बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
राजगृह में तीर्थंकर महावीर का प्रवचन चल रहा था। निशब्द होकर सभी लोग प्रवचन सुन रहे थे। सभा में सम्राट श्रेणिक, महामंत्री अभय कुमार आदि गणमान्य लोगों के साथ नागरिक भी उपस्थित थे। तभी एक वृुद्ध ने प्रवेश किया। उसके शरीर पर जीर्ण-शीर्ण वस्त्र थे। उसके शरीर में कुष्ठ रोग के मवाद से दुर्गंध निकल रही थी। वह महावीर को प्रणाम किए बिना सम्राट श्रेणिक के सामने आ खड़ा हुआ।
उसने सम्राट श्रेणिक से कहा, आयुष्मान आप जीते रहें। इसके बाद वह तीर्थंकर की ओर घूमा और कहा, आप शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त करें। इसके बाद वह लाठी टेकता हुआ महामंत्री के पास पहुंचा और कहा, तुम चाहे जियो, चाहे मरो। तत्पश्चात वह घूमा और राजगृह के कसाई काल शौकरिक के पास पहुंचा और बोला, शौकरिक, तुम न मरो, न जियो। इतना कहकर वृुद्ध बाहर चला गया।
सब लोग आश्चर्यचकित थे। तब महावीर ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, स्वयं महादिदेव विवेक थे। उन्होंने सम्राट से कहा, आप जीते रहें। इसका मतलब यह है कि आपके सामने सारा ऐश्वर्य है, मरने के बाद दुख ही दुख है। इसलिए आपका जीना ही उचित है। मेरे बारे में उन्होंने कहा कि मैं मर जाऊं क्योंकि वह मेरे शरीर को एक बंधन मानते हैं।
महामंत्री से उन्होंने कहा कि चाहे जियो, चाहे मरो। इसका मतलब यह है कि महामंत्री अपने कार्य को निष्ठा पूर्वक संपन्न कर रहे हैं। आगे भी इनके सामने सुख ही सुख होंगे। इसलिए इनका मरना जीना एक समान है। कसाई शौकरिक का जीवन पाप पूर्ण है, उसे अगले जन्म में भी दुख ही दुख मिलेगा। तुम इस जन्म में भी पाप भोग रहे हो और अगले जन्म में भी तुम्हें पाप भोगना पड़ेगा। महावीर की बात सुनकर सभा में उपस्थित लोगों की आंख खुल गई।