Saturday, October 10, 2026

The only way to keep the mind pure is self-research.


bodhi tree

Ashok Mishra

Buddha always preached to people in simple language and in context related to life. This is why common people can understand his teachings and implement them in their lives. He always talked about practical matters. Once upon a time. Mahatma Buddha was preaching self-welfare to the people in the Dharma Sabha. One of his disciples asked, Lord! Man remains entangled in so many situations, he cannot get rid of them. 

In such a situation, how can he benefit himself? The path of life seems very difficult, then how can he find the path of liberation in life? Gautam Buddha said that self-research is the only way to lead a man to the path of duty and dharma. 

A man should think in his mind what kind of shortcomings he has due to which he is not able to walk on the path of self-welfare. Self-research is the path on which man can not only make his life happy but can also benefit himself. Gautam Buddha presented the example of a woman and said, what does a woman do every day? The first thing she does when she wakes up in the morning is look at her face in the mirror. She makes every possible effort to make her face clear and beautiful. She sees in the mirror that if there is any dirt on her face, she immediately removes it.

 If it doesn't go away, she washes her face with clean water and cleans it with a cloth. Similarly, man should also observe the evils within and outside himself. If even a slight deficiency is noticed, then efforts should be made to remove it. The only way to keep body and mind pure is self-research.

मन को शुद्ध रखने का उपाय ही आत्म शोध है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने हमेशा लोगों को सरल भाषा और जीवन से जुड़े संदर्भ में ही उपदेश दिए। यही कारण है कि उनके उपदेशों को सामान्य जन समझ सके और अपने जीवन में उसे उतार सके। वह हमेशा व्यावहारिक बात ही किया करते थे। एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध धर्म सभा में लोगों को आत्म कल्याण का उपदेश दे रहे थे। उनके एक शिष्य ने पूछा कि भगवन! मनुष्य इतने प्रसंगों में उलझा रहता है, उसे उससे ही छुटकारा नहीं मिलता है। 

ऐसे में वह आत्म कल्याण कैसे करे? जीवन की राह बहुत कठिन प्रतीत होती है, फिर वह जीवन में मुक्ति का मार्ग कैसे पा सकता है? गौतम बुद्ध ने कहा कि आत्म शोध ही मनुष्य को अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर ले जाने का एक मात्र रास्ता है। मनुष्य को अपने मन में विचार करना चाहिए कि उसमें किस तरह की कमियां हैं जिसके कारण वह आत्म कल्याण के पथ पर नहीं चल पा रहा है। 

आत्म शोध की वह पथ है जिस पर चलकर मनुष्य न केवल अपने जीवन को सुखी बना सकता है, बल्कि अपना कल्याण कर सकता है। गौतम बुद्ध ने एक स्त्री का उदाहरण पेश करते हुए कहा कि एक स्त्री रोज क्या करती है? वह सुबह उठकर सबसे पहले दर्पण में अपना चेहरा निहारती है। 

वह अपने चेहरे को निर्मल और सुंदर बनाने का हर संभव प्रयास करती है। दर्पण में वह देखती है कि चेहरे पर यदि कहीं कोई गंदगी लगी है, तो वह उसे तुरंत हटाती है। नहीं हटा, तो वह साफ पानी से चेहरा धोती है, कपड़े से साफ करती है। इसी तरह मनुष्य को भी अपने भीतर और बाहर की बुराइयों का निरीक्षण करना चाहिए। यदि तनिक भी कमी दिख जाए, तो उसे प्रयत्न करके हटाना चाहिए। शरीर और मन को शुद्ध रखने का उपाय ही आत्म शोध है।

अपने दो साल के कार्यकाल का हिसाब तैयार कर रही सैनी सरकार

अशोक मिश्र

भाजपा सरकार आगामी 17  अक्टूबर को सत्ता की हैट ट्रिक लगा लेगी। सैनी सरकार के दूसरे टर्म के दो साल भी पूरे हो जाएंगे। अपने दो साल की उपलब्धियों को लेकर सैनी सरकार एक रिपोर्ट कार्ड तैयार करने जा रही है।  सरकार इस दो साल के कार्यकाल को नॉन-स्टॉप विकास और जवाबदेही के रूप में प्रस्तुत कर रही है। स्वयं सैनी ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि उनके दो साल की पहचान जवाबदेही है।  योजनाएं केवल कागजों पर घोषणाएं बनकर नहीं रहनी चाहिए। सरकार के रिपोर्ट कार्ड का सबसे बड़ा दावा संकल्प पत्र को लेकर है। 

भाजपा ने 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले 217 संकल्पों वाला संकल्प पत्र जारी किया था। अलग-अलग मंचों पर मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि इनमें से 70 वादे 18 महीनों के भीतर पूरे कर दिए गए हैं। बाकी 147 पर तेजी से काम चल रहा है। शुरुआत में सौ दिन पूरे होने पर सरकार ने 18 संकल्प पूरे करने का दावा किया था। रोजगार के मोर्चे पर सरकार का मुख्य नारा बिना पर्ची-बिना खर्ची के पारदर्शी भर्ती रहा है। मुख्यमंत्री का दावा है कि उनकी सरकार 60 हजार से अधिक युवाओं को बिना भ्रष्टाचार और सिफारिश के नौकरी दे चुकी है, जबकि पिछले 12 सालों में दो लाख से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरी देने की बात कही जा रही है। 

उद्योग के क्षेत्र में जीटी रोड बेल्ट में इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप के लिए किसानों से जमीन आमंत्रित करना, जापानी कंपनियों के साथ पांच हजार करोड़ निवेश का एमओयू और 2024-25 में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत 761 मामलों में लगभग 5064 करोड़ रुपये के लोन स्वीकृत करना भी रोजगार सृजन से जोड़ा जा रहा है। इसके अलावा हरियाणा देश का पहला राज्य बना जिसने अग्निवीरों के लिए राज्य पुलिस में 20 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की। कृषि के क्षेत्र में सरकार हरियाणा को देश का इकलौता राज्य बताती है जहाँ 24 फसलों पर एमएसपी दी जा रही है। 

इसी को किसान कल्याण का सबसे बड़ा सबूत बताया गया है। दो साल बाद भी जिन समस्याओं का समाधान सैनी सरकार नहीं निकाल पाई है उनमें बेरोजगारी की धारणा, कानून-व्यवस्था और नशे का मुद्दा प्रमुख है। सरकार नशा विरोधी यात्रा और युवाओं को खेल से जोड़ने की बात कर रही है, लेकिन नशे के बढ़ते मामलों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। इसके अलावा भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे नेताओं का आरोप है कि दो सालों में हरियाणा विकास के हर पैमाने पर पिछड़ गया है और मुख्यमंत्री के पास राज्य के लिए समय ही नहीं है। 

एमएसपी पर खरीद, डीएपी की समय पर उपलब्धता, शहरी प्रदूषण और गुरुग्राम-फरीदाबाद जैसे एनसीआर शहरों में जलभराव और ट्रैफिक की समस्या भी ऐसी चुनौतियां हैं जिनका स्थायी समाधान अभी होना बाकी है। वैसे देखना यह होगा कि सरकार अपने रिपोर्ट कार्ड में क्या कहती है।

Friday, October 9, 2026

A lie does not last long before the truth.


Bodhi tree

Ashok Mishra

The path of life of Mahatma Buddha was never easy. He continued to struggle with conflicting forces throughout his life. Some people think that after attaining enlightenment, Buddha continued to receive respect everywhere. His followers were always engaged in his protection. Whoever came before him became his follower. It was nothing like that. Buddha had many opponents and he kept plotting something or the other against him. 

Once Mahatma Buddha was passing through a state in which the number of people who disliked him was very high. He never missed any opportunity to harass the Tathagat and cast aspersions on him. When he was told that Gautam Buddha had come to the city to give a sermon. Then they hatched a conspiracy. He prepared a woman and that woman wrapped clothes around her stomach like a pregnant woman and reached the place where Mahatma Buddha was preaching in the Dharma Sabha. 

She went to the assembly and started shouting, look at this hypocritical man. He roams around like a great Mahatma. He has made me pregnant and doesn't even accept me. Now he is sitting here preaching. Hearing this, there was commotion in the meeting. Buddha's disciple got scared. He asked Buddha, Lord! What will happen now? 

Buddha smiled and said, lies never last. Don't worry. Coincidentally, when she was making a thunderous noise in front of the women's gathering and trying to assassinate the character of Buddha, her girdle became loose and fell on the ground. That woman's secret was revealed. She felt embarrassed. He confessed the truth before the Synod. People were ready to beat him, then Buddha stopped them and said that fallen people already die. In such a situation, there is no point in inflicting physical pain. The woman felt ashamed and went away from there.

सच के आगे झूठ ज्यादा देर नहीं टिकता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के जीवन की राह कभी आसान नहीं रही। वह परस्पर विरोधी शक्तियों से आजीवन संघर्ष करते रहे। कुछ लोग समझते हैं कि बुद्ध को बुद्धत्व प्राप्त होने के बाद हर जगह मान-सम्मान मिलता रहा। उनके अनुयायी हमेशा उनकी सुरक्षा में लगे रहे। जो भी उनके सामने आता था, वह उनका अनुयायी बन जाता था। ऐसा कुछ नहीं था। बुद्ध के बहुत सारे विरोधी थे और वह उनके खिलाफ कोई न कोई साजिश रचते रहते थे। 

एक बार महात्मा बुद्ध एक ऐसे राज्य से गुजर रहे थे जिसमें उनको नापंसद करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा थी। वह तथागत को परेशान करने, उन पर लांक्षन लगाने का कोई भी अवसर चूकते नहीं थे। जब उन्हें यह बता चला कि गौतम बुद्ध नगर में प्रवचन देने आए हैं। तब उन्होंने एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने एक महिला को तैयार किया और वह महिला पेट में कपड़े लपेटकर गर्भवती स्त्री की तरह उस जगह पहुंची, जहां धर्म सभा में महात्मा बुद्ध प्रवचन दे रहे थे। 

वह धर्मसभा में जाकर चिल्लाने लगी, देखो इस ढोंगी आदमी को। यह बहुत बड़ा महात्मा बना फिरता है। इसने मुझे गर्भवती कर दिया है और मुझे अपनाता भी नहीं है। अब यहां बैठा उपदेश कर रहा है। यह सुनकर सभा में खलबली मच गई। बुद्ध का शिष्य घबराया। उनसे बुद्ध से पूछा, भगवन! अब क्या होगा? बुद्ध मुस्कुराए और बोले, झूठ कभी नहीं टिकता है। चिंता मत करो। 

संयोग से जब वह महिला सभा के सामने गरज-गरज कर बुद्ध के चरित्र हनन का प्रयास कर रही थी, तभी उसकी करधनी ढीली होकर जमीन पर गिर पड़ी। उस महिला का राज खुल गया। वह शर्मसार हो गई। उसने धर्मसभा के सामने सच्चाई स्वीकार कर ली। लोग उसे मारने-पीटने के लिए उद्यत हो गए, तब बुद्ध ने लोगों को रोकते हुए कहा कि पतित लोग पहले ही मर जाते हैं। ऐसे में शारीरिक पीड़ा देने का कोई अर्थ नहीं है। वह स्त्री लज्जित होकर वहां से चली गई।

कांग्रेस और सपा में दरार की बात सच है या कोरी कल्पना?

अशोक मिश्र

पिछले तीन दिनों से इंडिया गठबंधन के सांसद सड़क पर हैं। आज भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में सांसद और इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को कार्यकर्ता राजघाट पहुंच चुके हैं। पुलिस ने राजघाट के सभी द्वारों पर बैरिकेडिंग लगाकर अंदर जाने का रास्ता बंद कर दिया है। इंडिया गठबंधन के सांसदों का कहना है कि वह राजघाट जाकर बापू के सरकार को सद्बुद्धि देने की प्रार्थना करेंगे। 

पिछले तीन दिनों से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया गठबंधन का प्रदर्शन दिल्ली में चल रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ियां हैं। इसके सहारे वोट चोरी हो रही है, इसलिए विपक्ष ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, एसआईआर रद्द करने और बैलेट पेपर पर चुनाव कराने की मांग कर रहा है। 

सात अक्टूबर को नई दिल्ली के जनपथ स्थित सागर रत्ना रेस्टोरेंट में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा आयोजित लंच के बाद करीब सौ सांसद जंतर-मंतर की ओर रवाना हुए। इसी लंच को लेकर विवाद खड़ा हुआ। बुधवार 6 अक्टूबर को सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन से पहले खड़गे ने सभी विपक्षी पार्टियों के साथ मीटिंग बुलाई थी, लेकिन उसमें समाजवादी पार्टी का कोई सांसद शामिल नहीं हुआ। इसके बाद अटकलें लगीं कि इंडिया गठबंधन में दरार है। इस पर दो अलग-अलग दावे सामने आए। 

सपा सूत्रों ने दावा किया कि कांग्रेस ने उन्हें इस लंच के लिए आमंत्रित ही नहीं किया था। वहीं कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि लंच के लिए इंडिया गठबंधन के सभी दलों को आमंत्रित किया गया था। लंच का फैसला कल देर रात लिया गया और उसी समय जानकारी दी गई, इसलिए स्वाभाविक था कि कुछ दलों के प्रतिनिधि शामिल नहीं हो सके। कुछ दलों के प्रतिनिधि देर से सूचना के कारण शामिल नहीं हो सके। इसमें अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, शिवसेना उद्धव और एनसीपी शरद पवार गुट के लोग थे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि इंडिया गठबंधन में कोई दरार नहीं है। इसी बीच उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर खींचतान की खबरें भी सामने आ रही हैं। 

कांग्रेस सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि वह कम से कम 150 सीटों की मांग कर रही है, जबकि सपा खेमे से 50 से 53 सीटें से लेकर 85-90 सीटें देने तक की अलग-अलग चर्चाएं चल रही हैं। एक अन्य रिपोर्ट में 53 से 55 सीटों का आॅफर बताया जा रहा है। अखिलेश यादव ने भी हाल में कहा था कि किसको कितनी सीट मिलेगी यह बड़ी बात नहीं, गठबंधन की जीत ज्यादा जरूरी है। भविष्य में राजनीतिक समीकरण क्या रूप अख्तियार करता है, इसके बारे में ठीक-ठीक कह पाना संभव नहीं है। लेकिन वर्तमान में जो हालत है, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इंडिया गठबंधन में दरार की बात कोरी कल्पना है।

Thursday, October 8, 2026

Wealth Is Not Needed for Spiritual Well-being


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Buddhist literature abounds with stories concerning the Buddha and the Bodhisattvas. The Bodhisattva tales recount the stories of Gautama Buddha's past lives. Through their characters, these stories illustrate virtues such as purity, compassion, a sense of duty, and non-violence. Among these Buddhist tales is the story of a merchant named Shaur Puchchha. According to the story, Shaur Puchchha was an extremely wealthy merchant.

He was renowned for his generosity and was a devoted follower of Gautama Buddha. He harbored a deep desire to contribute to the Sangha (the monastic community). Once, Gautama Buddha was seated with his disciples, engaged in a discourse on the Dharma. Shaur Puchchha arrived and humbly stated, "I possess one hundred thousand gold coins. I wish to donate them to the Sangha so that arrangements for food, clothing, and other necessities can be made for the people." Upon hearing this, the Buddha silently rose and went to rest.

Shaur Puchchha sat there for a long time, pondering what mistake he might have made that caused the Buddha to leave without a word. By chance, he met the Buddha again some time later. Shaur Puchchha said to the Tathagata, "I have some gold ornaments that I wish to offer to the Sangha." Once again, the Buddha remained silent. A few days later, a grand religious assembly was organized in Vaishali, drawing thousands of people.

Everyone was occupied with some task or another. Shaur Puchchha arrived and, without asking anyone, set to work. The assembly concluded, and the people departed, yet Shaur Puchchha continued to work, completely absorbed in the task. At midnight, the Buddha approached him and asked, "My child, have you partaken of the *Prasad* (sanctified offering)?" Shaur Puchchha was overcome with emotion, his voice choking with feeling, and he prostrated himself fully before the Buddha. Buddha said that wealth is not required for spiritual well-being; all that is needed is devotion. Shaur Puchh had found the path to spiritual well-being.


आत्म कल्याण के लिए धन की जरूरत नहीं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध साहित्य में बुद्ध और बोधिसत्व से संबंधित तमाम कथाएं भरी पड़ी हैं। बोधिसत्व महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं बताई गई हैं। यह कथाएं जीवन में शुचिता, दया, कर्तव्यबोध और अहिंसा जैसे गुणों की पात्रों के माध्यम से व्याख्या करती हैं। इन्हीं बौद्ध साहित्य में शौर पुच्छ बनिक की एक कथा भी कही गई है। कथा के मुताबिक शौर पुच्छ एक बहुत ही धनवान व्यापारी था। 

वह अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। वह गौतम बुद्ध का एक अनन्य भक्त था। वह संघ के लिए बहुत कुछ करना चाहता था। एक बार की बात है। गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए धर्मचर्चा कर रहे थे। तभी वहां पर शौर पुच्छ वहां पर आया और उसने बड़ी विनम्रता से कहा कि मेरे पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएं हैं। मैं इन स्वर्ण मुद्राओं को संघ को देना चाहता हूं ताकि लोगों के लिए भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था किया जा सके। यह सुनकर बुद्ध चुपचाप वहां से उठे और विश्राम करने चले गए। 

वहां पर बैठा शौर पुच्छ काफी देर तक सोचता रहा कि उससे क्या गलती हुई जो बुद्ध बिना कुछ कहे सुने उठकर चले गए। एक दिन संयोग से उसकी मुलाकात फिर हुई। शौर पुच्छ ने तथागत से कहा कि मेरे पास कुछ स्वर्ण आभूषण हैं। यह मैं संघ को देना चाहता हूं। इस बार भी बुद्ध चुप रहे। कुछ दिनों बाद वैशाली में एक विशाल धर्म सभा का आयोजन किया गया। हजारों लोग जमा हुए थे। 

सभी लोग किसी ने किसी काम में लगे हुए थे। शौर पुच्छ वहां पहुंचा और बिना किसी से कुछ पूछे वह काम में लग गया। धर्मसभा खत्म हुई। लोग चले गए। शौर पुच्छ बेसुध काम करता रहा। आधी रात को बुद्ध उसके पास पहुंचे और कहा, वत्स! तुमने प्रसाद ग्रहण किया? शौर पुच्छ का गला रुंध गया। उसने बुद्ध को साष्टांग प्रणाम किया। बुद्ध ने कहा कि आत्म कल्याण के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती है। इसके लिए बस निष्ठा की जरूरत होती है। शौर पुच्छ को आत्मकल्याण का मार्ग मिल चुका था।

एसआईआर विवाद का टकराव से नहीं पारदर्शिता से निकलेगा समाधान


अशोक मिश्र

देश में इस समय चुनाव आयोग को लेकर बना माहौल चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष का प्रदर्शन और मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नारेबाजी, ये दोनों घटनाएं एक बड़े टकराव का हिस्सा हैं जिसका केंद्र है एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण। एसआईआर कोई नई व्यवस्था नहीं है। यह मतदाता सूची को साफ करने की एक विशेष प्रक्रिया है जिसे तब अपनाया जाता है, जब मृत मतदाताओं के नाम, एक ही व्यक्ति के कई जगह नाम, पते बदलने और फर्जी नाम जुड़ने की शिकायतें बड़े पैमाने पर मिलती हैं। 

सामान्य पुनरीक्षण हर साल होता है, लेकिन एसआईआर गहन जांच के लिए कराया जाता है।  बिहार में 24 जून 2025 को इसके लिए आदेश जारी हुआ। बाद में दूसरे राज्यों में भी इसे लागू किया गया। विवाद की शुरुआत इसके बड़े पैमाने और गति को लेकर हुई। विपक्ष का कहना है कि बहुत कम समय में लाखों नामों का सत्यापन किया गया जिससे कई वास्तविक मतदाता भी सूची से बाहर हो गए। कुछ खबरों में यह भी आया कि आयोग के अंदर ही इस प्रक्रिया के तकनीकी बदलावों पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने असहमति दर्ज कराई थी। आयोग ने स्पष्ट किया कि संस्थागत फैसलों में अलग अलग राय आना सामान्य है। 

अंतिम आदेश सर्वसम्मति से जारी किया गया था। एसआईआर के साथ फॉर्म 6 का विवाद जुड़ गया जिसने आग में घी का काम किया। इस मामले में सबसे बड़ा पेच तब आया जब आयोग ने कहा कि इस अतिरिक्त घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है जबकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अदालत में स्पष्ट किया कि अदालत ने किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी थी, उसने केवल स्वघोषणा के सिद्धांत को सही माना था। इसी पृष्ठभूमि में वोट चोरी का आरोप लगाया जा रहा है। विपक्ष खासकर कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा और एनडीए गठबंधन को फायदा पहुंचाने के लिए लक्षित तरीके से विरोधी मतदाताओं के नाम काटे गए और फर्जी मतदाता जोड़े गए। 

इस आरोप के पीछे तीन आधार बताए जा रहे हैं। पहला कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता संख्या में असामान्य वृद्धि या कमी के आंकड़े। दूसरा बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा बिना फील्ड वेरिफिकेशन के नाम हटाने की शिकायतें। तीसरा फॉर्म छह की अतिरिक्त शर्त को जानबूझकर कठिन बनाना। इस गतिरोध का समाधान टकराव से नहीं पारदर्शिता से निकलेगा। सबसे पहले एसआईआर के तहत हटाए गए और जोड़े गए नामों की बूथवार सूची सार्वजनिक कर सभी दलों को डिजिटल रूप में दी जानी चाहिए ताकि कोई भी दल घर बैठे जांच कर सके। 

चुनाव आयोग के प्रति अविश्वास लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उसकी गलती हो सकती है, उसकी आलोचना जरूरी है लेकिन उसे राजनीतिक विरोधी मानकर घेरने से अराजकता ही बढ़ेगी। भरोसा तभी लौटेगा जब प्रक्रिया अधिक खुली, जांच योग्य और सबकी भागीदारी वाली बनेगी।

Wednesday, October 7, 2026

The Purpose of Life is to Walk the Path of Knowledge

Bodhi Vriksha

Ashok Mishra

Sudatta was an immensely wealthy merchant of Shravasti (Savatthi). He was also known as Anathapindaka because he was always at the forefront of arranging food and education for the poor and orphaned children in and around Shravasti. He never hesitated to do good for others. It was for this reason that he was called Anathapindaka. He had purchased a forest belonging to Jeta—the son of King Prasenajit—at a high price and dedicated it to Mahatma Buddha. 

That forest is known as Jetavana. It still exists in Shravasti today. Once, Mahatma Buddha was delivering a sermon to his disciples in Jetavana. All the disciples were striving to internalize every single word spoken by the Tathagata. Just then, Mahatma Buddha saw Mahakashyapa, Maudgalyayana, Sariputra, Chunda, and Devadatta approaching. The Tathagata instructed his disciple Anathapindaka, "My child, rise! A group of Brahmins is approaching; arrange suitable seats befitting them." Anathapindaka was taken aback. 

He said, "Lord! Perhaps you do not recognize them. Only one among them is a Brahmin; the others belong to the Kshatriya, Vaishya, and 'Untouchable' castes." Hearing this, Buddha smiled and said, "My child, caste is not determined by birth but by qualities, temperament, and deeds. By their deeds, all of them are indeed Brahmins." 

As they drew closer, one of them praised Anathapindaka; Buddha remarked that the only shortcoming Anathapindaka had was that he had not yet grasped the true purpose of life. Had he understood that the purpose of life is to become altruistic rather than selfish, he would not have spoken in that manner. Walking the path of wisdom is more important than merely being wise. Hearing this, Anathapindaka felt humbled and grasped the essence of the Buddha's words; the true purpose of life is to walk the path of wisdom.