Wednesday, September 2, 2026

इस जैसा प्रेमी आदमी कभी नहीं देखा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

किसी गांव में जूता सिलने वाला व्यक्ति रहता था। गरीब था। दो जून की रोटी का ठिकाना भी बड़ी मुश्किल से हो पाता था। उस गांव में महात्मा बुद्ध का प्रवचन होना था। लेकिन उसे इन बातों से मतलब भी नहीं था रोजी-रोटी कमाने के चक्कर में। एक दिन वह सुबह सोकर उठा और पास के तालाब में गया, तो उसे एक सुंदर फूल दिखाई दिया। उसने कीचड़ में घुसकर उस फूल को तोड़ा और उसे बेचने के लिए शहर की ओर चल दिया। 

सोचा, आठ आने, एक रुपया मिल जाएगा, तो दो दिन का खर्च चल जाएगा। जैसे ही वह गांव के बाहर पहुंचा, रास्ते में नगर सेठ ने उसके हाथ में फूल देखा, तो कहा कि इस फूल के मैं दो रुपये दूंगा। यह फूल मुझे दे दो। गरीब आदमी खुश हो गया। तभी राजा के एक मंत्री वहां आ पहुंचे और उन्होंने कहा कि मैं इस फूल के पांच रुपये दूंगा। यह फूल मेरा हुआ। 

नगर सेठ और मंत्री में हो रहा विवाद निपटा भी नहीं था कि वहां राजा की सवारी आ पहुंची। राजा ने उस फूल को देखते ही कहा कि यह फूल मेरा हुआ। मैं तुम्हें राजकोष से इतना धन दूंगा कि तुम्हें जीवन भर मेहनत करने की जरूरत नहीं होगी। देखते ही देखते उस फूल की कीमत हजारों रुपये हो गई। अब गरीब व्यक्ति ने राजा से पूछा कि आखिर इस फूल में ऐसी क्या खासियत है जो इतना महंगा हो गया। 

राजा ने सारी बात बताई कि इस गांव में महात्मा बुद्ध का आगमन होने वाला है। हम इसे बुद्ध को भेंट करना चाहते हैं। यह सुनकर उस व्यक्ति ने फूल बेचने से मना कर दिया। शाम को जब बुद्ध गांव में पहुंचे, तो उस व्यक्ति ने बुद्ध को प्रणाम करते हुए उस फूल को अर्पित कर दिया और एक कोने में जाकर खड़ा हो गया। बुद्ध के कानों तक फूल की कथा पहुंच चुकी थी। उन्होंने कहा कि जिस आदमी के पास खाने के पैसे नहीं हैं। वह आदमी इतना बड़ा त्याग कर रहा है। मैं वर्षों से भ्रमण कर रहा हूं, इस जैसा प्रेमी आदमी कभी नहीं मिला।

कभी शुद्ध जल का स्रोत रही यमुना नदी का पानी छूने लायक नहीं रहा

अशोक मिश्र

हरियाणा में यमुना नदी की हालत इन दिनों चिंताजनक है। प्राचीनकाल से लेकर चार-पांच दशक पहले तक यह नदी शुद्ध जल का स्रोत मानी जाती थी। अब यमुना नदी कई स्थानों पर मानक से कहीं अधिक प्रदूषित हो चुकी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अभी हाल में जो आंकड़े जारी किए हैं, उसके मुताबिक जब हरियाणा में यमुना नदी प्रवेश करती है, तो उसका पानी अपेक्षाकृत साफ होता है। फरीदाबाद और पलवल तक पहुंचने के बाद वह एक गंदे नाले में तब्दील हो जाती है। इन दोनों जिलों में यमुना नदी मानक से 27 गुना ज्यादा प्रदूषित पाई गई है। इसका सबसे बड़ा कारण है सीवेज और औद्योगिक कचरे का बिना उपचार के सीधा नदी में जाना। 

हरियाणा के पास अपने घरेलू गंदे पानी के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से को रिसाइकिल करने की क्षमता है, लेकिन हकीकत में राज्य प्रतिदिन कम से कम 1140 एमएलडी अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित सीवेज यमुना में छोड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यमुना में पहुंचने वाले कुल प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला गुरुग्राम छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत में हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नदी में जा रहा है। फरीदाबाद की सैकड़ों अवैध डाइंग और टेक्सटाइल इकाइयां रासायनिक और रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में बहा रही हैं। 

बल्लभगढ़-पलवल से भी बिना शोधन का सीवेज गिरता है, इसलिए वजीराबाद से ओखला के बीच 22 किमी का हिस्सा सबसे अधिक प्रदूषित माना ही जाता है। यमुना नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए सरकारी प्रयास कई दशकों से चल रहे हैं, पर कमी कार्यान्वयन में रह गई है। यमुना कार्य योजना के पहले और दूसरे चरण में कुल 1514.42 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। 

तीसरे चरण के लिए 1656 करोड़ रुपये की संशोधित लागत मंजूर की गई है। एनजीटी ने कई बार हरियाणा को एसटीपी अपग्रेड करने की डेडलाइन दी, नालों की निगरानी के लिए विशेष समिति बनवाई और सीपीसीबी को तिमाही आधार पर एसटीपी के प्रदर्शन की निगरानी का निर्देश दिया। 2027 तक नालों के बीओडी स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम करने का लक्ष्य रखा गया है। ड्रोन सर्वेक्षण से नालों की मैपिंग हो रही है, सीवर लाइनें लगभग पूरी बिछाई जा चुकी हैं और अवैध डिस्चार्ज पर कार्रवाई भी हो रही है। 

कई जगह क्षमता बढ़ी है और कुछ नालों से उपचारित पानी की मात्रा पहले से ज्यादा हो गई है। फिर भी कमी बनी हुई है। नदियों के प्रदूषण का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव गहरा है। यमुना और घग्गर के किनारे की खेती पर असर पड़ रहा है। उच्च टीडीएस और रासायनिक कचरे वाला पानी फसलों और मवेशियों के लिए खतरनाक है, भूजल में भी 30 से 50 प्रतिशत तक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। पीने के पानी में अमोनिया बढ़ने से क्लोरीन के साथ मिलकर कैंसर तक का खतरा बताया गया है।

Tuesday, September 1, 2026

खरगोश बोला, भागो! आकाश फट पड़ा है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एक बार किसी शिष्य ने महात्मा बुद्ध से पूछा कि भंते! जब भय पैदा होता है, तो वह सोचने विचारने की क्षमता क्यों हर लेता है? अपने शिष्य की बात सुनकर महात्मा बुद्ध ने उन्हें एक कथा सुनाई। वाराणसी में एक खरगोश रहता था। वह एक दिन अपनी घनी झाड़ियों में सो रहा था। 

कुछ देर पहले ही उसने भरपेट भोजन किया था। नींद में उसने सपना देखा कि वह किसी महल में सोया हुआ है। उस महल की छत टूटकर गिर गई है और वह मलबे में दबता जा रहा है। तभी संयोग से पास में ही लगे बेल के पेड़ से एक फल टूटकर गिरा। गिरने पर बड़ी जोर की आवाज हुई। उसने आकाश की ओर देखा। उसने सोचा कि आकाश फट पड़ा है। वह आत्मरक्षा के लिए भाग खड़ा हुआ। 

रास्ते में उसे हिरनों का एक झुंड मिला। उसने भागने का कारण पूछा, तो भागते-भागते खरगोश ने कहा कि पीछे आकाश फट पड़ा है। मैं सुरक्षित स्थान पर शरण लेने जा रहा हूं। जान बचानी है, तो तुम भी भागो। हिरनों का झुंड भी भागने लगा। इस तरह रास्ते में भेड़, बकरी, गाय जैसे तमाम जानवर मिलते गए और बिना कोई कारण जाने सब भागने लगे। भागते-भागते वह पहाड़ी घाटी में पहुंच गए। 

वहां एक शेर खड़ा हुआ था। उसने उन सबको रोका और पूछा कि तुम लोग भाग क्यों रहे हो? खरगोश ने कहा कि आकाश फट पड़ा है। शेर ने कहा कि ऊपर देखो, आकाश तो वहीं है। सारे जानवरों ने जब ऊपर देखा, तो विश्वास हुआ कि बादल नहीं फटा है। सब खरगोश को कोसते हुए लौट पड़े। यह कथा सुनाकर बुद्ध ने अपने शिष्य से कहा कि जब मन में भय पैदा होता है, तो सोचने-विचारने की शक्ति खत्म हो जाती है। ऐसा ही आध्यात्मिक जगत में भी होता है।

छोटी-छोटी जगहों पर पौधरोपण कर बढ़ाई जा सकती है हरियाली


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में हरियाली बढ़ाने और शहरी वन क्षेत्र में वृद्धि करने के लिए डीएनडी-केएमपी (दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट फ्लाईवे-कुंडली-मानेसर-पलवल) एक्सप्रेसवे लिंक रोड किनारे पौधे और झाड़ियां उगाई जाएगी, ताकि इन क्षेत्रों में हरियाली आ सके। दरअसल, हरित क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास तो पूरे हरियाणा में हो रहा है। इसमें जहां सरकार अपनी ओर से प्रयास कर रही है, वहीं स्वयंसेवी संस्थाओं और स्कूल-कालेजों का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है। राज्य सरकार वन महोत्सव, कैम्पा फंड, ग्रीन इंडिया मिशन, नगर वन योजना और एक पेड़ मां के नाम जैसी पहलों के जरिए करोड़ों पौधे लगाने का लक्ष्य रख रही है। 

हाल ही में एक करोड़ चालीस लाख पौधों का अभियान शुरू किया गया, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों, पंचायत भूमि, सड़कों और नहरों के किनारे रोपण शामिल है। मियावाकी वन और विरासत पेड़ों के संरक्षण जैसी नई पहलें भी हो रही हैं, ताकि शहरों और गांवों में हरियाली बढ़े। सरकारी प्रयासों से वनक्षेत्र बढ़ाने में सफलता सीमित रही है। दो हजार उन्नीस से दो हजार तेईस के बीच करीब एक हजार करोड़ रुपये केंद्रीय फंड मिलने के बावजूद वन आवरण में सिर्फ बारह वर्ग किमी का इजाफा हुआ। 

दस साल की अवधि में भी वृद्धि तीस वर्ग किमी के आसपास ही रही। घने वनों में कमी आई है जबकि खुले वन और स्क्रब लैंड थोड़े बढ़े हैं। कई जिलों में वन आवरण घटा है। पौधे लगाने के बावजूद उनकी जीवित रहने की दर कम रहना और भूमि की उपलब्धता सीमित होना प्रमुख बाधाएं हैं। हाल में सरकार ने रोपण के बाद रखरखाव पर ज्यादा जोर दिया है और बड़े-बड़े पांच हेक्टेयर के टुकड़ों में रोपण की नीति अपनाई है, ताकि निगरानी आसान हो। अरावली इलाके की स्थिति सबसे चिंताजनक है। 

दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में फैली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली ही रेगिस्तान को रोकने, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता को बचाने की दीवार है, पर अवैध खनन, फार्महाउसों के लिए जंगल कटाई और शहरीकरण ने इसे खोखला कर दिया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक स्टडी के अनुसार 2001 से 2016 के बीच हरियाणा के अरावली क्षेत्र में वन आवरण में 37 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिसका सीधा संबंध खनन गतिविधियों से है।  

अरावली ग्रीन वॉल जैसी परियोजनाओं से सुधार की उम्मीद है। पहले से ही सड़कों, नहरों और रेलवे लाइनों के किनारे पट्टी वाले वन मौजूद हैं। इन जगहों पर और पौधे लगाकर हरे गलियारे बनाए जा सकते हैं, जो वायु प्रदूषण कम करने और तापमान नियंत्रित करने में मददगार साबित होंगे। शहरी क्षेत्रों में संस्थानों और खाली पड़े स्थानों पर भी रोपण संभव है। भूमि की कमी के कारण बड़े ब्लॉक बनाना मुश्किल है, लेकिन छोटी-छोटी जगहों का भी सही उपयोग किया जाए तो असर दिख सकता है।

Monday, August 31, 2026

काम, क्रोध और लोभ पर विजय पाने की विद्या सीखी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्रावस्ती में एक युवक था अंकमाल। बौद्ध कथाओं में इसका कई बार जिक्र आया है। कुछ लोग अंकमाल और अंगुलिमाल को एक ही मानते हैं। शायद यह दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं। एक दिन युवा अंकमाल महात्मा बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ। उसने बड़ी विनम्रता से कहा कि भंते! मैं संसार की सेवा करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि आप जहां उचित समझें, मुझे भेज दें ताकि लोगों को मैं धर्म का रास्ता बता पाऊं। 

अंकमाल की बात सुनकर महात्मा बुद्ध हंसे और बोले, दुनिया को कुछ के लिए तुम्हारे पास भी तो कुछ होना चाहिए। जाओ, अपनी योग्यता बढ़ाओ। अंकमाल वहां से चला गया। उसने दस साल तक कठोर परिश्रम करके 24 कलाएं सीखीं। तीर बनाने से लेकर नाव चलाने तक की विद्याएं सीखने से उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। वह कलाविशारद कहा जाने लगा। उसे अपने ऊपर अभिमान हो गया। 

वह महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा और अभिमानपूर्वक कहा कि मैं अब 24 कलाओं को जानता हूं। हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूं। बुद्ध ने कहा कि तुमने योग्यता हासिल की है, लेकिन परीक्षा नहीं दी है। एक दिन वेष बदलकर बुद्ध उसके पास पहुंचे और उसकी बुराई करने लगे। वह उन्हें क्रोधित होकर मारने दौड़ा। उसी दिन वह आम्रपाली के साथ उससे मिलने पहुंचे, तो वह पूरे समय आम्रपाली को ही देखता रहा। उसी दिन दोपहर में दो बौद्ध श्रमण पहुंचे और उससे कहा कि महाराज आपको मंत्रीपद देना चाहते हैं क्या स्वीकार करेंगे? 

अंकमाल को लोभ आ गया। वह बोला, हां..हां, अभी चलो। दोनों श्रमण चुपचाप चले गए। शाम को अंकमाल को तथागत ने बुलवाया और पूछा, वत्स! तुमने काम, क्रोध और लोभ पर विजय पाने की विद्या सीखी है। अंकमाल चुप रह गया। उसे दिन हुई सारी घटनाएं याद आईं। उसने लज्जा से सिर झुका लिया। उस दिन से आत्म विजय की साधना शुरू कर दी।

हरियाणा के 62 प्रतिशत इलाकों में पीने लायक नहीं रहा पानी

अशोक मिश्र

हरियाणा में अब सवाल यह नहीं है कि लोगों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। असली सवाल यह है कि जिन लोगों को पीने का पानी मिल रहा है, वह पानी पीने लायक है भी या नहीं। नूंह और पलवल के लगभग 103 गांवों में लोगों को निर्धारित मात्रा से चालीस लीटर पानी कम मिल रहा है। कांग्रेस विधायक आफताब अहमद के सवाल का जवाब देते हुए जन स्वास्थ्य अभियंत्रिकी मंत्री रणबीर गंगवा ने बताया कि राज्य के 297 गांवों में प्रति व्यक्ति दैनिक पेयजल उपलब्धता 55 लीटर से कम है। 

इन गांवों में जो पानी मिल रहा है, उसका टीडीएस यानी पानी में कुल घुले हुए ठोस पदार्थ कई जगहों पर सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। इसी तरह की स्थिति प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी है। लवल में औसत टीडीएस तीन साल में 74 प्रतिशत बढ़कर 940 से 1,636 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया है और जिले के सभी छह ब्लॉक प्रभावित हैं। नूंह के इंदरी ब्लॉक में टीडीएस लगभग दोगुना होकर 1,002 से 1,974 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया है, जो 2,000 मिलीग्राम प्रति लीटर की उस अंतिम सीमा के बेहद करीब है जिसे भारतीय मानक केवल तभी स्वीकार करते हैं जब कोई वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध न हो। 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अनुसार प्रदेश के 61.33 प्रतिशत क्षेत्र में भूजल का अति-दोहन हो रहा है। रासायनिक उर्वरकों और औद्योगिक कचरे से भूजल में नाइट्रेट, फ्लोराइड और भारी धातुओं का घुलना है, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रह गया। इस स्थिति के लिए जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी हुई है। लंबे समय से भूजल का अत्यधिक दोहन होता रहा है। कृषि में पानी की अधिक खपत, नहरी पानी की अपर्याप्त उपलब्धता और भूजल पर निर्भरता ने संकट को गहराया। कई क्षेत्रों में भूजल स्वाभाविक रूप से खारा या खनिजों से युक्त है, लेकिन उपचार संयंत्र और नहर आधारित वैकल्पिक स्रोत विकसित करने में पर्याप्त गति नहीं दिखाई गई। 

जनस्वास्थ्य विभाग की परियोजनाओं में देरी, रखरखाव की कमी और निगरानी की कमजोरी भी समस्या बढ़ाती है। अवैध कनेक्शन पानी को अंतिम छोर तक पहुंचने से रोकते हैं। जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल का लक्ष्य पूरा होने का दावा किया जाता है, लेकिन पानी की गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो पाई। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर योजनाएं बनीं, लेकिन धरातल पर उनके क्रियान्वयन में अंतर रहा। शासन-प्रशासन को अब ठोस और त्वरित कदम उठाने की जरूरत है। 

हरियाणा के गांवों में पेयजल संकट अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं रह गया है। सरकारी आंकड़े खुद समस्या की गंभीरता स्वीकार करते हैं। अब जरूरी है कि घोषणाओं से आगे बढ़कर प्रभावी क्रियान्वयन हो, ताकि हर घर तक स्वच्छ और पर्याप्त पानी पहुंचे। जल संकट सिर्फ प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य और जीवन स्तर से जुड़ा मुद्दा है। 

Sunday, August 30, 2026

विशाखे! अपने भीतर ही सुख की तलाश करो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

विशाखा को मिगारमाता भी कहा जाता है। वह श्रावस्ती के सबसे धनी व्यापारी मिगारा की पुत्रवधू थी। विशाखा साकेत (अयोध्या) के एक धनी व्यापारी की पुत्री थी और उसका विवाह मिगारा के पुत्र पुन्नवद्धन के साथ हुआ था। एक बार की बात है। मिगारा के दरवाजे पर एक भिक्षुक आया। भिक्षाम देहि की आवाज सुनकर विशाखा द्वार पर आई और जोर से कहा कि भोजन बासी है। जब ताजा होगा, तब आना। विशाखा अपने पितृगृह में रहते हुए ही महात्मा बुद्ध से प्रभावित थी।

 विशाखा की बात सुनकर मिगारा ने कहा कि यह क्या कह रही हो? भोजन तो ताजा बना है। तब विशाखा ने कहा कि पिता जी, आज हम सब जो कुछ भी खा रहे हैं, ऐश्वर्य का भोग कर रहे हैं, वह तो पूर्व जन्मों का प्रतिफल है। इस जन्म में आपने कोई पुण्य तो कमाया नहीं है। इसलिए भोजन बासी हुआ न। बात मिगारा के समझ में आ गई। तब उसने अपनी पुत्रवधू को माता का दर्जा दिया और तब से वह मिगारमाता के नाम से प्रसिद्ध हुई। 


बाद में मिगारा ने भी बौद्ध धर्म अपना लिया। एक बार जब महात्मा बुद्ध श्रावस्ती आए, तो वह मिगारमाता के पूर्णाराम में विश्राम कर रहे थे। निरंतर यात्रा की वजह से वह कुछ थकान महसूस कर रहे थे। विशाखा तथागत के साथ धर्म चर्चा करना चाहती थी, लेकिन किसी कारणवश वह ऐसा नहीं कर पा रही थी। अपनी समस्या के निवारण के लिए वह राजा प्रसेनजित के महल भी गई, लेकिन उसका काम करने से प्रसेनजित ने भी टाल दिया। वह चिलचिलाती धूप में लौटी और बुद्ध को प्रणाम कर खिन्न बदन बैठ गई। 

बुद्ध ने कहा कि विशाखे! इसलिए कहता हूं कि आकांक्षाओं को कम से कम रखना चाहिए। विशाखा ने कहा कि भगवन! कोई ऐसा उपाय है जिससे आकांक्षाओं को कम किया जा सके। बुद्ध बोले, अपने भीतर ही सुख की तलाश करो, तो बाहरी इच्छाएं निस्सार प्रतीत होने लगेंगी। यह सुनकर विशाखा की उदासी दूर हो गई।

समाज को संगठित अपराध और गैंगस्टरों के खिलाफ आगे आना होगा


अशोक मिश्र

संगठित गिरोह, गैंगस्टर नेटवर्क और फिरौती के लिए आने वाले फोन काल्स के खिलाफ हरियाणा में विशेष एसटीएफ ने कमर कस ली है। उसने अपराधियों के खिलाफ अपना अभियान तेज कर दिया है। स्पेशल टास्क फोर्स ने 2024 से अब तक करीब 1972 आरोपियों को गिरफ्तार किया है जिनमें 1063 गैंगस्टर और गैंग सदस्य शामिल हैं। अकेले 2026 में जनवरी से अगस्त के बीच 512 आरोपी पकड़े गए जिनमें 270 गैंगस्टर या उनके सहयोगी तथा 55 मोस्ट वांटेड अपराधी थे। 

ऑपरेशन ट्रैकडाउन जैसे अभियानों में एक ही दिन में दर्जनों कुख्यात अपराधियों को गिरफ्तार कर हिस्ट्री शीट खोली गईं। विदेश भागकर बैठे गैंगस्टरों के खिलाफ भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ा है। 2025-26 में 21 गैंगस्टरों को निर्वासन या प्रत्यर्पण के जरिए भारत लाया गया जिनमें 2026 में ही 14 शामिल हैं। कई अन्य विभिन्न देशों में हिरासत में हैं। जॉर्जिया, अमेरिका, यूएई, थाईलैंड, फिलीपींस और अन्य जगहों से अपराधियों की वापसी ने नेटवर्क को झटका दिया है।  हरियाणा में गैंगस्टर पनपने के कारण संरचनात्मक और सांस्कृतिक दोनों हैं। 

राज्य में तेजी से बढ़ा जमीन का बाजार, देहात में बेरोजगारी के बीच कम समय में अधिक पैसा कमाने की चाह, शराब और खनन जैसे नकद-बहुल धंधों पर नियंत्रण की होड़ और पंचायत से लेकर नगर निगम तक के ठेकों में वर्चस्व की राजनीति ने अपराध को आर्थिक प्रोत्साहन दिया। सात राज्यों के डीजीपी की चंडीगढ़ में हुई बैठक में हरियाणा पुलिस ने खुद स्वीकार किया कि प्रदेश में करीब 80 आपराधिक गैंग सक्रिय हैं, जिनमें से आठ बड़े गैंग दिल्ली-एनसीआर में फिरौती वसूलते हैं और सभी ने विदेश में अपने पॉइंट आॅफ कॉन्टैक्ट बना रखे हैं। संगठित अपराध समाज पर गहरी और बहुआयामी चोट पहुंचा रहा है।

यह केवल हिंसा या हत्या तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि व्यापारियों, बिल्डरों और आम नागरिकों से रंगदारी वसूली, संपत्ति विवादों में हस्तक्षेप तथा भय का माहौल पैदा कर आर्थिक गतिविधियों को बाधित करता है। व्यवसायी और उद्यमी लगातार धमकियों के साए में रहते हैं, जिससे निवेश प्रभावित होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है। हरियाणा पुलिस की वर्तमान रणनीति गिरफ्तारी के साथ-साथ नेटवर्क को आर्थिक और लॉजिस्टिक रूप से तोड़ने पर केंद्रित है। 

यह स्वीकार करना होगा कि सिर्फ पुलिस कार्रवाई से संगठित अपराध खत्म नहीं होगा। जब तक जमीन-शराब-ठेकेदारी के विवादों का निपटारा त्वरित अदालती प्रक्रिया से नहीं होगा, युवाओं के लिए कौशल और रोजगार के विकल्प नहीं बनेंगे और गैंगस्टर संस्कृति का सामाजिक बहिष्कार नहीं होगा, तब तक हर गिरफ्तार गैंगस्टर की जगह दूसरा तैयार होता रहेगा। प्रत्यर्पण और सख्ती एक जरूरी विराम है, स्थायी समाधान नहीं। समाज को गैंगस्टरों के खिलाफ आगे आना होगा।


Saturday, August 29, 2026

अजातशत्रु! तुम्हारा पाप कभी नहीं मिटेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के सम्राट बिंबिसार की उनके पुत्र अजातशत्रु ने हत्या कर दी थी। पिता को मौत के घाट उतारने के बाद अजातशत्रु ने शासन संभाला। काफी दिनों बाद उसे अपने पिता की हत्या करने पर पश्चाताप हुआ। उसने उस पाप को मिटाने के लिए पशुबलि का आयोजन किया। संयोग से उन्हीं दिनों महात्मा बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि विपरीत दिशा में भेड़ों का एक झुंड चला आ रहा है। 

उसके पीछे आ रहे गड़रिये ने एक भेड़ के बच्चे को कंधे पर लाद रखा है। बुद्ध समझ गए कि मेमने को कोई कष्ट है जिसकी वजह से गड़रिये ने उसे कंधे पर उठा रखा है। उन्होंने गड़रिये से मेमने के बारे में पूछा, तो गड़रिये ने बड़ी श्रद्धा से जवाब दिया-भंते! इस मेमने के पैर में चोट लगी है। इसलिए मैंने इसे कंधे पर उठा रखा है। बुद्ध ने उस मेमने की चोट की जगह पर हाथ रखा, तो मेमने को राहत मिली। 

उसने अपनी आंखें मूंद ली। साधु वेश में खड़ी बुद्ध को देखकर गड़रिये ने कहा कि भंते! आप इस मेमने के इस चोट को देखकर इतने पीड़ित हैं। अभी कुछ देर बाद इन सबको अग्नि को समर्पित कर दिया जाएगा, तब आपको कितनी व्यथा होगी। यह सुनकर बुद्ध विचलित हो उठे। उन्होंने पूछा, तो गड़रिये ने बताया कि महाराज अजातशत्रु पिता की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए एक हजार पशुओं की बलि चढ़ाने जा रहे हैं। 

बुद्ध जब यज्ञ स्थल पर पहुंचे तो देखा कि अजातशत्रु यजमान की तरह यज्ञवेदी के पास बैठा हुआ है और ब्राह्मण यज्ञ करा रहे हैं। बुद्ध को देखते ही अजातशत्रु बुद्ध के पास पहुंचा और यज्ञ के बारे में बताया। बुद्ध ने कहा कि एक पत्ता ले आओ। पत्ता आने पर उन्होंने अजातशत्रु से कहा, इसको चीर दो। पत्ता चीरे जाने के बाद उन्होंने कहा, इसे जोड़ दो। अजातशत्रु ने कहा कि इसे जोड़ा कैसे जा सकता है। तब बुद्ध ने कहा कि जो पाप तुमने किया है, उसे मिटाया नहीं जा सकता है। तब इस यज्ञ का क्या मतलब है। अजातशत्रु की समझ में बात आ गई और उसने यज्ञ टाल दिया।

मिलावटी मिठाइयों ने रक्षाबंधन त्यौहार का मजा किया किरकिरा


अशोक मिश्र

हमारा देश पर्व प्रधान है। शायद ही कोई महीना ऐसा बीतता हो जिसमें कोई न कोई तीज-त्यौहार न आता हो। भारत में तीज-त्यौहार कृषि से जुड़े रहे हैं। भाई-बहन के पावन प्रेम संबंधों का प्रतीक रक्षाबंधन भी मूलत: कृषि से ही जुड़ा है। दरअसल, सावन बीतते-बीतते कृषि कार्य पर विराम लग जाता है। किसान खेत-खलिहान से खाली हो जाता है। अभी फसल तैयार नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में यही मौका होता है, अपने सगे संबंधियों से मिलने का। बहनें अपने भाई और अन्य परिजनों से मिलने को व्याकुल होती हैं। तो वह अपने मायके चल देती है रक्षाबंधन मनाने के लिए। 

घर में आई बहन-बेटी का स्वागत विभिन्न तरह के पकवानों से किया जाता है। हरियाणा में कोई तीन-चार दशक पहले तक रक्षाबंधन पर्व पर बाजार से मिठाई लाने का तो चलन ही नहीं था। घर की बुजुर्ग महिला यानी दादी, मां, चाची आदि सुबह चार बजे उठकर चूल्हा लीपती थीं। फिर उसी चूल्हे पर सुबह ही कड़ाही चढ़ जाती थी। घी तो घर का ही होता था, गाय-भैंस के दूध से निकला। उस घी में सबसे पहले गुलगुले तलते, गुड़ और गेहूं के आटे के मीठे गोले, जो बाहर से कुरकुरे और अंदर से नरम होते थे। 

साथ में शक्करपारे, जिन्हें बच्चे राखी बंधवाने से पहले ही चट कर जाते थे। चूरमा तो रक्षाबंधन की आत्मा था। बाजरे की रोटी को हाथ से मसलकर उसमें बूरा और घी मिलाकर बनाया जाता था। यह चूरमा इतना पौष्टिक होता था कि एक कटोरी में पूरे सावन की ताकत आ जाती थी। मीठे चावल, पीले मीठे चावल में केसर नहीं, हल्दी की एक चुटकी और घी की महक होती थी। खीर तो मिट्टी की हांडी में बनती थी। धीमी आंच पर घंटों तक पकती, और पुआ, मालपुए, खांड के बताशे तो रक्षाबंधन की शोभा ही बढ़ा देते थे। 

भाई के आने पर थाली में ये ही परोसे जाते थे, साथ में दही और घर का बना सफेद मक्खन, इसके स्वाद का तो कहना ही क्या था। ये पकवान सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं होते थे, ये मां के हाथों की दुआ थे। हर निवाले में पता चलता था कि इसमें मिलावट नहीं, ममता मिली है। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। त्योहार के दो दिन पहले अखबारों में खबरें आने लगती हैं कि फलां जगह से नकली मावा पकड़ा गया। फलां दुकान पर मिलावटी बर्फी मिली। लोग पढ़कर भी उसी दुकान पर लौट जाते हैं क्योंकि किसी के पास घर पर पकवान बनाने के लिए समय नहीं है। घर पर पकवान और मिठाई बनाना अब पिछड़ापन लगने लगा है। 

आज लगभग हर घर में डिब्बा आता है दुकान से बंधा-बंधाया। ऊपर सुनहरी पन्नी लगी मिठाई, देखने में सुंदर, पर भीतर क्या है, कोई नहीं जानता। खोया के नाम पर पाउडर, घी के नाम पर डालडा और रंग के नाम पर केमिकल। हमने खुद अपने हाथों से त्योहारों को जहर में बदल दिया है। चूरमा, खीर और गुलगुला आदि को हमने एक चमकदार डिब्बे के लिए बेच दिया।