Wednesday, August 5, 2026

बेटा राहुल! बुद्ध की शरण में जाओ

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारतीय नारियों में उर्मिला और यशोधरा का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उर्मिला के पति लक्ष्मण अपने बड़े भाई राम के पथ का अनुगमन करने के लिए स्वेच्छा से चौदह वर्ष के वनवास पर गए थे। यशोधरा के पति सिद्धार्थ मानव कल्याण के लिए पत्नी का परित्याग करके चले गए थे। 

इन दोनों महिलाओं की पीड़ा एक समान थी। चौदह साल बाद उर्मिला को अपने पति का सान्निध्य प्राप्त हुआ, लेकिन बारह साल बाद यशोधरा के पति सिद्धार्थ आए तो, लेकिन एक भिक्षु के रूप में, जो अब उसका नहीं, पूरे मानव समाज के लिए समर्पित हो चुका था। यशोधरा ने जब सुना कि उसके पति नगर में आए हैं,तो वह अपने ससुर महाराज शुद्धोधन की तरह महल के बाहर उनसे मिलने नहीं गई। ससुराल और नैहर दोनों कुल के हिसाब से वह राजकुल की क्षत्राणी थी। अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी। गर्व तो होना ही था। 

महात्मा बुद्ध यशोधरा के अंत:पुर में पधारे। यशोधरा ने अपने पति को देखा, भिक्षुक रूप में। उन्हें देखते ही दांपत्य जीवन की तमाम स्मृतियां जीवंत हो उठीं। बुद्ध ने उसके त्याग को आदर प्रदान करते हुए कहा, यशोधरे! कुशल से तो हो? यशोधरा बुद्ध की आवाज सुनकर गदगद हो उठी। उसने कहा- हां, स्वामी! बुद्ध बोले, स्वामी नहीं, भिक्षु कहो यशोधरे! मैं अपना धर्म निभाने आया हूं। तुम कुछ भिक्षा दोगी। यशोधरा ने कहा, भंते! आप भी पूर्व संबंधों के आधार पर कुछ प्रतिदान कर सकेंगे? 

बुद्ध ने कहा कि भिक्षु धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं हो, तो अवश्य करूंगा। यह सुनकर यशोधरा ने कहा कि तो फिर पुत्र राहुल को अपने पितृ कुल की परंपरा का निर्वाह करने का अधिकार प्रदान कीजिए। इतना कहकर उसने अपने पुत्र राहुल को पुकारा और कहा, जाओ बेटा, अपने पितृ कुल की परंपरा का अनुसरण करो। बुद्ध की शरण, धर्म की शरण में और संघ की शरण में जाओ। इस तरह उस महाविदुषी ने मानव कल्याण के लिए एक और महात्याग किया।

हरियाणा में कब रुकेंगी प्रेम संबंधों के नाम पर होती निर्मम हत्याएं?

 हरियाणा में कब रुकेंगी प्रेम संबंधों के नाम पर होती निर्मम हत्याएं?

अशोक मिश्र

फरीदाबाद के सिकरोना गांव स्थित सरस्वती सीनियर सेकेंडरी स्कूल की शिक्षिका की 27 बार चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई। हत्या का कारण यह बताया जा रहा है कि हत्या का आरोपी उससे प्रेम करता था और शिक्षिका पर विवाह करने के लिए दबाव डाल रहा था। शिक्षिका पहले से ही शादीशुदा थी। उसने फिरोजपुर कलां निवासी विकास से बारह साल पहले प्रेमविवाह किया था। टीचर के दो बच्चे भी थे। हत्या के आरोपी अमित से उसकी पहचान तब हुई थी, जब वह दो साल पहले फिरोजपुर कलां में अमित के घर के पास के एक स्कूल में पढ़ाती थी। तभी दोनों की आपस में पहचान हुई थी। आरोपी टीचर पर विवाह करने के लिए दबाव डाल रहा था, जबकि टीचर संध्या ने मना कर दिया था और वहां से नौकरी छोड़कर वह सिकरोना गांव में पढ़ाने लगी थी। 

एकतरफा प्यार, अवैध संबंध या प्रेम विवाह जैसे मामलों में हत्या की घटनाएं इधर काफी देखने को मिल रही हैं। हरियाणा में एकतरफा प्रेम में होने वाली हत्याएं अब कोई अपवाद नहीं रहीं, यह एक पैटर्न बन चुकी हैं। ऐसे मामलों में प्रेम भावना नहीं, कब्जे की मानसिकता बन जाता है। हरियाणा जैसे प्रदेश में जहां पितृसत्ता, इज्जत और मर्दानगी की परिभाषा बहुत कठोर है। यहां प्रेम को भी अक्सर उसी चश्मे से देखा जाता है। लड़के को बचपन से सिखाया जाता है कि उसे जीतना है, पाना है और लड़की को सिखाया जाता है कि उसका इनकार अंतिम नहीं है। 

जब यही लड़का बड़ा होकर एकतरफा प्रेम करता है, तो वह प्रेम में संवाद नहीं, अधिकार खोजता है। अगर लड़की हां नहीं कहती, तो उसे लगता है कि उसकी मर्दानगी को चुनौती दी गई है। इस चुनौती का जवाब वह हिंसा से देता है। यह प्रेम की विफलता नहीं, हक जताने की असफलता का प्रतिशोध है। फरीदाबाद की शिक्षिका की सोमवार को की गई हत्या इसी भावना को दर्शाती है। ऐसे मामलों में प्रेम नहीं, बल्कि झूठ, धोखा और पितृसत्तात्मक दोहरे मापदंड हत्या की वजह बनते हैं। पुरुष के अवैध संबंध को अक्सर चुपचाप सहन करने या दबाने की कोशिश होती है, पर महिला के संबंध को सीधे उसके चरित्र और पूरे परिवार की इज्जत से जोड़कर उसकी जान तक ले ली जाती है। यह रवैया लगभग देश के सभी राज्यों में पाया जाता है। 

यह सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच का है। पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर लेती है, जैसा टीचर हत्याकांड में हुआ। कोर्ट आने वाले दिनों में उसे वाजिब सजा भी दे देगी। इसके बाद भी ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं। जब तक समाज में प्रेम का अर्थ पाना नहीं, देना नहीं सिखाया जाएगा, जब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगा पाना संभव नहीं होगा। जब तक लड़कों को यह नहीं सिखाया जाएगा कि किसी का इनकार भी पूरा वाक्य है, तब तक ऐसे खून बहता रहेगा।

Tuesday, August 4, 2026

अब मैं राजकुल का सदस्य नहीं रहा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने लगभग पचास वर्ष तक पूरे देश में मानव धर्म का प्रचार किया। राज्य का त्याग किए हुए उन्हें बारह वर्ष हो चुके थे। एक दिन बुद्ध कपिलवस्तु में राजा शुद्धोधन के सामने भिक्षु के रूप में खड़े हो गए। शुद्धोधन उन्हें देखकर आश्चर्यचकित थे। जिसे चक्रवर्ती सम्राट बनना था, वह आज अपने पिता के सामने भिक्षु के रूप में खड़ा है। 

वह विचलित हो उठे और बोले, क्या यही हमारे कुल की परिपाटी है? अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम भिक्षु का रूप त्यागकर वापस लौट सकते हो। यह सारा राजपाट तुम्हारा ही है। अपने पिता की विह्वल वाणी को सुनकर भी बुद्ध धीर गंभीर बने रहे। उन्होंने कहा कि राजन! यह आपके कुल की परिपाटी नहीं है। यह बुद्ध के कुल की परिपाटी है। बुद्ध कुल में हर भिक्षु को अपनी क्षुधा पूर्ति के लिए भिक्षा मांगनी ही पड़ती है। मैं अब राजकुल का सदस्य नहीं रह गया हूं। मैं आत्म कल्याण और लोक मंगल की कामना से साधना में लगे भिक्षु समुदाय का परिजन हूं। 

महात्मा बुद्ध की बात सुनकर राजा शुद्धोधन की आंखों से आंसू बहने लगे। लेकिन उन्हें इस बात का संतोष था कि कम से कम उनका पुत्र जीवित सामने खड़ा है। उन्हें लगा कि अब अपने पुत्र को समझा-बुझाकर वापस राजकुल में नहीं ला सकते हैं। इससे अच्छा है कि उसे मुक्त कर दिया जाए। लेकिन उन्होंने कहा कि क्या तुम एक दिन मेरा आतिथ्य स्वीकार करोगे। 

बुद्ध ने कहा कि कल मैं अपने संघ के साथ आतिथ्य स्वीकार करने आऊंगा। अगले दिन नियत समय पर महात्मा बुद्ध राजभवन में पहुंचे और सभी परिजनों का उसी प्रकार अभिवादन स्वीकार किया जैसे वह संघ में रहकर करते थे। इसके बाद वह चले गए।

हरियाणवी लोकगीतों में पीहर की याद है तो पिया से बिछड़ने की पीड़ा भी



अशोक मिश्र

कल सावन का पहला सोमवार था। शिवालय में भक्तों की भारी भीड़ जुटी हुई थी। अपने आराध्यदेव की भक्त पूजा-अर्चना करके देश, प्रदेश और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना कर रहे थे। इसी के साथ-साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों में सावनी लोकगीतों की भी धुन सुनाई देने लगी है। सभी प्रदेशों के सावन से जुड़े लोकगीतों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, माधुर्य है और लालित्य है। हरियाणवी लोकगीतों का तो कहना ही क्या है! आषाढ़ की तपिश के बाद जब पहली फुहार पड़ती है तो खेत, बाग और आंगन सब एक साथ भीगते हैं, मिट्टी की सोंधी खुशबू से सारा परिवेश महक उठता है। 

उसी भीगेपन और सोंधी खुशबू से फूटते हैं सावन के लोकगीत। लोकगीत हरियाणा की औरतों की अपनी डायरी रहे हैं। इनमें उनकी खुशी है, तो दुख भी दर्ज है। नवविवाहिताओं के अपने प्रिय से मिलन है, तो सावन में पीहर लौटने की वजह से विरह की पीड़ा भी समाहित है। इन लोकगीतों में बाग में डले झूले की पींग है, तो नई बहू की तीज की कोथली की आस है। बहू की सास से बाग में झूला डलवाने का मीठा उलाहना है। जहां बहू अपनी सास से मनुहार करती है कि ‘आया री सासड़ सावन मास’। वहीं पीहर की गलियों की याद है जहां उसने अपनी सहेलियों, भाभियों और भाइयों-बहनों के साथ जीवन के सुखद दिन बिताए हैं। 

अब हरियाणा की युवा गायिकाएं पुरानी बंदिशों को नए संगीत के साथ गा रही हैं। उन पर बेहतरीन नृत्य कर रही हैं। अपने नृत्य कौशल और पहनावे में हरी-हरी चूड़ियों, धानी चुनरिया और अमुआ की डाली वाले बिंबों को फिर से फैशन बना रही हैं। यह सही है कि सावनी गीतों की आत्मीयता घटी है, पर उनकी दृश्यता और पहुंच बढ़ी है। एक रील हजारों लोगों तक पहुंचकर उन्हें हरियाणा की पारंपरिकता से परिचय करवा रही है। पुराने गीतों की भाषा ठेठ हरियाणवी थी। उसमें अलंकार नहीं, सीधे-सीधे मन के भावों को व्यक्त करने की भावना थी। उनमें कोथली, पीहर, सासरा, बाग, मोर, पींग जैसे शब्द बार-बार आते थे। 

प्राचीन लोकगीतों का उद्देश्य किस्से के माध्यम से अपनी पीड़ा और खुशी को व्यक्त करके मन को हल्का करना था। आज के सावनी गीतों में भाषा हिंदी-मिश्रित हरियाणवी हो गई है। इसका कारण यह है कि इन गीतों का बड़े पैमाने पर प्रसार हो सके, ज्यादा से ज्यादा दर्शक इसे देख-समझ सकें। वाद्ययंत्रों में भी काफी बदलाव आया है। संगीत में ढोलक के साथ कीबोर्ड, गिटार और डीजे बीट्स जुड़ गए हैं। अब गीत छोटे हो गए हैं दो-ढाई मिनट के, ताकि रील में फिट हो जाएं। 

इसके बावजूद अच्छी बात यह है कि धुन वही पुरानी है। सावन का महीना आज भी हरियाणा की बेटी को पीहर की तरफ खींचता है। जब तक ‘सावन आया हे मां मेरी मैं सुण्या जी’ जैसी पंक्तियां किसी महिला के होंठों पर हैं, सावनी लोकगीतों की परंपरा हमेशा कायम रहेगी।

Monday, August 3, 2026

यह भी ढोल बजाकर अपना पेट भर लेगा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महाराजा रणजीत सिंह जितना अपनी बहादुरी और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे, उतना ही वह साहित्य और कला प्रेम के लिए जाने जाते थे। उन्हें शेर-ए-पंजाब कहा जाता था क्योंकि उन्होंने अपने राज्य का विस्तार  लाहौर और अमृतसर से लेकर पेशावर, कश्मीर और मुल्तान तक कर लिया था। उनको अपने समय में सबसे धर्म निरपेक्ष शासक माना जाता था। उनके दरबार में हिंदू, सिख और मुसलमान को ऊंचे पद हासिल हुए थे। 

उन्होंने अपने राज्य का काफी शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था। उन्होंने अपने शासनकाल में किसी को भी मृत्युदंड नहीं दिया था, ऐसा कहा जाता है। एक बार की बात है। वह दरबार में बैठे थे कि तभी एक मसखरा आया और उसने महाराजा रणजीत सिंह को कई हास्य प्रसंग सुनाए। महाराजा काफी प्रसन्न हो गए। उन्होंने उस मसखरे से प्रसन्न होकर अपना सबसे प्रिय हाथी उसे उपहार में दे दिया। हाथी पर बैठकर मसखरा अपने घर रवाना हुआ। 

अब उसके पास समस्या थी कि वह हाथी को खिलाए कैसे? हाथी कोई थोड़ा सा तो खाता नहीं है। वह था तो एक गरीब मसखरा ही। उसने हाथी के गले में एक ढोल बांध दिया और छोड़ दिया। हाथी भटकता हुआ महाराजा के फीलखाने में पहुंच गया। लोगों ने यह बात महाराजा तक पहुंचाई। यह सुनकर रणजीत सिंह को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने मसखरे को बुलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपना हाथी दिया और तुमने इसकी यह दुर्दशा कर दी। 

मसखरे ने हाथ जोड़कर कहा कि महाराज! आप जानते हैं कि मैं कितना गरीब हंू। मैं ढोल बजाकर अपना पेट पालता हूं। मैंने इसके गले में ढोल बांध दिया ताकि यह भी ढोल बजाकर अपना पेट भर ले। यह बात सुनकर महाराजा रणजीत सिंह बहुत हंसी आई और अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने बहुत सारा धन देकर मसखरे को रवाना कर दिया।

हरियाणा में स्कूलों की दशा बदलने को सैनी सरकार ने कस ली कमर


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 150 नए राजकीय विद्यालयों के भवन को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करने का फैसला लिया है। यही नहीं, सीएम सैनी ने 719 उत्कृष्ट विद्यालयों में भी आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने और आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। वैसे भी सीएम ने पहले ही सरकारी स्कूलों में मुखिया को एक लाख रुपये तक स्कूल की व्यवस्था सुधारने के लिए बिना विभागीय अनुमति के खर्च करने की छूट दे रखी है। इतने रकम से स्कूलों में बच्चों के लिए पेयजल की व्यवस्था, लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था की जा सकती है। 

यदि स्कूल में पहले से ही ये सुविधाएं हैं, तो इससे दूसरे भी सुधारात्मक कार्य किए जा सकते हैं। स्कूलों में सुविधाएं बढ़ने और अध्यापकों की भर्ती से परीक्षा परिणाम में भी काफी सुधार आया है। याद करें कि 2023 में दसवीं का पास प्रतिशत केवल 57.73 प्रतिशत था, जो सरकार और अध्यापकों के संयुक्त प्रयास की वजह से 2024 में 94 प्रतिशत से ऊपर चला गया। 2025 में भी नियमित छात्रों का परिणाम 92.49 प्रतिशत रहा जो काफी संतोषजनक है। एएसईआर यानी एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट 2024 की रिपोर्ट में हरियाणा के सरकारी स्कूलों ने राष्ट्रीय औसत को भी पीछे छोड़ दिया था। 

रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों में कक्षा तीन, पांच और आठ में भाषा और गणित की दक्षता का स्तर देश के सरकारी और निजी स्कूलों के मिले-जुले औसत से अधिक है। इसी सुधार की झलक सुपर-100 जैसी योजनाओं में भी दिखाई देती है, जहां सरकारी स्कूलों के 21 बच्चों ने बड़े कीर्तिमान बनाए हैं। यह हरियाणा के लिए एक गौरव की बात है। हालांकि सैनी सरकार को शिक्षकों की भर्ती के संबंध में ध्यान देने की जरूरत है। यदि सभी विद्यालयों के लिए आवश्यकता के अनुरूप शिक्षकों की भर्ती की जाती है, तो इससे न केवल स्कूलों में होने वाली पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरेगी, वरन प्रदेश में बेरोजगारी भी कम होगी। 

विधानसभा में 27 फरवरी 2026 को कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला के सवाल का जवाब देते हुए शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा ने कहा था कि जनवरी 2026 तक 15,451 पद खाली हैं जिनमें 3,998 पीजीटी, 7,707 टीजीटी और 3,746 पीआरटी शामिल हैं। एक अन्य आंकड़े के अनुसार 298 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी नियमित शिक्षक नहीं है और 1,051 स्कूल केवल एक स्थायी शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। कुल मिलाकर हरियाणा के सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से बेहतर बनाने की है। सरकारी स्कूलों में इमारतें और बोर्ड रिजल्ट सुधर रहे हैं। जब तक हर कक्षा में शिक्षक और हर स्कूल में पानी, बिजली और इंटरनेट जैसी बुनियाद पूरी तरह पक्की नहीं होगी, तब तक सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी।

Sunday, August 2, 2026

जीभ ही अच्छा-बुरा कहलवाती है

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अरबी, फारसी और तुर्की साहित्य में लुकमान के संबंध में काफी कहानियां मिलती हैं। कहते हैं कि इनका जिक्र कुरान में भी किया गया है। साहित्य में इन्हें काफी बुद्धिमान बताया गया है। पुरानी पुस्तकों में इनका नाम लुकमान अल हाकिम के नाम से जाना जाता है। कुछ पुस्तकों में इन्हें बहुत बड़ा हकीम माना गया है। लुकमान के बारे में मशहूर है कि यह बचपन में गुलाम थे। 

जिस युग में हकीम पैदा हुए थे, उस युग में अरब देशों में गुलाम रखने का चलन था। जिस व्यक्ति के लुकमान गुलाम थे, वह बड़ा भला आदमी था। वह अपने गुलामों के प्रति दयाभाव रखता था और उन्हें बेवजह यातना नहीं दिया करता था। उनके सुख-दुख का ख्याल भी रखता था। उन्हीं दिनों लुकमान की बुद्धिमानी की चर्चा होने लगी थी। एक दिन इनके मालिक ने लुकमान को बुलाया और कहा कि आज मैं तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा लेना चाहता हूं। यदि तुमने मेरे सवालों का सही-सही जवाब दिया, तो तुम्हें गुलामी से मुक्त कर दूंगा। 

लुकमान मान गए। मालिक ने कहा कि यह बकरा ले जाओ और इसका जो भी अच्छा अंग हो वह लेकर आओ। हकीम थोड़ी दे बाद लौटे और अपने मालिक के सामने बकरे की जीभ रख दी। मालिक ने कहा कि क्या यही सबसे अच्छा अंग है? लुकमान ने कहा कि शरीर में जीभ अच्छी हो तो सब कुछ अच्छा होता है। मालिक ने कहा कि इसे हटाओ और सबसे बुरा अंग लेकर आओ। 

कुछ क्षण बाद लुकमान फिर जीभ लेकर लौटे और बोले-शरीर में जीभ बुरी हो, तो जीवन खराब कर देती है। लुकमान के जवाब से मालिक बहुत खुश हुआ। उसने समझ लिया कि लुकमान उसे क्या समझाना चाहते हैं। उसने तत्काल लुकमान को गुलामी से मुक्त कर दिया।

कैंसर से बचाव और रोकथाम के लिए लोगों का जागरूक होना बहुत जरूरी

अशोक मिश्र

कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कल ही फेफड़ा कैंसर दिवस मनाया गया है। हरियाणा सरकार ने भी लोगों को जागरूक करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जागरूकता सेमिनार, भाषण और खेलकूद प्रतियोगिताओं के माध्यम से कैंसर फैलने के कारण और निवारण पर चर्चा की गई, लेकिन यह भी सच है कि प्रदेश में कैंसर एक नई मुसीबत बनती जा रही है। अब यह केवल शहरी नहीं बल्कि ग्रामीण समस्या बन चुका है। पूरे प्रदेश में मुंह और फेफड़े के कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज मिल रहे हैं, वहीं महिलाओं में स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर और पुरुषों में फेफड़ा व प्रोस्टेट कैंसर प्रमुख हैं। 

राज्य में फेफड़े के कैंसर फैलने का प्रमुख कारण बीड़ी, तंबाकू और हुक्का है। इसके शिकार पुरुष और स्त्री दोनों हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार हरियाणा में 29.1 प्रतिशत पुरुष और 2.5 प्रतिशत महिलाएं तंबाकू का सेवन करती हैं। गांवों में बीड़ी, हुक्का और खैनी का प्रचलन अधिक है। चिकित्सकों के अनुसार ग्रामीण महिलाओं में कैंसर बढ़ने का प्रमुख कारण बीड़ी है। बीड़ी और हुक्का का उपयोग करने में ग्रामीण महिलाएं पुरुषों से बहुत ज्यादा पीछे नहीं हैं। 

हालांकि यह भी सही है कि शहरों में ही नहीं, अब ग्रामीण इलाकों में भी हालात बदल रहे हैं। स्त्री-पुरुष जागरूक हो रहे हैं। बस, चिंताजनक बात यह है कि शहरों में नई पीढ़ी में सिगरेट का चलन थोड़ा बढ़ रहा है। इस पर रोक लगाने का प्रयास करना होगा। इसके लिए केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं होंगे। नई पीढ़ी के अभिभावकों को भी नशे के खिलाफ उतरना होगा। अपने घर के बच्चों को समझाना होगा, इसके नुकसान समझाने होंगे, तभी युवाओं में बीड़ी, सिगरेट और हुक्के के प्रति बढ़ते आकर्षण को रोकना संभव होगा। वैसे राज्य सरकार ने बढ़ते कैंसर को चुनौती के रूप में लेते हुए इससे निपटने के लिए कई स्तर पर कदम उठाए हैं। इस कार्य में केंद्र सरकार आगे बढ़कर सहयोग भी कर रही है। 

केंद्र के सहयोग से झज्जर में राष्ट्रीय कैंसर संस्थान और अंबाला कैंट में अटल कैंसर केयर सेंटर जैसे केंद्र स्थापित किए गए हैं। जिला स्तर पर नॉन कम्युनिकेबल डिजीज कार्यक्रम के तहत मुंह, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की मुफ्त स्क्रीनिंग की जा रही है। सिविल अस्पतालों में फ्लोराइड लैब के माध्यम से पेयजल जांच करके कैंसर को फैलने से रोकने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। आशा कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। तंबाकू नियंत्रण अभियान के साथ-साथ आयुष्मान भारत के तहत मुफ्त इलाज की व्यवस्था की जा रही है। साल 2026 में राज्य सरकार ने 17 जिलों में नए डे-केयर कैंसर सेंटर शुरू किए हैं। ऐसी स्थिति में कैंसर से बचाव के लिए लोगों की जीवनशैली में बदलाव सबसे प्रभावी उपाय है, जिसमें तंबाकू और बीड़ी-हुक्का पूरी तरह छोड़ना होगा।

Saturday, August 1, 2026

बुजुर्ग होते पिता और नए खुलते वृद्धाश्रम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत में वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या यह बताने के लिए पर्याप्त है कि एकल परिवार में बुजुर्गों की स्थिति काफी दयनीय होती जा रही है। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तो परिवार के बुजुर्ग सदस्यों का मान-सम्मान भी बना रहता था और उनकी बुढ़ापे में देखभाल भी अच्छी तरह से होती रहती थी। परिवार में  अच्छा खासा दखल भी उनका बना रहता था, लेकिन एकल परिवार के चलन ने सब कुछ स्वाहा कर दिया है। 

मेरे एक मित्र दीनदयाल हैं। हमारी काफी पुरानी मित्रता है। वह जीवन भर एक सरकारी नौकरी की बदौलत अपना जीवन यापन करते रहे। कभी किसी से दो पैसे लेना भी गंवारा नहीं किया। हालांकि चाहते तो काफी कुछ कमा सकते थे। पांच-छह साल पहले मेरी मुलाकात लखनऊ में दीनदयाल से हुई। रिटायरमेंट का कुछ ही समय बचा था। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनकी बेटियों की शादी अच्छे खाते-पीते परिवार में हो गई है। 

एक बेटा अमेरिका में नौकरी करता है, वहीं उसने अमेरिकन लड़की से विवाह कर लिया है। चार-पांच साल में एकाध दिन के लिए आता है। दूसरा बेटा भी सरकारी नौकरी में है और वह दूसरे शहर में अपने परिवार के साथ रहता है। उनकी पत्नी की मृत्यु काफी पहले हो गई थी। 

एक साल पहले जब लखनऊ गया, तो उनसे मुलाकात हुई। दीनदयाल काफी कमजोर नजर आ रहा था। पूछने पर उसने एक गली की ओर इशारा किया और बताया कि वहां रहता है। दो महीने पहले लखनऊ गया, तो दीन दयाल से मिलने की इच्छा हुई। पूछते-पूछते वहां पहुंचा, तो पता लगा कि जहां दीनदयाल रहता है, वह एक वृद्धाश्रम है। पिछले कई साल से दीनदयाल वहीं रह रहा है, जबकि उसका एक बेटा लखनऊ में ही तबादला करवाकर रह रहा है। सोचता हूं, जिसने बच्चों के पालन-पोषण में सारी जिंदगी खपा दी, वही बच्चे अपने पिता को नहीं पाल पा रहे हैं।

सौ सप्ताह तक नशे के खिलाफ चलेगा अभियान, अब नजीर बनेगा हरियाणा

अशोक मिश्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो अगस्त को ‘नशा मुक्त युवा फार विकसित भारत संकल्प’ अभियान का शुभारंभ करेंगे। पीएम मोदी इस दौरान देश के एक करोड़ से अधिक युवाओं से वर्चुअली जुड़ेंगे और नशा मुक्त समाज के निर्माण का संकल्प लेंगे। हरियाणा जैसे राज्यों के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा, जहां सौ सप्ताह तक नशे के खिलाफ जनांदोलन की तैयारी चल रही है। 

प्रधानमंत्री के संबोधन के साथ ही सभी शिक्षण संस्थानों में एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ, नशा मुक्ति मित्र के रूप में पंजीकरण अभियान और फिट इंडिया से जुड़ी विशेष खेल गतिविधियों की शुरुआत होगी। हरियाणा ने अब नशे के खिलाफ लड़ाई को पुलिस फाइलों से निकालकर गली-मोहल्ले तक पहुंचाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी अपने संबोधन में कई बार इस बात को दोहरा चुके हैं कि नशे को खत्म करना सिर्फ पुलिस का काम नहीं, यह समाज की जिम्मेदारी है। 

नशा मुक्ति केवल उपचार या पुलिस कार्रवाई का विषय नहीं है, बल्कि यह विकसित भारत की पहली शर्त है। जब युवा नशे से दूर रहकर पढ़ेगा, खेलेगा, नवाचार करेगा, तभी वह देश और प्रदेश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बना पाएगा। प्रदेश में नशीले पदार्थों की बिक्री की स्थिति आज भी चिंताजनक बनी हुई है। हालांकि उसका स्वरूप बदल गया है। पहले जहां पंजाब से सटे सिरसा, फतेहाबाद, डबवाली जैसे सीमावर्ती जिलों में हेरोइन और अफीम की तस्करी ज्यादा होती थी। वहीं अब एनसीआर के जिलों फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल और पानीपत तक सिंथेटिक नशा और दोहरे उपयोग वाली दवाओं का जाल फैल गया है। पंजाब और राजस्थान की सीमा से सटा होने के कारण हरियाणा ट्रांजिट रूट भी रहा है। 

स्कूल-कॉलेज, औद्योगिक क्षेत्र और बॉर्डर के जिले इसके सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके माने जाते हैं। सस्ती दवाओं, सिंथेटिक ड्रग्स और अवैध शराब के जरिए तस्कर नेटवर्क ने युवाओं को निशाना बनाया। लेकिन हरियाणा पुलिस और नारकोटिक्स विभाग के आपसी तालमेल ने नशा कारोबार पर जबरदस्त चोट भी की है। राज्य सरकार की अब तक की सफलता को आंकड़ों में देखें तो कार्रवाई बड़े पैमाने पर हुई है। 2020 से 2025 तक के छह वर्षों में हरियाणा में एनडीपीएस एक्ट के तहत 20,519 एफआईआर दर्ज कर 35,207 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। बड़े तस्करों के खिलाफ 2,353 एफआईआर में 6,256 बड़ी मछलियों को पकड़ा गया है। वर्ष 2025 को तो अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई वाला साल माना जा रहा है, जिसमें अकेले 3,738 एफआईआर और 6,801 गिरफ्तारियां हुईं जिनमें 33 विदेशी नागरिक भी शामिल थे।

 इसके बावजूद मुख्यमंत्री सैनी का यह कहना सही है कि जब तक समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक हरियाणा को नशा मुक्त नहीं बनाया जा सकता है। अगर स्कूल, पंचायत, परिवार और प्रशासन एक साथ चले तो हरियाणा नशे के खिलाफ नजीर बन सकता है।