बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
स्वामी विवेकानंद हमेशा हर काम को एकाग्रचित्त होकर करने का संदेश दिया करते थे। वह लोगों को जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से ही समझाने का प्रयास करते थे। वैसे स्वामी विवेकानंद खुद अपनी यात्रा के दौरान हुए अनुभवों से सीख लेते थे।उन पर विचार करते थे और उसके बाद अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते थे। वह संन्यासी होते हुए भी लोगों के दुख-दर्द को दूर करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने कई देशों की यात्राएं की थीं। वह जहां भी जाते थे, जिज्ञासु लोग उन्हें घेर लेते थे और धर्म की चर्चा करते थे।
एक बार की बात वह किसी देश की यात्रा पर थे। वह लोगों से मिलते जुलते हुए घूम रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक पुल पर खड़े हुए कुछ लड़के बहते हुए अंडे के छिलके पर निशाना लगाने की कोशिश कर रहे हैं। उन सभी लड़कों में एक तरह की अघोषित प्रतियोगिता चल रही थी।
किसी भी लड़के का सटीक निशाना नहीं लग रहा था। स्वामी विवेकानंद कुछ देकर तक लड़कों का यह कौतुक देखते रहे। फिर उन्होंने एक युवक से कहा कि लाओ, बंदूक मुझे दो। एक लड़के ने अपनी बंदूक स्वामी जी को थमा दी। स्वामी जी ने पहला निशाना साधा। एकदम सटीक निशाना लगा।
इसके बाद उन्होंने दस निशाने लगाए, सारे निशाने सटीक लगे। लड़कों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि आपने यह कैसे कर लिया? स्वामी जी ने कहा कि जब तुम किसी काम को करो, तो अपना पूरा ध्यान उसी काम पर लगाओ। एकाग्रचित्त होकर यदि कोई काम करोगे, तो सफलता जरूर मिलेगी। पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर ही लगा दो। मैंने भी ऐसा ही किया। यही वजह है कि मेरे सारे निशाने ठीक लगे।









