बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बुद्ध ने जीवन भर लोगों को यह समझाने का प्रयास किया है कि लालसा ही हमारे दुखों का मूल है। जब हम जरूरत से ज्यादा संग्रह करते हैं, तो हमें उन वस्तुओं के प्रति मोह हो जाता है। जब वह वस्तु किसी कारण से नष्ट हो जाए या चोरी चली जाए, तो उसे हमें दुख होता है। हमें भविष्य या अतीत के बारे में सोचकर दुखी नहीं होना चाहिए। जो पल आप जी रहे हैं, वही आपका है। यदि वर्तमान को ही अच्छी तरह से जी लिया जाए, तो वह भविष्य को भी सुधारने की क्षमता रखता है।महात्मा बुद्ध के इस जीवन दर्शन को क्षणवाद के नाम से जाना जाता है। यदि हम अपने जीवन के बारे में विचार करें, तो महात्मा बुद्ध की बात सही नजर आती है। हम जीवन में अतीत या भविष्य को सोचकर परेशान होते रहते हैं, इससे वर्तमान जीवन का आनंद भी नहीं उठा पाते हैं। इसी तरह महात्मा बुद्ध इंसान को सुख और दुख में समान रहने का उपदेश दिया करते थे।
एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध कहीं जा रहे थे। उनके मन में पता नहीं क्या आया, वह अच्छी भली पगडंडी को छोड़कर नीचे चलने लगे। नीचे कंटीली झाड़ियां थीं। उस पर चलने से बुद्ध के पैरों में कांटे चुभने लगे। उनके साथ चल रहे लोग आश्चर्यचकित रह गए। उनके शिष्य आनंद ने पूछा, तात! आप पगडंडी छोड़कर कंटीले रास्ते पर क्यों चल रहे हैं।
बुद्ध ने जवाब देते हुए कहा कि इंसान को इस पगडंडी पर सुख और दुख दोनों भोगने पड़ते हैं। सुखों के प्रति आशक्ति रखने से जब इंसान दुख में पड़ता है, तो वह अत्यंत दुखी हो जाता है। मैं कंटीले रास्ते पर इसलिए चल रहा हूं ताकि सुख और दुख का अभ्यास बना रहे। यह सुनकर उनके साथ चलने वाले समझ गए कि महात्मा बुद्ध उन्हें क्या समझाना चाहते हैं।