Thursday, June 18, 2026

जोड़ने वाले को सिर पर बिठाना चाहिए

प्रतीकात्मक चित्र

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो समाज और देश को जोड़े रखता है, वह और कुछ न करते हुए भी आदरणीय होता है। घर, परिवार, समाज और देश जब जुड़ा रहेगा, तो उस देश की उन्नति होगी। लोग समृद्ध होंगे। व्यापार फले-फूलेगा। लोगों को मधुर वाणी और सद्कर्मों से जोड़ा जा सकता है। दुनिया में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने हमेशा देश और समाज को जोड़ने की बात की है। 

इस संबंध में एक बहुत ही रोचक कथा सुनाता हूं। किसी शहर में एक दर्जी रहता था। वह अपनी दुकान पर आते समय अपने बेटे को भी साथ ले लेता था। बेटे का स्कूल रास्ते में ही पड़ता था। पहले वह अपने बेटे को स्कूल छोड़ता और फिर दुकान पर चला आता। अपना काम करता। एक दिन उसके बेटे के स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गई तो वह अपने पिता की दुकान पर चला गया। 

उसने देखा कि उसके पिता कैंची से नाप के अनुसार कपड़े काट रहे हैं। कभी कपड़े को इधर काटते हैं, तो कभी उधर। कपड़े काटने के बाद वह कैंची को अपने पैर के नीचे दबा लेते हैं। इसके बाद वह कपड़े की सिलाई करने लगते हैं। सुई में धागा डालने के बाद कपड़े की सिलाई करते हैं। सिलाई के दौरान यदि कपड़े की कतरब्योंत करनी हो, तो सुई को अपने सिर की टोपी में खोंस लेते हैं। जब तक बेटा अपने पिता की दुकान में रहा, यही देखता रहा। 

चलते समय उसने पूछा, पिताजी! कैंची को तो आप पैर के नीचे दबा लेते हैं, लेकिन सुई को टोपी में क्यों खोंस लेते हैं। पिता ने गंभीर होकर कहा, बेटा! कैंची हमेशा काटने का काम करती है, लेकिन सुई हमेशा जोड़ती है। काटने वाले को हमेशा पैरों के नीचे दबा कर रखना चाहिए, लेकिन जो जोड़ता है, उसे सिर माथे पर बिठाना चाहिए।

समय बचाने के लिए रेलवे ट्रैक पार करना मौत को दावत देना है

अशोक मिश्र

कैथल में रेल इंजन की चपेट में आने से एक बुजुर्ग की मौत हो गई। सुबह पांच बजे वह आदमी नए रेलवे हाल्ट के नजदीक रेलवेलाइन से गुजर रहा था। जैसे ही वह व्यक्ति लाइन को पार करने लगा, इंजन की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई। ट्रेन के इंजन की चपेट में आकर अपनी जान गंवाने वाले व्यक्ति की पहचान पूंडरी निवासी साहब सिंह के रूप में हुई है। रेल लाइन पार करते समय होने वाला हादसा लोगों की लापरवाही और हड़बड़ी के कारण होता है। 

अकसर देखने में आता है कि ट्रेन के आने के समय रेलवे क्रांसिंग का फाटक बंद कर दिया जाता है। इसके बावजूद लोग अगर पैदल हैं, तो उसके नीचे से झुककर रेल पटरी को क्रास कर जाते हैं। दोपहिया वाहन को आड़ा-तिरछा करके निकालने की कोशिश की जाती है। ऐसी स्थिति में अकसर हादसे हो जाते हैं। लोग ध्यान नहीं देते हैं और जब तक रेल पटरी पार करते हैं, तब तक स्पीड से ट्रेन आ जाती है और लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। हरियाणा में रेलवे ट्रैक पार करते समय हुए हादसों के अधिकांश मामले असावधानी, शॉर्टकट अपनाने और फुटओवर ब्रिज का इस्तेमाल न करने के कारण होते हैं। 

सरकारी और फोरेंसिक आंकड़ों के अनुसार, इन हादसों में 80 प्रतिशत मौतें लापरवाही की वजह से होती हैं, जबकि  बाकी बचे 20 प्रतिशत मामले आत्महत्या के होते हैं। देखने में यह आया है कि पारिवारिक कलह, प्रेम में असफल होने या किसी दूसरी तरह के दबाव के चलते जब आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं, तो वह रेल की पटरी पर लेटकर अपनी जान गंवा देना आसान समझते हैं। 

अगर हरियाणआ के मामलों का विश्लेषण किया जाए, तो रेल की पटरी पर मरने वाले कुल लोगों में से 92-96 प्रतिशत युवा पुरुष होते हैं। इनमें भी सबसे अधिक प्रभावित आयु वर्ग 21 से 40 वर्ष के बीच है।  यह भी देखने में आया है कि 52-55 प्रतिशत ट्रैक हादसे शाम 6 बजे से लेकर सुबह 6 बजे के बीच होते हैं। इन बारह घंटों में रोशनी और दृश्यता सबसे कम होती है। इसके कारण रेल पार करते समय सामने से आ रही ट्रेन दिखाई नहीं पड़ती है और हादसा हो जाता है। इन हादसों में अधिकांश मौतों का कारण सिर पर गंभीर चोट या अंगों का कुचला जाना है।  ऐसे हादसों में सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सा कमर से नीचे का अंग होता है। 

हरियाणा में नहीं, बल्कि दूसरे प्रदेशों में लोग समय बचाने के लिए शॉर्टकट अपनाते हैं। लोग भारी सामान के साथ पैदल चलने में परेशानी होने या पैदल पार पुल तक जाने में दिक्कत या आलस के कारण अक्सर रेलवे ट्रैक पार करते हैं। कई जगहों पर रेलवे ट्रैक के आर-पार उचित पुल या सब-वे न होना भी इसका एक बड़ा कारण है। लोग निर्धारित पुल या सब-वे का उपयोग करने के बजाय एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म या कॉलोनी के दूसरी ओर जाने के लिए सीधा ट्रैक पार करना आसान समझते हैं।

Wednesday, June 17, 2026

पुरस्कार का असली विजेता कौन है?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सेवा भावना ग्रंथों या पुस्तकों से नहीं उपजती है। सेवा करने के लिए किसी विशेष अवसर की भी जरूरत नहीं होती है। जब भी मौका मिले, सेवा जरूर करनी चाहिए। प्राचीनकाल में एक संत ने बच्चों में सेवा भावना जगाने के लिए एक विद्यालय खोला। उनके विद्यालय खोलने का उद्देश्य ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण करना था, जो समाज की सेवा कर सकें। 

उन्होंने अपने विद्यालय में बच्चों को सभी विषयों की शिक्षा देने के साथ-साथ लोगों की सेवा करने की भी प्रेरणा दी। वह हर विद्यार्थी से यही उम्मीद करते थे कि वह सभी जीव जंतुओं की सेवा करेगा। विद्यालय चलते हुए काफी दिन बीत गए थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि यह देखा जाए कि हमारे शिष्यों ने अब तक कितना सीखा है। उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। वाद-विवाद का विषय था-जीवों पर दया और प्राणी मात्र की सेवा। 

प्रतियोगिता शुरू हुई। किसी ने कहा कि प्राणी मात्र की सेवा के लिए संसाधनों का होना बहुत जरूरी है। जीवों पर भी दया करने के लिए इंसान में सेवा भावना का होना बहुत जरूरी है। कुछ विद्यार्थियों ने इसके विपरीत मत व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सेवा के लिए केवल भावना होनी चाहिए, संसाधन अपने आप जुट जाते हैं। जब प्रतियोगिता के पुरस्कार का समय आया, तो संत ने एक ऐसा छात्र को विजेता घोषित किया जो उपस्थित नहीं था। 

सबने इसका विरोध किया, तब संत ने कहा कि मैंने प्रतियोगिता के समय जानबूझकर एक घायल बिल्ली को द्वार पर छोड़ दिया था। सबने उस बिल्ली को देखा और अंदर आ गए, लेकिन एक छात्र ने उस बिल्ली की सेवा की, उसके घाव पर औषधि का लेप किया। कुछ स्वस्थ होने पर वह बिल्ली को सुरक्षित जगह पर छोड़ आया। ऐसे में आप लोग बताएं पुरस्कार का विजेता कौन है? यह सुनकर सबके सिर शर्म से झुक गए।

हरियाणा में साढ़े तीन लाख लोग अकेले रहने को अभिशप्त


अशोक मिश्र

अकेलापन महसूस करना और अकेले रहना, दोनों अगल-अलग बाते हैं। कई लोग भरे पूरे परिवार में रहते हैं, हंसते-बोलते, बतियाते हैं, लेकिन मन से वह कुछ समय के लिए ही सही अपने को अकेला महसूस करते हैं। ऐसा तब होता है, जब व्यक्ति का अपने परिवार से जुड़ाव कम होता है। वह अपने परिवार के प्रति आत्मीय नहीं रह जाता है। वहीं, बहुत सारे लोग ऐसे भी होते हैं, जो किन्हीं परिस्थितियों के कारण अकेले रह जाते हैं। हरियाणा में 3.54 लाख से अधिक लोग अकेले रह रहे हैं। 

अकेले रहने वाले इन नागरिकों की पहचान के लिए सत्यापन अभियान चलाया गया है। इस अभियान के माध्यम से उनकी पात्रता और आय से संबंधित आंकड़े इकट्ठे किए जा रहे हैं। परिवार पहचान पत्र में 354215 लोगों ने अपने को अकेला दर्शाया है। इनमें से 1,90,112 लोगों की सालाना आय 1.80 लाख रुपये से कम दिखाई गई है। अब तक 1,66,240 एकल व्यक्तियों का बीपीएल श्रेणी में सफलतापूर्वक सत्यापन किया जा चुका है। बाकी बचे लाभार्थियों का सत्यापन कार्य जारी है। वैसे तो इस सत्यापन का वास्तविक उद्देश्य यही बताया गया है कि सत्यापन के माध्यम से पात्र व्यक्तियों तक सरकारी सुविधाओं को पहुंचाया जाए। 

समय समय पर सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचाया जाए, ताकि अकेले रहने वाले लोगों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। समाज में सबसे ज्यादा परेशानी का सामना अकेले रहने वाले लोग ही करते हैं। पत्नी या पति की मौत हो जाने, तलाक लेने या दूसरे कारणों से अकेले रहने वालों के सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं। पति या पत्नी की मौत हो चुकी है, अवस्था भी ढल रही है। निस्संतान हैं या संतान की शादी हो चुकी है और वह दूसरे शहर या देश में रह रहा है। 

ऐसी स्थिति में यदि अकेले रहने वाले व्यक्ति के साथ कुछ अघटित घटता है, तो उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं होता है। कई बार ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं कि अकेले रहने वाले की किन्हीं परिस्थितियों में मौत हो गई। पड़ोसियों को तब पता चला,जब उसकी लाश से बदबू उठने लगी। बुढ़ापे में अकेले रहना कितना कष्टकारक है, यह वही जान सकता है जो अकेला रहने को अभिशप्त है। बीमारी के दौरान उसकी मदद करने वाला कोई नहीं होता है। 

कई तरह की बीमारियों से जूझता व्यक्ति ऐसी अवस्था में किससे मदद मांगने जाए। लोग अकेले व्यक्ति को देखते ही मुंह फेर लेते हैं कि कहीं ऐसा न हो, मेडिकल स्टोर से दवा लाने को कह दे। या बाजार से सब्जी अथवा खाने-पीने का सामान लाने को कह दे। कई बार तो बेटा-बेटी, बहू अपने परिवार के बुजुर्ग को अकेले रहने को ही बाध्य कर देते हैं। वह यह नहीं सोचते हैं कि एक दिन वह भी बुजुर्ग होंगे और उनके बच्चों ने उन्हें घर से निकाल दिया, तो वह क्या करेंगे।

Tuesday, June 16, 2026

गधे बचे रहेंगे, तो श्रम बचा रहेगा

व्यंग्य

अशोक मिश्र

गुनाहगार उदास बैठे थे. मैंने उनसे पूछा, क्या हुआ, उस्ताद! किसी ने आपकी भैंस खोल ली है क्या? जो उदास बैठे हैं. उस्ताद ने जिराफ की तरह गर्दन उठाई और बोले, अच्छा यह बताओ? गधा तुम्हारी नजर में क्या है? मैंने अपनी छप्पन इंची छाती फुलाई और जोशीले स्वर में कहा, इस दुनिया का सबसे निकृष्टतम जीव अगर कोई है, तो वह गधा है. गधे से बड़ा गधा कोई दूसरा प्राणी हो ही नहीं सकता. मालिक ने जो बचा खुचा घास भूसा डाल दिया, तो उससे ही गधे ने संतोष कर लिया. न कोई विरोध, न कोई प्रदर्शन. अगर मालिक उसे दाना-पानी देना भूल गया, तो भी ढेंचू-ढेंचू करके आभार जता दिया. जब मालिक को काम लेना हुआ, तो लाद दिया गधे पर गधे भर का बोझ. ढोते रहो बिना कोई उज्र किए. इस संसार में गधा भी कोई प्राणी है.

आज ही प्रभात खबर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित व्यंग्य
गुनाहगार ने पहले तो आश्चर्य से मुझे देखा और फिर बोले, और क्या कहना है तुम्हें गधे के बारे में. मैंने तपाक से कहा, कहना क्या है! इंसानों में जो सबसे ज्यादा नकारा, निकम्मा, काहिल और कामचोर होता है, उसे गधा ही कहा जाता है. बेवकूफ इंसान को तो हर कोई देखते ही कह बैठता है, गधे हो क्या? अरे! यह तो पूरा गधा है. बेवकूफ आदमी को गधे की उपमा ही इसीलिए दी गई क्योंकि गधा भी पूरा बेवकूफ होता है.

काफी देर से उदास बैठे गुनाहगार के चेहरे पर अब क्रोध की लालिमा छाने लगी थी. उन्होंने तल्ख लहजे में मुझे घूरते हुए कहा कि तुम गधे की मेहनती प्रवृत्ति का अपमान कर रहे हो. जानते हो, गधा श्रम का प्रतीक है. दुनिया भर में गधा हमेशा सम्मान का पात्र रहा है. वह जीवन भर परिश्रम करता है. मालिक जिस दशा में रखता है, उसी दशा में रह लेता है, लेकिन मजाल है कि वह रत्ती भर चूं करे. यही उसकी खासियत है. श्रम की महत्ता सदियों से रही है, आगे भी रहेगी. गधे का अपमान करने का मतलब है कि श्रम का अपमान करना. श्रम की ही वजह से आज यह  खूबसूरत दुनिया वजूद में है. श्रम चाहे इंसान का हो या गधे का, सम्माननीय है.

सांस लेने के लिए गुनाहगार पल भर के लिए रुके. फिर बोले, तुम जानते हो, डायनासोर की ही तरह कुछ दशकों बाद गधे विलुप्त हो जाएंगे. यदि गधे विलुप्त हो गए, तो तुम जैसे निकृष्ट इंसानों को गधे की उपमा कैसे दी जाएगी. गधों के विलुप्त होने का मतलब है कि श्रम का विलुप्त हो जाना है. ऐसा हुआ, तो यह कोई छोटी-मोटी घटना नहीं होगी. पूरी प्रकृति में वैसा ही बदलाव आएगा जैसा डायनासोरों के विलुप्त होने पर आया था. यही सोचकर सरकार ने गधों को पालने पर लाखों रुपये देने की घोषणा की है. सोचता हूं कि गांव में जितने भी खेत हैं, उनमें एक गधा बाड़ा बनवाऊं और सौ-सवा सौ गधे पाल लूं. उन गधों की देखभाल के लिए तुम जैसा कोई गधा नौकर रख लूं. गधों को विलुप्त होने से बचाना, इंसानी फर्ज है. गधे बचे रहेंगे, तो श्रम बचा रहेगा, मालिक के प्रति वफादारी बची रहेगी. यह हंसती-खिलखलाती दुनिया बची रहेगी. वरना सब चौपट ही समझो.

विश्वास हो, तो सफलता जरूर मिलती है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र 

अगर मन में विश्वास हो और कुछ कर गुजरने की अभिलाषा तो संकट से हमेशा मुक्ति पाई जा सकती है। यदि कोई कार्य कठिन लग रहा हो, तो उस कार्य को भी पूरा किया जा सकता है। इसके लिए विश्वास और लगन के साथ-साथ धैर्य की भी जरूरत होती है। 

कहते हैं कि किसी नगर में एक युवक ने व्यापार करना शुरू किया। पंूंजी छोटी थी, लेकिन अपने मृदु स्वभाव और बातचीत की निपुणता के चलते उसका व्यापार चल निकला। कुछ वर्षों में ही वह अपने नगर का सबसे अमीर व्यापारी हो गया। उसने नौकर चाकरों से अपना काम कराना शुरू किया। धीरे-धीरे उस युवक का स्वभाव भी बदलना शुरू हो गया। उसे अपने धन पर काफी अभिमान हो गया। 

अब उसका स्वभाव भी काफी कर्कश हो चुका था जिसकी वजह से लोगों ने अब बातचीत करना भी कम कर दिया था। इसी दौरान उसके व्यापार में बहुत अधिक घाटा हुआ। वह एक दिन हताश होकर एक पार्क में बैठा हुआ था, तो उसके बगल में बैठे एक बुजुर्ग ने पूछा, तुम इतने उदास क्यों हो? युवक ने अपनी सारी दास्तान कह सुनाई। बुजुर्ग ने पूछा कि तुम्हें कितने रुपये मिल जाएं जिससे तुम अपना कारोबार पुन: शुरू कर सको। उस युवक ने कहा कि दस लाख रुपये। बुजुर्ग ने दस लाख रुपये का चेक उसे दे दिया। 

एक साल बाद पार्क में मिलने का वायदा करके बुजुर्ग चला गया। घर पहुंचने पर युवक ने सोचा कि मैं इस चेक को भुनाऊंगा नहीं। पहले अपने पास जो पूंजी बची है, उससे काम करूंगा। धीरे-धीरे उसका काम चल निकला। अब वह पहले से भी अच्छी स्थिति में था। एक साल बाद युवक उसी पार्कमें पहुंचा तो देखा कि बुजुर्ग आ रहा है। उसके पीछे एक नर्स और दो युवक थे। नर्स ने बताया कि यह बुजुर्ग पागलखाने से भाग निकला है। अपने को अमीर समझकर लोगों को चेक बांटता रहता है। तब युवक की समझ में आया कि उसके पास दस लाख रुपये होने का विश्वास था, इसी वजह से उसे सफलता मिली।

बेसहारा पशुओं की सड़कों पर धमाचौकड़ी, हादसों का डर

अशोक मिश्र

हरियाणा के किसी भी जिले की सड़क पर एक घंटा घूम आइए, कोई न कोई बेसहारा पशु सड़कों पर मिल ही जाएगा। बेसहारा पशु जिसमें गौवंश, सांड और कुत्ते आते हैं, हर सड़क पर लोगों को परेशान करते और डराते हुए मिल जाएंगे। वैसे मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी कई बार हरियाणा की सड़कों को बेसहारा पशुविहीन करने का दावा कर चुके हैं, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है। 

एक अनुमान के मुताबिक केवल फरीदाबाद शहर में ही करीब दस हजार बेसहारा पशु सड़कों पर घूमते हैं। राज्य की सड़कों पर घूमने वाले बेसहारा पशु ट्रैफिक में बाधा तो बनते ही हैं, लोगों के लिए जानलेवा भी साबित होते हैं। बेसहारा पशु सड़कों पर अचानक दौड़ पड़ते हैं जिससे सड़कों पर चल रहे वाहन चालक हड़बड़ा जाते हैं और हादसा कर बैठते हैं। इन पशुओं के आगे पीछे चल रहे लोग भी चपेट में आकर या तो अपनी जान गंवा बैठते हैं या फिर जीवन भर के लिए दिव्यांग हो जाते हैं।

राज्य में पिछले पांच वर्षों में आवारा पशुओं के कारण हुए हादसों में नौ सौ से अधिक लोगों की मौत हुई है और तीन हजार से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। पिछले पांच साल में हुए आंकड़ों को देखा जाए तो राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार हरियाणा में 3300 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। हर महीने औसतन 10 लोगों की मौत बेसहारा पशुओं के हमलों या उनसे टकराने के कारण हुई है। शहरी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों और गायों के कारण प्रतिदिन औसतन 15 से ज्यादा शिकायतें हेल्पलाइन पर आती हैं। बेसहारा पशुओं में आने वाले कुत्ते भी लोगों के लिए भारी मुसीबत का कारण बन रहे हैं। 

प्रदेश में कई लाख कुत्ते ऐसे हैं जो सड़कों पर आवारा घूमते हैं। यह कई बार झुंड बनाकर बच्चों और बुजुर्गों पर हमला करते हैं। ऐसे हमलों में काफी लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पिछले दिनों सुप्रीमकोर्ट ने भी हस्तक्षेप करके सड़कों पर घूमने वाले कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने का आदेश जारी किया है। सड़कों पर घूमने वाले कुत्तों के बंध्याकरण का भी निर्देश दिया है। 

कोर्ट के निर्देश पर हरियाणा सरकार भी बेसहारा पशुओं से होने वाले हादसों में मरने और घायल होने वालों को मुआवजा देती है।  हरियाणा में बेसहारा पशुओं के हमले या काटने से होने वाली मौतों और गंभीर चोटों पर हाईकोर्ट के आदेशानुसार आर्थिक मुआवजा (कुत्ते के काटने पर दस हजार रुपये और हमले में चोटिल होने पर बीस हजार रुपये तक) देने का प्रावधान किया गया है। प्रदेश में आवारा पशुओं को पकड़कर नंदीशालाओं और गौशालाओं में भेजने के लिए राज्य में लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद बेसहारा पशुओं के हमले रुक नहीं रहे हैं। इसका कारण यह है कि बेसहारा पशुओं की संख्या बहुत अधिक है और नंदीशालाओं-गौशालाओं में जगह कम है।

Monday, June 15, 2026

क्यों ना मौत की खुशी से स्वागत किया जाए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जीवन का हर पल कीमती है और उसका उपयोग करना चाहिए। जीवन का कोई भरोसा नहीं है, पता नहीं कब मौत आ जाए। संसार में वही लोग सुखी रहते हैं, जो अपने जीवन को सहजता से जीते हैं। एक बार की बात है।

 किसी राज्य का राजा किसी बात पर अपने मंत्री से नाराज हो गया। वैसे मंत्री ने कोई बड़ा अपराध नहीं किया था, लेकिन राजा ने अपने सैनिकों को बुलाकर कहा कि आज शाम तक मंत्री को फांसी पर लटका दो। राजा को मंत्री की कोई बात हृदय में चुभ गई थी, इसीलिए वह मंत्री से नाराज हो गया था। 

राजा की बात सुनकर सारे दरबारी चकित रह गए क्योंकि मंत्री ने कई बार अपने अमूल्य सुझावों से राजा को फायदा पहुंचाया था। लेकिन राजा का आदेश कोई भला कैसे टाल सकता था। सैनिक उस मंत्री के घर पहुंचे, तो मंत्री अपने रिश्तेदारों और परिवार वालों के साथ उत्सव मना रहा था। उस मंत्री का उस दिन जन्मदिन था। सैनिकों ने जब राजा का आदेश सुनाया, तो परिवार और रिश्तेदार दुखी हो गए। उत्सव मनाना रोक दिया गया। 

तब मंत्री ने कहा कि फांसी तो शाम को लगनी है। तब तक का समय तो है न हमारे पास। तो फिर उत्सव बंद क्यों किया जाए। लोगों ने उत्सव मनाना शुरू कर दिया। लेकिन मन ही मन सारे लोग उदास थे। यह बात जब सैनिकों ने राजा को बताई तो राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। 

उन्होंने मंत्री को बुलाया, तो मंत्री ने कहा कि आपने शाम तक का समय दिया,यह आपकी कृपा है। ऐसी स्थिति में मैं बचा हुआ समय अपने परिवार के साथ बिताना चाहता हूं। मेरे लिए एक-एक पल बहुत कीमती है। जब मौत होनी ही है, तो क्यों न खुशी से मौत का स्वागत किया जाए। यह सुनकर राजा ने मंत्री की सजा को माफ कर दिया।

धान की खेती करें, लेकिन पानी को बरबाद होने से भी बचाएं

अशोक मिश्र

धान की रोपाई करने पर हरियाणा सरकार की ओर से लगाई गई पाबंदी आज यानी 15 जून को समाप्त हो जाएगी। कल के बाद किसान अपनी सुविधानुसार धान की रोपाई कर सकेंगे। हरियाणा में पिछले कुछ दशकों से भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है जिसकी वजह से साठ दिन में पैदा होने वाले धान की रोपाई पर प्रदेश सरकार ने 15 जून तक रोपाई पर प्रतिबंध लगा रखा है। 

वैसे भी प्रदेश के लगभग सभी जिलों में लगातार गिरता भूजल स्तर राज्य सरकार, कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। राज्य सरकार हर संभव प्रयास कर रही है कि लगातार गिरते भूजल स्तर को रोका जाए और लोगों को होने वाली पानी की कमी की समस्या को दूर किया जाए। आज हालात यह है कि हरियाणा में दिनोंदिन गिरता भूजल स्तर एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण यहाँ पानी का अत्यधिक दोहन होता है, जिसके चलते लगभग 88 ब्लॉक 'अति-शोषित' (डार्क जोन) की श्रेणी में आ चुके हैं। 

पानी की किल्लत के कारण हजारों नलकूप सूख चुके हैं। प्रदेश के लगभग 14 जिलों की स्थिति चिंताजनक है, जहाँ भूजल स्तर 30 मीटर से भी नीचे चला गया है। महेंद्रगढ़, कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, अंबाला, हिसार और जींद में भूजल का दोहन सबसे अधिक हुआ है। यही वजह है कि प्रदेश सरकार धान की जगह मक्का, बाजरा और दलहन जैसी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा दे रही है। इतना ही नहीं, सरकार इसके लिए किसानों को प्रोत्साहन राशि भी देती है। सरकार चाहती है कि प्रदेश में धान की फसल कम से कम उगाई जाए ताकि पानी की बचत हो सके। एक बीघा धान बोने से लेकर फसल तैयार होने तक औसतन तीन से पांच लाख लीटर पानी खर्च होता है। 

इतना पानी खर्च करने के बाद अगर धान की फसल तैयार होती है, तो पूरे प्रदेश में धान की फसल पर कितना पानी खर्च होता है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रदेश में लगातार गिरते भूजल स्तर का एक प्रमुख कारण धान की खेती भी है। लेकिन यदि किसान चाहें तो आधुनिक तकनीक से पानी की खपत को काफी कम कर सकते हैं। सीधी बुवाई करने से धान की फसल उगाने पर खर्च होने वाले पानी की पचास से साठ प्रतिशत बचत की जा सकती है। 

ड्रिप इरीगेशन विधि से धान उगाने पर पानी का वाष्पीकरण कम होता है और सिंचाई पर होने वाला पानी और खर्च दोनों बचते हैं। लेकिन ज्यादातर किसान ऐसा नहीं सोचते हैं। वह धान की अगेती फसल बोकर जल्दी से जल्दी खेत खाली कर लेना चाहते हैं ताकि अगली फसल आलू, सरसों जैसी फसलों को बोकर ज्यादा कमाई की जा सके। अगेती फसल में धान के प्रमुख कीटों और बीमारियों का प्रकोप बहुत कम देखने को मिलता है। लेकिन किसानों को यह सोचना चाहिए कि धान की खेती करने पर पानी की होने वाली बरबादी कम नहीं है। पानी की बरबादी राष्ट्र का नुकसान है।

Sunday, June 14, 2026

गलती मान लेने वाले लोग बड़ा काम करते हैं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा गांधी ने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले को समर्पित एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम है धर्मात्मा गोखले। गोखले कांग्रेस में नरम दल के नेता माने जाते थे। उन्हें भारत को स्वाधीन कराने के लिए प्रतिक्रियावादी या क्रांतिकारी तरीका पसंद नहीं था। 

यही वजह है कि वह गरम दल के नेताओं के विचारों के विरोधी थे। इसके बावजूद जब 1907 में गरम दल के नेता लाला लाजपत राय को अंग्रेजों ने म्यामार के माडले जेल में कैद कर लिया, तो गोखले ने उनकी रिहाई के लिए आंदोलन चलाया था। गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को वर्तमान महाराष्ट्र (तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा) के कोटलुक गाँव में हुआ था।

इनके बचपन का एक किस्स है। हुआ यह कि एक दिन गणित के अध्यापक ने क्लास में सभी बच्चों को एक सवाल हल करने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि जो इस सवाल को हल कर लेगा, उसे पुरस्कार दिया जाएगा। सभी बच्चे सवाल हल करने लगे। लेकिन किसी को इसका हल नहीं सूझ रहा था। सवाल वाकई कठिन था। क्लास में काफी सन्नाटा था। काफी देर गोखले अपनी सीट से उठे और अध्यापक को अपनी कापी सौंप दी। अध्यापक ने देखा कि सवाल का उत्तर वाकई सही था। 

अगले दिन जब पुरस्कार देने की बारी आई, तो गोखले अपने अध्यापक के पैरों से लिपट गए और रोते हुए बोले, मैं इस पुरस्कार के लायक नहीं हूं क्योंकि मैंने उस सवाल का उत्तर किताब से नकल किया था। अध्यापक ने कहा कि मुझे दुख इस बात का नहीं है कि तुमने उत्तर नकल किया। लेकिन इस बात की खुशी है कि तुमने आखिर में सच बोल दिया। गलती मान लेने वाले लोग जीवन में कुछ बड़ा काम करते हैं।