Sunday, August 2, 2026

जीभ ही अच्छा-बुरा कहलवाती है

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अरबी, फारसी और तुर्की साहित्य में लुकमान के संबंध में काफी कहानियां मिलती हैं। कहते हैं कि इनका जिक्र कुरान में भी किया गया है। साहित्य में इन्हें काफी बुद्धिमान बताया गया है। पुरानी पुस्तकों में इनका नाम लुकमान अल हाकिम के नाम से जाना जाता है। कुछ पुस्तकों में इन्हें बहुत बड़ा हकीम माना गया है। लुकमान के बारे में मशहूर है कि यह बचपन में गुलाम थे। 

जिस युग में हकीम पैदा हुए थे, उस युग में अरब देशों में गुलाम रखने का चलन था। जिस व्यक्ति के लुकमान गुलाम थे, वह बड़ा भला आदमी था। वह अपने गुलामों के प्रति दयाभाव रखता था और उन्हें बेवजह यातना नहीं दिया करता था। उनके सुख-दुख का ख्याल भी रखता था। उन्हीं दिनों लुकमान की बुद्धिमानी की चर्चा होने लगी थी। एक दिन इनके मालिक ने लुकमान को बुलाया और कहा कि आज मैं तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा लेना चाहता हूं। यदि तुमने मेरे सवालों का सही-सही जवाब दिया, तो तुम्हें गुलामी से मुक्त कर दूंगा। 

लुकमान मान गए। मालिक ने कहा कि यह बकरा ले जाओ और इसका जो भी अच्छा अंग हो वह लेकर आओ। हकीम थोड़ी दे बाद लौटे और अपने मालिक के सामने बकरे की जीभ रख दी। मालिक ने कहा कि क्या यही सबसे अच्छा अंग है? लुकमान ने कहा कि शरीर में जीभ अच्छी हो तो सब कुछ अच्छा होता है। मालिक ने कहा कि इसे हटाओ और सबसे बुरा अंग लेकर आओ। 

कुछ क्षण बाद लुकमान फिर जीभ लेकर लौटे और बोले-शरीर में जीभ बुरी हो, तो जीवन खराब कर देती है। लुकमान के जवाब से मालिक बहुत खुश हुआ। उसने समझ लिया कि लुकमान उसे क्या समझाना चाहते हैं। उसने तत्काल लुकमान को गुलामी से मुक्त कर दिया।

कैंसर से बचाव और रोकथाम के लिए लोगों का जागरूक होना बहुत जरूरी

अशोक मिश्र

कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कल ही फेफड़ा कैंसर दिवस मनाया गया है। हरियाणा सरकार ने भी लोगों को जागरूक करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जागरूकता सेमिनार, भाषण और खेलकूद प्रतियोगिताओं के माध्यम से कैंसर फैलने के कारण और निवारण पर चर्चा की गई, लेकिन यह भी सच है कि प्रदेश में कैंसर एक नई मुसीबत बनती जा रही है। अब यह केवल शहरी नहीं बल्कि ग्रामीण समस्या बन चुका है। पूरे प्रदेश में मुंह और फेफड़े के कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज मिल रहे हैं, वहीं महिलाओं में स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर और पुरुषों में फेफड़ा व प्रोस्टेट कैंसर प्रमुख हैं। 

राज्य में फेफड़े के कैंसर फैलने का प्रमुख कारण बीड़ी, तंबाकू और हुक्का है। इसके शिकार पुरुष और स्त्री दोनों हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार हरियाणा में 29.1 प्रतिशत पुरुष और 2.5 प्रतिशत महिलाएं तंबाकू का सेवन करती हैं। गांवों में बीड़ी, हुक्का और खैनी का प्रचलन अधिक है। चिकित्सकों के अनुसार ग्रामीण महिलाओं में कैंसर बढ़ने का प्रमुख कारण बीड़ी है। बीड़ी और हुक्का का उपयोग करने में ग्रामीण महिलाएं पुरुषों से बहुत ज्यादा पीछे नहीं हैं। 

हालांकि यह भी सही है कि शहरों में ही नहीं, अब ग्रामीण इलाकों में भी हालात बदल रहे हैं। स्त्री-पुरुष जागरूक हो रहे हैं। बस, चिंताजनक बात यह है कि शहरों में नई पीढ़ी में सिगरेट का चलन थोड़ा बढ़ रहा है। इस पर रोक लगाने का प्रयास करना होगा। इसके लिए केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं होंगे। नई पीढ़ी के अभिभावकों को भी नशे के खिलाफ उतरना होगा। अपने घर के बच्चों को समझाना होगा, इसके नुकसान समझाने होंगे, तभी युवाओं में बीड़ी, सिगरेट और हुक्के के प्रति बढ़ते आकर्षण को रोकना संभव होगा। वैसे राज्य सरकार ने बढ़ते कैंसर को चुनौती के रूप में लेते हुए इससे निपटने के लिए कई स्तर पर कदम उठाए हैं। इस कार्य में केंद्र सरकार आगे बढ़कर सहयोग भी कर रही है। 

केंद्र के सहयोग से झज्जर में राष्ट्रीय कैंसर संस्थान और अंबाला कैंट में अटल कैंसर केयर सेंटर जैसे केंद्र स्थापित किए गए हैं। जिला स्तर पर नॉन कम्युनिकेबल डिजीज कार्यक्रम के तहत मुंह, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की मुफ्त स्क्रीनिंग की जा रही है। सिविल अस्पतालों में फ्लोराइड लैब के माध्यम से पेयजल जांच करके कैंसर को फैलने से रोकने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। आशा कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। तंबाकू नियंत्रण अभियान के साथ-साथ आयुष्मान भारत के तहत मुफ्त इलाज की व्यवस्था की जा रही है। साल 2026 में राज्य सरकार ने 17 जिलों में नए डे-केयर कैंसर सेंटर शुरू किए हैं। ऐसी स्थिति में कैंसर से बचाव के लिए लोगों की जीवनशैली में बदलाव सबसे प्रभावी उपाय है, जिसमें तंबाकू और बीड़ी-हुक्का पूरी तरह छोड़ना होगा।

Saturday, August 1, 2026

बुजुर्ग होते पिता और नए खुलते वृद्धाश्रम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत में वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या यह बताने के लिए पर्याप्त है कि एकल परिवार में बुजुर्गों की स्थिति काफी दयनीय होती जा रही है। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तो परिवार के बुजुर्ग सदस्यों का मान-सम्मान भी बना रहता था और उनकी बुढ़ापे में देखभाल भी अच्छी तरह से होती रहती थी। परिवार में  अच्छा खासा दखल भी उनका बना रहता था, लेकिन एकल परिवार के चलन ने सब कुछ स्वाहा कर दिया है। 

मेरे एक मित्र दीनदयाल हैं। हमारी काफी पुरानी मित्रता है। वह जीवन भर एक सरकारी नौकरी की बदौलत अपना जीवन यापन करते रहे। कभी किसी से दो पैसे लेना भी गंवारा नहीं किया। हालांकि चाहते तो काफी कुछ कमा सकते थे। पांच-छह साल पहले मेरी मुलाकात लखनऊ में दीनदयाल से हुई। रिटायरमेंट का कुछ ही समय बचा था। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनकी बेटियों की शादी अच्छे खाते-पीते परिवार में हो गई है। 

एक बेटा अमेरिका में नौकरी करता है, वहीं उसने अमेरिकन लड़की से विवाह कर लिया है। चार-पांच साल में एकाध दिन के लिए आता है। दूसरा बेटा भी सरकारी नौकरी में है और वह दूसरे शहर में अपने परिवार के साथ रहता है। उनकी पत्नी की मृत्यु काफी पहले हो गई थी। 

एक साल पहले जब लखनऊ गया, तो उनसे मुलाकात हुई। दीनदयाल काफी कमजोर नजर आ रहा था। पूछने पर उसने एक गली की ओर इशारा किया और बताया कि वहां रहता है। दो महीने पहले लखनऊ गया, तो दीन दयाल से मिलने की इच्छा हुई। पूछते-पूछते वहां पहुंचा, तो पता लगा कि जहां दीनदयाल रहता है, वह एक वृद्धाश्रम है। पिछले कई साल से दीनदयाल वहीं रह रहा है, जबकि उसका एक बेटा लखनऊ में ही तबादला करवाकर रह रहा है। सोचता हूं, जिसने बच्चों के पालन-पोषण में सारी जिंदगी खपा दी, वही बच्चे अपने पिता को नहीं पाल पा रहे हैं।

सौ सप्ताह तक नशे के खिलाफ चलेगा अभियान, अब नजीर बनेगा हरियाणा

अशोक मिश्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो अगस्त को ‘नशा मुक्त युवा फार विकसित भारत संकल्प’ अभियान का शुभारंभ करेंगे। पीएम मोदी इस दौरान देश के एक करोड़ से अधिक युवाओं से वर्चुअली जुड़ेंगे और नशा मुक्त समाज के निर्माण का संकल्प लेंगे। हरियाणा जैसे राज्यों के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा, जहां सौ सप्ताह तक नशे के खिलाफ जनांदोलन की तैयारी चल रही है। 

प्रधानमंत्री के संबोधन के साथ ही सभी शिक्षण संस्थानों में एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ, नशा मुक्ति मित्र के रूप में पंजीकरण अभियान और फिट इंडिया से जुड़ी विशेष खेल गतिविधियों की शुरुआत होगी। हरियाणा ने अब नशे के खिलाफ लड़ाई को पुलिस फाइलों से निकालकर गली-मोहल्ले तक पहुंचाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी अपने संबोधन में कई बार इस बात को दोहरा चुके हैं कि नशे को खत्म करना सिर्फ पुलिस का काम नहीं, यह समाज की जिम्मेदारी है। 

नशा मुक्ति केवल उपचार या पुलिस कार्रवाई का विषय नहीं है, बल्कि यह विकसित भारत की पहली शर्त है। जब युवा नशे से दूर रहकर पढ़ेगा, खेलेगा, नवाचार करेगा, तभी वह देश और प्रदेश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बना पाएगा। प्रदेश में नशीले पदार्थों की बिक्री की स्थिति आज भी चिंताजनक बनी हुई है। हालांकि उसका स्वरूप बदल गया है। पहले जहां पंजाब से सटे सिरसा, फतेहाबाद, डबवाली जैसे सीमावर्ती जिलों में हेरोइन और अफीम की तस्करी ज्यादा होती थी। वहीं अब एनसीआर के जिलों फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल और पानीपत तक सिंथेटिक नशा और दोहरे उपयोग वाली दवाओं का जाल फैल गया है। पंजाब और राजस्थान की सीमा से सटा होने के कारण हरियाणा ट्रांजिट रूट भी रहा है। 

स्कूल-कॉलेज, औद्योगिक क्षेत्र और बॉर्डर के जिले इसके सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके माने जाते हैं। सस्ती दवाओं, सिंथेटिक ड्रग्स और अवैध शराब के जरिए तस्कर नेटवर्क ने युवाओं को निशाना बनाया। लेकिन हरियाणा पुलिस और नारकोटिक्स विभाग के आपसी तालमेल ने नशा कारोबार पर जबरदस्त चोट भी की है। राज्य सरकार की अब तक की सफलता को आंकड़ों में देखें तो कार्रवाई बड़े पैमाने पर हुई है। 2020 से 2025 तक के छह वर्षों में हरियाणा में एनडीपीएस एक्ट के तहत 20,519 एफआईआर दर्ज कर 35,207 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। बड़े तस्करों के खिलाफ 2,353 एफआईआर में 6,256 बड़ी मछलियों को पकड़ा गया है। वर्ष 2025 को तो अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई वाला साल माना जा रहा है, जिसमें अकेले 3,738 एफआईआर और 6,801 गिरफ्तारियां हुईं जिनमें 33 विदेशी नागरिक भी शामिल थे।

 इसके बावजूद मुख्यमंत्री सैनी का यह कहना सही है कि जब तक समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक हरियाणा को नशा मुक्त नहीं बनाया जा सकता है। अगर स्कूल, पंचायत, परिवार और प्रशासन एक साथ चले तो हरियाणा नशे के खिलाफ नजीर बन सकता है। 

Friday, July 31, 2026

प्रोफेसर के आगे नहीं झुके बिधानचंद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डॉ. बिधान चंद राय का जन्म पटना के बांकीपुर में एक बंगाली कायस्थ परिवार में 1882 में हुआ था। वह एक महान चिकित्सक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह पश्चिम बंगाल के वह दूसरे मुख्यमंत्री थे जो अपने मृत्युपर्यंत बारह साल तक अपने पद पर बने रहे। बिधानचंद राय को आधुनिक बंगाल का निर्माता कहा जाता है। संयोग की बात है कि बिधान चंद का जन्म और मृत्यु एक जुलाई को ही हुई थी। 

भारत सरकार ने उन्हें 1961 में भारत रत्न से सम्मानित किया था। बिधान चंद के माता-पिता ब्रह्मसमाजी थे जिसका प्रभाव उनके जीवन पर काफी गहरा पड़ा था। उनके पिता डिप्टी कमिश्नर थे, लेकिन अपनी दानशीलता के कारण हमेशा आर्थिक दबाव में रहे। स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने बहुत ही कठिन परिश्रम के बाद कलकत्ता मेडिकल कालेज में प्रवेश पाया। 

अपनी प्रतिभा और सादगी के चलते वह जल्दी ही अध्यापकों और छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए। वह सत्यवादी थे। चाहे जो परिस्थितियां हों, वह हमेशा सत्य ही बोलते थे। एक बार की बात है। उनके एक प्रोफेसर की वजह से कार दुर्घटना हो गई। उस समय बिधानचंद राय वहीं मौजूद थे। प्रोफेसर ने बिधानचंद को अपने पक्ष में गवाही देने को कहा। 

बिधानचंद ने सच कहना ही स्वीकार किया। प्रोफेसर ने बहुत धमकाया, परीक्षा में फेल करने की धमकी दी, लेकिन वह अडिग रहे। अदालत में उन्होंने वही कहा, जो देखा था। नतीजा यह हुआ कि प्रोफेसर दंडित किया गया। प्रोफेसर ने दुर्भावना वश उन्हें उस साल परीक्षा में फेल कर दिया। उनका एक साल बरबाद गया, लेकिन वह बाद में परीक्षा पास करके एक योग्य चिकित्सक बने। गरीबों की चिकित्सा वह बिना फीस लिए करते थे।

यदि सुरक्षा नहीं, तो किसी काम का नहीं है एक पेड़ मां के नाम पौधरोपण

अशोक मिश्र

मां और धरती दोनों में बड़ी साम्यता है। एक इंसान को जन्म देती है, दूसरी हवा, पानी और अनाज के जरिये जीवन को आगे बढ़ाती है। इसी नजरिये को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 जून 2024 को पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में देश भर में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान शुरू किया था। इसके माध्यम से जन्म देने वाली मां की स्मृति को बनाए रखते हुए प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना था। ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया गया कि वह अपनी मां के नाम पर हर साल एक पौधरोपण अवश्य करें। रोपा गया पौधा जब पेड़ बन जाएगा, तो उनके मां की स्मृतियां पेड़ के माध्यम से जीवित रहेंगी। 

हरियाणा में भी लोगों ने इस मुहिम को साकार बनाने की ठान ली। हरियाणा को पहले चरण में 1.6 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य मिला था, लेकिन राज्य ने 1.87 करोड़ पौधे लगाकर सबको चकित कर दिया था। पूरे राज्य में बड़, पीपल, गुलमोहर, नीम और फलदार पौधे लगाए गए जिससे यह साफ हुआ कि लोगों ने इसे सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भावनात्मक जिम्मेदारी मान लिया था।  

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 26 जुलाई 2026 को यमुनानगर पुलिस लाइन में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधारोपण किया। इस अवसर पर उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि पौधे सिर्फ पर्यावरण नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं। हर नागरिक से जीवन में कम से कम एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल जरूर करनी चाहिए। सरकार ने इस मुहिम को होल आॅफ गवर्नमेंट और होल आॅफ सोसाइटी मॉडल पर चलाया। इस तरह का संदेश जब मुखिया से गांव तक जाता है तो लोगों में जिम्मेदारी का भाव आता है। सरकार ने इसे केवल अपील नहीं रहने दिया, संस्थागत बनाया है। 

वन विभाग को नोडल बनाकर मनरेगा, जल शक्ति अभियान, स्वच्छ भारत मिशन, अमृत सरोवर और राष्ट्रीय हरित राजमार्ग मिशन से जोड़ा गया है, ताकि गड्ढा खोदने से लेकर पानी देने तक की जिम्मेदारी बँटे। सबसे प्रयोगधर्मी कदम वन मित्र योजना रही, जहाँ पौधा लगाने पर 20 रुपये और उसकी देखभाल सौंपने पर 10 रुपये प्रति पौधा प्रोत्साहन दिया गया। इससे लोगों की आय बढ़ी और पौधों को सुरक्षा भी मिली। कई जिलों से यह भी खबरें आ रही हैं कि काफी संख्या में रोपे गए पौधे सूख चुके हैं या फिर अपने स्थान से गायब हैं। 

सवाल यह भी है कि क्या पौधरोपण का लक्ष्य पूरा हुआ। संख्यात्मक के लिहाज से हरियाणा ने हर चरण में अपना कोटा पूरा किया है। कई बार उससे आगे भी निकला है। नहरों, अमृत सरोवरों और स्कूल परिसरों में लगे पौधों की देखभाल अपेक्षाकृत बेहतर है, जबकि सड़क किनारे और खुले मैदानों में गर्मी और पानी की कमी से क्षति भी हुई है। कुछ मामले तो केवल फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रहे, इसके बाद ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी गई।

Thursday, July 30, 2026

अदालत का आदेश नहीं मानते, तो हंटर से पिटवाता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बंगाल के एक सुल्तान हुए थे गयासुद्दीन आजम शाह। इनकी न्यायप्रियता की कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। गयासुद्दीन इलियास शाही वंश के तीसरे सबसे प्रभावशाली शासक थे। इन्होंने बंगाल पर 1390 से 1410-11 ईस्वी तक शासन किया था। गियासुद्दीन आजम शाह सिकंदर शाह और उनकी एक हिंदू पत्नी के पुत्र थे। इनके सत्रह सौतेले भाई थे। अपने पिता के शासनकाल में उन्होंने मयमनसिंह जिले के राज्यपाल के रूप में कार्य किया और वहाँ गियासपुर नामक एक टकसाल की स्थापना की थी। 

कहते हैं कि गयासुद्दीन रोज तीरंदाजी का अभ्यास किया करते थे। एक दिन दुर्योग से उनका तीर लक्ष्य से भटककर एक विधवा के इकलौते बेटे को जा लगा। बेटे की तीर लगने से मौत हो गई। उस महिला ने अपने बेटे की मौत को लेकर शहर के काजी के यहां न्याय दिलाने के लिए गुहार लगाई। शहर काजी ने समन भेजकर सुल्तान गयासुद्दीन को अपनी अदालत में तलब किया। 

सुल्तान भी साधारण कपड़े में अदालत में आए और एक आरोपी की तरह कठघरे में खड़े हो गए। न्यायालय की कार्रवाई शुरू हुई। तमाम गवाहों और सुबूतों के आधार पर सुल्तान दोषी पाए गए। काजी ने सुल्तान को विधवा के भरणपोषण के लिए उचित मुआवजा देने का आदेश दिया। सुल्तान ने आदेश मान लिया। जब मामला निपट गया, तो सुल्तान ने अपने कपड़ों में छिपी तलवार निकालकर काजी को दिखाते हुए कहा कि अगर आज आप डर जाते और न्याय नहीं करते, तो इसी तलवार से आपका गला काट देता। 

तब काजी ने अपनी गद्दी से हंटर निकालकर दिखाते हुए कहा कि यदि आप अदालत का फैसला नहीं मानते, तो इसी हंटर से पिटवाता। यह सुनकर सुल्तान ने काजी को गले लगा लिया और उसके न्याय की खूब प्रशंसा की।

नई औद्योगिक नीति से रोजगार सृजन की अपार संभावनाएं

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने नई औद्योगिक नीति लांच कर दी है। हरियाणा प्रगतिशील एमएसएमई एवं निर्यात संवर्धन नीति केवल एक सरकारी घोषणा मानना भूल होगी। नई औद्योगिक नीति प्रदेश की अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने वाला कदम साबित होने वाला है। 55 हजार करोड़ के शुरुआती निवेश और पांच लाख करोड़ के बड़े लक्ष्य वाली इस ‘मेक इन हरियाणा 2026’ नीति का सबसे बड़ा संदेश है कि अब निवेश सिर्फ गुरुग्राम-मानेसर तक सीमित नहीं रहेगा। इसका लाभ राज्य के लगभग सभी जिलों को मिलेगा। नई औद्योगिक नीति से विजन 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में भी सफलता मिलेगी। 

नई औद्योगिक नीति का सबसे ज्यादा लाभ रोजगारऔर प्रति व्यक्ति आय के क्षेत्र में दिखाई देगा। सैनी सरकार नई नीचि से खुद 10 लाख नौकरियों के सृजन का लक्ष्य बता रही है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, एआई, डेटा सेंटर, फार्मा और खिलौना निर्माण जैसे नए सेक्टर शामिल हैं। इतने भारी भरकम पूंजी निवेश के बाद जब लोकल युवाओं को स्थानीय फैक्ट्रियों में स्किल्ड नौकरी मिलेगी, तो इसके पूरे प्रदेश में पलायन घटेगा। इन फैक्ट्रियों में उत्पादित माल की खपत बढ़ेगी, जो स्थानीय लोगों की आय में सीधे इजाफा करेगा। रोजगार सृजन से जहां प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी, वहीं दूसरे प्रदेशों और विदेश में इन उत्पादों का निर्यात करने से विदेशी मुद्रा का भंडार भी बढ़ेगा। नई औद्योगिक नीति में रोजगार को लेकर सरकार का लक्ष्य साफ है। 

अगले पांच साल में 10 लाख नए रोजगार पैदा करने की दिशा में नई औद्योगिक नीति एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। इसका सबसे ज्यादा जोर उन सेक्टरों पर है जहाँ कम पूंजी में ज्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। इसमें सबसे आगे मैन्युफैक्चरिंग और आॅटोमोबाइल,इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपोनेंट सेक्टर है। फरीदाबाद-गुरुग्राम-मानेसर बेल्ट में पहले से मौजूद फैक्ट्रियों के विस्तार और नई आईएमटी बनने से असेंबलिंग, वेल्डिंग, मेंटेनेंस जैसे कामों में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होगा। राज्य में दूसरा बड़ा क्षेत्र खिलौना निर्माण, फार्मा और कृषि आधारित उद्योग है। 

इन क्षेत्रों में पूंजी निवेश के बाद रोजगार सृजन की अपार संभावनाएं हैं। ये सभी श्रम आधारित उद्योग हैं और एमएसएमई के जरिए गांव-कस्बों तक नौकरियों पहुंचेंगी और लोगों का जीवन स्तर अच्छा होगा। हरियाणा की नई 'मेक इन हरियाणा 2026' नीति का फोकस अब पारंपरिक उद्योग से हटकर भविष्य के उद्योगों पर ज्यादा है, इसलिए इसका फायदा चुनिंदा नहीं बल्कि एक पूरी चेन को होगा। सरकार ने इसी वजह से रोजगार सब्सिडी और एसजीएसटी रिफंड को नीति से जोड़ा है ताकि कंपनियां हरियाणा के युवाओं को ही प्राथमिकता दें। सरकार ने महिला उद्यमियों, अनुसूचित जाति, दिव्यांग, पूर्व सैनिकों जैसे तमाम लोगों के लिए विशेष प्रोत्साहन प्रावधान किए हैं।


Wednesday, July 29, 2026

अंतत: पर्वत पर चढ़ने में कामयाब हो गया

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जीवन में हर किसी के सामने कोई न कोई समस्या जरूर सामने आती है। अगर व्यक्ति को हल करने के लिए पहला कदम उठाता है, वही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। अपने लक्ष्य की ओर उठा पहला कदम ही उसको आधी सफलता दिला देता है। यदि वह पहला कदम नहीं उठाता तो सफलता कैसे हासिल होती। किसी गांव में एक युवक रहता था। उस गांव के सामने एक पर्वत था। 

वह उस पर्वत पर चढ़कर अपने गांव का नाम रोशन करना चाहता था। लेकिन गांव के लोग उसको हर बार हतोत्साहित कर देते थे। इसके कारण उसमें धीरे-धीरे साहस की कमी होती गई और वह अपने साहस पर ही शंका करने लगा। संयोग से उस रास्ते से एक दिन एक साधु गुजरा। 

वह थोड़ी देर के लिए उस गांव में भी गया। मुलाकात के दौरान उस युवक ने अपने मन की सारी बात साधु को बताई। यह सुनकर साधु ने कुछ दिन गांव में रहने का निश्चय किया। साधु उसे गांव के बाहर ले गया और एक बड़े से पत्थर को उठाने को कहा। युवक ने कहा कि इतना बड़ा पत्थर मैं कैसे उठा सकता हूं। साधु ने कहा कि तुम इसे उठा नहीं सकते, तो क्या हुआ? ढकेल तो सकते हो। 

साधु के कहने पर युवक रोज पत्थर को ढकेलने का प्रयास करता रहा। कुछ दिन बाद साधु ने युवक से कहा कि अब तुम पर्वत की चढ़ाई शुरू करो। युवक ने पर्वत की चढ़ाई शुरू की और अंतत: वह पर्वत पर चढ़ने में कामयाब हो गया। जब युवक वापस आया, तो उसने साधु से कहा कि आपने मुझे पत्थर ढकेलने के लिए क्यों कहा था? साधु ने कहा कि पत्थर ढकेलने से तुम्हारा शरीर मजबूत हुआ। जब शरीर मजबूत हुआ, तो तुम्हारा साहस लौट आया। आज पर्वत पर चढ़ने में सफल हुए हो, तो इसका कारण यह है कि तुमने पत्थर को ढकेलने के लिए पहला कदम उठाया था। यही तुम्हारी सफलता का राज है।

कांवड़ यात्रा को सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने की तैयारी

अशोक मिश्र

सावन का पवित्र महीना कल यानी 30 जुलाई से शुरू हो रहा है। सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं। जो भी भक्त भगवान शिव की सच्चे मन और पूरी आस्था के साथ पूजा करता है, भगवान उसकी मनोकामना अवश्य पूरी करते हैं। यही वजह है कि शिवभक्त सावन में भगवान को प्रसन्न करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं। इसके लिए वे तमाम परेशानियां सहकर भी गंगा जल लाते हैं और अपने देवाधिदेव भगवान शंकर को अर्पित करते हैं। 

हर साल की तरह देश-प्रदेश के करोड़ों शिव भक्त कल से कांवड़ यात्रा पर निकलेंगे। वैसे तो हरियाणा में गंगा का कोई तट नहीं है, लेकिन यह उत्तराखंड, यूपी और दिल्ली को जोड़ने वाला सबसे अहम ट्रांजिट राज्य है। इसलिए हर साल लाखों कांवड़िए हरिद्वार-ऋषिकेश से गंगाजल लेकर यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, रोहतक, हिसार, भिवानी और गुरुग्राम-मानेसर होते हुए अपने-अपने शिव मंदिरों तक जाते हैं। हर साल की तरह राज्य प्रशासन की तरफ से कांवड़ियों के रूट पर गड्ढे भरवाने, सड़क किनारे झाड़ियां साफ कराने, स्ट्रीट लाइट, पीने का पानी, शौचालय, बिजली और सात्विक भोजन के शिविर लगाने के निर्देश दिए गए हैं। 

डीजे की आवाज और कांवड़ की ऊंचाई तय सीमा में रखने को कहा गया है ताकि यातायात बाधित न हो। कुछ दिन पहले मेरठ में पांच राज्यों के आला अधिकारियों की एक संयुक्त बैठक हुई थी जिसमें कांवड़ियों की यात्रा को सुरक्षित संपन्न कराने के लिए पूरा प्लान तैयार किया गया था। हरियाणा के सामने संतुलन साधने की चुनौती है, एक तरफ कांवड़ियों को सम्मान, सुरक्षा और सुविधा देनी है, दूसरी तरफ स्कूल, अस्पताल और रोजमर्रा की आवाजाही बाधित न हो इसका ध्यान रखना है। 

अगर समय से रूट की जानकारी, साफ-सफाई और स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से सेवा शिविर लगें और कांवड़िए भी अनुशासन बनाए रखें तो यह यात्रा वाकई सेवा और सौहार्द का उदाहरण बन सकती है। सैनी सरकार ने जो व्यवस्था की है, उसको देखते हुए यही लगता है कि इस बार भी पूरे राज्य में कांवड़ यात्रा सुरक्षित, सुविधाजनक और बाधारहित होगी। यदि राज्य और राज्य के बाहर से आने वाले कांवड़िए अनुशासन में रहे, निस्संदेह सरकार उनको हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए तत्पर है। सावन का महीना वैसे भी आस्था और विश्वास का है। सात्विकता और शुद्ध आचरण की अपेक्षा इस महीने में हर किसी से की जा सकती है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने पूरे कांवड़ रूट पर मीट और शराब की दुकानें पूरी तरह बंद रखने का आदेश जारी किया है। सुरक्षा के लिहाज से इस बार इंतजाम पहले से कहीं ज्यादा कड़े और तकनीक आधारित हैं। हरियाणा पुलिस ने भी इसे चुनौती के रूप में लेते हुए कांवड़ यात्रा को अबाधित संपन्न कराने की चुनौती स्वीकार की है।