Tuesday, October 27, 2026

Kumarajiva: The Greatest Propagator of Buddhism


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Kumarajiva, who was born in Bihar, made a monumental contribution to the spread of Buddhism. Buddhist literature contains a wealth of information about him. A man of exceptional talent, Kumarajiva eventually went to study at Nalanda University. His insatiable thirst for knowledge led him to Taxila, where he not only pursued his education but also served as a teacher. 

It was during his time teaching at Taxila that he resolved to dedicate his innate, God-given talent to the propagation of the Buddhist faith. He immersed himself in the deep study of Buddhism and began spreading its teachings across the kingdoms and regions surrounding Taxila—a task that required him to master several Asian languages. 

Later, he decided to travel to China to propagate Buddhism. After an arduous and challenging journey, Kumarajiva arrived in China. He learned the Chinese language (Mandarin) and translated numerous Buddhist texts into Chinese. He would engage with the people, explaining the tenets of Buddhism and sharing the life and teachings of Gautama Buddha in their own language. 

Gradually, Buddhism began to take root and spread throughout China. In this endeavor, he secured the support of several influential figures and rulers. However, the path was far from easy; Kumarajiva often had to take significant risks. Even in China, he faced opposition from those who resisted the spread of Buddhism, yet he remained steadfast in his mission. Ultimately, he became the most prominent propagator of Buddhism in China, earning widespread acceptance among the people.

बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रचारक कुमार जीव


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में बिहार में जन्मे कुमार जीव का बहुत बड़ा योगदान है। बौद्ध साहित्य में इनके बारे में बहुत सारी जानकारियां दी गई हैं। बिहार में जन्मे कुमार जीव बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। समय आने पर वह नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने गए। ज्ञान हासिल करने की भूख इन्हें तक्षशिला तक ले गई। यहां इन्होंने शिक्षा हासिल की और बाद में अध्यापन कार्य भी यहीं किया। तक्षशिला में अध्यापन के दौरान ही इन्होंने निश्चय किया कि प्रकृति प्रदत्त इस प्रतिभा का उपयोग धर्म के प्रचार-प्रसार में करना चाहिए। 

उन्होंने बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन किया और उन्होंने तक्षशिला के आसपास के राज्यों और देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। इसके लिए इन्हें कई एशियाई भाषा को भी सीखना पड़ा। बाद में इन्होंने तय किया कि उन्हें चीन जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करना चाहिए। एक लंबी और कठिन यात्रा करके कुमार जीव चीन पहुंचे। उन्होंने चीनी भाषा मंदारिन सीखी और अनेक बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद भी किया। वह लोगों के बीच जाते और उन्हें उनकी ही भाषा में बौद्ध धर्म के बारे में बताते थे।

 महात्मा बुद्ध के उपदेश और जीवन चरित बताते थे। इससे धीरे-धीरे चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार होने लगा। उन्होंने इस काम में चीन के कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और राजाओं का सहयोग भी हासिल किया। लेकिन यह सब कुछ बहुत आसान भी नहीं रहा। कई बार कुमार जीव को बहुत बड़ा जोखिम भी उठाना पड़ा। 

चीन में भी इन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विरोधियों का सामना करना पड़ा। लेकिन कुमार जीव अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि कालांतर में यह चीन में बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रचारक साबित हुए और लोगों ने इन्हें स्वीकार भी कर लिया।

व्यक्तिगत टिप्पणियों से तार-तार होती है लोकतांत्रिक मर्यादा

अशोक मिश्र

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना में दिए गए बयान ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के स्वर को गर्मा दिया है। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के कार्यक्रम में जब खड़गे भाषण दे रहे थे और कथित वोट चोरी तथा एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी करने वालों को जेल भेजने की बात कर रहे थे, तभी सभा में मौजूद एक व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा कि मोदी कहीं नहीं जाएंगे। इस पर नाराज खड़गे ने जो टिप्पणी की, वह टिप्पणी तुरंत विवाद का विषय बन गई। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता का अपमान बताया और देशभर में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि खड़गे ने सारी मर्यादाएं तार-तार कर दी हैं। कांग्रेस के पास अब नीति नहीं, सिर्फ गाली-गलौज की राजनीति बची है। 

अन्य भाजपा नेताओं ने भी इसे अश्लील, अभद्र और लोकतांत्रिक मर्यादा के विरुद्ध करार दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस ने खड़गे का बचाव करते हुए कहा कि बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। खड़गे का इशारा प्रधानमंत्री के वैचारिक पिता यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर था। साथ ही पार्टी का दावा है कि पटना में पहले बीजेपी कार्यकर्ता ने खड़गे के दिवंगत पिता का अपमान किया था। इसके जवाब में यह प्रतिक्रिया आई थी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी इसे एक आम बोलचाल का मुहावरा बताया है, किसी के पिता का व्यक्तिगत अपमान नहीं। जब बहस नीतियों, जैसे एसआईआर में गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या चुनाव सुधार जैसे मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत और पारिवारिक टिप्पणियों पर आ जाती है, तो जनता का ध्यान असली सवालों से भटक जाता है। लगातार ऐसी भाषा से सार्वजनिक संवाद का स्तर गिरता है। 

राजनीति में शालीनता का मानक कमजोर होता है जिसे युवा पीढ़ी सामान्य मानने लगती है। समर्थक वर्ग में भावनात्मक ध्रुवीकरण बढ़ता है। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और पुतला दहन जैसे प्रतीकात्मक विरोध रोजमर्रा की राजनीति बन जाते हैं, जिससे सामाजिक विश्वास कम होता है। युवा और बच्चे, इन घटनाओं को देखकर यह संदेश ग्रहण करते हैं कि सत्ता के लिए कोई भी सीमा पार की जा सकती है। इससे समाज में असहिष्णुता बढ़ती है, विरोधी विचार रखने वाले लोगों के प्रति घृणा और नफरत की भावना मजबूत होती है। 

सार्वजनिक चर्चा मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई—से हटकर व्यक्तिगत हमलों और भावनात्मक आरोपों पर केंद्रित हो जाती है। नतीजतन लोकतंत्र कमजोर पड़ता है क्योंकि मतदाता मूल बहस के बजाय शोर और सनसनी से प्रभावित होते हैं। ऐसे विवाद से राजनीतिक दलों को तात्कालिक सुर्खियां तो मिल जाती हैं, लेकिन लोकतंत्र की दीर्घकालिक सेहत के लिए जरूरी विचार-विमर्श और समाधान खोजने की संस्कृति कमजोर पड़ती है। राजनीति का स्तर गिरता है और लोकतंत्र प्रभावित होता है।

Monday, October 26, 2026

How Does Jealousy Take Root in the Mind?


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Among the many disciples of Gautama Buddha, Vakkula is a notable figure. While Sariputra was adept at delivering sermons, Vakkula did not possess this skill. It is said that he attained enlightenment just seven days after seeking refuge in the Buddha, and by the eighth day, he had attained the pure state of *Arhatship*. Vakkula Sthavira had a friend named Acela Kashyapa, an ascetic who always remained naked. 

The two met in Rajagriha when they were both eighty years old. Acela Kashyapa initiated a conversation, asking, "Friend Vakkula, how many years have passed since you became an ascetic?" Vakkula replied with ease, "Eighty years, my friend." Acela then asked, "In these eighty years, how many times have you engaged in sexual intercourse?" Vakkula answered, "Not even once. In the last eighty years, the thought of sexual desire has never once crossed my mind. 

To tell you the truth, in all these eighty years, not even a trace of malice toward anyone has ever arisen in my consciousness. I do not even know how thoughts of violence arise in people's minds. I do not know how to wear clothes in the manner of householders; 

I simply wear the robes as the monks do in the *viharas* (monasteries). I do not know what it is like to wear garments stitched with a needle, nor do I know how one is supposed to sit in the homes of householders. I cannot even recall a single instance of being ill over the past eighty years.

" It is said that among all of the Buddha’s disciples, Vakkula Sthavira was the healthiest. He had renounced all the comforts and luxuries of worldly life. Perhaps this is the reason why his age is stated as 160 years in Buddhist texts.

मन में ईर्ष्या कैसे पनपती है, नहीं जानता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के अनेक शिष्यों में वक्कुल का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। जहां सारिपुत्र उपदेश देने में प्रवीण थे, वहीं वक्कुल को यह कला नहीं आती थी। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध की शरण में आने के सात दिन बाद ही इन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया था। आठवें दिन इन्हें शुद्ध अर्हत्व ज्ञान प्राप्त हुआ था। वक्कुल स्थविर के एक मित्र थे अचेल काश्यप जो सदैव नग्न रहते थे। अस्सी वर्ष की आयु में राजगृह में दोनों की मुलाकात हुई। अचेल काश्यप ने स्थविर वक्कुल से वार्तालाप शुरू किया। अचेल ने वक्कुल से पूछा, तुम्हें संन्यासी हुए कितने वर्ष बीत गए हैं, मित्र वक्कुल। 

वक्कुल ने सहजता से जवाब दिया, अस्सी साल, मित्र। तब अचेल ने पूछा कि इन अस्सी वर्षों में आपने कितनी बार मैथुन किया है? वक्कुल ने जवाब दिया, एक बार भी नहीं। मेरे मन में पिछले अस्सी साल में एक बार भी काम वासना का विचार तक नहीं आया। सच बताऊं। पिछले अस्सी साल में एक बार भी मेरे चित्त में किसी के प्रति द्वेष की भावना तक पैदा नहीं हुई। मैं यह भी नहीं जानता कि लोगों के मन में हिंसा संबंधी विचार कैसे पैदा होते हैं। गृहस्थों के समान मैं वस्त्र पहनना नहीं जानता हूं। 

विहारों में जिस तरह भिक्षु वस्त्र पहनते हैं, वैसा ही मैं भी पहन लेता हूं। सुई से सिए वस्त्र कैसे होते हैं, मैं नहीं जानता हूं। गृहस्थों के घर में किस तरह बैठा जाता है, यह भी मुझे नहीं आता है। पिछले अस्सी साल में मैं बीमार कब पड़ा था, यह भी मुझे याद नहीं है। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध के सभी शिष्यों में सबसे स्वस्थ स्थविर वक्कुल ही थे। उन्होंने समाज की सभी तरह की सुख-सुविधाओं को त्याग रखा था। शायद यही वजह है कि बौद्ध ग्रंथों में उनकी आयु 160 वर्ष बताई गई है।

कांग्रेस की प्रस्तावित रैली को लेकर पक्ष-विपक्ष में मची रार


अशोक मिश्र

दिल्ली में एक नवंबर को प्रस्तावित कांग्रेस की रैली को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस विवाद के मूल में आयोजन का स्थान, समय और उसके संभावित प्रभाव को लेकर किए जा रेह अलग-अलग दावे हैं। एक तरफ तो इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बताया जा रहा है। दूसरी तरफ इसे राजधानी के जनजीवन के लिए एक बड़ी असुविधा के तौर पर देखा जा रहा है। रैली के समर्थन में दिया जाने वाला पहला तर्क संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा है। 

वैसे तो यह बात काफी हद तक सही है कि किसी भी राजनीतिक दल को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने, जनता को जुटाने और सरकार के सामने अपनी मांगें रखने का अधिकार है। दिल्ली देश की राजधानी है। इसके नाते यह स्वाभाविक है कि सामाजिक-राजनीतिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं और व्यक्तिगत तौर पर लोग धरना-प्रदर्शन करने दिल्ली ही आते हैं। रैली मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर बुलाई गई है। 

कांग्रेस का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों, खासकर पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। पार्टी इसे वोट चोरी बताते हुए देशभर से लोगों को दिल्ली बुला रही है और दावा कर रही है कि इस महारैली में दस लाख तक लोग जुट सकते हैं। दिल्ली पुलिस ने पहले ही इस आयोजन के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी कर दिया है, जिससे कांग्रेस को वैधता का आधार मिल गया है। 

वहीं रैली के विरोध में भी कई व्यावहारिक और राजनीतिक तर्क दिए जा रहे हैं। प्रशासनिक स्तर पर सबसे बड़ी चिंता यातायात और कानून व्यवस्था को लेकर है। एक नवंबर को त्योहारों के आसपास का समय है, जब दिल्ली में पहले से ही भीड़ और प्रदूषण का दबाव रहता है। दीपावली और धनतेरस जैसे त्यौहार भी नजदीक होंगे, ऐसे में लाखों लोगों के एक जगह जुटने से मध्य दिल्ली और नई दिल्ली के बड़े हिस्से में जाम, मेट्रो पर अतिरिक्त भार और आम लोगों के कामकाज में बाधा आने की आशंका जताई जा रही है। 

इसके अलावा त्योहारी सीजन का मुद्दा भी उठाया जा रहा है। दीपावली, धनतेरस और छठ जैसे त्योहारों के बीच यह रैली दिल्ली के व्यापारियों के कारोबार को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। चैंबर आॅफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री जैसे संगठनों ने आशंका जताई है कि यातायात व्यवस्था प्रभावित होने और भीड़ के कारण करीब दस हजार करोड़ रुपये का व्यापार प्रभावित हो सकता है। उन्होंने रैली को भाई दूज के बाद स्थगित करने की अपील की है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ चलते हैं।


Sunday, October 25, 2026

Sariputra! Your Presence Is a Blessing

Bodhivriksha

Ashok Mishra

Buddhism attracted many individuals who played a pivotal role in transforming society. Among them was Sariputra, a figure held in high regard within Buddhist literature. He was a contemporary of Gautama Buddha, though he passed away before the Buddha himself. Sariputra was a man of profound humility and wisdom—so humble, in fact, that he would not hesitate to offer an apology even when he had committed no fault. 

Once, upon hearing that a monk named Purna possessed great wisdom, Sariputra felt a deep longing to meet him. Unlike those who resided in cities or monasteries, Purna lived in the forest. Following the accounts he had heard of Purna’s virtues, Sariputra traveled to his hermitage and requested a teaching. Moved deeply by the wisdom shared by Purna, Sariputra was overcome with emotion, and tears began to stream from his eyes. 

"O noble one," he said, "you are truly blessed. Hearing your words has purified me. It is my great fortune to have beheld you; your teachings, nectar-like in their essence, have brought me immense grace." Purna replied, "The praise you offer is a reflection of your own kindness. You have not yet introduced yourself; may I know who you are?" 

Sariputra answered, "Noble one, I am but a humble servant of the Dhamma; people call me Sariputra." Upon hearing this, Purna exclaimed, "Are you Sariputra—the foremost disciple of the Master? You are as truly great as the Master himself! Blessed are those who dwell in your presence. I, too, consider myself fortunate to have beheld you today. That you have graced a humble monk like me with your presence is a supreme blessing."


सारिपुत्र! आपने दर्शन दिया, मेरा सौभाग्य

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म में बहुत सारे ऐसे लोग शामिल थे जिन्होंने समाज को बदलने में अहम भूमिका अदा की थी। ऐसे लोगों में सारिपुत्र भी गिने जाते हैं। बौद्ध साहित्य में इनका नाम बड़े आदर के साथ लिया गया है। यह महात्मा बुद्ध की ही उम्र के थे, लेकिन इनकी मृत्यु महात्मा बुद्ध से पहले हो गई थी। यह बहुत ही विनम्र और ज्ञानवान व्यक्ति थे। 

यह विनयी इतने थे कि कोई अपराध न करने पर भी क्षमा मांगने में संकोच नहीं करते थे। एक बार की बात है। उन्होंने सुना कि पूर्ण नाम के भिक्षु बहुत ज्ञानी हैं। सारिपुत्र के मन में उनसे मिलने की लालसा पैदा हुई। पूर्ण भिक्षु किसी नगर या आश्रम में निवास करने की जगह जंगल में ही रहते थे। पूर्ण की प्रशंसा सुनने के बाद एक दिन वह उनके आश्रम जा पहुंचे। 

सारिपुत्र ने उनसे उपदेश देने की प्रार्थना की। महात्मा पूर्ण का उपदेश सुनकर सारिपुत्र काफी भावविभोर हो गए। उनकी आंखों से अश्रु बहने लगे। उन्होंने कहा कि महात्मन! आप धन्य हैं। आपकी वाणी सुनकर आज मैं पवित्र हो गया। मेरे बड़े भाग्य हैं कि आपके दर्शन हुए। आपकी अमृत के समान उपदेश सुनकर मैं धन्य हो गया। महात्मा पूर्ण बोले, आप जो प्रशंसा कर रहे हैं, वह आपकी कृपा है। आपने अपना परिचय नहीं दिया। मैं आपके बारे में जानना चाहता हूं। 

सारिपुत्र ने कहा, महात्मन! मैं धम्म का एक तुच्छ सेवक हूं। लोग मुझे सारिपुत्र कहते हैं। यह सुनते ही महात्मा पूर्ण ने कहा, क्या आप सारिपुत्र हैं। महात्मा सारिपुत्र जो गुरु के परम शिष्य हैं। आप तो गुरु के समान ही परम महान हैं। वह सभी लोग धन्य हैं जो आपके सान्निध्य में हमेशा रहते हैं। आज तो मैं भी आपके दर्शन पाकर अपने को धन्य मानता हूं। आप ने मुझ तुच्छ श्रमण को दर्शन दिया, यह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है।

अरुणाचल प्रदेश में चीन की बढ़ती सक्रियता चिंताजनक

अशोक मिश्र

अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है। भारत की सीमा पर अगर पड़ोसी देश कोई गैर जरूरी हरकत करता है, तो उसका मुंह तोड़ जवाब दिया जाता है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच जारी टकराहट हाल के महीनों में एक बार फिर भारत-चीन संबंधों के केंद्र में आ गई है। जुलाई 2026 के अंत से ऊपरी सुबनसिरी जिले के तक्सिंग सर्कल के आसपास असाफिला और माजा क्षेत्रों में दोनों पक्षों के जवान आमने-सामने आ गए थे। 

वास्तविक नियंत्रण रेखा के छह-सात किलोमीटर अंदर चीनी सैनिकों द्वारा तंबू लगाने की खबरें आई थीं। इसके बाद भारतीय फौज ने अपनी तैनाती बढ़ाई। इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक ने दो दिन पहले आधिकारिक रूप से कई स्थानों पर फेस-आॅफ जारी रहने की पुष्टि की है। हालांकि हिंसक झड़प की कोई घटना सामने नहीं आई है। भारतीय फौज और चीनी सेना के बीच जारी टकराव को सिर्फ एक सैनिक झड़प के तौर पर नहीं देखा जा सकता है। 

इसके पीछे इतिहास, भूगोल और भू-राजनीति के कई परतें हैं। इस क्षेत्र में भारत का प्रशासन, चुनाव, विकास कार्य और जनजीवन दशकों से निर्बाध चल रहा है। स्थानीय मोनपा और अन्य जनजातीय समुदाय खुद को भारतीय मानते हैं। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की चीनी घुसपैठ या नाम बदलने की कोशिश को भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला है। इसे किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं माना जा सकता है। सामरिक दृष्टिकोण से भी भारत का तर्क  है कि अरुणाचल प्रदेश, विशेषकर तवांग, सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है और यदि यहाँ चीन दखलंदाजी करता है, तो पूरे पूर्वोत्तर की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। 

इसीलिए वहाँ बुनियादी ढांचे, सड़कों और सैनिक तैनाती को बढ़ाना उसकी रक्षात्मक मजबूरी है। दूसरी तरफ चीन इस पूरे क्षेत्र को जांगनान या दक्षिणी तिब्बत कहता है। मैकमोहन रेखा को ही सिरे से खारिज करता है। उसका तर्क है कि शिमला समझौते पर तत्कालीन तिब्बती प्रतिनिधि और ब्रिटिश भारत ने हस्ताक्षर किए थे। भारत सरकार ने इस बात को कभी स्वीकार ही नहीं किया। भारत और चीन दोनों एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और आपसी व्यापार तथा क्षेत्रीय स्थिरता उनके हित में है। ब्रिक्स जैसे मंचों पर सहयोग जारी रखने के बावजूद सीमा पर तनाव बढ़ाना दोनों के लिए नुकसानदेह है। 

इसलिए वार्ता, विशेष प्रतिनिधि स्तर की बैठकें और कोर कमांडर स्तर के संवाद जारी रखने चाहिए। सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है, लेकिन आक्रामक रुख अपनाने से पहले सभी शांतिपूर्ण विकल्प आजमाने चाहिए। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर जारी यह टकराहट सिर्फ सैन्य मुद्दा नहीं, बल्कि दोनों देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक धैर्य और क्षेत्रीय शांति की परीक्षा है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष अपने हितों की रक्षा करते हुए संवाद का रास्ता खुला रख पाते हैं या नहीं।

Saturday, October 24, 2026

Dhamma Senapati has become arrogant

bodhi tree

Ashok Mishra

There was no dearth of Shramanas in Buddhism. Mendicant unions were formed in major cities of the country. Thousands of disciples used to stay in these monasteries and take religious initiation. He tried to purify himself and gained respect in the society. But there were some among them who had not yet matured. He could not even free himself from human vices. 

Such people often committed mistakes which were not forgivable. But Mahatma Buddha provided many opportunities for them to improve. Its just matter of one day. Mahatma Buddha was sitting in Vihar discussing religion. Then a disciple of the ashram came and said to Mahatma Buddha, ever since you have given the title of Dhamma Senapati to Sariputra, he has become as per his wish. 

He has become proud of his position. He keeps torturing the monks. They kill people. They have hit me too. Then Buddha said that even if there was some reason, it is not believed that Mahatma Sariputra would kill anyone. There is no question of beating anyone without any reason. I call Sariputra and ask. After some time, when Sariputra came there, 

Tathagata asked him, this monk says that you have killed him without any reason. Sariputra said that these monks are extremely learned and ascetic people. How can I have the audacity to kill them? I am his servant. How can Sariputra, who begs from door to door, have so much courage? If I have caused any pain, I apologize. 

On hearing this, the monk fell at the feet of Sariputra and asked for forgiveness and said, please forgive me. Out of jealousy, I accused you without any reason. Then Mahatma Buddha said to Sariputra, he has committed an unforgivable crime, but please forgive him.