संजय मग्गू
रूस में वोल्शेविक नेता लेनिन के विरोधी के रूप में विख्यात लियोन ट्राटस्की ने कभी कहा था कि हो सकता है कि आपका युद्ध से कोई लेना देना न हो, लेकिन युद्ध का आपसे लेना-देना जरूर होता है। अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चालीस दिनों तक चले युद्ध को ही लें। इससे भारत सहित दुनिया के तमाम देशों का क्या लेना देना था? कुछ भी नहीं। तीन देश आपस में लड़ रहे थे, इससे हम भारतीयों का क्या जाता है? लेकिन इस युद्ध का हमसे लेना देना तो था।
दुनिया के कई देशों की तरहभारत की अर्थव्यवस्था पर इस युद्ध के दुष्परिणाम सामने आए। होर्मुज स्ट्रेट से व्यापारिक जहाजों का आवागमन ठप होने से हर देशों की तरह भारत में भी एलपीजी, डीजल-पेट्रोल की किल्लत हुई। नतीजा यह हुआ कि गैस, तेल की कमी बताकर कालाबाजारियों ने अपनी जेब भर ली। खाने-पीने की चीजें महंगी हो गईं। अर्थव्यवस्था पर भी तेल-गैस की कमी का प्रभाव पड़ा। फिर एक झटके में ट्रंप ने 14 दिनों के लिए युद्ध विराम घोषित कर दिया। क्यों? क्योंकि जो आर्थिक दबाव भारत सहित दुनिया भर की जनता झेल रही थी, उससे कहीं ज्यादा दबाव अमेरिकी जनता झेल रही थी।
अमेरिकी जनता को तो इस युद्ध से सीधा लेना-देना था। करोड़ों डॉलर के हथियार बेवजह फूंक दिए गए। माना कि इस युद्ध में ईरान को ज्यादा जनहानि उठानी पड़ी। उसके कई प्रमुख लीडर मार दिए गए, लेकिन कुछ न कुछ जनहानि अमेरिका और इजरायल को भी उठानी पड़ी। बेवजह ईरान के साथ युद्ध छेड़ने की वजह से जहां अमेरिका में डेमोक्रेटिक सांसद विरोध कर रहे थे, वहीं ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी युद्ध को उचित नहीं मान रहे थे। डेमोक्रेटिक सांसद इस बात से नाराज थे कि ट्रंप ने इतना बड़ा फैसला लेते समय उनको विश्वास में नहीं लिया। जैसे भारत में कोई भी फैसला लेते वक्त सरकार नेता प्रतिपक्ष को भाव नहीं देती है।
अब तो ट्रंप से डेमोक्रे टिक यह सवाल भी पूछने लगे हैं कि जब पिछले साल जून में अमेरिका ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने लायक नहीं छोड़ा था, तो 28 फरवरी को दोबारा ईरान पर हमला करने की जरूरत क्यों आ पड़ी। पिछले साल जून महीने में अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था और ट्रंप ने बाद में यह दावा किया था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है।
डेमोक्रेट्स का यह सवाल जायज भी है। ट्रंप अब भी अपने स्वभाव के अनुरूप कभी दो सप्ताह के लिए युद्ध विराम घोषित करते हैं, तो कुछ ही घंटे के बाद ईरान को मटियामेट कर देने की धमकी देते हैं। इजरायल द्वारा लेबनान पर किए गए हमले को जायज ठहराने लगते हैं। ट्रंप जिस तरह ‘क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा, रुष्टा-तुष्टा क्षणे-क्षणे’ वाली मनोवृत्ति से पीड़ित दिखाई पड़ते हैं, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि अस्थायी युद्ध विराम की अवधि पूरी होने से पहले ही एक बार फिर युद्ध का नगाड़ा बज उठे, तो कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी।
(लेखक दैनिक देश रोजाना के प्रधान संपादक हैं।)







