Wednesday, April 1, 2026

सुकरात बोले, मैं तो सबसे बड़ा अज्ञानी हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अपने ज्ञान का घमंड कभी नहीं करना चाहिए। विनम्रता और लोगों को अपने से उच्च मानना, सच्चे ज्ञानी की निशानी है। जो वास्तव में ज्ञानी होता है, उसे अपने ज्ञान का अभिमान कभी नहीं होता है। वह हमेशा लोगों की भलाई करता रहता है, लेकिन बदले में वह आभार व्यक्त कराना भी नहीं चाहता है। 

बात उस समय की है, जब यूनान में सुकरात के ज्ञान की दूर-दूर तक चर्चा थी। उन्हीं दिनों एक संत भी ऐसे थे जो ज्ञानी थे और सुकरात उनकी बहुत प्रशंसा करते थे। एक दिन एक व्यक्ति उस संत के पास पहुंचा और संत से कहा कि महात्मा जी, मैं अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहता हूं। आप कोई ऐसी शिक्षा या ज्ञान दें जिससे मेरा जीवन बेहतर हो जाए। 

उस व्यक्ति बात सुनकर संत ने कहा कि भाई, मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूं। मैं आपको ज्ञान कैसे दे सकता हूं। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने आपका बहुत नाम सुना है। आपकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है और आप अपने को साधारण व्यक्ति बता रहे हैं। इस पर संत ने कहा कि यदि तुम सचमुच ज्ञान पाना चाहते हो, तो सुकरात के पास चले जाए। 

वह यूनान के सबसे ज्ञानी व्यक्ति हैं। वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुंचा। उसने सारी बात बताते हुए कहा कि वह जीवन को बेहतर बनाने का मंत्र सीखना चाहता है। इस पर सुकरात ने कहा कि जिस संत ने तुम्हें मेरे पास भेजा  है। वह कम से कम साधारण मनुष्य तो हैं। मैं साधारण मनुष्य भी नहीं हूं। मैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूं। वह व्यक्ति फिर संत के पास पहुंचा, तो संत ने कहा कि जब सुकरात जैसा ज्ञानी अपने को अज्ञानी कह रहा है, तो यह उनके ज्ञानी होने का प्रमाण है। यह सुनकर उस व्यक्ति ने इसे ही जीवन को बेहतर बनाने का पहला पाठ मान लिया।

सोशल मीडिया छीन रहा बच्चों की मानसिक ताकत और सुकून

अशोक मिश्र

वैसे तो सोशल मीडिया का अगर सदुपयोग किया जाए, तो यह बहुत ही कारगर साबित हो सकती है। विचारों के आदान-प्रदान के साथ-साथ सोशल मीडिया लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखने का बहुत सशक्त माध्यम है। लेकिन इसके दुरुपयोग के खतरे भी कम नहीं है। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। यह एक तरह से लत साबित होता जा रहा है जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास बाधित होता जा रहा है। 

हरियाणा के जिला अस्पतालों में अब ऐसे बहुत सारे मामले सामने आने लगे हैं जिनसे पता चलता है कि बच्चे एक लंबा समय सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं जिसके दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। राज्य के जिलों में जिला नागरिक अस्पतालों में आए बच्चों की समस्याओं को गंभीरता से जांचने के बाद पता चलता है कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने की वजह से उनका फोकस पढ़ाई से हट रहा है। 

वह जो कुछ स्कूल, कोचिंग या घर पर पढ़ रहे हैं, वह उन्हें याद नहीं हो रहा है। ज्यादातर बच्चे शारीरिक रूप से भले ही अपने क्लास में मौजूद हों, लेकिन दिमागी रूप से वह सोशल मीडिया पर ही होते हैं। यही वजह है कि उनके टीचर्स जो कुछ क्लास में पढ़ाते हैं, वह उनके भेजे में नहीं घुस रहा है। ऐसी अवस्था में उनकी याददाश्त भी प्रभावित हो रही है। 

बच्चे खुद भूलने की आदत से परेशान हैं, लेकिन वह सोशल मीडिया का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं। अपने बच्चों की ऐसी स्थिति देखकर पैरेंटस भी काफी परेशान हो रहे हैं। बच्चों की ऐसी स्थिति के लिए कई सामाजिक और पारिवारिक कारण जिम्मेदार हैं। अगर माता-पिता दोनों कामकाजी हैं या घर का वातावरण अशांत है, तो मां-पिता अपने बच्चों को मोबाइल में उलझाए रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं। घरों में रहने वाली महिलाएं भी अपने बच्चे को मोबाइल या लैपटॉप या डेस्कटॉप देकर अपने लिए थोड़ी देर का सुकून खोजने में लग जाती हैं। 

इसी का नतीजा है कि बच्चे अब सोशल मीडिया के आदी होते जा रहे हैं। बच्चे बाहर जाकर खेलने कूदने की जगह घर में ही रहकर सोशल मीडिया पर ही अपने लिए मनोरंजन तलाश रहे हैं। पहले बच्चे अपना ज्यादातर समय गली-मोहल्लों और पार्कों में खेलते-कूदते बिताते थे जिसकी वजह से वह मानसिक और शारीरिक रूप से ज्यादा मजबूत रहते थे। वह स्कूल में भी अच्छा प्रदर्शन करते थे। 

लेकिन आज के हालात में जब स्कूल और घर में बच्चों को बेवजह डांटा-फटकारा जाता है, तो वह तनावग्रस्त हो जाते हैं। उस तनाव से मुक्ति पाने के लिए बच्चे सोशल मीडिया पर समय बिताना उचित समझते हैं। यदि अपने बच्चों का भविष्य सुधारना है, तो सबसे पहले अभिभावकों, अध्यापकों को बच्चों से संवाद कायम करना होगा। उनकी समस्याओं को समझना होगा। उनकी दूसरे बच्चों से तुलना बंद करनी होगी, तभी वह सोशल मीडिया के जंजाल से मुक्त होंगे।

Tuesday, March 31, 2026

विसेंट वैन गॉग जिसे मरने के बाद सराहा गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अपने जीवन की अंतिम सांस लेने के समय ‘दुख हमेशा रहेगा’ कहने वाले डच चित्रकार विसेंट वैन गॉग को जीवन भर वह नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। मृत्यु के कई वर्षों बाद जब उनकी प्रतिभा को लोगों ने पहचाना और उन्हें अपने समय का महानतम चित्रकार माना। 

30 मार्च 1853 में नीदरलैंड्स में जन्मे वैन गॉग को बचपन से ही चित्रकला में रुचि थी। उनके परिवार के कई लोग कला से संबंधित व्यवसाय करते थे। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के काम किए। कई वह आर्ट डीलर बने जो उनके परिवार के दादा, चाचा आदि करते थे। 

निराशा के क्षणों में उन्होंने पादरी बनने का फैसला किया, लेकिन इस काम में भी वह विफल ही रहे। वैसे वैन गॉग का जन्म एक अमीर परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा उनकी मां की देखरेख में हुई थी। लेकिन वह अपने परिवार से जीवन भर लगभग कटे से रहे। एकाकी जीवन जीने की वजह से वह अस्थिर दिमाग वाले हो गए थे। कुछ लोग तो उन्हें मनोरोगी समझते थे। 

जब वह 27 साल के हुए, तो उन्होंने मुकम्मल तौर पर तय किया कि अब उन्हें चित्रकार ही बनना है। उन्होंने चित्र बनाना शुरू किया, लेकिन लोग उनके चित्रों के प्रति उदासीन ही रहते थे। वह अपने जीवन में केवल एक ही चित्र बेचने में सफल हो पाए थे। 

एक दशक से कुछ अधिक समय में, उन्होंने लगभग 2,100 कला कृतियाँ बनाईं, जिनमें लगभग 860 तैलचित्र थे, जिनमें से अधिकांश उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दो वर्षों में बनाईं। एक बार उन्होंने अपने को गोली मार ली। गोली उनकी रीढ़ की हड्डी में फंस गई। अस्पताल में ही 29 जुलाई 1890 में 37 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।

थोड़े से लालच के लिए रिश्तों की मर्यादा को भूल रहे लोग


अशोक मिश्र

रिश्तों को हर समाज में विशेष महत्व दिया जाता रहा है। माता-पिता, भाई-बहन, सास-बहू जैसे तमाम रिश्ते ऐसे होते हैं जो जीवन को व्यवस्थित और संतुलित बनाते हैं। भारत में ही नहीं, कई देशों में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है। आज भी बरकरार है, लेकिन संयुक्त परिवारों की संख्या में निस्संदेह भारी कमी  आई है। संयुक्त परिवारों की खूबी यह थी कि यदि परिवार का एक सदस्य आर्थिक रूप से कमजोर भी हो, तो परिवार के दूसरे लोग उसकी सहायता करते थे। 

एक साथ, एक ही घर में रहने और एक ही चूल्हे का भोजन करने की वजह से उनमें प्रेम बना रहता था। यदि कभी कोई ऊंच-नीच भी हो जाती थी तो परिवार का मुखिया समझा बुझाकर शांत कर देता था। बच्चे भी सब एक साथ खेलते-कूदते, खाते-पीते थे, अपने परिवार के बड़ों के साथ उठते-बैठते थे, तो उनमें प्रेम बना रहता था। वह रक्त संबंधों को समझते थे। भाई कितना भी बुरा हो, भाई होता था। लेकिन जैसे ही एक परिवार का चलन हुआ, रक्त संबंधों की महत्ता घटने लगी। 

अलग-अलग रहने की वजह से प्रेमभाव भी कम होते-होते लगभग खत्म हो गया। इसी वजह से अब समाज में छोटी-छोटी बातों पर भाई, बहन, देवर-भाभी, देवरानी-जिठानी जैसे रिश्तों में दरार आती जा रही है। थोड़े से फायदे के लिए लोग हत्या करने से भी हिचक नहीं रहे हैं। फरीदाबाद में ही बारह दिन पहले प्रापर्टी के पैसों की लालच में एक बहू ने अपनी सास की हत्या कर दी। 

रविवार को पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार होने के बाद आरोपी बहू ने खुलासा किया कि सास अपनी प्रापर्टी बेचने से मिले पैसे को दूसरे बेटे को देना चाहती थी। यह बात उसकी बड़ी बहू को मंजूर नहीं था। एक दिन उसने अपनी सास का गला दबा दिया। जब उसने देखा कि गला दबाने से भी सास की मौत नहीं हुई है, तो वह पेट पर बैठकर तब तक छाती पर घूंसे बरसाती रही, जब तक कि सास की मौत नहीं हो गई। सास की मौत होने के बाद उसने सबसे कहा कि उसकी सास की मौत बीमारी के चलते हो गई, लेकिन उसकी देवरानी को शक हो गया और उसने पुलिस से शिकायत कर दी। 

पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराया, तब जाकर हत्या की पुष्टि हुई। यह तो हमारे समाज की एक बानगी है। ऐसी घटनाएं रोज कहीं न कहीं हो रही है। कहीं बेटा पिता की हत्या कर रहा है, तो कहीं पिता अपने बेटे की। भाई भाई का हत्यारा है, तो भाई बहन का। लोग थोड़े से लालच के लिए  रिश्तों का कत्ल करने से हिचक नहीं रहे हैं। इन घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे समाज में रिश्तों की मर्यादा रह ही नहीं गई है। लेकिन इसी समाज में बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो परिवार और अपने निकटतम परिजनों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं।

Monday, March 30, 2026

आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। अगर आप अपने मन में ठान लें कि आप जीते हुए हैं, तो यकीन मानिए, हारी हुई बाजी भी आप हर हालत में जीत सकते हैं। बस मन में यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मुझे कोई हरा नहीं सकता है। परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं, लोग खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन यदि मन में विश्वास है, तो विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है। 

कभी एक समय ऐसा था कि यूनान को अजेय समझा जाता था। उसकी फौजों ने कभी हार का सामना नहीं किया था। जिस देश पर यूनान हमला करता था, उस देश का शासक या तो अधीनता स्वीकार कर लेता था या फिर राज्य छोड़कर भाग जाता था। पूरा यूरोप यूनान की फौजों के आतंक से संत्रस्त था। रोम के सेनापति सीजर यूनानी फौजों का यह भय अपने देश के सैनिकों और प्रजा के मन से निकालता चाहता था। 

वह काफी दिनों से सोच रहा था कि यूनानी सैनिकों को कैसे मजा चखाया जाए। फिर उसने यूनानी फौजों की अपराजेयता को ही निशाना बनाने की बात सोची। सीजर ने अपने देश के हर शहर, हर गांव की दीवार पर यह वाक्य लिखवाया, यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं, जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। आओ! हम सब तनकर खड़े हो जाएं और यूनानी फौजों को उनकी करनी का मजा चखाएं। 

इस वाक्य का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ। रोम की जनता उत्साहित हो गई। घर-घर युद्ध की तैयारियां हुईं। एक दिन यूनान की फौजें रोम की फौज के सामने आ खड़ी हुई। जमकर लड़ाई लड़ी गई और अजेय समझा जाने वाला यूनान परास्त हो गया। सीजर ने एक इतिहास रच दिया।

हरियाणा की सड़कों पर पैदल चलना भी नहीं रहा सुरक्षित

अशोक मिश्र

हरियाणा में अब सड़क पर पैदल चलना भी सुरक्षित नहीं रहा। पता नहीं, कब तेज रफ्तार में बस, कार, ट्रैक्टर या ट्रक आए और कुचलता हुआ निकल जाए। गुरुग्राम में शुक्रवार की शाम को तेज रफ्तार थार ने पैदल घर लौट रहे नाना और उनके दो नातियों को उड़ा दिया। रफ्तार इतनी तेज थी कि तीनों लोग घटना स्थल से लगभग बीस मीटर दूर जा गिरे। हादसे के बाद थार चालक वाहन रोककर घायलों को अस्पताल पहुंचाने की जगह वहां से फरार हो गया। 

काफी देर तक जब साठ वर्षीय नाना सुभाष और उनके दस और आठ वर्षीय दोनों नाती जब घर नहीं पहुंचे, तब उनकी तलाश शुरू हुई। काफी देर बाद तीनों लोगों को खोज निकाला गया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने तीनों को मृत घोषित कर दिया। सड़क पर किनारे चल रहे इन तीनों को कहां मालूम था कि पीछे से तेज रफ्तार थार के रूप में उनकी मौत आ रही है। 

हरियाणा के युवाओं में तेज रफ्तार से कार चलाना काफी शान की बात समझी जाती है। उन्हें तेज वाहन चलाने में एक किस्म का रोमांच महसूस होता है, लेकिन तेज रफ्तार से वाहन चलाने वाले युवा यह भूल जाते हैं कि उनके ऐसा करने से उनकी जान तो खतरे में रहती ही है, सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की जान को भी उतना ही खतरा बना रहता है। हरियाणा यातायात पुलिस से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में 57,901 लोगों की जान गई है। 

राज्य में पिछले 11 वर्षों में लगभग 1.15 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। 2017 में 11,258 सड़क दुर्घटनाओं में 5,120 लोगों की जान गई, जो 2014 के बाद सबसे अधिक है। हरियाणा में साल 2024 के दौरान 9806 सड़क हादसे हुए। इन हादसों में करीब 4689 लोगों की मौत हो गई, 7914 लोग घायल हुए। यह आंकड़ा साल 2023 के मुकाबले काफी कम है। खास बात यह है कि पुलिस ने साल 2024 के सड़क हादसों में घायल होने वाले 5313 लोगों को फस्ट एड की सुविधा मुहैया करवाई, वहीं 7090 घायलों को तुरंत प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया। साल 2023 में 10 हजार 168 सड़क हादसे हुए, जिनमें 5092 लोगों की मौत हुई है। साल 2022 में 11 हजार 130 सड़क हादसों में 5621 लोगों की मौत हुई थी। 

अधिकांश दुर्घटनाएं तेज गति, लापरवाही से गाड़ी चलाने और गलत दिशा में गाड़ी चलाने के कारण होती हैं। चालक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं या नशे में होते हैं, जो इन दुर्घटनाओं के कारणों में और इजाफा करता है। सड़क हादसों में लोगों की केवल मौत ही नहीं होती है, बहुत सारे लोग घायल भी होते हैं। कुछ लोग दिव्यांग हो जाते हैं। दिव्यांगता की वजह से पीड़ित व्यक्ति को जीवन भर तकलीफ उठानी पड़ती है। कुछ मामलों में जब परिवार में कमाने वाला व्यक्ति ही दिव्यांग हो जाए, तो पूरा परिवार बिखर जाता है।

युद्ध का इतना ही शौक है, तो अपने बेटे को भेजो लड़ने

संजय मग्गू

एसी कमरों में बैठकर 'युद्ध' का फैसला करना दुनिया का सबसे आसान काम है, क्योंकि वहां जान किसी और के बेटे की जाती है। यह एक कटु सत्य है। अभी हाल ही में इस कटु सत्य को उजागर किया है यूरोपीय संसद में स्पेन की आइरीन मोंटेरो ने। जब ट्रंप नाटो देशों से ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरने की अपील कर रहे थे, उसी दौरान यूरोपीय संसद में स्पेन की नेता, वामपंथी विचारक और महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली आइरीन मोंटेरो गरज रही थीं और उन राष्ट्राध्यक्षों को ललकार रही थीं जो युद्ध की हिमायत कर रहे थे। उन्होंने सीधे डोनाल्ड ट्रंप को घेरे में लेते हुए यहां तक कहा कि अगर ट्रंप को जंग का इतना ही शौक है, तो वे खुद मैदान में उतरें और अपने बेटों को फ्रंट लाइन पर भेजें। 

यह एक कटु सत्य है। मोंटेरो का यह बयान उन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो दूर बैठकर युद्ध की घोषणा करते हैं, सैनिकों को मरने के लिए युद्ध की आग में झोंक देते हैं। जैसे ही अपनी जान पर खतरा दिखता है, बंकरों में जाकर छिप जाते हैं। इन दिनों कई देशों के बीच युद्ध चल रहे हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चलने वाले युद्ध में हजारों सैनिक अब तक मारे जा चुके हैं। 

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले एक महीने से चल रहे युद्ध में किसको अपनी जान गंवानी पड़ी है? ईरान में तो वहां के सुप्रीम लीडर सहित सैन्य अधिकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, लेकिन क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या फिर बेंजामिन नेतन्याहू के परिवार से किसी को युद्ध में अपनी जान गंवानी पड़ी। नहीं। यह दोनों देश हमलावर हैं, ईरान हमला झेलने वाला देश है। युद्ध ईरान ने नहीं शुरू किया था। इसलिए एक तरह से युद्ध उसकी ही भूमि पर लड़ा जा रहा है। 

ऐसी स्थिति में उसे नुकसान होना स्वाभाविक है। जब भी कहीं किन्हीं दो देशों के बीच युद्ध होता है, तो इन युद्धों में मरने वाले गरीब मां-बाप के बेटे यानी सैनिक ही होते हैं। दुनिया भर के युद्धों का इतिहास खंगाला जाए, तो यही सिस्टम देखने को मिलेगा। राजा-महाराजा अपने महल में रंगरलियां मना रहा होता था, उनकी फौज के सिपाही अपने राजा के प्रति वफादारी निभाने के लिए अपनी जान न्यौछावर कर रहा होता था। 

दूसरों के बच्चों को युद्ध की आग में झोंक देने वाले राजा-महाराजा अपने को वीर बताते थे, लेकिन वास्तव में वह कायर ही होते थे। जिस दिन दुनिया के हर राष्ट्राध्यक्ष की औलादें सीमा पर बंदूक थामकर खड़ी होंगी, उसी दिन दुनिया के सारे विवाद बातचीत की मेज पर सुलझ जाएंगे। अगर ट्रंप, नेतन्याहू, पुतिन और ब्लादिमीर जेलेंस्की के बेटे-बेटियां हाथों में बंदूक लेकर लड़ने गए होते, तो यह  युद्ध पहले ही दिन खत्म हो गया होता। 

सत्ता के नशे में चूर राष्ट्रहित का नारा देने वाले राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद, नेता के सामने अपने बेटे-बेटियों को युद्ध के समय बार्डर पर भेजने की बाध्यता हो, तो कितने देशों के सत्ताधीश युद्ध के पक्ष में खड़े होंगे? शायद एक भी नहीं। सब शांति दूत बन जाएंगे।

Sunday, March 29, 2026

इस सवाल का उत्तर तो मेरा ड्राइवर दे देगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर किसी की संगति अच्छी या बुरी है, तो उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता है। यही वजह है कि हमारे महापुरुषों ने हमेशा सत्संगति में ही रहने की सलाह दी है। कहते हैं कि सत्संगति से बुरा आदमी भी अच्छा व्यवहार करने लगता है। कुसंगति के मामले में भी यही प्रतिक्रिया होती है। कुसंगति में अच्छे आदमी को भी बुरा बनने में तनिक भी देर नहीं लगती है। 

सत्संगति को लेकर अल्बर्ट आइंस्टीन से जुड़ी एक रोचक कथा कही जाती है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन अपने आविष्कारों की वजह से दुनिया भर में मशहूर थे। उन्हें जगह-जगह व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता था। उनके यहां एक ड्राइवर था। जब वह व्याख्यान देते थे, तो वह पीछे बैठकर उन्हें बड़े ध्यान से सुनता था। इसका नतीजा यह हुआ कि वह उनके विचारों से प्रभावित हो गया और विचार सुनते सुनते वह भी थोड़ा बहुत जानकार हो गया। 

एक दिन जब वह व्याख्यान देकर लौट रहे थे, तो ड्राइवर ने बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि सर, मैं भी मंचों पर आपकी तरह व्याख्यान दे सकता हूं। आज आपने जो कुछ कहा है, मुझे पूरी तरह याद हो गया है। आइंस्टीन ने हंसते हुए कहा, अच्छा, सुनाओ जरा। उसने पूरा भाषण सुना दिया। तब आइंस्टीन को मजाक सूझा। उन्होंने कहा कि अगली बार मुझे जहां जाना है, वहां तुम बोलना। ऐसा ही हुआ। 

आइंस्टीन ड्राइवर की वर्दी पहनकर पीछे बैठ गए। ड्राइवर का व्याख्यान सुनकर लोग तालियां बजाने लगे। इसी दौरान एक व्यक्ति ने कठिन बात पूछी। ड्राइवर ने हंसते हुए कहा कि इतने आसान सवाल का उत्तर तो मेरा ड्राइवर दे सकता है। आइंस्टीन खड़े हुए और जवाब दे दिया। आइंस्टीन ड्राइवर की बुद्धिमत्ता को देखकर चकित रह गए।

एलपीजी की किल्लत और दूसरे राज्य के मजदूरों में मची भगदड़

अशोक मिश्र

पश्चिमी एशिया में पिछली 28 फरवरी से चल रहे युद्ध का प्रभाव अब विश्व स्तर पर दिखाई देने लगा है। इससे हरियाणा अछूता कैसे रह सकता है। हरियाणा में भी एलपीजी और डीजल-पेट्रोल का संकट गहराने लगा है। लोगों में एलपीजी, डीजल पेट्रोल को लेकर दहशत फैलती जा रही है। इसमें अफवाह फैलाने वाले लोगों का बहुत बड़ा हाथ है। प्रदेश सरकार बार-बार एलपीजी, डीजल-पेट्रोल भरपूर होने की बात कह रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है। 

हां, यह बात सही है कि युद्ध से पहले जहां लोग जरूरत पड़ने पर एलपीजी बुकिंग कराते थे, वहीं अब लगभग हर आदमी गैस सिलेंडर भरवा कर रख लेना चाहता है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी न हो। ऐसी स्थिति में उन लोगों को ज्यादा दिक्कत होने लगी है जिसके पास वैध एलपीजी कनेक्शन नहीं है। ऐसे लोगों में ज्यादातर वह लोग शामिल हैं, जो दूसरे राज्यों से हरियाणा में नौकरी या मजदूरी करने आए हैं। अपना घर-बार छोड़कर हरियाणा में रोजगार की तलाश में आए लोग स्थायी नहीं रहते हैं। 

यह कुछ दिनों तक काम करते हैं, फिर अपने घर लौट जाते हैं। कुछ महीनों बाद यह फिर काम की तलाश में लौटते हैं। ऐसे लोगों का कोई स्थायी पता नहीं होता है। ऐसे लोग वैध एलपीजी कनेक्शन लेने की जगह छोटे गैस सिलेंडर से अपना काम चलाते हैं। गैस और तेल संकट की वजह से पिछले लगभग एक महीने से छोटा वाला सिलेंडर भरा नहीं जा रहा है। जब वैध वालों को ही गैस नहीं मिल पा रही है, ऐसे में छोटे गैस सिलेंडर वालों को जरूर परेशानी हो रही है। 

कालाबाजारी करने वालों ने भी आपदा में अवसर तलाश लिया है। वह महंगे दाम पर गैस बेच रहे हैं। राज्य में कुछ जगहों पर पांच सौ रुपये प्रति किलो गैस बिकने की खबरें अखबारों में छप रही हैं। ऐसी स्थिति में रोजाना कमाकर खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों, दूसरे राज्यों से आने वाले कामगारों के लिए परेशानी खड़ी हो गई है। पहली बात तो इन्हें रोज काम भी नहीं मिल पाता है। युद्ध के चलते काम-धंधा भी मंदा चल रहा है। ऐसी स्थिति में तीन-चार सौ रुपये किलो गैस खरीद पाना दिहाड़ी मजदूरों और निजी संस्थानों में काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों के लिए मुश्किल हो रहा है। 

ऐसी स्थिति में अपने घर लौट जाने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं बच रहा है। हालात इतने विकट हैं कि डीजल-पेट्रोल और एलपीजी की वजह से लाकडाउन जैसे हालात पैदा हो गए हैं। उद्योग-धंधे बंद होते जा रहे हैं। इन उद्योगों में काम कर रहे लोग बेरोजगार होने लगे हैं। ऐसी हालत में इनके पास अपने घर लौट जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा है। यही वजह है कि दूसरे राज्यों से आए मजदूरों में भगदड़ मची हुई है। गैस महंगी होने से खाना भी महंगा होता जा रहा है। ऐसी हालत में उन्हें घर लौटने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है।

Saturday, March 28, 2026

कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी के सीखने की एक निश्चित सीमा है। दुनिया में जितना भी ज्ञान है, उसे एक आदमी पूरा हासिल नहीं कर सकता है। विद्वान से विद्वान आदमी सब कुछ नहीं सीख सकता है, लेकिन हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सीखते जरूर रहना चाहिए। प्राचीन काल में एक दार्शनिक थे। काफी विद्वान थे, लेकिन वह विनम्र भी उतने ही थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं को लेकर आते थे। 

बहुत सारे शिक्षण संस्थानों के अध्यापक और विद्यार्थी उनके पास ज्ञान हासिल करने पहुंचते थे। लेकिन वह अपने पास आने वाले की शंकाओं और समस्याओं का हरसंभव तरीके से समाधान करने की कोशिश करते थे। उसके साथ ही साथ वह उनसे सवाल भी करते थे। उस व्यक्ति से हर तरह की जानकारी हासिल करने का प्रयास करते थे। यह देखकर एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा कि मैं देखता हूं कि जो लोग आपसे सीखने आते हैं, आप उनसे भी सीखने की कोशिश करते हैं। 

आप उनसे छोटी से छोटी बात पूछते हैं। आप सचमुच जानने की कोशिश करते हैं या सामने वाले के सामने न जानने का ढोंग करते हैं। यह सुनकर दार्शनिक पहले तो जोर-जोर से काफी देर तक हंसते रहे। फिर बोले, देखो, एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी में सब कुछ नहीं सीख सकता है। जितना वह सीखता है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा उससे छूट जाता है। 

दुनिया का समग्र ज्ञान एक व्यक्ति हासिल नहीं कर सकता है। मैं भी सब कुछ नहीं जानता हूं। इसलिए जो मैं जानता हूं, वह उसे बताता हूं, जो मैं नहीं जानता हूं, वह उससे सीखने की कोशिश करता हूं। व्यक्ति को जीवन में हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए। यह सुनकर मित्र चुप रह गया।