Friday, August 14, 2026

बुद्ध को गुरु बनाने में मुझे कोई संकोच नहीं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने कहा है कि जो कुछ दिखता है, उसमें दुख छिपा हुआ है। जो कुछ दृश्यमान है, वह जल्दी ही नष्ट हो जाने वाला है। ऐसी स्थिति में जब सब कुछ नष्ट हो जाने वाला है, तो उसके फंदे में पड़ा ही क्यों जाए। तपस्या या उपवास से इन स्थितियों को बदला नहीं जा सकता है। तो फिर तपस्या या उपवास करने का कोई मतलब भी नहीं है। इन स्थितियों से छुटकारा केवल मन से ही पाया जा सकता है। इसलिए मन को शुद्ध रखना चाहिए। 

उन दिनों मगध में कस्सप और नादिंकस्सप नाम के दो अत्यंत प्रसिद्ध साधु रहते थे। इन दोनों साधुओं की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी। इनके पांच-पांच सौ शिष्य थे। कस्सप और नादिंकस्सप का आदर मगध नरेश बिंबसार भी करते थे। एक दिन जब महात्मा बुद्ध अपने प्रवचन दे रहे थे, तो इन दोनों साधुओं ने भी उपदेश का श्रवण किया। इन दोनों साधुओं को महात्मा बुद्ध की बात सही लगी। 

इन दोनों ने बुद्ध को अपना गुरु बना लिया। अब यह दोनों साधु महात्मा बुद्ध के साथ ही रहने लगे। कुछ दिनों बाद संयोग से महात्मा बुद्ध बिंबसार की राजधानी राजगृह पहुंचे तो तथागत के साथ इन दोनों साधुओं को देखकर उन्हें बहुत आश्यर्य हुआ। उन्होंने महात्मा बुद्ध के साथ-साथ इन दोनों साधुओं का भी बड़े आदर के साथ स्वागत किया। एकांत मिलने पर बिंबसार ने कस्सप से पूछा-मेरी समझ में यह नहीं  आ रहा है कि एक वृद्ध साधु किसी नवयुवक का शिष्य कैसे हो सकता है। 

इस पर कस्सप ने जवाब देते हुए कहा कि बुद्ध ने हृदय को निर्मल रखते हुए लोक कल्याण की भावना से काम करने का रास्ता सुझाया जो मुझे उचित लगा। इसलिए मुझे बुद्ध को अपना गुरु बनाने में किसी प्रकार का संकोच नहीं है।


युवाओं को बरबाद कर रहा है ऑनलाइन गेम्स का फैलता जाल


अशोक मिश्र

हरियाणा में ऑनलाइन गेम्स का जाल फैलता जा रहा है। इससे काफी परिवार बरबाद हो रहे हैं। आनलाइन गेमिंग की लत में लोग अपनी जमा पूंजी तक लुटा रहे हैं। आनलाइन गेम अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या बन चुका है। गांव के खेतों से लेकर शहरों के दफ्तरों, खेल के मैदानों, घर और अन्य जगहों पर युवा अपने मोबाइल पर दिन-रात गेम खेलते दिखते हैं। शुरुआत में यह शौक छोटे-मोटे इनाम और टाइमपास के लिए होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह लत में बदल जाता है जहां व्यक्ति अपनी पूरी कमाई, बचत और फिर उधार लिया पैसा भी दांव पर लगा देता है। 

जब हार का कर्ज सिर पर चढ़ता है और वापसी का कोई रास्ता नजर नहीं आता तो कई लोग गहरे अवसाद में चले जाते हैं और कुछ तो आत्महत्या जैसा कठोर कदम भी उठा लेते हैं। फरीदाबाद एक व्यक्ति ने आनलाइन गेमिंग की लत के चक्कर में अपनी पूरी तनख्वाह दो घंटे में गंवा दी। इसके साथ ही उस पर पचास हजार रुपये का कर्ज भी हो गया। इस हताशा में उसने मंगलवार शाम को अगस्त क्रांति एक्सप्रेस के सामने कूदकर अपनी जान दे दी। आत्महत्या करने वाला व्यक्ति काफी दिनों से कर्ज की वजह से परेशान था। 

उसकी पत्नी ने उसे समझाया भी था कि वह दोनों मिलकर धीरे-धीरे कर्ज चुका देंगे। बस, उसे आनलाइन गेम खेलना बंद करना होगा। इसके बावजूद उस व्यक्ति की गेम खेलने की आदत नहीं छूटी। इस प्रवृत्ति के बढ़ने के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे पहला कारण है स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की हर हाथ तक पहुंच। हरियाणा में बेरोजगारी और अर्द्ध-बेरोजगारी के कारण बहुत से युवाओं के पास समय तो है पर स्थिर आय का साधन नहीं, ऐसे में जल्दी पैसा कमाने का लालच उन्हें इन गेम्स की ओर खींचता है। 

हरियाणा में सबसे ज्यादा प्रचलित गेम्स दो तरह के हैं। एक तरफ कौशल के नाम पर खेले जाने वाले पैसे वाले गेम्स हैं तो दूसरी तरफ बैटल रॉयल और युवाओं में लोकप्रिय गेम्स हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए केवल सरकार ही नहीं बल्कि परिवार और समाज को भी मिलकर काम करना होगा। परिवारों को चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल उपयोग पर नजर रखें। उनके बैंक लेन-देन की जानकारी रखें और खुलकर पैसे के बारे में बात करें। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल लिटरेसी और वित्तीय साक्षरता के बारे में बताया जाए कि कैसे ये गेम्स लत बनाते हैं। 

जो व्यक्ति कर्ज में फंस गया है, उसे अकेला छोड़ने के बजाय मनोवैज्ञानिक परामर्श और नशा मुक्ति केंद्रों जैसी सहायता देनी होगी, ताकि वह शर्म के कारण आत्महत्या की ओर न जाए। अगर समय रहते समाज, परिवार और सरकार ने मिलकर इस आॅनलाइन जुए की लत पर काबू नहीं पाया तो यह मेहनती युवाओं की कमाई और भविष्य दोनों को निगल जाएगी।

Thursday, August 13, 2026

मानव कल्याण के लिए संन्यासी बने गौतम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बात लगभग ढाई हजार साल पहले की है। शाक्य नरेशों की राजधानी कपिलवस्तु के राजमार्ग पर एक रथ दौड़ता हुआ चला जा रहा था। उस रथ पर राजकुमार गौतम विराजमान थे। युवा हो जाने के बाद शायद पहली बार राजकुमार सिद्धार्थ राजमहल से बाहर निकले थे। अब तक राजमहल से बाहरी दुनिया उनके लिए अपरिचित थी। उनके पिता को किसी ज्योतिषी ने बताया था कि आपका पुत्र चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर महान संन्यासी। पुत्र संन्यासी न बने, इसके लिए आमोद-प्रमोद की सारी व्यवस्थाएं की गई थीं। 

उस युग की सबसे सुंदर स्त्री यशोधरा से उसका विवाह हुआ था। एक दिन राजकुमार सिद्धार्थ नगर भ्रमण की जिद कर बैठे, तो पिता शुद्धोधन को अनुमति देनी पड़ी। कुछ दूर जाने पर राजकुमार गौतम ने देखा कि एक व्यक्ति एकदम जर्जर अवस्था में झुकी कमर के साथ लकड़ी से टेकता हुआ चला जा रहा है। वह लोगों से रोटी मांग रहा था, लेकिन शरारती लड़के उसे ढेले मार रहे थे। 

राजकुमार ने सारथी से पूछा, तो उसने बताया कि एक दिन सबको जरावस्था से गुजरना पड़ेगा। इससे कोई बच नहीं सकता है। आगे जाने पर उन्होंने एक शव को जाते देखा। पूछने पर सारथी ने बताया कि एक दिन सबको मरना है। इससे मुक्ति संभव नहीं है। कुछ दूर चलने पर उन्होंने एक गर्भवती स्त्री को अशक्त देखा, तो उन्होंने कारण पूछा। 

सारथी ने बताया कि बीमारी की वजह से यह महिला अशक्त हो गई है। इन बातों का राजकुमार गौतम पर बहुत प्रभाव पड़ा। एक दिन आधी रात में अपना सब कुछ छोड़कर गौतम संन्यासी बनने के लिए निकल पड़े ताकि दुनिया को रोग-शोक से मुक्ति का मार्ग तलाश सकें। यह मानव कल्याण के लिए अपने सुखों का अप्रतिम त्याग था।

सड़कों पर घूम रहे लावारिस पशु साबित हो रहे जानलेवा


अशोक मिश्र

सदियों से हरियाणा पशुपालन के मामले में अग्रणी रहा है। यहां लगभग हर घर में दूध-दही और मक्खन का उपयोग होता रहा है। सबसे ज्यादा पशु शायद आज भी हरियाणा में ही पाए जाते हैं। शहरीकरण और औद्योगिक विकास के चलते लोगों ने अब पशुओं को पालना कम कर दिया है। यहां दूध और दूध उत्पादों का कारोबार सबसे ज्यादा होता है। लेकिन पशुपालक जब तक पशु दूध देने लायक रहता है, तब तक उसकी देखभाल करते हैं। जहां पशु ने दूध देना बंद किया, उसे लावारिस सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। 

हरियाणा की सड़कों पर घूम रहे बेसहारा पशु अब जान-माल के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। हाल के महीनों में रेवाड़ी में दुकान जा रहे युवक को गाय ने सींगों पर उछालने और करीब एक मिनट तक कुचला था। यह घटना सीसीटीवी में कैद हुई थी और सोशल मीडिया पर काफी वायरल भी हुई थी। इसी जिले में पिछले दिनों रिटायर्ड कैप्टन जगराम यादव गाय ने कुचल दिया था जिनकी आज मौत हो गई है। बुजुर्ग दुकानदार प्रताप सिंह यादव गाय के हमले में घायल हो गए थे जिनकी बाद में मौत हो गई थी। 

फरीदाबाद में भी स्कूटी सवार कारोबारी आशु खत्री की मौत गोवंश की टक्कर के बाद हो गई थी। इस समस्या का निवारण केवल गौशाला खोलने से नहीं होगा। पूरे हरियाणा के लिए एक मुकम्मल व्यवस्था पैदा करना होगा। सबसे पहले तो पशुपालकों की जिम्मेदारी तय करनी होगी ताकि हर पालतू गोवंश की ईयर टैगिंग, उसका आधार जैसे रजिस्ट्रेशन और छोड़ने पर भारी जुर्माना लगना चाहिए। गौशालाओं को भी केवल दान पर निर्भर रहने वाला बनाने की जगह आत्मनिर्भर इकाई बनाना होगा। गोबर से बायो सीएनजी, खाद, अगरबत्ती और गौमूत्र से कीट नियंत्रक जैसे उत्पादों पर सरकारी खरीद गारंटी मिलनी चाहिए। 

सरकारी स्तर पर प्रयास पिछले दो-तीन वर्षों में तेज हुए हैं। हरियाणा सरकार का स्पष्ट लक्ष्य प्रदेश को बेसहारा गो-मुक्त बनाना बताया गया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी कई बार हरियाणा की सड़कों को लावारिस पशु मुक्त बनाने की घोषणा कर चुके हैं। इसके लिए प्रशासन, गौशालाएं और समाज मिलकर काम करें, यह निर्देश दिया गया है। प्रदेश में 619 पंजीकृत गौशालाओं के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में 228 करोड़ 58 लाख रुपये की चारा अनुदान राशि जारी की गई है और ढांचागत सुधार के लिए अलग से बजट दिया जा रहा है। इसके बावजूद हालत सुधर नहीं रही है। 

सबसे बड़ा बदलाव मुआवजे की नीति में आया है। दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय परिवार सुरक्षा योजना यानी दयालु-2 के तहत अब बेसहारा गाय, सांड, भैंस, नीलगाय और आवारा कुत्तों के हमले से मृत्यु, चोट या दिव्यांगता होने पर प्रभावित परिवार को पांच लाख रुपये तक का मुआवजा देने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इतना सब कुछ करने के बाद भी हादसे कम नहीं हो पा रहे हैं।

Wednesday, August 12, 2026

दुखी जनों की सेवा से होगा आत्म कल्याण

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध को आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्होंने प्रथम धर्म चक्र प्रवर्तन में जिज्ञासुओं को आत्म कल्याण मार्ग पर चलने को प्रेरित किया। नतीजा यह हुआ कि हजारों लोग ‘धर्मं शरणं गच्छामि’ का उद्घोष करते हुए आगे आए और इस तरह भिक्षु संघ का निर्माण हुआ। इस संघ में रहने वाले लोग भिक्षु कहे जाने लगे। मानव कल्याण ही इन भिक्षुओं का परम ध्येय था। महात्मा बुद्ध प्रत्येक भिक्षु का ध्यान रखते थे। तथागत के प्रिय शिष्यों में भदंत आनंद थे जो काफी विद्वान और ऊर्जावान थे। 

वह ज्यादातर बुद्ध के साथ ही रहते थे। एक दिन महात्मा बुद्ध ने एक भिक्षुक के बारे में पूछा कि वह आज नहीं दिखाई दिया। भदंत आनंद ने उत्तर दिया, भंते! वह अतिसार से पीड़ित है। इस वजह से वह आज दिखाई नहीं दिया है। महात्मा बुद्ध ने कहा कि चलो, उससे देख आएं। 

यह कहकर तथागत अपने शिष्य भदंत आनंद के साथ उस भिक्षुक की कुटिया में पहुंचे। कुटिया में पहुंचने पर बुद्ध ने देखा कि वह अपने ही मल-मूत्र में लिपटा हुआ पड़ा है। बुद्ध ने उससे पूछा कि तुम्हें क्या हुआ है? उस भिक्षुक ने बताया कि भगवन! मैं अतिसार से पीड़ित हूं। बुद्ध ने पूछा कि तुम्हारी सेवा करने कोई क्यों नहीं आया? उस भिक्षुक ने कहा कि सभी आत्म कल्याण की साधना में लगे हुए हैं। ऐसा वे कहते हैं। 

बुद्ध ने आनंद से घड़े में जल मंगाया और उस भिक्षुक का शरीर धोया। उसके मल-मूत्र को साफ किया। शाम को उन्होंने सभी भिक्षुओं को एकत्रित करके कहा कि तप साधना करने से मोक्ष या आत्म कल्याण की प्राप्ति होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानता हूं। सच्चे हृदय से दुखी जनों की सेवा करने से आत्म कल्याण की प्राप्ति जरूर होगी। एक भिक्षुक के बीमार होने और किसी के उसकी सेवा न करने का प्रसंग जानकर सभी भिक्षुक लज्जित हो उठे।

पैदल चलने वालों के लिए कब सुरक्षित होंगी सड़कें?


अशोक मिश्र

तेज रफ्तार गाड़ियों से लोगों के कुचले जाने की घटनाएं अब लोगों में भय पैदा करने लगी हैं। सड़क पर चलने वाले लोग अब अपने आपको असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। कब और कहां सड़क पर चलती हुई गाड़ी कुचल दे, इसका कोई ठिकाना भी नहीं है। फरीदाबाद के मेवला महाराजपुर में सड़क के किनारे खड़े तीन लोगों को तेज रफ्तार थार ने रविवार को कुचल दिया था। यह तीनों लोग मार्निंग वॉक पर निकले थे। इनमें से एक व्यक्ति की मौत हो गई। मार्निंग वॉक पर निकले इन तीन लोगों को सपने में भी यह अंदेशा नहीं रहा होगा कि उनके साथ ऐसी घटना होने वाली है। 

ऐसी घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण गाड़ी को ताकत और स्टेटस सिंबल समझने की मानसिकता है। थार जैसी बड़ी एसयूवी युवाओं में काफी लोकप्रिय है। इन गाड़ियों से वह शो ऑफ, दबंगई और सड़क पर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश करते हैं। थार जैसी गाड़ियों से स्टंट करने, खाई में गिरने, नशे में लोगों को कुचलने और ड्रिफ्ट करते हुए लोगों की जान जोखिम में डालने जैसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। सड़क पर होने वाले ज्यादातर हादसों के पीछे वाहन चालकों का नशे में होना है। 

इसके साथ ही हमारे शहरों में बुनियादी ढांचे की कमी भी जिम्मेदार है। राज्य के कई जिलों की घनी आबादी वाले इलाकों में सड़क पर चलने वालों के लिए न तो सुरक्षित फुटपाथ है, न फुट ओवर ब्रिज, न स्पीड ब्रेकर और न ही स्पीड कैमरे। लोग मजबूरन मुख्य सड़क या सर्विस लेन पर ही चलते हैं। इसका समाज पर असर बहुत गहरा और खतरनाक है। जब सुबह टहलने निकला एक बुजुर्ग या एक आम कर्मचारी सड़क पर ही कुचल दिया जाता है, तो लोगों के मन में असुरक्षा बैठ जाती है। 

लोग अपने बच्चों को साइकिल चलाने या बुजुर्गों को पार्क तक अकेले भेजने से डरने लगते हैं। इससे एक पूरी पीढ़ी का खुली हवा में निकलना, पैदल चलना और स्वस्थ रहना बंद हो जाता है। ऐसी घटनाएं कानून और सिस्टम पर से भरोसा कमजोर करती हैं। लोग सोचने लगते हैं कि सड़क पर चलने वाला गरीब पैदल यात्री और बड़ी गाड़ी में बैठा अमीर चालक कानून की नजर में बराबर नहीं हैं। यह खाई जब बढ़ती है, तो गुस्सा, आक्रोश और सड़क पर ही बदला लेने की प्रवृत्ति पैदा होती है। 

ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल चालान काटना काफी नहीं है। सबसे पहले लाइसेंस सिस्टम को सख्त करना होगा। चालक की पहली गलती पर ही कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। टेस्ट के बिना लाइसेंस और बिना हेलमेट-बेल्ट के गाड़ी चलाने वाले को गिरफ्तार करके जेल भेज देना चाहिए। शराब पीकर या नशे में गाड़ी चलाने पर गाड़ी को तुरंत सीज और लंबे समय के लिए लाइसेंस रद्द करने का नियम लागू हो ताकि लोगों को सबक मिल सके।

Tuesday, August 11, 2026

मत-मतांतर का समन्वय ही धर्म है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती आज एक जिला है। पहले वह बहराइच जिले का ही एक अंग था। श्रावस्ती देश की एक प्राचीन नगरी है। यहां कई प्रतापी राजाओं ने राज्य किया था। कहते हैं कि श्रीराम के पुत्र कुश ने श्रावस्ती नगरी बसाई थी। इस बात की सत्यता तो इतिहासकार और पुरातत्वविद ही कर सकते हैं। बात उस समय की है, जब महात्मा बुद्ध श्रावस्ती में चौमासा बिताने के लिए आया करते थे। 

तथागत वर्षाकाल में किसी स्थान पर ठहर जाया करते थे, बाकी महीनों में वह भ्रमण किया करते थे। एक दिन महात्मा बुद्ध सघन एकांत में बने एक संघाराम में विश्राम कर रहे थे। तभी एक भिक्षु ने आकर महात्मा बुद्ध से निवेदन किया-भगवन! सम्राट चंद्रचूड आपके दर्शन करना चाहते हैं। वह समाज में फैले विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर की वजह से धर्म को लेकर विभ्रमित हो रहे हैं। 

वह आपसे  उसका समाधान चाहते हैं। यह सुनकर बुद्ध ने कहा कि तात! चंद्रचूड एक महान धर्मात्मा सम्राट हैं। उनको तत्काल यहां लाओ। थोड़ी देर बाद चंद्रचूड आकर एक सामान्य व्यक्ति की तरह एक किनारे बैठ गए। महात्मा बुद्ध ने उनका कुशल क्षेम पूछा और उनके ठहरने की व्यवस्था कर दी। अगले दिन सम्राट चंद्रचूड ने  देखा कि कुछ दृष्टिविहीन लोगों के बीच एक हाथी खड़ा है और बुद्ध के निर्देश पर सब हाथी को स्पर्श कर रहे हैं। 

बुद्ध ने उन दृष्टिबाधित लोगों से हाथी के बारे में पूछा, तो जिसने जो अंग छुआ था, हाथी को वैसा ही बताया। यह देखकर चंद्रचूड हंस पड़े। तब बुद्ध ने कहा कि सम्राट! यह विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर का समन्वय ही धर्म है। इसलिए आपको इन मत-मतांतरों के चलते भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। धर्म का सनातन स्वरूप भी ऐसा ही है। यह सुनकर चंद्रचूड संतुष्ट हुए और राज्य को लौट गए।

चार-पांच साल की बच्चियों को पीरियड्स आना गंभीर चेतावनी

अशोक मिश्र

यह  हरियाणा के लिए ही नहीं, पूरे उत्तर भारत के लिए गंभीर चेतावनी है कि अब चार-पांच साल की मासूम बच्चियों को पीरियड्स आने लगे हैं और पांच-छह साल के लड़कों को दाढ़ी मूंछ के लक्षण उभरने लगे हैं। यह कोई चिकित्सा संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि  पूरे समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है। इसे चिकित्सा विज्ञान में प्रिकॉशियस प्यूबर्टी यानी असामयिक यौवन कहा जाता है। पीजीआई रोहतक के पीडियाट्रिक एंडो क्रायनोलॉजी विभाग में बच्चों को विशेष टीके लगाकर हार्मोन की गति को नियंत्रित किया जा रहा है। विभाग में हर महीने करीब छह नए बच्चे अपना इलाज कराने के लिए पहुंच रहे हैं। 

देश भर के पीडियाट्रिक एंडोक्राइन सेंटरों के आंकड़ों के अनुसार कोविड काल में इस तरह के मामलों में तीन गुना तक बढ़ोतरी देखी गई है, जहां पहले 4208 बच्चों में से 59 में ऐसे लक्षण थे, वहीं कोविड के दौरान 3053 में से 155 बच्चों में समय से पहले यौवन के लक्षण मिले। हरियाणा भी इस राष्ट्रीय प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। यहां के शहरी जिलों जैसे गुड़गांव, फरीदाबाद, पानीपत में बाल रोग विशेषज्ञों के पास ऐसे केस लगातार आ रहे हैं। इसका असर केवल शारीरिक नहीं है। छोटी उम्र में हार्मोनल बदलाव से बच्चों की हड्डियों की ग्रोथ प्लेट जल्दी बंद हो जाती है जिससे उनकी अंतिम लंबाई कम रह जाती है। 

साथ ही मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन, समाज से कटाव और बचपन छिनने जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी आती हैं। यह समय है कि हम इसे सामान्य समझकर अनदेखा न करें। समय से पहले बच्चों में यौवन के लक्षणों का प्रकट होने का सबसे बड़ा कारण बच्चों में बढ़ता मोटापा है। शोध बताते हैं कि हाई-फैट डाइट और बढ़ा हुआ बीएमआई लड़कियों में असामयिक यौवन का सबसे महत्वपूर्ण रिस्क फैक्टर है। हरियाणा में खान-पान की परंपरा में घी-दूध का अधिक उपयोग होता है।

साथ ही आजकल बाजार में मिलने वाला पशुओं से प्राप्त दूध जिसमें दूध बढ़ाने के लिए हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं, यह लड़कियों में हार्मोनल गड़बड़ी पैदा कर रहा है। कई शोधों में पाया गया है कि तीन से सात साल तक के बच्चों को अधिक एनिमल फैट खिलाने से हार्मोनल असंतुलन और जल्दी प्यूबर्टी का खतरा बढ़ जाता है। हरियाणा के खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, प्लास्टिक की बोतलों में गर्म दूध या पानी पीना, सैनिटाइजर और कॉस्मेटिक्स का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों में यह लक्षण दिखने के प्रमुख कारण हैं। 

यह सब बच्चों के नाजुक अंत:स्रावी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। यही नहीं, जीवनशैली में बदलाव, देर रात तक जागना, नींद की कमी, दिन भर स्क्रीन पर रहना, शारीरिक गतिविधि का अभाव भी बच्चों को जल्द युवा बना रहा है। यदि किसी भी मासूम बच्चे में हार्मोनल गड़बड़ी के संकेत मिलें, तो तुरंत चिकित्सक के पास जाकर इलाज कराएं।

Monday, August 10, 2026

बेटी क्षेम! आत्मोद्धार का मार्ग अवश्य मिलेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के राजा बिंबसार का पूरा महल सजाया गया था। नगर का हर नागरिक महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए उत्साहित था। तथागत ने महाराज के अतिथि गृह की जगह बेलवन में रहना चुना था। महाराज बिंबसार भी अपनी सजधज के साथ तैयार हो चुके थे। नगर, महल और स्वयं राजा की सजधज के सामने राज्याभिषेक के समय हुई सजावट फीकी पड़ रही थी। महाराज अपने महल से निकल कर महारानी क्षेमा के रंग महल में पहुंचे। 

उन्होंने देखा कि महारानी क्षेमा अपने अंत:पुर के स्वाध्याय कक्ष में अन्यमनस्क सी लेटी आचार्य धर्मपाल का जीवन दर्शन पढ़ रही थीं। महाराज बिंबसार ने उन्हें अभी तैयार हुआ नहीं देखा, तो बोल पड़े, प्रियतमे! अभी तुम तैयार नहीं हुई? जिसके स्वागत को सारा नगर उमड़ पड़ा है, उसके स्वागत के लिए तुम अभी तक तैयार नहीं हो। क्षेमा सांगल नरेश की राज कन्या थी। 

सांगल नरेश महात्मा बुद्ध के परमप्रिय शिष्यों में से एक थे। महारानी क्षेमा का बुद्ध के प्रति यह उपेक्षा का भाव सम्राट बिंबसार को चकित कर रहा था। क्षेमा ने उपेक्षा भाव से करवट लेते हुए कहा कि बुद्ध के सामने जाने से क्या लाभ है। वह यही कहेंगे कि यह संसार मिथ्या है। संसार का सौंदर्य मिथ्या है। ऐसी स्थिति में हम सांसारिक जीव उनके सामने जाकर क्या करेंगे। 


महारानी को अपने सौंदर्य पर अत्यधिक अभिमान था। संयोग से इसी समय उन्हें झपकी आ गई। झपकी के दौरान ही उन्होंने देखा कि बुद्ध को एक अत्यंत रूपसी अप्सरा चंवर डुला रही है। उन्होंने एक ही पल में अप्सरा का बचपन, जवानी और बुढ़ापा तीनों देखा। 

बुढ़ापे में धंसी आंखें, सफेद केश, जर्जर काया देखकर वह कांप उठी। क्षेमा की नींद टूट गई। वह यह देखकर कांप उठी। उसके सौंदर्य का अभिमान चकनाचूर हो गया। क्षेमा दूसरे क्षण बुद्ध के चरणों में पड़ी क्षमा के साथ आत्मोद्धार का मार्ग पूछ रही थी। बुद्ध बोले, बेटी क्षेम, पहले वाह्य सौंदर्य से बाहर तो निकलो। आत्मोद्धार का मार्ग अवश्य मिलेगा।

परिवार में आया बिखराव बन रहा युवाओं में उग्रता का कारण


अशोक मिश्र

कोई यह सोच भी नहीं सकता है कि बच्चे! सिगरेट पीना तुम्हारे लिए हानिकारक है। इसे मत पियो कहने पर कोई नाबालिग थोड़ी देर बाद युवक पर चाकू से हमला कर दे। युवक की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई। आरोपी नाबालिग केवल नौवीं कक्षा पास है और तीन-चार महीने पहले उसने अपने मोहल्ले में लोगों पर धाक जमाने के लिए दिल्ली से चाकू खरीदा था। हरियाणा में पिछले कुछ सालों में युवाओं से जुड़ी हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। कभी रील के लिए झगड़ा, कभी पुरानी रंजिश, कभी सिर्फ ‘तूने मुझे घूरा क्यों’ जैसी मामूली बात पर हत्या ऐसी घटनाएं अब अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल रही हैं। 

सिगरेट पीने से मना करने पर एक नाबालिग के हाथ में चाकू आ जाना और एक हंसते-खेलते युवक की जान चले जाना हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर हमारे हाथों में पल रहे बच्चों के मन में इतना गुस्सा, इतनी हिंसा कहां से आ रही है। यह सवाल सिर्फ उस एक नाबालिग का नहीं, बल्कि पूरे हरियाणा के बदलते युवा मानस का है। इस उग्रता के पीछे परिवार का बिखराव भी एक बड़ा कारण है। जब से परिवार बिखरने लगे हैं, तब से बच्चों और युवाओं के स्वभाव में तब्दीली आ रही है। 

पहले संयुक्त परिवार में दादा-ताऊ की एक नजर ही बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए काफी थी। वह उन्हें संस्कारित करते रहते थे। अब एकल परिवारों में माता-पिता अपनी नौकरी और संघर्ष में व्यस्त हैं। घर पर बच्चों के पास पूरा दिन मोबाइल और इंटरनेट है। लोगों का आपसी संवाद भी धीरे-धीरे कम या खत्म होता जा रहा है। घर में बच्चा क्या देख रहा है, क्या सोच रहा है, किससे मिल रहा है, यह जानने का समय ही अभिभावकों के पास नहीं है। जब घर में उसकी बात नहीं सुनी जाती, तो वह बाहर अपनी धाक जमाकर, डराकर अपनी बात मनवाना सीख जाता हैं। 

इस उग्रता को बढ़ावा देता है उन्हें सहजता से मिल जाने वाला नशा। बीड़ी-सिगरेट जैसी छोटी लत से शुरू होकर यह सिलसिला नशे की गोलियों और दूसरे सिंथेटिक नशे तक पहुंच रहा है। एनसीआर की बेल्ट में इन चीजों की उपलब्धता चिंताजनक रूप से आसान हो गई है। नशे की हालत में सही और गलत की समझ खत्म हो जाती है और छोटा सा गुस्सा भी जानलेवा बन जाता है।  

समाज में एक अजीब सा डर बैठ गया है। अब लोग पार्क में, गली में गलत होते देखकर भी टोकने से कतराते हैं, सोचते हैं कि कौन झगड़ा मोल ले, पता नहीं सामने वाले के पास क्या है। यह चुप्पी धीरे-धीरे पूरे समाज को कायर और असुरक्षित बना रही है। इससे बचने का यही तरीका है कि हम रोज आधा घंटा बिना मोबाइल के अपने बच्चों से बात करें, उनके दोस्तों को जानें, उन्हें खेल के मैदान तक फिर से ले जाएं। जहाँ पसीना बहेगा तो सड़क पर खून नहीं बहेगा, यही इसका इलाज है। यही तरीका उनकी उग्रता को कम कर सकता है।