Monday, October 12, 2026

A sleeping person is like a dead person


bodhi tree

Ashok Mishra

Tathagata saw neither day nor night to propagate the religion. Whenever and wherever he got the opportunity, he inspired people for self-welfare. In the royal palace where Siddhartha enjoyed all the happiness of the world. For every work, slaves and maids used to stand in a queue, after assuming sannyasa, he used to do all his work himself. 

On one side was all the splendor of the world, on the other side was the crowd of devotees and the sufferings of the world. Despite this, there was never a glimpse of fatigue or lack of enthusiasm on Buddha's face. It seemed as if a new energy was flowing through him all the time. Once upon a time. He was giving sermons to his disciples at night. 

All the people present to listen to the sermon were listening to Buddha's speech with great attention. There was one person among them, who was dozing off in between. It seemed that he was very tired. Perhaps he had worked hard all day. He was feeling sleepy due to fatigue. He was not even a beggar. Mahatma Buddha saw him and calling him said, Vatsa! are you sleeping? 

The person got nervous, no God! I am awake. Buddha continued his sermon. After some time he fell asleep again. Tathagata repeated the same question three-four times and went to sleep again saying that he was God and not a person. For the last time Buddha asked him, stay alive, Vatsa! He said angrily, No God! Hearing this, all the people present there laughed. Mahatma Buddha also smiled and said, this time you answered correctly, Vatsa! A sleeping man is like a dead person. Unless we awaken our wisdom and conscience, we all remain as dead.

सोता हुआ व्यक्ति मृतक समान है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तथागत ने धर्म का प्रचार करने के लिए न दिन देखा, न रात देखी। जब और जहां मौका मिला, उन्होंने लोगों को आत्म कल्याण के लिए प्रेरित किया। राज महल में जहां सिद्धार्थ को दुनिया के समस्त सुख हासिल थे। हर काम के लिए दास-दासियां पंक्तिबद्ध होकर खड़े रहते थे, संन्यास धारण करने के बाद वह अपना समस्त कार्य खुद करते थे। एक ओर थे दुनिया भर का समस्त वैभव, वहीं दूसरी ओर श्रद्धालुओं की भीड़ और दुनिया भर के कष्ट। 

इसके बावजूद बुद्ध के चेहरे पर न कभी थकान की झलक मिली, न ही उत्साहहीनता की। ऐसा लगता था कि उनमें हर समय एक नई ऊर्जा प्रवाहित होती रहती थी। एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों को रात्रि में प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन सुनने के लिए उपस्थित समस्त जन बड़े ध्यान से बुद्ध की वाणी का श्रवण कर रहे थे। उनमें एक व्यक्ति ऐसा भी था, जो बीच-बीच में ऊंघ रहा था। 

ऐसा लगता था कि वह काफी थका हुआ है। शायद उसने दिन भर कठिन परिश्रम किया था। थकान की वजह से उसे नींद आ रही थी। वह भिक्षुक भी नहीं था। महात्मा बुद्ध ने उसे देखा और उसको पुकारते हुए कहा, वत्स! सो रहे हो? वह व्यक्ति हड़बड़ा उठा, नहीं भगवन! जागा हुआ हूं। बुद्ध ने अपना उपदेश जारी रखा। थोड़ी देर बाद वह फिर सो गया। तीन चार बार तथागत ने वही सवाल दोहराया और वह व्यक्ति नहीं भगवन कहकर फिर सो जाता। 

आखिरी बार बुद्ध ने उससे पूछा, जीवित हो, वत्स! उसने तपाक से कहा, नहीं भगवन! यह सुनकर वहां उपस्थित सारे लोग हंस पड़े। महात्मा बुद्ध भी मुस्कुराए और बोले, इस बार तुमने सही उत्तर दिया, वत्स! सोता हुआ आदमी मृतक समान है। जब तक हम अपनी प्रज्ञा और विवेक को नहीं जगाते हैं, तब तक हम सभी मृतक समान ही हैं।

प्रदर्शन मामले में सरकार सफल रही, कीमत आम जनता ने चुकाई


अशोक मिश्र

दस अक्टूबर को दिल्ली की तस्वीर देखकर ऐसा लगा कि जैसे राजधानी किसी युद्ध के मोर्चे में तब्दील हो गई हो। हर चौराहे पर बैरिकेड, हर सीमा पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती, जगह-जगह कंटीले तार और बख्तरबंद वाहन, मानो दुश्मन देश के सैनिक हमला करने आ रहे हों। सरकार ने अपनी पूरी ताकत इस बात में झोंक दी कि प्रदर्शनकारी किसी भी सूरत में जंतर-मंतर तक न पहुंच पाएं। इसमें वह पूरी तरह सफल भी रही। एक परिंदा तक जंतर-मंतर तक नहीं फटक सका। 

सवाल यह है कि क्या अपने ही नागरिकों को रोकने के लिए राजधानी को इस हद तक छावनी में बदलने की सचमुच जरूरत थी? लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार कोई भीख नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है। जंतर-मंतर तो दशकों से इसी अधिकार के प्रतीक के रूप में जाना जाता रहा है। जब सरकार ही तय करने लगे कि कौन प्रदर्शन करेगा, कहाँ करेगा और कैसे करेगा, तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था का अर्थ क्या रह जाता है? असहमति को रोकना व्यवस्था की मजबूती नहीं, बल्कि उसके डर को दिखाता है। सरकार का तर्क था कि सीजेपी ने प्रदर्शन के लिए पर्याप्त नोटिस और गाइडलाइन का पालन नहीं किया, इसलिए अनुमति नहीं दी गई। तो फिर अनुमति न देने की कीमत क्या आम जनता को चुकानी चाहिए? सात हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरें हैं। 

कई विपक्षी दलों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। वाम दलों ने कहा कि सरकार ने अपने चारों ओर घेरा डालकर दिल्ली को एक विशाल पुलिस शिविर में बदल दिया है। इस पूरी कवायद की सबसे बड़ी कीमत आम जनता ने चुकाई। दिल्ली आने-जाने वाले लाखों लोगों के लिए शनिवार का दिन किसी सजा से कम नहीं था। मेट्रो के कई स्टेशनों को बंद कर दिया गया, कई ट्रेनें दिल्ली के स्टेशनों पर रुकी ही नहीं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आने वाली सड़कों पर घंटों लंबा जाम लगा रहा। 

दफ्तर जाने वाले, अस्पताल जाने वाले, परीक्षा देने वाले छात्र, मजदूर और व्यापारी, सभी इस नाकाबंदी में फंसे रहे। सरकार चाहती तो प्रदर्शन के लिए एक व्यवस्थित जगह देकर, बातचीत का रास्ता खोलकर इस अराजकता से बचा जा सकता था। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को जगह देना प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत होता। लेकिन सरकार की मंशा प्रदर्शन को व्यवस्थित करने की नहीं, बल्कि उसे विफल करने की अधिक दिखी। और इस विफल करने के चक्कर में उसने पूरे एनसीआर की जनजीवन व्यवस्था को ही विफल कर दिया। जब सरकार जनता की सुविधा के बजाय अपनी सुविधा को प्राथमिकता देने लगती है, तब लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी चिंता की बात और क्या हो सकती है।

Sunday, October 11, 2026

Sadhu came to know about the importance of dedication


Bodhi tree

Ashok Mishra

Many stories of Buddha's life seem very miraculous. Some historians believe that Buddha was an atheist. This may or may not be true. It is believed that many stories in Buddhist literature have been added or subtracted later. In such a situation, only a serious student of Buddhist literature can tell the truth of the popular stories about Buddha. It is said that once he was giving a sermon somewhere. 

All the monks, including the most beloved disciple and cousin Ananda, were enjoying the discourse. Then a wandering monk came there and bowed to Buddha and said, Lord! I am an ordinary monk. I have neither intelligence nor tact. I neither have any vocabulary nor the art of talking to anyone efficiently. I am not in a position to even raise any question or curiosity. If you consider me worthy, then tell me some things that I should accept, so that my life also becomes successful. 

Hearing this, Gautam Buddha smiled for a while and then remained silent. On the other hand, the monk also became silent after saying his words. Both remained silent for a long time. Suddenly tears started flowing from his eyes. After a long time, the wandering monk got up and bowed to him and said, Lord! I was blessed by the education you gave me. Having said this, the sadhu went away dancing and singing.

 The people present there were astonished. Finally, Anand asked without saying anything and he went away satisfied. Buddha said that there are many types of horses. One blow from a whip makes them walk. The other horse has to be beaten from time to time. 

The third type of horse has to be beaten continuously only then will it move. For the fourth type of horse the shadow of the whip is sufficient. This saint was also the fourth type of saint.

समर्पण की महत्ता का साधु को हुआ ज्ञान


 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध के जीवन की अनेक कथाएं बड़ी चमत्कारिक प्रतीत होती हैं। कुछ  इतिहासकारों का मानना है कि बुद्ध अनीश्वरवादी थे। यह बात सत्य भी हो सकती है और नहीं भी। बौद्ध साहित्य में भी बहुत सारी कथाएं बाद में जोड़ी-घटाई गई हैं, ऐसा माना जाता है। ऐसी स्थिति में बौद्ध साहित्य का गंभीर अध्येता ही बुद्ध के बारे में प्रचलित कहानियों का सत्य बता सकता है। कहते हैं कि एक बार कहीं पर वह प्रवचन कर रहे थे। 

परम प्रिय शिष्य और चचेरे भाई आनंद सहित सभी भिक्षुक प्रवचन का आनंद ले रहे थे। तभी एक घुमक्कड़ साधु वहां आया और उसने बुद्ध को प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! मैं एक साधारण साधु हूं। मेरे पास न बुद्धि है और न ही चातुर्य। मेरे पास न कोई शब्द संग्रह है और न ही किसी से कुशलता से बातचीत करने की कला है। मैं कोई प्रश्न या जिज्ञासा प्रकट कर पाने की भी स्थिति में नहीं हूं। यदि आप मुझे योग्य समझें, तो मेरे ग्रहण करने योग्य कुछ बातें बता दें, ताकि मेरा भी जीवन सफल हो जाए।

यह सुनकर गौतम बुद्ध थोड़ी देर के लिए मुस्कुराए और फिर मौन साध लिया। उधर साधु भी अपनी बात कहकर चुप हो गया। काफी देर तक दोनों मौन रहे। अचानक उसकी आंखों से अश्रु बहने लगे। काफी देर बाद घुमक्कड़ साधु उठा और उसने प्रणाम करते हुए कहा, भगवन! आपने मुझे जो शिक्षा दी, उससे मैं धन्य हो गया। 

इतना कहकर वह नाचता गाता साधु चला गया। वहां मौजूद लोग चकित रह गए। आखिरकार, आनंद ने पूछ ही लिया कि आप कुछ बोले भी नहीं और वह संतुष्ट होकर चला गया। बुद्ध ने कहा कि घोड़े कई प्रकार के होते हैं। एक चाबुक से एक वार करने से चल पड़ते हैं। दूसरे घोड़े को बीच-बीच में पीटते रहना पड़ता है। 

तीसरे प्रकार के घोड़े को लगातार पीटना ही पड़ता है, तभी वह चलते हैं। चौथे प्रकार के घोड़े के लिए चाबुक की छाया ही काफी है। यह साधु भी चौथे प्रकार साधु था।

मिलावटी खाद्य पदार्थों से बचा सकती है नागरिकों की थोड़ी सी सावधानी


अशोक मिश्र

आज से नवरात्रि शुरू हो गई है। इसके साथ ही बाजारों में वह सालाना चक्र भी शुरू हो जाएगा जिसे हम सब पहचानते हैं। व्रत का कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, समा के चावल से लेकर दशहरा और दीपावली की मिठाइयों, पनीर, खोया, घी और तेल तक हर चीज की मांग अचानक बढ़ जाएगी। इस मांग को पूरा करने के लिए आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ेगा। इसी दबाव की आड़ में मिलावट का धंधा तेज हो जाएगा। यह कोई नई बात नहीं है। यह एक पैटर्न है, जो पिछले कई दशकों से हर साल दोहराया जा रहा है। 

हर साल अखबारों में एक जैसी खबरें छपती हैं, सरकार चेतावनी जारी करती है। खाद्य विभाग विभिन्न जगहों पर छापे मारता है। क्विंटलों कथित मिलावटी माल को नष्ट किया जाता है। फिर भी मिलावटी सामान बिकता है और बीमारियां घर-घर पहुंचती हैं। इस बार भी कोई नया दृश्य सामने आने की उम्मीद नहीं है। लेकिन सरकारी स्तर पर यह कहा जा रहा है कि इस बार की तस्वीर अलग होगी। सरकार अब सिर्फ छापेमारी तक सीमित नहीं रहना चाहती। रणनीति में बदलाव दिख रहा है। 

एफएसएसएआई ने राज्यों को वल्नरेबिलिटी मैपिंग करने को कहा है यानी उन इलाकों और उन बिना लाइसेंस वाले खोया-पनीर निर्माताओं को पहले से चिन्हित करना जहां से सबसे ज्यादा मिलावट की सूचना आती है। मिठाई निर्माताओं को निर्देश दिया गया है कि वे कच्चा माल-दूध, खोया, पनीर, केवल एफएसएसएआई लाइसेंस प्राप्त वेंडरों से ही खरीदें। इतना ही नहीं, जांच को तेज और जनता के करीब लाया जा रहा है। अब मावा और मिठाइयों की आॅन-द-स्पॉट जांच की व्यवस्था, फूड सेफ्टी आॅन व्हील्स वैन, और मैजिक बॉक्स यानी डार्ट किट के जरिए त्वरित टेस्टिंग पर जोर है। फिर सवाल यह है कि जब सरकारी मशीनरी इतनी सक्रिय है तो मिलावट रुक क्यों नहीं रही। इसका उत्तर अर्थशास्त्र और व्यवहार दोनों में है। 

त्योहारों में दूध की मांग 30 से 40 प्रतिशत बढ़ जाती है। वहीं  तथ्य यह है कि दूध का उत्पादन जरूरत के मुताबिक नहीं बढ़ता है। कीमत बढ़ने से सस्ता विकल्प बनाने का लालच बढ़ता है। पनीर में पाम आॅयल, स्टार्च और डिटर्जेंट, खोया में मैदा, सूजी और सिंथेटिक दूध, मिठाइयों में अखाद्य रंग और पुराने खोये का इस्तेमाल आम है। उपभोक्ता भी जाने-अनजाने में इसमें भागीदार बन जाता है। लोग चमकदार, ज्यादा सफेद और असामान्य रूप से सस्ती मिठाई की ओर आकर्षित होते हैं। 

यही गलती कई बार उन पर भारी पड़ जाती है। अंतत: यह लड़ाई केवल खाद्य विभाग की नहीं है। सरकार का काम बाजार को साफ रखना है, लेकिन मांग जनता पैदा करती है। जब तक हम सस्ते और चमकदार के मोह में आकर बिना सवाल पूछे कुछ भी खरीदते रहेंगे, तब तक मिलावट का अर्थशास्त्र चलता रहेगा। इस नवरात्रि से दीपावली तक का समय सिर्फ उपवास और उत्सव का नहीं, बल्कि अपने भोजन को लेकर सचेत रहने का भी है। थोड़ी सी सावधानी, थोड़ी सी जांच और भरोसेमंद स्रोत से खरीदारी ही वह लक्ष्मण रेखा है जो त्योहार की मिठास को कड़वाहट में बदलने से रोक सकती है।

Saturday, October 10, 2026

The only way to keep the mind pure is self-research.


bodhi tree

Ashok Mishra

Buddha always preached to people in simple language and in context related to life. This is why common people can understand his teachings and implement them in their lives. He always talked about practical matters. Once upon a time. Mahatma Buddha was preaching self-welfare to the people in the Dharma Sabha. One of his disciples asked, Lord! Man remains entangled in so many situations, he cannot get rid of them. 

In such a situation, how can he benefit himself? The path of life seems very difficult, then how can he find the path of liberation in life? Gautam Buddha said that self-research is the only way to lead a man to the path of duty and dharma. 

A man should think in his mind what kind of shortcomings he has due to which he is not able to walk on the path of self-welfare. Self-research is the path on which man can not only make his life happy but can also benefit himself. Gautam Buddha presented the example of a woman and said, what does a woman do every day? The first thing she does when she wakes up in the morning is look at her face in the mirror. She makes every possible effort to make her face clear and beautiful. She sees in the mirror that if there is any dirt on her face, she immediately removes it.

 If it doesn't go away, she washes her face with clean water and cleans it with a cloth. Similarly, man should also observe the evils within and outside himself. If even a slight deficiency is noticed, then efforts should be made to remove it. The only way to keep body and mind pure is self-research.

मन को शुद्ध रखने का उपाय ही आत्म शोध है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने हमेशा लोगों को सरल भाषा और जीवन से जुड़े संदर्भ में ही उपदेश दिए। यही कारण है कि उनके उपदेशों को सामान्य जन समझ सके और अपने जीवन में उसे उतार सके। वह हमेशा व्यावहारिक बात ही किया करते थे। एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध धर्म सभा में लोगों को आत्म कल्याण का उपदेश दे रहे थे। उनके एक शिष्य ने पूछा कि भगवन! मनुष्य इतने प्रसंगों में उलझा रहता है, उसे उससे ही छुटकारा नहीं मिलता है। 

ऐसे में वह आत्म कल्याण कैसे करे? जीवन की राह बहुत कठिन प्रतीत होती है, फिर वह जीवन में मुक्ति का मार्ग कैसे पा सकता है? गौतम बुद्ध ने कहा कि आत्म शोध ही मनुष्य को अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर ले जाने का एक मात्र रास्ता है। मनुष्य को अपने मन में विचार करना चाहिए कि उसमें किस तरह की कमियां हैं जिसके कारण वह आत्म कल्याण के पथ पर नहीं चल पा रहा है। 

आत्म शोध की वह पथ है जिस पर चलकर मनुष्य न केवल अपने जीवन को सुखी बना सकता है, बल्कि अपना कल्याण कर सकता है। गौतम बुद्ध ने एक स्त्री का उदाहरण पेश करते हुए कहा कि एक स्त्री रोज क्या करती है? वह सुबह उठकर सबसे पहले दर्पण में अपना चेहरा निहारती है। 

वह अपने चेहरे को निर्मल और सुंदर बनाने का हर संभव प्रयास करती है। दर्पण में वह देखती है कि चेहरे पर यदि कहीं कोई गंदगी लगी है, तो वह उसे तुरंत हटाती है। नहीं हटा, तो वह साफ पानी से चेहरा धोती है, कपड़े से साफ करती है। इसी तरह मनुष्य को भी अपने भीतर और बाहर की बुराइयों का निरीक्षण करना चाहिए। यदि तनिक भी कमी दिख जाए, तो उसे प्रयत्न करके हटाना चाहिए। शरीर और मन को शुद्ध रखने का उपाय ही आत्म शोध है।

अपने दो साल के कार्यकाल का हिसाब तैयार कर रही सैनी सरकार

अशोक मिश्र

भाजपा सरकार आगामी 17  अक्टूबर को सत्ता की हैट ट्रिक लगा लेगी। सैनी सरकार के दूसरे टर्म के दो साल भी पूरे हो जाएंगे। अपने दो साल की उपलब्धियों को लेकर सैनी सरकार एक रिपोर्ट कार्ड तैयार करने जा रही है।  सरकार इस दो साल के कार्यकाल को नॉन-स्टॉप विकास और जवाबदेही के रूप में प्रस्तुत कर रही है। स्वयं सैनी ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि उनके दो साल की पहचान जवाबदेही है।  योजनाएं केवल कागजों पर घोषणाएं बनकर नहीं रहनी चाहिए। सरकार के रिपोर्ट कार्ड का सबसे बड़ा दावा संकल्प पत्र को लेकर है। 

भाजपा ने 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले 217 संकल्पों वाला संकल्प पत्र जारी किया था। अलग-अलग मंचों पर मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि इनमें से 70 वादे 18 महीनों के भीतर पूरे कर दिए गए हैं। बाकी 147 पर तेजी से काम चल रहा है। शुरुआत में सौ दिन पूरे होने पर सरकार ने 18 संकल्प पूरे करने का दावा किया था। रोजगार के मोर्चे पर सरकार का मुख्य नारा बिना पर्ची-बिना खर्ची के पारदर्शी भर्ती रहा है। मुख्यमंत्री का दावा है कि उनकी सरकार 60 हजार से अधिक युवाओं को बिना भ्रष्टाचार और सिफारिश के नौकरी दे चुकी है, जबकि पिछले 12 सालों में दो लाख से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरी देने की बात कही जा रही है। 

उद्योग के क्षेत्र में जीटी रोड बेल्ट में इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप के लिए किसानों से जमीन आमंत्रित करना, जापानी कंपनियों के साथ पांच हजार करोड़ निवेश का एमओयू और 2024-25 में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत 761 मामलों में लगभग 5064 करोड़ रुपये के लोन स्वीकृत करना भी रोजगार सृजन से जोड़ा जा रहा है। इसके अलावा हरियाणा देश का पहला राज्य बना जिसने अग्निवीरों के लिए राज्य पुलिस में 20 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की। कृषि के क्षेत्र में सरकार हरियाणा को देश का इकलौता राज्य बताती है जहाँ 24 फसलों पर एमएसपी दी जा रही है। 

इसी को किसान कल्याण का सबसे बड़ा सबूत बताया गया है। दो साल बाद भी जिन समस्याओं का समाधान सैनी सरकार नहीं निकाल पाई है उनमें बेरोजगारी की धारणा, कानून-व्यवस्था और नशे का मुद्दा प्रमुख है। सरकार नशा विरोधी यात्रा और युवाओं को खेल से जोड़ने की बात कर रही है, लेकिन नशे के बढ़ते मामलों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। इसके अलावा भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे नेताओं का आरोप है कि दो सालों में हरियाणा विकास के हर पैमाने पर पिछड़ गया है और मुख्यमंत्री के पास राज्य के लिए समय ही नहीं है। 

एमएसपी पर खरीद, डीएपी की समय पर उपलब्धता, शहरी प्रदूषण और गुरुग्राम-फरीदाबाद जैसे एनसीआर शहरों में जलभराव और ट्रैफिक की समस्या भी ऐसी चुनौतियां हैं जिनका स्थायी समाधान अभी होना बाकी है। वैसे देखना यह होगा कि सरकार अपने रिपोर्ट कार्ड में क्या कहती है।

Friday, October 9, 2026

A lie does not last long before the truth.


Bodhi tree

Ashok Mishra

The path of life of Mahatma Buddha was never easy. He continued to struggle with conflicting forces throughout his life. Some people think that after attaining enlightenment, Buddha continued to receive respect everywhere. His followers were always engaged in his protection. Whoever came before him became his follower. It was nothing like that. Buddha had many opponents and he kept plotting something or the other against him. 

Once Mahatma Buddha was passing through a state in which the number of people who disliked him was very high. He never missed any opportunity to harass the Tathagat and cast aspersions on him. When he was told that Gautam Buddha had come to the city to give a sermon. Then they hatched a conspiracy. He prepared a woman and that woman wrapped clothes around her stomach like a pregnant woman and reached the place where Mahatma Buddha was preaching in the Dharma Sabha. 

She went to the assembly and started shouting, look at this hypocritical man. He roams around like a great Mahatma. He has made me pregnant and doesn't even accept me. Now he is sitting here preaching. Hearing this, there was commotion in the meeting. Buddha's disciple got scared. He asked Buddha, Lord! What will happen now? 

Buddha smiled and said, lies never last. Don't worry. Coincidentally, when she was making a thunderous noise in front of the women's gathering and trying to assassinate the character of Buddha, her girdle became loose and fell on the ground. That woman's secret was revealed. She felt embarrassed. He confessed the truth before the Synod. People were ready to beat him, then Buddha stopped them and said that fallen people already die. In such a situation, there is no point in inflicting physical pain. The woman felt ashamed and went away from there.