Tuesday, March 24, 2026

भगत सिंह बोले, तुम्हारा स्थान मेरी मां से ऊंचा है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में छुआछूत जैसी कुरीति सदियों से चली आ रही थी। इसके खिलाफ हमारे देश के महापुरुषों ने बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी, तब जाकर समाज में धीरे-धीरे बदलाव आया और आज हम कह सकते हैं कि देश से अस्पृश्यता जैसी भावना को पूरी तरह परास्त कर दिया गया है। बात उस समय की है, जब एचएसआरए यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रख्यात क्रांतिकारी भगत सिंह जेल में बंद थे। 

ब्रिटिश हुकूमत उन्हें फांसी की सजा सुना चुकी थी। लाहौर जेल में बंद किए गए भगत सिंह का सभी कैदी बड़ा सम्मान करते थे। उनमें एक बोधा नाम का सफाई कर्मी भी था। भगत सिंह बोधा को बेबे कहकर पुकारा करते थे। पंजाब में मां को बड़े सम्मान और प्यार के साथ बेबे कहकर संबोधित किया जाता है। 

इस पर बोधा विनीत स्वर में प्रतिरोध करते हुए भगत सिंह से कहा करता था कि वह निम्न कुल में पैदा हुआ है। आप उच्च कुल में पैदा हुए हैं। आपका इस तरह मुझे बेबे कहकर संबोधित करना उचित नहीं है। इस पर हंसते हुए भगत सिंह कहा करते थे कि बचपन में मां ने मेरा मल-मूत्र साफ किया था। 

आप हमारे बड़े होने के बाद भी वही काम करते हो। इस नाते तो आपका सम्मान मां से भी बढ़कर होना चाहिए था। भगत सिंह वैसे भी उस विचारधारा को मानते थे जिसमें इंसान का इंसान के प्रति कोई भेदभाव न हो। अपनी फांसी से एक दिन पहले भगत सिंह ने जेल प्रशासन से कहा कि उन्हें बोधा के हाथ की बनी रोटी खानी है। यह सुनकर बोधा फूट-फूटकर रो पड़ा। भगत सिंह ने अपनी शहादत देते हुए भी अपने आदर्श का जीवंत उदाहरण पेश करते हुए बड़े प्रेम से बोधा के हाथ की बनी रोटी खाई  और शहीद हो गए।

हरियाणा में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़ी हुईं पंचायतें


अशोक मिश्र

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अब लोग जागरूक होने लगे हैं। धार्मिक, सामाजिक क्षेत्र में जितनी भी कुरीतियां हैं, लोग अब उसके खिलाफ स्वर बुलंद करने लगे हैं। शादी-विवाह सहित सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों में लोगों ने देश और समाज को नुकसान पहुंचाने वाली रीतियों, परपंराओं से निजात पानी शुरू कर दी है। इसके लिए अब पंचायतें भी सामने आने लगी हैं। 

प्रदेश में सामाजिक बदलाव की बहने वाली बयार के पीछे जागरूक स्त्री और पुरुष दोनों हैं। फतेहाबाद जिले की बड़ोपल पंचायत ने प्रस्ताव पास किया है कि अब वह बाल विवाह नहीं होने देंगे। जो भी बाल विवाह कराता हुआ पाया जाएगा, उसके यहां होने वाले विवाह में बान पर नहीं बैठेंगे और हल्दी की रस्म नहीं निभाई जाएगी। पंचायत ने भी यह तय किया कि यदि किसी ने पंचायत के फैसले के खिलाफ जाकर बाल विवाह कराने का प्रयास किया, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, पंचायत में बारात नहीं आने दिया जाएगा और यदि किसी ने गुपचुप बाल विवाह करने की सोची, तो उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत की जाएगी। 

जरूरत पड़ने पर दूसरे गांवों की पंचायतों का भी सहयोग लिया जाएगा। कभी हमारे देश और प्रदेश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा थी। इसे सामाजिक मान्यता भी हासिल की थी, लेकिन जैसे-जैसे समाज शिक्षित हुआ, जागरूर हुआ, लोगों को बाल विवाह से होने वाली परेशानियां और नुकसान की बात समझ में आने लगी। प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी ने बाल विवाह से अपना मुंह मोड़ लिया, लेकिन कुछ लोग अभी बाल विवाह को उचित मानकर अपने बेटा-बेटी का बाल विवाह कराते हैं। 

प्रदेश के मामले में अच्छी बात यह है कि पंचायतों ने अब शादी-विवाह में होने वाले बेतुके खर्चों पर भी रोक लगानी शुरू कर दी है। फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में पिछले दिनों आयोजित पंचायत में फैसला लिया गया है कि शादी-विवाह या अन्य दूसरे मांगलिक कार्यों के समय बजाए जाने वाली डीजे का बहिष्कार किया जाएगा। पूरे जिले के गांवों, कालोनियों और सेक्टरों से आए प्रतिनिधियों ने पूरे दस सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प लिया। लोगों को मानना था कि शादी-विवाह के समय कई परंपराएं पुराने समय के हिसाब से शुरू हुई थीं। अब इन परंपराओं का कोई औचित्य नहीं रह गया है। 

कुछ परंपराएं ऐसी हैं जिनकी वजह से वर और वधू पक्ष के खर्चे अनावश्यक रूप से बढ़ जाते हैं और जिनका कोई औचित्य भी नहीं है। शादी-विवाह में बहुत तेज आवाज में बजने वाले डीजे की वजह से कई बार पड़ोसियों से मारपीट जैसी घटनाएं हो जाती हैं। बहुत ज्यादा शोर मचाने वाले डीजे जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं खर्चा भी बहुत ज्यादा आता है। यही नहीं, फैसला यह भी किया गया कि शादी, लगन-सगाई और अन्य रस्मों में खर्च लेने की प्रथा को बंद किया जाएगा।

Monday, March 23, 2026

प्रशंसा प्रगति का मार्ग रोक देती है, पुत्र!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अभिमान और प्रशंसा दो ऐसे शब्द हैं जो व्यक्ति की प्रगति को बाधित कर देते हैं। बहुत अधिक प्रशंसा होने से व्यक्ति में अभिमान आ जाना स्वाभाविक है। यही वजह है कि महापुरुषों ने हर व्यक्ति को प्रशंसा से दूर रहने की बात कही है। इस संदर्भ में एक मूर्तिकार की बड़ी रोचक कथा है। 

किसी नगर में एक मूर्तिकार रहता था। वह अपने समय में बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था। लोग जब उसकी प्रशंसा करते तो वह विनम्रता से सिर झुकाकर रह जाता था। कुछ दिनों बाद उसके बेटे ने भी मूर्तियं बनाना सीखना शुरू कर दिया। पिता अपने पुत्र की मूर्तियों में हमेशा कोई न कोई कमी निकाल देता और उसे दूसरी मूर्ति बनाने को कहता था। इस तरह कई साल बीत गए। 

अब उसका पुत्र भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाने लगा था। लेकिन मूर्तिकार पिता अपने पुत्र के कार्यों से संतुष्ट नहीं होता था। वह अपने हिसाब से कुछ न कुछ कमियां निकाल ही देता था। धीरे-धीरे पुत्र के मन में क्रोध की भावना पैदा होने लगी। उसे लगने लगा कि पिता में ही कोई खोट है, जो उनकी इतनी अच्छी मूर्तियों से भी संतुष्ट नहीं हैं। एक दिन उसने अपनी एक मूर्ति को अपने मित्र के हाथ से पिता के पास भिजवाया। वह अपने घर में एक जगह पर छिप गया। 

पिता ने उस मूर्ति को देखा, तो बरबस मुंह से निकल गया कि जिसने यह मूर्ति बनाई है, वह महान मूर्तिकार है। तभी बेटा बाहर आया और बोला, यह मूर्ति मैंने बनाई है, लेकिन कभी आपने मेरी प्रशंसा नहीं की। थोड़ी देर पहले इस मूर्ति को बनाने वाले को महान मूर्तिकार कह रहे थे। तब पिता ने कहा कि यदि मैं तुम्हारी प्रशंसा कर देता, तो तुममें और अच्छा करने की ललक नहीं पैदा होती। तुम्हें अपनी कला पर अभिमान हो जाता और तुम्हारी प्रगति रुक जाती। यह सुनकर पुत्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने पिता से क्षमा मांगी।

आगामी ओलिंपिक खेल में 36 पदक जीतने का सरकार ने तय किया लक्ष्य

अशोक मिश्र

पूरे देश में हरियाणा को खिलाड़ियों वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता है। यहां की प्रदेश सरकारों ने समय-समय पर खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाईं, उन्हें प्रोत्साहित किया और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में पदक जीतने पर उन्हें सम्मानित भी किया, नकद ईनाम भी दिए। सरकारी नौकरियां प्रदान कीं। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2014 से लेकर अब तक लगभग 709 करोड़ रुपये करीब 17 हजार खिलाड़ियों को पुरस्कार देने पर खर्च किए हैं। पिछले साल से अब तक 662 खिलाड़ियों को 109 रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की जा चुकी है। इसका नतीजा यह रहा कि यहां के युवाओं ने भी सरकार को निराश नहीं किया। 

हरियाणा के सबसे ज्यादा खिलाड़ियों ने प्रदेश और देश का नाम विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में रोशन किया है जिनमें भाला फेंक में पानीपत के नीरज चोपड़ा, कुश्ती में सोनीपत के योगेश्वर दत्त और रवि कुमार दहिया, झज्जर के बजरंग पुनिया, रोहतक की साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, बबीता फोगाट, गीता फोगाट, संग्राम सिंह आदि प्रमुख हैं। प्रदेश में ऐसे खिलाड़ियों की भरमार है जिन्होंने समय-समय पर देश और प्रदेश का नाम गर्व से ऊंचा किया है। 

अब सैनी सरकार ने गुजरात के अहमदाबाद में वर्ष 2036 में ओलंपिक खेलों में हरियाणा के खिलाड़ियों के कुल मिलाकर 36 पदक जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सरकार ने इसकी तैयारी अभी से शुरू कर दी है। मिशन ओलिंपिक 2036 में 36 पदक लाने के लक्ष्य लेकर सरकार ने प्रदेश में 21 नए स्टेडियम बनाने का फैसला किया है। इसके लिए हरियाणा में खेलों का बुनियादी ढांचा बेहतर किया जाएगा। प्रतिभावान खिलाड़ी तैयार करने के लिए जल्द ही वैज्ञानिक तरीके से प्रतिभा खोज अभियान शुरू की जाएगी। 

स्कूल-कालेजों और खेल नर्सरियों में जुझारू खिलाड़ी तलाशे जाएंगे और उन्हें पदक जीतने लायक बनाया जाएगा। 10 से 12 साल के प्रतिभाशाली बच्चों को ओलिंपिक स्तर की प्रतियोगिता के लायक बनाने के लिए राज्य खेल विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण दिया जाएगा। सैनी सरकार का 11 जिलों में नए खेल स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव है। कैथल, झज्जर, चरखी दादरी, गुरुग्राम, कुरुक्षेत्र, जींद, रोहतक, फरीदाबाद, यमुनानगर, सोनीपत, फतेहाबाद और पलवल जिले में कुल 21 नए खेल स्टेडियम बनाने जाएंगे। 

इनमें खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। दिव्यांग खिलाड़ियों को समर्पित पैरा खेल स्टेडियम बनाने की दिशा में सरकार ने काम शुरू कर दिया है। राजीव गांधी खेल परिसर दौलताबाद को भी सरकार अपग्रेड करेगी। सरकार ने तो पूरे राज्य में डेढ़ हजार खेल नर्सरियां खोल रखी हैं। इन नर्सरियों में 37 हजार से अधिक खिलाड़ी अभ्यास करते हैं। इतनी तैयारी के बाद पूरी तरह विश्वास है कि हमारे प्रदेश के खिलाड़ी 36 से कहीं ज्यादा पदक जीतकर लाएंगे और प्रदेश का नाम रोशन करेंगे।

Sunday, March 22, 2026

प्रायश्चित रूपी पानी पापों को बहा देता है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुरा कर्म करने वाले को यदि अपराध बोध से मुक्ति पानी है, तो उसे अपने बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना होता है। प्रायश्चित ही उसके मन निर्मल बना सकती है। जिस व्यक्ति के लिए उसका कर्म नुकसानदायक साबित हुआ है, उससे क्षमा मांगने से पाप का प्रायश्चित हो जाता है। 

बुरे कामों के लिए किसी से क्षमा मांगना और अपने पापों का प्रायश्चित करना वही व्यक्ति कर सकता है जिसे अपने पापों का ज्ञान हो गया हो। एक बार की बात है। एक संत किसी जगह प्रवचन कर रहे थे। उनका प्रवचन सुनने के लिए भारी भीड़ जुटी हुई थी। 

संत की मधुर वाणी में ज्ञान का अजस्र प्रवाह हो रहा था। वह कह रहे थे कि यदि किसी व्यक्ति से अनजाने में कोई गलती हो जाए, पाप हो जाए, तो उसे आभास नहीं होता है। ऐसी स्थिति में हर व्यक्ति को जाने-अनजाने हुए पाप या बुरे कर्म के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। इतना ही नहीं, भविष्य में कोई बुरा कर्म या पाप न हो जाए, इसके लिए संकल्प लेना चाहिए। 

वहां मौजूद लोग मौन होकर संत का प्रवचन सुन रहे थे।  प्रवचन खत्म हुआ तो सारे लोग चले गए, लेकिन एक व्यक्ति वहां मौजूद रहा। जब सब चले गए तो उसने संत से कहा कि महाराज! मेरे मन में एक जिज्ञासा है। प्रायश्चित करने से पापों से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है। 

संत ने कहा कि आप कल आइएगा, मैं समझाऊंगा। दूसरे दिन उस व्यक्ति को लेकर संत नदी किनारे पहुंचे। वहां एक गड्ढे में पानी सड़ गया था, कीड़े पड़ गए थे। संत ने पूछा कि यह पानी क्यों सड़ गया? उस व्यक्ति ने कहा कि प्रवाह न होने से पानी सड़ गया। संत ने कहा कि ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप होते हैं जिन्हें प्रायश्चित का पानी सड़े हुए पानी को बहा देता है।

देसी प्रजाति के पेड़ पौधों के लिए खतरा है विलायती कीकर

अशोक मिश्र

अरावली का प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन खतरे में है। इसका कारण अरावली क्षेत्र में बड़ी संख्या में उगने वाली विलायती कीकर को माना जा रहा है। विलायती कीकर ने पूरे अरावली क्षेत्र में देसी प्रजाति के पौधों खेजड़ी, करीर और ढाक जैसे पौधों को पनपने और विकसित होने से रोक दिया है। देसी प्रजाति के पौधे धीरे-धीरे अरावली क्षेत्र से गायब होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव वन्यजीवों पर भी दिखाई देने लगा है।

जो वन्यजीव देसी प्रजाति के पेड़-पौधों पर निर्भर रहते हैं, उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है जिसकी वजह से कई बार वह भोजन की खोज में अपने निवास क्षेत्र से निकलकर मानव बस्तियों में पहुंच जा रहे हैं। अरावली क्षेत्र में विलायती कीकर के लगातार फैलने का कारण पूर्व सरकारों का गलत फैसला था। हरियाणा में सन 1990 से लेकर 1999 तक इन दस वर्षों में अरावली पहाड़ियों और उसके आसपास के क्षेत्र में हेलिकाप्टर से जगह-जगह विलायती कीकर यानी बबूल के बीज गिराए गए थे। 

नतीजा यह हुआ कि अरावली क्षेत्र की अधिकतर जमीनों पर विलायती कीकर उग आए। इन विलायती बबूलों ने अपना कुनबा बढ़ाना जब शुरू किया, तो स्थानीय वनस्पतियां सिकुड़ने लगीं। यह विलायती कीकर राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी आंधियों को रोकने में नाकामयाब रहे। पहले से रोपे गए या अपने आप उगी स्थानीय वनस्पतियां पहले एक सीमा के बाद धूल को आगे बढ़ने से रोक देती थीं। इससेहरियाणा, दिल्ली और गुजरात के कुछ क्षेत्र रेगिस्तान बनने से बचे रहे। अब राजस्थान से उठने वाले धूल के बवंडर हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने लगे हैं। यदि राजस्थान से आने वाली धूल को रोका नहीं गया, तो दिल्ली और हरियाणा की हरी-भरी जमीनें रेगिस्तान में बदल जाएंगी। 

ऐसी आशंका पर्यावरणविद व्यक्त करने लगे हैं। लेकिन विलायती बबूल ने सारे इकोसिस्टम को बिगाड़कर रख दिया। पर्यावरण को शुद्ध रखने में सक्षम स्थानीय वनस्पतियां अब तो नब्बे फीसदी कम हो गई हैं। सन 2000 से 2004 के बीच अरावली क्षेत्र में अवैध खनन भी बहुत हुए। खनन और वन माफियाओं ने पूरे अरावली क्षेत्र को बरबाद करके रख दिया। वैसे यह बात सही है कि पिछले कुछ वर्षों में अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र का दायरा बढ़ा है। 

वन विभाग का सर्वे बताता है कि वर्ष 2025 में वन क्षेत्र 6948.44 हेक्टेयर से बढ़कर 7530.23 हेक्टेयर हो गया है। इस विस्तार का श्रेय बड़े पैमाने पर अरावली क्षेत्र में किए गए पौधरोपण को जाता है। लेकिन इस पौधरोपण का फायदा तब मिलेगा, जब पूरे अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर की बढ़त को रोक दिया जाए। विलायती कीकर की बढ़त को लेकर जिला वन अधिकारी भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि अरावली क्षेत्र से विलायती कीकर को नियंत्रित करना हमारी प्राथमिकता है।

सोने की मुहर ले लो, बस आटा मत छीनना

प्रतीकात्मक चित्र
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संकट काल में सबसे बड़ा साथी व्यक्ति का धैर्य होता है। यदि धैर्यपूर्वक संकट का मुकाबला किया जाए, तो संकट से छुटकारा अवश्य मिलता है। यही वजह है कि महापुरुष और विद्वान लोग संकट के समय में घबराते नहीं हैं। वह बड़े धैर्य और साहस के साथ संकट का सामना करते हैं और अंतत: अपना मार्ग प्रशस्त करते हैं। एक बार की बात है। एक गांव में भिक्षुक रहता था। 

वह दिन भर गांव-गांव घूमकर भिक्षा मांगता था। जो कुछ मिल जाता था, उसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक दिन वह भिक्षा मांगने के लिए पास के शहर में चला गया। संयोग से वह एक समृद्ध व्यापारी के घर पर भिक्षा मांगने पहुंच गया। उस समय व्यापारी बहुत खुश था क्योंकि कई साल बाद उसके यहां बेटा पैदा हुआ था। दरवाजे पर उसे भिक्षुक दिखाई पड़ा, तो उसने बड़े आदर के साथ भिक्षुक को अंदर बुलाया और उसे एक सोने की मुहर दान दी। 

भिक्षुक ने व्यापारी से प्रसन्नता का कारण पूछा, तो उसने कहा कि कई वर्ष के बाद उसके यहां संतान जन्मी है। मैं अत्यंत खुश हूं। भिक्षुक ने उस बच्चे को ढेर सारा आशीर्वाद दिया। उसने दूसरे घरों में भी भिक्षा मांगी। कहीं आटा मिला, तो कहीं चावल। 

कहीं दूसरी वस्तु। जब वह भिक्षा मांगकर वापस लौट रहा था तो रास्ते में जंगल पड़ा। उसने मुहर आटे की थैली में छिपा ली। संयोग से उसी समय डाकुओं ने उसे घेर लिया और कहा कि जो कुछ भी है, वह दे दो। भिक्षुक ने सोने की मुहर देते हुए कहा कि बस, मेरा यह आटा मत छीनना। डाकुओं ने पूछा क्यों? तब भिक्षुक ने कहा कि यह आटा चमत्कारी है। रोज एक सोने की मुहर पैदा करता है। डाकुओं ने मुहर फेंक दी और आटा छीन लिया। और वहां से चले गए। अपने धैर्य और चतुराई से भिक्षुक ने सोने की मुहर बचा ली।

नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही चिंता में डूबे अभिभावक


अशोक मिश्र

हरियाणा में इन दिनों परीक्षाएं चल रही हैं। बच्चे अपनी पूरी तैयारी के साथ परीक्षा दे रहे हैं। कुछ कक्षाओं की परीक्षाएं संपन्न हो चुकी हैं। सबका यही प्रयास है कि वह इन परीक्षाओं में अधिक से अधिक मार्क्स हासिल करें। कुछ ही दिनों बाद ज्यादातर बच्चे अगली कक्षा में प्रवेश लेंगे, लेकिन उनके माता-पिता नई कक्षाओं में भर्ती कराने में खर्च होने वाली रकम को लेकर अभी से चिंतित हो उठे हैं। 

नई किताबें, कापियों का खर्चा तो उन्हें झेलना ही है, फीस भी नई कक्षा में बढ़ाकर देनी होगी। एक सामान्य से अंग्रेजी मीडियम स्कूल में बच्चे का प्राइमरी में एडमिशन कराने के लिए कम से कम पंद्रह-बीस हजार रुपये खर्च हो ही जाते हैं। यदि एक से अधिक बच्चे हुए, तो यह बोझ दोगुना हो जाता है। हरियाणा के कई जिलों में शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही ड्रेस बदलने की घोषणा कर दी गई है। 

ऐसे में पुरानी ड्रेस अब किसी काम की नहीं रह गई है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि कुछ स्कूल तो हर साल अपनी ड्रेस बदल देते हैं। इन स्कूलों का एक ड्रेस से काम नहीं चलता है। शुक्रवार-शनिवार के लिए अलग ड्रेस, बाकी दिनों के लिए अलग ड्रेस, जिस दिन पीटी यानी शारीरिक शिक्षा का क्लास लगेगा, उस दिन की अलग ड्रेस तय की जाती है। इस तरह बच्चों को अपने स्कूल की कई यूनिफार्म खरीदनी पड़ती है। एक ड्रेस पर सामान्य तौर पर एक हजार रुपये का खर्च आ ही जाता है। 

उस पर कपड़े के दामों में पच्चीस-तीस प्रतिशत बढ़ोतरी हो जाने की खबर है। ऐसी स्थिति में अपने बच्चों के लिए नई ड्रेस खरीदना अभिभावकों के लिए आर्थिक संकट पैदा करने वाला साबित होता है। इतना ही नहीं, गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और खेल गतिविधियों के लिए स्कूल वाले अलग से ड्रेस दिलवाते हैं। कई स्कूल तो अपने यहां से इन ड्रेसों को खरीदने के लिए माता-पिता को बाध्य करते हैं। एक मामूली सी टीशर्ट के लिए भी ढाई-तीन सौ रुपये वसूले जाते हैं। इन स्कूलों की ऐसी दशा देखकर यही आभास होता है कि यह स्कूल विद्या के मंदिर नहीं, बल्कि मुनाफा कमाने की दुकानें बनकर रह गई हैं। 

यह तो हुई ड्रेस की बात। सिलेबस हर साल बदल दिया जाता है। कई बार तो किसी विषय की किताब में एक या दो चैप्टर बदल दिया जाता है और बच्चों से कहा जाता है कि नई किताब लेना अनिवार्य है। यदि सिलेबस नहीं बदला होता, तो बच्चे पुरानी किताब से पढ़ लेते। ऐसी स्थिति में स्कूल और पुस्तक विक्रेताओं को नुकसान होता। इसी लिए हर साल सिलेबस बदल दिया जाता है ताकि माता-पिता नई किताब खरीदने पर मजबूर हो जाएं। स्कूल वाले या तो नई पुस्तकों  से लेकर कापी, पेंसिल, बैग आदि खुद बेचते हैं या फिर वह ज्यादा कमीशन देने वाले पुस्तक विक्रेता से ही किताब-कापियां लेने को बाध्य करते हैं। निजी स्कूल तो अभिभावकों के लिए शोषण के अड्डे बनकर रह गए हैं।

Friday, March 20, 2026

कायर को कभी नहीं मिलती सफलता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आयरलैंड के प्रसिद्ध नाटककार और उपन्यासकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ को अपना जीवन अत्यंत गरीबी में बिताना पड़ा। उनका जन्म 26 जुलाई 1858 को डबलिन में हुआ था। वैसे वह एक कुलीन परिवार में पैदा हुए थे, लेकिन पिता जार्ज कैर शॉ के अव्यावहारिक जीवन और शराब में डूबे रहने की वजह से गरीबी में जीवन बिताने को अभिशप्त थे। 

उनकी मां लुसिंडा एलिजाबेथ गर्ली शॉ अपनी दो बेटियों को साथ लेकर अपने पति को छोड़कर लंदन चली गई थीं। बर्नार्ड शॉ की प्रारंभिक शिक्षा कुछ ही साल हुई थी। इसके बाद उन्होंने जीवनयापन के लिए कई प्रकार के काम करने पड़े। सोलह साल की उम्र से शुरू हुआ संघर्ष का दौर तब खत्म हुआ जब 1912 में उनके नाटक पिग्मेलियन को खूब प्रशंसा मिली। 

शुरुआती दौर में बर्नार्ड शॉ बातचीत करने से घबराते थे। स्वभाव से संकोची और हीनभावना से ग्रसित बर्नार्ड शॉ को इससे छुटकारा पाने के लिए डिबेटिंग सोसाइटी ज्वाइन की और भाषण देने की कला सीखने लगे। अंतत: यह कला काम आई। उन्होंने अपनी हीन भावना पर विजय पाई। इसका नतीजा यह हुआ कि जिस लेखन को पहले लोगों ने अस्वीकार कर दिया था, चर्चित होने पर वही लोग उनके नाटकों और उपन्यासों को पढ़ने के लिए लालायित रहने लगे। 

सन 1925 में उन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला। शॉ ने यह नियम बना रखा था कि वह प्रतिदिन पांच पेज लिखा करेंगे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष तक लेखन किया। वह अकसर कहा करते थे कि यदि सच्चे दिल से प्रयास किया जाए और मन में दृढ़ निश्चय हो, तो जीवन में सफलता मिलनी अनिवार्य है। कायर व्यक्ति को कभी सफलता नहीं मिलती है।

हरियाणा में ड्रॉपआउट रोकने को चाहिए सुरक्षित और स्वस्थ माहौल


अशोक मिश्र

पलवल जिले के गदपुरी थाना क्षेत्र में असावटी गांव की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या का कारण छात्रा के स्कूल आते-जाते समय कुछ युवकों द्वारा की जा रही छेड़छाड़ को बताया जा रहा है। युवकों की छेड़छाड़ और भाई की पिटाई से आहत छात्रा ने 17 मार्च को पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली। पिछले छह महीने से छात्रा को युवक परेशान कर रहे थे।

इसके चलते आखिरकार नाबालिग छात्रा ने पढ़ाई छोड़ने का फैसला लिया। इसके बावजूद छात्रा का पिंड नहीं छूटा। युवक इतने मनबढ़ थे कि वह अब घर आकर उसे परेशान करने लगे थे। 16 मार्च को जब लड़के घर आकर छात्रा को परेशान करने लगे, तो उसके भाई ने इसका विरोध किया। इस पर युवकों ने छात्रा के भाई की बुरी तरह पिटाई कर दी। इस पिटाई से आहत छात्रा ने पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली। कुछ युवकों की छेड़छाड़ ने एक नाबालिग को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। 

पुलिस यदि इन युवकों को सजा भी दिलाती है, तो क्या सजा मिलेगी। एकाध साल बाद यह लड़के छूट जाएंगे? लेकिन एक जीवन खिलने से पहले ही मुरझा गया, उसको न्याय कैसे मिलेगा? हरियाणा में न जाने कितनी लड़कियां ऐसी या इससे दूसरी परिस्थितियों के चलते स्कूल छोड़ने या आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों से स्कूलों से ड्रापआउट का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। इस मामले को बजट सत्र के दौरान संसद में भी उठाया गया था। 

कांग्रेस सांसद कुमारी सैलजा ने ड्रापआउट मामले को उठाते हुए सरकार से इस मामले में कदम उठाने की अपील की थी। सरकार ने भी आश्वासन दिया था कि वह जल्दी ही स्कूल छोड़ने वाले छात्र-छात्राओं को वापस स्कूल लाने का हरसंभव प्रयास करेगी। संसद में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार पिछले एक साल में हरियाणा की 5.30 लाख बच्चे विभिन्न कारणों से स्कूल छोड़कर घर बैठ गए है। इनमें से करीब 2.58 लाख छात्र सरकारी स्कूलों से और लगभग 2.91 लाख छात्र निजी स्कूलों से पढ़ाई छोड़ चुके हैं। इनमें असावटी वाली छात्रा जैसी परिस्थितियों में पढ़ाई छोड़ने वाली छात्राओं की संख्या ज्यादा ही थी। 

स्कूलों से बच्चों के ड्रॉप आउट होने का सबसे बड़ा कारण लोगों की कम आय है। लेकिन यह भी सच है कि स्कूल-कालेज दूर होने की वजह से लोग अपनी लड़कियों को पढ़ने भेजने से कतराते हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादातर मां-बाप अपनी बेटियों को अकेले भेजने से घबराते हैं। 

उनको लगता है कि यह उनकी बेटी के साथ ऊंच नीच हो गया तो क्या होगा? यदि ग्रामीण क्षेत्र में थोड़े पास पास स्कूल और कॉलेज हो तो ड्रॉप आउट काफी हद तक रुक सकता है। इसके साथ ही छात्राओं को सुरक्षित और स्वस्थ माहौल देना भी जरूरी है। यदि छात्रा को कोई मनचला प्रताड़ित करेगा, तो वह पढ़ने कैसे आ पाएंगी?