Saturday, June 27, 2026

रंगभेद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के ही समानरंगभेद  और मानवाधिकार के समर्थन में काम करने वाले डेसमंड एमपिलो टूटू को उनके कार्यों के लिए नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था।  वह दक्षिण अफ्रीका के एक एंग्लिकन बिशप और धर्मशास्त्री थे। टुटू का जन्म दक्षिण अफ्रीका के क्लर्कडॉर्प में एक गरीब परिवार में हुआ था, जहाँ उनकी मिश्रित खोसा और मोत्स्वाना वंश की वंशावली थी। 

वयस्क होने पर उन्होंने शिक्षक के रूप में प्रशिक्षण लिया और नोमालिजो लेआ शेनक्सेन से विवाह किया जिनसे उनके कई बच्चे हुए। 1962 में वे किंग्स कॉलेज लंदन में धर्मशास्त्र का अध्ययन करने के लिए यूनाइटेड किंगडम चले गए । 1966 में वे दक्षिणी अफ्रीका लौट आए। वह अपने पिता के काफी करीब थे, लेकिन उनके शराब पीने और अपनी पत्नी से मारपीट करने की आदत से वह अपने पिता से नाराज भी रहते थे। 

उन दिनों अफ्रीका में रंगभेद चरम पर था। गोरे लोग अश्वेतों के साथ बुरा व्यवहार करते थे। एक बार की बात है। वह बचपन में अपने पिता के साथ कहीं जा रहे थे।  तभी उन्होंने देखा कि सामने से एक श्वेत पादरी ट्रेवर हडलस्टन चले आ रहे हैं। डेसमंड ने देखा कि उनके पिता को देखते ही पादरी ने अपनी टोपी उतारी और अभिवादन किया। यह एक तरह से दक्षिण अफ्रीका में आश्चर्य की बात है। 

डेसमंड ने अपने पिता से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति सभी मनुष्य को समान समझता है। रंग के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करता है। बस,यहीं से डेसमंड में रंगभेद की भावना के खिालाफ लड़ने की प्रेरणा मिली। उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़कर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति को खत्म कराया।

क्षणिक आवेश में होने वाले अपराध पर कैसे लगे अंकुश?

अशोक मिश्र

नेहा कुमारी का अपराध केवल इतना था कि उसने अपने पति अमित को ड्यूटी पर जाने को कहा था। अमित उस दिन ड्यूटी पर नहीं जाना चाहता था। बस, इसी बात पर अमित ने छह महीने की गर्भवती अपनी पत्नी की हत्या कर दी। पहले उसने चुन्नी से नेहा का गला दबाया। उसके बाद पानी से भरी बाल्टी में उसका मुंह दबाकर मार डाला। बिहार के मुजफ्फरनगर की रहने वाली नेहा एक महीने पहले अपने पति के साथ फरीदाबाद के पल्ला थाना क्षेत्र स्थित पंचशील कालोनी में रहने आई थी। 

पत्नी की हत्या का आरोपी अमित फरार है। आज नहीं तो कल अमित गिरफ्तार किया जाएगा। उस पर अपनी पत्नी और गर्भस्थ शिशु की हत्या का मुकदमा चलेगा। भले ही हत्या का आरोपी अमित और मारी गई नेहा बिहार के मूल निवासी रहे हों, लेकिन हरियाणा में भी इस तरह की हत्याएं होती रहती हैं। यह किसी एक प्रांत या जिले की कहानी नहीं है। लगभग पूरे देश में ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। अक्सर देखा गया है कि मानसिक दबाव, अहंकार, शराब की लत और घरेलू विवाद के चलते पुरुष अपनी पत्नी की हत्या कर बैठते हैं। 

इस तरह की घटनाओं में होता यह है कि कई बार पति का इरादा पत्नी की हत्या करने का नहीं होता है, लेकिन वह उत्तेजना में आकर हत्या कर बैठता है। वह अनचाहे ऐसी जगह पर वार कर बैठता है जिससे पत्नी की मौत हो जाती है। कई बार पति अपनी पत्नी के किरदार पर शक करते हैं और इस शक में आकर हत्या जैसा कदम उठाते हैं। कई बार तो बात इससे उलट भी होती है। पत्नी को अपने पति के चरित्र पर शक होता है या उसे प्रमाण मिल जाता है, तो अपनी पत्नी से छुटकारा पाने के लिए वह हत्या जैसा कुकृत्य कर बैठता है। 

हरियाणा में घरेलू हिंसा व्यवस्थित और दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति का हिस्सा है। शराब या दूसरे किस्म के नशे आदी लोग पत्नी के विरोध करने पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मारपीट के साथ-साथ हत्या जैसी घटनाएं भी घटित हो जाती हैं। एक आंकड़े के अनुसार, प्रदेश में लगभाग 37 प्रतिशत महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें से शायद ही कोई महिला घरेलू हिंसा रोकने के लिए कदम उठाती हो। वह इसे भाग्य का लिखा या नियति मानकर चुपचाप सहती रहती है।

 नीति आयोग की सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू हिंसा के कारण महिलाएं आत्महत्या या अचानक हुए हमलों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शिकार होती हैं। हरियाणा सरकार ने पिछले पांच-छह साल में कन्या भ्रूण हत्या रोककर यह साबित कर दिया है कि कानून से बदलाव लाया जा सकता है। अब जरूरत यह है कि स्त्री के खिलाफ किसी भी प्रकार का अपराध होने पर आरोपी को सख्त से सख्त सजा दी जाए।

Friday, June 26, 2026

फुटबाल के सितारे तुलसीदास बलराम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तुलसीदास बलराम को भारतीय फुटबॉल को स्वर्ण युग में लाने का श्रेय दिया जाता है। बलराम का जन्म 4 अक्टूबर, 1936 को ब्रिटिश-अधिकृत हैदराबाद के सिकंदराबाद के पास अम्मुगुडा गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। गरीबी के बावजूद बचपन से ही उन्हें फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था। तमाम परेशानियों के बावजूद बलराम ने लल्लागुडा वर्कशॉप ग्राउंड में फुटबॉल खेलना शुरू किया। 

उन्होंने शुरुआती दौर से ही हैदराबादी शैली के वन-टच फुटबॉल का अभ्यास किया। सिकंदराबाद लीग में सिविलियंस और आर्मी इलेवन के बीच हुए एक मैच के दौरान उन्हें पहचान मिली। उस समय उनके परिवार की हालत यह थी कि फुटबॉल मैच खेलने के लिए उनके पास जूते नहीं थे। बिना जूतों के फुटबॉल मैच खेलना लगभग असंभव था। आखिरकार बहुत सोच-समझकर वह सिकंदराबाद के ही एक जूते बनाने वाले के पास पहुंचे। 

उन्होंने जूते बनाने वाले को अपनी सारी स्थिति बताई। उससे कहा कि यदि उसे जूते नहीं मिले, तो वह टूर्नामेंट नहीं खेल पाएगा। उससे कोई पुराना जूता देने की विनती की। जूता बनाने वाले ने कहा कि उसके पास कोई पुराना जूता नहीं है। अगर वह कहीं से पुलिस का पुराना जूता ले आए, तो वह उसे पहनने लायक बना देगा। काफी प्रयास के बाद उसकी मुलाकात एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी से हुई। 

उसकी व्यथा-कथा सुनकर पुलिसकर्मी ने अपना पुराना जूता दिया। मरम्मत करने वाले ने दो रुपये में जूता ठीक कर दिया। उस टूर्नामेंट में बलराम ने गोल पर गोल मारकर सबको हैरान कर दिया। बाद में प्रसिद्ध कोच सैयद अब्दुल के मार्गदर्शन में वह 1956 में संतोष ट्राफी और मेलबर्न ओलंपिक तक पहुंचा। बलराम ने भारत के लिए कुल 33 मैच खेले और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 12 गोल किए।  बलराम का निधन 16 फरवरी 2023 को 86 वर्ष की आयु में हुआ।

खुले में बचा-खुचा खाना फेंकने वालों पर लगे भारी भरकम जुर्माना

अशोक मिश्र

घर के बाहर अगर किसी महिला का बच्चा खेल रहा है, तो उसे हर समय यही डर बना रहता है कि उसका बच्चा सुरक्षित है या नहीं। हरियाणा के किसी भी जिले में सुबह सड़कों पर टहलना, बच्चों का पार्कों में खेलना, अकेले कहीं आना जाना दुश्वार हो रहा है। हर मां को यही डर सताता रहता है कि घर से बाहर निकले उसके बच्चों को कहीं कुत्ता काट न ले। फरीदाबाद हो या गुरुग्राम, सोनीपत हो या कुरुक्षेत्र, सब जगह एक जैसे हालात हैं। पिछले पांच साल में कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। 

कुत्ते के काटने पर जब घायल व्यक्ति सरकारी अस्पताल पहुंचता है, तो उसे एक लंबी लाइन मिलती है। निजी अस्पतालों में एंटी रैबीज का इंजेक्शन पांच हजार से कम में नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में गरीब आदमी के लिए पांच हजार रुपये खर्च कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। फिर भी किसी तरह गरीब आदमी इंजेक्शन के लिए पैसे का जुगाड़ करता है। पशुपालन विभाग द्वारा 2019 से 2023 तक किए गए एक अध्ययन के अनुसार, राज्य में आवारा कुत्तों की संख्या लगभग 1.8 मिलियन होने का अनुमान है। 

एक अनुमान के मुताबिक, पूरे हरियाणा में प्रतिवर्ष 1.43 लाख से अधिक कुत्ते के काटने के मामले होते हैं, लेकिन इनमें से सरकारी रजिस्टर पर काफी कम ही दर्ज हो पाते हैं। इसलिए वास्तविक आंकड़ों का पता ही नहीं चल पाता है। बहुत सारे लोग कुत्ते के काटने पर झाड़-फूंक में लग जाते हैं या फिर निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं।  प्रदेश में नगर निगम की एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल योजना केवल कागजों पर ही चल रही है। सन 2023 में फरीदाबाद नगर निगम ने दावा किया था कि जिले में 15 हजार कुत्तों की नसबंदी की गई थी। 

अभी हाल में ही दावा किया गया कि इस वर्ष लगभग सात हजार कुत्तों की नसबंदी की गई है। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि हर गली में हर महीने कई पिल्ले पैदा हो रहे हैं। कुत्तों का सबसे बड़ा अड्डा कूड़े का ढेर होता है। लोग, होटल या ढाबा चलाने वाले लोग अपने घर और रेस्टोरेंट का बचा हुआ कचरा, सड़ी रोटियां, मांस के टुकड़े आदि कूड़े के ढेर पर फेंक देते हैं। 

नगर निगम नियमित रूप से कूड़ा कचरा नहीं उठाता है जिसकी वजह  से कूड़े के ढेर के आसपास कुत्तों के झुंड जमा हो जाते हैं। उधर से गुजरने वाले लोगों पर कुत्तों का झुंड हमला करता है। बहुत सारे लोग डाग लवर होने का दम भरते हैं। घर से ही बचा खुचा खाना सड़क पर डाल देते हैं। जब इनके द्वारा पाले गए कुत्ते किसी को काट लेते है, तो यही डाग लवर यह कहकर अपनी जान छुड़ा लेते हैं कि इन लोगों ने कुत्ते को उकसाया होगा। उसको पत्थर मारा होगा। ऐसे लोगों से यही अपील की जा सकती है कि यदि कुत्तों से प्यार है तो सड़क पर नहीं, तय जगह खिलाओ। खुले में खाना फेंकने वालों पर भारी भरकम जुर्माना लगना चाहिए। 

Wednesday, June 24, 2026

एक दीपक से जले सैकड़ों दीपक

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया में जितने भी बदलाव हुए हैं, उनकी शुरुआत एक छोटे से कदम से ही हुई है। किसी भी देश, समाज में जब भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है, तो उसके पीछे किसी व्यक्ति का छोटा सा प्रयास ही रहा होगा। इसके बाद उस व्यक्ति के साथ लोग जुड़ते गए होंगे और समाज, देश में बहुत भारी परिवर्तन आया होगा। यह बात ध्रुव सत्य है। बदलाव की प्रक्रिया किसी एक से शुरू होती है और वह पूरे समाज को प्रभावित करती है। 

इस संबध में एक बहुत ही रोचक प्रसंग है। किसी गांव में एक बुजुर्ग रहता था। वह घोर आशावादी था। निराशा के क्षणों में भी वह आशा का दामन नहीं छोड़ता था। वह शाम होने पर अपने घर के दरवाजे पर रोज एक दीपक जलाता था। लोग उसको पागल समझते थे। बुजुर्ग दीपक जलाने के बाद उसे देखता रहता था, जब तक दीपक बुझ नहीं जाता था। 

एक दिन एक युवक से रहा नहीं गया और वह बुजुर्ग के पास पहुंचकर उससे बोला, बाबा! केवल एक दीपक जलाने से क्या होगा? पूरे गांव में तो रोशनी नहीं हो जाएगी। बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा कि अंधेरा खत्म करना मेरा काम नहीं है। दीपक जलाने से कम से कम कहीं तो उजाला है। 

एक दिन गांव में बहुत तेज आंधी आई। लोगों ने देखा कि बुजुर्ग का दीपक तेज आंधी में भी जल रहा है। युवक फिर बुजुर्ग के पास गया और पूछा, बाबा! आपका दीपक कैसे जल रहा है? बुजुर्ग ने कहा कि मैंने अपने दोनों हाथों से दीपक को बुझने से बचाया था।  युवक ने कहा कि बाबा, इस एक दीपक से पूरी दुनिया का अंधेरा दूर नहीं हो सकता। 

बुजुर्ग ने कहा कि मेरे मन में तो अंधेरा नहीं है। इससे प्रभावित होकर युवक ने भी दीपक जलाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते कुछ दिनों में सभी गांव वालों ने दीपक जलाना शुरू कर दिया। कल तक जो गांव अंधेरे में डूबा रहता था, आज वह दीपकों की रोशनी से जगमगा रहा था।

किसी हादसे का इंतजार न करें बचाव की कर लें पूरी तैयारियां


 अशोक मिश्र

गरमी के दिनों में आगजनी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। मार्च से लेकर जून तक देश में कई बड़े हादसे हो चुके हैं। सोमवार को ही लखनऊ के अलीगंज इलाके में स्थित कोचिंग संस्थान में लगी आग से 15 लोगों की जान चली गई। इनमें सबसे ज्यादा छात्र-छात्राएं थीं। डिजिटल लॉक डोर नहीं खुलने और चारों ओर धुआं भर जाने की वजह से इन स्टूडेंट का दम घुट गया और मौत हो गई। 

कुछ स्टूडेंट्स ने जान बचाने के लिए बाहर छलांग लगा दी। बुरी तरह घायल होकर अस्पताल में भर्ती हैं। इसी तरह 3 जून को सुबह दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में अवैध रूप से संचालित हो रहे फ्लोरिश होटल एवं गेस्ट हाउस में लगी आग में 21 लोगों की मौत हो गई। इनमें से ज्यादातर विदेशी नागरिक थे। गुरुग्राम के ही आठ लोगों की मौत हुई थी जो एक ही परिवार के थे। मई महीने में दिल्ली के विवेक विहार में कमरे में लगे एसी का कंप्रेशर फटने से लगी आग में नौ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। 

पिछले साल जुलाई 2025 में फरीदाबाद के सेक्टर-16 स्थित एक निजी कोचिंग सेंटर  में आग लगी थी। कोचिंग सेंटर में लगी आग का कारण शार्ट सर्किट बताया गया था। संतोष की बात यह है कि समय रहते आग बुझा ली गई और जनहानि नहीं हुई। मई 2025 में करनाल जिले के एक कोचिंग सेंटर में भी आग लगने की घटना हुई थी, लेकिन समय रहते आग पर काबू पा लिया गया था। कोचिंग सेंटर में जब आग लगी थी, तब पांच सौ स्टूडेंट वहां मौजूद थे। हरियाणा के प्रत्येक जिले में सैकड़ों कोचिंग संस्थान चलाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ द ज्ञानम, आईसीएस कोचिंग सेंटर, करियर पॉवर, राइस एकेडमी जैसे चर्चित संस्थान हैं। 

जिलों में वैध-अवैध रूप से संचालित होने वाले कोचिंग संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए हरियाणा सरकार ने 'हरियाणा रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन आॅफ प्राइवेट कोचिंग इंस्टिट्यूट्स बिल' लागू किया है। संस्थानों के लिए अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र और उचित वेंटिलेशन वाले बुनियादी ढांचे का होना अनिवार्य है। संस्थानों में फर्स्ट-आइड किट और आपातकालीन चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। परिसरों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाना और सुरक्षा गार्ड तैनात करना शामिल है। 

छात्रों की शिकायतों को सुनने और समाधान करने के लिए एक आंतरिक शिकायत निवारण समिति का गठन की बात भी कही गई। पूरे राज्य में हजारों संख्या में संचालित वैध-अवैध कोचिंग संस्थान नियमों का कितना पालन करते हैं, यह जांच का विषय है। कई जिलों में तो कोचिंग संस्थान ऐसी जगहों पर संचालित हो रहे हैं, जब पर आपदा आने पर फायर ब्रिगेड या पुलिस की गाड़ियों का पहुंच पाना असंभव है। कोचिंग संस्थानों में आपदा के समय निकलने के लिए दूसरा रास्ता भी नहीं है। ऐसे संस्थानों में कोई भी हादसा हो सकता है।

Tuesday, June 23, 2026

संन्यासी मार्टिन लूथर ने दिया अहिंसा का संदेश

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर किसी ने कोई पाप किया है, उसके पापों के परिणाम से छुटकारा पोप या चर्च नहीं दे सकते हैं। दुनिया में अगर किसी के पापों के लिए कोई माफी या सजा दे सकता है, तो वह ईसा ही पाप मुक्ति दे हैं। जर्मन संन्यासी, पादरी और धर्म प्रचारक मार्टिन लूथर ने खुलेआम पोप की आलोचना करते हुए यह बात कही थी। संन्यासी मार्टिन लूथर का जन्म  1483 को जर्मनी में हुआ था। 

उनके पिता हैंस लूथर एक खदान में मजदूर थे। हैंस लूथर के आठ बच्चे थे जिसमें मार्टिन दूसरे थे। उन्होंने चर्च के पादरियों के अविवाहित रहने का भी विरोध किया। और सन 1524 ई. में उन्होंने कैथरिन बोरा से विवाह किया। तब तक रोम सन 1520 में लूथर का कैथोलिक चर्च से बहिष्कार की घोषणा कर चुका था। इस बहिष्कार के बाद ही वह एक नए संप्रदाय का नेतृत्व करने लगे थे। 

इससे जर्मनी के लोग उनसे काफी नाराज रहते थे। वह जहां भी जाते उनका विरोध किया जाता था। एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। उनकी धर्म की नई व्याख्या से नाराज लोगों ने उन पर और उनके शिष्यों का विरोध किया। इस दौरान उन पर पत्थर भी फेंके गए। वह लोग जहां भी जाते थे, लोग उनका विरोध करने के लिए आ खड़े होते थे। 

इससे परेशान एक शिष्य ने लूथर से कहा कि इन लोगों को इनकी ही भाषा में जवाब देना चाहिए। संत लूथर ने कहा कि यदि हम भी उनके जैसा ही व्यवहार करने लगे, तो फिर उनमें और हम में क्या फर्क रह जाएगा। वे हमसे नाराज हैं। हम अपने प्रेम, सद्भाव और सहिष्णुता से ही उनके क्रोध को कम या समाप्त कर सकते हैं। यह सुनकर शिष्यों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने हिंसा न करने का संकल्प लिया।

जल भंडार नहीं बचाया तो भविष्य में झेलना पड़ेगा गंभीर जल संकट

अशोक मिश्र

राष्ट्रीय भूजल सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े बहुत डराने वाले हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की हालत आंकड़ों के मुताबिक काफी खराब हो चुकी है। देश में भूजल संकट के सबसे बड़े हॉटस्पॉट यही तीनों राज्य हैं। अगर हालात पर बहुत जल्दी काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले वर्षों में इन तीनों राज्यों की जनता पानी के लिए त्राहि-त्राहि करेगी और सरकार कुछ नहीं कर पाएगी। हरियाणा में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। प्रदेश में हर साल 14 अरब घन मीटर पानी की कमी हो रही है। 

राज्य साल दर साल सूखता जा रहा है। राज्य की औसत भूजल दोहन दर 135.96 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। कुरुक्षेत्र जैसे जिलों में भूजल दोहन की दर रिकॉर्ड 228 प्रतिशत तक पहुंच गई है। शहर में भूजल की उपलब्धता काफी चिंताजनक है। शहरों में पानी की कुल मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। गर्मी के दिनों हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि लोगों की पानी की जरूरतों को पूरा करना स्थानीय निकायों के लिए काफी मुश्किल हो जाता है। लोगों को पीने का पानी भी टैंकरों से खरीदना पड़ता है। हरियाणा में शहर ही नहीं, 7,287 गांवों में से 3,041 गांव जल संकट से जूझ रहे हैं।

राज्य के कुल 141 ब्लॉकों में से 91 ब्लॉक अत्यधिक शोषित श्रेणी में आ गए हैं। 14 जिलों में पानी का स्तर 30 मीटर से भी ज्यादा नीचे गिर चुका है। प्रदेश की वार्षिक जल मांग लगभग 34.96 लाख करोड़ लीटर है, जबकि उपलब्ध जल भंडार सिर्फ 20.93 लाख करोड़ लीटर ही है। विशेषज्ञों का मनाना है कि हरियाणा में गंभीर जल संकट के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार खेतों में लगे ट्यूबवेल हैं। किसान इन कृषि ट्यूबवेलों का अंधाधुंध उपयोग करके बहुत सारा पानी बरबाद कर देते हैं। खेतों में जरूरत से कहीं ज्यादा पानी भर देते हैं जिसकी वजह से गर्मी के मौसम में बहुत सारा पानी वाष्पित हो जाता है। 

हरियाणा में वर्षा जल का संचयन भी कम हो पाता है। वैसे बरसात भी अन्य राज्यों की अपेक्षा कम होती है जिसकी वजह से भूजल रिचार्ज दर भी काफी कम है। राज्य में तेज होता शहरीकरण और अत्यधिक जनसंख्या का दबाव पानी के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। राज्य के जिलों में स्थापित होने वाली औद्योगिक इकाइयों में भी पानी की भारी खपत होती है जिसकी वजह से भूजल स्तर काफी गिरता जा रहा है। 

गंभीर पानी संकट से बचने का एक ही उपाय है कि प्रदेश के किसान, उद्योगपति और नागरिक प्रदेश सरकार की नीतियों पर अमल करें। पानी का उपयोग करें, लेकिन उसे बरबाद होने से हर हालत में बचाएं। जहां तक संभव हो, बरसात के पानी का संरक्षण करें। इसके लिए जरूरी है कि सौ वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल में बने मकानों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य रूप से लगाएं। यदि वर्षा जल को बचाया नहीं गया, तो आने वाले दिनों भीषण जलसंकट का सामना करना पड़ सकता है।

Monday, June 22, 2026

मछली ने भुगता जिद करने का परिणाम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जिद हमेशा नुकसानदायक होती है। यदि कोई किसी काम से होने वाले नुकसान के बारे में बताए, तो उसकी बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि बताने वाले व्यक्ति की बात सही लगे, तो उस पर अमल करना चाहिए। ऐसे मामले में जिद नहीं करनी चाहिए। जिद करने से हमेशा नुकसान ही होता है। 

हठधर्मिता हर मामले में काम नहीं आती है। किसी गांव के तालाब में तीन मछलियां रहती थीं। इन तीनों मछलियों का जन्म भी इसी तालाब में हुआ था। एक ही तालाब में रहने की वजह से तीनों में काफी गहरी दोस्ती थी। इनमें से एक मछली काफी तेज तर्रार और बुद्धिमान थी। 

वह अपनी सहेलियों को समय-समय पर चेताती रहती थी ताकि वे किसी मुसीबत में न फंस जाएं। दूसरी मछली बुद्धिमान मछली से कम बुद्धि वाली थी। लेकिन उसे मूर्ख नहीं कहा जा सकता था। वह पहली मछली की बात मानती थी, लेकिन बात मानने से पहले वह अच्छी तरह से विचार कर लेती थी। उसे बुद्धिमान मछली की बातें अच्छी और सच्ची लगती थीं। 

तीसरी मछली काफी जिद्दी थी। वह अपनी ही धुन में लगी रहती थी। कई बार वह अपनी जिद की वजह से मुसीबत में फंसते-फंसते बची थी। लेकिन हर बार बुद्धिमान मछली ने उसे किसी न किसी तरह से बचाया था। इसके बावजूद उसकी आदत नहीं बदली थी। एक दिन बुद्धिमान मछली ने देखा कि तालाब के किनारे मछुआरा आया हुआ है। 

बुद्धिमान मछली ने अपनी दोनों सहेलियों को सचेत किया और तालाब के कोने में जाने से मनाकर दिया। जिद्दी मछली ने उसकी बात नहीं सुनी। वह जैसे ही तालाब में गई मछुआरे के फैलाए जाल में फंस गई। अब जिद्दी मछली पछताने लगी, लेकिन अब क्या किया जा सकता था। जिद्दी मछली ने लाख प्रयास किया, लेकिन जाल से बाहर न आ सकी।

फुटपाथ पर चलने का अधिकार लोगों को दिलाएगा कौन?

अशोक मिश्र

सड़कों पर पैदल चलने वालों का सुरक्षित घर पहुंचना भी करिश्मा है। सड़क हो, मेट्रो स्टेशन हो या रेलवे स्टेशन इनके अगल-बगल से गुजरने वाली सड़कों से फुटपाथ अक्सर गायब होता है। ऐसा नहीं है कि फुटपाथ बनाए नहीं जाते हैं। बनाए जाते हैं, लेकिन इन पर रेहड़ी-पटरी वालों का कब्जा होता है। दुकानदार अपनी दुकान के सामने सामान सजाकर बैठ जाते हैं जिससे पैदल चलने वालों के लिए जगही नहीं बचती है। पैदल चलने वालों को मजबूर होकर उस सड़क पर चलना पड़ता है जिस पर तेज रफ्तार गाड़ियां आ जा रही होती हैं। 

ऐसे में कई बार हादसे भी होते हैं। इन हादसों में कुछ लोग घायल होते हैं, तो कुछ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। कई जगहों पर फुटपाथ टूटे-फूटे होते हैं, चलने लायक ही नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में पैदल चलने वाला कहां जाए। उसके पास एक ही विकल्प बचता है, सड़क पर चले। इन्हीं सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 19 जून 2026 को सुप्रीमकोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि  पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। 

अदालत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित और बाधा रहित फुटपाथ पर चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसे मोटर वाहनों की सुविधा से पहले संरक्षण मिलना चाहिए। सवाल उठता है कि पैदल चलने वालों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा। यह जिम्मेदारी राज्य सरकार के अधीन आने वाले शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और पंचायतों की है। इन संस्थाओं को फुटपाथों का निर्माण, रखरखाव और अतिक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, क्योंकि पैदल चलना सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन का अभिन्न हिस्सा है। इस अधिकार की रक्षा करना सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी होगी। यदि किसी नागरिक को सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध नहीं कराया जाता या उसके इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संविधान और अन्य कानूनों के तहत अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। 

वैसे तो राज्य सरकार के अधीन काम करने वाली संस्थाएं सुप्रीमकोर्ट के फैसले से पहले भी फुटपाथों पर हुए अतिक्रमण को हटाने का काम करती रही हैं। स्थानीय निकायों द्वारा अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाए जाते रहे हैं, लेकिन फुटपाथों पर से रेहड़ी-पटरी को हटाया गया, फुटपाथ पर रखे दुकानदारों के सामान को जब्त किया गया,  कुछ ही समय बाद हालात पहले जैसे हो जाते हैं। 

इधर अतिक्रमण हटाने वाले गए, उधर फिर फुटपाथ पर रेहड़ी पटरी वालों ने कब्जा कर लिया। जैसे ही अतिक्रमण विरोधी अभियान शुरू होता है, खबर फैलते ही सारे कब्जाधारी सतर्क हो जाते हैं। अभियान चलाने वालों को कब्जे दिखाई ही नहीं देते हैं, लेकिन उनके जाते ही फिर फुटपाथ पर दुकानें सज जाती हैं।