Friday, April 3, 2026

राजा ने युवराज को दिया देश निकाला


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एक सच्चा न्यायाधीश या राजा वही होता है, जो किसी मामले में फैसला करते समय अपना पराया नहीं देखता है। न्याय जल्दी और सच्चा होना चाहिए। एक समय की बात है। किसी राज्य का राजा अपनी प्रजा के बीच काफी लोकप्रिय था। वह अपनी प्रजा की भलाई के लिए हमेशा कुछ न कुछ करने को तैयार रहता था। 

एक दिन की बात है। उसके दरबार में कुछ लोग उससे मिलने आए। उसने उन लोगों को बड़े आदर के साथ बिठाया। उन्हें जलपान कराया। इसके बाद उसने पूछा कि आप लोग किस वजह से मुझसे मिलने आए हैं। एक व्यक्ति यह बात सुनते ही रो पड़ा। राजा ने उस रोते हुए व्यक्ति से कहा कि आप मुझे बताइए कि मेरे राज्य में आपको किस प्रकार का कष्ट है। 

मैं आपके कष्ट को दूर करने का हरसंभव प्रयास करूंगा। राजा की बात सुनकर एक बुजुर्ग ने कहा कि महाराज! अब आपसे क्या कहूं। युवराज के कार्यों से राज्य के काफी लोग दुखी हैं। परेशान हैं। बुजुर्ग की बात सुनकर राजा ने पूछा कि युवराज ऐसा क्या करते हैं जिसकी वजह से हमारी प्रजा को दुख होता है। 

उस बुजुर्ग ने कहा कि महाराज! रोज शाम को युवराज नदी के किनारे जाकर बैठ जाते हैं। उधर से गुजरने वाले छोटे बच्चों को नदी में फेंककर अपना मनोरंजन करते हैं। बच्चे जब बचाने के लिए चिल्लाते हैं, वह हंसते हैं। काफी बच्चे डूबकर मर गए हैं। राजा ने कहा कि आप लोग घर जाइए, कल से ऐसा नहीं होगा। 

राजा जब राजमहल पहुंचा, तो उसने युवराज को बुलाया और कहा कि तुम्हें डूबते बच्चों को देखकर खुशी मिलती है। तुम युवराज रहने के लायक ही नहीं हो। भय से कांपते हुए युवराज ने दोबारा ऐसा करने का वचन दिया, लेकिन राजा नहीं माने और युवराज को देश निकाला दे दिया।

कड़े फैसले लिए बिना हरियाणा में कभी साफ नहीं होगी यमुना


अशोक मिश्र

जब भी दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में चुनाव होते हैं, यमुना की गंदगी का मुद्दा जरूर उठता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में यमुना नदी की स्वच्छता को लेकर खूब चर्चा हुई थी। आप सरकार के दौरान झाग वाली यमुना को लेकर खूब आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए थे। 

वैसे तो यमुना नदी आज भी दिल्ली और हरियाणा में साफ नहीं है, लेकिन हरियाणा सरकार ने अपने क्षेत्र में बहने वाली यमुना को स्वच्छ बनाने का मन बना लिया है। यमुना नगर के कलेसर जंगल से लेकर पलवल के हसनपुर के बीच 320 से 328 किमी लंबाई में बहने वाली यमुना को प्रदूषण मुक्त करने का फैसला सैनी सरकार ने लिया है। इसके लिए एक विशेष मिशन चलाने पर फैसला लिया गया है। 

प्रदेश सरकार की योजना है कि वर्ष 2926-27 के बीच यमुना में गिरने वाले सभी नालों के जल का वैज्ञानिक उपचार सुनिश्चित किया जाए जिससे नदी को स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त किया जा सके। इसके लिए यमुना नदी में मिलने वाले सभी नालों की मैपिंग कराई जाएगी। इसके लिए जरूरी है कि तीन महीने के भीतर सभी नालों और प्रदूषण पैदा करने वाले बिंदुओं की पहचान की जाए ताकि यमुना नदी को पुराने स्वरूप में लौटाया जा सके। हरियाणा में 463 एमएलडी तक बिना ट्रीटमेंट किया हुआ गंदा पानी यमुना में गिराया जा रहा है। 

हरियाणा में इन दिनों 90 एसटीपी काम कर रहे हैं। इन सीवेट ट्रीटमेंट प्लांट की कुल क्षमता 1518 एमएलडी है। इनमें से 62 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी एसटीपी केवल यमुना में मिलने वाले जल को शोधित करने में ही लगे हुए हैं। लेकिन यह सभी एसटीपी मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। कुछ एसटीपी की कार्य क्षमता आंशिक है। बाहशाहपुर ड्रेन क्षेत्र समेत कई क्षेत्रों में तो अभी एसटीपी लगाए ही नहीं गए हैं। यही वजह है कि 463 एमएलडी प्रदूषित जल यमुना में मिलाया जा रहा है। इन हालात को देखते हुए सरकार ने सभी खराब एसटीपी की तुंरत मरम्मत करने का फैसला लिया है। 

इस कार्य में नई क्षमता वाली एसटीपी को जोड़ा जाएगा ताकि हरियाणा में बहने वाली यमुना नदी में मिलने वाले जल को प्रदूषण रहित बनाया जा सके। प्रदेश में ड्रेन नंबर छह समेत कई ड्रेन और 117 औद्योगिक इकाइयां यमुना नदी में प्रदूषित जल डाल रही हैं। इन्हें सरकार ने चिह्नित किया है। इन औद्योगिक इकाइयों सहित नालों से होकर यमुना में मिलने वाले प्रदूषित जल को रोकने के लिए अब कड़े कदम उठाए जाएंगे। अब औद्योगिक इकाइयों को एसटीपी से जोड़ना  अनिवार्य किया जाएगा। 

यमुना नदी में रासायनिक कचरा डालने या बहाने वाली इकाइयों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अवैध डिस्चार्ज पर इन इकाइयों पर जुर्माना लगाने या बंद कर देने का भी प्रदेश सरकार ने फैसला किया है। यमुना नदी को पुराने स्वरूप में लाने के लिए कड़े फैसले लेने पर सरकार को मजबूर होना पड़ेगा।

Thursday, April 2, 2026

समय और धैर्य सबसे बड़े हीरा और मोती

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी को हमेशा समय की कद्र करनी चाहिए। दुनिया में सबसे कीमती समय होता है। यदि इसे गंवा दिया, तो आदमी के पास कुछ भी नहीं बचता है। इसी तरह धैर्य इनसान की सबसे बड़ी खूबी होती है। यदि मनुष्य धैर्यवान नहीं है, तो वह जीवन में कुछ भी हासिल नहीं कर सकता है। 

एक बार की बात है। एक साधु नदी के किनारे बैठकर चिल्लाता रहता था, जो चाहोगे, सो पाओगे। लोग उधर से गुजरते। साधु को चिल्लाते हुए सुनते और मुस्कुराकर निकल जाते थे। लोग उस साधु की बात पर विश्वास नहीं करते थे। उसे पागल मानते थे। लेकिन साधु नियम से नदी के किनार आता और यही रट लगाता, जो चाहोगे, सो पाओगे। एक दिन की बात है। एक युवक ने साधु की बात सुनी, तो उसके पास गया। 

उसने साधु को प्रणाम किया और उसके बगल में बैठ गया। थोड़ी देर बाद साधु ने उससे पूछा, बेटा! तुम भी किसी कामना के साथ यहां आए हो? युवक ने कहा कि मैंने आपकी बात सुनी थी। मैं भी जो चाहता हूं, वह पाना चाहता हूं। साधु ने कहा कि तुम क्या चाहते हो? युवक ने कहा कि मैं जो कुछ भी चाहता हूं, वह पूरा हो सकता है? साधु ने कहा कि हां बेटा! जो चाहते हो, वह तुम्हें हासिल हो सकता है।

उस युवक ने कहा कि मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूं, क्या यह संभव है? साधु ने उसकी एक हथेली पर अपना हाथ रखते हुए कहा कि मैं तुम्हें एक हीरा दे रहा हूं। इससे तुम हजारों हीरे बना सकते हैं। वह हीरा है समय। इसे कसकर पकड़े रहना। दूसरे हाथ पर अपनी हथेली रखते हुए साधु ने कहा कि इस हाथ में दुनिया सबसे बढ़िया मोती धैर्य दे रहा हूं। इन दोनों की बदौलत तुम दुनिया के सबसे बड़े व्यापारी बन सकते हो। साधु की बात सुनकर युवक ने उसे प्रणाम किया और अपना रास्ते चला गया।

हरियाणा में अवैध गर्भपात पर रोक लगाने से ही सुधरेगा लिंगानुपात

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार लिंगानुपात में सुधार लाने का हर संभव प्रयास कर रही है। लेकिन उसके इस प्रयास में प्रदेश में लिंग परीक्षण करने वाले अवैध रूप से खुले क्लीनिक और शहर से लेकर गांवों तक फैले इनके एजेंट, सरकार के मनसूबों पर पानी फेर रहे हैं। राज्य के लगभग सभी जिलों में अवैध तरीके से होने वाले गर्भपात सरकार की लिंगानुपात बढ़ाने की योजना को अंगूठा दिखा रहा हैं। 

पलवल जिले में ही एक महिला को अवैध रूप से गर्भपात कराते हुए एक महिला को गिरफ्तार किया गया है। अवैध रूप से गर्भपात होने की जानकारी समय पर जिला सिविल सर्जन को मिल गई, तो उन्होंने एक टीम बनाकर अवैध रूप से गर्भपात करने वाली महिला के खिलाफ कार्रवाई की। तलाशी के दौरान टीम ने चिन्हित नोट, गर्भपात से संबंधित दवाइयां, इंजेक्शन सिरींज तथा अन्य मामले से जुड़े यंत्र बरामद किए हैं। सबसे ताज्जुब की बात यह है कि यह महिला कई साल से अवैध तरीके से गर्भपात करा रही थी और इसके पास चिकित्सा से संबंधित डिग्री या सर्टिफिकेट या वैध लाइसेंस तक नहीं मिला। 

छानबीन में पता चला कि आरोपी महिला दसवीं तक ही पढ़ी है। सरकार समय समय पर अवैध गर्भपात के संबंध में लोगों को जागरूक भी करती रहती है। इसके बावजूद एक अच्छी खासी संख्या में महिलाएं भ्रूण की जांच करवाकर अवैध रूप से संचालित गर्भपात केंद्रों पर जाकर कन्या भ्रूण से छुटकारा पा रही हैं। यही नहीं, हरियाणा के पड़ोसी राज्यों में भी महिलाएं गर्भपात करा रही हैं।

राज्य के लगभग हर जिले में इन अवैध गर्भपात केंद्रों के दलाल फैले हुए हैं। यह अपने इलाके में गर्भवती महिलाओं से संपर्क करके उन्हें कन्या भ्रूण की जांच कराने का लालच देते हैं। यदि जांच के बाद भ्रूण कन्या निकलती है, तो उसे जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। यही वजह है कि सरकार अपने सभी प्रयास के बावजूद सफल नहीं हो पा रही है। हालांकि यह भी सही है कि अवैध तरीके से होने वाली घटनाएं प्रदेश में बहुत कम हो गई हैं, लेकिन अभी इसके खिलाफ अभियान तेज करने की जरूरत है। हालांकि यह भी सही है कि हरियाणा में जन्म के समय लिंगानुपात में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। 

2025 में यह बढ़कर 923 हो गया है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक है। 2024 में यह आंकड़ा 910 था, जो बताता है कि सरकारी सख्ती और जागरूकता अभियानों (जैसे पीएनडीटी एक्ट का कड़ाई से पालन) के कारण स्थिति में काफी सुधार आया है। जिला स्तर पर, पंचकूला 2025 में 971 के लिंगानुपात में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला जिला बनकर उभरा। यह 2024 के 915 से एक बड़ा सुधार था। अगर राज्य सरकार अवैध रूप से खुले क्लीनिकों पर सख्ती की जाए, तो लिंगानुपात सुधारने में दिक्कत नहीं आने वाली है।

Wednesday, April 1, 2026

सुकरात बोले, मैं तो सबसे बड़ा अज्ञानी हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अपने ज्ञान का घमंड कभी नहीं करना चाहिए। विनम्रता और लोगों को अपने से उच्च मानना, सच्चे ज्ञानी की निशानी है। जो वास्तव में ज्ञानी होता है, उसे अपने ज्ञान का अभिमान कभी नहीं होता है। वह हमेशा लोगों की भलाई करता रहता है, लेकिन बदले में वह आभार व्यक्त कराना भी नहीं चाहता है। 

बात उस समय की है, जब यूनान में सुकरात के ज्ञान की दूर-दूर तक चर्चा थी। उन्हीं दिनों एक संत भी ऐसे थे जो ज्ञानी थे और सुकरात उनकी बहुत प्रशंसा करते थे। एक दिन एक व्यक्ति उस संत के पास पहुंचा और संत से कहा कि महात्मा जी, मैं अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहता हूं। आप कोई ऐसी शिक्षा या ज्ञान दें जिससे मेरा जीवन बेहतर हो जाए। 

उस व्यक्ति बात सुनकर संत ने कहा कि भाई, मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूं। मैं आपको ज्ञान कैसे दे सकता हूं। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने आपका बहुत नाम सुना है। आपकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है और आप अपने को साधारण व्यक्ति बता रहे हैं। इस पर संत ने कहा कि यदि तुम सचमुच ज्ञान पाना चाहते हो, तो सुकरात के पास चले जाए। 

वह यूनान के सबसे ज्ञानी व्यक्ति हैं। वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुंचा। उसने सारी बात बताते हुए कहा कि वह जीवन को बेहतर बनाने का मंत्र सीखना चाहता है। इस पर सुकरात ने कहा कि जिस संत ने तुम्हें मेरे पास भेजा  है। वह कम से कम साधारण मनुष्य तो हैं। मैं साधारण मनुष्य भी नहीं हूं। मैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूं। वह व्यक्ति फिर संत के पास पहुंचा, तो संत ने कहा कि जब सुकरात जैसा ज्ञानी अपने को अज्ञानी कह रहा है, तो यह उनके ज्ञानी होने का प्रमाण है। यह सुनकर उस व्यक्ति ने इसे ही जीवन को बेहतर बनाने का पहला पाठ मान लिया।

सोशल मीडिया छीन रहा बच्चों की मानसिक ताकत और सुकून

अशोक मिश्र

वैसे तो सोशल मीडिया का अगर सदुपयोग किया जाए, तो यह बहुत ही कारगर साबित हो सकती है। विचारों के आदान-प्रदान के साथ-साथ सोशल मीडिया लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखने का बहुत सशक्त माध्यम है। लेकिन इसके दुरुपयोग के खतरे भी कम नहीं है। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। यह एक तरह से लत साबित होता जा रहा है जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास बाधित होता जा रहा है। 

हरियाणा के जिला अस्पतालों में अब ऐसे बहुत सारे मामले सामने आने लगे हैं जिनसे पता चलता है कि बच्चे एक लंबा समय सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं जिसके दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। राज्य के जिलों में जिला नागरिक अस्पतालों में आए बच्चों की समस्याओं को गंभीरता से जांचने के बाद पता चलता है कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने की वजह से उनका फोकस पढ़ाई से हट रहा है। 

वह जो कुछ स्कूल, कोचिंग या घर पर पढ़ रहे हैं, वह उन्हें याद नहीं हो रहा है। ज्यादातर बच्चे शारीरिक रूप से भले ही अपने क्लास में मौजूद हों, लेकिन दिमागी रूप से वह सोशल मीडिया पर ही होते हैं। यही वजह है कि उनके टीचर्स जो कुछ क्लास में पढ़ाते हैं, वह उनके भेजे में नहीं घुस रहा है। ऐसी अवस्था में उनकी याददाश्त भी प्रभावित हो रही है। 

बच्चे खुद भूलने की आदत से परेशान हैं, लेकिन वह सोशल मीडिया का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं। अपने बच्चों की ऐसी स्थिति देखकर पैरेंटस भी काफी परेशान हो रहे हैं। बच्चों की ऐसी स्थिति के लिए कई सामाजिक और पारिवारिक कारण जिम्मेदार हैं। अगर माता-पिता दोनों कामकाजी हैं या घर का वातावरण अशांत है, तो मां-पिता अपने बच्चों को मोबाइल में उलझाए रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं। घरों में रहने वाली महिलाएं भी अपने बच्चे को मोबाइल या लैपटॉप या डेस्कटॉप देकर अपने लिए थोड़ी देर का सुकून खोजने में लग जाती हैं। 

इसी का नतीजा है कि बच्चे अब सोशल मीडिया के आदी होते जा रहे हैं। बच्चे बाहर जाकर खेलने कूदने की जगह घर में ही रहकर सोशल मीडिया पर ही अपने लिए मनोरंजन तलाश रहे हैं। पहले बच्चे अपना ज्यादातर समय गली-मोहल्लों और पार्कों में खेलते-कूदते बिताते थे जिसकी वजह से वह मानसिक और शारीरिक रूप से ज्यादा मजबूत रहते थे। वह स्कूल में भी अच्छा प्रदर्शन करते थे। 

लेकिन आज के हालात में जब स्कूल और घर में बच्चों को बेवजह डांटा-फटकारा जाता है, तो वह तनावग्रस्त हो जाते हैं। उस तनाव से मुक्ति पाने के लिए बच्चे सोशल मीडिया पर समय बिताना उचित समझते हैं। यदि अपने बच्चों का भविष्य सुधारना है, तो सबसे पहले अभिभावकों, अध्यापकों को बच्चों से संवाद कायम करना होगा। उनकी समस्याओं को समझना होगा। उनकी दूसरे बच्चों से तुलना बंद करनी होगी, तभी वह सोशल मीडिया के जंजाल से मुक्त होंगे।

Tuesday, March 31, 2026

विसेंट वैन गॉग जिसे मरने के बाद सराहा गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अपने जीवन की अंतिम सांस लेने के समय ‘दुख हमेशा रहेगा’ कहने वाले डच चित्रकार विसेंट वैन गॉग को जीवन भर वह नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। मृत्यु के कई वर्षों बाद जब उनकी प्रतिभा को लोगों ने पहचाना और उन्हें अपने समय का महानतम चित्रकार माना। 

30 मार्च 1853 में नीदरलैंड्स में जन्मे वैन गॉग को बचपन से ही चित्रकला में रुचि थी। उनके परिवार के कई लोग कला से संबंधित व्यवसाय करते थे। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के काम किए। कई वह आर्ट डीलर बने जो उनके परिवार के दादा, चाचा आदि करते थे। 

निराशा के क्षणों में उन्होंने पादरी बनने का फैसला किया, लेकिन इस काम में भी वह विफल ही रहे। वैसे वैन गॉग का जन्म एक अमीर परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा उनकी मां की देखरेख में हुई थी। लेकिन वह अपने परिवार से जीवन भर लगभग कटे से रहे। एकाकी जीवन जीने की वजह से वह अस्थिर दिमाग वाले हो गए थे। कुछ लोग तो उन्हें मनोरोगी समझते थे। 

जब वह 27 साल के हुए, तो उन्होंने मुकम्मल तौर पर तय किया कि अब उन्हें चित्रकार ही बनना है। उन्होंने चित्र बनाना शुरू किया, लेकिन लोग उनके चित्रों के प्रति उदासीन ही रहते थे। वह अपने जीवन में केवल एक ही चित्र बेचने में सफल हो पाए थे। 

एक दशक से कुछ अधिक समय में, उन्होंने लगभग 2,100 कला कृतियाँ बनाईं, जिनमें लगभग 860 तैलचित्र थे, जिनमें से अधिकांश उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दो वर्षों में बनाईं। एक बार उन्होंने अपने को गोली मार ली। गोली उनकी रीढ़ की हड्डी में फंस गई। अस्पताल में ही 29 जुलाई 1890 में 37 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।

थोड़े से लालच के लिए रिश्तों की मर्यादा को भूल रहे लोग


अशोक मिश्र

रिश्तों को हर समाज में विशेष महत्व दिया जाता रहा है। माता-पिता, भाई-बहन, सास-बहू जैसे तमाम रिश्ते ऐसे होते हैं जो जीवन को व्यवस्थित और संतुलित बनाते हैं। भारत में ही नहीं, कई देशों में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है। आज भी बरकरार है, लेकिन संयुक्त परिवारों की संख्या में निस्संदेह भारी कमी  आई है। संयुक्त परिवारों की खूबी यह थी कि यदि परिवार का एक सदस्य आर्थिक रूप से कमजोर भी हो, तो परिवार के दूसरे लोग उसकी सहायता करते थे। 

एक साथ, एक ही घर में रहने और एक ही चूल्हे का भोजन करने की वजह से उनमें प्रेम बना रहता था। यदि कभी कोई ऊंच-नीच भी हो जाती थी तो परिवार का मुखिया समझा बुझाकर शांत कर देता था। बच्चे भी सब एक साथ खेलते-कूदते, खाते-पीते थे, अपने परिवार के बड़ों के साथ उठते-बैठते थे, तो उनमें प्रेम बना रहता था। वह रक्त संबंधों को समझते थे। भाई कितना भी बुरा हो, भाई होता था। लेकिन जैसे ही एक परिवार का चलन हुआ, रक्त संबंधों की महत्ता घटने लगी। 

अलग-अलग रहने की वजह से प्रेमभाव भी कम होते-होते लगभग खत्म हो गया। इसी वजह से अब समाज में छोटी-छोटी बातों पर भाई, बहन, देवर-भाभी, देवरानी-जिठानी जैसे रिश्तों में दरार आती जा रही है। थोड़े से फायदे के लिए लोग हत्या करने से भी हिचक नहीं रहे हैं। फरीदाबाद में ही बारह दिन पहले प्रापर्टी के पैसों की लालच में एक बहू ने अपनी सास की हत्या कर दी। 

रविवार को पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार होने के बाद आरोपी बहू ने खुलासा किया कि सास अपनी प्रापर्टी बेचने से मिले पैसे को दूसरे बेटे को देना चाहती थी। यह बात उसकी बड़ी बहू को मंजूर नहीं था। एक दिन उसने अपनी सास का गला दबा दिया। जब उसने देखा कि गला दबाने से भी सास की मौत नहीं हुई है, तो वह पेट पर बैठकर तब तक छाती पर घूंसे बरसाती रही, जब तक कि सास की मौत नहीं हो गई। सास की मौत होने के बाद उसने सबसे कहा कि उसकी सास की मौत बीमारी के चलते हो गई, लेकिन उसकी देवरानी को शक हो गया और उसने पुलिस से शिकायत कर दी। 

पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराया, तब जाकर हत्या की पुष्टि हुई। यह तो हमारे समाज की एक बानगी है। ऐसी घटनाएं रोज कहीं न कहीं हो रही है। कहीं बेटा पिता की हत्या कर रहा है, तो कहीं पिता अपने बेटे की। भाई भाई का हत्यारा है, तो भाई बहन का। लोग थोड़े से लालच के लिए  रिश्तों का कत्ल करने से हिचक नहीं रहे हैं। इन घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे समाज में रिश्तों की मर्यादा रह ही नहीं गई है। लेकिन इसी समाज में बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो परिवार और अपने निकटतम परिजनों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं।

Monday, March 30, 2026

आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। अगर आप अपने मन में ठान लें कि आप जीते हुए हैं, तो यकीन मानिए, हारी हुई बाजी भी आप हर हालत में जीत सकते हैं। बस मन में यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मुझे कोई हरा नहीं सकता है। परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं, लोग खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन यदि मन में विश्वास है, तो विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है। 

कभी एक समय ऐसा था कि यूनान को अजेय समझा जाता था। उसकी फौजों ने कभी हार का सामना नहीं किया था। जिस देश पर यूनान हमला करता था, उस देश का शासक या तो अधीनता स्वीकार कर लेता था या फिर राज्य छोड़कर भाग जाता था। पूरा यूरोप यूनान की फौजों के आतंक से संत्रस्त था। रोम के सेनापति सीजर यूनानी फौजों का यह भय अपने देश के सैनिकों और प्रजा के मन से निकालता चाहता था। 

वह काफी दिनों से सोच रहा था कि यूनानी सैनिकों को कैसे मजा चखाया जाए। फिर उसने यूनानी फौजों की अपराजेयता को ही निशाना बनाने की बात सोची। सीजर ने अपने देश के हर शहर, हर गांव की दीवार पर यह वाक्य लिखवाया, यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं, जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं और यूनानी फौजों को उनकी करनी का मजा चखाएं। 

इस वाक्य का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ। रोम की जनता उत्साहित हो गई। घर-घर युद्ध की तैयारियां हुईं। एक दिन यूनान की फौजें रोम की फौज के सामने आ खड़ी हुई। जमकर लड़ाई लड़ी गई और अजेय समझा जाने वाला यूनान परास्त हो गया। सीजर ने एक इतिहास रच दिया।

हरियाणा की सड़कों पर पैदल चलना भी नहीं रहा सुरक्षित

अशोक मिश्र

हरियाणा में अब सड़क पर पैदल चलना भी सुरक्षित नहीं रहा। पता नहीं, कब तेज रफ्तार में बस, कार, ट्रैक्टर या ट्रक आए और कुचलता हुआ निकल जाए। गुरुग्राम में शुक्रवार की शाम को तेज रफ्तार थार ने पैदल घर लौट रहे नाना और उनके दो नातियों को उड़ा दिया। रफ्तार इतनी तेज थी कि तीनों लोग घटना स्थल से लगभग बीस मीटर दूर जा गिरे। हादसे के बाद थार चालक वाहन रोककर घायलों को अस्पताल पहुंचाने की जगह वहां से फरार हो गया। 

काफी देर तक जब साठ वर्षीय नाना सुभाष और उनके दस और आठ वर्षीय दोनों नाती जब घर नहीं पहुंचे, तब उनकी तलाश शुरू हुई। काफी देर बाद तीनों लोगों को खोज निकाला गया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने तीनों को मृत घोषित कर दिया। सड़क पर किनारे चल रहे इन तीनों को कहां मालूम था कि पीछे से तेज रफ्तार थार के रूप में उनकी मौत आ रही है। 

हरियाणा के युवाओं में तेज रफ्तार से कार चलाना काफी शान की बात समझी जाती है। उन्हें तेज वाहन चलाने में एक किस्म का रोमांच महसूस होता है, लेकिन तेज रफ्तार से वाहन चलाने वाले युवा यह भूल जाते हैं कि उनके ऐसा करने से उनकी जान तो खतरे में रहती ही है, सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की जान को भी उतना ही खतरा बना रहता है। हरियाणा यातायात पुलिस से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में 57,901 लोगों की जान गई है। 

राज्य में पिछले 11 वर्षों में लगभग 1.15 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। 2017 में 11,258 सड़क दुर्घटनाओं में 5,120 लोगों की जान गई, जो 2014 के बाद सबसे अधिक है। हरियाणा में साल 2024 के दौरान 9806 सड़क हादसे हुए। इन हादसों में करीब 4689 लोगों की मौत हो गई, 7914 लोग घायल हुए। यह आंकड़ा साल 2023 के मुकाबले काफी कम है। खास बात यह है कि पुलिस ने साल 2024 के सड़क हादसों में घायल होने वाले 5313 लोगों को फस्ट एड की सुविधा मुहैया करवाई, वहीं 7090 घायलों को तुरंत प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया। साल 2023 में 10 हजार 168 सड़क हादसे हुए, जिनमें 5092 लोगों की मौत हुई है। साल 2022 में 11 हजार 130 सड़क हादसों में 5621 लोगों की मौत हुई थी। 

अधिकांश दुर्घटनाएं तेज गति, लापरवाही से गाड़ी चलाने और गलत दिशा में गाड़ी चलाने के कारण होती हैं। चालक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं या नशे में होते हैं, जो इन दुर्घटनाओं के कारणों में और इजाफा करता है। सड़क हादसों में लोगों की केवल मौत ही नहीं होती है, बहुत सारे लोग घायल भी होते हैं। कुछ लोग दिव्यांग हो जाते हैं। दिव्यांगता की वजह से पीड़ित व्यक्ति को जीवन भर तकलीफ उठानी पड़ती है। कुछ मामलों में जब परिवार में कमाने वाला व्यक्ति ही दिव्यांग हो जाए, तो पूरा परिवार बिखर जाता है।