Saturday, July 25, 2026

जो अपनी मेहनत का खाते हैं, मुझसे श्रेष्ठ हैं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पाकिस्तान और उत्तर भारत में हातिम ताई एक जाना पहचाना नाम है। हातिम ताई से जुड़ी किस्से-कहानियां बड़े शौक से सुनी-सुनाई जाती है। छठी शताब्दी में अरब में पैदा हुए हातिमताई अपनी दानशीलता के लिए काफी प्रसिद्ध थे। अरब देशों में हातिमताई आज भी नायक की तरह याद किए जाते हैं। अरब की ताई जनजाति पैदा हुए हातिम का पूरा नाम हातिम बिन अब्दुल्लाह बिन साद अल ताई था। कहा जाता है कि उनके पुत्र अदी बिन हातिम ताई थे, जो इस्लामिक पैगंबर मुहम्मद के साथी थे।

 वह एक शासक होने के साथ-साथ कवि भी थे। उनके पास जो भी व्यक्ति मदद मांगने आता था, वह खाली हाथ नहीं जाता था। यदि उनका कोई दुश्मन भी उनसे मदद मांगता था, तो वह उदार मन से उसकी मदद करते थे। एक दिन जब वह अपने मित्रों के साथ बैठे थे, तो उनके एक मित्र ने पूछा कि हातिम, क्या तुम किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हो, जो तुमसे भी श्रेष्ठ हो। 

हातिम ताई ने हंसते हुए कहा, हां! मैं ऐसे आदमी को जानता हूं जो मुझसे भी काफी अच्छा है। मित्र के पूछने पर उन्होंने बताया कि एक बार मैंने अपने महल में बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। उस भोज में बहुत सारे लोग आए। सबने पकवान का स्वाद लिया। शाम होने से पहले मैं घूमने निकला, तो देखा कि एक व्यक्ति लकड़ी काटकर घर ले जा रहा था। मैंने उससे कहा कि आज हातिम ताई ने भोज दिया था, तुम वहां जाकर खाना खा सकते थे। कम से कम आज मेहनत करने से बच जाते। 

उस आदमी ने कहा कि मैं अपनी मेहनत की कमाई खाता हूं। मैं दिन भर में जो कुछ अर्जित करता हूं, उससे अपना और अपने परिवार का पेट भरता हूं। मुझे किसी के यहां भोज पर जाने की जरूरत नहीं है। उस आदमी को देखकर मैंने जाना कि बहुत सारे लोग जो अपनी मेहनत का खाते हैं। वह मुझसे श्रेष्ठ हैं।

सेव अरावली के स्वयंसेवकों ने पाली गांव में कायम की नई मिसाल

अशोक मिश्र

फरीदाबाद के पाली गांव में सेव अरावली संस्था के स्वयंसेवकों ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने आज से पांच साल पहले पाली गांव के आसपास अरावली क्षेत्र में बंजर पड़ी जमीनों पर ढाई हजार पौधों को रोपकर एक नई शुरुआत की थी। आज वह बंजर इलाका हराभरा हो गया है। यह अरावली पर्वतमाला को हराभरा करने की एक नायाब मिसाल है। संस्था के स्वयंसेवकों की अटूट मेहनत और लगन की वजह से दस से बारह फुट ऊंचे ढाई हजार से अधिक देशी पेड़ों का एक विशाल मिनी फारेस्ट तैयार हो गया है। 

इसके लिए सेव अरावली के स्वयंसेवकों की जितनी तारीफ की जाए, वह कम ही है। हरियाणा में अरावली की बंजर होती पहाड़ियों पर अब हरियाली लौटाने का जो संकल्प दिख रहा है, वह केवल पौधरोपण का आंकड़ा नहीं बल्कि मरुस्थलीकरण के खिलाफ एक दीवार खड़ी करने जैसा है। हरियाणा की अरावली पहाड़ियां कभी राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक ढाल थीं, लेकिन खनन, अतिक्रमण और अनदेखी के कारण दक्षिण हरियाणा की बड़ी जमीन बंजर और झाड़-झंखाड़ में बदल गई। अब इसी बंजर जमीन पर हरियाणा सरकार अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर पौधरोपण कर रही है। 

इसका मकसद सिर्फ  पेड़ लगाना नहीं, बल्कि थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकना, धूल भरी आंधियों को थामना और भूजल को बचाना है। केंद्र की अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत हरियाणा ने अपने पाँच जिलों  गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ में फैली 33,706 हेक्टेयर रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया की जीआईएस मैपिंग कराई थी जिसमें से 24,990 हेक्टेयर यानी लगभग 61,750 एकड़ जमीन बंजर पाई गई थी। सेव अरावली जैसी संस्थाएँ भी देशी पौधे लगाकर इस सरकारी प्रयास में जन-भागीदारी जोड़ रही हैं। राज्य के पांचों जिलों में खेजड़ी, बबूल, धोक, बेर जैसी स्थानीय प्रजातियां लगाई जा रही हैं क्योंकि ये कम पानी में भी जीवित रहती हैं और मिट्टी को बांधती हैं। 

अरावली का पुनर्जीवन केवल एकड़ गिनने का विषय नहीं, बल्कि उस पारिस्थितिक दीवार को फिर खड़ा करने का प्रश्न है जो थार को दिल्ली तक आने से सदियों से रोकती आई है। अरावली एनसीआर के लिए प्राकृतिक दीवार का काम करती है। जब यहां हरियाली बढ़ती है तो पश्चिमी राजस्थान से आने वाली धूल और गर्म हवाएं सीधे दिल्ली-गुरुग्राम तक नहीं पहुंचतीं। वायु गुणवत्ता में मामूली सुधार, तापमान में कमी और पक्षियों-वन्यजीवों की वापसी इसके शुरुआती संकेत हैं। भूजल के लिहाज से यह और भी अहम है। सेव अरावली जैसी कुछ और संस्थाएं यदि हरियाणा में सक्रिय हो जाएं, तो अरावली क्षेत्र के साथ-साथ पूरे राज्य को हराभरा बनाना कोई कठिन नहीं होगा।

Friday, July 24, 2026

दान देने वाले की भावना देखो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आजकल सोशल मीडिया पर तमाम ऐसी पोस्ट देखने को मिल जाती हैं जिसमें कोई स्त्री या पुरुष किसी गरीब को कुछ वस्तु या खाने-पीने की वस्तु दे रहा होता है। लोग छोटी से छोटी चीज का दान देते समय वीडियो बनाते हैं या फोटो खींचते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं। ऐसी पोस्ट उनकी मानसिकता को दर्शाता है। दान देते समय मन की भावना पवित्र होनी चाहिए। 

एक समय की बात है। किसी गुरुकुल में आचार्य अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। उसी समय नगर का एक बड़ा व्यापारी अपने सेवकों के साथ आया। आचार्य ने उसका ठीक वैसे ही स्वागत किया, जैसा कि वह अन्य लोगों का किया करते थे। अमीर व्यापारी अपने साथ कई तरह फल, मिष्टान्न और अनाज की कई बोरियां थीं। आचार्य ने अपने शिष्यों से कहकर व्यापारी द्वारा लाए गए उपहार को भंडार गृह में रखवा लिया। कुछ देर रहकर व्यापारी अपने सेवकों के साथ चला गया। संयोग से व्यापारी के जाने के कुछ देर बाद एक बुजुर्ग महिला एक कटोरे में थोड़ा सा भात लेकर आई। वह अत्यंत गरीब थी।

उसे देखते ही आचार्य अपने आसन से उठे और उस बुजुर्ग महिला के पास जाकर उसको प्रणाम किया। बुजुर्ग महिला द्वारा लाए गए भात को वह बड़े प्रेम से खाने लगे। भात खाने के बाद बुजुर्ग महिला का कटोरा धोकर आचार्य ने आदर सहित लौटा दिया। वह महिला चली गई। तब एक शिष्य ने कहा कि गुरु जी! व्यापारी के उपहार की ओर तो आपने देखा नहीं, लेकिन बुजुर्ग महिला का थोड़ा सा भात लेने आप खुद उठकर उसके पास गए, ऐसा क्यों? आचार्य ने कहा कि व्यापारी के दान में अहंकार का भाव था। 

उसने जो कुछ भी दिया है, वह उसके धन का मामूली हिस्सा है। लेकिन महिला का थोड़ा सा भात उसके पूरे दिन की कमाई थी। किसी का दान नहीं, उसकी भावना देखनी चाहिए। बुजुर्ग महिला की भावना पवित्र थी, व्यापारी की भावना में अहंकार था।

हरियाणा में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नी होगी एक लंबी लड़ाई

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कमर कस ली है। एंटी करप्शन ब्यूरो ने प्रदेश के 140 भ्रष्ट अधिकारियों की बाकायदा सूची भी बना ली है। भ्रष्टाचार किसी भी राज्य में हो, उस प्रदेश की शासन और अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर देता है। भ्रष्टाचार हमेशा गरीब जनता के लिए हानिकारक साबित होता है। रिश्वत देकर अमीर और अपराधी प्रवृत्ति के लोग अपना काम करा लेते हैं। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है, जो कमजोर और गरीब होते हैं। यह स्थिति किसी भी कल्याणकारी राज्य के लिए अच्छी नहीं होती है। सैनी सरकार ने भी सरकारी भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश एंटी करप्शन ब्यूरो को दे दिया है। 

ब्यूरो प्रमुख अरशिंदर सिंह चावला की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में राज्य भर के ऐसे 140 अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची तैयार की गई है जिनके खिलाफ बिना रिश्वत लिए काम न करने की बार-बार शिकायतें मिल रही हैं। इन सभी अधिकारियों पर विशेष खुफिया निगरानी रखी जा रही है। पिछले दिनों राज्य में अब तक का एक बहुत बड़ा 661 करोड़ रुपये का वित्तीय घोटाला सामने आया था जिसमें सरकारी विभागों के फंड को निजी बैंकों में अवैध रूप से डायवर्ट किया गया था। 

इस करोड़ों के घोटाले में कथित संलिप्तता और अनियमितताओं के कारण वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पंकज अग्रवाल, राम कुमार सिंह (आरके सिंह) और प्रदीप कुमार (प्रदीप डागर) को निलंबित किया जा चुका है। पंचकूला नगर निगम के पूर्व कमिश्नर आरके सिंह और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व सदस्य सचिव प्रदीप कुमार को गिरफ्तार किया है। इन पर सरकारी पैसों की फर्जी एफडी बनाकर शेल कंपनियों में ट्रांसफर करने का आरोप है। प्रदेश के 140 अधिकारियों की सूची सामने आने से यह उम्मीद जगी है कि अब शिकंजा ऊपर तक जाएगा। इनमें राजस्व, पीडब्ल्यूडी, नगर निगम, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी शामिल हैं। 

वैसे तो एसीबी हर महीने स्टिंग करती है, रिश्वत लेते पटवारी, क्लर्क और इंजीनियर पकड़े जाते हैं। दिक्कत यह है कि पकड़े जाने वाले हमेशा निचले और मध्य स्तर के कर्मचारी होते हैं। हरियाणा युवा और औद्योगिक प्रदेश है। यहां निवेश तभी आएगा जब फाइलें समय पर चलेंगी। जब एक उद्यमी को ठडउ के लिए महीने भर चक्कर काटने पड़ें और अंत में चाय-पानी की मांग हो, तो वह उद्योग दूसरे राज्य में चला जाता है। 

हरियाणा ने खेल, कृषि और स्टार्टअप में नाम कमाया है। पर एक भ्रष्ट अधिकारी पूरे विभाग की छवि खराब कर देता है। हरियाणा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़नी होगी। शुरुआत नीचे से नहीं ऊपर से करनी होगी, तभी व्यवस्था सुधरेगी।

Thursday, July 23, 2026

पिता जी! लकड़ी का कटोरा बना रहा हूं

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहते हैं कि इनसान जो बोता है, उसे जीवन में काटना जरूर पड़ता है। जो अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करता है, तो संभव है कि उसकी संतान भी अपने माता-पिता की देखभाल न करे। ऐसा हर मामले में तो संभव नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में यह बात सच हो सकती है। कहते हैं कि किसी जगह पर एक फकीर रहता था। जीवन भर गांव-गांव शहर-शहर भटकता रहा। 

एक दिन ऐसा भी आया, जब वह बूढ़ा हो गया। अब उसमें चलने-फिरने की ताकत नहीं रही। उसने सोचा कि अब भटकने से बेहतर है कि वह अपने परिवार के पास लौट जाए। उस समय उसके परिवार में बेटा-बहू और छह-सात साल का पौत्र था। घर लौटने पर उसके बेटे-बहू ने बेमन से घर में रख लिया। खाना खाते समय उस फकीर के हाथ कांपते थे। जब वह चम्मच से खाना निकालता, तो कुछ न कुछ मेज या फर्श पर गिर जाता। पानी या दूध पीने के लिए गिलास  उठाता, तो वह भी मेज पर गिर जाता। मेज और फर्श पर खाना वगैरह गिरने से बहू को सफाई करनी पड़ती थी। कई बरतन भी हाथ से छूटकर टूट चुके थे। 

फकीर की बहू ने अपने पति से कहकर बूढ़े फकीर को एक छोटी मेज पर खाने के लिए बैठा दिया। उसके बर्तन भी लकड़ी के थे। खाने का चम्मच भी लकड़ी का बनवा लिया। इससे बूढ़ा फकीर बहुत दुखी हुआ, लेकिन कर भी क्या सकता था। काफी दिन बीत गए। एक दिन बेटे ने अपने पुत्र को लकड़ी का कटोरा बनाते देखा, तो पूछा, बेटे! तुम क्या कर रहे हो। 

उसके बेटे ने जवाब दिया कि पिता जी, कटोरा बना रहा हूं। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, तो आपको भी इसमें खाने को दिया करूंगा। फकीर का बेटा यह सुनकर अवाक रह गया। अपने बेटे की बात सुनकर पति-पत्नी बहुत परेशान हो गए। उस दिन से बूढ़े फकीर को अलग मेज पर बैठकर खाने की जरूरत नहीं पड़ी। जब तक बूढ़ा फकीर जिंदा रहा, बहू-बेटे ने बहुत ख्याल रखा।

विकल्प नहीं, हरियाणा की जरूरत बन चुकी है प्राकृतिक खेती

अशोक मिश्र

प्राचीनकाल में जब हल से जुताई करके खेती करने की पद्धति का विकास नहीं हुआ था, तब लोग प्राकृतिक खेती करते थे। वह खेतों और अन्य खाली जगहों पर बीज का छिड़काव कर दिया करते थे। अनुकूल मौसम में यह बीज अंकुरित होकर बढ़ते रहते थे और समय आने पर लोग उस फसल को काट लेते थे। बाकी अवशेष को वह यो ही छोड़ देते थे, जो अगली फसल के लिए खाद का काम करते थे। 

आज भी प्राकृतिक खेती इसी तरह से की जाती है। प्राकृतिक खेती में यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों जैसे कृत्रिम रसायनों का बिल्कुल उपयोग नहीं होता है। इन रासायनिक खादों की जगह मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए खेत में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और देसी गाय के गोबर-मूत्र का उपयोग किया जाता है। हरियाणा की सैनी सरकार ने 2026-27 तक एक लाख एकड़ भूमि को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए अब तक लगभग दो लाख किसानों ने तीन लाख एकड़ भूमि के लिए पोर्टल पर पंजीकरण कराया है। 

एक जानकारी के अनुसार राज्य में लगभग 24 हजार किसान 44 हजार एकड़ भूमि में अभी प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हर पंचायत ने अपनी कुल भूमि का 10 प्रतिशत या कम से कम एक एकड़ हिस्सा प्राकृतिक खेती के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया है। प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके माध्यम से पैदा हुई फसल हानिकारक रसायनों से पूरी तरह मुक्त होती है जिससे गंभीर किस्म की बीमारियों के होने का खतरा नहीं रहता है। 

प्राकृतिक खेती पूरी तरह से पारिस्थितिकी पर आधारित है। देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल के आटे और मिट्टी के मिश्रण से 'जीवामृत' (तरल उर्वरक) और 'बीजामृत' (बीज उपचार) तैयार किए जाते हैं, जो मिट्टी में सूक्ष्मजीवों को बढ़ाते हैं। प्राकृतिक खेती अन्य पद्धतियों की अपेक्षा सस्ती और सुरक्षित है। यही वजह है कि  राज्य सरकार रसायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते खर्च, घटते भूजल और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट के के कारण पिछले कुछ सालों से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। 

प्राकृतिक खेती में रासायनिक खाद, कीटनाशक और सिंचाई पर खर्च 40 से 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है। प्राकृतिक खेती से कार्बन उत्सर्जन घटता है, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च कम होता है। राज्य सरकार का मानना है कि अगर एक लाख एकड़ का लक्ष्य पूरा हुआ तो खाद और बिजली सब्सिडी में करोड़ों की बचत होगी और निर्यात के लिए जैविक उत्पादों का बाजार भी खुलेगा। राज्य की अर्थव्यवस्था को कम लागत, बेहतर स्वास्थ्य और टिकाऊ पानी की दिशा में ले जाएगी। प्राकृतिक खेती आज विकल्प नहीं, जरूरत बन चुकी है।

Wednesday, July 22, 2026

मैं भविष्य की चिंता नहीं करता, इसलिए खुश हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने कहा है कि जो पल आप जी रहे हैं, वही पल आपका है। जो बीत गया, वह बीत गया। वह दोबारा वापस आने से रहा। जो भविष्य के गर्भ में है, उस पर आपका कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में जो वर्तमान है, उसी को अच्छी तरह से जीना चाहिए। वर्तमान को संवारकर ही अच्छे भविष्य की रूपरेखा तय की जा सकती है। दर्शन में इसे बुद्ध का क्षणवाद कहा जाता है। 

इस संदर्भ में एक रोचक कथा है। किसी राज्य का राजा अत्यंत धनवान था। वह अपने राज्य की प्रजा के लिए भी जरूरत पड़ने पर कल्याणकारी काम करता था। इसके बावजूद वह खुश नहीं था। वह अपनी नाखुशी का कारण भी समझ नहीं पाता था। धीरे-धीरे उसके मन में निराशा बढ़ती जा रही थी। एक दिन उसने अपने राज्य के एक बुद्धिमान व्यक्ति के सामने अपनी समस्या रखी। 

उस बुद्धिमान व्यक्ति ने राजा से कहा कि कल सुबह महल के बाहर जो व्यक्ति खुश दिखाई दे, उसके साथ एक दिन गुजारिये। आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा। अगले दिन राजमहल के बाहर राजा खड़ा हुआ। तभी उसने देखा कि एक लकड़हारा अपने सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादे हुए जा रहा है। सिर पर बोझ होने के बावजूद वह गुनगुना रहा था। 

राजा ने उस लकड़हारे से पूछा कि तुम इतने गरीब हो, रात का खाना मिलेगा या नहीं, इसकी भी गारंटी नहीं है। इसके बावजूद तुम खुश दिख रहे हो। क्या कारण है? उस लकड़हारे ने कहा कि मैं स्वस्थ हूं। अपनी मेहनत की कमाई खाता हूं। मैं यह कतई नहीं सोचता हूं कि कल क्या होगा। मैं आज में ही मस्त रहता हूं। इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं होती है। यह सुनकर राजा समझ गया किउसकी बीमारी का कारण क्या है। उसी दिन से वह भविष्य की चिंता छोड़कर प्रजा के पालन पर अधिक ध्यान देने लगा।

जागरूक नागरिक ही सड़कों और नालियों को रख सकते हैं स्वच्छ

अशोक मिश्र

बरसात के दिन हैं। हरियाणा के प्रत्येक जिले में सड़कों पर कीचड़, जलभराव और नालियों का जाम होना, आम बात है। सीएम नायब सिंह सैनी बरसात आने से पूर्व ही कई बार स्थानीय निकायों को चेतावनी दे चुके थे कि मानसून आने से पहले ही नाले, नालियों और सड़कों की सफाई हो जानी चाहिए। इसके बावजूद हर जिले से बरसात के बाद जलभराव जैसी समस्या से लोगों को जूझना पड़ रहा है। इसके लिए काफी हद तक स्थानीय निकायों के अधिकारी और कर्मचारी जिम्मेदार हैं, तो वहीं नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। 

जब तक नागरिकों में ‘मेरा कचरा, मेरी जिम्मेदारी’ वाली सोच पैदा नहीं होगी, तब तक प्रत्येक जिले में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी कचरे के ढेर और गंदी नालियों से निजात नहीं मिलेगी। सच कहा जाए, तो स्वच्छ हरियाणा का सपना तब सच होगा, जब सरकार के साथ हर नागरिक अपने दरवाजे से सफाई शुरू करेगा। वैसे तो प्रदेश में स्वच्छता के नाम पर हर साल हर जिले में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। राज्य में बड़ी जोर-शोर से स्वच्छ भारत मिशन भी चलाया जाता है।

 नेता, अधिकारी और कुछ सामाजिक संस्थाएं किसी दिन सड़कों पर झाड़ू लगाकर स्वच्छता का संदेश भी देती हैं। अखबारों और टीवी चैनलों पर झाडू बुहारते हुए फोटो और खबर भी प्रकाशित हो जाती है। उसके चंद घंटों बाद वह सड़क फिर से अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है। स्वच्छता के नाम पर नगर निकायों का बजट, सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह, कचरा उठाने के ठेके, डोर-टू-डोर कलेक्शन, सेग्रीगेशन प्लांट और जागरूकता अभियान जैसे सारे उपाय किए जाते हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर कागज पर दिखते हैं, वास्तविकता में नहीं। गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और करनाल को स्मार्ट सिटी कहा जाता है। इसके बावजूद सुबह सड़क पर निकलते ही कूड़े के ढेर, नालों में प्लास्टिक और खाली प्लॉट में कचरे का पहाड़ आमतौर पर दिख ही जाता है। 

अकेले गुरुग्राम में कचरा प्रबंधन और सफाई के लिए 315 से 350 करोड़ रुपये तक वार्षिक खर्च होता है। फरीदाबाद में भी सौ से 125 करोड़ प्रति वर्ष खर्च होने का अनुमान है। राज्य सरकार 'स्वच्छ भारत मिशन' (शहरी और ग्रामीण) के तहत सालाना करोड़ों रुपये आवंटित करती है। इतने भारी बजट के बाद भी सड़कों पर कूड़ा बिखरा हुआ दिखाई दे, तो सचमुच यही समझना चाहिए कि स्थानीय प्रशासन अपने काम में लापरवाही बरत रहा है। सारा दोष सफाई कर्मचारियों का ही नहीं है। 

सच कहा जाए, तो राज्य के नागरिकों की लापरवाह आदत की वजह से भी सड़कों, गलियों और मैदानों में सफाई नहीं रह पाती है। ठेले वाले, दुकानदार और बिल्डिंग मैटेरियल वाले भी कचरा उठाने की फीस बचाने के लिए रात में सड़क किनारे डाल जाते हैं। 

Tuesday, July 21, 2026

नरसंहार देखकर व्यथित हो उठा अशोक

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक को पहले चंड अशोक के नाम से जाना जाता था। अशोक बचपन से ही अत्यंत महत्वाकांक्षी था। वह चक्रवर्ती सम्राट बिंदुसार और रानी धर्मा का पुत्र था। रानी धर्मा क्षत्रिय कुल की नहीं थी, इसलिए उसका बहुत अधिक सम्मान भी नहीं था। 

वैसे तो इतिहास में अशोक के सौ भाई बताए गए हैं, लेकिन तीन भाइयों सुसीम, अशोक और तिष्य के ही नाम मिलते हैं। तिष्य अशोक का छोटा सगा भाई था। कहते हैं कि जब अशोक निर्वासन झेल रहा था, उसी दौरान उसके सौतेले भाइयों ने अशोक की मां की हत्या कर दी। यह समाचार सुनकर अशोक राजमहल लौटा और उसने अपने सभी भाइयों की हत्या कर दी और खुद को सम्राट घोषित कर दिया। 

आठ साल के शासन में उसने अपने राज्य का विस्तार ईरान तक लिया था। उसने अपने शासन को आठ प्रांतों में बांट दिया था। सम्राट बनने के आठवें साल में सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। कहते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद एक लाख पचास हजार लोग बंदी बनाकर कलिंग से निर्वासित कर दिए गए थे। युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे। डेढ़ लाख सैनिक घायल हुए थे। 

कलिंग में जिधर नजर जाती थी, उस ओर या तो शव दिखाई देते थे या फिर कराहते हुए घायल सैनिक। यह दृश्य अशोक ने देखा तो उसका मन द्रवित हो उठा। उसने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त से इसका उपाय पूछा, तो उन्होंने महात्मा बुद्ध का मार्ग अपनाने की सलाह दी। वह बौद्ध के नजदीक आता गया और अंतत: उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके बाद वह मानवता की सेवा में लग गया। इस तरह चंड अशोक से देवप्रिय अशोक में बदल गया। सम्राट अशोक द्वारा खुदवाए गए 33 शिलालेख अब तक प्राप्त हो चुके हैं।

अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक नालों को बहने देने में ही हमारी भलाई


अशोक मिश्र

अरावली की पहाड़ियों ने सदियों से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली को प्राणवायु प्रदान की है। इनकी प्राकृतिक नालियों ने इन चारों राज्यों के भूगर्भ जल स्तर को बनाए रखने में सैकड़ों साल तक अहम भूमिका निभाई है। मानसूनी मौसम में इन नालियों के जरिये बरसाती पानी धरती के नीचे जाकर भूगर्भ जल स्तर को स्थिर रखता रहा है, लेकिन अब यह प्रक्रिया बाधित होने लगी है। लोगों ने इन नालियों पर अतिक्रमण करके स्वाभाविक प्रवाह को बाधित किया है जिसकी वजह से भूगर्भ जल स्तर घटता जा रहा है। 

गुड़गांव से फरीदाबाद तक फैली अरावली की तलहटी में सैकड़ों प्राकृतिक नाले थे जो मानसून का पानी बिना किसी बाधा के यमुना और अन्य निचले क्षेत्रों तक पहुंचा देते थे। पिछले दो दशकों में इन नालों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। कॉलोनियां, इंडस्ट्रियल प्लॉट, सड़कें और रिसॉर्ट बन गए और नालों को पाटकर या मोड़कर कंक्रीट के नीचे दबा दिया गया। नतीजा सामने है। अब जब थोड़ी तेज बारिश होती है तो गुरुग्राम का साइबर सिटी, द्वारका एक्सप्रेसवे और फरीदाबाद के निचले इलाके पानी में डूब जाते हैं। 

पहले बरसात के दिनों में प्राकृतिक नालियों के माध्यम से जमीन पर उतरता था जिसे धरती सोख लेती थी। लेकिन अब अरावली के इर्द-गिर्द कंक्रीट का जंगल उग आने की वजह से अरावली की नालियों से निकला पानी सीधे नालों में चला जाता है और सारा पानी व्यर्थ चला जाता है। यही कारण है कि हरियाणा का भूजल स्तर संकट में आता चला जा रहा है। कई इलाके डार्क जोन में आ चुके हैं। बरसात के दिनों में कई जिलों में लोग पानी के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। यह स्थिति किसी विडंबना से कम नहीं है। 

अरावली वन्यजीवों का कॉरिडोर है। नालों के बंद होने से जानवरों के पानी पीने के स्रोत खत्म हुए हैं और उनका प्राकृतिक रास्ता टूटा है। पानी और भोजन की तलाश में अब वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इस स्थिइत से बचने के लिए जरूरी है कि अरावली क्षेत्र की प्राकृतिक नालियों की पहचान की जाए, उनको संरक्षित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहले ही कह चुके हैं कि अरावली के सभी प्राकृतिक नालों की पहचान कर उन्हें प्रोटेक्टेड घोषित किया जाए। 

सैटेलाइट मैपिंग और ड्रोन सर्वे से 2010 से पहले के नक्शों के आधार पर नालों की पुरानी जमीन चिह्नित की जा सकती है। अगर अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक जल प्रवाह मार्ग को बचाया नहीं गया तो हर मानसून में राज्य के शहर डूबेंगे, भूजल और घटेगा और गर्मी और बढ़ेगी। सरकार, कोर्ट, नागरिक और उद्योग अगर मिलकर नालों को उनका रास्ता वापस दें तो अरावली फिर से हरियाणा की ढाल बन सकती है। नहीं तो हम हर साल बाढ़ और सूखे दोनों का दंश झेलते रहेंगे।