Saturday, February 28, 2026

लोहिया ने अंग्रेजी हुकूमत की खोल दी पोल


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डॉ. राम मनोहर लोहिया को समाजवादी विचारक माना जाता है। उनका जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर जिले में मारवाड़ी बनिया परिवार में हुआ था। जब वह दो साल के थे, तो उनकी माता का निधन हो गया। स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले उनके पिता हीरा लाल लोहिया ने दूसरा विवाह करने की जगह अपने बेटे के पालन पोषण का जिम्मा लिया। 

लोहिया ने बीएचयू से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की और 1929 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले विद्यासागर कालेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह इंग्लैंड चले गए, लेकिन वहां का वातावरण रास नहीं आया। तो वह जर्मनी के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में पीएडी करने चले गए। इस दौरान लोहिया का अपने पिता से पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। 

उनके पिता भारत में अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अत्याचार के बारे में अपने पत्रों में जिक्र किया करते थे। इससे लोहिया के मन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रोष पैदा होता चला गया। उसी दौरान एक घटना घटी। उन्हीं दिनों जिनेवा में लीग आफ नेशन्स का अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में कई देशों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भारत से बीकानेर के महाराज भी अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे। 

अधिवेशन में अंग्रेजी शासन की जमकर प्रशंसा की गई, इस बात को लोहिया बरदाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों की फांसी का उल्लेख किया। इससे दुनिया भर में अंग्रेजी हुकूमत की सच्चाई सबके सामने आई। भारत आने के बाद लोहिया ने स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी और समाजवादी विचारधारा को प्रसारित किया।

खनन मामले में सुप्रीमकोर्ट लेगा पहले विषय विशेषज्ञों की राय


अशोक मिश्र

अरावली पर्वत माला के संबंध में सुप्रीमकोर्ट ने बिलकुल उचित ही कहा है कि जब तक विशेषज्ञों की रिपोर्ट नहीं आ जाती है, तब तक अरावली क्षेत्र में सारी गतिविधियों को यथावत रखा जाए। गुरुवार को अरावली मामले की सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि कोर्ट इस बारे में विशेषज्ञों की राय लेगा कि अरावली क्षेत्र में खनन की इजाजत दी जा सकती है या नहीं। 

यदि खनन की इजाजत दी जा सकती है तो किस स्तर तक खनन की इजाजत दी जा सकती है। अरावली क्षेत्र में होने वाले खनन की देखरेख का जिम्मा किसका रहेगा,यह भी तय करना बहुत जरूरी है। बहरहाल, सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने फैसले की भी समीक्षा करेगा। गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट ने जो कहा है, उससे लगता है कि अरावली क्षेत्र में खनन के मामले को लेकर कोर्ट पूरी तरह गंभीर है और जब तक वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाएगा, देखरेख की जिम्मेदारी तय नहीं हो जाएगी, तब तक वह किसी प्रकार की इजाजत नहीं देगा। 

सुप्रीमकोर्ट के रवैये से पर्यावरण प्रेमी और अरावली को बचाने की मुहिम में लगे लोगों को बहुत बड़ी राहत मिली है।  पिछले साल के नवंबर महीने में सुप्रीमकोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति द्वारा सुझाई गई परिभाषा को स्वीकार कर लिया था। नई परिभाषा के अनुसार, वही पहाड़ियां अरावली क्षेत्र के अंतर्गत मानी जाएंगी जिसकी स्थानीय ऊंचाई सौ मीटर या उससे अधिक हो। साथ ही दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों के पांच सौ मीटर के दायरे में होने पर ही उन्हें अरावली क्षेत्र में माना जाएगा। 

बाद में इस नई परिभाषा को लेकर विवाद पैदा हो गया। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में इसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। कुछ लोगों ने एक बार फिर अरावली क्षेत्र को बचाने के लिए सुप्रीमकोर्ट की ही शरण ली। इसका फायदा भी हुआ। अदालत ने अपने ही फैसले पर रोक लगाते हुए सुनवाई शुरू की है। इस बार की सुनवाई में हर पहलू पर खुद शीर्ष अदालत ध्यान दे रही है। वैसे यह बात सही है कि पिछले कुछ दशकों से अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान की वजह से यहां का जलवायु संतुलन गड़बड़ा गया है। 

इसका कारण अरावली क्षेत्र में दिनोंदिन बढ़ता अतिक्रमण, वनों की अवैध कटाई, अवैध खनन और शहरी संरचना का बढ़ता क्षेत्रफल माना जा रहा है। पिछले दिनों अरावली के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन पर सांकला फाउंडेशन में शोध किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैध खनन, वनों की कटाई और अरावली के इर्द-गिर्द किए गए पक्के निर्माणों ने भूजल रिचार्ज, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला है जिसकी वजह से अरावली पर्वत माला के पारिस्थितिक तंत्र बुरा असर डाला है। 

दरवाजे पर दस्तक दे रही है होली, उठिए ! जी खोलकर स्वागत कीजिए


अशोक मिश्र

लीजिए, वर्ष, महीना, सप्ताह और दिन की पगडंडियां तय करती हुई किसी नवयौवना की तरह होली आपके दरवाजे पर दस्तक दे रही है. उठिए और उसका खुले दिल से स्वागत कीजिए। फागुनी बयार ने आपके तन-मन को पहले से ही मदमस्त कर रखा है, ऐसे में फिर काहे का लिहाज और काहे का संकोच. उठिए, उन्हें प्रेम के रंग से सराबोर कर दीजिए, जिनसे साल भर आपने खुले मन से बात नहीं की है. कई महीने पहले किसी से हुई लड़ाई या 'तू.. तू.. मैं.. मैं' की गांठ अब भी आपके मन में अगर पड़ी हुई है. तो जनाब, उस गांठ को खोलिए और रंग, अबीर और गुलाल लेकर जुट जाइए। होलिकोत्सव मनाने को. फिर देखिए इस बार की होली में आपको कितना मजा आता है. हर साल फागुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला हर्षोल्लास का त्योहार होली इस बात का संदेश देता है कि परेशानियों और संकटों से घबराकर बैठ जाने का नाम नहीं है जिंदगी। जिंदगी तो होली के रंगों की तरह चारों ओर बिखरकर खुद हंसने-मुस्कुराने और लोगों को हंसने-मुस्कुराने पर मजबूर कर देने का नाम है,

जानते हैं, होलिकोत्सव का दूसरा नाम मदनोत्सव है. वैसे तो फाल्गुन का पूरा महीना ही कामदेव यानी मदन को समर्पित है. तन को कंपा देने वाली ठंड कम होते ही मन और तन में एक नए उत्साह का संचरण होने लगता है. फागुन महीने में वातावरण भी सुहावना होता है. न अधिक गर्मी और न ही अधिक सर्दी। बस, इसी लिए आम के साथ-साथ आदमी का मन भी बौराने लगता है। कहते हैं कि फागुन के महीने में साठ साल के पोपले मुंह वाले बाबा भी देवर लगने लगते हैं। हंसी ठिठोली, मनोविनोद का एक मदमस्त कर देने वाला दौर चलने लगता है। घूंघट की आड़ से नवयौवनाएं नयनों के तीर इतनी कसकर मारती हैं कि उसके इर्द-गिर्द मंडराने वाले रूप लोलुपों यानी भंवरों के जिगर के आरपार हो जाते हैं नयनों के ये तीर। सामाजिक वर्जनाएं कमजोर होने लगती हैं। मर्यादाओं का स्थान अश्लील गीत संगीत ले लेते हैं। लेकिन यह सब कुछ सिर्फ एक दिन के लिए होता है। कहीं-कहीं पर तो यह सिलसिला पूरे सात आठ दिन तक चलता है। इन दिनों ऐसा लगता है कि आदमी अपनी साल भर में संचित की गई विषय वासनाओं को अंतरमन से उलीच कर फिर साल भर के लिए पाक साफ हो जाना चाहता है। वैसे तो किसी न किसी रूप में होली पूरे देश में मनाई जाती है। 

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड, दिल्ली, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश आदि जगहों पर होली की छटा देखते ही बनती है. लेकिन उत्तर भारत में भी ब्रज (बरसाने की होली) और अवध की होली विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, विभिन्न क्षेत्रों में मनाई जाने वाली होलियों पर उस क्षेत्र में आराध्य देवों के गुणों का भी प्रभाव दिखाई देता है. अब ब्रज यानी बरसाने की होली को ही लें। यहां मनाई जाने वाली होली का रंग ही कुछ निराला है। ब्रज क्षेत्र में मथुरा, वृंदावन, नंदगांव और बरसाना (राधा के गांव) में बड़ी धूमधाम से होली मनाई जाती है. ब्रज क्षेत्र के आराध्य देव हैं कृष्ण. (वैसे तो पूरे देश में श्रीकृष्ण की आराधना-पूजा की जाती है।) ब्रजवासियों के नायक श्रीकृष्ण माखनचोर हैं, गोपियों के साथ रास रचाते हैं, लीलाएं करते हैं। मौका पड़ने पर अपनी मां से झूठ भी बोलते हैं। ऐसे में होली पर उनके इन गुणों का प्रभाव न पड़े, ऐसा हो ही नहीं सकता है। यही वजह है कि यहां के गीतों, लोकगीतों और फागों में मस्ती का पुट तो होता ही है, अश्लीलता भी खूब घुली-मिली होती है। ब्रज साहित्य में होली से जुड़े जितनी रचनाएं मिलती हैं, उनका एक अलग ही रंग है, ब्रज क्षेत्र में फागुन पूर्णिमा से पहले और उसके बाद आठ दिन तक महिलाओं, युवतियों, बच्चों, बूढ़ों और युवकों की भीड़ जो धमाल मचाती है, वह देखते ही बनता है। यहां की होलिकोत्सव में रंगों का इस्तेमाल तो होता ही है, अश्लील गीतों की भी भरमार होती है। 'नैन नचाय कहयो मुस्काय लला फिर अड़यो खेलन होरी...' जैसे गीत अब कहां सुनने को मिलते हैं। बड़े-बड़े डेक या लाउडस्पीकर लगाकर ऐसे-ऐसे गीत बजाए जाते हैं कि शर्म से आंखें गड़ जाती हैं. इन गीतों के बजने तक बेटी बाप से, भाई-बहन से आंख चुराने लगते हैं।

बरसाने की लठमार होली का कहना ही क्या है। पुरुष साल भर तक अपनी प्रियतमा की एक लाठी खाने का इंतजार करते हैं। होलिकोत्सव के दिन उनकी प्रियतमा भी बिना किसी लाज-शर्म के उन पर लाठियां बरसाती रहती है। पुरुष उसकी इस अदा पर सौ-सी जान से कुरबान होता जाता है और लाठियां खाता जाता है। रंगों, फूलों और अबीर-गुलाल से रची-बसी बरसाने की होली देखने तो दूरदराज से लोग आते हैं। विदेशी भी इसे देखने आते हैं, तो वे भी यहां के वातावरण की मस्ती में अपनी सुध-बुध खोकर होली खेलने लगते हैं।

वहीं अवध क्षेत्र के आराध्य देव श्रीराम हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। यही वजह है कि होलिकोत्सव कुछ दशक पहले तक मर्यादित था. लोकगीतों और फागों में एक मधुरता थी, शालीनता थी। अयोध्या के राजा दशरथ, उनकी तीनों रानियों, श्रीराम और उनके सभी भाइयों से संबंधित लोकगीत और फाग गाए जाते थे। इन गीतों और लोकगीतों की रचनाएं कब हुई, नहीं कहा जा सकता है। हां, गोस्वामी तुलसी की होली से संबंधित रचनाएं भी खूब गाई जाती थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे उसमें भी अश्लीलता और भौंडेपन का समावेश होने लगा है। आधुनिक परिवेश में होली का वह लालित्य कहीं खो सा गया है, जो आज से चार-पांच दशक पहले पूरे देश में देखने को मिलता था।

होली का उल्लास भी अब कुछ धीमा पड़ने लगा है। महंगाई ने होली के उल्लास को निगल सा लिया है। इन दिनों होली के नाम पर इतने आडंबर रखे जाने लगे हैं कि लोग उन आडंबरों के लिए अपने दैनिक खर्चों में कटौती करके भी उसे पूरा नहीं कर पाते हैं। शराब, मिठाइयों और अन्य दूसरे मद में खूब पैसा खर्च किया जाने लगा है। नशा करके होली मनाने की लत ने होलिकोत्सव की मस्ती को जैसे खत्म ही कर दिया है। नशे में झूमती युवकों की भीड़ से बचकर निकल जाने में ही अब लोग भलाई समझने लगे हैं। यदि हम नशे का सेवन किए बिना होलिकोत्सव मनाते हैं, उससे कहीं ज्यादा खुशी मिलती है। इन तमाम परेशानियों और दिक्कतों के बावजूद आइए, हम खुले मन से होली मनाएं। प्रेम के रंग में खुद तो सराबोर हों ही, दूसरों को भी उसी रंग से सराबोर कर दें।

Friday, February 27, 2026

सज्जन की उपाधि खरीदी या बेची नहीं जा सकती

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया के इतिहास में एक ऐसा भी राजा हुआ है जिसने उपाधियां पैसे लेकर बांटी थी। ऐसे राजा का नाम है जेम्स चार्ल्स स्टुअर्ट। इनका जन्म  सन 1566 में हुआ था। स्टुअर्ट एक लेखक भी थे। उन्होंने डेमोनोलॉजी (1597) और बेसिलिकॉन डोरॉन (1599) जैसी रचनाएँ लिखीं। उनके द्वारा प्रायोजित बाइबिल का अंग्रेजी अनुवाद 'किंग जेम्स संस्करण' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 

एलिजाबेथ प्रथम के निधन के बाद उन्हें राजगद्दी मिली थी, लेकिन बाद में वह स्कॉटलैंड, ब्रिटेन और आयरलैंड के शासक बने। तभी से उन्होंने अपने को ग्रेट ब्रिटेन का राजा कहना शुरू किया। यह तो सभी जानते हैं कि शासन व्यवस्था चलाने के लिए काफी धन की जरूरत होती है। 

राजकोष का धन बढ़ाने के लिए उन्होंने कई उपाय किए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसलिए उन्होंने लोगों से मोटी रकम लेकर उपाधियां बांटनी शुरू की। उन्होंने बहुत सारे लोगों को लॉर्ड, ड्यूक, प्रिंस जैसी तमाम उपाधियां पैसे लेकर बांटी। वह इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि इन उपाधियों को हासिल करने वाला व्यक्ति समाज में अपने अहंकार को तुष्ट करना चाहता है। 

उपाधि हासिल कर लेने से कोई महान नहीं हो जाता है। एक दिन वह दरबार मं बैठे तो एक आदमी ने आकर उनसे कहा कि  उसे सज्जन की उपाधि चाहिए। इसके लिए चाहे जितनी रकम खर्च करनी पड़े। स्टूअर्ट ने कहा कि मैं तुम्हें राजवंश से जुड़ी उपाधियां दे सकता हूं। तुम्हें लॉर्ड बना सकता हूं, ड्यूक बना सकता हूं, लेकिन सज्जन की उपाधि नहीं दे सकता हूं क्योंकि सज्जनता खरीदी या बेची नहीं सजा सकती है। इसे अपने कर्म और व्यवहार से कमाना पड़ता है। वह आदमी निराश होकर चला गया।

हरियाणा में सीएमश्री स्कूलों से गरीब बच्चों का सुधरेगा भविष्य


अशोक मिश्र

बेरोजगारी को छोड़कर देश में रहने वाले नागरिकों की दो प्रमुख समस्याएं हैं। पहली स्वास्थ्य और दूसरा शिक्षा। देश की बहुसंख्यक आबादी को स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का दंश झेलना पड़ता है। वहीं अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर भी उन्हें चिंतित होना पड़ता है। नागरिकों की शिक्षा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए सैनी सरकार ने सीएमश्री स्कूलों को खोलने की योजना तैयार की है। 

प्रदेश में पहले से ही 252 पीएमश्री स्कूल संचालित हैं। फिलहाल तो योजना के मुताबिक सीएमश्री स्कूल नए नहीं खोले जाएंगे, बल्कि जो सरकारी विद्यालय बंद हो गए हैं या कुछ सरकारी स्कूलों को ही अपग्रेड करके उन्हें सीएमश्री स्कूल बनाया जाएगा। इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में से 25 प्रतिशत गरीब छात्रों को मौका दिया जाएगा। इन्हें मुफ्त शिक्षा दी जाएगी। बाकी 75 प्रतिशत बच्चों से भी कम फीस ली जाएगी। वैसे यह योजना तो बहुत अच्छी है। 

यदि सरकारी स्कूलों को अपग्रेड कर दिया जाए, उनमें सुविधाएं बढ़ा दी जाएं, तो गरीब बच्चों को यहां पढ़ने की सुविधा मिलने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा। गरीब बच्चों को वैसे भी शिक्षा हासिल करने में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा का स्तर उठाने के लिए प्रदेश सरकार ने स्कूलों में नौ हजार से अधिक कमरे बनवाकर ढांचागत सुधार किए हैं, तो वहीं 'सीएम शाइन' जैसी पहल भी शुरू की गई है। इसके बावजूद सैनी सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। 

राज्य के सरकारी स्कूलों में 40 हजार से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं। इन पदों पर भर्तियां की जाएं, तो बच्चों की शिक्षा पूरी हो सकेगी। लगभग 298 स्कूलों में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है और 1,051 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर कैसा होगा, इसको समझा जा सकता है। यही नहीं, विभिन्न कक्षाओं के परिणाम शून्य रहने जैसी गंभीर चुनौतियां भी मौजूद हैं। पिछले सात वर्षों में 400 स्कूल मर्ज या बंद हुए हैं और लगभग पांच हजार कंप्यूटर लैब में इंटरनेट नहीं है। वैसे तो प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में सभी सुविधाएं होने का दावा करती है, लेकिन इस बात में आंशिक सच्चाई है। 

स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं की 18 प्रतिशत और शौचालयों की एक से दो प्रतिशत तक कमी है। जिन स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है, उन स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की परेशानी का समझा जा सकता है। अलग से लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था न होने की वजह से लड़कियां स्कूल आने से कतराने लगती हैं। कुछ लड़कियां तो स्कूल आना ही छोड़ देती हैं। कई स्कूलों की इमारतें काफी पुरानी हो चुकी हैं। ऐसे स्कूलों में हादसे का डर बना रहता है। बरसात के दिनों में यह डर और भी बढ़ जाता है।

Thursday, February 26, 2026

अमेरिका के संस्थापकों में से एक थे फ्रैंकलिन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बेंजामिन फ्रैंकलिन को अमेरिका के संस्थापकों में से एक माना जाता है। वह वैज्ञानिक होने के साथ-साथ लेखक, व्यंग्यकार, उद्यमी और राजनेता भी थे। उनका जन्म छह जनवरी 1706 में बोस्टन में हुआ था। उन्होंने बिजली की छड़, बाईफोकल्स, फ्रैंकलिन स्टोव, गाड़ी के ओडोमीटर और ग्लास 'आर्मोनिका' का आविष्कार किया। बेंजामिन के पिता जोशिया फ्रेंकलिन ने दो शादियां की थीं। 

दोनों पत्नियों से कुल मिलाकर उनकी 17 संतानें थीं। बेंजामिन के दस सगे भाई-बहन थे और वह अपनी मां के आखिरी पुत्र थे। बेंजामिन की अपने भाई जेम्स से नहीं पटती थी। जेम्स हमेशा बेंजामिन को लेकर कुछ न कुछ ताने मारता रहता था। इससे परेशान होकर बेंजामिन बोस्टन से भागकर फिलाडेल्फिया आ गया। 

फिलाडेल्फिया में उन्होंने काम पाने के लिए कई जगह हाथ-पांव मारे, लेकिन बात बनी नहीं। काम की तलाश में एक दिन बेंजामिन एक ऐसे प्रिंटर्स के यहां पहुंचे जिसके यहां कामकाज बंद पड़ा था। उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस से मालिक से काम मांगा, तो उसने कहा कि मेरी एक मशीन ंबंद पड़ी है। बेंजामिन ने मशीन देखने के बाद कहा कि इसे ठीक करने में दिन भर लग जाएगा, मैं पूरी दिहाड़ी लूंगा। 

मालिक मान गया। लेकिन बेंजामिन ने दोपहर में ही मशीन को ठीक कर दिया। मालिक ने जब पूरी दिहाड़ी दी, तो आधी दिहाड़ी वापस करते हुए कहा कि मेरा मेहनताना इतना ही बनता है। उनकी इस ईमानदारी से प्रिटिंग प्रेस का मालिक बहुत प्रभावित हुआ। उसने दूसरी मशीन ठीक करने को कहा। इस तरह परिश्रम करते हुए अंत में वह वैज्ञानिक, राजनेता,लेखक बन गए। उन्होंने 17 अप्रैल 1790 में दुनिया को अलविदा कह दिया।

कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है हरियाणा को नशामुक्त बनाना


अशोक मिश्र

मंगलवार को पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि पड़ोसी राज्य हरियाणा में नशीली दवाओं की बिक्री चिंता का विषय है। यह सच है कि हरियाणा में नशीले पदार्थोँ की बिक्री हो रही है, लेकिन कम से कम पंजाब को हरियाणा पर यह आरोप लगाने का हक नहीं है। पंजाब का नाम ही नशीले पदार्थों की बिक्री की वजह से ‘उड़ता पंजाब’ काफी पहले ही पड़ चुका था। नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले सपनों की रंगीन दुनिया में उड़ने लगते हैं, इसलिए नशे में डूबे रहने वाली अधिसंख्य आबादी की वजह से उस प्रदेश के नाम के साथ उड़ता शब्द जोड़ दिया जाता है। 

हरियाणा सरकार इस बात का भरसक प्रयास कर रही है कि राज्य से नशीले पदार्थों का समूल नाश कर दिया जाए। पंजाब में सक्रिय ड्रग माफिया हरियाणा में भी अपना नेटवर्ककायम किए हुए हैं। उधर राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी नशीले पदार्थ हरियाणा में आ रहे हैं। अफीम और पोस्त का छिलका राजस्थान, झारखंड,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से ही ज्यादातर आ रहे हैं। गांजा भांग की आपूर्ति हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों से हो रही है। इन दोनों प्रदेशों में अवैध रूप से गांजा ज्यादा पैदा किया जाता है। 

नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले लोग बड़े पैमाने पर हरियाणा में लाकर युवाओं को नशे का आदी बना रहे हैं। वैसे राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन के साथ-साथ स्वयंसेवी संस्थाएं बड़े पैमाने पर राज्य में नशामुक्ति अभियान चला रही हैं। स्कूल कालेजों और यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को खासतौर पर फोकस किया जा रहा है। उन्हें नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। 

स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों के आसपास नशीले पदार्थ बेचने वाले लोगों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। जिला स्तर पर खेल परिसरों और स्टेडियम पर भी पुलिस और नारकोटिक्स डिपार्टमेंट की निगाह रहती है। खिलाड़ियों पर भी नजर रखी जा रही है ताकि वह नशे के आदी बनकर अपना जीवन और करियर बरबाद न कर लें। राज्य सरकार ने जिलों में संचालित होने वाले अवैध वेलनेस सेंटरों पर भी कड़ी निगाह रखने का सख्त आदेश दिया है। 

संबंधित विभागों को निर्देश दिया जा चुका है कि वह जल्दी से जल्दी इन अवैध वेलनेस सेंटरों की जांच करके रिपोर्ट पेश करें। राज्य में नशे के कारोबार को रोकने के लिए पुलिस और नारकोटिक्स विभाग को अपना नेटवर्कबढ़ाना होगा। शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में भी नशीले पदार्थ का कारोबार बढ़ रहा है। नशा माफिया नशीले पदार्थ की सप्लाई और बिक्री के लिए महिलाओं का सहारा ले रहे हैं। इसका कारण यह है कि महिलाओं पर लोगों और प्रशासन का शक कम होता है। महिलाएं बड़ी चतुरता से नशीले पदार्थ की सप्लाई कर देती हैं।

Wednesday, February 25, 2026

ब्राह्मण की मदद करने को खतरे में डाला जीवन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

छत्रपति शिवाजी में युद्ध नीति बनाने की असाधारण प्रतिभा थी। उनका जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। उनके पिता शाहजी राजे भोसले एक शक्तिशाली सामंत परिवार में जन्मे थे। शाहजी राजे की दो पत्नियां थीं। शिवाजी की माता जीजाबाई ने ही अपने पुत्र का पालन-पोषण किया था। 

बचपन से ही जीजाबाई ने अपने बेटे को युद्ध और रणनीति बनाने की शिक्षा दी थी। यह उस युग की मांग थी। शिवाजी का 1674 में रायगढ़ में राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति की उपाधि धारण की थी। उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब से कई लड़ाइयां लड़ी थीं। एक बार की बात है। मुगलों की सेना से बचने के लिए वह वेष बदलकर गांव-गांव घूम रहे थे। 

एक दिन वह एक ब्राह्मण के यहां रहने गए। ब्राह्मण काफी गरीब था। उसको अपना और अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन उसने शिवाजी को प्रतिदिन भरपेट भोजन कराया। कई दिनों तक वह खुद भूखा रहा। जब यह बात शिवाजी को पता चली, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। वह सोचने लगे कि इस ब्राह्मण की कैसे मदद की जाए। उन्होंने वहां के एक मुगल सूबेदार को पत्र लिखा कि इस ब्राह्मण के घर में शिवाजी छिपे हुए हैं। 

शिवाजी को गिरफ्तार कर लो, लेकिन इस ब्राह्मण को दो हजार अशर्फियां दे दो। मुगल सूबेदार ने दो हजार अशर्फियां देने के बाद शिवाजी को गिरफ्तार कर लिया। जब यह बात ब्राह्मण को पता चली तो वह फूटफूटकर रोने लगा। उसी दिन तानाजी ने हमला करके शिवाजी को कैद से छुड़ा लिया। इस तरह अपना जीवन खतरे में डालकर भी शिवाजी ने ब्राह्मण की मदद की। लोगों की मदद करने में शिवाजी हमेशा आगे रहते थे।

विवशता से उपजे क्रोध के कारण बढ़ रही आपराधिक घटनाएं

अशोक मिश्र

अंबाला कैंट में मामूली सी बात को लेकर हुई बहस के दौरान हुए झगड़े में बीच बचाव करने आए एक युवक की हमलावरों ने हत्या कर दी। वैसे तो यह घटना एक सामान्य घटना की ही तरह है। लेकिन इस घटना से आजकल युवाओं में छोटी-छोटी बात पर उग्र रूप धारण कर लेने की प्रवृत्ति का खुलासा होता है। रविवार को अंबाला कैंट के जगाधरी रोड पर सिया वाटिका में शादी रिसेप्शन पार्टी आयोजित की गई थी। सिया वाटिका पैलेस में डेकोरेशन का काम जसराज उर्फ जस्सा को मिला था। 

रविवार होने की वजह से अंबाला के जैन स्कूल में ड्राइवर का काम करने वाला सोनू भी अपने दोस्त जस्सा के साथ वहां आया हुआ था। पार्किंग एरिया में सात-आठ युवकों ने जस्सा को घेर लिया और बहस करने लगे। यह बहस थोड़ी देर में मारपीट में बदल गई। मारपीट होता देख सोनू और भूपेंद्र बीच-बचाव करने आए। हमलावरों ने सोनू को घेर कर चाकू से हमला किया। पीठ में चाकू घोंप देने से सोनू की तत्काल मौत हो गई और भूपेंद्र गंभीर घायल हो गया। हमलावर भाग खड़े हुए। 

लोगों का अनुमान है कि किसी छोटी-मोटी बात को लेकर हमलावरों में से किसी एक के साथ जस्सा की बहस हुई थी। इस बहस ने ही बात में विकराल रूप धारण कर लिया और बात हत्या तक पहुंच गई। पिछले कुछ दशकों से युवा पीढ़ी लगातार उग्र होती जा रही है। मामूली बात पर हत्या कर देने, आत्महत्या कर लेने या फिर मारपीट कर लेने जैसी घटनाएं अब सामान्य रूप से देखने को मिल रही हैं। इसके कई कारण भी बताए जाते हैं। जब से एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है और माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, ऐसी स्थिति में वह अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। 

कम से कम आठ-दस घंटे एकाकी जीवन बिताने वाले बच्चों के मन में अपने परिजनों को लेकर एक आक्रोश पनपने लगता है। ऐसी स्थिति में वह मनमानी करने पर उतारू हो जाते हैं। माता-पिता यदि उनके किसी काम का विरोध करते हैं, तो मन में पहले से ही संचित आक्रोश फूट पड़ता है और वह अपराध कर बैठते हैं। पढ़ाई लिखाई करने के बाद भी जब युवाओं को नौकरी नहीं मिलती है अथवा माता-पिता कोई स्वरोजगार करवा पाने में सक्षम नहीं होते हैं, तो वह अपराध की ओर मुड़ जाते हैं। अपना खर्च चलाने के लिए वह लूटपाट, हत्या, चोरी-डकैती जैसे अपराध में लिप्त हो जाते हैं। 

मोबाइल पर खेले जाने वाले कुछ गेम्स भी युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रहे हैं। वह दिमाग को इतना कुंठित कर देते हैं कि वह सही गलत का फैसला नहीं कर पाते हैं और अपराध कर बैठते हैं। अशिक्षा, गरीबी, बेकारी जैसी समस्याओं ने युवाओं को इतना निराश कर दिया है कि वह अपने को असहाय समझने लगे हैं। इस असहायता से उपजे क्रोध के कारण भी समाज में आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं।

Tuesday, February 24, 2026

चिकित्सक के साथ राजनेता भी थे एंटोनियो एगास मोनिज

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एंटोनियो एगास मोनिज ने अपनी खोजों से मानवता की बहुत सेवा की। उन्होंने मस्तिष्क में होने वाली बीमारियों के इलाज और आपरेशन का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने ल्यूकोटॉमी नामक शल्य क्रिया विकसित की जिससे दिमागी बीमारियों के इलाज का रास्ता खुला। 

मोनिज को बचपन से ही दिमाग के रहस्यों को सुलझाने में दिलचस्पी थी। वह मनुष्य के दिमाग को सबसे रहस्यमय मानते थे। जब बड़े हुए तो भी उनके दिमाग में यही बात आती रही कि दिमाग में होने वाली बीमारियों का इलाज कैसे किया जाए और कैसे पता लगाया जाए कि दिमाग के अमुक हिस्से में परेशानी है। मोनिज का जन्म 29 नवंबर 1874 को पुर्तगाल में हुआ था। 

मोनिज ने स्नातक करने के बाद लिस्बन विश्ववद्यिालय में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर नियुक्त हुए। इसके बाद मोनिज की यात्रा कभी रुकी नहीं। करीब बारह साल तक बार-बार विफल होने के बाद 1927 में उन्होंने सेरेबल एंजियोग्राफी तकनीक विकसि की जिससे मस्तिष्क की रक्त नलिकाओं की तस्वीर लेना संभव हुआ। इस खोज ने चिकित्सा जगत में नई क्रांति लगा दी इससे मस्तिष्क के रोगों का इलाज संभव हो पाया। 

इस नई खोज के लिए सन 1929 में मोनिज को नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। मोनिज को बचपन से ही राजनीति में भी दिलचस्पी थी। वह लोकतंत्र के समर्थक थे। इसके लिए कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सन 1900 में वह सासंद चुने गए। उनका परिवार राजशाही का समर्थक था, लेकिन मोनिज लोकतंत्र समर्थक थे। वह स्पेन के राजदूत भी नियुक्त किए गए। 1917 में वह विदेश मामलों के मंत्री भी बनाए गए। 1919 को उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। 13 दिसंबर 1955 को 81 वर्ष की आयु में चिकित्सक और राजनेता मोनिज की मृत्यु हो गई।