Sunday, September 20, 2026

पशुपालन को कारोबार का दर्जा मिलने से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने पशुपालन को कारोबार के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। इसके लिए वित्तीय सहायता का दायरा भी बढ़ाया गया है। राज्य में पशुपालन को कारोबार का दर्जा मिलना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक संरचनात्मक बदलाव है। जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। हरियाणा में पशुपालन सदियों से ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। प्राचीन काल से ही यहां के किसान और पशुपालक गाय, भैंस, भेड़-बकरी जैसे पशुओं को परिवार का अभिन्न अंग मानते आए हैं। 

हरियाणा नस्ल की गाय और मुर्रा भैंस देशभर में प्रसिद्ध रही हैं। आज भी यह क्षेत्र दूध उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है, जहां प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। सदियों से पशुपालन को कृषि का सहायक धंधा माना जाता रहा, जबकि सच्चाई यह है कि छोटे और सीमांत किसान के लिए पशु ही उसकी सबसे तरल पूंजी है। कारोबार का दर्जा मिलते ही पशुपालक को वैधानिक पहचान मिलेगी, जो अब तक उद्योग को ही मिलती थी। बीसवीं पशुधन जनगणना 2019 के अनुसार राज्य में कुल पशुधन आबादी लगभग 71.26 लाख है, जिसमें भैंसों की संख्या करीब 43.76 लाख और गायों की लगभग 19.32 लाख है। 

स्वदेशी गौवंश की संख्या 19वीं जनगणना में 8.12 लाख से बढ़कर 9.49 लाख हो गई, जो 16.94 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। दूध उत्पादन भी 2014-15 के 79 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 125.93 लाख टन तक पहुंच गया है, जबकि प्रति पशु प्रतिदिन उत्पादकता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह हरियाणा के पशुपालकों की कर्मठता का परिचायक है। पशुपालन को पारंपरिक व्यवसाय से आगे बढ़ाकर कारोबार या उद्योग का दर्जा दिए जाने से पशुपालकों को कई ठोस लाभ मिलेंगे। 

इसके बाद उन्हें बैंक ऋण आसानी से उपलब्ध होंगे। सब्सिडी और बीमा सुविधाएं मिलेंगी। आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। पशुपालक छोटे स्तर से शुरू करके बड़े डेयरी फार्म स्थापित कर सकते हैं, जिससे नियमित आय सुनिश्चित होती है। यदि पशुपालन को कारोबार माना जाए तो महिला सशक्तिकरण भी स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत में पशुओं की देखभाल का 70 प्रतिशत से अधिक काम महिलाएं करती हैं। 

सरकार पशुपालन से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए कई कदम उठा रही है। चारे की उपलब्धता बढ़ाने, बीमा कवरेज विस्तार, समयबद्ध सेवाएं, मोबाइल पशु चिकित्सा वैन और गौशालाओं को सहायता जैसी पहलें जारी हैं। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत स्वदेशी नस्लों का संरक्षण हो रहा है। पशुओं को लावारिस छोड़ने पर जुर्माना और कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।  इससे न केवल पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी बल्कि हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी और अधिक समृद्ध बनेगी।

Saturday, September 19, 2026

तात! अनुमति दे तो संन्यासिनी बनना चाहती हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कोसल नरेश प्रसेनजित के राज्य का कोषाध्यक्ष सुदत्त की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी। बौद्ध ग्रंथों में उन्हें अनाथपिंडक भी बताया गया है। उनकी पुत्री उत्पलवर्णा अत्यंत रूपवती थी। जब उसने षोडस वर्ष की आयु पार की, तो ऐसा लगने लगा कि देवी रति भी उसके रूप-सौंदर्य को देखकर शर्मिंदा हो जाएं। राग तो गौरवर्णी उत्पलवर्णा के अंग प्रत्यंग से मानो फूट रहा हो। 

अधरों पर मानो गुलाब की पंखुड़ियां आ बैठी हों। नयन रतनारे थे और ग्रीवा अत्यंत सुंदर थी। कंठ से इतनी मधुर ध्वनि निकलती थी कि सुनने वाला मोहित हो उठता था। ऐसी रूपवती कन्या से कौन विवाह नहीं करना चाहेगा। आसपास के राज्यों के राजकुमार, नगरश्रेष्ठि और सामंत कुमारों के विवाह प्रस्ताव आने लगे। अपनी अनुपम सुंदरी पुत्री के लिए ढेर सारे विवाह प्रस्ताव आने से पिता काफी चिंतित थे।

वह इस ऊहापोह में थे कि अपनी पुत्री के विवाह के लिए किसका प्रस्ताव स्वीकार करें और किसको मना कर दें। इसी विषय पर वह सोच ही रहे थे कि उनकी पुत्री ने उनके कक्ष में प्रवेश किया। उसने अपने पिता से कहा कि पिता जी, आपने सुना ही होगा। गंगातीर वासी ने पहले विवाह किया। फिर एक दूसरी स्त्री रख ली। उससे एक कन्या पैदा हुई। बाद में उस कन्या को भी अंकशयिनी बनाया। 

ऐसे अमर्यादित समाज में कोई भी विश्वसनीय नहीं है। यदि आप अनुमति दें, तो मैं अविवाहित रहकर समाज को सुधारने का प्रयत्न करना चाहती हूं। पिता ने आशीर्वाद देते हुए अपनी पुत्री को संन्यास लेने की अनुमति दे दी। महात्मा बुद्ध के पास जाकर उत्पलवर्णा ने प्रव्रज्या ग्रहण की। 

पिता तुल्य स्नेह दर्शाते हुए बुद्ध ने उसे ज्ञान से सिंचित किया। भिक्षुणी उत्पलवर्णा ने अपनी साधना से सिद्धावस्था प्राप्त की और समाज को धर्म के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। महात्मा बुद्ध का वह जीवन भर सहयोग करती रही।

हरियाणा में पिटबुल के काटने की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक


अशोक मिश्र

हरियाणा में पिटबुल कुत्तों के हमलों की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। ताजा मामला सोनीपत के सिक्का कालोनी की है। 14 सितंबर की शाम बुआ अपने छह माह के भतीजे को गोद में लेकर सिक्का कालोनी की गली में टहल रही थी। तभी पड़ोसी का पालतू पिटबुल अचानक दौड़ता हुआ आया और बच्चे पर झपट पड़ा। सीसीटीवी फुटेज देखने पर साफ पता चलता है कि कुत्ता करीब आधा मिनट तक बच्चे को जबड़ों में दबाकर नोचता रहा, घसीटता रहा। लोगों ने डंडे-चप्पल मारकर बड़ी मुश्किल से बच्चे को छुड़ाया। 

हमले में बच्चे के चेहरे, पेट और शरीर पर गहरे जख्म हैं। बच्चे को गोद में लेकर टहलने वाली उसकी बुआ भी घायल हुई है। बच्चे की हालत गंभीर होने पर उसे रोहतक पीजीआई रेफर किया गया है और इलाज जारी है। प्रदेश की यह कोई पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं अब अक्सर होती रहती हैं। पंचकूला, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, सोनीपत आदि शहरों से ऐसी खबरें लगातार आती रहती हैं। पिटबुल की उग्रता को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि देखनी होगी। पिटबुल टेरियर को मूल रूप से इंग्लैंड में सांडों से लड़ाई और बाद में डॉग फाइटिंग के लिए विकसित किया गया था।

चुन-चुन कर सबसे आक्रामक पिल्लों से पिटबुल ब्रीड तैयार की गई थी। इसलिए इसमें दर्द सहने की क्षमता, जिद्दी पकड़ स्वाभाविक रूप से कुत्तों की अन्य प्रजाति ज्यादा है। पशु चिकित्सकों के अनुसार एक बार पकड़ लेने के बाद पिटबुल अपने शिकार को आसानी से छोड़ते नहीं, इसलिए आधे मिनट का हमला भी जानलेवा बन जाता है। केंद्र सरकार के मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने 12 मार्च 2024 को 23 नस्लों जिसमें पिटबुल टेरियर, अमेरिकन बुलडॉग, रॉटविलर, कैन कोर्सो, डोगो अर्जेंटीनो सहित अन्य शामिल हैं को खतरनाक और उग्र माना था। केंद्र सरकार ने उनके आयात, बिक्री और ब्रीडिंग पर रोक का नोटिफिकेशन जारी किया था। 

लेकिन सरकार के इस नोटिफिकेशन के खिलाफ कुछ डॉग लवर्स ने कई राज्यों की हाईकोर्ट में याचिकाएं दीं। जवाब मांगे जाने पर केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया था कि वह फिलहाल इस बैन पर अमल नहीं हो रहा है। इस मामले में लोगों से आपत्तियां मंगाई गई हैं। नतीजा यह है कि 2026 तक देश में पिटबुल पर कोई लागू होने योग्य राष्ट्रव्यापी बैन नहीं है।  हरियाणा मेंं नगर निगमों ने अपने स्तर पर सख्ती की है। पंचकूला नगर निगम ने पिटबुल और रॉटविलर मिक्स जैसी नस्लों के पालने पर रोक का प्रस्ताव पास किया है। 

प्रस्ताव में कहा है कि इस प्रजाति का कुत्ता घर में मिला तो भारी जुर्माना लगेगा। चंडीगढ़ प्रशासन ने भी अमेरिकन पिटबुल, पिटबुल टेरियर, बुल टेरियर, कैन कोर्सो, डोगो अर्जेंटीनो और रॉटविलर समेत सात नस्लों को बैन किया है। बिना पंजीकरण कुत्ता पालने पर 10 हजार रुपये तक जुर्माना तय किया है। 

Friday, September 18, 2026

भगवन! मैं अपने पाप कर्म से ऊब चुकी हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आम्रपाली वैशाली की नगर वधू थी। रूप और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति आम्रपाली के आगे पीछे वैभव डोलता रहता था। एक दिन सबने देखा कि साधारण वेश में आम्रपाली नंगे पांव महात्मा बुद्ध के आश्रम की ओर स्थिर कदमों में बढ़ती चली जा रही है। लोग आश्चर्य से भर उठे। आकंठ पाप कर्म में डूबी आम्रपाली बौद्ध संघ में क्या करने जा रही है, यह लोगों के बीच कौतूहल का विषय था। कुछ लोग उसके पीछे पीछे चल पड़े। 

वैशाली नगर में आम्रपाली का बौद्ध आश्रम की ओर जाना चर्चा का विषय बन गया। स्थिर कदमों से कई तरह की बातों को सोचती-विचारती आम्रपाली अंतत बौद्ध संघ तक पहुंच ही गई। भिक्षु संघ के प्रवेश द्वार पर आनंद किसी काम से निकल रहे थे। आम्रपाली ने जाकर उनसे विनती की, मैं महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए आई हूं। आनंद तत्काल उल्टे पैर लौट पड़े। उन्होंने भीतर जाकर महात्मा बुद्ध को संदेश दिया। 

तब तक आम्रपाली भी पीछे-पीछे चलकर महात्मा बुद्ध तक पहुंच चुकी थी। करुणा निधान तथागत यह सुनकर खड़े हो गए। उन्होंने मधुर किंतु स्नेहमयी वाणी में कहा, आओ देवि! बुद्ध के स्वर से झरती करुणा में आम्रपाली का गात भी गया। वह फफक कर रो पड़ी। उसने रुदन करते हुए कहा, भगवन! मैं अपने पाप कर्म  से ऊब चुकी हूं। क्या मेरा इस नरक से उद्धार होगा?  

महात्मा बुद्ध ने करुणायुक्त स्वर में कहा, न...न! जिसे तुम पाप जीवन कह रही हो, वह समाज की बनाई हुई व्यवस्था है। देवि! जाग्रत जन ही समाज को नई व्यवस्था देते हैं। और सचमुच तथागत ने उसे नई व्यवस्था का मार्ग सुझा दिया। उस दिन के बाद अपना सब कुछ छोड़कर आम्रपाली भिक्षुणी बनकर इतिहास में सदा के लिए अमर हो गई।

हरियाणा में ब्लैक स्पॉट साबित हो रहे जानलेवा, कब मिलेगी मुक्ति?

अशोक मिश्र

हरियाणा की सड़कों पर बने ब्लैक स्पॉट डेथ स्पॉट के रूप में बदल चुके हैं। राज्य में ब्लैक स्पॉट सड़क पर चलने वालों के लिए स्थायी जख्म बन चुके हैं जिस पर न तो सरकार ध्यान दे रही है, न ही केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण। राज्य में ब्लैक स्पॉट्स की संख्या और इनसे होने वाली मौतों का आंकड़ा राज्य की सड़क सुरक्षा की पोल खोलता है। राज्य में वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच कुल 474 ब्लैक स्पॉट्स चिन्हित किए गए थे। 

तकनीकी परिभाषा में ब्लैक स्पॉट वह स्थान है जिसे सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मानकों के अनुसार चिन्हित किया जाता है, जहां 500 मीटर के दायरे में पिछले तीन सालों में पांच सड़क दुर्घटनाएं जिनमें मृत्यु या गंभीर चोट हुई हो, या दस मौतें हुई हों। ब्लैक स्पॉट इंजीनियरिंग की विफलता के नक्शे हैं, कहीं तीखा मोड़ है, कहीं सर्विस रोड नहीं है, कहीं डिवाइडर का गलत कट है, कहीं रोशनी नहीं है, कहीं स्पीड ब्रेकर और साइनेज गायब हैं और कहीं हाईवे पर ही अवैध अतिक्रमण है। 

सड़कों पर बने ब्लैक स्पॉट पर होने वाले हादसों के लिए केवल इंजीनियरिंग ही दोषी नहीं है। चालक भी बराबर के जिम्मेदार हैं। पुलिस डेटा बताता है कि सबसे ज्यादा शिकार पैदल यात्री और दोपहिया चालक होते हैं। ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में चलना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, हेलमेट और सीट बेल्ट न पहनना, हाईवे पर शराब के ठेकों के पास से निकलते हुए तेज रफ्तार, ये सब ब्लैक स्पॉट को डेथ ट्रैप में बदल देते हैं। एक ही ब्लैक स्पॉट पर जैसे दिल्ली-अंबाला हाईवे पर पानीपत में तीन साल में 41 हादसे और 26 मौतें हो चुकी हैं। यह मौतें साबित करती हैं कि सड़क का दोष स्थायी है पर चालक की गलती उसे घातक बना देती है। 

अंतत: यही कहा जा सकता है कि हरियाणा में ब्लैक स्पॉट की समस्या सड़क की नहीं, सिस्टम की है। सरकार की योजना में ब्लैक स्पॉट सुधार को प्राथमिकता दी गई है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सभी चिह्नित स्थलों को मार्च 2026 तक सुधारने का निर्देश दिया था और मिशन मोड में काम करने पर जोर दिया था, लेकिन राज्य के कई ब्लैक स्पॉट आज भी लोगों की जान ले रहे हैं। 

फरीदाबाद में ही वर्ष 2025 में चिन्हित ब्लैक स्पॉट पर हुए 56 हादसों में 30 लोगों की मौत हो चुकी है। ब्लैक स्पॉट दूर करने में लापरवाही कई कारणों से बरती जाती है। विभिन्न एजेंसियों जैसे एनएचएआई और राज्य विभागों के बीच समन्वय की कमी, बजट और संसाधनों की सीमितता, भूमि अधिग्रहण या निर्माण संबंधी बाधाएँ, तथा सुधार कार्यों की निगरानी में शिथिलता प्रमुख हैं। कभी-कभी स्थलों की पहचान के बाद स्थायी समाधान में वर्षों लग जाते हैं जबकि अल्पकालिक उपाय भी समय पर लागू नहीं होते। राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्राथमिकता की कमी भी इसमें योगदान देती है। हालांकि हाल के निदेर्शों और अभियानों से स्थिति में सुधार की उम्मीद जगी है, लेकिन निरंतर निगरानी और जवाबदेही आवश्यक है।

Thursday, September 17, 2026

पहला और दूसरा संस्करण कब छपा?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बात जापान की है। जापान तक बौद्ध धर्म पहुंच चुका था। जापान में एक महाभिक्षु भोग्गालि पुत्तस अपने आश्रम में चिंतित बैठे हुए थे। उनके एक शिष्य ने अन्यमनस्क देखा, तो पूछ लिया, तात! आप उदास क्यों बैठे हुए हैं? महाभिक्षु ने कहा कि मैंने भारत में तथागत के कुछ उपदेश पालि भाषा में प्राप्त किए थे। शिष्य ने पूछा, क्या वे खो गए हैं? 

महाभिक्षु ने कहा कि नहीं, मैंने उसका जापानी भाषा में अनुवाद कर लिया है। अब उसके प्रकाशन की चिंता है। शिष्य ने कहा कि क्या, इसके लिए धनिकों के पास जाकर धन संग्रह किया जाए? महाभिक्षु ने कहा कि साधन भी साध्य की गरिमा के अनुरूप होना चाहिए। क्यों न हम लोग मजदूरी करें। यह सुनकर सभी शिष्य चकित रह गए। बौद्ध ने मजदूरी करनी शुरू की, तो उद्देश्य जानकर लोगों ने धन देना भी शुरू कर दिया। 

काफी धन संग्रह हो गया, लेकिन संयोग से उन्हीं दिनों जापान के एक इलाके में दुर्भिक्ष पड़ा। महाभिक्षु ने संग्रहीत धन का उपयोग लोगों को वस्त्र और भोजन जुटाने में करना शुरू कर दिया। अगले वर्ष वर्षा हुई और दुर्भिक्ष खत्म हुआ। इस बार पहले से कम समय में धन संग्रह हो गया, लेकिन तभी महाभिक्षु को ज्ञात हुआ कि जापान में कई इलाकों में बाढ़ की वजह से फसलें नष्ट हो गई हैं। लोगों के पास खाने-पीने का अभाव है। 

महाभिक्षु ने इस बार भी लोगों के भोजन और वस्त्र के लिए संग्रहीत धन को बांटना शुरू कर दिया। अब उनके शिष्य थोड़ा निराश भी होने लगे थे। लेकिन इस बार पहले कहीं जल्दी धन संग्रह हुआ और उस पुस्तक का प्रकाशन संभव हुआ। पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर लिखा गया तीसरा संस्करण। लोगों ने पूछा पहले संस्करण कब छपे, तो शिष्यों ने कहा कि अकाल ग्रस्त और बाढ़ ग्रस्त लोगों की आंखों में पहला और दूसरा संस्करण पढ़ा जा सकता है। लोग उनकी बात से संतुष्य हो गए।

कब तक खुले मैनहोल करते रहेंगे लोगों की जान से खिलवाड़?


अशोक मिश्र

पलवल की गांधी कॉलोनी में सोमवार को जो हुआ, उसने लोगों के मन को झकझोर कर रख दिया है। चार साल की दीपांशी, जिसने अभी ठीक से बोलना भी नहीं सीखा था, जो अपनी मौत से पहले खेल रही थी, हंस रही थी, एक खुले मैनहोल में समा गई और हमेशा के लिए चली गई। यह कोई दुर्घटना नहीं, यह एक हत्या है, लापरवाही के चलते की गई हत्या। और यह पहली बार नहीं है। फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, पानीपत से लेकर पूरे हरियाणा में हर बरसात में, हर सर्दी, हर गरमी के मौसम में ऐसी खबरें आती हैं। 

कोई बच्चा, कोई बुजुर्ग, कोई बाइक सवार इस काले गड्ढे में गिर जाता है और फिर उसकी चीख सड़कों के शोर में दब जाती है। माँ-बाप की गोद खाली हो गई, दादा-दादी की आँखें सूख गईं। जो परिवार  अपनी बच्ची को सुरक्षित खेलने की जगह भी नहीं दे पाया, वह आज सिर्फ यादों और आँसुओं से जूझ रहा है। सड़कों पर बिखरे खुले मैनहोल अब सिर्फ लापरवाही की निशानी नहीं, बल्कि मौत के गड्ढे बन चुके हैं।  बच्चे, बुजुर्ग, आम राहगीर, कोई भी सुरक्षित नहीं। ढक्कन गायब हो जाते हैं, चोरी हो जाते हैं, टूट जाते हैं या काम पूरा होने के बाद ठेकेदार और अधिकारी भूल जाते हैं। 

कभी नगर पालिका या नगर निगम के ठेकेदार काम खत्म होने के बाद ढक्कन लगाना भूल जाते हैं, कभी नाली की सफाई के लिए ढक्कन हटाया जाता है और वापस नहीं रखा जाता। और कई बार तो लोहे के भारी ढक्कन चोरी हो जाते हैं और महीनों तक कोई सुध लेने वाला नहीं होता। कोई रजिस्टर नहीं, कोई निगरानी नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। ठेकेदार कहता है काम नगर निगम का था, नगर निगम कहता है जल बोर्ड की लापरवाही है, और बीच में एक मासूम की जान चली जाती है। यह लापरवाही नहीं तो क्या है? 

यह सिस्टम की वह क्रूर उदासीनता है जो सड़क पर चलते हर आम आदमी को अनाथ समझती है। कानून साफ कहता है। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सुरक्षित जीवन का अधिकार देता है। अदालतें बार-बार फैसला सुना चुकी हैं कि खुले मैनहोल में गिरने से होने वाली मौत या चोट पर नगर निकाय और संबंधित विभाग मुआवजा देने के लिए बाध्य हैं। 

लापरवाही साबित होने पर अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है। कई हाईकोर्ट ने अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया है और मुआवजे की राशि अधिकारियों से वसूलने के निर्देश दिए हैं। फिर भी जमीनी हकीकत नहीं बदलती। हरियाणा में हाल ही में निर्देश जारी हुए कि कहीं भी मैनहोल खुला न रहे। निगरानी समितियाँ बनाई गईं, अधिकारियों को व्यक्तिगत जवाबदेही सौंपी गई। अगर लापरवाही से जान जाती है तो सख्त कार्रवाई की बात कही गई। 

लेकिन निदेर्शों से ज्यादा जरूरत है निरंतर निरीक्षण, तुरंत ढक्कन लगाने की व्यवस्था, चोरी रोकने के उपाय और नागरिकों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की। जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, हम सबकी है—जागरूक रहें, शिकायत करें, दबाव बनाएँ। क्योंकि एक मासूम की मौत पूरे समाज के लिए शर्मनाक है।

Wednesday, September 16, 2026

आयुष्मान महाराज! आप जीते रहें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजगृह में तीर्थंकर महावीर का प्रवचन चल रहा था। निशब्द होकर सभी लोग प्रवचन सुन रहे थे। सभा में सम्राट श्रेणिक, महामंत्री अभय कुमार आदि गणमान्य लोगों के साथ नागरिक भी उपस्थित थे। तभी एक वृुद्ध ने प्रवेश किया। उसके शरीर पर जीर्ण-शीर्ण वस्त्र थे। उसके शरीर में कुष्ठ रोग के मवाद से दुर्गंध निकल रही थी।  वह महावीर को प्रणाम किए बिना सम्राट श्रेणिक के सामने आ खड़ा हुआ। 

उसने सम्राट श्रेणिक से कहा, आयुष्मान आप जीते रहें। इसके बाद वह तीर्थंकर की ओर घूमा और कहा, आप शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त करें। इसके बाद वह लाठी टेकता हुआ महामंत्री के पास पहुंचा और कहा, तुम चाहे जियो, चाहे मरो। तत्पश्चात वह घूमा और राजगृह के कसाई काल शौकरिक के पास पहुंचा और बोला, शौकरिक, तुम न मरो, न जियो। इतना कहकर वृुद्ध बाहर चला गया। 

सब लोग आश्चर्यचकित थे। तब महावीर ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, स्वयं महादिदेव विवेक थे। उन्होंने सम्राट से कहा, आप जीते रहें। इसका मतलब यह है कि आपके सामने सारा ऐश्वर्य है, मरने के बाद दुख ही दुख है। इसलिए आपका जीना ही उचित है। मेरे बारे में उन्होंने कहा कि मैं मर जाऊं क्योंकि वह मेरे शरीर को एक बंधन मानते हैं। 

महामंत्री से उन्होंने कहा कि चाहे जियो, चाहे मरो। इसका मतलब यह है कि महामंत्री अपने कार्य को निष्ठा पूर्वक संपन्न कर रहे हैं। आगे भी इनके सामने सुख ही सुख होंगे। इसलिए इनका मरना जीना एक समान है। कसाई शौकरिक का जीवन पाप पूर्ण है, उसे अगले जन्म में भी दुख ही दुख मिलेगा। तुम इस जन्म में भी पाप भोग रहे हो और अगले जन्म में भी तुम्हें पाप भोगना पड़ेगा। महावीर की बात सुनकर सभा में उपस्थित लोगों की आंख खुल गई।

हरियाणा के लिए काफी लाभदायक है किशाऊ बांध परियोजना


अशोक मिश्र

हरियाणा के लिए किशाऊ बांध परियोजना अत्यंत लाभदायक मानी जा रही है। इससे हरियाणा की एक बड़ी आबादी का जल संकट दूर हो सकेगा। राज्य गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। किशाऊ बांध परियोजना का इतिहास लगभग 85 साल पुराना है। इसका मुख्य विवाद हमेशा लागत और हिस्सेदारी को लेकर रहा है। 1940 में पहली बार बांध परियोजना का विचार आया था। 1944-45 में पंजाब सरकार ने सर्वे शुरू किया और 1965 में इसकी शुरुआती रिपोर्ट पंचवर्षीय योजना में शामिल हुई, लेकिन बार-बार साइट को लेकर तकनीकी आपत्तियां आती रहीं। पहले किशाऊ गांव के पास साइट प्रस्तावित थी, जिसे केंद्रीय जल आयोग ने खारिज कर दिया था। 

बाद में संबरखेड़ा साइट को 236 मीटर ऊंचे बांध के लिए सही माना गया। असली विवाद पिछले आठ सालों में पैदा हुआ, जब हिमाचल प्रदेश ने कहा कि वह बिजली घटक की लागत का वित्तीय बोझ नहीं उठाएगा। अंतत: जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठकों के बाद सहमति बनी कि परियोजना की लागत का नब्बे प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी तथा शेष दस प्रतिशत छह भागीदार राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा। इसी 10 प्रतिशत हिस्से में हरियाणा की नई हिस्सेदारी करीब 579 करोड़ रुपये तय की गई है। 

पहले के समझौतों में हरियाणा की हिस्सेदारी 478.85 करोड़, उत्तर प्रदेश की 298.76 करोड़, राजस्थान की 93.51 करोड़, दिल्ली की 60.50 करोड़, उत्तराखंड की 38.19 करोड़ और हिमाचल की 31.58 करोड़ बताई गई थी। लेकिन नई व्यवस्था में हिमाचल की बिजली लागत को अन्य राज्यों ने उठाया है। इस 579 करोड़ रुपये के बदले में हरियाणा को सिंचाई के लिए 836.39 क्यूसेक पानी मिलेगा। यह पानी यमुना प्रणाली के माध्यम से हरियाणा की नहरों में आएगा। किशाऊ बांध से मिलने वाला 836.39 क्यूसेक अतिरिक्त पानी हरियाणा की पश्चिमी यमुना नहर और जवाहरलाल नेहरू लिफ्ट नहर प्रणाली में जाएगा। 

इससे दक्षिण हरियाणा के अंतिम छोर तक सिंचाई पानी पहुंचेगा, भूजल पर दबाव कम होगा और पीने के पानी की किल्लत, खासकर गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे एनसीआर शहरों में कम होगी। हरियाणा के लिए यह परियोजना काफी लाभदायक साबित हो सकती है क्योंकि राज्य कृषि प्रधान होने के साथ-साथ पेयजल और सिंचाई के लिए यमुना बेसिन पर काफी निर्भर है। अतिरिक्त और नियमित जल आपूर्ति से सिंचाई क्षमता बढ़ेगी, सूखे या कम पानी वाले मौसम में राहत मिलेगी तथा दक्षिणी जिलों सहित उन क्षेत्रों को पानी पहुंचाया जा सकेगा जहां उपलब्धता कम है। कुल मिलाकर यह परियोजना अंतरराज्यीय सहयोग का उदाहरण बनते हुए यमुना बेसिन के राज्यों की जल संबंधी जरूरतों को संतुलित तरीके से पूरा करने का प्रयास है।

Tuesday, September 15, 2026

दानदाता का संतुष्ट होना जरूरी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कौशल नरेश प्रसेनजित का यह नियम था कि वह वर्ष भर में अपने राज कर्मचारियों और उनके परिवार को वस्त्र दान किया करते थे। कहते हैं कि उनके यहां पांच सौ राजकर्मचारी थे। समय आने पर उन्होंने राजकर्मियों को वस्त्र दिए। संयोग से उन्होंने दिनों महात्मा बुद्ध के प्रिय सेवक आनंद ने प्रवचन करते हुए कहा कि मनुष्य को अपरिग्रह का पालन करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक का संचय नहीं करना चाहिए। 

राज कर्मचारी संघ की शास्ता से परिचित थे। तो उन्होंने सोचा कि कहीं महाराज द्वारा दिए गए वस्त्र अपरिश्रम और लोभ से जुड़ा हुआ है। वह सब धर्मनिष्ठ थे, तो उन्होंने सारे वस्त्र लाकर आनंद को दान कर दिए। धीरे-धीरे यह बात महाराज प्रसेनजित तक पहुंची। यह बात जानकर प्रसेनजित को क्रोध आ गया कि दूसरों को अपरिग्रह का उपदेश देने वाले आनंद ने पांच सौ वस्त्र ग्रहण कर लिए। वह अगले दिन संघाराम पहुंच गए। 

आनंद ने उनका सादर अभिवादन किया। प्रसेनजित ने क्रोध में पूछा कि भंते! आप भिक्षु हैं। आपने पांच सौ वस्र कैसे ग्रहण कर लिए? आनंद उन्हें संघाराम की ओर ले गए और बताया कि यहां के भिक्षुओं के चीवर उपयोग लायक नहीं रह गए थे। इसलिए मैंने सारे वस्त्र उनमें वितरित कर दिए। 

प्रसेनजित ने रोष से पूछा, और उनके पुराने वस्त्र? उनका क्या हुआ? आनंद ने नम्रता से जवाब दिया, भिक्षुओं के पुराने वस्त्रों की कथरी बना दी गई है ताकि  बिछाने के काम आए। मेरा एक ही चीवर से काम चल जाता है, तो मैंने केवल एक ही वस्त्र लिया है। यह सुनकर प्रसेनजित को बहुत दुख हुआ। उन्होंने आनंद से क्षमा मांगी। आनंद ने कहा कि महाराज! दान पाने वाले से ज्यादा दान देने वाले का संतुष्ट होना जरूरी है।