अशोक मिश्र
बंगाल के एक सुल्तान हुए थे गयासुद्दीन आजम शाह। इनकी न्यायप्रियता की कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। गयासुद्दीन इलियास शाही वंश के तीसरे सबसे प्रभावशाली शासक थे। इन्होंने बंगाल पर 1390 से 1410-11 ईस्वी तक शासन किया था। गियासुद्दीन आजम शाह सिकंदर शाह और उनकी एक हिंदू पत्नी के पुत्र थे। इनके सत्रह सौतेले भाई थे। अपने पिता के शासनकाल में उन्होंने मयमनसिंह जिले के राज्यपाल के रूप में कार्य किया और वहाँ गियासपुर नामक एक टकसाल की स्थापना की थी।कहते हैं कि गयासुद्दीन रोज तीरंदाजी का अभ्यास किया करते थे। एक दिन दुर्योग से उनका तीर लक्ष्य से भटककर एक विधवा के इकलौते बेटे को जा लगा। बेटे की तीर लगने से मौत हो गई। उस महिला ने अपने बेटे की मौत को लेकर शहर के काजी के यहां न्याय दिलाने के लिए गुहार लगाई। शहर काजी ने समन भेजकर सुल्तान गयासुद्दीन को अपनी अदालत में तलब किया।
सुल्तान भी साधारण कपड़े में अदालत में आए और एक आरोपी की तरह कठघरे में खड़े हो गए। न्यायालय की कार्रवाई शुरू हुई। तमाम गवाहों और सुबूतों के आधार पर सुल्तान दोषी पाए गए। काजी ने सुल्तान को विधवा के भरणपोषण के लिए उचित मुआवजा देने का आदेश दिया। सुल्तान ने आदेश मान लिया। जब मामला निपट गया, तो सुल्तान ने अपने कपड़ों में छिपी तलवार निकालकर काजी को दिखाते हुए कहा कि अगर आज आप डर जाते और न्याय नहीं करते, तो इसी तलवार से आपका गला काट देता।
तब काजी ने अपनी गद्दी से हंटर निकालकर दिखाते हुए कहा कि यदि आप अदालत का फैसला नहीं मानते, तो इसी हंटर से पिटवाता। यह सुनकर सुल्तान ने काजी को गले लगा लिया और उसके न्याय की खूब प्रशंसा की।