बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महर्षि दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर था। दयानंद का जन्म गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी 1824 को हुआ था। बचपन में एक दिन पिता ने मूलशंकर को शिवरात्रि व्रत रखने को कहा। रात में पूजा करते समय देखा कि शंकर भगवान की मूर्ति पर चूहा चढ़ा हुआ है। उन्हें तब बोध हो गया कि यह वह शंकर नहीं हैं जिसके बारे में उन्हें बताया गया था।इसके बाद उन्होंने सत्य की खोज के लिए घर त्याग दिया। इसके बाद दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की और भारतीय समाज में फैली तमाम कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया। दयानंद सरस्वती की मृत्यु के संबंध में बताया जाता है कि उनकी मौत की साजिश रचने में अंग्रेजों का हाथ था।
बात 1883 की है। राजस्थान के जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के निमंत्रण पर महर्षि दयानंद सरस्वती जोधपुर गए थे। वह रोज प्रवचन करते थे। कभी-कभी महाराजा जसवंत सिंह भी उनका प्रवचन सुनने आते थे। महाराज के विशेष आग्रह पर वह कई बार राज महल भी गए। वहां उन्होंने देखा कि नन्हीं नाम की वेश्या का महाराज पर विशेष प्रभाव था।
महाराज राजकाज करने की जगह पर ज्यादातर विषय भोग में लिप्त रहते थे। यह बात दयानंद को अटपटी लगी। एक दिन जब वह प्रवचन कर रहे थे, तो उन्होंने महाराज को संबोधित करते हुए कहा कि राजा का कर्तव्य प्रजा का पालन करना है, विषय भोग में लिप्त रहना नहीं। इससे महाराज ने नन्हीं से संबंध तोड़ लिए। कहते हैं कि अंग्रेजों की शह पर नन्हीं ने रसोइये से मिलकर दूध में पिसा हुआ कांच मिलकर स्वामी जी पिला दिया। इसके बाद अस्पताल में भी धीमा जहर देने की बात कही जाती है। 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में ही दयानंद का देहांत हो गया।








