Tuesday, September 22, 2026

मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ के संबंध में यह बहुप्रचलित घटना है। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन की दो पत्नियां थीं, महामाया और महाप्रजापति गौतमी। महामाया और गौतमी दोनों सगी बहनें थीं। महामाया ने एक ही पुत्र सिद्धार्थ को जन्म दिया था और कुछ ही दिनों बाद उनकी मौत हो गई थी, जबकि गौतमी ने पुत्र नंद और पुत्री नंदा को जन्म दिया था। एक बार की बात है। 

राजकुमार सिद्धार्थ राजवन में टहल रहे थे। उनके साथ मंत्री पुत्र देवदत्त भी था। इतने में सिद्धार्थ ने राजहंसों को आकाश में उड़ते हुए देखा। उन्होंने देवदत्त से कहा कि देखो, राजहंस आकाश में विचरते हुए कितने सुंदर लग रहे हैं। यह देखकर देवदत्त ने अपने तरकश से तीर निकाला और धनुष पर चढ़ाकर प्रत्यंचा खींच दी। तीर जाकर आकाश में उड़ रहे एक राजहंस के लगा और वह जमीन पर आ गिरा। 

घायल हंस को देखकर सिद्धार्थ का मन चीत्कार कर उठा। वह आंखों में अश्रु लिए उस हंस के पास पहुंचे और उसे उठाकर तीर निकाला और उसे बचाने का जो भी उपाय संभव था, वह किया। देवदत्त ने हंस पर अपना अधिकार बताते हुए मांगा। राजकुमार सिद्धार्थ ने हंस को देने से मनाकर दिया। राजपुत्र होने से देवदत्त उस समय तो सिद्धार्थ से कुछ नहीं कह सका, लेकिन उसने हंस पर अधिकार जताने के लिए राजा के यहां मामला पहुंचा दिया। राजदरबार में दोनों ने अपना-अपना पक्ष रखा। 

सिद्धार्थ ने कहा कि मारने वाले से बचाने वाले का अधिकार ज्यादा होता है। अपने ही पुत्र का मामला होने से राजा शुद्धोदन फैसला नहीं कर पा रहे थे। अंत में उन्होंने हंस को मंगाया और उसे राज दरबार में छोड़ दिया। कहा कि यह हंस जिसके पास चला जाएगा, हंस पर उसका अधिकार होगा। अंतत: हंस सिद्धार्थ के पास गया और इस तरह हंस पर राजकुमार सिद्धार्थ का अधिकार हुआ।

शिक्षा व्यवस्था को रोजगार, बाजार से और अधिक जोड़ने की जरूरत

 अशोक मिश्र

लाडवा इलाके के गांवों में रविवार को आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने दावा किया कि पिछले बारह साल में दो लाख से अधिक युवाओं को बिना पर्ची-बिना खर्ची के सरकारी नौकरी दी गई। मुख्य रूप से यह बात सत्ताधारी दल के आधिकारिक बयानों पर आधारित है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और राज्य सूचना विभाग ने बार-बार यह आंकड़ा दोहराया है। 

हालांकि विपक्ष इस दावे पर सवाल उठाता है। वे कहते हैं कि स्थायी नियमित पदों पर भर्ती अपेक्षाकृत कम हुई है और कई नियुक्तियां संविदात्मक या हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से हुई हैं। रोजगार एक्सचेंजों में पंजीकृत बेरोजगार युवाओं की संख्या चार लाख से अधिक बताई जाती है। इसमें बारहवीं पास युवा सबसे अधिक हैं। इसके बाद स्नातक और स्नातकोत्तर का नंबर आता है। कई जिलों जैसे हिसार, जींद, कैथल और सिरसा में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या विशेष रूप से ऊंची है। 

बेरोजगारी सबसे अधिक शिक्षित युवाओं में दिखती है। स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री धारक, खासकर कला और सामान्य विषयों वाले युवा, नौकरी बाजार में सबसे अधिक संघर्ष कर रहे हैं। इसके विपरीत तकनीकी, व्यावसायिक और कौशल आधारित कोर्स करने वाले युवा अपेक्षाकृत आसानी से रोजगार पा रहे हैं। आईटी, कंप्यूटर एप्लिकेशन, नर्सिंग, पैरामेडिकल, होटल मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स, आॅटोमोबाइल और निर्माण संबंधी डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स वाले युवाओं को उद्योगों और सेवा क्षेत्र में अवसर मिल रहे हैं। हरियाणा में उद्योग, निर्माण, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र के विस्तार के कारण ये कौशल मांग में हैं। 

वर्तमान में सबसे फायदेमंद पढ़ाई वही है जो डिग्री के साथ कौशल जोड़ती हो, जैसे बीसीए के साथ क्लाउड, बीएससी नर्सिंग, जर्मन या जापानी भाषा के साथ केयरगिवर कोर्स, हरियाणा में विदेश रोजगार के लिए ड्राइविंग और हॉस्पिटैलिटी प्रशिक्षण लेना लाभदायक है। केवल डिग्री हासिल करने से रोजगार की गारंटी नहीं रह गई है। बेरोजगारी का राज्य की अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव पड़ रहा है। 

युवा शक्ति का सही उपयोग न होने से उत्पादकता और उपभोग दोनों प्रभावित होते हैं। साथ ही बेरोजगारी भत्ते और कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च बढ़ता है। कौशल आधारित शिक्षा और बाजार उन्मुख कोर्स वर्तमान समय में अधिक फायदेमंद साबित हो रहे हैं। अर्थव्यवस्था पर बेरोजगारी का दबाव तो है, लेकिन उद्योग और सेवा क्षेत्र के विस्तार से अवसर भी पैदा हो रहे हैं। योजनाएं राहत दे रही हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगार बाजार से और अधिक जोड़ने की जरूरत है। युवाओं के जीवन में स्थिरता तभी आएगी जब मेरिट आधारित स्थायी रोजगार के अवसर और व्यावहारिक कौशल दोनों साथ-साथ बढ़ेंगे।


Monday, September 21, 2026

वैशाली को पराभूत देखना चाहते हैं सम्राट

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के सम्राट बिंबिसार को उनके पुत्र अजातशत्रु ने राज्य हथियाने के लिए उन्हें बंदी बना लिया था। बंदीगृह में उन्हें भूखा रखा गया, प्रताड़ित किया गया। इसी प्रताड़ना के चलते बिंबिसार की मृत्यु हो गई। इसके बाद अजातशत्रु निरंकुश हो गया। महात्मा बुद्ध से प्रभावित होने के बावजूद उसकी राज्य लिप्सा कम नहीं हुई। एक दिन जब महात्मा बुद्ध राजगृह बाहरी इलाके में स्थित गृध्रकूट आश्रम में पधारे, तो अजातशत्रु ने अपने मगध महामात्य वस्सकार को उनकी सेवा में भेजा और उनसे निवेदन करने को कहा। 

काफी देर तक बुद्ध का प्रवचन सुनने के बाद एकांत में कस्सकार ने कहा, भगवन! सम्राट वैशाली गणराज्य को पराभूत देखना चाहते हैं। कोई उपाय बताएं। उसकी बात सुनने के बाद तथागत गंभीर हो गए। उन्होंने पास बैठे अपने परम शिष्य आनंद से पूछा कि यह बताओ, क्या वज्जियों के सन्निपात यानी संसद अधिवेशन बार-बार होते हैं? आनंद ने कहा, हां। 

तब बुद्ध ने फिर पूछा, भंते! क्या वज्जि संघबद्ध रहकर उद्यम करते हैं, वह राष्ट्रीय कर्तव्यों को मिलजुलकर करते हैं? क्या वैशाली का शासक सभा द्वारा नियमपूर्व स्वीकृत हुए बिना कोई आदेश पारित नहीं करते हैं? स्वीकृत विधि विधान का नियमपूर्वक पालन करते हैं? क्या उनके यहां सारे नियमों का पालन होता है? क्या वैशाली राज्य में बुजुर्गों का सम्मान होता है? उनके आदेशों का पालन होता है? क्या वैशाली में कुमारियों और महिलाओं का आदर सम्मान होता है? क्या नौकरों-चाकरों का सम्मान होता है, उनकी रक्षा की जाती है?

आनंद ने कहा, हां भगवन! वैशाली में यह सब कुछ होता है। महात्मा बुद्ध की मुख मुद्रा गंभीर हो गई। वह महामात्य वस्सकार की ओर देखते हुए आनंद से बोले, तो आनंद, यह धर्म गणतंत्र के प्राण तत्व हैं। जब तक लिच्छवि इनका पालन करते रहेंगे, वे अविजेय रहेंगे। यह सुनकर कस्सकार लौट गया।

अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला सराहनीय


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला लिया है। यह गणना नौ साल बाद होने जा रही है। राज्य सरकार का यह फैसला सराहनीय और स्वागतयोग्य है। जीवों की गणना का इंतजार पर्यावरण प्रेमियों के साथ-साथ वन विभाग भी कर रहा था। आखिरी व्यापक गणना वर्ष 2017 में हुई थी, जबकि उससे पहले 2012 में हुई थी यानी 2017 के बाद से वैज्ञानिक तरीके से गिनती नहीं हुई है।   

वन्य जीवों की गणना सिर्फ संख्या गिनने का आंकड़ा नहीं होता है, यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का हेल्थ कार्ड होता है। इससे यह भी पता चलता है कि किस प्रजाति की आबादी बढ़ रही है, किसकी घट रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? उनका आवास कितना सुरक्षित है और मानव दबाव का असर कितना है। इसी के आधार पर राज्य सरकार बजट, स्टाफ, वाटर होल, कॉरिडोर और मुआवजा नीति आदि तय करती है। 

अगर गणना न हो तो वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बनाई गई योजनाएं अंधेरे में तीर चलाने जैसा साबित होती हैं। 2017 की रिपोर्ट में दक्षिणी हरियाणा की अरावली में तेंदुए, लकड़बग्घा, सियार और कई अन्य प्रजातियाँ दर्ज की गई थीं, परंतु पिछले वर्षों में आवास में बदलाव, शहरीकरण और मानव हस्तक्षेप के कारण स्थिति बदल चुकी है। इसलिए नई गणना जरूरी हो गई है। अरावली क्षेत्र की प्रधानता की बात करें तो यहां का असली शासक तेंदुआ है जो शीर्ष शिकारी के रूप में पूरे तंत्र को संतुलित रखता है, लेकिन संख्या के लिहाज से सबसे अधिक नीलगाय, बंदर और सियार हैं। 

अरावली में कई जीव विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके हैं या संकटग्रस्त हैं। इनमें भारतीय भेड़िया, रेगिस्तानी लोमड़ी, कैरकल, रस्टी स्पॉटेड कैट तथा कुछ स्थानों पर चिंकारा और स्लोथ बियर शामिल हैं। इनके घटने का मुख्य कारण आवास का विखंडन, खनन, शहरीकरण, सड़क निर्माण तथा पानी के स्रोतों का सूखना है। जंगल सिकुड़ने से शिकार की कमी हो जाती है और जानवर मानव बस्तियों की ओर बढ़ने को मजबूर हो जाते हैं जहाँ वे दुर्घटना या संघर्ष का शिकार हो जाते हैं। यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अरावली की जैव विविधता और अधिक क्षतिग्रस्त हो सकती है। 

नई गणना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है जो सही आंकड़ों के आधार पर प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ बनाने में मदद करेगी। नौ साल बाद होने वाली यह गणना अगर ट्रैप, ट्रांसेक्ट और ड्रोन तीनों तरीकों से हुई तो यह बताएगी कि अरावली सच में जी रहा है या सिर्फ कैमरे में जीता हुआ दिख रहा है, और उसी के आधार पर तय होगा कि आने वाले दशक में यहां तेंदुआ दहाड़ेगा या सिर्फ कहानियों में रहेगा। फरीदाबाद के धौज गांव में हरियाणा का पहला निगरानी केंद्र भी इसी लिए बन रहा है जहां से हर दो साल में गणना और सतत निगरानी की योजना है। 

Sunday, September 20, 2026

शव देखकर हंसने लगे महात्मा बुद्ध


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सुजाता बिहार के बोधगया के पास स्थित सेनानी (उरुवेला) गाँव के एक धनी जमींदार की पुत्री थीं। विवाह से पूर्व सुजाता ने एक वट (बरगद/पीपल) वृक्ष के देवता से मन्नत मांगी थी कि यदि उनका विवाह अच्छे कुल में हुआ और उन्हें प्रथम पुत्र की प्राप्ति हुई, तो वह हर वर्ष उस वृक्ष देवता को विशेष खीर (पायस) का भोग लगाएंगी। उनकी इच्छा पूरी हुई। उनका विवाह एक संभ्रांत परिवार में हुआ। 

समय आने पर उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। अपनी मन्नत के अनुसार वह हर साल उस वृक्ष पर खीर अर्पित करती थीं।  अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सुजाता ने दूध से अत्यंत स्वादिष्ट और शुद्ध खीर तैयार की। तभी उनकी दासी पूर्णा ने आकर उन्हें बताया कि वट वृक्ष के नीचे एक संन्यासी बैठा हुआ है। महात्मा बुद्ध कठोर तपस्या करते हुए कई वर्ष बीत गए थे। उनकी काया अत्यंत कमजोर हो गई थी। 

उन्होंने सुजाता की पायस स्वीकार की, तो उनके शरीर को थोड़ी ऊर्जा मिली। इसके बाद उन्होंने समाधि लगाई जो सातवें दिन टूटी। बीच-बीच में सुजाता आकर बुद्ध को देख जाती थी। निरंजना नदी के किनारे वट वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ। संयोग से उसी समय एक शव यात्रा निकल रही थी। उसे देखकर बुद्ध हंस पड़े। सुजाता ने पूछा कि कल तक आप शव देखकर दुखी हो जाते थे, आज आप हंस रहे हैं। 

बुद्ध ने कहा कि सुख-दुख तो मनुष्य की कल्पना मात्र है। मनुष्य का मोह ही सभी परेशानियां का कारण है। आज मैंने जान लिया है कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तन है। सुजाता तुम ही बताओ, जिसे सनातन वस्तु मिल गई हो जो न परिवर्तनशील हो, न नााशवान, तो फिर उसे कैसा शोक। यह सुनकर सुजाता संतुष्ट हुई और स्वगृह चली गई।

पशुपालन को कारोबार का दर्जा मिलने से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने पशुपालन को कारोबार के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। इसके लिए वित्तीय सहायता का दायरा भी बढ़ाया गया है। राज्य में पशुपालन को कारोबार का दर्जा मिलना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक संरचनात्मक बदलाव है। जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। हरियाणा में पशुपालन सदियों से ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। प्राचीन काल से ही यहां के किसान और पशुपालक गाय, भैंस, भेड़-बकरी जैसे पशुओं को परिवार का अभिन्न अंग मानते आए हैं। 

हरियाणा नस्ल की गाय और मुर्रा भैंस देशभर में प्रसिद्ध रही हैं। आज भी यह क्षेत्र दूध उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है, जहां प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। सदियों से पशुपालन को कृषि का सहायक धंधा माना जाता रहा, जबकि सच्चाई यह है कि छोटे और सीमांत किसान के लिए पशु ही उसकी सबसे तरल पूंजी है। कारोबार का दर्जा मिलते ही पशुपालक को वैधानिक पहचान मिलेगी, जो अब तक उद्योग को ही मिलती थी। बीसवीं पशुधन जनगणना 2019 के अनुसार राज्य में कुल पशुधन आबादी लगभग 71.26 लाख है, जिसमें भैंसों की संख्या करीब 43.76 लाख और गायों की लगभग 19.32 लाख है। 

स्वदेशी गौवंश की संख्या 19वीं जनगणना में 8.12 लाख से बढ़कर 9.49 लाख हो गई, जो 16.94 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। दूध उत्पादन भी 2014-15 के 79 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 125.93 लाख टन तक पहुंच गया है, जबकि प्रति पशु प्रतिदिन उत्पादकता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह हरियाणा के पशुपालकों की कर्मठता का परिचायक है। पशुपालन को पारंपरिक व्यवसाय से आगे बढ़ाकर कारोबार या उद्योग का दर्जा दिए जाने से पशुपालकों को कई ठोस लाभ मिलेंगे। 

इसके बाद उन्हें बैंक ऋण आसानी से उपलब्ध होंगे। सब्सिडी और बीमा सुविधाएं मिलेंगी। आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। पशुपालक छोटे स्तर से शुरू करके बड़े डेयरी फार्म स्थापित कर सकते हैं, जिससे नियमित आय सुनिश्चित होती है। यदि पशुपालन को कारोबार माना जाए तो महिला सशक्तिकरण भी स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत में पशुओं की देखभाल का 70 प्रतिशत से अधिक काम महिलाएं करती हैं। 

सरकार पशुपालन से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए कई कदम उठा रही है। चारे की उपलब्धता बढ़ाने, बीमा कवरेज विस्तार, समयबद्ध सेवाएं, मोबाइल पशु चिकित्सा वैन और गौशालाओं को सहायता जैसी पहलें जारी हैं। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत स्वदेशी नस्लों का संरक्षण हो रहा है। पशुओं को लावारिस छोड़ने पर जुर्माना और कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।  इससे न केवल पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी बल्कि हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी और अधिक समृद्ध बनेगी।

Saturday, September 19, 2026

तात! अनुमति दे तो संन्यासिनी बनना चाहती हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कोसल नरेश प्रसेनजित के राज्य का कोषाध्यक्ष सुदत्त की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी। बौद्ध ग्रंथों में उन्हें अनाथपिंडक भी बताया गया है। उनकी पुत्री उत्पलवर्णा अत्यंत रूपवती थी। जब उसने षोडस वर्ष की आयु पार की, तो ऐसा लगने लगा कि देवी रति भी उसके रूप-सौंदर्य को देखकर शर्मिंदा हो जाएं। राग तो गौरवर्णी उत्पलवर्णा के अंग प्रत्यंग से मानो फूट रहा हो। 

अधरों पर मानो गुलाब की पंखुड़ियां आ बैठी हों। नयन रतनारे थे और ग्रीवा अत्यंत सुंदर थी। कंठ से इतनी मधुर ध्वनि निकलती थी कि सुनने वाला मोहित हो उठता था। ऐसी रूपवती कन्या से कौन विवाह नहीं करना चाहेगा। आसपास के राज्यों के राजकुमार, नगरश्रेष्ठि और सामंत कुमारों के विवाह प्रस्ताव आने लगे। अपनी अनुपम सुंदरी पुत्री के लिए ढेर सारे विवाह प्रस्ताव आने से पिता काफी चिंतित थे।

वह इस ऊहापोह में थे कि अपनी पुत्री के विवाह के लिए किसका प्रस्ताव स्वीकार करें और किसको मना कर दें। इसी विषय पर वह सोच ही रहे थे कि उनकी पुत्री ने उनके कक्ष में प्रवेश किया। उसने अपने पिता से कहा कि पिता जी, आपने सुना ही होगा। गंगातीर वासी ने पहले विवाह किया। फिर एक दूसरी स्त्री रख ली। उससे एक कन्या पैदा हुई। बाद में उस कन्या को भी अंकशयिनी बनाया। 

ऐसे अमर्यादित समाज में कोई भी विश्वसनीय नहीं है। यदि आप अनुमति दें, तो मैं अविवाहित रहकर समाज को सुधारने का प्रयत्न करना चाहती हूं। पिता ने आशीर्वाद देते हुए अपनी पुत्री को संन्यास लेने की अनुमति दे दी। महात्मा बुद्ध के पास जाकर उत्पलवर्णा ने प्रव्रज्या ग्रहण की। 

पिता तुल्य स्नेह दर्शाते हुए बुद्ध ने उसे ज्ञान से सिंचित किया। भिक्षुणी उत्पलवर्णा ने अपनी साधना से सिद्धावस्था प्राप्त की और समाज को धर्म के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। महात्मा बुद्ध का वह जीवन भर सहयोग करती रही।

हरियाणा में पिटबुल के काटने की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक


अशोक मिश्र

हरियाणा में पिटबुल कुत्तों के हमलों की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। ताजा मामला सोनीपत के सिक्का कालोनी की है। 14 सितंबर की शाम बुआ अपने छह माह के भतीजे को गोद में लेकर सिक्का कालोनी की गली में टहल रही थी। तभी पड़ोसी का पालतू पिटबुल अचानक दौड़ता हुआ आया और बच्चे पर झपट पड़ा। सीसीटीवी फुटेज देखने पर साफ पता चलता है कि कुत्ता करीब आधा मिनट तक बच्चे को जबड़ों में दबाकर नोचता रहा, घसीटता रहा। लोगों ने डंडे-चप्पल मारकर बड़ी मुश्किल से बच्चे को छुड़ाया। 

हमले में बच्चे के चेहरे, पेट और शरीर पर गहरे जख्म हैं। बच्चे को गोद में लेकर टहलने वाली उसकी बुआ भी घायल हुई है। बच्चे की हालत गंभीर होने पर उसे रोहतक पीजीआई रेफर किया गया है और इलाज जारी है। प्रदेश की यह कोई पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं अब अक्सर होती रहती हैं। पंचकूला, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, सोनीपत आदि शहरों से ऐसी खबरें लगातार आती रहती हैं। पिटबुल की उग्रता को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि देखनी होगी। पिटबुल टेरियर को मूल रूप से इंग्लैंड में सांडों से लड़ाई और बाद में डॉग फाइटिंग के लिए विकसित किया गया था।

चुन-चुन कर सबसे आक्रामक पिल्लों से पिटबुल ब्रीड तैयार की गई थी। इसलिए इसमें दर्द सहने की क्षमता, जिद्दी पकड़ स्वाभाविक रूप से कुत्तों की अन्य प्रजाति ज्यादा है। पशु चिकित्सकों के अनुसार एक बार पकड़ लेने के बाद पिटबुल अपने शिकार को आसानी से छोड़ते नहीं, इसलिए आधे मिनट का हमला भी जानलेवा बन जाता है। केंद्र सरकार के मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने 12 मार्च 2024 को 23 नस्लों जिसमें पिटबुल टेरियर, अमेरिकन बुलडॉग, रॉटविलर, कैन कोर्सो, डोगो अर्जेंटीनो सहित अन्य शामिल हैं को खतरनाक और उग्र माना था। केंद्र सरकार ने उनके आयात, बिक्री और ब्रीडिंग पर रोक का नोटिफिकेशन जारी किया था। 

लेकिन सरकार के इस नोटिफिकेशन के खिलाफ कुछ डॉग लवर्स ने कई राज्यों की हाईकोर्ट में याचिकाएं दीं। जवाब मांगे जाने पर केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया था कि वह फिलहाल इस बैन पर अमल नहीं हो रहा है। इस मामले में लोगों से आपत्तियां मंगाई गई हैं। नतीजा यह है कि 2026 तक देश में पिटबुल पर कोई लागू होने योग्य राष्ट्रव्यापी बैन नहीं है।  हरियाणा मेंं नगर निगमों ने अपने स्तर पर सख्ती की है। पंचकूला नगर निगम ने पिटबुल और रॉटविलर मिक्स जैसी नस्लों के पालने पर रोक का प्रस्ताव पास किया है। 

प्रस्ताव में कहा है कि इस प्रजाति का कुत्ता घर में मिला तो भारी जुर्माना लगेगा। चंडीगढ़ प्रशासन ने भी अमेरिकन पिटबुल, पिटबुल टेरियर, बुल टेरियर, कैन कोर्सो, डोगो अर्जेंटीनो और रॉटविलर समेत सात नस्लों को बैन किया है। बिना पंजीकरण कुत्ता पालने पर 10 हजार रुपये तक जुर्माना तय किया है। 

Friday, September 18, 2026

भगवन! मैं अपने पाप कर्म से ऊब चुकी हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आम्रपाली वैशाली की नगर वधू थी। रूप और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति आम्रपाली के आगे पीछे वैभव डोलता रहता था। एक दिन सबने देखा कि साधारण वेश में आम्रपाली नंगे पांव महात्मा बुद्ध के आश्रम की ओर स्थिर कदमों में बढ़ती चली जा रही है। लोग आश्चर्य से भर उठे। आकंठ पाप कर्म में डूबी आम्रपाली बौद्ध संघ में क्या करने जा रही है, यह लोगों के बीच कौतूहल का विषय था। कुछ लोग उसके पीछे पीछे चल पड़े। 

वैशाली नगर में आम्रपाली का बौद्ध आश्रम की ओर जाना चर्चा का विषय बन गया। स्थिर कदमों से कई तरह की बातों को सोचती-विचारती आम्रपाली अंतत बौद्ध संघ तक पहुंच ही गई। भिक्षु संघ के प्रवेश द्वार पर आनंद किसी काम से निकल रहे थे। आम्रपाली ने जाकर उनसे विनती की, मैं महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए आई हूं। आनंद तत्काल उल्टे पैर लौट पड़े। उन्होंने भीतर जाकर महात्मा बुद्ध को संदेश दिया। 

तब तक आम्रपाली भी पीछे-पीछे चलकर महात्मा बुद्ध तक पहुंच चुकी थी। करुणा निधान तथागत यह सुनकर खड़े हो गए। उन्होंने मधुर किंतु स्नेहमयी वाणी में कहा, आओ देवि! बुद्ध के स्वर से झरती करुणा में आम्रपाली का गात भी गया। वह फफक कर रो पड़ी। उसने रुदन करते हुए कहा, भगवन! मैं अपने पाप कर्म  से ऊब चुकी हूं। क्या मेरा इस नरक से उद्धार होगा?  

महात्मा बुद्ध ने करुणायुक्त स्वर में कहा, न...न! जिसे तुम पाप जीवन कह रही हो, वह समाज की बनाई हुई व्यवस्था है। देवि! जाग्रत जन ही समाज को नई व्यवस्था देते हैं। और सचमुच तथागत ने उसे नई व्यवस्था का मार्ग सुझा दिया। उस दिन के बाद अपना सब कुछ छोड़कर आम्रपाली भिक्षुणी बनकर इतिहास में सदा के लिए अमर हो गई।

हरियाणा में ब्लैक स्पॉट साबित हो रहे जानलेवा, कब मिलेगी मुक्ति?

अशोक मिश्र

हरियाणा की सड़कों पर बने ब्लैक स्पॉट डेथ स्पॉट के रूप में बदल चुके हैं। राज्य में ब्लैक स्पॉट सड़क पर चलने वालों के लिए स्थायी जख्म बन चुके हैं जिस पर न तो सरकार ध्यान दे रही है, न ही केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण। राज्य में ब्लैक स्पॉट्स की संख्या और इनसे होने वाली मौतों का आंकड़ा राज्य की सड़क सुरक्षा की पोल खोलता है। राज्य में वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच कुल 474 ब्लैक स्पॉट्स चिन्हित किए गए थे। 

तकनीकी परिभाषा में ब्लैक स्पॉट वह स्थान है जिसे सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मानकों के अनुसार चिन्हित किया जाता है, जहां 500 मीटर के दायरे में पिछले तीन सालों में पांच सड़क दुर्घटनाएं जिनमें मृत्यु या गंभीर चोट हुई हो, या दस मौतें हुई हों। ब्लैक स्पॉट इंजीनियरिंग की विफलता के नक्शे हैं, कहीं तीखा मोड़ है, कहीं सर्विस रोड नहीं है, कहीं डिवाइडर का गलत कट है, कहीं रोशनी नहीं है, कहीं स्पीड ब्रेकर और साइनेज गायब हैं और कहीं हाईवे पर ही अवैध अतिक्रमण है। 

सड़कों पर बने ब्लैक स्पॉट पर होने वाले हादसों के लिए केवल इंजीनियरिंग ही दोषी नहीं है। चालक भी बराबर के जिम्मेदार हैं। पुलिस डेटा बताता है कि सबसे ज्यादा शिकार पैदल यात्री और दोपहिया चालक होते हैं। ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में चलना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, हेलमेट और सीट बेल्ट न पहनना, हाईवे पर शराब के ठेकों के पास से निकलते हुए तेज रफ्तार, ये सब ब्लैक स्पॉट को डेथ ट्रैप में बदल देते हैं। एक ही ब्लैक स्पॉट पर जैसे दिल्ली-अंबाला हाईवे पर पानीपत में तीन साल में 41 हादसे और 26 मौतें हो चुकी हैं। यह मौतें साबित करती हैं कि सड़क का दोष स्थायी है पर चालक की गलती उसे घातक बना देती है। 

अंतत: यही कहा जा सकता है कि हरियाणा में ब्लैक स्पॉट की समस्या सड़क की नहीं, सिस्टम की है। सरकार की योजना में ब्लैक स्पॉट सुधार को प्राथमिकता दी गई है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सभी चिह्नित स्थलों को मार्च 2026 तक सुधारने का निर्देश दिया था और मिशन मोड में काम करने पर जोर दिया था, लेकिन राज्य के कई ब्लैक स्पॉट आज भी लोगों की जान ले रहे हैं। 

फरीदाबाद में ही वर्ष 2025 में चिन्हित ब्लैक स्पॉट पर हुए 56 हादसों में 30 लोगों की मौत हो चुकी है। ब्लैक स्पॉट दूर करने में लापरवाही कई कारणों से बरती जाती है। विभिन्न एजेंसियों जैसे एनएचएआई और राज्य विभागों के बीच समन्वय की कमी, बजट और संसाधनों की सीमितता, भूमि अधिग्रहण या निर्माण संबंधी बाधाएँ, तथा सुधार कार्यों की निगरानी में शिथिलता प्रमुख हैं। कभी-कभी स्थलों की पहचान के बाद स्थायी समाधान में वर्षों लग जाते हैं जबकि अल्पकालिक उपाय भी समय पर लागू नहीं होते। राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्राथमिकता की कमी भी इसमें योगदान देती है। हालांकि हाल के निदेर्शों और अभियानों से स्थिति में सुधार की उम्मीद जगी है, लेकिन निरंतर निगरानी और जवाबदेही आवश्यक है।