Sunday, August 23, 2026

बुद्ध बोले, प्रकृति में नहीं होते हैं चमत्कार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के समकालीन एक राजा थे। वह किसी सिद्ध पुरुष की तलाश में थे ताकि अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकें। वह अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए हर संभव प्रयास पहले भी कर चुके थे। किसी ने उन्हें सलाह दी थी कि यदि वह किसी सिद्ध पुरुष को तलाश लें, तो वह आपकी मनोकामना की पूर्ति कर सकता है। राजा ने एक मैदान में पतला सा बहुत ऊंचा बांस गड़वाया और उस पर सोने का एक कमंडल टांग दिया। 

उन्होंने घोषणा की कि जो भी सिद्ध पुरुष बांस पर चढ़कर कमंडल उतार लाएगा, उसे कमंडल के साथ बहुत कुछ दिया जाएगा। वह मेरा गुरु होगा और उसे रहने के लिए महल, आने जाने के लिए हाथी-घोड़े प्रदान किए जाएंगे। उस राज्य के संत, महात्मा, ज्ञानी-गुणी सबने प्रयास किया, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। काफी दिनों बाद एक पतला-दुबला बौद्ध भिक्षु आया। 

उसने चुनौती स्वीकार कर ली। वह बांस पर चढ़ गया और सोने का कमंडल उतार लाया। राजा ने उसे अपना गुरु बना लिया और सारी सुख सुविधाएं दीं। एक दिन भिक्षु ने सोचा कि महात्मा बुद्ध इन दिनों श्रावस्ती के जेतवन में विहार कर रहे हैं क्यों न चलकर उन्हें चमत्कार के बारे में बताया जाए। राजा ने सवारी और सेवकों का प्रबंध कर दिया। वह जेतवन पहुंचा। इससे पहले बुद्ध उसके चमत्कार की कथा सुन चुके थे। 

शाम को जब वह भिक्षुओं को प्रवचन देने आए, तो उस भिक्षु की चर्चा करते हुए बोले, यह व्यक्ति भिक्षु बनने से पहले नट था। पतले बांस पर चढ़ना इसके लिए कोई कठिन काम नहीं था। इसने कोई चमत्कार नहीं किया है। प्रकृति में चमत्कार नहीं होते हैं। आज से बुद्ध संघ का कोई भी भिक्षु चमत्कार दिखाने का प्रयास नहीं करेगा। छल से धर्म का प्रचार करने का प्रयास भी नहीं करेगा। आत्मशुद्धि के लिए की गई तप साधना से ही मानव कल्याण संभव है।

गांव की गलियों से लेकर शहर के बाजारों तक सफाई का पहिया जाम

अशोक मिश्र

हरियाणा में पिछले सोलह दिन से सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं।  मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने खुद मोर्चा संभालते हुए कहा है कि वह जल्दी ही हड़ताल खत्म कराएंगे, बातचीत सौहार्दपूर्ण माहौल में हो रही है और समाधान निकलेगा। गांव की गलियों से लेकर शहरों के बाजारों तक सफाई का पहिया थमा हुआ है। शहरों से लेकर गांवों तक कूड़े-कचरे के ढेर लग चुके हैं। हड़ताल के कारण प्रदेश भर में 14 हजार टन से ज्यादा कूड़ा जमा हो चुका है। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में नालियां अवरुद्ध हो गई हैं। 

वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर निजी कर्मचारियों से कचरा उठवाने की कोशिश स्थानीय प्रशासन ने की थी, लेकिन ऐसा करने पर कर्मचारी भड़क रहे हैं। वह कई जगहों पर निजी कर्मचारियों को काम रोक रहे हैं। कहीं रोडवेज के परिचालकों को अस्थायी रूप से फायर ब्रिगेड में लगाना पड़ रहा है क्योंकि अग्निशमन कर्मचारी भी हड़ताल पर हैं। इस बिगड़ती व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है और स्थानीय निकाय विभाग से शपथपत्र पर जवाब मांगा है। सफाईकर्मियों की हड़ताल का स्वास्थ्य पर सीधा असर दिखने लगा है। 

सड़कों पर पड़ा कचरा सड़ रहा है, बदबू से लोग बेहाल हैं, नालियों का गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है और मक्खी-मच्छर पनप रहे हैं। स्थानीय डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि हरियाणा स्वास्थ्य आपातकाल की कगार पर है। गुरुग्राम, हिसार, फरीदाबाद जैसे शहरों में टनों कचरे से डेंगू, मलेरिया, डायरिया, त्वचा संक्रमण और सांस की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ गया है। सात दिन से कूड़े के ढेर लगे रहने से बीमारी फैलने का अंदेशा पहले ही जताया जा रहा था। 

ऐसे में मुख्यमंत्री का यह भरोसा कि बातचीत से जल्द सफाई व्यवस्था पटरी पर लौटेगी, आम लोगों के लिए एक उम्मीद है, लेकिन जब तक कागज पर मानी गई 17 मांगों के आदेश जारी नहीं होते और पक्का करने की मांग पर कोई बीच का रास्ता नहीं निकलता, तब तक गांव की चौपाल से लेकर शहर के अस्पताल तक यही सवाल गूंज रहा है कि कचरे के इस पहाड़ के नीचे आखिर आम आदमी की सेहत कब तक दबी रहेगी। सरकार वेतन बढ़ोतरी, समय पर वेतन, वर्दी और सुरक्षा उपकरण, पीएफ-ईएसआई, एरियर का भुगतान, ठेका प्रथा खत्म कर पे-रोल पर लाने और कुछ भत्तों पर सहमत होती दिख रही है। 

पानीपत में हुई बैठक के बाद तो हड़ताल खत्म होने का ऐलान भी हुआ था। लेकिन पक्का करने की सबसे बड़ी मांग पर सरकार अड़ी हुई है। उसका कहना है कि हाईकोर्ट के 31 दिसंबर 2005 के आदेश और बाद में 31 दिसंबर 2025 तक 10 साल की सेवा वालों को नियमित करने के निर्देश की समीक्षा करेगी, तुरंत पक्का करना संभव नहीं है। यही वह बिंदु है जहां बात टूटती है। कर्मचारी इसे ही अपनी 19 साल की सेवा का हक मानते हैं और ठेका प्रथा समाप्त करने के लिखित आदेश जारी होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दे रहे हैं। 

लोकतंत्र को ‘भीड़तंत्र’ में नहीं बदलने देगी नई पीढ़ी


संजय मग्गू

इन दिनों जो माहौल है, उसको देखते हुए कुछ लोगों को अब यह डर सताने लगा है कि कहीं लोकतंत्र भीड़तंत्र में न बदल जाए। उनकी आशंका का आधार शायद बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में हुए जेन जेड के आंदोलन हैं। इन देशों में हुए आंदोलन के दौरान युवा अनियंत्रित हो गए थे और जो कुछ हुआ, उसे पूरी दुनिया ने देखा। इन देशों को यदि आधार बनाकर बात की जाए, तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में तब्दील होने की उनकी आशंका गलत नहीं है। लेकिन हमें यह बात भी याद रखनी चाहिए कि हर आंदोलनकर्ता हिंसक नहीं होता है, बलवाई नहीं होता है। 

पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए जेन जेड के आंदोलन ने यह साबित कर दिया है। संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी तब उग्र हुए, जब पुलिस और अराजकतत्वों ने उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा। बिना वर्दी और बैच पहने लोगों ने युवाओं को जिस तरह निशाना बनाया, लड़कियों के निजी अंगों पर प्रहार किया, उसके मुकाबले युवाओं का प्रतिरोध कुछ भी नहीं था। सच तो यह है कि पुलिस को बार-बार यह बताया-समझाया जाता है कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाला उनका शत्रु है। ब्रिटिश पीरियड से ही यह मानसिकता चली आ रही है। 

शायद अब पुलिस की ऐसी मानसिकता बहुत दिन तक नहीं रहने वाली है। जैसे-जैसे समाज बदल रहा है, लोगों की मानसिकता बदल रही है, वैसे-वैसे जेन जेड और जेन अल्फा का व्यवहार भी बदल रहा है। यह बदलाव बहुत तेजी से हो रहा है। इस बात को राज्य सत्ता, प्रशासन और समाज के लोग बहुत शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। इन दिनों तो रोज किसी न किसी प्रांत से, किसी जिले से या गांव से यह खबर आ रही है कि छोटे-छोटे बच्चों ने अपनी लड़ाई खुद लड़ने का निर्णय लिया है। 

वह अब किसी संगठन या किसी सहारे का इंतजार नहीं कर रहे हैं। वह अपनी लड़ाई खुद लड़ने को तैयार हैं। उन्हें किसी किस्म का भय भी नहीं है। कल्पना कीजिए, उस बच्ची में कितना साहस होगा, जो अपने स्कूल में होने वाली असुविधा और अनियमितताओं को लेकर डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट कार्यालय के सामने खड़ी होकर कह रही थी कि डीएम को बुलाओ। हम उनसे ही बात करेंगे। यह बदलाव है। यही बदलाव नए और पारदर्शी शासन व्यवस्था की नींव बनने वाला है। निकट भविष्य में व्यवस्था को या तो खुद सुधरना होगा या फिर मिटना होगा।

निडर जेन अल्फा जब बड़े होकर कार्य क्षेत्र में प्रवेश करेंगे, तो निश्चित है कि वह न तो खुद गलत करेंगे और न किसी को करने देंगे। इस बदलाव को सकारात्मक रूप से लेना चाहिए। जो काम हमारी पीढ़ी नहीं कर सकी, यदि जेन जेड और जेन अल्फा करने में सफल हो गई, तो यकीन मानिए, हमारे सामने एक नया भारत होगा जिसमें भ्रष्टाचार, शोषण, दोहन और उत्पीड़न को कोई जगह नहीं मिलने वाली है। यह पीढ़ी लोकतंत्र को भीड़तंत्र में नहीं बदलने देगी। बस, हमें अपनी नई पीढ़ी पर विश्वास करना सीखना होगा।

Saturday, August 22, 2026

प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध जब घर-परिवार और राजपाट त्यागकर मानव कल्याण के लिए घर से निकले, तो उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जिस व्यक्ति ने अपनी 29 वर्ष की आयु तक किसी प्रकार के अभाव का अनुभव न किया हो, जिसने कभी कड़ी धूप में खड़े होने की जरूरत ही नहीं पड़ी हो, उस राजकुमार को जगह-जगह की धूल छाननी पड़ रही थी। 

जिसने अपने जीवन में स्वादिष्ट भोजनों का ही स्वाद चखा हो, उसे केवल एक समय की भिक्षा पर ही अपना गुजारा करना पड़ रहा हो, ऐसी स्थिति काफी दारुण थी। नंगे पैर चलने से पैरों में घाव हो गया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए उनका मन विचलित हो रहा था। चलते चलते वह एक झील के पास पहुंचे जिसका जल बड़ा शीतल था। उन्होंने उस झील का पानी पिया। 

तभी उनकी निगाह एक गिलहरी पर पड़ी। वह अपनी पूंछ भिगोकर झील को सुखाने का प्रयास कर रही थी। महात्मा बुद्ध ने उस गिलहरी से बड़े प्रेम से पूछा, प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो? उस गिलहरी ने जवाब दिया कि इस झील ने मेरे बच्चों को निगल लिया है, मैं इसको सुखाकर रहूंगी। बुद्ध ने कहा कि तुम्हारे पूंछ भिगोकर पानी बाहर छिड़कने से झील सूख जाएगी? गिलहरी ने कहा कि मेरे पास समय नहीं है। मैं यह प्रयास करती रहूंगी।

 बुद्ध ने कहा कि इस काम में कितना समय लगेगा, इसका तुम्हें भान है? इसमें तुम्हारा पूरा जीवन बीत जाएगा, लेकिन झील नहीं सूखेगी। गिलहरी ने कहा कि भले ही जीवन बीत जाए, लेकिन मैं यह काम करके ही रहूंगी। अपनी पीड़ा से व्यथित बुद्ध के हृदय तक गिलहरी की बात पहुंची। उन्होंने सोचा कि जब यह छोटी सी गिलहरी जीवन भर प्रयास करके इस विशाल झील को सुखाने को तत्पर है, तो मैं मनुष्य होकर इन कठिनाइयों से भागने की सोच रहा हूं। अब उनका आत्मविश्वास लौट आया था।

जिन्होंने बचपन संवारा, बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर

अशोक मिश्र

हरियाणा आज भी अपने बड़े बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा के लिए देश में विख्यात है। यह प्रदेश तो बड़ों के आदर-सत्कार के लिए जाना जाता था। जहां ताऊ-चाचा के बिना कोई ब्याह नहीं होता था। जहां दादा के हुक्के के धुएं से ही घर की शाम बनती थी। वहीं आज गांवों में भी ताले लगे हुए घरों में अकेले रह रहे बुजुर्ग दिख जाते हैं। बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने की घटनाओं को पढ़ सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं, लेकिन अफसोस कि ऐसी घटनाएं अब प्रदेश में एक खामोश सच्चाई बनती जा रही हैं। 

जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन कंधों पर बैठकर मेले देखे, बाजार में घूमने गए, जिन आंखों ने बुखार में रात-रात भर जागकर इंतजार किया, वही हाथ, वही कंधे, वही आंखें आज एक कमरे के कोने में सामान की तरह अकेली छोड़ दी जा रही है। यह सिर्फ  किसी एक परिवार की कहानी नहीं है, यह पूरे समाज की विडंबना है। कहने को तो लोग तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए, लेकिन वही लोग संवेदना की सीढ़ियां उतरते गए हैं, यह कटु सत्य है। प्रदेश में दिनोंदिन नए खुलते वृद्धाश्रम और उनमें बढ़ती बुजुर्गों की संख्या का सबसे बड़ा कारण एकल परिवार का सपना है जिसे लोगों ने आधुनिकता समझ लिया है। 

हरियाणा में वृद्धाश्रम  अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहे, ग्रामीण इलाकों और जिला मुख्यालयों के आसपास ऐसे आश्रमों की संख्या चुपचाप बढ़ रही है। प्रदेश में पहले घर आंगन होता था जिसमें दादा-दादी कहानियां होते थे, संस्कार होते थे। अब घर एक फ्लैट बन गया है, जहां दो लोगों के बाद तीसरे की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है। नौकरी, करियर, बच्चों की पढ़ाई और शहरों की भागदौड़ ने लोगों को इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि बुजुर्गों की धीमी चाल उन्हें बोझ लगने लगी है। 

उनकी दवाइयों का समय, उनकी बार-बार की एक ही बात, उनका पुराने जमाने का टोकना-टाकना, यह सब भागदौड़ भरे जीवन के हिसाब से फिट नहीं बैठता है और इसका नतीजा यह होता है कि घर का बुजुर्ग वृद्धाश्रम में नजर आने लगता है। हरियाणा जैसे प्रदेश में यह बदलाव और भी ज्यादा चुभता है। सोच कर देखें। एक दिन वे लोग भी वहीं खड़े होंगे जिन्होंने अपने बुजुर्ग माता पिता को वृद्धाश्रम भेजा है। उनके भी घुटने जवाब दे चुके होंगे, आंखें भी धुंधली हो गई होंगी। तब उन्हें क्या चाहिए होगा? 

एक आलीशान कमरा या अपने बच्चों की आहट? जो बीज आज वह बो रहे हैं, वही कल उनकी फसल होगी। इस जटिल समस्या का समाधान कानून नहीं कर सकता है। लोगों के मन में बदलाव लाकर किया जा सकता है। मां-बाप को बोझ नहीं, घर की नींव समझना होगा। जैसे नींव दिखाई नहीं देती पर उसी पर पूरी इमारत टिकी होती है, वैसे ही बुजुर्ग दिखाई भले कम देते हों, पर उन्हीं के आशीर्वाद पर घर टिका होता है।

Friday, August 21, 2026

गण श्रेष्ठो! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के समय में प्राचीन कोशल महाजनपद की राजधानी  श्रावस्ती थी। इसके राजा थे प्रसेनजित जिन्हें पाली भाषा में पसेनदी कहा जाता है। महात्मा बुद्ध और प्रसेनजित समवयस्क थे। एक बार की बात है। श्रावस्ती में अकाल पड़ा। कई वर्ष तक बरसात नहीं हुई। खेतों में फसल नहीं बोई जा सकी। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए। प्रजा भूख की वजह से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही थी। 

राजा प्रसेनजित भी जितना हो सकता था, गरीब प्रजा के लिए उपाय कर रहे थे, लेकिन वह पर्याप्त नहीं था। उसी क्षेत्र में उन दिनों महात्मा बुद्ध भी थे। उन्होंने श्रावस्ती का हाल सुना, तो उनका मन करुणा से भर गया। वह श्रावस्ती पहुंचे तो नगर के धनिकों ने उनका प्रवचन सुनने के लिए एक आयोजन किया। महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस समय अकाल के कारण नरकंकाल जैसे दिखने वाले लोगों की सेवा करना ही सबसे बड़ा आवश्यक धर्म और कर्तव्य है। 

बुद्ध की वाणी सुनकर अकालग्रस्त लोगों में आशा का संचार हुआ कि शायद कोई मदद को आगे आए। धनिक और राजवंश के लोग भूखे प्यासे लोगों की मदद तो करना चाहते थे, लेकिन वह अपने धन में खर्च करना गंवारा नहीं था। उन्होंने बहाने बनाने शुरू कर दिए। लोगों की बात सुनकर बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां बैठी एक भिखारी की बेटी सुप्रिया ने कहा कि मैं अपनी शक्ति भर लोगों को भोजन कराने का दायित्व लेती हूं। 

लोगों ने पूछा, तुम ऐसा कैसे करोगी। सुप्रिया ने कहा कि मैं नगर के धनी और संपन्न परिवारों से मांगकर लाऊंगी और अकालग्रस्त लोगों को खिलाऊंगी। यह सुनकर बुद्ध ने कहा कि गण श्रेष्ठो! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। साधनहीनता किसी कार्य में बाधा नहीं बन सकती है। यह सुनकर धनिक शर्मसार हुए और उन्होंने सहायता का वचन दिया।

हरियाणा के युवाओं को चाहिए सिर्फ एक भरोसेमंद इकोसिस्टम


अशोक मिश्र

हरियाणा के औद्योगिक और तकनीकी विकास की आधारशिला जेन जी के कंधे पर ही टिकी है। हरियाणा की कुल आबादी का 26.6 प्रतिशत हिस्सा जेन जी है। राज्य की कुल आबादी लगभग तीन करोड़ के आसपास मानी जाती है। इस हिसाब से देखें, तो प्रदेश में लगभग 75 से 80 लाख युवा जेन जी वर्ग में आते हैं। इन्हीं में से वह उद्यमी निकल रहे हैं जो गुरुग्राम की साइबर सिटी से लेकर हिसार की कृषि यूनिवर्सिटी तक अपना बिजनेस खड़ा कर रहा है। इन युवाओं को सफलता का मंत्र देने के लिए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी आज गुरुग्राम यूनिवर्सिटी पधारेंगे। इनके साथ होंगे प्रदेश के नामी-गिरामी उद्यमी जो अपने अनुभवों से इन जेन जी इंटरप्रेन्योर को समृद्ध करेंगे। 

कार्यक्रम में छह मास्टर क्लास रूम स्थापित किए जाएंगे और इनके माध्यम से युवाओं को उद्यमी बनने की ट्रेनिंग दी जाएगी। डिपार्टमेंट फार प्रमोशन आफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2026 तक प्रदेश में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या 11,620 से अधिक हो चुकी थी, जिन्होंने सीधे तौर पर 1,39,600 से ज्यादा नौकरियां पैदा की हैं। 

कुछ महीने पहले तक यह आंकड़ा 8,800 से 9,500 के बीच बताया जा रहा था। हरियाणा में जेन जी इंटरप्रेन्योर का कारोबार अब करोड़ों से निकलकर अरबों डॉलर की वैल्यूएशन में गिना जाने लगा है। राज्य से 19 यूनिकॉर्न निकले हैं, यानी ऐसी कंपनियां जिनका मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक है। सैनी सरकार ने भी इन युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए सौ करोड़ रुपये का आत्मनिर्भर स्टार्टअप वेंचर फंड, 50 करोड़ रुपये का को-इनवेस्टमेंट प्लान और 2025-26 के बजट में 20 हजार एकड़ में 10 नई औद्योगिक मॉडल टाउनशिप बनाने का ऐलान किया है। यह एक सकारात्मक कदम है जिसकी सराहना की जानी चाहिए। 

मुख्यमंत्री लगातार युवाओं से जॉब सीकर नहीं, जॉब क्रिएटर बनने का आह्वान कर रहे हैं। इसके लिए मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं का विस्तार किया जा रहा है। हरियाणा सरकार ने हाल ही में एआई मिशन, सेमीकंडक्टर पॉलिसी और एच-हब जैसे वर्ल्ड-क्लास इनक्यूबेटर की घोषणा की है। लेकिन आशंकाएं भी कम नहीं हैं। प्रदेश में 65 रोजगार कार्यालयों में 4.04 लाख बेरोजगार युवा पंजीकृत हैं। 2024 में 46 हजार से अधिक ग्रेजुएट युवाओं ने सफाई कर्मचारी की संविदा नौकरी के लिए आवेदन किया था। 

यह दर्शाता है कि उद्यमिता का रास्ता अभी सबके लिए आसान नहीं है। इसके बावजूद हरियाणा की कहानी अब बदल रही है। 80 लाख जेन जी में से यदि केवल एक प्रतिशत भी गंभीर उद्यमी बनता है तो प्रदेश को 80 हजार नए उद्यम मिल सकते हैं। अभी तो यह शुरुआत है। मुख्यमंत्री का आज का संवाद इसी कारण महत्वपूर्ण है कि सरकार सुनना चाहती है कि यह पीढ़ी नौकरी मांगना नहीं, नौकरी बांटना चाहती है। उसे चाहिए सिर्फ एक भरोसेमंद इकोसिस्टम।

Thursday, August 20, 2026

अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले

बोधिवृक्ष

 अशोक मिश्र

राजगृह में रहने वाले अर्थवसु बहुत ही धनी थे। उनका व्यापार बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ था। वह बहुत ही कृपण व्यक्ति माने जाते थे। उन्हें किसी ने कभी किसी को दान करते हुए नहीं देखा था। एक दिन पुत्र विडाल ने घर आकर अपने पिता अर्थवसु से उलाहना दिया। विडाल ने कहा, तात! हमारे विद्यालय के सहपाठी कहते हैं कि तुम इतने साधारण वस्त्र पहनते हो, तुम्हें अर्थवसु का पुत्र कौन कहेगा। राजगृह के सबसे धनी व्यापारी का पुत्र इतने साधारण वस्त्र पहनता है। आर्य हमारी महत्वाकांक्षाओं का अनादर क्यों करते हैं। 


तभी ज्येष्ठ पुत्र-वधु तिर्यग आ पहुंची। उसने कहा कि विडाल सच कहते हैं आर्य श्रेष्ठ। आज सावित्री वट पूजा के समय ग्राम्य ललनाओं ने मुझसे जो बात कही, उसको सुनकर मेरा अंत:करण रो रहा है। तुम्हारे श्वसुर इतने धनाढ्य हैं कि वह तुम्हें नख शिख स्वर्णाभूषणों से लाद सकते हैं, लेकिन सावित्री पूजा के समय भी तुम्हें वस्त्र सामान्य युवती की ही तरह हैं। अर्थवसु अपने पुत्र और पुत्र-वधु की बात सुनकर भी चुप रहे। 


कुछ वर्ष बीते। वर्षा ने तो जैसे राजगृह से मुंह मोड़ लिया। अकाल पड़ गया। अर्थवसु ने इस संकट में अपने अनाज गृह और कोष का मुंह खोल दिया। जब तक वर्ष नहीं हुई, राजगृह में अर्थवसु ने किसी को भूखा नहीं सोने दिया। लोग आश्चर्यचकित हो उठे। महात्मा बुद्ध ने यह सुना तो वह गदगद हो उठे। वह अर्थवसु के दर्शन को लालायित हो उठे।


 बुद्ध जब वहां पहुंचे, तो तिर्यग ने अपने वृद्ध श्वसुर को आवाज दी, आर्य श्रेष्ठ, उठिए। तथागत आज आपके द्वार पर आए हैं। अर्थवसु ने अपनी आंखें खोली। तथागत की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले। तुमने सारे राजगृह की रक्षा की। यह सुनकर अर्थवसु की बूढ़ी आंखों में चमक आई और उसकी आत्मा ने शरीर त्याग दिया।

किशाऊ बांध परियोजना से निकट भविष्य में बुझेगी हरियाणा की प्यास


अशोक मिश्र

सदियों पहले हरियाणा को हरित प्रदेश कहा जाता था क्योंकि यहां की नदियां और जमीन जल से परिपूर्ण थे। पिछले चार-पांच दशक में लोगों ने नदी और जमीन के पानी का इतना शोषण किया कि आज यह राज्य जल संकट से जूझ रहा है। इस जलसंकट को दूर करने के लिए 16 जून को छह राज्यों हिमाचल, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने मिलकर किशाऊ बांध बनाने की परियोजना पर सहमति जताई थी। किशाऊ बांध परियोजना के चलते आने वाले कुछ वर्षों में हरियाणा का जल संकट खत्म होने के आसार बनने लगे हैं। समझौते के तहत हरियाणा ने बिजली की जगह पानी को प्राथमिकता दी है और उसे कुल उपलब्ध जल का 47.82 प्रतिशत मिलेगा। 

आंकड़ों में यह हिस्सा 1324 एमसीएम में से 836 क्यूसेक है, जो पीने और सिंचाई दोनों के लिए अतिरिक्त होगा। किशाऊ बांध परियोजना केवल एक बांध का निर्माण नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जल संकट के स्थायी समाधान की एक बड़ी राष्ट्रीय परिकल्पना है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की है। इस परियोजना पर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है जिसमें से 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाएगी और बाकी दस प्रतिशत छह राज्यों को खर्च करना होगा। 

हरियाणा के बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान प्रमुख लाभार्थी हैं। दिल्ली को इस परियोजना से यमुना में शुद्ध जल प्रवाह बढ़ने से पेयजल आपूर्ति और प्रदूषण से निपटने में मदद मिलेगी, जबकि राजस्थान के शेखावाटी जैसे डार्क जोन को पाइपलाइन से पानी पहुंचाने की योजना है। केंद्र के अनुसार इस जल से निचले राज्यों के डाउनस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स में भी विद्युत उत्पादन बढ़ने की संभावना है। यह परियोजना हिमालयी क्षेत्र में बन रही है, जहां पर्यावरणीय और मानवीय लागत सबसे अधिक है। 

हिमाचल सरकार स्वयं कह चुकी है कि विस्थापन के मामले में वही सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। रिपोर्टों के अनुसार हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांवों के निवासी 660 मेगावाट के इस बांध का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनके घर, कृषि भूमि और वन क्षेत्र जलमग्न होंगे। बांध की वजह से वनों का विनाश होगा और पारंपरिक आजीविका, सांस्कृतिक धरोहर के उजड़ने का खतरा है। परियोजना की लागत पहले ही लगभग 12 हजार करोड़ आंकी गई है और यह 1960 के दशक से प्रस्तावित होने के बावजूद पर्यावरणीय मंजूरी और अंतर-राज्यीय खिंचाव के कारण लटकी रही है। 

236 मीटर ऊंचे बांध के लिए यह क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील भी माना जाता है। यदि पुनर्वास, वन संरक्षण और पारदर्शी लागत साझाकरण को ईमानदारी से लागू किया गया, तो हरियाणा की प्यास, दिल्ली की पेयजल किल्लत और राजस्थान की सूखी नहरों को राहत मिलेगी और यमुना को नया जीवन मिलेगा।

Wednesday, August 19, 2026

अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उब्बिरी का जन्म श्रावस्ती के कुलीन राजवंश में हुआ था। वह अप्रतिम सुंदरी थी। जो भी उसे देखता, वह मंत्रमुग्ध होकर बस देखता ही रह जाता था। जब वह पूर्ण युवती हुई तो उसका विवाह कौशल नरेश के साथ हुआ। कौशल नरेश उब्बिरी को पाकर अपने को धन्य महसूस करने लगे। 

अभी उसे कौशलपुर के अंत:पुर में आए एक वर्ष ही हुआ था कि वह गर्भवती हो गई। उसके गर्भवती होने की खबर पाकर प्रजा में अपार हर्ष हुआ। समय आने पर उनसे एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया जीवंती। जब जीवंती एक वर्ष की हुई, तो उसने अपनी चपलता और सुंदरता से राजपरिवार का मन मोह लिया। कौशल नरेश ने उब्बिरी को राजमहिषी की पदवी प्रदान की और भव्य शोभायात्रा निकाली। 

कहते हैं कि सौभाग्य के साथ-साथ कभी कभी दुर्भाग्य भी आता है। एक वर्ष की जीवंती की अचानक मृत्यु हो गई। महारानी उब्बिरी पुत्री के शोक में विक्षिप्त हो गई। वह श्मशान घाट पर विलाप करती, अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो? उब्बिरी ने राजमहल छोड़ दिया। शोक विह्वल क्षत-विक्षत देह लिए वह श्मशानघाट में चिल्लाती रहती। संयोग से उधर से एक दिन महात्मा बुद्ध निकले। वह उब्बिरी की करुण कथा से परिचित थे। 

वह श्मशानघाट पहुंचे और उब्बिरी से बोले, पुत्री! तुम बता सकती हो, इस श्मशानघाट में कितने लोगों का दाह संस्कार हुआ है। उसने कहा, नहीं देव! तथागत ने कहा, अगर तुम्हारी तरह सभी लोग शोक विह्वल हो जाएं तो सृष्टि कैसे चलेगी?  अच्छा बताओ, जीवंती के आत्म तत्व को तुम खोज सकती हो? उब्बिरी ने कहा, नहीं देव नहीं। तथागत बोले, तो उठो, आत्म तत्व को खोजने का प्रयास करो। यह सुनकर उब्बिरी की आंख खुल गई। वह मोह माया त्यागकर आत्म साधना में निरत हो गई और पूर्णता प्राप्त करके ही लौटी।