Friday, September 25, 2026

वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग दिया था। उनका गृह त्याग उस युग की सबसे परिवर्तनकारी घटना साबित हुई थी। एक ऐसा राजकुमार जिसके पास सुख-सुविधा के सारे उपकरण मौजूद हों, उस समय की सबसे सुंदर स्त्री उनकी पत्नी हो। एक पुत्र भी हो जिसको अभी राजकुमार सिद्धार्थ ने ठीक से उसे देखा भी नहीं था। 

ऐसे में वह दूसरों के दुखों से द्रवीभूत होकर संन्यासी हो जाए, सचमुच यह एक अद्भुत घटना थी। लोगों के कल्याण के लिए ऐश्वर्य त्याग देना, सचमुच बड़े साहस का काम है। गृह त्याग के बाद सिद्धार्थ ने छह साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अपने शरीर को विभिन्न तरह के कष्ट दिए, लेकिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। बोधगया में निरंजना नदी के किनारे पीपल वृक्ष के नीचे 49 दिनों तक कठोर तपस्या की। 

इस तपस्या के ही दौरान एक दिन कुछ महिलाएं बड़े ही मधुर स्वर में गाती हुई जा रही थीं। उन दिनों जब महिलाएं लंबी यात्रा करती थीं, तो थकान मिटाने के लिए कुछ समूह में गाती हुई जलती थीं, ताकि थकान की अनुभूति न हो। वह स्त्रियां गा रही थीं जिसका मतलब था कि वीणा के तारों को इतना ढीला मत छोड़ो कि उससे मधुर ध्वनि ही न निकल सके। वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वह टूट जाएं। 

महिलाओं का गायन सिद्धार्थ के कानों में पड़ा, तो वह समझ गए कि शरीर को कष्ट देना तपस्या नहीं है। उसी दिन उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त हुआ और राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए। उन्हें समझ में आ गया था कि अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए शरीर को कष्ट देना उचित नहीं है। संयमित जीवन, खान-पान, विश्राम, निद्रा आदि से आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने सारनाथ में पहला उपदेश दिया।

हर अतिक्रमण के खिलाफ होनी चाहिए लगातार कठोर कार्रवाई


अशोक मिश्र

हरियाणा में सड़कों, बाजारों और गलियों में फैला अतिक्रमण अब एक आम दृश्य बन चुका है। चाहे शहर हो या कस्बा, लगभग हर जगह फुटपाथों पर दुकानें, ठेलों की कतारें, निर्माण सामग्री के ढेर और अनधिकृत निर्माण नजर आते हैं। इससे आम नागरिकों को रोजाना भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। सड़कें संकरी हो जाती हैं, यातायात जाम लगता है और पैदल चलने वालों के लिए जगह नहीं बचती। 

बाजारों में खरीदारी के दौरान भीड़ और अव्यवस्था के कारण समय और मेहनत दोनों बर्बाद होते हैं। यह समस्या सिर्फ व्यवस्था की नहीं है, यह सीधे तौर पर जनजीवन, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी है। सड़कों पर दुकानदारों द्वारा सामान बाहर तक लगा देना, रेहड़ी-पटरी वालों का स्थायी रूप से एक ही जगह घेर लेना, मकान मालिकों द्वारा रैंप और चबूतरे को सड़क तक बढ़ा देना और बिल्डरों द्वारा पार्किंग की जगह पर दुकानें बना देना, ये सब इसी अतिक्रमण के अलग-अलग रूप हैं। 

परिणाम सामने है। सड़कों की चौड़ाई आधी रह जाती है। दो गाड़ियों के निकलने की जगह पर एक भी मुश्किल से निकल पाती है। पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ बचा ही नहीं, इसलिए वे सड़क पर चलने को मजबूर होते हैं और यही छोटी सी लापरवाही बड़े सड़क हादसों का कारण बन जाती है। एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपात सेवाएं जाम में फंस जाती हैं। बाजारों की स्थिति और भी बदतर है। त्योहारों पर तो आलम यह होता है कि ग्राहक दुकान तक पहुंच ही नहीं पाता है। 

भीड़, अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग मिलकर खरीदारी को एक सजा बना देते हैं। बेरोजगारी, बढ़ती आबादी और शहरी योजनाओं की कमी इन प्रवृत्तियों को और मजबूत बनाती है। इनके खिलाफ कार्रवाई सख्त और निरंतर होनी चाहिए। नगर निगम और नगर महापालिका को नियमित अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाना चाहिए। उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाना, बार-बार दोषी पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई करना और जरूरत पड़ने पर निर्माण सामग्री या सामान जब्त करना आवश्यक है। 

ऐसा नहीं है कि जिलों में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है, लेकिन जो होती है, वह ज्यादातर दिखावटी और मौसमी होती है। अगर प्रशासन लगातार निगरानी रखे, दोषियों को समान रूप से सजा दे और वैकल्पिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तो स्थिति में सुधार संभव है। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी कि सार्वजनिक जगह किसी की निजी संपत्ति नहीं है। जब तक समाज में यह चेतना नहीं आएगी कि अतिक्रमण न केवल अवैध है बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन भी है, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। हरियाणा जैसे विकासशील राज्य में अगर शहरी प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए और नियमों को बिना भेदभाव लागू किया जाए तो सड़कें, बाजार और गलियां फिर से सुचारु और सुरक्षित हो सकती हैं।

Thursday, September 24, 2026

मुझे इसकी लीला देखने का सुयोग नहीं मिलेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ, तो पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन ने राज महल को पूरी तरह सजाया। दूर-दूर से राजा, सामंत, श्रेष्ठि और नागरिक राज कुमार सिद्धार्थ के दर्शन करने और आशीर्वाद देने आए। महाराज शुद्धोदन और महारानी महामाया अत्यंत प्रसन्न थे। महात्मा बुद्ध से जुड़े कुछ ग्रंथों के मुताबिक लुंबिनी में एक उद्यान में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ था और उनकी मां महामाया की तत्काल मृत्यु हो गई थी। 

ज्यादातर लोग मानते हैं कि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद उनकी मां की मृत्यु हुई थी। खैर, राजकुमार सिद्धार्थ को देखने जब दूर-दूर से लोग आ रहे थे, तो उन्हीं दिनों हिमालय से एक वृद्ध साधु उन्हें देखने आया। जब नवजात सिद्धार्थ को उस साधु के सामने लाया गया। पिता ने साधु के चरणों में सिद्धार्थ को रखते हुए कहा कि महात्मन! इस बच्चे को आशीर्वाद दें कि यह यशस्वी हो, दीर्घायु हो, प्रतापी हो। 

साधु पहले तो कुछ क्षण तक निर्निमेष उन्हें देखता रहा और फिर वह फूट-फूटकर रोने लगा। महाराज शुद्धोदन यह देखकर घबरा गए। उन्होंने आशंकित होकर साधु से पूछा, कुछ अपशकुन की आशंका है क्या, मान्यवर। आप मुझे बताएं क्या बात है? महाराज की बात सुनकर कुछ देर तक चुप रहा और फिर बोला, महाराज! किसी प्रकार के अपशकुन की आशंका नहीं है। आप चिंतित न हों। 

मैं तो यह सोचकर रो रहा हूं कि जिसे खोजते-खोजते सारी उम्र बीत गई, उसका जन्म अब हो रहा है। मैं इस बालक की लीलाओं को नहीं देख पाऊंगा। मैं इनके चरणों में बैठकर आत्म ज्ञान हासिल नहीं कर पाऊंगा, यही सोचकर मुझे रोना आ गया। महाराज, आप धन्य हैं जो ऐसे यशस्वी बालक के पिता हैं। यह कहकर साधु चला गया।

हरियाणा में नार्को टेरर नेटवर्क का पर्दाफाश एटीएस की बड़ी सफलता


अशोक मिश्र

हरियाणा एंटी टेररिस्ट स्क्वाड ने बहुत ही काबिले तारीफ काम किया है। उसने देश के सामने एक अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा  किया है। घटना 13 सितंबर 2026 की है। इस दिन सुबह पंचकूला के सेक्टर-11 स्थित अलिफ लैला क्लब में फायरिंग हुई। फायरिंग में एक युवती घायल हुई। पुलिस ने मामले की जब जांच शुरू की, तो मामला पहले आपसी झगड़े का लगा, लेकिन जब हरियाणा पुलिस की जांच आगे बढ़ी, तो सारी परतें खुलती चली गईं। इस जांच को गंभीरता को देखते हुए एंटी टेररिस्ट स्क्वाड को जिम्मा सौंपा गया। वहीं से अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा हुआ। 

एटीएस ने अब तक तीन मौके से, एक एसएएस नगर से और तीन लुधियाना से कुल मिलाकर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि आरोपी अमेरिका सहित विदेश में बैठे हैंडलरों के निर्देश पर काम कर रहे थे। ये हैंडलर स्थानीय लोगों को रहने की जगह, वाहन और पैसा उपलब्ध कराते थे ताकि सीमा पार से ड्रोन के जरिए आने वाले नशीले पदार्थों, हथियारों और ड्रग मनी को निर्धारित जगहों तक पहुंचाया जा सके।  यह घटना बताती है कि नार्कोटिक्स का कारोबार और आतंकी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ गई हैं। 

नशीले पदार्थों की तस्करी से कमाए गए पैसे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों और हथियारों की खरीद में हो रहा है। स्थानीय नार्को कारोबारी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़कर आतंकियों के लिए काम कर रहे हैं या उनके साथ मिलकर साझा हित साध रहे हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सिर्फ छापेमारी काफी नहीं है। यह बात हरियाणा एटीएस भी जानती है। इसलिए एटीएस ने सबसे पहले फाइनेंशियल और ड्रोन ट्रेल को तोड़ने जैसा काम शुरू किया है। सप्लाई चेन, हथियार के स्रोत और विदेशी हैंडलरों के पैसे का रास्ता खंगाला जा रहा है। 

दूसरी ओर एटीएस ने दक्षिण हरियाणा के नूंह, पलवल, फरीदाबाद, गुरुग्राम बेल्ट में इंटेलिजेंस को मजबूत करना शुरू कर दिया है, जहां सीसीटीवी, किराएदार सत्यापन और साइबर पेट्रोलिंग को एक साथ क्रियान्वित करना शुरू कर दिया है। फरीदाबाद के अल-फलाह जैसे संस्थानों में अपनी जड़ें जमा रहे आतंकियों के मामले दिखाते हैं कि पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी ऑनलाइन ग्रूमिंग का शिकार हो रहे हैं, इसलिए मदरसों, यूनिवर्सिटीज और यूट्यूब इन्फ्लुएंसर इकोसिस्टम पर निगरानी के साथ-साथ सामुदायिक पुलिसिंग जरूरी है। 

एटीएस ने इस पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। हरियाणा एटीएस का गठन जून 2026 में हुआ। यह सीआईडी के अधीन काम करता है। पंचकूला तथा गुरुग्राम में इसके केंद्र हैं। इसमें एनएसजी जैसी कमांडो फोर्स, इंटेलिजेंस विंग, जांच इकाई और काउंटर-रैडिकलाइजेशन सेल शामिल हैं। गठन के कुछ ही महीनों में पंचकूला क्लब फायरिंग मामले में नार्को-टेरर नेटवर्क का पदार्फाश इसकी पहली बड़ी सफलता है। 


Wednesday, September 23, 2026

और राज कुमार बदल गया



बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के ही जीवनकाल में एक राजा था। वह बहुत ही दयालु और प्रजापालक था। उसकी महारानी भी अपने महाराज के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी। लेकिन इस राज दंपति को एक ही कष्ट था। उनका पुत्र बहुत ही क्रूर और उदंड था। वह अपनी मनमानी हरकतों से पूरी प्रजा को परेशान किए रहता था। राजा ने उसे बहुत सुधारने की कोशिश की। 

महारानी भी अपने पुत्र को समय समय पर सुधारने का प्रयत्न करती रहती थी। राज्य की प्रजा को अपने राजा और महारानी से बहुत प्रेम था, लेकिन वह राजकुमार से घृणा करती थी। राज्य की जनता में राजकुमार के प्रति विरोध बढ़ता जा रहा था। किसी तरह यह बात महात्मा बुद्ध के कानों तक पहुंची। उन्होंने राजकुमार को सुधारने का फैसला किया। वह उस राजा के राज्य में पहुंचे। 

महात्मा बुद्ध ने राज कुमार को अपने पास बुलाने की अपेक्षा खुद उसके पास पहुंचे। राजा-रानी ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया। मौका देखकर बुद्ध ने राज कुमार बातचीत करते हुए टहलने लगे। वह टहलते-टहलते एक नीम के पौधे के पास पहुंचे और राज कुमार से कहा कि तुम इस पेड़ के पत्ते को देखो तो कैसा है? राज कुमार ने नीम का एक पत्ता तोड़कर मुंह में डाला। चबाते ही उसने क्रोध में आकर उस पौधे को जड़ से उखाड़ डाला।

 महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस पौधे क्यों उखाड़ डाला? राज कुमार ने कहा कि जब यह पौधा है, तो इतना कड़वा है। बड़ा होगा, तो यह विष की तरह कड़वा होगा। महात्मा बुद्ध ने कहा कि यदि तुम्हारे व्यवहार से क्रुद्ध होकर जनता भी वैसा व्यवहार करे, जैसा तुमने नीम के साथ किया है, तो क्या होगा? यह सुनकर राज कुमार अवाक रह गया। उसकी समझ में आ गया था कि महात्मा बुद्ध उसे क्या समझाना चाहते हैं। उसी दिन से राजकुमार बदल गया।

अरावली क्षेत्र में शोर शराबा करने वाले बाइक राइडर्स पर अंकुश जरूरी

अशोक मिश्र

सेव अरावली जैसी संस्थाओं ने अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए सराहनीय कार्य किया है। इस संस्था ने अब फरीदाबाद पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर अरावली क्षेत्र के शांत और संवेदनशील वन क्षेत्र में वीकेंड पर स्टंट करने और मॉडिफाइड बाइकों से तेज आवाज करने वाले राइडर्स ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनकी यह मांग जायज भी है। इन बाइक राइडर्स की वजह से अरावली क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। अरावली पर्वत श्रृंखला जो लगभग 150 करोड़ वर्ष पुरानी है, गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक फैली हुई है। 

यह पाँच राज्यों के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करती है। थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकना, मानसून को थामना, भूजल स्तर को बनाए रखना और दिल्ली-एनसीआर जैसे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र के लिए फेफड़ों का काम करना, ये सभी कार्य अरावली करती है। लेकिन आज जो व्यवस्था पूरे उत्तर-पश्चिम भारत को प्रदूषण से बचा रही थी, वही खुद वायु प्रदूषण, धूल, अवैध खनन, कचरा डंपिंग और सबसे नया खतरा ध्वनि प्रदूषण का शिकार बन रही है। खनन, अतिक्रमण, शहरीकरण और बढ़ते मानवीय दबाव के अलावा हाल के वर्षों में सप्ताहांत पर आने वाले ग्रुप बाइकर्स का शोर-शराबा भी इसके संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। 

ट्रस्ट का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर से बड़ी संख्या में आने वाले ये बाइकर्स लगातार हॉर्न बजाते, मॉडिफाइड साइलेंसर से तेज आवाज निकालते और अत्यधिक गति से दौड़ते हुए वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास में ध्वनि प्रदूषण, व्यवधान, भय और तनाव पैदा करते हैं। आसपास के गांवों में भी बुजुर्गों और ग्रामीणों को इससे परेशानी होती है तथा सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। वन्य जीवों पर इस तरह के शोर का प्रभाव बहुआयामी होता है। जानवर शोर को खतरे के संकेत के रूप में ग्रहण करते हैं। वे पहले सतर्क होते हैं, फिर स्थिति का आकलन करते हैं और अंतत: भाग खड़े होते हैं। 

वैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया है कि लगातार ध्वनि प्रदूषण से वन्य जीवों में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता घटती है, हृदय गति बिगड़ती है और वे अपना प्राकृतिक आवास छोड़कर आबादी वाले इलाकों की ओर भागने लगते हैं। आवागमन बढ़ने से सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ती है, जिससे धूल उड़ती है, मिट्टी का कटाव होता है, वनस्पति नष्ट होती है और वन्य जीव गलियारे खंडित हो जाते हैं। सेव अरावली जैसी संस्थाओं की मांगें इस दिशा में दबाव बना रही हैं कि सामान्य यातायात नियमों से आगे बढ़कर पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाए जाएं। 

बढ़ते आवागमन और शोर से होने वाले सूक्ष्म लेकिन दीर्घकालिक नुकसान को भी गंभीरता से लिया जाना आवश्यक है, ताकि यह पर्वतमाला न केवल मानव आबादी बल्कि वन्य जीवों के लिए भी सुरक्षित बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा तथा संतुलित पर्यावरण उपलब्ध कराया सके।


Tuesday, September 22, 2026

मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ के संबंध में यह बहुप्रचलित घटना है। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन की दो पत्नियां थीं, महामाया और महाप्रजापति गौतमी। महामाया और गौतमी दोनों सगी बहनें थीं। महामाया ने एक ही पुत्र सिद्धार्थ को जन्म दिया था और कुछ ही दिनों बाद उनकी मौत हो गई थी, जबकि गौतमी ने पुत्र नंद और पुत्री नंदा को जन्म दिया था। एक बार की बात है। 

राजकुमार सिद्धार्थ राजवन में टहल रहे थे। उनके साथ मंत्री पुत्र देवदत्त भी था। इतने में सिद्धार्थ ने राजहंसों को आकाश में उड़ते हुए देखा। उन्होंने देवदत्त से कहा कि देखो, राजहंस आकाश में विचरते हुए कितने सुंदर लग रहे हैं। यह देखकर देवदत्त ने अपने तरकश से तीर निकाला और धनुष पर चढ़ाकर प्रत्यंचा खींच दी। तीर जाकर आकाश में उड़ रहे एक राजहंस के लगा और वह जमीन पर आ गिरा। 

घायल हंस को देखकर सिद्धार्थ का मन चीत्कार कर उठा। वह आंखों में अश्रु लिए उस हंस के पास पहुंचे और उसे उठाकर तीर निकाला और उसे बचाने का जो भी उपाय संभव था, वह किया। देवदत्त ने हंस पर अपना अधिकार बताते हुए मांगा। राजकुमार सिद्धार्थ ने हंस को देने से मनाकर दिया। राजपुत्र होने से देवदत्त उस समय तो सिद्धार्थ से कुछ नहीं कह सका, लेकिन उसने हंस पर अधिकार जताने के लिए राजा के यहां मामला पहुंचा दिया। राजदरबार में दोनों ने अपना-अपना पक्ष रखा। 

सिद्धार्थ ने कहा कि मारने वाले से बचाने वाले का अधिकार ज्यादा होता है। अपने ही पुत्र का मामला होने से राजा शुद्धोदन फैसला नहीं कर पा रहे थे। अंत में उन्होंने हंस को मंगाया और उसे राज दरबार में छोड़ दिया। कहा कि यह हंस जिसके पास चला जाएगा, हंस पर उसका अधिकार होगा। अंतत: हंस सिद्धार्थ के पास गया और इस तरह हंस पर राजकुमार सिद्धार्थ का अधिकार हुआ।

शिक्षा व्यवस्था को रोजगार, बाजार से और अधिक जोड़ने की जरूरत

 अशोक मिश्र

लाडवा इलाके के गांवों में रविवार को आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने दावा किया कि पिछले बारह साल में दो लाख से अधिक युवाओं को बिना पर्ची-बिना खर्ची के सरकारी नौकरी दी गई। मुख्य रूप से यह बात सत्ताधारी दल के आधिकारिक बयानों पर आधारित है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और राज्य सूचना विभाग ने बार-बार यह आंकड़ा दोहराया है। 

हालांकि विपक्ष इस दावे पर सवाल उठाता है। वे कहते हैं कि स्थायी नियमित पदों पर भर्ती अपेक्षाकृत कम हुई है और कई नियुक्तियां संविदात्मक या हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से हुई हैं। रोजगार एक्सचेंजों में पंजीकृत बेरोजगार युवाओं की संख्या चार लाख से अधिक बताई जाती है। इसमें बारहवीं पास युवा सबसे अधिक हैं। इसके बाद स्नातक और स्नातकोत्तर का नंबर आता है। कई जिलों जैसे हिसार, जींद, कैथल और सिरसा में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या विशेष रूप से ऊंची है। 

बेरोजगारी सबसे अधिक शिक्षित युवाओं में दिखती है। स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री धारक, खासकर कला और सामान्य विषयों वाले युवा, नौकरी बाजार में सबसे अधिक संघर्ष कर रहे हैं। इसके विपरीत तकनीकी, व्यावसायिक और कौशल आधारित कोर्स करने वाले युवा अपेक्षाकृत आसानी से रोजगार पा रहे हैं। आईटी, कंप्यूटर एप्लिकेशन, नर्सिंग, पैरामेडिकल, होटल मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स, आॅटोमोबाइल और निर्माण संबंधी डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स वाले युवाओं को उद्योगों और सेवा क्षेत्र में अवसर मिल रहे हैं। हरियाणा में उद्योग, निर्माण, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र के विस्तार के कारण ये कौशल मांग में हैं। 

वर्तमान में सबसे फायदेमंद पढ़ाई वही है जो डिग्री के साथ कौशल जोड़ती हो, जैसे बीसीए के साथ क्लाउड, बीएससी नर्सिंग, जर्मन या जापानी भाषा के साथ केयरगिवर कोर्स, हरियाणा में विदेश रोजगार के लिए ड्राइविंग और हॉस्पिटैलिटी प्रशिक्षण लेना लाभदायक है। केवल डिग्री हासिल करने से रोजगार की गारंटी नहीं रह गई है। बेरोजगारी का राज्य की अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव पड़ रहा है। 

युवा शक्ति का सही उपयोग न होने से उत्पादकता और उपभोग दोनों प्रभावित होते हैं। साथ ही बेरोजगारी भत्ते और कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च बढ़ता है। कौशल आधारित शिक्षा और बाजार उन्मुख कोर्स वर्तमान समय में अधिक फायदेमंद साबित हो रहे हैं। अर्थव्यवस्था पर बेरोजगारी का दबाव तो है, लेकिन उद्योग और सेवा क्षेत्र के विस्तार से अवसर भी पैदा हो रहे हैं। योजनाएं राहत दे रही हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगार बाजार से और अधिक जोड़ने की जरूरत है। युवाओं के जीवन में स्थिरता तभी आएगी जब मेरिट आधारित स्थायी रोजगार के अवसर और व्यावहारिक कौशल दोनों साथ-साथ बढ़ेंगे।


Monday, September 21, 2026

वैशाली को पराभूत देखना चाहते हैं सम्राट

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के सम्राट बिंबिसार को उनके पुत्र अजातशत्रु ने राज्य हथियाने के लिए उन्हें बंदी बना लिया था। बंदीगृह में उन्हें भूखा रखा गया, प्रताड़ित किया गया। इसी प्रताड़ना के चलते बिंबिसार की मृत्यु हो गई। इसके बाद अजातशत्रु निरंकुश हो गया। महात्मा बुद्ध से प्रभावित होने के बावजूद उसकी राज्य लिप्सा कम नहीं हुई। एक दिन जब महात्मा बुद्ध राजगृह बाहरी इलाके में स्थित गृध्रकूट आश्रम में पधारे, तो अजातशत्रु ने अपने मगध महामात्य वस्सकार को उनकी सेवा में भेजा और उनसे निवेदन करने को कहा। 

काफी देर तक बुद्ध का प्रवचन सुनने के बाद एकांत में कस्सकार ने कहा, भगवन! सम्राट वैशाली गणराज्य को पराभूत देखना चाहते हैं। कोई उपाय बताएं। उसकी बात सुनने के बाद तथागत गंभीर हो गए। उन्होंने पास बैठे अपने परम शिष्य आनंद से पूछा कि यह बताओ, क्या वज्जियों के सन्निपात यानी संसद अधिवेशन बार-बार होते हैं? आनंद ने कहा, हां। 

तब बुद्ध ने फिर पूछा, भंते! क्या वज्जि संघबद्ध रहकर उद्यम करते हैं, वह राष्ट्रीय कर्तव्यों को मिलजुलकर करते हैं? क्या वैशाली का शासक सभा द्वारा नियमपूर्व स्वीकृत हुए बिना कोई आदेश पारित नहीं करते हैं? स्वीकृत विधि विधान का नियमपूर्वक पालन करते हैं? क्या उनके यहां सारे नियमों का पालन होता है? क्या वैशाली राज्य में बुजुर्गों का सम्मान होता है? उनके आदेशों का पालन होता है? क्या वैशाली में कुमारियों और महिलाओं का आदर सम्मान होता है? क्या नौकरों-चाकरों का सम्मान होता है, उनकी रक्षा की जाती है?

आनंद ने कहा, हां भगवन! वैशाली में यह सब कुछ होता है। महात्मा बुद्ध की मुख मुद्रा गंभीर हो गई। वह महामात्य वस्सकार की ओर देखते हुए आनंद से बोले, तो आनंद, यह धर्म गणतंत्र के प्राण तत्व हैं। जब तक लिच्छवि इनका पालन करते रहेंगे, वे अविजेय रहेंगे। यह सुनकर कस्सकार लौट गया।

अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला सराहनीय


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला लिया है। यह गणना नौ साल बाद होने जा रही है। राज्य सरकार का यह फैसला सराहनीय और स्वागतयोग्य है। जीवों की गणना का इंतजार पर्यावरण प्रेमियों के साथ-साथ वन विभाग भी कर रहा था। आखिरी व्यापक गणना वर्ष 2017 में हुई थी, जबकि उससे पहले 2012 में हुई थी यानी 2017 के बाद से वैज्ञानिक तरीके से गिनती नहीं हुई है।   

वन्य जीवों की गणना सिर्फ संख्या गिनने का आंकड़ा नहीं होता है, यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का हेल्थ कार्ड होता है। इससे यह भी पता चलता है कि किस प्रजाति की आबादी बढ़ रही है, किसकी घट रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? उनका आवास कितना सुरक्षित है और मानव दबाव का असर कितना है। इसी के आधार पर राज्य सरकार बजट, स्टाफ, वाटर होल, कॉरिडोर और मुआवजा नीति आदि तय करती है। 

अगर गणना न हो तो वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बनाई गई योजनाएं अंधेरे में तीर चलाने जैसा साबित होती हैं। 2017 की रिपोर्ट में दक्षिणी हरियाणा की अरावली में तेंदुए, लकड़बग्घा, सियार और कई अन्य प्रजातियाँ दर्ज की गई थीं, परंतु पिछले वर्षों में आवास में बदलाव, शहरीकरण और मानव हस्तक्षेप के कारण स्थिति बदल चुकी है। इसलिए नई गणना जरूरी हो गई है। अरावली क्षेत्र की प्रधानता की बात करें तो यहां का असली शासक तेंदुआ है जो शीर्ष शिकारी के रूप में पूरे तंत्र को संतुलित रखता है, लेकिन संख्या के लिहाज से सबसे अधिक नीलगाय, बंदर और सियार हैं। 

अरावली में कई जीव विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके हैं या संकटग्रस्त हैं। इनमें भारतीय भेड़िया, रेगिस्तानी लोमड़ी, कैरकल, रस्टी स्पॉटेड कैट तथा कुछ स्थानों पर चिंकारा और स्लोथ बियर शामिल हैं। इनके घटने का मुख्य कारण आवास का विखंडन, खनन, शहरीकरण, सड़क निर्माण तथा पानी के स्रोतों का सूखना है। जंगल सिकुड़ने से शिकार की कमी हो जाती है और जानवर मानव बस्तियों की ओर बढ़ने को मजबूर हो जाते हैं जहाँ वे दुर्घटना या संघर्ष का शिकार हो जाते हैं। यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अरावली की जैव विविधता और अधिक क्षतिग्रस्त हो सकती है। 

नई गणना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है जो सही आंकड़ों के आधार पर प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ बनाने में मदद करेगी। नौ साल बाद होने वाली यह गणना अगर ट्रैप, ट्रांसेक्ट और ड्रोन तीनों तरीकों से हुई तो यह बताएगी कि अरावली सच में जी रहा है या सिर्फ कैमरे में जीता हुआ दिख रहा है, और उसी के आधार पर तय होगा कि आने वाले दशक में यहां तेंदुआ दहाड़ेगा या सिर्फ कहानियों में रहेगा। फरीदाबाद के धौज गांव में हरियाणा का पहला निगरानी केंद्र भी इसी लिए बन रहा है जहां से हर दो साल में गणना और सतत निगरानी की योजना है।