Sunday, February 15, 2026

...और बच्चा हमेशा के लिए सो गया

प्रतीकात्मक एआई चित्र
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। कहीं पेड़ों को काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं, तो कहीं वनों को उजाड़कर बस्तियां बसाई जा रही हैं। इससे हमारा पर्यावरण संकट में पड़ता जा रहा है। जिस मौसम में गर्मी पड़नी चाहिए, उस मौसम में चक्रवात आ रहे हैं, तेज हवाओं के साथ बरसात हो रही है। 

पृथ्वी का तापमान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से मौसम चक्र में भारी बदलाव आता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारी संख्या में लोगों को विस्थापित होने पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के शुरुआती दौर यह कथा है। कहते हैं कि किसी राज्य में कई वर्षों से बरसात नहीं हुई। उस राज्य के लोगों ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादातर पेड़ों को काट डाला था। 

इसका नतीजा यह हुआ कि एक साल बादल आते और बिना बरसे निकल जाते। जैसे प्रकृति भी मानवों के कुकृत्य से नाराज थी। लोगों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। लोग भूख और प्यास से मर रहे थे। एक बच्चा भी कई दिनों से भूखा था। अनाज पैदा न होने की वजह से काफी संख्या में लोगों को अपनी जान देनी पड़ी थी। बच्चा भी काफी दुर्बल हो गया था। उसके पास थोड़ा सा पानी बचा था। 

तभी उस बच्चे के सामने एक चिड़िया भूख-प्यास से बेहाल होकर गिर पड़ी। वह भी शायद कई दिनों से भूखी प्यासी थी। उस बच्चे ने चिड़िया को देखा और फिर अपने पास बचे हुए पानी को देखा। उसने एक-एक बूंद पानी चिड़िया के चोंच में डालनी शुरू की। थोड़ी देर में कुछ पानी चिड़िया के पेट में गया और कुछ पानी जमीन पर। थोड़ी देर बाद चिड़िया ने अपने पंख फड़फड़ाए और उड़ गई। उसके बाद बच्चा जमीन पर गिरा और हमेशा के लिए सो गया। कहते हैं कि इसके बाद उस राज्य में भारी बारिश हुई।

जंगल सफारी तो चाहिए, लेकिन अरावली क्षेत्र की कीमत पर नहीं


अशोक मिश्र

अरावली की पहाड़ियों में प्रस्तावित जंगल सफारी पर रोक लगा दी गई है। सुप्रीमकोर्ट ने हाल ही में अरावली की ऊंचाई को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। इसके बाद जब वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने इसका विरोध किया और मामले को लेकर दोबारा सुप्रीमकोर्ट में गए, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले पर न केवल रोक लगा दी, बल्कि अब जंगल सफारी के निर्माण पर भी रोक लगा दी है। 

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान  अरावली की पहाड़ियों में किसी भी तरह के गैर वानिकी कार्य पर रोक लगाते हुए कहा है कि अगली सुनवाई तक अरावली क्षेत्र में कोई भी अंतिम निर्णय नहीं लिया जाए या विस्तृत कार्य योजना जमा की जाए। वैसे सरकार जंगल सफारी विकसित करने के लिए प्रारंभिक सर्वे और कॉन्सेप्ट प्लान तैयार करा रही थी। भूमि की पहचान के साथ-साथ मास्टर प्लान का प्रारूप तैयार कर लिया था। सरकार अब सुप्रीमकोर्ट के निर्देश के बाद सभी पहलुओं पर दोबारा विचार करेगी, समीक्षा करेगी। 

यह भी संभव है कि सरकार जरूरत पड़ने पर परियोजना के स्वरूप में थोड़ा बहुत बदलाव लाए। सरकार का कहना है कि जंगल सफारी के निर्माण के बाद पर्यावरण संरक्षण होता। सफारी की वजह से अरावली क्षेत्र में हो रहा पेड़ों का अवैध कटान ही नहीं रुकता, बल्कि खनन पर भी रोक लगती। वन और खनन माफिया लोगों की मौजूदगी की वजह से अपना काम नहीं कर पाते। उनकी गतिविधियों पर लगाम लग जाती। इतना ही नहीं, नूंह और गुरुग्राम के दस हजार एकड़ क्षेत्र में जंगल सफारी विकसित होने से प्रदेश में पर्यटकों का आवागमन बढ़ेगा। इससे प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार बढ़ेगा, राज्य के लोगों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। 

दुनिया के सबसे बड़े जंगल सफारी के चलते प्रदेश राष्ट्रीय और  अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन नक्शे पर अपनी जगह और पहचान बनाने में सफल होगा। सरकार का यह तर्क कहीं से भी गलत नहीं है, लेकिन जंगल सफारी बनने से नुकसान भी कम नहीं होता। अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीवों को लोगों के आने से जो परेशानी होती, वह भी ध्यान रखना होगा। वन्यजीवों को प्राकृतिक वातावरण नहीं मिल पाता, इससे वह मानव बस्तियों की ओर भी रुख कर सकते थे। 

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि अरावली की पहाड़ियां हजारों साल से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए फेफड़े का काम करती रही है। अरावली की पहाड़ियों की वजह से ही लोगों को स्वस्थ हवा मिलती रही है। प्रदूषण पर काफी हद तक रोक लगती रही है, लेकिन मोटर गाड़ियों, कल-कारखानों के साथ-साथ पराली जलाने जैसी घटनाओं ने प्रदूषण की समस्या को काफी हद तक बढ़ा दिया है। अरावली की पहाड़ियों पर होने वाले पेड़ों की अवैध कटान से भी बुरा प्रभाव पड़ा है। प्रदूषण की समस्या गहराई है।

Saturday, February 14, 2026

मेरे गुरु दुनिया के मालिक के लिए गाते हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी हरिदास वृंदावन में रहते थे। वह कवि, संगीतकार और उच्चकोटि के कृष्ण उपासक थे। उनको सखी संप्रदाय का उपासक माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि वह ललिता सखी के अवतार थे। स्वामी हरिदास के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती है। बस, इतना पता चलता है कि इनका जन्म 1478 में हुआ था। प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे। 

तानसेन अकबर के दरबार में थे। अकबर को तानसेन का गायन बहुत प्रिय था, लेकिन उसने तानसेन के गुरु हरिदास के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। अकबर जानता था कि गुरु हरिदास उसके सामने कभी नहीं गाएंगे। वह आगरा भी उसके बुलाने पर नहीं आएंगे। एक बार किसी संदर्भ में गुरु हरिदास की चर्चा चल रही थी, तो अकबर ने तानसेन के सामने हरिदास का गायन सुनने की इच्छा जाहिर की। 

तानसेन अपने गुरु के स्वभाव से भी परिचित थे। वह सोचने लगे कि अकबर की इच्छा कैसे पूरी की जाए। उन्होंने अकबर से कहा कि आपकी इच्छा जरूर पूरी हो सकती है, लेकिन आपको एक साधारण व्यक्ति की तरह वेष बदलकर मेरे साथ चलना होगा। एक दिन दोनों लोग वृंदावन पहुंचे। अकबर गुरु जी की कुटिया से बाहर खड़े हो गए। तानसेन अंदर गए और गुरु के समक्ष बैठकर गाने लगे। 

उन्होंने एक पद जानबूझकर गलत गाया, तो हरिदास ने वाद्य यंत्र उठाकर खुद गाना शुरू किया। हरिदास का गायन सुनकर अकबर चकित रह गया। लौटते समय अकबर ने तानसेन से कहा कि गुरु जी के गायन में जो बात है, वह तुम्हारे गायन में नहीं है। तानसेन ने कहा कि मैं एक सम्राट के लिए गाता हूं। मेरे गुरु जी पूरी दुनिया के मालिक के लिए गाते हैं। यह बात सुनकर अकबर ने अपनी सहमति से सिर हिला दिया।

आधुनिक तकनीक और फैलते बाजार ने खत्म कर दी मेलों की उपयोगिता


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में चल रहे सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले के समापन में बस दो दिन ही बचे हैं। पिछले एक पखवाड़े से चल रहा यह मेला दुनिया का सबसे बड़ा हस्तशिल्प मेला माना जाता है। इस मेले में दुनिया भर से कला प्रेमी आते हैं। यह मेला भारत ही नहीं, दुनिया भर की संस्कृतियों का संगम जैसा प्रतीत होता है। दुनिया भर के लोग जब किसी जगह पहुंचते हैं, तो वह अपनी सभ्यता और संस्कृति की छाप तो छोड़ते ही हैं, जिस जगह गए हुए होते हैं, उस स्थान की भी सभ्यता और संस्कृति से परिचित होते हैं। 

यही मेले का उद्देश्य भी होता है। सूरजकुंड मेले का भी उद्देश्य यही है। पिछले 39 साल से हर साल सूरजकुंड में लगने वाले मेले की ख्याति का कारण भी यही है। युवा पीढ़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से परिचित हो रहे हैं। सच कहा जाए, तो हमारे देश में मेले की अवधारणा सदियों पुरानी है। प्राचीनकाल में भारतीय क्षेत्र में जितनी भी सभ्यताएं थीं, उनमें मेले प्रमुख स्थान रखते थे।

 कुछ पुरातत्वविदों का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी मेले लगाए जाते थे। इन मेलों में जहां लोग आमोद-प्रमोद के लिए आते थे, वहीं वह अपनी दैनिक जरूरतों की वस्तुएं भी खरीदते थे। मेले ठेले दैनिक जरूरतों की पूर्ति का माध्यम होने के साथ-साथ सूचनाओं के भी केंद्र हुआ करते थे। इन मेलों में आने वाले लोग अपने रिश्तेदारों से भी मिल लिया करते थे। जो लोग व्यस्तता के चलते अपने परिजनों से नहीं मिल पाते थे, वह मेले में जरूर जाते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि उनके परिजन और रिश्तेदार मेले में जरूर आएंगे। उन दिनों वैवाहिक रिश्ते भी बहुत ज्यादा दूर नहीं किए जाते थे ताकि जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की मदद के लिए जल्दी से जल्दी पहुंचा जा सके। चार-पांच किलोमीटर के ही दायरे में बहन, बेटियों की शादियां की जाती थीं। इसका कारण यह था कि उन दिनों आवागमन के साधन सर्वसुलभ नहीं थे। 

इस वजह से दूरदराज के इलाके में शादियां नहीं की जाती थीं। ऐसी स्थिति यह मेले एक तरह से एक दूसरे से मिलने के साधन हुआ करते थे। दक्षिण से लेकर उत्तर तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अगर प्राचीन इतिहास खंगाला जाए, तो मेलों की गाथाएं जरूर मिलेंगी। लेकिन आज जब हम तकनीकी मामलों में बहुत आगे बढ़ चुके हैं, तो मेलों की महत्ता लगातार घटती जा रही है। 

अब साप्ताहिक मेलों का भी आयोजन लगभग बंद हो चुका है। दैनिक जरूरतों की पूर्ति करने वाले मेलों की उपयोगिता खत्म सी होने लगी है क्योंकि मेलों का स्थान अब बड़े-बड़े बाजारों और आनलाइन कंपनियों ने ले लिया है। अब तो बाजार भी जाने की जरूरत नहीं रह गई है। मोबाइल के एक क्लिक पर जरूरत की सारी वस्तुएं हाजिर हो जाती हैं। मनोरंजन के इतने साधन हो गए हैं कि अब मेलों के माध्यम से मिलने वाला मनोरंजन फीका लगने लगा है।

Friday, February 13, 2026

राजा का कर्तव्य विषय भोग नहीं, प्रजा पालन है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महर्षि दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर था। दयानंद का जन्म गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी 1824 को हुआ था। बचपन में एक दिन पिता ने मूलशंकर को शिवरात्रि व्रत रखने को कहा। रात में पूजा करते समय देखा कि शंकर भगवान की मूर्ति पर चूहा चढ़ा हुआ है। उन्हें तब बोध हो गया कि यह वह शंकर नहीं हैं जिसके बारे में उन्हें बताया गया था। 

इसके बाद उन्होंने सत्य की खोज के लिए घर त्याग दिया। इसके बाद दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की और भारतीय समाज में फैली तमाम कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया। दयानंद सरस्वती की मृत्यु के संबंध में बताया जाता है कि उनकी मौत की साजिश रचने में अंग्रेजों का हाथ था। 

बात 1883 की है। राजस्थान के जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के निमंत्रण पर महर्षि दयानंद सरस्वती जोधपुर गए थे। वह रोज प्रवचन करते थे। कभी-कभी महाराजा जसवंत सिंह भी उनका प्रवचन सुनने आते थे। महाराज के विशेष आग्रह पर वह कई बार राज महल भी गए। वहां उन्होंने देखा कि नन्हीं नाम की वेश्या का महाराज पर विशेष प्रभाव था। 

महाराज राजकाज करने की जगह पर ज्यादातर विषय भोग में लिप्त रहते थे। यह बात दयानंद को अटपटी लगी। एक दिन जब वह प्रवचन कर रहे थे, तो उन्होंने महाराज को संबोधित करते हुए कहा कि राजा का कर्तव्य प्रजा का पालन करना है, विषय भोग में लिप्त रहना नहीं। इससे महाराज ने नन्हीं से संबंध तोड़ लिए। कहते हैं कि अंग्रेजों की शह पर नन्हीं ने रसोइये से मिलकर दूध में पिसा हुआ कांच मिलकर स्वामी जी पिला दिया। इसके बाद अस्पताल में भी धीमा जहर देने की बात कही जाती है। 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में ही दयानंद का देहांत हो गया।

हरियाणा में प्रदूषित जल लोगों के लिए साबित हो रहा जानलेवा


अशोक मिश्र

पलवल के छांयसा गांव में पिछले एक पखवाड़े में 14 लोगों की अस्वाभाविक रूप से मौत हो चुकी है। प्रदूषित पानी की वजह से लोगों के मरने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने कुछ लोगों की मौत का कारण हेपेटाइटिस बी बताया है। हरियाणा में प्रदूषित पानी की वजह से लोगों की हो रही मौत काफी चिंताजनक है। 

हरियाणा के अधिकतर जिलों के कुछ इलाकों में लोगों को प्रदूषित जल का उपयोग दैनिक जीवन में करना पड़ रहा है। इसकी वजह से केवल इंसान ही नहीं, पालतू पशुओं की भी मौत हो रही है। नूंह के तावडू उपमंडल के अंतर्गत गोयला गांव के नजदीक कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे और रेलवे लाइन के बीच जहरीले केमिकल युक्त पानी पीने से नौ फरवरी को तीन गायों की मौत हो गई थी, वहीं 40 से अधिक गायों की हालत गंभीर बनी हुई थी। 

फरवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, हिसार के हांसी और उसके आसपास के क्षेत्रों में दूषित पानी पीने से बीमारियां फैलने के कारण 50 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं।  फरीदाबाद के झाड़सेतली और मांगर गाँव में औद्योगिक प्रदूषण के कारण भूजल जहरीला हो चुका है। इस क्षेत्र में कैंसर, किडनी और लीवर की बीमारियों के कारण अब तक 30 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं। 

हरियाणा में प्रदूषित जल की वजह से इंसान और पशुओं को अपनी जान गंवानी पड़ रही हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो, जब किसी न किसी जिले में प्रदूषित जल की वजह से बीमार पड़ने या मौत होने की खबर न आती हो। राज्य में प्रदूषित पानी एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका है। इस समस्या का समाधान जितनी जल्दी खोज लिया जाए, उतना ही अच्छा है। प्रदूषित जल के कारण हर साल पूरे राज्य में काफी मौतें हो रही हैं, जो काफी चिंताजनक है। इसका कारण औद्योगिक कारखानों से निकला अपशिष्ट, सीवर का गंदा पानी और कृषि रसायनों हैं। इनके कारण ही राज्य के अधिकतर जिलों में भूजल पीने योग्य नहीं रहा है। 

दक्षिणी और पश्चिमी हरियाणा के जिले खासतौर पर प्रदूषित जल संकट के शिकार हैं। हरियाणा के कई जिलों भिवानी, फतेहाबाद, करनाल, जिंद, सोनीपत के भूजल में यूरेनियम, नाइट्रेट और आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इसकी वजह से लोगों को कई तरह की गंभीर बीमारियां हो रही हैं। डाइंग और प्लेटिंग इकाइयों का केमिकल युक्त पानी सीधे भूमिगत जल में मिल रहा है। इसे रोकने का प्रयास उद्योगों के मालिक नहीं कर रहे हैं। सरकारी मशीनरी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। जब किसी जिले में कोई हादसा होता है, तो सरकारी मशीनरी सक्रिय होती है। कुछ दिनों तक सावधानी बरती जाती है। मरीजों को दवाइयां दी जाती हैं, लोगों में क्लोरिन के टेबलेट्स बांटे जाते हैं। उसके बाद वही पुराना रवैया अख्तियार कर लिया जाता है।

Thursday, February 12, 2026

अपनी शादी में चर्च नहीं पहुंचे लुई पाश्चर


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

फ्रांस के महान सूक्ष्म जीवविज्ञानी, रैबीज टीके के आविष्कारक लुई पाश्चर बहुत मेहनती थे। 27 दिसंबर 1822 को फ्रांस में जन्मे लुई पाश्चर के पिता चमड़ा व्यापारी थे। चमड़ा व्यापार में उन्हें कमाई बहुत कम होती थी जिससे उनका परिवार आर्थिक संकट से ही घिरा रहता था। 

पाश्चर ने 1831 में स्कूली शिक्षा हासिल की। शुरुआती दौर में वह एक औसत छात्र थे। लिखने-पढ़ने में उनका मन नहीं लगता था। उन्हें मछलियां पकड़ना और पेटिंग करना बहुत पसंद था। एक बार उन्होंने अपने माता-पिता की  पेंटिंग भी बनाई थी। बाद में उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। पाश्चर ने 1848 में स्ट्रासबर्ग में अध्यापन शुरू किया और बाद में वह रसायन विज्ञान विभाग के हेड बने। 

वह स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय के एक अधिकारी की बेटी को वह पसंद करते थे। लड़की और उसके मां-बाप भी शादी करने के लिए तैयार थे। उस समय कुत्ते के काटने का इलाज रैबीज टीके की खोज के कारण काफी प्रसिद्ध हो चुके थे। शादी की तारीख तय हो गई। आखिरकार वह तारीख भी आ गई जिस दिन उनकी शादी होनी थी। लुई पाश्चर और लड़की के सभी रिश्तेदार नियत समय पर चर्च पहुंच गए, लेकिन दूल्हा ही गायब था। 

लोगों में अब कानाफूसी शुरू हो गई। काफी समय बाद एक मित्र उन्हें खोजते हुए प्रयोगशाला पहुंचा, तो देखा कि वह एक प्रयोग में बिजी हैं। मित्र ने कहा कि आज तुम्हारी शादी है और तुम यहां हो। प्रयोग तो बाद में भी किया जा सकता है। पाश्चर ने कहा कि कई साल की मेहनत सफल होने वाली है। शादी तो कल भी हो सकती है। प्रयोग पूरा करने के बाद वह चर्च पहुंचे और धूमधाम से उनकी शादी हुई।

अरावली क्षेत्र में तालाब बनाकर जलसंरक्षण की महत्वपूर्ण योजना


अशोक मिश्र

उत्तर भारत में दिन और रात का तापमान बढ़ने लगा है। हाड़ कंपाती सर्दी से छुटकारा मिल चुका है। आने वाले दिनों में सर्दी बिलकुल खत्म हो जाएगी। तब शुरू होगी पानी की समस्या। हरियाणा के लगभग सभी जिलों में गर्मी के मौसम में पेयजल की समस्या तो होती ही है, नदियों, तालाबों और नालों का जलस्तर काफी कम हो जाने या सूख जाने की वजह से जानवरों को भी पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में जानवर पानी की तलाश में अपने रिहायशी क्षेत्र से निकल कर मानवीय आबादी की ओर चले जाते हैं। 

शहर और गांवों में जानवरों के आ जाने की वजह से कई बार मानव और पशु दोनों को नुकसान पहुंचता है। इस समस्या से निपटने के लिए हरियाणा सरकार ने अरावली क्षेत्र में नए तालाबों के निर्माण और पुराने तालाबों की मरम्मत करके उन्हें उपयोगी बनाने का फैसला किया है। इस योजना के तहत फरीदाबाद में चार बड़े तालाब बनाने के साथ-साथ फरीदाबाद-गुरुग्राम को जाने वाली सड़क के आसपास पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाएगा। इससे फायदा यह होगा कि इन तालाबों के आसपास रहने वाले वन्य जीवों को पानी पीने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। 

उन्हें अपने आसपास ही पीने का पानी उपलब्ध हो जाएगा जिससे उनके शहरों या गांवों में आने की आशंका भी कम हो जाएगी। वैसे भी राज्य सरकार अरावली ग्रीन वॉल योजना के जरिये पूरे अरावली क्षेत्र में नए नए तालाब बनाने और पुराने तालाबों की मरम्मत करने पर जोर दे रही है। इस योजना के तहत किसानों और अन्य लोगों को भी तालाब निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। इस परियोजना के पहले चरण में गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, चरखी दादरी और भिवानी में 66 जल निकायों को विकसित और पुनर्जीवित करने की योजना है। 

वैसे तालाबों के निर्माण से फायदा यह होगा कि जहां वन्य जीवों को पीने के लिए पानी मिलेगा, वहीं इन तालाबों के जरिये भूगर्भ जल स्तर में भी सुधार आएगा। तालाब और झीलों के जरिये धरती पानी सोखती रहेगी जिससे आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों और वनस्पतियों को भी फलने-फूलने के लिए आवश्यक जल उपलब्ध हो सकेगा। अरावली क्षेत्र के आसपास बसे लोगों को सरकार की इस योजना से काफी उम्मीदें हैं। यदि इस परियोजना पर ईमानदारी से काम हुआ, तो अरावली क्षेत्र में बसी मानव आबादी को भी जल संकट से मुक्ति मिलने की पूरी उम्मीद है। 

लोगों का तो यहां तक कहना है कि यदि जगह-जगह पर ऐसे तालाब बनाए जाएं, तो पूरे अरावली क्षेत्र को फिर से हराभरा किया जा सकता है। ऐसा होने पर जल संरक्षण का ध्येय तो पूरा होगा ही, पर्यावरण प्रदूषण से भी काफी हद तक निजात मिल जाएगी। लोगों को सांस लेने के लिए स्वच्छ भी मिलेगी।

Wednesday, February 11, 2026

आसानी से हासिल नहीं होती उच्चता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उच्चता या श्रेष्ठता बहुत आसानी से हासिल नहीं होती है। इसके लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। समय के साथ-साथ लगन भी बहुत जरूरी होती है। यदि कोई व्यक्ति सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा है, तो इसका यही मतलब है कि उसने पूरा सफर तय किया है। बिना सफर तय किए कोई उस स्थान तक नहीं पहुंच सकता है।  इस संदर्भ में एक शिष्य की कथा है। किसी राज्य में एक गुरुकुल संचालित किया जा रहा था। 

गुरु का एक शिष्य नवदीक्षित हुआ था। अपने गुरु की ख्याति देखकर उसके मन भी आया कि मैं भी क्यों न एक गुरुकुल खोल लूं। मैं भी लोगों को दीक्षित करूं। लोग मुझे भी सम्मान देंगे। एक दिन उसने अपने गुरु के सामने अपने मन की बात को रखते हुए कहा कि गुरुदेव! गुरुदेव, मेरा भी मन करता है कि आपकी ही तरह मेरे भी कई शिष्य हों और सभी मुझे भी आप जैसा ही मान-सम्मान दें। 

अपने शिष्य की बात सुनकर गुरु मंद मंद मुस्कुराने लगे। वह समझ गए कि शिष्य के मन में ख्याति की लालसा पैदा हो गई है। गुरु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा- कई वर्षों की लंबी साधना के पश्चात अपनी योग्यता और विद्वता के बलबूते पर तुम्हें भी एक दिन यह सब प्राप्त हो सकता है। शिष्य ने कहा- इतने वर्षों बाद क्यों? मैं अभी ही अपने शिष्यों को दीक्षा क्यों नहीं दे सकता? गुरु ने अपने शिष्य को तख्त से उतरकर नीचे खड़ा होने को कहा। फिर स्वयं तख्त पर खड़े होकर कहा- जरा मुझे ऊपर वाले तख्त पर पहुंचा दो। 

शिष्य विचार में पड़ गया। फिर बोला- गुरुदेव! भला मैं खुद नीचे खड़ा हूं, फिर आपको ऊपर कैसे पहुंचा सकता हूं? इसके लिए तो पहले खुद मुझे ही ऊपर आना होगा। गुरु ने मुस्कुराकर कहा- ठीक इसी प्रकार यदि तुम किसी को अपना शिष्य बनाकर ऊपर उठाना चाहते हो, तो तुम्हारा उच्च स्तर पर होना भी आवश्यक है। शिष्य गुरु का आशय समझ गया। वह उनके चरणों में गिर गया। 

नीमका जेल में बंदी की हत्या ने खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल


अशोक मिश्र

तबलीगी जमात से जुड़े आतंकी अब्दुल रहमान की फरीदाबाद के नीमका जेल में हत्या हो गई। इस जेल को प्रदेश की सबसे सुरक्षित जेलों में से एक माना जाता है। सुरक्षित कही जाने वाली इस जेल में जम्मू-कश्मीर के 50 से ज्यादा हार्डकोर बंदियों को रखा गया है। यह ऐसे बंदी हैं जिन पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने से लेकर देश के खिलाफ साजिश रचने तक के आरोप हैं। ऐसी सुरक्षित जेल में किसी अपराधी की हत्या हो जाना जेल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। 

आतंकी अब्दुल रहमान को स्पेशल सेल में रखा गया था जिसमें  हत्या का आरोपी अरुण चौधरी भी बंद था। इन दोनों के अलावा एक और बंदी सोहेब रियाज भी था। कहा जा रहा है कि हत्या के आरोप में बंद अरुण चौधरी ने रहमान की हत्या के लिए पहले एक पत्थर को खोजा, फिर उसे नुकीला बनाया और फिर उस नुकीले पत्थर को सर पर मारकर हत्या कर दी। संदिग्ध आतंकी अब्दुल रहमान की हत्या के आरोपी पर पहले से ही हत्या का मुकदमा चल रहा था। 

उसे अक्टूबर 2024 में जम्मू-कश्मीर की कठुआ जेल से फरीदाबाद की नीमका जेल में ट्रांसफर किया गया था। मारे गए संदिग्ध आतंकी रहमान के मामले में अभी तक एक भी गवाही नहीं हुई है, ऐसा कहा जा रहा है। रहमान को गुजरात एसटीएस और हरियाणा एसटीएस के संयुक्त प्रयास से 2 मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया था। रहमान पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के साथ-साथ अयोध्या में बने राम मंदिर को उड़ाने की साजिश रचने का भी आरोप था। 

जांच में पता चला था कि अब्दुल लगभग डेढ़ साल तक सोशल मीडिया पर भड़काऊ वीडियो अपलोड करता था। जब सोशल मीडिया एकाउंट बंद कर दिया गया, तो उसने इंस्टाग्राम पर भड़काऊ वीडियो डालना शुरू कर दिया था। इसके बाद इसकी गतिविधियों पर पुलिस की नजर पड़ी और गुजरात एसटीएस के साथ हरियाणा एसटीएस ने संयुक्त टीम बनाकर इसे गिरफ्तार कर लिया था। नीमका जेल में इससे पहले भी कई तरह की अनियमितताएं पाई गई थीं। नीमका जेल में 19 जून 2013 में पांच-पांच हजार रुपये लेकर बाहर से दो मोबाइल और चार्जर मंगाने का आरोप जेल वार्डन पर लगा था। 

इसके कुछ ही दिन बाद दो बंदियों के पास से दो मोबाइल फोन, चार्जर, सिम और बैटरी बरामद हुई थी। दिसंबर 2019 में भी इसी तरह की घटना नीमका जेल में हुई थी। क्राइम ब्रांच पुलिस ने कई घंटे की खोजबीन के बाद पांच मोबाइल फोन और तीन सिम कार्ड बरामद किए थे। इसी जेल में जून 2011 में दो कुख्यात अपराधी आपस में लड़ बैठे थे। इस घटना के विरोध में एक बंदी के परिवार वालों ने जेल के बाहर प्रदर्शन भी किया था। ऐसी सुरक्षित जेल में किसी बंदी की हत्या हो जाना सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल देती है।