Monday, July 13, 2026

हां, मैं आपकी हत्या करने आया था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

शिवाजी राजे भोसले का राज्याभिषेक रायगढ़ में सन 1674 में हुआ था। यहीं पर उन्होंने मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी और राज्याभिेषक के बाद छत्रपति कहलाए। छत्रपति शिवाजी ने अपनी अनुशासित सेना और चतुर प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक खुशहाल राज्य की स्थापना की थी। उन्होंने मुगलों की भारी भरकम सेना का मुकाबला करने के लिए गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई थी जिससे मुगलों की सेना काफी खौफ खाती थी। एक बार की बात है। रात में वह अपने कक्ष में सो रहे थे। 

संयोग से उस समय सेनापति तानाजी पहरे पर थे। एक दस-बारह साल के एक बालक ने पहरेदारों की निगाह बचाकर शिवाजी के कक्ष में प्रवेश किया। उसने तलवार निकाली और शिवाजी पर हमला करने ही वाला था कि तानाजी की निगाह उस पर पड़ गई। तब तक शिवाजी की नींद भी खुल चुकी थी। बालक को बंदी बना लिया गया। शिवाजी ने उस बालक के हाथ में तलवार देखकर पूछा कि तुम मेरे कक्ष में इस तरह चोरी से क्यों आए थे। क्या तुम मेरी हत्या करना चाहते थे? 

बालक शिवाजी को देखकर डर गया। उसने डरते हुए कहा कि हां, मैं आपकी हत्या करने आया था। तब शिवाजी ने पूछा कि तुम मुझे क्यों मारना चाहते थे? तब बालक ने कहा कि मैं आपकी सेना के एक सैनिक का पुत्र हूं। मेरे पिता की लड़ाई में मौत हो गई है। मेरी मां बीमार हैं। मैं काम की तलाश में निकला था। आपके दुश्मनों ने मुझे पैसे देकर आपकी हत्या करने को कहा था। अभी आप मुझे छोड़ दीजिए, मैं अपनी मां से मिलकर कल सुबह हाजिर हो जाऊंगा। 

उस समय उसे छोड़ दिया गया। अगली सुबह नियत समय पर वह बालक दरबार में हाजिर हुआ। शिवाजी ने कहा कि यह हमारे वीर शहीद सैनिक का पुत्र है। भूल हमसे हुई। हम अपने सैनिकों के जीवन काल और उसके बाद उनके परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था करते हैं। मैं इस बालक की मृत्युदंड की सजा भी माफ करता हूं।

हरित विकास की ओर हरियाणा ने बढ़ाए मजबूती से कदम


अशोक मिश्र

हरियाणा ने बड़ी मजबूती से हरित विकास की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आगामी 17 जुलाई को हरियाणा देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन संचालित करने के मामले में गवाह बनने जा रहा है। यह ट्रेन जींद-सोनीपत रेलमार्ग पर चलाई जाएगी। यह डीजल के बजाय पानी और हाइड्रोजन से चलेगी जिससे प्रदूषण शून्य होगा यानी कार्बन का उत्सर्जन नहीं होगी। राज्य में जिस तरह सरकारी योजनाएं हरित विकास को ध्यान में रखकर संचालित की जा रही हैं, उससे उम्मीद है कि निकट भविष्य में हरियाणा की तस्वीर बदलेगी। वैसे भी सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आने तक यह हरित प्रदेश ही था। कहा जाता है कि हरियाणा शब्द भी हरियाली से ही आया है। 

राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और सतत कृषि के लिए सौ करोड़ रुपये के ग्रीन क्लाइमेट रेजिलिएंस फंड' की शुरुआत की है। इसका उद्देश्य प्रदूषण को कम करना और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना है। पिछले कुछ सालों में हरियाणा ने हरित विकास की दिशा में कई कदम उठाए हैं। आने वाले समय में इसी पर राज्य का भविष्य तय होगा। सबसे पहले सौर ऊर्जा के क्षेत्र में हरियाणा ने रफ्तार पकड़ी है। सरकारी इमारतों की छतों पर सोलर पैनल लगना, गांवों में सोलर स्ट्रीट लाइट और किसानों के लिए सोलर पंप योजना से न सिर्फ बिजली की बचत हो रही है बल्कि डीजल पर निर्भरता भी कम हुई है। 

गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों में इलेक्ट्रिक बसें और ई-आॅटो को बढ़ावा देना वायु प्रदूषण घटाने की दिशा में छोटा पर जरूरी कदम है। भूजल स्तर गिरना हरियाणा की सबसे गंभीर समस्या है। इसे देखते हुए माइक्रो इरिगेशन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और तालाबों के पुनरुद्धार पर काम शुरू हुआ है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार 'वन मित्र योजना' के तहत लोगों को पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए पैसे दे रही है। पूरे राज्य में पुराने पेड़ों की रक्षा के लिए 'प्राण वायु देवता पेंशन योजना' लागू है जिसमें 75 साल से पुराने पेड़ों का संरक्षण करने वालों को प्रतिवर्ष तीन हजार रुपये मिलते हैं। 

हरियाणा में वन क्षेत्र बढ़ाने का यह बहुत बढ़िया प्रयास है। बस, जरूरत इस बात की है कि पूरे राज्य में पेड़ों की अवैध कटाई को पूरी तरह नियंत्रित कर लिया जाए। सरकार वन क्षेत्र बढ़ाने का जितना प्रयास करती है, वन माफिया उतनी ही तेजी के साथ वनों की अवैध कटाई करके सरकार के प्रयासों पर पानी फेर देते हैं। अगर गांव-गांव में जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और सौर ऊर्जा को जन आंदोलन बनाया जाए तो बदलाव जमीनी स्तर पर दिखेगा। हरित विकास का मतलब विकास रोकना नहीं है। इसका मतलब है ऐसा विकास जो अगली पीढ़ी के लिए हवा, पानी और खेती की जमीन बचा कर रखे। उन्हें स्वस्थ जीवन दे।

जीवन में रात बहुत लंबी लगे, तो जुगनू को याद कीजिए


संजय मग्गू

आषाढ़ का महीना आधा बीत चुका है। पंद्रह दिन बाद सावन शुरू हो जाएगा। बरसात के दिनों में अंधेरे में चमक उठने वाले जुगनू अब शहरों में तो क्या, गांवों में भी कम दिखने लगे हैं। सदियों तक कवियों और साहित्यकारों के लिए आशा का प्रतीक रहे जुगनुओं को विकास ने निगल लिया है। शहरों और गांवों में बिजली की चमक ने उनके प्रजनन दर को प्रभावित किया है। कीट विशेषज्ञों का कहना है कि मई-जून में जुगनुओं का प्रजनन होता है। अंधेरी रात में अपने प्रकाश से मादा नर को खोजती है, लेकिन शहरों-गांवों में फैलती जा रही तीव्र रोशनी मादा को नर पहचानने में बाधा पैदा कर रही है। 

यही वजह है कि जुगनुओं की संख्या में भारी कमी आ रही है। कभी शहर और गांव में अंधेरी रातों में हरी, पीली और लाल रंग की रोशनी बिखेरते जुगनू अब यदा-कदा दिख जाएं, तो आप अपने को सौभाग्यशाली समझिए। मार्च 2026 में  भारत की पहली फायरफ्लाई यानी जुगनू चेकलिस्ट में जुगनुओं की 92 प्रजातियों का दस्तावेज तैयार किया गया है जिसमें से 61 प्रतिशत प्रजातियां भारत में ही पाई जाती हैं। जिस जगह जुगनू चमक रहे हों, तो माना जाता है कि उस स्थान का वातावरण हेल्दी है। प्रदूषण और प्रजनन दर में आई गिरावट ने जुगनुओं के सामने संकट पैदा कर दिया है। कभी वह भी जमाना था कि जब बच्चे जुगनुओं को मुट्ठी में कैद करके खिलखिलाते थे, मानो उन्होंने उजाले को कैद कर लिया हो। 

अंधेरी रात में यहां-वहां उड़ते-बैठे जुगनू इस बात का एहसास कराते थे कि अभी अंधेरा पूरी तरह हावी नहीं हुआ है। छोटी सी ही सही, उजाले की एक किरण अभी अंधेरे से अपनी पूरी ताकत से जूझ रही है। जुगनू का प्रयास भले ही छोटा हो, लेकिन जिस शिद्दत और जिजीविषा के साथ वह अंधेरे के खिलाफ मोर्चा लेते हैं, वह इंसानों में साहस जगाने के लिए काफी है। जुगनू आकार में बहुत छोटे होते हैं। न उनके पास सूरज जैसी ताकत है, न चांद जैसी चमक। फिर भी घनी काली रात में वे टिमटिमाकर अपना रास्ता खुद भी बनाते हैं और दूसरों को भी अपना रास्ता खुद तय करना सिखाते हैं। उनकी यही सबसे बड़ी उपयोगिता है मानव समाज के लिए। इंसान के सामने आ खड़ी हुई परेशानी के समय सबसे खतरनाक चीज निराशा है। निराशा आदमी को अंदर से तोड़ देती है। जुगनू हमें यही सिखाते हैं कि उजाला बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। 

एक छोटी सी पहल, एक अच्छा शब्द, एक मदद का हाथ भी किसी की रात बदल सकता है। अंधकार स्थायी नहीं होता। परेशानी भी हमेशा नहीं रहती। जरूरत है उस टिमटिमाहट को पहचानने की और उसे बुझने न देने की। क्योंकि एक जुगनू से दूसरे जुगनू तक रोशनी पहुंचती है और फिर वही रोशनी मिलकर सुबह बना देती है। इसलिए जब भी जीवन में रात बहुत लंबी लगे, तो याद रखिए। उम्मीद खत्म नहीं हुई है। कहीं न कहीं कोई जुगनू अभी भी टिमटिमा रहा है। बस उसे देखना है और खुद भी एक जुगनू बनना है।

Sunday, July 12, 2026

किसान और कुएं में गिरा गधा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संकट के समय यदि धैर्य रखा जाए, तो बड़ी से बड़ी समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। जो लोग संकट के समय अपना धैर्य खो देते हैं, वह परेशानी से निजात नहीं पा सकते हैं। धैर्य रखने वाला व्यक्ति हमेशा अपने काम में सफल होता है। बहुत पुराने समय की बात है। किसी गांव में एक किसान रहता था। उसने कई जानवरों के साथ-साथ एक गधा पाल रखा था। 

गधा काफी उम्र का हो गया था। अब किसान ने उससे काम लेना भी लगभग बंद कर दिया था। एक दिन जब गधा चरने गया, तो वह एक सूखे कुएं में गिर गया। गधा कुएं से निकलने का प्रयास करने लगा, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। उधर जब नियत समय पर गधा घर नहीं लौटा, तो किसान उसे खोजने निकला। खोजते-खोजते वह उस कुएं के पास पहुंचा, तो उसे कुएं में से गधे के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। 

कुएं को देखते ही किसान समझ गया कि इसमें से गधे को निकालने का प्रयास करना व्यर्थ है क्योंकि इतने गहरे कुएं से गधे का निकल पाना असंभव है। किसान ने यह भी सोचा कि गधा तो काफी बूढ़ा हो गया है। अब वह मेरे किसी काम का भी नहीं रह गया। इसलिए इसको निकालने की कोशिश करना बेकार है। यही सोचकर उसने गांववालों को बुलाया और कुएं को पाट देने की बात कही। 

लोगों ने कुएं में मिट्टी डालनी शुरू की। उधर कुएं में जैसी ही मिट्टी आती, गधा मिट्टी अपने शरीर से झाड़ देता। धीरे-धीरे गधा ऊपर आता चला गया। जब कुआं पूरी तरह पाट दिया गया, तो गधा उसमें से निकलकर जंगल की ओर चला गया। वह जान गया था कि किसान ने कुएं में मिट्टी उसे बचाने के लिए नहीं, बल्कि जिंदा दफन कर देने के लिए कुएं में मिट्टी डलवाई थी। गधे के जंगल चले जाने के बाद किसान को भी अपनी हरकत को लेकर पश्चाताप हुआ, लेकिन अब हो भी क्या सकता था।

हरियाणा कांग्रेस को छोड़ना होगा पुराने नेताओं का मोह

अशोक मिश्र

हरियाणा कांग्रेस के नए प्रभारी संजय सतीशचंद्र दत्त की हालत पर यह मुहावरा काफी सटीक बैठता है-आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। कांग्रेस हाई कमान ने उन्हें राज्य में संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी दी है, लेकिन अब उन्हें कांग्रेस में व्याप्त गुटबाजी को लेकर नए सिरे से संघर्ष करना पड़ रहा है। वैसे हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के इतिहास में न तो गुटबाजी का इतिहास नया है और न ही नए प्रभारी का आना। अब तक न जाने कितने नए प्रभारी आए और चले गए, लेकिन प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी पर लगाम लगाने में विफल रहे। 

कार्यकर्ताओं को भी अब इस गुटबाजी की आदत सी हो गई है।  प्रदेश कांग्रेस में हुड्डा खेमा, सैलजा खेमा, सुरजेवाला खेमा के साथ-साथ अब तो कुछ नए चेहरे छोटे स्तर पर दिखाई देने लगे हैं। जब भी राज्य में चुनाव के दिन नजदीक  आते हैं, हर खेमा अपने-अपने दावे लेकर उठ खड़ा होता है। हर चुनाव से पहले यही कथा दोहराई जाती है और नतीजा हर बार वही निराशाजनक ही होता है। 

हरियाणा प्रभारी संजय दत्त का पांच दिवसीय दौरे से एक आशा बंधी थी कि प्रदेश कांग्रेस में माहौल बदलेगा। नेता अपने-अपने अहंकार को त्यागकर कांग्रेस को मजबूत करने में अपना सौ प्रतिशत योगदान देंगे, लेकिन ऐसा दिखाई नहीं दिया। वैसे तो कहने को सभी गुट के वरिष्ठ नेता मंच पर एक साथ दिखाई दिए, लेकिन उन्होंने मंच पर जिस तरह अपनी बातें रखीं, उससे यह साफ हो गया कि हाथ भले ही मिले हों, लेकिन उनके दिल नहीं मिले हैं। बैठक के दौरान ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और पार्टी महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला के बीच मंच पर ही तीखी नोकझोंक का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिससे हालात का पता चलता है। 

सैलजा कुमारी का यह कहना कि कुछ नेता कार्यकर्ताओं से अपनी जयजयकार करवाते हैं, लेकिन जिस दिन कांग्रेस जिंदाबाद के नारे लगेंगे, उस दिन कांग्रेस मजबूत हो जाएगी। सच तो यह है कि इन वरिष्ठ नेताओं के बीच अदावतें बहुत पुरानी और इतनी गहरी हैं कि दो-चार बैठकों से यह वैरभाव खत्म होने वाला नहीं है। हुड्डा का जनाधार और संगठन पर पकड़ आज भी सबसे मजबूत है। वहीं सैलजा दलित और महिला वोट को साधने की कोशिश में हैं। सुरजेवाला अपने संगठन कौशल के लिए जाने जाते हैं। इन तीनों को एक मंच पर लाकर एकजुट करना किसी जादू से कम नहीं होगा। 

यदि प्रदेश प्रभारी संजय दत्त इस काम में सफल हो जाते हैं, तो यकीनन हरियाणा कांग्रेस में बदलाव आएगा। कांग्रेस का सबसे जरूरी काम है युवा और नए चेहरों को मौका देना। हरियाणा में जाट राजनीति के साथ-साथ गैर-जाट, ओबीसी और दलित समीकरण भी हार-जीत तय करते हैं। अगर कांग्रेस सिर्फ पुराने नामों के इर्द-गिर्द घूमती रही तो भाजपा को हराना मुश्किल होगा। 

Saturday, July 11, 2026

कुष्ठ रोगियों के लिए समर्पित किया जीवन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कभी अमर शहीद राजगुरु के साथी रहे बाबा आमटे अहिंसावादी महात्मा गांधी और विनोबा भावे से काफी प्रभावित रहे। महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपने को क्रांतिकारी आंदोलन से अलग कर लिया था और पूरी तरह अहिंसा के मार्ग पर चल पड़े थे। बाबा आमटे का पूरा नाम मुरलीधर देवीदास आमटे था। इनका जन्म 26 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में हुआ था। 

इनके उनके पिता देवीदास हरबाजी आमटे शासकीय सेवा में लेखपाल थे। बरोड़ा से पाँच-छ: मील दूर गोरजे गांव में उनकी जमींदारी थी। उनका बचपन बहुत ही ठाट-बाट से बीता। यह भी कहा जा सकता है कि बाबा आमटे चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए थे। लेकिन एलएलबी की पढ़ाई करने के बाद जब कर्मक्षेत्र में उतरे, तो उन्होंने गरीबों की सहायता, कुष्ठ रोगियों का इलाज ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। 

कहते हैं कि एक बार बाबा आमटे कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे कुष्ठ रोग से ग्रसित तुलसीदास पड़े हुए हैं। पहले तो वह भी आगे बढ़ गए, लेकिन उन्होंने फिर सोचा कि यदि तुलसी दास की जगह वह होते, तो क्या होता? बस, वह लौटकर तुलसीदास के पास आए और उन्होंने उन्हें उठाया। उसकी सेवा की। इस घटना के बाद उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। 

महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में उन्होंने आनंदवन नाम से कुष्ठ रोगियों के लिए एक आश्रम खोला। शुरुआत में इस आश्रम में सात कुष्ठ रोगी थे। आज 180 हेक्टेयर जमीन पर फैला आनन्दवन अपनी आवश्यकता की हर वस्तु स्वयं पैदा कर रहा है। 9 फरवरी 2008 में 94 वर्ष की आयु में बाबा आमटे ने संसार से विदा ली।

गर्मी से राहत तो मिली लेकिन जलभराव ने बढ़ा दी मुसीबत

अशोक मिश्र

पूरे देश में मानसून सक्रिय हो गया है। हरियाणा में भी लगभग सभी जिलों में बरसात हो रही है। भारी बरसात की वजह से कहीं पेड़ गिर रहे हैं, तो कहीं सड़कें धंस रही हैं। नालियां जाम होने की वजह से शहरों की गलियों में पानी जमा हुआ है। सड़कों पर बने गड्ढे राहगीरों के लिए मुसीबत साबित हो रहे हैं। हरियाणा में इस बार भी सड़कें बह गईं, गलियां तालाब बन गईं और गड्ढों में पानी भरकर लोगों की मुश्किलें दोगुनी हो गईं। गुरुग्राम से लेकर करनाल, फरीदाबाद से हिसार और रोहतक से अंबाला तक हालात एक जैसे हैं। 

भारी बरसात के कारण फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, सोनीपत और भिवानी जैसे जिलों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। लोगों को आने जाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बीते दिनों में फरीदाबाद में खेड़ी पुल धंसने से ट्रैफिक वन-वे करना पड़ा, गुरुग्राम में नरसिंहपुर के पास नेशनल हाईवे-48 धंस गया। इन सभी जिलों के निचले इलाकों और अंडरपास में भारी जलभराव हुआ है। पलवल में लगातार बारिश से सड़कें जलमग्न होने की खबर है जिसकी वजह से मुख्य मार्गों पर लंबा ट्रैफिक जाम देखा गया। 

सोनीपत के रोहट में प्राइमरी हेल्थ सेंटर की बिल्डिंग भरभरा कर गिर गई। यहां पर सड़कें तालाब बन गईं। ऐसी हालत में लोगों का आवागमन बाधित हो रहा है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए जलभराव वाली सड़कें मुसीबत का कारण बन रही हैं। ऐसी स्थिति में सड़कों के किनारे खुले मैनहोल हादसे को न्यौता दे रहे हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों में तो हालात शहरों से भी ज्यादा खराब हैं। गांव के कच्चे रास्ते कीचड़ से भरे हुए हैं। कीचड़ भरे रास्तों में आना-जाना काफी मुश्किल है। 

इन्हीं रास्तों से होकर दोपहिया और चारपहिया वाहन आ जा रहे हैं। इन्हीं रास्तों से होकर बच्चों को स्कूल आना-जाना पड़ रहा है। सब्जी और अन्य सामान बेचने वाले लोगों को भी इन्हीं रास्तों से होकर गुजरना पड़ रहा है। सिरसा, भिवानी, जींद जैसे जिलों में ग्रामीण सड़कों की हालत इतनी खराब है कि एंबुलेंस तक समय पर नहीं पहुंच पाती है। गांवों और शहरों में जलभराव की वजह से मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है। ऐसे में डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया जैसे रोगों के फलाने का खतरा बढ़ता जा रहा है। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हर साल बरसात से पहले करोड़ों रुपये सड़कों और नालियों की सफाई पर खर्च होने के दावे किए जाते हैं, फिर नतीजा वही क्यों रहता है। हर बार ऐसा क्यों महसूस होता है कि योजना कागजों तक सीमित रह जाती है। फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे तेजी से बढ़ते जिलों में शहरीकरण की रफ्तार के साथ बुनियादी सुविधाएं नहीं बढ़ीं। कई शहरों में पानी निकलने की जगहें बंद कर दी गईं, निचले इलाकों में कॉलोनियां बन गईं और नतीजा यह कि थोड़ी सी बारिश में ही घरों में पानी घुस जाता है।

Friday, July 10, 2026

तुम बेटी का ध्यान रखना


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एक मां दुनिया में सबसे ज्यादा अपनी संतान को प्यार करती है। अगर कभी उसके सामने पिता, पति और संतान में से किसी एक को चुनने की कठिन घड़ी आ जाए, तो वह निश्चित रूप से अपनी संतान को चुनेगी। ऐसी मान्यता है। कई मामलों में यह सत्य भी साबित हुआ है। एक बार की बात है। एक दंपति समुद्री जहाज पर यात्रा कर रहा था। समुद्री यात्रा के दौरान जहाज का निचला हिस्सा टूट गया। 

जहाज डूबने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने लाइफ बोट निकाली। ज्यादातर यात्री लाइफबोट पर चले गए। दंपति ने देखा कि लाइफबोट पर अब केवल एक ही आदमी की जगह है। दंपति ने एक दूसरे को देखा। पति ने पत्नी को तत्काल छलांग लगाई और लाइफबोट पर जा गिरा। डूबते जहाज पर खड़ी पत्नी ने अपने पति से केवल इतना कहा, बेटी का ध्यान रखना। इसके बाद जहाज डूब गया। 

उस महिला की मौत हो गई। लाइफबोट के सहारे पति किनारे पहुंचा। उसने अपनी बेटी का अच्छी तरह से पालन-पोषण किया। उसने अपनी बेटी के पालन-पोषण में किसी तरह की कमी नहीं रहने दी। एक दिन वह भी आया, जब उस आदमी की मौत हो गई। इस घटना को कई साल बीत गए। एक दिन जब उस आदमी की बेटी घर की सफाई कर रही थी, तो उसे एक डायरी मिली। उसको पढ़ने के बाद पता चला कि उसकी मां को एक गंभीर बीमारी हो गई थी। कुछ दिनों बाद उसकी मौत निश्चित थी। 

उसके पिता ने सोचा कि यदि मैं जहाज पर रुकता हूं, तो मेरी मौत निश्चित हो जाएगी। उधर पत्नी की भी मौत निश्चित है। ऐसी स्थिति में यदि वह बच जाता है, तो वह अपनी बेटी का पालन-पोषण कर सकता है। यही सोचकर उसने पत्नी को जहाज में ही छोड़कर लाइफबोट में कूदने का फैसला किया। उसकी पत्नी भी उसके फैसले से सहमत थी। लेकिन उसे जीवन भर अपनी पत्नी की कमी खलती रही।

सरकारी मशीनरी को चलाने में कम नहीं है संविदा कर्मियों की भूमिका

अशोक मिश्र

किसी भी महिला की गर्भावस्था की अवधि उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस समय महिला को सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की होती है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ रहे। मानसिक शांति के साथ-साथ परिवार का सहयोग और आर्थिक मजबूती बहुत जरूरी होती है। यदि महिला कार्यरत है, तो उसे सरकार या जिस संस्था में वह कार्यरत है, उससे भी उसे भरपूर सहयोग मिले। स्थायी कर्मचारियों को जो गर्भावस्था के दौरान सुविधाएं मिलती हैं, वह गर्भवती संविदा कर्मियों को भी मिले, ऐसी उम्मीद करना कोई गलत भी नहीं है। 

लेकिन हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चांदपुरा गांव के वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में  संविदा पर कार्यरत शिक्षिका को इस मामले में निराश ही होना पड़ा। शिक्षिका की नियुक्ति 16 मार्च 2024 को हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से हुई थी। नौकरी के दौरान उसे गर्भावस्था संबंधी गंभीर समस्याएं हो गईं। चिकित्सकों ने उसे नौ महीने तक बेड रेस्ट की सलाह दी। शिक्षिका ने डॉक्टर की सलाह के मुताबिक अपने विभाग से मेडिकल अवकाश मांगा, लेकिन उसे मेडिकल अवकाश देने की जगह 16 मार्च 2026 को नौकरी से ही हटा दिया गया। जबकि दूसरे संविदा कर्मियों की नियुक्ति अवधि बढ़ा दी गई। 15 अप्रैल 2026 को शिक्षिका ने बच्चे को जन्म दिया और वह अपने निष्कासन के खिलाफ अदालत गई। 

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मां बनने की कीमत नौकरी नहीं हो सकती है। अदालत ने शिक्षिका की सेवा को बहाल करने के साथ-साथ अन्य सुविधाएं प्रदान करने का आदेश दिया है। हरियाणा समेत देश के कई राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विभागों में हजारों महिलाएं संविदा के आधार पर काम कर रही हैं। ये नर्सें, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षिका और क्लर्क सरकारी मशीनरी को चलाने में उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं जितनी नियमित कर्मचारी। फर्क सिर्फ इतना है कि इनके पास नौकरी की सुरक्षा नहीं है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर कई बार प्रबंधन गर्भावस्था की सूचना मिलते ही अनुबंध खत्म कर देता है। तर्क दिया जाता है कि संविदा की अवधि पूरी हो गई या पद की जरूरत नहीं रही। 

पर संयोग इतना साफ होता है कि बर्खास्तगी का पत्र उसी महीने आता है जब महिला मातृत्व अवकाश मांगती है। समस्या यह भी है कि संविदा प्रणाली को लचीलेपन के नाम पर इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसमें सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान ही नहीं हैं। न पीएफ, न ईएसआई, न मातृत्व अवकाश। विभाग काम तो पूरा लेते हैं पर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं। गर्भवती महिला को काम से निकाल देना न केवल अमानवीय है बल्कि उस विकास के दावे को भी खोखला करता है जिसमें हम बेटी बचाओ और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। जब महिलाएं सशक्त होंगी, तो देश भी सशक्त और विकसित होगा।

नफरत को फैलने से रोक सकता है केवल खेल


संजय मग्गू

भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोगों के बीच नफरत का माहौल देखने को मिल रहा है। नफरती माहौल का कारण धर्म कतई नहीं है। दुनिया के किसी भी धर्म ने नहीं कहा कि तुम दूसरी जाति, धर्म, संप्रदाय या भाषा भाषी के साथ नफरत करो। लेकिन यह भी सच है कि दुनिया में नफरत बढ़ रही है। इसके पीछे केवल और केवल सियासत है। राजनीति अपने फायदे के लिए लोगों को आपस में लड़ा रही है। एक दूसरे से नफरत करने की सीख दे रही है, बढ़ावा दे रही है। ऐसी स्थिति में जब दुनिया भर के धर्म गुरु लोगों को यह शिक्षा दे रहे हैं कि एक इंसान का दूसरे इंसान से नफरत करना, धर्म के खिलाफ है, तो फिर नफरत का विस्तार रुक क्यों नहीं रहा है? 

इसका कारण यह है कि राजनीति ने अब धर्म का लबादा ओढ़ रखा है। धर्म में भी राजनीति का प्रवेश हो चुका है। ऐसी स्थिति में तमाम धर्म उपदेश, संत, महात्मा और धार्मिक गुरु विफल हो रहे हैं। तो सवाल यह उठता है कि क्या नफरत के विस्तार को रोका नहीं जा सकता है? जरूर रोका जा सकता है। नफरत के विस्तार पर अगर कोई रोक लगा सकता है, तो वह है खेल। खेल में ही वह कूबत है, जो नफरत के विस्तार को रोक सकता है। कोई भी खेल हो, उसे खेलने में दो या दो से अधिक लोगों की जरूरत पड़ती है। 

अगर आप खेलते समय खिलाड़ियों के हावभाव, क्रिया कलाप पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि एक सच्चा खिलाड़ी जब खेल रहा होता है, तो वह जाति, धर्म, भाषा, प्रांत और संप्रदाय जैसी बातों से ऊपर उठ चुका होता है। क्रिकेट हो या फुटबाल अथवा रग्बी जैसे खेल हों, जहां टीम की जरूरत होती है, तो उस टीम में एक ही भाषा-भाषी, एक ही प्रांत, एक ही धर्म-जाति अथवा संप्रदाय के खिलाड़ी नहीं होते हैं। विभिन्न जाति, धर्म या प्रांत के खिलाड़ी टीम में शामिल किए जाते हैं। जब खेल शुरू होता है, तो टीम का प्रत्येक सदस्य बस खिलाड़ी होता है। वह यह भूल जाता है कि वह किस धर्म का है, किस जाति का है और उसके साथी उससे भिन्न हैं। खेल के मैदान पर हर खिलाड़ी का साथी जोश और जुनून होता है। 

वह बस यही जानता है कि टीम का प्रत्येक सदस्य उसका साथी है और उसे हर हालत में प्रतियोगिता जीतनी है। उस समय कोई भी हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई नहीं होता है। दर्शक भी खेल देखते समय जातीयता, धार्मिकता, प्रांतीयता जैसी भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता की भावना से ओत प्रोत होते हैं। वह केवल अपने देश को जीतता हुआ देखना चाहते हैं। यदि मैं दो प्रांतों के बीच हो रहा है, तो हर दर्शक अपने प्रांत को ही जीतता हुआ देखने की ख्वाहिश रखते हैं। 

अच्छा प्रदर्शन होने पर विरोधी टीम की प्रशंसा करने में भी पीछे नहीं रहते हैं। इसका उदाहरण पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में कई बार सामने आ चुका है, जब खिलाड़ी ने सब कुछ भुलाकर प्रतिस्पर्धी टीम की तारीफ की है। खेल खिलाड़ी को एकजुट रहने का संदेश देती है, अलगाव या नफरत का नहीं। खेल ही लोगों में प्रेम का प्रस्फुटन करा सकता है। यह क्षमता केवल खेल में है।