Friday, August 7, 2026

और यशोधरा नहीं आई मिलने


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लोककल्याण के लिए जब महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु से निकले, तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूरे बारह साल तक बुद्ध भ्रमण करते रहे। इसी दौरान उन्हें आत्मबोध हुआ। उन्होंने मानव कल्याण का मार्ग खोजा।  दीन-दुखियों की पीड़ा का निवारण किया। लोगों को अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। यह सब कुछ करते हुए बारह साल बीत गए। एक दिन कपिलवस्तु के लोगों ने सुना कि उनका राजकुमार सिद्धार्थ नगर में आ रहा है। 

राजा शुद्धोधन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। महात्मा बुद्ध की मौसी और राजा शुद्धोधन की दूसरी पत्नी महाप्रजापति गौतमी की आंखें अपने पाल्य पुत्र को देखने के लिए व्याकुल थीं। सिद्धार्थ के जन्म के बाद महारानी महामाया यानी महादेवी की मौत हो जाने की वजह से राजा शुद्धोधन ने गौतमी से विवाह कर लिया था। सिद्धार्थ का पालन-पोषण भी मौसी गौतमी ने ही किया था। 


तथागत के नगर आगमन की सूचना पाकर नगरवासी उत्तेजित थे। वह अपने राजकुमार को देखने के लिए लालायित थे। राजदरबार में नियत समय पर राजा शुद्धोधन अपने पूरे परिवार और सभासदों के साथ-साथ उपस्थित हुए। राज दरबार के बाहर विशाल जनसमूह उपस्थित था। तभी भिक्षु वेश में तथागत का आगमन हुआ। उन्होंने संन्यासी धर्म के अनुरूप सबका अभिवादन किया और स्वीकार भी किया। वह सबसे प्रेम से मिले। लेकिन उनकी आंखें यशोधरा को खोज रही थीं। 

उससे मिलने सब आए थे। पुत्र राहुल भी एक ओर सकुचाया सा खड़ा अपने पिता को देख रहा था। लेकिन मानिनी यशोधरा वहां नहीं आई थी। वह क्यों जाए उनसे मिलने? जिसने छोड़ा था, वही आकर मिलेगा? उसने तो त्यागा नहीं था? महात्मा बुद्ध समझ गए कि मानिनी यशोधरा अंत:पुर से बाहर निकलकर मिलने नहीं आएगी। उन्हें ही उसके पास जाना होगा।

पहाड़ी इलाकों में हो रही बरसात से उफान पर हरियाणा की नदियां


अशोक मिश्र

हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश हो रही है। इसकी वजह से पहाड़ी इलाकों से अचानक पानी आ जाने से हरियाणा में बहने वाली नदियां उफान पर हैं। बारिश और नदियों के उफान में आने से हरिया के कई जिलों में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। पहाड़ों में हो रहे भूस्खलन और मूसलाधार बारिश के कारण नदियों का जलस्तर खतरे के निशान तक पहुंच रहा है। हालात यह है कि हरियाणा की लगभग सभी प्रमुख नदियां उफान पर बह रही हैं। इसका सबसे पहला दबाव यमुना नदी पर बने हथिनीकुंड बैराज पर पड़ा है। मंगलवार को यमुनानगर स्थित हथिनी कुंड बैराज पर नदी का बहाव अचानक तेज हो गया था। 

कुछ ही घंटों में जल प्रवाह 34,364  क्यूसेक से बढ़कर 79,629 क्यूसेक तक पहुंच गया था। बढ़ते जलस्तर को देखते हुए सिंचाई विभाग को एहतियात के तौर पर बैराज के 18 में से 16 गेट खोलने पड़े और अतिरिक्त पानी को दिल्ली की ओर छोड़ना पड़ा। अब यह पानी दिल्ली तक पहुंचने वाला है। इसी तरह शिवालिक पहाड़ियों से निकलने वाली बरसाती नदियां घग्गर, मारकंडा, टांगरी, सोम, पाथराला और कौशल्या भी पूरे उफान पर हैं। अंबाला में मारकंडा खतरे के निशान के आसपास और टांगरी तीन फीट ऊपर बह रही थी। 

कुरुक्षेत्र के शाहाबाद में मारकंडा 26 हजार क्यूसेक से ज्यादा के वेग से बह रही है, तो कैथल में घग्गर का जलस्तर डेंजर लेवल के आसपास है। सिरसा के ओटू हेड पर भी घग्गर में लगातार बढ़ोतरी की खबर है। हरियाणा की नदियां जब भी उफान पर आती हैं, तो इन नदियों के आसपास बसे शहरों में सबसे ज्यादा खतरा पैदा हो जाता है। यमुना के रास्ते में पड़ने वाले यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, फरीदाबाद और पलवल में सबसे ज्यादा खतरा होता है। हरियाणा में बाढ़ आने पर सबसे ज्यादा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। अगस्त का महीना धान की फसल के लिए बेहद अहम होता है। 

इस बार खेतों में पानी भरने से सैकड़ों एकड़ से ज्यादा में लगी खरीफ की फसल जलमग्न होने की खबर है। इससे हजारों किसान प्रभावित हुए हैं। यमुनानगर, करनाल, सोनीपत और अंबाला-कुरुक्षेत्र बेल्ट में धान के साथ-साथ चारा और सब्जियों की फसलें भी डूब गई हैं। हर साल नदियों के साथ आई रेत खेतों में जमा हो जाती है जिससे जमीन की उर्वरता पर लंबे समय तक असर पड़ता है। किसान चिंतित हैं कि पानी उतरने के बाद भी खेतों में नमी और कीचड़ के कारण दोबारा बुवाई करना मुश्किल होगा। आम लोगों की परेशानी भी कम नहीं है। नदी किनारे बसे निचले गांवों में रहने वाले लोगों को प्रशासन ने सतर्क रहने को कहा है। जलभराव के कारण पशुओं के लिए चारे की कमी हो गई है और मच्छरों के बढ़ने से बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। 

Thursday, August 6, 2026

शुभे! तुम अधीर क्यों होती हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एक थी पट्टाचारा। बहुत ही सुंदर और चतुर पट्टाचारा को किशोरावस्था में ही पड़ोस के एक युवक से प्रेम हो गया। माता-पिता का ज्ञात हुआ, तो उन्होंने बहुत रोका-टोका, समझाया, लेकिन पट्टाचारा नहीं मानी। वह अपने प्रेमी से विवाह पर अड़ी रही। एक दिन रात्रि में वह अपने प्रेमी के साथ घर से निकल पड़ी। दोनों ने दूसरे नगर में जाकर अपनी गृहस्थी बसाई। दो साल बात पट्टाचारा गर्भवती हो गई। उसने अपने पति से कहा कि दोनों अपने नगर लौट चलते हैं। पति ने कहा, वहां जाने पर केवल अपमान ही मिलेगा। 

इस तरह दो साल और बीत गए। एक बार फिर पट्टाचारा को गर्भ ठहरा, तो उसने समय नजदीक आने पर पति से एक बार फिर पितृगृह चलने का अनुरोध किया। इस बार पति भी मान गया। दोनों अपने शहर की ओर चल पड़े। रास्ता लंबा था और मार्ग में एक घना बीहड़ जंगल था। दोनों अपने बच्चे के साथ एक पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे कि तभी पट्टाचारा को प्रसव वेदना शुरू हो गई। 

इस बार भी बेटा जन्मा। उस समय आग की जरूरत पड़ी, तो पति लकड़ियां बीनने गया, तो उसे सर्प ने डस लिया। मजबूरन पति की लाश को नदी में बहाया और दोनों बच्चों के साथ नदी पार करने लगी। वह दोनों बच्चों को एक साथ नदी पार नहीं करा सकती थी, तो वह नवजात बच्चे को लेकर उस पार गई और उसे एक जगह पत्तों से ढककर बड़े बेटे के पास आने लगी। तभी उनका बड़ा बेटा नदी में बह गया और नवजात बच्चे को सियार लेकर भाग गया। जब वह मायके पहुंची, तो पता चला कि उसके माता-पिता की मौत हो चुकी है। उसके भाई की मौत भी उसी दिन हुई थी। सास ससुर भी बूढ़े हो चुके थे।

इस दुख में वह पागल हो गई। कुछ लोग उसे लेकर महात्मा बुद्ध के पास पहुंचे। बुद्ध ने कहा, शुभे! तुम अधीर क्यों होती हो? एक दिन मरना सबको है और अकेले ही मरना है। आश्रम में कुछ दिन रहने के बाद पट्टाचारा का मन स्थिर हुआ, तो बुद्ध उसे भिक्षुणी बना लिया।

दूध-दही का खाणा, यो सै म्हारा हरियाणा कहावत हो रही विफल


अशोक मिश्र

हरियाणा में खान-पान की एक समृद्ध परंपरा रही है। इसका कारण यह माना जाता है कि हरियाणा की धरती सदैव हरी-भरी रही है। यह पशुओं के लिए आवश्यक पौष्टिक चारा और उनके जीवन के लिए अनुकूल पर्यावरण सदैव से मौजूद रहा है। यही वजह है कि राज्य के लोग  दूध-दही और उसके अन्य उत्पादों को खाने-पीने के काफी शौकीन रहे हैं। हरियाणा के लोग अपने खान-पान के बारे में जब भी बातचीत करते हैं, तो बड़े गर्व से कहते हैं कि दूध-दही का खाणा, यो सै म्हारा हरियाणा। 

लेकिन आज यह गर्वोक्ति फीकी पड़ रही है। राज्य के पोषण पुनर्वास केंद्रों में दिनोंदिन कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। फरीदाबाद के ही कुपोषण पुनर्वास केंद्र में ही रोज कोई न कोई बच्चा भर्ती किया जा रहा है। लगभग सभी जिलों में कमोबेश यही स्थिति है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के पोषण ट्रैकर पोर्टल की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, जब 13.82 लाख बच्चों की जांच की गई तो करीब 35 फीसदी बच्चे कुपोषित मिले। इनमें 22 फीसदी बौनापन, सात फीसदी कम वजन, करीब तीन फीसदी कमजोर और तीन फीसदी अत्यधिक वजन यानी मोटापे के शिकार पाए गए। 

इन बच्चों के इलाज के लिए बने पोषण पुनर्वास केंद्रों पर भी दबाव बढ़ रहा है। हरियाणा में खाने-पीने की कोई कमी नहीं है। यहां सभी तरह के अनाज, फल और सब्जियां उगाई जाती हैं। यह पड़ोसी राज्यों में भी बिकने के लिए भेजी जाती हैं। दरअसल, हरियाणा में बढ़ते कुपोषण का सबसे बड़ा कारण जानकारी का अभाव है। पालन-पोषण के दौरान बरती गई लापरवाही है। राज्य के ज्यादातर अभिभावक डेढ़ से दो साल तक अपने बच्चों को सिर्फ  दूध पिलाते रहते हैं। इसके अलावा कोई खाद्यान्न नहीं देते हैं। जबकि छह महीने के बाद बच्चे के लिए दूध पूर्ण आहार नहीं रह जाता है। बच्चे को दाल, खिचड़ी, बारीक की हुई सब्जियां, केला, आलू जैसे पूरक आहार देना भी बहुत जरूरी होता है। 

यह बच्चे को कुपोषण से बचाता है। बच्चों में कुपोषण का एक और कारण है, गर्भवती महिला का एनीमिया से पीड़ित होना। खून की कमी की वजह से गर्भस्थ शिशु को पैदा होने से पहले ही भरपूर पोषण नहीं मिल पाता है। इसकी वजह से जब वह पैदा होता है, तो उसका वजन मानक से बहुत कम होता है। गर्भावस्था के दौरान माताओं में खून की कमी और असंतुलित खानपान भी कुपोषण को बढ़ा रहे हैं। इससे निपटने के लिए प्रदेश में 25,962 आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए 23,447 कार्यकर्ता काम कर रही हैं, 149 प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं। दूध उपहार योजना के तहत एक से छह साल के बच्चों के साथ गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को खीर, प्रोटीन मिल्क बार और स्किम्ड मिल्क पाउडर दिया जा रहा है। राज्य सरकार कुपोषण दूर करने का भरसक प्रयास कर रही है, लेकिन लोगों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है।

Wednesday, August 5, 2026

बेटा राहुल! बुद्ध की शरण में जाओ

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारतीय नारियों में उर्मिला और यशोधरा का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उर्मिला के पति लक्ष्मण अपने बड़े भाई राम के पथ का अनुगमन करने के लिए स्वेच्छा से चौदह वर्ष के वनवास पर गए थे। यशोधरा के पति सिद्धार्थ मानव कल्याण के लिए पत्नी का परित्याग करके चले गए थे। 

इन दोनों महिलाओं की पीड़ा एक समान थी। चौदह साल बाद उर्मिला को अपने पति का सान्निध्य प्राप्त हुआ, लेकिन बारह साल बाद यशोधरा के पति सिद्धार्थ आए तो, लेकिन एक भिक्षु के रूप में, जो अब उसका नहीं, पूरे मानव समाज के लिए समर्पित हो चुका था। यशोधरा ने जब सुना कि उसके पति नगर में आए हैं,तो वह अपने ससुर महाराज शुद्धोधन की तरह महल के बाहर उनसे मिलने नहीं गई। ससुराल और नैहर दोनों कुल के हिसाब से वह राजकुल की क्षत्राणी थी। अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी। गर्व तो होना ही था। 

महात्मा बुद्ध यशोधरा के अंत:पुर में पधारे। यशोधरा ने अपने पति को देखा, भिक्षुक रूप में। उन्हें देखते ही दांपत्य जीवन की तमाम स्मृतियां जीवंत हो उठीं। बुद्ध ने उसके त्याग को आदर प्रदान करते हुए कहा, यशोधरे! कुशल से तो हो? यशोधरा बुद्ध की आवाज सुनकर गदगद हो उठी। उसने कहा- हां, स्वामी! बुद्ध बोले, स्वामी नहीं, भिक्षु कहो यशोधरे! मैं अपना धर्म निभाने आया हूं। तुम कुछ भिक्षा दोगी। यशोधरा ने कहा, भंते! आप भी पूर्व संबंधों के आधार पर कुछ प्रतिदान कर सकेंगे? 

बुद्ध ने कहा कि भिक्षु धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं हो, तो अवश्य करूंगा। यह सुनकर यशोधरा ने कहा कि तो फिर पुत्र राहुल को अपने पितृ कुल की परंपरा का निर्वाह करने का अधिकार प्रदान कीजिए। इतना कहकर उसने अपने पुत्र राहुल को पुकारा और कहा, जाओ बेटा, अपने पितृ कुल की परंपरा का अनुसरण करो। बुद्ध की शरण, धर्म की शरण में और संघ की शरण में जाओ। इस तरह उस महाविदुषी ने मानव कल्याण के लिए एक और महात्याग किया।

हरियाणा में कब रुकेंगी प्रेम संबंधों के नाम पर होती निर्मम हत्याएं?

 हरियाणा में कब रुकेंगी प्रेम संबंधों के नाम पर होती निर्मम हत्याएं?

अशोक मिश्र

फरीदाबाद के सिकरोना गांव स्थित सरस्वती सीनियर सेकेंडरी स्कूल की शिक्षिका की 27 बार चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई। हत्या का कारण यह बताया जा रहा है कि हत्या का आरोपी उससे प्रेम करता था और शिक्षिका पर विवाह करने के लिए दबाव डाल रहा था। शिक्षिका पहले से ही शादीशुदा थी। उसने फिरोजपुर कलां निवासी विकास से बारह साल पहले प्रेमविवाह किया था। टीचर के दो बच्चे भी थे। हत्या के आरोपी अमित से उसकी पहचान तब हुई थी, जब वह दो साल पहले फिरोजपुर कलां में अमित के घर के पास के एक स्कूल में पढ़ाती थी। तभी दोनों की आपस में पहचान हुई थी। आरोपी टीचर पर विवाह करने के लिए दबाव डाल रहा था, जबकि टीचर संध्या ने मना कर दिया था और वहां से नौकरी छोड़कर वह सिकरोना गांव में पढ़ाने लगी थी। 

एकतरफा प्यार, अवैध संबंध या प्रेम विवाह जैसे मामलों में हत्या की घटनाएं इधर काफी देखने को मिल रही हैं। हरियाणा में एकतरफा प्रेम में होने वाली हत्याएं अब कोई अपवाद नहीं रहीं, यह एक पैटर्न बन चुकी हैं। ऐसे मामलों में प्रेम भावना नहीं, कब्जे की मानसिकता बन जाता है। हरियाणा जैसे प्रदेश में जहां पितृसत्ता, इज्जत और मर्दानगी की परिभाषा बहुत कठोर है। यहां प्रेम को भी अक्सर उसी चश्मे से देखा जाता है। लड़के को बचपन से सिखाया जाता है कि उसे जीतना है, पाना है और लड़की को सिखाया जाता है कि उसका इनकार अंतिम नहीं है। 

जब यही लड़का बड़ा होकर एकतरफा प्रेम करता है, तो वह प्रेम में संवाद नहीं, अधिकार खोजता है। अगर लड़की हां नहीं कहती, तो उसे लगता है कि उसकी मर्दानगी को चुनौती दी गई है। इस चुनौती का जवाब वह हिंसा से देता है। यह प्रेम की विफलता नहीं, हक जताने की असफलता का प्रतिशोध है। फरीदाबाद की शिक्षिका की सोमवार को की गई हत्या इसी भावना को दर्शाती है। ऐसे मामलों में प्रेम नहीं, बल्कि झूठ, धोखा और पितृसत्तात्मक दोहरे मापदंड हत्या की वजह बनते हैं। पुरुष के अवैध संबंध को अक्सर चुपचाप सहन करने या दबाने की कोशिश होती है, पर महिला के संबंध को सीधे उसके चरित्र और पूरे परिवार की इज्जत से जोड़कर उसकी जान तक ले ली जाती है। यह रवैया लगभग देश के सभी राज्यों में पाया जाता है। 

यह सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच का है। पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर लेती है, जैसा टीचर हत्याकांड में हुआ। कोर्ट आने वाले दिनों में उसे वाजिब सजा भी दे देगी। इसके बाद भी ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं। जब तक समाज में प्रेम का अर्थ पाना नहीं, देना नहीं सिखाया जाएगा, जब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगा पाना संभव नहीं होगा। जब तक लड़कों को यह नहीं सिखाया जाएगा कि किसी का इनकार भी पूरा वाक्य है, तब तक ऐसे खून बहता रहेगा।

Tuesday, August 4, 2026

अब मैं राजकुल का सदस्य नहीं रहा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने लगभग पचास वर्ष तक पूरे देश में मानव धर्म का प्रचार किया। राज्य का त्याग किए हुए उन्हें बारह वर्ष हो चुके थे। एक दिन बुद्ध कपिलवस्तु में राजा शुद्धोधन के सामने भिक्षु के रूप में खड़े हो गए। शुद्धोधन उन्हें देखकर आश्चर्यचकित थे। जिसे चक्रवर्ती सम्राट बनना था, वह आज अपने पिता के सामने भिक्षु के रूप में खड़ा है। 

वह विचलित हो उठे और बोले, क्या यही हमारे कुल की परिपाटी है? अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम भिक्षु का रूप त्यागकर वापस लौट सकते हो। यह सारा राजपाट तुम्हारा ही है। अपने पिता की विह्वल वाणी को सुनकर भी बुद्ध धीर गंभीर बने रहे। उन्होंने कहा कि राजन! यह आपके कुल की परिपाटी नहीं है। यह बुद्ध के कुल की परिपाटी है। बुद्ध कुल में हर भिक्षु को अपनी क्षुधा पूर्ति के लिए भिक्षा मांगनी ही पड़ती है। मैं अब राजकुल का सदस्य नहीं रह गया हूं। मैं आत्म कल्याण और लोक मंगल की कामना से साधना में लगे भिक्षु समुदाय का परिजन हूं। 

महात्मा बुद्ध की बात सुनकर राजा शुद्धोधन की आंखों से आंसू बहने लगे। लेकिन उन्हें इस बात का संतोष था कि कम से कम उनका पुत्र जीवित सामने खड़ा है। उन्हें लगा कि अब अपने पुत्र को समझा-बुझाकर वापस राजकुल में नहीं ला सकते हैं। इससे अच्छा है कि उसे मुक्त कर दिया जाए। लेकिन उन्होंने कहा कि क्या तुम एक दिन मेरा आतिथ्य स्वीकार करोगे। 

बुद्ध ने कहा कि कल मैं अपने संघ के साथ आतिथ्य स्वीकार करने आऊंगा। अगले दिन नियत समय पर महात्मा बुद्ध राजभवन में पहुंचे और सभी परिजनों का उसी प्रकार अभिवादन स्वीकार किया जैसे वह संघ में रहकर करते थे। इसके बाद वह चले गए।

हरियाणवी लोकगीतों में पीहर की याद है तो पिया से बिछड़ने की पीड़ा भी



अशोक मिश्र

कल सावन का पहला सोमवार था। शिवालय में भक्तों की भारी भीड़ जुटी हुई थी। अपने आराध्यदेव की भक्त पूजा-अर्चना करके देश, प्रदेश और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना कर रहे थे। इसी के साथ-साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों में सावनी लोकगीतों की भी धुन सुनाई देने लगी है। सभी प्रदेशों के सावन से जुड़े लोकगीतों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, माधुर्य है और लालित्य है। हरियाणवी लोकगीतों का तो कहना ही क्या है! आषाढ़ की तपिश के बाद जब पहली फुहार पड़ती है तो खेत, बाग और आंगन सब एक साथ भीगते हैं, मिट्टी की सोंधी खुशबू से सारा परिवेश महक उठता है। 

उसी भीगेपन और सोंधी खुशबू से फूटते हैं सावन के लोकगीत। लोकगीत हरियाणा की औरतों की अपनी डायरी रहे हैं। इनमें उनकी खुशी है, तो दुख भी दर्ज है। नवविवाहिताओं के अपने प्रिय से मिलन है, तो सावन में पीहर लौटने की वजह से विरह की पीड़ा भी समाहित है। इन लोकगीतों में बाग में डले झूले की पींग है, तो नई बहू की तीज की कोथली की आस है। बहू की सास से बाग में झूला डलवाने का मीठा उलाहना है। जहां बहू अपनी सास से मनुहार करती है कि ‘आया री सासड़ सावन मास’। वहीं पीहर की गलियों की याद है जहां उसने अपनी सहेलियों, भाभियों और भाइयों-बहनों के साथ जीवन के सुखद दिन बिताए हैं। 

अब हरियाणा की युवा गायिकाएं पुरानी बंदिशों को नए संगीत के साथ गा रही हैं। उन पर बेहतरीन नृत्य कर रही हैं। अपने नृत्य कौशल और पहनावे में हरी-हरी चूड़ियों, धानी चुनरिया और अमुआ की डाली वाले बिंबों को फिर से फैशन बना रही हैं। यह सही है कि सावनी गीतों की आत्मीयता घटी है, पर उनकी दृश्यता और पहुंच बढ़ी है। एक रील हजारों लोगों तक पहुंचकर उन्हें हरियाणा की पारंपरिकता से परिचय करवा रही है। पुराने गीतों की भाषा ठेठ हरियाणवी थी। उसमें अलंकार नहीं, सीधे-सीधे मन के भावों को व्यक्त करने की भावना थी। उनमें कोथली, पीहर, सासरा, बाग, मोर, पींग जैसे शब्द बार-बार आते थे। 

प्राचीन लोकगीतों का उद्देश्य किस्से के माध्यम से अपनी पीड़ा और खुशी को व्यक्त करके मन को हल्का करना था। आज के सावनी गीतों में भाषा हिंदी-मिश्रित हरियाणवी हो गई है। इसका कारण यह है कि इन गीतों का बड़े पैमाने पर प्रसार हो सके, ज्यादा से ज्यादा दर्शक इसे देख-समझ सकें। वाद्ययंत्रों में भी काफी बदलाव आया है। संगीत में ढोलक के साथ कीबोर्ड, गिटार और डीजे बीट्स जुड़ गए हैं। अब गीत छोटे हो गए हैं दो-ढाई मिनट के, ताकि रील में फिट हो जाएं। 

इसके बावजूद अच्छी बात यह है कि धुन वही पुरानी है। सावन का महीना आज भी हरियाणा की बेटी को पीहर की तरफ खींचता है। जब तक ‘सावन आया हे मां मेरी मैं सुण्या जी’ जैसी पंक्तियां किसी महिला के होंठों पर हैं, सावनी लोकगीतों की परंपरा हमेशा कायम रहेगी।

Monday, August 3, 2026

यह भी ढोल बजाकर अपना पेट भर लेगा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महाराजा रणजीत सिंह जितना अपनी बहादुरी और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे, उतना ही वह साहित्य और कला प्रेम के लिए जाने जाते थे। उन्हें शेर-ए-पंजाब कहा जाता था क्योंकि उन्होंने अपने राज्य का विस्तार  लाहौर और अमृतसर से लेकर पेशावर, कश्मीर और मुल्तान तक कर लिया था। उनको अपने समय में सबसे धर्म निरपेक्ष शासक माना जाता था। उनके दरबार में हिंदू, सिख और मुसलमान को ऊंचे पद हासिल हुए थे। 

उन्होंने अपने राज्य का काफी शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था। उन्होंने अपने शासनकाल में किसी को भी मृत्युदंड नहीं दिया था, ऐसा कहा जाता है। एक बार की बात है। वह दरबार में बैठे थे कि तभी एक मसखरा आया और उसने महाराजा रणजीत सिंह को कई हास्य प्रसंग सुनाए। महाराजा काफी प्रसन्न हो गए। उन्होंने उस मसखरे से प्रसन्न होकर अपना सबसे प्रिय हाथी उसे उपहार में दे दिया। हाथी पर बैठकर मसखरा अपने घर रवाना हुआ। 

अब उसके पास समस्या थी कि वह हाथी को खिलाए कैसे? हाथी कोई थोड़ा सा तो खाता नहीं है। वह था तो एक गरीब मसखरा ही। उसने हाथी के गले में एक ढोल बांध दिया और छोड़ दिया। हाथी भटकता हुआ महाराजा के फीलखाने में पहुंच गया। लोगों ने यह बात महाराजा तक पहुंचाई। यह सुनकर रणजीत सिंह को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने मसखरे को बुलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपना हाथी दिया और तुमने इसकी यह दुर्दशा कर दी। 

मसखरे ने हाथ जोड़कर कहा कि महाराज! आप जानते हैं कि मैं कितना गरीब हंू। मैं ढोल बजाकर अपना पेट पालता हूं। मैंने इसके गले में ढोल बांध दिया ताकि यह भी ढोल बजाकर अपना पेट भर ले। यह बात सुनकर महाराजा रणजीत सिंह बहुत हंसी आई और अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने बहुत सारा धन देकर मसखरे को रवाना कर दिया।

हरियाणा में स्कूलों की दशा बदलने को सैनी सरकार ने कस ली कमर


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 150 नए राजकीय विद्यालयों के भवन को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करने का फैसला लिया है। यही नहीं, सीएम सैनी ने 719 उत्कृष्ट विद्यालयों में भी आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने और आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। वैसे भी सीएम ने पहले ही सरकारी स्कूलों में मुखिया को एक लाख रुपये तक स्कूल की व्यवस्था सुधारने के लिए बिना विभागीय अनुमति के खर्च करने की छूट दे रखी है। इतने रकम से स्कूलों में बच्चों के लिए पेयजल की व्यवस्था, लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था की जा सकती है। 

यदि स्कूल में पहले से ही ये सुविधाएं हैं, तो इससे दूसरे भी सुधारात्मक कार्य किए जा सकते हैं। स्कूलों में सुविधाएं बढ़ने और अध्यापकों की भर्ती से परीक्षा परिणाम में भी काफी सुधार आया है। याद करें कि 2023 में दसवीं का पास प्रतिशत केवल 57.73 प्रतिशत था, जो सरकार और अध्यापकों के संयुक्त प्रयास की वजह से 2024 में 94 प्रतिशत से ऊपर चला गया। 2025 में भी नियमित छात्रों का परिणाम 92.49 प्रतिशत रहा जो काफी संतोषजनक है। एएसईआर यानी एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट 2024 की रिपोर्ट में हरियाणा के सरकारी स्कूलों ने राष्ट्रीय औसत को भी पीछे छोड़ दिया था। 

रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों में कक्षा तीन, पांच और आठ में भाषा और गणित की दक्षता का स्तर देश के सरकारी और निजी स्कूलों के मिले-जुले औसत से अधिक है। इसी सुधार की झलक सुपर-100 जैसी योजनाओं में भी दिखाई देती है, जहां सरकारी स्कूलों के 21 बच्चों ने बड़े कीर्तिमान बनाए हैं। यह हरियाणा के लिए एक गौरव की बात है। हालांकि सैनी सरकार को शिक्षकों की भर्ती के संबंध में ध्यान देने की जरूरत है। यदि सभी विद्यालयों के लिए आवश्यकता के अनुरूप शिक्षकों की भर्ती की जाती है, तो इससे न केवल स्कूलों में होने वाली पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरेगी, वरन प्रदेश में बेरोजगारी भी कम होगी। 

विधानसभा में 27 फरवरी 2026 को कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला के सवाल का जवाब देते हुए शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा ने कहा था कि जनवरी 2026 तक 15,451 पद खाली हैं जिनमें 3,998 पीजीटी, 7,707 टीजीटी और 3,746 पीआरटी शामिल हैं। एक अन्य आंकड़े के अनुसार 298 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी नियमित शिक्षक नहीं है और 1,051 स्कूल केवल एक स्थायी शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। कुल मिलाकर हरियाणा के सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से बेहतर बनाने की है। सरकारी स्कूलों में इमारतें और बोर्ड रिजल्ट सुधर रहे हैं। जब तक हर कक्षा में शिक्षक और हर स्कूल में पानी, बिजली और इंटरनेट जैसी बुनियाद पूरी तरह पक्की नहीं होगी, तब तक सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी।