Monday, March 2, 2026

तुम किसी और की मदद कर देना


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जरूरत के समय किसी की मदद करना और उसे भूल जाना सज्जन व्यक्ति का काम है। इस दुनिया में ऐसे बहुत से लोग जीवन में कभी न कभी मिल जाते हैं जो लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं। लेकिन ऐसे लोग बहुतायत में मिलेंगे जो किसी की मदद करने के बाद लोगों के बीच चर्चा करते रहते हैं कि अमुक व्यक्ति की उन्होंने संकट के समय सहायता की थी। 

फ्रैंकलिन बेंजामिन एक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ प्रकाशक थे। वह संपादक होने के साथ-साथ राजनेता और राजनयिक भी थे। उन्हें अमेरिका का संस्थापक होने के भी सौभाग्य हासिल हुआ था। वह अमेरिका के अमीर लोगों में से एक थे। उनका बचपन काफी संकटों में बीता था। जब वह अपने जीवन के शुरुआती दिनों में संकट में थे, तो उन्होंने अपने एक मित्र से कुछ मुद्राएं उधार ली थीं। 

उन दिनों वह एक समाचार पत्र प्रकाशित कर रहे थे। बीमार पड़ जाने की वजह से कई दिनों तक उनका अखबार नहीं निकला था। अखबार से भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हो रहा था। ऐसी स्थिति में उन्हें अपने मित्र से उधार मांगने की नौबत आ गई थी। उनके मित्र ने उनकी भरपूर मदद भी की थी। इस बात को काफी दिन बीत गए। एक दिन वह अपने मित्र के पास गए और उसके सामने कुछ मुद्राएं रखकर बोले, मित्र, यह रही तुम्हरी रकम। मित्र ने पूछा, किस बात की रकम।

 फ्रैंकलिन ने कहा कि एक बार मैंने आपसे कुछ मुद्राएं उधार ली थीं। अब मेरे पास पैसा है, तो आपकी रकम लौटाना चाहता हूं। उन्होंने पूरी घटना बताई। तब उनके मित्र ने कहा कि यह रकम तुम अपने पास रखो। जब तुम्हें कोई जरूरतमंद मिल जाए तो तुम उसकी मदद कर देना और रकम वापस मत मांगना। फ्रैंकलिन ने बाद में ऐसा किया भी, लोगों की भरपूर मदद की।

त्यौहार आते ही मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री ने पकड़ा जोर


अशोक मिश्र

होली त्यौहार को पूरे भारत में बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। सर्दियों के बीतने के तुरंत बाद आने वाले इस त्यौहार में खुशियां मानो छलक ही पड़ती हैं। होली के मौके पर घरों में विभिन्न पकवान और मिठाइयां बनाई जाती हैं। तीन-चार दशक पहले लोग मिठाइयां और पकवान घर पर ही बनाते थे। मिठाइयों में उपयोग की जाने वाली अधिकतर सामग्री भी उनके घर में ही उपलब्ध रहती थीं, इसलिए मिलावटी सामान मिलने की गुंजाइश भी बहुत कम रहती थी। उस दौर में दुकानदार भी मिलावट करने से कतराते थे। लेकिन आज इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में मिलावटी खाद्य पदार्थों की भरमार दिखाई देती है। ज्यादातर मिठाइयां और अन्य पदार्थ मिलावटी होते हैं। 

दुकानदार मुनाफा कमाने की होड़ में लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हैं। कई दुकानों पर तो बासी और फफूंद लगी मिठाइयों को भी बेच दिया जाता है। बेचने वाला इस बात पर ग्लानि नहीं महसूस करता है कि इन बासी और मिलावटी मिठाइयों और पकवानों को खाकर लोग बीमार पड़ जाएंगे। हालात बिगड़ने पर उनकी मौत भी हो सकती है। यही वजह है कि त्यौहार आने से कुछ दिन पहले ही भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने लोगों को सावधानी बरतने के लिए चेतावनी जारी की है। 

तीज-त्यौहारों पर सबसे ज्यादा मिलावटी दूध और उससे बनने अन्य उत्पाद बेचे जाते हैं। होली के अवसर पर मिलावटी पनीर, खोया आदि बिकता है। हरियाणा में भी त्यौहार के मद्देनजर खाने-पीने और मिठाइयों की दुकानों पर छापे मारे जा रहे हैं। खाद्य पदार्थों के सैंपल भरे जा रहे हैं। मिलावटी खाद्य पदार्थ पाए जाने पर जुर्माना ठोका जा रहा रहा है। इसके बावजूद मिलावटी सामानों की बिक्री पर पूरी तरह रोक नहीं लग पा रही है। सच तो यह है कि मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री के न रुकने का कारण हमारे प्रदेश के बाजार की संरचना और संसाधनों की कमी है। लगभग तीन करोड़ आबादी वाले हरियाणा प्रदेश खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की संख्या पर्याप्त नहीं है। राज्य में जितने भी खाद्य पदार्थों के सैंपल भरे जाते हैं, उनकी टेस्टिंग रिपोर्ट आने में ही पंद्रह से बीस दिन लग जाते हैं। 

ऐसी स्थिति दुकानदार तब तक अपना मिलावटी माल बेच चुका होता है। लगने वाला जुर्माना भी बहुत ज्यादा नहीं होता है, इसकी वजह से मिलावट का बाजार सरगर्म रहता है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट 2025 के अंतर्गत मिलावटी पदार्थ खाने से किसी की मौत होने पर आजीवन कैद या दस लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन ऐसे ज्यादातर मामलों को अदालत में साबित कर पाना आसान नहीं है। 

ऐसी स्थिति में मिलावटी खाद्य पदार्थ बेचने वाले ज्यादातर व्यापारी अदालत से छूट जाते हैं। इसके लिए अगर अलग से फास्ट ट्रैक बनाकर जल्दी-जल्दी मामले निपटाए जाएं तो मिलावट कुछ हद तक रुक सकती है।

Sunday, March 1, 2026

चार आलसी बेटे और खेत में गड़ा सोना

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता है। मेहनती आदमी कभी शांत नहीं बैठता है। वह कुछ न कुछ करता रहता है ताकि उसकी मेहनत की आदत बनी रहे। आलसी आदमी मेहनत करने से कतराता है। वह कुछ करने की जगह खयाली पुलाव पकाता रहता है। लेकिन उसके हाथ कुछ नहीं लगता है। ऐसी ही एक कथा है जिसमें एक मेहनती किसान ने अपने जीवन के अतिंम क्षणों में अपने चार बेटों को मेहनत करने का क्या परिणाम होता है, यह समझा दिया। 

यह कथा वैसे तो हम सबने सुनी ही होगी, लेकिन एक बार और सही। किसी गांव में एक किसान था। बहुत मेहनती था। उसके पास खेत तो कम थे, लेकिन मेहनत करने की वजह से गुजारा ठीकठाक चल जाता था। उसके चार बेटे थे। चारों बेटे बहुत आलसी थे। किसान जब भी खेतों में काम करने को कहा, वह टाल जाते थे। इससे किसान बहुत चिंतित रहता थ। उसने लाख प्रयास किए, लेकिन उसके बेटे नहीं सुधरे। 

आखिर वह समय भी आया, जब किसान बूढ़ा हो गया और बीमार पड़ा। बीमारी की वजह से वह जान गया कि उसका अंत निकट है। उसने अपने बेटों से कहा कि उसने खेत में सोना गाड़ रखा है, लेकिन वह स्थान उसे ठीक-ठीक याद नहीं है। इतना कहने के बाद उसकी मौत हो गई। शोक दूर होने पर बेटों को पिता की बात याद आई। उन चारों ने मिलकर पूरे खेत को खोद डाला, लेकिन सोना नहीं मिला। 

अंत में उन्होंने सोचा कि जब खेत की खोदाई कर ही ली है, तो क्यों न बीज बो दिया जाए। समय पर उसकी सिंचाई भी की। उस साल अच्छी फसल हुई। जरूरत भर का रखने के बाद बेचने पर अच्छा मुनाफा भी हुआ। वह अब समझ गए थे कि उनका पिता उन्हें क्या सिखाना चाहता था।

लावारिस पशुओं से मुक्ति की राह देखती हरियाणा की सड़कें

अशोक मिश्र

हरियाणा में लावारिस पशु एक बड़ी मुसीबत बनते जा रहे हैं। लावारिस पशुओं को पकड़कर उन्हें गौशालाओं तक पहुंचाने के लिए राज्य सरकार कई बार विशेष अभियान तक चलाया है। सरकार ने तो कुछ महीनों के भीतर सड़कों को लावारिस पशुविहीन करने की घोषणा तक की थी, लेकिन सड़कें अभी तक लावारिस पशुविहीन नहीं हुई हैं। पिछले साल 1 से 31 अगस्त 2025 तक प्रदेश के सभी जिलों में एक विशेष अभियान चलाया गया था ताकि सड़कें पशुओं से मुक्त हो सकें। काफी संख्या में लावारिस पशुओं को पकड़कर उनकी टैगिंग की गई थी और उन्हें विभिन्न गौशालाओं में पहुंचाया गया था। गौशालाओं में क्षमता से ज्यादा पशु रखे गए। वैसे तो राज्य सरकार ने पशुपालन विभाग के माध्यम से चार जिलों में विशेष 'गौ अभ्यारण्य' स्थापित करने की योजना बनाई है ताकि आवारा पशुओं को स्थायी आश्रय मिल सके। 

एक अनुमान के मुताबिक पिछले कुछ सालों में लावारिस पशुओं की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है। अनुमान लगाया जाता है कि प्रदेश में पांच लाख से अधिक पशु लावारिस हैं। जिनमें से साढ़े चार लाख पशुओं को गौशालाओं में भेजा जा चुका है। इसका मतलब यही है कि पचास हजार से अधिक लावारिस पशु सड़कों पर हैं। यह भी कहा जाता है कि हर साल लगभग 50 हजार नए लावारिस पशु इसमें जुड़ जाते हैं। प्रदेश के 750 से अधिक पंजीकृत/अपंजीकृत गौशालाओं में 4.5 लाख से अधिक मवेशी हैंजो क्षमता से अधिक और दबाव में हैं। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम, हिसार जैसे कई शहरों में लावारिस पशु बड़ी संख्या में पाए जाते हैं जिसकी वजह से होने वाले हादसों में लोग अपना जीवन गंवा रहे हैं। कुछ लोग स्थायी रूप से दिव्यांग भी हो जाते हैं जिसकी वजह से वह परिवार पर एक तरह से बोझ बनकर रह जाते हैं। सड़कों पर घूमते लावारिस पशु प्रदेश में होने वाले पंद्रह प्रतिशत हादसों के लिए जिम्मेदार हैं। लावारिस पशु कब आपस में ही लड़ने लगेंगे, यह नहीं कहा जा सकता है। इस आपसी भिड़ंत के चलते इनके पास से गुजरने वाले राहगीर और वाहन चालक हादसे का शिकार हो जाते हैं। वैसे तो पशुओं के हमले या दुर्घटना में मृत्यु/स्थायी दिव्यांगता होने परहरियाणा सरकार 'दयालु-कक' योजना के तहत तीन लाख रुपये तक का मुआवजा प्रदान कर रही है। 

1 अगस्त 2024 से 31 दिसंबर 2025 के बीच 38 शहरों में 49,500 से अधिक पशुओं को आश्रय में भेजा गयाऔर मालिकों पर 421 चालान किए गए। उनसे जुर्माना वसूला गया। राज्य सरकार ने संबंधित विभागों को सख्य आदेश दे रखा है कि जो डेयरी संचालक अपने पशुओं को सड़कों पर छोड़ते हैं, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज किया जाए और उनसे भारी जुर्माना वसूला जाए। लगभग सभी शहरों में नगर निगम अलग से अभियान चलाता रहता है, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकल रहा है। 

Saturday, February 28, 2026

लोहिया ने अंग्रेजी हुकूमत की खोल दी पोल


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डॉ. राम मनोहर लोहिया को समाजवादी विचारक माना जाता है। उनका जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर जिले में मारवाड़ी बनिया परिवार में हुआ था। जब वह दो साल के थे, तो उनकी माता का निधन हो गया। स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले उनके पिता हीरा लाल लोहिया ने दूसरा विवाह करने की जगह अपने बेटे के पालन पोषण का जिम्मा लिया। 

लोहिया ने बीएचयू से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की और 1929 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले विद्यासागर कालेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह इंग्लैंड चले गए, लेकिन वहां का वातावरण रास नहीं आया। तो वह जर्मनी के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में पीएडी करने चले गए। इस दौरान लोहिया का अपने पिता से पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। 

उनके पिता भारत में अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अत्याचार के बारे में अपने पत्रों में जिक्र किया करते थे। इससे लोहिया के मन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रोष पैदा होता चला गया। उसी दौरान एक घटना घटी। उन्हीं दिनों जिनेवा में लीग आफ नेशन्स का अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में कई देशों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भारत से बीकानेर के महाराज भी अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे। 

अधिवेशन में अंग्रेजी शासन की जमकर प्रशंसा की गई, इस बात को लोहिया बरदाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों की फांसी का उल्लेख किया। इससे दुनिया भर में अंग्रेजी हुकूमत की सच्चाई सबके सामने आई। भारत आने के बाद लोहिया ने स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी और समाजवादी विचारधारा को प्रसारित किया।

खनन मामले में सुप्रीमकोर्ट लेगा पहले विषय विशेषज्ञों की राय


अशोक मिश्र

अरावली पर्वत माला के संबंध में सुप्रीमकोर्ट ने बिलकुल उचित ही कहा है कि जब तक विशेषज्ञों की रिपोर्ट नहीं आ जाती है, तब तक अरावली क्षेत्र में सारी गतिविधियों को यथावत रखा जाए। गुरुवार को अरावली मामले की सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि कोर्ट इस बारे में विशेषज्ञों की राय लेगा कि अरावली क्षेत्र में खनन की इजाजत दी जा सकती है या नहीं। 

यदि खनन की इजाजत दी जा सकती है तो किस स्तर तक खनन की इजाजत दी जा सकती है। अरावली क्षेत्र में होने वाले खनन की देखरेख का जिम्मा किसका रहेगा,यह भी तय करना बहुत जरूरी है। बहरहाल, सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने फैसले की भी समीक्षा करेगा। गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट ने जो कहा है, उससे लगता है कि अरावली क्षेत्र में खनन के मामले को लेकर कोर्ट पूरी तरह गंभीर है और जब तक वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाएगा, देखरेख की जिम्मेदारी तय नहीं हो जाएगी, तब तक वह किसी प्रकार की इजाजत नहीं देगा। 

सुप्रीमकोर्ट के रवैये से पर्यावरण प्रेमी और अरावली को बचाने की मुहिम में लगे लोगों को बहुत बड़ी राहत मिली है।  पिछले साल के नवंबर महीने में सुप्रीमकोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति द्वारा सुझाई गई परिभाषा को स्वीकार कर लिया था। नई परिभाषा के अनुसार, वही पहाड़ियां अरावली क्षेत्र के अंतर्गत मानी जाएंगी जिसकी स्थानीय ऊंचाई सौ मीटर या उससे अधिक हो। साथ ही दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों के पांच सौ मीटर के दायरे में होने पर ही उन्हें अरावली क्षेत्र में माना जाएगा। 

बाद में इस नई परिभाषा को लेकर विवाद पैदा हो गया। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में इसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। कुछ लोगों ने एक बार फिर अरावली क्षेत्र को बचाने के लिए सुप्रीमकोर्ट की ही शरण ली। इसका फायदा भी हुआ। अदालत ने अपने ही फैसले पर रोक लगाते हुए सुनवाई शुरू की है। इस बार की सुनवाई में हर पहलू पर खुद शीर्ष अदालत ध्यान दे रही है। वैसे यह बात सही है कि पिछले कुछ दशकों से अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान की वजह से यहां का जलवायु संतुलन गड़बड़ा गया है। 

इसका कारण अरावली क्षेत्र में दिनोंदिन बढ़ता अतिक्रमण, वनों की अवैध कटाई, अवैध खनन और शहरी संरचना का बढ़ता क्षेत्रफल माना जा रहा है। पिछले दिनों अरावली के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन पर सांकला फाउंडेशन में शोध किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैध खनन, वनों की कटाई और अरावली के इर्द-गिर्द किए गए पक्के निर्माणों ने भूजल रिचार्ज, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला है जिसकी वजह से अरावली पर्वत माला के पारिस्थितिक तंत्र बुरा असर डाला है। 

दरवाजे पर दस्तक दे रही है होली, उठिए ! जी खोलकर स्वागत कीजिए


अशोक मिश्र

लीजिए, वर्ष, महीना, सप्ताह और दिन की पगडंडियां तय करती हुई किसी नवयौवना की तरह होली आपके दरवाजे पर दस्तक दे रही है. उठिए और उसका खुले दिल से स्वागत कीजिए। फागुनी बयार ने आपके तन-मन को पहले से ही मदमस्त कर रखा है, ऐसे में फिर काहे का लिहाज और काहे का संकोच. उठिए, उन्हें प्रेम के रंग से सराबोर कर दीजिए, जिनसे साल भर आपने खुले मन से बात नहीं की है. कई महीने पहले किसी से हुई लड़ाई या 'तू.. तू.. मैं.. मैं' की गांठ अब भी आपके मन में अगर पड़ी हुई है. तो जनाब, उस गांठ को खोलिए और रंग, अबीर और गुलाल लेकर जुट जाइए। होलिकोत्सव मनाने को. फिर देखिए इस बार की होली में आपको कितना मजा आता है. हर साल फागुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला हर्षोल्लास का त्योहार होली इस बात का संदेश देता है कि परेशानियों और संकटों से घबराकर बैठ जाने का नाम नहीं है जिंदगी। जिंदगी तो होली के रंगों की तरह चारों ओर बिखरकर खुद हंसने-मुस्कुराने और लोगों को हंसने-मुस्कुराने पर मजबूर कर देने का नाम है,

जानते हैं, होलिकोत्सव का दूसरा नाम मदनोत्सव है. वैसे तो फाल्गुन का पूरा महीना ही कामदेव यानी मदन को समर्पित है. तन को कंपा देने वाली ठंड कम होते ही मन और तन में एक नए उत्साह का संचरण होने लगता है. फागुन महीने में वातावरण भी सुहावना होता है. न अधिक गर्मी और न ही अधिक सर्दी। बस, इसी लिए आम के साथ-साथ आदमी का मन भी बौराने लगता है। कहते हैं कि फागुन के महीने में साठ साल के पोपले मुंह वाले बाबा भी देवर लगने लगते हैं। हंसी ठिठोली, मनोविनोद का एक मदमस्त कर देने वाला दौर चलने लगता है। घूंघट की आड़ से नवयौवनाएं नयनों के तीर इतनी कसकर मारती हैं कि उसके इर्द-गिर्द मंडराने वाले रूप लोलुपों यानी भंवरों के जिगर के आरपार हो जाते हैं नयनों के ये तीर। सामाजिक वर्जनाएं कमजोर होने लगती हैं। मर्यादाओं का स्थान अश्लील गीत संगीत ले लेते हैं। लेकिन यह सब कुछ सिर्फ एक दिन के लिए होता है। कहीं-कहीं पर तो यह सिलसिला पूरे सात आठ दिन तक चलता है। इन दिनों ऐसा लगता है कि आदमी अपनी साल भर में संचित की गई विषय वासनाओं को अंतरमन से उलीच कर फिर साल भर के लिए पाक साफ हो जाना चाहता है। वैसे तो किसी न किसी रूप में होली पूरे देश में मनाई जाती है। 

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड, दिल्ली, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश आदि जगहों पर होली की छटा देखते ही बनती है. लेकिन उत्तर भारत में भी ब्रज (बरसाने की होली) और अवध की होली विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, विभिन्न क्षेत्रों में मनाई जाने वाली होलियों पर उस क्षेत्र में आराध्य देवों के गुणों का भी प्रभाव दिखाई देता है. अब ब्रज यानी बरसाने की होली को ही लें। यहां मनाई जाने वाली होली का रंग ही कुछ निराला है। ब्रज क्षेत्र में मथुरा, वृंदावन, नंदगांव और बरसाना (राधा के गांव) में बड़ी धूमधाम से होली मनाई जाती है. ब्रज क्षेत्र के आराध्य देव हैं कृष्ण. (वैसे तो पूरे देश में श्रीकृष्ण की आराधना-पूजा की जाती है।) ब्रजवासियों के नायक श्रीकृष्ण माखनचोर हैं, गोपियों के साथ रास रचाते हैं, लीलाएं करते हैं। मौका पड़ने पर अपनी मां से झूठ भी बोलते हैं। ऐसे में होली पर उनके इन गुणों का प्रभाव न पड़े, ऐसा हो ही नहीं सकता है। यही वजह है कि यहां के गीतों, लोकगीतों और फागों में मस्ती का पुट तो होता ही है, अश्लीलता भी खूब घुली-मिली होती है। ब्रज साहित्य में होली से जुड़े जितनी रचनाएं मिलती हैं, उनका एक अलग ही रंग है, ब्रज क्षेत्र में फागुन पूर्णिमा से पहले और उसके बाद आठ दिन तक महिलाओं, युवतियों, बच्चों, बूढ़ों और युवकों की भीड़ जो धमाल मचाती है, वह देखते ही बनता है। यहां की होलिकोत्सव में रंगों का इस्तेमाल तो होता ही है, अश्लील गीतों की भी भरमार होती है। 'नैन नचाय कहयो मुस्काय लला फिर अड़यो खेलन होरी...' जैसे गीत अब कहां सुनने को मिलते हैं। बड़े-बड़े डेक या लाउडस्पीकर लगाकर ऐसे-ऐसे गीत बजाए जाते हैं कि शर्म से आंखें गड़ जाती हैं. इन गीतों के बजने तक बेटी बाप से, भाई-बहन से आंख चुराने लगते हैं।

बरसाने की लठमार होली का कहना ही क्या है। पुरुष साल भर तक अपनी प्रियतमा की एक लाठी खाने का इंतजार करते हैं। होलिकोत्सव के दिन उनकी प्रियतमा भी बिना किसी लाज-शर्म के उन पर लाठियां बरसाती रहती है। पुरुष उसकी इस अदा पर सौ-सी जान से कुरबान होता जाता है और लाठियां खाता जाता है। रंगों, फूलों और अबीर-गुलाल से रची-बसी बरसाने की होली देखने तो दूरदराज से लोग आते हैं। विदेशी भी इसे देखने आते हैं, तो वे भी यहां के वातावरण की मस्ती में अपनी सुध-बुध खोकर होली खेलने लगते हैं।

वहीं अवध क्षेत्र के आराध्य देव श्रीराम हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। यही वजह है कि होलिकोत्सव कुछ दशक पहले तक मर्यादित था. लोकगीतों और फागों में एक मधुरता थी, शालीनता थी। अयोध्या के राजा दशरथ, उनकी तीनों रानियों, श्रीराम और उनके सभी भाइयों से संबंधित लोकगीत और फाग गाए जाते थे। इन गीतों और लोकगीतों की रचनाएं कब हुई, नहीं कहा जा सकता है। हां, गोस्वामी तुलसी की होली से संबंधित रचनाएं भी खूब गाई जाती थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे उसमें भी अश्लीलता और भौंडेपन का समावेश होने लगा है। आधुनिक परिवेश में होली का वह लालित्य कहीं खो सा गया है, जो आज से चार-पांच दशक पहले पूरे देश में देखने को मिलता था।

होली का उल्लास भी अब कुछ धीमा पड़ने लगा है। महंगाई ने होली के उल्लास को निगल सा लिया है। इन दिनों होली के नाम पर इतने आडंबर रखे जाने लगे हैं कि लोग उन आडंबरों के लिए अपने दैनिक खर्चों में कटौती करके भी उसे पूरा नहीं कर पाते हैं। शराब, मिठाइयों और अन्य दूसरे मद में खूब पैसा खर्च किया जाने लगा है। नशा करके होली मनाने की लत ने होलिकोत्सव की मस्ती को जैसे खत्म ही कर दिया है। नशे में झूमती युवकों की भीड़ से बचकर निकल जाने में ही अब लोग भलाई समझने लगे हैं। यदि हम नशे का सेवन किए बिना होलिकोत्सव मनाते हैं, उससे कहीं ज्यादा खुशी मिलती है। इन तमाम परेशानियों और दिक्कतों के बावजूद आइए, हम खुले मन से होली मनाएं। प्रेम के रंग में खुद तो सराबोर हों ही, दूसरों को भी उसी रंग से सराबोर कर दें।

Friday, February 27, 2026

सज्जन की उपाधि खरीदी या बेची नहीं जा सकती

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया के इतिहास में एक ऐसा भी राजा हुआ है जिसने उपाधियां पैसे लेकर बांटी थी। ऐसे राजा का नाम है जेम्स चार्ल्स स्टुअर्ट। इनका जन्म  सन 1566 में हुआ था। स्टुअर्ट एक लेखक भी थे। उन्होंने डेमोनोलॉजी (1597) और बेसिलिकॉन डोरॉन (1599) जैसी रचनाएँ लिखीं। उनके द्वारा प्रायोजित बाइबिल का अंग्रेजी अनुवाद 'किंग जेम्स संस्करण' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 

एलिजाबेथ प्रथम के निधन के बाद उन्हें राजगद्दी मिली थी, लेकिन बाद में वह स्कॉटलैंड, ब्रिटेन और आयरलैंड के शासक बने। तभी से उन्होंने अपने को ग्रेट ब्रिटेन का राजा कहना शुरू किया। यह तो सभी जानते हैं कि शासन व्यवस्था चलाने के लिए काफी धन की जरूरत होती है। 

राजकोष का धन बढ़ाने के लिए उन्होंने कई उपाय किए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसलिए उन्होंने लोगों से मोटी रकम लेकर उपाधियां बांटनी शुरू की। उन्होंने बहुत सारे लोगों को लॉर्ड, ड्यूक, प्रिंस जैसी तमाम उपाधियां पैसे लेकर बांटी। वह इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि इन उपाधियों को हासिल करने वाला व्यक्ति समाज में अपने अहंकार को तुष्ट करना चाहता है। 

उपाधि हासिल कर लेने से कोई महान नहीं हो जाता है। एक दिन वह दरबार मं बैठे तो एक आदमी ने आकर उनसे कहा कि  उसे सज्जन की उपाधि चाहिए। इसके लिए चाहे जितनी रकम खर्च करनी पड़े। स्टूअर्ट ने कहा कि मैं तुम्हें राजवंश से जुड़ी उपाधियां दे सकता हूं। तुम्हें लॉर्ड बना सकता हूं, ड्यूक बना सकता हूं, लेकिन सज्जन की उपाधि नहीं दे सकता हूं क्योंकि सज्जनता खरीदी या बेची नहीं सजा सकती है। इसे अपने कर्म और व्यवहार से कमाना पड़ता है। वह आदमी निराश होकर चला गया।

हरियाणा में सीएमश्री स्कूलों से गरीब बच्चों का सुधरेगा भविष्य


अशोक मिश्र

बेरोजगारी को छोड़कर देश में रहने वाले नागरिकों की दो प्रमुख समस्याएं हैं। पहली स्वास्थ्य और दूसरा शिक्षा। देश की बहुसंख्यक आबादी को स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का दंश झेलना पड़ता है। वहीं अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर भी उन्हें चिंतित होना पड़ता है। नागरिकों की शिक्षा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए सैनी सरकार ने सीएमश्री स्कूलों को खोलने की योजना तैयार की है। 

प्रदेश में पहले से ही 252 पीएमश्री स्कूल संचालित हैं। फिलहाल तो योजना के मुताबिक सीएमश्री स्कूल नए नहीं खोले जाएंगे, बल्कि जो सरकारी विद्यालय बंद हो गए हैं या कुछ सरकारी स्कूलों को ही अपग्रेड करके उन्हें सीएमश्री स्कूल बनाया जाएगा। इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में से 25 प्रतिशत गरीब छात्रों को मौका दिया जाएगा। इन्हें मुफ्त शिक्षा दी जाएगी। बाकी 75 प्रतिशत बच्चों से भी कम फीस ली जाएगी। वैसे यह योजना तो बहुत अच्छी है। 

यदि सरकारी स्कूलों को अपग्रेड कर दिया जाए, उनमें सुविधाएं बढ़ा दी जाएं, तो गरीब बच्चों को यहां पढ़ने की सुविधा मिलने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा। गरीब बच्चों को वैसे भी शिक्षा हासिल करने में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा का स्तर उठाने के लिए प्रदेश सरकार ने स्कूलों में नौ हजार से अधिक कमरे बनवाकर ढांचागत सुधार किए हैं, तो वहीं 'सीएम शाइन' जैसी पहल भी शुरू की गई है। इसके बावजूद सैनी सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। 

राज्य के सरकारी स्कूलों में 40 हजार से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं। इन पदों पर भर्तियां की जाएं, तो बच्चों की शिक्षा पूरी हो सकेगी। लगभग 298 स्कूलों में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है और 1,051 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर कैसा होगा, इसको समझा जा सकता है। यही नहीं, विभिन्न कक्षाओं के परिणाम शून्य रहने जैसी गंभीर चुनौतियां भी मौजूद हैं। पिछले सात वर्षों में 400 स्कूल मर्ज या बंद हुए हैं और लगभग पांच हजार कंप्यूटर लैब में इंटरनेट नहीं है। वैसे तो प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में सभी सुविधाएं होने का दावा करती है, लेकिन इस बात में आंशिक सच्चाई है। 

स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं की 18 प्रतिशत और शौचालयों की एक से दो प्रतिशत तक कमी है। जिन स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है, उन स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की परेशानी का समझा जा सकता है। अलग से लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था न होने की वजह से लड़कियां स्कूल आने से कतराने लगती हैं। कुछ लड़कियां तो स्कूल आना ही छोड़ देती हैं। कई स्कूलों की इमारतें काफी पुरानी हो चुकी हैं। ऐसे स्कूलों में हादसे का डर बना रहता है। बरसात के दिनों में यह डर और भी बढ़ जाता है।

Thursday, February 26, 2026

अमेरिका के संस्थापकों में से एक थे फ्रैंकलिन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बेंजामिन फ्रैंकलिन को अमेरिका के संस्थापकों में से एक माना जाता है। वह वैज्ञानिक होने के साथ-साथ लेखक, व्यंग्यकार, उद्यमी और राजनेता भी थे। उनका जन्म छह जनवरी 1706 में बोस्टन में हुआ था। उन्होंने बिजली की छड़, बाईफोकल्स, फ्रैंकलिन स्टोव, गाड़ी के ओडोमीटर और ग्लास 'आर्मोनिका' का आविष्कार किया। बेंजामिन के पिता जोशिया फ्रेंकलिन ने दो शादियां की थीं। 

दोनों पत्नियों से कुल मिलाकर उनकी 17 संतानें थीं। बेंजामिन के दस सगे भाई-बहन थे और वह अपनी मां के आखिरी पुत्र थे। बेंजामिन की अपने भाई जेम्स से नहीं पटती थी। जेम्स हमेशा बेंजामिन को लेकर कुछ न कुछ ताने मारता रहता था। इससे परेशान होकर बेंजामिन बोस्टन से भागकर फिलाडेल्फिया आ गया। 

फिलाडेल्फिया में उन्होंने काम पाने के लिए कई जगह हाथ-पांव मारे, लेकिन बात बनी नहीं। काम की तलाश में एक दिन बेंजामिन एक ऐसे प्रिंटर्स के यहां पहुंचे जिसके यहां कामकाज बंद पड़ा था। उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस से मालिक से काम मांगा, तो उसने कहा कि मेरी एक मशीन ंबंद पड़ी है। बेंजामिन ने मशीन देखने के बाद कहा कि इसे ठीक करने में दिन भर लग जाएगा, मैं पूरी दिहाड़ी लूंगा। 

मालिक मान गया। लेकिन बेंजामिन ने दोपहर में ही मशीन को ठीक कर दिया। मालिक ने जब पूरी दिहाड़ी दी, तो आधी दिहाड़ी वापस करते हुए कहा कि मेरा मेहनताना इतना ही बनता है। उनकी इस ईमानदारी से प्रिटिंग प्रेस का मालिक बहुत प्रभावित हुआ। उसने दूसरी मशीन ठीक करने को कहा। इस तरह परिश्रम करते हुए अंत में वह वैज्ञानिक, राजनेता,लेखक बन गए। उन्होंने 17 अप्रैल 1790 में दुनिया को अलविदा कह दिया।