Wednesday, July 22, 2026

मैं भविष्य की चिंता नहीं करता, इसलिए खुश हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने कहा है कि जो पल आप जी रहे हैं, वही पल आपका है। जो बीत गया, वह बीत गया। वह दोबारा वापस आने से रहा। जो भविष्य के गर्भ में है, उस पर आपका कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में जो वर्तमान है, उसी को अच्छी तरह से जीना चाहिए। वर्तमान को संवारकर ही अच्छे भविष्य की रूपरेखा तय की जा सकती है। दर्शन में इसे बुद्ध का क्षणवाद कहा जाता है। 

इस संदर्भ में एक रोचक कथा है। किसी राज्य का राजा अत्यंत धनवान था। वह अपने राज्य की प्रजा के लिए भी जरूरत पड़ने पर कल्याणकारी काम करता था। इसके बावजूद वह खुश नहीं था। वह अपनी नाखुशी का कारण भी समझ नहीं पाता था। धीरे-धीरे उसके मन में निराशा बढ़ती जा रही थी। एक दिन उसने अपने राज्य के एक बुद्धिमान व्यक्ति के सामने अपनी समस्या रखी। 

उस बुद्धिमान व्यक्ति ने राजा से कहा कि कल सुबह महल के बाहर जो व्यक्ति खुश दिखाई दे, उसके साथ एक दिन गुजारिये। आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा। अगले दिन राजमहल के बाहर राजा खड़ा हुआ। तभी उसने देखा कि एक लकड़हारा अपने सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादे हुए जा रहा है। सिर पर बोझ होने के बावजूद वह गुनगुना रहा था। 

राजा ने उस लकड़हारे से पूछा कि तुम इतने गरीब हो, रात का खाना मिलेगा या नहीं, इसकी भी गारंटी नहीं है। इसके बावजूद तुम खुश दिख रहे हो। क्या कारण है? उस लकड़हारे ने कहा कि मैं स्वस्थ हूं। अपनी मेहनत की कमाई खाता हूं। मैं यह कतई नहीं सोचता हूं कि कल क्या होगा। मैं आज में ही मस्त रहता हूं। इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं होती है। यह सुनकर राजा समझ गया किउसकी बीमारी का कारण क्या है। उसी दिन से वह भविष्य की चिंता छोड़कर प्रजा के पालन पर अधिक ध्यान देने लगा।

जागरूक नागरिक ही सड़कों और नालियों को रख सकते हैं स्वच्छ

अशोक मिश्र

बरसात के दिन हैं। हरियाणा के प्रत्येक जिले में सड़कों पर कीचड़, जलभराव और नालियों का जाम होना, आम बात है। सीएम नायब सिंह सैनी बरसात आने से पूर्व ही कई बार स्थानीय निकायों को चेतावनी दे चुके थे कि मानसून आने से पहले ही नाले, नालियों और सड़कों की सफाई हो जानी चाहिए। इसके बावजूद हर जिले से बरसात के बाद जलभराव जैसी समस्या से लोगों को जूझना पड़ रहा है। इसके लिए काफी हद तक स्थानीय निकायों के अधिकारी और कर्मचारी जिम्मेदार हैं, तो वहीं नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। 

जब तक नागरिकों में ‘मेरा कचरा, मेरी जिम्मेदारी’ वाली सोच पैदा नहीं होगी, तब तक प्रत्येक जिले में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी कचरे के ढेर और गंदी नालियों से निजात नहीं मिलेगी। सच कहा जाए, तो स्वच्छ हरियाणा का सपना तब सच होगा, जब सरकार के साथ हर नागरिक अपने दरवाजे से सफाई शुरू करेगा। वैसे तो प्रदेश में स्वच्छता के नाम पर हर साल हर जिले में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। राज्य में बड़ी जोर-शोर से स्वच्छ भारत मिशन भी चलाया जाता है।

 नेता, अधिकारी और कुछ सामाजिक संस्थाएं किसी दिन सड़कों पर झाड़ू लगाकर स्वच्छता का संदेश भी देती हैं। अखबारों और टीवी चैनलों पर झाडू बुहारते हुए फोटो और खबर भी प्रकाशित हो जाती है। उसके चंद घंटों बाद वह सड़क फिर से अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है। स्वच्छता के नाम पर नगर निकायों का बजट, सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह, कचरा उठाने के ठेके, डोर-टू-डोर कलेक्शन, सेग्रीगेशन प्लांट और जागरूकता अभियान जैसे सारे उपाय किए जाते हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर कागज पर दिखते हैं, वास्तविकता में नहीं। गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और करनाल को स्मार्ट सिटी कहा जाता है। इसके बावजूद सुबह सड़क पर निकलते ही कूड़े के ढेर, नालों में प्लास्टिक और खाली प्लॉट में कचरे का पहाड़ आमतौर पर दिख ही जाता है। 

अकेले गुरुग्राम में कचरा प्रबंधन और सफाई के लिए 315 से 350 करोड़ रुपये तक वार्षिक खर्च होता है। फरीदाबाद में भी सौ से 125 करोड़ प्रति वर्ष खर्च होने का अनुमान है। राज्य सरकार 'स्वच्छ भारत मिशन' (शहरी और ग्रामीण) के तहत सालाना करोड़ों रुपये आवंटित करती है। इतने भारी बजट के बाद भी सड़कों पर कूड़ा बिखरा हुआ दिखाई दे, तो सचमुच यही समझना चाहिए कि स्थानीय प्रशासन अपने काम में लापरवाही बरत रहा है। सारा दोष सफाई कर्मचारियों का ही नहीं है। 

सच कहा जाए, तो राज्य के नागरिकों की लापरवाह आदत की वजह से भी सड़कों, गलियों और मैदानों में सफाई नहीं रह पाती है। ठेले वाले, दुकानदार और बिल्डिंग मैटेरियल वाले भी कचरा उठाने की फीस बचाने के लिए रात में सड़क किनारे डाल जाते हैं। 

Tuesday, July 21, 2026

नरसंहार देखकर व्यथित हो उठा अशोक

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक को पहले चंड अशोक के नाम से जाना जाता था। अशोक बचपन से ही अत्यंत महत्वाकांक्षी था। वह चक्रवर्ती सम्राट बिंदुसार और रानी धर्मा का पुत्र था। रानी धर्मा क्षत्रिय कुल की नहीं थी, इसलिए उसका बहुत अधिक सम्मान भी नहीं था। 

वैसे तो इतिहास में अशोक के सौ भाई बताए गए हैं, लेकिन तीन भाइयों सुसीम, अशोक और तिष्य के ही नाम मिलते हैं। तिष्य अशोक का छोटा सगा भाई था। कहते हैं कि जब अशोक निर्वासन झेल रहा था, उसी दौरान उसके सौतेले भाइयों ने अशोक की मां की हत्या कर दी। यह समाचार सुनकर अशोक राजमहल लौटा और उसने अपने सभी भाइयों की हत्या कर दी और खुद को सम्राट घोषित कर दिया। 

आठ साल के शासन में उसने अपने राज्य का विस्तार ईरान तक लिया था। उसने अपने शासन को आठ प्रांतों में बांट दिया था। सम्राट बनने के आठवें साल में सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। कहते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद एक लाख पचास हजार लोग बंदी बनाकर कलिंग से निर्वासित कर दिए गए थे। युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे। डेढ़ लाख सैनिक घायल हुए थे। 

कलिंग में जिधर नजर जाती थी, उस ओर या तो शव दिखाई देते थे या फिर कराहते हुए घायल सैनिक। यह दृश्य अशोक ने देखा तो उसका मन द्रवित हो उठा। उसने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त से इसका उपाय पूछा, तो उन्होंने महात्मा बुद्ध का मार्ग अपनाने की सलाह दी। वह बौद्ध के नजदीक आता गया और अंतत: उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके बाद वह मानवता की सेवा में लग गया। इस तरह चंड अशोक से देवप्रिय अशोक में बदल गया। सम्राट अशोक द्वारा खुदवाए गए 33 शिलालेख अब तक प्राप्त हो चुके हैं।

अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक नालों को बहने देने में ही हमारी भलाई


अशोक मिश्र

अरावली की पहाड़ियों ने सदियों से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली को प्राणवायु प्रदान की है। इनकी प्राकृतिक नालियों ने इन चारों राज्यों के भूगर्भ जल स्तर को बनाए रखने में सैकड़ों साल तक अहम भूमिका निभाई है। मानसूनी मौसम में इन नालियों के जरिये बरसाती पानी धरती के नीचे जाकर भूगर्भ जल स्तर को स्थिर रखता रहा है, लेकिन अब यह प्रक्रिया बाधित होने लगी है। लोगों ने इन नालियों पर अतिक्रमण करके स्वाभाविक प्रवाह को बाधित किया है जिसकी वजह से भूगर्भ जल स्तर घटता जा रहा है। 

गुड़गांव से फरीदाबाद तक फैली अरावली की तलहटी में सैकड़ों प्राकृतिक नाले थे जो मानसून का पानी बिना किसी बाधा के यमुना और अन्य निचले क्षेत्रों तक पहुंचा देते थे। पिछले दो दशकों में इन नालों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। कॉलोनियां, इंडस्ट्रियल प्लॉट, सड़कें और रिसॉर्ट बन गए और नालों को पाटकर या मोड़कर कंक्रीट के नीचे दबा दिया गया। नतीजा सामने है। अब जब थोड़ी तेज बारिश होती है तो गुरुग्राम का साइबर सिटी, द्वारका एक्सप्रेसवे और फरीदाबाद के निचले इलाके पानी में डूब जाते हैं। 

पहले बरसात के दिनों में प्राकृतिक नालियों के माध्यम से जमीन पर उतरता था जिसे धरती सोख लेती थी। लेकिन अब अरावली के इर्द-गिर्द कंक्रीट का जंगल उग आने की वजह से अरावली की नालियों से निकला पानी सीधे नालों में चला जाता है और सारा पानी व्यर्थ चला जाता है। यही कारण है कि हरियाणा का भूजल स्तर संकट में आता चला जा रहा है। कई इलाके डार्क जोन में आ चुके हैं। बरसात के दिनों में कई जिलों में लोग पानी के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। यह स्थिति किसी विडंबना से कम नहीं है। 

अरावली वन्यजीवों का कॉरिडोर है। नालों के बंद होने से जानवरों के पानी पीने के स्रोत खत्म हुए हैं और उनका प्राकृतिक रास्ता टूटा है। पानी और भोजन की तलाश में अब वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इस स्थिइत से बचने के लिए जरूरी है कि अरावली क्षेत्र की प्राकृतिक नालियों की पहचान की जाए, उनको संरक्षित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहले ही कह चुके हैं कि अरावली के सभी प्राकृतिक नालों की पहचान कर उन्हें प्रोटेक्टेड घोषित किया जाए। 

सैटेलाइट मैपिंग और ड्रोन सर्वे से 2010 से पहले के नक्शों के आधार पर नालों की पुरानी जमीन चिह्नित की जा सकती है। अगर अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक जल प्रवाह मार्ग को बचाया नहीं गया तो हर मानसून में राज्य के शहर डूबेंगे, भूजल और घटेगा और गर्मी और बढ़ेगी। सरकार, कोर्ट, नागरिक और उद्योग अगर मिलकर नालों को उनका रास्ता वापस दें तो अरावली फिर से हरियाणा की ढाल बन सकती है। नहीं तो हम हर साल बाढ़ और सूखे दोनों का दंश झेलते रहेंगे।

Monday, July 20, 2026

गुरु बोले, तब मैं दो सौ स्वर्ण मुद्राएं लूंगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हर गुरु की यही इच्छा होती है कि जो भी शिष्य उसके पास शिक्षा प्राप्त करने आए, वह बिल्कुल कोरा हो। एक दम खाली स्लेट की तरह। वह कुछ भी न जानता हो, तो गुरु को सिाखाने में काफी सहूलियत होती है क्योंकि जिसको शुरुआत से शिक्षा हासिल करनी है, वह गुरु की बातों को ध्यान से सुनेगा। जिसे थोड़ा बहुत ज्ञान होगा, वह गुरु से सवाल भी करेगा और संतुष्ट न होने पर वह गुरु पर अविश्वास भी करेगा। 

एक बार की बात है। किसी राज्य में एक युवक रहता था। उसे संगीत का थोड़ा बहुत ज्ञान था। वह अपने संगीत ज्ञान को बढ़ाना चाहता था। वह चाहता था कि अपने संगीत के ज्ञान से दुनिया को चमत्कृत कर दे। यह सोचकर वह एक महान संगीतज्ञ के पास गया। उसने संगीतज्ञ गुरु के सामने अपनी इच्छा प्रकट की। संगीतज्ञ ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि मैं तुम्हें संगीत सिखा दो दूंगा, लेकिन उसके लिए धन देना होगा। 

युवक ने गुरु से कहा, ठीक है। मैं आपको संगीत सिखाने का शुल्क जरूर दूंगा। गुरुदेव कितना शुल्क मुझे देना होगा। गुरु ने कहा कि सौ स्वर्ण मुद्राएं। युवक ने कहा कि सौ स्वर्ण मुद्राएं हैं तो बहुत ज्यादा, लेकिन मैं प्रस्तुत कर दूंगा। वैसे भी मैं संगीत के बारे में थोड़ा बहुत जानता हूं। यह सुनते ही गुरु ने कहा कि अब तो मैं दो सौ स्वर्ण मुद्राएं लूंगा। युवक ने कहा कि मैं थोड़ा बहुत जानता हूं, तो आपको कम शुल्क लेना चाहिए था क्योंकि मेहनत कम करनी पड़ेगी। आप शुल्क दोगुना कर रहे हैं। 

गुरु ने कहा कि जो तुमने थोड़ा बहुत सीख रखा है, उसको मिटाने में मुझे काफी मेहनत करनी पड़ेगी। अगर कुछ नया सीखना है, तो पुराने को मिटाना होगा। तभी तुम ठीक से सीख पाओगे। यह सुनकर युवक निरुत्तर हो गया।

जनभागीदारी से हरियाणा में बढ़ाया जा सकता है हरित आवरण क्षेत्र

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने वन संरक्षण, हरित आवरण बढ़ाने और पौधरोपण अभियान में जनभागीदारी बढ़ाने की मुहिम तेज कर दी है। सीएम नायब सिंह सैनी व्यक्तिगत रूप से भी वन क्षेत्र बढ़ाने के प्रयासों की मानिटरिंग कर रहे हैं। वन विभाग की समीक्षा बैठक में भी उन्होंने प्रदेश में हरित आवरण बढ़ाने की दिशा में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं। हरियाणा ने पहली बार सौ करोड़ रुपये के ग्रीन क्लाइमेट रेजिलिएंट फंड के बजट का प्रावधान किया है। राज्य सरकार ने प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए राज्य में 2.10 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। 

यह अभियान ‘एक पेड़ मां के नाम’ के तहत चलाया जा रहा है। इसके बावजूद हरियाणा और पंजाब में हरित आवरण में गिरावट देखी जा रही है। हरियाणा में केवल 7.48 प्रतिशत वन और वृक्ष आवरण है, जबकि पंजाब में यह और भी कम यानी 6.59 प्रतिशत है। भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा का कुल वन क्षेत्र 1,603 वर्ग किमी है जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र 44,212 वर्ग किमी का लगभग 3.63 प्रतिशत है। यही वजह है कि हरियाणा को अक्सर खेतों और फैक्ट्रियों का प्रदेश कहा जाता है, जंगलों का नहीं। 

हरियाणा सरकार हर साल जुलाई में वन महोत्सव मनाती है और ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों के तहत बड़े पैमाने पर पौधारोपण करती है। लेकिन इस मामले में सबसे जरूरी यह है कि वन महोत्सव या दूसरे किसी अवसरों पक केवल पौधा लगाना ही काफी नहीं है। जब तक रोपा गया पौधा जड़ पकड़कर पेड़ का रुप न ले ले, तब तक उसकी देखभाल करना भी जरूरी है। अगर रोपे गए पौधे की देखभाल नहीं की गई, तो पौधे को गाय, भैंस और बकरी जैसे पशु चट कर जाते हैं। 

राज्य सरकार ने कैंपा यानी कि क्षतिपूर्ति वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण योजना के तहत बीस लाख पौधों को रोपने का लक्ष्य निर्धारित किया है। हरियाणा में भूजल घट रहा है, गर्मी बढ़ रही है। ऐसे में खेजड़ी, शीशम, नीम और बड़ जैसे स्थानीय प्रजातियों पर फोकस जरूरी है। साथ ही शहरी क्षेत्रों में पार्क, सड़क किनारे और स्कूल-कॉलेज की खाली जमीन को ‘मियावाकी वन’ में बदला जा सकता है। 

मियावाकी जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित एक पौधरोपण तकनीक है। इसके तहत बहुत छोटे से शहरी भूखंड में भी देशी पौधों को अत्यधिक सघन रूप से लगाया जाता है। यह सामान्य पारंपरिक जंगलों की तुलना में दस गुना तेजी से बढ़ते हैं और 30 गुना अधिक घने होते हैं। वन महोत्सव ने जनजागरूकता और पौधारोपण में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन जब तक लगाए गए पौधों को वन का दर्जा नहीं मिलेगा और समुदाय की भागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक हरियाणा के हरित मानचित्र पर बड़ा बदलाव नहीं आएगा। 

Sunday, July 19, 2026

पत्थर बोला, उफ! मुझे मत मारो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जीवन में कुछ हासिल करने के लिए कष्ट सहना पड़ता है, प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। जो कष्ट से घबरा जाता है, वह कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है। वह तिरस्कार का भागी होता है। वहीं जिसने विपरीत परिस्थितियों से जूझकर सफलता पाई है, वह पूजा के योग्य माना जाता है। एक कथा है। कहते हैं कि किसी राज्य में एक नामी मूर्तिकार रहता था। 

मूर्तिकार की मूर्तियां एकदम जीवंत लगती थीं। जो भी उसकी बनाई हुई मूर्तियों को देखता, सराहना किए बिना नहीं रह सकता था। एक दिन मूर्तिकार कहीं जा रहा था। काफी देर तक चलते रहने की वजह से वह थक गया। थोड़ी देर सुस्ताने के लिए एक पेड़ की छांव में बैठ गया। उसने उस पेड़ के आसपास देखा, तो उसे काफी बड़े-बड़े पत्थर दिखाई दिए। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद उसने एक पत्थर को उठाया। 

उसने जैसे ही पहली हथौड़ी का प्रहार किया, पत्थर ने रोते हुए गुहार लगाई, मुझे मत मारो। दूसरा वार होते ही पत्थर ने कहा कि मुझे आपकी हथौड़ी से पीड़ा पहुंच रही है। मुझे मत मारो। पत्थर की बात सुनकर मूर्तिकार ने उसे छोड़ दिया। उसने दूसरा पत्थर उठाया और वह उसे तराशने लगा। कठिन मेहनत के बाद मूर्तिकार ने उस पत्थर को एक देवी का रूप दे दिया। उस मूर्ति को वहीं छोड़कर वह आगे बढ़ गया। कुछ साल इस घटना को बीत गए। एक दिन वह फिर उस रास्ते से गुजरा। 

उसने देखा कि लोगों ने उस मूर्ति की पूजा-अर्चना शुरू कर दी है। लोग उस पर फूल और नैवेद्य आदि चढ़ा रहे हैं। जो पत्थर रोया था, उस पर  लोग मूर्ति पर चढ़ाने के लिए नारियल फोड़ते हैं। यह देखकर पत्थर पछता रहा था। सच ही कहा गया है कि बिना कष्ट सहे, जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होता है।

हरियाणा में हरित परिवहन का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल

 

अशोक मिश्र

दिल्ली एनसीआर में हर साल प्रदूषण की स्थिति काफी गंभीर हो जाती है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रदूषण के चलते लोगों का दम घुटने लगता है। बच्चे और बूढ़े हलकान हो जाते हैं। हरियाणा ने अब इससे निजात पाने की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। निकट भविष्य में हरित विकास की ओर बढ़ा कदम उसे प्रदूषण की समस्या से निजात दिलाएगा। हरियाणा सरकार 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतों को स्वच्छ और नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने की दिशा में अग्रसर है। 

राज्य सरकार अगले चार वर्ष तक सरकारी बसों में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक बसों की करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके लिए पूरे राज्य में 789 से अधिक इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन और पॉइंट सफलतापूर्वक स्थापित किए जा चुके हैं। गुरुग्राम, फरीदाबाद और पंचकूला में ई-बसें और ई-आटो सड़कों पर उतर चुके हैं। चार्जिंग स्टेशनों का नेटवर्क धीरे-धीरे फैल रहा है। अगर नीतियों का साथ मिला तो हरियाणा अगले पांच साल में देश का ग्रीन मोबिलिटी हब बन सकता है। हरियाणा ने अब तय कर लिया है कि गुरुग्राम-दिल्ली की जहरीली हवा, फरीदाबाद की फैक्ट्रियों से निकलते धुएं से वह निजात पाकर रहेगा। 

राज्य में विकास का रंग अब हरा हो चला है। ऐसे में हरित परिवहन प्रदेश के लिए मजबूरी भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।हरियाणा वैसे भी देश का आटो हब है। मानेसर, गुरुग्राम, फरीदाबाद और कुंडली में पहले से ही दुनिया की बड़ी आटो कंपनियां हैं। अब यही कंपनियां इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन की तरफ मुड़ रही हैं। इन कंपनियों के सहारे राज्य को हरित विकास की रफ्तार को तेज किया जा सकता है। हरित परिवहन केवल प्रदूषण घटाएगा ही नहीं, यह लाखों हाथों को काम भी देगा। ईवी बैटरी, मोटर, कंट्रोलर और हाइड्रोजन फ्यूल सेल के निर्माण में इंजीनियरों से लेकर आईटीआई पास तकनीशियनों तक की जरूरत होगी। 

अनुमान है कि मानेसर-धरुहेड़ा की आटो बेल्ट में ही अगले कुछ सालों में 50 से 70 हजार प्रत्यक्ष नौकरियां बन सकती हैं। इसके साथ चार्जिंग स्टेशन और हाइड्रोजन रीफ्यूलिंग स्टेशन लगाने, चलाने और उनकी देखरेख के लिए 20 हजार लोगों को काम मिलेगा। कुल मिलाकर आने वाले 5 से 7 साल में हरित परिवहन के कारण हरियाणा में 1.2 से 1.5 लाख नए रोजगार सृजित हो सकते हैं और इनमें से बड़ी संख्या उन युवाओं के लिए होगी जिन्होंने 12वीं या आईटीआई की है। 

नीति आयोग के एक अनुमान के अनुसार यदि हरियाणा हरित परिवहन में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश करता है तो 2030 तक राज्य की प्रति व्यक्ति आय में 8 से 12 प्रतिशत तक अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। मजबूत नीतिगत फैसलों और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश के कारण, राज्य में हरित परिवहन का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।

Saturday, July 18, 2026

तुम मेरी गठरी लेकर भाग तो नहीं जाओगे


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लालच में अकसर लोग अपनी किस्मत को संवारने का अवसर खो देते हैं। कई बार ऐसा होता है कि यदि हम लालच में न पड़ें, तो हमारे जीवन की दशा बदल सकती है, लेकिन यह लालच हमें कहीं का नहीं छोड़ता है। इसी वजह से कहा गया है कि लालच बुरी बला है। इस संबंध में एक बहुत रोचक कथा है। कहते हैं कि एक सूनसान जगह पर एक बूढ़ा तीन गठरियों के साथ खड़ा हुआ था। 

तभी उस रास्ते से एक युवक गुजरा। बूढ़े ने युवक से कहा कि बेटा, अगर तुम यह गठरी उठाकर ले चलो, तो मैं तुम्हें दो सोने के सिक्के दूंगा। युवक मान गया। उसने एक गठरी उठाई। गठरी भारी थी। युवक ने पूछा कि बाबा! इसमें क्या है? बूढ़े ने कहा कि इसमें सिक्के हैं। थोड़ी दूर चलने के बाद एक नदी आई। बूढ़े ने कहा कि बेटा! दो गठरियां लेकर मैं नदी नहीं पार कर पाऊंगा। क्या तुम एक गठरी और ले लोगे। 

युवक ने हामी भर दी। युवक ने दूसरी गठरी उठाकर पूछा, बाबा! इसमें क्या है? बूढ़े ने कहा कि इसमें चांदी के सिक्के हैं। तुम इसे लेकर भाग तो नहीं जाओगे। युवक ने कहा कि नहीं, मैं ईमानदार आदमी हूं। नदी पार करने के बाद एक पहाड़ी आ गई। बूढ़े ने कहा कि बेटा, इस गठरी को भी तुम ले लो। मैं गठरी उठाकर पहाड़ी पार नहीं कर सकता हूं। युवक ने तीसरी गठरी उठा ली। 

युवक ने पूछा, इसमें क्या है? बुजुर्ग ने कहा कि इसमें सोने के सिक्के हैं। तुम लेकर भाग तो नहीं जाओगे। युवक ने कहा कि वह ईमानदार है। आगे जाने पर बूढ़ा पीछे रह गया। तब युवक तीनों गठरियां लेकर भाग गया। घर जाकर उसने तीनों गठरी खोली, तो उसमें मिट्टी भरी हुई थी और एक पत्र रखा हुआ था। पत्र में लिखा था कि मुझे एक ईमानदार खजांची की जरूरत थी। इसलिए तुम्हारी परीक्षा ली गई, लेकिन तुम पास नहीं हुए। पास हो जाते तो मंत्रि परिषद के सदस्य बन जाते। ठाठ का जीवन बिताते। यह पढ़कर युवक अपने लालच पर बहुत शर्मिंदा हुआ।

सरकार, समाज, स्कूल और परिवार को मिलकर लड़ना होगा नशे के खिलाफ


अशोक मिश्र

हरियाणा में जहां युवा खेलों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करके देश और प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और प्रांतीय खेलों में पदक जीत रहे हैं, वहीं राज्य के कुछ युवा नशा करके अपना भविष्य बरबाद कर रहे हैं। हरियाणा के लिए नशा कारोबार एक बड़ी समस्या है। हरियाणा नारकोटिक्स डिपार्टमेंट और स्थानीय पुलिस नशीले पदार्थों की सप्लाई करने वालों पर जहां कड़ाई से कार्रवाई कर रही है, वहीं नारकोटिक्स डिपार्टमेंट के अधिकारी और कर्मचारी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों में जाकर नशे के खिलाफ छात्र-छात्राओं को जागरूक भी कर रहे हैं। 

इसके बावजूद नशीले पदार्थों की बिक्री पर पूरी तरह से रोक नहीं लग पा रही है। पिछले साल आतंकवादी गतिविधियों के लिए चर्चा में रही अलफलाह यूनिवर्सिटी एक बार फिर चर्चा में है। पिछले साल आतंकवादी घटनाओं में लिप्त और दिल्ली कार विस्फोट के मामले में अलफलाह यूनिवर्सिटी के कई डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया था। अब इसी यूनिवर्सिटी का एक छात्र दो सौ ग्राम से अधिक गांजा की तस्करी करता हुआ पकड़ा गया है। एमबीबीएस द्वितीय वर्ष के छात्र अदीदशाह दिल्ली के सप्लायर से गांजा लेकर यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों को सप्लाई करता था। 

कुछ बाहरी लोग भी अदीदशाह से गांजा लेने आते थे। हरियाणा में नशे का अवैध कारोबार (ड्रग तस्करी) एक गंभीर समस्या है। पंजाब और राजस्थान की सीमा से सटे इलाकों और बड़े शहरों में इसका ज्यादा असर है। सरकार और पुलिस इसके खिलाफ 'जीरो टॉलेरेंस' (सख्त रुख) की नीति अपना रहे हैं। इसे रोकने के लिए कई बड़े कदम उठाए गए हैं। नशे का कारोबार अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रहा, यह गांव-देहात तक अपनी जड़ें जमा चुका है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि नशे का शिकार सबसे ज्यादा 15 से 30 साल के युवा हो रहे हैं। बेरोजगारी, तनाव, दिखावे की जिंदगी और गलत संगत ने उन्हें इस दलदल में धकेल दिया है। युवाओं को नशे के दलदल से निकालने के लिए सरकार को तस्करी की सप्लाई चेन तोड़नी होगी। हरियाणा की सीमा पर बसे जिलों में निगरानी बढ़ानी होगी। यदि राज्य में कहीं भी कोई अवैध नशीला पदार्थ बेचता पाया जाए, तो उसकी संपत्ति की कुर्की की जाए। सरकार को तस्करों पर गैंगस्टर एक्ट लगाकर उन्हें जेल में ठूंस देना चाहिए। साथ ही नशीली दवाओं की अवैध बिक्री करने वाले मेडिकल स्टोर पर लगाम लगानी होगी, ताकि युवाओं का भविष्य सुधारा जा सके। इसके लिए जरूरी है कि सरकार, समाज, स्कूल और परिवार चारों मिलकर नशे के खिलाफ लड़ाई लड़ें तभी नशा रोकने में सफलता मिल सकती है। किसी भी राज्य की अकेली सरकार नशे के कारोबार को नहीं रोक सकती है। इसमें सभी का सहयोग जरूरी है।