Monday, October 5, 2026

Desires eat away a man


bodhi tree

Ashok Mishra

Shrenik was the most glorious and very famous king of the Magadha Empire. In Buddhist literature he is known as Bimbisara. A lot has been written about him in Buddhist and Jain literature. It is said that he was a follower of Jainism, but he also had faith in Buddhism. Raja Shrenik was a contemporary of Mahatma Buddha and Swami Mahavir. 

Their capital was Rajgriha i.e. Rajgir. His wife's name was Chelna, who was the daughter of King Chetak of Vaishali kingdom. It is said that the famous sons of Queen Chelna included Abhaykumar and Kunik i.e. Ajatashutra. 

Once upon a time. King Shrenik's mind was disturbed. He was neither able to sleep properly at night nor did he find food interesting. The mind was like an alien mind. He was not interested in any work. Many types of apprehensions surrounded him. He could not understand why this was happening. Coincidentally, Mahatma Buddha had visited Rajgriha in those days. 

King Shrenik, restless at heart, thought of meeting the Tathagat and asking for a solution to the problem. He reached the ashram. At that time the sermon of Mahatma Buddha was going on. All the people present there were very happy listening to Buddha's sermon. 

King Shrenik also went and sat in a corner without creating any disturbance. Buddha sensed his mood. During the sermon itself he said that desires distract a person. If a man gets freedom from desires, be he a king or a pauper, everyone can live a happy life. Man loses his desires. On hearing this, King Shrenik got the solution to his problems. He returned to the palace happy.

मनुष्य को खा जाती हैं तृष्णाएं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्रेणिक मगध साम्राज्य के परम प्रतापी और अति प्रसिद्ध राजा थे। बौद्ध  साहित्य में इन्हें ही बिंबिसार के नाम से जाना जाता है। बौद्ध और जैन साहित्य में इनके बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। कहते हैं कि यह जैन धर्म को मानने वाले थे, लेकिन इनकी आस्था बौद्ध धर्म पर भी थी। 

महात्मा बुद्ध और स्वामी महावीर के राजा श्रेणिक समकालीन थे। इनकी राजधानी राजगृह यानी राजगीर थी। इतनी पत्नी का नाम चेलना था जो वैशाली राज्य के राजा चेटक की पुत्री थीं। कहा जाता है कि रानी चेलना के प्रसिद्ध पुत्रों में अभयकुमार और कूणिक यानी अजातशुत्र शामिल थे। एक बार की बात है। राजा श्रेणिक का मन अशांत था। वह रात को न तो ठीक से सो पाते थे और न ही उन्हें भोजन रुचिकर लगता था। 

मन अन्यमनस्क सा था। किसी काम में उनका मन नहीं लगता था। कई तरह की आशंकाएं उन्हें घेरे हुए थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। संयोगवश उन दिनों महात्मा बुद्ध राजगृह पधारे हुए थे। मन से बेचैन राजा श्रेणिक ने सोचा कि तथागत से मिलकर समस्या का समाधान पूछा जाए। वह आश्रम पहुंच गए। उस समय महात्मा बुद्ध का प्रवचन चल रहा था। वहां उपस्थित सारे लोग अत्यंत प्रसन्न होकर बुद्ध का प्रवचन सुन रहे थे। 

राजा श्रेणिक भी बिना व्यवधान पैदा किए एक कोने में जाकर बैठ गए। बुद्ध ने उनकी मनोदशा भांप ली। प्रवचन के दौरान ही उन्होंने कहा कि मनुष्य को तृष्णाएं विचलित कर देती हैं। यदि मनुष्य तृष्णाओं से मुक्ति पा ले, तो राजा हो या रंक, सभी सुखी जीवन गुजार सकते हैं। तृष्णाएं मनुष्य का खो जाती हैं। यह सुनते ही राजा श्रेणिक को अपनी समस्याओं का समाधान मिल गया। वह प्रसन्न चित्त राज महल लौट गए।

चमक-दमक में खत्म तो नहीं होती जा रही रामलीलाओं की परंपरा

अशोक मिश्र

हरियाणा में दशहरा पर्व की आहट सुनाई देने लगी है। राज्य में रामलीला कमेटियां मंचन की तैयारियों में जुट गई हैं। पिछले कई दशकों में रामलीला के मंचन का तरीका बदल गया है। फरीदाबाद स्मार्ट सिटी से लेकर गुरुग्राम के जैकबपुरा तक नौ अक्टूबर से लीलाओं के मंचन शुरू होने की बात कही जा रही है। मंचों पर कपड़े के पर्दों की जगह थ्री-डी इफेक्ट, एलईडी वॉल और सिनेमा हॉल जैसी लाइट-साउंड की भी चर्चा है। इतिहास के झरोखे में झांक कर देखें तो हरियाणा में रामलीला का इतिहास बहुत प्राचीन और सामाजिक प्रभाव बहुत गहरा है। 

यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक एकता का सबसे बड़ा साधन रहा है। पटौदी की रामलीला को दक्षिणी हरियाणा की सबसे पुरानी रामलीलाओं में गिना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि नवाब मुजफ्फर अली खान ने मन्नत पूरी होने पर रामलीला का मंचन शुरू करवाया था। वहां आज भी दिन में रामलीला होती है। जींद के एक गांव में 250 साल से अधिक समय से दिन में रामलीला होने की परंपरा है। इसका कारण यह है कि पहले यात्रा सुविधाएं सीमित थीं। 

दर्शक सूर्यास्त से पहले घर लौटना चाहते थे। उनकी सुरक्षा और सुविधा को देखते हुए दिन का समय तय किया गया था। हिसार की कटला रामलीला 127 वर्ष पुरानी है, तो हिसार के ही लोहारी राघो में 1948-49 से लगातार मंचन हो रहा है। इसके संस्थापक कलाकार विभाजन से पहले 1933 से 1947 तक पाकिस्तान में रामलीला करते थे। अंबाला के नारायणगढ़ में अंग्रेजों के जमाने की रामलीला मशाल की रोशनी में होती थी। दर्शक मीलों पैदल, बैलगाड़ियों और ट्रैक्टर-ट्रालियों से आते थे और पूरी रामलीला को ही वर्ष भर का एकमात्र मनोरंजन मानते थे।

 संवाद कविता शैली में, ब्रज-अवधी मिश्रित शुद्ध हिंदी में होते थे और अभिनय में भक्ति भाव प्रधान होता था। पहले वाली रामलीलाएं तकनीकी रूप से साधारण होते हुए भी अधिक मनोरंजक और प्रभावी मानी जाती थीं। तब मनोरंजन का कोई विकल्प नहीं था। पूरा गांव एक साथ बैठता था। धार्मिक उत्सुकता और सामाजिक जुड़ाव गहरा था। आज तकनीक ने रामलीला को दृश्य रूप से अधिक आकर्षक, भव्य और सिनेमाई बना दिया है। 

दर्शक को तात्कालिक रोमांच तो अधिक मिलता है, पर भाव के केंद्र में पात्र की जगह प्रभाव और प्रकाश ने ले ली है। शहरों में टीवी, ओटीटी, सोशल मीडिया और दशहरे पर बड़े मेलों के कारण पारंपरिक रामलीला देखने वालों की संख्या घटी है, कमेटियों को चंदा जुटाने और कलाकार ढूंढने में कठिनाई हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में और डिजिटल प्रचार से जुड़ी हाईटेक लीलाओं में भीड़ अभी भी अच्छी है, लाइव प्रसारण के कारण दर्शक बढ़े भी हैं। फिर भी कुल मिलाकर रामलीलाओं की संख्या कम होती जा रही है।

Sunday, October 4, 2026

Varna, Caste, and Gotra Are Like a Snake's Slough


Bodhivriksha

Ashok Mishra

It is said that during the era when Mahatma Buddha was born, the systems of caste, *gotra*, and *varna* were deeply entrenched and rigid. Individuals belonging to higher *varnas* and *gotras* were consumed by arrogance; they looked down upon those from lower *varnas* with disdain. After attaining enlightenment, the Tathagata’s first endeavor was to liberate people from the arrogance associated with caste, *varna*, and *gotra*. 

He established a rule that anyone joining the *Sangha* (monastic community) to become a monk had to change their name—a name that would be determined by the officials of the *Sangha* themselves. One day, some disciples were sitting in the ashram, engaged in a discussion. The topic of their conversation was precisely *gotra*, *varna*, and the like. One disciple remarked that upon entering the *Sangha*, one retains the same physical body; so, how could one truly shed the identity of *varna*, *gotra*, and caste? 

Eventually, word of this discussion reached Buddha. He summoned all his disciples to a religious assembly and asked if they had ever seen a snake. They all answered in the affirmative. Buddha then asked, "Have you ever seen a snake shedding its slough (outer skin)?" Most of the disciples replied positively. Buddha asked what the snake becomes like when it sheds its slough. One disciple replied that the snake becomes blind; it is only after the slough is shed that it regains its sight. 

Buddha then explained that caste, *varna*, and *gotra* are like a human being's slough. As long as a person clings to them, they remain blinded by arrogance. Once these are cast off, they gain a new vision. In such a state, everyone living in the *Sangha* becomes equal, and no trace of arrogance remains within them.

केंचुल सरीखे हैं वर्ण, जाति और गोत्र


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ऐसा कहा जाता है कि जिस कालखंड में महात्मा बुद्ध पैदा हुए थे, उन दिनों जाति, गोत्र और वर्ण व्यवस्था काफी रूढ़ थी। उच्च वर्ण और गोत्र वाले व्यक्तियों का अभिमान आकाश छू रहा था। वह अपने से नीचे वर्ण वाले लोगों को हेय समझते थे। बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद तथागत ने लोगों को सबसे पहले जाति, वर्ण और गोत्र के अहंकार से मुक्त करने का प्रयास किया। 

उन्होंने नियम बनाया कि जो भी व्यक्ति संघ में शामिल होगा, भिक्षुक बनेगा उसे अपना नाम बदलना पड़ेगा। नाम भी संघ के अधिकारी निर्धारित करेंगे। एक दिन की बात है। आश्रम में कुछ शिष्य बैठे हुए आपस में चर्चा कर रहे थे। उनकी चर्चा का विषय गोत्र, वर्ण आदि ही थे। एक शिष्य ने कहा कि संघ में आते समय यह शरीर तो पहले वाला ही रहता है, तो फिर वर्ण, गोत्र और जाति कैसे छूट जाएगा। 

कहते हैं कि धीरे-धीरे यह बात बुद्ध के कानों तक पहुंची। उन्होंने अपने सभी शिष्यों को धर्म सभा में बुलाया। उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा कि आप लोगों ने सांप को देखा है? सभी शिष्यों ने हां में जवाब दिया। तब महात्मा बुद्ध ने फिर पूछा, आप लोगों ने सांप को केंचुल छोड़ते हुए देखा है? ज्यादातर शिष्यों ने सकारात्मक जवाब दिया। बुद्ध ने पूछा कि जब सांप केंचुल छोड़ता है तो वह कैसा हो जाता है? 

एक शिष्य ने कहा कि सांप अंधा हो जाता है। जब उसका केंचुल छूट जाता है, तो वह फिर देखने लगता है। तब बुद्ध ने कहा कि जाति, वर्ण और गोत्र इंसान के केंचुल हैं। जब तक यह उसके साथ रहते हैं, इंसान अभिमान में अंधा बना रहता है। यह सब छूट जाने पर वह नई दृष्टि पाता है। ऐसी स्थिति में संघ में रहने वाले सभी समान हो जाते हैं। उनमें किसी प्रकार का अभिमान नहीं रह जाता है।

बच्चों, बूढ़ों को बचाना है तो प्रदूषण से सबको लड़ना होगा


अशोक मिश्र

फरीदाबाद, गुरुग्राम, सोनीपत, पानीपत से लेकर दिल्ली के आनंद विहार, जहांगीरपुरी, द्वारका तक कई जगहों पर वायु गुणवत्ता सूचकांक खराब श्रेणी में पहुंच चुका है। आंखों में जलन, गले में खराश और सुबह की सैर पर निकले बुजुर्गों की सांस फूलना अब आम शिकायत बनती जा रही है। असल सवाल यही है कि आखिर हर साल अक्टूबर आते-आते हमारी हवा सांस लेने लायक क्यों नहीं रह जाती। 

प्रदूषण का कोई एक मूल कारण नहीं है, बल्कि यह कई कारणों के एक साथ मिलने से बना एक जहर है। इसका सबसे बड़ा स्रोत हमारे रोजमर्रा के जीवन में छिपा है। दिल्ली एनसीआर में लगभग एक करोड़ से ज्यादा वाहन सड़कों पर हैं। इनसे निकलने वाला धुआं, खासकर डीजल वाहनों और पुराने वाहनों का उत्सर्जन, हवा में पीएम 2.5 और नाइट्रोजन आॅक्साइड की मात्रा को लगातार बढ़ाता है। दूसरा बड़ा कारण धूल है। पूरे एनसीआर में हजारों निर्माण स्थल चल रहे हैं, सड़कों की खुदाई चल रही है। 

खुले में पड़ी मिट्टी और मलबा हवा में घुल जाता है। इसमें उद्योगों से निकलने वाला धुआं, कूड़ा जलाने से उठने वाला जहरीला धुआं और घरों में इस्तेमाल होने वाले ठोस ईंधन भी मिल जाते हैं। पटाखे इस पहले से ही भरी हुई हवा में एक तात्कालिक विस्फोट की तरह हैं, जो दो-तीन दिन के लिए स्थिति को बेहद गंभीर बना देते हैं। इस जहरीली हवा की सबसे बड़ी कीमत हमारे घर के सबसे कमजोर लोग चुका रहे हैं, हमारे बच्चे और हमारे बुजुर्ग। डॉक्टर बताते हैं कि बच्चों के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, उनकी सांस लेने की गति बड़ों से तेज होती है, इसलिए वे प्रति किलो वजन के हिसाब से ज्यादा प्रदूषित हवा अंदर लेते हैं। 

साल भर खराब हवा में रहने से उनके फेफड़ों की क्षमता कम होने लगती है, अस्थमा, एलर्जी और बार-बार सर्दी-खांसी जैसी समस्याएं बचपन से ही घर कर जाती हैं। जो बच्चा आज हांफ रहा है, उसका भविष्य में खिलाड़ी बनने, खुलकर दौड़ने का सपना भी इसी हवा में धुंधला पड़ रहा है। नौनिहालों का जीवन संवारना है तो हमें उन्हें साफ हवा का बचपन लौटाना होगा। यह काम केवल प्रदूषण कम करने का नहीं, बल्कि उनके फेफड़ों को मजबूत करने का भी है। 

बच्चों को पौष्टिक भोजन, जिसमें विटामिन सी और एंटीआॅक्सीडेंट भरपूर हों, देना, उन्हें अंदरूनी खेलों के साथ-साथ साफ हवा वाले समय में सांस के व्यायाम सिखाना, और सबसे बढ़कर उन्हें यह बताना कि पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना कितना जरूरी है, ये सब मिलकर उनके भविष्य को सुरक्षित करेगा। इस मामले में सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती, जब तक हम लोग अपनी आदतें नहीं बदलते।

Saturday, October 3, 2026

What is the rationale behind worshipping the directions?


Bodhi Vriksha

Ashok Mishra

Mahatma Buddha was always rational; he is also considered an atheist. He endorsed only those ideas that withstood the test of logic. He steered clear of hypocrisy and futile argumentation. This is precisely why the number of his followers and disciples kept growing day by day. Once, while traveling along the path to Rajagriha with his disciples, he observed a householder—fresh from a bath and still in wet clothes—bowing in reverence to all the cardinal directions. 

This practice puzzled Buddha; he wondered what the actual rationale behind worshipping these directions could be. Eventually, he asked the householder, "Sir, what is the significance of worshipping these six directions? Why should they be worshipped?" The householder was taken aback by the question, unsure of how to respond. He admitted, "I have no knowledge regarding this." Buddha remarked, "What is the benefit of worshipping without understanding the rationale?" 

The man replied, "Bhante, please explain to me why these directions should be worshipped." Buddha smiled and said, "The directions for worship are different. The East is associated with parents and the head of the household. The South represents the teacher, while the West signifies the wife and son. The North represents friends and associates. The downward direction signifies the servant, and the upward direction represents the Brahmin and the Shramana." 

The householder asked, "Why worship the servant? It is they who serve us." Buddha explained, "Worshipping servants means treating them well and behaving towards them with affection. Simply folding one's hands in return for their service is not worship; treating them with love is true worship." Bowing to the Buddha, the householder said, "Today, you have bestowed true knowledge upon me."

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दिशाओं की पूजा करने का औचित्य क्या है?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध हमेशा तर्कशील रहे। उन्हें अनीश्वरवादी भी माना जाता है। जो बात तर्क की कसौटी पर खरी उतरती थी, उसी बात को वह प्रश्रय देते थे। पाखंड और वितंडावाद से वह बहुत दूर रहते थे। यही वजह है कि उनके समर्थकों और शिष्यों की संख्या दिन रात बढ़ती जाती थी। 

एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों के साथ राजगृह के पथ पर जा रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गृहस्थ नहाने के बाद भीगे कपड़ों में ही सभी दिशाओं को प्रणाम करता जा रहा है। यह बात महात्मा बुद्ध की समझ में नहीं आई। उन्होंने सोचा कि इन दिशाओं को प्रणाम करने का आखिर औचित्य क्या है? उन्होंने आखिरकार उस गृहस्थ से पूछ ही लिया। बुद्ध ने पूछा, महाशय! इन छह दिशाओं की पूजा करने का निहितार्थ क्या है? इनकी पूजा क्यों करनी चाहिए? 

गृहस्थ उनकी बात सुनकर भौंचक्का रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि वह क्या जवाब दे। उसने कहा, मुझे इस बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। बुद्ध ने कहा कि बिना औचित्य जाने पूजा करने से क्या लाभ है? उस व्यक्ति ने कहा कि भंते! आप ही समझा दीजिए कि इन दिशाओं की पूजा क्यों करनी चाहिए। तब बुद्ध मुस्कुराए और बोले, पूजा करने की दिशाएं भिन्न हैं। माता-पिता और गृहपति के लिए पूर्व दिशा मानी गई है। आचार्य की दिशा दक्षिण, पत्नी और पुत्र की दिशा पश्चिम मानी गई है। मित्रादि के लिए उत्तर दिशा मानी जाती है। सेवक के लिए नीचे वाली दिशा और ब्राह्मण, श्रमण के लिए ऊंचाई वाली दिशा मानी गई है। 

गृहस्थ ने कहा कि सेवक की पूजा क्यों? वह तो हम लोगों की पूजा करते हैं। बुद्ध ने कहा कि सेवकों की पूजा का मतलब उनके साथ सद्व्यवहार, वात्सल्यपूर्ण आचरण करना है। उनकी सेवा के बदले हाथ जोड़ना पूजा नहीं है। उनसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना ही पूजा है। गृहस्थ ने बुद्ध को नमन करते हुए कहा कि आज मुझे सच्चा ज्ञान प्रदान किया।

पार्कों में अतिक्रमण ने बच्चों के जीवन से छीन लिया खेल

अशोक मिश्र

हरियाणा के विभिन्न जिलों में पार्कों की गिनती कम नहीं है। बच्चों के खेलने के लिए बहुत अधिक जगह है। कागजों पर हर जगह पर्याप्त पार्क हैं, पार्कों में खेलने के उपकरण हैं। हर कॉलोनी, हर सेक्टर, हर गाँव में पार्क  दर्ज हैं, पर जमीन पर उतर कर देखो, तो सच्चाई आँखों में चुभती है। कहीं पार्क की चारदीवारी के भीतर किसी ने अपना सामान रख लिया है, कहीं किसी दबंग ने पक्का कमरा बना लिया है। कहीं दुकान सज गई है। जो थोड़ी बहुत हरियाली बची थी, वहाँ अब टाइल-पत्थर की पूजा-वेदी बन गई है, अगरबत्ती की खुशबू तो है पर बच्चों की किलकारी गायब है। 

सोच कर देखिए, जिस जगह पर कभी बच्चे दौड़ते थे, आज वहाँ अतिक्रमण का ताला लगा है। जहाँ अतिक्रमण नहीं हुआ, वहाँ के हालात तो और निराशा जनक हैं। पार्क में झूले तो खड़े हैं, पर उनकी चेन जंग खा चुकी है। फिसलपट्टी टूटी हुई है, झूला हिलाओ तो पूरा ढांचा कांपता है। किसी पार्क में एक ही झूला बचा है, जिस पर बारी के लिए बच्चों में झगड़ा होता है। कई पार्क  तो ऐसे हैं जहाँ झूला लगा ही नहीं, सिर्फ नाम का घास का टुकड़ा है, जिसमें कचरा और काँटे ज्यादा हैं। खेल की जगह कम। बच्चा वहाँ जाए भी तो खेले क्या? एक उम्मीद स्कूलों से बंधती है, लेकिन उनकी भी दशा पार्कों से कम बदतर नहीं है। 

स्कूलों में भी वही सूना मंजर है। नए-नए भवन बन गए, कमरे बन गए, पर खेल का मैदान कहीं खो गया। जहाँ थोड़ा बहुत मैदान बचा भी है, वहां घंटी तो बजती है पर खेलने की नहीं। अध्यापक कहते हैं सिलेबस पूरा करना है। अभिभावक कहते हैं सबसे ज्यादा नंबर लाने हैं। बच्चा बेचारा बस्ते के बोझ में दबा, कक्षा की चारदीवारों में कैद है। वह भीतर ही भीतर घुटता है। खिड़की से बाहर मैदान को देखता रहता है। उसका मन भागना चाहता है, पर उसे बैठना पड़ता है। अध्यापक का अनुशासन उसके मन की छटपटाहट पर भारी पड़ता है। गाँवों और मोहल्लों में तो हालत और कठिन है। 

पहले जहां जोहड़ के पास, बाखल में, खाली पड़ी जमीन पर बच्चे गुल्ली-डंडा, पिट्ठू, कबड्डी खेल लेते थे, वहाँ अब प्लॉट कट गए हैं, मकान खड़े हो गए हैं। खेलने लायक एक इंच जमीन नहीं बची। नतीजा, हमारे बच्चे सड़क पर खेलने को मजबूर हैं। गली में दो ईंटों से विकेट बनता है, सड़क पर आती गाड़ी के हॉर्न से खेल रुकता है। माँ का दिल हर पल डरता है कि कहीं कुछ हो न जाए। 

क्या यही बचपन है जो हमें उनको देना था? शायद नहीं। हमें उन्हें स्वस्थ जीवन देना था। जब बच्चा दौड़ेगा नहीं, कूदेगा नहीं, गिरेगा-उठेगा नहीं, तो उसका शरीर कैसे बनेगा। उसकी सांस कैसे गहरी होगी, उसकी आँखों में वह चमक कहाँ से आएगी? आज छोटे-छोटे बच्चों की आँखों पर चश्मा है, पीठ झुकी हुई है, थकान जल्दी आती है, क्योंकि उनके जीवन से खेल ही छीन लिया गया है। बच्चों को खेलने की जगह देना कोई एहसान नहीं है, यह उनका हक है, उनकी सांस है, उनका बचपन है।

Friday, October 2, 2026

A wise person's mistake cannot be forgiven, my child!



The Bodhi Tree

Ashok Mishra

Mahatma Buddha used to impart spiritual teachings to people and show them the path to liberation. He would periodically test his disciples and keep a watch on their daily lives. If they made a mistake, he would explain—with great affection and through examples—where and why they had erred. Consequently, the disciples would easily grasp his teachings. 

Once, Mahatma Buddha was traveling with his disciples. Along the way, he would occasionally ask a disciple a question or respond to someone's words. As they walked, they reached the edge of a garden where there was a pond. The pond was filled with blooming lotus flowers. Buddha gazed at the lotuses with deep affection; the sight of the flowers in the garden and the pond brought him great joy. 

Just then, one of his disciples ran to the pond, plucked a flower, and offered it to Buddha. Buddha accepted the flower but explained, "Plucking a flower grown through someone else's hard work is very wrong. Before plucking a flower, one should seek permission from the person who cultivated it." Meanwhile, a man arrived, began plucking lotuses from the pond, and tossed them aside. 

The disciple said, "Master! You are saying nothing to the man who has completely altered the appearance of the pond." Buddha replied, "If a person commits such an act driven by worldly desire or greed, it stems from ignorance. However, when a wise person commits the same act, it is a sin. The man who has marred the pond is ignorant; his mistake can be forgiven, but yours cannot." The disciple understood Buddha's words.