Saturday, April 25, 2026

एकाग्रचित्त होकर लक्ष्य पर ध्यान दो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी विवेकानंद हमेशा हर काम को एकाग्रचित्त होकर करने का संदेश दिया करते थे। वह लोगों को जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से ही समझाने का प्रयास करते थे। वैसे स्वामी विवेकानंद खुद अपनी यात्रा के दौरान हुए अनुभवों से सीख लेते थे। 

उन पर विचार करते थे और उसके बाद अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते थे। वह संन्यासी होते हुए भी लोगों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने कई देशों की यात्राएं की थीं। वह जहां भी जाते थे, जिज्ञासु लोग उन्हें घेर लेते थे और धर्म की चर्चा करते थे। 

एक बार की बात वह किसी देश की यात्रा पर थे। वह लोगों से मिलते जुलते हुए घूम रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक पुल पर खड़े हुए कुछ लड़के बहते हुए अंडे के छिलके पर निशाना लगाने की कोशिश कर रहे हैं। उन सभी लड़कों में एक तरह की अघोषित प्रतियोगिता चल रही थी। 

किसी भी लड़के का सटीक निशाना नहीं लग रहा था। स्वामी विवेकानंद कुछ देकर तक लड़कों का यह कौतुक देखते रहे। फिर उन्होंने एक युवक से कहा कि लाओ, बंदूक मुझे दो। एक लड़के ने अपनी बंदूक स्वामी जी को थमा दी। स्वामी जी ने पहला निशाना साधा। एकदम सटीक निशाना लगा। 

इसके बाद उन्होंने दस निशाने लगाए, सारे निशाने सटीक लगे। लड़कों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि आपने यह कैसे कर लिया? स्वामी जी ने कहा कि जब तुम किसी काम को करो, तो अपना पूरा ध्यान उसी काम पर लगाओ। एकाग्रचित्त होकर यदि कोई काम करोगे, तो सफलता जरूर मिलेगी। पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर ही लगा दो। मैंने भी ऐसा ही किया। यही वजह है कि मेरे सारे निशाने ठीक लगे।

मंडियों में अव्यवस्था और गेहूं की धीमी उठान से किसानों में भारी रोष

अशोक मिश्र

हरियाणा में गेहूं की फसल लगभग पूरी तरह कट चुकी है। किसानों ने अपने परिश्रम को नकदी में बदलने के लिए मंडियों की ओर रुख करना बहुत पहले से शुरू कर दिया था। इन दिनों तो मंडियों में किसानों की आमद काफी तेज हो गई है। लेकिन तमाम दावों और वायदों के बावजूद मंडियों की व्यवस्था चरमरा कर रह गई है। किसान अपनी फसल को लेकर मंडियों में पहुंच रहे हैं, लेकिन उनके अनाज खरीदने के लिए या तो कर्मचारी  उपलब्ध नहीं हैं या फिर जो अनाज खरीद लिया गया है, उसकी उठान की कोई मुकम्मल व्यवस्था तक नहीं है। मंडियों की पूरी व्यवस्था अस्त-व्यस्त दिखाई देती है। राज्य भर की मंडियों में चारों ओर गेहूं ही गेहूं दिखाई पड़ रहा है।  प्रदेश की 14 मंडियों में हालात काफी बिगड़े हुए हैं। 

गेहूं का ढेर सड़कों और मंडियों में लगा हुआ है।  इस अनाज का कोई पुरसाहाल नहीं है। राज्यभर की मंडियों से अब तक जो आंकड़ा मिल रहा है, उसके मुताबिक राज्य मंडियों में अब तक 80.39 लाख मीट्रिक टन गेहूं की आवक हुई है। इसमें से 58.28 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद हुई है। बाकी अनाज अभी तक मंडियों में ही पड़ा हुआ है। जहां तक अनाज की उठान का मामला है, अभी तक कुल 30.14 लाख मीट्रिक टन का ही उठान हो पाया है। हालत यह है कि 12 अप्रैल को खरीदा गया गेहूं अभी तक उठाया नहीं गया है। 

आढ़ती एसोसिएशन के प्रधान रघुवीर चट्ठा का कहना है कि छह दिन पहले एसोसिएशन और किसानों ने मंडियों की अव्यवस्था को लेकर रोष जताया था। तब प्रशासन ने आश्वासन देते हुए कहा था कि पहले केंद्र की सड़कों से गेहूं उठाया जाएगा। इसके बाद प्लेटों से गेहूं उठान शुरू किया जाएगा। लेकिन हालत आज तक नहीं सुधर हैं। इससे आढ़तियों में काफी रोष है। 

उठान न होने की वजह से किसानों को भुगतान मिलने में भी देरी हो रही है। धीमी उठान की वजह से 11.3 प्रतिशत भुगतान किसानों को नहीं हो पाया है। किसान अपने खातों को बार-बार चेक करते हैं और फिर मायूस हो जाते हैं। अभी तक 6269.09 करोड़ रुपये में से कुल 2474.93 करोड़ रुपये का ही भुगतान हो पाया है। आढ़तियों का कहना है कि उठान प्रक्रिया जानबूझकर धीमी की जा रही है। 

इतना ही नहीं, आढ़तियों से प्रति कट्टा सात रुपये की अवैध वसूली की जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस तरह हर सीजन में लगभग पचास लाख रुपये का खेल किया जाता है। मंडियों में पैदा हुई अव्यवस्था के चलते आढ़तियों और किसानों में भारी रोष भी देखने को मिल रहा है। किसान संगठनों ने धीमी उठान और मंडियों में अव्यवस्था को लेकर आंदोलन की चेतावनी दी है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि वह ट्रांसपोर्टरों, माल ढुलाई और उठान से जुड़ी एजेंसियों पर कठोर कार्रवाई करे, ताकि काम में तेजी आए।

Friday, April 24, 2026

मेरे पास एक ही फटा पुराना वस्त्र है

फोटो साभार गूगल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अट्ठारहवीं शताब्दी में इसाइयत धर्मजागरण के क्षेत्र में सबसे ज्यादा चर्चित रहे संत जान वेस्ली का जन्म 17 जून 1703 में इंग्लैंड में हुआ था। वह एक पादरी, धर्मशास्त्री और ईसाई प्रचारक थे। उन्हें मेथोडिस्ट संप्रदाय का संस्थापक और जनक माना जाता है। उनके पिता सैमुअल वेस्ली और माता सुजाना वेस्ली धार्मिक प्रवृत्ति के थे। इसका प्रभाव जान वेस्ली पर भी पड़ा। 

उन्होंने अपने भाई चार्ल्स वेस्ली के साथ मिलकर एक होली क्लब भी बनाया था जिसमें वह नियमित प्रार्थना, बाइबिल का अध्ययन और लोगों के प्रति सदभाव रखना सिखाया करते थे। वह चर्च या किसी के घर में उपदेश देने की जगह खुले में उपदेश देना पसंद करते थे। एक बार की बात है। एक दिन जॉन वेस्ली अपने घर बैठे कुछ सोच रहे थे। तभी  उनके घर में काम करने वाली एक महिला आई। 

महिला उदास थी। उसकी परेशानी उसके चेहरे से झलक रही थी। जब वेस्ली ने उससे उदासी का कारण पूछा, तो उसने बताया कि उसके पास पहनने के लिए एक ही फटा पुराना वस्त्र है। इसकी वजह से वह बाहर नहीं निकल पाती है। यह बात सुनकर उन्होंने एक बार उस महिला के वस्त्रों को देखा और फिर उनकी नजर अपने कमरे में टंगे पर्दों पर गई। पर्दे काफी कीमती थे। 

महिला की दशा देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने उस महिला को वस्त्र खरीदने के लिए पैसे दिए। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य ही बना लिया दूसरों की मदद करने का। धीरे-धीरे  उन्होंने लोगों को यह कहना शुरू किया कि कमाओ, बचाओ और दान कर दो। उन्होंने अपनी भी संपत्ति काफी हद तक दान कर दी थी। यही वजह है कि ईसाई धर्मावलंबियों में वह आज भी याद किए जाते हैं।

हरियाणा को औद्योगिक हब बनाने की तैयारी में सैनी सरकार


अशोक मिश्र

कोई प्रदेश कितना समृद्ध और विकसित है, इसका पता उस प्रदेश में लगने वाले उद्योगों से चलता है। उद्योग ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यह रीढ़ जितनी मजबूत होगी, उस प्रदेश में उतने ही ज्यादा रोजगार के अवसर सृजित होंगे। राज्य में प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी होगी। ज्यादा से ज्यादा उद्योगों के लगने से लोग खुशहाल होंगे। 

अगर किसी राज्य को उद्योग लगाने वाले पूंजीपतियों और उद्यमियों को अपनी ओर आकर्षित करना है, तो उसे सबसे पहले अपने यहां सड़कों का बेहतरीन जाल बिछाना होगा। अच्छी क्वालिटी की सड़कें व्यापार और उद्योगों के लिए बहुत अधिक सहायक साबित होती हैं। सड़कें अच्छी होने से उत्पादित माल को जल्दी और सुरक्षित रूप से एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाया जा सकता है। 

बीते दिन मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने दिल्ली में इन्हीं सब मुद्दों को लेकर देश-विदेश के उद्योगपतियों से काफी विस्तार से बातचीत की। बातचीत के दौरान सीएम सैनी ने उद्योगपतियों से बस यही अनुरोध किया कि वह हरियाणा में उद्योग लगाकर अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी बेहतर उत्पाद बनाएं। भारतीय उत्पादों की ग्लोबल मार्केट में धूम मचनी चाहिए।  कंपनियां ऐसे उत्पाद बनाए कि मेक इन इंडिया का मतलब बेहतर गुणवत्ता हो। दरअसल, सैनी सरकार आटो, मैन्यूफैक्चरिंग, इलेक्ट्रानिक्स और अन्य सेक्टरों से जुड़े उद्योगपतियों से मुलाकात की थी। 

उन्होंने देश-विदेश से आए उद्योगपतियों से नई औद्योगिक नीति के लिए सुझाव भी मांगे थे। सीएम सैनी ने उद्योगपतियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि औद्योगिक निवेश के लिए हरियाणा सबसे बेहतरीन राज्य है। आज चाहे उद्योगों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात हो, चाहे सड़क कनेक्टिविटी की बात हो या मूलभूत सुविधाओं की बात हो, हर क्षेत्र में हरियाणा अव्वल है। औद्योगिक क्षेत्र के लिए बेहतर से बेहतर सुविधाएं दी जा रही हैं। सिंगल विंडो सिस्टम से कागजी कार्यवाही को संपन्न किया जा रहा है। 

हरियाणा में उद्योगों के लिए बेहतरीन इको सिस्टम है, तभी देश की बड़ी बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की पहली पसंद हरियाणा है। हरियाणा जल्द ही अपनी नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी लेकर आ रहा है, उसे लेकर उद्योगपतियों से सीधा संवाद हो रहा है। इससे इस पॉलिसी को और बेहतर बनाया जाएगा ताकि उद्योग ज्यादा से ज्यादा लाभ उठा सके और प्रदेश अधिक तरक्की कर सके। 

यह सच है कि यदि हरियाणा में उद्योग लगाने की मुहिम में सैनी सरकार सफल हो जाती है, तो 2047 में विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में हरियाणा के उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। इसी वजह से हरियाणा सरकार ने अपना विजन डॉक्यूमेंट पेश किया है। प्रदेश में औद्योगिक विकास होगा तो इससे प्रदेश की ग्रोथ भी बढ़ेगी और लोगों को अधिक से अधिक रोजगार भी मिलेगा। 

जब लाखों पौधे हर साल रोपे जाते हैं तो क्यों नहीं बढ़ रहा वन क्षेत्र?


अशोक मिश्र

दो दिन पहले पृथ्वी दिवस था। पूरी दुनिया में पृथ्वी दिवस सन 1970 से मनाया गया था। इसका उद्देश्य मानव जीवन के लिए अनिवार्य संसाधनों को नष्ट होने से बचाना और पृथ्वी को हरा भरा रखना। हरियाणा में भी पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है। इस बार भी हरियाणा में पौधरोपण को लेकर ढेर सारी योजनाएं बनाई गई हैं। कुछ पर अमल किया जा चुका है, तो कुछ पर अमल होना अभी बाकी है। कहा जा रहा है कि हरियाणा में बीते कुछ वर्षों में जिला प्रशासन और जनभागीदारी से अरावली की पहाड़ियों, जल स्रोतों और शहरी पर्यावरण को दुरुस्त करने के लिए कई स्तरों पर कार्य किया गया है। 

हरियाणा में जल संरक्षण के लिए 55 गांवों में 115 सोक पिट तैयार किए जा रहे हैं जिनका उद्देश्य अतिरिक्त पानी को सोखकर जल स्तर को बनाए रखना है। मिशन अमृत सरोवर के तहत पुराने तालाबों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है, उन्हें सुधारा जा रहा है ताकि बरसात के दिनों में अतिरिक्त पानी को संग्रहीत किया जा सके। इसके अलावा अटल भूजल योजना के तहत किसानों को प्रेरित किया जा रहा है कि वह टपका विधि से अपने फसलों की सिंचाई करें ताकि कम से कम पानी का उपयोग करके फसलों से अधिक लाभ उठाया जा सके। अरावली क्षेत्र में भी हरित आवरण बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाया जा रहा है। 

दुर्गम पहाड़ियों पर सीड बॉल का छिड़काव करके वहां हरित आवरण बढ़ाने की कोशिश हो रही है। सीड बॉल बरसात के दिनों में उग आते हैं और दुर्गम जगहों पर इस तरह नए पौधों को उगाया जाता है। सरकारी आंकड़ा बताता है कि पिछले साल अरावली और उसके आसपास के शहरी क्षेत्र में कुल एक लाख 63 हजार 517 पौधों को लगाया गया था। सरकार हर साल लाखों पौधों को सरकारी कर्मचारियों और निजी संस्थाओं के माध्यम से लगवाती है, इसके बावजूद प्रदेश में वन क्षेत्र अगर घटता जा रहा है, तो फिर सवाल यह है कि इतने अधिक प्रयास करने के बावजूद वन क्षेत्र बढ़ क्यों नहीं रहा है। 

भारतीय वन सर्वेक्षण की ताजा द्विवार्षिक रिपोर्ट के अनुसार फरीदाबाद, पलवल और नूंह जिलों में कुल मिलाकर करीब चार फीसदी तक वन क्षेत्र कम हुआ है। यह आंकड़ा किसी भी पर्यावरण प्रेमी के लिए चिंता की बात है। वन क्षेत्र कम होने से अरावली पहाड़ियों के इर्द-गिर्द बसे शहरों का तापमान बढ़ रहा है। रिकार्ड बताते हैं कि फरीदाबाद जिले में कुल 78.43 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से 1.08 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। वर्तमान में यहां 25.98 वर्ग किलोमीटर मध्यम घना जंगल और 52.45 वर्ग किलोमीटर खुला जंगल बचा है। 

इसी तरह पलवल जिले में भी 0.21 वर्ग किलोमीटर हरियाली कम हुई है। सबसे भयावह स्थिति नूंह जिले की है जहां 108.96 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से रिकॉर्ड 4.05 वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो चुका है। जंगलों के इस तरह सिमटने का सीधा असर शहर की हवा और सेहत पर पड़ना तय है। 


Wednesday, April 22, 2026

जब सच हुई ज्योतिषी की भविष्यवाणी

21 अप्रैल 2026 को प्रभात खबर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

व्यंग्य

अशोक मिश्र

आज मैं अपनी टूटी हुई बायीं कलाई लेकर अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा हुआ हूं। साथ में मेरी दाईं कनपटी भी सूजी हुई है। बात यह है कि कल सुबह जैसे ही सोकर उठा, मेरे प्रतिवेशी प्रसिद्ध ज्योतिषी थंगाबली घर पर पधारे। उनको देखते ही मैं समझ गया कि आज मेरा दिन खराब जाएगा। जब भी उनके सुबह दर्शन हुए हैं, बुरा दिन बीता है। 

मुझे देखते ही थंगाबली ईरानी मिसाइल की तरह धड़ाम से फटे और बोले, देखो! आज तुम्हारे ग्रह दशा ठीक नहीं है। तुम्हारी कुंडली में आज 'पिटनयोग' योग है। 'प' अक्षर से शुरू होने वाले रिश्तों से तो खासतौर पर सावधान रहना। इतना कहकर वह रफूचक्कर हो गए।

सुबह-सुबह जगाए जाने मूड खराब हो गया। सोचा कि जाग ही गया हूं तो मार्निंग वॉक कर लेता हूं। काफी दिन हुए उगता सूरज नहीं देखा है। सो, पहुंच गया पार्क। मैं गेट पर पहुंचा ही था कि तबीयत चकाचक हो गई। छाया के दर्शन जो हो गए थे। मैं उसके पास पहुंचा। आशिकाना लहजे में कहा, हाय छम्मकछल्लो! सूर्योदय के साथ-साथ पूर्णिमा की चांद भी उदित हो गया। यह तो चमत्कार हो गया। 

इतना कहकर मैंने विकल प्रेमी की तरह उसे गले लगा लिया। अभी मैं ठीक से उसे गले भी नहीं लगा पाया था कि मेरी दायीं कनपटी झनझना उठी। मानो इजरायल की भटकती हुई कोई मिसाइल कनपटी से टकरा गई हो। मैंने कनपटी सहलाई। छाया ने वॉकिंग स्टिक से अमेरिका की तरह प्रहार किया था। गुर्राती हुई बोली, अभी तो एक ही स्टिक मारी है। आइंदा इश्क फरमाया, तो मुंह तोड़ दूंगी। नाती-पोतों को खिलाने की उम्र में चला है इश्क लड़ाने। नासपीटे! तुम्हें शर्म नहीं आती है। इतना कहकर छाया स्टिक टेकती हुई पार्क से चली गई।

तभी मुझे ज्योतिषी थंगाबली की बात याद आई। उन्होंने कहा था कि 'प' अक्षर से शुरू होने वाले रिश्तों से सावधान रहना। 'प' अक्षर यानी प्रेमिका। मैं वॉक करने की जगह काफी देर तक पार्क की मुलायम घास पर बैठा रहा। काफी देर बाद जब होश ठिकाने आए, तो मैं उठकर घर की ओर चल दिया। घर का दरवाजा खोलकर जैसे ही अंदर हुआ, बरामदे से सनसनाता हुआ बेलन मेरे मुंह की ओर आया। 

बचने के लिए मैंने अपनी बायीं कलाई ढाल की तरह बेलन के आगे कर दिया। कलाई तो शहीद हो गई, लेकिन मेरा थोबड़ा रक्तरंजित होने से बच गया। तभी घरैतिन ट्रंप की तरह गरजती हुई आई और बोली, आपको कुछ शर्म-हया है या सब बेचकर खा गए हैं? बुढ़ापे में इश्कियाए घूमते रहते हैं। 

मैं अपनी सफाई में कुछ पाता कि घरैतिन एक बार फिर गरजीं-तुम बाहर क्या-क्या गुल खिलाते हो, मुझे पता ही नहीं चलता, अगर छाया दीदी आकर तुम्हारी करतूतों का कच्चा चिट्ठा न खोलतीं। जिंदगी भर तो हथेली पर दिल लेकर 'तू भी ले...तू भी ले' करते रहे। अब तो अपनी इज्जत का ख्याल करिए। मैं तो आजिज आ गई हूं, इस आदमी की छिछोरी हरकतों से। मैं चुपचाप कमरे में आ गया। यहां भी पत्नी से पिटा। कुछ देर बाद कनपटी और कलाई सूजने लगी, तो बेटा-पत्नी अस्पताल में भर्ती कराकर यह कहते हुए चले गए कि ठीक हो जाना, तो घर चले आना।


मैं समझ गया कि मां महान क्यों है?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मां के लिए दुनिया की सभी भाषाओं में जो भी शब्द हैं, उस भाषा के सबसे पवित्र शब्द हैं। मां की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है। मां का अपनी संतान के प्रति प्रेम बिल्कुल निस्वार्थ होता है। वह किसी लालसा या लोभ के लिए न तो अपने बच्चे को जन्म देती है और न ही जीवन में वह अपनी संतान से कोई अपेक्षा रखती है। 

एक बार स्वामी विवेकानंद से एक जिज्ञासु व्यक्ति ने पूछा कि स्वामी जी! मां की महिमा दुनिया भर के ग्रंथों में गाई गई है। ऐसा क्यों? मां इतनी महान क्यों है? यह बात सुनकर स्वामी विवेकानंद मुस्कुराए और बोले, एक काम करो। अभी तुरंत जाकर पांच सेर का एक पत्थर ले आओ। 

वह व्यक्ति पत्थर ले आया। स्वामी जी ने कहा कि एक कपड़े की सहायता से इस पत्थर को अपने पेट पर बांध लो। चौबीस घंटे तक इसे बांधे रखना। एक पल के लिए भी इसे अपने पेट से अलग मत करना। वह व्यक्ति चला गया। शाम तक वह पेट पर पत्थर लादे-लादे पस्त हो गया। 

अब उसे तो चलने-फिरने उठने बैठने में भी परेशानी होने लगी। किसी तरह दूसरे दिन की सुबह हुई और वह भागा-भागा स्वामी विवेकानंद के पास पहुंचा और बोला, एक सवाल का जवाब पाने के लिए अगर इतना कष्ट उठाना है, तो मुझे नहीं चाहिए अपने सवाल का जवाब। 

तब स्वामी जी ने समझाते हुए कहा कि तुम्हारी हालत दस-बारह घंटे में ही बिगड़ गई, जबकि मां लगभग इतना ही बोझ पेट में लेकर नौ महीने तक रहती है। वह अपने काम भी करती है, लेकिन किसी से शिकायत नहीं करती है। यही वजह है कि दुनिया में मां की महिमा गाई जाती है। यह बात सुनकर वह व्यक्ति स्वामी जी के चरणों में गिर गया और बोला, स्वामी जी, मैं समझ गया कि मां महान क्यों है?

बाढ़ से निपटने की तैयारियों में अभी से जुटी हरियाणा सरकार


अशोक मिश्र

अभी बरसात का मौसम आने में दो-ढाई महीने की देरी है, लेकिन सैनी सरकार ने यमुना नदी का जलस्तर बढ़ने पर हरियाणा के निचले जिलों में पानी भर जाने की आशंका के चलते अभी से तैयारियों करने का निर्देश दिया है। वैसे तो सैनी सरकार ने जनवरी में ही नदी तटबंधों की मरम्मत और बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी सभी परियोजनाओं की नियमित मानीटरिंग करने को कहा था। 

जनवरी में ही मुख्यमंत्री ने प्रदेश की 388 बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के लिए 637 करोड़ की मंजूरी भी प्रदान कर दी थी। इसमें जिला उपायुक्तों द्वारा प्रस्तावित की गई 102 करोड़ रुपये की 59 परियोजनाएं भी शामिल थीं। शासन स्तर पर इस बार पहले से ही चौकसी बरतने की तैयारी है ताकि पिछले साल अगस्त में हरियाणा और पंजाब में आई बाढ़ से हुए नुकसान की कहानी दोहराई न जा सके। 

यही वजह है कि इस बार बाढ़ जैसी समस्या का स्थायी समाधान करने की तैयारी की जा रही है। हरियाणा के कई जिलों में तालाब निर्माण, नदियों की सुरक्षा दीवारों को मजबूत करने से लेकर रेस्क्यू बोट की मरम्मत आदि शुरू हो चुकी है। सरकार ने यमुना नदी के किनारे बसे संवेदनशील गांवों में रेस्क्यू और राहत कार्यों को मजबूत करने पर जोर दिया है। इसके तहत 15 फीट लंबी एल्युमीनियम की नाव पहले से तैयार रखी जाएंगी ताकि आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। 

इन नाव के जरिये जलभराव या बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जाएगा। साथ ही राहत टीमों को भी मौके पर तेजी से काम करने में मदद मिलेगी। सरकार ने  प्रशासन के सामने साफ तौर पर लक्ष्य निर्धारित कर दिया है कि मानसून शुरू होने से पहले सभी काम पूरे कर लिए जाएं। तालाब, सुरक्षा दीवार और रेस्क्यू व्यवस्था पूरी तरह तैयार रखे जाएं ताकि बरसात के दिनों में निचले इलाकों में पानी भर जाने पर वहां के लोगों को तत्काल फायदा पहुंचाया जा सके। 

ज्यादा बारिश होने पर यदि इन इलाकों में जलभराव की समस्या पैदा होती है, तो किसी भी आपात स्थिति में तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू किए जा सकें। हरियाणा के कई जिलों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। फसलों को काफी नुकसान हुआ था। किसानों के सामने तो भूखों मरने तक की नौबत आ गई थी। बाढ़ के चलते खड़ी फसलों का नुकसान तो हुआ ही था, खेतों में काफी दिनों तक पानी भरा रहने की वजह से अगली फसल बोने में भी काफी देरी हुई। 

कई जगहों पर तो नमी ज्यादा होने की वजह से बीज अंकुरित कम हुए या बिल्कुल ही नहीं हुए। सैनी सरकार ऐसी स्थिति दोबारा नहीं चाहती है। यही कारण है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में ताबाल निर्माण करवाकर बाढ़ के प्रभाव को कम करना चाहती है। तालाब निर्माण से इलाके का जलस्तर भी  बढ़ेगा और लोगों को अपनी जरूरतों के लिए पानी भी समय पर उपलब्ध हो सकेगा।

संभलिए, मुट्ठी में फंसी रेत की तरह फिसल रहा समय

संजय मग्गू

अक्सर बातचीत के दौरान लोग यह बात दोहराते हैं कि पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान। सचमुच समय बलवान भी है और कीमती भी। समय अगर एक बार अतीत बन गया, तो फिर वह कभी वर्तमान नहीं बन सकता है। जो बीत गया, सो बीत गया। अक्सर जब लोग अपने चौथेपन की अवस्था में पहुंचते हैं, तो उन्हें इस बात का अफसोस होता है कि उनके पास वैसे तो बहुत कुछ है, लेकिन समय नहीं है। समय की कमी है। पछतावा भी होता है कि समय उनके ही हाथ से यों फिसल गया, जैसे मुट्ठी में दबी रेत धीरे-धीरे फिसल जाती है और पता ही नहीं चलता है कि कब रेत फिसल कर गिर चुकी है और मुट्ठी खाली है। 

अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि लोगों के पास समय बहुत है। लोग ऐसी-ऐसी बातों पर घंटों बहस करते हुए मिल जाएंगे जिससे उनका कोई लेना देना नहीं है। युद्ध में ईरान जीतेगा या अमेरिका, इसी बात को लेकर घंटों बहस करते हुए बिता देंगे,जबकि सच तो यह है कि कोई भी युद्ध जीते, उनका कोई लेना-देना न ईरान से है, न ही अमेरिका या इजरायल से। यह आदत गांव और शहर सब जगह समान रूप से पाई जाती है। गांवों में तो निरर्थक बातों पर बहस के दौरान लाठी-डंडे तक चल जाते हैं। 

भाई से भाई की, पड़ोसी से पड़ोसी की दुश्मनी तक हो जाती है, कारण वही बेकार की बहस। चौथेपन में समय की कमी का रोना रोने वाला इंसान नहीं जानता है कि प्रकृति ने उसे खूब समय दिया था। हम इंसानों को जीने लायक प्रकृति द्वारा दिया गया समय कम नहीं था। केवल कुछ ही जीवों को प्रकृति ने हमसे ज्यादा समय जीने के लिए दिया है, लेकिन हमने उसे व्यर्थ गंवा दिया। समय की चिंता इंसान इसलिए नहीं करता है क्योंकि वह अदृश्य है। मूर्तिमान नहीं है। दिखाई नहीं पड़ता है। 

धन, संपत्ति, महल-अट्टालिकाएं, रुतबा, पद दृश्यमान हैं, इसलिए इंसान सबसे ज्यादा कदर इनकी करता है, लेकिन चूंकि समय दिखाई नहीं देता है, इसलिए उसकी कोई कदर ही नहीं होती है। यही समय की खूबी है। गुजर गए समय को वापस धन, दौलत देकर भी वापस नहीं लाया जा सकता है। अगर इंसान समय को  कंजूसी से खर्च करता, तो शायद उसके पास करने के लिए बहुत सा समय बच गया होता। कहने का मतलब यह है कि समय को तो बीतना ही है। 

लेकिन हमने जो समय व्यर्थ में गंवा दिया, अगर उस समय में हमने कोई सार्थक काम कर लिया होता, तो अफसोस नहीं होता। अपना, अपने परिवार, देश और समाज के लिए अपना समय खर्च कर सकते थे। लेकिन नहीं। यह बात तब समझ में नहीं आती है, जब खूब समय होता है। इंसान को चिंता तब होती है, जब समय का अभाव होता है। ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। अब तो बैठकर बस बिसूरना ही है।

Tuesday, April 21, 2026

नींद में ही दुनिया को अलविदा कह गए थे चैपलिन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लंदन में 16 अप्रैल 1889 को पैदा हुए चार्ली चैपलिन ने अपने दर्द को ही ताकत बनाकर दुनिया को हंसाया। फिल्मी परदे पर बिना कुछ कहे केवल अपनी भावभंगिमाओं से उन्होंने लोगों को न केवल हंसाया बल्कि रुलाया भी खूब। चैपलिन का जीवन बड़ी गरीबी में संघर्ष करते हुए बीता। 

उनके पिता शराबी थे और घर की जिम्मेदारी उठाने की जगह हमेशा शराब के नशे में धुत रहते थे। चैपलिन की माता और पिता दोनों संगीत क्षेत्र से जुड़े हुए थे। जब चैपलिन किशोरावस्था में पहुंचे तब तक उनके पिता की अत्यधिक शराब पीने की वजह से मौत हो गई। उनकी मां मानसिक रोगी हो गई थीं क्योंकि कंठनली में विकार आ जाने की वजह से गायिका और अभिनेत्री का करियर खत्म हो गया था। 

इसलिए उनकी मां का ज्यादातर समय अस्पताल में रहना पड़ता था। अभिनय से उनको बचपन से ही प्यार था। वह कम उम्र में ही थिएटर करने लगे। उससे जो आय होती थी, उसी से उनका खर्चा चलता था। जैसे-जैसे चैपलिन बड़े होते गए, उनके अभिनय में निखार आता गया। 

अंतत: फिल्मों में काम करने की नीयत से चैपलिन अमेरिका पहुंचे। जब उन्हें फिल्मों में काम करने मौका मिला, तो  उन्होंने दुनिया को खूब हंसाया। उन दिनों मूक फिल्मों का दौर था। चैपलिन का मशहूर किरदार द ट्रैंप छोटी मूंछ, ढीली ढाली पैंट, टोपी और छड़ी ही उनकी पहचान हो गई।   

उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भोगा था, जिया था, उसको द माडर्न टाइम्स और द किड जैसी फिल्मों में अच्छी तरह व्यक्त किया। उनका एक वाक्य पूरी दुनिया में मशहूर था कि जिस दिन आप हंसे नहीं, वह दिन व्यर्थ गया। इस महान कलाकार की स्विट्जरलैंड के वेवे में 25 दिसम्बर 1977 को नींद में मृत्यु हो गई।