बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
राहुल सांकृत्यायन को महापंडित कहा जाता था। इसका कारण यह था कि वह संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, अरबी, अंग्रेजी, फारसी, पालि, तमिल, कन्नड, रूसी, फ्रांसीसी, जापानी, तिब्बती सहित लगभग 36 भाषाओं को अच्छी तरह से जानते थे। 9 अप्रैल 1893 को आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में हुआ था।बचपन में इनका नाम केदारनाथ पांडेय था, लेकिन जब इन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया, तो महात्मा बुद्ध के पुत्र राहुल के नाम पर अपना नाम राहुल रखने के साथ सांकृत्य गोत्र के नाम पर सांकृत्यायन भी जोड़ लिया। राहुल सांकृत्यायन को बचपन से ही घुमक्कड़ी का शौक था।
तीसरी कक्षा की किताब में पढ़ा गया एक शे’र ‘सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां’ ने इन्हें बहुत प्रभावित किया। ग्यारह साल की उम्र में हुई शादी को इन्होंने नकार दिया था और घर से भाग खड़े हुए थे। राहुल सांकृत्यायन ने इंग्लैण्ड और यूरोप की यात्रा की। दो बार लद्दाख यात्रा, दो बार तिब्बत यात्रा, जापान, कोरिया, मंचूरिया, सोवियत भूमि (1935 ई.), ईरान में पहली बार, तिब्बत में तीसरी बार 1936 ई. में, सोवियत भूमि में दूसरी बार 1937 ई. में, तिब्बत में चौथी बार 1938 ई.में यात्रा की।
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर राहुल ने बिहार में कई जगह जनसभाएं की, खूब जोरदार भाषण दिए। कई बार गिरफ्तार किए गए। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया। बंदी जीवन का भी उन्होंने फायदा उठाया और मानव समाज के विकास क्रम को सरल तरीके से समझाने वाली पुस्तक वोल्गा से गंगा उन्होंने जेल में ही लिखी थी। 14 अप्रैल 1963 को यह महामानव दार्जिलिंग में चिर निद्रा में सो गया।









