Saturday, May 2, 2026

भिक्षा मांगने के अलावा कोई काम नहीं है क्या?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी रामदास का बचपन का नाम नारायण सूर्याजी पंत ठोसर था। संन्यास ग्रहण करने के बाद उनका नाम स्वामी रामदास रखा गया। उन्हें समर्थ गुरु रामदास के नाम से भी जाना जाता है। वह मराठा वीर छत्रपति शिवाजी के गुरु भी थे। स्वामी रामदास एक कवि, संत और दार्शनिक भी थे। स्वामी रामदास ने दासबोध, आत्माराम, मनोबोध आदि ग्रंथों की रचना की है। 

स्वामी जी का जन्म 1606 में महाराष्ट्र के जालना जिले के जांब गांव में कुलकर्णी ब्राह्मण के यहां हुआ था। इन्होंने बारह साल की उम्र में ही तपस्या शुरू कर दी थी। इनका एक नियम था कि वह प्रतिदिन पांच घर से ही भिक्षा मांगते थे। हर घर से कुछ न कुछ भिक्षा जरूर ग्रहण करते थे। एक दिन की बात है। वह एक घर में भिक्षा मंगाने गए। उस घर में थोड़ी देर पहले पति-पत्नी में लड़ाई हुई थी। 

पत्नी काफी गुस्से में थी। तभी स्वामी रामदास ने भिक्षा के लिए गुहार लगाई। वह महिला गुस्से से बाहर आई और कहा कि तुम लोगों को भिक्षा मांगने के अलावा कोई काम नहीं है क्या? जाओ, मेरे घर से कोई भिक्षा नहीं मिलेगी। स्वामी जी ने शांत भाव से कहा कि मैं भिक्षा जरूर लेकर जाऊंगा। उस समय महिला कमरे में पोछा लगा रहा थी। वह पोछा लगाने वाला कपड़ा लेकर आई और उनके भिक्षा पात्र में डाल दिया। 

स्वामी जी प्रसन्न मन से उस कपड़े को लेकर नदी के किनारे गए। उसे अच्छी तरह से साफ किया, सुखाया  और उसे लेकर मंदिर में आ गए। उस कपड़े की बाती बनाकर मंदिर में दिया जला दिया। उधर वह महिला स्वामी जी के जाने के बाद बहुत पछताई। 

वह  उन्हें खोजते हुए मंदिर पहुंची और चरणों में गिरकर कहा कि मैंने आप जैसे महापुरुष को भला बुरा कहा, मुझे माफ कर दें। स्वामी जी ने कहा किआज मुझे आपने बहुत अच्छी भिक्षा दी। अनाज देतीं तो मेरे ही काम आता। इससे काफी लोगों का भला हुआ।

सीमित संसाधन और कर्मियों की भारी कमी, कैसे बुझेगी आग?

अशोक मिश्र

पूरे उत्तर भारत में प्रचंड गर्मी पड़ रही है। लोग व्याकुल हैं। पशु-पक्षी भी प्रचंड गर्मी की वजह से परेशान हैं। इसी बीच गर्मी के सीजन में अचानक लग जाने वाली आग से न केवल लोगों की संपत्ति का नुकसान हो रहा है, बल्कि कई बार आग लगने की घटना में जान भी चली जाती है। अत्यधिक गर्मी की वजह से आग बड़ी आसानी से लग जाती है। किसी किसी के घर, कारखाने या आफिस में शार्ट सर्किट होने पर निकलने वाली चिन्गारी भयानक रूप अख्तियार कर रही है। खेतों में रखा गेहूं का अवशेष किसी की लापरवाही से प्रचंड रूप धारण कर रहा है।

किसी ने बीड़ी या सिगरेट पी और लापरवाही से फेंककर चला गया। बीड़ी या सिगरेट का टुकड़ा जहां गिरा वहां अगर आग पकड़ने वाली वस्तु हुई, तो आग लग जाती है। हरियाणा में पिछले कुछ दिनों से आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। हर जिले में गर्मी के चलते आगजनी की एकाध घटनाएं तो रोज ही घट रही हैं। ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा परेशानी अग्निशमन विभाग को होती है। बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी के बीच औद्योगिक नगरी फरीदाबाद गुरुवार को आग की घटनाएं मुसीबत बन गईं। 

शहर के तीन अलग-अलग इलाकों में आग लगने की घटनाएं सामने आईं। फायर ब्रिगेड बड़ी मशक्कत से आग पर काबू पाया। दो आग की घटनाएं ज्वलनशील पदार्थों से भरे स्थानों में लगी। इससे आग को फैलने और इससे भारी आशंका से लोग डर गए। गनीमत यह रही कि दमकल विभाग की मुस्तैदी से समय रहते आग पर काबू पा लिया गया और किसी की जान नहीं गई। इन हादसों में लाखों रुपये का कच्चा व तैयार माल जलकर खाक हो गया। यह भी सच है कि प्रदेश में अग्निशमन कर्मियों की भारी कम है।

वैसे पूरे प्रदेश में अभी तक केवल 109 सरकारी फायर स्टेशन हैं, जो जनसंख्या और क्षेत्रफल को देखते हुए काफी कम प्रतीत होते हैं। इनमें से भी सबसे ज्यादा शहरी क्षेत्र में फायर स्टेशन हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में इनकी संख्या काफी कम है। प्रदेश में 59 फायर स्टेशन खोले जाएंगे जिसमें से बीस फायर स्टेशन एनसीआर इलाके में खोले जाएंगे। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इन नए फायर स्टेशनों को खोलने की मंजूरी दे चुके हैं। फायर स्टेशन खोलने का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों में लगने वाली आग पर जल्दी  से जल्दी काबू पाना है। 

कई बार यह भी देखने में आया है कि जब किसी खेत या औद्योगिक संस्थान में  आग लग जाती है, तो फायर ब्रिगेड को पहुंचने में काफी देर लगती है। इसका कारण फायर स्टेशन का बहुत दूर होना है। जब फायर ब्रिगेड चलती है, तो रास्ते में पड़ने वाली टूटी फूटी सड़कें, संकरे रास्ते और सड़कों पर हुआ अतिक्रमण उनकी रफ्तार को काफी धीमा कर देते हैं। ऐसी स्थिति जब तक फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंचती है, तब तक फसल या सामान जलकर स्वाहा हो चुका होता है।

Friday, May 1, 2026

बिना चले श्रावस्ती पहुंच सकते हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने आजीवन लोगों को सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह का ही संदेश दिया। उनका कहना था कि आपके पास जितना है, उतने में ही संतोष करो। सत्य बोलने वाले से बढ़कर कोई साहसी नहीं होता है। सत्य बोलना बड़े साहस का काम है। सत्य बोलने वाला ही अहिंसा का मर्म समझ सकता है। 

महात्मा बुद्ध की बातों का प्रभाव लोगों को बहुत पड़ता था क्योंकि वह आम लोगों की भाषा में आम जनजीवन से ही उदाहरण दिया करते थे। एक बार की बात है। वह किसी जगह प्रवचन दे रहे थे। उनका प्रवचन रोज होता था। करीब महीने भर हो गए थे उस स्थान पर प्रवचन देते हुए। 

एक दिन एक व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध से प्रवचन के बाद कहा कि तथागत! मेरे मन में एक जिज्ञासा है। आपका आदेश हो, तो मैं अपनी जिज्ञासा प्रकट करूं।  उसकी बात सुनकर गौतम बुद्ध ने कहा कि हां क्यों नहीं। तुम अपनी जिज्ञासा प्रकट कर सकते हो। बताओ क्या प्रश्न है। उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने आपका उपदेश लगभग एक महीने तक सुना। मुझ पर उसका कोई विशेष असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। 

उस आदमी की बात सुनकर महात्मा बुद्ध ने कहा कि यह बताओ, तुम कहां रहते हो?  उस व्यक्ति ने बताया कि वह श्रावस्ती में रहता है। तथागत ने पूछा कि यह बताओ, तुम श्रावस्ती कैसे जाते हो? उस व्यक्ति ने कहा कि कभी पैदल, तो कभी घोड़े पर आता जाता हूं। बुद्ध ने कहा कि क्या तुम यहां बैठे-बैठे श्रावस्ती पहुंच सकते हो? उस व्यक्ति ने कहा कि बिना चले कोई कैसे श्रावस्ती पहुंच सकता है। 

तब बुद्ध बोले, मेरी बातों को अमल में लाए बिना तुम जीवन में क्या हासिल कर सकते हो? अच्छी बातों को जब तक जीवन में उतारा न जाए, वह बेकार ही रहता है। उस व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध से कहा, भंते! मैं समझ गया कि आप मुझे क्या समझाना चाहते हैं।

क्रेडिट कार्ड के जाल में फंसकर अपना जीवन गंवा रहे नौनिहाल


अशोक मिश्र

आज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदल चुका है। नकदी की जगह प्लास्टिक मनी ने लिया है। लोगों को अब जेब में नकदी लेकर चलने की जरूरत भी नहीं रह गई है। यदि आपके पास डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड है, तो  आपको नकदी की फिक्र करने की आवश्यकता नहीं है। शहरों और कस्बों में लगे एटीएम या फिर आनलाइन कुछ भी खरीद सकते हैं। 

इस प्लास्टिक मनी ने कई तरह की समस्याएं भी पैदा की हैं। इसने लोगों को फिजूलखर्च भी बना दिया है। पहले लोग नकदी को खर्च करने से पहले दस बार सोचते थे, खर्चे का हिसाब-किताब लगाते थे और उसके बाद काफी सोच समझकर खरीदारी करते थे, लेकिन जब से क्रेडिट कार्ड ने अपने पैर फैलाए हैं, तब से खरीदारी की कोई लिमिट ही नहीं रही। लोग बिना कुछ सोचे समझे  अनलिमिटेड खरीदारी कर रहे हैं, पैसा उड़ा रहे हैं। 

इसी का खामियाजा राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के कुछ छात्रों ने भुगता है। सट्टेबाजी और अनलिमिटेड कर्ज ने एनआईटी के चार छात्रों की जान ले ली है। राज्य महिला आयोग ने खुलासा किया है कि आत्महत्या करके अपनी जान देने वाले छात्रों पर क्रेडिट कार्ड के सत्तर हजार रुपये से ज्यादा के कर्ज थे। इस कर्ज को चुकाने के लिए उन्हें दूसरे लोगों से कर्ज लेना पड़ता था। 

इस पर भी 36 प्रतिशत ब्याज भी देना पड़ता है। राज्य महिला आयोग का यह भी कहना है कि एनआईटी परिसर में जितने भी क्रेडिट कार्ड बनाए गए हैं, उसको बनाते समय अभिभावकों की इजाजत नहीं ली गई है। हाल में ही एनआईटी में आत्महत्या करने वाले चारों छात्रों के अभिभावकों का यही कहना है कि उनके बच्चों की मौत के पीछे क्रेडिट कार्ड ही है। एक अभिभावक ने कहा कि उन्होंने कुछ दिनों पहले क्रेडिट कार्ड का कर्ज चुकाने के लिए तीन किस्तों में 75 हजार रुपये दिए थे। इसके बावजूद उनके बेटे ने आत्महत्या कर ली। यह सच है कि लगभग सभी बैंक क्रेडिट कार्ड जारी करते हैं। 

इस क्रेडिट कार्ड से आप बैंक खाते में पैसा न होते हुए भी मनचाही रकम खर्च कर सकते हैं। एक निश्चि अवधि तक इस खर्च की गई रकम पर कोई ब्याज नहीं देना पड़ता है, लेकिन जैसे ही वह निश्चित अवधि बीतती है, बैंक वाले अपनी मनमाफिक ब्याज वसूलते हैं। कई बार तो ब्जाय की रकम ही मूल रकम से दोगुनी-तीनगुनी हो जाती है। एक बार जो क्रेडिट कार्ड के जाल में फंस जाता है, वह मकड़ी के जाले में फंसे जीव की तरह छटपटा तो सकता है, लेकिन उससे निकल नहीं सकता है। 

क्रेडिट कार्ड उन परिवारों के लिए एक मुसीबत साबित हो रहा है जो किसी तरह अपने खर्चों को सीमित करके अपने बेटा-बेटियों को ऐसे संस्थानों में पढ़ने के लिए भेजते हैं। नए माहौल में आने के बाद बच्चों के कदम बहक जाते हैं और वह सट्टेबाजी के साथ-साथ कई तरह के दुर्व्यसनों में लिप्त हो जाते हैं जिसका खामियाजा पूरा परिवार भोगता है।

सोशल मीडिया पर नीम-हकीम खतरा-ए-जान

30 अप्रैल को प्रभात खबर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

अशोक मिश्र

हमारे देश में अब डॉक्टरों की जरूरत ही नहीं रही। सोशल मीडिया पर एक से बढ़कर डॉक्टर मौजूद हैं। एक वीडियो में बाबा टाइप के एक योगी ने कहा कि दिन में दस-दस मिनट तक पांच छह बार अपने हाथ की पांचों अंगुलियों के नाखूनों को आपस में रगड़ो, डायबिटीज बीस दिन में छूमंतर हो जाएगी। सुबह सूर्योदय से पहले पांच मिनट तक नाखूनों को एक दूसरे से रगड़ने पर ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाता है, भले ही ब्लड प्रेशर कितना पुराना हो। अगर किसी माता-बहन का पीरियड अनियमित हो, ज्यादा पीड़ा होती हो, तो बस दिन में तीन बार नाखूनों को आपस में रगड़ो, न केवल पीरियड नियमित हो जाएगा, अगर बाल सफेद हो रहे हों, तो बाल भी पांचवें हफ्ते से काले होने शुरू हो जाएंगे।

बस, फिर क्या था? देश के लोग जुट गए सुबह-शाम, दोपहर-रात नाखून रगड़ने में। ट्रेन, मेट्रो, आफिस, घर, मैदान, जहां भी देखो, लोग नाखून रगड़ रहे हैं। मानो, नाखून रगड़ना राष्ट्रीय कर्म घोषित कर दिया गया हो। प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी प्रेम करने की जगह बैठे नाखून रगड़ रहे हैं। क्लास में टीचर पढ़ाने की जगह खुद तो नाखून रगड़ ही रहे हैं, बच्चों से भी नाखून रगड़वा रही हैं। पांच-सात साल की बच्चियां नाखून रगड़ रही हैं। भला, इन बच्चियों को अभी पीरियड से क्या लेना देना, लेकिन नहीं, नाखून रगड़ रही हैं, तो रगड़ रही हैं, उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है।

आज आफिस पहुंचा, तो मेरा एक साथी पिलपिलाए हुए पपीते की तरह मुंह लटकाए बैठा हुआ था। मैंने उससे पूछा, क्या हुआ? तुम्हारा मुंह क्यों लटका हुआ है, मानो कोई तुम्हारी भैंस खोल ले गया हो। उसने अपना दायां हाथ दिखाया जिसकी तीन अंगुलियों में पट्टी बंधी हुई थी। मैंने पूछा, यह क्या हुआ? 

उसने कहा, सर जी! एक बाबा के कहने पर मैं चार महीने से अपने दोनों हाथ की अंगुलियों को आपस में रगड़ रहा था। रगड़ते-रगड़ते नाखून इतने घिस गए कि चमड़ी दिखने लगी। डायबिटीज कम करने के चक्कर में नाखून तो गंवा ही बैठा, अब चमड़ी से खून आने लगा है। सारी अंगुलियां सूज गई हैं। डॉक्टर ने सभी अंगुलियों पर दवा लगाकर पट्टी बांध दी है। सर, मैं आज कोई खबर नहीं लिख पाऊंगा। मेरी पत्नी और बेटी की भी लगभग यही दशा है।

मुझे अपने साथी की बात सुनकर बहुत गुस्सा आया। लेकिन क्या करता? गुस्से पर काबू रखते हुए कहा, तुम तो पत्रकार हो, तुम्हें यह बात समझ में नहीं आई कि ऐसा करने से डायबिटीज कैसे ठीक हो जाएगा? साथी ने कहा कि बाबा ने कहा था कि नाखून के घर्षण से जो ऊष्मा पैदा होगी, वह धीरे-धीरे रक्त में प्रवेश करेगी, रक्त के जरिये अग्न्याशय में इंसुलिन बनने लगेगी। मैंने चीखते हुए कहा, तुम अहमक हो। अबे, नाखून रगड़ने से डायबिटीज, बीपी, किडनी, लिवर के रोग ठीक हो जाते, तो सारी दुनिया के डॉक्टर कटोरा लेकर भीख मांगते या नाखून रगड़ने की ट्रेनिंग सेंटर खोल लेते। तुम्हारे जैसे न जाने कितने बेवकूफ बाबाओं और स्वामियों के कहने पर लौकी का जूस पीकर अपनी किडनी और लीवर से हाथ धो बैठे हैं। सुबह, शाम, दोपहर जग भरकर करेले का जूस पीकर दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। इतना कहकर मैं बड़बड़ाता हुआ अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।


अमेरिका के शिकागो में जब उगा लाल सूरज


मई दिवस पर विशेष

अशोक मिश्र

पूंजीवाद के उदय-विकास का आधार मजदुर वर्ग का निर्मम और निरंकुश रक्त शोषण ही रहा है, तभी तो इसके आरंभिक चरण में सूर्योदय से सूर्यास्त तक मजदूरों से काम लिया जाता था। तब चूंकि मशीनों का विकास भी अपने आरंभिक चरण काल में था। अतएव पूंजीपति वर्ग के लिए मजदूरों के आवश्यक श्रम काल को कम करने और अतिरिक्त श्रम काल को लंबा करने के लिए कार्य दिवस को ही लंबा खींचना सबके कारगर तरीका था। यही वजह है कि पूंजीपति वर्ग मजदूरों को मशीनों का ही एक पुर्जा मानकर उनसे 17-18 घंटे तक काम लेता था। इससे कम घंटे काम करने पर मजदूरों को कई तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी जाती थीं। कई देशों में तो मजदूरों की हालत और भी खराब थी। उन्हें इंसान समझा ही नहीं जाता था। उनसे 20 घंटे काम लिया जाता था। 

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण काल में अमेरिका के मजदूर इसके खिलाफ आवाज उठाने लगे। असंतुष्ट मजदूरों ने अपना संगठन भी बनाना शुरू किया, ताकि पूंजीपतियों के खिलाफ संघर्ष तेज किया जा सके। 1820 से 1840 के बीच काम के घंटे कम कराने की मांग को लेकर लगातार हड़तालें हुईं। ये हड़तालें अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाईं, क्योंकि एक तो उनका संगठन मजबूत नहीं था और दूसरे उनमें वर्गीय चेतना का अभाव था। इस कमी को पूरा करने के लिए 1827 में सर्वप्रथम अमेरिका के औद्योगिक केंद्र फिलाडेल्फिया में मेकैनिकों की यूनियन का गठन गृह निर्माण उद्योग के मजदूरों की हड़ताल से हुई थी।

बाद में 1837 में पूरी दुनिया में पैदा हुए आर्थिक संकट की वजह से अमेरिकी सरकार दस घंटे का श्रम दिवस लागू करने पर विवश अवश्य हुई, परंतु कुछ ही स्थानों पर यह लागू हो सका। तो मजदूर आंदोलन पुन: तेज होने लगे। तब मजदूर संगठनों की आपसी सहमति से यह तय किया गया कि मजदूरों को काम के घंटे दस की बजाय आठ करने की मांग करनी चाहिए। यह मांग 1857 में काफी जोर पकड़ने लगी। पूरी दुनिया में इस मांग को मजदूरों का समर्थन मिलने लगा। अमेरिका से बाहर भी इस मांग को लेकर हड़तालें होने लगीं। यहां तक कि उस समय के सबसे पिछड़े देश आस्ट्रेलिया में मजदूरों ने 'आठ घंटा काम, आठ घंटा आराम और आठ घंटा मनोरंजन' का नारा बुलंद किया। इसी क्रम में अमेरिका में गृहयुद्ध के बाद 1866 में 20 अगस्त को 60 मजदूर ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों ने वाल्टिक मोर में एकत्र होकर नेशनल लेबर यूनियन गठित किया। इसके क्रांतिकारी नेता विलियम एच. सिलविश प्रथम अंतरराष्ट्रीय (जिसका नेतृत्व स्वयं कार्ल मार्क्स और एंगेल्स कर रहे थे) के साथ संबंध कायम कर अंतरराष्ट्रीय वर्गीय एकता कायम करने के प्रयासों में लग गए। सन 1869 में ही नेशनल लेबर यूनियन ने अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलन के साथ सहयोग करने का प्रस्ताव किया।

मालूम हो कि सितबंर 1866 में प्रथम अंतरराष्ट्रीय की जेनेवा कांग्रेस ने अपने एक पारित प्रस्ताव में कहा था कि काम का समय कानून के जरिये सीमाबद्ध करना एक प्राथमिक व्यवस्था है। इस तरह देखते-देखते आठ घंटे का आंदोलन एटलांटिक महासागर से प्रशांत महासागर तक और न्यू इंग्लैंड से कैलिफोर्निया तक फैल गया। तभी तो द्वितीय अंतरराष्ट्रीय की प्रथम कांग्रेस पेरिस में पहली मई 1886 को विशेष दिवस के तौर पर मनाने का फैसला लिया गया। इससे पूर्व अमेरिकन फेडरेशन आफ लेबर ने सन 1884 के सात अक्टूबर को एक प्रस्ताव पास कर 1886 की पहली मई से दैनिक आठ घंटे काम का दिन वैध मानने का प्रस्ताव पास किया था। 

इतिहास बताता है कि पहली मई 1886 को अमेरिका के शिकागो शहर में दुनिया भर से मजदूर आकर जमा हुए थे। अमेरिकी सरकार ने मजदूरों को सबक सिखाने के लिए उन पर गोलियां चलवाईं। कहते हैं कि इस गोलीबारी में लगभग एक लाख मजदूर शहीद हुए थे। शांति का प्रतीक मजदूरों का सफेद झंडा उनके ही खून से लाल हो गया। तभी से मजदूरों और मजदूर संगठनों ने अपने झंडे का रंग भी लाल कर दिया। शिकागों में शहीद हुए मजदूरों की शहादत रंग लाई और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों के चलते सारे संसार में क्रमश: आठ घंटे का श्रम समय लागू किया गया।

Thursday, April 30, 2026

चिंता करने से केवल परेशानी बढ़ती है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जब हम किसी काम को बोझ समझते हैं, तो उस काम को करने में कई तरह की परेशानियां आती हैं और हम परेशान हो उठते हैं। काम में मन भी नहीं लगता है। लेकिन जब वही काम हम कर्तव्य समझकर करते हैं, तो भावना बदल जाती है। काम वही रहता है, लेकिन परिणाम बदल जाते हैं। 

यही वजह है कि कहा गया है कि हर काम को कर्तव्य समझकर करना चाहिए ताकि परिणाम बेहतर आए। एक किस्सा है कि किसी राज्य में अकाल पड़ गया। कई साल तक अकाल रहा। इसके नतीजा यह हुआ कि राजा को न तो किसानों से लगान मिला और न ही व्यापारियों से किसी प्रकार का टैक्स। इससे राजकोष भी लगभग खाली हो गया। राजा की यह हालत देखकर भूख-प्यास ही मर गई। 

अब उसे खाना अच्छा लगता था, न पानी। वह हरदम सोचता रहता था कि यदि किसी दुश्मन ने ऐसे समय में हमला कर दिया तो क्या होगा? अपने ही मंत्री ने दुश्मन से हाथ मिला लिया, तो कैसे हालात से निपटा जाएगा। पहले भी एक मंत्री को दुश्मन देश के राजा के साथ पकड़ा गया था। एक दिन महल में राजगुरु आए और उन्होंने राजा की दशा देखकर कहा कि ऐसा करो, राजपाट मुझे सौंप दो। तुम मेरे कर्मचारी की तरह काम करो। 

इसके बाद राजा की हालत बदल गई। अब उसे भूख भी लगने लगी। नींद भी आने लगी। काफी दिन बीत गए। एक दिन राजगुरु फिर राजमहल पधारे। उन्होंने कहा कि राजन! पहले तुम हर काम को बोझ समझकर करते थे, तो चिंता में पड़े रहते थे। लेकिन जैसे ही तुमने राजकाज को कर्तव्य समझकर करना शुरू किया, कई तरह की चिंताएं मिट गईं। चिंता करने से केवल परेशानी बढ़ती है। समाधान खोजने से ही कार्य हल होते हैं।

हरियाणा के 1338 स्कूलों में नर्सरी कक्षा में एक भी प्रवेश नहीं


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने विश्वविद्यालयों में शिक्षा सुधार के लिए विभागाध्यक्षों से पांच साल की प्राथमिकताएं तय करने का निर्देश दिया है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने पांच साल में पांच लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य भी रखा है। उच्च शिक्षा में सुधार लाने की कोशिश करने वाली सरकार को नर्सरी और प्राइमरी शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। 

कुछ दिन पहले हरियाणा की सैनी सरकार ने एक अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच पूरे प्रदेश में प्रवेश उत्सव मनाने का फैसला किया था। प्रवेश उत्सव के सहारे राज्य सरकार नर्सरी कक्षाओं में सौ फीसदी प्रवेश का लक्ष्य रखा था। आंगनबाड़ी केंद्रों और सरकारी स्कूलों में नर्सरी कक्षाओं में सौ प्रतिशत लक्ष्य रखकर प्रदेश के नौनिहालों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया था। शून्य ड्रापआउट के लक्ष्य के साथ-साथ नर्सरी कक्षा में प्रवेश लेने वाले बच्चों का स्वागत बैंडबाजे के साथ करने को कहा गया था। 

इसके लिए स्कूल को भी अच्छी तरह से सजाना था, इसके लिए स्कूल के हेड को पांच हजार रुपये का बजट भी दिया गया था। इसके बाद भी प्रदेश के 1338 स्कूलों में नर्सरी कक्षा में बच्चों का प्रवेश शून्य रहा। 1338 स्कूलों में  एक भी बच्चा प्रवेश लेने नहीं पहुंचा। उच्च शिक्षा में सुधार को तत्पर राज्य सरकार को प्रदेश के सरकारी स्कूलों पर भी ध्यान देना चाहिए। स्कूल चाहे निजी हो या सरकारी, किसी भी बच्चे के भविष्य की  आधारशिला नर्सरी और प्राइमरी कक्षाएं ही होती हैं। 

नर्सरी कक्षा में आने वाला बच्चा बिल्कुल खाली स्लेट की तरह होता है। इन बच्चों को जो पढ़ाया, सिखाया जाएगा, वही उनके भविष्य में काम आएगा। सरकारी स्कूलों की यह दशा साफ संकेत करती है कि नर्सरी में बच्चों का प्रवेश दिलाने का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया। सरकारी स्कूलों की छवि दिनों दिन हरियाणा की जनता के मन में खराब बोती जा रही है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि सरकारी स्कूलों में बैठने, शौचालय और अध्यापकों की कमी की वजह से पढ़ाई अच्छी नहीं होती है। यही कारण है कि लोग अपने खर्चों में कटौती करके निजी स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं।

निजी स्कूलों में सरकारी स्कूलों की अपेक्षा ज्यादा सुविधाएं होती हैं, लोगों के दिमाग में यह बात घर कर गई है। ऐसी स्थिति में सबसे जरूरी यह है कि प्रदेश के 1338 स्कूलों में लोगों ने अपने बच्चे का  एडमिशन कराने के बारे में क्यों नहीं सोचा, इसका पता लगाया जाए। इसके लिए अध्यापकों और अन्य लोगों को जमीनी स्तर पर उतरकर पता लगाना होगा। एक-एक बच्चे के घर जाकर उसके अभिभावकों से बात करनी होगी। जो भी बातें उभर कर सामने आएं, उसके अनुरूप नीतियां बनाकर फिर से प्रयास करना होगा। सरकार को भी इन स्कूलों में स्वच्छ पेयजल, शौचालय और  खेलकूद के लिए जगह और उपकरण की व्यवस्था करनी होगी।

Wednesday, April 29, 2026

देखना चाहता था कि तुम में कितना धैर्य है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर कोई काम धैर्य के साथ किया जाए, तो वह भले ही असंभव लगने वाला हो, आखिरकार पूरा हो ही जाता है। धैर्य के साथ-साथ लगन भी जरूरी होता है। यदि इन दोनों गुणों का समावेश हो जाए, तो व्यक्ति जीवन में काफी सफल हो जाता है। कहते हैं कि जिस व्यक्ति में थोड़ा सा भी धैर्य नहीं होता है, वह जीवन में कोई भी काम सफलतापूर्वक नहीं कर सकता है। 

एक बार की बात है। किसी राज्य में एक गुरुकुल चलता था। वहां काफी संख्या में बच्चे पढ़ते थे। गुरुकुल के आचार्य की बहुत अधिक ख्याति थी। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों के धैर्य की परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने बांस से बनी कुछ टोकरियां मंगाई और अपने शिष्यों को देते हुए कहा कि इन टोकरियों में पानी भरकर लाओ। आश्रम की सफाई करनी है। बांस की टोकरियों को देखकर सारे शिष्य आश्चर्यचकित रह गए।  

उन्हें आचार्य का आदेश विचित्र तो लगा, लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकते थे। अत: वह पास में बहने वाली नदी में गए और उन्होंने टोकरियों में पानी भरा। लेकिन पानी तुरंत ही बहकर निकल गया। सारे शिष्यों ने कई बार प्रयास किया, लेकिन विफल होने पर वह आचार्य के पास लौट आए। उन्होंने कहा कि आचार्य जी, इन टोकरियों में पानी कैसे भरा जा सकता है। 

आचार्य ने देखा कि एक शिष्य वापस नहीं आया था। उन्होंने कहा कि तुम सब इंतजार करो। वह शिष्य नदी से पानी भरने का प्रयास शाम तक करता रहा। इससे पानी में भीगते-भीगते बांस फूल गया और सारे छेद बंद हो गए। जब उसने पानी भरा तो वह नहीं निकला। यह देखकर वह प्रसन्न हुआ और पानी लाकर आचार्य के सामने रख दिया। तब आचार्य ने कहा कि यही तुम लोगों परीक्षा थी। मैं देखना चाहता था कि तुम लोगों में कितना धैर्य है। इस परीक्षा में केवल एक शिष्य ही सफल हुआ।

सड़क पर चलने वालों की जान जोखिम में डालते तेज रफ्तार वाहन


अशोक मिश्र

तेज रफ्तार गाड़ियां सड़कों पर चलने वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित होती जा रही हैं। तेज रफ्तार वाहन से दो तरह के खतरे होते हैं। एक तो जो तेज रफ्तार में वाहन चला रहा होता है, उसकी जान खतरे में होती है। वहीं सड़क पर चलने वाले दूसरे लोग भी खतरे में ही होते हैं। तेज रफ्तार वाहन कब किसी को कुचल दे, किसी वाहन को टक्कर मार दे, इसका पूर्वाभास नहीं होता है। 

आजकल के युवा अपने वाहन को तेज रफ्तार में ही चलाना पसंद करते हैं। नतीजा यह होता है कि वह खुद तो घायल होते ही हैं, दूसरों की जान भी जोखिम में डालते हैं। फरीदाबाद में खेड़ी पुल थाना के अंतर्गत आने वाले कच्चा खेड़ी रोड पर एक महिला अपने दो साल के बच्चे का हाथ पकड़कर पैदल जा रही थी। पीछे से तेज रफ्तार में आ रहे कार चालक ने लापरवाही से बच्चे को टक्कर मार दी। गाड़ी का अगला पहिया बच्चे के सिर से गुजर गया। बच्चे की तत्काल मौत हो गई। 

फरीदाबाद के ही गदपुरी थाने के पास तेज रफ्तार में आगे जा रहे ट्रक ने अचानक ब्रेक मार दी जिससे पीछे से आ रहा आटो बड़ी तेजी से ट्रक से टकरा गया। इस टक्कर में आटो में बैठे एक बुजुर्ग की मौत हो गई। फरीदाबाद के ही समयपुर चुंगी के पास तेज रफ्तार कैंटर ने आगे चल रही बाइक को टक्कर मार दी जिससे बाइक सवार महिला सड़क पर गिर पड़ी और टैंकर महिला के सिर के ऊपर से गुजर गया। पलवल के पृथला गांव के समीप राष्ट्रीय राज मार्ग 19 पर बाइक और पिकअप की टक्कर में बाइक चालक के साथ-साथ दो मासूम बच्चियों की मौत हो गई। 

होडल गे गांव गढ़ी पट्टी में तेज रफ्तार ट्रैक्टर चालक ने बाइक को पीछे से टक्कर मार दी। इस टक्कर की वजह से पानी लेने जा रहे दो भाइयों में से एक की मौत हो गई और दूसरा बुरी तरह घायल हो गया। यह सारी घटनाएं रविवार को ही हुई हैं। जब दो जिलों की यह हालत है, तो हरियाणा के सभी जिलों में होने वाले हादसों का अंदाजा लगाया जा सकता है। वाहन की स्पीड तेज होने की वजह से नुकसान भी बहुत ज्यादा होता है। कई बार तो इंसानी नुकसान बहुत ज्यादा हो जाता है।

एक्सप्रेस वे और फोरलेन सड़कों पर गलत साइड से वाहनों के आने पर रोक नहीं लग पा रही है। इससे सड़क हादसों पर रोक नहीं लग पा रही है। सड़कों की खराब दशा भी ज्यादातर सड़क हादसों के लिए जिम्मेदार है। एक्सप्रेस वे और फोरलेन सड़कों पर सौ-एक सौ बीस की स्पीड में दौड़ रहे वाहन के सामने जब अचानक कोई गाड़ी, इंसान या लावारिस पशु आ जाता है तो ऐसी स्थिति में वाहन को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में सड़क हादसे की आशंका काफी बढ़ जाती है। कई बार अचानक ब्रेक मारने से वाहन उलट जाता है या फिर सामने से आर रहे वाहन से टकरा जाता है।