अशोक मिश्र
हरियाणा सरकार ने पशुपालन को कारोबार के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। इसके लिए वित्तीय सहायता का दायरा भी बढ़ाया गया है। राज्य में पशुपालन को कारोबार का दर्जा मिलना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक संरचनात्मक बदलाव है। जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। हरियाणा में पशुपालन सदियों से ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। प्राचीन काल से ही यहां के किसान और पशुपालक गाय, भैंस, भेड़-बकरी जैसे पशुओं को परिवार का अभिन्न अंग मानते आए हैं।हरियाणा नस्ल की गाय और मुर्रा भैंस देशभर में प्रसिद्ध रही हैं। आज भी यह क्षेत्र दूध उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है, जहां प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। सदियों से पशुपालन को कृषि का सहायक धंधा माना जाता रहा, जबकि सच्चाई यह है कि छोटे और सीमांत किसान के लिए पशु ही उसकी सबसे तरल पूंजी है। कारोबार का दर्जा मिलते ही पशुपालक को वैधानिक पहचान मिलेगी, जो अब तक उद्योग को ही मिलती थी। बीसवीं पशुधन जनगणना 2019 के अनुसार राज्य में कुल पशुधन आबादी लगभग 71.26 लाख है, जिसमें भैंसों की संख्या करीब 43.76 लाख और गायों की लगभग 19.32 लाख है।
स्वदेशी गौवंश की संख्या 19वीं जनगणना में 8.12 लाख से बढ़कर 9.49 लाख हो गई, जो 16.94 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। दूध उत्पादन भी 2014-15 के 79 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 125.93 लाख टन तक पहुंच गया है, जबकि प्रति पशु प्रतिदिन उत्पादकता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह हरियाणा के पशुपालकों की कर्मठता का परिचायक है। पशुपालन को पारंपरिक व्यवसाय से आगे बढ़ाकर कारोबार या उद्योग का दर्जा दिए जाने से पशुपालकों को कई ठोस लाभ मिलेंगे।
इसके बाद उन्हें बैंक ऋण आसानी से उपलब्ध होंगे। सब्सिडी और बीमा सुविधाएं मिलेंगी। आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। पशुपालक छोटे स्तर से शुरू करके बड़े डेयरी फार्म स्थापित कर सकते हैं, जिससे नियमित आय सुनिश्चित होती है। यदि पशुपालन को कारोबार माना जाए तो महिला सशक्तिकरण भी स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत में पशुओं की देखभाल का 70 प्रतिशत से अधिक काम महिलाएं करती हैं।
सरकार पशुपालन से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए कई कदम उठा रही है। चारे की उपलब्धता बढ़ाने, बीमा कवरेज विस्तार, समयबद्ध सेवाएं, मोबाइल पशु चिकित्सा वैन और गौशालाओं को सहायता जैसी पहलें जारी हैं। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत स्वदेशी नस्लों का संरक्षण हो रहा है। पशुओं को लावारिस छोड़ने पर जुर्माना और कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। इससे न केवल पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी बल्कि हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी और अधिक समृद्ध बनेगी।