Monday, March 30, 2026

आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। अगर आप अपने मन में ठान लें कि आप जीते हुए हैं, तो यकीन मानिए, हारी हुई बाजी भी आप हर हालत में जीत सकते हैं। बस मन में यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मुझे कोई हरा नहीं सकता है। परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं, लोग खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन यदि मन में विश्वास है, तो विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है। 

कभी एक समय ऐसा था कि यूनान को अजेय समझा जाता था। उसकी फौजों ने कभी हार का सामना नहीं किया था। जिस देश पर यूनान हमला करता था, उस देश का शासक या तो अधीनता स्वीकार कर लेता था या फिर राज्य छोड़कर भाग जाता था। पूरा यूरोप यूनान की फौजों के आतंक से संत्रस्त था। रोम के सेनापति सीजर यूनानी फौजों का यह भय अपने देश के सैनिकों और प्रजा के मन से निकालता चाहता था। 

वह काफी दिनों से सोच रहा था कि यूनानी सैनिकों को कैसे मजा चखाया जाए। फिर उसने यूनानी फौजों की अपराजेयता को ही निशाना बनाने की बात सोची। सीजर ने अपने देश के हर शहर, हर गांव की दीवार पर यह वाक्य लिखवाया, यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं, जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं और यूनानी फौजों को उनकी करनी का मजा चखाएं। 

इस वाक्य का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ। रोम की जनता उत्साहित हो गई। घर-घर युद्ध की तैयारियां हुईं। एक दिन यूनान की फौजें रोम की फौज के सामने आ खड़ी हुई। जमकर लड़ाई लड़ी गई और अजेय समझा जाने वाला यूनान परास्त हो गया। सीजर ने एक इतिहास रच दिया।

हरियाणा की सड़कों पर पैदल चलना भी नहीं रहा सुरक्षित

अशोक मिश्र

हरियाणा में अब सड़क पर पैदल चलना भी सुरक्षित नहीं रहा। पता नहीं, कब तेज रफ्तार में बस, कार, ट्रैक्टर या ट्रक आए और कुचलता हुआ निकल जाए। गुरुग्राम में शुक्रवार की शाम को तेज रफ्तार थार ने पैदल घर लौट रहे नाना और उनके दो नातियों को उड़ा दिया। रफ्तार इतनी तेज थी कि तीनों लोग घटना स्थल से लगभग बीस मीटर दूर जा गिरे। हादसे के बाद थार चालक वाहन रोककर घायलों को अस्पताल पहुंचाने की जगह वहां से फरार हो गया। 

काफी देर तक जब साठ वर्षीय नाना सुभाष और उनके दस और आठ वर्षीय दोनों नाती जब घर नहीं पहुंचे, तब उनकी तलाश शुरू हुई। काफी देर बाद तीनों लोगों को खोज निकाला गया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने तीनों को मृत घोषित कर दिया। सड़क पर किनारे चल रहे इन तीनों को कहां मालूम था कि पीछे से तेज रफ्तार थार के रूप में उनकी मौत आ रही है। 

हरियाणा के युवाओं में तेज रफ्तार से कार चलाना काफी शान की बात समझी जाती है। उन्हें तेज वाहन चलाने में एक किस्म का रोमांच महसूस होता है, लेकिन तेज रफ्तार से वाहन चलाने वाले युवा यह भूल जाते हैं कि उनके ऐसा करने से उनकी जान तो खतरे में रहती ही है, सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की जान को भी उतना ही खतरा बना रहता है। हरियाणा यातायात पुलिस से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में 57,901 लोगों की जान गई है। 

राज्य में पिछले 11 वर्षों में लगभग 1.15 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। 2017 में 11,258 सड़क दुर्घटनाओं में 5,120 लोगों की जान गई, जो 2014 के बाद सबसे अधिक है। हरियाणा में साल 2024 के दौरान 9806 सड़क हादसे हुए। इन हादसों में करीब 4689 लोगों की मौत हो गई, 7914 लोग घायल हुए। यह आंकड़ा साल 2023 के मुकाबले काफी कम है। खास बात यह है कि पुलिस ने साल 2024 के सड़क हादसों में घायल होने वाले 5313 लोगों को फस्ट एड की सुविधा मुहैया करवाई, वहीं 7090 घायलों को तुरंत प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया। साल 2023 में 10 हजार 168 सड़क हादसे हुए, जिनमें 5092 लोगों की मौत हुई है। साल 2022 में 11 हजार 130 सड़क हादसों में 5621 लोगों की मौत हुई थी। 

अधिकांश दुर्घटनाएं तेज गति, लापरवाही से गाड़ी चलाने और गलत दिशा में गाड़ी चलाने के कारण होती हैं। चालक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं या नशे में होते हैं, जो इन दुर्घटनाओं के कारणों में और इजाफा करता है। सड़क हादसों में लोगों की केवल मौत ही नहीं होती है, बहुत सारे लोग घायल भी होते हैं। कुछ लोग दिव्यांग हो जाते हैं। दिव्यांगता की वजह से पीड़ित व्यक्ति को जीवन भर तकलीफ उठानी पड़ती है। कुछ मामलों में जब परिवार में कमाने वाला व्यक्ति ही दिव्यांग हो जाए, तो पूरा परिवार बिखर जाता है।

युद्ध का इतना ही शौक है, तो अपने बेटे को भेजो लड़ने

संजय मग्गू

एसी कमरों में बैठकर 'युद्ध' का फैसला करना दुनिया का सबसे आसान काम है, क्योंकि वहां जान किसी और के बेटे की जाती है। यह एक कटु सत्य है। अभी हाल ही में इस कटु सत्य को उजागर किया है यूरोपीय संसद में स्पेन की आइरीन मोंटेरो ने। जब ट्रंप नाटो देशों से ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरने की अपील कर रहे थे, उसी दौरान यूरोपीय संसद में स्पेन की नेता, वामपंथी विचारक और महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली आइरीन मोंटेरो गरज रही थीं और उन राष्ट्राध्यक्षों को ललकार रही थीं जो युद्ध की हिमायत कर रहे थे। उन्होंने सीधे डोनाल्ड ट्रंप को घेरे में लेते हुए यहां तक कहा कि अगर ट्रंप को जंग का इतना ही शौक है, तो वे खुद मैदान में उतरें और अपने बेटों को फ्रंट लाइन पर भेजें। 

यह एक कटु सत्य है। मोंटेरो का यह बयान उन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो दूर बैठकर युद्ध की घोषणा करते हैं, सैनिकों को मरने के लिए युद्ध की आग में झोंक देते हैं। जैसे ही अपनी जान पर खतरा दिखता है, बंकरों में जाकर छिप जाते हैं। इन दिनों कई देशों के बीच युद्ध चल रहे हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चलने वाले युद्ध में हजारों सैनिक अब तक मारे जा चुके हैं। 

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले एक महीने से चल रहे युद्ध में किसको अपनी जान गंवानी पड़ी है? ईरान में तो वहां के सुप्रीम लीडर सहित सैन्य अधिकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, लेकिन क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या फिर बेंजामिन नेतन्याहू के परिवार से किसी को युद्ध में अपनी जान गंवानी पड़ी। नहीं। यह दोनों देश हमलावर हैं, ईरान हमला झेलने वाला देश है। युद्ध ईरान ने नहीं शुरू किया था। इसलिए एक तरह से युद्ध उसकी ही भूमि पर लड़ा जा रहा है। 

ऐसी स्थिति में उसे नुकसान होना स्वाभाविक है। जब भी कहीं किन्हीं दो देशों के बीच युद्ध होता है, तो इन युद्धों में मरने वाले गरीब मां-बाप के बेटे यानी सैनिक ही होते हैं। दुनिया भर के युद्धों का इतिहास खंगाला जाए, तो यही सिस्टम देखने को मिलेगा। राजा-महाराजा अपने महल में रंगरलियां मना रहा होता था, उनकी फौज के सिपाही अपने राजा के प्रति वफादारी निभाने के लिए अपनी जान न्यौछावर कर रहा होता था। 

दूसरों के बच्चों को युद्ध की आग में झोंक देने वाले राजा-महाराजा अपने को वीर बताते थे, लेकिन वास्तव में वह कायर ही होते थे। जिस दिन दुनिया के हर राष्ट्राध्यक्ष की औलादें सीमा पर बंदूक थामकर खड़ी होंगी, उसी दिन दुनिया के सारे विवाद बातचीत की मेज पर सुलझ जाएंगे। अगर ट्रंप, नेतन्याहू, पुतिन और ब्लादिमीर जेलेंस्की के बेटे-बेटियां हाथों में बंदूक लेकर लड़ने गए होते, तो यह  युद्ध पहले ही दिन खत्म हो गया होता। 

सत्ता के नशे में चूर राष्ट्रहित का नारा देने वाले राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद, नेता के सामने अपने बेटे-बेटियों को युद्ध के समय बार्डर पर भेजने की बाध्यता हो, तो कितने देशों के सत्ताधीश युद्ध के पक्ष में खड़े होंगे? शायद एक भी नहीं। सब शांति दूत बन जाएंगे।

Sunday, March 29, 2026

इस सवाल का उत्तर तो मेरा ड्राइवर दे देगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर किसी की संगति अच्छी या बुरी है, तो उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता है। यही वजह है कि हमारे महापुरुषों ने हमेशा सत्संगति में ही रहने की सलाह दी है। कहते हैं कि सत्संगति से बुरा आदमी भी अच्छा व्यवहार करने लगता है। कुसंगति के मामले में भी यही प्रतिक्रिया होती है। कुसंगति में अच्छे आदमी को भी बुरा बनने में तनिक भी देर नहीं लगती है। 

सत्संगति को लेकर अल्बर्ट आइंस्टीन से जुड़ी एक रोचक कथा कही जाती है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन अपने आविष्कारों की वजह से दुनिया भर में मशहूर थे। उन्हें जगह-जगह व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता था। उनके यहां एक ड्राइवर था। जब वह व्याख्यान देते थे, तो वह पीछे बैठकर उन्हें बड़े ध्यान से सुनता था। इसका नतीजा यह हुआ कि वह उनके विचारों से प्रभावित हो गया और विचार सुनते सुनते वह भी थोड़ा बहुत जानकार हो गया। 

एक दिन जब वह व्याख्यान देकर लौट रहे थे, तो ड्राइवर ने बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि सर, मैं भी मंचों पर आपकी तरह व्याख्यान दे सकता हूं। आज आपने जो कुछ कहा है, मुझे पूरी तरह याद हो गया है। आइंस्टीन ने हंसते हुए कहा, अच्छा, सुनाओ जरा। उसने पूरा भाषण सुना दिया। तब आइंस्टीन को मजाक सूझा। उन्होंने कहा कि अगली बार मुझे जहां जाना है, वहां तुम बोलना। ऐसा ही हुआ। 

आइंस्टीन ड्राइवर की वर्दी पहनकर पीछे बैठ गए। ड्राइवर का व्याख्यान सुनकर लोग तालियां बजाने लगे। इसी दौरान एक व्यक्ति ने कठिन बात पूछी। ड्राइवर ने हंसते हुए कहा कि इतने आसान सवाल का उत्तर तो मेरा ड्राइवर दे सकता है। आइंस्टीन खड़े हुए और जवाब दे दिया। आइंस्टीन ड्राइवर की बुद्धिमत्ता को देखकर चकित रह गए।

एलपीजी की किल्लत और दूसरे राज्य के मजदूरों में मची भगदड़

अशोक मिश्र

पश्चिमी एशिया में पिछली 28 फरवरी से चल रहे युद्ध का प्रभाव अब विश्व स्तर पर दिखाई देने लगा है। इससे हरियाणा अछूता कैसे रह सकता है। हरियाणा में भी एलपीजी और डीजल-पेट्रोल का संकट गहराने लगा है। लोगों में एलपीजी, डीजल पेट्रोल को लेकर दहशत फैलती जा रही है। इसमें अफवाह फैलाने वाले लोगों का बहुत बड़ा हाथ है। प्रदेश सरकार बार-बार एलपीजी, डीजल-पेट्रोल भरपूर होने की बात कह रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है। 

हां, यह बात सही है कि युद्ध से पहले जहां लोग जरूरत पड़ने पर एलपीजी बुकिंग कराते थे, वहीं अब लगभग हर आदमी गैस सिलेंडर भरवा कर रख लेना चाहता है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी न हो। ऐसी स्थिति में उन लोगों को ज्यादा दिक्कत होने लगी है जिसके पास वैध एलपीजी कनेक्शन नहीं है। ऐसे लोगों में ज्यादातर वह लोग शामिल हैं, जो दूसरे राज्यों से हरियाणा में नौकरी या मजदूरी करने आए हैं। अपना घर-बार छोड़कर हरियाणा में रोजगार की तलाश में आए लोग स्थायी नहीं रहते हैं। 

यह कुछ दिनों तक काम करते हैं, फिर अपने घर लौट जाते हैं। कुछ महीनों बाद यह फिर काम की तलाश में लौटते हैं। ऐसे लोगों का कोई स्थायी पता नहीं होता है। ऐसे लोग वैध एलपीजी कनेक्शन लेने की जगह छोटे गैस सिलेंडर से अपना काम चलाते हैं। गैस और तेल संकट की वजह से पिछले लगभग एक महीने से छोटा वाला सिलेंडर भरा नहीं जा रहा है। जब वैध वालों को ही गैस नहीं मिल पा रही है, ऐसे में छोटे गैस सिलेंडर वालों को जरूर परेशानी हो रही है। 

कालाबाजारी करने वालों ने भी आपदा में अवसर तलाश लिया है। वह महंगे दाम पर गैस बेच रहे हैं। राज्य में कुछ जगहों पर पांच सौ रुपये प्रति किलो गैस बिकने की खबरें अखबारों में छप रही हैं। ऐसी स्थिति में रोजाना कमाकर खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों, दूसरे राज्यों से आने वाले कामगारों के लिए परेशानी खड़ी हो गई है। पहली बात तो इन्हें रोज काम भी नहीं मिल पाता है। युद्ध के चलते काम-धंधा भी मंदा चल रहा है। ऐसी स्थिति में तीन-चार सौ रुपये किलो गैस खरीद पाना दिहाड़ी मजदूरों और निजी संस्थानों में काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों के लिए मुश्किल हो रहा है। 

ऐसी स्थिति में अपने घर लौट जाने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं बच रहा है। हालात इतने विकट हैं कि डीजल-पेट्रोल और एलपीजी की वजह से लाकडाउन जैसे हालात पैदा हो गए हैं। उद्योग-धंधे बंद होते जा रहे हैं। इन उद्योगों में काम कर रहे लोग बेरोजगार होने लगे हैं। ऐसी हालत में इनके पास अपने घर लौट जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा है। यही वजह है कि दूसरे राज्यों से आए मजदूरों में भगदड़ मची हुई है। गैस महंगी होने से खाना भी महंगा होता जा रहा है। ऐसी हालत में उन्हें घर लौटने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है।

Saturday, March 28, 2026

कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी के सीखने की एक निश्चित सीमा है। दुनिया में जितना भी ज्ञान है, उसे एक आदमी पूरा हासिल नहीं कर सकता है। विद्वान से विद्वान आदमी सब कुछ नहीं सीख सकता है, लेकिन हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सीखते जरूर रहना चाहिए। प्राचीन काल में एक दार्शनिक थे। काफी विद्वान थे, लेकिन वह विनम्र भी उतने ही थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं को लेकर आते थे। 

बहुत सारे शिक्षण संस्थानों के अध्यापक और विद्यार्थी उनके पास ज्ञान हासिल करने पहुंचते थे। लेकिन वह अपने पास आने वाले की शंकाओं और समस्याओं का हरसंभव तरीके से समाधान करने की कोशिश करते थे। उसके साथ ही साथ वह उनसे सवाल भी करते थे। उस व्यक्ति से हर तरह की जानकारी हासिल करने का प्रयास करते थे। यह देखकर एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा कि मैं देखता हूं कि जो लोग आपसे सीखने आते हैं, आप उनसे भी सीखने की कोशिश करते हैं। 

आप उनसे छोटी से छोटी बात पूछते हैं। आप सचमुच जानने की कोशिश करते हैं या सामने वाले के सामने न जानने का ढोंग करते हैं। यह सुनकर दार्शनिक पहले तो जोर-जोर से काफी देर तक हंसते रहे। फिर बोले, देखो, एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी में सब कुछ नहीं सीख सकता है। जितना वह सीखता है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा उससे छूट जाता है। 

दुनिया का समग्र ज्ञान एक व्यक्ति हासिल नहीं कर सकता है। मैं भी सब कुछ नहीं जानता हूं। इसलिए जो मैं जानता हूं, वह उसे बताता हूं, जो मैं नहीं जानता हूं, वह उससे सीखने की कोशिश करता हूं। व्यक्ति को जीवन में हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए। यह सुनकर मित्र चुप रह गया।

नवरात्र में कंजकों को पूजने के साथ उन्हें पैदा भी होने दीजिए


अशोक मिश्र

कल अष्टमी और आज नवमी को देश भर में कन्यापूजन किया गया। जिन कंजकों को साल भर में कोई महत्व नहीं दिया जाता है, उन्हें चैत्र और शारदीय नवरात्र की अष्टमी और नवमी को बडेÞ आदर सम्मान के साथ घर बुलाया जाता है, उन्हें भोजन कराया जाता है, उनके पांव धोए जाते हैं और चलते समय अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दक्षिणा भी दिया जाता है। साल में दो बार नवरात्र का व्रत रखने वाले लोग नौ दिनों तक मातृशक्ति की पूजा करते हैं। उनसे आशीर्वाद की कामना करते हैं। 

शतायु होने के साथ-साथ धन-धान्य का वरदान मांगते हैं, लेकिन जैसे ही नवरात्र के नौ दिन बीतते हैं, कन्याओं की अवहेलना शुरू हो जाती है। कुछ लोग तो नवरात्र बीतते ही अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर अस्पताल की ओर चल देते हैं ताकि चोरी-छिपे लिंग परीक्षण कराया जा सके। यदि गर्भस्थ शिशु कन्या है, तो भ्रूण हत्या कराया जाए। वैसे तो लड़कियों की बेकदरी के कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं, लेकिन कन्या भ्रूण हत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। 

समाज को उन प्रथाओं और मान्यताओं को बदलने की कोशिश करनी चाहिए जिनकी वजह से लोग अपने घर में बेटी को जन्म देना नहीं चाहते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी लड़कियों के विवाह के समय होती है। देश के सत्तर फीसदी लोग जीवन भर पेट काटकर बेटी के विवाह के लिए रुपये जोड़ते हैं, ताकि वह अपनी बेटी का अच्छे से विवाह कर सकें। छोटी मोटी नौकरी करने वाले लड़के के मां-बाप दहेज के नाम पर इतना मुंह फाड़ते हैं कि लड़की का बाप दहल जाता है। 

जिसके पास जितना अधिक पैसा है, उसको उसी हिसाब से कमाऊ दामाद मिलता है। यही वजह है कि लोग दहेज न दे पाने की वजह से लड़कियों को जन्म नहीं देना चाहते हैं। वैसे तो सरकार ने दहेज लेना और देना अपराध घोषित कर रखा है, लेकिन समाज में अपनी नाक बचाने के नाम पर इसे सामान्य व्यवहार मानकर देना पड़ रहा है। जब तक पूरे समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा, तब तक बात बनने वाली नहीं है। लोग अपनी बेटियों को गर्भ में ही मारते रहेंगे। 

इस मामले में हरियाणा बहुत पीछे नहीं है। सरकार की तमाम नीतियों और सख्ती के बावजूद साल 2025 में एक हजार लड़कों के पीछे 923 लड़कियों का ही जन्म हरियाणा में हुआ है। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 910 था। यही नहीं, साल 2014 में लड़कियों का लिंगानुपात 871 था। प्रदेश सरकार ने हर तरह का उपाय आजमा लिया है, इसके बावजूद कन्या भ्रूण हत्या नहीं रुक रही है। 

प्रदेश में जगह-जगह खुले अवैध क्लीनिकों में यह काम जारी है। जानकारी मिलने पर सरकार कार्रवाई करती है, संबंधित लोगों को पड़ककर जेल में डालती है, लेकिन आरोपी जमानत करवाकर अपने काम में फिर जुट जाते हैं। जब तक समाज कंजक पूजन के साथ-साथ कंजकों को जन्म देना नहीं सीखेगा, तब तक लिंगानुपात सुधरने वाला नहीं है।

Friday, March 27, 2026

काश! कि मूर्तिकार ने एक बार और प्रयास किया होता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी को प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए। कई बार ऐसा भी होता है कि सौ-दो सौ बार प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती है, लेकिन यदि मन में दृढ़ता हो, तो सौ-दो सौ बार प्रयास करने वाले को भी अगली बार के प्रयास में सफलता मिल जाती है। 

एक बार की बात है। एक राजा के दरबार में एक विदेशी नागरिक आया। राजा ने उसका बड़ा  आदर सम्मान किया। विदेशी नागरिक कुछ दिन राजा के राज्य में रहा भी, लेकिन चलते समय उसने राजा को एक बड़ा सा सुंदर पत्थर भेंट किया। राजा उस पत्थर को देखकर बहुत खुश हुआ। विदेशी नागरिक के जाने के बाद राजा ने सोचा कि इस पत्थर से भगवान की एक सुंदर सी मूर्ति बनवाई जाए। 

उसने अपने एक मंत्री को मूर्ति बनाने का काम सौंप दिया। उस पत्थर को लेकर मंत्री राज्य के एक सबसे प्रसिद्ध मूर्तिकार के पास गया और उससे सात दिन में मूर्ति बनाने को कहा। उस मूर्तिकार ने सहर्ष अनुमति दे दी। मंत्री ने मूर्ति बनाने के बदले पचास स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन दिया। उस मूर्तिकार ने पत्थर को तोड़ने के लिए हथौड़ा मारा। पत्थर नहीं टूटा। पचास बार हथौड़े का प्रहार करने का बाद भी जब पत्थर नहीं टूटा, तो मूर्तिकार थक गया। 

उसने मंत्री से कहा कि इस पत्थर से मूर्ति नहीं बन सकती है, आप इसे ले जाएं। मंत्री उस पत्थर को लेकर दूसरे मूर्तिकार के पास गया। उसने मंत्री के सामने ही हथौड़े का प्रहार किया और पत्थर टूट गया। उसने मूर्ति बनानी शुरू कर दी। ऐसा होने पर मंत्री सोचने लगा कि पहले वाला मूर्तिकार यदि एक बार और प्रयास करता तो वह अपने काम में सफल हो जाता और 50 स्वर्ण मुद्राओं का अधिकारी होता। लेकिन जल्दबादी में उसने यह मौका गंवा दिया।

घाटा सहने के बावजूद बिजली की दरों में बढ़ोतरी न करने का फैसला सराहनीय


अशोक मिश्र

मार्च का महीना बीतने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। अभी से ही गर्मी अपना प्रभाव दिखाने लगी है। अप्रैल से जून-जुलाई तक प्रचंड गर्मी पड़ने के आसार हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि हरियाणा में बिजली की खपत बढ़ेगी। खपत बढ़ने से उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम पर बिजली खपत में संतुलन बनाए रखने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी। 

सामान्य दिनों की अपेक्षा गर्मी के दिनों में बिजली की खपत पढ़ जाती है, यह सर्वमान्य नियम है क्योंकि गर्मी के दिनों में पंखा और एसी यानी वातानुकूलन यंत्र लगभग हर घर में चलाया जाता है। एसी और पंखों को चलाने से बिजली खपत की दर आसमान छूने लगती है। ऐसी स्थिति में कई बार स्थानीय बिजली विभाग प्रशासन को  कई प्रकार की दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। एक आंकड़े के  अनुसार प्रदेश के 83.79 लाख उपभोक्ता हैं। इन उपभोक्ताओं को गर्मी के दिनों में अबाधित बिजली सप्लाई कर पाना, एक बड़ी चुनौती होती है। उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम गर्मियों में किसी तरह हालात को बेहतर बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं। 

इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हरियाणा सरकार ने इस बार बिजली की दरों में बढ़ोतरी नहीं करने का फैसला लिया है जो प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है। हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग ने यह निर्णय उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम की ओर से दायर वार्षिक राजस्व आवश्यकता याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के बाद लिया है। इससे दोनों डिस्कॉम्स को लगभग 4,484.71 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का अनुमान है। 

इतना बड़ा घाटा सहने के बावजूद बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी न करना, प्रदेश सरकार की सराहनीय पहल ही कही जाएगी। इससे पहले हरियाणा में बिजली की दरें अप्रैल 2025 में बढ़ाई गई थीं। इतना ही नहीं, आयोग ने बिजली क्षेत्र में सुधार के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए हैं। हरियाणा पावर परचेज सेंटर के पुनर्गठन पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि बिजली खरीद प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और किफायती बन सके। साथ ही, डिमांड साइड मैनेजमेंट उपायों के माध्यम से मांग में उतार-चढ़ाव को संतुलित करने पर भी जोर दिया गया है। 

वर्तमान में अधिकतम और न्यूनतम मांग के बीच लगभग तीन हजार से पांच हजार मेगावाट का अंतर है। आयोग ने कृषि क्षेत्र के लिए 7,870.32 करोड़ रुपये की राज्य सरकार सब्सिडी का प्रावधान रखा है। इसके तहत किसानों को 7.48 रुपये प्रति यूनिट की वास्तविक लागत के मुकाबले केवल 0.10 रुपये प्रति यूनिट का भुगतान करना होगा, जिससे कृषि उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलेगी।

Thursday, March 26, 2026

हमेशा लोगों के साथ प्रेमभाव से रहें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पंजाब के गुजरांवाला जिले में पैदा हुए स्वामी रामतीर्थ ने अपना जीवन बहुत ही गरीबी में बिताया था। इनका बचपन का नाम तीर्थराम था, लेकिन संन्यास ग्रहण करने के बाद रामतीर्थ कर दिया गया था। हालांकि इनका विवाह बाल्यावस्था में ही हो गया था, लेकिन जब संन्यास ग्रहण किया, तो परिवार का त्याग कर दिया। संन्यासी बनने से पहले वह एक स्नातक कालेज में शिक्षक थे। 

1891 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से गणित में सर्वोच्च अंक हासिल किया था। एक दिन जब वह अपने क्लास में बच्चों को पढ़ा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि कुछ छात्र आपस में लड़ रहे हैं। उन छात्रों का आपस में लड़ना, उन्हें पसंद नहीं आया। वह सोचने लगे कि उनके छात्र आपस में वैरभाव रखते हैं। जबकि वह चाहते थे कि लोग आपस में प्रेमभाव से रहें, एक दूसरे की मदद करें। 

पहले तो उन्होंने सोचा कि इन छात्रों को समझाया जाए, लेकिन उस दिन उन्होंने उनसे कुछ नहीं कहा। अगले दिन जब वह क्लास में पहुंचे, तो उन्होंने ब्लैक बोर्ड पर एक लाइन खींच दी। उन्होंने अपने छात्रों से कहा कि इसे छोटा करके दिखाओ। एक छात्र ने डस्टर लिया और उस लाइन को थोड़ा मिटाने लगा। इस पर रामतीर्थ ने रोकते हुए कहा कि इसे छोटा नहीं करना है। 

तब कई छात्रों ने कहा कि यदि इसे मिटाया नहीं गया, तो इसे छोटा करना संभव नहीं है। तब स्वामी रामतीर्थ ने उस लाइन के नीचे एक लंबी रेखा खींच दी और बोले, हो गई न छोटी। तब उन्होंने समझाया कि किसी की उपलब्धि पर ईर्ष्या करने से बेहतर है, उससे भी बढ़कर काम किया जाए। अपने काम से किसी उपलब्धि की रेखा को छोटी कर दो। बिना लड़े आगे बढ़ने का यही तरीका है। छात्रों की समझ में अब बात आ गई थी।  उन्होंने भविष्य में आपस में न लड़ने का संकल्प लिया।