Thursday, August 20, 2026

अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले

बोधिवृक्ष

 अशोक मिश्र

राजगृह में रहने वाले अर्थवसु बहुत ही धनी थे। उनका व्यापार बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ था। वह बहुत ही कृपण व्यक्ति माने जाते थे। उन्हें किसी ने कभी किसी को दान करते हुए नहीं देखा था। एक दिन पुत्र विडाल ने घर आकर अपने पिता अर्थवसु से उलाहना दिया। विडाल ने कहा, तात! हमारे विद्यालय के सहपाठी कहते हैं कि तुम इतने साधारण वस्त्र पहनते हो, तुम्हें अर्थवसु का पुत्र कौन कहेगा। राजगृह के सबसे धनी व्यापारी का पुत्र इतने साधारण वस्त्र पहनता है। आर्य हमारी महत्वाकांक्षाओं का अनादर क्यों करते हैं। 


तभी ज्येष्ठ पुत्र-वधु तिर्यग आ पहुंची। उसने कहा कि विडाल सच कहते हैं आर्य श्रेष्ठ। आज सावित्री वट पूजा के समय ग्राम्य ललनाओं ने मुझसे जो बात कही, उसको सुनकर मेरा अंत:करण रो रहा है। तुम्हारे श्वसुर इतने धनाढ्य हैं कि वह तुम्हें नख शिख स्वर्णाभूषणों से लाद सकते हैं, लेकिन सावित्री पूजा के समय भी तुम्हें वस्त्र सामान्य युवती की ही तरह हैं। अर्थवसु अपने पुत्र और पुत्र-वधु की बात सुनकर भी चुप रहे। 


कुछ वर्ष बीते। वर्षा ने तो जैसे राजगृह से मुंह मोड़ लिया। अकाल पड़ गया। अर्थवसु ने इस संकट में अपने अनाज गृह और कोष का मुंह खोल दिया। जब तक वर्ष नहीं हुई, राजगृह में अर्थवसु ने किसी को भूखा नहीं सोने दिया। लोग आश्चर्यचकित हो उठे। महात्मा बुद्ध ने यह सुना तो वह गदगद हो उठे। वह अर्थवसु के दर्शन को लालायित हो उठे।


 बुद्ध जब वहां पहुंचे, तो तिर्यग ने अपने वृद्ध श्वसुर को आवाज दी, आर्य श्रेष्ठ, उठिए। तथागत आज आपके द्वार पर आए हैं। अर्थवसु ने अपनी आंखें खोली। तथागत की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले। तुमने सारे राजगृह की रक्षा की। यह सुनकर अर्थवसु की बूढ़ी आंखों में चमक आई और उसकी आत्मा ने शरीर त्याग दिया।

किशाऊ बांध परियोजना से निकट भविष्य में बुझेगी हरियाणा की प्यास


अशोक मिश्र

सदियों पहले हरियाणा को हरित प्रदेश कहा जाता था क्योंकि यहां की नदियां और जमीन जल से परिपूर्ण थे। पिछले चार-पांच दशक में लोगों ने नदी और जमीन के पानी का इतना शोषण किया कि आज यह राज्य जल संकट से जूझ रहा है। इस जलसंकट को दूर करने के लिए 16 जून को छह राज्यों हिमाचल, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने मिलकर किशाऊ बांध बनाने की परियोजना पर सहमति जताई थी। किशाऊ बांध परियोजना के चलते आने वाले कुछ वर्षों में हरियाणा का जल संकट खत्म होने के आसार बनने लगे हैं। समझौते के तहत हरियाणा ने बिजली की जगह पानी को प्राथमिकता दी है और उसे कुल उपलब्ध जल का 47.82 प्रतिशत मिलेगा। 

आंकड़ों में यह हिस्सा 1324 एमसीएम में से 836 क्यूसेक है, जो पीने और सिंचाई दोनों के लिए अतिरिक्त होगा। किशाऊ बांध परियोजना केवल एक बांध का निर्माण नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जल संकट के स्थायी समाधान की एक बड़ी राष्ट्रीय परिकल्पना है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की है। इस परियोजना पर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है जिसमें से 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाएगी और बाकी दस प्रतिशत छह राज्यों को खर्च करना होगा। 

हरियाणा के बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान प्रमुख लाभार्थी हैं। दिल्ली को इस परियोजना से यमुना में शुद्ध जल प्रवाह बढ़ने से पेयजल आपूर्ति और प्रदूषण से निपटने में मदद मिलेगी, जबकि राजस्थान के शेखावाटी जैसे डार्क जोन को पाइपलाइन से पानी पहुंचाने की योजना है। केंद्र के अनुसार इस जल से निचले राज्यों के डाउनस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स में भी विद्युत उत्पादन बढ़ने की संभावना है। यह परियोजना हिमालयी क्षेत्र में बन रही है, जहां पर्यावरणीय और मानवीय लागत सबसे अधिक है। 

हिमाचल सरकार स्वयं कह चुकी है कि विस्थापन के मामले में वही सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। रिपोर्टों के अनुसार हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांवों के निवासी 660 मेगावाट के इस बांध का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनके घर, कृषि भूमि और वन क्षेत्र जलमग्न होंगे। बांध की वजह से वनों का विनाश होगा और पारंपरिक आजीविका, सांस्कृतिक धरोहर के उजड़ने का खतरा है। परियोजना की लागत पहले ही लगभग 12 हजार करोड़ आंकी गई है और यह 1960 के दशक से प्रस्तावित होने के बावजूद पर्यावरणीय मंजूरी और अंतर-राज्यीय खिंचाव के कारण लटकी रही है। 

236 मीटर ऊंचे बांध के लिए यह क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील भी माना जाता है। यदि पुनर्वास, वन संरक्षण और पारदर्शी लागत साझाकरण को ईमानदारी से लागू किया गया, तो हरियाणा की प्यास, दिल्ली की पेयजल किल्लत और राजस्थान की सूखी नहरों को राहत मिलेगी और यमुना को नया जीवन मिलेगा।

Wednesday, August 19, 2026

अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उब्बिरी का जन्म श्रावस्ती के कुलीन राजवंश में हुआ था। वह अप्रतिम सुंदरी थी। जो भी उसे देखता, वह मंत्रमुग्ध होकर बस देखता ही रह जाता था। जब वह पूर्ण युवती हुई तो उसका विवाह कौशल नरेश के साथ हुआ। कौशल नरेश उब्बिरी को पाकर अपने को धन्य महसूस करने लगे। 

अभी उसे कौशलपुर के अंत:पुर में आए एक वर्ष ही हुआ था कि वह गर्भवती हो गई। उसके गर्भवती होने की खबर पाकर प्रजा में अपार हर्ष हुआ। समय आने पर उनसे एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया जीवंती। जब जीवंती एक वर्ष की हुई, तो उसने अपनी चपलता और सुंदरता से राजपरिवार का मन मोह लिया। कौशल नरेश ने उब्बिरी को राजमहिषी की पदवी प्रदान की और भव्य शोभायात्रा निकाली। 

कहते हैं कि सौभाग्य के साथ-साथ कभी कभी दुर्भाग्य भी आता है। एक वर्ष की जीवंती की अचानक मृत्यु हो गई। महारानी उब्बिरी पुत्री के शोक में विक्षिप्त हो गई। वह श्मशान घाट पर विलाप करती, अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो? उब्बिरी ने राजमहल छोड़ दिया। शोक विह्वल क्षत-विक्षत देह लिए वह श्मशानघाट में चिल्लाती रहती। संयोग से उधर से एक दिन महात्मा बुद्ध निकले। वह उब्बिरी की करुण कथा से परिचित थे। 

वह श्मशानघाट पहुंचे और उब्बिरी से बोले, पुत्री! तुम बता सकती हो, इस श्मशानघाट में कितने लोगों का दाह संस्कार हुआ है। उसने कहा, नहीं देव! तथागत ने कहा, अगर तुम्हारी तरह सभी लोग शोक विह्वल हो जाएं तो सृष्टि कैसे चलेगी?  अच्छा बताओ, जीवंती के आत्म तत्व को तुम खोज सकती हो? उब्बिरी ने कहा, नहीं देव नहीं। तथागत बोले, तो उठो, आत्म तत्व को खोजने का प्रयास करो। यह सुनकर उब्बिरी की आंख खुल गई। वह मोह माया त्यागकर आत्म साधना में निरत हो गई और पूर्णता प्राप्त करके ही लौटी।

आखिर रेलवे ट्रैक को पार करने की आदत कब बदलेंगे लोग?

अशोक मिश्र

रेलवे ट्रैक पार करने की आदत लोगों में बहुत पुरानी है। जब से रेल गाड़ियों का परिचालन शुरू हुआ है, तब से लोग रेलवे ट्रैक को पार करते चले आ रहे हैं। तीन चार दशक पहले तक रेल विभाग के पास इतनी सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन अब रेलवे ने बहुत सारा विकास कर लिया है। देश के लगभग हर रेलवे स्टेशन पर जरूरत के अनुसार फुट ओवरब्रिज का निर्माण कर लिया है। इसके बावजूद लोग स्टेशन पर रेलवे ट्रैक पार करने से नहीं चूकते हैं। यह प्रवृत्ति हरियाणा में भी पाई जाती है। 

अक्सर हरियाणा में रेलवे ट्रैक पार करते समय होने वाले हादसे की खबरें आती रहती हैं। अकेले दिल्ली-एनसीआर सर्कल में, जिसमें हरियाणा के फरीदाबाद, गुड़गांव, पानीपत, सोनीपत और अंबाला जैसे बड़े जिले आते हैं, साल 2024 में रेलवे ट्रैक पार करने पर 2210 मामले दर्ज किए गए और इतने ही लोगों की गिरफ्तारी हुई, वहीं ट्रेन से कटकर 2562 लोगों की मौत हुई और 666 लोग घायल हुए। साल 2025 में यह संख्या और बढ़ी, 4260 केस दर्ज हुए और ट्रेन की चपेट में आने से 2402 मौतें और 582 लोगों के घायल होने की खबर है। 

लोगों को रेलवे ट्रैक पार करने की इतनी जल्दी क्यों रहती है, यह सवाल मनोवैज्ञानिक से ज्यादा सामाजिक है। रेलवे ट्रैक पार करते समय व्यक्ति को लगता है कि ट्रेन अभी दूर है, वह निकल जाएगा। रिपोर्ट बताती है कि आज सबसे बड़ा कारण मोबाइल पर बात करते हुए या गाना सुनते हुए ट्रैक पार करना है। हरियाणा के कई स्टेशनों पर फुट ओवर ब्रिज या अंडरपास एक किलोमीटर दूर है, भारी सामान, बच्चों या बुजुर्गों के साथ कोई इतना घूमना नहीं चाहता, इसलिए वह पटरियों को ही शॉर्टकट बना लेता है। 

भीड़ का अनुसरण की आदत लोगों को संकट में डाल देती है। जब एक व्यक्ति कूदता है तो दस उसके पीछे कूदते हैं। रेलवे प्रशासन खुद मानता है कि लोग सुरक्षा निर्देशों का उल्लंघन करते हैं, ओवरब्रिज से बचते हैं और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का उपयोग करते हुए ट्रैक पार करते हैं। इस मामले में बचाव का रास्ता केवल सजा नहीं, बल्कि रोकथाम और आदत में बदलाव है। 

रेलवे ने पिछले कुछ सालों में 6,191 किमी ट्रैक पर फेंसिंग लगाई है और पटरियों के किनारे बाड़ लगाया है, पर हरियाणा जैसे सघन आबादी वाले राज्य में यह अभी काफी नहीं है। सबसे जरूरी है हर छोटे-बड़े स्टेशन के पास 300-500 मीटर की दूरी पर फुट ओवर ब्रिज और अंडरपास बनाना, स्टेशनों के नजदीक खुले एरिया में तार और बाउंड्री वॉल लगाना, जिसके लिए रेलवे लगातार सिफारिश करती रही है। लोगों को खुद समझना होगा कि दो मिनट की बचत के लिए पूरा जीवन दांव पर लगाना कोई समझदारी नहीं। वीणा के तार की तरह जीवन भी मध्यम गति में ही सुरक्षित और मधुर रहता है, अति की जल्दबाजी में वह टूट ही जाता है।


Tuesday, August 18, 2026

वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध का राजकुमार श्रोण अत्यंत विलासी था। वह अपने महल से बाहर नहीं निकलता था। हमेशा भोग विलास में ही लगा रहता था। सुंदर किशोरियां उसके आगे पीछे घूमती रहती थीं। उसकी पत्नी अत्यंत सुंदरी थी। वह भी अपने पति का हर तरह से ख्याल रखती थी। राजकुमार श्रोण अत्यंत घमंडी किस्म का था। वह किसी का भी अपमान करने में तनिक भी संकोच नहीं करता था। वह वय का भी ध्यान नहीं रखता था। 

महाराज अपने पुत्र की आदत से बहुत परेशान थे। वह वीणा बहुत बढ़िया बजाता था। एक दिन उसने महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना, तो उसका मन बदल गया। उसने प्रवज्या धारण कर ली। भिक्षु हो गया। जब सारे भिक्षु दिन में एक बार भोजन करते थे, तो वह दो दिन बाद भोजन करता था। वह नंगे पैर चलता था। 

जब सारे भिक्षु पेड़ की छाया में बैठ जाते थे, तो वह कड़ी धूप में खड़ा रहता था। जिससे उसका सुकोमल शरीर सूखकर कांटा हो गया। उसके पैरों से मवाद बहने लगा, लेकिन वह अविचलित रहा। यह बात जब महात्मा बुद्ध को पता चली, तो उन्होंने श्रोण को अपने पास बुलाया और कहा, भंते! मैंने सुना है कि तुम वीणा बहुत सुमधुर बजाते हो। यदि वीणा के तारों को ढीला छोड़ दिया जाए, तो क्या होगा? 

श्रोण ने कहा कि वह नहीं बजेंगे। उनसे स्वर ही नहीं फूटेगा। तथागत ने फिर पूछा, यदि तारों को अधिक कस दिया जाए तो क्या होगा? श्रोण ने कहा कि तार टूट जाएंगे। बुद्ध ने कहा कि शरीर भी तो एक वीणा है। यदि तुम इसको अधिक कष्ट दोगे, तो शरीर टूट जाएगा। नष्ट हो जाएगा। यह सुनकर श्रोण समझ गया कि महात्मा बुद्ध  उसे क्या समझाना चाहते हैं। उस दिन के बाद श्रोण ने अन्य भिक्षुओं के समान आचरण  करने लगा।

हरियाणा के किसी जिले में भूजल की गुणवत्ता उत्तम श्रेणी में नहीं

अशोक मिश्र

हरियाणा में जल स्तर का लगातार नीचे जाना ही चिंताजनक नहीं है, बल्कि भूजल की गुणवत्ता भी अब डराने लगी है। राज्य की धरती के नीचे पानी का भंडार जितना भरता है, उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार हरियाणा में सालाना भूजल पुनर्भरण 10.27 बीसीएम आंका गया है जबकि दोहन 12.72 बीसीएम तक पहुंच चुका है यानी राज्य अपने भूजल संसाधन का करीब 137 प्रतिशत उपयोग कर रहा है। यह गिरावट पूरे प्रदेश में एक जैसी नहीं है लेकिन 14 जिले सबसे अधिक दबाव में हैं जिनमें अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, भिवानी, जींद, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सोनीपत, सिरसा, पानीपत, फतेहाबाद और झज्जर शामिल हैं। 

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कुलपति प्रो. बलदेवराज कांबोज ने विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा तैयार हरियाणा के भूजल गुणवत्ता मानचित्र का अनावरण किया है। इस मानचित्र की नींव छह वर्षों के अथक फील्ड सर्वे पर टिकी है। वैज्ञानिकों ने गांव स्तर पर जीपीएस लोकेशन के आधार पर भूजल के नमूने एकत्र किए और आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल के दिशा-निदेर्शों के अनुसार उनका विश्लेषण किया। पिछला ऐसा मानचित्र 1992 में बना था। 

पूरे हरियाणा में केवल 31.83 प्रतिशत भूजल ही अच्छी गुणवत्ता श्रेणी में आता है जो अधिकांश फसलों की सिंचाई के लिए उपयुक्त है। लगभग 30.04 प्रतिशत भूजल सीमांत लवणीय पाया गया है जिसे उचित प्रबंधन के साथ लवण-सहिष्णु फसलों के लिए उपयोग किया जा सकता है। विस्तृत वर्गीकरण बताता है कि 6.04 प्रतिशत खारा पानी, 19.50 प्रतिशत उच्च एसएआर खारा पानी, 5.67 प्रतिशत हल्का क्षारीय, 1.66 प्रतिशत क्षारीय और 5.26 प्रतिशत अत्यधिक क्षारीय पानी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मानचित्र में गुणवत्ता को अच्छे, सीमांत लवणीय, लवणीय, उच्च एसएआर लवणीय, सीमांत क्षारीय, क्षारीय और उच्च क्षारीय वर्गों में बांटा गया है। 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा का कोई भी जिला शत-प्रतिशत उत्तम श्रेणी में नहीं है। 31.83 प्रतिशत अच्छे पानी का यह आंकड़ा पूरे प्रदेश के नमूनों का औसत है, किसी एक जिले का नहीं। इसका असर सीधे किसान के नलकूप पर, पीने के पानी की गुणवत्ता पर और खेत की मिट्टी पर पड़ रहा है। जब मीठे पानी की परत नीचे चली जाती है तो नीचे का खारा और क्षारीय पानी ऊपर आ जाता है जिससे न केवल सिंचाई बल्कि स्वास्थ्य का संकट भी बढ़ता है। वैज्ञानिकों ने खारे और अधिक सोडियम वाले पानी वाले क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता के हिसाब से खेती करने और मिट्टी सुधार के उपाय अपनाने की सलाह दी है। यदि किसान वैज्ञानिकों की सलाह के हिसाब से खेती करें, तो पानी की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।

Monday, August 17, 2026

गणिका से भिक्षुणी बनी आम्रपाली

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आम्रपाली वैशाली नगर की राजनृत्यांगना थी। बौद्ध साहित्य में उसका नाम अंबपाली और अंबापालिका भी मिलता है। कहा जाता है कि किसी ने आम्रपाली को जन्म लेते ही शाही उपवन में आम के पेड़ के नीचे लाकर डाल दिया था। इसलिए उसका नाम आम्रपाली पड़ा। उसे सबसे पहले राजा के माली महानामन ने देखा। वह उसे अपने गांव ले गया और उसका पालन पोषण करने लगा। 

वह उस समय निस्संतान था। वह जब किशोरावस्था में पहुंच तो उसके सौंदर्य की ख्याति पूरे राज्य में फैल गई। वैशाली में राजनृत्यांगना के लिए प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी, उस प्रतियोगिता में आम्रपाली ने नृत्य किया और उसे उसकी मर्जी के बिना जनपदकल्याणी पद के लिए चुन लिया गया। हालांकि उस समय वह पुष्पक कुमार नामक युवक से प्यार करती थी और उसकी शादी होने वाली थी। 

मजबूरन उसे राज गणिका जैसे कर्म के लिए विवश होना पड़ा। यही वजह है कि वह लिच्छवि पुरुषों से घृणा करती थी। एक दिन सबने सुना कि वैशाली नगर में महात्मा बुद्ध पधार रहे हैं। आम्रपाली ने महात्मा बुद्ध से उसके यहां भोजन करने का निमंत्रण दिया जिसे तथागत ने स्वीकार कर लिया। यह सुनकर वैशाली नगर के सामंत और धनाढ्य लोग क्रोधित हो उठे। 

उन्होंने एक लाख कार्षापण (तत्कालीन मुद्रा) देने का लोभ दिया, लेकिन आम्रपाली ने स्वीकार नहीं किया। नियत समय पर बुद्ध  ने उसके यहां भोजन किया। बाद में बुद्ध ने उसके त्याग और भक्ति को देखते हुए भिक्षुणी होने की अनुमति प्रदान कर दी। वह अपना सब कुछ त्यागकर एक भिक्षुणी हो गई। हिंदी साहित्य में आम्रपाली को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है।

महिला, युवा और किसान खुशहाल होगा, तभी विकसित होगा भारत


अशोक मिश्र

पंद्रह अगस्त को हांसी में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी प्रदेशवासियों को संबोधित करते हुए महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के सपने को पूरा करने की दिशा में हरियाणा बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। आज हरियाणा देश का सबसे पसंदीदा औद्योगिक और निवेश गंतव्य बन गया है। सरकार की उद्योग मित्र नीतियों, पारदर्शी व्यवस्था और बेहतर कानून व्यवस्था के कारण देश-विदेश की बड़ी कंपनियां हरियाणा में निवेश करने के लिए उत्साहित हैं। 

इससे प्रदेश में न केवल बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हो रहे हैं बल्कि हमारे युवाओं के लिए रोजगार के लाखों अवसर भी पैदा हो रहे हैं, जो विकसित भारत की नींव को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विकास का अर्थ केवल फैक्ट्रियां और सड़कें बनाना ही नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति का विकास है। इसी सोच के साथ प्रदेश में शिक्षा, खेल और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाया जा रहा है, बेटियों के लिए सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा रही है, वहीं हर जिले में खेल स्टेडियम और प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से हरियाणा को खेलों की राजधानी के रूप में और मजबूत किया जा रहा है। 

स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए हर जिले में मेडिकल कॉलेज और बेहतर अस्पतालों की सुविधा आम आदमी तक पहुंचाई जा रही है। मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि प्रदेश सरकार का लक्ष्य सिर्फ आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। विकसित भारत की परिकल्पना तभी पूरी होगी जब हर नागरिक स्वस्थ, शिक्षित और सशक्त होगा। इस विकास यात्रा में सबसे बड़ी नई दिशा महिला सशक्तिकरण को मिली है। सरकार ने महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं बल्कि विकास की भागीदार बनाया है। 

स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, लाडो लक्ष्मी जैसी योजनाओं से बेटियों का भविष्य सुरक्षित किया जा रहा है और सरकारी नौकरियों व पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर उन्हें निर्णय लेने की शक्ति दी जा रही है। आज हरियाणा की महिला खेत से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी पहचान बना रही है। हरियाणा की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं। उनकी सफलता अन्य बेटियों को भी आगे बढ़कर कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दे रही है। 

साथ ही प्रदेश सरकार ने किसानों के हित में भी कई ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। किसान हमारे अन्नदाता हैं। उनकी समृद्धि के बिना विकसित भारत की कल्पना अधूरी है। फसलों का समय पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उठान, खराब फसलों का तुरंत मुआवजा, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा और नहरों व ट्यूबवेलों के माध्यम से हर खेत तक पानी पहुंचाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। जब किसान खुशहाल होगा, महिला सशक्त होगी, युवा शिक्षित और स्वस्थ होगा तभी हरियाणा सही मायने में विकसित भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर तेजी से आगे बढ़ेगा।

Sunday, August 16, 2026

आदर पाने का आधार नहीं हो सकती जाति

 

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने लगभग पचास वर्ष तक देश के विभिन्न भागों में घूम घूमकर लोककल्याण के लिए मानव धर्म का प्रचार-प्रसार किया। महात्मा बुद्ध एक स्थान पर बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं रुकते थे। वह लोगों को सत्य, अहिंसा और जरूरत से ज्यादा संचय न करने का उपदेश दिया करते थे। उनके संघ में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता था। वह स्त्री-पुरुष और जातिगत भावना से ऊपर उठकर लोगों से व्यवहार किया करते थे। 

एक बार की बात है। भिक्षुक संघ में कुछ लोगों में इस बात को लेकर विवाद पैदा हो गया कि प्रथम आसन और भोजन का प्रथम परोसा किसे दिया जाए? भिक्षुक संघ में जितने लोग थे, उतने मत थे। इस बारे में किसी ने कहा कि ब्राह्मण को पहला आसन और पहला भोजन दिया जाए क्योंकि जातीयता में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। किसी ने क्षत्रिय का पक्ष लिया, तो किसी ने वैश्य और दलित जातियों का। 

सभी अपने-अपने विचारों पर अडिग था। कोई किसी से हार मानने वाला नहीं था। ऐसी स्थिति में बात जब बिगड़ने लगी, तो कुछ लोगों ने तथागत से इस बारे में सलाह लेने की बात कही। सब लोग महात्मा बुद्ध के पास पहुंचे। महात्मा बुद्ध ने सबकी बातें बड़ी गंभीरता से सुनी। 

उन्होंने कहा कि संघ में जाति के आधार पर भेदभाव करना बहुत गलत है। संघ में जिसने पहले प्रवज्या ली है और लोककल्याण में जो सबसे आगे रहता हो, वही प्रथम आसन और भोजन का प्रथम परोसा पाने का हकदार है। भले ही वह किसी भी कुल या जाति में पैदा हुआ हो। बुद्ध की इस व्यवस्था से सभी लोग सहमत हो गए। इसका परिणाम यहहुआ कि बौद्ध का प्रसार भारत ही नहीं, भारत के बाहर भी हुआ।

स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा के वीरों ने भी दी थी शहादत



अशोक मिश्र

आज हम 80वां स्वाधीनता दिवस मना रहे हैं। भारत को स्वाधीन कराने में हमारे देश के हजारों युवाओं ने अपना बलिदान दिया था। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समय तक चलने वाला स्वाधीनता संग्राम शायद भारत का ही था। ढाई तीन सौ साल के स्वाधीनता संग्राम में देश के हर कोने से लोगों ने अपना बलिदान दिया था। इन्हीं लोगों के बलिदान का परिणाम था कि अंग्रेजों को मजबूर होकर 15 अगस्त 1947 को हमारे देश को आजाद करना पड़ा। 

स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा का भी योगदान कम नहीं था। भले ही वह उस समय पंजाब प्रांत का हिस्सा रहा हो। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा (तब पंजाब का हिस्सा) सबसे पहले बिगुल बजाने वाले क्षेत्रों में से एक था। 10 मई 1857 को मेरठ में क्रांति शुरू होने के कुछ ही घंटों बाद अंबाला छावनी में भी विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी थी। अंबाला से निकली यह आग देखते ही देखते गुड़गांव, रोहतक, हिसार, करनाल और पानीपत तक फैल गई थी। रेवाड़ी के राव तुलाराम ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया। अपने छोटे से राज्य के साधनों से एक बड़ी सेना खड़ी की। 

उन्होंने नारनौल के पास नसीबपुर में अंग्रेजी सेना से डटकर लोहा लिया। उनके साथ झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खान, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह और फर्रुखनगर के नवाब अहमद अली खान ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला। अंग्रेजों ने इन तीनों वीरों को दिल्ली के चांदनी चौक पर सरेआम फांसी दी थी, पर वे हरियाणा के लोगों के दिलों में अमर हो गए। महात्मा गांधी के आह्वान पर हरियाणा पूरी तरह से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गया। 1919 में रॉलेट एक्ट के विरोध में रोहतक, भिवानी और अंबाला में बड़ी हड़तालें हुईं। 1920-21 के असहयोग आंदोलन में हरियाणा के किसानों, छात्रों और वकीलों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 

चौधरी छोटूराम, पंडित नेकीराम शर्मा, लाला दौलतराम और सर शादीलाल जैसे नेताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागृत किया। पंडित नेकीराम शर्मा को तो हरियाणा केसरी कहा जाता था, जिन्होंने भिवानी से संदेश नामक पत्र निकालकर अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में अंबाला, करनाल और रोहतक में नमक कानून तोड़ा गया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में तो हरियाणा के हर जिले से जत्थे जेल गए। हिसार के हांसी में तो छात्रों ने तहसील पर तिरंगा फहरा दिया था। 

आजाद हिंद फौज में भी हरियाणा के हजारों जवान शामिल थे, जिनमें मेजर सूरजमल जैसे अनेक वीरों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। यही कारण है कि हरियाणा को वीरों और किसानों की धरती कहा जाता है, जिसने देश की आजादी के लिए अपना खून और पसीना दोनों दिया। स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में देश के अनेक प्रदेशों की तरह हरियाणा का भी नाम अग्रगण्य माना जाता है।