Wednesday, September 16, 2026

आयुष्मान महाराज! आप जीते रहें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजगृह में तीर्थंकर महावीर का प्रवचन चल रहा था। निशब्द होकर सभी लोग प्रवचन सुन रहे थे। सभा में सम्राट श्रेणिक, महामंत्री अभय कुमार आदि गणमान्य लोगों के साथ नागरिक भी उपस्थित थे। तभी एक वृुद्ध ने प्रवेश किया। उसके शरीर पर जीर्ण-शीर्ण वस्त्र थे। उसके शरीर में कुष्ठ रोग के मवाद से दुर्गंध निकल रही थी।  वह महावीर को प्रणाम किए बिना सम्राट श्रेणिक के सामने आ खड़ा हुआ। 

उसने सम्राट श्रेणिक से कहा, आयुष्मान आप जीते रहें। इसके बाद वह तीर्थंकर की ओर घूमा और कहा, आप शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त करें। इसके बाद वह लाठी टेकता हुआ महामंत्री के पास पहुंचा और कहा, तुम चाहे जियो, चाहे मरो। तत्पश्चात वह घूमा और राजगृह के कसाई काल शौकरिक के पास पहुंचा और बोला, शौकरिक, तुम न मरो, न जियो। इतना कहकर वृुद्ध बाहर चला गया। 

सब लोग आश्चर्यचकित थे। तब महावीर ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, स्वयं महादिदेव विवेक थे। उन्होंने सम्राट से कहा, आप जीते रहें। इसका मतलब यह है कि आपके सामने सारा ऐश्वर्य है, मरने के बाद दुख ही दुख है। इसलिए आपका जीना ही उचित है। मेरे बारे में उन्होंने कहा कि मैं मर जाऊं क्योंकि वह मेरे शरीर को एक बंधन मानते हैं। 

महामंत्री से उन्होंने कहा कि चाहे जियो, चाहे मरो। इसका मतलब यह है कि महामंत्री अपने कार्य को निष्ठा पूर्वक संपन्न कर रहे हैं। आगे भी इनके सामने सुख ही सुख होंगे। इसलिए इनका मरना जीना एक समान है। कसाई शौकरिक का जीवन पाप पूर्ण है, उसे अगले जन्म में भी दुख ही दुख मिलेगा। तुम इस जन्म में भी पाप भोग रहे हो और अगले जन्म में भी तुम्हें पाप भोगना पड़ेगा। महावीर की बात सुनकर सभा में उपस्थित लोगों की आंख खुल गई।

हरियाणा के लिए काफी लाभदायक है किशाऊ बांध परियोजना


अशोक मिश्र

हरियाणा के लिए किशाऊ बांध परियोजना अत्यंत लाभदायक मानी जा रही है। इससे हरियाणा की एक बड़ी आबादी का जल संकट दूर हो सकेगा। राज्य गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। किशाऊ बांध परियोजना का इतिहास लगभग 85 साल पुराना है। इसका मुख्य विवाद हमेशा लागत और हिस्सेदारी को लेकर रहा है। 1940 में पहली बार बांध परियोजना का विचार आया था। 1944-45 में पंजाब सरकार ने सर्वे शुरू किया और 1965 में इसकी शुरुआती रिपोर्ट पंचवर्षीय योजना में शामिल हुई, लेकिन बार-बार साइट को लेकर तकनीकी आपत्तियां आती रहीं। पहले किशाऊ गांव के पास साइट प्रस्तावित थी, जिसे केंद्रीय जल आयोग ने खारिज कर दिया था। 

बाद में संबरखेड़ा साइट को 236 मीटर ऊंचे बांध के लिए सही माना गया। असली विवाद पिछले आठ सालों में पैदा हुआ, जब हिमाचल प्रदेश ने कहा कि वह बिजली घटक की लागत का वित्तीय बोझ नहीं उठाएगा। अंतत: जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठकों के बाद सहमति बनी कि परियोजना की लागत का नब्बे प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी तथा शेष दस प्रतिशत छह भागीदार राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा। इसी 10 प्रतिशत हिस्से में हरियाणा की नई हिस्सेदारी करीब 579 करोड़ रुपये तय की गई है। 

पहले के समझौतों में हरियाणा की हिस्सेदारी 478.85 करोड़, उत्तर प्रदेश की 298.76 करोड़, राजस्थान की 93.51 करोड़, दिल्ली की 60.50 करोड़, उत्तराखंड की 38.19 करोड़ और हिमाचल की 31.58 करोड़ बताई गई थी। लेकिन नई व्यवस्था में हिमाचल की बिजली लागत को अन्य राज्यों ने उठाया है। इस 579 करोड़ रुपये के बदले में हरियाणा को सिंचाई के लिए 836.39 क्यूसेक पानी मिलेगा। यह पानी यमुना प्रणाली के माध्यम से हरियाणा की नहरों में आएगा। किशाऊ बांध से मिलने वाला 836.39 क्यूसेक अतिरिक्त पानी हरियाणा की पश्चिमी यमुना नहर और जवाहरलाल नेहरू लिफ्ट नहर प्रणाली में जाएगा। 

इससे दक्षिण हरियाणा के अंतिम छोर तक सिंचाई पानी पहुंचेगा, भूजल पर दबाव कम होगा और पीने के पानी की किल्लत, खासकर गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे एनसीआर शहरों में कम होगी। हरियाणा के लिए यह परियोजना काफी लाभदायक साबित हो सकती है क्योंकि राज्य कृषि प्रधान होने के साथ-साथ पेयजल और सिंचाई के लिए यमुना बेसिन पर काफी निर्भर है। अतिरिक्त और नियमित जल आपूर्ति से सिंचाई क्षमता बढ़ेगी, सूखे या कम पानी वाले मौसम में राहत मिलेगी तथा दक्षिणी जिलों सहित उन क्षेत्रों को पानी पहुंचाया जा सकेगा जहां उपलब्धता कम है। कुल मिलाकर यह परियोजना अंतरराज्यीय सहयोग का उदाहरण बनते हुए यमुना बेसिन के राज्यों की जल संबंधी जरूरतों को संतुलित तरीके से पूरा करने का प्रयास है।

Tuesday, September 15, 2026

दानदाता का संतुष्ट होना जरूरी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कौशल नरेश प्रसेनजित का यह नियम था कि वह वर्ष भर में अपने राज कर्मचारियों और उनके परिवार को वस्त्र दान किया करते थे। कहते हैं कि उनके यहां पांच सौ राजकर्मचारी थे। समय आने पर उन्होंने राजकर्मियों को वस्त्र दिए। संयोग से उन्होंने दिनों महात्मा बुद्ध के प्रिय सेवक आनंद ने प्रवचन करते हुए कहा कि मनुष्य को अपरिग्रह का पालन करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक का संचय नहीं करना चाहिए। 

राज कर्मचारी संघ की शास्ता से परिचित थे। तो उन्होंने सोचा कि कहीं महाराज द्वारा दिए गए वस्त्र अपरिश्रम और लोभ से जुड़ा हुआ है। वह सब धर्मनिष्ठ थे, तो उन्होंने सारे वस्त्र लाकर आनंद को दान कर दिए। धीरे-धीरे यह बात महाराज प्रसेनजित तक पहुंची। यह बात जानकर प्रसेनजित को क्रोध आ गया कि दूसरों को अपरिग्रह का उपदेश देने वाले आनंद ने पांच सौ वस्त्र ग्रहण कर लिए। वह अगले दिन संघाराम पहुंच गए। 

आनंद ने उनका सादर अभिवादन किया। प्रसेनजित ने क्रोध में पूछा कि भंते! आप भिक्षु हैं। आपने पांच सौ वस्र कैसे ग्रहण कर लिए? आनंद उन्हें संघाराम की ओर ले गए और बताया कि यहां के भिक्षुओं के चीवर उपयोग लायक नहीं रह गए थे। इसलिए मैंने सारे वस्त्र उनमें वितरित कर दिए। 

प्रसेनजित ने रोष से पूछा, और उनके पुराने वस्त्र? उनका क्या हुआ? आनंद ने नम्रता से जवाब दिया, भिक्षुओं के पुराने वस्त्रों की कथरी बना दी गई है ताकि  बिछाने के काम आए। मेरा एक ही चीवर से काम चल जाता है, तो मैंने केवल एक ही वस्त्र लिया है। यह सुनकर प्रसेनजित को बहुत दुख हुआ। उन्होंने आनंद से क्षमा मांगी। आनंद ने कहा कि महाराज! दान पाने वाले से ज्यादा दान देने वाले का संतुष्ट होना जरूरी है।

मिट्टी की मूर्तियों को प्राकृतिक रंगों से सजाकर सार्थक बनाएं गणेशोत्सव

अशोक मिश्र

गणेशोत्सव शुरू हो चुका है और आज बाजार से लेकर मंदिर और घर-घर में भगवान गणेश विराजमान हो चुके हैं। छोटी-छोटी मनोहारी मूर्तियों से लेकर विशालकाय पंडालों की भव्य प्रतिमाएं तक हर तरफ श्रद्धा और उत्साह का वातावरण बना रही हैं। 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर इन मूर्तियों का बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ विसर्जन किया जाएगा। तब एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता भी सामने आएगी। आज बाजार में बिकने वाली अधिकांश मूर्तियां प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी से बनती हैं। 

पीओपी कैल्शियम सल्फेट हेमीहाइड्रेट है, यह नदी या तालाब के पानी में महीनों तक नहीं घुलता। यह पानी के तल पर बैठकर उसे उथला कर देता है, पानी के बहाव को रोकता है और जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर देता है। इससे भी अधिक खतरनाक है इन मूर्तियों पर किया गया सजावट का काम। इन्हें चमकदार और आकर्षक बनाने के लिए सीसा, पारा, क्रोमियम, कैडमियम और आर्सेनिक जैसे भारी धातुओं वाले रासायनिक रंगों का उपयोग किया जाता है। 

जब ये मूर्तियां पानी में डुबोई जाती हैं, तो ये रंग पानी में घुल जाते हैं और पानी को जहरीला बना देते हैं। इससे पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से कम हो जाती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड का बढ़ना कहा जाता है। आॅक्सीजन कम होने से मछलियां, कछुए और अन्य जलीय जीव दम घुटने से मरने लगते हैं। उनके प्रजनन चक्र प्रभावित होते हैं तथा वनस्पतियों की जड़ें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। हालांकि शुद्ध मिट्टी की मूर्तियां घुलकर कुछ हद तक नमी बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। 

इसका अर्थ यह नहीं है कि आस्था और पर्यावरण में से एक को चुनना पड़ेगा, बल्कि हमें अपनी परंपरा को ही अधिक समझदारी से निभाना होगा। इसका सबसे सुंदर और सीधा समाधान है फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटना यानी प्राकृतिक चिकनी मिट्टी से बनी मूर्तियों को अपनाना। ये मूर्तियां पानी में 45 मिनट से कुछ घंटों में पूरी तरह घुल जाती हैं। मिट्टी में मिलकर उसे नुकसान नहीं पहुंचातीं। यदि रंग करना ही है तो हल्दी, गेरू, चंदन, फूलों के रस जैसे प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जा सकता है। 

आज कई कलाकार बीज वाली गणेश मूर्तियां भी बना रहे हैं जिनमें तुलसी या अन्य पौधों के बीज होते हैं, विसर्जन के बाद मिट्टी में लगाने पर वह मूर्ति एक पौधे के रूप में विकसित हो जाती है, यह विसर्जन नहीं बल्कि एक नया सृजन बन जाता है। व्यक्तिगत स्तर के साथ-साथ सामुदायिक स्तर पर भी बदलाव जरूरी है। नगर निगमों और प्रशासन द्वारा बनाए गए कृत्रिम तालाबों या टैंकों में विसर्जन करना एक बहुत प्रभावी तरीका है। समुदाय स्तर पर सामूहिक रूप से छोटी और पर्यावरण अनुकूल मूर्तियों का चयन करके तथा घर पर विसर्जन की परंपरा अपनाकर हम आस्था और पर्यावरण दोनों की रक्षा कर सकते हैं। गणेश जी विघ्नहर्ता हैं और अगर हम उनके उत्सव को प्रकृति के अनुकूल मनाएं तो यह उनके आशीर्वाद को और अधिक सार्थक बनाएगा। 


Monday, September 14, 2026

संथाली का आत्मग्लानि धुल गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के वेलुवन में महात्मा बुद्ध को पधारना था। कुशी संघाराम में विशाल धर्मदीक्षा का आयोजन किया गया था। बहुत सारे लोग आए हुए थे। कौशल, मगध, कौशांबी, पंचनद और जेतवन विहारों से भारी संख्या में बौद्ध परिव्राजक वेलुवन पधारे थे। इन्हीं परिव्राजकों में संथाली भी थे। संथाली मगध के ही निवासी थे। उनके पिता प्रधान श्रेणिक थे। उनका भवन राज प्रासाद का भ्रम पैदा करता था। यहां समस्त प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं। वैभवशाली संथाली सब कुछ त्यागकर महात्मा बुद्ध की शरण में आए थे। 

धर्मदीक्षा की व्यवस्था के लिए सभी परिव्राजकों को कोई न कोई काम सौंपा गया। संथाली और वलैशी को उस दिन भिक्षा मांगने की जिम्मेदारी सौंपी गई। संथाली और वलैशी भिक्षा पात्र लेकर नगर की ओर निकल गए। नगर के द्वार द्वार भटकते हुए वह अपने घर के दरवाजे पर जा खड़े हुए। आज उनका अपना घर श्रीहीन प्रतीत हो रहा था। उन्होंने रुंधे हुए गले से आवाज लगाई-भवति भिक्षाम देहि जननी। 

यह चार शब्द कहते हुए संथाली का कंठ अवरुद्ध हो गया। पहली बार में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उन्होंने फिर आवाज लगाई, तो अंदर से आवाज आई-मां, संथाली आया है। संथाली आए हैं। इसके बाद उस घर में हलचल मच गई। मां, पिता, बहन, भाई और पत्नी सब दरवाजे पर आ खड़े हुए। शरीर पर एक वस्त्र, केशरहित सिर, हाथ में भिक्षा पात्र देखकर मां, पिता, भाई सब रोने लगे। 

पांच साल में पहली बार संथाली अपने घर के दरवाजे पर आए थे। संथाली ने उन्हें रोते हुए देखकर कहा, तात! मेरी साधना में अधूरी रह गई शायद, तभी तो आप रुदन कर रहे हैं। पिता ने अवरुद्ध कंठ से कहा, नहीं पुत्र! पांच साल में तुम्हारी अक्षय कीर्ति कमाई है। जो काम मुझे करना चाहिए था, वह तुम कर रहे हो। तुम इस देश के इतिहास हो। यह सुनकर संथाली का आत्मग्लानि धुल गया।

सड़कों पर घूमते लावारिस कुत्तों का बढ़ता जा रहा आतंक

अशोक मिश्र

शनिवार को बल्लभगढ़ के शाहुपुरा में दो छोटी बहनों को आवारा कुत्तों ने घेर लिया। दोनों ने तुरंत रैंप पर चढ़कर अपनी जान बचाई। सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें करीब छह साल के बच्चे के पीछे कुत्ता दौड़ता नजर आ रहा है और बच्चा ‘मम्मी बचाओ, मम्मी बचाओ’ चिल्ला रहा है। उसकी आवाज सुनकर घरवाले बाहर निकले और कुत्ते को भगाया। गनीमत यह रही कि बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। 

यह घटना अकेली नहीं है। प्रदेश भर में कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं और लोग भय के साये में जीने को मजबूर हैं। आज स्थिति यह है कि गली हो या बाजार, दिन हो या रात, लोगों को एक अनजाना डर घेरे रहता है। झुंड में घूमते आवारा कुत्ते अचानक किसी अकेले राहगीर, स्कूली बच्चे या बुजुर्ग पर हमला कर देते हैं। डॉग बाइट को लेकर अब शासन स्तर पर हलचल तेज हुई है, उन्होंने कुत्तों को झुंड बनाने से रोकने और जनसंख्या कम करने के उपाय करने शुरू कर दिए हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद हरियाणा के शहरी स्थानीय निकाय विभाग ने एक विस्तृत कार्ययोजना तय की है जिसके तहत प्रदेश के सभी 87 निकायों में कम से कम पांच हजार कुत्तों की क्षमता वाले आश्रय स्थल बनाए जाएंगे। सरकार का कहना है कि उसके पास अभी सभी कुत्तों को एक साथ शेल्टर में शिफ्ट करने के संसाधन नहीं हैं, इसलिए फिलहाल फोकस नसबंदी पर रहेगा। प्रदेश सरकार और स्थानीय निकाय आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए मुख्य रूप से एनिमल बर्थ कंट्रोल यानी एबीसी कार्यक्रम चला रहे हैं। इस कार्यक्रम के तहत नगर निगम और नगर परिषदें एजेंसियों को ठेका देकर कुत्तों को पकड़ती हैं, उनकी नसबंदी कराती हैं, रेबीज के टीके लगाती हैं, टैगिंग करती हैं और फिर उन्हें उसी क्षेत्र में छोड़ देती हैं जहां से पकड़ा गया था। 

एबीसी नियम 2023 के तहत यह काम वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से करने का प्रावधान है। केंद्र सरकार की 'स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट 2026-27' योजना के तहत 3000 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया है। इसके तहत देशभर में 30 सितंबर तक 2.46 करोड़ कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। 

हरियाणा को लगभग 58 हजार कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य मिला है। जमीन पर काम शुरू भी हुआ है। शाहुपुरा जैसी घटनाएं साफ दर्शाती हैं कि आम आदमी अभी असुरक्षित महसूस कर रहा है। सरकार की योजनाएं और प्रशासनिक गतिविधि हर जगह मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन और निरंतरता जरूरी है। नसबंदी अभियान को तेज करना, आक्रामक कुत्तों को तुरंत हटाना, शिकायतों का त्वरित निस्तारण और जागरूकता बढ़ाना ही इस आतंक से राहत दिलाने का रास्ता है। लोगों को भी इस मामले में जागरूक होना होगा।

Sunday, September 13, 2026

बुरा करने वाले के साथ होता है बुरा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध श्रावस्ती में विहार कर रहे थे। नित्य ही संध्या के समय जेतवन में बुद्ध का प्रवचन आयोजित किया जाता था। उन्हीं दिनों महापाल नाम का व्यापारी किसी काम से श्रावस्ती आया हुआ था। उसने महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना, तो वह बहुत अधिक प्रभावित हुआ। उसने सोचा कि मनुष्य योनि बहुत मुश्किल से मिलता है। व्यापार में अच्छे बुरे काम करते हुए जीवन को क्यों नष्ट किया जाए। वह अपने घर वापस गया और अपने भाई को व्यापार का सारा कार्यभार सौंपकर श्रावस्ती वापस आ गया। 

उसने महात्मा बुद्ध से शिष्य बनने की कामना की। बुद्ध ने उसकी इच्छा का सम्मान किया और शिष्य बना लिया। शिष्य बनने के बाद उसने आराधना शुरू की। उसने लेटकर सोना भी छोड़ दिया। बैठे बैठे साधना करता रहता था। कुछ दिनों के बाद आंखों में पीड़ा शुरू हुई। लोगों ने वैद्य को बुलाया। वैद्य ने कहा कि दवा के साथ नेत्र को विश्राम जरूरी है। लेकिन कुछ दिनों बाद महापाल की आंखें चली गईं। 

वह अंधा हो गया। अब वह महापाल की जगह चक्षुपाल कहा जाने लगा। जब वह आता जाता, तो उसके पैरों तले छोटे जीव दबकर मर जाते थे। अन्य शिष्यों ने महात्मा बुद्ध को यह बात बताई तो उन्होंने कहा कि वह देख नहीं सकता है, इसलिए उसका यह पाप क्षम्य है। शिष्यों के पूछने तथागत ने कहा कि पूर्व जन्म में महापाल एक वैद्य था। एक महिला इसके पास आंखों का इलाज कराने आई थी। 

उसने कहा था कि यदि उसकी आंखें ठीक हो गईं, तो वह आजीवन उसकी दासी बनकर रहेगी। आंखें ठीक होने पर महिला अपनी बात मुकर गई थी। तब वैद्य ने उसे एक ऐसी दवा दी जिससे उसकी दोनों आंखें चली गई। इस जन्म में महापाल को उसके पूर्व जन्म के पाप का ही दंड मिला है। जो किसी के साथ बुरा करता है, उसके साथ बुरा ही होता है।

मिलावटी खाद्य पदार्थों को लेकर सरकार सख्त, प्रशासन सतर्क

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने फैसला किया है कि मिलावट करने वालों के खिलाफ अभियान चलाया जाएगा। शरदकालीन तीज-त्यौहार भी नजदीक आ रहे हैं। पितृपक्ष, नवरात्र, दशहरा, दीपावली जैसे त्यौहार नजदीक ही हैं। इन त्यौहारों पर खाद्य पदार्थों और मिठाइयों की मांग काफी बढ़ जाती है। बाजार में मिठाई, दूध-पनीर, घी और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इसी मौके का फायदा उठाकर मिलावटखोर सक्रिय हो जाते हैं। ऊंची मांग और जल्दी बिक्री का दबाव उन्हें सस्ते विकल्प अपनाने का प्रलोभन देता है। 

हरियाणा सरकार ने इस खतरे को भांपते हुए खाद्य विभाग की टीमों के साथ पुलिस की मदद से विशेष अभियान चलाने का फैसला लिया है। चंडीगढ़ में मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी की अध्यक्षता में हुई राज्य स्तरीय सलाहकार समिति की बैठक में तय किया गया है कि त्यौहारी सीजन से पहले खाद्य पदार्थों की जांच और नमूना लेने की कार्रवाई तेज की जाएगी और इस बार अकेले खाद्य विभाग नहीं बल्कि पुलिस की टीमें भी साथ रहेंगी। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है क्योंकि पहले अक्सर व्यापारी सैंपल लेने आई टीमों से उलझ जाते थे या दबाव बनाकर कार्रवाई को टाल देते थे। 

पुलिस की मौजूदगी से औचक निरीक्षण को बल मिलेगा। हर साल ऐसे अभियान चलने के बावजूद मिलावट नहीं रुकने का कारण अर्थशास्त्र है। दशहरा, नवरात्र और दीपावली पर खोया, पनीर, घी और मिठाइयों की मांग इतनी अधिक हो जाती है कि वैध आपूर्ति कम पड़ जाती है। मांग और आपूर्ति के इस अंतर को पाटने के लिए नकली और सस्ता माल खपाया जाता है। इसके अलावा राज्य में जांच और दंड की प्रक्रिया काफी धीमी है। पहले सैंपल की रिपोर्ट आने में बीस दिन से अधिक लगते हैं और कई जिलों में खाद्य सुरक्षा अधिकारी का पद तक खाली रहता है। इस बार तुलनात्मक रूप से सरकार की कार्रवाई अधिक आक्रामक दिख रही है। 

पिछले वित्त वर्ष में ही मिलावट के मामलों में 2.35 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया और 265 मामलों में दोषसिद्धि हुई है। इस साल रणनीति असुरक्षित खाद्य की शीघ्र पहचान, लैब जांच को मजबूत करना और फील्ड निरीक्षण को प्रभावी बनाने पर केंद्रित है। जिलों में सीएम फ्लाइंग के साथ संयुक्त रेड, गोदामों पर छापे और खराब तेल को मौके पर नष्ट करने जैसी कार्रवाई इसी का हिस्सा हैं। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम जैसे शहरी जिलों में जहां मिठाई की बड़ी फैक्टरियां हैं, वहां वेयरहाउस स्तर पर ही निगरानी शुरू कर दी गई है। कुल मिलाकर, त्योहारों का मौसम स्वास्थ्य के लिए चुनौती भरा है, लेकिन सरकार की बढ़ती सख्ती, आधुनिक जांच सुविधाएं और पुलिस सहयोग से स्थिति में सुधार की उम्मीद है। उपभोक्ताओं को भी सतर्क रहना होगा, प्रमाणित और पैक किए हुए उत्पादों को प्राथमिकता देनी होगी तथा संदेह होने पर विभाग को सूचित करना होगा। मिलावट रोकना केवल प्रशासन का काम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

Saturday, September 12, 2026

पहले भोजन-चिकित्सा की व्यवस्था करो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध खुद तो वर्ष के आठ-नौ महीने सतत यात्रा पर रहते थे, लेकिन वह अपने शिष्यों को भी जगह-जगह भेजकर लोगों को आत्म कल्याण का मार्ग सुझाने के लिए भेजते रहते थे। तथागत का एक प्रिय शिष्य था कलभ्भन। वह हमेशा महात्मा बुद्ध के आदेशों का पालन करने को तत्पर रहता था। एक दिन महात्मा बुद्ध ने उसे बुलाया और कहा कि वत्स! यह संसार दुखियों से भरा पड़ा है। 

लोग अज्ञानवश कुरीतियों से जकड़े हुए हैं। अशिक्षा की वजह से वह अपना सुधार नहीं कर पा रहे हैं। तुम जाकर इन लोगों को जागृति का पाठ पढ़ाओ। लोगों के कल्याण का मार्ग इन्हें समझाओ। अपने गुरु की आज्ञा पाकर कलभ्भन चल पड़े। वह चलते-चलते एक गांव में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि चारों ओर गरीबी का साम्राज्य है। स्त्रियां पुरुषों के काम कर रही हैं। लोग अशिक्षित और कुरीतियों से ग्रसित थे। 

बच्चे बीमार और भुखमरी का शिकार लग रहे थे। बच्चे अध्ययन करने भी नहीं जाते थे। कलभ्भन ने कहा कि उन्हें सेवा का स्थान मिल गया। उन्होंने एक पेड़ के नीचे अपना सारा सामान रखा।  लोगों को यह खबर मिलते ही कि महात्मा बुद्ध के शिष्य कलभ्भन उनका दुख दूर करने आए हैं, वह उनके पास जमा हो गए। उन्होंने कलभ्भन के रहने की व्यवस्था की। 

अगले दिन सुबह कलभ्भन ने उपदेश देना शुरू किया। कुछ दिन बाद तो लोगों ने उनके पास आना ही बंद कर दिया। कलभ्भन लौटकर बुद्ध के पास पहुंचे और सारा हाल कह सुनाया। सब कुछ जानकर उन्होंने अपने दो अन्य शिष्यों को बुलाया और कहा कि अमुक गांव में जाकर लोगों के खाने-पीने और चिकित्सा की व्यवस्था करो। बच्चों के लिए पाठशाला खुलवाओ। उसके बाद जब वह निरोगी हो जाएं, तो उन्हें कर्म का रास्ता दिखाओ। इसके बाद उन्हें आत्म कल्याण का मार्ग बताना। अब कलभ्भन समझ गए कि उन्होंने क्या गलती की थी।

रिश्ते-नातों की टूटती डोर को फिर से बुनने की जरूरत


अशोक मिश्र

रिश्ते नातों की डोर धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। हम भाई-बहन, माता-पिता, मामा-मामी, चाचा-चाची जैसे रिश्तों को भूलते जा रहे हैं। जिस आंगन में बचपन बीता, अच्छे-बुरे दिन देखे, सहे और उससे उबर कर जीवन की पगडंडी पर आगे बढ़े। उसी आंगन के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए और भाई, बहन या अन्य निकट संबंधी दाह संस्कार तक रुकने से इनकार कर दें, तो इन रिश्तों की निरर्थकता समझ में आ जाती है। कुरुक्षेत्र के पिहोवा में सरस्वती तीर्थ के पास पिछले दस साल से अकेला जीवन गुजार रहे 71 वर्षीय जुगल किशोर की 4 सितंबर को मौत हो गई। 

दिल्ली के उत्तम नगर का रहने वाला यह अविवाहित वृद्ध बीमार पड़ा तो बाबा फरीद अनाथ आश्रम ने उसे अस्पताल पहुंचाया। अंतिम सांस लेने के बाद इकलौती बहन पुष्पा रानी अस्पताल पहुंचीं। भाई का शव देखा, फिर हाथ जोड़कर बोलीं—मेरे पास टाइम नहीं है, तबीयत खराब है, तुसी ही संस्कार कर दो, अस्थियां भी तुसी ले जाओ। और वह चली गईं। पुष्पा रानी उसी आंगन की बेटी हैं जिसने राखी पर रोना और भैया दूज पर भाई की लंबी उम्र की दुआएं करना सीखा था। फिर ऐसा क्या बदला कि वही आंखें जो भाई की एक खरोंच पर बरस पड़ती थीं, आज अंतिम विदाई पर भी सूखी रह गईं?  

यह सवाल नहीं बल्कि उस समाज के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो बात-बात में संस्कारों की दुहाई देता है। ऐसी घटनाओं के पीछे गहरी सांस्कृतिक और मानसिक सड़ांध भी है। व्यक्तिगत स्वार्थ, सुविधा का मोह और ‘मैं’ की संस्कृति ने ‘हम’ को पीछे धकेल दिया। मृत्यु के समय भी समय निकालना कठिन लगने लगा है। कुछ महीने पहले सोनीपत में बच्चों ने पिता के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया। करनाल में एक बहन की मौत पर भाई ने फोन पर कहा—अंतिम संस्कार कर देना, मैं नहीं आ सकता और मोबाइल बंद कर दिया। 

रोहतक में पिता के शव को लेकर भाई-बहन झगड़ पड़े। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, एक पैटर्न हैं। इनसे पता चलता है कि रिश्ते मर रहे हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां रिश्तों से विश्वास ही खो देंगी। मौत के समय कोई नहीं आएगा, बीमार पड़ने पर कोई नहीं पूछेगा। जीवन अकेला और ठंडा हो जाएगा। जुगल किशोर तो अपना जीवन पूरा करके चले गए, पर उनकी बहन एक दिन जरूर पछताएगी। 

जब रात में अकेले में बचपन की कोई याद कौंधेगी। जब राखी का वो धागा याद आएगा जो कभी भाई की कलाई पर बांधा था। पछतावे से बेहतर है, समय रहते संभल जाना। रिश्ते बोझ नहीं हैं, रिश्ते ही तो वो छत हैं जो तेज धूप में हमें जलने से बचाते हैं। अगर ये छत ही गिर गई, तो हम सब खुले आसमान के नीचे अकेले खड़े रह जाएंगे, सफल, व्यस्त, पर बिल्कुल अकेले। आइए, इस टूटती डोर को फिर से बुनें, एक फोन कॉल से, एक गले लगने से, एक माफी से।