Friday, February 13, 2026

राजा का कर्तव्य विषय भोग नहीं, प्रजा पालन है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महर्षि दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर था। दयानंद का जन्म गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी 1824 को हुआ था। बचपन में एक दिन पिता ने मूलशंकर को शिवरात्रि व्रत रखने को कहा। रात में पूजा करते समय देखा कि शंकर भगवान की मूर्ति पर चूहा चढ़ा हुआ है। उन्हें तब बोध हो गया कि यह वह शंकर नहीं हैं जिसके बारे में उन्हें बताया गया था। 

इसके बाद उन्होंने सत्य की खोज के लिए घर त्याग दिया। इसके बाद दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की और भारतीय समाज में फैली तमाम कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया। दयानंद सरस्वती की मृत्यु के संबंध में बताया जाता है कि उनकी मौत की साजिश रचने में अंग्रेजों का हाथ था। 

बात 1883 की है। राजस्थान के जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के निमंत्रण पर महर्षि दयानंद सरस्वती जोधपुर गए थे। वह रोज प्रवचन करते थे। कभी-कभी महाराजा जसवंत सिंह भी उनका प्रवचन सुनने आते थे। महाराज के विशेष आग्रह पर वह कई बार राज महल भी गए। वहां उन्होंने देखा कि नन्हीं नाम की वेश्या का महाराज पर विशेष प्रभाव था। 

महाराज राजकाज करने की जगह पर ज्यादातर विषय भोग में लिप्त रहते थे। यह बात दयानंद को अटपटी लगी। एक दिन जब वह प्रवचन कर रहे थे, तो उन्होंने महाराज को संबोधित करते हुए कहा कि राजा का कर्तव्य प्रजा का पालन करना है, विषय भोग में लिप्त रहना नहीं। इससे महाराज ने नन्हीं से संबंध तोड़ लिए। कहते हैं कि अंग्रेजों की शह पर नन्हीं ने रसोइये से मिलकर दूध में पिसा हुआ कांच मिलकर स्वामी जी पिला दिया। इसके बाद अस्पताल में भी धीमा जहर देने की बात कही जाती है। 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में ही दयानंद का देहांत हो गया।

हरियाणा में प्रदूषित जल लोगों के लिए साबित हो रहा जानलेवा


अशोक मिश्र

पलवल के छांयसा गांव में पिछले एक पखवाड़े में 14 लोगों की अस्वाभाविक रूप से मौत हो चुकी है। प्रदूषित पानी की वजह से लोगों के मरने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने कुछ लोगों की मौत का कारण हेपेटाइटिस बी बताया है। हरियाणा में प्रदूषित पानी की वजह से लोगों की हो रही मौत काफी चिंताजनक है। 

हरियाणा के अधिकतर जिलों के कुछ इलाकों में लोगों को प्रदूषित जल का उपयोग दैनिक जीवन में करना पड़ रहा है। इसकी वजह से केवल इंसान ही नहीं, पालतू पशुओं की भी मौत हो रही है। नूंह के तावडू उपमंडल के अंतर्गत गोयला गांव के नजदीक कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे और रेलवे लाइन के बीच जहरीले केमिकल युक्त पानी पीने से नौ फरवरी को तीन गायों की मौत हो गई थी, वहीं 40 से अधिक गायों की हालत गंभीर बनी हुई थी। 

फरवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, हिसार के हांसी और उसके आसपास के क्षेत्रों में दूषित पानी पीने से बीमारियां फैलने के कारण 50 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं।  फरीदाबाद के झाड़सेतली और मांगर गाँव में औद्योगिक प्रदूषण के कारण भूजल जहरीला हो चुका है। इस क्षेत्र में कैंसर, किडनी और लीवर की बीमारियों के कारण अब तक 30 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं। 

हरियाणा में प्रदूषित जल की वजह से इंसान और पशुओं को अपनी जान गंवानी पड़ रही हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो, जब किसी न किसी जिले में प्रदूषित जल की वजह से बीमार पड़ने या मौत होने की खबर न आती हो। राज्य में प्रदूषित पानी एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका है। इस समस्या का समाधान जितनी जल्दी खोज लिया जाए, उतना ही अच्छा है। प्रदूषित जल के कारण हर साल पूरे राज्य में काफी मौतें हो रही हैं, जो काफी चिंताजनक है। इसका कारण औद्योगिक कारखानों से निकला अपशिष्ट, सीवर का गंदा पानी और कृषि रसायनों हैं। इनके कारण ही राज्य के अधिकतर जिलों में भूजल पीने योग्य नहीं रहा है। 

दक्षिणी और पश्चिमी हरियाणा के जिले खासतौर पर प्रदूषित जल संकट के शिकार हैं। हरियाणा के कई जिलों भिवानी, फतेहाबाद, करनाल, जिंद, सोनीपत के भूजल में यूरेनियम, नाइट्रेट और आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इसकी वजह से लोगों को कई तरह की गंभीर बीमारियां हो रही हैं। डाइंग और प्लेटिंग इकाइयों का केमिकल युक्त पानी सीधे भूमिगत जल में मिल रहा है। इसे रोकने का प्रयास उद्योगों के मालिक नहीं कर रहे हैं। सरकारी मशीनरी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। जब किसी जिले में कोई हादसा होता है, तो सरकारी मशीनरी सक्रिय होती है। कुछ दिनों तक सावधानी बरती जाती है। मरीजों को दवाइयां दी जाती हैं, लोगों में क्लोरिन के टेबलेट्स बांटे जाते हैं। उसके बाद वही पुराना रवैया अख्तियार कर लिया जाता है।

Thursday, February 12, 2026

अपनी शादी में चर्च नहीं पहुंचे लुई पाश्चर


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

फ्रांस के महान सूक्ष्म जीवविज्ञानी, रैबीज टीके के आविष्कारक लुई पाश्चर बहुत मेहनती थे। 27 दिसंबर 1822 को फ्रांस में जन्मे लुई पाश्चर के पिता चमड़ा व्यापारी थे। चमड़ा व्यापार में उन्हें कमाई बहुत कम होती थी जिससे उनका परिवार आर्थिक संकट से ही घिरा रहता था। 

पाश्चर ने 1831 में स्कूली शिक्षा हासिल की। शुरुआती दौर में वह एक औसत छात्र थे। लिखने-पढ़ने में उनका मन नहीं लगता था। उन्हें मछलियां पकड़ना और पेटिंग करना बहुत पसंद था। एक बार उन्होंने अपने माता-पिता की  पेंटिंग भी बनाई थी। बाद में उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। पाश्चर ने 1848 में स्ट्रासबर्ग में अध्यापन शुरू किया और बाद में वह रसायन विज्ञान विभाग के हेड बने। 

वह स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय के एक अधिकारी की बेटी को वह पसंद करते थे। लड़की और उसके मां-बाप भी शादी करने के लिए तैयार थे। उस समय कुत्ते के काटने का इलाज रैबीज टीके की खोज के कारण काफी प्रसिद्ध हो चुके थे। शादी की तारीख तय हो गई। आखिरकार वह तारीख भी आ गई जिस दिन उनकी शादी होनी थी। लुई पाश्चर और लड़की के सभी रिश्तेदार नियत समय पर चर्च पहुंच गए, लेकिन दूल्हा ही गायब था। 

लोगों में अब कानाफूसी शुरू हो गई। काफी समय बाद एक मित्र उन्हें खोजते हुए प्रयोगशाला पहुंचा, तो देखा कि वह एक प्रयोग में बिजी हैं। मित्र ने कहा कि आज तुम्हारी शादी है और तुम यहां हो। प्रयोग तो बाद में भी किया जा सकता है। पाश्चर ने कहा कि कई साल की मेहनत सफल होने वाली है। शादी तो कल भी हो सकती है। प्रयोग पूरा करने के बाद वह चर्च पहुंचे और धूमधाम से उनकी शादी हुई।

अरावली क्षेत्र में तालाब बनाकर जलसंरक्षण की महत्वपूर्ण योजना


अशोक मिश्र

उत्तर भारत में दिन और रात का तापमान बढ़ने लगा है। हाड़ कंपाती सर्दी से छुटकारा मिल चुका है। आने वाले दिनों में सर्दी बिलकुल खत्म हो जाएगी। तब शुरू होगी पानी की समस्या। हरियाणा के लगभग सभी जिलों में गर्मी के मौसम में पेयजल की समस्या तो होती ही है, नदियों, तालाबों और नालों का जलस्तर काफी कम हो जाने या सूख जाने की वजह से जानवरों को भी पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में जानवर पानी की तलाश में अपने रिहायशी क्षेत्र से निकल कर मानवीय आबादी की ओर चले जाते हैं। 

शहर और गांवों में जानवरों के आ जाने की वजह से कई बार मानव और पशु दोनों को नुकसान पहुंचता है। इस समस्या से निपटने के लिए हरियाणा सरकार ने अरावली क्षेत्र में नए तालाबों के निर्माण और पुराने तालाबों की मरम्मत करके उन्हें उपयोगी बनाने का फैसला किया है। इस योजना के तहत फरीदाबाद में चार बड़े तालाब बनाने के साथ-साथ फरीदाबाद-गुरुग्राम को जाने वाली सड़क के आसपास पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाएगा। इससे फायदा यह होगा कि इन तालाबों के आसपास रहने वाले वन्य जीवों को पानी पीने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। 

उन्हें अपने आसपास ही पीने का पानी उपलब्ध हो जाएगा जिससे उनके शहरों या गांवों में आने की आशंका भी कम हो जाएगी। वैसे भी राज्य सरकार अरावली ग्रीन वॉल योजना के जरिये पूरे अरावली क्षेत्र में नए नए तालाब बनाने और पुराने तालाबों की मरम्मत करने पर जोर दे रही है। इस योजना के तहत किसानों और अन्य लोगों को भी तालाब निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। इस परियोजना के पहले चरण में गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, चरखी दादरी और भिवानी में 66 जल निकायों को विकसित और पुनर्जीवित करने की योजना है। 

वैसे तालाबों के निर्माण से फायदा यह होगा कि जहां वन्य जीवों को पीने के लिए पानी मिलेगा, वहीं इन तालाबों के जरिये भूगर्भ जल स्तर में भी सुधार आएगा। तालाब और झीलों के जरिये धरती पानी सोखती रहेगी जिससे आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों और वनस्पतियों को भी फलने-फूलने के लिए आवश्यक जल उपलब्ध हो सकेगा। अरावली क्षेत्र के आसपास बसे लोगों को सरकार की इस योजना से काफी उम्मीदें हैं। यदि इस परियोजना पर ईमानदारी से काम हुआ, तो अरावली क्षेत्र में बसी मानव आबादी को भी जल संकट से मुक्ति मिलने की पूरी उम्मीद है। 

लोगों का तो यहां तक कहना है कि यदि जगह-जगह पर ऐसे तालाब बनाए जाएं, तो पूरे अरावली क्षेत्र को फिर से हराभरा किया जा सकता है। ऐसा होने पर जल संरक्षण का ध्येय तो पूरा होगा ही, पर्यावरण प्रदूषण से भी काफी हद तक निजात मिल जाएगी। लोगों को सांस लेने के लिए स्वच्छ भी मिलेगी।

Wednesday, February 11, 2026

आसानी से हासिल नहीं होती उच्चता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उच्चता या श्रेष्ठता बहुत आसानी से हासिल नहीं होती है। इसके लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। समय के साथ-साथ लगन भी बहुत जरूरी होती है। यदि कोई व्यक्ति सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा है, तो इसका यही मतलब है कि उसने पूरा सफर तय किया है। बिना सफर तय किए कोई उस स्थान तक नहीं पहुंच सकता है।  इस संदर्भ में एक शिष्य की कथा है। किसी राज्य में एक गुरुकुल संचालित किया जा रहा था। 

गुरु का एक शिष्य नवदीक्षित हुआ था। अपने गुरु की ख्याति देखकर उसके मन भी आया कि मैं भी क्यों न एक गुरुकुल खोल लूं। मैं भी लोगों को दीक्षित करूं। लोग मुझे भी सम्मान देंगे। एक दिन उसने अपने गुरु के सामने अपने मन की बात को रखते हुए कहा कि गुरुदेव! गुरुदेव, मेरा भी मन करता है कि आपकी ही तरह मेरे भी कई शिष्य हों और सभी मुझे भी आप जैसा ही मान-सम्मान दें। 

अपने शिष्य की बात सुनकर गुरु मंद मंद मुस्कुराने लगे। वह समझ गए कि शिष्य के मन में ख्याति की लालसा पैदा हो गई है। गुरु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा- कई वर्षों की लंबी साधना के पश्चात अपनी योग्यता और विद्वता के बलबूते पर तुम्हें भी एक दिन यह सब प्राप्त हो सकता है। शिष्य ने कहा- इतने वर्षों बाद क्यों? मैं अभी ही अपने शिष्यों को दीक्षा क्यों नहीं दे सकता? गुरु ने अपने शिष्य को तख्त से उतरकर नीचे खड़ा होने को कहा। फिर स्वयं तख्त पर खड़े होकर कहा- जरा मुझे ऊपर वाले तख्त पर पहुंचा दो। 

शिष्य विचार में पड़ गया। फिर बोला- गुरुदेव! भला मैं खुद नीचे खड़ा हूं, फिर आपको ऊपर कैसे पहुंचा सकता हूं? इसके लिए तो पहले खुद मुझे ही ऊपर आना होगा। गुरु ने मुस्कुराकर कहा- ठीक इसी प्रकार यदि तुम किसी को अपना शिष्य बनाकर ऊपर उठाना चाहते हो, तो तुम्हारा उच्च स्तर पर होना भी आवश्यक है। शिष्य गुरु का आशय समझ गया। वह उनके चरणों में गिर गया। 

नीमका जेल में बंदी की हत्या ने खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल


अशोक मिश्र

तबलीगी जमात से जुड़े आतंकी अब्दुल रहमान की फरीदाबाद के नीमका जेल में हत्या हो गई। इस जेल को प्रदेश की सबसे सुरक्षित जेलों में से एक माना जाता है। सुरक्षित कही जाने वाली इस जेल में जम्मू-कश्मीर के 50 से ज्यादा हार्डकोर बंदियों को रखा गया है। यह ऐसे बंदी हैं जिन पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने से लेकर देश के खिलाफ साजिश रचने तक के आरोप हैं। ऐसी सुरक्षित जेल में किसी अपराधी की हत्या हो जाना जेल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। 

आतंकी अब्दुल रहमान को स्पेशल सेल में रखा गया था जिसमें  हत्या का आरोपी अरुण चौधरी भी बंद था। इन दोनों के अलावा एक और बंदी सोहेब रियाज भी था। कहा जा रहा है कि हत्या के आरोप में बंद अरुण चौधरी ने रहमान की हत्या के लिए पहले एक पत्थर को खोजा, फिर उसे नुकीला बनाया और फिर उस नुकीले पत्थर को सर पर मारकर हत्या कर दी। संदिग्ध आतंकी अब्दुल रहमान की हत्या के आरोपी पर पहले से ही हत्या का मुकदमा चल रहा था। 

उसे अक्टूबर 2024 में जम्मू-कश्मीर की कठुआ जेल से फरीदाबाद की नीमका जेल में ट्रांसफर किया गया था। मारे गए संदिग्ध आतंकी रहमान के मामले में अभी तक एक भी गवाही नहीं हुई है, ऐसा कहा जा रहा है। रहमान को गुजरात एसटीएस और हरियाणा एसटीएस के संयुक्त प्रयास से 2 मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया था। रहमान पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के साथ-साथ अयोध्या में बने राम मंदिर को उड़ाने की साजिश रचने का भी आरोप था। 

जांच में पता चला था कि अब्दुल लगभग डेढ़ साल तक सोशल मीडिया पर भड़काऊ वीडियो अपलोड करता था। जब सोशल मीडिया एकाउंट बंद कर दिया गया, तो उसने इंस्टाग्राम पर भड़काऊ वीडियो डालना शुरू कर दिया था। इसके बाद इसकी गतिविधियों पर पुलिस की नजर पड़ी और गुजरात एसटीएस के साथ हरियाणा एसटीएस ने संयुक्त टीम बनाकर इसे गिरफ्तार कर लिया था। नीमका जेल में इससे पहले भी कई तरह की अनियमितताएं पाई गई थीं। नीमका जेल में 19 जून 2013 में पांच-पांच हजार रुपये लेकर बाहर से दो मोबाइल और चार्जर मंगाने का आरोप जेल वार्डन पर लगा था। 

इसके कुछ ही दिन बाद दो बंदियों के पास से दो मोबाइल फोन, चार्जर, सिम और बैटरी बरामद हुई थी। दिसंबर 2019 में भी इसी तरह की घटना नीमका जेल में हुई थी। क्राइम ब्रांच पुलिस ने कई घंटे की खोजबीन के बाद पांच मोबाइल फोन और तीन सिम कार्ड बरामद किए थे। इसी जेल में जून 2011 में दो कुख्यात अपराधी आपस में लड़ बैठे थे। इस घटना के विरोध में एक बंदी के परिवार वालों ने जेल के बाहर प्रदर्शन भी किया था। ऐसी सुरक्षित जेल में किसी बंदी की हत्या हो जाना सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल देती है।

Tuesday, February 10, 2026

साधु ने कहा, मैं तो प्रेम करना जानता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सम्राट अशोक का सगा भाई तो तिष्य था, लेकिन सौतेले भाइयों को मिलाकर सौ भाई बताए जाते हैं। सम्राट बिंदुसार का सबसे बड़ा भाई सुसीम था। बिंदुसार युवराज सुसीम को ही उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। लेकिन अशोक खुद सम्राट बनना चाहता था। सुसीम तक्षसिला का राज्यपाल था। वह खुद अशोक से घृणा करता था। लेकिन सत्ता संघर्ष में उसने सुसीम की हत्या कर दी थी। 

जब सुसीम की हत्या हुई थी, तब उसकी पत्नी गर्भवती थी। कहा तो यह जाता है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर दी थी। इसीलिए उसे चंड अशोक कहा जाने लगा था। कलिंग युद्ध के बाद हुए रक्तपात को देखकर अशोक का मन व्यथित हो उठा। वह बेचैनी में इधर उधर भटकने लगा। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। एक दिन वह बाग में बैठा हुआ था। 

उसने देखा कि एक युवा साधु के चेहरे पर असीम शांति है। उसका चेहरा चमक रहा था। अशोक उसके पास गया, तो साधु से परिचय पूछा। उस युवा साधु ने कहा कि मैं निग्रोध कुमार हूं। सुसीम का पुत्र। जब आपने मेरे पिता की हत्या की थी, तब मैं अपनी मां के गर्भ में था। उसके बाद मेरी मां को काफी भटकना पड़ा। मेरी मां को एक बौद्ध भिक्षु ने शरण दी। मेरा जन्म वहीं हुआ। अशोक ने कहा कि तब तो तुम मुझ से घृणा करते होगे। 

उस साधु ने कहा कि घृणा क्या होती है, यह मैं नहीं जानता हूं। मैं तो प्रेम करना जानता हूं। मैं समस्त प्राणियों को प्रेम करता हूं। अशोक ने कहा कि मुझे माफ कर दो। मेरे मन को शांति नहीं मिल रही है। साधु ने कहा कि तुम बुद्ध की शरण में जाओ। वहीं शांति संभव है। इसके बाद अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उसने लोककल्याण के लिए बहुत सारे काम किए। तब उसे प्रियदर्शी अशोक के नाम से जाना गया।

सूरजकुंड हादसे की जांच के लिए कमेटी गठित, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में चल रहा अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर हस्तशिल्प मेले में शनिवार को झूला टूटने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। शनिवार को हुए हादसे में इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद की मौत हो गई और 13 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद मार्च में ही सेवानिवृत्त होने वाले थे। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि प्रारंभिक जांच में झूले में गड़बड़ी पाई गई है। 

सुरक्षा व्यवस्था की जांच के लिए विभिन्न विभागों के अधिकारियों की एक नौ सदस्यीय कमेटी बनाई गई थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि कमेटी ने मेले में लगने वाले झूलों की जांच ही नहीं की। जिस मेले में देश-विदेश से सैलानियों के लिए सुरक्षित बताया जा रहा था, उसी मेले में हुआ यह हादसा सारी व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। कहा जा रहा है कि मेले में लगने वाले झूलों और अन्य मशीनों की रोज चेकिंग होनी थी। लेकिन इस मामले में काफी लापरवाही बरती गई। नियम बताते हैं कि किसी भी जगह पर जब कोई भारी झूला लगाया जाता है, तो उस जगह की मिट्टी की जांच की जाती है। 

यह पता लगाया जाता है कि झूले की नींव कितनी टिकाऊ होगी। मेला शुरू होने से पहले मिट्टी की जांच हुई थी या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है। कहा तो यही जा रहा है कि हरियाणा टूरिज्म ने मानकों पर ध्यान ही नहीं दिया। जिस जगह पर झूला लगाया गया था, उस जगह की मिट्टी भुरभुरी बताई जा रही है। ऐसी जमीन पर मजबूती के साथ झूला लगा पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि सरकार ने हादसे की जांच के लिए कमेटी बना दी है। यह कमेटी जल्दी ही अपनी रिपोर्ट पेश कर देगी। 

हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, ऐसी आशा है। दरअसल, जितने बड़े पैमाने पर सूरजकुंड मेला आयोजित किया जा रहा है, उसके लिए बहुत अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। सूरजकुंड मेले में प्रति दिन हजारों लोग आते हैं। लोग मेले में खरीदारी करने आते हैं। इसी बहाने वह अपना मन बहलाव करते हैं। झूले और अन्य आयोजनों के जरिये मनोरंजन करना उनका मुख्य उद्देश्य होता है। मेले में आयोजित होने वाले विभिन्न तरह के कार्यक्रमों को देखकर वह प्रसन्न होते हैं। 

मेले में आने वाले लोग दूसरे प्रांतों के लोगों से मिलकर उनके बारे में जानकारी हासिल करते हैं। वहीं दूसरे प्रदेश के लोग भी हरियाणा की कला, संस्कृति और खानपान से परिचित होते हैं। सूरजकुंड मेले को देखकर ऐसा लगने लगता है कि  एक छोटा भारत यहां बसा दिया गया हो। ऐसी स्थिति में विभिन्न संस्कृतियों के मेल-मिलाप से देशभक्ति की भावना प्रबल होती है। ऐसे महत्वपूर्ण अवसर पर यदि कोई हादसा हो जाए, तो लोगों में भय का संचार होता है और वह मेले में आने से परहेज करने लगते हैं।

Monday, February 9, 2026

संकट में भी साथ नहीं छोड़ता सच्चा मित्र


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संस्कृत साहित्य में कहा गया है कि सच्चा दोस्त संकट के समय में अपने मित्र का साथ नहीं छोड़ता है। सच्चा मित्र सभी तरह के पाप कर्म से दूर रखता है, लेकिन हितकारी कामों को करने के लिए उत्साहित करता है। ऐसे ही एक सच्चे दोस्त की एक कथा है। किसी राज्य के राजा ने घोषणा की कि राज कुमार को देश निकाला दिया जाता है। जो भी व्यक्ति राज कुमार का पक्ष लेगा या फिर उसकी सहायता करता हुआ पाया जाएगा, उसको कठोर दंड दिया जाएगा।

 यह घोषणा सुनकर राजकुमार चकित रह गया। उसको दुख भी हुआ कि उसने कोई ऐसा अपराध भी नहीं किया है जिसकी वजह से उसके पिता ने उसे ऐसा कठोर दंड दिया है। राजकुमार के तीन परम प्रिय मित्र थे। वह ऐसे कठिन समय में सहायता मांगने एक मित्र के पास पहुंचा। मित्र ने उसे देखते ही दरवाजा बंद कर लिया और कहा कि मैं कोई सहायता नहीं कर सकता। 

दूसरे मित्र ने कहा कि कहीं भी जाने के लिए मेरा घोड़ा ले जाओ। इससे ज्यादा मदद नहीं कर सकता हूं। जब राजकुमार अपने तीसरे मित्र के पास पहुंचा, तो उसके मित्र ने राजकुमार का स्वागत करते हुए कहा कि मैं हर हालत में तुम्हारे साथ हूं। लेकिन एक बार चलकर राजा से पूछ लिया जाए कि उन्होंने ऐसा आदेश दिया क्यों? दोनों राजा के पास पहुंचे। 

उन्हें देखते ही राजा ने राजकुमार के मित्र कहा कि तुम्हें मालूम है कि क्या सजा मिलेगी? मित्र ने कहा कि आप जो भी सजा देंगे, मंजूर है, लेकिन यह तो बताएं राजकुमार का अपराध क्या है? राजा ने कहा कि मैं अब राजकुमार को गद्दी सौंपने की सोच रहा था। जिसके साथ एक सच्चा मित्र होता है, वह जीवन में सफल होता है। राजकुमार के राजा बनने पर तुम मंत्री बनोगे।

खिलाड़ियों की डाइट ही नहीं होगी पौष्टिक, तो कैसे करेंगे मुकाबला


अशोक मिश्र

खेल और युद्ध के बीच बहुत ही गहरा संबंध हैं। पहले खेल शुरू हुए या युद्ध, यह कह पाना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन यह सही है कि प्राचीन काल में खेल भी युद्ध का ही एक प्रारूप हुआ करते थे। दोनों में अंतर केवल इतना है कि खेल एक निश्चित नियम और सौहार्दपूर्ण भावना से जुड़े होते हैं, लेकिन युद्ध का वैसे तो कोई नियम नहीं होता है और यह मानवघाती भी होता है। खिलाड़ी का एक ही लक्ष्य होता है प्रतिद्वंद्वी को हर हालत में पराजित करना, लेकिन युद्ध में प्रतिद्वंद्वी को मौत के घाट उतारना एकमात्र लक्ष्य होता है। ऐसी स्थिति में खिलाड़ियों को विशेष खानपान की जरूरत होती है। 

अपने प्रतिस्पर्धी को हराने में वह तभी सक्षम होंगे, जब वह हष्टपुष्ट और शारीरिक-मानसिक रूप से सक्षम होंगे। हरियाणा सरकार ने करीब एक साल पहले खिलाड़ियों की डाइट मनी में पांच सौ रुपये की बढ़ोतरी का ऐलान किया था, लेकिन हकीकत में यह बढ़ोतरी आज तक नहीं हुई है। एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश की डेढ़ हजार खेल नर्सरियों में साढ़े सैंतीस हजार खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं। 

ऐसी स्थिति में इन खिलाड़ियों को अपनी खुराक को संतुलित रखने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यह बात सही है कि हरियाणा ने देशी और विदेशी खेल प्रतिस्पर्धाओं में देश में सबसे ज्यादा पदक जीते हैं। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदेश के खिलाड़ियों ने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। सबसे ज्यादा पदक जीते हैं, लेकिन यदि इन खिलाड़ियों को अच्छी डाइट नहीं मिलेगी, तो यह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे करेंगे। इतना ही नहीं, इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने वाले प्रशिक्षकों (कोचों) के वेतनमान में वृद्धि का ऐलान सरकार ने किया था। इन कोचों के वेतनमान में अभी तक कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। 

प्रदेश में संचालित डेढ़ हजार खेल नर्सरियों में से एक हजार नर्सरियों का संचालन निजी तौर पर होता है। इन एक हजार खेल नर्सरियों का संचालन निजी संस्थाएं और पंचायतों द्वारा होता है। यदि सरकार इन प्रशिक्षकों का वेतनमान समय पर बढ़ा दिया गया होता, तो शायद यह कोच अपने खिलाड़ियों को बड़े उत्साह के साथ प्रशिक्षण देते। राज्य सरकार ने कनिष्ठ प्रशिक्षकों का वेतन बीस हजार से पच्चीस हजार और वरिष्ठ प्रशिक्षकों का वेतन 25 हजार से तीस हजार करने का वायदा किया था, लेकिन अभी तक वायदा पूरा न होने की वजह से प्रशिक्षकों में भारी असंतोष है। 

सरकारी अधिकारियों की कामकाज में लापरवाही का आलम यह है कि पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की घोषणा प्रदेश सरकार ने 2024-25 में की थी, यह खेल नर्सरियां आजतक नहीं खोली जा सकी हैं। पांच सौ खेल नर्सरियों को खोलने की फाइल खेल विभाग, वित्त विभाग और सीएमओ के बीच घूम रही है।