Saturday, August 22, 2026

प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध जब घर-परिवार और राजपाट त्यागकर मानव कल्याण के लिए घर से निकले, तो उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जिस व्यक्ति ने अपनी 29 वर्ष की आयु तक किसी प्रकार के अभाव का अनुभव न किया हो, जिसने कभी कड़ी धूप में खड़े होने की जरूरत ही नहीं पड़ी हो, उस राजकुमार को जगह-जगह की धूल छाननी पड़ रही थी। 

जिसने अपने जीवन में स्वादिष्ट भोजनों का ही स्वाद चखा हो, उसे केवल एक समय की भिक्षा पर ही अपना गुजारा करना पड़ रहा हो, ऐसी स्थिति काफी दारुण थी। नंगे पैर चलने से पैरों में घाव हो गया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए उनका मन विचलित हो रहा था। चलते चलते वह एक झील के पास पहुंचे जिसका जल बड़ा शीतल था। उन्होंने उस झील का पानी पिया। 

तभी उनकी निगाह एक गिलहरी पर पड़ी। वह अपनी पूंछ भिगोकर झील को सुखाने का प्रयास कर रही थी। महात्मा बुद्ध ने उस गिलहरी से बड़े प्रेम से पूछा, प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो? उस गिलहरी ने जवाब दिया कि इस झील ने मेरे बच्चों को निगल लिया है, मैं इसको सुखाकर रहूंगी। बुद्ध ने कहा कि तुम्हारे पूंछ भिगोकर पानी बाहर छिड़कने से झील सूख जाएगी? गिलहरी ने कहा कि मेरे पास समय नहीं है। मैं यह प्रयास करती रहूंगी।

 बुद्ध ने कहा कि इस काम में कितना समय लगेगा, इसका तुम्हें भान है? इसमें तुम्हारा पूरा जीवन बीत जाएगा, लेकिन झील नहीं सूखेगी। गिलहरी ने कहा कि भले ही जीवन बीत जाए, लेकिन मैं यह काम करके ही रहूंगी। अपनी पीड़ा से व्यथित बुद्ध के हृदय तक गिलहरी की बात पहुंची। उन्होंने सोचा कि जब यह छोटी सी गिलहरी जीवन भर प्रयास करके इस विशाल झील को सुखाने को तत्पर है, तो मैं मनुष्य होकर इन कठिनाइयों से भागने की सोच रहा हूं। अब उनका आत्मविश्वास लौट आया था।

जिन्होंने बचपन संवारा, बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर

अशोक मिश्र

हरियाणा आज भी अपने बड़े बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा के लिए देश में विख्यात है। यह प्रदेश तो बड़ों के आदर-सत्कार के लिए जाना जाता था। जहां ताऊ-चाचा के बिना कोई ब्याह नहीं होता था। जहां दादा के हुक्के के धुएं से ही घर की शाम बनती थी। वहीं आज गांवों में भी ताले लगे हुए घरों में अकेले रह रहे बुजुर्ग दिख जाते हैं। बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने की घटनाओं को पढ़ सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं, लेकिन अफसोस कि ऐसी घटनाएं अब प्रदेश में एक खामोश सच्चाई बनती जा रही हैं। 

जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन कंधों पर बैठकर मेले देखे, बाजार में घूमने गए, जिन आंखों ने बुखार में रात-रात भर जागकर इंतजार किया, वही हाथ, वही कंधे, वही आंखें आज एक कमरे के कोने में सामान की तरह अकेली छोड़ दी जा रही है। यह सिर्फ  किसी एक परिवार की कहानी नहीं है, यह पूरे समाज की विडंबना है। कहने को तो लोग तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए, लेकिन वही लोग संवेदना की सीढ़ियां उतरते गए हैं, यह कटु सत्य है। प्रदेश में दिनोंदिन नए खुलते वृद्धाश्रम और उनमें बढ़ती बुजुर्गों की संख्या का सबसे बड़ा कारण एकल परिवार का सपना है जिसे लोगों ने आधुनिकता समझ लिया है। 

हरियाणा में वृद्धाश्रम  अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहे, ग्रामीण इलाकों और जिला मुख्यालयों के आसपास ऐसे आश्रमों की संख्या चुपचाप बढ़ रही है। प्रदेश में पहले घर आंगन होता था जिसमें दादा-दादी कहानियां होते थे, संस्कार होते थे। अब घर एक फ्लैट बन गया है, जहां दो लोगों के बाद तीसरे की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है। नौकरी, करियर, बच्चों की पढ़ाई और शहरों की भागदौड़ ने लोगों को इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि बुजुर्गों की धीमी चाल उन्हें बोझ लगने लगी है। 

उनकी दवाइयों का समय, उनकी बार-बार की एक ही बात, उनका पुराने जमाने का टोकना-टाकना, यह सब भागदौड़ भरे जीवन के हिसाब से फिट नहीं बैठता है और इसका नतीजा यह होता है कि घर का बुजुर्ग वृद्धाश्रम में नजर आने लगता है। हरियाणा जैसे प्रदेश में यह बदलाव और भी ज्यादा चुभता है। सोच कर देखें। एक दिन वे लोग भी वहीं खड़े होंगे जिन्होंने अपने बुजुर्ग माता पिता को वृद्धाश्रम भेजा है। उनके भी घुटने जवाब दे चुके होंगे, आंखें भी धुंधली हो गई होंगी। तब उन्हें क्या चाहिए होगा? 

एक आलीशान कमरा या अपने बच्चों की आहट? जो बीज आज वह बो रहे हैं, वही कल उनकी फसल होगी। इस जटिल समस्या का समाधान कानून नहीं कर सकता है। लोगों के मन में बदलाव लाकर किया जा सकता है। मां-बाप को बोझ नहीं, घर की नींव समझना होगा। जैसे नींव दिखाई नहीं देती पर उसी पर पूरी इमारत टिकी होती है, वैसे ही बुजुर्ग दिखाई भले कम देते हों, पर उन्हीं के आशीर्वाद पर घर टिका होता है।

Friday, August 21, 2026

गण श्रेष्ठो! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के समय में प्राचीन कोशल महाजनपद की राजधानी  श्रावस्ती थी। इसके राजा थे प्रसेनजित जिन्हें पाली भाषा में पसेनदी कहा जाता है। महात्मा बुद्ध और प्रसेनजित समवयस्क थे। एक बार की बात है। श्रावस्ती में अकाल पड़ा। कई वर्ष तक बरसात नहीं हुई। खेतों में फसल नहीं बोई जा सकी। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए। प्रजा भूख की वजह से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही थी। 

राजा प्रसेनजित भी जितना हो सकता था, गरीब प्रजा के लिए उपाय कर रहे थे, लेकिन वह पर्याप्त नहीं था। उसी क्षेत्र में उन दिनों महात्मा बुद्ध भी थे। उन्होंने श्रावस्ती का हाल सुना, तो उनका मन करुणा से भर गया। वह श्रावस्ती पहुंचे तो नगर के धनिकों ने उनका प्रवचन सुनने के लिए एक आयोजन किया। महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस समय अकाल के कारण नरकंकाल जैसे दिखने वाले लोगों की सेवा करना ही सबसे बड़ा आवश्यक धर्म और कर्तव्य है। 

बुद्ध की वाणी सुनकर अकालग्रस्त लोगों में आशा का संचार हुआ कि शायद कोई मदद को आगे आए। धनिक और राजवंश के लोग भूखे प्यासे लोगों की मदद तो करना चाहते थे, लेकिन वह अपने धन में खर्च करना गंवारा नहीं था। उन्होंने बहाने बनाने शुरू कर दिए। लोगों की बात सुनकर बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां बैठी एक भिखारी की बेटी सुप्रिया ने कहा कि मैं अपनी शक्ति भर लोगों को भोजन कराने का दायित्व लेती हूं। 

लोगों ने पूछा, तुम ऐसा कैसे करोगी। सुप्रिया ने कहा कि मैं नगर के धनी और संपन्न परिवारों से मांगकर लाऊंगी और अकालग्रस्त लोगों को खिलाऊंगी। यह सुनकर बुद्ध ने कहा कि गण श्रेष्ठो! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। साधनहीनता किसी कार्य में बाधा नहीं बन सकती है। यह सुनकर धनिक शर्मसार हुए और उन्होंने सहायता का वचन दिया।

हरियाणा के युवाओं को चाहिए सिर्फ एक भरोसेमंद इकोसिस्टम


अशोक मिश्र

हरियाणा के औद्योगिक और तकनीकी विकास की आधारशिला जेन जी के कंधे पर ही टिकी है। हरियाणा की कुल आबादी का 26.6 प्रतिशत हिस्सा जेन जी है। राज्य की कुल आबादी लगभग तीन करोड़ के आसपास मानी जाती है। इस हिसाब से देखें, तो प्रदेश में लगभग 75 से 80 लाख युवा जेन जी वर्ग में आते हैं। इन्हीं में से वह उद्यमी निकल रहे हैं जो गुरुग्राम की साइबर सिटी से लेकर हिसार की कृषि यूनिवर्सिटी तक अपना बिजनेस खड़ा कर रहा है। इन युवाओं को सफलता का मंत्र देने के लिए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी आज गुरुग्राम यूनिवर्सिटी पधारेंगे। इनके साथ होंगे प्रदेश के नामी-गिरामी उद्यमी जो अपने अनुभवों से इन जेन जी इंटरप्रेन्योर को समृद्ध करेंगे। 

कार्यक्रम में छह मास्टर क्लास रूम स्थापित किए जाएंगे और इनके माध्यम से युवाओं को उद्यमी बनने की ट्रेनिंग दी जाएगी। डिपार्टमेंट फार प्रमोशन आफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2026 तक प्रदेश में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या 11,620 से अधिक हो चुकी थी, जिन्होंने सीधे तौर पर 1,39,600 से ज्यादा नौकरियां पैदा की हैं। 

कुछ महीने पहले तक यह आंकड़ा 8,800 से 9,500 के बीच बताया जा रहा था। हरियाणा में जेन जी इंटरप्रेन्योर का कारोबार अब करोड़ों से निकलकर अरबों डॉलर की वैल्यूएशन में गिना जाने लगा है। राज्य से 19 यूनिकॉर्न निकले हैं, यानी ऐसी कंपनियां जिनका मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक है। सैनी सरकार ने भी इन युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए सौ करोड़ रुपये का आत्मनिर्भर स्टार्टअप वेंचर फंड, 50 करोड़ रुपये का को-इनवेस्टमेंट प्लान और 2025-26 के बजट में 20 हजार एकड़ में 10 नई औद्योगिक मॉडल टाउनशिप बनाने का ऐलान किया है। यह एक सकारात्मक कदम है जिसकी सराहना की जानी चाहिए। 

मुख्यमंत्री लगातार युवाओं से जॉब सीकर नहीं, जॉब क्रिएटर बनने का आह्वान कर रहे हैं। इसके लिए मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं का विस्तार किया जा रहा है। हरियाणा सरकार ने हाल ही में एआई मिशन, सेमीकंडक्टर पॉलिसी और एच-हब जैसे वर्ल्ड-क्लास इनक्यूबेटर की घोषणा की है। लेकिन आशंकाएं भी कम नहीं हैं। प्रदेश में 65 रोजगार कार्यालयों में 4.04 लाख बेरोजगार युवा पंजीकृत हैं। 2024 में 46 हजार से अधिक ग्रेजुएट युवाओं ने सफाई कर्मचारी की संविदा नौकरी के लिए आवेदन किया था। 

यह दर्शाता है कि उद्यमिता का रास्ता अभी सबके लिए आसान नहीं है। इसके बावजूद हरियाणा की कहानी अब बदल रही है। 80 लाख जेन जी में से यदि केवल एक प्रतिशत भी गंभीर उद्यमी बनता है तो प्रदेश को 80 हजार नए उद्यम मिल सकते हैं। अभी तो यह शुरुआत है। मुख्यमंत्री का आज का संवाद इसी कारण महत्वपूर्ण है कि सरकार सुनना चाहती है कि यह पीढ़ी नौकरी मांगना नहीं, नौकरी बांटना चाहती है। उसे चाहिए सिर्फ एक भरोसेमंद इकोसिस्टम।

Thursday, August 20, 2026

अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले

बोधिवृक्ष

 अशोक मिश्र

राजगृह में रहने वाले अर्थवसु बहुत ही धनी थे। उनका व्यापार बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ था। वह बहुत ही कृपण व्यक्ति माने जाते थे। उन्हें किसी ने कभी किसी को दान करते हुए नहीं देखा था। एक दिन पुत्र विडाल ने घर आकर अपने पिता अर्थवसु से उलाहना दिया। विडाल ने कहा, तात! हमारे विद्यालय के सहपाठी कहते हैं कि तुम इतने साधारण वस्त्र पहनते हो, तुम्हें अर्थवसु का पुत्र कौन कहेगा। राजगृह के सबसे धनी व्यापारी का पुत्र इतने साधारण वस्त्र पहनता है। आर्य हमारी महत्वाकांक्षाओं का अनादर क्यों करते हैं। 


तभी ज्येष्ठ पुत्र-वधु तिर्यग आ पहुंची। उसने कहा कि विडाल सच कहते हैं आर्य श्रेष्ठ। आज सावित्री वट पूजा के समय ग्राम्य ललनाओं ने मुझसे जो बात कही, उसको सुनकर मेरा अंत:करण रो रहा है। तुम्हारे श्वसुर इतने धनाढ्य हैं कि वह तुम्हें नख शिख स्वर्णाभूषणों से लाद सकते हैं, लेकिन सावित्री पूजा के समय भी तुम्हें वस्त्र सामान्य युवती की ही तरह हैं। अर्थवसु अपने पुत्र और पुत्र-वधु की बात सुनकर भी चुप रहे। 


कुछ वर्ष बीते। वर्षा ने तो जैसे राजगृह से मुंह मोड़ लिया। अकाल पड़ गया। अर्थवसु ने इस संकट में अपने अनाज गृह और कोष का मुंह खोल दिया। जब तक वर्ष नहीं हुई, राजगृह में अर्थवसु ने किसी को भूखा नहीं सोने दिया। लोग आश्चर्यचकित हो उठे। महात्मा बुद्ध ने यह सुना तो वह गदगद हो उठे। वह अर्थवसु के दर्शन को लालायित हो उठे।


 बुद्ध जब वहां पहुंचे, तो तिर्यग ने अपने वृद्ध श्वसुर को आवाज दी, आर्य श्रेष्ठ, उठिए। तथागत आज आपके द्वार पर आए हैं। अर्थवसु ने अपनी आंखें खोली। तथागत की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले। तुमने सारे राजगृह की रक्षा की। यह सुनकर अर्थवसु की बूढ़ी आंखों में चमक आई और उसकी आत्मा ने शरीर त्याग दिया।

किशाऊ बांध परियोजना से निकट भविष्य में बुझेगी हरियाणा की प्यास


अशोक मिश्र

सदियों पहले हरियाणा को हरित प्रदेश कहा जाता था क्योंकि यहां की नदियां और जमीन जल से परिपूर्ण थे। पिछले चार-पांच दशक में लोगों ने नदी और जमीन के पानी का इतना शोषण किया कि आज यह राज्य जल संकट से जूझ रहा है। इस जलसंकट को दूर करने के लिए 16 जून को छह राज्यों हिमाचल, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने मिलकर किशाऊ बांध बनाने की परियोजना पर सहमति जताई थी। किशाऊ बांध परियोजना के चलते आने वाले कुछ वर्षों में हरियाणा का जल संकट खत्म होने के आसार बनने लगे हैं। समझौते के तहत हरियाणा ने बिजली की जगह पानी को प्राथमिकता दी है और उसे कुल उपलब्ध जल का 47.82 प्रतिशत मिलेगा। 

आंकड़ों में यह हिस्सा 1324 एमसीएम में से 836 क्यूसेक है, जो पीने और सिंचाई दोनों के लिए अतिरिक्त होगा। किशाऊ बांध परियोजना केवल एक बांध का निर्माण नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जल संकट के स्थायी समाधान की एक बड़ी राष्ट्रीय परिकल्पना है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की है। इस परियोजना पर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है जिसमें से 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाएगी और बाकी दस प्रतिशत छह राज्यों को खर्च करना होगा। 

हरियाणा के बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान प्रमुख लाभार्थी हैं। दिल्ली को इस परियोजना से यमुना में शुद्ध जल प्रवाह बढ़ने से पेयजल आपूर्ति और प्रदूषण से निपटने में मदद मिलेगी, जबकि राजस्थान के शेखावाटी जैसे डार्क जोन को पाइपलाइन से पानी पहुंचाने की योजना है। केंद्र के अनुसार इस जल से निचले राज्यों के डाउनस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स में भी विद्युत उत्पादन बढ़ने की संभावना है। यह परियोजना हिमालयी क्षेत्र में बन रही है, जहां पर्यावरणीय और मानवीय लागत सबसे अधिक है। 

हिमाचल सरकार स्वयं कह चुकी है कि विस्थापन के मामले में वही सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। रिपोर्टों के अनुसार हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांवों के निवासी 660 मेगावाट के इस बांध का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनके घर, कृषि भूमि और वन क्षेत्र जलमग्न होंगे। बांध की वजह से वनों का विनाश होगा और पारंपरिक आजीविका, सांस्कृतिक धरोहर के उजड़ने का खतरा है। परियोजना की लागत पहले ही लगभग 12 हजार करोड़ आंकी गई है और यह 1960 के दशक से प्रस्तावित होने के बावजूद पर्यावरणीय मंजूरी और अंतर-राज्यीय खिंचाव के कारण लटकी रही है। 

236 मीटर ऊंचे बांध के लिए यह क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील भी माना जाता है। यदि पुनर्वास, वन संरक्षण और पारदर्शी लागत साझाकरण को ईमानदारी से लागू किया गया, तो हरियाणा की प्यास, दिल्ली की पेयजल किल्लत और राजस्थान की सूखी नहरों को राहत मिलेगी और यमुना को नया जीवन मिलेगा।

Wednesday, August 19, 2026

अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उब्बिरी का जन्म श्रावस्ती के कुलीन राजवंश में हुआ था। वह अप्रतिम सुंदरी थी। जो भी उसे देखता, वह मंत्रमुग्ध होकर बस देखता ही रह जाता था। जब वह पूर्ण युवती हुई तो उसका विवाह कौशल नरेश के साथ हुआ। कौशल नरेश उब्बिरी को पाकर अपने को धन्य महसूस करने लगे। 

अभी उसे कौशलपुर के अंत:पुर में आए एक वर्ष ही हुआ था कि वह गर्भवती हो गई। उसके गर्भवती होने की खबर पाकर प्रजा में अपार हर्ष हुआ। समय आने पर उनसे एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया जीवंती। जब जीवंती एक वर्ष की हुई, तो उसने अपनी चपलता और सुंदरता से राजपरिवार का मन मोह लिया। कौशल नरेश ने उब्बिरी को राजमहिषी की पदवी प्रदान की और भव्य शोभायात्रा निकाली। 

कहते हैं कि सौभाग्य के साथ-साथ कभी कभी दुर्भाग्य भी आता है। एक वर्ष की जीवंती की अचानक मृत्यु हो गई। महारानी उब्बिरी पुत्री के शोक में विक्षिप्त हो गई। वह श्मशान घाट पर विलाप करती, अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो? उब्बिरी ने राजमहल छोड़ दिया। शोक विह्वल क्षत-विक्षत देह लिए वह श्मशानघाट में चिल्लाती रहती। संयोग से उधर से एक दिन महात्मा बुद्ध निकले। वह उब्बिरी की करुण कथा से परिचित थे। 

वह श्मशानघाट पहुंचे और उब्बिरी से बोले, पुत्री! तुम बता सकती हो, इस श्मशानघाट में कितने लोगों का दाह संस्कार हुआ है। उसने कहा, नहीं देव! तथागत ने कहा, अगर तुम्हारी तरह सभी लोग शोक विह्वल हो जाएं तो सृष्टि कैसे चलेगी?  अच्छा बताओ, जीवंती के आत्म तत्व को तुम खोज सकती हो? उब्बिरी ने कहा, नहीं देव नहीं। तथागत बोले, तो उठो, आत्म तत्व को खोजने का प्रयास करो। यह सुनकर उब्बिरी की आंख खुल गई। वह मोह माया त्यागकर आत्म साधना में निरत हो गई और पूर्णता प्राप्त करके ही लौटी।

आखिर रेलवे ट्रैक को पार करने की आदत कब बदलेंगे लोग?

अशोक मिश्र

रेलवे ट्रैक पार करने की आदत लोगों में बहुत पुरानी है। जब से रेल गाड़ियों का परिचालन शुरू हुआ है, तब से लोग रेलवे ट्रैक को पार करते चले आ रहे हैं। तीन चार दशक पहले तक रेल विभाग के पास इतनी सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन अब रेलवे ने बहुत सारा विकास कर लिया है। देश के लगभग हर रेलवे स्टेशन पर जरूरत के अनुसार फुट ओवरब्रिज का निर्माण कर लिया है। इसके बावजूद लोग स्टेशन पर रेलवे ट्रैक पार करने से नहीं चूकते हैं। यह प्रवृत्ति हरियाणा में भी पाई जाती है। 

अक्सर हरियाणा में रेलवे ट्रैक पार करते समय होने वाले हादसे की खबरें आती रहती हैं। अकेले दिल्ली-एनसीआर सर्कल में, जिसमें हरियाणा के फरीदाबाद, गुड़गांव, पानीपत, सोनीपत और अंबाला जैसे बड़े जिले आते हैं, साल 2024 में रेलवे ट्रैक पार करने पर 2210 मामले दर्ज किए गए और इतने ही लोगों की गिरफ्तारी हुई, वहीं ट्रेन से कटकर 2562 लोगों की मौत हुई और 666 लोग घायल हुए। साल 2025 में यह संख्या और बढ़ी, 4260 केस दर्ज हुए और ट्रेन की चपेट में आने से 2402 मौतें और 582 लोगों के घायल होने की खबर है। 

लोगों को रेलवे ट्रैक पार करने की इतनी जल्दी क्यों रहती है, यह सवाल मनोवैज्ञानिक से ज्यादा सामाजिक है। रेलवे ट्रैक पार करते समय व्यक्ति को लगता है कि ट्रेन अभी दूर है, वह निकल जाएगा। रिपोर्ट बताती है कि आज सबसे बड़ा कारण मोबाइल पर बात करते हुए या गाना सुनते हुए ट्रैक पार करना है। हरियाणा के कई स्टेशनों पर फुट ओवर ब्रिज या अंडरपास एक किलोमीटर दूर है, भारी सामान, बच्चों या बुजुर्गों के साथ कोई इतना घूमना नहीं चाहता, इसलिए वह पटरियों को ही शॉर्टकट बना लेता है। 

भीड़ का अनुसरण की आदत लोगों को संकट में डाल देती है। जब एक व्यक्ति कूदता है तो दस उसके पीछे कूदते हैं। रेलवे प्रशासन खुद मानता है कि लोग सुरक्षा निर्देशों का उल्लंघन करते हैं, ओवरब्रिज से बचते हैं और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का उपयोग करते हुए ट्रैक पार करते हैं। इस मामले में बचाव का रास्ता केवल सजा नहीं, बल्कि रोकथाम और आदत में बदलाव है। 

रेलवे ने पिछले कुछ सालों में 6,191 किमी ट्रैक पर फेंसिंग लगाई है और पटरियों के किनारे बाड़ लगाया है, पर हरियाणा जैसे सघन आबादी वाले राज्य में यह अभी काफी नहीं है। सबसे जरूरी है हर छोटे-बड़े स्टेशन के पास 300-500 मीटर की दूरी पर फुट ओवर ब्रिज और अंडरपास बनाना, स्टेशनों के नजदीक खुले एरिया में तार और बाउंड्री वॉल लगाना, जिसके लिए रेलवे लगातार सिफारिश करती रही है। लोगों को खुद समझना होगा कि दो मिनट की बचत के लिए पूरा जीवन दांव पर लगाना कोई समझदारी नहीं। वीणा के तार की तरह जीवन भी मध्यम गति में ही सुरक्षित और मधुर रहता है, अति की जल्दबाजी में वह टूट ही जाता है।


Tuesday, August 18, 2026

वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध का राजकुमार श्रोण अत्यंत विलासी था। वह अपने महल से बाहर नहीं निकलता था। हमेशा भोग विलास में ही लगा रहता था। सुंदर किशोरियां उसके आगे पीछे घूमती रहती थीं। उसकी पत्नी अत्यंत सुंदरी थी। वह भी अपने पति का हर तरह से ख्याल रखती थी। राजकुमार श्रोण अत्यंत घमंडी किस्म का था। वह किसी का भी अपमान करने में तनिक भी संकोच नहीं करता था। वह वय का भी ध्यान नहीं रखता था। 

महाराज अपने पुत्र की आदत से बहुत परेशान थे। वह वीणा बहुत बढ़िया बजाता था। एक दिन उसने महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना, तो उसका मन बदल गया। उसने प्रवज्या धारण कर ली। भिक्षु हो गया। जब सारे भिक्षु दिन में एक बार भोजन करते थे, तो वह दो दिन बाद भोजन करता था। वह नंगे पैर चलता था। 

जब सारे भिक्षु पेड़ की छाया में बैठ जाते थे, तो वह कड़ी धूप में खड़ा रहता था। जिससे उसका सुकोमल शरीर सूखकर कांटा हो गया। उसके पैरों से मवाद बहने लगा, लेकिन वह अविचलित रहा। यह बात जब महात्मा बुद्ध को पता चली, तो उन्होंने श्रोण को अपने पास बुलाया और कहा, भंते! मैंने सुना है कि तुम वीणा बहुत सुमधुर बजाते हो। यदि वीणा के तारों को ढीला छोड़ दिया जाए, तो क्या होगा? 

श्रोण ने कहा कि वह नहीं बजेंगे। उनसे स्वर ही नहीं फूटेगा। तथागत ने फिर पूछा, यदि तारों को अधिक कस दिया जाए तो क्या होगा? श्रोण ने कहा कि तार टूट जाएंगे। बुद्ध ने कहा कि शरीर भी तो एक वीणा है। यदि तुम इसको अधिक कष्ट दोगे, तो शरीर टूट जाएगा। नष्ट हो जाएगा। यह सुनकर श्रोण समझ गया कि महात्मा बुद्ध  उसे क्या समझाना चाहते हैं। उस दिन के बाद श्रोण ने अन्य भिक्षुओं के समान आचरण  करने लगा।

हरियाणा के किसी जिले में भूजल की गुणवत्ता उत्तम श्रेणी में नहीं

अशोक मिश्र

हरियाणा में जल स्तर का लगातार नीचे जाना ही चिंताजनक नहीं है, बल्कि भूजल की गुणवत्ता भी अब डराने लगी है। राज्य की धरती के नीचे पानी का भंडार जितना भरता है, उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार हरियाणा में सालाना भूजल पुनर्भरण 10.27 बीसीएम आंका गया है जबकि दोहन 12.72 बीसीएम तक पहुंच चुका है यानी राज्य अपने भूजल संसाधन का करीब 137 प्रतिशत उपयोग कर रहा है। यह गिरावट पूरे प्रदेश में एक जैसी नहीं है लेकिन 14 जिले सबसे अधिक दबाव में हैं जिनमें अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, भिवानी, जींद, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सोनीपत, सिरसा, पानीपत, फतेहाबाद और झज्जर शामिल हैं। 

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कुलपति प्रो. बलदेवराज कांबोज ने विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा तैयार हरियाणा के भूजल गुणवत्ता मानचित्र का अनावरण किया है। इस मानचित्र की नींव छह वर्षों के अथक फील्ड सर्वे पर टिकी है। वैज्ञानिकों ने गांव स्तर पर जीपीएस लोकेशन के आधार पर भूजल के नमूने एकत्र किए और आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल के दिशा-निदेर्शों के अनुसार उनका विश्लेषण किया। पिछला ऐसा मानचित्र 1992 में बना था। 

पूरे हरियाणा में केवल 31.83 प्रतिशत भूजल ही अच्छी गुणवत्ता श्रेणी में आता है जो अधिकांश फसलों की सिंचाई के लिए उपयुक्त है। लगभग 30.04 प्रतिशत भूजल सीमांत लवणीय पाया गया है जिसे उचित प्रबंधन के साथ लवण-सहिष्णु फसलों के लिए उपयोग किया जा सकता है। विस्तृत वर्गीकरण बताता है कि 6.04 प्रतिशत खारा पानी, 19.50 प्रतिशत उच्च एसएआर खारा पानी, 5.67 प्रतिशत हल्का क्षारीय, 1.66 प्रतिशत क्षारीय और 5.26 प्रतिशत अत्यधिक क्षारीय पानी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मानचित्र में गुणवत्ता को अच्छे, सीमांत लवणीय, लवणीय, उच्च एसएआर लवणीय, सीमांत क्षारीय, क्षारीय और उच्च क्षारीय वर्गों में बांटा गया है। 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा का कोई भी जिला शत-प्रतिशत उत्तम श्रेणी में नहीं है। 31.83 प्रतिशत अच्छे पानी का यह आंकड़ा पूरे प्रदेश के नमूनों का औसत है, किसी एक जिले का नहीं। इसका असर सीधे किसान के नलकूप पर, पीने के पानी की गुणवत्ता पर और खेत की मिट्टी पर पड़ रहा है। जब मीठे पानी की परत नीचे चली जाती है तो नीचे का खारा और क्षारीय पानी ऊपर आ जाता है जिससे न केवल सिंचाई बल्कि स्वास्थ्य का संकट भी बढ़ता है। वैज्ञानिकों ने खारे और अधिक सोडियम वाले पानी वाले क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता के हिसाब से खेती करने और मिट्टी सुधार के उपाय अपनाने की सलाह दी है। यदि किसान वैज्ञानिकों की सलाह के हिसाब से खेती करें, तो पानी की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।