Monday, April 13, 2026

राजकुमारी के पैरों को चमड़े से ढक दो

प्रतीकात्मक चित्र साभार गूगल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जूते का आविष्कार कब हुआ, यह कोई नहीं जानता है। अनुमान व्यक्त किया जाता है कि जूतों का सबसे पुराना ज्ञात जोड़ा सात से आठ हजार ईसा पूर्व का है जो प्राकृतिक सामग्री छाल से बना था। चमड़े से बने सबसे पुराने ज्ञात जूते 3500 ईसा पूर्व के माने जाते हैं। यह भी केवल अनुमान है। पक्के तौर पर यह नहीं बताया जा सकता है कि जूते का आविष्कार किसने और कब किया था? 

इस संबंध में एक प्राचीन कथा कही जाती है। कहते हैं कि किसी देश में एक राजा था। उसके एक बेटी थी। राजा अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था। उसने अपनी बेटी को एकदम नाजुक गुलाब की पंखुड़ियों की तरह पाला था। वह अपने महल से बाहर नहीं आती जाती थी। उसकी सारी दुनिया केवल महल तक ही सिमटकर रह गई थी। वह महल में ही खेलती-कूदती थी, वहीं खाना खाती, पानी पीती और महल में ही सो जाती थी। 

राजकुमारी का जब मन होता, तो उसकी सहेलियों को बुला दिया जाता था। वह उनके साथ खेलती थी। उसकी सहेलियां महल के बाहर के चटपटे किस्से सुनाते थे। एक दिन राजकुमारी के मन में आया कि वह भी अपनी सहेलियों के साथ शहर घूमे। देखे तो महल के बाहर की दुनिया कैसी है? यह बात जब राजा को पता चली, तो राजा घबरा गया। 

वह सोचने लगा कि इतने नाजो से पाली गई उनकी बेटी सड़क पर कैसे चलेगी? उसके तो पैर लहूलुहान हो जाएंगे। तब राजा ने कहा कि पूरे शहर को चमड़ों से ढक दिया जाए ताकि उनकी बेटी को कोई परेशानी न हो। तब एक दरबारी ने बड़े साहस के साथ राजा से कहा कि महाराज! पूरे शहर को चमड़ों से ढकना आसान नहीं है, लेकिन क्यों न राजकुमारी के पैरों को ही चमड़े से ढक दिया जाए। राजा को यह सलाह पसंद आई। कहते हैं कि इस तरह जूते का चलन शुरू हुआ।

गैस संकट के चलते उद्योगों को हो रहा भारी नुकसान, उत्पादन ठप

अशोक मिश्र

मध्य एशिया में चल रहा युद्ध भले ही एक पखवाड़े के लिए रुक गया हो, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट विवाद नहीं सुलझने से यह उम्मीद भी क्षीण होती जा रही है कि कुछ दिनों बाद शायद हालात सामान्य हो जाएं। वैसे तो ईरान का रवैया भारतीय तेल टैंकर जहाजों के प्रति नरम है, लेकिन बहुत ज्यादा राहत मिलती हुई नहीं दिख रही है। इसका नतीजा यह है कि हरियाणा सहित सभी राज्यों में एलपीजी, डीजल और पेट्रोल की किल्लत बनी हुई है। 

हरियाणा में एलपीजी को लेकर भले ही थोड़ा बहुत दबाव कम हुआ हो, लेकिन हालात अभी तक काबू में नहीं हैं। गैस और तेल की कालाबाजारी करने वालों की इन दिनों चांदी है। वह परेशान नागरिकों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। हजार-ग्यारह सौ में मिलने वाली गैस की कीमत तीन से पांच हजार रुपये वसूली जा रही है। इस मामले में सबसे ज्यादा परेशानी में वह लोग हैं जो पांच किलो वाला सिलेंडर भरवाकर काम चलाते थे। 

हालांकि सैनी सरकार ने कुछ दिन पहले घोषणा की थी कि पांच किलो वाला सिलेंडर गरीबों को पहचान पत्र दिखाने पर आसानी से उपलब्ध कराया जाएगा। लेकिन इस मामले में भी व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। सिलेंडर बुक कराने पर भी लोगों के मोबाइल पर डीएसी यानी डिलिवरी अथेंटिकेशन कोड तक नहीं आ रहा है जिसकी वजह से लोगों को काफी परेशानी होती है। 

वह लोग बार-बार बुकिंग सेंटर की दौड़ लगा रहे हैं। वैसे तो एलपीजी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए प्रदेश सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। कालाबाजारियों के खिलाफ सख्ती भी बरती जा रही है, लेकिन यह भी सच है कि लोगों की जरूरत के हिसाब से एलपीजी उपलब्ध नहीं है। प्रशासन इस बात पर भी नजर रख रहा है कि घरेलू सिलेंडरों का उपयोग व्यावसायिक मामलों में न होने पाए। इसके बावजूद होटल, ढाबा और रेस्टोरेंट संचालक घरेलू सिलेंडर का ही उपयोग कर रहे हैं। 

गैस उपलब्ध न होने की वजह से ज्यादातर होटल, ढाबे और रेस्त्रां या तो बंद हो चुके हैं, बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं। सबसे ज्यादा परेशानी राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों में उद्यमियों को हो रही है। प्रदेश के लाखों उद्यमी अपने प्रतिष्ठानों को बंद करने पर मजबूर हो गए हैं। राज्य में कई फैक्टरियों में उत्पादन पचास प्रतिशत से भी कम रह गया है। सबसे ज्यादा प्रभावित वे फैक्टरियां हैं जिनका काम लोहे की कटिंग, लोहे को पिघलना या गैस वेल्डिंग है। ऐसी फैक्टरियां या तो बंद कर दी गई हैं या फिर फैक्टरियों में कार्यरत मजदूरों की छंटनी कर दी गई है। 

जिन वर्कशाप या छोटी इकाइयों में दस से पंद्रह मजदूर गैस की किल्लत पैदा होने से पहले काम करते थे, अब ऐसी इकाइयों में तीन-चार मजदूर ही बचे हैं। बाकी लोगों की छुट्टी कर दी गई है। उद्यमी अपने आर्डर पूरा कर पाने में असमर्थ हैं। इससे उनको आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

Sunday, April 12, 2026

मौत का भय है, तो क्रांतिकारी क्यों बना?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख सेनानी अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख कर्ताधर्ता थे। बिस्मिल लोगों में देश प्रेम पैदा करने वाली कविताएं भी लिखा करते थे। उनकी रचनाओं को ब्रिटिश हुकूमत जब्त भी कर चुकी थी। 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर शहर के खिरनीबाग मुहल्ले में जन्मे रामप्रसाद अपने पिता मुरलीधर और माता मूलमती की दूसरी सन्तान थे। 

उनसे पूर्व एक पुत्र पैदा होते ही मर चुका था। राम प्रसाद बिस्मिल में ग्यारह साल की उम्र से क्रांतिकारी भावनाएं जाग्रत हो चुकी थीं। कांग्रेस, स्वराज पार्टी आदि में कुछ वर्षों तक काम करने के बाद वह अंतत: एचआरए की कानपुर में हुई बैठक में शामिल हुए और अंतत: एचआरए के ही होकर रह गए। 

इस बैठक में शचींद्रनाथ सान्याल, योगेश चंद्र चटर्जी जैसे तमाम क्रांतिकारी शामिल हुए थे। 9 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर रेलवे स्टेशन से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाना लूट लिया। 

बिस्मिल को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी की सजा सुनाई। फांसी से पहले राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी मां को पत्र लिखकर धैर्य रखने को कहा। जब उनकी जेल में आखिरी बार उनसे मिलने आईं, तो बिस्मिल रोने लगे। तब उनकी मां ने कहा कि जब तुम्हें मौत का इतना ही डर था, तो क्रांतिकारी क्यों बने? बिस्मिल ने कहा कि मुझे मौत का भय नहीं है। मैं आपकी सेवा नहीं कर सका, इसका अफसोस है। 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी।

सड़कों की खराब दशा और तेज रफ्तार की वजह से हो रहे हादसे


अशोक मिश्र

वाहनों की रफ्तार जानलेवा साबित हो रही है। यह सभी वाहन चालक जानते हैं, लेकिन इसके बावजूद ट्रैफिक रूल्स का पालन नहीं करते हैं। इसकी वजह से उनकी जान जाने का तो खतरा बना ही रहता है, इनके वाहनों की ओवर स्पीड सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों के लिए भी जानलेवा साबित होती है। वाहनों के निर्धारित गति सीमा से अधिक तेज चलाने की वजह से आए दिन हादसे होते रहते हैं। 

शुक्रवार की ही रात पलवल जिले की तीन घटनाओं में जीजा-साले सहित चार युवकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। दो लोग बुरी तरह घायल हैं और अस्पताल में इनका इलाज चल रहा है। पलवल में केएमपी एक्सप्रेस वे पर महेशपुर गांव के नजदीक बाइक सवार जीजा साले को अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों लोग बाइक समेत काफी दूर जाकर गिरे। हादसे के बाद भी अज्ञात वाहन चालक रुकने की जगह भाग खड़ा हुआ। 

अस्पताल पहुंचाए जाने के बाद जीजा-साले दोनों मृत घोषित कर दिए गए। इसी तरह होडल हसनपुर रोड पर डराना मोड़ के पास बाइक पर सवार तीन दोस्तों को अज्ञात वाहन ने पीछे से टक्कर मारकर घायल कर दिया। इनमें से एक युवक की तत्काल मौत हो गई और बाकी दोनों दोस्तों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यही नहीं, धतीर और टहरकी के बीच अपने भतीजे को अस्पताल में खाना देकर लौट रहे व्यक्ति को अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी और मौके से चालक फरार हो गया। 

इन तीनों मामलों में टक्कर मारने वाले चालक मौके से फरार हो गए थे। दरअसल, सात साल पहले सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने वाहनों की निर्धारित स्पीड को 10 से 20 प्रतिशत बढ़ा दिया है। तब कहा गया था कि यदि वाहन की स्पीड के कारण होने वाले चालन मामलों में पांच प्रतिशत अतिरिक्त छूट मिलेगी। एक्सप्रेस वे पर सौ की जगह 120, फोरलेन सड़कों पर 90 से बढ़ाकर सौ किलोमीटर प्रति घंटा वाहनों की स्पीड निर्धारित की गई थी। 

एक्सप्रेस वे और फोरलेन सड़कों पर सौ-एक सौ बीस की स्पीड में दौड़ रहे वाहन के सामने जब अचानक कोई गाड़ी, इंसान या लावारिस पशु आ जाता है तो ऐसी स्थिति में वाहन को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में सड़क हादसे की आशंका काफी बढ़ जाती है। कई बार अचानक ब्रेक मारने से वाहन उलट जाता है या फिर सामने से आर रहे वाहन से टकरा जाता है। 

वाहन की स्पीड तेज होने की वजह से नुकसान भी बहुत ज्यादा होता है। कई बार तो इंसानी नुकसान बहुत ज्यादा हो जाता है। एक्सप्रेस वे और फोरलेन सड़कों पर गलत साइड से वाहनों के आने पर रोक नहीं लग पा रही है। इससे सड़क हादसों पर रोक नहीं लग पा रही है। सड़कों की खराब दशा भी ज्यादातर सड़क हादसों के लिए जिम्मेदार है।

Saturday, April 11, 2026

युद्ध से हमारा रिश्ता हो न हो, लेकिन युद्ध का तो है


संजय मग्गू

रूस में वोल्शेविक नेता लेनिन के विरोधी के रूप में विख्यात लियोन ट्राटस्की ने कभी कहा था कि हो सकता है कि आपका युद्ध से कोई लेना देना न हो, लेकिन युद्ध का आपसे लेना-देना जरूर होता है। अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चालीस दिनों तक चले युद्ध को ही लें। इससे भारत सहित दुनिया के तमाम देशों का क्या लेना देना था? कुछ भी नहीं। तीन देश आपस में लड़ रहे थे, इससे हम भारतीयों का क्या जाता है? लेकिन इस युद्ध का हमसे लेना देना तो था। 

दुनिया के कई देशों की तरहभारत की अर्थव्यवस्था पर इस युद्ध के दुष्परिणाम सामने आए। होर्मुज स्ट्रेट से व्यापारिक जहाजों का आवागमन ठप होने से हर देशों की तरह भारत में भी एलपीजी, डीजल-पेट्रोल की किल्लत हुई। नतीजा यह हुआ कि गैस, तेल की कमी बताकर कालाबाजारियों ने अपनी जेब भर ली। खाने-पीने की चीजें महंगी हो गईं। अर्थव्यवस्था पर भी तेल-गैस की कमी का प्रभाव पड़ा। फिर एक झटके में ट्रंप ने 14 दिनों के लिए युद्ध विराम घोषित कर दिया। क्यों? क्योंकि जो आर्थिक दबाव भारत सहित दुनिया भर की जनता झेल रही थी, उससे कहीं ज्यादा दबाव अमेरिकी जनता झेल रही थी। 

अमेरिकी जनता को तो इस युद्ध से सीधा लेना-देना था। करोड़ों डॉलर के हथियार बेवजह फूंक दिए गए। माना कि इस युद्ध में ईरान को ज्यादा जनहानि उठानी पड़ी। उसके कई प्रमुख लीडर मार दिए गए, लेकिन कुछ न कुछ जनहानि अमेरिका और इजरायल को भी उठानी पड़ी। बेवजह ईरान के साथ युद्ध छेड़ने की वजह से जहां अमेरिका में डेमोक्रेटिक सांसद विरोध कर रहे थे, वहीं ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी युद्ध  को उचित नहीं मान रहे थे। डेमोक्रेटिक सांसद इस बात से नाराज थे कि ट्रंप ने इतना बड़ा फैसला लेते समय उनको विश्वास में नहीं लिया। जैसे भारत में कोई भी फैसला लेते वक्त सरकार नेता प्रतिपक्ष को भाव नहीं देती है। 

अब तो ट्रंप से डेमोक्रे टिक यह सवाल भी पूछने लगे हैं कि जब पिछले साल जून में अमेरिका ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने लायक नहीं छोड़ा था, तो 28 फरवरी को दोबारा ईरान पर हमला करने की जरूरत क्यों आ पड़ी। पिछले साल जून महीने में अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था और ट्रंप ने बाद में यह दावा किया था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है। 

डेमोक्रेट्स का यह सवाल जायज भी है। ट्रंप अब भी अपने स्वभाव के अनुरूप कभी दो सप्ताह के लिए युद्ध विराम घोषित करते हैं, तो कुछ ही घंटे के बाद ईरान को मटियामेट कर देने की धमकी देते हैं।  इजरायल द्वारा लेबनान पर किए गए हमले को जायज ठहराने लगते हैं। ट्रंप जिस तरह ‘क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा, रुष्टा-तुष्टा क्षणे-क्षणे’ वाली मनोवृत्ति से पीड़ित दिखाई पड़ते हैं, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि अस्थायी युद्ध विराम की अवधि पूरी होने से पहले ही एक बार फिर युद्ध  का नगाड़ा बज  उठे, तो कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी।

(लेखक दैनिक देश रोजाना के प्रधान संपादक हैं।)

डेढ़ सौ साथियों के साथ शहीद हो गए बुद्धू भगत


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत को स्वाधीन कराने में हमारे देश के न जाने कितने वीर पुत्रों और पुत्रियों ने अपना बलिदान दिया है। कहते हैं कि इंसान जैसे ही गुलाम होता है, वैसे ही उसमें स्वतंत्र होने की प्रबल इच्छा पैदा हो जाती है। अंग्रेजों की गुलामी के साथ ही साथ हमारे देश में स्वाधीनता की आवाज बुलंद होने लगी थी। ऐसे ही एक वीर आदिवासी थे बुद्धू जिन्होंने छोटानागपुर इलाके में विद्रोह किया। 

उनके विद्रोह को कोल विद्रोह या लकड़ा विद्रोह के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजों के खिलाफ हुई इस बगावत में बुद्धू भगत ने अपने दो पुत्रों हलधर भगत और गिरिधर भगत के साथ शहादत दी थी। इनके साथ ही करीब डेढ़ सौ आदिवासियों ने अपने प्राण न्यौछावर किए थे। रांची के सिलागई गांव में 17 फरवरी 1792 में पैदा हुए बुद्धू भगत ने बचपन से ही तीर-धनुष, गुलेल से सटीक निशाना लगाना सीख लिया था। 

उन्होंने बचपन से ही अंग्रेजों का आदिवासियों के साथ होने वाला अत्याचार देखा था। इससे उनके भीतर विद्रोह की आग धधकने लगी थी। जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की, तो अपने साथियों से उन्होंने कहा कि हमारे जंगल ही हमारे लिए मददगार हैं। उन्होंने अपने साथियों से तीर, पत्थर और गुलेल से हमला करने को कहा। इसका नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों के लिए बुद्धू भगत एक चुनौती बन गए क्योंकि लाख कोशिश के बावजूद वह उन्हें पकड़ नहीं सके थे। 

1832 में बुद्धू भगत को शिकस्त देने के लिए अंग्रेज कप्तान इम्फे बड़ी फौज लेकर आया और सिलागई गांव के पास ही उन्हें घेर लिया। उनके साथ अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। अंत में जिस गांव में बुद्धू भगत पैदा हुए थे, उसी गांव में उन्होंने अपने साथियों के साथ शहादत पाई। बुद्धू भगत ने अपनी जान देकर स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया।

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन से बनी कृत्रिम झीलें साबित हो रही जानलेवा


अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन एक गंभीर समस्या है। सुप्रीमकोर्ट, राज्य सरकार और पर्यावरण प्रेमी इसको लेकर चिंतित हैं। सुप्रीमकोर्ट और राज्य सरकार खनन माफियाओं के खिलाफ सख्त कदम उठाने का आदेश दे चुकी है। इसके बावजूद अवैध खनन नहीं रुक पा रहा है। कहा जाता है कि सन 1990 के बाद से अब तक मेवात, गुरुग्राम और फरीदाबाद जिले में खनन माफियाओं ने पांच सौ एकड़ से अधिक घने जंगल, कई पहाड़ियां और 120 से अधिक प्राकृतिक झरनों और तालाबों को नष्ट कर दिया है। 

अवैध खनन के चलते अरावली क्षेत्र में भारी संख्या में कृत्रिम झीलों का निर्माण हो गया है। इन कृत्रिम झीलों की देख रेख में भी लापरवाही बरती जा रही है जिसकी वजह से पिछले सोलह साल में सौ से अधिक लोग इन कृत्रिम झीलों में डूबने से अपनी जान गंवा चुके हैं। पिछले मंगलवार को ही बल्लभगढ़ के थाना धौज क्षेत्र के सिरोही झील में डूबने से बीस वर्षीय युवक की मौत हो गई। सोशल मीडिया पर इस कृत्रिम झील के सौंदर्य के बारे में पढ़कर युवक यहां घूमने आया था। 

युवक को कतई यह अंदाजा नहीं था कि जिस कृत्रिम झील के सौंदर्य को देखकर वह मुग्ध हो रहा है, वही उसके लिए जानलेवा साबित होने वाली है। बिना कुछ सोचे-समझे झील में तैरने के लिए कूदना जानलेवा साबित हुआ। फरीदाबाद-गुरुग्राम रोड के किनारे ही कम से कम छह कृत्रिम झीलें बन गई हैं। वन विभाग या स्थानीय प्रशासन की ओर से इन कृत्रिम झीलों के किनारे किसी तरह की चेतावनी देने वाला बोर्ड भी नहीं लगा है। इन झीलों के चारों ओर तारबंदी भी नहीं की गई है। 

यहां पर किसी कर्मचारी को तैनात भी नहीं किया गया है, ताकि वह यहां आने वाले लोगों को सचेत कर सके। जब यहां कोई आता है, तो वह सोशल मीडिया पर इन झीलों के बारे में बहुत ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर फोटो और वीडियो डालते रहते हैं जिससे प्रभावित होकर युवा इन झीलों के आसपास पिकनिक मनाने चले आते हैं। गर्मियों के दिनों में तो युवा बिना झीलों की गहराई का पता किए तैरने लगते हैं जिसकी वजह से वह हादसे का शिकार हो जाते हैं।  

अवैध खनन की वजह से बनी इन कृत्रिम झीलों के आसपास चेतावनी बोर्ड लगाने के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन को तारबंदी करनी चाहिए ताकि हादसों को रोका जा सके। इसके साथ ही पूरे अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए। अवैध खनन के चलते ही प्राकृतिक तालाब और झरने खत्म हो गए हैं, जिससे क्षेत्र मरुस्थल में बदल रहा है। 

नांगल चौधरी जैसे क्षेत्रों में पानी एक हजार फीट नीचे चला गया है। हरियाली खत्म हो रही है और जड़ी-बूटियां लुप्त हो रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले नूंह के एक क्षेत्र में 41 लाख मीट्रिक टन से अधिक अवैध खनन से 22 अरब रुपये का नुकसान हुआ।


Friday, April 10, 2026

राहुल सांकृत्यायन ने जेल में लिखी वोल्गा से गंगा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राहुल सांकृत्यायन को महापंडित कहा जाता था। इसका कारण यह था कि वह संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, अरबी, अंग्रेजी, फारसी, पालि, तमिल, कन्नड, रूसी, फ्रांसीसी, जापानी, तिब्बती सहित लगभग 36 भाषाओं को अच्छी तरह से जानते थे। 9 अप्रैल 1893 को आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में हुआ था।

बचपन में इनका नाम केदारनाथ पांडेय था, लेकिन जब इन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया, तो महात्मा बुद्ध के पुत्र राहुल के नाम पर अपना नाम राहुल रखने के साथ सांकृत्य गोत्र के नाम पर सांकृत्यायन भी जोड़ लिया। राहुल सांकृत्यायन को बचपन से ही घुमक्कड़ी का शौक था। 

तीसरी कक्षा की किताब में पढ़ा गया एक शे’र ‘सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां’ ने इन्हें बहुत प्रभावित किया। ग्यारह साल की उम्र में हुई शादी को इन्होंने नकार दिया था और घर से भाग खड़े हुए थे। राहुल सांकृत्यायन ने इंग्लैण्ड और यूरोप की यात्रा की। दो बार लद्दाख यात्रा, दो बार तिब्बत यात्रा, जापान, कोरिया, मंचूरिया, सोवियत भूमि (1935 ई.), ईरान में पहली बार, तिब्बत में तीसरी बार 1936 ई. में, सोवियत भूमि में दूसरी बार 1937 ई. में, तिब्बत में चौथी बार 1938 ई.में यात्रा की। 

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर राहुल ने बिहार में कई जगह जनसभाएं की, खूब जोरदार भाषण दिए। कई बार गिरफ्तार किए गए। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया। बंदी जीवन का भी उन्होंने फायदा उठाया और मानव समाज के विकास क्रम को सरल तरीके से समझाने वाली पुस्तक वोल्गा से गंगा उन्होंने जेल में ही लिखी थी। 14  अप्रैल 1963 को यह महामानव दार्जिलिंग में चिर निद्रा में सो गया।

न्यूनतम मजदूरी 35 प्रतिशत बढ़ने से असंगठित श्रमिकों को फायदा


अशोक मिश्र

हरियाणा की जीडीपी में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का बहुत बड़ा योगदान है।  जून 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा में लगभग 52 लाख (25 प्रतिशत से अधिक) अनौपचारिक श्रमिक हैं, जो घर, प्रतिष्ठानों, निर्माण और अन्य अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करते हैं। इनका कोई आधिकारिक लेखा-जोखा तो नहीं होता है, लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि हरियाणा की जीडीपी में असंगठित कार्यबल का 30 प्रतिशत कृषि में, 24 प्रतिशत निर्माण में और 21 प्रतिशत अन्य क्षेत्रों में एक बहुत बड़ी भूमिका है। 

इनके असंगठित होने की वजह से इनकी समस्याओं का निस्तारण भी बहुत मुश्किल से हो पाता है। प्रदेश में इन असंगठित श्रमिकों के छिटपुट रजिस्टर्ड संगठन तो पाए जाते हैं, लेकिन वह उनकी समस्याओं को सुलझाने में उतने प्रभावी नहीं पाए जाते हैं। इनको मजदूरी भी बहुत कम दी जाती है जिसको महसूस करते हुए सैनी सरकार ने अकुशल, अर्धकुशल, कुशल और अति कुशल श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी की है। 

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में चारों श्रेणियों के मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया गया। अकुशल मजदूरों की न्यूनतन मजदूरी को 11 हजार 257 रुपये से बढ़ाकर 15 हजार 220 रुपये मासिक किया गया है। न्यूनतम मजदूरी में 35 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की गई है, जो कि एक अप्रैल 2026 से लागू होगी।  एक्सपर्ट कमेटी ने श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी के लिए रिपोर्ट दी थी, जिसे राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी प्रदान कर दी गई है। 

 इससे प्रदेश में कार्यरत लगभग साठ लाख से अधिक असंगठित श्रमिकों को लाभ मिलेगा। सरकार इन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु विशेष कल्याण बोर्ड, ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण और पीएम श्रम योगी मान-धन योजना जैसी योजनाओं के तहत सहायता प्रदान कर रही है। हरियाणा में असंगठित श्रमिक ज्यादातर रेहड़ी-पटरी, घरेलू कार्य, भवन निर्माण, आटो-रिक्शा, टी स्टालों और ढाबों पर काम करते हुए पाए जाते हैं। जो लोग विशेष कल्याण बोर्ड, ई श्रम पोर्टल आदि पर अपना रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं, उन्हें तो सरकारी सहायता का लाभ मिल जाता है, बाकी श्रमिकों को कोई पूछने वाला नहीं है।

 इन लोगों को नौकरी या काम देने वाला नियोक्ता कम वेतन देने के साथ-साथ निर्धारित समय से ज्यादा काम करवाता है। इनकी सामाजिक सुरक्षा की भी कोई जिम्मेदारी नियोक्ता नहीं उठाता है। ऐसी स्थिति में अगर नियोक्ता जब चाहे इन्हें काम से निकाल भी देता है। नतीजा यह होता है कि कई दिनों तक इन्हें कोई काम ही नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति देश के लगभग हर राज्य में है। अगर छोटी-मोटी पूंजी जुटाकर यह अपना कोई रोजगार करना चाहें, तो इनके सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं।

Thursday, April 9, 2026

ईरान का न्यायप्रिय बादशाह नौशेरवां


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ईरान में एक बहुत ही न्यायप्रिय और राज्य संचालन में कुशल बादशाह हुआ है जिसे नौशेरवां के नाम से जाना जाता है। इतिहास और ईरानी कथाओं में उसका वास्तविक नाम खुसरो प्रथम बताया जाता है। वह सासानियन बादशाह कोबाद का पुत्र था। बाद में वह नौशेरवां-ए-आदिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

कहा जाता है कि जब खुसरो छोटा था, तो उसके पिता कोबाद के दरबार में सीरिया निवासी माजदक नामक व्यक्ति आया और उसने खुद को पैगंबर बताया। बादशाह कोबाद उसके विचार से बहुत प्रभावित हुआ। उसे अपना मंत्री और कोषाध्यक्ष बना दिया। माजदक ने बाहशाह को समझाया कि संपत्ति और महिलाओं पर सबका साझा अधिकार होना चाहिए। पुरुषों को इनसे कोई लगाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि ये दोनों ईर्ष्या, क्रोध, प्रतिशोध, लोभ और वासना जैसे पाँच दुर्गुणों को जन्म देते हैं। 

कुछ ही दिनों में माजदक ने ईरान में अपने हजारों अनुयायी बना लिए जो समाज के निचले तबके के लोग थे। एक दिन माजदक ने बादशाह की पत्नी यानी खुसरो की माता पर अपना हक जताया। इसका खुसरो ने विरोध किया। माजदक ने बादशाह से खुसरो की शिकायत की। खुसरो ने अपने पिता से माजदक को विश्वासघाती और समाज के लिए बुरा आदमी बताया। 

उन्होंने छह महीने में उसके खिलाफ सबूत पेश करने का भी दावा किया। कुछ ही दिनों में खुसरो ने सबूत के साथ माजदक का पर्दाफाश कर दिया। माजदक और उसे शिष्यों को मृत्युदंड दिया गया। पिता के बाद खुसरो ने  531 ईस्वी से 579 ईस्वी तक शासन किया। वे ईरान के सबसे प्रसिद्ध और सफल शासकों में से एक थे। शतरंज और बैकगैमोन जैसे खेलों की शुरुआत उनके शासनकाल में हुई थी। उनके शासनकाल में किसानों से लगान की वसूली भी खत्म कर दी थी।