अशोक मिश्र
‘संतन को कहा सीकरी सो काम’जैसी काव्य रचना करने वाले कुंभन दास अष्टछाप के प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। उनका जन्म मथुरा के जमनावतो गांव में 1468 ईस्वी में हुआ माना जाता है। पुराने जमाने के कवि, साहित्यकार और दार्शनिक अपनी रचनाओं में भी अपने बारे में कुछ भी लिखने से परहेज करते थे। ऐसी अवस्था में उनके बारे में बहुत सारी बातें उनके समकालीन लोगों के आधार पर तय करनी पड़ती है।कहा जाता है कि वह अपने गांव में खेती करते थे, उसी से परिवार को गुजारा होता था। खेती से कितनी आय होती रही होगी, इसका अंदाजा आज के किसानों को देखकर लगाया जा सकता है। श्रीनाथ जी के मंदिर में यह रोज नए-नए पद गाकर सुनाया करते थे। इनकी पत्नी के अलावा सात पुत्र, सात पुत्रवधुएं और एक विधवा भतीजी रहती थी। एक बार की बात है। राजा मान सिंह वेष बदलकर कवि कुंभनदास से मिलने पहुंचे।
उस समय वह नहाने के बाद माथे पर तिलक लगाने जा रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी को आवाज देते हुए कहा कि बेटी दर्पण दे जाओ, तिलक लगाना है। संयोग से दर्पण बेटी के हाथ से छूटा और गिरकर टूट गया। बेटी ने दर्पण टूटने की बात कही, तो कुंभनदास ने कहा कि कोई बात नहीं किसी बर्तन में पानी भरकर ले आओ। एक टूटे बर्तन में पानी आने पर उन्होंने प्रतिबिंब देखकर तिलक लगाया।
अगले दिन राजा मान सिंह स्वर्ण जड़ित दर्पण लेकर कुंभनदास के समक्ष उपस्थित हो गए। कुंभनदास ने कहा कि अच्छा तो कल आप ही आए थे। आपका यहां आने का स्वागत है, लेकिन इन बेकार की वस्तुओं को लाने की जरूरत नहीं है। यह सुनकर राजा मान सिंह का हृदय भाव विभोर हो उठा।






