Friday, February 27, 2026

सज्जन की उपाधि खरीदी या बेची नहीं जा सकती

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया के इतिहास में एक ऐसा भी राजा हुआ है जिसने उपाधियां पैसे लेकर बांटी थी। ऐसे राजा का नाम है जेम्स चार्ल्स स्टुअर्ट। इनका जन्म  सन 1566 में हुआ था। स्टुअर्ट एक लेखक भी थे। उन्होंने डेमोनोलॉजी (1597) और बेसिलिकॉन डोरॉन (1599) जैसी रचनाएँ लिखीं। उनके द्वारा प्रायोजित बाइबिल का अंग्रेजी अनुवाद 'किंग जेम्स संस्करण' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 

एलिजाबेथ प्रथम के निधन के बाद उन्हें राजगद्दी मिली थी, लेकिन बाद में वह स्कॉटलैंड, ब्रिटेन और आयरलैंड के शासक बने। तभी से उन्होंने अपने को ग्रेट ब्रिटेन का राजा कहना शुरू किया। यह तो सभी जानते हैं कि शासन व्यवस्था चलाने के लिए काफी धन की जरूरत होती है। 

राजकोष का धन बढ़ाने के लिए उन्होंने कई उपाय किए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसलिए उन्होंने लोगों से मोटी रकम लेकर उपाधियां बांटनी शुरू की। उन्होंने बहुत सारे लोगों को लॉर्ड, ड्यूक, प्रिंस जैसी तमाम उपाधियां पैसे लेकर बांटी। वह इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि इन उपाधियों को हासिल करने वाला व्यक्ति समाज में अपने अहंकार को तुष्ट करना चाहता है। 

उपाधि हासिल कर लेने से कोई महान नहीं हो जाता है। एक दिन वह दरबार मं बैठे तो एक आदमी ने आकर उनसे कहा कि  उसे सज्जन की उपाधि चाहिए। इसके लिए चाहे जितनी रकम खर्च करनी पड़े। स्टूअर्ट ने कहा कि मैं तुम्हें राजवंश से जुड़ी उपाधियां दे सकता हूं। तुम्हें लॉर्ड बना सकता हूं, ड्यूक बना सकता हूं, लेकिन सज्जन की उपाधि नहीं दे सकता हूं क्योंकि सज्जनता खरीदी या बेची नहीं सजा सकती है। इसे अपने कर्म और व्यवहार से कमाना पड़ता है। वह आदमी निराश होकर चला गया।

हरियाणा में सीएमश्री स्कूलों से गरीब बच्चों का सुधरेगा भविष्य


अशोक मिश्र

बेरोजगारी को छोड़कर देश में रहने वाले नागरिकों की दो प्रमुख समस्याएं हैं। पहली स्वास्थ्य और दूसरा शिक्षा। देश की बहुसंख्यक आबादी को स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का दंश झेलना पड़ता है। वहीं अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर भी उन्हें चिंतित होना पड़ता है। नागरिकों की शिक्षा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए सैनी सरकार ने सीएमश्री स्कूलों को खोलने की योजना तैयार की है। 

प्रदेश में पहले से ही 252 पीएमश्री स्कूल संचालित हैं। फिलहाल तो योजना के मुताबिक सीएमश्री स्कूल नए नहीं खोले जाएंगे, बल्कि जो सरकारी विद्यालय बंद हो गए हैं या कुछ सरकारी स्कूलों को ही अपग्रेड करके उन्हें सीएमश्री स्कूल बनाया जाएगा। इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में से 25 प्रतिशत गरीब छात्रों को मौका दिया जाएगा। इन्हें मुफ्त शिक्षा दी जाएगी। बाकी 75 प्रतिशत बच्चों से भी कम फीस ली जाएगी। वैसे यह योजना तो बहुत अच्छी है। 

यदि सरकारी स्कूलों को अपग्रेड कर दिया जाए, उनमें सुविधाएं बढ़ा दी जाएं, तो गरीब बच्चों को यहां पढ़ने की सुविधा मिलने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा। गरीब बच्चों को वैसे भी शिक्षा हासिल करने में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा का स्तर उठाने के लिए प्रदेश सरकार ने स्कूलों में नौ हजार से अधिक कमरे बनवाकर ढांचागत सुधार किए हैं, तो वहीं 'सीएम शाइन' जैसी पहल भी शुरू की गई है। इसके बावजूद सैनी सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। 

राज्य के सरकारी स्कूलों में 40 हजार से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं। इन पदों पर भर्तियां की जाएं, तो बच्चों की शिक्षा पूरी हो सकेगी। लगभग 298 स्कूलों में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है और 1,051 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर कैसा होगा, इसको समझा जा सकता है। यही नहीं, विभिन्न कक्षाओं के परिणाम शून्य रहने जैसी गंभीर चुनौतियां भी मौजूद हैं। पिछले सात वर्षों में 400 स्कूल मर्ज या बंद हुए हैं और लगभग पांच हजार कंप्यूटर लैब में इंटरनेट नहीं है। वैसे तो प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में सभी सुविधाएं होने का दावा करती है, लेकिन इस बात में आंशिक सच्चाई है। 

स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं की 18 प्रतिशत और शौचालयों की एक से दो प्रतिशत तक कमी है। जिन स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है, उन स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की परेशानी का समझा जा सकता है। अलग से लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था न होने की वजह से लड़कियां स्कूल आने से कतराने लगती हैं। कुछ लड़कियां तो स्कूल आना ही छोड़ देती हैं। कई स्कूलों की इमारतें काफी पुरानी हो चुकी हैं। ऐसे स्कूलों में हादसे का डर बना रहता है। बरसात के दिनों में यह डर और भी बढ़ जाता है।

Thursday, February 26, 2026

अमेरिका के संस्थापकों में से एक थे फ्रैंकलिन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बेंजामिन फ्रैंकलिन को अमेरिका के संस्थापकों में से एक माना जाता है। वह वैज्ञानिक होने के साथ-साथ लेखक, व्यंग्यकार, उद्यमी और राजनेता भी थे। उनका जन्म छह जनवरी 1706 में बोस्टन में हुआ था। उन्होंने बिजली की छड़, बाईफोकल्स, फ्रैंकलिन स्टोव, गाड़ी के ओडोमीटर और ग्लास 'आर्मोनिका' का आविष्कार किया। बेंजामिन के पिता जोशिया फ्रेंकलिन ने दो शादियां की थीं। 

दोनों पत्नियों से कुल मिलाकर उनकी 17 संतानें थीं। बेंजामिन के दस सगे भाई-बहन थे और वह अपनी मां के आखिरी पुत्र थे। बेंजामिन की अपने भाई जेम्स से नहीं पटती थी। जेम्स हमेशा बेंजामिन को लेकर कुछ न कुछ ताने मारता रहता था। इससे परेशान होकर बेंजामिन बोस्टन से भागकर फिलाडेल्फिया आ गया। 

फिलाडेल्फिया में उन्होंने काम पाने के लिए कई जगह हाथ-पांव मारे, लेकिन बात बनी नहीं। काम की तलाश में एक दिन बेंजामिन एक ऐसे प्रिंटर्स के यहां पहुंचे जिसके यहां कामकाज बंद पड़ा था। उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस से मालिक से काम मांगा, तो उसने कहा कि मेरी एक मशीन ंबंद पड़ी है। बेंजामिन ने मशीन देखने के बाद कहा कि इसे ठीक करने में दिन भर लग जाएगा, मैं पूरी दिहाड़ी लूंगा। 

मालिक मान गया। लेकिन बेंजामिन ने दोपहर में ही मशीन को ठीक कर दिया। मालिक ने जब पूरी दिहाड़ी दी, तो आधी दिहाड़ी वापस करते हुए कहा कि मेरा मेहनताना इतना ही बनता है। उनकी इस ईमानदारी से प्रिटिंग प्रेस का मालिक बहुत प्रभावित हुआ। उसने दूसरी मशीन ठीक करने को कहा। इस तरह परिश्रम करते हुए अंत में वह वैज्ञानिक, राजनेता,लेखक बन गए। उन्होंने 17 अप्रैल 1790 में दुनिया को अलविदा कह दिया।

कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है हरियाणा को नशामुक्त बनाना


अशोक मिश्र

मंगलवार को पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि पड़ोसी राज्य हरियाणा में नशीली दवाओं की बिक्री चिंता का विषय है। यह सच है कि हरियाणा में नशीले पदार्थोँ की बिक्री हो रही है, लेकिन कम से कम पंजाब को हरियाणा पर यह आरोप लगाने का हक नहीं है। पंजाब का नाम ही नशीले पदार्थों की बिक्री की वजह से ‘उड़ता पंजाब’ काफी पहले ही पड़ चुका था। नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले सपनों की रंगीन दुनिया में उड़ने लगते हैं, इसलिए नशे में डूबे रहने वाली अधिसंख्य आबादी की वजह से उस प्रदेश के नाम के साथ उड़ता शब्द जोड़ दिया जाता है। 

हरियाणा सरकार इस बात का भरसक प्रयास कर रही है कि राज्य से नशीले पदार्थों का समूल नाश कर दिया जाए। पंजाब में सक्रिय ड्रग माफिया हरियाणा में भी अपना नेटवर्ककायम किए हुए हैं। उधर राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी नशीले पदार्थ हरियाणा में आ रहे हैं। अफीम और पोस्त का छिलका राजस्थान, झारखंड,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से ही ज्यादातर आ रहे हैं। गांजा भांग की आपूर्ति हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों से हो रही है। इन दोनों प्रदेशों में अवैध रूप से गांजा ज्यादा पैदा किया जाता है। 

नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले लोग बड़े पैमाने पर हरियाणा में लाकर युवाओं को नशे का आदी बना रहे हैं। वैसे राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन के साथ-साथ स्वयंसेवी संस्थाएं बड़े पैमाने पर राज्य में नशामुक्ति अभियान चला रही हैं। स्कूल कालेजों और यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को खासतौर पर फोकस किया जा रहा है। उन्हें नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। 

स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों के आसपास नशीले पदार्थ बेचने वाले लोगों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। जिला स्तर पर खेल परिसरों और स्टेडियम पर भी पुलिस और नारकोटिक्स डिपार्टमेंट की निगाह रहती है। खिलाड़ियों पर भी नजर रखी जा रही है ताकि वह नशे के आदी बनकर अपना जीवन और करियर बरबाद न कर लें। राज्य सरकार ने जिलों में संचालित होने वाले अवैध वेलनेस सेंटरों पर भी कड़ी निगाह रखने का सख्त आदेश दिया है। 

संबंधित विभागों को निर्देश दिया जा चुका है कि वह जल्दी से जल्दी इन अवैध वेलनेस सेंटरों की जांच करके रिपोर्ट पेश करें। राज्य में नशे के कारोबार को रोकने के लिए पुलिस और नारकोटिक्स विभाग को अपना नेटवर्कबढ़ाना होगा। शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में भी नशीले पदार्थ का कारोबार बढ़ रहा है। नशा माफिया नशीले पदार्थ की सप्लाई और बिक्री के लिए महिलाओं का सहारा ले रहे हैं। इसका कारण यह है कि महिलाओं पर लोगों और प्रशासन का शक कम होता है। महिलाएं बड़ी चतुरता से नशीले पदार्थ की सप्लाई कर देती हैं।

Wednesday, February 25, 2026

ब्राह्मण की मदद करने को खतरे में डाला जीवन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

छत्रपति शिवाजी में युद्ध नीति बनाने की असाधारण प्रतिभा थी। उनका जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। उनके पिता शाहजी राजे भोसले एक शक्तिशाली सामंत परिवार में जन्मे थे। शाहजी राजे की दो पत्नियां थीं। शिवाजी की माता जीजाबाई ने ही अपने पुत्र का पालन-पोषण किया था। 

बचपन से ही जीजाबाई ने अपने बेटे को युद्ध और रणनीति बनाने की शिक्षा दी थी। यह उस युग की मांग थी। शिवाजी का 1674 में रायगढ़ में राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति की उपाधि धारण की थी। उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब से कई लड़ाइयां लड़ी थीं। एक बार की बात है। मुगलों की सेना से बचने के लिए वह वेष बदलकर गांव-गांव घूम रहे थे। 

एक दिन वह एक ब्राह्मण के यहां रहने गए। ब्राह्मण काफी गरीब था। उसको अपना और अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन उसने शिवाजी को प्रतिदिन भरपेट भोजन कराया। कई दिनों तक वह खुद भूखा रहा। जब यह बात शिवाजी को पता चली, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। वह सोचने लगे कि इस ब्राह्मण की कैसे मदद की जाए। उन्होंने वहां के एक मुगल सूबेदार को पत्र लिखा कि इस ब्राह्मण के घर में शिवाजी छिपे हुए हैं। 

शिवाजी को गिरफ्तार कर लो, लेकिन इस ब्राह्मण को दो हजार अशर्फियां दे दो। मुगल सूबेदार ने दो हजार अशर्फियां देने के बाद शिवाजी को गिरफ्तार कर लिया। जब यह बात ब्राह्मण को पता चली तो वह फूटफूटकर रोने लगा। उसी दिन तानाजी ने हमला करके शिवाजी को कैद से छुड़ा लिया। इस तरह अपना जीवन खतरे में डालकर भी शिवाजी ने ब्राह्मण की मदद की। लोगों की मदद करने में शिवाजी हमेशा आगे रहते थे।

विवशता से उपजे क्रोध के कारण बढ़ रही आपराधिक घटनाएं

अशोक मिश्र

अंबाला कैंट में मामूली सी बात को लेकर हुई बहस के दौरान हुए झगड़े में बीच बचाव करने आए एक युवक की हमलावरों ने हत्या कर दी। वैसे तो यह घटना एक सामान्य घटना की ही तरह है। लेकिन इस घटना से आजकल युवाओं में छोटी-छोटी बात पर उग्र रूप धारण कर लेने की प्रवृत्ति का खुलासा होता है। रविवार को अंबाला कैंट के जगाधरी रोड पर सिया वाटिका में शादी रिसेप्शन पार्टी आयोजित की गई थी। सिया वाटिका पैलेस में डेकोरेशन का काम जसराज उर्फ जस्सा को मिला था। 

रविवार होने की वजह से अंबाला के जैन स्कूल में ड्राइवर का काम करने वाला सोनू भी अपने दोस्त जस्सा के साथ वहां आया हुआ था। पार्किंग एरिया में सात-आठ युवकों ने जस्सा को घेर लिया और बहस करने लगे। यह बहस थोड़ी देर में मारपीट में बदल गई। मारपीट होता देख सोनू और भूपेंद्र बीच-बचाव करने आए। हमलावरों ने सोनू को घेर कर चाकू से हमला किया। पीठ में चाकू घोंप देने से सोनू की तत्काल मौत हो गई और भूपेंद्र गंभीर घायल हो गया। हमलावर भाग खड़े हुए। 

लोगों का अनुमान है कि किसी छोटी-मोटी बात को लेकर हमलावरों में से किसी एक के साथ जस्सा की बहस हुई थी। इस बहस ने ही बात में विकराल रूप धारण कर लिया और बात हत्या तक पहुंच गई। पिछले कुछ दशकों से युवा पीढ़ी लगातार उग्र होती जा रही है। मामूली बात पर हत्या कर देने, आत्महत्या कर लेने या फिर मारपीट कर लेने जैसी घटनाएं अब सामान्य रूप से देखने को मिल रही हैं। इसके कई कारण भी बताए जाते हैं। जब से एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है और माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, ऐसी स्थिति में वह अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। 

कम से कम आठ-दस घंटे एकाकी जीवन बिताने वाले बच्चों के मन में अपने परिजनों को लेकर एक आक्रोश पनपने लगता है। ऐसी स्थिति में वह मनमानी करने पर उतारू हो जाते हैं। माता-पिता यदि उनके किसी काम का विरोध करते हैं, तो मन में पहले से ही संचित आक्रोश फूट पड़ता है और वह अपराध कर बैठते हैं। पढ़ाई लिखाई करने के बाद भी जब युवाओं को नौकरी नहीं मिलती है अथवा माता-पिता कोई स्वरोजगार करवा पाने में सक्षम नहीं होते हैं, तो वह अपराध की ओर मुड़ जाते हैं। अपना खर्च चलाने के लिए वह लूटपाट, हत्या, चोरी-डकैती जैसे अपराध में लिप्त हो जाते हैं। 

मोबाइल पर खेले जाने वाले कुछ गेम्स भी युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रहे हैं। वह दिमाग को इतना कुंठित कर देते हैं कि वह सही गलत का फैसला नहीं कर पाते हैं और अपराध कर बैठते हैं। अशिक्षा, गरीबी, बेकारी जैसी समस्याओं ने युवाओं को इतना निराश कर दिया है कि वह अपने को असहाय समझने लगे हैं। इस असहायता से उपजे क्रोध के कारण भी समाज में आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं।

Tuesday, February 24, 2026

चिकित्सक के साथ राजनेता भी थे एंटोनियो एगास मोनिज

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एंटोनियो एगास मोनिज ने अपनी खोजों से मानवता की बहुत सेवा की। उन्होंने मस्तिष्क में होने वाली बीमारियों के इलाज और आपरेशन का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने ल्यूकोटॉमी नामक शल्य क्रिया विकसित की जिससे दिमागी बीमारियों के इलाज का रास्ता खुला। 

मोनिज को बचपन से ही दिमाग के रहस्यों को सुलझाने में दिलचस्पी थी। वह मनुष्य के दिमाग को सबसे रहस्यमय मानते थे। जब बड़े हुए तो भी उनके दिमाग में यही बात आती रही कि दिमाग में होने वाली बीमारियों का इलाज कैसे किया जाए और कैसे पता लगाया जाए कि दिमाग के अमुक हिस्से में परेशानी है। मोनिज का जन्म 29 नवंबर 1874 को पुर्तगाल में हुआ था। 

मोनिज ने स्नातक करने के बाद लिस्बन विश्ववद्यिालय में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर नियुक्त हुए। इसके बाद मोनिज की यात्रा कभी रुकी नहीं। करीब बारह साल तक बार-बार विफल होने के बाद 1927 में उन्होंने सेरेबल एंजियोग्राफी तकनीक विकसि की जिससे मस्तिष्क की रक्त नलिकाओं की तस्वीर लेना संभव हुआ। इस खोज ने चिकित्सा जगत में नई क्रांति लगा दी इससे मस्तिष्क के रोगों का इलाज संभव हो पाया। 

इस नई खोज के लिए सन 1929 में मोनिज को नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। मोनिज को बचपन से ही राजनीति में भी दिलचस्पी थी। वह लोकतंत्र के समर्थक थे। इसके लिए कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सन 1900 में वह सासंद चुने गए। उनका परिवार राजशाही का समर्थक था, लेकिन मोनिज लोकतंत्र समर्थक थे। वह स्पेन के राजदूत भी नियुक्त किए गए। 1917 में वह विदेश मामलों के मंत्री भी बनाए गए। 1919 को उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। 13 दिसंबर 1955 को 81 वर्ष की आयु में चिकित्सक और राजनेता मोनिज की मृत्यु हो गई।

सड़कों पर बेलगाम दौड़ती गाड़ियों पर कब लगेगा अंकुश?

अशोक मिश्र

पिछले शनिवार को दिल्ली में एक बेलगाम वर्ना कार ने डिलीवरी ब्वाय  हेम शंकर को कुचल दिया। इलेक्ट्रिक स्कूटी सवार हेम शंकर को टक्कर मारने के बाद भी कार सवार रुका नहीं। राजधानी दिल्ली में आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। अगर हादसों के आंकड़े इकट्ठे किए जाएं, तो पता चलता है कि हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों में अमीरजादों की एक अच्छी खासी संख्या है। कानपुर में ही दस करोड़ की गाड़ी में सवार शिवम मिश्रा ने एक युवक को कुचल दिया और मौके से भाग खड़ा हुआ। 

बाद में लोगों के दबाव पर शिवम मिश्रा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। उसे गिरफ्तार किया गया। हमारे देश और प्रदेश में ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। अमीर परिवार के लड़के-लड़कियां ट्रैफिक नियमों का पालन करना, अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। वह यह समझ लेते हैं कि पैसे के बल पर कुछ भी किया जा सकता है और कुछ भी हासिल किया जा सकता है। 

उन्हें अपने परिवार के पैसे और ओहदे पर बड़ा अभिमान होता है। लग्जरी गाड़ियों पर नंबर प्लेट तक ठीक ढंग से नहीं लगवाते हैं। बेतुकी नंबर प्लेटों को देखकर पता नहीं चलता है कि गाड़ी का नंबर क्या है? ट्रैफिक पुलिस कर्मी भी इन्हें देखकर अनदेखा कर देते हैं। नंबर प्लेटों के साथ खिलवाड़ तो जैसे आम बात हो गई है। कई गाड़ियों में तो नंबर प्लेट बहुत छोटी होती है और उसके ऊपर या नीचे बड़े बड़े अक्षरों में जाति या धर्म सूचक शब्द लिखा होता है, पार्टी का नाम लिखा होता है या फिर कोई धार्मिक चिह्न बना होता है। 

नंबर प्लेट के आसपास ही बड़े बड़े अक्षरों में अटपटे शब्द लिखे होते हैं। यह हाल पूरे हरियाणा का है। राज्य के हर जिले में ऐसी कई गाड़ियां देखने को मिल जाएंगी जिनका नंबर नजदीक से भी देखने पर पता नहीं चलता है। ऐसी स्थिति में इन गाड़ियों के मालिक यदि कोई हादसा करके भाग जाएं, तो इनका पता लगाना काफी मुश्किल होता है। राज्य के हर जिले के प्रमुख चौराहों पर सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं। इसके बावजूद इनके खिलाफ शायद ही कार्रवाई की जाती हो। केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के तहत गाड़ियों पर गलत, फैंसी, धार्मिक या अपठनीय नंबर प्लेट लगाने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। 

वैसे तो वाहनों पर हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट को अनिवार्य किया गया है, लेकिन ऐसी प्लेट बहुत ही कम गाड़ियों पर लगी मिलती है। नंबर प्लेट  पर अंग्रेजी अक्षर और अंक ही होने चाहिए, लेकिन कुछ लोग नंबर प्लेट पर ऐसी कलाकारी करवाते हैं कि उसे देखने पर पागल लिखा दिखाई देता है। ऐसी गाड़ियों को चलाना अपराध की श्रेणी में आता है। ट्रैफिक पुलिस यदा-कदा ऐसी गाड़ियों के खिलाफ मुहिम भी चलाती है, लेकिन गाड़ी मालिक जुर्माना अदा करने के बाद फिर से वही करने लगते हैं। ऐसे लोगों पर यदि भारी जुर्माना लगाया जाए या उनका लाइसेंस ही सस्पेंड कर दिया जाए, तो शायद सुधार हो सकता है।

Monday, February 23, 2026

आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, काम से होती है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मैडम क्यूरी पहली महिला थीं जिन्हें भौतिक और रसायन का नोबल मिला था। पियरे क्यूरी से विवाह करने के बाद वह पूरी दुनिया में मैडम क्यूरी के नाम से जानी गईं। पोलैंड में जन्मी मैडम क्यूरी का वास्तविक नाम मारिया स्क्लाडोवका था। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। 

बड़ी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। यह पहला परिवार था जिसने पांच नोबेल पुरस्कार हासिल किया था। इतनी प्रसिद्धि के बावजूद मैडम क्यूरी सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करती थीं। पूरी दुनिया में ख्याति के बावजूद वह दिन-रात जब भी मौका मिलता था, वह अपने प्रयोगशाला में प्रयोग करती रहती थीं। पति-पत्नी दोनों वैज्ञानिक थे, इस वजह से दोनों एक दूसरे का बहुत सम्मान भी किया करते थे। 

एक बार की बात है। एक युवा पत्रकार उनका साक्षात्कार लेने उनके घर आया। उस समय मैडम क्यूरी एक बहुत ही साधारण कपड़े पहनकर बाहर बैठी हुई थीं। उस पत्रकार ने मैडम क्यूरी से पूछा कि क्या तुम यहां की नौकरानी हो? मैडम क्यूरी ने जवाब दिया है-हां, मैं इस घर की नौकरानी हूं। उस पत्रकार ने कहा कि क्या मैडम क्यूरी घर में हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-वह बाहर गई हैं। 

पत्रकार ने पूछा कि वह कब तक आएंगी? क्यूरी ने जवाब दिया-पता नहीं। पत्रकार ने फिर पूछा, कुछ कहकर गई हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-हां, उन्होंने कहा है कि आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, उसके काम से होती है। यह सुनते ही उस पत्रकार ने उन्हें गौर से देखा तो पता लगा कि यही तो मैडम क्यूरी हंै। वह उनकी सादगी से बहुत प्रभावित हुआ।

पेड़ों की अवैध कटान के चलते संकुचित हुआ वन्यजीव गलियारा

अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान के चलते वन्य जीवों का गलियारा काफी संकुचित हुआ है। यही वजह है कि अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीव यदा कदा मानव बस्तियों में घुस आते हैं। इससे कई बार जनहानि भी होती है। ज्यादातर मामलों में समय पर पता लग जाने की वजह से लोग उन्हें विभिन्न उपायों से जंगल की ओर भगा देते हैं। मानव हस्तक्षेप की वजह से वन्य जीवों के लिए स्वाभाविक ईको सिस्टम अरावली क्षेत्र में प्रभावित हो रहा है। 

लेकिन यह प्रभाव किस रूप में पड़ रहा है, वन्य जीवों की आबादी घट रही है या बढ़ रही है, इसका भी कोई सटीक आंकड़ा नहीं है क्योंकि सन 2017 से अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती ही नहीं हुई है। हालांकि यह जरूर कहा जा रहा है कि जल्दी ही अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती कराई जाएगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनकी आबादी कितनी बढ़ी या घटी। 

पुराने आंकड़े बताते हैं कि 2017 के सर्वे में 31 तेंदुए मिले थे। अनुमान है कि अब यह संख्या बढ़कर 80-90 के करीब हो सकती है। उस सर्वे में यह भी पता चला था कि सन 2017 में 167 नीलगाय, 126 लकड़बग्घे, 26 जंगली बिल्लियाँ, 91 पोरक्यूपाइन (साही), 50 नेवले, चार लोमड़ी, और 61 ताड़ के सिवेट भी रिकॉर्ड किए गए थे। रिपोर्ट में 14 चिंकारा और 23 मोर के साथ दूसरे जानवर दिखने की बात भी कही गई थी। ऐसा नहीं है कि सरकार ने वन्यजीवों की गिनती कराने का प्रयास नहीं किया था। 

2017 के बाद देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को सर्वे का काम सौंपा गया था। अरावली क्षेत्र में बड़े जोर-शोर से सर्वे भी किया गया था, लेकिन इंस्टीटूयूट ने अभी तक सर्वे रिपोर्ट भी जारी नहीं की है। प्रदेश सरकार ने कई बार सर्वे रिपोर्ट भी मांगी, लेकिन इंस्टीट्यूट ने जवाब देना उचित ही नहीं समझा। ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि एक बार नए सिरे से वन्यजीवों की गिनती कराई जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि वास्तविक स्थिति क्या है? यदि वन्य जीवों की संख्या घट रही है, तो इनकी जनसंख्या बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए। 

यह पता लगाया जाए कि वह कौन से कारण हैं जिनकी वजह से जीवों की संख्या घट रही है। उन कारणों को दूर करके वन्य जीवों की आबादी बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया जाए। यदि बढ़ रही है, तो भी उन कारणों को चिन्हित किया जाए, ताकि इसका उपयोग दूसरी जगहों पर किया जा सके। हमें दोनों हालात की जानकारी होनी चाहिए। पिछले कई सालों से अरावली क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। 

रसूख वाले लोग अपने फार्म हाउस, मैरिज हाल आदि बनवाकर वन्य जीवों के रहन-सहन को बाधित कर रहे हैं। वन्यजीव गलियारे में इंसानों के आवागमन की वजह से उन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।