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| 21 अप्रैल 2026 को प्रभात खबर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित |
व्यंग्य
अशोक मिश्र
आज मैं अपनी टूटी हुई बायीं कलाई लेकर अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा हुआ हूं। साथ में मेरी दाईं कनपटी भी सूजी हुई है। बात यह है कि कल सुबह जैसे ही सोकर उठा, मेरे प्रतिवेशी प्रसिद्ध ज्योतिषी थंगाबली घर पर पधारे। उनको देखते ही मैं समझ गया कि आज मेरा दिन खराब जाएगा। जब भी उनके सुबह दर्शन हुए हैं, बुरा दिन बीता है।मुझे देखते ही थंगाबली ईरानी मिसाइल की तरह धड़ाम से फटे और बोले, देखो! आज तुम्हारे ग्रह दशा ठीक नहीं है। तुम्हारी कुंडली में आज 'पिटनयोग' योग है। 'प' अक्षर से शुरू होने वाले रिश्तों से तो खासतौर पर सावधान रहना। इतना कहकर वह रफूचक्कर हो गए।
सुबह-सुबह जगाए जाने मूड खराब हो गया। सोचा कि जाग ही गया हूं तो मार्निंग वॉक कर लेता हूं। काफी दिन हुए उगता सूरज नहीं देखा है। सो, पहुंच गया पार्क। मैं गेट पर पहुंचा ही था कि तबीयत चकाचक हो गई। छाया के दर्शन जो हो गए थे। मैं उसके पास पहुंचा। आशिकाना लहजे में कहा, हाय छम्मकछल्लो! सूर्योदय के साथ-साथ पूर्णिमा की चांद भी उदित हो गया। यह तो चमत्कार हो गया।
इतना कहकर मैंने विकल प्रेमी की तरह उसे गले लगा लिया। अभी मैं ठीक से उसे गले भी नहीं लगा पाया था कि मेरी दायीं कनपटी झनझना उठी। मानो इजरायल की भटकती हुई कोई मिसाइल कनपटी से टकरा गई हो। मैंने कनपटी सहलाई। छाया ने वॉकिंग स्टिक से अमेरिका की तरह प्रहार किया था। गुर्राती हुई बोली, अभी तो एक ही स्टिक मारी है। आइंदा इश्क फरमाया, तो मुंह तोड़ दूंगी। नाती-पोतों को खिलाने की उम्र में चला है इश्क लड़ाने। नासपीटे! तुम्हें शर्म नहीं आती है। इतना कहकर छाया स्टिक टेकती हुई पार्क से चली गई।
तभी मुझे ज्योतिषी थंगाबली की बात याद आई। उन्होंने कहा था कि 'प' अक्षर से शुरू होने वाले रिश्तों से सावधान रहना। 'प' अक्षर यानी प्रेमिका। मैं वॉक करने की जगह काफी देर तक पार्क की मुलायम घास पर बैठा रहा। काफी देर बाद जब होश ठिकाने आए, तो मैं उठकर घर की ओर चल दिया। घर का दरवाजा खोलकर जैसे ही अंदर हुआ, बरामदे से सनसनाता हुआ बेलन मेरे मुंह की ओर आया।
बचने के लिए मैंने अपनी बायीं कलाई ढाल की तरह बेलन के आगे कर दिया। कलाई तो शहीद हो गई, लेकिन मेरा थोबड़ा रक्तरंजित होने से बच गया। तभी घरैतिन ट्रंप की तरह गरजती हुई आई और बोली, आपको कुछ शर्म-हया है या सब बेचकर खा गए हैं? बुढ़ापे में इश्कियाए घूमते रहते हैं।
मैं अपनी सफाई में कुछ पाता कि घरैतिन एक बार फिर गरजीं-तुम बाहर क्या-क्या गुल खिलाते हो, मुझे पता ही नहीं चलता, अगर छाया दीदी आकर तुम्हारी करतूतों का कच्चा चिट्ठा न खोलतीं। जिंदगी भर तो हथेली पर दिल लेकर 'तू भी ले...तू भी ले' करते रहे। अब तो अपनी इज्जत का ख्याल करिए। मैं तो आजिज आ गई हूं, इस आदमी की छिछोरी हरकतों से। मैं चुपचाप कमरे में आ गया। यहां भी पत्नी से पिटा। कुछ देर बाद कनपटी और कलाई सूजने लगी, तो बेटा-पत्नी अस्पताल में भर्ती कराकर यह कहते हुए चले गए कि ठीक हो जाना, तो घर चले आना।












