बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध के बनाए संघ में कोई भी शामिल हो सकता था। किसी भी जाति विशेष पर कोई प्रतिबंध नहीं था। लेकिन भिक्षुक संघ में शामिल होने से पहले व्यक्ति को अपनी जातीय उच्चता, ऊंच-नीच की भावना को त्यागना पड़ता था। उसके लिए कई तरह की कठिन परीक्षाएं भी होती थीं।संघ में सभी जातियों के मिल जुलकर रहते थे। कई बार भिक्षुक बनने से पहले सामाजिक स्तर पर सबसे निचले पायदान पर रहा व्यक्ति भी संघ में उच्च स्थिति प्राप्त कर लेता था, लेकिन संघ के भिक्षुओं में कोई दुर्भावना नहीं होती थी। एक बार की बात है। धर्म दीक्षा का समापन हुआ, तो उसमें भाग लेने वाले नवबौद्ध अपनी अपनी रुचि के मुताबिक परिव्रज्या के लिए चले गए।
उनमें देववर्धन नामक भिक्षु भी था। वह बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुआ और कलिंग जाकर संघ का प्रचार करने की इच्छा जताई। उसकी इच्छा जानकर बुद्ध ने शीश पर आशीर्वाद का हाथ फेरते हुए कहा, वत्स! कलिंग में जाना उचित नहीं है क्योंकि वहां के लोग बहुत क्रूर, अधर्मी और ईष्यालु हैं। वह तुम्हें बहुत तरीके से सताएंगे। गालियां देंगे। देववर्धन ने कहा, भगवन! वह मुझे गालियां ही देंगे, मुझे मारे पीटेंगे तो नहीं। बुद्ध ने कहा कि वह मारपीट भी कर सकते हैं। तब देववर्धन ने कहा कि उनकी मारपीट से शरीर को थोड़ी चोट ही पहुंचेगी। मार तो नहीं डालेंगे।
बुद्ध ने कहा कि वह तुम्हारी जान भी ले सकते हैं। मैंने देखा है वह बहुत क्रूर हैं। तब भी देववर्धन अड़ा रहा। बोला, पुण्य कार्य करते हुए मुझे अपने प्राण देने पड़े, तो मैं समझूंगा कि यह शरीर सार्थक हो गया। बुद्ध ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम कलिंग धर्म प्रचार कर सकोगे। तुममें सच्ची सेवा भावना है।