Saturday, August 29, 2026

अजातशत्रु! तुम्हारा पाप कभी नहीं मिटेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के सम्राट बिंबिसार की उनके पुत्र अजातशत्रु ने हत्या कर दी थी। पिता को मौत के घाट उतारने के बाद अजातशत्रु ने शासन संभाला। काफी दिनों बाद उसे अपने पिता की हत्या करने पर पश्चाताप हुआ। उसने उस पाप को मिटाने के लिए पशुबलि का आयोजन किया। संयोग से उन्हीं दिनों महात्मा बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि विपरीत दिशा में भेड़ों का एक झुंड चला आ रहा है। 

उसके पीछे आ रहे गड़रिये ने एक भेड़ के बच्चे को कंधे पर लाद रखा है। बुद्ध समझ गए कि मेमने को कोई कष्ट है जिसकी वजह से गड़रिये ने उसे कंधे पर उठा रखा है। उन्होंने गड़रिये से मेमने के बारे में पूछा, तो गड़रिये ने बड़ी श्रद्धा से जवाब दिया-भंते! इस मेमने के पैर में चोट लगी है। इसलिए मैंने इसे कंधे पर उठा रखा है। बुद्ध ने उस मेमने की चोट की जगह पर हाथ रखा, तो मेमने को राहत मिली। 

उसने अपनी आंखें मूंद ली। साधु वेश में खड़ी बुद्ध को देखकर गड़रिये ने कहा कि भंते! आप इस मेमने के इस चोट को देखकर इतने पीड़ित हैं। अभी कुछ देर बाद इन सबको अग्नि को समर्पित कर दिया जाएगा, तब आपको कितनी व्यथा होगी। यह सुनकर बुद्ध विचलित हो उठे। उन्होंने पूछा, तो गड़रिये ने बताया कि महाराज अजातशत्रु पिता की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए एक हजार पशुओं की बलि चढ़ाने जा रहे हैं। 

बुद्ध जब यज्ञ स्थल पर पहुंचे तो देखा कि अजातशत्रु यजमान की तरह यज्ञवेदी के पास बैठा हुआ है और ब्राह्मण यज्ञ करा रहे हैं। बुद्ध को देखते ही अजातशत्रु बुद्ध के पास पहुंचा और यज्ञ के बारे में बताया। बुद्ध ने कहा कि एक पत्ता ले आओ। पत्ता आने पर उन्होंने अजातशत्रु से कहा, इसको चीर दो। पत्ता चीरे जाने के बाद उन्होंने कहा, इसे जोड़ दो। अजातशत्रु ने कहा कि इसे जोड़ा कैसे जा सकता है। तब बुद्ध ने कहा कि जो पाप तुमने किया है, उसे मिटाया नहीं जा सकता है। तब इस यज्ञ का क्या मतलब है। अजातशत्रु की समझ में बात आ गई और उसने यज्ञ टाल दिया।

मिलावटी मिठाइयों ने रक्षाबंधन त्यौहार का मजा किया किरकिरा


अशोक मिश्र

हमारा देश पर्व प्रधान है। शायद ही कोई महीना ऐसा बीतता हो जिसमें कोई न कोई तीज-त्यौहार न आता हो। भारत में तीज-त्यौहार कृषि से जुड़े रहे हैं। भाई-बहन के पावन प्रेम संबंधों का प्रतीक रक्षाबंधन भी मूलत: कृषि से ही जुड़ा है। दरअसल, सावन बीतते-बीतते कृषि कार्य पर विराम लग जाता है। किसान खेत-खलिहान से खाली हो जाता है। अभी फसल तैयार नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में यही मौका होता है, अपने सगे संबंधियों से मिलने का। बहनें अपने भाई और अन्य परिजनों से मिलने को व्याकुल होती हैं। तो वह अपने मायके चल देती है रक्षाबंधन मनाने के लिए। 

घर में आई बहन-बेटी का स्वागत विभिन्न तरह के पकवानों से किया जाता है। हरियाणा में कोई तीन-चार दशक पहले तक रक्षाबंधन पर्व पर बाजार से मिठाई लाने का तो चलन ही नहीं था। घर की बुजुर्ग महिला यानी दादी, मां, चाची आदि सुबह चार बजे उठकर चूल्हा लीपती थीं। फिर उसी चूल्हे पर सुबह ही कड़ाही चढ़ जाती थी। घी तो घर का ही होता था, गाय-भैंस के दूध से निकला। उस घी में सबसे पहले गुलगुले तलते, गुड़ और गेहूं के आटे के मीठे गोले, जो बाहर से कुरकुरे और अंदर से नरम होते थे। 

साथ में शक्करपारे, जिन्हें बच्चे राखी बंधवाने से पहले ही चट कर जाते थे। चूरमा तो रक्षाबंधन की आत्मा था। बाजरे की रोटी को हाथ से मसलकर उसमें बूरा और घी मिलाकर बनाया जाता था। यह चूरमा इतना पौष्टिक होता था कि एक कटोरी में पूरे सावन की ताकत आ जाती थी। मीठे चावल, पीले मीठे चावल में केसर नहीं, हल्दी की एक चुटकी और घी की महक होती थी। खीर तो मिट्टी की हांडी में बनती थी। धीमी आंच पर घंटों तक पकती, और पुआ, मालपुए, खांड के बताशे तो रक्षाबंधन की शोभा ही बढ़ा देते थे। 

भाई के आने पर थाली में ये ही परोसे जाते थे, साथ में दही और घर का बना सफेद मक्खन, इसके स्वाद का तो कहना ही क्या था। ये पकवान सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं होते थे, ये मां के हाथों की दुआ थे। हर निवाले में पता चलता था कि इसमें मिलावट नहीं, ममता मिली है। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। त्योहार के दो दिन पहले अखबारों में खबरें आने लगती हैं कि फलां जगह से नकली मावा पकड़ा गया। फलां दुकान पर मिलावटी बर्फी मिली। लोग पढ़कर भी उसी दुकान पर लौट जाते हैं क्योंकि किसी के पास घर पर पकवान बनाने के लिए समय नहीं है। घर पर पकवान और मिठाई बनाना अब पिछड़ापन लगने लगा है। 

आज लगभग हर घर में डिब्बा आता है दुकान से बंधा-बंधाया। ऊपर सुनहरी पन्नी लगी मिठाई, देखने में सुंदर, पर भीतर क्या है, कोई नहीं जानता। खोया के नाम पर पाउडर, घी के नाम पर डालडा और रंग के नाम पर केमिकल। हमने खुद अपने हाथों से त्योहारों को जहर में बदल दिया है। चूरमा, खीर और गुलगुला आदि को हमने एक चमकदार डिब्बे के लिए बेच दिया।


Friday, August 28, 2026

महारानी क्षेमा ने त्यागा भोग विलास


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

साम्राज्ञी महारानी क्षेमा हर्यक वंश के प्रतापी राजा बिंबिसार की पत्नी थीं। वह मद्र देश (वर्तमान पंजाब) के बौद्ध शासक सांगल की पुत्री थीं। उन्हें अपने रूप-यौवन पर बहुत अभिमान था। इस वजह से वह बुद्ध को नापसंद करती थीं क्योंकि बुद्ध बाहरी सौंदर्य को मिथ्या मानते थे। एक दिन जब उन्होंने बुद्ध को देखा, तो बुद्ध ने उन्हें जीवन की तीनों अवस्थाओं से परिचय कराया। वह बुद्ध से प्रभावित हुईं। 

एक दिन महारानी क्षेमा अपने सैन्य टुकड़ी के साथ महात्मा बुद्ध के चैत्य विहार में पधारीं। आश्रम के बाहर ही सैनिक टुकड़ी को रोक दिया गया। वह रथ से उतरीं और रथ सहित सैनिकों को वापस जाने का आदेश दिया। वह बुद्ध के निजी कक्ष में पहुंची और उन्हें प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! अब तक मैं अंधकार में भटकती रही। यदि पता होता कि प्राकृतिक नियमों में राजा प्रजा एक समान हैं। 

मृत्यु और आधिभौतिक कष्टों और परेशानियों के जाल-जंजाल से कोई मुक्त नहीं होता, तो मैंने आत्मकल्याण के कई चरण पूरे कर लिए होते। महात्मा बुद्ध ने धीर गंभीर स्वर में कहा कि जिनके प्रति तुम्हारा उत्तरदायित्व हैं, उनकी अनुमति भिक्षुणी बनने के लिए अनिवार्य है। यह सुनकर महारानी क्षेमा वापस लौटीं और बिंबिसार से अनुमति लेकर चैत्य विहार दोबारा पहुंची। 

यह बात सुनते ही राज्य की प्रजा भी प्रव्रज्या लेने के लिए उमड़ पड़ी। बुद्ध ने कहा कि क्षेमे! जिस तरह तुम प्रव्रज्या लेने को चैतन्य हो, क्या आश्रम के बाहर उमड़ी भीड़ भी वैसे ही चैतन्य है? क्षेमा ने कहा कि नहीं प्रभु। बुद्ध ने कहा कि फिर यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि इन्हें चैतन्य बनाओ। क्षेमा ने कई साल तक जन जन के बीच जाकर लोगों को आत्मकल्याण की दीक्षा दी और बुद्ध से दीक्षा लेकर महान भिक्षुणी बनी।

सदियों से हरियाणवी लोकगीतों ने रक्षाबंधन पर्व को रखा जिंदा


अशोक मिश्र

आज रक्षाबंधन है। भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है। हर प्रदेश में रक्षाबंधन मनाने की अपनी अपनी परंपराएं हैं, लोकगीत हैं और विधियां हैं। हरियाणा में रक्षाबंधन की छटा ही निराली और अद्भुत है। हरियाणा में रक्षाबंधन मनाने की परंपरा महाभारत काल से ही चली आ रही है, ऐसा माना जाता है। द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की कलाई पर आंचल का टुकड़ा बांधा था और हरियाणा के खेतों में बैठी दादी यही कथा अपनी पोतियों को सुनाते हुए राखी का अर्थ समझा देती थीं कि यह धागा नहीं, वचन है। 

हरियाणा के पौराणिक किस्सों में तो यह भी कहा जाता है कि जब फसल कट जाती थी और सावन भादों में भाई खेत से थोड़ा खाली होता था, तब बहन अपने पीहर आकर उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती थी ताकि अगली फसल तक उसका भाई सलामत रहे, खेत सलामत रहे। प्राचीन काल में रक्षाबंधन का तरीका बिल्कुल अलग था। तब राखी कोई बाजार की चीज नहीं थी। बहनें खुद सूत कातकर, उसमें हल्दी, सरसों और चावल के दाने पिरोकर राखी बनाती थीं। ऐसी राखियों में बहन का अपने भाई के प्रति प्यार झलकता था। 

पुराने समय में राखी बांधने के बाद शाम को पूरा गांव किसी एक जगह इकट्ठा होकर लोकनृत्य करता था, रात को महिलाएं एकत्रित होकर अपनी खुशी व्यक्त करती थीं। भाई अपनी बहन को अपने खेत की पहली फसल में से हिस्सा देता था, क्योंकि बहन का हक माना जाता था। अब बहुत कुछ बदल गया है। अब राखी कूरियर से आती है। वीडियो कॉल पर बंध जाती है। भाई-बहन एक-दूसरे से हजारों किमी दूर हैं। राखी का रूप भी बदल गया-चांदी की, ब्रेसलेट वाली, कार्टून वाली। पर भाव वही है। 

पहले बहनें सावन भर इंतजार करती थीं कि कब राखी आएगी, अब व्हाट्सएप पर सुबह-सुबह राखी की फोटो आ जाती है। इस पर्व को सबसे ज्यादा जिंदा रखते हैं यहां के लोकगीत। हरियाणा की राखी बिना गीतों के पूरी ही नहीं होती। जब बहनें पीहर से ससुराल लौटने लगती हैं तो आंगन में एक ही गीत गूंजता है- हे री राखी बांधण आई सूं, तेरे रोज नहीं आंदी। इस एक लाइन में शिकायत भी है, अपनापन भी और बचपन की लड़ाई भी। दूसरा गीत जो हर भाभी-ननद की जुबान पर रहता है-इबकै रक्षाबंधन पै छुट्टी आज्या, मैं राखी बांधण आऊंगी मेरे वीर। 

ये गीत सांग और रागनी की धरती से निकले हैं। सूरज कवि दादा लख्मीचंद के जमाने से ही सांग मंडलियां राखी के किस्सों को मंच पर गाती रही हैं, जहां भाई-बहन के प्रेम को रागनी के सुर में पिरो दिया जाता था। आज भी जब बहन भाई की कलाई पर धागा बाँधती है तो आँखों में वही पुरानी चमक आ जाती है। धागा चाहे रेशमी हो या सूती, भाव वही रहता है, रक्षा का वादा, प्रेम का बंधन और वो अटूट विश्वास कि चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए, भाई-बहन का रिश्ता कभी नहीं टूटेगा। 

Thursday, August 27, 2026

साधक को छोटे काम भी करने चाहिए


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जब श्रावस्ती के बाहर जेतवन में संघ की स्थापना हुई थी, तब से उसकी देखभाल अनाथ पिंडक के पास थी। वह महात्मा बुद्ध के साथ-साथ सभी भिक्षुओं का ध्यान रखते थे। उन्हीं दिनों सुप्पारक तीर्थ क्षेत्र से प्रव्रज्या पर दारूचीरिय लौटे थे। वह पहले भी जेतवन में संन्यासी का जीवन बिता चुके थे। लेकिन जब उन्हें दक्षिण में जाने का अवसर प्राप्त हुआ और उन्हें लोगों से मान सम्मान मिला, तो उनका श्रम करने का अभ्यास छूट गया था। वह सुस्वादु भोजन ग्रहण करने के भी अभ्यस्त हो चुके थे। 

जिस दिन दारूचीरिय जेतवन पधारे, अनाथपिंडक ने उन्हें अतिथि माना। दूसरे दिन अनाथ पिंडक ने दारूचीरिय को कुल्हाड़ी पकड़ाते हुए जंगल से लकड़ी काट लाने को कहा। श्रम का अभ्यास छूट जाने और मन में अहंभाव पैदा हो जाने की वजह से दारूचीरिय ने इसे छोटा काम समझा और लकड़ी काटने नहीं गए। तीसरे दिन अनाथ पिंडक ने उनसे कहा कि आपको तथागत के पास रहना चाहिए। 

हम लोग तो श्रमण मात्र हैं। यह सुनकर दारूचीरिय श्रावस्ती की ओर चल पड़े। वह चलते समय सोचने लगे कि सबसे बड़े अर्हत को भिक्षा मांगने की क्या आवश्यकता है, जब इतने सारे भिक्षु यहां मौजूद हैं। दारूचीरिय श्रावस्ती पहुंचे तो देखा कि बुद्ध रास्ते में पड़े उपलों को उठाकर अपनी झोली में रखते जा रहे हैं ताकि आश्रम में भोजन बनाने में सहायता हो सके। 

पास पहुंचकर दारूचीरिय अभिवादन कर पाते उससे पहले ही बुद्ध ने कहा कि अर्हत को छोटे मोटे काम को भी गरिमा प्रदान करनी चाहिए। दारूचीरिय समझ गए। शाम को सत्संग के समय भी इस घटना को दोहराते हुए कहा कि  आम का पेड़ जितने ज्यादा फल होते हैं, वह उतना ही झुक जाता है। विभूतियां पाकर साधक को और झुकना चाहिए। यह सुनकर दारूचीरिय का सिर शर्म से झुक गया। उन्होंने उसी दिन से हर तरह का श्रम करना प्रारंभ कर दिया।

मरीज की जान से खिलवाड़ करते हैं नकली दवाओं के कारोबारी

अशोक मिश्र

दिल्ली एनसीआर और हरियाणा में नकली और अवैध दवाओं का कारोबार अपनी जड़ें जमाता जा रहा है। इसका ताजा और चिंताजनक उदाहरण दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा फरीदाबाद निवासी डॉ. मनीष शर्मा की गिरफ्तारी है। कुछ दिनों पहले दिल्ली पुलिस ने एक बड़े अंतरराज्यीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया था और इस मामले में 17 लोगों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार किए गए लोगों के पास से करीब नौ करोड़ रुपये मूल्य की कैंसर रोधी दवाएं बरामद हुई थीं। 

इस मामले में फरीदाबाद के नर्सिंग स्टाफ और अस्पताल कर्मचारियों की सक्रिय भूमिका सामने आई। अस्पताल से दवाएं चुराकर तस्करों के जरिए बाजार में पहुंचाने का तरीका इस नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा था। कैंसर, डायबिटीज और वजन नियंत्रण की दवाएं असल में लाखों रुपये की होती हैं, इसलिए नकली या डायवर्ट की गई दवाएं सस्ती दर पर उपलब्ध कराकर या असली कीमत पर बेचकर अपराधी बेतहाशा कमाई करते हैं। अस्पतालों और सरकारी गोदामों से दवाओं का डायवर्जन है, जहां नर्सिंग स्टाफ या प्राइवेट असिस्टेंट मरीजों के लिए रखी वायल निकालकर बाहर सप्लाई करते हैं। 

राज्य ड्रग्स कंट्रोलर ने फील्ड अधिकारियों को सख्त निगरानी, त्वरित निरीक्षण, सैंपलिंग और कानूनी कार्रवाई के आदेश दिए हैं। पिछले दस महीनों में 16 लोगों को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया, जिसमें गुरुग्राम इकाई ने 12 गिरफ्तारियां कीं और कई अंतरराज्यीय सिंडिकेट ध्वस्त किए। अप्रैल 2026 में गुरुग्राम के डीएलएफ फेज-4 और सेक्टर-69 में नकली मौनजारो इंजेक्शन का रैकेट पकड़ा गया, जिसमें करीब 70 लाख रुपये मूल्य की दवाएं जब्त हुईं। जुलाई में नकली टेल्मा-एएम गोलियों का नेटवर्क उजागर हुआ, जिसकी सप्लाई चेन दिल्ली के बिना लाइसेंस वाले थोक व्यापारी और उत्तर प्रदेश-बिहार तक पहुंची।  

एसोचैम का अनुमान है कि देश में नकली दवाओं का बाजार 15 हजार करोड़ रुपये सालाना से अधिक हो गया है। यह कारोबार 20-25 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है। इस मामले में हरियाणा का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। यह भी सच है कि देश का बड़ा फार्मा उत्पादन हरियाणा के सोनीपत, पानीपत, अंबाला बेल्ट में होता है। हर बड़ी बरामदगी में हरियाणा का नाम आने से विशेषज्ञ चिंतित हैं। 

उनका अंदाजा है कि अकेले प्रदेश में सालाना चार सौ से छह सौ करोड़ रुपये का अवैध कारोबार चल रहा है। इसकी बड़ी वजह विभाग में स्टाफ की भारी कमी है। नकली दवाओं का यह कारोबार सिर्फ  आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि मरीजों की जान से जानबूझकर किया जाने वाला खिलवाड़ है। कैंसर जैसे रोगों में नकली दवा देने से इलाज विफल हो सकता है और मौत का खतरा बढ़ जाता है। 

Wednesday, August 26, 2026

भगवन! मुझे बंधन मुक्ति का उपदेश दें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सुप्पारक तीर्थ क्षेत्र में एक संत रहते थे वाहिय दारूचीरिय। उन्होंने अपनी वासना और इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। धन संपत्ति का उन्हें मोह ही नहीं था। महाराष्ट्र के पालघर जिले के नालासोपारा को ही प्राचीन काल में सुप्पारक तीर्थ कहा जाता था। साधु वाहिय दारूचीरिय जहां भी जाते लोग उनके चरणों में अपनी धन, संपत्ति, वस्त्रों और विभिन्न तरह के उपहारों का ढेर लगा देते थे।

धीरे धीरे उनमें एक अहंभाव जागने लगा। वृद्ध गुरु को अपने शिष्य के अहंभाव के बारे में जानकारी मिल गई। गुरु ने अपने शिष्य दारूचीरिय से कहा कि तुमने गौतम बुद्ध का नाम सुना है? दारूचीरिय ने उत्तर दिया, हां गुरुवर! मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। जेतवन में वह परिव्राजक हैं। उन्होंने भी अर्हत मार्ग को सिद्ध कर लिया है। गुरु ने कहा, तब तुम्हें उनके सामीप्य में कुछ दिन बिताने चाहिए। 

गुरु की बात मानकर दारूचीरिय सुप्पारक से जेतवन के लिए चल पड़े। जब वह जेतवन पहुंचे, तो उन्होंने एक भिक्षु से पूछा कि आप लोग बता सकते हैं, तथागत मिलेंगे? उस भिक्षु ने कहा कि तथागत, भिक्षा के लिए श्रावस्ती गए हैं। तीसरे पहर तक आएंगे। आप विश्राम करें। दारूचीरिय को आश्चर्य हुआ कि इतने भिक्षुओं के होते हुए बुद्ध को भिक्षा मांगने की जरूरत क्यों पड़ी। वह वहीं पहुंचे जहां भिक्षा के लिए बुद्ध खड़े थे। 

दारूचीरिय ने कहा कि भगवन! आप मुझे बंधन मुक्ति का उपदेश दें। बुद्ध ने कहा कि यह उचित समय नहीं है। जब दारूचीरिय ने कई बार जिद की तो महात्मा बुद्ध ने कहा कि जो एक ही बार में एक ही काम में इतना तल्लीन हो जाए कि दूसरी इंद्रियां भाव ही शेष न रह जाए, तो वह अनासक्त और बंधन मुक्त हो जाता है। अब दारूचीरिय को अपनी कमियों का भान हुआ। वह बुद्ध को प्रणाम कर जेतवन की ओर लौट पड़े।

बरसाती मौसम में बीमारियों से बचने के लिए बरतें सावधानी


अशोक मिश्र

हरियाणा में इन दिनों हो रही बरसात ने प्रशासन और व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। भारी बारिश ने कई शहरों और कस्बों को एक विचित्र और चिंताजनक तस्वीर में बदल दिया है। सड़कों पर खुले मैनहोल, कूड़ा-कचरा से पूरी तरह भरी नालियां, पानी के साथ तैरता कचरा और घरों में घुसता सीवर का गंदा पानी मिलकर एक ऐसा दृश्य रच रहे हैं जो न सिर्फ असुविधाजनक है बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है। बड़े-बड़े गड्ढे सड़कों पर फैल गए हैं जो किसी भी समय किसी वाहन या पैदल यात्री के लिए दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम से लेकर हिसार और अंबाला तक एक ही तस्वीर है - सड़कों पर घुटनों तक पानी, उस पानी में तैरता पॉलीथीन और कचरा। किसी भी स्थान पर रुका हुआ पानी मच्छरों का प्रजनन स्थल बन जाता है। डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को न्यौता देता है। घरों में घुसा सीवर का पानी और नालियों का ओवरफ्लो लोगों में हैजा, टाइफाइड, पीलिया और दस्त जैसी जल-जनित बीमारियों का कारण बनता है। गीली जमीन पर फिसलन और दूषित पानी में पैर रखने से चर्म रोग और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं। ऐसे में सावधानी ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।  ऐसी स्थिति में सबसे पहले तो पीने के पानी पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।

 बरसात में नल का पानी सीधे पीने से बचें। उसे अच्छी तरह उबालकर या फिल्टर करके ही इस्तेमाल करें। बाहर का कटा फल, खुले में बिका जूस या चाट-पकौड़ी से परहेज करें। इनमें सीवर के पानी के सूक्ष्म कण मिले होने की आशंका रहती है। घर में पानी को ढक कर रखें और कूलर, गमले, पुराने टायर या छत पर रखी किसी भी चीज में पानी जमा न होने दें। हर दो दिन में उन्हें खाली कर सुखा दें। शाम के समय पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छरदानी या मच्छर भगाने वाली क्रीम का उपयोग करें। 

थोड़ी सी समझदारी, साफ-सफाई और एक-दूसरे का ख्याल रखकर हम इस मुश्किल मौसम को भी सुरक्षित निकाल सकते हैं। अगर बुखार, उल्टी, दस्त या त्वचा संबंधी कोई समस्या हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और स्वयं दवा न लें। बरसात प्रकृति का वरदान है। बरसात की वजह से ही नए-नए पौधों का जन्म होता है। धरती हरी भरी हो जाती है। तपती धरती को बरसात ही शीतल करती है। लेकिन हमारी थोड़ी सी लापरवाही इसे अभिशाप बना देती है। थोड़ी सतर्कता, थोड़ी जागरूकता और थोड़ा सहयोग अपनाकर हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने परिवार और पड़ोसियों को भी सुरक्षित रख सकते हैं। हरियाणा के लोग कठिन परिस्थितियों में सदियों से एकजुट रहे हैं। उनका आपसी भाईचारा दूसरे राज्यों के लिए एक मिसाल की तरह है। इस बार भी वही एकजुटता हमें इन चुनौतियों से उबरने में मदद करेगी।


हम भी इंसान हैं, डायन नहीं !

अशोक मिश्र

गांव में किसी को बकरियां अचानक मर गई, गाय या भैंस बीमार हो गई, बच्चा बीमार है या फिर अचानक मर गया, किसी के घर में बच्चे नहीं हो रहे हैं, इसका क्या मतलब है? इसका एक ही मतलब है कि गांव में कोई डायन है? 'डायन... जी हां, डायन...। सभ्य समाज में ऊपर कही गई बातों को सुनकर भले ही लोगों के मुंह से एकाएक निकल पड़े, यह क्या बेवकूफी है, लेकिन झारखंड, उड़ीसा, असम, नगालैंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि राज्यों के गांवों का सच यही है। डायन, टोनहिन, चुड़ैल, भुतनी, प्रेतनी, डाकिनी, कलंकिनी आदि ये शब्द हैं जो प्राचीनकाल से अब तक औरतों के खिलाफ एक हथियार के रूप में प्रयोग किए जाते रहे हैं। डायन घोषित की गई महिला या महिलाओं के बाल काट लेना, उनके साथ बलात्कार करना, उनको नंगा करके गांव भर में घुमाना, उनके जननांगों को क्षति पहुंचाना, मुंडन कर देना, उनकी हत्या कर देना आदि अमानवीय व्यवहार अंधविश्वासी समाज में जैसे जायज बनकर रह गया है। डायन, भुतनी, चुड़ैल आदि शब्दों को गढ़कर स्त्री को अधिक से अधिक बुरी बत्ताने के लिए कई तरह के किस्से, कहानियां, मिथक और कहावतें गढ़ी गई। 'डायन भी सात पर छोड़ देती है जैसे मुहावरे स्त्री अस्मिता पर न केवल पातक प्रहार करते हैं, बल्कि बच्चों के मन में बचपन से ही उनके प्रति कलुषित धारणाएं पैदा कर देते हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों में डायन बताकर प्राचीनकाल से अब तक कितनी महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया, इसका कोई आंकड़ा दे पाना कतई संभव नहीं है। पिछले सौ-पचास साल का आंकड़ा यदि हम इकट्ठा कर भी ले, तो यह सच्चाई नहीं बदलने वाली है कि डायन शब्द की उत्पत्ति के पीछे पुरुषवादी सत्ता का हाथ रहा है। जो भी स्त्रियां पुरुषों के अनुकूल नहीं रहीं, उनके लिए ही पुरुषों ने यह शब्द ईजाद किया। डायन मतलब बुरी औरत.. जो पुरुषों का कहा नहीं मानती, जो बच्चों को खा जाती है, जिसकी वजह से देश, गांव, समाज और परिवार पर विपत्ति टूट पड़ती है। मजेदार बात यह है कि पुरुषों ने शब्द डायन गढ़ने के बाद यह खूबसूरत हथियार महिलाओं के ही हाथ में थमा दिया कि लो! जब हमें जरूरत महसूस होगी, हमारे इशारे पर उन स्त्रियों को डायन का खिताब देकर मार दो, जो हमारे इशारे पर चलने से इंकार करती हैं, जो पितृसत्ताक व्यवस्था वा पुरुषवादी सत्ता के खिलाफ बगावत करती हैं। यह खेल आज भी जारी है। आज इसका कुछ रूप भले ही बदल गया हो, लेकिन किसी भी महिला को डायन घोषित करने के पीछे की मानसिकता वही हजारों साल पुरानी है। अपने निहित स्वार्थों के लिए किसी भी विवश, लाचार, गरीब, अशिक्षित महिला को डायन बताकर मार दो। अफसोसजनक बात तो यह है कि इस साजिश में अब महिलाएं भी बराबर की भागीदार हैं, यह सोचे बिना कि ऐसा करके वे अपने को ही किसी न किसी रूप में कमजोर कर रही हैं।

हजारों साल बीत जाने के बावजूद इस देश की महिलाओं को यह सोचने-समझने का मौका ही नहीं दिया गया कि वे जब किसी महिला को डायन बताने के लिए प्रेरित की जाती हैं, तो उसके पीछे कारण क्या रहते हैं? आखिर औरत ही डायन क्यों होती है, पुरुष क्यों नहीं? डायन, चुड़ैल, भूतनी, कुटनी, वेश्या जैसे शब्दों की तलवार महिलाओं को ही रक्तरंजित क्यों करती है? भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस कहकर किसी पुरुष को मार दिया गया हो, ऐसी घटनाएं वर्तमान में तो क्या, अतीत में भी शायद ही देखने को मिले। और यदि एकाध हैं भी, तो उसके दूसरे समाजशास्त्रीय कारण रहे होंगे। कुछ राज्यों में तो औरतों को डायन बताकर मार देने की परंपरा आज भी अबाध गति से जारी है। अगर हम डायन बताकर मारी जाने वाली महिलाओं की आर्थिक दशा पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि अब तक ज्ञात सभी घटनाओं में लगभग 28 फीसदी महिलाएं या तो गरीब रही हैं, विधवा रही हैं या फिर तलाकशुदा। डायन बताकर मारी गई कुंवारी लड़‌कियों की भी आर्थिक दशा ऐसी ही रही होगी। अमीर घरों की महिलाओं को डायन बताकर मार देने की घटना न बराबर है। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि डायन कही जाने वाली औरतों के पीछे उनकी गरीबी, असहायता, शोषण-दोहन और यौन उत्पीडन जैसी प्रवृत्तियां उत्प्रेरक के रूप में काम करती रही है। अब तक जितने भी मामले सामने आए हैं, उनमें कुछ बातें तो कामन हैं, जैसे, संपत्ति विवाद, यौन शोषण, आपसी रंजिश आदि। इन कारणों से एक बात तो समझ में आती है कि कुछ लोग या समुदाय अपने ही नाते-रिश्तेदार महिलाओं को उनकी संपत्ति हड़पने, उनका यौन शोषण करने या फिर जमीन का बंटवारा न करना पड़े, इसके लिए कुछ महिलाओं या पुरुषों को लालच देकर डायन घोषित करके मार देते हैं। यह सदियों से होता चला आ रहा है।

झारखंड में ये समस्या विकराल रूप में है। उड़ीसा, आंध्र प्रदेश भी ऐसी हत्याओं के मामले में ज्यादा पीछे नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कानून नहीं बनाए। सरकार ने अपनी तरफ से कोशिश की और कर रही है, लेकिन लोगों की मानसिकता में अभी नकारात्मक बातें भरी पड़ी हैं। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना पर विश्वास अब भी कायम हैं। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून साल 2001 से ही लागू है। इसके बाद भी समाज में कोई खास बदलाव नहीं आया है। राजस्थान सरकार ने डायन प्रथा विरोधी कानून, 2015 पास करके ऐसी हत्याओं पर रोक लगाने की कोशिश की है।

असम में तो पिछले पांच सालों में 70 से अधिक महिलाओं को डायन बताकर मार दिया गया। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में हर साल डायन के नाम पर महिलाओं की बलि ली जा रही है। पुलिस और प्रशासन बहुत दबाव पड़ने और मीडिया में बात उछल जाने पर फौरी तौर पर कुछ कार्रवाइयां करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। कुछ लोग गिरफ्तार किए जाते हैं, बाद में जमानत पर छूटकर चले आते हैं, कई बार तो क्या, ज्यादातर मामलों में आरोपी सुबूत के अभाव में बरी तक हो जाते हैं। इस अभिशाप के खिलाफ आवाज सदियों से नहीं उठती रही है, लेकिन इस अभिशाप के खिलाफ असम ने जो पहल की है, वह बेमिसाल है। असम की ही एक बहादुर महिला 62 वर्षीय बीरूवाला डायन बताकर मार देने वाले अंधविश्वास के खिलाफ पिछले कई सालों से लड़ रही है। वह अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान इस डायन प्रथा रूपी अभिशाप से बचा चुकी है। अब असम ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में महिलाएं और पुरुष धार्मिक अंधविश्वासों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। वे इसके खिलाफ आवाज भी उठाने लगे हैं, लेकिन अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। 

Tuesday, August 25, 2026

तू सेवा कर, इसके लिए सारा संसार पड़ा है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

विशाखा कोशल प्रदेश की राजधानी साकेत(वर्तमान में अयोध्या) के एक धनी व्यापारी की पुत्री थी। उसके माता-पिता पहले मगध में रहते थे। जब वह सात साल की थी, तो महात्मा बुद्ध मगध आए थे, तो वह उनसे मिली थी। बाद में उसके परिजन साकेत आ गए। जब वह सोलह साल की हुई, तो उसका विवाह श्रावस्ती के धनी व्यापारी मिगारा के पुत्र पुन्नवद्धन के साथ हुआ और वह अपनी ससुराल श्रावस्ती आ गई। उसे मिगारमाता भी कहा जाता है क्योंकि उसने मिगारा को बौद्ध बनने को प्रेरित किया था। तब उसके ससुर ने उसे अपनी माता का दर्जा दिया था। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध जेतवन पधारे। विशाखा ने अगले दिन बुद्ध के प्रवचन की व्यवस्था की थी। दुर्योग से उसी रात विशाका के पौत्र धीरज का निधन हो गया। पौत्र का दाह संस्कार होने के बाद भी वह रोती रही। जब थोड़ा सा दुख कम हुआ, तो वह उस सभा में जा बैठी जहां बुद्ध लोगों को संबोधित कर रहे थे। 

बुद्ध ने देखा कि विशाखा अस्त व्यस्त वस्त्रों में बैठी शोकमग्न है। बुद्ध ने कहा, विशाखे! मध्याह्न हो चला, तूने अपने वस्त्र नहीं बदले। विशाखा ने रुदन भरे स्वर में कहा, भगवन! मेरे पौध का निधन हो गया है। बहुत समझाने पर जब उसका रोना बंद नहीं हुआ, तो बुद्ध ने कहा, विशाखे! यदि तुझे तेरा पौत्र मिल जाए तो तुझे खुशी होगी? विशाखा ने कहा, हां, तब मेरी खुशी का पारावार नहीं रहेगा। 

बुद्ध ने कहा कि यदि तुझे श्रावस्ती की जनसंख्या जितने पुत्र-पौत्र हो जाएं, तो तुझे अपार खुशी होगी। विशाखा ने कहा, हां, मैं तो बहुत खुश हो जाऊंगी। बुद्ध ने कहा कि तब तो रोज किसी न किसी की मृत्यु होती रहेगी। तू तो रोज इसी तरह व्याकुल रहेगी। सोच, जब तू एक पौत्र के निधन पर इतनी दुखी है, तब क्या होगा? तू सेवा कर, इसके लिए सारा संसार पड़ा है। सेवा में जो सुख है, वह आसक्ति में नहीं है। 

विशाखा महात्मा बुद्ध की बात को समझ गई और उसी दिन से सेवा का पंथ अपना लिया।