Saturday, March 28, 2026

कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी के सीखने की एक निश्चित सीमा है। दुनिया में जितना भी ज्ञान है, उसे एक आदमी पूरा हासिल नहीं कर सकता है। विद्वान से विद्वान आदमी सब कुछ नहीं सीख सकता है, लेकिन हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सीखते जरूर रहना चाहिए। प्राचीन काल में एक दार्शनिक थे। काफी विद्वान थे, लेकिन वह विनम्र भी उतने ही थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं को लेकर आते थे। 

बहुत सारे शिक्षण संस्थानों के अध्यापक और विद्यार्थी उनके पास ज्ञान हासिल करने पहुंचते थे। लेकिन वह अपने पास आने वाले की शंकाओं और समस्याओं का हरसंभव तरीके से समाधान करने की कोशिश करते थे। उसके साथ ही साथ वह उनसे सवाल भी करते थे। उस व्यक्ति से हर तरह की जानकारी हासिल करने का प्रयास करते थे। यह देखकर एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा कि मैं देखता हूं कि जो लोग आपसे सीखने आते हैं, आप उनसे भी सीखने की कोशिश करते हैं। 

आप उनसे छोटी से छोटी बात पूछते हैं। आप सचमुच जानने की कोशिश करते हैं या सामने वाले के सामने न जानने का ढोंग करते हैं। यह सुनकर दार्शनिक पहले तो जोर-जोर से काफी देर तक हंसते रहे। फिर बोले, देखो, एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी में सब कुछ नहीं सीख सकता है। जितना वह सीखता है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा उससे छूट जाता है। 

दुनिया का समग्र ज्ञान एक व्यक्ति हासिल नहीं कर सकता है। मैं भी सब कुछ नहीं जानता हूं। इसलिए जो मैं जानता हूं, वह उसे बताता हूं, जो मैं नहीं जानता हूं, वह उससे सीखने की कोशिश करता हूं। व्यक्ति को जीवन में हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए। यह सुनकर मित्र चुप रह गया।

नवरात्र में कंजकों को पूजने के साथ उन्हें पैदा भी होने दीजिए


अशोक मिश्र

कल अष्टमी और आज नवमी को देश भर में कन्यापूजन किया गया। जिन कंजकों को साल भर में कोई महत्व नहीं दिया जाता है, उन्हें चैत्र और शारदीय नवरात्र की अष्टमी और नवमी को बडेÞ आदर सम्मान के साथ घर बुलाया जाता है, उन्हें भोजन कराया जाता है, उनके पांव धोए जाते हैं और चलते समय अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दक्षिणा भी दिया जाता है। साल में दो बार नवरात्र का व्रत रखने वाले लोग नौ दिनों तक मातृशक्ति की पूजा करते हैं। उनसे आशीर्वाद की कामना करते हैं। 

शतायु होने के साथ-साथ धन-धान्य का वरदान मांगते हैं, लेकिन जैसे ही नवरात्र के नौ दिन बीतते हैं, कन्याओं की अवहेलना शुरू हो जाती है। कुछ लोग तो नवरात्र बीतते ही अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर अस्पताल की ओर चल देते हैं ताकि चोरी-छिपे लिंग परीक्षण कराया जा सके। यदि गर्भस्थ शिशु कन्या है, तो भ्रूण हत्या कराया जाए। वैसे तो लड़कियों की बेकदरी के कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं, लेकिन कन्या भ्रूण हत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। 

समाज को उन प्रथाओं और मान्यताओं को बदलने की कोशिश करनी चाहिए जिनकी वजह से लोग अपने घर में बेटी को जन्म देना नहीं चाहते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी लड़कियों के विवाह के समय होती है। देश के सत्तर फीसदी लोग जीवन भर पेट काटकर बेटी के विवाह के लिए रुपये जोड़ते हैं, ताकि वह अपनी बेटी का अच्छे से विवाह कर सकें। छोटी मोटी नौकरी करने वाले लड़के के मां-बाप दहेज के नाम पर इतना मुंह फाड़ते हैं कि लड़की का बाप दहल जाता है। 

जिसके पास जितना अधिक पैसा है, उसको उसी हिसाब से कमाऊ दामाद मिलता है। यही वजह है कि लोग दहेज न दे पाने की वजह से लड़कियों को जन्म नहीं देना चाहते हैं। वैसे तो सरकार ने दहेज लेना और देना अपराध घोषित कर रखा है, लेकिन समाज में अपनी नाक बचाने के नाम पर इसे सामान्य व्यवहार मानकर देना पड़ रहा है। जब तक पूरे समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा, तब तक बात बनने वाली नहीं है। लोग अपनी बेटियों को गर्भ में ही मारते रहेंगे। 

इस मामले में हरियाणा बहुत पीछे नहीं है। सरकार की तमाम नीतियों और सख्ती के बावजूद साल 2025 में एक हजार लड़कों के पीछे 923 लड़कियों का ही जन्म हरियाणा में हुआ है। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 910 था। यही नहीं, साल 2014 में लड़कियों का लिंगानुपात 871 था। प्रदेश सरकार ने हर तरह का उपाय आजमा लिया है, इसके बावजूद कन्या भ्रूण हत्या नहीं रुक रही है। 

प्रदेश में जगह-जगह खुले अवैध क्लीनिकों में यह काम जारी है। जानकारी मिलने पर सरकार कार्रवाई करती है, संबंधित लोगों को पड़ककर जेल में डालती है, लेकिन आरोपी जमानत करवाकर अपने काम में फिर जुट जाते हैं। जब तक समाज कंजक पूजन के साथ-साथ कंजकों को जन्म देना नहीं सीखेगा, तब तक लिंगानुपात सुधरने वाला नहीं है।

Friday, March 27, 2026

काश! कि मूर्तिकार ने एक बार और प्रयास किया होता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आदमी को प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए। कई बार ऐसा भी होता है कि सौ-दो सौ बार प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती है, लेकिन यदि मन में दृढ़ता हो, तो सौ-दो सौ बार प्रयास करने वाले को भी अगली बार के प्रयास में सफलता मिल जाती है। 

एक बार की बात है। एक राजा के दरबार में एक विदेशी नागरिक आया। राजा ने उसका बड़ा  आदर सम्मान किया। विदेशी नागरिक कुछ दिन राजा के राज्य में रहा भी, लेकिन चलते समय उसने राजा को एक बड़ा सा सुंदर पत्थर भेंट किया। राजा उस पत्थर को देखकर बहुत खुश हुआ। विदेशी नागरिक के जाने के बाद राजा ने सोचा कि इस पत्थर से भगवान की एक सुंदर सी मूर्ति बनवाई जाए। 

उसने अपने एक मंत्री को मूर्ति बनाने का काम सौंप दिया। उस पत्थर को लेकर मंत्री राज्य के एक सबसे प्रसिद्ध मूर्तिकार के पास गया और उससे सात दिन में मूर्ति बनाने को कहा। उस मूर्तिकार ने सहर्ष अनुमति दे दी। मंत्री ने मूर्ति बनाने के बदले पचास स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन दिया। उस मूर्तिकार ने पत्थर को तोड़ने के लिए हथौड़ा मारा। पत्थर नहीं टूटा। पचास बार हथौड़े का प्रहार करने का बाद भी जब पत्थर नहीं टूटा, तो मूर्तिकार थक गया। 

उसने मंत्री से कहा कि इस पत्थर से मूर्ति नहीं बन सकती है, आप इसे ले जाएं। मंत्री उस पत्थर को लेकर दूसरे मूर्तिकार के पास गया। उसने मंत्री के सामने ही हथौड़े का प्रहार किया और पत्थर टूट गया। उसने मूर्ति बनानी शुरू कर दी। ऐसा होने पर मंत्री सोचने लगा कि पहले वाला मूर्तिकार यदि एक बार और प्रयास करता तो वह अपने काम में सफल हो जाता और 50 स्वर्ण मुद्राओं का अधिकारी होता। लेकिन जल्दबादी में उसने यह मौका गंवा दिया।

घाटा सहने के बावजूद बिजली की दरों में बढ़ोतरी न करने का फैसला सराहनीय


अशोक मिश्र

मार्च का महीना बीतने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। अभी से ही गर्मी अपना प्रभाव दिखाने लगी है। अप्रैल से जून-जुलाई तक प्रचंड गर्मी पड़ने के आसार हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि हरियाणा में बिजली की खपत बढ़ेगी। खपत बढ़ने से उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम पर बिजली खपत में संतुलन बनाए रखने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी। 

सामान्य दिनों की अपेक्षा गर्मी के दिनों में बिजली की खपत पढ़ जाती है, यह सर्वमान्य नियम है क्योंकि गर्मी के दिनों में पंखा और एसी यानी वातानुकूलन यंत्र लगभग हर घर में चलाया जाता है। एसी और पंखों को चलाने से बिजली खपत की दर आसमान छूने लगती है। ऐसी स्थिति में कई बार स्थानीय बिजली विभाग प्रशासन को  कई प्रकार की दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। एक आंकड़े के  अनुसार प्रदेश के 83.79 लाख उपभोक्ता हैं। इन उपभोक्ताओं को गर्मी के दिनों में अबाधित बिजली सप्लाई कर पाना, एक बड़ी चुनौती होती है। उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम गर्मियों में किसी तरह हालात को बेहतर बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं। 

इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हरियाणा सरकार ने इस बार बिजली की दरों में बढ़ोतरी नहीं करने का फैसला लिया है जो प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है। हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग ने यह निर्णय उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम की ओर से दायर वार्षिक राजस्व आवश्यकता याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के बाद लिया है। इससे दोनों डिस्कॉम्स को लगभग 4,484.71 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का अनुमान है। 

इतना बड़ा घाटा सहने के बावजूद बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी न करना, प्रदेश सरकार की सराहनीय पहल ही कही जाएगी। इससे पहले हरियाणा में बिजली की दरें अप्रैल 2025 में बढ़ाई गई थीं। इतना ही नहीं, आयोग ने बिजली क्षेत्र में सुधार के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए हैं। हरियाणा पावर परचेज सेंटर के पुनर्गठन पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि बिजली खरीद प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और किफायती बन सके। साथ ही, डिमांड साइड मैनेजमेंट उपायों के माध्यम से मांग में उतार-चढ़ाव को संतुलित करने पर भी जोर दिया गया है। 

वर्तमान में अधिकतम और न्यूनतम मांग के बीच लगभग तीन हजार से पांच हजार मेगावाट का अंतर है। आयोग ने कृषि क्षेत्र के लिए 7,870.32 करोड़ रुपये की राज्य सरकार सब्सिडी का प्रावधान रखा है। इसके तहत किसानों को 7.48 रुपये प्रति यूनिट की वास्तविक लागत के मुकाबले केवल 0.10 रुपये प्रति यूनिट का भुगतान करना होगा, जिससे कृषि उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलेगी।

Thursday, March 26, 2026

हमेशा लोगों के साथ प्रेमभाव से रहें


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पंजाब के गुजरांवाला जिले में पैदा हुए स्वामी रामतीर्थ ने अपना जीवन बहुत ही गरीबी में बिताया था। इनका बचपन का नाम तीर्थराम था, लेकिन संन्यास ग्रहण करने के बाद रामतीर्थ कर दिया गया था। हालांकि इनका विवाह बाल्यावस्था में ही हो गया था, लेकिन जब संन्यास ग्रहण किया, तो परिवार का त्याग कर दिया। संन्यासी बनने से पहले वह एक स्नातक कालेज में शिक्षक थे। 

1891 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से गणित में सर्वोच्च अंक हासिल किया था। एक दिन जब वह अपने क्लास में बच्चों को पढ़ा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि कुछ छात्र आपस में लड़ रहे हैं। उन छात्रों का आपस में लड़ना, उन्हें पसंद नहीं आया। वह सोचने लगे कि उनके छात्र आपस में वैरभाव रखते हैं। जबकि वह चाहते थे कि लोग आपस में प्रेमभाव से रहें, एक दूसरे की मदद करें। 

पहले तो उन्होंने सोचा कि इन छात्रों को समझाया जाए, लेकिन उस दिन उन्होंने उनसे कुछ नहीं कहा। अगले दिन जब वह क्लास में पहुंचे, तो उन्होंने ब्लैक बोर्ड पर एक लाइन खींच दी। उन्होंने अपने छात्रों से कहा कि इसे छोटा करके दिखाओ। एक छात्र ने डस्टर लिया और उस लाइन को थोड़ा मिटाने लगा। इस पर रामतीर्थ ने रोकते हुए कहा कि इसे छोटा नहीं करना है। 

तब कई छात्रों ने कहा कि यदि इसे मिटाया नहीं गया, तो इसे छोटा करना संभव नहीं है। तब स्वामी रामतीर्थ ने उस लाइन के नीचे एक लंबी रेखा खींच दी और बोले, हो गई न छोटी। तब उन्होंने समझाया कि किसी की उपलब्धि पर ईर्ष्या करने से बेहतर है, उससे भी बढ़कर काम किया जाए। अपने काम से किसी उपलब्धि की रेखा को छोटी कर दो। बिना लड़े आगे बढ़ने का यही तरीका है। छात्रों की समझ में अब बात आ गई थी।  उन्होंने भविष्य में आपस में न लड़ने का संकल्प लिया।

जब तक लालच या भय रहेगा साइबर क्राइम नहीं रुकेगा


अशोक मिश्र

साइबर ठगी के मामले हरियाणा में बढ़ते जा रहे हैं। साइबर ठगों की कार्यप्रणाली को देखते हुए लोग अब अनजान नंबर से आने वाले फोन को उठाना बंद करने लगे हैं। इसके चलते कई बार वाजिब नंबर से आने वाले फोन भी अटेंड नहीं हो पाते हैं। लोग यही सोचकर फोन कॉल को टाल देते हैं, क्या पता ठगों का ही फोन हो और ऐसे में जरूरी कॉल भी अटेंड होने से रह जाती है। इन तमाम सावधानियों के बाद भी बहुत सारे लोग हैं जो इन साइबर ठगों के चंगुल में फंस ही जाते हैं। 

हरियाणा का शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहां से रोज एकाध खबर साइबर ठगी की न आती हो। फरीदाबाद में ही साइबर ठगों ने क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने के नाम पर साठ हजार रुपये से अधिक ठग लिए। साइबर ठगों ने अपने शिकार को क्रेडिट कार्ड बढ़ाने का आश्वासन दिया और लिंक भेजकर उसमें डिटेल भरने को कहा। जैसे ही पीड़ित व्यक्ति ने उस लिंक को खोला, उसके खाते से पैसे कट गए। 

बल्लभगढ़ में ही एक फर्नीचर व्यापारी से दुबई टूर की व्यवस्था के नाम पर करीब साढ़े छह लाख रुपये ठग लिए गए। व्यापारी को अपने परिवार के साथ दुबई टूर पर जाना था। दुबई जाने के लिए व्यापारी वेबसाइट पर टूर पैकेज तलाश रहा था, उसी पर उसे एक नंबर मिला। उस पर बातचीत करने पर उस व्यक्ति ने एक टूर पैकेज भेजा। व्यापारी ने छह लाख चौबीस हजार रुपये भी अलग-अलग किस्तों में जमा कर दिया। 

नियत समय पर जब व्यापारी अपने परिवार के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचा तो पता चला कि साथ जा रही एक लड़की का वीजा फर्जी है। टूर पैकेज के नाम पर बेबसाइट से बात करने वाले व्यक्ति ने दो दिन बाद वीजा बनवाकर देने और दो दिन बाद की फ्लाइट से सीटें बुक करने का आश्वासन दिया। इसके बाद आरोपियों के फोन बंद आ रहे है। फर्नीचर व्यापारी ने इसकी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी है। 

स्वाभाविक है कि पुलिस अब अपना काम करेगी। हरियाणा पुलिस ही नहीं, देश भर की सरकारें, वहां के पुलिस अधिकारी, सुप्रीमकोर्ट और यहां तक कि पीएम नरेंद्र मोदी लोगों को साइबर अरेस्ट, डिजिटल ठगी और अन्य साइबर क्राइम के बार में देशवासियों को सचेत कर चुके हैं। आज भी कर रहे हैं और शायद भविष्य में भी लोगों को सचेत करते रहेंगे, इसके बावजूद ऐसी घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। ऐसी स्थिति में एक ही बात समझ में आती है कि इन घटनाओं के पीछे भय या लालच काम करता है। 

जब पुलिस बार-बार यह दोहरा रही है कि वह किसी भी मामले में न तो टेलीफोन, मोबाइल फोन या वीडियो कॉल करके किसी बारे में चर्चा नहीं करती है, तो फिर पता नहीं क्यों लोग साइबर अरेस्ट हो जाते हैं। अपने पैसे को दो गुना करने या जिस व्यक्ति से कभी मिले नहीं हैं, उस पर कैसे विश्वास करके लाखों रुपये ट्रांसफर कर देते हैं।

Wednesday, March 25, 2026

गुरु का स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में माता-पिता के बाद गुरु को ऊंचा स्थान दिया गया है। गुरु कैसा भी हो, वह हमेशा सम्मानीय होता है। इस संदर्भ में एक पुरानी कथा प्रचलित है। एक राजा था। उसे ज्ञान प्राप्त करने की बड़ी लालसा थी। उसने अपने मंत्रियों से कहा कि वह किसी योग्य गुरु की तलाश करें। काफी खोज के बाद मंत्री एक योग्य व्यक्ति को खोजने में सफल हो गया। राजा ने उस गुरु से शिक्षा हासिल करनी शुरू की। गुरु जी बहुत योग्य थे। इस तरह काफी समय बीत गया, लेकिन गुरु के योग्य होने के बावजूद राजा को कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। 

वह इस वजह से चिंतित रहने लगे। एक दिन उन्होंने इस बात की चर्चा अपनी महारानी से की। राजा ने कहा कि तुम बताओ, मैं इसका कारण किससे पूछूं। महारानी ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि आप इस समस्या का हल अपने गुरु जी से ही पूछिए। वह एक योग्य गुरु हैं। 

उनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने कई लोगों को योग्य बनाया है। कुछ दिन विचार करने के बाद एक दिन राजा ने अपने गुरु के सामने समस्या रख दी। उन्होंने कहा कि गुरु जी, मुझे इतने महीने हो गए, आप मुझे रोज अच्छी अच्छी बातें सिखाते हैं, लेकिन मैं सीख नहीं पाता हूं। इसका कारण क्या है? गुरु जी ने राजा को गौर से देखा और बोले, इसका कारण आपका राजा होना है। 

आप मेरे शिष्य हैं और मैं आपका गुरु हूं। इस नाते मुझे आपको ज्ञान देते समय ऊंचे स्थान पर बैठना चाहिए और आपको नीचे। लेकिन राजा होने की वजह से आप ऊंचे स्थान पर बैठते हैं और मैं नीचे बैठता हूं। गुरु हर हालत में सम्मानीय होता है। उसका स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए। 

यह बात सुनकर राजा सारी बातें समझ गया और उसने गुरु को आगे से ऊंचा स्थान देना शुरू किया। कुछ साल के बाद वह विद्वान हो गया।

सामूहिक प्रयास से ही हरियाणा हो सकता है तपेदिक मुक्त राज्य


अशोक मिश्र

आज विश्व तपेदिक दिवस पर पूरे देश में टीबी उन्मूलन को लेकर अभियान चलाए गए। लोगों को जागरूक किया गया। उन्हें यह समझाने का प्रयास किया गया कि तपेदिक एक गंभीर रोग है, इससे पीड़ित होने पर इलाज ही इसका बचाव है। यदि समय पर रोग का पता चल जाए, तो इसका इलाज संभव है और मरीज का जीवन बचाया जा सकता है। हरियाणा में भी आज लगभग सभी जिलों में लोगों को जागरूक करने के लिए सेमिनार, कार्यशालाएं और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए गए। 

इसके बावजूद अभी तक हरियाणा को तपेदिक मुक्त नहीं किया जा सका है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। राज्य के सभी जिलों में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है। औद्योगिक नगरी के नाम से जाने जाने वाले जिलों में दूसरे राज्यों से कामगारों का आना और उनका अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहना, तपेदिक रोग का सबसे बड़ा कारण कारण है। 

राज्य के लगभग हर जिले में शहरी क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है, इसके साथ झुग्गी-झोपड़ियों का भी विस्तार होता जा रहा है। दूसरे राज्यों से आए ज्यादातर मजदूर इन्हीं झुग्गी-झोपड़ियों में शरण लेते हैं। स्वास्थ्य एजेंसियां जब तपेदिक रोगियों का पता लगाने के लिए अभियान चलाती हैं, तो पता लगता है कि इनमें से कई मजदूर टीबी के मरीज निकल आते हैं। 

ज्यादातर मामलों में होता यह है कि यह मजदूर एक जगह टिकते नहीं हैं। टीबी का कोर्स भी पूरा नहीं करते हैं। जबकि टीबी का इलाज लंबा चलता है और एक दिन भी दवा लेने में नागा नहीं किया जा सकता है। ऐसे लोग इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं जिससे बाद में जब परेशानी बढ़ जाती है, तो यह लोग फिर अस्पताल की ओर रुख करते हैं, तब दवा लेने की मियाद काफी बढ़ जाती है। इन सब परेशानियों के बावजूद राज्य सरकार अपने पूरे दमखम के साथ तपेदिक उन्मूलन के अभियान में लगी हुई है। 

मार्च महीने में ही राज्य सरकार ने एक आंकड़ा जारी किया था जिसके मुताबिक हरियाणा की 2157 ग्राम पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित कर दिया गया है। इनमें से 211 पंचायतों को स्वर्ण, 646 पंचायतों को रजत तथा 1300 पंचायतों को कांस्य श्रेणी में प्रमाणपत्र मिला है। राज्य में कुल 6237 पंचायतें हैं। इस तरह लगभग 35 प्रतिशत पंचायतें टीबी मुक्त हो गई हैं। अंबाला टीबी मुक्त 191 पंचायतों के साथ अभियान में सबसे आगे है। 

पिछले तीन वर्षों में टीबी-मुक्त पंचायतों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इस कार्यक्रम के जमीनी स्तर पर मजबूत क्रियान्वयन को दर्शाती  है। फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 88,689 टीबी के मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें 74,483 मरीजों का सफलतापूर्वक उपचार किया गया। ऐसी स्थिति में लोगों को भी चाहिए कि वह लगातार खांसी आने पर अपनी जांच कराएं और हरियाणा को तपेदिक मुक्त बनाने में सहयोग करें।


Tuesday, March 24, 2026

भगत सिंह बोले, तुम्हारा स्थान मेरी मां से ऊंचा है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में छुआछूत जैसी कुरीति सदियों से चली आ रही थी। इसके खिलाफ हमारे देश के महापुरुषों ने बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी, तब जाकर समाज में धीरे-धीरे बदलाव आया और आज हम कह सकते हैं कि देश से अस्पृश्यता जैसी भावना को पूरी तरह परास्त कर दिया गया है। बात उस समय की है, जब एचएसआरए यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रख्यात क्रांतिकारी भगत सिंह जेल में बंद थे। 

ब्रिटिश हुकूमत उन्हें फांसी की सजा सुना चुकी थी। लाहौर जेल में बंद किए गए भगत सिंह का सभी कैदी बड़ा सम्मान करते थे। उनमें एक बोधा नाम का सफाई कर्मी भी था। भगत सिंह बोधा को बेबे कहकर पुकारा करते थे। पंजाब में मां को बड़े सम्मान और प्यार के साथ बेबे कहकर संबोधित किया जाता है। 

इस पर बोधा विनीत स्वर में प्रतिरोध करते हुए भगत सिंह से कहा करता था कि वह निम्न कुल में पैदा हुआ है। आप उच्च कुल में पैदा हुए हैं। आपका इस तरह मुझे बेबे कहकर संबोधित करना उचित नहीं है। इस पर हंसते हुए भगत सिंह कहा करते थे कि बचपन में मां ने मेरा मल-मूत्र साफ किया था। 

आप हमारे बड़े होने के बाद भी वही काम करते हो। इस नाते तो आपका सम्मान मां से भी बढ़कर होना चाहिए था। भगत सिंह वैसे भी उस विचारधारा को मानते थे जिसमें इंसान का इंसान के प्रति कोई भेदभाव न हो। अपनी फांसी से एक दिन पहले भगत सिंह ने जेल प्रशासन से कहा कि उन्हें बोधा के हाथ की बनी रोटी खानी है। यह सुनकर बोधा फूट-फूटकर रो पड़ा। भगत सिंह ने अपनी शहादत देते हुए भी अपने आदर्श का जीवंत उदाहरण पेश करते हुए बड़े प्रेम से बोधा के हाथ की बनी रोटी खाई  और शहीद हो गए।

हरियाणा में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़ी हुईं पंचायतें


अशोक मिश्र

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अब लोग जागरूक होने लगे हैं। धार्मिक, सामाजिक क्षेत्र में जितनी भी कुरीतियां हैं, लोग अब उसके खिलाफ स्वर बुलंद करने लगे हैं। शादी-विवाह सहित सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों में लोगों ने देश और समाज को नुकसान पहुंचाने वाली रीतियों, परपंराओं से निजात पानी शुरू कर दी है। इसके लिए अब पंचायतें भी सामने आने लगी हैं। 

प्रदेश में सामाजिक बदलाव की बहने वाली बयार के पीछे जागरूक स्त्री और पुरुष दोनों हैं। फतेहाबाद जिले की बड़ोपल पंचायत ने प्रस्ताव पास किया है कि अब वह बाल विवाह नहीं होने देंगे। जो भी बाल विवाह कराता हुआ पाया जाएगा, उसके यहां होने वाले विवाह में बान पर नहीं बैठेंगे और हल्दी की रस्म नहीं निभाई जाएगी। पंचायत ने भी यह तय किया कि यदि किसी ने पंचायत के फैसले के खिलाफ जाकर बाल विवाह कराने का प्रयास किया, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, पंचायत में बारात नहीं आने दिया जाएगा और यदि किसी ने गुपचुप बाल विवाह करने की सोची, तो उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत की जाएगी। 

जरूरत पड़ने पर दूसरे गांवों की पंचायतों का भी सहयोग लिया जाएगा। कभी हमारे देश और प्रदेश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा थी। इसे सामाजिक मान्यता भी हासिल की थी, लेकिन जैसे-जैसे समाज शिक्षित हुआ, जागरूर हुआ, लोगों को बाल विवाह से होने वाली परेशानियां और नुकसान की बात समझ में आने लगी। प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी ने बाल विवाह से अपना मुंह मोड़ लिया, लेकिन कुछ लोग अभी बाल विवाह को उचित मानकर अपने बेटा-बेटी का बाल विवाह कराते हैं। 

प्रदेश के मामले में अच्छी बात यह है कि पंचायतों ने अब शादी-विवाह में होने वाले बेतुके खर्चों पर भी रोक लगानी शुरू कर दी है। फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में पिछले दिनों आयोजित पंचायत में फैसला लिया गया है कि शादी-विवाह या अन्य दूसरे मांगलिक कार्यों के समय बजाए जाने वाली डीजे का बहिष्कार किया जाएगा। पूरे जिले के गांवों, कालोनियों और सेक्टरों से आए प्रतिनिधियों ने पूरे दस सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प लिया। लोगों को मानना था कि शादी-विवाह के समय कई परंपराएं पुराने समय के हिसाब से शुरू हुई थीं। अब इन परंपराओं का कोई औचित्य नहीं रह गया है। 

कुछ परंपराएं ऐसी हैं जिनकी वजह से वर और वधू पक्ष के खर्चे अनावश्यक रूप से बढ़ जाते हैं और जिनका कोई औचित्य भी नहीं है। शादी-विवाह में बहुत तेज आवाज में बजने वाले डीजे की वजह से कई बार पड़ोसियों से मारपीट जैसी घटनाएं हो जाती हैं। बहुत ज्यादा शोर मचाने वाले डीजे जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं खर्चा भी बहुत ज्यादा आता है। यही नहीं, फैसला यह भी किया गया कि शादी, लगन-सगाई और अन्य रस्मों में खर्च लेने की प्रथा को बंद किया जाएगा।