बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
मगध के वेलुवन में महात्मा बुद्ध को पधारना था। कुशी संघाराम में विशाल धर्मदीक्षा का आयोजन किया गया था। बहुत सारे लोग आए हुए थे। कौशल, मगध, कौशांबी, पंचनद और जेतवन विहारों से भारी संख्या में बौद्ध परिव्राजक वेलुवन पधारे थे। इन्हीं परिव्राजकों में संथाली भी थे। संथाली मगध के ही निवासी थे। उनके पिता प्रधान श्रेणिक थे। उनका भवन राज प्रासाद का भ्रम पैदा करता था। यहां समस्त प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं। वैभवशाली संथाली सब कुछ त्यागकर महात्मा बुद्ध की शरण में आए थे।धर्मदीक्षा की व्यवस्था के लिए सभी परिव्राजकों को कोई न कोई काम सौंपा गया। संथाली और वलैशी को उस दिन भिक्षा मांगने की जिम्मेदारी सौंपी गई। संथाली और वलैशी भिक्षा पात्र लेकर नगर की ओर निकल गए। नगर के द्वार द्वार भटकते हुए वह अपने घर के दरवाजे पर जा खड़े हुए। आज उनका अपना घर श्रीहीन प्रतीत हो रहा था। उन्होंने रुंधे हुए गले से आवाज लगाई-भवति भिक्षाम देहि जननी।
यह चार शब्द कहते हुए संथाली का कंठ अवरुद्ध हो गया। पहली बार में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उन्होंने फिर आवाज लगाई, तो अंदर से आवाज आई-मां, संथाली आया है। संथाली आए हैं। इसके बाद उस घर में हलचल मच गई। मां, पिता, बहन, भाई और पत्नी सब दरवाजे पर आ खड़े हुए। शरीर पर एक वस्त्र, केशरहित सिर, हाथ में भिक्षा पात्र देखकर मां, पिता, भाई सब रोने लगे।
पांच साल में पहली बार संथाली अपने घर के दरवाजे पर आए थे। संथाली ने उन्हें रोते हुए देखकर कहा, तात! मेरी साधना में अधूरी रह गई शायद, तभी तो आप रुदन कर रहे हैं। पिता ने अवरुद्ध कंठ से कहा, नहीं पुत्र! पांच साल में तुम्हारी अक्षय कीर्ति कमाई है। जो काम मुझे करना चाहिए था, वह तुम कर रहे हो। तुम इस देश के इतिहास हो। यह सुनकर संथाली का आत्मग्लानि धुल गया।