Friday, September 11, 2026

यहां कोई किसी का नहीं होता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध जातक कथाओं में अश्मक महाजनपद के राजा अस्सक की एक कथा है। प्राचीन काल में अश्मक राज्य वर्तमान महाराष्ट्र और तेलंगाना क्षेत्र के बीच में गोदावरी नदी के तट पर स्थित था। पोटली इसकी राजधानी थी। राजा अस्सक की महारानी उब्बरा बहुत ही सुंदर थी। एक बार वह बीमार पड़ी तो सबने उसके स्वस्थ होने की प्रार्थना की। 

महारानी ने भी प्रार्थना की कि या तो मृत्यु हो जाए या फिर वह स्वस्थ हो जाए। लेकिन कोई प्रार्थना काम नहीं आई। उब्बरा की मौत हो गई। महाराज उब्बरा से बहुत अधिक प्रेम करते थे। वह अपनी महारानी की मृत्यु के बाद लगभग विक्षिप्त हो गए। वह केवल रोते रहते थे। महारानी का शव तेल में भिगोकर रख दिया गया ताकि खराब न हो। उन्हीं दिनों बोधिसत्व अश्मक राज्य में पहुंचे और उन्होंने माणवक नामक आदमी से पूछा कि पूरे राज्य में यह उदासी क्यों छाई हुई है। माणवक  ने सारी कथा सुनाई। तब बोधिसत्व ने कहा कि अपने राजा से जाकर कहो कि मैं जानता हूं, उनकी उब्बरा कहां है। यह बात सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। 

वह पालकी पर बैठकर बोधिसत्व के पास पहुंचा। उसने आतुरता से पूछा कि मेरी उब्बरा कहां है? बोधिसत्व ने योगबल से गुबरैले के रूप में जन्मी उब्बरी को वहां बुलाया और राजा को दिखाते हुए कहा कि यह देखो, तुम्हारी उब्बरा जो उस गुबरैले के पीछे आकर्षित होकर भागती जा रही है। बोधिसत्व ने गुबरी से पूछा, उब्बरा पूर्व जन्म में तुम कौन थी? गुबरी ने जवाब दिया-मैं राजा अस्सक की पटरानी थी। उस जन्म में मेरा पति परमेश्वर था। लेकिन इस जन्म में यह गुबरैला ही मेरा साथी है। 

तब बोधिसत्व ने राजा से कहा कि यहां कोई किसी का नहीं है। जब तक जीवन है,तब तक सभी अपने हैं। जीवन खत्म होने के बाद सारे रिश्ते नाते टूट जाते हैं। यहां कोई किसी का नहीं होता है। यह सुनकर राजा अस्सक को अपनी भूल का पता चला। उसने मोह त्यागकर उब्बरा का दाह संस्कार किया और अपनी प्रजा के हित में लग गया।

हवा साफ करने के लिए सबसे पहले नीयत साफ करना जरूरी

अशोक मिश्र

दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण रोकने के लिए जारी दिशा निर्देश का पालन न करने पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने  हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जाहिर की है। सीएक्यूएम ने इस संबंध में जवाब मांगा है। हरियाणा के जिलों में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। वायु स्वच्छ न होने की वजह से लोगों की सांसें घुटती जा रही हैं। कई प्रकार की बीमारियों से लोग पीड़ित हो रहे हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी सीएक्यूएम का हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताना और जवाब तलब करना कोई नई बात नहीं है। यह उस पुरानी और सड़ी हुई व्यवस्था का एक और प्रमाण है जहाँ दिशा निर्देश केवल कागजों पर जारी होते हैं और जमीन पर धूल बनकर उड़ जाते हैं। 

ग्रेड रिस्पांस एक्शन प्लान लागू होता है, बैठकें होती हैं, चेतावनियां दी जाती हैं, लेकिन फरीदाबाद, गुरुग्राम, पानीपत, सोनीपत और बहादुरगढ़ में एक्यूआई मीटर चार सौ पार कर जाता है तो सवाल सिर्फ हवा का नहीं रह जाता, सवाल पूरी प्रशासन प्रणाली की नीयत का बन जाता है। फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं पर कैमरे लगे हैं पर कैमरे बंद हैं, ईंट भट्ठों को जिगजैग तकनीक पर लाने का आदेश है पर रिश्वत देकर पुराने भट्ठे ही चल रहे हैं, कंस्ट्रक्शन साइट पर पानी का छिड़काव अनिवार्य है पर बिल्डर पानी की टंकी ही गायब कर देते हैं। 

यह लापरवाही नहीं, यह मिलीभगत है। सरकार को राजस्व चाहिए, उद्यमी को मुनाफा चाहिए और बीच में बोर्ड एक कमजोर मध्यस्थ बनकर रह गया है जो केवल नोटिस भेजता है और फाइल बंद कर देता है। हरियाणा के कई जिलों में वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है और लोग सांस लेने के लिए जूझ रहे हैं। बच्चे, बुजुर्ग और श्वसन रोगियों की तकलीफ बढ़ रही है, जबकि जिम्मेदार एजेंसियां कागजी कार्रवाई में उलझी नजर आती हैं। राज्य के लोग भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं। 

निजी वाहनों का अत्यधिक उपयोग, कचरा जलाना, खुले में कूड़ा फेंकना और जागरूकता की कमी प्रदूषण में योगदान देती है। जब नागरिक स्वयं नियमों का उल्लंघन करते हैं तो व्यवस्था पर सवाल उठाना एकतरफा हो जाता है। उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने, उत्सर्जन मानकों का पालन करने और आॅनलाइन निगरानी प्रणाली से जोड़ने के लिए समयबद्ध दबाव डालना होगा। सड़कों पर धूल नियंत्रण, मैकेनाइज्ड स्वीपिंग, कचरा प्रबंधन और पराली जलाने पर प्रभावी रोक को मजबूत करना चाहिए।

वायु प्रदूषण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह एक प्रबंधित आपदा है। इसका भुगतान आज दमा के मरीज, स्कूल जाते बच्चे और खेत में काम करने वाले मजदूर अपने फेफड़ों से कर रहे हैं। जब तक सरकार निर्देश जारी करने को ही काम मानती रहेगी, उद्यमी अनुपालन को खर्चा समझता रहेगा और नागरिक को केवल दोषी ठहराया जाता रहेगा, तब तक हर सर्दी में वही घुटन लौटेगी। हवा को साफ करने के लिए पहले नीयत को साफ करना पड़ेगा।

Thursday, September 10, 2026

व्रतधारी बनो, संकल्प लो और आगे बढ़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महानगरी तक्षशिला को दुल्हन की भांति सजाया गया था। नगर का हर निवासी महात्मा बुद्ध के दर्शन का अभिलाषी था। उससे भी ज्यादा चर्चा दस्यु अंगुलिमाल की थी जिसने तथागत के संपर्क में आने के बाद प्रव्रज्या धारण कर ली थी। लोग यह जानना चाहते थे कि अहिंसक के रूप में तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण करने वाला युवक दस्यु से भिक्षुक बनने के बाद कैसा दिखता है। श्रावस्ती के घने वन में पहली मुलाकात के बाद ही अंगुलिमाल ने दस्यु वृत्ति त्याग दी थी।

 तक्षशिला में अपने नवदीक्षित शिष्य अंगुलिमाल के साथ तथागत ने प्रवेश किया, तो जनों ने पुष्प वर्षा से उनका स्वागत किया। शाम को जब धर्म सभा शुरू हुई तो महात्मा बुद्ध  ने अंगुलिमाल की कथा बताते हुए कहा कि अंगुलिमाल का पूर्व कर्म उन लोगों से श्रेष्ठ था जो अव्रती हैं। उसने एक हजार अंगुलियों के संग्रह का व्रत धारण किया था। यद्यपि उसका व्रत और तरीका दोनों ही गलत थे क्योंकि इस कर्म में हिंसा थी। 

लेकिन जो लोग बिना किसी व्रत या उद्देश्य के अपना जीवन बिताते चले आ रहे हैं, उनसे अपने जीवन में कोई न कोई उद्देश्य रखने वाला श्रेष्ठ है। जो लोग व्रतहीन जीवन व्यतीत करते हैं, वह अपना जीवन अकारण बिताते हैं। दस्यु वृत्ति वाले जीवन को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह अमानवीय था। व्रतहीन व्यक्ति को आत्म तुष्टि से वंचित होना पड़ता है, आत्म तृप्ति से भी। 

अंगुलिमाल की व्रत निष्ठा से ही सद् और असद् के बीच के अंतरद्वंद्व में सद् की विजय हुई है। प्रेरणाहीन मन भूमि वाला व्यक्ति अंगुलिमाल के पूर्व कर्म से भी ज्यादा पतित है। इसलिए व्रतधारी बनो, संकल्प लो और आगे बढ़ो।

संवाद और आपसी समझ से दूर किया जा सकता है भाषा विवाद

अशोक मिश्र

फरीदाबाद में महिला आयोग की सोमवार को शुरू हुई दो दिवसीय कार्यशाला ‘शी इज ए चेंज मेकर’ में केरल विधानसभा की उपाध्यक्ष और कुछ महिला विधायकों द्वारा हिंदी में संचालन का विरोध किया गया। यह उस लंबे भाषा-विवाद की एक छोटी सी झलक है जो आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति और समाज के साथ चल रहा है। केरलम विधानसभा की उपाध्यक्ष सहित कई महिला विधायकों ने कार्यक्रम छोड़ दिया क्योंकि सत्र मुख्य रूप से हिंदी में चलाए जा रहे थे और अनुवाद की कोई व्यवस्था नहीं थी। 

विरोध करने वाली विधायकों ने कहा कि दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के प्रतिभागियों के लिए सामग्री समझना कठिन हो गया था। ऐसे विवाद की जड़ में इतिहास है। उससे भी ज्यादा इस मामले में गलतफहमी है। संविधान में कहीं भी हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है, अनुच्छेद 343 में उसे संघ की राजभाषा कहा गया है और अंग्रेजी को सह-राजभाषा के रूप में जारी रखने की व्यवस्था की गई थी। 


1965 में जब अंग्रेजी को हटाने की बात आई तो तमिलनाडु में बड़ा आंदोलन हुआ और अंतत: त्रिभाषा फार्मूला लाया गया। उत्तर भारत ने हिंदी को स्वाभाविक रूप से अपना लिया क्योंकि वह उसकी बोलियों के करीब थी, जबकि दक्षिण में हिंदी को एक नई, ऊपर से थोपी गई भाषा के रूप में देखा गया। वहीं से यह भावना बनी कि हिंदी थोपने का अर्थ है उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व थोपना। केरल की उपाध्यक्ष और अन्य विधायकों को हिंदी न समझ पाने की तकलीफ वास्तविक हो सकती है, उन्हें सच में हिंदी समझने में कठिनाई हुई हो, लेकिन उस वास्तविक कठिनाई को तुरंत एक राजनीतिक नैरेटिव में बदल देना ही राजनीति है। 

उन्हें ऐसा करने से हर हालत में बचना चाहिए था। हिंदी-भाषी क्षेत्रों में कभी-कभी यह भावना रहती है कि हिंदी सबसे व्यापक भाषा है इसलिए उसे राष्ट्र की एकता का माध्यम बनाना स्वाभाविक है। दोनों पक्षों के पास तर्क हैं। एक ओर विशाल आबादी हिंदी समझती या बोलती है, दूसरी ओर देश में बाईस अनुसूचित भाषाएं हैं। कई राज्य अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं। जब राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में केवल एक भाषा का इस्तेमाल होता है तो गैर-हिंदी भाषी प्रतिनिधि खुद को बाहर महसूस करते हैं। 


यह असुविधा वास्तविक है। इस समस्या का समाधान संभव है लेकिन इसके लिए व्यावहारिक सोच की जरूरत है। राष्ट्रीय कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से बहुभाषी व्यवस्था होनी चाहिए। हिंदी के साथ अंग्रेजी और जरूरत पड़ने पर अन्य प्रमुख भाषाओं में अनुवाद की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। प्रौद्योगिकी आज इतनी आगे बढ़ चुकी है कि वास्तविक समय का अनुवाद संभव है। फरीदाबाद वाली घटना याद दिलाती है कि राष्ट्रीय मंचों पर सबको बराबर भागीदारी का मौका मिलना चाहिए। 

जब प्रतिभागी अपनी बात समझ सकें और रख सकें तभी कार्यक्रम सार्थक बनते हैं। भाषाई संवेदनशीलता और व्यावहारिक व्यवस्था दोनों अपनाकर इस पुराने विवाद को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है। राजनीति अगर इसे और उलझाएगी तो समस्या बनी रहेगी, अगर संवाद और सुविधा पर ध्यान देगी तो समाधान की दिशा खुलेगी।

Wednesday, September 9, 2026

अहिंसक बन गया दस्यु अंगुलिमाल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध ग्रंथ मज्झिम निकाय 86 में एक कथा कही गई है। कहते हैं कि श्रावस्ती (सावत्थी) में एक प्रतिष्ठित परिवार रहता था। उसका एक मात्र पुत्र था अहिंसक। अहिंसक के बचपन में ही किसी ने भविष्यवाणी की थी कि वह बड़ा होकर दुर्दांत दस्यु बनेगा। पुत्र दस्यु न बने, यही सोचकर उसकी मां ने नाम रखा था अहिंसक। 

समय आने पर उसके माता-पिता ने अपने पुत्र को पढ़ने के लिए तक्षशिला भेजा। वहां पहुंचने पर जब अहिंसक की शिक्षा प्रारंभ हुई, तो वह पढ़ने-लिखने में अपने सहपाठियों से कहीं ज्यादा आगे निकल गया। इसे कुछ विद्यार्थियों को उससे बड़ी ईर्ष्या हुई। उन्होंने कई ग्रुप बनाकर एक आलसी छात्र निंगा के नेतृत्व में आचार्य से अहिंसक की शिकायत की। पहले तो आचार्य ने छात्रों की बात पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह अहिंसक की तीक्ष्ण बुद्धि और प्रतिभा के कायल थे। 


लेकिन जब उसकी बार-बार शिकायत आने लगी तो वह अहिंसक से नाराज हो उठे। उन्होंने जब शिक्षा पूर्ण होने वाली थी, तो उससे एक हजार लोगों की अंगुलियों को गुरु दक्षिणा में मांगी। अहिंसक ने इसका विरोध किया, लेकिन आचार्य नहीं माने। वह गुरु दक्षिणा पूर्ति के लिए दुर्दांत डाकू बन गया। बौद्ध ग्रंथों से इतर यह भी कहा जाता है कि आचार्य पत्नी अहिंसक के रूप-सौंदर्य के प्रति आकर्षित थीं और प्रणय निवेदन अस्वीकार करने की वजह से उन्होंने अपने पति को उकसाकर ऐसी गुरु दक्षिणा मांगने पर विवश किया था। इस तरह एक निर्दोष युवक अंगुलिमाल दस्यु बन गया।

वहीं कुछ ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि तक्षशिला के छात्रों ने अहिंसक और गुरु पत्नी में अवैध संबंधों का आरोप लगाया था जिसकी वजह से आचार्य ने ईर्ष्यावश अहिंसक को दस्यु बनने के लिए मजबूर कर दिया था।

वायु स्वच्छता के लिए नागरिकों की सक्रिय सहभागिता जरूरी


अशोक मिश्र

देश के 130 शहरों में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम यानी एनसीएपी के तहत शहरों की कार्य योजना के क्रियान्वयन के आधार पर पर्यावरण मंत्रालय द्वारा स्वच्छ वायु सर्वेक्षण कराया जाता है। इस साल सर्वेक्षण में हरियाणा की स्थिति मिश्रित रही। दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में फरीदाबाद ने उल्लेखनीय सुधार दिखाते हुए देशभर में 14वां स्थान हासिल किया। यह शहर 2023 में 47वें पायदान पर था। फरीदाबाद ने दिल्ली को भी पीछे छोड़ दिया, जो इसी श्रेणी में 21वें स्थान पर रहा। 

वहीं चंडीगढ़ इस बार 27वें से छलांग लगाकर आठवें स्थान पर पहुंच गया। इससे स्पष्ट है कि एनसीआर से सटे हरियाणा के शहरों में सुधार की गति धीमी है। सरकारी दस्तावेजों में ही वाहन प्रदूषण, औद्योगिक प्रदूषण, सड़कों और खुले क्षेत्रों की धूल, निर्माण और विध्वंस गतिविधियों से धूल, बायोमास जलाना, कृषि पराली जलाना, नगर ठोस कचरा जलाना और लैंडफिल में आग जैसे कारण गिनाए गए हैं। खेती-किसानी के संदर्भ में अक्टूबर-नवंबर में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाना दिल्ली एनसीआर के संकट का बड़ा कारण है। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम, मानेसर, सोनीपत में अनियंत्रित निर्माण, बिना ढके मलबा परिवहन और कच्ची सड़कों से उड़ती धूल पीएम 10 का स्थायी स्रोत बन गई है। फरीदाबाद, पानीपत, गुरुग्राम, धारूहेड़ा बेल्ट में थर्मल पावर प्लांट, ईंट भट्ठे, टेक्सटाइल और रसायन उद्योगों से सल्फर डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन आॅक्साइड निकलते हैं जो हवा में अमोनियम सल्फेट जैसे सेकेंडरी प्रदूषक बनाते हैं। 

एक अध्ययन में कहा गया कि फरीदाबाद, गुरुग्राम, सोनीपत में पीएम 2.5 का लगभग एक तिहाई हिस्सा (33-34 प्रतिशत) इसी सेकेंडरी प्रदूषण से आता है, जो केवल सर्दियों का नहीं बल्कि संरचनात्मक स्थायी संकट है। राज्य में प्रदूषण रोकने के लिए लोगों की सहभागिता अत्यंत जरूरी है। सरकार अकेले इस समस्या से नहीं निपट सकती। नागरिकों को वाहन कम चलाने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, घरों में ऊर्जा बचत करने, कचरा न जलाने और निर्माण के दौरान धूल नियंत्रण का ध्यान रखने की जरूरत है। 

जागरूकता अभियान, स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा और स्थानीय स्तर पर निगरानी समितियां बनाई जाएं तो प्रभावशाली परिणाम मिल सकते हैं।  जन भागीदारी के बिना कोई भी योजना अधूरी रह जाती है। वायु प्रदूषण रोक पाने में हरियाणा सरकार कई मायनों में नाकाम रही है। सर्वेक्षण में कुछ सुधार दिखने के बावजूद वास्तविक वायु गुणवत्ता खराब बनी हुई है। सभी जिले राष्ट्रीय मानकों से अधिक प्रदूषित हैं। सर्दियों में स्थिति गंभीर हो जाती है और कई शहर रेड जोन में चले जाते हैं। यह चुनौती सामूहिक जिम्मेदारी की है जिसमें सरकार, किसान, उद्योगपति और आम नागरिक सभी की सक्रिय भूमिका अनिवार्य है।


Tuesday, September 8, 2026

अच्छे काम का फल अच्छा ही मिलता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ड्वाइड डेविड हाइजनहावर ने द्वितीय विश्व महायुद्ध के दौरान अमेरिकी और ब्रिटिश सेना का नेतृत्व किया था। हाइजनहावर का जन्म 1890 को टेक्सास शहर में हुआ था। वह अपने माता-पिता के सात पुत्रों में से तीसरे थे। बचपन में एक हादसा हुआ था जिससे उनके छोटे भाई की एक आंख चली गई थी जिसका पछतावा उन्हें जीवन भर रहा। 

पहले विश्व महायुद्ध में उन्हें बहुत ज्यादा अपने रणकौशल को दिखाने का मौका नहीं मिला, लेकिन जब दूसरा विश्व महायुद्ध छिड़ा, तो उन्हें मित्र राष्ट्रों की सेना का सर्वोच्च अधिकारी नियुक्त किया गया। युद्ध के दिनों में वह अपने घर से रोज एक निश्चित समय पर सफेद गाड़ी में पेरिस के मुख्य रास्ते से सेना के कैंप आया जाया करते थे। इस बात की खबर किसी तरह जर्मन सैनिकों को मिल गई। 

एक दिन अपने नियत समय पर सफेद गाड़ी निकली। रास्ते में फ्रांसीसी सैनिकों के वेश में जर्मन सैनिक खड़े हो गए। उन्होंने उस गाड़ी को बम से उड़ा दिया। जब यह देखा, तो फ्रांसीसी सैनिकों में हड़कंप मच गया। यह खबर फैल गई कि जनरल आइजनहावर मारे गए। थोड़ी देर बाद लोगों ने देखा कि आइजनहावर पैदल चले आ रहे हैं। लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। 

सैनिक अफसरों ने उनसे पूछा कि आप बम धमाके से बच कैसे गए तो उन्होंने बताया कि जब मैं आ रहा था, तो मैंने रास्ते में देखा कि एक बुजुर्ग दंपति एक अस्पताल का पता पूछ रहे हैं। उनके बेटे का उस अस्पताल में आपरेशन हुआ था। मैंने ड्राइवर से कहा कि तुम गाड़ी लेकर जाओ, मैं इन्हें अस्पताल तक छोड़कर आता हूं। मैं उस बुजुर्ग दंपति को अस्पताल तक छोड़ने के बाद आ रहा हूं। मैं जानता हूं कि नेक काम का फल नेक ही मिलता है।

गरीबी और आवास की भारी कमी के चलते जर्जर इमारतों में रहने की मजबूरी

अशोक मिश्र

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को दोपहर में करीब पचास साल पुरानी एक पांच मंजिला इमारत भरभराकर गिर गई। इसमें छात्रों के पेइंग गेस्ट आवास चल रहे थे। इस हादसे में सात लोगों की जान चली गई और कई घायल हुए। मरम्मत कार्य और पानी जमा होने जैसी वजहें सामने आईं, लेकिन असल में यह घटना अवैध विस्तार, कमजोर संरचना और प्रशासनिक लापरवाही का जीता जागता नमूना थी। पिछले दो-तीन सालों में दिल्ली में ऐसी घटनाएं बार-बार हुई हैं। 

सोलह सालों में इक्कीस प्रमुख इमारत हादसों में एक सौ छत्तीस लोगों की मौत हो चुकी है। हरियाणा की तस्वीर भी इससे अलग नहीं है। मानसून के दिनों में हरियाणा की तस्वीर और भी भयावह हो जाती है। पिछले साल 8 सितंबर 2025 को मुख्यमंत्री सैनी ने बताया था कि भारी बारिश के कारण अलग-अलग जगहों पर मकान गिरने से 12 लोगों की मौत हुई है। इनमें फतेहाबाद और भिवानी में तीन-तीन, कुरुक्षेत्र और यमुनानगर में दो-दो, हिसार और फरीदाबाद में एक-एक मौत शामिल है। 

उसी साल भारी बारिश से छत गिरने की अलग-अलग घटनाओं में सात लोगों, जिनमें तीन बच्चे थे, की मौत की पुष्टि हुई थी। गुरुग्राम, मानेसर, बादशाहपुर, पटौदी जैसे निर्माण हब में हर साल मजदूरों की मौत का सिलसिला अलग चलता रहता है। हरियाणा में तेजी से हो रहा शहरीकरण, अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी इन घटनाओं को बढ़ावा देते हैं। नगर निगम अधिनियम और हरियाणा बिल्डिंग कोड दो हजार सत्रह में खतरनाक इमारतों के लिए प्रावधान हैं। 

आयुक्त या सक्षम अधिकारी जर्जर इमारत को मरम्मत या गिराने का आदेश दे सकते हैं। ऊंची जोखिम वाली इमारतों के लिए संरचनात्मक सुरक्षा उपाय, थर्ड पार्टी निरीक्षण और पोस्ट-कंस्ट्रक्शन आॅडिट अनिवार्य किए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन नियमों को लागू नहीं किया जाता है। कई बार खतरनाक घोषित इमारतों की सूची बनती है, फिर भी समय पर कार्रवाई नहीं होती। पुरानी या कमजोर इमारतों में रहने की मजबूरी आर्थिक दबाव से जुड़ी है। गरीबी, आवास की भारी कमी और वैकल्पिक विकल्प न होना उन्हें जान जोखिम में डालकर रहने को मजबूर करता है। 

कई बार मालिक भी किराये की कमाई के लिए पुरानी इमारतों में अतिरिक्त मंजिलें चढ़ा देते हैं या मरम्मत टालते हैं। ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। यदि हर नगर निकाय हर साल मानसून से पहले ड्रोन और जूनियर इंजीनियरों से हर वार्ड की 30 साल से पुरानी इमारतों की जियो-टैगिंग करे। उसकी सूची सार्वजनिक करे, नोटिस चिपकाने से आगे बढ़कर बिजली-पानी काटकर खाली कराए और मालिक को नब्बे दिन में रेट्रोफिटिंग या री-डेवलपमेंट का विकल्प दे, जिसके लिए हरियाणा में पहले से मौजूद हाउसिंग बोर्ड की सब्सिडी को जोड़ा जा सकता है।

Monday, September 7, 2026

पापों के प्रायश्चित में जुट जाओ


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पता नहीं यह कथा कितनी सही है, लेकिन कहते हैं कि बौद्ध ग्रंथों में इसका जिक्र है। राजगृह में एक चरवाहे की पत्नी बहुत सुंदर और नृत्य-संगीत कला में काफी निपुण थी। उसकी विद्या से राजगृह की अमीर घरों की महिलाएं और कन्याएं ईर्ष्या करती थीं। राजगृह में होने वाले आयोजनों में उस चरवाहे की पत्नी को नृत्य आदि के लिए आमंत्रित किया जाता था। एक बार उत्सव में उसे आमंत्रित किया गया, लेकिन उसने गर्भवती होने की वजह से नृत्य के लिए मना कर दिया। 

उसे सभा में अपमानित करके नृत्य के लिए मजबूर कर दिया गया। इस अपमान से उसके मन में क्रोध पनप उठा। वह जीवन भर इस घटना को मन में दबाए रही। कहते हैं कि अगले जन्म में वह हारीति नाम की यक्षिणी के रूप में पैदा हुई। उसके मन में पूर्व जन्म का प्रतिशोध इस जन्म में भी बना रहा। लेकिन संगीत और नृत्य की प्रतिभा भी बनी रही। प्रतिशोधवश वह राजगृह के अबोध बच्चों को चुराकर उनका खाने लगी। 


बहुत बाद में लोगों को यह पता चला, तो राजगृह नरेश ने उसे बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। जब यह बात महात्मा बुद्ध ने सुनी तो वह चौंक उठे। उन्होंने ध्यान लगाकर उसके पूर्व जन्म के बारे में जाना। उन्होंने राजगृह नरेश से कहकर हारीति को कारागार से मुक्त करवा लिया और उसके बच्चों को चुरा लिया। बच्चे चोरी हो जाने पर वह व्याकुल हो गई। 

अब उसकी समझ में आयाकि उसने जिनके बच्चों का वध किया था। वह कैसे जी रहे होंगे। शोक और व्याकुल अवस्था में वह बुद्ध के पास पहुंची। बुद्ध ने कहा कि तुमने अब तक बच्चों का वध किया है। पाप के प्रायश्चित के लिए बच्चों की रक्षा और विकास में जुट जाओ। इसी से तुम्हें शांति मिलेगी। अपने पाप का प्रायश्चित करने में वह आजीवन लगी रही। जब उसकी मृत्यु हुई तो उसके मन में काफी शांति थी।

मौसमी बीमारियां का खतरा, सफाई कर्मियों की हड़ताल बनी मुसीबत

अशोक मिश्र

इन दिनों बरसात का मौसम और सफाई कर्मियों की हड़ताल दोनों हरियाणा के लिए मुसीबत साबित हो रही है। सफाई कर्मियों की हड़ताल के चलते जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। सड़कों पर कचरा फैला हुआ है। इनसे उठने वाली बदबू से जीना मुहाल हुआ जा रहा है। वहीं बरसात की वजह से हालत और बदतर हो गई है। नालियां जहां उफनाई हुई हैं, वहीं जगह-जगह जलभराव होने से परेशानी और बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में कई तरह के रोगों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों के अनुसार जलभराव, बढ़ी हुई नमी, दूषित पेयजल और मच्छरों की तेजी से बढ़ती संख्या के कारण बीमारियां सबसे ज्यादा फैलती हैं। 

मच्छर जनित रोगों का खतरा ऐसे मौसम में सबसे ज्यादा होता है जिसमें डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया प्रमुख हैं। डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर दिन के समय काटता है और साफ पानी में पनपता है, जबकि मलेरिया परजीवी से होने वाला रोग है। पानी और भोजन के जरिए फैलने वाले रोगों में टाइफाइड, हैजा, डायरिया, हेपेटाइटिस ए, पीलिया और पेट के संक्रमण शामिल हैं। दूषित पानी के सीधे संपर्क से होने वाले रोगों में लेप्टोस्पायरोसिस और त्वचा रोग सबसे अहम हैं। 

लेप्टोस्पायरोसिस एक जीवाणु रोग है जो बारिश में गंदे पानी और जानवरों के मलमूत्र के संपर्क से फैलता है। कूलर, पानी की टंकियां, गमले, टूटे बर्तन, पुराने टायर और निमार्णाधीन मकानों में जमा पानी मच्छरों के पनपने के सबसे बड़े ठिकाने बनते हैं। गंदे पानी में सीवर का मिश्रण होने से ऐसे संक्रमण बड़ी तेजी से बढ़ते हैं। कचरे के ढेर से मक्खियां भी बढ़ती हैं, जो भोजन को दूषित कर संक्रमण फैलाती हैं। त्वचा संबंधी संक्रमण और सांस की तकलीफ भी बढ़ सकती है। स्वास्थ्य विभाग ने मलेरिया मुक्त राज्य बनाने का लक्ष्य रखा है और मच्छर जनित रोगों पर विशेष निगरानी बढ़ाई गई है। घर-घर लार्वा जांच अभियान चलाए जा रहे हैं। फॉगिंग, ड्राई डे अभियान और जागरूकता कार्यक्रम जारी हैं। अस्पतालों में बाढ़ और गर्मी संबंधी नियंत्रण कक्ष स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं। दवाओं, ओआरएस और आपातकालीन टीमों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर है। डेंगू और मलेरिया के मामलों की रिपोर्टिंग अनिवार्य की गई है। सरकार बरसाती बीमारियों से निपटने के लिए सतर्क है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का स्तर मिश्रित है। कई जिला अस्पतालों में एमआरआई, सीटी स्कैन और डायलिसिस जैसी सेवाएं बढ़ाई जा रही हैं। मुफ्त इलाज की योजनाओं के तहत गंभीर बीमारियों का उपचार उपलब्ध है। फिर भी कुछ जगहों पर डॉक्टरों की कमी, बुनियादी ढांचे की समस्या और भारी बारिश के दौरान घरों में पानी घुसने जैसी शिकायतें सामने आती रहती हैं। प्रदेश को इस चुनौती से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है।