बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
लोककल्याण के लिए जब महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु से निकले, तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूरे बारह साल तक बुद्ध भ्रमण करते रहे। इसी दौरान उन्हें आत्मबोध हुआ। उन्होंने मानव कल्याण का मार्ग खोजा। दीन-दुखियों की पीड़ा का निवारण किया। लोगों को अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। यह सब कुछ करते हुए बारह साल बीत गए। एक दिन कपिलवस्तु के लोगों ने सुना कि उनका राजकुमार सिद्धार्थ नगर में आ रहा है।
राजा शुद्धोधन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। महात्मा बुद्ध की मौसी और राजा शुद्धोधन की दूसरी पत्नी महाप्रजापति गौतमी की आंखें अपने पाल्य पुत्र को देखने के लिए व्याकुल थीं। सिद्धार्थ के जन्म के बाद महारानी महामाया यानी महादेवी की मौत हो जाने की वजह से राजा शुद्धोधन ने गौतमी से विवाह कर लिया था। सिद्धार्थ का पालन-पोषण भी मौसी गौतमी ने ही किया था।
तथागत के नगर आगमन की सूचना पाकर नगरवासी उत्तेजित थे। वह अपने राजकुमार को देखने के लिए लालायित थे। राजदरबार में नियत समय पर राजा शुद्धोधन अपने पूरे परिवार और सभासदों के साथ-साथ उपस्थित हुए। राज दरबार के बाहर विशाल जनसमूह उपस्थित था। तभी भिक्षु वेश में तथागत का आगमन हुआ। उन्होंने संन्यासी धर्म के अनुरूप सबका अभिवादन किया और स्वीकार भी किया। वह सबसे प्रेम से मिले। लेकिन उनकी आंखें यशोधरा को खोज रही थीं।
उससे मिलने सब आए थे। पुत्र राहुल भी एक ओर सकुचाया सा खड़ा अपने पिता को देख रहा था। लेकिन मानिनी यशोधरा वहां नहीं आई थी। वह क्यों जाए उनसे मिलने? जिसने छोड़ा था, वही आकर मिलेगा? उसने तो त्यागा नहीं था? महात्मा बुद्ध समझ गए कि मानिनी यशोधरा अंत:पुर से बाहर निकलकर मिलने नहीं आएगी। उन्हें ही उसके पास जाना होगा।