अशोक मिश्रलीजिए, वर्ष, महीना, सप्ताह और दिन की पगडंडियां तय करती हुई किसी नवयौवना की तरह होली आपके दरवाजे पर दस्तक दे रही है. उठिए और उसका खुले दिल से स्वागत कीजिए। फागुनी बयार ने आपके तन-मन को पहले से ही मदमस्त कर रखा है, ऐसे में फिर काहे का लिहाज और काहे का संकोच. उठिए, उन्हें प्रेम के रंग से सराबोर कर दीजिए, जिनसे साल भर आपने खुले मन से बात नहीं की है. कई महीने पहले किसी से हुई लड़ाई या 'तू.. तू.. मैं.. मैं' की गांठ अब भी आपके मन में अगर पड़ी हुई है. तो जनाब, उस गांठ को खोलिए और रंग, अबीर और गुलाल लेकर जुट जाइए। होलिकोत्सव मनाने को. फिर देखिए इस बार की होली में आपको कितना मजा आता है. हर साल फागुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला हर्षोल्लास का त्योहार होली इस बात का संदेश देता है कि परेशानियों और संकटों से घबराकर बैठ जाने का नाम नहीं है जिंदगी। जिंदगी तो होली के रंगों की तरह चारों ओर बिखरकर खुद हंसने-मुस्कुराने और लोगों को हंसने-मुस्कुराने पर मजबूर कर देने का नाम है,
जानते हैं, होलिकोत्सव का दूसरा नाम मदनोत्सव है. वैसे तो फाल्गुन का पूरा महीना ही कामदेव यानी मदन को समर्पित है. तन को कंपा देने वाली ठंड कम होते ही मन और तन में एक नए उत्साह का संचरण होने लगता है. फागुन महीने में वातावरण भी सुहावना होता है. न अधिक गर्मी और न ही अधिक सर्दी। बस, इसी लिए आम के साथ-साथ आदमी का मन भी बौराने लगता है। कहते हैं कि फागुन के महीने में साठ साल के पोपले मुंह वाले बाबा भी देवर लगने लगते हैं। हंसी ठिठोली, मनोविनोद का एक मदमस्त कर देने वाला दौर चलने लगता है। घूंघट की आड़ से नवयौवनाएं नयनों के तीर इतनी कसकर मारती हैं कि उसके इर्द-गिर्द मंडराने वाले रूप लोलुपों यानी भंवरों के जिगर के आरपार हो जाते हैं नयनों के ये तीर। सामाजिक वर्जनाएं कमजोर होने लगती हैं। मर्यादाओं का स्थान अश्लील गीत संगीत ले लेते हैं। लेकिन यह सब कुछ सिर्फ एक दिन के लिए होता है। कहीं-कहीं पर तो यह सिलसिला पूरे सात आठ दिन तक चलता है। इन दिनों ऐसा लगता है कि आदमी अपनी साल भर में संचित की गई विषय वासनाओं को अंतरमन से उलीच कर फिर साल भर के लिए पाक साफ हो जाना चाहता है। वैसे तो किसी न किसी रूप में होली पूरे देश में मनाई जाती है।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड, दिल्ली, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश आदि जगहों पर होली की छटा देखते ही बनती है. लेकिन उत्तर भारत में भी ब्रज (बरसाने की होली) और अवध की होली विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, विभिन्न क्षेत्रों में मनाई जाने वाली होलियों पर उस क्षेत्र में आराध्य देवों के गुणों का भी प्रभाव दिखाई देता है. अब ब्रज यानी बरसाने की होली को ही लें। यहां मनाई जाने वाली होली का रंग ही कुछ निराला है। ब्रज क्षेत्र में मथुरा, वृंदावन, नंदगांव और बरसाना (राधा के गांव) में बड़ी धूमधाम से होली मनाई जाती है. ब्रज क्षेत्र के आराध्य देव हैं कृष्ण. (वैसे तो पूरे देश में श्रीकृष्ण की आराधना-पूजा की जाती है।) ब्रजवासियों के नायक श्रीकृष्ण माखनचोर हैं, गोपियों के साथ रास रचाते हैं, लीलाएं करते हैं। मौका पड़ने पर अपनी मां से झूठ भी बोलते हैं। ऐसे में होली पर उनके इन गुणों का प्रभाव न पड़े, ऐसा हो ही नहीं सकता है। यही वजह है कि यहां के गीतों, लोकगीतों और फागों में मस्ती का पुट तो होता ही है, अश्लीलता भी खूब घुली-मिली होती है। ब्रज साहित्य में होली से जुड़े जितनी रचनाएं मिलती हैं, उनका एक अलग ही रंग है, ब्रज क्षेत्र में फागुन पूर्णिमा से पहले और उसके बाद आठ दिन तक महिलाओं, युवतियों, बच्चों, बूढ़ों और युवकों की भीड़ जो धमाल मचाती है, वह देखते ही बनता है। यहां की होलिकोत्सव में रंगों का इस्तेमाल तो होता ही है, अश्लील गीतों की भी भरमार होती है। 'नैन नचाय कहयो मुस्काय लला फिर अड़यो खेलन होरी...' जैसे गीत अब कहां सुनने को मिलते हैं। बड़े-बड़े डेक या लाउडस्पीकर लगाकर ऐसे-ऐसे गीत बजाए जाते हैं कि शर्म से आंखें गड़ जाती हैं. इन गीतों के बजने तक बेटी बाप से, भाई-बहन से आंख चुराने लगते हैं।
बरसाने की लठमार होली का कहना ही क्या है। पुरुष साल भर तक अपनी प्रियतमा की एक लाठी खाने का इंतजार करते हैं। होलिकोत्सव के दिन उनकी प्रियतमा भी बिना किसी लाज-शर्म के उन पर लाठियां बरसाती रहती है। पुरुष उसकी इस अदा पर सौ-सी जान से कुरबान होता जाता है और लाठियां खाता जाता है। रंगों, फूलों और अबीर-गुलाल से रची-बसी बरसाने की होली देखने तो दूरदराज से लोग आते हैं। विदेशी भी इसे देखने आते हैं, तो वे भी यहां के वातावरण की मस्ती में अपनी सुध-बुध खोकर होली खेलने लगते हैं।
वहीं अवध क्षेत्र के आराध्य देव श्रीराम हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। यही वजह है कि होलिकोत्सव कुछ दशक पहले तक मर्यादित था. लोकगीतों और फागों में एक मधुरता थी, शालीनता थी। अयोध्या के राजा दशरथ, उनकी तीनों रानियों, श्रीराम और उनके सभी भाइयों से संबंधित लोकगीत और फाग गाए जाते थे। इन गीतों और लोकगीतों की रचनाएं कब हुई, नहीं कहा जा सकता है। हां, गोस्वामी तुलसी की होली से संबंधित रचनाएं भी खूब गाई जाती थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे उसमें भी अश्लीलता और भौंडेपन का समावेश होने लगा है। आधुनिक परिवेश में होली का वह लालित्य कहीं खो सा गया है, जो आज से चार-पांच दशक पहले पूरे देश में देखने को मिलता था।
होली का उल्लास भी अब कुछ धीमा पड़ने लगा है। महंगाई ने होली के उल्लास को निगल सा लिया है। इन दिनों होली के नाम पर इतने आडंबर रखे जाने लगे हैं कि लोग उन आडंबरों के लिए अपने दैनिक खर्चों में कटौती करके भी उसे पूरा नहीं कर पाते हैं। शराब, मिठाइयों और अन्य दूसरे मद में खूब पैसा खर्च किया जाने लगा है। नशा करके होली मनाने की लत ने होलिकोत्सव की मस्ती को जैसे खत्म ही कर दिया है। नशे में झूमती युवकों की भीड़ से बचकर निकल जाने में ही अब लोग भलाई समझने लगे हैं। यदि हम नशे का सेवन किए बिना होलिकोत्सव मनाते हैं, उससे कहीं ज्यादा खुशी मिलती है। इन तमाम परेशानियों और दिक्कतों के बावजूद आइए, हम खुले मन से होली मनाएं। प्रेम के रंग में खुद तो सराबोर हों ही, दूसरों को भी उसी रंग से सराबोर कर दें।