Sunday, June 21, 2026

विन्या! तेरे दोस्त में अतिथि का रूप देखती हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गांधीवादी नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनोबा भावे का वास्तविक नाम विनायक नरहरि भावे था। वह चित्तपावन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। बचपन से ही विनोबा भावे को गणित और रसायन विज्ञान में रुचि थी। उनकी सूझबूझ भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली थी। विनोबा भावे के दो भाई और थे। उन्हें विनोबा नाम महात्मा गांधी ने दिया था। 

बाद में यही नाम प्रचलित हो गया और विनायक नरहरि को लोग कालांतर में भूल गए। उनकी मां रुक्मिणी बाई विदुषी महिला थीं। लेकिन वह भक्तिभाव में हमेशा डूबी रहती थीं। इसका प्रभाव उनके तीनों बेटों पर पड़ा था। बाद में विनोबा भावे ने संन्यास ग्रहण किया और महात्मा गांधी ने उन्हें संत विनोबा कहकर संबोधित किया। विनोबा के बचपन की एक घटना है। 

बताया जाता है कि बचपन में विनोबा का एक साथी उनके साथ ही रहता था। वह उनके साथ ही पढ़ने जाता था। ऐसा कहा जाता है। उन दिनों रात में कुछ खाना बच जाया करता था। उनकी मां बासी भोजन को विनोबा को खाने के लिए दे दिया करती थीं। उनके दोस्त को हमेशा ताजा भोजन दिया करती थीं। यह देखकर एक दिन विनोबा ने अपनी मां से कहा कि मां, तू मेरे साथ भेदभाव करती है। मुझे रोज बासी खाना नाश्ते में देती है और मेरे दोस्त को ताजा व गरम खाना। 

उनकी मां दुखी हो गईं। उन्होंने कहा कि विन्या (मां का दिया नाम) मैं भी इंसान हूं और मुझसे भी गलती हो सकती है। तू मेरा बेटा है और तेरे दोस्त में मैं अतिथि वाला भाव देखती हूं। अतिथि को भला बासी भोजन कैसे दिया जा सकता है। वैसे विनोबा ने यह बात मजाक में कही थी, लेकिन मां को यह बात चुभ गई थी। विनोबा ने जीवन भर अपनी मां की सीख पर अमल किया।

हरियाणा में वर्षा जल संचयन के लिए सबको करनी होगी कोशिश

अशोक मिश्र

उत्तर भारत में मानसून आने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। वैसे भी हरियाणा के कुछ जिलों में छिटपुट बरसात हो भी रही है। प्रदेश सरकार ने राज्य में जलभराव रोकने के लिए नाले, नालियों और सीवरेज सिस्टम आदि की सफाई करने के आदेश बहुत पहले ही दे दिए थे। सभी जिलों में इस पर काम चल भी रहा है। कुछ जिलों में काम पूरा हो गया है, तो कुछ जिलों में अभी काम जारी है। 

वहीं, बरसात के दिनों में वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए भी कई योजनाओं पर काम हो रहा है। राज्य सरकार ने सौ वर्ग मीटर या इससे अधिक छत वाले वाले प्लाट पर बने मकान के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य कर रखा है। इसके बाद भी ज्यादातर ऐसे मकानों में या तो रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगे ही नहीं है या फिर दिखावे के लिए बीस-पच्चीस मीटर गहरा पाइप लगाकर खानापूर्ति कर ली गई है। इससे वर्षा जल ऊपरी सतह में ही रह जा रहा है और भूगर्भ जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। 

हरियाणा जैसे प्रदेश की आज हालत यह है कि राज्य में हर साल 14 अरब घन मीटर पानी की कमी हो रही है। राज्य साल दर साल सूखता जा रहा है। शहर में भूजल की उपलब्धता कम होती जा रही है और पानी की कुल मांग बढ़ती जा रही है, जिससे लोगों की पानी की जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। राज्य के 7,287 गांवों में से 3,041 गांव जल संकट से जूझ रहे हैं। यदि वर्षा जल को नदियों में मिलने से बचाया नहीं गया, तो आने वाले दिनों हालात और भी बदतर होने की आशंका है। 

हरियाणा में जल संकट की स्थिति से निपटने के लिए व्यावहारिक समाधान खोजने होंगे। ऐसे में वर्षा जल संचयन सबसे कारगर उपाय है। राज्य सरकार का दावा है कि जल संचयन के मामले में हरियाणा दूसरे राज्यों के मुकाबले में बेहतर काम कर रहा है।  जल प्रबंधन के शानदार प्रदर्शन के लिए हरियाणा को राष्ट्रीय स्तर पर बेस्ट स्टेट इन वाटर मैनेजमेंट का पुरस्कार भी मिल चुका है। तो फिर हरियाणा में पानी की इतनी भारी कमी क्यों है? सरकारी आंकड़ा कहता है कि राज्य में 68,000 से अधिक जल संरक्षण ढांचे बनाए जा चुके हैं और लगभग 2,215 से अधिक तालाबों का जीर्णोद्धार किया जा चुका है। 

कुछ दिनों पहले सिंचाई एवं जल संसाधन तथा महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रुति चौधरी ने कहा था कि पहली बार हरियाणा में लगभग 5,700 करोड़ रुपये की लागत से विश्व बैंक समर्थित एकीकृत जल प्रबंधन परियोजना (इंटीग्रेटेड  वाटर प्लान) लागू की जा रही है, जो पूरे प्रदेश के लिए गेम चेंजर साबित होगी। इंटीग्रेटेड वाटर प्लान से यह उम्मीद तो पैदा होती है कि निकट भविष्य में प्रदेश को जल समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा, लेकिन यह भी सही है कि अभी हालात अच्छे नहीं हैं। इसके लिए शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में सबको मिलकर वर्षा जल संचयन में हाथ बंटाना होगा। तभी पानी की किल्लत को दूर किया जा सकता है।

Saturday, June 20, 2026

कुछ तुम्हारे जैसी, कुछ तुमसे अच्छी


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इंसान अगर संतोषी हो, तो उसे किसी भी अवस्था में नींद आ सकती है। वह कहीं भी सो सकता है,लेकिन यदि संतोष नहीं है, तो उसे राजसी पलंग पर भी नींद नहीं आएगी। एक बार की बात है। एक साधु घूमते-घूमते किसी शहर में पहुंच गया। शहर में प्रवेश करते समय रात हो गई थी। सर्दी के दिन थे। लोग अपने घर का दरवाजा बंद करके सोने चले गए थे। अब रात में साधु किसके घर का दरवाजा खटखटाता। 

उसके पास ओढ़ने का कपड़ा भी नहीं था। उसने आसपास नजर दौड़ाई, तो भड़भूजे की दुकान नजर आई। भड़भूजे की भट्ठी थोड़ी गर्म थी। सो, साधु ने सोचा कि इसी भट्ठी में किसी तरह रात गुजार लूं। वह उसी में सो गया।  संयोग से पास में ही राजा का महल भी था। 

सुबह उठते ही राजा ने अपने नौकरों से पूछा, रात कैसे बीती? तब तक साधु भी जाग गया था। उसने राजा का प्रश्न सुना, तो बोला, कुछ तुम्हारे जैसी, कुछ तुम्हारे से अच्छी। राजा ने फिर एक बार यही प्रश्न दोहराया। साधु ने फिर वही उत्तर दिया। राजा चकित रह गया कि यह कौन है, जो उसके सवालों का उत्तर दे रहा है। राजा ने कहा कि सवालों का जवाब देने वाले को यहां ले आओ। 

सैनिक साधु को खोजते हुए जब भट्ठी के पास पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि आपको राजा ने बुलाया है। साधु  के शरीर में राख और कालिख लगी हुई थी। राजा ने पूछा कि मेरे जैसी और मेरे से बेहतर रात कैसे बीती? साधु ने कहा कि आप राज महल में नर्म बिस्तर पर सोए। मैं भट्ठी की गर्म राख पर सोया। हम दोनों जब सो गए, तो एक समान हो गए। सुबह उठते ही आपको राज्य की चिंता सताने लगी, जबकि मैं जब सुबह उठा, तो चिंता मुक्त था। सो मेरी रात आपसे अच्छी बीती। राजा साधु की बात सुनकर संतुष्ट हो गया।

लोगों की लापरवाही के चलते बढ़ रहीं आग लगने की घटनाएं


अशोक मिश्र

फरीदाबाद के मेवला महाराज औद्योगिक क्षेत्र में गुरुवार को आग लगने से जूता फैक्टरी का गोदाम जलकर खाक हो गया। हालांकि राहत की बात यह है कि आग लगने से किसी की मौत नहीं हुई है। गर्मी के दिनों में हरियाणा में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। घर, फैक्टरी, होटल, दुकान, खेत में पड़ी फसल आदि में थोड़ी सी लापरवाही के चलते आग विकराल रूप धारण कर लेती है। गरमी के दिनों में आग लगने का कारण किसानों का गेहूं के अवशेष को खेत में ही जला देना भी है। 

किसान गेहूं के अवशेष का दूसरा उपयोग करने की जगह जब जला देते हैं, तो हवा के माध्यम से उड़ने वाली चिन्गारी दूसरे खेतों में रखी फसल, फसल के अवशेष आदि को भारी नुकसान पहुंचाती है। पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2026 में गेहूं की कटाई के मौसम में हरियाणा में खेतों में आग लगने की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इस वर्ष मामलों की संख्या 2025 की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है। पिछले साल राज्य में 1,745 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इस साल 1,610 मामलों की यह वृद्धि मात्र एक वर्ष में लगभग 92 प्रतिशत की बढ़ोतरी  को दर्शाती है। इससे पर्यावरण प्रदूषण और पराली जलाने पर रोक लगाने संबंधी नियमों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। 

हरियाणा में 2024 में 3077, 2023 में 1887 और 2022 में 2872 कृषि अग्निकांड हुए थे। खेतों में आग लगने के मामले में अधिकारी मानते हैं कि खेतों में आग लगने की अधिकतर घटनाएं आकस्मिक थीं और शॉर्ट सर्किट के कारण हुईं। हां, कुछ मामलों में किसानों ने जानबूझकर पराली में आग लगाई, जो बाद में तेज गर्म हवाओं और शुष्क मौसम के कारण आसपास के खेतों में तेजी से फैल गई। गर्मी के मौसम में वातावरण शुष्क होने की वजह सेआग बड़ी तेजी से फैलती है। 

घर, फैक्टरी, होटल या दूसरी जगहों पर लोगों की लापरवाही के चलते आग लग जाती है। कई बार बिजली के तारों की वजह से पैदा हुई चिन्गारी सब कुछ स्वाहा कर देती है। मार्च से लेकर जून-जुलाई तक सबसे ज्यादा आगजनी की घटनाएं होती हैं। ऐसी स्थिति में अग्नि शमन एवं आपातकालीन सेवाओं का महत्व काफी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में सरकार को चाहिए कि वह दमकल विभाग को पर्याप्त कर्मचारी, आधुनिक संसाधन और मजबूत व्यवस्था उपलब्ध कराए। 

वर्तमान में प्रदेश में 89 फायर स्टेशन संचालित हैं, जो मुख्यत: शहरी क्षेत्रों तक सीमित हैं। कस्बों, उपमंडलों, ग्रामीण इलाकों और नए औद्योगिक क्षेत्रों में अग्नि सुरक्षा के संसाधन अपेक्षाकृत कम हैं। इस स्थिति से बचने के लिए सैनी सरकार ने 59 नए फायर स्टेशन खोलने का फैसला लिया था। इस योजना पर तेजी से काम चल रहा है। इससे आपात स्थितियों में रिस्पॉन्स टाइम में उल्लेखनीय कमी आएगी। योजना का सबसे बड़ा प्रभाव एनसीआर क्षेत्र में दिखेगा, जहां 20 नए फायर स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। 

Friday, June 19, 2026

मित्रता की परिभाषा समझाने वाला दोस्त

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे पास मित्र कितने है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन तमाम मित्रों में से सच्चा मित्र कौन है, इससे फर्क पड़ता है। इसीलिए कहा जाता है कि किसी से भी मित्रता करते समय उसकी सच्चाई और मित्र के प्रति प्रेम कितना है, यह देखना चाहिए। मित्र सद्गुणी हो, तभी मित्रता करनी चाहिए। सच्चा मित्र संकट के समय साथ नहीं छोड़ता है। 

एक कथा है। किसी नगर में एक बुजुर्ग व्यक्ति रहता था। उसके पुत्र को अपने मित्रों पर बहुत गर्व था। उसके कई मित्र थे। लेकिन उसके पिता का एक ही मित्र था। बेटा जब भी बात चलती, तो वह अपने मित्रों की बड़ाई करते हुए थकता नहीं था। वह अपने पिता का उपहास भी उड़ाता था कि उनके एक ही मित्र है। एक दिन पिता ने अपने बेटे से कहा कि चलो, हम दोनों अपने अपने मित्र की परीक्षा लेते हैं। बेटा तैयार हो गया। 

पिता-पुत्र दोनों बेटे के घर में रात के दो बजे पहुंचे। बेटे ने अपने दोस्त का दरवाजा खटखटाया। कई बार आवाज दी। लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई। कुछ देर बाद बेटे ने फिर दरवाजा खटखटाते हुए अपने मित्र का नाम लेकर आवाज दी। अंदर से बेटे के मित्र ने अपनी मां से कहा कि कह दो, मैं घर पर नहीं हूं। बेटा बहुत निराश हो गया। उसके बाद उसका पिता अपने दोस्त के घर ले गया। 

दरवाजा खटखटाया, तो दो मिनट बाद अंदर से आवाज आई, रुको मित्र! दरवाजा खोलता हूं। दरवाजा खुलते ही पिता-पुत्र ने देखा कि दरवाजा खोलने वाले के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी। पिता ने अपने मित्र से पूछा, यह क्या है? मित्र ने जवाब दिया कि इतनी रात को आए हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें पैसे की जरूरत है। या फिर तुम्हारी किसी से लड़ाई हो गयी है। अगर पैसे की जरूरत है, तो यह थैली ले जाओ। यदि किसी से लड़ाई हुई है, तो यह तलवार लेकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूं। यह सुनकर पुत्र की समझ में मित्रता की परिभाषा आ गई।

सड़क हादसों के सबसे बड़े कारण हैं थकान और झपकी


अशोक मिश्र

मंगलवार को पलवल में अलग-अलग सड़क हादसों में चार युवकों सहित पांच लोगों की मौत हो गई। इन हादसों का कारण वाहन को तेज रफ्तार से चलाना था। हरियाणा में ऐसे हादसे आए दिन होते रहते हैं। तेज रफ्तार वाहन चलाने वाले चालक इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं करते हैं कि वह अपने साथ-साथ सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की भी जान जोखिम में डाल रहे हैं। 

तेज रफ्तार वाहन चलाने का आनंद लेने वाले अगर ऐसा सोच लें, तो शायद प्रदेश क्या पूरे देश में होने वाले सड़क हादसों की संख्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। तेज रफ्तार से चल रहा वाहन जब किसी दूसरे वाहन से टकराता है, तो चोट दोनों को लगती है और नुकसान दोनों को होता है। जो चालक ट्रैफिक नियमों का पालन करते हुए अपने गंतव्य की ओर जा रहा था, उसकी क्या गलती थी जिसकी सजा उसे भुगतनी पड़ी। गलती तो उस वाहन चालक की थी जो ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करते हुए तेज गति से वाहन चला रहा था। हरियाणा सरकार और ट्रैफिक पुलिस विभिन्न माध्यमों से आए दिन लोगों को जागरूक करती रहती है कि वह सड़क पर चलते समय ट्रैफिक नियमों का पालन करें। 

वाहन को निर्धारित गति सीमा में ही चलाएं। सड़क पर बने संकेतकों को ध्यान में रखें, उसके अनुसार वाहन संचालित करें, लेकिन लोग ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करते हैं और अपने साथ-साथ दूसरों की जान को संकट में डालते हैं। अक्सर देखने में आता है कि लंबी दूरी तक सफर करने वाले वाहन ज्यादातर हादसे का शिकार होते हैं। लंबी दूरी के वाहन चालकों के लिए सबसे बड़ा खतरा थकान और नींद है। बस और ट्रक चालक कई बार लगातार घंटों तक वाहन चलाते रहते हैं। 

वह चाहते हैं कि थोड़ा रुक कर कहीं विश्राम कर लें, लेकिन समय पर माल या सवारियों को पहुंचाने की जिम्मेदारी उन्हें विश्राम नहीं लेने देती है। ऐसी स्थिति में पर्याप्त विश्राम नहीं मिलने पर उनकी एकाग्रता कम हो जाती है। ऐसे में चूक होने की आशंका काफी बढ़ जाती है। कई बार तो कुछ सेकंड की झपकी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन जाती है। यह देखने में आया है कि ज्यादातर हादसे रात या सुबह होते हैं। ऐसे समय को विशेष रूप से जोखिम भरा माना जाता है। यह वह समय होता है, जब शरीर स्वाभाविक रूप से विश्राम चाहता है। यदि चालक को विश्राम न मिले, तो चालक को नींद आने की आशंका काफी बढ़ जाती है। 

निजी परिवहन कंपनियों, सरकारी परिवहन संस्थाओं और वाहन मालिकों की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे अपने वाहन चालकों के कार्य के घंटों को नियंत्रित करें, उन्हें आराम करने का पर्याप्त अवसर दें। उन्हें इंसान समझें, रोबोट नहीं। केवल आर्थिक लाभ के लिए लगातार वाहन चलवाना मानव जीवन के साथ खिलवाड़ है।

Thursday, June 18, 2026

जोड़ने वाले को सिर पर बिठाना चाहिए

प्रतीकात्मक चित्र

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो समाज और देश को जोड़े रखता है, वह और कुछ न करते हुए भी आदरणीय होता है। घर, परिवार, समाज और देश जब जुड़ा रहेगा, तो उस देश की उन्नति होगी। लोग समृद्ध होंगे। व्यापार फले-फूलेगा। लोगों को मधुर वाणी और सद्कर्मों से जोड़ा जा सकता है। दुनिया में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने हमेशा देश और समाज को जोड़ने की बात की है। 

इस संबंध में एक बहुत ही रोचक कथा सुनाता हूं। किसी शहर में एक दर्जी रहता था। वह अपनी दुकान पर आते समय अपने बेटे को भी साथ ले लेता था। बेटे का स्कूल रास्ते में ही पड़ता था। पहले वह अपने बेटे को स्कूल छोड़ता और फिर दुकान पर चला आता। अपना काम करता। एक दिन उसके बेटे के स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गई तो वह अपने पिता की दुकान पर चला गया। 

उसने देखा कि उसके पिता कैंची से नाप के अनुसार कपड़े काट रहे हैं। कभी कपड़े को इधर काटते हैं, तो कभी उधर। कपड़े काटने के बाद वह कैंची को अपने पैर के नीचे दबा लेते हैं। इसके बाद वह कपड़े की सिलाई करने लगते हैं। सुई में धागा डालने के बाद कपड़े की सिलाई करते हैं। सिलाई के दौरान यदि कपड़े की कतरब्योंत करनी हो, तो सुई को अपने सिर की टोपी में खोंस लेते हैं। जब तक बेटा अपने पिता की दुकान में रहा, यही देखता रहा। 

चलते समय उसने पूछा, पिताजी! कैंची को तो आप पैर के नीचे दबा लेते हैं, लेकिन सुई को टोपी में क्यों खोंस लेते हैं। पिता ने गंभीर होकर कहा, बेटा! कैंची हमेशा काटने का काम करती है, लेकिन सुई हमेशा जोड़ती है। काटने वाले को हमेशा पैरों के नीचे दबा कर रखना चाहिए, लेकिन जो जोड़ता है, उसे सिर माथे पर बिठाना चाहिए।

समय बचाने के लिए रेलवे ट्रैक पार करना मौत को दावत देना है

अशोक मिश्र

कैथल में रेल इंजन की चपेट में आने से एक बुजुर्ग की मौत हो गई। सुबह पांच बजे वह आदमी नए रेलवे हाल्ट के नजदीक रेलवेलाइन से गुजर रहा था। जैसे ही वह व्यक्ति लाइन को पार करने लगा, इंजन की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई। ट्रेन के इंजन की चपेट में आकर अपनी जान गंवाने वाले व्यक्ति की पहचान पूंडरी निवासी साहब सिंह के रूप में हुई है। रेल लाइन पार करते समय होने वाला हादसा लोगों की लापरवाही और हड़बड़ी के कारण होता है। 

अकसर देखने में आता है कि ट्रेन के आने के समय रेलवे क्रांसिंग का फाटक बंद कर दिया जाता है। इसके बावजूद लोग अगर पैदल हैं, तो उसके नीचे से झुककर रेल पटरी को क्रास कर जाते हैं। दोपहिया वाहन को आड़ा-तिरछा करके निकालने की कोशिश की जाती है। ऐसी स्थिति में अकसर हादसे हो जाते हैं। लोग ध्यान नहीं देते हैं और जब तक रेल पटरी पार करते हैं, तब तक स्पीड से ट्रेन आ जाती है और लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। हरियाणा में रेलवे ट्रैक पार करते समय हुए हादसों के अधिकांश मामले असावधानी, शॉर्टकट अपनाने और फुटओवर ब्रिज का इस्तेमाल न करने के कारण होते हैं। 

सरकारी और फोरेंसिक आंकड़ों के अनुसार, इन हादसों में 80 प्रतिशत मौतें लापरवाही की वजह से होती हैं, जबकि  बाकी बचे 20 प्रतिशत मामले आत्महत्या के होते हैं। देखने में यह आया है कि पारिवारिक कलह, प्रेम में असफल होने या किसी दूसरी तरह के दबाव के चलते जब आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं, तो वह रेल की पटरी पर लेटकर अपनी जान गंवा देना आसान समझते हैं। 

अगर हरियाणआ के मामलों का विश्लेषण किया जाए, तो रेल की पटरी पर मरने वाले कुल लोगों में से 92-96 प्रतिशत युवा पुरुष होते हैं। इनमें भी सबसे अधिक प्रभावित आयु वर्ग 21 से 40 वर्ष के बीच है।  यह भी देखने में आया है कि 52-55 प्रतिशत ट्रैक हादसे शाम 6 बजे से लेकर सुबह 6 बजे के बीच होते हैं। इन बारह घंटों में रोशनी और दृश्यता सबसे कम होती है। इसके कारण रेल पार करते समय सामने से आ रही ट्रेन दिखाई नहीं पड़ती है और हादसा हो जाता है। इन हादसों में अधिकांश मौतों का कारण सिर पर गंभीर चोट या अंगों का कुचला जाना है।  ऐसे हादसों में सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सा कमर से नीचे का अंग होता है। 

हरियाणा में नहीं, बल्कि दूसरे प्रदेशों में लोग समय बचाने के लिए शॉर्टकट अपनाते हैं। लोग भारी सामान के साथ पैदल चलने में परेशानी होने या पैदल पार पुल तक जाने में दिक्कत या आलस के कारण अक्सर रेलवे ट्रैक पार करते हैं। कई जगहों पर रेलवे ट्रैक के आर-पार उचित पुल या सब-वे न होना भी इसका एक बड़ा कारण है। लोग निर्धारित पुल या सब-वे का उपयोग करने के बजाय एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म या कॉलोनी के दूसरी ओर जाने के लिए सीधा ट्रैक पार करना आसान समझते हैं।

Wednesday, June 17, 2026

पुरस्कार का असली विजेता कौन है?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सेवा भावना ग्रंथों या पुस्तकों से नहीं उपजती है। सेवा करने के लिए किसी विशेष अवसर की भी जरूरत नहीं होती है। जब भी मौका मिले, सेवा जरूर करनी चाहिए। प्राचीनकाल में एक संत ने बच्चों में सेवा भावना जगाने के लिए एक विद्यालय खोला। उनके विद्यालय खोलने का उद्देश्य ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण करना था, जो समाज की सेवा कर सकें। 

उन्होंने अपने विद्यालय में बच्चों को सभी विषयों की शिक्षा देने के साथ-साथ लोगों की सेवा करने की भी प्रेरणा दी। वह हर विद्यार्थी से यही उम्मीद करते थे कि वह सभी जीव जंतुओं की सेवा करेगा। विद्यालय चलते हुए काफी दिन बीत गए थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि यह देखा जाए कि हमारे शिष्यों ने अब तक कितना सीखा है। उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। वाद-विवाद का विषय था-जीवों पर दया और प्राणी मात्र की सेवा। 

प्रतियोगिता शुरू हुई। किसी ने कहा कि प्राणी मात्र की सेवा के लिए संसाधनों का होना बहुत जरूरी है। जीवों पर भी दया करने के लिए इंसान में सेवा भावना का होना बहुत जरूरी है। कुछ विद्यार्थियों ने इसके विपरीत मत व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सेवा के लिए केवल भावना होनी चाहिए, संसाधन अपने आप जुट जाते हैं। जब प्रतियोगिता के पुरस्कार का समय आया, तो संत ने एक ऐसा छात्र को विजेता घोषित किया जो उपस्थित नहीं था। 

सबने इसका विरोध किया, तब संत ने कहा कि मैंने प्रतियोगिता के समय जानबूझकर एक घायल बिल्ली को द्वार पर छोड़ दिया था। सबने उस बिल्ली को देखा और अंदर आ गए, लेकिन एक छात्र ने उस बिल्ली की सेवा की, उसके घाव पर औषधि का लेप किया। कुछ स्वस्थ होने पर वह बिल्ली को सुरक्षित जगह पर छोड़ आया। ऐसे में आप लोग बताएं पुरस्कार का विजेता कौन है? यह सुनकर सबके सिर शर्म से झुक गए।

हरियाणा में साढ़े तीन लाख लोग अकेले रहने को अभिशप्त


अशोक मिश्र

अकेलापन महसूस करना और अकेले रहना, दोनों अगल-अलग बाते हैं। कई लोग भरे पूरे परिवार में रहते हैं, हंसते-बोलते, बतियाते हैं, लेकिन मन से वह कुछ समय के लिए ही सही अपने को अकेला महसूस करते हैं। ऐसा तब होता है, जब व्यक्ति का अपने परिवार से जुड़ाव कम होता है। वह अपने परिवार के प्रति आत्मीय नहीं रह जाता है। वहीं, बहुत सारे लोग ऐसे भी होते हैं, जो किन्हीं परिस्थितियों के कारण अकेले रह जाते हैं। हरियाणा में 3.54 लाख से अधिक लोग अकेले रह रहे हैं। 

अकेले रहने वाले इन नागरिकों की पहचान के लिए सत्यापन अभियान चलाया गया है। इस अभियान के माध्यम से उनकी पात्रता और आय से संबंधित आंकड़े इकट्ठे किए जा रहे हैं। परिवार पहचान पत्र में 354215 लोगों ने अपने को अकेला दर्शाया है। इनमें से 1,90,112 लोगों की सालाना आय 1.80 लाख रुपये से कम दिखाई गई है। अब तक 1,66,240 एकल व्यक्तियों का बीपीएल श्रेणी में सफलतापूर्वक सत्यापन किया जा चुका है। बाकी बचे लाभार्थियों का सत्यापन कार्य जारी है। वैसे तो इस सत्यापन का वास्तविक उद्देश्य यही बताया गया है कि सत्यापन के माध्यम से पात्र व्यक्तियों तक सरकारी सुविधाओं को पहुंचाया जाए। 

समय समय पर सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचाया जाए, ताकि अकेले रहने वाले लोगों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। समाज में सबसे ज्यादा परेशानी का सामना अकेले रहने वाले लोग ही करते हैं। पत्नी या पति की मौत हो जाने, तलाक लेने या दूसरे कारणों से अकेले रहने वालों के सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं। पति या पत्नी की मौत हो चुकी है, अवस्था भी ढल रही है। निस्संतान हैं या संतान की शादी हो चुकी है और वह दूसरे शहर या देश में रह रहा है। 

ऐसी स्थिति में यदि अकेले रहने वाले व्यक्ति के साथ कुछ अघटित घटता है, तो उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं होता है। कई बार ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं कि अकेले रहने वाले की किन्हीं परिस्थितियों में मौत हो गई। पड़ोसियों को तब पता चला,जब उसकी लाश से बदबू उठने लगी। बुढ़ापे में अकेले रहना कितना कष्टकारक है, यह वही जान सकता है जो अकेला रहने को अभिशप्त है। बीमारी के दौरान उसकी मदद करने वाला कोई नहीं होता है। 

कई तरह की बीमारियों से जूझता व्यक्ति ऐसी अवस्था में किससे मदद मांगने जाए। लोग अकेले व्यक्ति को देखते ही मुंह फेर लेते हैं कि कहीं ऐसा न हो, मेडिकल स्टोर से दवा लाने को कह दे। या बाजार से सब्जी अथवा खाने-पीने का सामान लाने को कह दे। कई बार तो बेटा-बेटी, बहू अपने परिवार के बुजुर्ग को अकेले रहने को ही बाध्य कर देते हैं। वह यह नहीं सोचते हैं कि एक दिन वह भी बुजुर्ग होंगे और उनके बच्चों ने उन्हें घर से निकाल दिया, तो वह क्या करेंगे।