बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महर्षि कणाद का जन्म कब हुआ था, इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण तो नहीं मिलते हैं, लेकिन माना जाता है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी से दूसरे शताब्दी के बीच पैदा हुए होंगे। कुछ लोगों ने ईसा से तीन सौ साल पहले उनका जन्म माना है। कहते हैं कि जब किसान खेत से फसल काट लेते थे, तो खेत में फसल के दाने बिखर जाते थे, उन्हीं दोनों को इकट्ठा करके वह अपना काम चलाते थे।फसल के इन दानों को कन यानी कण कहा जाता था, इससे ही उनका नाम कणाद पड़ा। प्राचीन भारतीय प्रकृति वैज्ञानिकों और दार्शनिकों में उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है क्योंकि वह भारतीय जगत में भौतिकी के जन्मदाता भी कहे जा सकते हैं। उन्होंने ही द्रव्य में परमाणु को मूल आधार मानते हुए परमाणु को अविभाज्य बताया था।
कहा जाता है कि तत्कालीन राजा को जब यह जानकारी मिली कि कणाद खेतों से कन बीनकर अपना गुजारा करते हैं, तो उन्होंने बहुत सा धन देकर अपने मंत्री को कणाद के पास भेजा। कणाद ने धन लेने से मना करते हुए मंत्री से कहा कि इस धन को उन लोगों में बांट दो जिन्हें इसकी बहुत जरूरत है। इस प्रकार राजा ने तीन बार अपने मंत्री को भेजा, लेकिन कणाद ने धन नहीं लिया।
आखिर में राजा खुद कणाद के पास पहुंचा, कणाद ने इस बार भी धन लेने से मना करते हुए कहा कि मैं इस धन को लेकर क्या करूंगा। मैं पहले से ही अमीर हूं। आपकी संपदा तो एक दिन नष्ट हो जाएगी, लेकिन मेरे पास जो संपदा है, वह कभी नष्ट नहीं होगी। कणाद की यह बात सुनकर राजा समझ गया कि कणाद के लिए भौतिक संपदा कोई मायने नहीं रखती है। वह उन्हें प्रणाम करके राजमहल लौट गया।







