Tuesday, February 10, 2026

साधु ने कहा, मैं तो प्रेम करना जानता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सम्राट अशोक का सगा भाई तो तिष्य था, लेकिन सौतेले भाइयों को मिलाकर सौ भाई बताए जाते हैं। सम्राट बिंदुसार का सबसे बड़ा भाई सुसीम था। बिंदुसार युवराज सुसीम को ही उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। लेकिन अशोक खुद सम्राट बनना चाहता था। सुसीम तक्षसिला का राज्यपाल था। वह खुद अशोक से घृणा करता था। लेकिन सत्ता संघर्ष में उसने सुसीम की हत्या कर दी थी। 

जब सुसीम की हत्या हुई थी, तब उसकी पत्नी गर्भवती थी। कहा तो यह जाता है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर दी थी। इसीलिए उसे चंड अशोक कहा जाने लगा था। कलिंग युद्ध के बाद हुए रक्तपात को देखकर अशोक का मन व्यथित हो उठा। वह बेचैनी में इधर उधर भटकने लगा। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। एक दिन वह बाग में बैठा हुआ था। 

उसने देखा कि एक युवा साधु के चेहरे पर असीम शांति है। उसका चेहरा चमक रहा था। अशोक उसके पास गया, तो साधु से परिचय पूछा। उस युवा साधु ने कहा कि मैं निग्रोध कुमार हूं। सुसीम का पुत्र। जब आपने मेरे पिता की हत्या की थी, तब मैं अपनी मां के गर्भ में था। उसके बाद मेरी मां को काफी भटकना पड़ा। मेरी मां को एक बौद्ध भिक्षु ने शरण दी। मेरा जन्म वहीं हुआ। अशोक ने कहा कि तब तो तुम मुझ से घृणा करते होगे। 

उस साधु ने कहा कि घृणा क्या होती है, यह मैं नहीं जानता हूं। मैं तो प्रेम करना जानता हूं। मैं समस्त प्राणियों को प्रेम करता हूं। अशोक ने कहा कि मुझे माफ कर दो। मेरे मन को शांति नहीं मिल रही है। साधु ने कहा कि तुम बुद्ध की शरण में जाओ। वहीं शांति संभव है। इसके बाद अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उसने लोककल्याण के लिए बहुत सारे काम किए। तब उसे प्रियदर्शी अशोक के नाम से जाना गया।

सूरजकुंड हादसे की जांच के लिए कमेटी गठित, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में चल रहा अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर हस्तशिल्प मेले में शनिवार को झूला टूटने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। शनिवार को हुए हादसे में इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद की मौत हो गई और 13 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद मार्च में ही सेवानिवृत्त होने वाले थे। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि प्रारंभिक जांच में झूले में गड़बड़ी पाई गई है। 

सुरक्षा व्यवस्था की जांच के लिए विभिन्न विभागों के अधिकारियों की एक नौ सदस्यीय कमेटी बनाई गई थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि कमेटी ने मेले में लगने वाले झूलों की जांच ही नहीं की। जिस मेले में देश-विदेश से सैलानियों के लिए सुरक्षित बताया जा रहा था, उसी मेले में हुआ यह हादसा सारी व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। कहा जा रहा है कि मेले में लगने वाले झूलों और अन्य मशीनों की रोज चेकिंग होनी थी। लेकिन इस मामले में काफी लापरवाही बरती गई। नियम बताते हैं कि किसी भी जगह पर जब कोई भारी झूला लगाया जाता है, तो उस जगह की मिट्टी की जांच की जाती है। 

यह पता लगाया जाता है कि झूले की नींव कितनी टिकाऊ होगी। मेला शुरू होने से पहले मिट्टी की जांच हुई थी या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है। कहा तो यही जा रहा है कि हरियाणा टूरिज्म ने मानकों पर ध्यान ही नहीं दिया। जिस जगह पर झूला लगाया गया था, उस जगह की मिट्टी भुरभुरी बताई जा रही है। ऐसी जमीन पर मजबूती के साथ झूला लगा पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि सरकार ने हादसे की जांच के लिए कमेटी बना दी है। यह कमेटी जल्दी ही अपनी रिपोर्ट पेश कर देगी। 

हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, ऐसी आशा है। दरअसल, जितने बड़े पैमाने पर सूरजकुंड मेला आयोजित किया जा रहा है, उसके लिए बहुत अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। सूरजकुंड मेले में प्रति दिन हजारों लोग आते हैं। लोग मेले में खरीदारी करने आते हैं। इसी बहाने वह अपना मन बहलाव करते हैं। झूले और अन्य आयोजनों के जरिये मनोरंजन करना उनका मुख्य उद्देश्य होता है। मेले में आयोजित होने वाले विभिन्न तरह के कार्यक्रमों को देखकर वह प्रसन्न होते हैं। 

मेले में आने वाले लोग दूसरे प्रांतों के लोगों से मिलकर उनके बारे में जानकारी हासिल करते हैं। वहीं दूसरे प्रदेश के लोग भी हरियाणा की कला, संस्कृति और खानपान से परिचित होते हैं। सूरजकुंड मेले को देखकर ऐसा लगने लगता है कि  एक छोटा भारत यहां बसा दिया गया हो। ऐसी स्थिति में विभिन्न संस्कृतियों के मेल-मिलाप से देशभक्ति की भावना प्रबल होती है। ऐसे महत्वपूर्ण अवसर पर यदि कोई हादसा हो जाए, तो लोगों में भय का संचार होता है और वह मेले में आने से परहेज करने लगते हैं।

Monday, February 9, 2026

संकट में भी साथ नहीं छोड़ता सच्चा मित्र


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संस्कृत साहित्य में कहा गया है कि सच्चा दोस्त संकट के समय में अपने मित्र का साथ नहीं छोड़ता है। सच्चा मित्र सभी तरह के पाप कर्म से दूर रखता है, लेकिन हितकारी कामों को करने के लिए उत्साहित करता है। ऐसे ही एक सच्चे दोस्त की एक कथा है। किसी राज्य के राजा ने घोषणा की कि राज कुमार को देश निकाला दिया जाता है। जो भी व्यक्ति राज कुमार का पक्ष लेगा या फिर उसकी सहायता करता हुआ पाया जाएगा, उसको कठोर दंड दिया जाएगा।

 यह घोषणा सुनकर राजकुमार चकित रह गया। उसको दुख भी हुआ कि उसने कोई ऐसा अपराध भी नहीं किया है जिसकी वजह से उसके पिता ने उसे ऐसा कठोर दंड दिया है। राजकुमार के तीन परम प्रिय मित्र थे। वह ऐसे कठिन समय में सहायता मांगने एक मित्र के पास पहुंचा। मित्र ने उसे देखते ही दरवाजा बंद कर लिया और कहा कि मैं कोई सहायता नहीं कर सकता। 

दूसरे मित्र ने कहा कि कहीं भी जाने के लिए मेरा घोड़ा ले जाओ। इससे ज्यादा मदद नहीं कर सकता हूं। जब राजकुमार अपने तीसरे मित्र के पास पहुंचा, तो उसके मित्र ने राजकुमार का स्वागत करते हुए कहा कि मैं हर हालत में तुम्हारे साथ हूं। लेकिन एक बार चलकर राजा से पूछ लिया जाए कि उन्होंने ऐसा आदेश दिया क्यों? दोनों राजा के पास पहुंचे। 

उन्हें देखते ही राजा ने राजकुमार के मित्र कहा कि तुम्हें मालूम है कि क्या सजा मिलेगी? मित्र ने कहा कि आप जो भी सजा देंगे, मंजूर है, लेकिन यह तो बताएं राजकुमार का अपराध क्या है? राजा ने कहा कि मैं अब राजकुमार को गद्दी सौंपने की सोच रहा था। जिसके साथ एक सच्चा मित्र होता है, वह जीवन में सफल होता है। राजकुमार के राजा बनने पर तुम मंत्री बनोगे।

खिलाड़ियों की डाइट ही नहीं होगी पौष्टिक, तो कैसे करेंगे मुकाबला


अशोक मिश्र

खेल और युद्ध के बीच बहुत ही गहरा संबंध हैं। पहले खेल शुरू हुए या युद्ध, यह कह पाना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन यह सही है कि प्राचीन काल में खेल भी युद्ध का ही एक प्रारूप हुआ करते थे। दोनों में अंतर केवल इतना है कि खेल एक निश्चित नियम और सौहार्दपूर्ण भावना से जुड़े होते हैं, लेकिन युद्ध का वैसे तो कोई नियम नहीं होता है और यह मानवघाती भी होता है। खिलाड़ी का एक ही लक्ष्य होता है प्रतिद्वंद्वी को हर हालत में पराजित करना, लेकिन युद्ध में प्रतिद्वंद्वी को मौत के घाट उतारना एकमात्र लक्ष्य होता है। ऐसी स्थिति में खिलाड़ियों को विशेष खानपान की जरूरत होती है। 

अपने प्रतिस्पर्धी को हराने में वह तभी सक्षम होंगे, जब वह हष्टपुष्ट और शारीरिक-मानसिक रूप से सक्षम होंगे। हरियाणा सरकार ने करीब एक साल पहले खिलाड़ियों की डाइट मनी में पांच सौ रुपये की बढ़ोतरी का ऐलान किया था, लेकिन हकीकत में यह बढ़ोतरी आज तक नहीं हुई है। एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश की डेढ़ हजार खेल नर्सरियों में साढ़े सैंतीस हजार खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं। 

ऐसी स्थिति में इन खिलाड़ियों को अपनी खुराक को संतुलित रखने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यह बात सही है कि हरियाणा ने देशी और विदेशी खेल प्रतिस्पर्धाओं में देश में सबसे ज्यादा पदक जीते हैं। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदेश के खिलाड़ियों ने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। सबसे ज्यादा पदक जीते हैं, लेकिन यदि इन खिलाड़ियों को अच्छी डाइट नहीं मिलेगी, तो यह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे करेंगे। इतना ही नहीं, इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने वाले प्रशिक्षकों (कोचों) के वेतनमान में वृद्धि का ऐलान सरकार ने किया था। इन कोचों के वेतनमान में अभी तक कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। 

प्रदेश में संचालित डेढ़ हजार खेल नर्सरियों में से एक हजार नर्सरियों का संचालन निजी तौर पर होता है। इन एक हजार खेल नर्सरियों का संचालन निजी संस्थाएं और पंचायतों द्वारा होता है। यदि सरकार इन प्रशिक्षकों का वेतनमान समय पर बढ़ा दिया गया होता, तो शायद यह कोच अपने खिलाड़ियों को बड़े उत्साह के साथ प्रशिक्षण देते। राज्य सरकार ने कनिष्ठ प्रशिक्षकों का वेतन बीस हजार से पच्चीस हजार और वरिष्ठ प्रशिक्षकों का वेतन 25 हजार से तीस हजार करने का वायदा किया था, लेकिन अभी तक वायदा पूरा न होने की वजह से प्रशिक्षकों में भारी असंतोष है। 

सरकारी अधिकारियों की कामकाज में लापरवाही का आलम यह है कि पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की घोषणा प्रदेश सरकार ने 2024-25 में की थी, यह खेल नर्सरियां आजतक नहीं खोली जा सकी हैं। पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की फाइल खेल विभाग, वित्त विभाग और सीएमओ के बीच घूम रही है।

Sunday, February 8, 2026

मां की मेहनत से वैज्ञानिक बने थामस अल्वा एडिसन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मां के लिए दुनिया की विभिन्न भाषाओं में जितने भी शब्द प्रचलित हैं, वह उस भाषा का सबसे पवित्र शब्द होता है। मां से महान दूसरा कोई नहीं हो सकता है। मां अपने बच्चे के लिए दुनिया से लड़ सकती है। यही वजह है कि पूत कपूत हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती है। ऐसी मां थीं थामस अल्वा एडिसन की मां। 

उन्होंने अपनी सूझबूझ और बेटे के प्रति प्रेम के चलते सदी को महान वैज्ञानिक प्रदान किया। अमेरिका में 11 फरवरी 1847 में पैदा हुए थामस अल्वा एडिसन प्रारंभिक जीवन में मंद बुद्धि के थे। बात तब की है, जब थामस प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनके अध्यापक ने एडिसन को एक पत्र देते हुए कहा कि इसे अपनी मां को दे देना। उनकी मां नैन्सी मैथ्यूज इलियट ने जब वह पत्र पढ़ा, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। 

अपनी मां को रोता देखकर एडिसन ने पूछा कि मां, इसमें क्या लिखा है? उनकी मां ने फीकी मुस्कान के साथ कहा कि इसमें लिखा है कि आपका बच्चा कुछ ज्यादा ही होशियार है। हमारा स्कूल उसके स्तर का नहीं है, इसलिए हम उसे नहीं पढ़ा सकते हैं। इसके बाद एडिसन को पढ़ाने की जिम्मेदारी उनकी मां ने संभाली। शुरुआत में उन्हें बहुत परेशानी हुई, लेकिन अंतत: वह अपने उद्देश्य में सफल हो गईं। 

उनके बेटे ने इलेक्ट्रिक बल्ब जैसे कई महान आविष्कार किए। वह एक अमीर व्यवसायी बन गए। इसी बीच उनकी मां की मौत हो गई। एक दिन जब वह अपने घर में पुरानी चीजों को देख रहे थे, तो उनके हाथ पुराना पत्र लगा। उन्होंने खोलकर पढ़ा। उसमें लिखा था कि आपका बेटा बौद्धिक तौर पर काफी कमजोर है, उसे स्कूल न भेजें। यह पढ़कर एडिसन काफी देर तक रोते रहे।

मोबाइल फोन का अधिक उपयोग बच्चों का विकास कर रहा बाधित

अशोक मिश्र

कोई भी आविष्कार मानव समाज के लिए बुरा नहीं होता है, सिवाय परमाणु बम के आविष्कार के। अभी तक तोप, तलवार, बम, पिस्तौल जैसे अस्त्र-शस्त्र को ही मानव समाज के लिए घातक माना गया है। यह भले ही देश की सुरक्षा में अब उपयोग किए जाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि मानव की हत्या में ही काम आता हैं। अगर इन सब हथियारों की खोज नहीं हुई होती, तो शायद मानव समाज में अपेक्षाकृत ज्यादा शांति होती। इन सबके अलावा जितने भी आविष्कार हुए हैं, वह सब किसी न किसी रूप में मानव समाज के विकास में योगदान ही करते रहे हैं। लेकिन मानव समाज के लिए लाभदायक माने जाने वाली तकनीक का यदि दुरुपयोग करने पर कोई व्यक्ति उतारू हो जाए, तो समाज को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। अब मोबाइल फोन को ही लें। 

फोन का आविष्कार दूरदराज में बैठे लोगों से संवाद के लिए हुआ था। बात में इसमें सुविधाएं बढ़ती गई और इंटरनेट ने सूचनाओं का एक विशाल संसार खोल दिया। इसका उपयोग ज्ञान के लिए किया जाने लगा। यदि मोबाइल फोन का सही से इस्तेमाल किया जाए, तो यह छात्र-छात्राओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। यह बच्चों को भरपूर जानकारियां उपलब्ध करा सकता है। इसका उपयोग करके बच्चे अपने सिलेबस से इतर जानकारियां हासिल करके अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं। कोरोना काल में तो बच्चों ने मोबाइल के सहारे ही अपनी पढ़ाई जारी रखी थी। 

आनलाइन क्लासेस की वजह से ही उनका पाठ्यक्रम पूरा हो पाया था और बच्चे घर में रहकर सुरक्षित भी रहे। लेकिन जब इसका दुरुपयोग होने लगा, तो अभिभावकों को चिंता हुई। बच्चे पढ़ाई या मनोरंजन के नाम पर डिजिटल नशे का शिकार होने लगे। डिटिजल नशा उनके सिर पर इस कदर चढ़ा कि यदि मां-पिता ने उन्हें मोबाइल से दूर रखने का प्रयास किया, तो उन्होंने आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने से भी परहेज नहीं किया। गाजियाबाद की तीन बहनों की आत्महत्या एक गंभीर सवाल खड़े करती है। देश में बहुत सारे बच्चे हैं जो डिजिटल नशे के चलते अपना जीवन बरबाद कर रहे हैं। ज्यादा समय तक आन स्क्रीन रहने से बच्चों का शारीरिक-मानसिक विकास रुक जाता है। 

वह कई तरह की बीमारियों के शिकार होने लगते हैं। वह मोबाइल को ही अपना सच्चा साथी समझकर बाहरी दुनिया से कटने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि वह समाज और परिवार के साथ अपना सामांजस्य नहीं बिठा पाते हैं। ऐसी हालत में वह मेमोरी लॉस, चिड़चिड़ापन, विद्रोही, एकाग्रता की कमी और मोटापे का शिकार हो जाते हैं। मनोचिकित्सकों का यह भी मानना है कि कई बार बच्चे मानसिक तनाव को दूर करने के लिए मोबाइल का सहारा लेते हैं, लेकिन बाद में इसके गुलाम होकर रह जाते हैं।

Saturday, February 7, 2026

बिभा चौधरी जिसके नाम पर रखा गया तारे का नाम



बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कलकत्ता के जमींदार परिवार में 1913 को जन्मी बिभा चौधरी ने अपना पूरा जीवन विज्ञान को समर्पित कर दिया था। बिभा के पिता बाकूं बिहारी चौधरी और मां उर्मिला ने ब्रह्म समाज की सदस्यता ग्रहण कर ली थी जिसकी वजह से हिंदू समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया था। उनके पिता एक चिकित्सक थे। उनके माता-पिता यह मानते थे कि लड़कियों को भी पढ़ने-लिखने का पूरा अधिकार है। 

बिभा की बचपन से ही विज्ञान में काफी रुचि थी। सन 1936 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में एमएससी करने वाली वह अकेली छात्रा थीं। पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद वह उसी भौतिकी विभाग में प्रोफेसर देवेन्द्र मोहन बसु की देखरेख में शोध करने के लिए जुड़ गईं। सन 1938 से 1942 तक दार्जिलिंग की ऊंची पहाड़ियों पर कास्मिक किरणों पर अध्ययन किया। उन्होंने मेसॉन नामक कण की पहचान की।

इससे जुड़े तीन शोधपत्र नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुए।इसके बात तो बिभा चौधरी का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हो गया। इसके बाद कई अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलनों में भाग लेने का मौका मिला। वह भारत की प्रमुख महिला वैज्ञानिक के रूप में पहचानी जाने लगी थीं। उन्होंने वर्ष 1955 में इटली में पीसा में आयोजित मूल अणुओं पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी भाग लिया। 

विज्ञान के क्षेत्र में बिभा चौधरी ने बहुत अधिक योगदान दिया। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने 2019 में पृथ्वी से 340 प्रकाश वर्ष दूर एक तारे का नाम बिभा रखा है। यह किसी वैज्ञानिक के लिए सबसे बड़े सम्मान की बात है। आजीवन शोध कार्य में ही लगी रहने वाली बिभा चौधरी ने विवाह नहीं किया। 2 जून 1991 में कोलकाता में ही इस महान महिला वैज्ञानिक ने 77 साल की आयु में दुनिया छोड़ दी। 

प्रतिभाओं को निखारने के लिए खेल नर्सरियों की संख्या बढ़ाएगी सरकार


अशोक मिश्र

हरियाणा की सैनी सरकार पिछले साल 28 जनवरी से 14 फरवरी तक उत्तराखंड में आयोजित हुए 38वें राष्ट्रीय खेलों के पदक विजेताओं को सम्मानित करने जा रही है। पिछले साल हुए राष्ट्रीय खेल में हरियाणा के खिलाड़ियों ने 48 स्वर्ण, 47 रजत और 58 कांस्य पदक जीते थे। खेल चाहे अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हो या राष्ट्रीय स्तर का, हरियाणा के खिलाड़ी पदक जीतने में सबसे आगे रहते हैं। हरियाणा के खिलाड़ियों का जोश और जुनून खेल प्रतिस्पर्धाओं में देखते ही बनता है। 

वैसे भी अन्य राज्यों की अपेक्षा हरियाणा अपने खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने, उनके लिए सुविधाएं मुहैया कराने और उन्हें पुरस्कार देने के मामले में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला राज्य है। सरकार ने तो पूरे राज्य में डेढ़ हजार खेल नर्सरियां खोल रखी हैं। इन नर्सरियों में 37 हजार से अधिक खिलाड़ी अभ्यास करते हैं। पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की अनुमति खेल विभाग ने मांगी है। सैनी सरकार बहुत जल्दी राज्य में खेल नर्सरियों की संख्या तीन हजार से अधिक करने जा रही है। 

इन नर्सरियों में बच्चों को छोटी उम्र से ही प्रशिक्षण दिया जा रहा है।  यही वजह है कि सभी तरह की प्रतिस्पर्धाओं में हरियाणा के खिलाड़ी आगे रहते हैं। हरियाणा के सबसे ज्यादा खिलाड़ियों ने प्रदेश और देश का नाम विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में रोशन किया है जिनमें भाला फेंक में पानीपत के नीरज चोपड़ा, कुश्ती में सोनीपत के योगेश्वर दत्त और रवि कुमार दहिया, झज्जर के बजरंग पुनिया, रोहतक की साक्षी मलिक,  विनेश फोगाट, बबीता फोगाट, गीता फोगाट, संग्राम सिंह आदि प्रमुख हैं। 

मुक्केबाजी में विजेंद्र सिंह, विकास कृष्ण यादव, मनोज कुमार, अमित पंघाल, अखिल कुमार, स्वीटी बूरा, नीतू घनघस का नाम उल्लेखनीय है। हाकी में कुरुक्षेत्र की रानी रामपाल, सिरसा की सविता पूनिया, नवजोत कौर, नवनीत कौर, मोनिका मलिक, नेहा गोयल का नाम गर्व के साथ लिया जाता है। निशानेबाजी में झज्जर की मनु भाकर, यशस्विनी देसवाल, अमन, सर्वजोत सिंह और पैरालिंपिक सुमित अंतिल, मनीष नरवाल, अमित सरोहा, प्रणव सुरमा, नितेश कुमार प्रमुख हैं। पर्वतारोहण में संतोष यादव, ममता सौदा, अनीता कुंडू आदि ने प्रदेश को गौरव दिलाया है। 

प्रदेश सरकार ने वर्ष 2014 से लेकर अब तक लगभग 709 करोड़ रुपये करीब 17 हजार खिलाड़ियों को पुरस्कार देने पर खर्च किए हैं। पिछले साल से अब तक 662 खिलाड़ियों को 109 रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की जा चुकी है। हरियाणा की खेल नीतियां खिलाड़ियों को बहुत भा रही हैं। सरकार हर स्तर का पुरस्कार जीतने वाले खिलाड़ी को प्रोत्साहित जरूर करती है। यही कारण है कि दूसरे राज्यों ने भी हरियाणा की खेल नीतियों का अनुसरण करना शुरू कर दिया है, ताकि उनके यहां भी खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिले। 

Friday, February 6, 2026

परमाणु के बारे में पता लगाने वाले महर्षि कणाद


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महर्षि कणाद का जन्म कब हुआ था, इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण तो नहीं मिलते हैं, लेकिन माना जाता है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी से दूसरे शताब्दी के बीच पैदा हुए होंगे। कुछ लोगों ने ईसा से तीन सौ साल पहले उनका जन्म माना है। कहते हैं कि जब किसान खेत से फसल काट लेते थे, तो खेत में फसल के दाने बिखर जाते थे, उन्हीं दोनों को इकट्ठा करके वह अपना काम चलाते थे। 

फसल के इन दानों को कन यानी कण कहा जाता था, इससे ही उनका नाम कणाद पड़ा। प्राचीन भारतीय प्रकृति वैज्ञानिकों और दार्शनिकों में उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है क्योंकि वह भारतीय जगत में भौतिकी के जन्मदाता भी कहे जा सकते हैं। उन्होंने ही द्रव्य में परमाणु को मूल आधार मानते हुए परमाणु को अविभाज्य बताया था। 

कहा जाता है कि तत्कालीन राजा को जब यह जानकारी मिली कि कणाद खेतों से कन बीनकर अपना गुजारा करते हैं, तो उन्होंने बहुत सा धन देकर अपने मंत्री को कणाद के पास भेजा। कणाद ने धन लेने से मना करते हुए मंत्री से कहा कि इस धन को उन लोगों में बांट दो जिन्हें इसकी बहुत जरूरत है। इस प्रकार राजा ने तीन बार अपने मंत्री को भेजा, लेकिन कणाद ने धन नहीं लिया। 

आखिर में राजा खुद कणाद के पास पहुंचा, कणाद ने इस बार भी धन लेने से मना करते हुए कहा कि मैं इस धन को लेकर क्या करूंगा। मैं पहले से ही अमीर हूं। आपकी संपदा तो एक दिन नष्ट हो जाएगी, लेकिन मेरे पास जो संपदा है, वह कभी नष्ट नहीं होगी। कणाद की यह बात सुनकर राजा समझ गया कि कणाद के लिए भौतिक संपदा कोई मायने नहीं रखती है। वह उन्हें प्रणाम करके राजमहल लौट गया।

ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों के लिए साबित हो रही जानलेवा

अशोक मिश्र

आन लाइन गेमिंग की लत बच्चों के लिए जानलेवा साबित होने लगी है। जरूरत से ज्यादा मोबाइल पर समय बिताने वाले बच्चों का मानसिक विकास तो रुक ही रहा है, वह उग्र भी होते जा रहे हैं। कई देशों ने तो बच्चों को कम से कम आॅन स्क्रीन रखने के लिए अपने यहां कठोर नियम बनाए हैं। आस्ट्रेलिया जैसे देशों ने तो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को  सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया है।

भारत में भी बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने के लिए नियम बनाने पर विचार किया जा रहा है। बच्चों के ज्यादा मोबाइल या कंप्यूटर पर समय बिताने की वजह से वह अवसाद के शिकार हो रहे हैं। गाजियाबाद के साहिबाबाद इलाके में रहने वाली तीन नाबालिग लड़कियों निशिका, पाखी और प्राची ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। वह कोरियन गेम्स के पीछे दीवानी थीं। इन तीनों बहनों की दीवानगी इस हद तक थी कि वह हर समय कोरियन गेम्स खेलती रहती थीं। इन्होंने तो गूगल के सहारे कोरियन भाषा भी सीख ली थी और आपस में कोरियन भाषा में बातचीत भी करती थीं। 

तीन साल पहले फेल हो जाने की वजह से इनकी पढ़ाई छूट गई थी। पंद्रह दिन पहले इनके पिता ने इनका मोबाइल छीन लिया था जिससी वजह से यह तीनों बहनें परेशान थी और अंतत: मंगलवार की देर रात दो बजे तीनों बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने उन अभिभावकों को चिंता में डाल दिया है जिनके बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय आन स्क्रीन बिताते हैं। वैसे कुछ लोगों की आदत होती है, बच्चों को बिजी रखने के लिए वह अपना मोबाइल पकड़ा देते हैं।

 वह यह भी जांचने की जहमत नहीं उठाते हैं कि उनके बच्चों ने मोबाइल या कंप्यूटर पर क्या देखा, क्या पढ़ा? गेमिंग की लत ते चलते बच्चों के आत्महत्या कर लेने की बहुत सारी घटनाएं देश और विदेश में हो चुकी हैं। पिछले एक दशक से टॉरगेट देने वाले गेम्स बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। ब्ल्यू वेल चैलेंज, द पास आउट चैलेंज, द सॉल्ट ऐंड आइस चैलेंज, द फायर चैलेंज और द कटिंग चैलेंज जैसे गेम्स बच्चों को टारगेट देकर आत्महत्या करने को प्रेरित करते हैं। वैसे तो ब्ल्यू वेल चैलेंज की शुुरुआत पिछले दो महीने से ही हुई है, लेकिन अब तक इस चैलेंज की वजह से 130 जानें जा चुकी हैं।

द पास आउट चैलेंज को चोकिंग गेम भी कहा जाता है। इसमें बच्चों को अपना गला दबाना होता है। हर साल अमेरिका में 250 से 1000 तक जानें चली जाती हैं। द साल्ट एंड आइस चैलेंज भी बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। द फायर चैलेंज में युवाओं को अपने शरीर पर आग लगाना होता है। द कटिंग चैलेंज गेम में भाग लेने वाले को अपने शरीर पर घाव करना होता है। जैसे-जैसे गेम आगे बढ़ता है, खेल अधिक से अधिक खतरनाक होता जाता है।