Tuesday, February 17, 2026

विल्मा ने पोलियो को हराकर जीता गोल्ड

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अमेरिका के टेनेसी में 23 जून 1940 को पैदा हुई विल्मा ग्लोडीन रुडोल्फ को बचपन में काफी संघर्ष करना पड़ा। वह समय से पहले पैदा हुई थीं। बचपन में ही निमोनिया और पोलियो की वजह से बायां पैर कमजोर हो गया। वह सहारा लेकर ही चल पाती थीं। 

उनकी मां ब्लैंथ रुडोल्फ और पिता एड रुडोल्फ हमेशा उनका उत्साहवर्धन करते रहे। उन दिनों अमेरिका में स्पोर्ट्स को ज्यादा महत्व दिया जाता था जिसकी वजह से प्राइमरी स्कूल से ही बच्चों को खेलने का मौका दिया जाता था। जब वह बारह साल की हुईं तो एक दिन स्पोर्ट्स पीरियड में उन्होंने अपने टीचर से ओलिंपिक के बारे में जानना चाहा। शिक्षक उसकी बात पर हंस पड़े और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि तुम अपने पैरों को देखो, दौड़ना तो दूर ठीक से चल भी नहीं पाती हो। ओलिंपिक के बारे में जानकर तुम क्या करोगी। 

वहां मौजूद छात्र-छात्राएं भी उसका मजाक उड़ाने लगे। फिर तो स्कूल में सबने उसका मजाक उड़ाना शुरू किया। तब विल्मा ने अपने शिक्षक से कहा कि एक दिन आप सब मुझे ओलिंपिक में दौड़ते हुए और पदक जीतते हुए देखें। इसके बाद विल्मा ने पहले अपनी बैसाखी से छुटकारा पाने का प्रयास किया जिसमें वह काफी मेहनत के बाद सफल भी हो गईं। इसके बाद उन्होंने दौड़ने का अभ्यास शुरू किया। 

छोटी-मोटी प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेकर जीत हासिल की। इसके बाद 1960 में रोम में हुए ओलिंपिक में उन्होंने तीन प्रतिस्पर्धाओं भाग लेकर तीन स्वर्ण पदक जीते। एक ओलिंपिक में तीन स्वर्ण पदक जीतने वाली वह अमेरिका की पहली महिला बनीं। 12 नवंबर 1994 को 54 वर्ष की आयु में इस महान महिला धाविका की कैंसर से टेनेसी में मौत हो गई।

आग लगने पर धन-जन हानि कम करने को खुलेंगे नए फायर स्टेशन


अशोक मिश्र

अब मौसम धीरे-धीरे गरम होने लगा है। तापमान बढ़ने से लोगों ने राहत की सांस ली है। लेकिन आने वाले दिनों में यही गरमी जब प्रचंड रूप अख्तियार करेगी, तब आज सुखद लगने वाली गरमी परेशानी का सबब बन जाएगी। गरमी के मौसम में सबसे ज्यादा आगजनी की घटनाएं सामने आती हैं। मौसम गरम होने की वजह से सब चीजें सूख जाती हैं जिसकी वजह से एक हल्की सी चिन्गारी भयानक रूप धारण कर लेती है। वनों और खेतों में आग लगने की घटनाएं सबसे ज्यादा मार्च से लेकर जून महीने में होती हैं। कई बार किसी व्यक्ति की लापरवाही के चलते खेत में लगी आग कफी नुकसानदायक साबित होती है। 

गेहूं की फसल की मार्च और अप्रैल महीने से कटनी शुरू हो जाती है। कई बार खड़ी फसल में आग लग जाती है जिसको रोक पाना किसान और लोगों के वश की बात नहीं रहती है। कई सौ एकड़ फसल जलकर राख हो जाती है। किसान की मेहनत स्वाहा हो जाती है। इस स्थिति से निपटने के लिए सैनी सरकार ने प्रदेश में फायर स्टेशन की संख्या बढ़ाने का फैसला लिया है। शिवालिक क्षेत्र पंचकुला, अंबाला और यमुना नगर जैसे जिलों में नए फायर स्टेशन खोलने की योजना है। 

 वैसे पूरे प्रदेश में अभी तक केवल 89 फायर स्टेशन हैं, जो जनसंख्या और क्षेत्रफल को देखते हुए काफी कम प्रतीत होते हैं। इनमें से भी सबसे ज्यादा शहरी क्षेत्र में फायर स्टेशन हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में इनकी संख्या काफी कम है। प्रदेश में 59 फायर स्टेशन खोले जाएंगे जिसमें से बीस फायर स्टेशन एनसीआर इलाके में खोले जाएंगे। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इन नए फायर स्टेशनों को खोलने की मंजूरी दे चुके हैं। फायर स्टेशन खोलने का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों में लगने वाली आग पर जल्दी  से जल्दी काबू पाना है। 

कई बार यह भी देखने में आया है कि जब किसी खेत या औद्योगिक संस्थान में  आग लग जाती है, तो फायर ब्रिगेड को पहुंचने में काफी देर लगती है। इसका कारण फायर स्टेशन का बहुत दूर होना है। जब फायर ब्रिगेड चलती है, तो रास्ते में पड़ने वाली टूटी फूटी सड़कें, संकरे रास्ते और सड़कों पर हुआ अतिक्रमण उनकी रफ्तार को काफी धीमा कर देते हैं। ऐसी स्थिति जब तक फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंचती है, तब तक फसल या सामान जलकर स्वाहा हो चुका होता है। इस स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने पचास किमी के दायरे में फायर स्टेशन स्थापित करने का फैसला किया है। 

हालांकि यह भी दूरी कुछ ज्यादा ही है। दस-पंद्रह किमी के दायरे में एक फायर स्टेशन होने से आग लगने की घटनाओं पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में धन-जन की हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि आग लगने पर फायर ब्रिगेड जब तक पहुंचती है, तब तक सब कुछ जलकर राख हो चुका होता है।

Monday, February 16, 2026

साबूलाल ने तिरंगा फहराकर ही दम लिया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

देश को आजाद कराने के लिए हजारों युवाओं ने अपना बलिदान दिया है। देश के लगभग हर जिले से लोगों ने अंग्रेजी दासता से मुक्ति के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग किया है। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे साबू लाल जैन वैसखिया। साबूलाल का जन्म 1923 मध्य प्रदेश के सागर जिले के गढ़ा कोटा में हुआ था। 

साबूलाल ने पांचवीं तक पढ़ाई की थी। वह आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके पिता पूरन चंद की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी, इसलिए उनको पढ़ाई छोड़कर कामकाज में लगना पड़ा। बचपन में ही उनके मन में देशभक्ति भावना पैदा हो गई थी। बात 1942 की है। देश में क्रांति की आग धधक रही थी। अंग्रेजों के खिलाफ पूरे देश में रोष था। उन्हीं दिनों सागर में तय किया गया कि कल अंग्रेजी शासन के विरोध में एक जुलूस निकाला जाएगा, जो कलेक्ट्रेट तक जाएगा। 

इस जुलूस में बाबूलाल ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। सैकड़ों आदमियों का यह जुलूस जैसे ही कलेक्ट्रेट पहुंचा, बाबू लाल कलेक्ट्रेट की छत पर चढ़ गए। उस समय नीचे मौजूद पुलिस वालों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन वह छत तक पहुंचने में सफल हो गए। कलेक्ट्रेट पर लगेयूनियन जैक को उतार कर साबूलाल ने नीचे फेंक दिया। इस पर पुलिस वालों ने उन्हें चेतावनी दी, लेकिन इसी बीच वह यूनियन जैक की जगह पर तिरंगा लगाने में सफल हो गए। इतने में पुलिस वालों ने गोलियां चलानी शुरू की। 

एक गोली आकर साबूलाल जैन के सीने में लगी। भारत माता की जयकारे के साथ साबूलाल नीचे आ गिरे। उनकी उसी समय मौत हो गई। साबूलाल के शहीद होने की खबर सुनकर पूरा जिला शोकग्रस्त हो गया। उनकी शवयात्रा के दौरान उमड़ी भारी भीड़ को देखकर ब्रिटिश हुकूमत भी दहल गई।

नई औद्योगिक नीति से हरियाणा में विकास को लगेंगे नए पंख


अशोक मिश्र

किसी भी देश या प्रदेश में पूंजी निवेश करते समय निवेशक सबसे पहले यह जानकारी हासिल करता है कि उस देश या प्रदेश की कानून व्यवस्था कैसी है? इसके बाद वह आवागमन के साधनों, सड़कों और शासन से मिलने वाले छूट आदि के बारे में विचार करता है। औद्योगिक क्षेत्र का विकास तभी हो सकता है, जब सरकार की नीतियां उद्योगों को प्रश्रय देने वाली हों, उनके विकास में सहयोगी साबित हों। यही वजह है कि नायब सैनी सरकार ने प्रदेश के विकास की आधारशिला रखने के लिए नई औद्योगिक नीति बनाने का फैसला किया है। नई औद्योगिक नीति के तहत राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय उद्योगों और निवेशकों को वह हरसंभव सुविधाएं देने की कोशिश की जाएगी जिससे देशी-विदेशी पूंजी निवेशक आकर्षित हो सकें। यदि प्रदेश में देशी-विदेशी निवेशक पूंजी निवेश करते हैं, तो इससे प्रदेश के लाखों युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। 

प्रदेश की बेरोजगारी कम होगी। लोगों की कमाई बढ़ने से जीवन स्तर भी उच्च होगा। सैनी सरकार इस प्रयास में लगी हुई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 लक्ष्य में हरियाणा का सबसे ज्यादा योगदान हो। हरियाणा की औद्योगिक स्थिति को देखते हुए यह स्वप्न असंभव भी नहीं लग रहा है। बस, इसके लिए थोड़ी मेहनत और करनी होगी। सैनी का तो यहां तक कहना है कि प्रदेश देशी-विदेशी पूंजी निवेशकों की पहली पसंद बना हुआ है। इस बार बजट में नई औद्योगिक नीति के साथ-साथ उद्योगों को भारी छूट और सुविधाएं मिलने की संभावना है। 

पिछले बजट में भी सरकार ने राज्य में दस आईएमटी बनाने की बनाने की घोषणा की थी। इन दस नई इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप में छह पर बड़ी तेजी से काम चल रहा है। बाकी बची चार आईएमटी का काम जल्दी ही शुरू होने वाला है। प्रदेश की कनेक्टिविटी को दुरुस्त करने के लिए सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। जो सड़कें खराब हो गई हैं या जिन सड़कों पर गड्ढे हैं, उनको दुरुस्त किया जा रहा है। नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे और जिलों की सड़कों का निर्माण किया जा रहा है, ताकि प्रदेश में आवागमन दुरुस्त हो सके। 

पहले से ही प्रदेश में आवागमन काफी सहूलियत भरा है। राज्य के एक कोने से दूसरे कोने में बहुत आसानी से पांच-छह घंटे में आया जाया जा सकता है। दिल्ली एयरपोर्ट, चंडीगढ़ एयरपोर्ट और हिसार एयरपोर्ट के जरिये हवाई यात्रा को भी सर्वसुलभ करने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है ताकि किसी को आने-जाने में कोई परेशानी न हो। इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर कुछ इस तरीके से विकसित किया जा रहा है ताकि आने वाले चार-पांच दशकों तक पूंजी निवेशकों को किसी किस्म की परेशानी का अनुभव न हो। यूरोपीय यूनियन के साथ पिछले दिनों हुए भारत-ईयू समझौते से भी हरियाणा को भारी लाभ मिलने की संभावना है।

Sunday, February 15, 2026

...और बच्चा हमेशा के लिए सो गया

प्रतीकात्मक एआई चित्र
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। कहीं पेड़ों को काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं, तो कहीं वनों को उजाड़कर बस्तियां बसाई जा रही हैं। इससे हमारा पर्यावरण संकट में पड़ता जा रहा है। जिस मौसम में गर्मी पड़नी चाहिए, उस मौसम में चक्रवात आ रहे हैं, तेज हवाओं के साथ बरसात हो रही है। 

पृथ्वी का तापमान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से मौसम चक्र में भारी बदलाव आता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारी संख्या में लोगों को विस्थापित होने पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के शुरुआती दौर यह कथा है। कहते हैं कि किसी राज्य में कई वर्षों से बरसात नहीं हुई। उस राज्य के लोगों ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादातर पेड़ों को काट डाला था। 

इसका नतीजा यह हुआ कि एक साल बादल आते और बिना बरसे निकल जाते। जैसे प्रकृति भी मानवों के कुकृत्य से नाराज थी। लोगों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। लोग भूख और प्यास से मर रहे थे। एक बच्चा भी कई दिनों से भूखा था। अनाज पैदा न होने की वजह से काफी संख्या में लोगों को अपनी जान देनी पड़ी थी। बच्चा भी काफी दुर्बल हो गया था। उसके पास थोड़ा सा पानी बचा था। 

तभी उस बच्चे के सामने एक चिड़िया भूख-प्यास से बेहाल होकर गिर पड़ी। वह भी शायद कई दिनों से भूखी प्यासी थी। उस बच्चे ने चिड़िया को देखा और फिर अपने पास बचे हुए पानी को देखा। उसने एक-एक बूंद पानी चिड़िया के चोंच में डालनी शुरू की। थोड़ी देर में कुछ पानी चिड़िया के पेट में गया और कुछ पानी जमीन पर। थोड़ी देर बाद चिड़िया ने अपने पंख फड़फड़ाए और उड़ गई। उसके बाद बच्चा जमीन पर गिरा और हमेशा के लिए सो गया। कहते हैं कि इसके बाद उस राज्य में भारी बारिश हुई।

जंगल सफारी तो चाहिए, लेकिन अरावली क्षेत्र की कीमत पर नहीं


अशोक मिश्र

अरावली की पहाड़ियों में प्रस्तावित जंगल सफारी पर रोक लगा दी गई है। सुप्रीमकोर्ट ने हाल ही में अरावली की ऊंचाई को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। इसके बाद जब वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने इसका विरोध किया और मामले को लेकर दोबारा सुप्रीमकोर्ट में गए, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले पर न केवल रोक लगा दी, बल्कि अब जंगल सफारी के निर्माण पर भी रोक लगा दी है। 

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान  अरावली की पहाड़ियों में किसी भी तरह के गैर वानिकी कार्य पर रोक लगाते हुए कहा है कि अगली सुनवाई तक अरावली क्षेत्र में कोई भी अंतिम निर्णय नहीं लिया जाए या विस्तृत कार्य योजना जमा की जाए। वैसे सरकार जंगल सफारी विकसित करने के लिए प्रारंभिक सर्वे और कॉन्सेप्ट प्लान तैयार करा रही थी। भूमि की पहचान के साथ-साथ मास्टर प्लान का प्रारूप तैयार कर लिया था। सरकार अब सुप्रीमकोर्ट के निर्देश के बाद सभी पहलुओं पर दोबारा विचार करेगी, समीक्षा करेगी। 

यह भी संभव है कि सरकार जरूरत पड़ने पर परियोजना के स्वरूप में थोड़ा बहुत बदलाव लाए। सरकार का कहना है कि जंगल सफारी के निर्माण के बाद पर्यावरण संरक्षण होता। सफारी की वजह से अरावली क्षेत्र में हो रहा पेड़ों का अवैध कटान ही नहीं रुकता, बल्कि खनन पर भी रोक लगती। वन और खनन माफिया लोगों की मौजूदगी की वजह से अपना काम नहीं कर पाते। उनकी गतिविधियों पर लगाम लग जाती। इतना ही नहीं, नूंह और गुरुग्राम के दस हजार एकड़ क्षेत्र में जंगल सफारी विकसित होने से प्रदेश में पर्यटकों का आवागमन बढ़ेगा। इससे प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार बढ़ेगा, राज्य के लोगों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। 

दुनिया के सबसे बड़े जंगल सफारी के चलते प्रदेश राष्ट्रीय और  अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन नक्शे पर अपनी जगह और पहचान बनाने में सफल होगा। सरकार का यह तर्क कहीं से भी गलत नहीं है, लेकिन जंगल सफारी बनने से नुकसान भी कम नहीं होता। अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीवों को लोगों के आने से जो परेशानी होती, वह भी ध्यान रखना होगा। वन्यजीवों को प्राकृतिक वातावरण नहीं मिल पाता, इससे वह मानव बस्तियों की ओर भी रुख कर सकते थे। 

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि अरावली की पहाड़ियां हजारों साल से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए फेफड़े का काम करती रही है। अरावली की पहाड़ियों की वजह से ही लोगों को स्वस्थ हवा मिलती रही है। प्रदूषण पर काफी हद तक रोक लगती रही है, लेकिन मोटर गाड़ियों, कल-कारखानों के साथ-साथ पराली जलाने जैसी घटनाओं ने प्रदूषण की समस्या को काफी हद तक बढ़ा दिया है। अरावली की पहाड़ियों पर होने वाले पेड़ों की अवैध कटान से भी बुरा प्रभाव पड़ा है। प्रदूषण की समस्या गहराई है।

Saturday, February 14, 2026

मेरे गुरु दुनिया के मालिक के लिए गाते हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी हरिदास वृंदावन में रहते थे। वह कवि, संगीतकार और उच्चकोटि के कृष्ण उपासक थे। उनको सखी संप्रदाय का उपासक माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि वह ललिता सखी के अवतार थे। स्वामी हरिदास के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती है। बस, इतना पता चलता है कि इनका जन्म 1478 में हुआ था। प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे। 

तानसेन अकबर के दरबार में थे। अकबर को तानसेन का गायन बहुत प्रिय था, लेकिन उसने तानसेन के गुरु हरिदास के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। अकबर जानता था कि गुरु हरिदास उसके सामने कभी नहीं गाएंगे। वह आगरा भी उसके बुलाने पर नहीं आएंगे। एक बार किसी संदर्भ में गुरु हरिदास की चर्चा चल रही थी, तो अकबर ने तानसेन के सामने हरिदास का गायन सुनने की इच्छा जाहिर की। 

तानसेन अपने गुरु के स्वभाव से भी परिचित थे। वह सोचने लगे कि अकबर की इच्छा कैसे पूरी की जाए। उन्होंने अकबर से कहा कि आपकी इच्छा जरूर पूरी हो सकती है, लेकिन आपको एक साधारण व्यक्ति की तरह वेष बदलकर मेरे साथ चलना होगा। एक दिन दोनों लोग वृंदावन पहुंचे। अकबर गुरु जी की कुटिया से बाहर खड़े हो गए। तानसेन अंदर गए और गुरु के समक्ष बैठकर गाने लगे। 

उन्होंने एक पद जानबूझकर गलत गाया, तो हरिदास ने वाद्य यंत्र उठाकर खुद गाना शुरू किया। हरिदास का गायन सुनकर अकबर चकित रह गया। लौटते समय अकबर ने तानसेन से कहा कि गुरु जी के गायन में जो बात है, वह तुम्हारे गायन में नहीं है। तानसेन ने कहा कि मैं एक सम्राट के लिए गाता हूं। मेरे गुरु जी पूरी दुनिया के मालिक के लिए गाते हैं। यह बात सुनकर अकबर ने अपनी सहमति से सिर हिला दिया।

आधुनिक तकनीक और फैलते बाजार ने खत्म कर दी मेलों की उपयोगिता


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में चल रहे सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले के समापन में बस दो दिन ही बचे हैं। पिछले एक पखवाड़े से चल रहा यह मेला दुनिया का सबसे बड़ा हस्तशिल्प मेला माना जाता है। इस मेले में दुनिया भर से कला प्रेमी आते हैं। यह मेला भारत ही नहीं, दुनिया भर की संस्कृतियों का संगम जैसा प्रतीत होता है। दुनिया भर के लोग जब किसी जगह पहुंचते हैं, तो वह अपनी सभ्यता और संस्कृति की छाप तो छोड़ते ही हैं, जिस जगह गए हुए होते हैं, उस स्थान की भी सभ्यता और संस्कृति से परिचित होते हैं। 

यही मेले का उद्देश्य भी होता है। सूरजकुंड मेले का भी उद्देश्य यही है। पिछले 39 साल से हर साल सूरजकुंड में लगने वाले मेले की ख्याति का कारण भी यही है। युवा पीढ़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से परिचित हो रहे हैं। सच कहा जाए, तो हमारे देश में मेले की अवधारणा सदियों पुरानी है। प्राचीनकाल में भारतीय क्षेत्र में जितनी भी सभ्यताएं थीं, उनमें मेले प्रमुख स्थान रखते थे।

 कुछ पुरातत्वविदों का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी मेले लगाए जाते थे। इन मेलों में जहां लोग आमोद-प्रमोद के लिए आते थे, वहीं वह अपनी दैनिक जरूरतों की वस्तुएं भी खरीदते थे। मेले ठेले दैनिक जरूरतों की पूर्ति का माध्यम होने के साथ-साथ सूचनाओं के भी केंद्र हुआ करते थे। इन मेलों में आने वाले लोग अपने रिश्तेदारों से भी मिल लिया करते थे। जो लोग व्यस्तता के चलते अपने परिजनों से नहीं मिल पाते थे, वह मेले में जरूर जाते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि उनके परिजन और रिश्तेदार मेले में जरूर आएंगे। उन दिनों वैवाहिक रिश्ते भी बहुत ज्यादा दूर नहीं किए जाते थे ताकि जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की मदद के लिए जल्दी से जल्दी पहुंचा जा सके। चार-पांच किलोमीटर के ही दायरे में बहन, बेटियों की शादियां की जाती थीं। इसका कारण यह था कि उन दिनों आवागमन के साधन सर्वसुलभ नहीं थे। 

इस वजह से दूरदराज के इलाके में शादियां नहीं की जाती थीं। ऐसी स्थिति यह मेले एक तरह से एक दूसरे से मिलने के साधन हुआ करते थे। दक्षिण से लेकर उत्तर तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अगर प्राचीन इतिहास खंगाला जाए, तो मेलों की गाथाएं जरूर मिलेंगी। लेकिन आज जब हम तकनीकी मामलों में बहुत आगे बढ़ चुके हैं, तो मेलों की महत्ता लगातार घटती जा रही है। 

अब साप्ताहिक मेलों का भी आयोजन लगभग बंद हो चुका है। दैनिक जरूरतों की पूर्ति करने वाले मेलों की उपयोगिता खत्म सी होने लगी है क्योंकि मेलों का स्थान अब बड़े-बड़े बाजारों और आनलाइन कंपनियों ने ले लिया है। अब तो बाजार भी जाने की जरूरत नहीं रह गई है। मोबाइल के एक क्लिक पर जरूरत की सारी वस्तुएं हाजिर हो जाती हैं। मनोरंजन के इतने साधन हो गए हैं कि अब मेलों के माध्यम से मिलने वाला मनोरंजन फीका लगने लगा है।

Friday, February 13, 2026

राजा का कर्तव्य विषय भोग नहीं, प्रजा पालन है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महर्षि दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर था। दयानंद का जन्म गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी 1824 को हुआ था। बचपन में एक दिन पिता ने मूलशंकर को शिवरात्रि व्रत रखने को कहा। रात में पूजा करते समय देखा कि शंकर भगवान की मूर्ति पर चूहा चढ़ा हुआ है। उन्हें तब बोध हो गया कि यह वह शंकर नहीं हैं जिसके बारे में उन्हें बताया गया था। 

इसके बाद उन्होंने सत्य की खोज के लिए घर त्याग दिया। इसके बाद दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की और भारतीय समाज में फैली तमाम कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया। दयानंद सरस्वती की मृत्यु के संबंध में बताया जाता है कि उनकी मौत की साजिश रचने में अंग्रेजों का हाथ था। 

बात 1883 की है। राजस्थान के जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के निमंत्रण पर महर्षि दयानंद सरस्वती जोधपुर गए थे। वह रोज प्रवचन करते थे। कभी-कभी महाराजा जसवंत सिंह भी उनका प्रवचन सुनने आते थे। महाराज के विशेष आग्रह पर वह कई बार राज महल भी गए। वहां उन्होंने देखा कि नन्हीं नाम की वेश्या का महाराज पर विशेष प्रभाव था। 

महाराज राजकाज करने की जगह पर ज्यादातर विषय भोग में लिप्त रहते थे। यह बात दयानंद को अटपटी लगी। एक दिन जब वह प्रवचन कर रहे थे, तो उन्होंने महाराज को संबोधित करते हुए कहा कि राजा का कर्तव्य प्रजा का पालन करना है, विषय भोग में लिप्त रहना नहीं। इससे महाराज ने नन्हीं से संबंध तोड़ लिए। कहते हैं कि अंग्रेजों की शह पर नन्हीं ने रसोइये से मिलकर दूध में पिसा हुआ कांच मिलकर स्वामी जी पिला दिया। इसके बाद अस्पताल में भी धीमा जहर देने की बात कही जाती है। 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में ही दयानंद का देहांत हो गया।

हरियाणा में प्रदूषित जल लोगों के लिए साबित हो रहा जानलेवा


अशोक मिश्र

पलवल के छांयसा गांव में पिछले एक पखवाड़े में 14 लोगों की अस्वाभाविक रूप से मौत हो चुकी है। प्रदूषित पानी की वजह से लोगों के मरने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने कुछ लोगों की मौत का कारण हेपेटाइटिस बी बताया है। हरियाणा में प्रदूषित पानी की वजह से लोगों की हो रही मौत काफी चिंताजनक है। 

हरियाणा के अधिकतर जिलों के कुछ इलाकों में लोगों को प्रदूषित जल का उपयोग दैनिक जीवन में करना पड़ रहा है। इसकी वजह से केवल इंसान ही नहीं, पालतू पशुओं की भी मौत हो रही है। नूंह के तावडू उपमंडल के अंतर्गत गोयला गांव के नजदीक कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे और रेलवे लाइन के बीच जहरीले केमिकल युक्त पानी पीने से नौ फरवरी को तीन गायों की मौत हो गई थी, वहीं 40 से अधिक गायों की हालत गंभीर बनी हुई थी। 

फरवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, हिसार के हांसी और उसके आसपास के क्षेत्रों में दूषित पानी पीने से बीमारियां फैलने के कारण 50 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं।  फरीदाबाद के झाड़सेतली और मांगर गाँव में औद्योगिक प्रदूषण के कारण भूजल जहरीला हो चुका है। इस क्षेत्र में कैंसर, किडनी और लीवर की बीमारियों के कारण अब तक 30 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं। 

हरियाणा में प्रदूषित जल की वजह से इंसान और पशुओं को अपनी जान गंवानी पड़ रही हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो, जब किसी न किसी जिले में प्रदूषित जल की वजह से बीमार पड़ने या मौत होने की खबर न आती हो। राज्य में प्रदूषित पानी एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका है। इस समस्या का समाधान जितनी जल्दी खोज लिया जाए, उतना ही अच्छा है। प्रदूषित जल के कारण हर साल पूरे राज्य में काफी मौतें हो रही हैं, जो काफी चिंताजनक है। इसका कारण औद्योगिक कारखानों से निकला अपशिष्ट, सीवर का गंदा पानी और कृषि रसायनों हैं। इनके कारण ही राज्य के अधिकतर जिलों में भूजल पीने योग्य नहीं रहा है। 

दक्षिणी और पश्चिमी हरियाणा के जिले खासतौर पर प्रदूषित जल संकट के शिकार हैं। हरियाणा के कई जिलों भिवानी, फतेहाबाद, करनाल, जिंद, सोनीपत के भूजल में यूरेनियम, नाइट्रेट और आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इसकी वजह से लोगों को कई तरह की गंभीर बीमारियां हो रही हैं। डाइंग और प्लेटिंग इकाइयों का केमिकल युक्त पानी सीधे भूमिगत जल में मिल रहा है। इसे रोकने का प्रयास उद्योगों के मालिक नहीं कर रहे हैं। सरकारी मशीनरी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। जब किसी जिले में कोई हादसा होता है, तो सरकारी मशीनरी सक्रिय होती है। कुछ दिनों तक सावधानी बरती जाती है। मरीजों को दवाइयां दी जाती हैं, लोगों में क्लोरिन के टेबलेट्स बांटे जाते हैं। उसके बाद वही पुराना रवैया अख्तियार कर लिया जाता है।