Friday, May 15, 2026

जीजा के साथ गोवा चली जाऊंगी


14 मई 2026 को दैनिक प्रभात खबर में प्रकाशित।
व्यंग्य

अशोक मिश्र

‘ना मानूं, ना मानूं, ना मानूं। मैं आपकी किसी कोई बात नहीं मानूंगी। आप झूठ बोलते हैं, फिर बहाना बनाकर निकल जाते हैं।’ घरैतिन नेता प्रतिपक्ष की तरह हाथ नचा-नचाकर बोल रही थीं। दरअसल, मैं भी गठबंधन के सहारे चल रही सरकार के मुखिया की तरह सिर झुकाए बैठा हुआ था। पत्नी और बेटा-बेटी का समर्थन लिए मेरी गृहस्थी रूपी सरकार चल भी नहीं सकती थी। गृहस्थी चलानी है, तो इन तीनों का सहयोग और समर्थन चाहिए। यह सभी जानते हैं कि दुनिया में सबसे कठिन काम पति होना है। पति और पिता को न जाने कितने समझौते करने पड़ते हैं। सुबह से ही मेरे घर में आपात बैठक चल रही थी। पत्नी, बेटा और बेटी तीनों गठबंधन धर्म का निर्वाह कर रहे थे। मेरे ही खिलाफ आक्रोश प्रदर्शन कर रहे थे।

मेरी आसंदी यानी जहां मैं बैठा हुआ था, वहां आकर मेरी बेटी मेरा कंधा झकझोरकर कह चुकी थी कि छुट्टियों में अगर आप हम सबको शिमला घुमाने नहीं ले गए, तो वह समर्थन वापस ले लेगी और मम्मी से कहकर मौसा जी के साथ गठबंधन करके नई सरकार बना लेगी।

पत्नी गोवा जाने की जिद पर अड़ी हुई थी। कह रही थी कि पिछले साल भी आपने गोवा ले जाने को कहा था। आखिरी समय पर आफिस का बहाना बनाकर टाल गए थे। इस बार अगर आपने आनाकानी की, तो मैं बच्चों को लेकर अपने जीजा के साथ गोवा घूमने चली जाऊंगी। बेटा बस इतना चाहता था कि इस बार की छुट्टियों में कहीं घूमने चला जाए, कोई स्थान विशेष उसकी च्वाइस में नहीं थी। मैं कई बार घरैतिन को समझा चुका था कि मेरी हालत पाकिस्तान जैसी है। वह तो अपनी गरीबी से  उबरने के लिए शराब बेच सकता है, लेकिन मेरे पास तो ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे बेचकर बच्चों को कहीं घुमाने ले जा सकूं। मेरी अर्थव्यवस्था सेंसेक्स की तरह ऊपर चढ़ ही नहीं रही है। महंगाई ने कमर तोड़ रखी है। मुद्रा अवमूल्यन रोज होता जा रहा है। बारह साल पहले जो सैलरी मिलती थी, उतनी ही मूल्य की सैलरी आज भी मिलती है। लेकिन परिवार वाले मेरी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। उन्हें तो लग रहा था कि भारत की तरह मेरी अर्थव्यवस्था पांच से सात ट्रिलियन डॉलर के बीच है। मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी हूं।

मेरी बेटी ने अपनी मां से कहा, मम्मी! बड़े मौसा जी से बात कीजिए। पूछिए कि वह हम सबको गोवा घुमाने ले जाने के लिए तैयार हैं? मौसी के साथ गोवा घूमने में मजा आ जाएगा। मैं तो जिंदगी में पहली बार समुद्र देखूंगी, कितना मजा आएगा। मैंने उस हालत में वॉक आउट करना ही उचित समझा। शाम को जब घर लौटा, तो पता चला कि घरैतिन ने अपने सहयोगी दलों यानी बेटा-बेटी को लेकर अपने जीजा-जीजी के साथ नई सरकार के गठन पर बातचीत करने के लिए गोवा जाने का फैसला किया है। मैं समझ गया कि मेरी अल्पमत की सरकार खतरे में है। मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी।

मन का अभिमान दूर हो चुका था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अभिमान वह दीमक है, जो व्यक्ति को धीरे-धीरे सफाचट कर जाता है। जिसे एक बार अभिमान हो गया, समझो कि वह पतन की ओर बढ़ चला है। उसके सुख-समृद्धि सब कुछ नष्ट होने वाला है। अभिमान पालने वाला यदि राजा भी हो, तो कुछ ही दिनों में वह रंक हो जाता है। 

किसी राज्य में राजा को अभिमान होने लगा। वैसे वह बहुत ही दयालु और गुणवान राजा था। उसने जीवन में कभी अपनी प्रजा के साथ राजा की तरह व्यवहार नहीं किया था। वह हमेशा अपनी प्रजा को पुत्रवत मानकर ही व्यवहार किया था। वह अपनी प्रजा का हर तरह से ख्याल रखता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका मन काफी चंचल हो रहा था। वह कई दिनों से अपने मन को साधने में लगा हुआ था। 

वह अपने राजा होने या राजकोष की संपदा पर कतई अभिमान नहीं करना चाहता था। लेकिन वह राजा था तो क्या हुआ, था तो इंसान ही। धीरे-धीरे उसके मन में अपने वैभव को लेकर अभिमान की भावना स्थायित्व पाने लगी। इसी कशमकश में वह अपने राजगुरु के पास पहुंचा। राजगुरु राजा को देखते ही सारा माजरा समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि तुम मेरी तीन बातों को हमेशा याद रखोगे, तो तुम सामान्य जीवन जी सकोगे। पहली बात यह है कि सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। 

दूसरी बात कि कभी भरपेट भोजन मत करना। तीसरी बात कि कम से कम सोना। सोने से बचे हुए समय में प्रजा की रक्षा करना। राजसी वैभव का मोह मत करना। जब जहां जैसा बिस्तर मिले, सो जाना। ऐसी स्थिति में तुम्हें घासफूस के बिस्तर पर भी अच्छी नींद आएगी। राजा अपने गुरु की बातों का मर्म समझ गया। उसने गुरु को प्रणाम किया और राज महल लौट आया। उसके मन का अभिमान दूर हो चुका था।

हवा में घुलने वाली अमोनिया गैस सांसों में घोल रही जहर

   

अशोक मिश्र

हरियाणा में वायु प्रदूषण के चलते सांस लेना भी दूभर होता जा रहा है। राज्य के औद्योगिक और शहरी इलाकों में हवा में घुली अमोनिया गैस लोगों की सांस घोट रही है। इसकी वजह से लोगों को कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। अमोनिया गैस के संपर्क  में आने वाले लोगों को  सांस लेने में तकलीफ होने के साथ-साथ खांसी, गले में जलन और छाती में जकड़न होती है। हवा में घुली अमोनिया गैस आंखों और त्वचा के लिए भी हानिकारक है। 

इसकी वजह से आंखों में तेज जलन पैदा होती है जिससे आंखों से पानी आने लगाता है। त्वचा में लालिमा आ सकती है जिससे खुजली भी हो सकती है। यही नहीं, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अमोनिया के संपर्क में रहे, तो वह दमा जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है। निमोनिया और फेफड़ों में पानी जमा होना आम बात है।  इनसान के तंत्रिका तंत्र पर भी बुरा असर पड़ सकता है। 

आंकड़े बताते हैं कि गुरुग्राम में हर दूसरा बच्चा श्वसन समस्याओं से जूझ रहा है। इसका बड़ा कारण प्रदूषित हवा है। रैस्पायर लिविंग साइंसिज की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि गुरुग्राम का सेक्टर-51 में कूड़े-कचरे के अंबार से बन रही जहरीली अमोनिया गैस का बड़ा हॉटस्पॉट बन चुका है। राज्य में पी. एम. 2.5 और पीएम 10 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से दोगुने से भी अधिक दर्ज किया गया है जबकि अमोनिया के स्तर में आठ फीसदी की बढ़ोतरी सामने आई है। गुरुग्राम के कुछ इलाके कूड़े के ढेरों और औद्योगिक कचरे के कारण अमोनिया के हॉटस्पॉट बन गए हैं।

इतना ही नहीं, फरीदाबाद, बहादुरगढ़, मानेसर और सोनीपत की औद्योगिक पट्टी इंसानों के लिए खतरे का कारण बनती जा रही है। इंसानों के स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण का बहुत बुरा असर हो रहा है। खेतों में यूरिया आधारित उर्वरकों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल हवा में अमोनिया गैस को बढ़ावा दे रहा है। खेतों में डाला गया उर्वरक बाद में हवा के संपर्क में आने के बाद अमोनिया गैस बनने का कारण है। पानीपत और सोनीपत के औद्योगिक बेल्ट में कपड़ा रंगाई इकाइयों और अन्य कारखानों से बिना उपचारित रसायन युक्त पानी यमुना नदी में छोड़ा जा रहा है जो हवा में अमोनिया का एक बड़ा स्रोत है। 

राज्य के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जमा कूड़े के अंबार से अमोनिया गैस का रिसाव होता है। कूड़े में पड़े अपशिष्ट जब सड़ने लगते हैं या उन पर सूरज की किरणें पड़ने से अपशिष्ट गर्म होता है, तब उससे अमोनिया गैस निकलती है। पशुधन अपशिष्ट से भी अमोनिया वायुमंडल में मिल रही है। ऐसी स्थिति में अगर बदलाव नहीं आया तो निकट भविष्य में लोगों को कई तरह की बीमारियों का शिकार होना पड़ सकता है। राज्य सरकार ऐसी स्थिति से बचने के लिए कई तरह के उपाय कर रही है। इसके बावजूद उद्योगों को भी इस काम में मदद करनी चाहिए और अपशिष्ट को नदी या खुले में फेंकने से बचना चाहिए।

Thursday, May 14, 2026

अरे! यह भोजन तो बासी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मित्रता का अर्थ यह नहीं है कि साथ घूमे-फिरे। सुख में मित्रता का दंभ भरा और जब संकट का समय आया, तो अपने मित्र से कन्नी काटकर निकल गए। मित्रता तो मित्र की मौत के बाद भी कायम रहती है।  दो मित्रों की एक बहुत ही अच्छी कथा है। किसी नगर में दो मित्र रहते थे। 

दोनों मित्र एक दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे। अमीरी-गरीबी या ऊंच-नीच की भावना उनमें कभी नहीं आई। संयोग की बात है। एक दिन एक मित्र की मौत हो गई। उम्र भी लगभग साठ के आसपास की हो गई थी। जीवित बचे मित्र को बहुत दुख हुआ। वह जानता था कि उसके मित्र का पुत्र आलसी और लापरवाह है। उसके मित्र ने काफी मेहनत करके खूब धन कमाया था। 

मित्र का पुत्र अपने आलस्य के चलते कुछ ही दिनों में सारे धन को खर्च कर बैठेगा। फिर कंगाली का जीवन जीना पड़ेगा। मित्र की मौत के कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति दिवंगत मित्र के घर गया। मित्र का पुत्र उसे जानता था। उसने बड़े सम्मान के साथ उसे बैठाया और आग्रह करते हुए कहा कि कुछ दिनों बाद त्यौहार आ रहा है। कृपया आप उस दिन भोजन पर पधारें। उस आदमी ने आग्रह स्वीकार कर लिया। जब वह व्यक्ति खाने पर बैठा, तो उसने पहला निवाला खाने के बाद कहा, अरे यह भोजन तो बासी है। 

मित्र के पुत्र ने कहा कि नहीं, यह तो अभी बनाया गया है। बासी कैसे हो सकता है। उस आदमी ने कहा कि इसमें गंध तो बरसों पुरानी आ रही है। मित्र का पुत्र समझ गया कि वह क्या कहना चाहते हैं। जिस धन से यह भोजन बना है, वह मेरे पिता का कमाया हुआ है। पुत्र ने अपने पिता के मित्र से कहा कि आप क्या कहना चाहते हैं, मैं समझ गया हूं। आप निश्चिंत रहें। मैं अपने पिता की संपत्ति में कमी नहीं आने दूंगा। मैं मेहनत करूंगा और अपनी कमाई से आपको भेजन कराऊंगा। यह सुनकर उस आदमी ने भोजन किया और संतुष्ट होकर अपने घर चाला गया।

जब तनावमुक्त रहेगा बच्चा तभी पढ़ाई में आगे बढ़ेगा बच्चा


अशोक मिश्र

यह सच है कि स्कूली बच्चों में तनाव बढ़ता जा रहा है। आज बच्चों के लिए सबसे जरूरी है कि वह खेलने-कूदने और पढ़ाई करने के साथ-साथ तनाव मुक्त रहें। केंद्र सरकार ने बच्चों को तनाव मुक्त रखने के लिए नई पहल करने का फैसला किया है। यह गाइडलाइन राज्यों से विचार-विमर्श करने के बाद जून के पहले सप्ताह में जारी हो सकता है। 

इस मामले में बच्चों को तनाव मुक्त रखने के लिए शिक्षा विभाग मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सहायता लेगा। इसके लिए गाइडलाइन तैयार की जा रही है। गाइडलाइन के मुताबिक, अब स्कूलों में बच्चों को केवल पढ़ाया ही नहीं जाएगा, बल्कि उनको तनाव मुक्त रहने के गुर सिखाए जाएंगे। अब स्कूलों में पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रखी जाएगी। शिक्षकों को भी स्वास्थ्य से जुड़ा विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वह स्कूल में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रख सकें। यदि कोई बच्चा तनावग्रस्त पाया जाता है, तो उसकी काउंसिलिंग की जाएगी। उसे मेडिटेशन सिखाया जाएगा। 

उसे खेलने-कूदने सहित अन्य गतिविधियों में लगाया जाएगा ताकि वह तनाव मुक्त हो सके। बच्चों को तनाव मुक्त रखने का सबसे बढ़िया तरीका उन्हें खेलने-कूदने की छूट देना है। खेलने-कूदने से बच्चों को मानसिक रूप से जहां संतोष प्राप्त होता है, तनाव कम होता है, वहीं उनका शारीरिक विकास भी होता है। दो-तीन दशक पहले तक स्कूली बच्चों पर कोई दबाव नहीं होता था। वह जी भरकर खेलते थे और मन भर पढ़ते थे। 

कहने का मतलब यह है कि जब तक उनका मन होता था, वह स्कूलों में पढ़ाई करते थे और जितनी मर्जी होती थी, उतना वह खेलते थे। उन दिनों रैंकिंग का दबाव भी बच्चों पर नहीं होता था। मां-पिता को बस इससे मतलब होता था कि उनका बच्चा पास हो गया है। फर्स्ट या सेकेंड आ गया, तो और अच्छी बात है। बच्चों पर किसी तरह का मानसिक दबाव नहीं रहने से उनका शारीरिक और मानसिक विकास भी अच्छी तरह होता था। जब वह उच्च शिक्षा ग्रहण करते थे, तो वह तनाव मुक्त रहते थे। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। 

नर्सरी और एलकेजी से ही माता-पिता अपने बच्चे पर अव्वल आने का दबाव डालने लगते हैं। यदि बच्चा किसी कारणवश पढ़ाई में पिछड़ जाता है, तो उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। उसकी दूसरे बच्चे से तुलना की जाती है। इससे बच्चा मनोवैज्ञानिक रूप से तनाव में आ जाता है। इतना ही नहीं, बच्चे को सुबह ही उठाकर पढ़ने के लिए बिठा दिया जाता है। 

उसके बाद उसे स्कूल भेज दिया जाता है। स्कूल में भी खेलने का मौका कम ही मिलता है। स्कूल से आने के कुछ ही देर बाद उसे ट्यूशन पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है। ट्यूशन से आने के बाद स्कूल और ट्यूशन का होमवर्क उसके सिर पर सवार हो जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चा तनावग्रस्त हो जाता है।

Wednesday, May 13, 2026

घड़े पर हंस रहे हो या कुम्हार पर?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्राचीनकाल में एक ऋषि हुए हैं उद्दालक। इनके पुत्र का नाम श्वेतकेतु था। माना जाता है कि विवाह नामक संस्था की शुरुआत श्वेतकेतु ने किया था। उद्दालक का एक शिष्य था कहोड़। उन्होंने अपनी पुत्री सुजाता की शादी कहोड़ से कर दी थी। कहोड़ को संपूर्ण वेदों का ज्ञान था। 

एक दिन कहोड़ वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, तो उनकी पत्नी सुजाता के गर्भ से आवाज आई कि पिता जी, आप वेद मंत्र का गलत उच्चारण कर रहे हैं। इस बात से नाराज कहोड़ ने अपने पुत्र को आठ जगह से टेढ़ा होने का शाप दिया। उन दिनों मिथिलापुर में ह्रस्वरोमा के पुत्र सीरध्वज यानी जनक का शासन था। 

कहते हैं कि अष्टावक्र भी अपने पिता कहोड़ के समान काफी विद्वान थे। अष्टावक्र के पिता को राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ में एक बंदी ने हरा दिया था जिसकी वजह से वह कारागार में बंद थे। अष्टावक्र अपने मामा श्वेतकेतु के साथ जब राजा जनक के दरबार में पहुंचे, तो उनको देखकर राजा जनक के सभी सभासद हंसने लगे। यह देखकर अष्टावक्र भी बहुत जोर से हंसने लगे। 

हालांकि उस समय अष्टावक्र और श्वेतकेतु की उम्र बहुत कम थी। मामा-भांजे दोनों किशोर ही थे। राजा जनक ने गंभीरता से अष्टावक्र से पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैं? अष्टावक्र ने राजा जनक से पूछा कि महाराज! आप बता सकते हैं कि आपके दरबारी क्यों हंस रहे थे। 

लोग कहते थे कि आपके दरबार में विद्वान रहते हैं, लेकिन यह तो निरे मूर्ख हैं। तब एक दरबारी ने कहा कि हम आपके शरीर को देखकर हंस रहे थे। अष्टावक्र ने कहा कि घड़े पर हंस रहे थे या कुम्हार पर? यह सुनकर सारे चुप रह गए। सभी जान गए कि दोनों बच्चे विद्वान हैं। बाद में बंदी से शास्त्रार्थ करके अष्टावक्र अपने पिता को आजाद करा लाए।

घरेलू कलह के चलते टूटते बिखरते जा रहे हैं परिवार

अशोक मिश्र

कई हजार साल पहले जब इंसान ने अपने को असुरक्षित महसूस किया, तो उसने परिवार नामक संस्था को जन्म दिया। परिवार को वर्तमान स्वरूप में आने में भी कई शताब्दियां लगीं। परिवार का मतलब होता है, हर प्रकार की समस्याओं और दिक्कतों को मिलजुलकर हल करना। परिवार ने न केवल विभिन्न प्रकार की विपत्तियों से इंसान की सुरक्षा की, बल्कि उसे सुकून का एहसास भी दिलाया। लेकिन पिछले दिनों से परिवार में जिस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं, उससे परिवार संस्था खुद संकटग्रस्त नजर आती है। 

परिवार की वजह से ही समाज में तमाम रिश्तों का निर्माण किया गया। हर रिश्ते की एक मर्यादा कायम की गई। लेकिन अब रिश्तों में कड़वाहट घुलती जा रही है। परिवार में कलह बढ़ती जा रही है। सोमवार को फरीदाबाद के दयालपुर गांव में एक व्यक्ति ने पहले अपने पांच साल के बच्चे की हत्या की और फिर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बताया जाता है कि मरने वाला अपनी पत्नी सहित अपने माता-पिता और भाई से झगड़ा करता था। उन सबसे मारपीट करता था जिसकी वजह से आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के मां-बाप, भाई और उसकी पत्नी अपने पांच साल के बेटे के साथ अलग रहते थे। 

मरने वाला व्यक्ति अपने पुस्तैनी घर में अकेला रहता था। दरअसल, ऐसी घटनाएं अब आम हो चली हैं। परिवार में पति-पत्नी, मां-पिता, भाई-बहनों के बीच सामंजस्य घटता जा रहा है। लोग छोटी-छोटी बातों पर उग्र हो रहे हैं। हत्या या आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं। जब से समाज में एकल परिवार का चलन बढ़ा है, तब से लड़के और लड़कियों में महत्वाकांक्षाओं ने उड़ान भरनी शुरू कर दी है। शिक्षित होना, अपने पैरों पर खड़ा होना, धन कमाने की लालसा होना किसी भी रूप में गलत नहीं है। 

लेकिन जब इसके चलते संबंधों में दरार आने लगे, तो परिवार के लोगों को सतर्क हो जाना चाहिए। आज पति हो या पत्नी, सबको अपने-अपने हिसाब से स्वतंत्रता चाहिए। कमाऊ महिलाएं अपनी कमाई को अपने मन मुताबिक खर्च करना चाहती हैं, लेकिन यदि पति इसमें बाधा डालता है, तो मनमुटाव हो जाता है। यही मनमुटाव बाद में एक ग्रंथि का रूप धारण कर लेता है। 

इससे परिवार में मारपीट, कहा सुनी और कई बाहर हत्या या आत्मघात जैसी घटनाओं में परिणत हो जाती है। जैसे-जैसे समाज में खुलापन आता जा रहा है, स्त्री-पुरुष की नजरों में परिवार और यौन संबंधों के मायने बदलते जा रहे हैं। अवैध संबंध रखना, शादीशुदा होते हुए भी गर्लफ्रेंड या ब्यायफ्रेंड रखना जैसी बातें सामान्य चलन मानी जाने लगी हैं। ऐसी स्थिति में परिवार में तनाव बढ़ना लाजिमी है। गरीबी, बेकारी जैसी समस्याओं के कारण भी परिवार में कलह मची रहती है। परिवार का कोई सदस्य अतिमहत्वाकांक्षी भी हो सकता है जिसकी वजह से परिवार में अनबन हो सकती है।

Tuesday, May 12, 2026

मौत का सौदागर अल्फ्रेड नोबेल मर गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डायनामाइट के आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल की आम जनता में मौत का सौदागर के नाम से ख्याति थी। स्वीडन में 21 अक्टूबर 1833 को पैदा हुए अल्फ्रेड नोबेल एक उद्योगपति, रसायनज्ञ और वैज्ञानिक थे। अपने माता-पिता की आठ संतानों में वह और उनके दो भाई ही जीवित बच पाए थे। 

वह कठिन परिस्थितियों में अपनी शिक्षा पूरी कर पाने में सफल हुए थे। नोबेल ने स्वीडिश, फ्रेंच, रूसी, अंग्रेजी, जर्मन और इतालवी भाषाओं में दक्षता हासिल कर ली थी। वह अंग्रेजी में कविताएं भी लिखते थे। ​​एक बार की बात है। जब डायनामाइट का आविष्कार करने के बाद अल्फ्रेड नोबेल काफी बड़े उद्योगपति बन गए। उन्हीं दिनों उनके भाई लुडविग नोबेल की मृत्यु हो गई। 

मृत्यु का समाचार सुनकर लोगों ने शोक व्यक्त करने के लिए आना शुरू किया। मगर वह रोज की तरह अपनी बालकनी में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर एक हेडिंग पर पड़ी। लिखा था-मौत के सौदागर, डायनामाइट के आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल का निधन। अखबार के रिपोर्टर ने लुडविग की जगह अल्फ्रेड की मौत का समाचार लिखकर भेजा था जिसे संपादक ने प्रकाशित कर दिया था। 

खबर में सारी बातें लिखी थीं, बस मरने वाले का नाम ही गलत था। यह समाचार पढ़ने के बाद नोबेल सोचने लगे कि मौत के बाद मैं मौत का सौदागर नाम से पहचाना जाऊंगा। इस खबर का उन पर प्रभाव यह हुआ कि उन्होंने उस दिन से लोगों की समस्याओं का निदान करना शुरू कर दिया। 

उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति एक ट्रस्ट बनाकर सौंप दी। उसी ट्रस्ट ने नोबेल की मौत के पांच साल बाद भौतिक, रसायन, शांति, चिकित्सा और साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार देना शुरू किया।

चोरी छिपे पेड़ कटते रहेंगे तो कैसे हरियाणा में बढ़ेगा वनक्षेत्र

अशोक मिश्र

दुनिया भर की सरकारें, प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद चीख-चीख कर लोगों को सचेत कर रहे हैं कि प्रकृति में कार्बन डाई आक्साइड गैस का उत्सर्जन रोको। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जितना कम होगा, पर्यावरण संतुलन बरकरार रहेगा। जीवाश्म ईंधन का उपयोग तो बिल्कुल बंद करना होगा। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि हर क्षेत्र में लगभग बीस प्रतिशत क्षेत्रफल हराभरा हो यानी पेड़-पौधों की बहुलता हो। यही वजह है कि भारत में हर साल जून और जुलाई महीने में पौधरोपण कार्यक्रम चलाया जाता है। 

स्कूली बच्चों से लेकर सरकारी संस्थाएं पौधरोपण कार्यक्रम में भाग लेते हैं। बच्चों को हर साल रटवाया जाता है कि पौधरोपण करो, पर्यावरण बचाओ। हरियाणा भी पौधरोपण के मामले में किसी भी दूसरे राज्य से पीछे नहीं है। राज्य में हर साल करोड़ों पौधे रोपे जाते हैं। यदि इस हिसाब से देखा जाए, तो पिछले एक दशक में जितने पौधे रोपे गए हैं, उसके बाद तो प्रदेश में जंगल ही जंगल होने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं है। बल्कि कुछ रिपोर्ट तो बताती हैं कि राज्य का वन क्षेत्र घटता जा रहा है। 

इसका कारण यह माना जा सकता है कि पौधरोपण अभियान तो चलाए गए, लेकिन पौधों को रोपने के बाद उनकी देखभाल नहीं की गई। इसकी वजह से पौधे या तो सूख गए या फिर उन्हें जानवर चर गए। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ संस्थाओं ने पौधरोपण के आंकड़े ही गलत दिए हों। वन क्षेत्र ने बढ़ने का कारण यह भी है कि राज्य में जितने वन क्षेत्र हैं उनमें पेड़ों की कटाई अवैध तरीके से की जा रही है। यमुनानगर स्थित कलेसर के जंगल में खैर के 3253 पेड़ काट दिए गए। 

अखबारों में रिपोर्ट छपने के बाद वन विभाग की नींद खुली। पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव विभाग ने मामले की जांच की तो कलेसर जंगल में 1473 पेड़ों के ठूंठ नए पाए गए। इसका मतलब यह है कि यह पेड़ हाल ही में काटे गए हैं। जांच में 1780 ठूंठ पुराने मिले हैं यानी इतने सारे पेड़ बहुत पहले ही काटे गए थे। पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव विभाग ने अपनी जांच रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच और आवश्यक कार्रवाई करने की सिफारिश की है। 

अवैध पेड़ कटान के मामले में कई बार संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है। संबंधित विभाग ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन देता है। ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच के बाद कार्रवाई भी की जाती है, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से अवैध कटान शुरू हो जाती है। ऐसी स्थिति में यही किया जा सकता है कि पेड़ों की अवैध कटान को लेकर लोगों को जागरूक किया जाए। अधिक से अधिक पौधों को रोपने के बाद उनकी सुरक्षा की जाए। जब तक लोग जागरूक नहीं होंगे, राज्य में बीस प्रतिशत वन क्षेत्र का सपना अधूरा ही रहेगा।

Monday, May 11, 2026

बेहतर है, जमीन उसे वापस कर दो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बिहार के सीवान जिले में कायस्थ परिवार में जन्मे डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। इनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी दोनों भाषाओं के विद्वान थे। इनकी मां कमलेश्वरी देवी ने हमेशा गरीबों की मदद करने, एक आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा दी। हालांकि राजेंद्र बाबू को अपनी मां का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं मिला। 

मां की मौत के बाद इनका पालन पोषण बड़ी बहन ने किया। डॉ. राजेंद्र बाबू बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। सन 1905 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से राजेंद्र बाबू ने प्रथम श्रेणी की डिग्री हासिल की। राजेंद्र बाबू कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, कुशल अधिवक्ता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। 

बात उन दिनों की है, जब वह वकालत कर रहे थे। बचपन में मां से मिली शिक्षा और बड़ी बहन के पालन-पोषण का प्रभाव यह हुआ कि वकालत के दिनों में भी उन्होंने गरीबों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया। वह गरीबों और असहायों का मुकदमा कई बार मुफ्त लड़े थे और जीत भी दिलाई थी। एक दिन एक व्यक्ति राजेंद्र बाबू के किसी परिचित का पत्र लेकर उनसे मिला और उनसे मुकदमा लड़ने की गुजारिश की। 

राजेंद्र बाबू ने उससे कागजात मांगे जिसको पढ़ने के बाद पता चला कि वह आदमी जिस जमीन का मुकदमा लड़ने के लिए उसके पास आया है, किसी विधवा का है। राजेंद्र बाबू ने उस व्यक्ति से कहा कि तुमने कागजात तो बहुत चतुराई से बनवाया है। तुम मुकदमा जीत भी सकते हो, लेकिन अच्छा होगा कि उस विधवा को उसकी जमीन वापस कर दो। वह जमीन ही उसकी जीविका का आधार है। यह सुनकर उस व्यक्ति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। उसने विधवा की जमीन उसे वापस कर दी।