Sunday, October 18, 2026

It Is Not Right to Disappoint a Seeker

Bodhivriksha

Ashok Mishra

According to Buddhist texts and historical evidence, Gautama Buddha passed away (attained Mahaparinirvana) in 483 BCE in Kushinagar (Kushinara) at the age of 80. Buddhist scriptures (such as the Mahaparinirvana Sutta) recount that during his travels, in the city of Pava, a blacksmith named Chunda offered a meal to Gautama Buddha. 

This meal included a specific dish known as 'sukara-maddava'. Following this meal, the Buddha began to suffer from dysentery, abdominal pain, and internal bleeding, which ultimately led to his death. Some scholars suggest that 'sukara-maddava' was not pork, but rather a type of mushroom that had become toxic. It is said that as the Buddha’s health deteriorated, his accompanying disciples grew deeply concerned. Ananda tended to him, yet his condition did not improve. 

Meanwhile, upon learning of the Buddha’s state, many people rushed to Kushinagar, and a large crowd gathered. Among them was a seeker named Subhadra, who had traveled a great distance hoping to find answers to his lingering doubts. He asked Ananda about the Buddha and requested an audience with him. Ananda explained the situation to Subhadra and declined his request to meet the Buddha. 

From within his hut, the Buddha overheard this exchange. He called for Ananda and remarked that it was not right to let any seeker leave in disappointment while he was still alive. Upon learning this, Subhadra decided it would not be appropriate to meet the Buddha. He paid silent homage to the Buddha’s greatness and, without hearing any formal teachings, went to sit among a group of wandering ascetics.

किसी जिज्ञासु को निराश करना उचित नहीं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध ग्रंथों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, गौतम बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) 483 ईसा पूर्व में कुशीनगर (कुशीनारा) में 80 वर्ष की आयु में हुई थी। बौद्ध ग्रंथों (जैसे महापरिनिर्वाण सुत्त) के अनुसार, अपनी यात्रा के दौरान पावा नगर में 'चुंद' नामक लोहार ने गौतम बुद्ध को भोजन कराया था। इस भोजन में 'सूकर-माद्दव' नामक एक विशेष खाद्य पदार्थ था। 

इस भोजन के बाद महात्मा बुद्ध को पेचिश, पेट में दर्द और रक्तस्राव होने लगा था जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि सूकर माद्दव सुअर का मांस नहीं बल्कि मशरूम था जो विषैला हो गया था। कहा जाता है कि जब गौतम बुद्ध की तबीयत बिगड़ गई तो उनके साथ चल रहे तमाम शिष्य चिंतित हो उठे। आनंद ने उनकी सेवा-सुश्रुषा की, इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे। 

इस बीच जिसको भी गौतम बुद्ध के बारे में पता चला, वह भागता हुआ कुशीनगर पहुंचा। एक भारी भीड़ जमा हो गई। तभी एक जिज्ञासु सुभद्र बहुत दूर से चलकर अपनी कुछ शंकाओं के समाधान के लिए वहां पहुंचा। उसने आनंद से गौतम बुद्ध के बारे में पूछा और मिलने की विनती की। आनंद ने सुभद्र को सारा हाल कह सुनाया और बुद्ध से मिलाने से इंकार कर दिया। कुटिया के भीतर बुद्ध यह वार्तालाप सुन रहे थे। 

उन्होंने आनंद को बुलाया और कहा कि मेरे जीवित रहते किसी जिज्ञासु को निराश होकर यहां से जाने देना ठीक नहीं है। सुभद्र ने जब यह जाना तो उसने गौतम बुद्ध से मिलना उचित नहीं समझा। उसने बुद्ध की महानता को मन ही मन प्रणाम किया और बिना कुछ उपदेश सुने ही वह परिव्राजकों की शिष्ट टोली में जाकर बैठ गया।

लोकतंत्र में रिजीम चेंज शब्द पर नहीं, इरादे पर बहस होनी चाहिए

अशोक मिश्र

रिजीम चेंज को लेकर इन दिनों देश की सियासत गरम है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर वार-पलटवार कर रहे हैं। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। हर बार यह सवाल बड़े जोरशोर से उठाया जाता है कि क्या किसी सरकार को बदलने की बात करना, उसकी वकालत करना या खुलेआम इसकी मांग करना लोकतंत्र में गुनाह है। इस शब्द के इर्द-गिर्द इतना शोर इसीलिए मचा हुआ है क्योंकि इसके दो बिल्कुल अलग अर्थ एक साथ चल रहे हैं। विपक्ष इसे लोकतंत्र की सबसे स्वाभाविक प्रक्रिया मानता है। 

उसका तर्क  सीधा है कि चुनाव, आंदोलन, आलोचना, अविश्वास प्रस्ताव, ये सब रिजीम चेंज के ही संवैधानिक औजार हैं। अगर सरकार अच्छा काम नहीं कर रही है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या संवैधानिक संस्थाओं को अपने प्रभाव में लेकर काम कर रही है,तो विपक्ष का काम ही है जनता के सामने विकल्प रखना और कहना कि इस रिजीम को बदलो। इस अर्थ में रिजीम चेंज कहना न तो असंवैधानिक है, न राष्ट्र-विरोधी। यह तो मतदाता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। लोकतंत्र में कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती, सत्ता बदलना ही लोकतंत्र की आत्मा है। जब सत्ता पक्ष ही हर आलोचना को रिजीम चेंज की साजिश बताकर देशद्रोह के खांचे में डाल देता है, तो वह दरअसल असहमति को ही अपराध बना रहा होता है। 

दूसरा पक्ष, जो आमतौर पर सत्ता में होता है, इस शब्द को एक अलग ही नजरिये से देखता है। उसका तर्क  है कि रिजीम चेंज का मतलब ही भू-राजनीति में बदलाव है। जब यह कहा जाता है कि फलां देश में रिजीम चेंज होना चाहिए, तो इसका इतिहास विदेशी हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंधों और अस्थिरता से जुड़ा रहा है। जब देश में कुछ नेता या समूह उसी शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, तो आशंका पैदा होती है कि क्या यह सिर्फ चुनावी नारा है या बाहरी ताकतों से सहानुभूति और आंतरिक अस्थिरता को न्योता देना है। 

चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की बात से देश की साख, निवेश का माहौल और संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है। जनता ने पांच साल के लिए जनादेश दिया है, उसे रोज-रोज की बयानबाजी से कमजोर करना जनादेश का अपमान है। सच इन दोनों अतियों के बीच कहीं है। रिजीम चेंज की बात करना बुरा नहीं है, बुरा हो सकता है उसका तरीका और उसकी मंशा। अगर यह बात वोट की चोट से, संवैधानिक दायरे में, बेहतर नीति और बेहतर नेतृत्व का वादा लेकर कही जा रही है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करती है। 

यही तो विपक्ष का धर्म है। लेकिन अगर यह बात संस्थाओं को ध्वस्त करके, अफवाह, हिंसा या विदेशी मंचों पर जाकर देश को कठघरे में खड़ा करके कही जा रही है, तो यह चिंता का विषय बन जाती है। सवाल यह होना चाहिए कि उसके पीछे का रास्ता क्या सुझाया गया है-बैलेट का या किसी और चीज का। लोकतंत्र में शब्द नहीं, इरादे पर बहस होनी चाहिए।

Saturday, October 17, 2026

The Celestial Maiden Said, You Are a Thief of Fragrance

Bodhivriksha

Ashok Mishra

Mahatma Buddha always endeavored to ensure that none of his actions or behaviors caused distress to anyone. He sought to set an example for society through his exemplary conduct. Nevertheless, there were times when he, too, would inadvertently commit an error. Whenever someone pointed out such a mistake, he would express his gratitude. 

Once, while he was meditating by the side of a lotus pond, a cool, fragrant breeze—carrying the scent of the lotus blossoms—wafted toward him. He was deeply absorbed in meditation, feeling a profound sense of joy and spiritual immersion. At that moment, a celestial maiden appeared by the pond. She remarked to Gautama Buddha, "You did not seek permission from the owner of the pond to enjoy the fragrance of these lotuses. By inhaling this scent without consent, you are, in effect, stealing it. You are a 'thief of fragrance'."


 Before Buddha could respond, a village girl arrived, stepped into the pond, began plucking the lotus flowers, and muddied the water. Buddha observed, "That village girl has soiled the entire pond and damaged the flowers; yet, you stand there silently, while accusing me of being a 'thief of fragrance'." The celestial maiden replied, "You are a highly respected figure in society—a man well-versed in the Dharma and the principles of righteous conduct. 

That girl, however, is naive and uneducated; she lacks such knowledge, and therefore, her transgression is forgivable. But for someone like you—who understands the principles of righteousness—to act in such a manner is not excusable." Hearing this, Buddha bowed his head in shame. He apologized to the celestial maiden and promised never to repeat such a mistake.


देव कन्या बोली, आप गंध चोर हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने हमेशा यही प्रयास किया कि उनके किसी आचरण या व्यवहार से किसी को परेशानी न हो। वह आदर्श व्यवहार करके समाज के सामने एक उदाहरण पेश करें। इसके बावजूद कई बार उनसे भी चूक हो ही जाया करते थे। जब कोई उन्हें उस चूक के बारे में बताता या ध्यान दिलाता था, तो वह उसके प्रति आभारी हो जाया करते थे। एक बार की बात है। वह एक कमल सरोवर के किनारे बैठे हुए ध्यान कर रहे थे। 

कमल सरोवर से होकर आने वाली हवा ठंडी और सुगंधित थी। कमल पुष्प की सुगंध हवा के साथ होकर उन तक आती थी।वह उस समय अत्यंत प्रसन्न और भाव विभोर होकर ध्यान लगा रहे थे। उसी समय कमल सरोवर के पास देव कन्या आई। उसने गौतम बुद्ध से कहा कि आपने कमल का गंध ग्रहण करने के लिए तालाब के स्वामी से इजाजत नहीं ली थी। ऐसी स्थिति में आप सुगंध ग्रहण करके गंध चोरी कर रहे हैं। आप गंध चोर हैं। 

महात्मा बुद्ध कुछ कहते कि उसी समय एक ग्रामीण बाला आई और उसने तालाब में घुसकर कमल पुष्पों को तोड़ने लगी। उसने सरोवर को भी गंदा कर दिया। तब बुद्ध ने कहा कि उस ग्रामीण बाला ने पूरे तालाब को गंदा कर दिया। पुष्पों को भी क्षत-विक्षत कर दिया। फिर भी आप चुपचाप खड़ी हैं। और मुझे गंध चोर कह रही हैं। 

उस देव कन्या ने कहा, आप समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आप धर्म के ज्ञानी हैं, आप नीति के ज्ञाता है। वह लड़की तो अबोध है। अशिक्षित है, उसे ज्ञान नहीं है। इसलिए उसका अपराध क्षम्य है। लेकिन आप नीतिवान होने के बावजूद ऐसा करें, तो वह क्षम्य नहीं है। यह सुनकर बुद्ध का सिर लज्जा से झुक गया। उन्होंने देव कन्या से क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसी गलती न करने का वचन दिया।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील आर्थिक संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत

अशोक मिश्र

अमेरिका और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते का पहला चरण अंतिम रूप ले चुका है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इसकी पुष्टि की है। कानूनी मसौदा तैयार होने और कुछ अंतिम बारीकियों के बाद यह लागू होने वाला है। यह खबर मात्र समझौते की घोषणा नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत है। लंबे समय से चली आ रही बातचीत के बाद यह प्रगति स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके निहितार्थों को गहराई से समझना जरूरी है। 

भारत के लिए इस डील का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच का है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है और यदि यहां स्थायी बाजार पहुंच मिलती है तो लाखों रोजगार वाले क्षेत्रों में मांग बढ़ेगी, निवेश आएगा और भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में हिस्सेदारी मजबूत होगी। पहले उच्च टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों, खासकर कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण, फुटवियर और श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भारी नुकसान हो रहा था। 

टैरिफ घटकर करीब अठारह प्रतिशत रहने और कई उत्पादों पर शून्य शुल्क की संभावना से निर्यात बढ़ेगा। इससे लाखों नौकरियां पैदा हो सकती हैं, खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए। छोटे और मझोले उद्यमों को नई बाजार पहुंच मिलेगी। ऊर्जा, विमान और तकनीक उत्पादों की अमेरिकी खरीद से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी। वैश्विक माहौल में चीन से दूर जा रहे निवेश को आकर्षित करने में भी यह मददगार साबित हो सकता है। भारत की आतुरता के पीछे केवल निर्यात नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक दबाव भी है। 

थोक महंगाई, ऊर्जा आयात पर निर्भरता और वैश्विक बाजार में चीन प्लस वन की नीति ने भारत को पश्चिमी बाजारों से गहरे जुड़ाव के लिए प्रेरित किया है। इस डील का दूसरा पहलू उतना ही संवेदनशील है। अमेरिका लंबे समय से भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र में बाजार पहुंच, बौद्धिक संपदा अधिकारों में कड़े प्रावधान और डिजिटल व्यापार में डेटा के मुक्त प्रवाह की मांग करता रहा है। भारत के करोड़ों छोटे किसान और अमूल जैसी सहकारी व्यवस्था अमेरिकी सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों के सामने टिक नहीं पाएगी। इसी तरह सस्ती दवाओं के उत्पादन पर पेटेंट की सख्ती का असर पड़ सकता है। 

सबसे बड़ा नया जोखिम रूस से तेल और गैस खरीद पर अमेरिकी सीनेट में 86 वोटों से पास हुए कानून को लेकर है, जिसमें राष्ट्रपति को प्रतिबंध लगाने का अधिकार मिलता है। भारत को यह डील इसलिए करनी चाहिए क्योंकि अलग-थलग रहना संभव नहीं। विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ संतुलित व्यापार संबंध विकास की गति बनाए रखने में सहायक होंगे। यह सिर्फ टैरिफ कम करने का मामला नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी का आधार है। सही शर्तों पर लागू होने पर यह रोजगार, निर्यात और निवेश तीनों को प्रोत्साहन देगा। 

Friday, October 16, 2026

The Conviction That I, Too, Can Become a Buddha

The Bodhi Tree

Ashok Mishra

It is true that Gautama Buddha did not establish a new religion; the term "Buddhism" was coined long after his *parinirvana*. He simply pointed out a path to transcend suffering. All his teachings were rooted in his own personal experience. He articulated the four fundamental truths of life: birth, old age, illness, death, separation from loved ones, and encounters with the unpleasant—all these constitute suffering (*dukkha*). 

The root cause of this suffering is *trishna*—an insatiable, never-ending craving for "more and more." If this craving can be extinguished, then suffering, too, can come to an end. This state is known as *nirvana*, and there is a clear path to attain it. Centering his teachings on these core principles, the Buddha guided others. Once, while he was addressing a gathering of nearly ten thousand people, a young man arrived. He looked at the *Tathagata*, bowed before him, and offered his salutations. 

The Buddha asked, "For what purpose have you come?" The young man replied, "The purpose for which I came has been fulfilled. I have nothing left to ask, nothing left to seek." The Buddha inquired, "What has been fulfilled? What has transpired? Share this with others as well." Thousands were present at the gathering, yet no one had witnessed anything specific occurring. The young man explained, "I came here to transform myself, and now I have been transformed. 

A conviction has taken root within me: I, too, can become a Buddha. The Buddha who exists today—I could become that very being tomorrow. A new faith has been born within me. It was in search of this new hope that I came here; it was with this trust that I bowed at your feet. When I stood up, I was a changed man. Now, I return, carrying this profound conviction."

यह विश्वास हो गया, मैं भी बुद्ध हो सकता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यह सच है कि महात्मा बुद्ध ने कोई नया धर्म नहीं चलाया था। बौद्ध धर्म नाम तो उनके परिनिर्वाण के बहुत बाद दिया गया। उन्होंने दुख से बाहर निकलने का रास्ता बताया था। उनके सारे उपदेश अपने अनुभव पर ही आधारित रहे हैं। उन्होंने जीवन के चार सत्य बताए थे। बुद्ध ने कहा कि जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, प्रिय से बिछोह, अप्रिय का मिलना, जीवन में दु:ख है। दु:ख का कारण है तृष्णा और चाहिए और चाहिए की कभी न खत्म होने वाली प्यास। तृष्णा को खत्म किया जा सकता है, तो दु:ख भी खत्म हो सकता है। 

इसी अवस्था को निर्वाण कहते हैं। उस तक पहुँचने का एक स्पष्ट मार्ग है। इन बातों को ही मुख्य आधार बनाकर महात्मा बुद्ध लोगों को उपदेश के माध्यम से परिचित कराते रहे। एक बार की बात है। वह लगभग दस हजार लोगों की भीड़ को उपदेश दे रहे थे।  एक युवक आया। उसने तथागत को देखा, उनके सामने झुका और उन्हें प्रणाम किया। बुद्ध ने पूछा, किस लिए आए हो? युवक ने कहा कि जिस लिए आया था, वह इच्छा पूर्ण हुई। 


अब न कुछ पूछना है, न कुछ जानना है। बुद्ध ने कहा कि क्या पूर्ण हुआ, क्या घट गया। यह और को भी बता दो। उस समय सत्संग में हजारों लोग मौजूद थे। किसी ने भी कुछ घटते या होते नहीं देखा था। युवक ने कहा कि मैं अपने को बदलने आया था। अब मैं बदल गया हूं। 

मुझ में यह विश्वास पैदा हो गया है कि मैं भी बुद्ध हो सकता हूं। जो बुद्ध आज हैं, वह कल मैं हो सकता हूं। मुझ में एक नई श्रद्धा ने जन्म ले लिया है। मैं इसी नई आशा की तलाश में यहां आया था। इसी भरोसे से मैं चरणों में झुका था। जब खड़ा हुआ, तो मैं बदल गया। अब मैं एक विश्वास के साथ वापस जा रहा हूं।

रिश्तों में इतने असंवेदनशील और हिंसक क्यों होते जा रहे हैं लोग?

अशोक मिश्र

मेरठ के चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड का अंतत: फैसला आ गया। इस मामले में जिला जज अरविंद कुमार मिश्र की अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। सच कहा जाए, तो यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का अंत नहीं है। यह हमारे समय के सामाजिक, नैतिक और न्यायिक अंतर्द्वंद्व पर की गई एक तीखी टिप्पणी है। जिन दिनों यह मामला प्रकाश में आया था, पूरे देश में इसकी चर्चा हुई थी। चर्चा का कारण मुस्कान और साहिल द्वारा हत्या के दौरान की गई क्रूरता थी। 

एक मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत की हत्या उसकी ही पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल ने कर दी थी। शव के पाँच टुकड़े करने के बाद उसे सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपा दिया गया। अदालत ने इसे जघन्यतम अपराध मानते हुए रेयरेस्ट आॅफ रेयर की श्रेणी में रखा। दोनों अपराधियों को हत्या के साथ-साथ साक्ष्य छिपाने के आरोप में सात-सात साल की अतिरिक्त सजा भी सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराधी को उसके किए की सजा देना भी धर्म का कार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि जब प्रजा सोती है, तब भी कानून जागता रहता है। 

अदालत द्वारा की गयी यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा की प्रतिक्रिया होती है। जब प्रेम, जो मनुष्य को बेहतर बनाता है, वही स्वामित्व और वासना में बदलकर इतनी बर्बरता पर उतर आए कि एक इंसान को काटकर ड्रम में भर दिया जाए, तो कानून को यह संदेश देना पड़ता है कि मनुष्यता की एक सीमा है जिसके पार जाना अक्षम्य है। इस फैसले के दो मानवीय पहलू भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। पहला, सजा सुनते ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर मौजूद दोनों दोषियों का रो पड़ना और मुस्कान का यह कहना कि मेरी बच्चियों का ध्यान रखना। 

यह एक माँ की अंतिम चिंता थी, जो बताती है कि अपराधी भी अंतत: एक मनुष्य ही है। आवेश में उसने अपराध तो किया, लेकिन वह अपनी बेटियों के प्रति उतनी ही संवेदनशील है जितनी एक मां को होना चाहिए। दूसरा, मृतक सौरभ की माँ का यह कहना कि आज बेटे को न्याय मिला, जो एक परिवार के 591 दिन लंबे इंतजार और 126 सुनवाइयों के दर्द का अंत है। मृत्युदंड एक सभ्य समाज के लिए हमेशा एक दुखद घटना है। 

लेकिन यह फैसला एक स्पष्ट चेतावनी है कि वैवाहिक संबंधों में विश्वासघात का रास्ता कानूनन तलाक से निकलता है, हत्या से नहीं। प्रेम के नाम पर किया गया स्वार्थ जब किसी निर्दोष की जान ले लेता है, तो समाज को उसके खिलाफ सबसे कठोर शब्दों में बोलना ही पड़ता है। इस सजा ने पीड़ित परिवार को न्याय दिया है, पर साथ ही हम सबके सामने यह सवाल भी छोड़ा है कि हम अपने रिश्तों में इतने असंवेदनशील और हिंसक कैसे होते जा रहे हैं?

Thursday, October 15, 2026

Elderly woman became immortal by donating one rupee


‍Bodhi Tree

Ashok Mishra

After attaining enlightenment, Buddha gave his first sermon from Sarnath. It is said that only five people were present at that time. Later the number of Buddha's disciples reached lakhs. To accommodate these disciples, Mahatma Buddha and his wealthy supporters had established Sanghas, monasteries and viharas at many places. 

The name of the organization of disciples of Mahatma Buddha was 'Buddhist Sangha' or 'Bhikshu Sangha'. After his enlightenment, Buddha expanded and built Buddhist orders at various places in North India such as Magadha, Sarnath, Vaishali, Shravasti, Rajagriha, etc. At one place, when the need to build a Buddhist monastery was felt, Tathagata decided to collect money from the people for it. 

People donated generously for the construction of the Buddhist monastery. Nagar Seth also gave a lot of gold coins. An elderly woman came among these people. He lived his entire life in extreme poverty. Somehow he managed to earn his living and saved one rupee. That elderly woman brought one rupee and handed it over with great devotion for the construction of the Vihar. 

When everything was settled, Mahatma Buddha called his disciple and asked who had donated how much. That disciple said, Lord! Nagar Seth had donated several hundred gold coins, but this was not even one percent of his total wealth. Then Buddha asked who had given 100% donation. The disciple told that a poor elderly mother had donated one rupee. That was his life's savings. When the monastery was completed, the inscription on its door had the old woman's name inscribed at the top.