने वाले इन प्रदर्शनों में एक बाद कामन है और वह है मजदूरों की वेतन बढ़ोतरी की मांग। कुछ दिन पहले ही हरियाणा सरकार ने अकुशल, अर्ध कुशल और कुशल मजदूरों  की मजदूरी में 35 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की घोषणा की है। 

इसके बाद भी अगर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का असंतोष बढ़ता जा रहा है तो इसका कारण यह है कि सरकार द्वारा घोषित की गई वेतन बढ़ोतरी सरकारी विभागों में तो लागू हो जाती है, लेकिन निजी कंपनियों और फैक्ट्रियों के मालिक उसे लागू नहीं करते हैं। मजदूरों का कहना है कि उन्हें दस-ग्यारह हजार रुपये वेतन दिया जाता है। उनसे बारह घंटे तक काम कराए जाते हैं। ओवरटाइम का पैसा भी नहीं दिया जाता है। महिला कर्मचारियों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होती है, उनके लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं की जाती है। ज्यादातर कंपनियों और फैक्ट्रियों में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं होती है। 

असंगठित क्षेत्र के प्रदर्शनकारी मजदूरों को भले ही अभी तात्कालिक रूप से मना लिया गया हो। उग्र प्रदर्शन करने वाले कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया गया हो, लेकिन यह आग फिर भड़क सकती है, इसकी पूरी आशंका बनी हुई है। अच्छा तो यह होगा कि कंपनी और फैक्ट्री मालिक अपने यहां काम करने वाले मजदूरों को एक इंसान समझकर व्यवहार करें। उन्हें कम से कम इतना वेतन तो अवश्य दें जिससे उनके परिवार का गुजारा सम्मानजनक ढंग से हो सके। कार्यस्थल पर भी उन्हें वह आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराई जाएं जो उनके लिए बहुत जरूरी है। मजदूरों को मशीन की जगह इंसान समझा जाए।

Tuesday, April 14, 2026

कलेक्टर अलेक्जेंडर हेमिल्टन की अनदेखी की


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बंगाल में नवजागरण के अग्रदूत थे राजा राममोहन राय। वह अंग्रेजी शिक्षा के भले ही समर्थक रहे हों, लेकिन उन्होंने भारतीयता को हमेशा सर्वोच्च शिखर पर रखा। राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 में बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह एक पत्रकार और समाज सुधारक के रूप में विख्यात थे। 

उन्होंने बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। उनके प्रयास करने से ही बंगाल में थोड़ी बहुत जागरूकता आई थी। उनके अथक प्रयासों से, तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 1829 में सती प्रथा को आधिकारिक तौर पर गैरकानूनी घोषित कर दिया था। 

एक बार की बात है। राजा राममोहन राय पालकी पर बैठकर कहीं जा रहे थे। उसी रास्ते में वहां का कलेक्टर  अलेक्जेंडर हैमिल्टन खड़ा था। राय ने उसे देखा, लेकिन उन्होंने पालकी से उतरने की जरूरत नहीं समझी। इससे कलेक्टर हैमिल्टन को बहुत गुस्सा आया। उसने सिपाहियों को भेजकर पालकी को रुकवा दिया। उसने राजा राममोहन राय को काफी भला बुरा कहा। 

इसके बाद राय ने कलेक्टर का लगभग निरादर करते हुए पालकी में जाकर बैठ गए और अपने गंतव्य की ओर चले गए। राजा राम मोहन राय को अंग्रेजों की भेदभाव वाली नीति बहुत बुरी लगती थी। कलेक्टर अलेक्जेंडर की शिकायत उन्होंने लार्ड मिंटो से की। लार्ड मिंटो ने कलेक्टर को आगे से राजा राममोहन राय के साथ ऐसा व्यवहार न करने की चेतावनी दी। 

इसके बावजूद राजा राममोहन राय अंग्रेजों की भेदभाव नीति के खिलाफ आवाज उठाते रहे। अंतत: ब्रिटिश हुकूमत को अपनी भेदभाव नीति को त्यागना पड़ गया।

बढ़ती गर्मी में लापरवाही से खेतों में आग लगने की घटनाएं चिंताजनक

अशोक मिश्र

बैसाख महीने की शुरुआत हो चुकी है। प्रचंड गर्मी के दिनों की कुछ दिन पहले ही शुरुआत हो चुकी थी। यह सही है कि अप्रैल महीने में इस बार छिटपुट बरसात होती रही। इसकी वजह से किसानों को अपनी फसलों को लेकर परेशानी उठानी पड़ी। उत्तर भारत में गेहंू की कटाई भी कहीं-कहीं शुरू हो चुकी है। हरियाणा में भी गेहूं और अन्य फसलें मंडियों में पहुंचने लगी हैं। किसान अपनी मेहनत का नकदीकरण करके खुश है। 

हरियाणा में पहली अप्रैल से ही मंडियों में अनाजों की खरीद शुरू हो चुकी है। यह बात अलग है कि कहीं कहीं मंडियों में अव्यवस्था की शिकायत किसान कर चुके हैं। इसके बावजूद संतोष की बात यह है कि अब धीरे-धीरे ही सही मंडियों में अनाज की खरीद रफ्तार पकड़ रही है। पिछले कई सालों पर नजर डालें तो गर्मी के दिनों में खड़ी फसलों और फसल अवशेषों में आग लगने की घटनाएं देखने को मिलती रही है। 

आज ही फतेहाबाद जिले में रतिया के लाली गांव में खेत में आग लगने से किसानों को भारी नुकसान हुआ है। बता दे कि करीब साढ़े तीन एकड़ खड़ी गेहूं की फसल और आठ एकड़ क्षेत्र में फैला भूसा जलकर राख हो गया। यह आग तुड़ी मशीन से निकली चिंगारी के कारण लगी, जिसने देखते ही देखते बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया। शुक्रवार को ही पलवल जिले के होडल क्षेत्र में बिजली के शॉर्ट सर्किट से गेहूं की फसल में भीषण आग लग गई। 

गौढोता-बेढ़ा सड़क मार्ग पर जोरोली वाले जंगल में एक ट्रांसफार्मर से निकली चिंगारी से खेतों में खड़ी 30 एकड़ गेहूं की फसल जलकर खाक हो गई। ऐसी घटनाओं को थोड़ी सी सावधानी बरतकर होने रोका जा सकता है। खेत या जहां पर अनाज या फसलों के अवशेष रखे हों, उस जगह बीड़ी, सिगरेट पीने से परहेज करने के साथ-साथ ज्वलनशील पदार्थों को हटा देना चाहिए। 

यदि किसी मशीन को चलाने से चिन्गारी निकल रही हो, तो तुरंत मशीन को बंद करके उसे ठीक करानी चाहिए। पिछले कई दशकों से हर साल खेतों में खड़ी फसलों में आग लगने की घटनाएं होती रही हैं। कई बार इसके लिए इंसानी भूल जिम्मेदार होती है, तो कई बार ऐसे कारणों से आग लग जाती है जिसको रोकने में इंसान का कोई वश नहीं होता है। 

लेकिन कुछ मामलों में तो यह भी देखने में आता है कि किसान रबी और खरीफ फसलों के अवशेष को खेत में आग लगा  देते हैं। धान की पराली को जलाने की घटनाएं भी सीजन में बहुत देखने को मिलती हैं, तो आजकल के मौसम में किसान गेहूं के अवशेष यानी भूसे को सहेजने की जगह आग लगा देना बेहतर समझते हैं। यह पूरी तरह गलत है। भूसे का कई तरह से उपयोग किया जा सकता है। भूसे को बेचकर किसान कमाई कर सकता है। हालांकि ऐसा बहुत कम किसान करते हैं, लेकिन इस पर भी रोक लगनी चाहिए।

Monday, April 13, 2026

राजकुमारी के पैरों को चमड़े से ढक दो

प्रतीकात्मक चित्र साभार गूगल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जूते का आविष्कार कब हुआ, यह कोई नहीं जानता है। अनुमान व्यक्त किया जाता है कि जूतों का सबसे पुराना ज्ञात जोड़ा सात से आठ हजार ईसा पूर्व का है जो प्राकृतिक सामग्री छाल से बना था। चमड़े से बने सबसे पुराने ज्ञात जूते 3500 ईसा पूर्व के माने जाते हैं। यह भी केवल अनुमान है। पक्के तौर पर यह नहीं बताया जा सकता है कि जूते का आविष्कार किसने और कब किया था? 

इस संबंध में एक प्राचीन कथा कही जाती है। कहते हैं कि किसी देश में एक राजा था। उसके एक बेटी थी। राजा अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था। उसने अपनी बेटी को एकदम नाजुक गुलाब की पंखुड़ियों की तरह पाला था। वह अपने महल से बाहर नहीं आती जाती थी। उसकी सारी दुनिया केवल महल तक ही सिमटकर रह गई थी। वह महल में ही खेलती-कूदती थी, वहीं खाना खाती, पानी पीती और महल में ही सो जाती थी। 

राजकुमारी का जब मन होता, तो उसकी सहेलियों को बुला दिया जाता था। वह उनके साथ खेलती थी। उसकी सहेलियां महल के बाहर के चटपटे किस्से सुनाते थे। एक दिन राजकुमारी के मन में आया कि वह भी अपनी सहेलियों के साथ शहर घूमे। देखे तो महल के बाहर की दुनिया कैसी है? यह बात जब राजा को पता चली, तो राजा घबरा गया। 

वह सोचने लगा कि इतने नाजो से पाली गई उनकी बेटी सड़क पर कैसे चलेगी? उसके तो पैर लहूलुहान हो जाएंगे। तब राजा ने कहा कि पूरे शहर को चमड़ों से ढक दिया जाए ताकि उनकी बेटी को कोई परेशानी न हो। तब एक दरबारी ने बड़े साहस के साथ राजा से कहा कि महाराज! पूरे शहर को चमड़ों से ढकना आसान नहीं है, लेकिन क्यों न राजकुमारी के पैरों को ही चमड़े से ढक दिया जाए। राजा को यह सलाह पसंद आई। कहते हैं कि इस तरह जूते का चलन शुरू हुआ।

गैस संकट के चलते उद्योगों को हो रहा भारी नुकसान, उत्पादन ठप

अशोक मिश्र

मध्य एशिया में चल रहा युद्ध भले ही एक पखवाड़े के लिए रुक गया हो, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट विवाद नहीं सुलझने से यह उम्मीद भी क्षीण होती जा रही है कि कुछ दिनों बाद शायद हालात सामान्य हो जाएं। वैसे तो ईरान का रवैया भारतीय तेल टैंकर जहाजों के प्रति नरम है, लेकिन बहुत ज्यादा राहत मिलती हुई नहीं दिख रही है। इसका नतीजा यह है कि हरियाणा सहित सभी राज्यों में एलपीजी, डीजल और पेट्रोल की किल्लत बनी हुई है। 

हरियाणा में एलपीजी को लेकर भले ही थोड़ा बहुत दबाव कम हुआ हो, लेकिन हालात अभी तक काबू में नहीं हैं। गैस और तेल की कालाबाजारी करने वालों की इन दिनों चांदी है। वह परेशान नागरिकों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। हजार-ग्यारह सौ में मिलने वाली गैस की कीमत तीन से पांच हजार रुपये वसूली जा रही है। इस मामले में सबसे ज्यादा परेशानी में वह लोग हैं जो पांच किलो वाला सिलेंडर भरवाकर काम चलाते थे। 

हालांकि सैनी सरकार ने कुछ दिन पहले घोषणा की थी कि पांच किलो वाला सिलेंडर गरीबों को पहचान पत्र दिखाने पर आसानी से उपलब्ध कराया जाएगा। लेकिन इस मामले में भी व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। सिलेंडर बुक कराने पर भी लोगों के मोबाइल पर डीएसी यानी डिलिवरी अथेंटिकेशन कोड तक नहीं आ रहा है जिसकी वजह से लोगों को काफी परेशानी होती है। 

वह लोग बार-बार बुकिंग सेंटर की दौड़ लगा रहे हैं। वैसे तो एलपीजी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए प्रदेश सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। कालाबाजारियों के खिलाफ सख्ती भी बरती जा रही है, लेकिन यह भी सच है कि लोगों की जरूरत के हिसाब से एलपीजी उपलब्ध नहीं है। प्रशासन इस बात पर भी नजर रख रहा है कि घरेलू सिलेंडरों का उपयोग व्यावसायिक मामलों में न होने पाए। इसके बावजूद होटल, ढाबा और रेस्टोरेंट संचालक घरेलू सिलेंडर का ही उपयोग कर रहे हैं। 

गैस उपलब्ध न होने की वजह से ज्यादातर होटल, ढाबे और रेस्त्रां या तो बंद हो चुके हैं, बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं। सबसे ज्यादा परेशानी राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों में उद्यमियों को हो रही है। प्रदेश के लाखों उद्यमी अपने प्रतिष्ठानों को बंद करने पर मजबूर हो गए हैं। राज्य में कई फैक्टरियों में उत्पादन पचास प्रतिशत से भी कम रह गया है। सबसे ज्यादा प्रभावित वे फैक्टरियां हैं जिनका काम लोहे की कटिंग, लोहे को पिघलना या गैस वेल्डिंग है। ऐसी फैक्टरियां या तो बंद कर दी गई हैं या फिर फैक्टरियों में कार्यरत मजदूरों की छंटनी कर दी गई है। 

जिन वर्कशाप या छोटी इकाइयों में दस से पंद्रह मजदूर गैस की किल्लत पैदा होने से पहले काम करते थे, अब ऐसी इकाइयों में तीन-चार मजदूर ही बचे हैं। बाकी लोगों की छुट्टी कर दी गई है। उद्यमी अपने आर्डर पूरा कर पाने में असमर्थ हैं। इससे उनको आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

Sunday, April 12, 2026

मौत का भय है, तो क्रांतिकारी क्यों बना?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख सेनानी अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख कर्ताधर्ता थे। बिस्मिल लोगों में देश प्रेम पैदा करने वाली कविताएं भी लिखा करते थे। उनकी रचनाओं को ब्रिटिश हुकूमत जब्त भी कर चुकी थी। 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर शहर के खिरनीबाग मुहल्ले में जन्मे रामप्रसाद अपने पिता मुरलीधर और माता मूलमती की दूसरी सन्तान थे। 

उनसे पूर्व एक पुत्र पैदा होते ही मर चुका था। राम प्रसाद बिस्मिल में ग्यारह साल की उम्र से क्रांतिकारी भावनाएं जाग्रत हो चुकी थीं। कांग्रेस, स्वराज पार्टी आदि में कुछ वर्षों तक काम करने के बाद वह अंतत: एचआरए की कानपुर में हुई बैठक में शामिल हुए और अंतत: एचआरए के ही होकर रह गए। 

इस बैठक में शचींद्रनाथ सान्याल, योगेश चंद्र चटर्जी जैसे तमाम क्रांतिकारी शामिल हुए थे। 9 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर रेलवे स्टेशन से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाना लूट लिया। 

बिस्मिल को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी की सजा सुनाई। फांसी से पहले राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी मां को पत्र लिखकर धैर्य रखने को कहा। जब उनकी जेल में आखिरी बार उनसे मिलने आईं, तो बिस्मिल रोने लगे। तब उनकी मां ने कहा कि जब तुम्हें मौत का इतना ही डर था, तो क्रांतिकारी क्यों बने? बिस्मिल ने कहा कि मुझे मौत का भय नहीं है। मैं आपकी सेवा नहीं कर सका, इसका अफसोस है। 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी।