Wednesday, August 26, 2026

भगवन! मुझे बंधन मुक्ति का उपदेश दें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सुप्पारक तीर्थ क्षेत्र में एक संत रहते थे वाहिय दारूचीरिय। उन्होंने अपनी वासना और इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। धन संपत्ति का उन्हें मोह ही नहीं था। महाराष्ट्र के पालघर जिले के नालासोपारा को ही प्राचीन काल में सुप्पारक तीर्थ कहा जाता था। साधु वाहिय दारूचीरिय जहां भी जाते लोग उनके चरणों में अपनी धन, संपत्ति, वस्त्रों और विभिन्न तरह के उपहारों का ढेर लगा देते थे।

धीरे धीरे उनमें एक अहंभाव जागने लगा। वृद्ध गुरु को अपने शिष्य के अहंभाव के बारे में जानकारी मिल गई। गुरु ने अपने शिष्य दारूचीरिय से कहा कि तुमने गौतम बुद्ध का नाम सुना है? दारूचीरिय ने उत्तर दिया, हां गुरुवर! मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। जेतवन में वह परिव्राजक हैं। उन्होंने भी अर्हत मार्ग को सिद्ध कर लिया है। गुरु ने कहा, तब तुम्हें उनके सामीप्य में कुछ दिन बिताने चाहिए। 

गुरु की बात मानकर दारूचीरिय सुप्पारक से जेतवन के लिए चल पड़े। जब वह जेतवन पहुंचे, तो उन्होंने एक भिक्षु से पूछा कि आप लोग बता सकते हैं, तथागत मिलेंगे? उस भिक्षु ने कहा कि तथागत, भिक्षा के लिए श्रावस्ती गए हैं। तीसरे पहर तक आएंगे। आप विश्राम करें। दारूचीरिय को आश्चर्य हुआ कि इतने भिक्षुओं के होते हुए बुद्ध को भिक्षा मांगने की जरूरत क्यों पड़ी। वह वहीं पहुंचे जहां भिक्षा के लिए बुद्ध खड़े थे। 

दारूचीरिय ने कहा कि भगवन! आप मुझे बंधन मुक्ति का उपदेश दें। बुद्ध ने कहा कि यह उचित समय नहीं है। जब दारूचीरिय ने कई बार जिद की तो महात्मा बुद्ध ने कहा कि जो एक ही बार में एक ही काम में इतना तल्लीन हो जाए कि दूसरी इंद्रियां भाव ही शेष न रह जाए, तो वह अनासक्त और बंधन मुक्त हो जाता है। अब दारूचीरिय को अपनी कमियों का भान हुआ। वह बुद्ध को प्रणाम कर जेतवन की ओर लौट पड़े।

बरसाती मौसम में बीमारियों से बचने के लिए बरतें सावधानी


अशोक मिश्र

हरियाणा में इन दिनों हो रही बरसात ने प्रशासन और व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। भारी बारिश ने कई शहरों और कस्बों को एक विचित्र और चिंताजनक तस्वीर में बदल दिया है। सड़कों पर खुले मैनहोल, कूड़ा-कचरा से पूरी तरह भरी नालियां, पानी के साथ तैरता कचरा और घरों में घुसता सीवर का गंदा पानी मिलकर एक ऐसा दृश्य रच रहे हैं जो न सिर्फ असुविधाजनक है बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है। बड़े-बड़े गड्ढे सड़कों पर फैल गए हैं जो किसी भी समय किसी वाहन या पैदल यात्री के लिए दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम से लेकर हिसार और अंबाला तक एक ही तस्वीर है - सड़कों पर घुटनों तक पानी, उस पानी में तैरता पॉलीथीन और कचरा। किसी भी स्थान पर रुका हुआ पानी मच्छरों का प्रजनन स्थल बन जाता है। डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को न्यौता देता है। घरों में घुसा सीवर का पानी और नालियों का ओवरफ्लो लोगों में हैजा, टाइफाइड, पीलिया और दस्त जैसी जल-जनित बीमारियों का कारण बनता है। गीली जमीन पर फिसलन और दूषित पानी में पैर रखने से चर्म रोग और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं। ऐसे में सावधानी ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।  ऐसी स्थिति में सबसे पहले तो पीने के पानी पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।

 बरसात में नल का पानी सीधे पीने से बचें। उसे अच्छी तरह उबालकर या फिल्टर करके ही इस्तेमाल करें। बाहर का कटा फल, खुले में बिका जूस या चाट-पकौड़ी से परहेज करें। इनमें सीवर के पानी के सूक्ष्म कण मिले होने की आशंका रहती है। घर में पानी को ढक कर रखें और कूलर, गमले, पुराने टायर या छत पर रखी किसी भी चीज में पानी जमा न होने दें। हर दो दिन में उन्हें खाली कर सुखा दें। शाम के समय पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छरदानी या मच्छर भगाने वाली क्रीम का उपयोग करें। 

थोड़ी सी समझदारी, साफ-सफाई और एक-दूसरे का ख्याल रखकर हम इस मुश्किल मौसम को भी सुरक्षित निकाल सकते हैं। अगर बुखार, उल्टी, दस्त या त्वचा संबंधी कोई समस्या हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और स्वयं दवा न लें। बरसात प्रकृति का वरदान है। बरसात की वजह से ही नए-नए पौधों का जन्म होता है। धरती हरी भरी हो जाती है। तपती धरती को बरसात ही शीतल करती है। लेकिन हमारी थोड़ी सी लापरवाही इसे अभिशाप बना देती है। थोड़ी सतर्कता, थोड़ी जागरूकता और थोड़ा सहयोग अपनाकर हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने परिवार और पड़ोसियों को भी सुरक्षित रख सकते हैं। हरियाणा के लोग कठिन परिस्थितियों में सदियों से एकजुट रहे हैं। उनका आपसी भाईचारा दूसरे राज्यों के लिए एक मिसाल की तरह है। इस बार भी वही एकजुटता हमें इन चुनौतियों से उबरने में मदद करेगी।


हम भी इंसान हैं, डायन नहीं !

अशोक मिश्र

गांव में किसी को बकरियां अचानक मर गई, गाय या भैंस बीमार हो गई, बच्चा बीमार है या फिर अचानक मर गया, किसी के घर में बच्चे नहीं हो रहे हैं, इसका क्या मतलब है? इसका एक ही मतलब है कि गांव में कोई डायन है? 'डायन... जी हां, डायन...। सभ्य समाज में ऊपर कही गई बातों को सुनकर भले ही लोगों के मुंह से एकाएक निकल पड़े, यह क्या बेवकूफी है, लेकिन झारखंड, उड़ीसा, असम, नगालैंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि राज्यों के गांवों का सच यही है। डायन, टोनहिन, चुड़ैल, भुतनी, प्रेतनी, डाकिनी, कलंकिनी आदि ये शब्द हैं जो प्राचीनकाल से अब तक औरतों के खिलाफ एक हथियार के रूप में प्रयोग किए जाते रहे हैं। डायन घोषित की गई महिला या महिलाओं के बाल काट लेना, उनके साथ बलात्कार करना, उनको नंगा करके गांव भर में घुमाना, उनके जननांगों को क्षति पहुंचाना, मुंडन कर देना, उनकी हत्या कर देना आदि अमानवीय व्यवहार अंधविश्वासी समाज में जैसे जायज बनकर रह गया है। डायन, भुतनी, चुड़ैल आदि शब्दों को गढ़कर स्त्री को अधिक से अधिक बुरी बत्ताने के लिए कई तरह के किस्से, कहानियां, मिथक और कहावतें गढ़ी गई। 'डायन भी सात पर छोड़ देती है जैसे मुहावरे स्त्री अस्मिता पर न केवल पातक प्रहार करते हैं, बल्कि बच्चों के मन में बचपन से ही उनके प्रति कलुषित धारणाएं पैदा कर देते हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों में डायन बताकर प्राचीनकाल से अब तक कितनी महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया, इसका कोई आंकड़ा दे पाना कतई संभव नहीं है। पिछले सौ-पचास साल का आंकड़ा यदि हम इकट्ठा कर भी ले, तो यह सच्चाई नहीं बदलने वाली है कि डायन शब्द की उत्पत्ति के पीछे पुरुषवादी सत्ता का हाथ रहा है। जो भी स्त्रियां पुरुषों के अनुकूल नहीं रहीं, उनके लिए ही पुरुषों ने यह शब्द ईजाद किया। डायन मतलब बुरी औरत.. जो पुरुषों का कहा नहीं मानती, जो बच्चों को खा जाती है, जिसकी वजह से देश, गांव, समाज और परिवार पर विपत्ति टूट पड़ती है। मजेदार बात यह है कि पुरुषों ने शब्द डायन गढ़ने के बाद यह खूबसूरत हथियार महिलाओं के ही हाथ में थमा दिया कि लो! जब हमें जरूरत महसूस होगी, हमारे इशारे पर उन स्त्रियों को डायन का खिताब देकर मार दो, जो हमारे इशारे पर चलने से इंकार करती हैं, जो पितृसत्ताक व्यवस्था वा पुरुषवादी सत्ता के खिलाफ बगावत करती हैं। यह खेल आज भी जारी है। आज इसका कुछ रूप भले ही बदल गया हो, लेकिन किसी भी महिला को डायन घोषित करने के पीछे की मानसिकता वही हजारों साल पुरानी है। अपने निहित स्वार्थों के लिए किसी भी विवश, लाचार, गरीब, अशिक्षित महिला को डायन बताकर मार दो। अफसोसजनक बात तो यह है कि इस साजिश में अब महिलाएं भी बराबर की भागीदार हैं, यह सोचे बिना कि ऐसा करके वे अपने को ही किसी न किसी रूप में कमजोर कर रही हैं।

हजारों साल बीत जाने के बावजूद इस देश की महिलाओं को यह सोचने-समझने का मौका ही नहीं दिया गया कि वे जब किसी महिला को डायन बताने के लिए प्रेरित की जाती हैं, तो उसके पीछे कारण क्या रहते हैं? आखिर औरत ही डायन क्यों होती है, पुरुष क्यों नहीं? डायन, चुड़ैल, भूतनी, कुटनी, वेश्या जैसे शब्दों की तलवार महिलाओं को ही रक्तरंजित क्यों करती है? भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस कहकर किसी पुरुष को मार दिया गया हो, ऐसी घटनाएं वर्तमान में तो क्या, अतीत में भी शायद ही देखने को मिले। और यदि एकाध हैं भी, तो उसके दूसरे समाजशास्त्रीय कारण रहे होंगे। कुछ राज्यों में तो औरतों को डायन बताकर मार देने की परंपरा आज भी अबाध गति से जारी है। अगर हम डायन बताकर मारी जाने वाली महिलाओं की आर्थिक दशा पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि अब तक ज्ञात सभी घटनाओं में लगभग 28 फीसदी महिलाएं या तो गरीब रही हैं, विधवा रही हैं या फिर तलाकशुदा। डायन बताकर मारी गई कुंवारी लड़‌कियों की भी आर्थिक दशा ऐसी ही रही होगी। अमीर घरों की महिलाओं को डायन बताकर मार देने की घटना न बराबर है। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि डायन कही जाने वाली औरतों के पीछे उनकी गरीबी, असहायता, शोषण-दोहन और यौन उत्पीडन जैसी प्रवृत्तियां उत्प्रेरक के रूप में काम करती रही है। अब तक जितने भी मामले सामने आए हैं, उनमें कुछ बातें तो कामन हैं, जैसे, संपत्ति विवाद, यौन शोषण, आपसी रंजिश आदि। इन कारणों से एक बात तो समझ में आती है कि कुछ लोग या समुदाय अपने ही नाते-रिश्तेदार महिलाओं को उनकी संपत्ति हड़पने, उनका यौन शोषण करने या फिर जमीन का बंटवारा न करना पड़े, इसके लिए कुछ महिलाओं या पुरुषों को लालच देकर डायन घोषित करके मार देते हैं। यह सदियों से होता चला आ रहा है।

झारखंड में ये समस्या विकराल रूप में है। उड़ीसा, आंध्र प्रदेश भी ऐसी हत्याओं के मामले में ज्यादा पीछे नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कानून नहीं बनाए। सरकार ने अपनी तरफ से कोशिश की और कर रही है, लेकिन लोगों की मानसिकता में अभी नकारात्मक बातें भरी पड़ी हैं। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना पर विश्वास अब भी कायम हैं। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून साल 2001 से ही लागू है। इसके बाद भी समाज में कोई खास बदलाव नहीं आया है। राजस्थान सरकार ने डायन प्रथा विरोधी कानून, 2015 पास करके ऐसी हत्याओं पर रोक लगाने की कोशिश की है।

असम में तो पिछले पांच सालों में 70 से अधिक महिलाओं को डायन बताकर मार दिया गया। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में हर साल डायन के नाम पर महिलाओं की बलि ली जा रही है। पुलिस और प्रशासन बहुत दबाव पड़ने और मीडिया में बात उछल जाने पर फौरी तौर पर कुछ कार्रवाइयां करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। कुछ लोग गिरफ्तार किए जाते हैं, बाद में जमानत पर छूटकर चले आते हैं, कई बार तो क्या, ज्यादातर मामलों में आरोपी सुबूत के अभाव में बरी तक हो जाते हैं। इस अभिशाप के खिलाफ आवाज सदियों से नहीं उठती रही है, लेकिन इस अभिशाप के खिलाफ असम ने जो पहल की है, वह बेमिसाल है। असम की ही एक बहादुर महिला 62 वर्षीय बीरूवाला डायन बताकर मार देने वाले अंधविश्वास के खिलाफ पिछले कई सालों से लड़ रही है। वह अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान इस डायन प्रथा रूपी अभिशाप से बचा चुकी है। अब असम ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में महिलाएं और पुरुष धार्मिक अंधविश्वासों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। वे इसके खिलाफ आवाज भी उठाने लगे हैं, लेकिन अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। 

Tuesday, August 25, 2026

तू सेवा कर, इसके लिए सारा संसार पड़ा है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

विशाखा कोशल प्रदेश की राजधानी साकेत(वर्तमान में अयोध्या) के एक धनी व्यापारी की पुत्री थी। उसके माता-पिता पहले मगध में रहते थे। जब वह सात साल की थी, तो महात्मा बुद्ध मगध आए थे, तो वह उनसे मिली थी। बाद में उसके परिजन साकेत आ गए। जब वह सोलह साल की हुई, तो उसका विवाह श्रावस्ती के धनी व्यापारी मिगारा के पुत्र पुन्नवद्धन के साथ हुआ और वह अपनी ससुराल श्रावस्ती आ गई। उसे मिगारमाता भी कहा जाता है क्योंकि उसने मिगारा को बौद्ध बनने को प्रेरित किया था। तब उसके ससुर ने उसे अपनी माता का दर्जा दिया था। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध जेतवन पधारे। विशाखा ने अगले दिन बुद्ध के प्रवचन की व्यवस्था की थी। दुर्योग से उसी रात विशाका के पौत्र धीरज का निधन हो गया। पौत्र का दाह संस्कार होने के बाद भी वह रोती रही। जब थोड़ा सा दुख कम हुआ, तो वह उस सभा में जा बैठी जहां बुद्ध लोगों को संबोधित कर रहे थे। 

बुद्ध ने देखा कि विशाखा अस्त व्यस्त वस्त्रों में बैठी शोकमग्न है। बुद्ध ने कहा, विशाखे! मध्याह्न हो चला, तूने अपने वस्त्र नहीं बदले। विशाखा ने रुदन भरे स्वर में कहा, भगवन! मेरे पौध का निधन हो गया है। बहुत समझाने पर जब उसका रोना बंद नहीं हुआ, तो बुद्ध ने कहा, विशाखे! यदि तुझे तेरा पौत्र मिल जाए तो तुझे खुशी होगी? विशाखा ने कहा, हां, तब मेरी खुशी का पारावार नहीं रहेगा। 

बुद्ध ने कहा कि यदि तुझे श्रावस्ती की जनसंख्या जितने पुत्र-पौत्र हो जाएं, तो तुझे अपार खुशी होगी। विशाखा ने कहा, हां, मैं तो बहुत खुश हो जाऊंगी। बुद्ध ने कहा कि तब तो रोज किसी न किसी की मृत्यु होती रहेगी। तू तो रोज इसी तरह व्याकुल रहेगी। सोच, जब तू एक पौत्र के निधन पर इतनी दुखी है, तब क्या होगा? तू सेवा कर, इसके लिए सारा संसार पड़ा है। सेवा में जो सुख है, वह आसक्ति में नहीं है। 

विशाखा महात्मा बुद्ध की बात को समझ गई और उसी दिन से सेवा का पंथ अपना लिया।

हरियाणा में फैल रहा स्वाइन फ्लू घबराने नहीं, सतर्क रहने की जरूरत


अशोक मिश्र

हरियाणा में स्वाइन फ्लू यानी एच1एन1 मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अब तक 119 मामले सामने आ चुके हैं। स्वाइन फ्लू के सबसे ज्यादा 1777 मामले दिल्ली में सामने आ चुके हैं। इसके साथ ही उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने स्पष्ट किया है कि फैल रहा वायरस कोई नया स्ट्रेन नहीं है बल्कि 2025 से ही प्रचलन में मौजूद मौसमी इन्फ्लुएंजा का हिस्सा है, इसलिए घबराने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्कता जरूरी है। 

बरसात और बदलते मौसम के बीच यह वायरस तेजी से फैलने की क्षमता रखता है, इसलिए इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है। स्वाइन फ्लू ज्यादातर लोगों में सामान्य फ्लू जैसा ही व्यवहार करता है। इसमें तेज बुखार, सूखी खांसी, गले में खराश, बहती या बंद नाक, सिरदर्द, शरीर और जोड़ों में दर्द, कमजोरी, भूख न लगना, कभी-कभी उल्टी या दस्त जैसे लक्षण दिखते हैं। ज्यादातर मरीज एक से दो सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। हालांकि गर्भवती महिलाएं, पांच साल से छोटे बच्चे, 65 साल से ऊपर के बुजुर्ग, मधुमेह, अस्थमा, हृदय या फेफड़ों की बीमारी वाले लोग और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्ति ज्यादा खतरे में रहते हैं। 

इनमें निमोनिया, सांस लेने में तकलीफ या अन्य जटिलताएं हो सकती हैं, लेकिन समय पर इलाज से गंभीरता काफी कम हो जाती है। यदि इस तरह के कोई भी लक्षण किसी के शरीर में दिखाई दें तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। लक्षण दिखते ही घर पर रहें, डॉक्टर से सलाह लें और बिना सलाह दवा न लें। एंटीवायरल दवाएं शुरुआती 48 घंटों में सबसे प्रभावी होती हैं। गुरुग्राम, फरीदाबाद, रोहतक, हिसार, करनाल, पानीपत और अंबाला जैसे शहरी और औद्योगिक जिले हमेशा अधिक संवेदनशील रहे हैं। 

सबसे ज्यादा खतरा घनी आबादी वाले शहरी इलाकों, भीड़-भाड़ वाले बाजारों, स्कूलों, कार्यालयों, अस्पतालों तथा सार्वजनिक परिवहन में रहता है, जहां नजदीकी संपर्क आसानी से होता है। इन जगहों पर सावधानी बरतकर और लक्षणों को नजरअंदाज न करके हम संक्रमण के प्रसार को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण है नियमित रूप से साबुन और पानी से हाथ धोना या सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना। खांसते-छींकते समय रूमाल या कोहनी से मुंह और नाक ढकना चाहिए। भीड़-भाड़ वाली जगहों से जितना हो सके बचना, मास्क पहनना, स्वस्थ आहार लेना, पर्याप्त पानी पीना और अच्छी नींद लेना प्रतिरक्षा को मजबूत रखता है। 

जागरूकता और साधारण सावधानियां ही इस मौसमी संक्रमण से बचाव का सबसे अच्छा तरीका हैं। यदि किसी को सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द या बुखार के साथ होंठ नीले पड़ने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत अस्पताल जाएं, क्योंकि यह जटिलता का संकेत हो सकता है।

Monday, August 24, 2026

आप जानते हैं, जीवन कितना क्षण भंगुर है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

वाहिय सुप्पारक क्षेत्र (महाराष्ट्र के पालघर जिले में नालासोपारा नाम से विख्यात है) के सबसे बड़े धनी और सम्मानित व्यक्ति थे। इतना धन-संपत्ति होते हुए भी वाहिय को किसी भी प्रकार का अभिमान नहीं था। वह त्याग, संयम और अपरिग्रह जैसे गुणों से परिपूर्ण एक संत पुरुष थे। वह दूसरों को दुख को अपना दुख मानते थे और जो भी उनके पास किसी सहायता की आशा से आता था, वह उसका हर तरह से सहायता करते थे। 

एक बार उनके मन में कुछ बातों को लेकर जिज्ञासा उत्पन्न हुई तो वह पैदल ही जेतवन के लिए चल पड़े। कई महीनों की पदयात्रा के बाद वाहिय जेतवन पहुंचे। उन्होंने संघ के एक भिक्षु से पूछा कि तथागत से मेरा इसी समय मिलना बहुत जरूरी है। मुझे कुछ मामलों में अपनी जिज्ञासा शांत करनी है। उस भिक्षु ने कहा कि तथागत, अभी भिक्षा के लिए जनपद गए हैं। आप इतनी दूर से आए हैं, विश्राम कीजिए। तथागत कुछ ही देर में आते होंगे। वाहिय को उनकी जिज्ञासा ने बहुत परेशान कर रखा था। 

वह भिक्षु से पूछकर उसी दिशा में चल पड़े जिधर महात्मा बुद्ध  गए थे। एक घर के द्वार पर भिक्षा पात्र लिए खड़े बुद्ध दिखाई पड़े। वाहिय ने बुद्ध को प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे मैं अक्षय सुख के मार्ग पर चल सकूं। बुद्ध ने कहा कि यह समय उपदेश देने का नहीं है। मैं भिक्षा लेकर जेतवन चल रहा हूं। वहीं उपदेश देता हूं। 

वाहिय ने कहा कि आप जानते हैं कि जीवन कितना क्षण भंगुर है। जीवन तिरछे पत्ते पर पड़े हुए जल बिंदु के समान है। कब ढुलक जाए, पता नहीं। बुद्ध ने उन्हें उपदेश दिया, तो वाहिय लौट पड़े। भिक्षा ग्रहण करके बुद्ध जब आगे बढ़े कि एक भिक्षु ने आकर कहा, भगवन! जो जिज्ञासु अभी अभी उपदेश सुनकर गया था, उसे सांड ने सींगों से उठाकर पटक दिया है। उसका निष्प्राण शव पड़ा है। बुद्ध ने कहा कि वह तुम्हारा गुरुभाई है। उसका सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करो। यदि मैं उसे अक्षय सुख का उपदेश नहीं देता, तो अपूर्ण इच्छा इसके साथ चली जाती।

भूख, कुपोषण, अशिक्षा के खिलाफ सफल हथियार है मिड-डे-मील

अशोक मिश्र

हरियाणा के सरकारी स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले मिड-डे-मील यानी पीएम पोषण योजना में गड़बड़ी की आशंका के चलते शिक्षा विभाग ने निगरानी व्यवस्था को सख्त कर दिया है। अब स्कूलों में बच्चों की हाजिरी केवल रजिस्टर तक सीमित नहीं रहेगी। बच्चों की हाजिरी का डिजिटल रिकॉर्ड भी तैयार किया जाएगा। सबसे पहले तो विभाग अपने तरीके से दर्ज हाजिरी का मिलान करेगा। वह यह सुनिश्चित करेगा कि जितने बच्चों के नाम पर भोजन दर्ज किया गया है, उस दिन स्कूल में  उतने बच्चे थे या नहीं। 

अब पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की रोज की हाजिरी पीएम पोषण एप पर भेजनी होगी। पहले हर महीने 10 तारीख तक पोर्टल पर डाटा अपडेट करने की छूट थी, पोर्टल 10 तारीख के बाद बंद हो जाता था, लेकिन अब मौलिक शिक्षा महानिदेशालय ने हिदायत दी है कि रोज डाटा एमआईएस पोर्टल और पीएम पोषण एप पर अपडेट किया जाए। निदेशालय के संज्ञान में आया है कि स्कूलों की ओर से डाटा अपडेट नहीं किया जा रहा है और विद्यार्थियों की संख्या के हिसाब से ज्यादा राशन मंगवाकर राशन की कमी की झूठी रिपोर्ट भेजी जा रही है। 

पीएम पोषण योजना का सीधा संबंध बच्चों के पोषण और स्कूल में उनकी उपस्थिति से है। इसलिए योजना के तहत उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन का रिकॉर्ड सही रखना बेहद जरूरी है। सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए खाद्यान्न और अन्य संसाधनों का इस्तेमाल वास्तविक विद्यार्थियों के लिए ही हो, इसी दिशा में डिजिटल निगरानी को अहम कदम माना जा रहा है। वैसे यह सच है कि मिड डे मील योजना का एक लाभ यह भी दिखने लगा है कि हरियाणा के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है। 

योजना लाखों बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने में बेहद सफल रही है। सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ा है, ड्रॉपआउट दर घटी है। यह इस योजना का सबसे सकारात्मक पहलू है। इससे प्रदेश में साक्षरता दर में काफी बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। इस योजना का एक सामाजिक पहलू भी उजागर हुआ है।  कई गरीब परिवारों के बच्चों के लिए मिड डे मील ही दिन का सबसे पौष्टिक भोजन है। मिड डे मील की वजह से वह कुपोषित होने से भी बच जा रहे हैं। सरकार ने बाल वाटिका से कक्षा आठ तक के बच्चों के पोषण स्तर में सुधार के लिए हफ्ते में एक दिन इंस्टेंट खीर और पिन्नी जैसी नई पहल भी शुरू की है। 

यह योजना भी बच्चों को कुपोषित होने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कई गरीब, मजदूर और प्रवासी परिवारों के लिए दोपहर का पक्का भोजन एक बड़ा आकर्षण है। इस वजह से पहली से आठवीं तक के बच्चों का दाखिला बढ़ा है और खासकर लड़कियों का ड्रॉपआउट काफी कम हुआ है। अगर गड़बड़ी और गुणवत्ता की समस्या को हटा दें, तो यह योजना हरियाणा में भूख, कुपोषण और अशिक्षा के खिलाफ एक साथ लड़ने वाला सबसे सफल हथियार है।

Sunday, August 23, 2026

बुद्ध बोले, प्रकृति में नहीं होते हैं चमत्कार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के समकालीन एक राजा थे। वह किसी सिद्ध पुरुष की तलाश में थे ताकि अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकें। वह अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए हर संभव प्रयास पहले भी कर चुके थे। किसी ने उन्हें सलाह दी थी कि यदि वह किसी सिद्ध पुरुष को तलाश लें, तो वह आपकी मनोकामना की पूर्ति कर सकता है। राजा ने एक मैदान में पतला सा बहुत ऊंचा बांस गड़वाया और उस पर सोने का एक कमंडल टांग दिया। 

उन्होंने घोषणा की कि जो भी सिद्ध पुरुष बांस पर चढ़कर कमंडल उतार लाएगा, उसे कमंडल के साथ बहुत कुछ दिया जाएगा। वह मेरा गुरु होगा और उसे रहने के लिए महल, आने जाने के लिए हाथी-घोड़े प्रदान किए जाएंगे। उस राज्य के संत, महात्मा, ज्ञानी-गुणी सबने प्रयास किया, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। काफी दिनों बाद एक पतला-दुबला बौद्ध भिक्षु आया। 

उसने चुनौती स्वीकार कर ली। वह बांस पर चढ़ गया और सोने का कमंडल उतार लाया। राजा ने उसे अपना गुरु बना लिया और सारी सुख सुविधाएं दीं। एक दिन भिक्षु ने सोचा कि महात्मा बुद्ध इन दिनों श्रावस्ती के जेतवन में विहार कर रहे हैं क्यों न चलकर उन्हें चमत्कार के बारे में बताया जाए। राजा ने सवारी और सेवकों का प्रबंध कर दिया। वह जेतवन पहुंचा। इससे पहले बुद्ध उसके चमत्कार की कथा सुन चुके थे। 

शाम को जब वह भिक्षुओं को प्रवचन देने आए, तो उस भिक्षु की चर्चा करते हुए बोले, यह व्यक्ति भिक्षु बनने से पहले नट था। पतले बांस पर चढ़ना इसके लिए कोई कठिन काम नहीं था। इसने कोई चमत्कार नहीं किया है। प्रकृति में चमत्कार नहीं होते हैं। आज से बुद्ध संघ का कोई भी भिक्षु चमत्कार दिखाने का प्रयास नहीं करेगा। छल से धर्म का प्रचार करने का प्रयास भी नहीं करेगा। आत्मशुद्धि के लिए की गई तप साधना से ही मानव कल्याण संभव है।

गांव की गलियों से लेकर शहर के बाजारों तक सफाई का पहिया जाम

अशोक मिश्र

हरियाणा में पिछले सोलह दिन से सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं।  मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने खुद मोर्चा संभालते हुए कहा है कि वह जल्दी ही हड़ताल खत्म कराएंगे, बातचीत सौहार्दपूर्ण माहौल में हो रही है और समाधान निकलेगा। गांव की गलियों से लेकर शहरों के बाजारों तक सफाई का पहिया थमा हुआ है। शहरों से लेकर गांवों तक कूड़े-कचरे के ढेर लग चुके हैं। हड़ताल के कारण प्रदेश भर में 14 हजार टन से ज्यादा कूड़ा जमा हो चुका है। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में नालियां अवरुद्ध हो गई हैं। 

वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर निजी कर्मचारियों से कचरा उठवाने की कोशिश स्थानीय प्रशासन ने की थी, लेकिन ऐसा करने पर कर्मचारी भड़क रहे हैं। वह कई जगहों पर निजी कर्मचारियों को काम रोक रहे हैं। कहीं रोडवेज के परिचालकों को अस्थायी रूप से फायर ब्रिगेड में लगाना पड़ रहा है क्योंकि अग्निशमन कर्मचारी भी हड़ताल पर हैं। इस बिगड़ती व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है और स्थानीय निकाय विभाग से शपथपत्र पर जवाब मांगा है। सफाईकर्मियों की हड़ताल का स्वास्थ्य पर सीधा असर दिखने लगा है। 

सड़कों पर पड़ा कचरा सड़ रहा है, बदबू से लोग बेहाल हैं, नालियों का गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है और मक्खी-मच्छर पनप रहे हैं। स्थानीय डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि हरियाणा स्वास्थ्य आपातकाल की कगार पर है। गुरुग्राम, हिसार, फरीदाबाद जैसे शहरों में टनों कचरे से डेंगू, मलेरिया, डायरिया, त्वचा संक्रमण और सांस की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ गया है। सात दिन से कूड़े के ढेर लगे रहने से बीमारी फैलने का अंदेशा पहले ही जताया जा रहा था। 

ऐसे में मुख्यमंत्री का यह भरोसा कि बातचीत से जल्द सफाई व्यवस्था पटरी पर लौटेगी, आम लोगों के लिए एक उम्मीद है, लेकिन जब तक कागज पर मानी गई 17 मांगों के आदेश जारी नहीं होते और पक्का करने की मांग पर कोई बीच का रास्ता नहीं निकलता, तब तक गांव की चौपाल से लेकर शहर के अस्पताल तक यही सवाल गूंज रहा है कि कचरे के इस पहाड़ के नीचे आखिर आम आदमी की सेहत कब तक दबी रहेगी। सरकार वेतन बढ़ोतरी, समय पर वेतन, वर्दी और सुरक्षा उपकरण, पीएफ-ईएसआई, एरियर का भुगतान, ठेका प्रथा खत्म कर पे-रोल पर लाने और कुछ भत्तों पर सहमत होती दिख रही है। 

पानीपत में हुई बैठक के बाद तो हड़ताल खत्म होने का ऐलान भी हुआ था। लेकिन पक्का करने की सबसे बड़ी मांग पर सरकार अड़ी हुई है। उसका कहना है कि हाईकोर्ट के 31 दिसंबर 2005 के आदेश और बाद में 31 दिसंबर 2025 तक 10 साल की सेवा वालों को नियमित करने के निर्देश की समीक्षा करेगी, तुरंत पक्का करना संभव नहीं है। यही वह बिंदु है जहां बात टूटती है। कर्मचारी इसे ही अपनी 19 साल की सेवा का हक मानते हैं और ठेका प्रथा समाप्त करने के लिखित आदेश जारी होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दे रहे हैं। 

लोकतंत्र को ‘भीड़तंत्र’ में नहीं बदलने देगी नई पीढ़ी


संजय मग्गू

इन दिनों जो माहौल है, उसको देखते हुए कुछ लोगों को अब यह डर सताने लगा है कि कहीं लोकतंत्र भीड़तंत्र में न बदल जाए। उनकी आशंका का आधार शायद बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में हुए जेन जेड के आंदोलन हैं। इन देशों में हुए आंदोलन के दौरान युवा अनियंत्रित हो गए थे और जो कुछ हुआ, उसे पूरी दुनिया ने देखा। इन देशों को यदि आधार बनाकर बात की जाए, तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में तब्दील होने की उनकी आशंका गलत नहीं है। लेकिन हमें यह बात भी याद रखनी चाहिए कि हर आंदोलनकर्ता हिंसक नहीं होता है, बलवाई नहीं होता है। 

पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए जेन जेड के आंदोलन ने यह साबित कर दिया है। संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी तब उग्र हुए, जब पुलिस और अराजकतत्वों ने उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा। बिना वर्दी और बैच पहने लोगों ने युवाओं को जिस तरह निशाना बनाया, लड़कियों के निजी अंगों पर प्रहार किया, उसके मुकाबले युवाओं का प्रतिरोध कुछ भी नहीं था। सच तो यह है कि पुलिस को बार-बार यह बताया-समझाया जाता है कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाला उनका शत्रु है। ब्रिटिश पीरियड से ही यह मानसिकता चली आ रही है। 

शायद अब पुलिस की ऐसी मानसिकता बहुत दिन तक नहीं रहने वाली है। जैसे-जैसे समाज बदल रहा है, लोगों की मानसिकता बदल रही है, वैसे-वैसे जेन जेड और जेन अल्फा का व्यवहार भी बदल रहा है। यह बदलाव बहुत तेजी से हो रहा है। इस बात को राज्य सत्ता, प्रशासन और समाज के लोग बहुत शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। इन दिनों तो रोज किसी न किसी प्रांत से, किसी जिले से या गांव से यह खबर आ रही है कि छोटे-छोटे बच्चों ने अपनी लड़ाई खुद लड़ने का निर्णय लिया है। 

वह अब किसी संगठन या किसी सहारे का इंतजार नहीं कर रहे हैं। वह अपनी लड़ाई खुद लड़ने को तैयार हैं। उन्हें किसी किस्म का भय भी नहीं है। कल्पना कीजिए, उस बच्ची में कितना साहस होगा, जो अपने स्कूल में होने वाली असुविधा और अनियमितताओं को लेकर डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट कार्यालय के सामने खड़ी होकर कह रही थी कि डीएम को बुलाओ। हम उनसे ही बात करेंगे। यह बदलाव है। यही बदलाव नए और पारदर्शी शासन व्यवस्था की नींव बनने वाला है। निकट भविष्य में व्यवस्था को या तो खुद सुधरना होगा या फिर मिटना होगा।

निडर जेन अल्फा जब बड़े होकर कार्य क्षेत्र में प्रवेश करेंगे, तो निश्चित है कि वह न तो खुद गलत करेंगे और न किसी को करने देंगे। इस बदलाव को सकारात्मक रूप से लेना चाहिए। जो काम हमारी पीढ़ी नहीं कर सकी, यदि जेन जेड और जेन अल्फा करने में सफल हो गई, तो यकीन मानिए, हमारे सामने एक नया भारत होगा जिसमें भ्रष्टाचार, शोषण, दोहन और उत्पीड़न को कोई जगह नहीं मिलने वाली है। यह पीढ़ी लोकतंत्र को भीड़तंत्र में नहीं बदलने देगी। बस, हमें अपनी नई पीढ़ी पर विश्वास करना सीखना होगा।