बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
हमारे देश में माता-पिता के बाद गुरु को ऊंचा स्थान दिया गया है। गुरु कैसा भी हो, वह हमेशा सम्मानीय होता है। इस संदर्भ में एक पुरानी कथा प्रचलित है। एक राजा था। उसे ज्ञान प्राप्त करने की बड़ी लालसा थी। उसने अपने मंत्रियों से कहा कि वह किसी योग्य गुरु की तलाश करें। काफी खोज के बाद मंत्री एक योग्य व्यक्ति को खोजने में सफल हो गया। राजा ने उस गुरु से शिक्षा हासिल करनी शुरू की। गुरु जी बहुत योग्य थे। इस तरह काफी समय बीत गया, लेकिन गुरु के योग्य होने के बावजूद राजा को कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ।वह इस वजह से चिंतित रहने लगे। एक दिन उन्होंने इस बात की चर्चा अपनी महारानी से की। राजा ने कहा कि तुम बताओ, मैं इसका कारण किससे पूछूं। महारानी ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि आप इस समस्या का हल अपने गुरु जी से ही पूछिए। वह एक योग्य गुरु हैं।
उनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने कई लोगों को योग्य बनाया है। कुछ दिन विचार करने के बाद एक दिन राजा ने अपने गुरु के सामने समस्या रख दी। उन्होंने कहा कि गुरु जी, मुझे इतने महीने हो गए, आप मुझे रोज अच्छी अच्छी बातें सिखाते हैं, लेकिन मैं सीख नहीं पाता हूं। इसका कारण क्या है? गुरु जी ने राजा को गौर से देखा और बोले, इसका कारण आपका राजा होना है।
आप मेरे शिष्य हैं और मैं आपका गुरु हूं। इस नाते मुझे आपको ज्ञान देते समय ऊंचे स्थान पर बैठना चाहिए और आपको नीचे। लेकिन राजा होने की वजह से आप ऊंचे स्थान पर बैठते हैं और मैं नीचे बैठता हूं। गुरु हर हालत में सम्मानीय होता है। उसका स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए।
यह बात सुनकर राजा सारी बातें समझ गया और उसने गुरु को आगे से ऊंचा स्थान देना शुरू किया। कुछ साल के बाद वह विद्वान हो गया।









