Saturday, April 11, 2026

युद्ध से हमारा रिश्ता हो न हो, लेकिन युद्ध का तो है


संजय मग्गू

रूस में वोल्शेविक नेता लेनिन के विरोधी के रूप में विख्यात लियोन ट्राटस्की ने कभी कहा था कि हो सकता है कि आपका युद्ध से कोई लेना देना न हो, लेकिन युद्ध का आपसे लेना-देना जरूर होता है। अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चालीस दिनों तक चले युद्ध को ही लें। इससे भारत सहित दुनिया के तमाम देशों का क्या लेना देना था? कुछ भी नहीं। तीन देश आपस में लड़ रहे थे, इससे हम भारतीयों का क्या जाता है? लेकिन इस युद्ध का हमसे लेना देना तो था। 

दुनिया के कई देशों की तरहभारत की अर्थव्यवस्था पर इस युद्ध के दुष्परिणाम सामने आए। होर्मुज स्ट्रेट से व्यापारिक जहाजों का आवागमन ठप होने से हर देशों की तरह भारत में भी एलपीजी, डीजल-पेट्रोल की किल्लत हुई। नतीजा यह हुआ कि गैस, तेल की कमी बताकर कालाबाजारियों ने अपनी जेब भर ली। खाने-पीने की चीजें महंगी हो गईं। अर्थव्यवस्था पर भी तेल-गैस की कमी का प्रभाव पड़ा। फिर एक झटके में ट्रंप ने 14 दिनों के लिए युद्ध विराम घोषित कर दिया। क्यों? क्योंकि जो आर्थिक दबाव भारत सहित दुनिया भर की जनता झेल रही थी, उससे कहीं ज्यादा दबाव अमेरिकी जनता झेल रही थी। 

अमेरिकी जनता को तो इस युद्ध से सीधा लेना-देना था। करोड़ों डॉलर के हथियार बेवजह फूंक दिए गए। माना कि इस युद्ध में ईरान को ज्यादा जनहानि उठानी पड़ी। उसके कई प्रमुख लीडर मार दिए गए, लेकिन कुछ न कुछ जनहानि अमेरिका और इजरायल को भी उठानी पड़ी। बेवजह ईरान के साथ युद्ध छेड़ने की वजह से जहां अमेरिका में डेमोक्रेटिक सांसद विरोध कर रहे थे, वहीं ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी युद्ध  को उचित नहीं मान रहे थे। डेमोक्रेटिक सांसद इस बात से नाराज थे कि ट्रंप ने इतना बड़ा फैसला लेते समय उनको विश्वास में नहीं लिया। जैसे भारत में कोई भी फैसला लेते वक्त सरकार नेता प्रतिपक्ष को भाव नहीं देती है। 

अब तो ट्रंप से डेमोक्रे टिक यह सवाल भी पूछने लगे हैं कि जब पिछले साल जून में अमेरिका ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने लायक नहीं छोड़ा था, तो 28 फरवरी को दोबारा ईरान पर हमला करने की जरूरत क्यों आ पड़ी। पिछले साल जून महीने में अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था और ट्रंप ने बाद में यह दावा किया था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है। 

डेमोक्रेट्स का यह सवाल जायज भी है। ट्रंप अब भी अपने स्वभाव के अनुरूप कभी दो सप्ताह के लिए युद्ध विराम घोषित करते हैं, तो कुछ ही घंटे के बाद ईरान को मटियामेट कर देने की धमकी देते हैं।  इजरायल द्वारा लेबनान पर किए गए हमले को जायज ठहराने लगते हैं। ट्रंप जिस तरह ‘क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा, रुष्टा-तुष्टा क्षणे-क्षणे’ वाली मनोवृत्ति से पीड़ित दिखाई पड़ते हैं, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि अस्थायी युद्ध विराम की अवधि पूरी होने से पहले ही एक बार फिर युद्ध  का नगाड़ा बज  उठे, तो कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी।

(लेखक दैनिक देश रोजाना के प्रधान संपादक हैं।)

डेढ़ सौ साथियों के साथ शहीद हो गए बुद्धू भगत


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत को स्वाधीन कराने में हमारे देश के न जाने कितने वीर पुत्रों और पुत्रियों ने अपना बलिदान दिया है। कहते हैं कि इंसान जैसे ही गुलाम होता है, वैसे ही उसमें स्वतंत्र होने की प्रबल इच्छा पैदा हो जाती है। अंग्रेजों की गुलामी के साथ ही साथ हमारे देश में स्वाधीनता की आवाज बुलंद होने लगी थी। ऐसे ही एक वीर आदिवासी थे बुद्धू जिन्होंने छोटानागपुर इलाके में विद्रोह किया। 

उनके विद्रोह को कोल विद्रोह या लकड़ा विद्रोह के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजों के खिलाफ हुई इस बगावत में बुद्धू भगत ने अपने दो पुत्रों हलधर भगत और गिरिधर भगत के साथ शहादत दी थी। इनके साथ ही करीब डेढ़ सौ आदिवासियों ने अपने प्राण न्यौछावर किए थे। रांची के सिलागई गांव में 17 फरवरी 1792 में पैदा हुए बुद्धू भगत ने बचपन से ही तीर-धनुष, गुलेल से सटीक निशाना लगाना सीख लिया था। 

उन्होंने बचपन से ही अंग्रेजों का आदिवासियों के साथ होने वाला अत्याचार देखा था। इससे उनके भीतर विद्रोह की आग धधकने लगी थी। जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की, तो अपने साथियों से उन्होंने कहा कि हमारे जंगल ही हमारे लिए मददगार हैं। उन्होंने अपने साथियों से तीर, पत्थर और गुलेल से हमला करने को कहा। इसका नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों के लिए बुद्धू भगत एक चुनौती बन गए क्योंकि लाख कोशिश के बावजूद वह उन्हें पकड़ नहीं सके थे। 

1832 में बुद्धू भगत को शिकस्त देने के लिए अंग्रेज कप्तान इम्फे बड़ी फौज लेकर आया और सिलागई गांव के पास ही उन्हें घेर लिया। उनके साथ अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। अंत में जिस गांव में बुद्धू भगत पैदा हुए थे, उसी गांव में उन्होंने अपने साथियों के साथ शहादत पाई। बुद्धू भगत ने अपनी जान देकर स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया।

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन से बनी कृत्रिम झीलें साबित हो रही जानलेवा


अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन एक गंभीर समस्या है। सुप्रीमकोर्ट, राज्य सरकार और पर्यावरण प्रेमी इसको लेकर चिंतित हैं। सुप्रीमकोर्ट और राज्य सरकार खनन माफियाओं के खिलाफ सख्त कदम उठाने का आदेश दे चुकी है। इसके बावजूद अवैध खनन नहीं रुक पा रहा है। कहा जाता है कि सन 1990 के बाद से अब तक मेवात, गुरुग्राम और फरीदाबाद जिले में खनन माफियाओं ने पांच सौ एकड़ से अधिक घने जंगल, कई पहाड़ियां और 120 से अधिक प्राकृतिक झरनों और तालाबों को नष्ट कर दिया है। 

अवैध खनन के चलते अरावली क्षेत्र में भारी संख्या में कृत्रिम झीलों का निर्माण हो गया है। इन कृत्रिम झीलों की देख रेख में भी लापरवाही बरती जा रही है जिसकी वजह से पिछले सोलह साल में सौ से अधिक लोग इन कृत्रिम झीलों में डूबने से अपनी जान गंवा चुके हैं। पिछले मंगलवार को ही बल्लभगढ़ के थाना धौज क्षेत्र के सिरोही झील में डूबने से बीस वर्षीय युवक की मौत हो गई। सोशल मीडिया पर इस कृत्रिम झील के सौंदर्य के बारे में पढ़कर युवक यहां घूमने आया था। 

युवक को कतई यह अंदाजा नहीं था कि जिस कृत्रिम झील के सौंदर्य को देखकर वह मुग्ध हो रहा है, वही उसके लिए जानलेवा साबित होने वाली है। बिना कुछ सोचे-समझे झील में तैरने के लिए कूदना जानलेवा साबित हुआ। फरीदाबाद-गुरुग्राम रोड के किनारे ही कम से कम छह कृत्रिम झीलें बन गई हैं। वन विभाग या स्थानीय प्रशासन की ओर से इन कृत्रिम झीलों के किनारे किसी तरह की चेतावनी देने वाला बोर्ड भी नहीं लगा है। इन झीलों के चारों ओर तारबंदी भी नहीं की गई है। 

यहां पर किसी कर्मचारी को तैनात भी नहीं किया गया है, ताकि वह यहां आने वाले लोगों को सचेत कर सके। जब यहां कोई आता है, तो वह सोशल मीडिया पर इन झीलों के बारे में बहुत ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर फोटो और वीडियो डालते रहते हैं जिससे प्रभावित होकर युवा इन झीलों के आसपास पिकनिक मनाने चले आते हैं। गर्मियों के दिनों में तो युवा बिना झीलों की गहराई का पता किए तैरने लगते हैं जिसकी वजह से वह हादसे का शिकार हो जाते हैं।  

अवैध खनन की वजह से बनी इन कृत्रिम झीलों के आसपास चेतावनी बोर्ड लगाने के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन को तारबंदी करनी चाहिए ताकि हादसों को रोका जा सके। इसके साथ ही पूरे अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए। अवैध खनन के चलते ही प्राकृतिक तालाब और झरने खत्म हो गए हैं, जिससे क्षेत्र मरुस्थल में बदल रहा है। 

नांगल चौधरी जैसे क्षेत्रों में पानी एक हजार फीट नीचे चला गया है। हरियाली खत्म हो रही है और जड़ी-बूटियां लुप्त हो रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले नूंह के एक क्षेत्र में 41 लाख मीट्रिक टन से अधिक अवैध खनन से 22 अरब रुपये का नुकसान हुआ।


Friday, April 10, 2026

राहुल सांकृत्यायन ने जेल में लिखी वोल्गा से गंगा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राहुल सांकृत्यायन को महापंडित कहा जाता था। इसका कारण यह था कि वह संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, अरबी, अंग्रेजी, फारसी, पालि, तमिल, कन्नड, रूसी, फ्रांसीसी, जापानी, तिब्बती सहित लगभग 36 भाषाओं को अच्छी तरह से जानते थे। 9 अप्रैल 1893 को आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में हुआ था।

बचपन में इनका नाम केदारनाथ पांडेय था, लेकिन जब इन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया, तो महात्मा बुद्ध के पुत्र राहुल के नाम पर अपना नाम राहुल रखने के साथ सांकृत्य गोत्र के नाम पर सांकृत्यायन भी जोड़ लिया। राहुल सांकृत्यायन को बचपन से ही घुमक्कड़ी का शौक था। 

तीसरी कक्षा की किताब में पढ़ा गया एक शे’र ‘सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां’ ने इन्हें बहुत प्रभावित किया। ग्यारह साल की उम्र में हुई शादी को इन्होंने नकार दिया था और घर से भाग खड़े हुए थे। राहुल सांकृत्यायन ने इंग्लैण्ड और यूरोप की यात्रा की। दो बार लद्दाख यात्रा, दो बार तिब्बत यात्रा, जापान, कोरिया, मंचूरिया, सोवियत भूमि (1935 ई.), ईरान में पहली बार, तिब्बत में तीसरी बार 1936 ई. में, सोवियत भूमि में दूसरी बार 1937 ई. में, तिब्बत में चौथी बार 1938 ई.में यात्रा की। 

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर राहुल ने बिहार में कई जगह जनसभाएं की, खूब जोरदार भाषण दिए। कई बार गिरफ्तार किए गए। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया। बंदी जीवन का भी उन्होंने फायदा उठाया और मानव समाज के विकास क्रम को सरल तरीके से समझाने वाली पुस्तक वोल्गा से गंगा उन्होंने जेल में ही लिखी थी। 14  अप्रैल 1963 को यह महामानव दार्जिलिंग में चिर निद्रा में सो गया।

न्यूनतम मजदूरी 35 प्रतिशत बढ़ने से असंगठित श्रमिकों को फायदा


अशोक मिश्र

हरियाणा की जीडीपी में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का बहुत बड़ा योगदान है।  जून 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा में लगभग 52 लाख (25 प्रतिशत से अधिक) अनौपचारिक श्रमिक हैं, जो घर, प्रतिष्ठानों, निर्माण और अन्य अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करते हैं। इनका कोई आधिकारिक लेखा-जोखा तो नहीं होता है, लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि हरियाणा की जीडीपी में असंगठित कार्यबल का 30 प्रतिशत कृषि में, 24 प्रतिशत निर्माण में और 21 प्रतिशत अन्य क्षेत्रों में एक बहुत बड़ी भूमिका है। 

इनके असंगठित होने की वजह से इनकी समस्याओं का निस्तारण भी बहुत मुश्किल से हो पाता है। प्रदेश में इन असंगठित श्रमिकों के छिटपुट रजिस्टर्ड संगठन तो पाए जाते हैं, लेकिन वह उनकी समस्याओं को सुलझाने में उतने प्रभावी नहीं पाए जाते हैं। इनको मजदूरी भी बहुत कम दी जाती है जिसको महसूस करते हुए सैनी सरकार ने अकुशल, अर्धकुशल, कुशल और अति कुशल श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी की है। 

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में चारों श्रेणियों के मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया गया। अकुशल मजदूरों की न्यूनतन मजदूरी को 11 हजार 257 रुपये से बढ़ाकर 15 हजार 220 रुपये मासिक किया गया है। न्यूनतम मजदूरी में 35 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की गई है, जो कि एक अप्रैल 2026 से लागू होगी।  एक्सपर्ट कमेटी ने श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी के लिए रिपोर्ट दी थी, जिसे राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी प्रदान कर दी गई है। 

 इससे प्रदेश में कार्यरत लगभग साठ लाख से अधिक असंगठित श्रमिकों को लाभ मिलेगा। सरकार इन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु विशेष कल्याण बोर्ड, ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण और पीएम श्रम योगी मान-धन योजना जैसी योजनाओं के तहत सहायता प्रदान कर रही है। हरियाणा में असंगठित श्रमिक ज्यादातर रेहड़ी-पटरी, घरेलू कार्य, भवन निर्माण, आटो-रिक्शा, टी स्टालों और ढाबों पर काम करते हुए पाए जाते हैं। जो लोग विशेष कल्याण बोर्ड, ई श्रम पोर्टल आदि पर अपना रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं, उन्हें तो सरकारी सहायता का लाभ मिल जाता है, बाकी श्रमिकों को कोई पूछने वाला नहीं है।

 इन लोगों को नौकरी या काम देने वाला नियोक्ता कम वेतन देने के साथ-साथ निर्धारित समय से ज्यादा काम करवाता है। इनकी सामाजिक सुरक्षा की भी कोई जिम्मेदारी नियोक्ता नहीं उठाता है। ऐसी स्थिति में अगर नियोक्ता जब चाहे इन्हें काम से निकाल भी देता है। नतीजा यह होता है कि कई दिनों तक इन्हें कोई काम ही नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति देश के लगभग हर राज्य में है। अगर छोटी-मोटी पूंजी जुटाकर यह अपना कोई रोजगार करना चाहें, तो इनके सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं।

Thursday, April 9, 2026

ईरान का न्यायप्रिय बादशाह नौशेरवां


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ईरान में एक बहुत ही न्यायप्रिय और राज्य संचालन में कुशल बादशाह हुआ है जिसे नौशेरवां के नाम से जाना जाता है। इतिहास और ईरानी कथाओं में उसका वास्तविक नाम खुसरो प्रथम बताया जाता है। वह सासानियन बादशाह कोबाद का पुत्र था। बाद में वह नौशेरवां-ए-आदिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

कहा जाता है कि जब खुसरो छोटा था, तो उसके पिता कोबाद के दरबार में सीरिया निवासी माजदक नामक व्यक्ति आया और उसने खुद को पैगंबर बताया। बादशाह कोबाद उसके विचार से बहुत प्रभावित हुआ। उसे अपना मंत्री और कोषाध्यक्ष बना दिया। माजदक ने बाहशाह को समझाया कि संपत्ति और महिलाओं पर सबका साझा अधिकार होना चाहिए। पुरुषों को इनसे कोई लगाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि ये दोनों ईर्ष्या, क्रोध, प्रतिशोध, लोभ और वासना जैसे पाँच दुर्गुणों को जन्म देते हैं। 

कुछ ही दिनों में माजदक ने ईरान में अपने हजारों अनुयायी बना लिए जो समाज के निचले तबके के लोग थे। एक दिन माजदक ने बादशाह की पत्नी यानी खुसरो की माता पर अपना हक जताया। इसका खुसरो ने विरोध किया। माजदक ने बादशाह से खुसरो की शिकायत की। खुसरो ने अपने पिता से माजदक को विश्वासघाती और समाज के लिए बुरा आदमी बताया। 

उन्होंने छह महीने में उसके खिलाफ सबूत पेश करने का भी दावा किया। कुछ ही दिनों में खुसरो ने सबूत के साथ माजदक का पर्दाफाश कर दिया। माजदक और उसे शिष्यों को मृत्युदंड दिया गया। पिता के बाद खुसरो ने  531 ईस्वी से 579 ईस्वी तक शासन किया। वे ईरान के सबसे प्रसिद्ध और सफल शासकों में से एक थे। शतरंज और बैकगैमोन जैसे खेलों की शुरुआत उनके शासनकाल में हुई थी। उनके शासनकाल में किसानों से लगान की वसूली भी खत्म कर दी थी।

किसानों को रुला रही बेमौसमी बारिश और मंडियों की अव्यवस्था


अशोक मिश्र

मार्च के साथ-साथ अप्रैल में भी पश्चिमी विक्षोक्ष के कारण उत्तर पश्चिमी और मध्य भागों में कुछ दिनों के अंतराल में बारिश हो रही है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ओलावृष्टि भी हुई है। तेज रफ्तार से हवाएं भी चली हैं। अप्रैल महीने का पहला पखवाड़ा भी कुछ ही दिनों में बीत जाएगा। इसके बावजूद होने वाली बरसात से निजात मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। 

वैसे तो हरियाणा सरकार ने घोषणा की है कि प्रदेश की मंडियों में पहुंचने वाली फसलों को जरूर खरीदा जाएगा। प्रदेश के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री राजेश नागर ने तो यहां तक घोषणा की है कि किसानों की फसल का एक-एक दाना न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाएगा। लेकिन प्रदेश की मंडियों के जो हालात हैं, उसको देखते हुए ऐसा नहीं लगता है। हथीन अनाज मंडी की ही बात करें, तो मंगलवार को मंडी में किसानों द्वारा लाए गए गेहूं के 540 गेट पास तो काटे गए, लेकिन खरीद एजेंसी हरियाणा वेयर हाउस ने एक दाना गेहंू की खरीद नहीं की। यह स्थिति तो केवल एक बानगी है। 

एजेंसी ने गेहूं की खरीद इसलिए नहीं की क्योंकि बेमौसमी बरसात के चलते गेहूं में नमी बढ़ गई थी और गेहूं के दाने का रंग भी बदल गया था।  बेमौसमी बरसात के चलते किसानों को काफी नुकसान हो रहा है। प्रदेश में जब भी बादल मंडराते हैं, तो किसानों के चेहरे रुआंसे हो जाते हैं। मौसम पर उनका कोई नियंत्रण भी नहीं है। जब-जब  बरसात होती है, तो उनकी आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं। वह बेबस होकर अपनी मेहनत से उगाई गई फसल को बरबाद होते देखते हैं और मन मसोसकर रह जाते हैं। 

जिन किसानों ने गेहूं की फसल काट ली है और अभी दाना नहीं निकाला है, उन किसानों को चिंता यह सता रही है कि दाने भीग गए, तो उनकी गुणवत्ता कम हो जाएगी। मंडियों में उन्हें कम दाम मिलेगा। दानों के अंकुरित हो जाने का खतरा भी पैदा हो गया है। यह समय कटाई का है। खेतों में खड़ी फसल तेज हवाओं और बारिश के चलते बिछ गई है। इससे पैदावार में 20-30 से लेकर 50-70 प्रतिशत तक नुकसान की आशंका है। सरसों, चने और मटर की फसल को भी ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से पहले ही भारी नुकसान पहुँच चुका है। 

रह-रह कर बरसात होने की वजह से फसलों की कटाई में भी देरी हो रही है। उधर जो किसान किसी तरह अपनी फसल को लेकर मंडियों में पहुंच रहे हैं, उन्हें वहां भी अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है। कहीं नमी ज्यादा बताकर फसल खरीदी नहीं जा रही है, तो कहीं ज्यादा किसानों के आ जाने से उनका अनाज मंडी के बाहर खुले में पड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में यदि बारिश हो जाती है, तो उनकी फसलों को भीगना पड़ता है। उनकी कीमत भी भीगने की वजह से कम हो जाती है।

Wednesday, April 8, 2026

अरे मूरख! तू किस भगवान की आराधना करेगा?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महाराष्ट्र के पैठण में संत एकनाथ का जन्म 1533 में हुआ था। कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास की तरह इनका भी जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था। संयोग से इनके माता रुक्मिणी और पिता सूर्य नारायण की मृत्यु भी इनके जन्म के कुछ समय बाद हो गई थी। इनका पालन पोषण इनके दादा  चक्रपाणि की देख-रेख में हुआ था। 

चक्रपाणि के पिता संत भानुदास बिट्ठल के अनन्य भक्त थे। संत एकनाथ ने भी अपने पड़दादा संत भानुदास के ही मार्ग का अनुसरण किया। महाराष्ट्र में सबसे बड़े संत के रूप में पूजे जाने वाले संत एकनााथ ने उन्हीं लोगों को दीक्षा दी जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्वों को पूरा कर लिया था। वे लोग भी एकनाथ के शिष्य बने जिन्होंने सांसारिक दायित्वों को स्वीकार ही नहीं किया था। 

अपने गुरु जनार्दन स्वामी के आदेश पर एकनाथ ने गृहस्थ जीवन स्वीकार किया था। एक दिन की बात है। एक गृहस्थ उनके पास आया और बोला, गुरुजी, मुझे अपना शिष्य स्वीकार कीजिए। मुझे दीक्षा दीजिए। मैं सांसारिक मोह त्यागकर संन्यास धारण करना चाहता हूं। 

संत एकनाथ ने उससे पूछा कि क्या तुमने अपने गृहस्थ जीवन के सभी दायित्वों को पूरा कर लिया है? क्या तुम्हारे परिवार ने तुम्हें संन्यास धारण करने की अनुमति प्रदान कर दी है? उस आदमी ने कहा कि गुरु जी, मैं अपनी पत्नी और बच्चों को सोते समय छोड़कर आया हूं। 

एकनाथ ने उस व्यक्ति को फटकारते हुए कहा कि अरे अज्ञानी, तू किस भगवान की आराधना, सेवा करेगा। असली भगवान को तो तू घर ही छोड़कर चला आया है। तेरा परिवार ही भगवान का स्वरूप है। ऐसे में तेरा संन्यास विफल ही रहेगा। यह सुनकर गृहस्थ को अपनी गलती का एहसास हुआ और क्षमा मांगते हुए अपने घर को लौट गया।

बच्ची से दुष्कर्म मामले में पुलिस का रवैया रहा संवेदनहीन


अशोक मिश्र

बलात्कार का मामला हमेशा संवेदनशील माना जाता रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था से पहले भी जब समाज में सामंती व्यवस्था थी, तब भी यह संवेदनशील ही रहा है। इन दिनों गुरुग्राम की तीन साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार का मामला चर्चा में है। इस मामले में सुप्रीमकोर्ट ने जो रवैया अख्तियार किया है, उससे समाज में यह संदेश जरूर गया है कि लोगों को अगर अदालतों पर भरोसा होता है, तो वह कतई गलत नहीं है। 

अदालतों में बैठे न्यायमूर्ति किसी भी हालत में पीड़ित को न्याय दिलाकर ही रहते हैं। गुरुग्राम के सेक्टर 54 की एक सोसायटी में रहने वाली तीन साल की एक बच्ची के साथ दो नौकरानियों और उनके एक पुरुष साथी ने दो महीने तक कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया। बच्ची को डराया धमकाया भी गया। जब उत्पीड़न कुछ ज्यादा ही होने लगा, तो चार फरवरी को बच्ची ने अपने साथ हो रहे अमानवीय कृत्य की जानकारी अपनी मां को दी। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। जब कोई मामला पुलिस तक पहुंचता है, तो लोगों को यह विश्वास होता है कि पुलिस अब दोषियों को पकड़कर न्याय दिलाएगी। 

लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। पुलिस ने बच्ची का बयान लेते वक्त आरोपियों को भी वहीं खड़े रहने की इजाजत दी। आरोपियों की मौजूदगी में बच्ची घबराई रही। मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर ने भी लापरवाही बरती। कुल मिलाकर जब यह मामला सुप्रीमकोर्ट के सामने आया, तो सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश यह जानकर दंग रह गए कि इतने संवेदनशील मामले में कितनी लापरवाही बरती गई। 

सुप्रीमकोर्ट पुलिस, डॉक्टर सहित उस घटना से जुड़े सभी पक्षों की लापरवाही पर न केवल नाराज हुआ, बल्कि कड़ी फटकार लगाई। सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में एक विशेष जांच टीम गठित करने के साथ-साथ बच्ची का बयान दोबारा लेने का आदेश दिया है। टीम में महिला अधिकारी अनिवार्य रूप से रहेगी। सादी वर्दी में बच्ची के घर जाकर पुलिस जांच करेगी। 

बच्ची से बातचीत करते समय मनोचिकित्सक और चाइल्ड काउंसलर भी मौजूद रहेंगे ताकि बच्ची सहज होकर अपनी बात कह सके। जिस तरह सुप्रीमकोर्ट ने अपनी संवेदनशीलता परिचय देते हुए मामले को सुलझाने का प्रयास किया है, वह वंदनीय है। सच तो यह है कि दुराचार किसी भी महिला या बच्ची के साथ किया गया हो, उसकी पीड़ा पीड़िता को आजीवन भोगती है। वह बलात्कार के दंश से जीवन भर उबर नहीं पाती है। वह काफी प्रयास के बावजूद एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन नहीं गुजार पाती है। 

उसका अतीत उसे चैन से जीने नहीं देता है। दुख की बात तो यह है कि ज्यादातर मामले में समाज पीड़िता को ही दोषी मानकर उपेक्षा करता है। उसकी खिल्ली उड़ाता है। उसे प्रताड़ित करता है। यही वजह है कि ज्यादातर मामलों में पीड़िता न्यायालय की चौखट तक नहीं पहुंच पाती है।

Tuesday, April 7, 2026

द मदर ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट रोजा पार्क्स


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रोजा लुईज मक्कॉली पार्क्स का नाम अमेरिकी-अफ्रीकी अश्वेत नागरिकों में आज भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। पार्क्स का जन्म 4 फरवरी 1913 को अमेरिका के टस्कागी में एक साधारण परिवार में हुआ था। जीवन यापन के लिए उन्होंने कई तरह के काम किए। बचपन में पार्क्स ने अपनी दादी और मां से रजाई सिलना सीखा था। ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने अपनी स्कूल की पोशाक तक सिल ली थी। 

सन 1932 में रोजा ने मोंटगोमरी के रेमंड पार्क्स से विवाह कर लिया जो पेशे से नाई थे। रेमंड उन दिनों सामाजिक सुधार के लिए आंदोलन चलाने वाले संगठन के सदस्य भी थे। इसका प्रभाव रोजा पार्क्स पर भी पड़ा। 1 दिसंबर 1955 की बात है। एक दिन अपने काम से वापस आते समय वह एक बस में चढ़ी और टिकट लेकर अश्वेतों के लिए तय सीट पर बैठ गईं।  

उन दिनों अमेरिका में बसों में श्वेत और अश्वेत लोगों के लिए अलग-अलग सीटें तय थीं। जब श्वेत लोगों की संख्या ज्यादा होने पर उनकी निर्धारित सीटें भर जाती थीं, तो अश्वेतों को अपनी सीट खाली करनी पड़ती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। श्वेत लोगों की सभी सीटें भर गई थीं। बस चालक जेम्स एफ. ब्लेक ने एक श्वेत यात्री के लिए पार्क्स से अपनी सीट छोड़ने के आदेश दिया। 

पार्क्स ने सीट छोड़ने से इनकार कर दिया। पार्क्स को गिरफ्तार कर लिया गया। अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय ने बस सेवा का 381 दिनों तक बहिष्कार किया। इस आंदोलन में मार्टिन लूथर किंग जूनियर सहित कई प्रसिद्ध नेताओं ने भाग लिया। अंत में अदालत ने बसों में किए जाने वाले नस्लीय भेदभाव को असंवैधानिक करार दिया। 

अपने साहस से पार्क्स ने अमेरिकी इतिहास बदल दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस ने द फर्स्ट लेडी आॅफ सिविल राइट्स (नागरिक अधिकारों की पहली औरत) और द मदर आॅफ द फ्रीडम मूवमेंट (आजादी लहर की माँ) नामों से पुकारा।