Saturday, November 7, 2026

Vigilance and Strict Enforcement Needed to Prevent Building Collapses

Ashok Mishra

On Thursday morning, another building collapsed in the Chawri Bazar area of ​​Old Delhi. Two laborers died when the three-story structure—currently under construction—caved in, leaving several others trapped beneath the debris. Following the incident, teams from the police, fire department, NDRF, and the municipal corporation spent hours engaged in rescue and relief operations. Preliminary investigations revealed that the building was being constructed without an approved plan. 

Work was underway on a third floor on a small plot of approximately 50 square meters; the structure collapsed while the roof slab was being poured. According to the municipal corporation, new construction was being carried out on the second and third floors under the guise of "repairs." The construction materials used did not meet prescribed standards, failing to bond or set properly. About five months earlier, in June, the Delhi Police had formally notified the municipal corporation about this illegal construction; however, the response was so sluggish and incomplete that the work continued—ultimately costing two laborers their lives. 

In the aftermath, three contractors were arrested, and two municipal engineers were suspended. The Delhi government has ordered an inquiry—a familiar, recurring pattern seen after every such tragedy: initial expressions of grief, followed by arrests and suspensions, then an investigation, and eventually, everything returns to the status quo. These accidents are not merely the result of negligence by a single individual or department; they represent a collective failure of the entire system. The primary responsibility lies with the building owners and contractors who, driven by the greed for profit, rental income, or the desire to add more rooms, disregard all regulations. They fail to obtain approved building plans, neglect to consult structural engineers, and resort to using cheap, substandard materials. Responsibility also rests with the engineers, architects, and supervisors tasked with overseeing construction quality—yet, in many instances, their involvement exists only on paper. 

The primary responsibility lies with the municipal corporation, local administration, and enforcement agencies—entities empowered to halt illegal construction, issue notices, seal structures, and demolish unauthorized buildings. Yet, even after receiving complaints or formal notifications from the police, they frequently fail to take timely action. When construction is allowed to reach a third floor despite reports of its illegality having been filed five months earlier, it points to more than mere negligence; it signals systemic corruption, collusion, staff shortages, and a profound lack of accountability. At the local level, bribery, political pressure, and a "we'll deal with it later" attitude often serve to shield illegal construction. Society, too, bears a share of the responsibility; tenants and neighbors often remain silent even when they observe warning signs—such as cracks in walls, a building leaning, unusual noises, or vibrations—fearing that raising an alarm could lead to eviction or conflict with the property owner. 

The scenario seen in Delhi is being repeated in cities across the country, revealing that this is not an isolated urban issue, but a national crisis rooted in rapid urbanization, poverty, and weak regulatory oversight. In July 2026, an illegal four-story building collapsed in Mankhurd, Mumbai, claiming the lives of six people, including five children. The structure had been built without authorization, with additional floors added unlawfully. Although the building began to lean hours before the collapse, residents in the nearby shanties could not escape in time. Similarly, in Lucknow’s Transport Nagar, the collapse of a three-story building resulted in eight deaths; investigations revealed that while permission had been granted for only two floors, a third had been constructed illegally. 

While these incidents occurred in different cities, they share a common root: unauthorized construction, excessive vertical expansion, the use of substandard materials, a disregard for safety, and a failure to intervene in time. Preventing such tragedies is not impossible; however, it requires shifting the focus from reactive measures taken after a disaster to establishing robust, proactive systems for prevention. First and foremost, a survey of every old, dilapidated, and hazardous building in the city must be conducted, with each structure categorized or marked based on its level of risk. A clear timeline—ranging from 24 to 72 hours—should be established for taking action upon receiving a complaint regarding illegal construction. 

There must be strict oversight of the quality of construction materials and the building process itself. Furthermore, the safety and training of laborers must be considered an integral part of accident prevention, as they are the first to be trapped when a building collapses. Ultimately, it must be understood that buildings do not collapse suddenly; the process is gradual—rules are broken, foundations weaken, cracks appear in the walls, officials turn a blind eye, and then, one morning, the entire structure is reduced to rubble. Preventing such incidents requires both vigilance and strict enforcement.

मकानों को गिरने से बचाने के लिए सतर्कता के साथ सख्ती जरूरी


अशोक मिश्र

दिल्ली में गुरुवार की सुबह पुरानी दिल्ली के चावड़ी बाजार इलाके में एक और इमारत भरभराकर गिर गई। निर्माणाधीन तीन मंजिला इमारत के ढहने से दो मजदूरों की मौत हो गई। कई लोग मलबे में दब गए। इसके बाद पुलिस, दमकल, एनडीआरएफ और नगर निगम की टीमें घंटों तक राहत और बचाव कार्य में जुटी रहीं। शुरुआती जांच में सामने आया कि यह इमारत बिना स्वीकृत नक्शे के बन रही थी। करीब 50 वर्ग मीटर के छोटे भूखंड पर तीसरी मंजिल का काम चल रहा था। छत का स्लैब डालते समय इमारत गिर गई। 

नगर निगम के अनुसार मरम्मत की आड़ में दूसरी और तीसरी मंजिल पर नया निर्माण कराया जा रहा था। निर्माण सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी जिससे वह ठीक से जमी भी नहीं थी। दिल्ली पुलिस ने करीब पाँच महीने पहले जून में ही इस अवैध निर्माण की सूचना नगर निगम को पत्र लिखकर दी थी, लेकिन कार्रवाई इतनी धीमी और अधूरी रही कि निर्माण चलता रहा। अंत में दो मजदूरों की जान चली गई। हादसे के बाद तीन ठेकेदारों को गिरफ्तार किया गया। नगर निगम के दो इंजीनियरों को निलंबित किया गया। 

दिल्ली सरकार ने जांच के आदेश दिए, मगर यह वही पुराना क्रम है जो हर हादसे के बाद दोहराया जाता है। पहले शोक, फिर गिरफ्तारी और निलंबन, फिर जांच और कुछ समय बाद सब कुछ पहले जैसा चलने लगता है। इन हादसों के पीछे केवल एक व्यक्ति या एक विभाग की लापरवाही नहीं है। पूरी व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। सबसे पहली जिम्मेदारी भवन मालिक और ठेकेदार की है, जो मुनाफे, किराये या अधिक कमरे बनाने की लालच में नियमों को ताक पर रख देते हैं। वे नक्शा तक पास नहीं कराते, स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सलाह नहीं लेते हैं। सस्ती और घटिया सामग्री इस्तेमाल करते हैं। जिम्मेदारी उन इंजीनियरों, आर्किटेक्टों और सुपरवाइजरों की भी है जिनका काम निर्माण की गुणवत्ता पर नजर रखना है, मगर कई जगहों पर वे कागजों पर ही मौजूद रहते हैं। सबसे बड़ी जिम्मेदारी नगर निगम, स्थानीय प्रशासन और प्रवर्तन तंत्र की है जिसके पास अवैध निर्माण रोकने, नोटिस देने, निर्माण सील करने और उसे गिराने का अधिकार है, लेकिन अक्सर शिकायत या पुलिस के पत्र के बाद भी समय पर कार्रवाई नहीं करते हैं। जब अवैध निर्माण की सूचना पाँच महीने पहले मिल चुकी थी, फिर भी तीसरी मंजिल तक काम पहुँच जाए, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार, मिलीभगत, स्टाफ की कमी और जवाबदेही के अभाव का संकेत है। 

कई बार स्थानीय स्तर पर रिश्वत, राजनीतिक दबाव और कुछ दिन बाद देख लेंगे वाली मानसिकता अवैध निर्माण को संरक्षण दे देती है। जिम्मेदारी समाज की भी है, जहां किराएदार या पड़ोसी दीवारों में दरार, इमारत का झुकना, आवाज आना या कंपन जैसे खतरे के संकेतों को देखकर भी चुप रहते हैं। उन्हें डर होता है कि शिकायत करने पर उन्हें घर खाली करना पड़ जाएगा या मालिक से झगड़ा हो जाएगा। दिल्ली जैसी ही कहानी देश के दूसरे शहरों में भी दोहराई जा रही है। इससे साफ होता है कि यह समस्या किसी एक शहर की नहीं, बल्कि शहरीकरण, गरीबी और कमजोर नियमन की राष्ट्रीय समस्या है। जुलाई 2026 में मुंबई के मानखुर्द में एक अवैध चार मंजिला इमारत गिरने से छह लोगों की मौत हो गई थी। इनमें पाँच बच्चे थे। वह इमारत बिना अनुमति बनी थी। उसमें अतिरिक्त मंजिलें जोड़ दी गई थीं। हादसे से कुछ घंटे पहले इमारत झुकने लगी थी। 

फिर भी पास की झोपड़ियों में रहने वाले लोग नहीं बच पाए। लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर में तीन मंजिला इमारत गिरने से आठ लोगों की मौत हुई थी। जांच में पता चला कि अनुमति केवल दो मंजिलों की थी, लेकिन तीसरी मंजिल अवैध रूप से बना दी गई थी। ये घटनाएँ अलग-अलग शहरों की लग सकती हैं, मगर इनकी जड़ एक ही है। बिना अनुमति निर्माण, भार से अधिक मंजिलें, घटिया सामग्री, सुरक्षा की अनदेखी और समय पर रोक न लगना। ऐसे हादसों को रोकना असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए हादसे के बाद की कार्रवाई से आगे बढ़कर हादसे से पहले की रोकथाम की व्यवस्था बनानी होगी।  सबसे पहले शहर की हर पुरानी, जर्जर और खतरनाक इमारत का सर्वेक्षण होना चाहिए और उसे रंग, श्रेणी या जोखिम के आधार पर चिह्नित किया जाना चाहिए। 

अवैध निर्माण पर शिकायत मिलते ही 24 से 72 घंटे के भीतर कार्रवाई की समय-सीमा तय होनी चाहिए। निर्माण सामग्री और निर्माण प्रक्रिया की गुणवत्ता पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए। मजदूरों की सुरक्षा और प्रशिक्षण को भी हादसों की रोकथाम का हिस्सा माना जाना चाहिए, क्योंकि इमारत गिरने पर सबसे पहले वे ही दबते हैं जो उसमें काम कर रहे होते हैं। अंत में यह समझना होगा कि इमारतें अचानक नहीं गिरतीं, वे धीरे-धीरे गिरती हैं, पहले नियम टूटते हैं, फिर नींव कमजोर होती है, फिर दीवारों में दरारें आती हैं, फिर अधिकारी आँखें मूँद लेते हैं और फिर एक सुबह पूरी इमारत मलबे में बदल जाती है। ऐसी घटनाओं को रोकना है, तो सतर्कता के साथ सख्ती बरतनी होगी।

Friday, November 6, 2026

Paving the Way for Evaluating Eligibility for Permanent Enrolment of Agniveers


Ashok Mishra

On November 4, 2026, the Union Cabinet approved a major change to the Agnipath scheme. This was announced by the Chief of Defence Staff, General NS Raja Subramani. Under this decision, Agniveers will be granted an optional two-year service extension following their initial four-year tenure, effectively increasing the total service duration from four to six years. This provision is specifically intended for the 75 percent of Agniveers who were previously slated to leave the service after the initial four-year term; they will now have the opportunity to remain in uniform for an additional two years. Furthermore, this opens a pathway for evaluating their eligibility for permanent enrolment. The impact of this decision on the Indian Army could be multifaceted. 

When the Agnipath scheme was launched in 2022, a primary concern was that approximately six to eight months of the four-year tenure were consumed by basic and trade training. Given that it takes another year to fully integrate into a unit and achieve operational proficiency, a soldier could contribute effectively to their battalion for only about two and a half years. This raised concerns regarding team bonding at the platoon level, mastery of weaponry, and a lack of experience in challenging environments, such as high-altitude regions. 

The two-year extension significantly bridges this gap. A six-year tenure ensures that, following training, a fully prepared soldier remains with their unit for approximately four and a half years—allowing them to experience two operational cycles and develop into a junior leader—while also providing the Army with a better return on its investment in the soldier. From the perspectives of logistics and human resource management, this will also foster greater stability. Instead of replacing 75 percent of the force every four years, there will now be a six-year rotation cycle, which will help alleviate some of the pressure on recruitment processes, training centres, and operational units. However, it remains true that the fundamental structure of the armed forces will, for now, continue to be short-term in nature. 

Even after six years, the majority of 'Agniveers' will have to leave the service; thus, concerns regarding long-standing regimental traditions and the continuity of the Junior Commissioned Officer (JCO) and Non-Commissioned Officer (NCO) cadres persist. For the youth, this decision undoubtedly serves as a significant relief and a source of encouragement. Over the past three years, the primary concern among Agniveers has been uncertainty about their future after the four-year tenure. With only 25 percent being selected for permanent service, many young recruits and their families perceived the role as merely a four-year job. In many coaching centers and rural areas, a prevailing belief had taken root that, after four years, these individuals would once again face unemployment. 

Now that the government—following a review—has acknowledged that the performance of the first batch warrants an extension, it sends a clear message to the youth that the scheme is not set in stone and remains open to improvement. This raises a critical question: is it appropriate to let a soldier go after four or six years of training and preparation? This is the most sensitive aspect of the scheme. On one hand, the military argues that modern warfare requires a younger profile—personnel who are tech-savvy and physically fit. Furthermore, reintegrating a large segment of the nation’s youth into society as disciplined human resources contributes to nation-building; those who leave the service can form a trained pool for roles in the police, paramilitary forces, corporate security, and disaster management. On the other hand, the process of molding a soldier extends far beyond mere physical training. The expertise they acquire—in weaponry, combat tactics, ethics, team spirit, and decision-making under extreme pressure—is the result of years of dedicated effort. 

If we completely release these battle-ready individuals after six years, the military loses a wealth of experience that would require an equivalent investment of time and resources to rebuild. Many former military officers believe that an ideal approach would have been to grant permanent status to at least 50 percent of the 'Agniveers'—or to retain them as part of a reserve force—so that they could be immediately recalled in the event of a war. Discharging them entirely represents a loss of investment for the military, while for the individual soldier, it entails an emotional setback, as they have come to fully identify as a member of the armed forces. 

Based on reports from the Parliamentary Standing Committee on Defence and various other estimates, the cost of preparing a single soldier is substantial. When one accounts for 36 to 44 weeks of basic training, followed by advanced military training, trade-specific training, live-fire drills, field exercises, as well as expenses for food, uniforms, accommodation, weaponry and ammunition, instructor salaries, and infrastructure, the estimated cost for the first year alone reaches approximately 10 to 12 lakh rupees. Ultimately, the future of the 'Agnipath' scheme will depend on how successful this six-year model proves to be in practice.

अग्निवीरों की स्थायी भर्ती के लिए पात्रता के मूल्यांकन का खुलेगा रास्ता


अशोक मिश्र

4 नवंबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अग्निपथ योजना में एक बड़े बदलाव को मंजूरी दी। इसकी घोषणा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने की। फैसले के तहत अग्निवीरों को अपने शुरुआती चार साल के कार्यकाल के बाद दो साल का वैकल्पिक सेवा विस्तार दिया जाएगा। यानी अब कुल सेवा अवधि चार से बढ़कर छह साल तक हो जाएगी। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन 75 प्रतिशत अग्निवीरों के लिए है जो पहले चार साल बाद सेवा से बाहर हो जाने थे। अब उन्हें दो और साल तक वर्दी में रहने का मौका मिलेगा। इसके बाद स्थायी भर्ती के लिए पात्रता के मूल्यांकन का रास्ता भी खुलेगा। 

इस फैसले का भारतीय सेना पर प्रभाव बहुआयामी हो सकता है। जब अग्निपथ योजना 2022 में शुरू हुई थी, तब सबसे बड़ी चिंता यह थी कि चार साल में से करीब छह से आठ महीने बुनियादी और ट्रेड प्रशिक्षण में चले जाते हैं। यूनिट में पूरी तरह घुलने-मिलने और आॅपरेशनल दक्षता हासिल करने में एक साल और लगता है, तो एक जवान मुश्किल से ढाई साल ही पूरी तरह प्रभावी सैनिक के रूप में बटालियन को दे पाता था। इससे पलटन स्तर पर टीम बॉन्डिंग, हथियारों पर महारत और हाई एल्टीट्यूड जैसे कठिन क्षेत्रों में अनुभव की कमी की आशंका जताई जा रही थी। दो साल का विस्तार इस गैप को काफी हद तक भरता है। 

छह साल का कार्यकाल मतलब है कि प्रशिक्षण के बाद लगभग साढ़े चार साल तक एक तैयार सिपाही यूनिट के साथ रहेगा, वह दो बार आॅपरेशनल साइकिल देखेगा, जूनियर लीडर के रूप में विकसित होगा और सेना को उस पर किए गए निवेश का बेहतर रिटर्न मिलेगा। लॉजिस्टिक और मानव संसाधन प्रबंधन के नजरिए से भी यह स्थिरता लाएगा। हर चार साल में 75 प्रतिशत बल को बदलने की जगह अब छह साल का रोटेशन होगा। इससे भर्ती, प्रशिक्षण केंद्रों और यूनिटों पर दबाव थोड़ा कम होगा। हालांकि, यह भी सच है कि सेना का मूल स्वरूप अभी  अल्पकालिक ही रहेगा। छह साल बाद भी अधिकांश अग्निवीरों को बाहर जाना होगा, इसलिए दीर्घकालिक रेजिमेंटल परंपरा और जेसीओ-एनसीओ कैडर की निरंतरता का सवाल पूरी तरह खत्म नहीं होता। युवाओं के मनोबल के लिहाज से यह फैसला निश्चित रूप से एक बड़ी राहत और प्रोत्साहन है। पिछले तीन सालों में अग्निवीरों के बीच सबसे बड़ी असुरक्षा यह थी कि चार साल बाद क्या होगा। 

पच्चीस प्रतिशत के स्थायी चयन का आंकड़ा सुनकर कई युवाओं और उनके परिवारों को लगता था कि यह सिर्फ चार साल की नौकरी है। कई कोचिंग सेंटरों और गांव-देहात में तो यह धारणा बन गई थी कि चार साल बाद वह फिर से बेरोजगार हो जाएंगे। अब जब सरकार ने खुद समीक्षा के बाद यह माना है कि पहले बैच के प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें और समय देना उचित है, तो यह युवाओं को यह संदेश देता है कि योजना पत्थर की लकीर नहीं है, इसमें सुधार की गुंजाइश है। अब सवाल आता है कि क्या एक सैनिक को चार या छह साल तक तैयार करने के बाद छोड़ देना उचित है। यह इस योजना का सबसे संवेदनशील पहलू है। एक तरफ सेना का तर्क  है कि आधुनिक युद्ध में युवा प्रोफाइल, तकनीक से लैस और शारीरिक रूप से फिट जवान चाहिए। 

देश की बड़ी युवा आबादी को अनुशासित मानव संसाधन के रूप में समाज में वापस भेजना राष्ट्र निर्माण है। जो अग्निवीर बाहर जाएंगे, वे पुलिस, अर्धसैनिक बलों, कॉर्पोरेट सुरक्षा और आपदा प्रबंधन में एक प्रशिक्षित पूल बनेंगे। दूसरी तरफ, एक फौजी को बनाने की जो प्रक्रिया है, वह सिर्फ शारीरिक कसरत नहीं है। उसे हथियार, युद्धकला, नैतिकता, टीम भावना और विषम परिस्थितियों में निर्णय लेने की जो घुट्टी पिलाई जाती है, वह वर्षों की मेहनत से बनती है। यदि हम छह साल बाद उस तैयार योद्धा को पूरी तरह से छोड़ देते हैं, तो सेना उस अनुभव को खो देती है जिसे दोबारा बनाने में फिर उतना ही समय और पैसा लगेगा। 

कई पूर्व सैन्य अधिकारियों का मानना है कि आदर्श स्थिति यह होती कि कम से कम पचास प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी किया जाता या उन्हें रिजर्व फोर्स के रूप में हमेशा के लिए सेना से जोड़े रखा जाता, ताकि युद्ध की स्थिति में उन्हें तुरंत वापस बुलाया जा सके। पूरी तरह से छोड़ देना सेना के लिए निवेश की हानि है और जवान के लिए भी एक भावनात्मक टूटन है, क्योंकि वह खुद को पूरी तरह फौजी मान चुका होता है। रक्षा मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्टों और विभिन्न अनुमानों के आधार पर एक सामान्य सैनिक को तैयार करने में काफी खर्च आता है। 

एक जवान की बुनियादी ट्रेनिंग 36 से 44 हफ्ते चलती है, फिर एडवांस मिलिट्री ट्रेनिंग, ट्रेड ट्रेनिंग, फायरिंग, फील्ड एक्सरसाइज, उसका खाना, वर्दी, आवास, हथियार-गोला-बारूद, प्रशिक्षकों का वेतन और इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च जोड़ लें तो पहले साल में ही लगभग 10 से 12 लाख रुपये तक का अनुमानित खर्च माना जाता है। अंतत: अग्निपथ योजना का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि छह साल वाला यह मॉडल जमीन पर कितना सफल रहता है।

Thursday, November 5, 2026

Saini government's land pooling policy is very beneficial for farmers

Ashok Mishra

Haryana Government has approved the Land Pooling Policy-2026 in the cabinet meeting held on November 3. This policy will replace the old policy by 2022. The objective of the decision taken under the chairmanship of Chief Minister Nayab Singh Saini is to end the old system of forced land acquisition and make farmers direct partners in development. In the new land pooling policy of Haryana, many such provisions have been added to keep the land mafia apart, which were either not there or were weak in the old policy of 2022. Actually, the game of land mafia starts when the government announces the development of an area. The mafia or its brokers go to the farmers and scare them that the government will buy your land cheaply, sell it to us now. The farmer panics and sells his land to anonymous people or shell companies at throwaway prices. Then the same land goes to the mafia in the form of expensive compensation or developed plot in the government records. 

The second method is heavy commission of middlemen and manipulation of papers. The new policy stops land mafia at many levels. Firstly, it is a completely voluntary acquisition and not a forced acquisition. When the government is not taking force then there is no need for the farmer to panic and sell cheaply. In this, the transaction takes place directly through the registration of sale deed. Rs 1 lakh per acre of interim assistance goes directly into the account of the land owner every year. If the money is not received within 15 days, there is a rule to pay nine percent annual interest, so that the money is not wasted in between. 

The commission of the land aggregator i.e. the person collecting the land has been fixed, he will get only 0.5 percent of the collector rate of the concerned revenue estate and that too will be given by the development agency, not the farmer. Now land pooling can be understood in this way. The government does not take the farmer's land forever by paying a fixed compensation, rather the farmer voluntarily gives his land to the pool for a big project. The government or its development agency develops that entire land by creating facilities like roads, electricity, water, sewerage etc. 

Then it returns a part of that developed land to the farmer. This is not a forced acquisition, this is a partnership. In the new policy, the same partnership formula has been decided that 50 percent of the total salable area of ​​the approved layout plan will be given to the land owners who gave the land and 50 percent will be with the development agency. Earlier there was a complicated provision of linking this 50 percent to the market price, which has now been removed and made directly on the basis of salable area so that there is transparency.  

The biggest benefit from this policy is to farmers and small and big land owners. They not only get developed plots whose market value is several times higher than their raw land, but also get interim financial assistance of Rs 1 lakh per acre every year for four years, i.e. a total of Rs 4 lakh in four years. Also, small owners have also been taken care of. Those whose contribution is less than 999 square meters will get compensation based on the developed plot as per the Land Acquisition Act 2013 or the reserve price, whichever is higher. Those whose contribution is more than 2000 square meters will get residential or industrial plots as well as commercial plots in the form of kiosks or booths. 

The minimum plot size is also fixed, 100 square meters for residential, 250 square meters for industrial and 500 square meters for institutional. The second benefit is to the government and development authorities. They get relief from the burden of farmers' protests, years-long lawsuits in courts and huge compensation amount for land acquisition and the land is available without dispute. The third benefit is to the general public and the development of the state, because when land is easily available, projects will be completed on time. To ensure this, in the new policy the time limit for completing the project has been reduced from five years to four years. If the agency does not complete the work on time, the land will be returned to the land owner. 

If land pooling was not allowed, the loss would have been at many levels. The government would again have to resort to the Forceful Land Acquisition Act, which often resulted in conflicts between farmers and the government over compensation, agitations and cases stuck in courts for years. This would have stalled residential and industrial projects in fast growing cities like Gurugram, Faridabad, Sonipat. The farmer received only a one-time fixed compensation, which was often lower than the market rate, and he did not get any benefit from the huge increase in the price of the land after it was developed, thus destroying his economic security.

किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है सैनी सरकार की लैंड पूलिंग नीति


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने 3 नवंबर को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी दी है। यह पॉलिसी 2022 की पुरानी नीति की जगह लेगी। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में लिए गए फैसले का मकसद जबरन भूमि अधिग्रहण की पुरानी व्यवस्था को खत्म करके किसानों को विकास में सीधा भागीदार बनाना है। हरियाणा की नई लैंड पूलिंग पॉलिसी में लैंड माफिया को अलग रखने के लिए कई ऐसे प्रावधान जोड़े गए हैं जो 2022 की पुरानी नीति में या तो नहीं थे या कमजोर थे। असल में लैंड माफिया का खेल तब शुरू होता है, जब सरकार किसी इलाके को विकसित करने की घोषणा करती है। माफिया या उसके दलाल किसानों के पास जाकर डराते हैं कि तुम्हारी जमीन तो सरकार सस्ते में ले लेगी, हमें अभी बेच दो। किसान घबराकर औने-पौने दाम पर जमीन बेनामी लोगों या शेल कंपनियों को बेच देता है। फिर वही जमीन सरकारी रिकॉर्ड में महंगे मुआवजे या विकसित प्लॉट के रूप में माफिया के पास चली जाती है। दूसरा तरीका बिचौलियों का भारी कमीशन और कागजों में हेराफेरी का होता है। 

नई नीति लैंड माफिया को कई स्तर पर रोकती है। पहली बात तो यह है कि यह पूरी तरह स्वैच्छिक है, जबरन अधिग्रहण नहीं। जब सरकार जबरदस्ती नहीं ले रही तो किसान को घबराकर सस्ते में बेचने की जरूरत ही नहीं है। इसमें लेन-देन सीधा सेल डीड यानी बिक्री विलेख के पंजीकरण से होता है। अंतरिम सहायता का एक लाख रुपये प्रति एकड़ हर साल सीधे भू-मालिक के खाते में जाता है। यदि 15 दिन में पैसा नहीं आया तो नौ प्रतिशत सालाना ब्याज देने का नियम है, ताकि पैसा बीच में कोई खा न जाए। लैंड एग्रीगेटर यानी जमीन जुटाने वाले व्यक्ति के कमीशन को फिक्स कर दिया गया है, उसे संबंधित रेवेन्यू एस्टेट के कलेक्टर रेट का सिर्फ 0.5 प्रतिशत ही मिलेगा और वह भी विकास एजेंसी देगी, किसान नहीं। अब लैंड पूलिंग को इस तरह समझा जा सकता है। सरकार किसान की जमीन एक तय मुआवजा देकर हमेशा के लिए नहीं लेती, बल्कि किसान अपनी जमीन स्वेच्छा से एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए पूल में देता है। 

सरकार या उसकी विकास एजेंसी उस पूरी जमीन पर सड़क, बिजली, पानी, सीवरेज जैसी सुविधाएँ बनाकर उसे विकसित करती है। फिर उस विकसित जमीन में से एक हिस्सा किसान को वापस कर देती है। यह जबरन अधिग्रहण नहीं, साझेदारी है। नई नीति में इसी साझेदारी का फॉर्मूला तय किया गया है कि स्वीकृत लेआउट प्लान के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा जमीन देने वाले भू-मालिकों को और 50 प्रतिशत हिस्सा विकास एजेंसी के पास रहेगा। पहले इस 50 प्रतिशत को बाजार मूल्य से जोड़ने का जटिल प्रावधान था, जिसे अब हटाकर सीधा बिक्री योग्य क्षेत्र के आधार पर कर दिया गया है ताकि पारदर्शिता रहे।  इस नीति से सबसे बड़ा फायदा किसान और छोटे-बड़े भू-मालिकों को है। 

उन्हें न सिर्फ विकसित प्लॉट मिलता है जिसका बाजार मूल्य उनकी कच्ची जमीन से कई गुना अधिक होता है, बल्कि चार साल तक हर साल प्रति एकड़ एक लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता भी मिलती है यानी चार साल में कुल चार लाख रुपये। साथ ही छोटे मालिकों का भी ध्यान रखा गया है। जिनका योगदान 999 वर्ग मीटर से कम है, उन्हें विकसित प्लॉट की जगह भूमि अधिग्रहण कानून 2013 या आरक्षित मूल्य में से जो अधिक हो, उसके आधार पर मुआवजा मिलेगा। जिनका योगदान 2000 वर्ग मीटर से अधिक है, उन्हें आवासीय या औद्योगिक प्लॉट के साथ-साथ कियोस्क या बूथ के रूप में वाणिज्यिक भूखंड भी मिलेगा। न्यूनतम प्लॉट का आकार भी तय है, आवासीय के लिए 100 वर्ग मीटर, औद्योगिक के लिए 250 वर्ग मीटर और संस्थागत के लिए 500 वर्ग मीटर। दूसरा फायदा सरकार और विकास प्राधिकरणों को है। 

उन्हें भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों के विरोध, अदालतों में सालों चलने वाले मुकदमों और भारी मुआवजा राशि के बोझ से मुक्ति मिलती है और जमीन बिना विवाद के उपलब्ध होती है। तीसरा फायदा आम जनता और प्रदेश के विकास को है, क्योंकि जब जमीन आसानी से मिलेगी तो परियोजनाएँ समय पर पूरी होंगी। इसी को सुनिश्चित करने के लिए नई नीति में परियोजना पूरी करने की समय-सीमा को पांच साल से घटाकर चार साल कर दिया गया है। यदि एजेंसी समय पर काम पूरा नहीं करती तो जमीन मालिक को उसकी जमीन वापस कर दी जाएगी। 

यदि लैंड पूलिंग की इजाजत न होती तो नुकसान कई स्तर पर होता। सरकार को फिर से जबरन भूमि अधिग्रहण अधिनियम का सहारा लेना पड़ता, जिसमें अक्सर किसान और सरकार के बीच मुआवजे को लेकर टकराव होता, आंदोलन होते और मामले वर्षों तक कोर्ट में अटके रहते। इससे गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में आवासीय और औद्योगिक परियोजनाएँ ठप पड़ जातीं। किसान को केवल एक बार का तय मुआवजा मिलता, जो अक्सर बाजार दर से कम होता और जमीन विकसित होने के बाद उसकी कीमत में जो भारी वृद्धि होती है, उसका कोई लाभ उसे नहीं मिलता, इससे उसकी आर्थिक सुरक्षा खत्म हो जाती। 

Wednesday, November 4, 2026

सीटीआई के नुकसान का आंकड़ा बड़ा और अवास्तविक लगता है


अशोक मिश्र

दिल्ली के रामलीला मैदान में एक नवंबर को इंडिया गठबंधन की महारैली तो खत्म हो गई, लेकिन उसकी अनुगूंज अभी तक सुनाई दे रही है। इंडिया गठबंधन, सत्ताधारी एनडीए और कुछ व्यापारिक संगठन इस मुद्दे को लेकर आपस में उलझे हुए हैं। सीटीआई यानी दिल्ली के व्यापारियों के संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने दावा किया है कि महारैली की वजह से करीब ग्यारह हजार करोड़ रुपये का व्यापारियों को नुकसान हुआ है। रामलीला मैदान में हुआ एक दिवसीय प्रदर्शन अक्सर अखबारों की सुर्खियों में तो भारी लगता है, पर उसका असर उस दिन शहर के बाजार पर कितना और कैसा पड़ा, इसकी वास्तविकता कई परतों में बंटी हुई है। पहली नजर में यह मान लिया जाता है कि प्रदर्शन वाले दिन सारा बाजार बंद हो गया और व्यापारियों को करोड़ों का नुकसान हो गया। जमीन पर तस्वीर इतनी एकतरफा नहीं होती। 

रामलीला मैदान के आसपास का व्यापार दो हिस्सों में बंटा है। एक तो वह जो मैदान से सटे हुए इलाकों जैसे दरियागंज, जामा मस्जिद, चांदनी चौक, कमला मार्केट और अजमेरी गेट के स्थायी व्यापारी हैं। और दूसरा वह जो प्रदर्शन में आने वाली भीड़ पर निर्भर अस्थायी कारोबार है। स्थायी दुकानों के लिए नुकसान का सबसे बड़ा कारण प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रशासनिक बंदोबस्त होता है। पुलिस बैरिकेडिंग, रास्तों का डायवर्जन और वाहनों की नो-एंट्री के चलते ग्राहकों की आवाजाही लगभग थम जाती है। जो ग्राहक रोजमर्रा का सामान खरीदने आता है, वह उस दिन भीड़ और जाम के डर से बाजार का रुख ही नहीं करता। कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, किताबें और बर्तन जैसी गैर-जरूरी वस्तुओं की बिक्री पर इसका सीधा असर पड़ता है, क्योंकि लोग टाल सकते हैं। 

इसके उलट, खाने-पीने, पानी, चाय, फल और परिवहन से जुड़े छोटे व्यापारियों के लिए वह दिन कभी-कभी सामान्य दिन से बेहतर भी निकल जाता है, क्योंकि हजारों की संख्या में आए प्रदर्शनकारियों को इन्हीं की जरूरत पड़ती है। इसलिए एक दिन के प्रदर्शन से हर व्यापारी को नुकसान होता है, यह कहना पूरी सच्चाई नहीं है। वहीं रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को इंडिया ब्लॉक की महारैली के बाद दिल्ली के व्यापारियों के संगठन चैंबर आॅफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) ने दावा किया है कि आसपास के 20-25 प्रमुख बाजारों जैसे चांदनी चौक, सदर बाजार, खारी बावली, चावड़ी बाजार, कनॉट प्लेस, करोल बाग आदि में करीब तीन लाख दुकानों में से लगभग ढाई लाख यानी 80 प्रतिशत दुकानें बंद रहीं। उनके मुताबिक इस एक दिन में खुदरा और थोक व्यापार को करीब 8800 करोड़, ट्रांसपोर्ट-लॉजिस्टिक्स को 1500 करोड़, होटल-रेस्टोरेंट-टूरिज्म को 500 करोड़ और असंगठित क्षेत्र-दिहाड़ी मजदूरों को 200 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, यानी कुल अनुमानित नुकसान 10 से 11 हजार करोड़ रुपये का। दिवाली के पीक सीजन में ये बाजार रोजाना 10-12 हजार करोड़ का कारोबार करते हैं, लेकिन रैली के कारण यातायात प्रतिबंध, भीड़ का डर और आसपास के शहरों से आने वाले तीन-चार लाख ग्राहक-व्यापारियों के न पहुंचने से बाजार सूने पड़ गए। 

सामान लाने-ले जाने वाले करीब पांच हजार वाहन भी नहीं चल सके। ये आंकड़े सीटीआई के अपने आकलन और व्यापारियों के व्हाट्सऐप ग्रुप्स से आए हैं। स्वतंत्र सर्वे या सरकारी आंकड़ों से इनकी पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए सटीक नुकसान कितना हुआ यह कहना मुश्किल है। कुछ आलोचनाओं में यह भी कहा गया कि दिल्ली के पूरे दैनिक जीडीपी योगदान या थोक बाजारों के सामान्य कारोबार के मुकाबले यह आंकड़ा बहुत बड़ा और अवास्तविक लगता है। विपक्षी पक्ष ने भी इन दावों को खारिज किया है और सीटीआई पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया है। वास्तविकता यह है कि रैली के दिन कई बाजार प्रभावित हुए, दुकानें बंद रहीं, यातायात रुका और ग्राहक कम आए—यह असर तो हुआ। असली और सबसे गंभीर नुकसान उन व्यापारियों का होता है जिनका काम रोज के हिसाब से चलता है। 

जैसे सब्जी-फल के ठेले वाले, दिहाड़ी पर माल ढोने वाले मजदूर, आॅटो-रिक्शा चालक और वे छोटे दुकानदार जो सुबह माल लाकर शाम तक बेचकर ही घर का खर्च निकालते हैं। उनके लिए एक दिन की बिक्री रुकना मतलब सीधे घर के चूल्हे पर असर पड़ना है। वहीं बड़ी दुकानों के लिए नुकसान बिक्री रुकने से ज्यादा सप्लाई चेन टूटने का होता है। ट्रक नहीं आ पाते, माल गोदाम में अटका रह जाता है और अगर वह माल फल, फूल या डेयरी जैसा खराब होने वाला है तो नुकसान दोगुना हो जाता है।  इस तरह एक दिन का प्रदर्शन दो से तीन दिन के व्यापार को धीमा कर देता है। दूसरी ओर, व्यापारी संगठनों द्वारा बताए जाने वाले नुकसान के आंकड़े अक्सर बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जाते हैं, ताकि प्रशासन पर दबाव बनाकर मुआवजे या भविष्य में ऐसी आयोजनों पर रोक की मांग की जा सके। चैंबर आॅफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने तो अब आगे और प्रदर्शन न होने देने की मांग करनी शुरू कर दी है, ताकि बाकी त्योहारी कारोबार बच सके। 


Tuesday, November 3, 2026

राष्ट्रीय जन-स्वास्थ्य आपातकाल का रूप लेता जा रहा प्रदूषण

 अशोक मिश्र

दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई राज्यों में प्रदूषण भयानक रूप अख्तियार करने लगा है। दिल्ली-एनसीआर में तो बीएस-4 वाहनों की इंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके लिए दिल्ली की सीमाओं पर चेकिंग अभियान चलाया जा रहा है। काफी संख्या में बीएस-4 वाहनों को न केवल वापस किया गया है, बल्कि कुछ वाहनों को जब्त भी कर लिया गया है। अक्टूबर-नवंबर आते ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या गहरा जाती है। इस बार बीएस-फोर वाहनों पर प्रतिबंध जैसा कदम उसी मौसमी संकट की प्रतिक्रिया है। प्रदूषण का कोई एक कारण नहीं है, यह कई स्रोतों का मिला-जुला परिणाम है। 

सबसे बड़ा हिस्सा वाहनों के धुएं का है। पुराने डीजल वाहन, बिना मेंटेनेंस वाले ट्रक और दोपहिया वाहन जो नाइट्रोजन आॅक्साइड और पीएम 2.5 छोड़ते हैं, प्रदूषण के सबसे बड़े कारण हैं। पराली जलाना भी प्रदूषण का प्रमुख कारण माना जाता है जो पंजाब-हरियाणा में अक्टूबर में चरम पर होता है। पंजाब-हरियाणा सरकार पराली जलाने से रोकने के लिए कई तरह के उपाय कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई है, लेकिन अभी यह उपाय पर्याप्त नहीं है। पराली का धुआं उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ दिल्ली की ओर आता है। केवल पुराने डीजल वाहनों और पराली को ही प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। इसके अलावा साल भर चलने वाले स्रोत भी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं, जैसे निर्माण कार्यों के दौरान उड़ने वाली धूल जो बिना ढके निर्माण करने के कारण उड़ती है, सड़कों की टूटी सतह से उड़ने वाली धूल, कोयला और बायोमास पर चलने वाले ईंट-भट्ठे और छोटे उद्योग, कचरा जलाना, घरों में लकड़ी-गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल और बिजली उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन का उपयोग। 

मौसम भी इसे बढ़ाता है, सर्दियों में हवा ठंडी और भारी हो जाती है, इनवर्जन के कारण धुंध ऊपर नहीं उठती और प्रदूषक जमीन के पास ही फंस जाते हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर प्रदूषण का स्थायी समाधान क्या है? तो हमें इस बात को अच्छी तरह समझना होगा कि केवल एक शहर में कुछ गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाने से कोई परिणाम नहीं निकलेगा। जरूरत है समग्र और पूरे साल चलने वाली नीति की, जो प्रदूषण को बिल्कुल खत्म करने में अहम भूमिका निभाए। परिवहन में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करना, मेट्रो और ई-बसों की संख्या बढ़ाना, आखिरी मील की कनेक्टिविटी देना और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना सबसे पहला कदम होना चाहिए। पराली के लिए किसानों को हैप्पी सीडर, बायो-डिकम्पोजर जैसे विकल्प सस्ते और समय पर उपलब्ध कराना होगा। पराली से बायो-सीएनजी या पैकेजिंग बनाने की सप्लाई चेन बनाना बहुत जरूरी है ताकि पराली जलाना किसानों के लिए आर्थिक रूप से गैर-जरूरी हो जाए। 

निर्माण और सड़कों पर डस्ट कंट्रोल के नियमों का सख्ती से पालन, ग्रीन कवर बढ़ाना, कचरा प्रबंधन में कचरा जलाने पर पूरी रोक और उद्योगों में क्लीनर फ्यूल पर स्विच करना भी स्थायी उपाय हैं। पूरे देश के लिए एक ही एयरशेड के रूप में एनसीआर सहित आसपास के राज्यों की संयुक्त कार्ययोजना ही काम करेगी, क्योंकि हवा राज्य की सीमा नहीं मानती। उसे एक शहर से दूसरे शहर या एक राज्य से दूसरे राज्य में आने-जाने से कोई नहीं रोक सकता है। स्वास्थ्य पर प्रदूषण का असर अब पूरे देश में दिखने लगा है। प्रदूषण अब केवल दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब या पश्चिमी उत्तर प्रदेश की समस्या नहीं रही। इसके देश के कई राज्य प्रभावित होने लगे हैं। प्रदूषण के चलते फैलने वाली बीमारियां, केवल खांसी-जुकाम तक सीमित नहीं हैं। प्रदूषित हवा में मौजूद पीएम 2.5 इतना बारीक कण है कि फेफड़ों से होते हुए खून में चला जाता है। इससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सीओपीडी जैसी सांस की बीमारियां बढ़ती हैं। बच्चों में फेफड़ों का विकास धीमा होता है। 

प्रदूषण के चलते बुजुर्गों में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। लंबे समय तक उच्च प्रदूषण में रहने से आंखों में जलन, त्वचा एलर्जी, गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव और बच्चों के शारीरिक विकास पर भी असर देखा गया है। डब्ल्यूएचओ और कई भारतीय अध्ययनों के अनुसार प्रदूषण के कारण औसत जीवन प्रत्याशा में भी कमी आ रही है। अब इसे केवल दिल्ली की सर्दियों की समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय जन-स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में देखना होगा। पानी के प्रदूषण से हैजा, टाइफाइड, डायरिया और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां फैलती हैं, जबकि मिट्टी और भोजन में मिले रसायनों से कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और किडनी संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। शोर प्रदूषण से तनाव, नींद की कमी और रक्तचाप की समस्याएं पैदा होती हैं। कुल मिलाकर प्रदूषण शरीर को अंदर से कमजोर करता है और छोटी-छोटी बीमारियां भी गंभीर रूप ले लेती हैं।  यह सामूहिक समस्या है जिसमें उद्योग, सरकार और आम नागरिक सभी की भूमिका है, इसलिए इसका समाधान भी सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।


Monday, November 2, 2026

इंडिया गठबंधन ने भीड़ से अपनी ताकत दिखाई, भाजपा ने सड़क से की घेराबंदी


अशोक मिश्र

एक नवंबर को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की रामलीला मैदान वाली महारैली और एनडीए की पश्चिमी दिल्ली में निकाली गई पदयात्रा, दोनों एक साथ चलीं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने नैरेटिव को मजबूती से पेश करने की कोशिश की। इंडिया गठबंधन का मुख्य नैरेटिव ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ या ‘चलो दिल्ली’ के इर्द-गिर्द घूमता रहा, जिसमें कथित वोट चोरी, मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में अनियमितताएं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग प्रमुख थी। राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव समेत कई बड़े नेताओं ने खुली गाड़ियों में मार्च किया, झंडे-बैनर लहराए गए और नारे गूंजे। 

आयोजकों ने लाखों की भीड़ का दावा किया जबकि पुलिस अनुमान करीब पचास हजार का रहा। वैसे इस महारैली में कई प्रदेशों के लोग भारी संख्या में शामिल हुए जिसमें युवा, बुजुर्ग, महिलाएं और हर समुदाय के लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। रैली ने विपक्षी एकजुटता का प्रदर्शन जरूर किया। महारैली ने मीडिया में अच्छा कवरेज पाया, लेकिन वास्तविक संख्या पर विवाद रहा। कुछ सहयोगी दलों की दूरी (खासकर आम आदमी पार्टी) ने पूर्ण एकता की तस्वीर को थोड़ा धुंधला किया। यह नैरेटिव अपने मूल समर्थकों और विपक्षी खेमे में तो मजबूत हुआ, लेकिन व्यापक जनता या तटस्थ वर्ग तक कितना पहुंचा, यह अभी स्पष्ट नहीं। 

चुनाव आयोग या सरकार पर तत्काल दबाव बनाने में यह सीमित रहा। इंडिया गठबंधन ने इस दिन को प्रतीकात्मक तौर पर चुना। रामलीला मैदान वही जगह है जहां से आंदोलन राष्ट्रीय चर्चा बनते हैं। गठबंधन का आरोप था कि देश में 'वोट चोरी' और वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की आड़ में लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है। इसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे तक की मांग उठाई गई। कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने इसके लिए 10 लाख तक लोगों के जुटने का दावा किया और राहुल गांधी सहित गठबंधन के सभी बड़े चेहरों को मंच पर उतारा। सुबह मिंटो रोड-कनॉट प्लेस चौराहे से मार्च निकालकर भीड़ को मैदान तक लाने की योजना बनाई गई, ताकि रैली सिर्फ एक सभा न होकर एक शक्ति प्रदर्शन लगे। इंडिया गठबंधन का नैरेटिव आंशिक रूप से मजबूत था, लेकिन पूरी तरह निर्णायक या व्यापक रूप से प्रभावी नहीं कहा जा सकता।

वोट चोरी, मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में कथित गड़बड़ी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग—यह मूल संदेश साफ, भावनात्मक और विपक्षी खेमे के लिए आकर्षक था। वहीं एनडीए ने पश्चिमी दिल्ली के हरि नगर से तिलक नगर की ओर पदयात्रा निकाली, जिसमें 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को याद करने और कांग्रेस पर संवेदनहीनता का आरोप लगाने पर जोर दिया गया। हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत नेताओं और सिख समुदाय के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। यह ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान का हिस्सा था। एनडीए का नैरेटिव इतिहास की याद दिलाते हुए विपक्ष को दोहरे मापदंड का आरोप लगाते हुए चलाया गया कि वे उसी तारीख के आसपास राजनीतिक रैली कर रहे हैं, जब सिख समुदाय के घाव ताजा हो जाते हैं। यह कदम इंडिया गठबंधन की रैली को अकेले समाचार चक्र पर हावी होने से रोकने में सफल रहा और एक समानांतर चर्चा खड़ी कर दी। 

सिख समुदाय और अपने कोर बेस में यह नैरेटिव प्रभावी रहा, क्योंकि यह भावनात्मक और ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा था। पूरे देश में इसी थीम पर कार्यक्रमों की श्रृंखला चलाने की योजना ने इसे स्थानीय घटना से आगे बढ़ाया। अब सवाल है कि कौन किस पर भारी रहा, तो इसका जवाब संख्या से ज्यादा संदेश में छिपा है। इंडिया गठबंधन भारी रहा नैरेटिव और सेंट्रलाइजेशन में। एक ही मैदान, एक ही मंच, एक ही मुद्दा-वोट चोरी। इससे मीडिया का पूरा फोकस दिल्ली पर केंद्रित हो गया, कैमरे रामलीला मैदान पर रहे और विपक्ष एकजुटता दिखाने में सफल रहा। इस तरह के केंद्रीकृत आयोजन से कार्यकर्ताओं में भावनात्मक उभार ज्यादा आता है, जो आने वाले चुनावों में बूथ तक ले जाने लायक ऊर्जा देता है। 

भाजपा भारी रही विस्तार और काउंटर-मोबिलाइजेशन में। उसने विपक्ष की रैली को दिल्ली तक सीमित नहीं रहने दिया। जिस दिन विपक्ष दिल्ली में भीड़ जुटा रहा था, उसी दिन भाजपा ने रोहतक, फरीदाबाद, दिल्ली के हरी नगर और देश के अन्य जिलों में पदयात्रा का आयोजन किया। भाजपा का तर्क सीधा था कि विपक्षी गठबंधन के मुद्दे को वह स्थानीय स्तर पर 'अराजकता' बनाम 'स्थिरता' की बहस में बदल देगी। पदयात्रा का मॉडल संघ और भाजपा के पुराने जनसंपर्क अभियान की याद दिलाता है, जहां छोटे-छोटे संपर्कों से बड़ा जनमत बनता है। एक महीने तक चलने वाला यह अभियान एक दिन की रैली की चमक को फीका करने की दीर्घकालिक रणनीति है। कुल मिलाकर देखा जाए तो 1 नवंबर को सुर्खियों पर कब्जा इंडिया गठबंधन का रहा, क्योंकि रामलीला मैदान की महारैली का दृश्य और पैमाना पदयात्रा के बिखरे हुए दृश्यों से ज्यादा टेलीविजन फ्रेंडली था। लेकिन जमीन पर असर के लिहाज से भाजपा की पदयात्रा ने विपक्ष के नैरेटिव को सिर्फ दिल्ली तक सीमित रखने से रोक दिया और उसे हर राज्य में चुनौती देने का आधार तैयार कर दिया। एक ने भीड़ से ताकत दिखाई, दूसरे ने सड़कों से घेराबंदी की।

Sunday, November 1, 2026

देश में तेजी से घोर गरीबी घटाने में एनएफएसए की बहुत बड़ी भूमिका


अशोक मिश्र

विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की ‘इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ’ रिपोर्ट बताती है कि भारत में अत्यधिक गरीबी की दर 2011 से 27.1 प्रतिशत थी, वह अब घटकर 2023 में 2.7 प्रतिशत रह गई है। इसके अनुसार 49.6 करोड़ लोग गरीबी की सीमारेखा से बाहर आए। रिपोर्ट इसे दुनिया में सबसे तेज गरीबी कमी की दरों में से एक बताती है। 2023 में अत्यधिक गरीबी रेखा से नीचे लगभग 7.5 करोड़ और 4.20 डॉलर वाली रेखा से नीचे लगभग 34 करोड़ लोग रह गए थे। बहुआयामी गरीबी (शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि को मिलाकर) भी घटी है। यह कमी मुख्य रूप से घरेलू खपत में मजबूत वृद्धि, रोजगार में बढ़ोतरी (विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के बीच) और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक हस्तांतरणों के विस्तार से जुड़ी बताई गई है। 

2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई, जो कार्यशील आयु वर्ग की वृद्धि से लगभग दोगुनी थी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रगति तेज रही, जिससे ग्रामीण-शहरी अंतर कुछ कम हुआ। रिपोर्ट भविष्य में भी गरीबी कम होने का अनुमान लगाती है। वास्तविक स्थिति में प्रगति तो हुई है, लेकिन चुनौतियां बाकी हैं। 2023 में ग्रामीण गरीबी (4.20 डॉलर रेखा पर) 19.3 प्रतिशत थी जबकि शहरी 8.6 प्रतिशत। गरीबी उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के क्षेत्र में केंद्रित हो गई है, जहां देश के लगभग 57 प्रतिशत गरीब रहते हैं। वेतन असमानता बनी हुई है—शीर्ष 10 प्रतिशत श्रमिकों की औसत कमाई निचले 10 प्रतिशत से लगभग 13 गुना अधिक थी। 

वास्तविक कमाई में खास बढ़ोतरी नहीं हुई और रोजगार वृद्धि अपेक्षाकृत कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में केंद्रित रही। युवा बेरोजगारी में हालिया बढ़ोतरी (खासकर ग्रामीण युवा महिलाओं में) भी दर्ज की गई। गरीबी अब कम शिक्षा, कम संपत्ति, अस्थिर रोजगार और ज्यादा आश्रितों वाले परिवारों में ज्यादा केंद्रित हो गई है। उच्चतर गरीबी रेखा (8.30 डॉलर प्रतिदिन) पर अभी भी बड़ी आबादी नीचे है। इस रिपोर्ट के बाद एक सवाल यह भी उठता है कि जब लगभग 50 करोड़ लोग गरीबी की सीमारेखा से बाहर हो गए हैं, तो फिर केंद्र सरकार देश के अस्सी करोड़ लोगों को प्रतिमाह पांच किलो मुफ्त राशन क्यों दे रही है? 

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि 80 करोड़ को मुफ्त राशन का आंकड़ा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, एनएफएसए से आता है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना मूलत: मार्च 2020 में कोविड के दौरान शुरू हुई थी, ताकि एनएफएसए के तहत कवर लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज मुफ्त में अतिरिक्त दिया जा सके। बाद में सरकार ने इसे ही जारी रखते हुए एक साल तक सभी एनएफएसए लाभार्थियों को अनाज मुफ्त देने का फैसला किया। यह 80 करोड़ कोई नई गरीबी गणना नहीं है, यह 2011 की जनगणना और उसके आधार पर बने राज्यों के कवरेज अनुपात का कानूनी हक है। इसमें अंत्योदय परिवार और प्राथमिकता वाले परिवार दोनों आते हैं। इनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो विश्व बैंक की 3 डॉलर या 4.20 डॉलर की रेखा से ऊपर आ चुके हैं, पर भारत की जीवन-यापन लागत, अनियमित रोजगार और स्वास्थ्य-शिक्षा के एक झटके में फिर से नीचे गिरने के जोखिम में हैं।  विश्व बैंक खुद अपनी रिपोर्ट में इस प्रगति का श्रेय बढ़े हुए उपभोग, महिला रोजगार और विस्तारित सामाजिक ट्रांसफर को देता है। यानी मुफ्त राशन गरीबी घटने के बावजूद जारी रहने वाली योजना नहीं, बल्कि गरीबी घटने का एक कारण भी है। 

राशन मिलने से परिवार की भोजन पर होने वाली नकद खर्च बचता है। उसी पैसे से वह शिक्षा, दवा या बेहतर भोजन पर खर्च कर पाता है और उपभोग सर्वेक्षण में वह गरीबी रेखा से ऊपर दिखता है। अगर कल राशन बंद हो जाए तो बहुत सारे परिवारों का वही उपभोग फिर से नीचे आ जाएगा, इसलिए इसे सुरक्षा कवच की तरह देखा जाता है, गरीबी प्रमाणपत्र की तरह नहीं। यहाँ एक और बारीक बात है। भारत में गरीबी केवल आय से नहीं, पोषण सुरक्षा से भी देखी जाती है। 4.20 डॉलर की रेखा पार करने का मतलब यह नहीं कि परिवार रोज संतुलित आहार ले पा रहा है। कुपोषण, एनीमिया, बच्चों में ठिगनापन जैसे संकेत बताते हैं कि अनाज की न्यूनतम उपलब्धता अभी राज्य की जिम्मेदारी है। सरकार के लिए 80 करोड़ को पांच किलो अनाज देना भूख के खिलाफ बीमा है, जबकि विश्व बैंक का आंकड़ा उपभोग के आधार पर आर्थिक गतिशीलता का संकेतक है। 

दोनों के पैमाने अलग हैं। गरीबी से बाहर आना एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें फिसलन बहुत है। एनएफएसए का दायरा जानबूझकर व्यापक रखा गया है ताकि जो अभी-अभी गरीबी रेखा पार किया है, वह किसी संकट में फिर से उसी में न गिर जाए। विरोधाभास तब बनता है जब हम दोनों आंकड़ों को एक ही तराजू पर तोलते हैं। सच यह है कि एक आंकड़ा बताता है कि सीढ़ी चढ़ी गई है, दूसरा बताता है कि सीढ़ी के नीचे जाल अभी भी लगा हुआ है। पिछले बारह सालों में 50 करोड़ लोगों का गरीबी के दायरे से बाहर आना, वाकई एक उपलब्धि है।