बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
हमारे देश में छुआछूत जैसी कुरीति सदियों से चली आ रही थी। इसके खिलाफ हमारे देश के महापुरुषों ने बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी, तब जाकर समाज में धीरे-धीरे बदलाव आया और आज हम कह सकते हैं कि देश से अस्पृश्यता जैसी भावना को पूरी तरह परास्त कर दिया गया है। बात उस समय की है, जब एचएसआरए यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रख्यात क्रांतिकारी भगत सिंह जेल में बंद थे।ब्रिटिश हुकूमत उन्हें फांसी की सजा सुना चुकी थी। लाहौर जेल में बंद किए गए भगत सिंह का सभी कैदी बड़ा सम्मान करते थे। उनमें एक बोधा नाम का सफाई कर्मी भी था। भगत सिंह बोधा को बेबे कहकर पुकारा करते थे। पंजाब में मां को बड़े सम्मान और प्यार के साथ बेबे कहकर संबोधित किया जाता है।
इस पर बोधा विनीत स्वर में प्रतिरोध करते हुए भगत सिंह से कहा करता था कि वह निम्न कुल में पैदा हुआ है। आप उच्च कुल में पैदा हुए हैं। आपका इस तरह मुझे बेबे कहकर संबोधित करना उचित नहीं है। इस पर हंसते हुए भगत सिंह कहा करते थे कि बचपन में मां ने मेरा मल-मूत्र साफ किया था।
आप हमारे बड़े होने के बाद भी वही काम करते हो। इस नाते तो आपका सम्मान मां से भी बढ़कर होना चाहिए था। भगत सिंह वैसे भी उस विचारधारा को मानते थे जिसमें इंसान का इंसान के प्रति कोई भेदभाव न हो। अपनी फांसी से एक दिन पहले भगत सिंह ने जेल प्रशासन से कहा कि उन्हें बोधा के हाथ की बनी रोटी खानी है। यह सुनकर बोधा फूट-फूटकर रो पड़ा। भगत सिंह ने अपनी शहादत देते हुए भी अपने आदर्श का जीवंत उदाहरण पेश करते हुए बड़े प्रेम से बोधा के हाथ की बनी रोटी खाई और शहीद हो गए।









