Saturday, May 9, 2026

इक्कीस साल की उम्र में शहीद हो गईं प्रीतिलता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रीतिलता वाडेदार एक ऐसी छात्रा थीं जिन्हें मरने के 80 साल बाद दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्रदान की गई थी। कोलकाता विश्वविद्यालय के अंग्रेज अधिकारियों ने उत्तीर्ण होने के बावजूद उनकी डिग्री पर रोक लगा दी थी। प्रीतिलता का जन्म 5 मई 1911 को चटगांव (अब बांग्लादेश में) के एक गरीब परिवार में हुआ था। 

कालेज की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गई थीं। वह क्रांतिकारी सूर्य सेन और उनके साथी रामकृष्ण विश्वास से अकसर मिलने जाया करती थीं। वह उनके क्रांतिकारी दल की सक्रिय सदस्य भी थीं। इनमें भारत को स्वाधीन कराने की प्रबल आकांक्षा थी। 

जब अंग्रेजों ने इनकी स्नातक की डिग्री पर रोक लगा दी, तो इन्होंने एक स्कूल में अध्यापन शुरू किया। चटगांव के पहाड़तली इलाके में एक यूरोपियन क्लब था जिसमें अंग्रेजों को ही अंदर जाने की इजाजत थी। क्लब के बाहर एक बोर्ड लगा हुआ था जिसमें अंग्रेजी में लिखा हुआ था कि डाग्स एंड इंडियन्स आर नॉट एलाउड। कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित लिखा यह बोर्ड प्रीतिलता बाडेदार की आंखों में हमेशा खटकता था। 

उधर से गुजरते समय वह इस बोर्ड को देखकर आक्रोशित हो उठती थीं। एक दिन प्रीतिलता ने अपने साथियों के साथ पहाड़तली के इस क्लब पर सशस्त्र हमला बोल दिया। दोनों ओर से गोलियां चलने लगीं। इसी बीच एक गोली आकर प्रीतिलता को लगी जिससे वह घायल हो गईं। 

अंग्रेजों की यातनाओं और दल का भेद खुलने के भय से बचने के लिए वह साइनाइड साथ लेकर गई थीं। जब बचने की गुंजाइश नहीं बची, तो प्रीतिलता ने साइनाइड खाकर प्राण त्याग दिए। क्रांतिकारी प्रीतिलता 21 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गईं।

हरियाणा में गेहूं के अवशेष जलाकर किसानों ने बढ़ा दिया प्रदूषण

अशोक मिश्र

प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है। दुनिया के कई देश प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। इससे उन देशों की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। जीडीपी गिर रही है। भारत में भी प्रदूषण की समस्या गहराती जा रही है। इसकी वजह से देश के कई हिस्सों में प्रदूषणजनित बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। इससे जहां परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, वहीं कार्यबल का भी नुकसान हो रहा है। 

हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोग प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। हरियाणा में प्रदूषण को रोकने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं, इसके बावजूद प्रदूषण से निजात नहीं मिल रही है। लोग धान की फसल के समय में पराली जलाने से बाज नहीं आते हैं, तो गेहूं की फसल के समय में गेहूं का फाना यानी उसके अवशेष डंठल जला रहे हैं। पिछले साल काफी प्रयास करने के बाद पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई थी। कुल 662 स्थानों पर धान की पराली जलाई गई थी।

लेकिन इस साल किसानों ने धान की पराली जलाने के मुकाबले में चार गुना ज्यादा गेहूं के अवशेष जला दिए हैं। पूरे प्रदेश में इस साल एक अप्रैल से छह मई के बीच 2683 स्थानों पर गेहूं के अवशेष जलाए जा चुके हैं। सबसे ज्यादा 441 मामले तो जींद जिले में पाए गए हैं। प्रदेश सरकार ने पराली हो या गेहूं के अवशेष जलाने पर प्रतिबंध लगा रखा है। प्रदेश सरकार ने किसान गेहूं के डंठल न जलाने पाएं, इसके लिए अधिकारियों की टीम बनाई थी। इस टीम को किसानों पर नजर रखनी थी, इसके बावजूद इतने ज्यादा स्थानों पर गेहूं के अवशेष जलाए गए। 

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पिछले दिनों हरियाणा के अधिकारियों से इस मामले में जवाब भी मांगा था। पिछले पांच साल से प्रदेश सरकार के काफी प्रयास करने के बाद पराली जलाने के मामले में काफी कमी आई थी। पराली जलाने की घटनाएं 3626 स्थानों से घटकर 662 पर आ गई थीं। अब गेहूं के अवशेष जलाने की घटनाओं ने सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सामने एक नई चिंता पैदा कर दी है। 

गेहूं के अवशेष को खेत में जलाने से पर्यावरण और मिट्टी को काफी नुकसान पहुंचता है। इसके खेतों में रहने वाले वे कीट भी मर जाते हैं, जो खेती के लिए काफी लाभदायक साबित होते हैं। इससे खेत की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो जाती है। वैसे यदि किसान चाहें तो गेहूं के अवशेष का सदुपयोग कर सकते हैं। वह गेहूं के डंठल से कम्पोस्ट खाद बना सकते हैं। इसके अलावा खेत में जुताई करके इन्हें मिट्टी में मिलाकर खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकते हैं। 

राज्य सरकार ने खेत में गेहूं के अवशेष जलाने वाले 552 किसानों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए दो सीजन तक मंडियों में एमएसपी पर अनाज बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया है। खेत या खेत के बाहर पराली या गेहूं का अवशेष जलाना, अपराध है। किसानों को ऐसा करने से बचना चाहिए।

Friday, May 8, 2026

विदेश में नौकरी दिलाने का झांसा देने वाले ट्रैवल एजेंटों की खैर नहीं

अशोक मिश्र

किसी भी तरह विदेश जाने की ललक पंजाब, हरियाणा और दक्षिण के राज्य केरलम के युवाओं में बहुत है। पंजाब और हरियाणा के युवा तो सोते-जागते अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, इजरायल, यूनाइटेड किंगडम, रूस और नार्वे जैसे देशों में जाने का सपना देखते रहते हैं। वे लोग सौभाग्यशाली हैं जिनको हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से विदेश भेजा जाता है। 

पिछले साल हरियाणा सरकार ने कौशल रोजगार निगम के जरिये सैकड़ों युवाओं को इजरायल और दुबई भेजा है। दुबई और इजरायल भेजे गए युवा पांच साल तक इन देशों में काम करेंगे। इन्हें अच्छी खासी तनख्वाह भी मिलेगी। लेकिन बहुत सारे ऐसे भी युवा हैं जो डंकी रूट से अमेरिका, कनाडा, रूस, आस्ट्रेलिया और अरब देशों में अच्छी खासी कमाई की चाह में जाते हैं। डंकी रूट से विदेश जाने वाले युवाओं को इसके लिए चालीस-पचास लाख रुपये खर्च करना पड़ता है। 

डंकी रूट से युवाओं को किसी भी देश में पहुंचाने का वायदा करने वाले फर्जी ट्रैवल एजेंट कई बार युवाओं की जान भी जोखिम में डाल देते हैं। इतना ही नहीं, पिछले तीन-साढ़े तीन साल में डंकी रूट से विदेश जाने की कोशिश करने वाले युवा करीब 1700 करोड़ रुपये गंवा चुके हैं। इस मामले में सबसे दुखद बात यह है कि जब गलत तरीके से किसी देश में जाने पर वहां की सरकार इन्हें पकड़ लेती है या भारत के लिए डिपोर्ट कर देती है, तो डिपोर्ट किए गए युवक के परिवार वाले प्रतिष्ठा के नाम पर चुप्पी साध लेते हैं। 

वह उस आदमी या ट्रैवल एजेंट के खिलाफ कार्रवाई तक नहीं करते हैं, जिसकी वजह से उनके बेटे की जिंदगी बरबाद हुई होती है। सरकार ने साल 2024 में विदेश भेजने में धोखाधड़ी के खिलाफ हरियाणा ट्रैवल एजेंट पंजीकरण और विनियमन विधेयक बनाया है। इसे विधानसभा में 28 फरवरी 2024 को पारित किया गया था। इसके तहत मानव तस्करी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने या धोखाधड़ी में दोषी पाए जाने पर ट्रैवल एजेंट को कम से कम तीन साल से लेकर अधिकतम दस साल की कैद हो सकती है। 

इसी तरह दो से पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। किसी व्यक्ति या एजेंसी को ट्रैवल एजेंट के रूप में काम करने के लिए सरकार से रजिस्ट्रेशन कराना होगा, जिसकी वैधता तीन साल की होगी, जिसके बाद रिन्यू करवाना होगा। धोखाधड़ी से अर्जित की गई ट्रैवल एजेंट की संपत्ति को जब्त भी किया जाएगा। लेकिन एक बार फिर सैनी सरकार ने ट्रैवल एजेंटों से जुड़े कानून में बदलाव किया है। 

यदि कोई ट्रैवल एजेंट विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर फर्जीवाड़ा करता है, नकली दस्तावेज बनाता है या फिर मानव तस्करी में लिप्त पाया जाता है, तो सात से दस साल की जेल या दो से पांच लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। नए कानून के मुताबिक, दोषी एजेंट की संपत्ति को जब्त करके पीड़ित को मुआवजा दिया जाएगा।

क्लर्क ने कहा, सबूत दो, तुम्हीं एमा काल्वे हो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी विवेकानंद की एक पुस्तक है मेमोरीज आफ यूरोपियन ट्रैवल। इसमें वह लिखते हैं कि एमा गरीब थीं लेकिन अद्भुत प्रतिभा संपन्न थीं। अपने सौंदर्य, यौवन, प्रतिभा और पवित्र आवाज की वजह से वे आज पश्चिम की सबसे कामयाब गायिका हैं। तकलीफों और मुफलिसी ने उन्हें सिखाया।

स्वामी जी ने जिस एमा के बारे में अपनी पुस्तक में लिखा है, वह थीं रोजा एमा काल्वे। इनका जन्म 15 अगस्त 1858 को एवेरान में हुआ था। इनके पिता एक इंजीनियर थे। यह फ्रांसीसी ओपेरा गायिका थीं। प्रसिद्ध होने के बाद उन्होंने बहुत धन कमाया,लेकिन 1894 में शिकागो में कार्यक्रम पेश करने के दौरान एमा की इकलौती पुत्री की आग लगने से मौत हो गई। इसके बाद उन्होंने चार बार आत्महत्या का प्रयास किया। 

इसी बीच उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई और उन्होंने उन्हें अवसाद से बाहर निकाला। कहते हैं कि जब वे अपने प्रसिद्धि के सर्वोच्च शिखर पर थीं, तो कैलिफोर्निया के एक छोटे शहर पहुंची। वह एक रजिस्टर्ड डाक आने वाली थी। पोस्टआफिस में पहुंचने पर उन्होंने डॉक के बारे में पूछताछ की और बताया कि वह एमा काल्वे हैं। पोस्ट आफिस के क्लर्कने उनसे उनके एमा काल्वे होने का सबूत मांगा। उन्होंने उस क्लर्क से विनम्रतापूर्वक कहा कि वही हैं एमा काल्वे। लेकिन क्लर्क नहीं माना। 

उसने कहा कि वह काल्वे जैसी नहीं दिखती हैं क्योंकि कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में उसने उन्हें देखा है। एमा ने बताया कि कार्यक्रम के समय मैं अधिक सुंदर दिखती हूं। इसके बाद एमा ने उस क्लर्क को वही गीत गाकर सुनाया। पूरा पोस्ट आफिस चकित रह गया। उस क्लर्क ने बाद में उनसे क्षमा मांगी और पत्र उन्हें सौंप दिया।

Thursday, May 7, 2026

तुम अपने श्वेत दोस्त के साथ नहीं खेल सकते


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्वेत अश्वेत का भेदभाव कोई नया नहीं है। आज दुनिया में कोई भी किसी के साथ रंग या नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहा है। अमेरिका, अफ्रीका और कई यूरोपीय देशों में नस्लभेद की भावना बहुत गहरे तक समाई हुई थी। काले लोगों को हर जगह अपमानित होना पड़ता था। 

गोरे लोग कई बार तो अपनी सीमाएं लांघकर काले लोगों को अपमानित करते थे। अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बड़ी मजबूती से लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर का जन्म 15 जनवरी 1929 को अटलांटा में हुआ था। उनके पिता पादरी थे। पिता की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी थी, इसलिए मार्टिन को बचपन में आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन बचपन में हुई एक घटना ने उनके बालमन पर बहुत प्रभाव डाला। 

जब वह छह साल के हुए और उन्हें स्कूल जाना पड़ा, तो पता चला कि पड़ोस में रहने वाले एक व्यापारी के पुत्र को गोरों के स्कूल में जाना होगा और मार्टिन को काले लोगों के स्कूल में। स्कूल जाने से पहले वह दोनों एक साथ खेलते थे, लेकिन बाद में दोनों को एक दूसरे के साथ खेलने से रोक दिया गया। इस घटना का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। 

बाद में उन्होंने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ जोरदार संघर्ष शुरू किया। उनके इस काम में आठवीं कक्षा में पढ़ाने वाली टीचर ब्रैडली ने नागरिक अधिकार की लड़ाई में उनका बहुत साथ दिया। टीचर की ही प्रेरणा से वह  अमेरिका में वंचितों को न्याय दिलाने में सफल हुए। उन्होंने जीवन भर रंगभेद के खिलाफ संघर्ष किया। 4 अप्रैल 1968 को एक हत्यारे ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर की गोली मारकर हत्या कर दी।

हरियाणा में कुपोषण की समस्या से जूझ रहीं गर्भवती महिलाएं

अशोक मिश्र

हरियाणा में गर्भवती महिलाएं कुपोषण की समस्या से जूझ रही हैं। इसकी वजह से कम वजन के शिशु पैदा हो रहे हैं। ऐसे में कम वजन के पैदा होने वाले शिशुओं में से कुछ एक साल की उम्र में ही मौत का शिकार हो जाते हैं। अगर फरीदाबाद जिले की ही रिपोर्ट पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि दस महीने में जिले में कुल 44395 नवजात बच्चों के वजन की जांच की गई,  जिसमें से 6803 बच्चों का वजन ढाई किग्रा से कम पाया गया। 945 बच्चों का वजन 1.8 किग्रा से भी कम पाया गया। 

इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में गर्भवती महिलाओं के पोषण की क्या स्थिति है। भारत सरकार के पोषण ट्रैकर पोर्टल के अनुसार वर्ष 2025 में हरियाणा में पांच साल तक की उम्र के करीब 13.82 लाख बच्चों की जांच की गई। इनमें करीब 35 फीसदी बच्चे कुपोषित मिले। बच्चों के सेहत में ध्यान में रखकर केंद्र ने हरियाणा सरकार को व्यापक जागरूकता अभियान चलाने और पोषण अभियान पर विशेष दिशा-निर्देश दिए थे। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों की ऊंचाई, वजन, शरीर की बनावट को भी मापा गया, जिसमें करीब 22 फीसदी बच्चे बौनापन, सात फीसदी कम वजन, करीब तीन फीसदी कमजोर और तीन फीसदी के करीब अत्यधिक वजन यानि मोटापा के शिकार पाए गए। 

हरियाणा में पांच साल से कम उम्र के लगभग 40 प्रतिशत बच्चे कम वजन और कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी चिंताजनक है। अध्ययनों के अनुसार, बच्चों में कम वजन के मुख्य कारणों में मां में खून की कमी (एनीमिया) और गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी प्रमुख है। हालांकि राज्य सरकार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैय्या कराने की हरसंभव कोशिश कर रही है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आशा कार्यकर्ताओं के सहारे गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। सैनी सरकार 'मिशन पोषण 2.0' के तहत धन का आवंटन बढ़ा रही है, लेकिन सरकार के काफी प्रयास करने के बावजूद व्यवस्थागत खामियां दूर नहीं हो पा रही हैं। हरियाणा के घरों में खाने-पीने की कमी नहीं है। लेकिन बच्चों को क्या डाइट लेनी चाहिए, क्या नहीं, इस जानकारी का अभिभावकों में अभाव है। ज्यादातर लोग डेढ़ या दो साल तक बच्चे को दूध ही पिलाते हैं, जबकि छह महीने के बाद बच्चे को ऊपरी खाना शुरू कर देना चाहिए।

 मां बाप का मानना रहता है कि बच्चे को दूध पिलाओ, वो सारा दिन ऐसा करते हैं, जिसकी वजह से अन्य पोषक तत्वों की कमी रह जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत सारी गर्भवती महिलाएं अपनी जांच कराने में भी लापरवाही बरतती हैं। जिसके कारण उन्हें पता ही नहीं चल पता है कि उनमें किस पोषक तत्व की कमी है। नतीजा यह होता है कि उनका बच्चा कमजोर पैदा होता है।

Wednesday, May 6, 2026

मेरा बेटा अनपढ़ है, खेती करता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

माता-पिता की सेवा करना, इनसान का परम कर्तव्य है। हमारे मां-बाप ने बहुत कष्ट उठाकर हमारा पालन-पोषण किया है। यदि हम उनके किसी काम न आए, तो फिर हमारा जीवन व्यर्थ है। एक बार की बात है। कुएं पर चार महिलाएं पानी भरने आईं। बात काफी पुरानी है। तब लोग पीने के पानी के लिए कुएं के पानी पर ही निर्भर रहते थे। चारों महिलाओं में बातचीत होने लगी। 

महिलाओं की बातचीत के दौरान चर्चा बेटों को लेकर चल निकली। एक महिला ने बड़े गर्व से अपने बेटे के बारे में बताते हुए कहा कि मेरा बेटा विश्वविद्यालय से पढ़कर आया है। पढ़ाई खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद उसे उसी विश्वविद्यालय में नौकरी मिल गई है। अब वह वहां पढ़ाने लगा है। तभी दूसरी महिला ने उसकी बात को काटते हुए कहा कि सुनो तो, मेरा बेटा वैज्ञानिक है। उसने विज्ञान की पढ़ाई की है। 

पढ़ने में वह काफी तेज है। कुछ ही दिनों बाद वह अपनी मेहनत और लगन से एक बड़ा वैज्ञानिक बन जाएगा। पूरी दुनिया में उसका नाम होगा। मैं भी कितनी भाग्यशाली हूं कि मेरा बेटा वैज्ञानिक है।  इतना कहकर दूसरी महिला चुप हुई, तो तीसरी महिला ने कहा कि मेरा बेटा भी पढ़ा-लिखा है। पड़ोस के गांव में पढ़ाता भी है। चौथी महिला चुप रही, तो महिलाओं ने उससे अपने बेटे के बारे में बताने को कहा। 

चौथी महिला ने संकोच में कहा, मेरा बेटा पढ़ा-लिखा नहीं है। वह खेती करता है। चारों महिलाएं पानी का घड़ा लेकर चल दीं। रास्ते में तीनों महिलाओं के बेटे मिलें। उन्होंने नमस्ते किया और आगे बढ़ गए। तभी चौथी महिला का बेटा आया और उसने अपनी मां से घड़ा लेता हुआ बोला, मां! पानी की जरूरत थी, तो मैं ला देता। आपने इतनी तकलीफ क्यों की? उस लड़के की बात को सुनकर तीनों महिलाएं समझ गई कि अनपढ़ होते हुए भी यह लड़का आज्ञाकारी है। तीनों महिलाओं का सिर लज्जा से झुक गया।

पर्यावरण बचाना है तो कंक्रीट का जंगल उगाने से बचना होगा

अशोक मिश्र

पंचकूला में सर्व समाज द्वारा आयोजित जनसभा में भाजपा के मेयर प्रत्याशी श्याम लाल बंसल के पक्ष में वोट का आह्वान करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हमारा लक्ष्य कंक्रीट के जंगल बनाना नहीं, बल्कि शहर को स्वच्छ बनाना है। सीएम सैनी ने बात तो पते की कही है, लेकिन क्या वास्तव में हरियाणा में ऐसा हो रहा है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि शहरों को हमेशा स्वच्छ रहना चाहिए। स्वच्छ शहर में रहने वाले व्यक्ति भी शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। 

हवा, पानी भी प्रदूषणरहित रहती है। इसके लिए जरूरी है कि शहरों की नालियां, सड़कें और गलियां स्वच्छ रहें। इधर उधर कूड़ा करकट न फेंके जाएं। स्थानीय निकायों और निजी संस्थाएं हर गली मोहल्ले से कचरा एकत्रित करके उसका समुचित निस्तारण करें। लोग नियत स्थान पर ही कूड़ा-करकट फेंकें। प्लास्टिक सहित अन्य कूड़ा करकट को आग न लगाया जाए। यह बात सीएम सैनी की बिल्कुल सही है, लेकिन जहां तक कंक्रीट का जंगल उगाने की बात है। राज्य में हर साल कंक्रीट के जंगल उगाए जा रहे हैं। 

कालोनियों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें कुछ वैध होती हैं, तो कुछ अवैध। सीमेंट की सड़कें बनाई जा रही हैं। खेती योग्य जमीनों पर कांप्लेक्स और कालोनियां बसाई जा रही हैं। राज्य में खेती और वन क्षेत्र का रकबा दिनों दिन कम होता जा रहा है। कालोनियों, घरों और सड़कों का रकबा बढ़ता जा रहा है। उद्योग-धंधे लगाए जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में उद्योग-धंधे नहीं लगने चाहिए। 

बिल्कुल लगने चाहिए, लेकिन वह इस तरह लगाए जाएं ताकि हमारे पर्यावरण को कतई नुकसान न पहुंचे। कारखाने और उद्योग मानकों पर खरे उतरने वाले होने चाहिए। इन उद्योगों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के निस्तारण और नियंत्रण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। उद्योगों से निकला रासायनिक कचरा नदियों और नालों में बहाया जाता है जिसकी वजह से नदियां प्रदूषित हो रही हैं। जिन स्थानों पर कालोनियां, घर, बाजार या उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं, उन स्थानों पर पहले से लगे पेड़-पौधों को काट दिया जाता है। 

राज्य में  इन सभी उद्योगों, कालोनियों और घरों  के निर्माण में सीमेंट का उपयोग किया जाता है। जब गर्मी का मौसम होता है, तो सीमेंट से बनी इमारतें और सड़कें सूरज की गर्मी को अवशोषित कर लेती हैं। रात में वह इस गर्मी को मुक्त करती हैं। इस तरह रिलीज होने वाली गर्मी हमारे ही वायु मंडल में रह जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि वायुमंडल गर्म रहने से हमारी पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है।

प्रकृति विज्ञानियों का कहना है कि आज से तीन-चार दशक पहले शहरों और गांवों में बनने वाले कच्ची मिट्टी और फूस से बनने वाले घर उर्ष्मा का परावर्तित कर देते थे जिससे पृथ्वी का तापमान नहीं बढ़ने पाता था।

अंतत: इंडिया गठबंधन के सारे पीएम मटेरियल ध्वस्त

संजय मग्गू

याद कीजिए, 23 जून 2023 को पटना में जब विपक्षी दलों के नेताओं का जमावड़ा हुआ था, तब नीतीश कुमार की भावभंगिमा क्या थी? यह बैठक नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई थी। दूसरी बैठक 17-18 जुलाई 2023 को कर्नाटक के बेंगलुरु में मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में हुई। तब नीतीश कुमार और उनके चेले-चपाटे उन्हें पीएम मटेरियल कहकर हवाई किले बांध रहे थे। 

बाद में जब विपक्षी दलों ने एकजुट होकर कांग्रेस को इंडिया गठबंधन का नेता चुना, तो उसके कुछ ही दिनों बाद नीतीश कुमार ने अपनी राह अलग कर ली। इसके बाद बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद को पीएम मटेरियल माना। वह कांग्रेस के नेतृत्व में भाजपा से लड़ने को तैयार नहीं थीं। क्षेत्रीय दल भी बेमन से इंडिया गठबंधन में शामिल हुए। आम आदमी पार्टी के केजरीवाल भी कांग्रेस को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्न: वाली स्थिति थी।  

इंडिया गठबंधन में अपने आपको पीएम मटेरियल या कांग्रेस को अपने नेतृत्व लायक न समझने वाले नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन आज कहां हैं? और कांग्रेस? सन 2023 के मुकाबले कांग्रेस आज कहीं ज्यादा मजबूत होकर उभरी है। तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। चौथी में बनने जा रही है। तब नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन में पीएम का चेहरा बनने से कमतर पर राजी नहीं थे, लेकिन भाजपा में क्या गए। मुख्यमंत्री पद तो गया ही, केवल राज्यसभा सांसद बनकर रह गए। केजरीवाल आज भारतीय राजनीति में अप्रांसगिक होते प्रतीत हो रहे हैं।

सात राज्यसभा सांसदों को भाजपा ने हड़प लिया। दिल्ली की सत्ता भी चली गई। पंजाब सरकार कब और कितने दिन चलेगी? अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या हालत होगी? कौन जानता है। उत्तर भारत में अपने बयानों से कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर देने वाले एमके स्टालिन चुनाव हार गए हैं। तमिलनाडु में सन 1971 के बाद पैदा हुई द्रविड़ राजनीति को पलीता लग चुका है। जोसेफ विजय तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं। कोई ताज्बुब नहीं है कि कांग्रेस स्टालिन का दामन छोड़कर विजय थलापति के साथ खड़ी हो जाए। वैसे उसे यह बहुत पहले कर लेना चाहिए था। 

रही बात ममता बनर्जी की। आज उन्होंने प्रेस काफ्रेंस में कहा कि मेरा लक्ष्य बिल्कुल साफ है। अब मैं एक आम व्यक्ति की तरह इंडिया गठबंधन को मजबूत करूंगी। अभी मेरे पास कोई पद नहीं है, इसलिए मैं एक सामान्य नागरिक हूं। ममता को चुनाव हारने के बाद इंडिया गठबंधन याद आ रहा है। अगर दो साल पहले ममता, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन, उमर अब्दुल्ला जैसे लोग अपना अहम त्यागकर खुले मन से इंडिया गठबंधन में शामिल हुए होते, तो शायद इस तरह अधोगति को प्राप्त नहीं हुए होते। 

लेकिन उस समय तो सब पीएम मटेरियल बनने का ख्याब देख रहे थे। भाजपा ने एक-एक करके सबको निपटा दिया। अब पीएम मोदी ने अखिलेश की ओर इशारा किया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में देखते हैं क्या होता है?

Tuesday, May 5, 2026

सोफी को गणित प्रेम ने कर दिया अमर


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मैरी सोफी जर्मेन एक फ्रांसीसी गणितज्ञ, दार्शनिक और भौतिक विज्ञानी थीं। इनका जन्म 1 अप्रैल 1776 को फ्रांस के पेरिस में हुआ था। इनके पिता एंब्रोइस फ्रांकोइस एक धनी रेशम व्यापारी थे। कुछ लोगों के अनुसार  सुनार थे। सोफी की बचपन से ही गणित में रुचि थी। 

इनके पिता को सोफी का गणित विषय में रुचि लेना कतई पसंद नहीं था। जब सोफी तेरह साल की थीं, उन्हीं दिनों क्रांतिकारियों ने बैस्टिल जेल पर हमला किया। चार घंटे की लड़ाई में 94 लोगों की मौत हुई। अंतत: क्रांतिकारियों ने बैस्टिल पर कब्जा कर लिया। इस कारण पूरे पेरिस में कर्फ्यू जैसा माहौल था। 

लोगों के घर से बाहर निकलने पर एक तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस मौके का फायदा सोफी ने अपने पिता की लाइब्रेरी में गणित की पुस्तकें पढ़ने में उठाया। गणित की पुस्तकों में इनका मन रमता गया। इसी दौरान इनके हाथ में जेई मोंटूक्ला की आर्किमिडीज की मौत की कहानी आई। इससे इनका गणित के प्रति आकर्षण और बढ़ गया। 

इनके पिता ने इनकी गणित की पढ़ाई बंद करने के कई प्रयास किए। रात में इन्हें ओढ़ने-पहनने के लिए गर्म कपड़े नहीं दिए जाते थे। आग जलाने की भी इजाजत नहीं थी। फिर भी सोफी मोमबत्ती जलाकर चुपचाप पढ़ाई करती रहीं। इनके जीवन में बदलाव तब आया जब 1794 में फ्रांस में एक प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थान एकोल पॉलिटेक्निक खुला। 

इस संस्थान की खास बात यह थी कि संस्थान में महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता था। तब सोफी ने एक नकली नाम मोंसियूर ले ब्रांक के नाम से अपने नोट्स यहां के प्रोफसरों को भेजना शुरू कर दिया। प्रोफेसर जोसेफ- लुई लांग्रेस इनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए। बाद में इन्हें गणित में योगदान के लिए पेरिस विज्ञान अकादमी का ग्रैंड प्राइज दिया गया।