बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध के समय में प्राचीन कोशल महाजनपद की राजधानी श्रावस्ती थी। इसके राजा थे प्रसेनजित जिन्हें पाली भाषा में पसेनदी कहा जाता है। महात्मा बुद्ध और प्रसेनजित समवयस्क थे। एक बार की बात है। श्रावस्ती में अकाल पड़ा। कई वर्ष तक बरसात नहीं हुई। खेतों में फसल नहीं बोई जा सकी। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए। प्रजा भूख की वजह से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही थी।राजा प्रसेनजित भी जितना हो सकता था, गरीब प्रजा के लिए उपाय कर रहे थे, लेकिन वह पर्याप्त नहीं था। उसी क्षेत्र में उन दिनों महात्मा बुद्ध भी थे। उन्होंने श्रावस्ती का हाल सुना, तो उनका मन करुणा से भर गया। वह श्रावस्ती पहुंचे तो नगर के धनिकों ने उनका प्रवचन सुनने के लिए एक आयोजन किया। महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस समय अकाल के कारण नरकंकाल जैसे दिखने वाले लोगों की सेवा करना ही सबसे बड़ा आवश्यक धर्म और कर्तव्य है।
बुद्ध की वाणी सुनकर अकालग्रस्त लोगों में आशा का संचार हुआ कि शायद कोई मदद को आगे आए। धनिक और राजवंश के लोग भूखे प्यासे लोगों की मदद तो करना चाहते थे, लेकिन वह अपने धन में खर्च करना गंवारा नहीं था। उन्होंने बहाने बनाने शुरू कर दिए। लोगों की बात सुनकर बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां बैठी एक भिखारी की बेटी सुप्रिया ने कहा कि मैं अपनी शक्ति भर लोगों को भोजन कराने का दायित्व लेती हूं।
लोगों ने पूछा, तुम ऐसा कैसे करोगी। सुप्रिया ने कहा कि मैं नगर के धनी और संपन्न परिवारों से मांगकर लाऊंगी और अकालग्रस्त लोगों को खिलाऊंगी। यह सुनकर बुद्ध ने कहा कि गण श्रेष्ठो! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। साधनहीनता किसी कार्य में बाधा नहीं बन सकती है। यह सुनकर धनिक शर्मसार हुए और उन्होंने सहायता का वचन दिया।