Sunday, June 7, 2026

अमूल्य शरीर होते हुए अपने गरीब कहते हो


 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुंबिनी में हुआ था। जब उनकी मां महामाया अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तभी रास्ते में उन्हें प्रसव पीड़ा हुई और लुंबिनी में बुद्ध का जन्म हुआ। गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वह शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के पुत्र थे। 

चूंकि बुद्ध के जन्म के कुछ ही दिन बाद महामाया की मृत्यु हो गई थी, तो उनका पालन-पोषण उनकी मौसी और राजा शुद्धोधन की दूसरी पत्नी महाप्रजावती गौतमी ने किया था। इस वजह से वह गौतम कहलाए। बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद तथागत निरंतर यात्रा पर ही रहते थे। केवल वर्षाकाल में ही एक जगह रुकते थे। एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध प्रवचन दे रहे थे। उनके पास एक व्यक्ति आया। 

वह बहुत ही क्षीण दिख रहा था। महात्मा बुद्ध ने उससे पूछा कि तुम इतने क्षीण क्यों हो? उस व्यक्ति ने उदास मन से जवाब दिया, महात्मन! मैं बहुत गरीब हूं। मेरे पास रोजी-रोटी का भी कोई जरिया नहीं है। समय पर सही भोजन नहीं मिलने की वजह से मेरा शरीर क्षीण हो गया है। 

कुछ देर सोचने के बाद महात्मा बुद्ध ने कहा कि यदि तुम अपने एक कान मुझे दे दो, तो मैं दो हजार मुद्राएं तुम्हें दिला सकता हूं। उस व्यक्ति ने कहा कि मैं आपको अपने कान कैसे दे सकता हूं। महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले, यदि तुम अपनी एक आंख दे दो, तो मैं पांच हजार मुद्राएं दे दूंगा। 

उस व्यक्ति ने आंख देने से भी मना कर दिया। फिर बुद्ध ने दस हजार मुद्राओं में हाथ देने को कहा, लेकिन उसने इस बार भी मना कर दिया। तब बुद्ध ने कहा कि इतना अनमोल शरीर लेकर भी तुम अपने को गरीब कहते हो। यदि तुम मेहनत करो, तो तुम गरीब नहीं रहोगे। यह सुनकर व्यक्ति ने मेहनत करने का वचन दिया और अपने घर चला गया।

मरीजों की जान जोखिम में डाल देते हैं झोलाछाप डॉक्टर

अशोक मिश्र

हमारे देश में एक बहुत पुरानी कहावत है कि नीम हकीम खतरा-ए-जान। आधा अधूरा ज्ञान रखने वाला डॉक्टर या वैद्य मरीज की जान के लिए किसी खतरे से कम नहीं है। लेकिन हरियाणा में तो ऐसे लोग भी इलाज करते हुए पाए गए हैं जिनके पास आधा अधूरा भी ज्ञान नहीं है। फरीदाबाद के एसजीएम नगर में शाहीन बानू नामक महिला क्लीनिक चलाती हुई पकड़ी गई है जिसके पास कोई डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट नहीं थी। 

इस महिला के बारे में केंद्र सरकार के आनलाइन शिकायत पोर्टल पर किसी ने शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में गठित टीम ने शाहीन क्लीनिक पर छापा मारा, तब यह खुलासा हुआ कि महिला के पास शिक्षा या चिकित्सा से जुड़ा कोई भी कागज मौजूद नहीं है। उसके पास से भारी मात्रा में एलोपैथिक दवाएं भी बरामद हुई हैं। चिकित्सा के नाम पर भारी भरकम फीस वसूलने वाली महिला न जाने कितने लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर चुकी है। 

हरियाणा में झोलाछाप या अनपढ़ लोग क्लीनिक खोलकर लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। प्रदेश में झोलाछाप डॉक्टरों का कोई आधिकारिक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है क्योंकि इस तरह का सारा कारोबार चोरी-छिपे किया जाता है, लेकिन एक अनुमान के आधार पर बात कही जाए, तो पूरे प्रदेश में लगभग पचास से साठ हजार क्लीनिक ऐसे चल रहे हैं जिनके पास उपयुक्त डिग्री या डिप्लोमा नहीं है। प्रदेश में झोलाछाप डॉक्टरों की समस्या ग्रामीण और औद्योगिक इलाकों विशेषकर नूंह, पलवल और गुरुग्राम में गंभीर है। मेवात, नूंह, पलवल, फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे कई जिलों  में इन अवैध क्लीनिकों की भरमार है। 

ऐसे क्लीनिकों के फलने-फूलने का सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रदेश में योग्य चिकित्सकों की भारी कमी है। सरकारी अस्पतालों की संख्या भी आबादी के अनुपात में काफी कम है। जो सरकारी अस्पताल हैं भी, उनमें या तो डॉक्टरों की कमी है या फिर समय पर उपलब्ध नहीं होते हैं। स्वास्थ्य केंद्रों में चौबीस घंटे सेवा का कोई व्यवस्था नहीं है। रात में इमरजेंसी के समय मरीज कहां जाए। निजी अस्पतालों में एक सामान्य सी बीमारी के लिए फीस और दवा के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है। 

कमीशन के लिए निजी अस्पताल कई बार जरूरत से ज्यादा जांच लिख देते हैं जिससे मरीज परेशान हो जाता है। ऐसी स्थिति में गरीब और मध्यम आय वर्ग के लोग इन अवैध रूप से खुले क्लीनिकों की ओर रुख करते हैं। अवैध रूप से खुले क्लीनिक न केवल मरीजों की जान को जोखिम में डालते हैं, बल्कि इनका आर्थिक शोषण भी करते हैं। हजारों लोग रोज ऐसे कथित डॉक्टरों पर भरोसा कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग और सीएम फ्लाइंग स्क्वायड लगातार ऐसे क्लीनिकों पर छापा मारता रहता है, लेकिन ऐसे क्लीनिक रक्तबीज की तरह बढ़ते जा रहा है।

Saturday, June 6, 2026

ग्रीन बेल्ट आंदोलन ने दिलाया नोबेल पुरस्कार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

केन्या में 1 अप्रैल 1940 को पैदा हुई वंगारी मथाई ने एक छोटा सा एनजीओ स्थापित करके पूरी दुनिया को पर्यावरण बचाने का जो संदेश दिया, वह अद्भुत है। केन्या पूर्वी अफ्रीका में स्थित एक देश है। मथाई ने अमेरिका और कीनिया में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। 

वंगारी माथाई ने 1964 में कंसास के एटचिसन स्थित माउंट सेंट स्कोलास्टिका कॉलेज से जीव विज्ञान में डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने 1966 में पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय से मास्टर आॅफ साइंस की डिग्री हासिल की। ​​उन्होंने जर्मनी और नैरोबी विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट की पढ़ाई की और 1971 में नैरोबी विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की, जहाँ उन्होंने पशु चिकित्सा शरीर रचना विज्ञान भी पढ़ाया था। 

मथाई जब बड़ी हुईं तो उन्होंने पाया कि केन्या में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। उन्हें याद आया कि उनके गांवों में हर ओर हरियाली थी। गांव के किनारे घने जंगल थे जिनमें विभिन्न प्रकार के जीव जंतु रहते थे। नदियों का पानी बहुत साफ सुथरा रहता था। जिसका उपयोग लोग पीने में करते थे। खेतों में हर समय हरियाली रहती थी। लेकिन अब वह सब बीती बातें हो चुकी थीं। 

जंगल कटते जा रहे थे, नदियों का पानी प्रदूषित हो रहा था। खेतों में भी हरियाली बहुत कम हो गई थी। इससे मथाई को बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने 1970 में ग्रीन बेल्ट आंदोलन की शुरुआत की। उन्होंने कीनिया की महिलाओं को इससे जोड़ा और धीरे-धीरे पूरे देश में यह आंदोलन फैल गया। सन 2004 में मथाई को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अगले साल इन्हें जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया। सांसद और कीनिया सरकार में मंत्री रहीं मथाई का 26 सितंबर 2011 को नैरोबी में उनका निधन हो गया।

मानकों पर खरे न उतरने वाले होटलों, रेस्त्रां पर हो कार्रवाई

अशोक मिश्र

दिल्ली के मालवीय नगर में तीन जून को हुई घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। फ्लोरिश स्टे होटल में आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई थी। गुरुग्राम के विवेक अग्रवाल और उनके परिवार के आठ सदस्य भी होटल में लगी आग में जिंदा जल गए थे। विवेक अग्रवाल अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ दिल्ली साकेत के मैक्स हॉस्पिटल दाखिल अपने पिता से मिलने गए थे और फिर बाद में अपने परिवार और मौसा-मौसी के साथ नाश्ता करने मालवीय नगर के रेस्टारेंट में गए थे जहां सभी की जलकर मौत हो गई थी। 

दिल्ली की घटना को देखते हुए हरियाणा प्रशासन की भी नींद खुल गई है। उसने हर जिले में ऐसे होटलों और रेस्टोरेंट की पहचान करनी शुरू कर दी है जिनके पास फायर एनओसी है या नहीं। भवन का निर्माण निर्धारित मानकों पर किया गया है या नहीं। यदि  कोई संस्थान मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है, तो उसे नोटिस भेजा जा रहा है। इस मामले में कोई आधिकारिक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुमान है कि पूरे राज्य में हजारों होम स्टे, होटल और रेस्टोरेंट संचालित है जिन्होंने वैध तरीके से फायर एनओसी हासिल नहीं की है। 

यह सभी अन्य मानकों पर भी खरे नहीं उतरते हैं। हर जिले में संचालित सैकड़ों होटलों और रेस्टोरेंटों में से केवल दस-बारह फीसदी के पास ही फायर विभाग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) है। घनी आबादी में संचालित प्रतिष्ठान किसी भी समय बड़े हादसे को न्योता दे सकते हैं जिससे जान-माल का भारी नुकसान संभव है। लगभग हर जिले में ढेर सारे होटल घनी आबादी में स्थित हैं जहां संकरी गलियों के कारण आग लगने जैसी आपदा आने पर दमकल वाहनों के पहुंचने में भी दिक्कत आ सकती है। 

यदि कोई हादसा हो जाए तो फायर विभाग के कर्मचारियों को विपदा में फंसे लोगों तक राहत पहुंचा, उन्हें बचाना काफी मुश्किल हो जाता है। होटल, रेस्टोरेंट और पेट्रोल पंप जैसे प्रतिष्ठानों में फायर सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य है। नियमित जांच, अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता और फायर एनओसी किसी भी दुर्घटना के दौरान जान-माल की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। लेकिन कई बार विभागीय अधिकारियों की भी ऐसे में मामले लापरवाही सामने आती है। 

कई प्रतिष्ठानों में फायर सेफ्टी उपकरण या तो लगाए ही नहीं गए हैं या फिर वे अनुपयोगी स्थिति में हैं। राज्य के ज्यादातर होटलों, होम स्टे या रेस्टोरेंट में स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म जैसे जरूरी फायर सेफ्टी उपकरण या तो हैं नहीं या फिर काम ही नहीं कर रहे हैं। कुछ होटल और रेस्टोरेंट तो ग्राउंड फ्लोर पर बने गोदाम में गैस सिलेंडर तक रखते हुए पाए जाते हैं। इससे आग लगने पर हालात काफी विस्फोटक हो जाते हैं। स्थानीय प्रशासन को इस संबंध में काफी गंभीरता से काम करना होगा और नियम विरुद्ध बने होटलों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी।

Friday, June 5, 2026

जीवन के अनुभवों से सीखा लिखना

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहते हैं कि कलम में बहुत ताकत होती है। लेखनी की बदौलत किसी देश की सत्ता बदली जा सकती है, तो किसी गलत नियमों को बदलने पर शासन को मजबूर किया जा सकता है। अमेरिकी उपन्यासकार अपटन बिल सिनक्लेयर जूनियर का उपन्यास द जंगल जब प्रकाशित हुआ, तो अमेरिकी जनता में काफी रोष फैल गया। 

उपन्यास में मांस पैकिंग उद्योग में श्रम और स्वच्छता की खराब स्थितियों को वर्णन किया गया था। बाद में सरकार ने नियम बनाकर मांस पैकिंग उद्योग में स्वच्छता का पालन करवाया। सिनक्लेयर के पिता शराब व्यवसायी थे। वह खुद भी इतना ज्यादा शराब पीते थे कि वह अपना व्यवसाय चौपट कर बैठे थे। नतीजा यह हुआ कि दस साल की उम्र तक सिनक्लेयर को स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। 

लेकिन पढ़ने-लिखने की लगन के चलते तमाम परेशानियों के बावजूद उन्होंने कालेज तक की पढ़ाई की। कालेज की फीस चुकाने के लिए सिनक्लेयर को सस्ती किताबों का लेखन भी करना पड़ा। वह दिन रात मिलाकर आठ हजार शब्द लिखने की कोशिश करते थे। उन्होंने सस्ते लेखन से एक अपार्टमेंट खरीदा और अपने माता-पिता को उसमें शिफ्ट किया। 

उन्होंने जून 1897 में सिटी कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बाद में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई की, लेकिन उनकी रुचि लेखन में अधिक थी। उन्होंने स्पेनिश, जर्मन और फ्रेंच सहित कई भाषाएँ सीखीं। वैसे तो उनके पहले चार उपन्यास खास लोकप्रिय नहीं रहे, लेकिन द जंगल ने उन्हें प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार दिलाया। नब्बे वर्ष की आयु में 25 नवंबर 1968 को उपन्यासकार अपटन सिनक्लेयर की मृत्यु हो गई।

संगठित अपराध के खिलाफ हरियाणा पुलिस ने कसी कमर

अशोक मिश्र

कोई भी राज्य संगठित अपराध को रोकने में तो सफल हो सकता है, लेकिन असंगठित अपराध को रोक पाना किसी भी राज्य की पुलिस या खुफिया विभाग के लिए संभव नहीं है। असंगठित अपराधों में ऐसे अपराध आते हैं जो योजना बनाकर नहीं किए जाते हैं। अगर कोई दो व्यक्ति किसी चौराहे पर झगड़ कर बैठें और एक व्यक्ति चाकू या बंदूक निकालकर हत्या कर दे, ऐसे अपराध को रोकना किसी के भी वश में नहीं है। 

आपसी झगड़े में हुई हत्या, किसी महिला या बच्ची के साथ किया गया दुष्कर्म जैसे न जाने कितने अपराध हैं जो असंगठित अपराध की श्रेणी में आते हैं। कोई आदमी कब क्या कर बैठेगा, इसका अंदाजा पहले से नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन संगठित अपराध को काफी हद तक रोका जा सकता है। संगठित अपराध अपराधी गिरोहों द्वारा अंजाम दिया जाता है। हरियाणा पुलिस और खुफिया एजेंसियां संगठित अपराध को रोकने का हरसंभव प्रयास कर रही हैं। काफी हद तक उन्हें सफलता भी मिली है। 

एसटीएफ ने वर्ष 2024 में 323, वर्ष 2025 में 470 और 2026 में 28 मई तक 148 गैंग सदस्यों को गिरफ्तार किया है। इस तरह पिछले तीन वर्षों में कुल 941 गैंगस्टर और उनके सहयोगी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। इतना ही नहीं, हरियाणा पुलिस ने संगठित अपराध और गैंगस्टर नेटवर्क पर शिकंजा कसने के लिए राज्य के 10,892 जघन्य अपराधियों की डिजिटल कुंडली तैयार की है। हत्या, हत्या के प्रयास और अन्य गंभीर अपराधों में शामिल इन अपराधियों का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार कर उनकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। हरियाणा पुलिस ने चार जिलों के नाम पर विशेष यूनिट भी तैयार की है जो संगठित अपराधी गिरोहों पर विशेष नजर रख रही है। 

पिछले दिनों रोहतक, झज्जर, सोनीपत और फरीदाबाद जिलों में संचालित विशेष आरजेएसएफ (रोहतक-झज्जर-सोनीपत-फरीदाबाद) यूनिट की कार्यप्रणाली और उपलब्धियों की समीक्षा भी की गई है जिसके परिणाम उत्साहजनक पाए गए हैं। आरजेएसएफ यूनिट उन युवाओं और छोटे अपराधियों पर भी नजर रख रही है जिन्हें गैंगस्टर गिरोह अपने नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश कर सकते हैं। हरियाणा में संगठित अपराध और गैंगस्टर सिंडिकेट मुख्य रूप से जबरन वसूली (फिरौती), टारगेट किलिंग और हथियारों की तस्करी में लिप्त हैं। अपराधी गिरोह आए दिन हरियाणा में व्यापारियों, नेताओं और बड़े उद्योगपतियों को रंगदारी देने के लिए धमकाते रहते हैं। 

विदेश में बैठा अपराधी गिरोह का मुखिया प्रदेश में टारगेट किलिंग जैसे अपराध को अंजाम देता रहता है। पुलिस ऐसे कई अपराधियों को भारत लाने में भी सफल हो चुकी है। हरियाणा एसटीएफ अब तक 22 वांछित गैंगस्टरों को विदेशों से डिपोर्ट या प्रत्यर्पित कर भारत ला चुकी है। अकेले 2026 में अब तक नौ गैंगस्टरों की वापसी सुनिश्चित की गई है। 

Thursday, June 4, 2026

फिल्म देखकर रो पड़े अल्बर्ट आइंस्टीन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जब दो महान हस्तियां एक दूसरे से मिलती हैं तो उनमें जो संवाद होता है, वह बड़ा ही रोचक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक होता है। कभी किसी ने महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से किसी ने पूछा था कि वह फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों में से किससे मिलना पसंद करेंगे? तब उन्होंने जवाब दिया था कि वह मूक फिल्मों के हास्य कलाकार चार्ली चैपलिन से मिलना पसंद करेंगे। 

बीसवीं सदी के महान वैज्ञानिकों में अल्बर्ट आइंस्टीन की चर्चा होती है। मानव समाज की सेवा करने में अल्बर्ट आइंस्टीन का कोई मुकाबला नहीं था। वहीं चार्ली चैपलिन ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया था। वह फर्श से अर्श तक पहुंचे थे। उनकी फिल्मों में संवाद न होते हुए भी भावनाएं बड़ी बारीकी से प्रकट हो जाती थीं। 

बात 2 फरवरी 1931 की है। लास एंजिल्स में चार्ली चैपलिन की फिल्म सिटी लाइट्स का प्रीमियर शो रखा गया था। इस शो में अल्बर्ट आइंस्टीन भी पहुंचे थे। संयोग से चार्ली चैपलिन भी अपनी फिल्म का शो देखने थिएटर में आए हुए थे। इन दोनों महान हस्तियों को देखते ही भीड़ पागल हो गई। वह उनके स्वागत में शोर मचाने लगी। लोग उनको देखने और हाथ मिलाने के लिए बेताब हो गए। 

तब आइंस्टीन ने चैपलिन से कहा कि आपकी कला में मुझे सबसे ज्यादा जो बात पसंद है, वह है आपकी सार्वभौमिकता। आप एक शब्द नहीं बोलते, फिर भी पूरी दुनिया आपको समझती है। तब चैपलिन ने तपाक से कहा कि यह सच है। लेकिन आपकी प्रसिद्धि इससे भी बड़ी है। दुनिया आपकी तब भी तारीफ करती है, जब कोई आपको समझता ही नहीं है! फिल्म देखने के दौरान चैपलिन यह देखकर दंग रह गए कि अंतिम दृश्य देखकर आइंस्टीन की आंखों में आंसू आ गए थे।

कब तक सरपंचों, पार्षदों के हक का उपयोग करते रहेंगे पति?

 

अशोक मिश्र

आए दिन अखबारों में खबरें छपती रहती हैं कि सरपंच पति ने बैठक में भाग लिया और लोगों को आश्वासन दिया कि पंचायत के अंतर्गत आने वाली सड़कों की मरम्मत कराई जाएगी। ऐसी ही कुछ खबरें पार्षद पति के संबंध में आती रहती हैं। सरपंच पति या पार्षद पति कोई संवैधानिक पद नहीं है। जब किसी पंचायत की सरपंच कोई महिला चुनी जाती है, तो लोग उसके पति को सरपंच पति कहने लगते हैं। 

यही हाल वार्डों में किसी महिला के पार्षद चुने जाने पर होता है। आमतौर पर देखने में यह आता है कि जब कोई महिला सरपंच या पार्षद अथवा अन्य पदों पर चुनी जाती है, तो प्राय: उसके पति ही सारा कामकाज संभालते हैं। कई मामलों में महिला सरपंच के पति स्वयं को सरपंच प्रतिनिधि बताकर सरकारी बैठकों, प्रशासनिक कार्यों और सुनवाई की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। सच तो यह है कि ऐसी स्थिति महिलाओं को मिले सांविधानिक अधिकारों और पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने की मूल भावना के विपरीत है। 

दरअसल, पंचायतों में महिला आरक्षण की पहल का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को जाता है जिन्होंने 1989 में पहली बार संसद में 64वां संविधान संशोधन विधेयक पेश कर पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था। बाद में पंचायती राज में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण, पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से दिलवाया, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था। ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निहितार्थ यह था कि देश में सबसे ज्यादा पिछड़ी स्त्री जाति को भी उनकी उन्नति के मार्ग पर चलाने का प्रयास किया जाए।

 घरों से निकल जब महिलाएं कार्य क्षेत्र में आएंगी, तो वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगी और महिलाओं को भी जागरूक करेंगी। लेकिन कुछ मामलों में ऐसा नहीं हुआ। पुरुषों ने अपनी पत्नियों को घर पर बिठा दिया और उनका पति होने के नाते शासन करने लगे। अभी हाल ही में हरियाणा राज्य सूचना आयोग ने महिला सरपंच की जगह उनके पति द्वारा सरकारी बैठकों और सूचना का अधिकार में पैरवी करने पर कड़ा संज्ञान लिया था। 

आयोग ने स्पष्ट किया था कि महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों या प्रॉक्सी की भागीदारी पूरी तरह से गैर-कानूनी है। हरियाणा में ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। गुरुग्राम जैसे नगर निगमों ने भी महिला पार्षदों की जगह उनके पतियों के बैठक में बोलने या हस्तक्षेप करने की प्रथा के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। महिलाओं को यदि अपनी स्थिति में सुधार लाना है, तो उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों का खुद पालन करना होगा। तभी महिला सशक्तिकरण का सपना साकार होगा।

Wednesday, June 3, 2026

विश्वास करने लायक आदमी कौन है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमें अपने जीवन में केवल उस आदमी पर विश्वास करना चाहिए जो आपकी परेशानी सुनकर आपकी मदद करे और किसी दूसरे के सामने उसका जिक्र तक न करे। इस संबंध में एक रोचक कथा है। किसी राज्य में गुरुकुल में उस सत्र के शिष्यों की पढ़ाई का आखिरी दिन था। 

सारे शिष्य बहुत प्रसन्न थे कि  अब उन्हें घर जाने को मिलेगा। बस, कुलपति का अंतिम उपदेश देना बाकी था जो शिक्षा सत्र खत्म होने का अनिवार्य अंग था। सारे शिष्य एक जगह उपस्थित थे। तभी वहां पर कुलपति भी आ गए। उन्होंने लकड़ी के बने हुए तीन गुड्डे देते हुए कहा कि तुम्हें इनमें अंतर बताना है। सबने उन तीनों गुड्डों को देखा, लेकिन अंतर नहीं बता सके। 

तभी एक शिष्य ने कहा कि अरे, इन गुड्डों में तो छेद है। तब कुलपति ने कहा कि सही बात है। उन्होंने एक तार देते हुए कहा कि इन तीनो गुड्डों के छेद में डालो। एक गुड्डे के कान के पास छेद था। उसमें तार डालने पर वह दूसरे कान से बाहर निकल गया। दूसरे गुड्डे के कान में तार डालने पर मुंह से तार निकल गया। तीसरे गुड्डे के कान में तार डालने पर वह कहीं से नहीं निकला। न कान से, न मुंह से, वह पेट में चला गया।

तब कुलपति ने कहा कि तुम सबके जीवन में तीन तरह के लोग मिलेंगे। एक तो इस कान से सुनेंगे और दूसरे कान से निकाल देंगे। तुम्हें ऐसे लोगों पर विश्वास नहीं करना है। दूसरे तरह के वह लोग होंगे जो आपकी बात सुनेंगे और दूसरों को बताएंगे। तुम्हें ऐसे लोगों से भी दूर रहना है। 

तीसरे तरह के लोग आपकी समस्या को सुनेंगे, संभव होगा तो मदद करेंगे और पेट में रख लेंगे। किसी से बताएंगे नहीं। तुम्हें ऐसे ही लोगों पर विश्वास करना है। इसके बाद कुलपति ने सबको घर जाने की इजाजत दे दी।

अरावली क्षेत्र में चेकडैम बनाकर रोका जा सकता है बरसाती पानी

अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र को बचाने की मुहिम काफी दिनों से चलाई जा रही है। अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन और पेड़ों की कटाई की वजह से बरसात के दिनों में पानी बहकर नालों और नदियों में बह जाता है। पहले अरावली पर्वत पर उगे पेड़-पौधे और पहाड़ों में पड़ी दरारें बरसाती पानी को सोखकर इलाके को रिचार्ज करती रहती थीं। लेकिन जैसे-जैसे पेड़ों की कटान होती गई और छोटी-छोटी पहाड़ियों को अवैध रूप से खनन करके मिटाया गया भूमि का रिचार्ज होना बंद हो गया। 

ऐसी स्थिति में अरावली क्षेत्र में बरसाती पानी के सरंक्षण के लिए फरीदाबाद महानगर विकास प्राधिकरण ने बहुत अच्छी योजना बनाई है। उसने बुढ़िया नाले पर छोटे बांध बनाकर जल का प्रबंधन करने की योजना तैयार की है। बुढ़िया नाले में चेक डैम बनाने से पहले उसका विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। रिपोर्ट मिलने के बाद चेकडैम बनाने की योजना तैयार की जाएगी। यह कदम अरावली क्षेत्र में जल और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। पूरे अरावली क्षेत्र में आने वाले गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, चरखीदादरी, नारनौल और रेवाड़ी जैसे शहरों में लगातार भू-जल दोहन के चलते भू जल स्तर बहुत अधिक नीचे चला गया है। 

कई दशक पहले तक इन शहरों के भू जल स्तर को अरावली की पहाड़ियां रिचार्ज करती थीं, लेकिन जैसे-जैसे पहाड़ियां अवैध खनन और पेड़ों की अवैध कटाई की वजह से बरबाद होती गईं, भूमि का रिचार्ज होना कम होता गया। विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला में प्रतिवर्ष होने वाली वर्षा का एक तिहाई हिस्सा अवशोषित करने की क्षमता है। पहाड़ियों से वर्षा जल का 10-12 प्रतिशत हिस्सा बहकर निकल जाता है। पहाड़ियों से बहकर निकला यह पानी आसपास के इलाकों के लिए भूजल पुनर्भरण का काम करता है। 

अरावली पर्वतमाला से बहने वाले वर्षा जल को अवशोषित करने और वाष्पीकरण के कारण होने वाले नुकसान को कम करने के लिए, ढलान वाले इलाकों से बहने वाले पानी को संग्रहित करने के लिए वर्षा जल संरचनाएं बनाई जाती हैं। हरियाणा उन क्षेत्रों में आता है जहां भूजल का स्तर बहुत तेजी से घट रहा है। इन क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए लगभग 60-70 लाख रुपये की औसत लागत से लगभग 300 जल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए। 

अरावली क्षेत्र में हर साल बह जाने वाले पानी को यदि चेकडैम के जरिये रोका जाए, तो इससे न केवल भूजल स्तर में सुधार हो सकता है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में जल की उपलब्धता भी बढ़ाई जा सकती है। फरीदाबाद महानगर विकास प्राधिकरण की यही करने की योजना है। यदि इस योजना को गुरुग्राम,रेवाड़ी, नूंह, नारनौल जैसे जिलों में लागू किया जाए, तो बरसात के दिनों में बह जाने वाले पानी के एक बड़े हिस्से को संरक्षित किया जा सकता है।