Friday, October 16, 2026

The Conviction That I, Too, Can Become a Buddha

The Bodhi Tree

Ashok Mishra

It is true that Gautama Buddha did not establish a new religion; the term "Buddhism" was coined long after his *parinirvana*. He simply pointed out a path to transcend suffering. All his teachings were rooted in his own personal experience. He articulated the four fundamental truths of life: birth, old age, illness, death, separation from loved ones, and encounters with the unpleasant—all these constitute suffering (*dukkha*). 

The root cause of this suffering is *trishna*—an insatiable, never-ending craving for "more and more." If this craving can be extinguished, then suffering, too, can come to an end. This state is known as *nirvana*, and there is a clear path to attain it. Centering his teachings on these core principles, the Buddha guided others. Once, while he was addressing a gathering of nearly ten thousand people, a young man arrived. He looked at the *Tathagata*, bowed before him, and offered his salutations. 

The Buddha asked, "For what purpose have you come?" The young man replied, "The purpose for which I came has been fulfilled. I have nothing left to ask, nothing left to seek." The Buddha inquired, "What has been fulfilled? What has transpired? Share this with others as well." Thousands were present at the gathering, yet no one had witnessed anything specific occurring. The young man explained, "I came here to transform myself, and now I have been transformed. 

A conviction has taken root within me: I, too, can become a Buddha. The Buddha who exists today—I could become that very being tomorrow. A new faith has been born within me. It was in search of this new hope that I came here; it was with this trust that I bowed at your feet. When I stood up, I was a changed man. Now, I return, carrying this profound conviction."

यह विश्वास हो गया, मैं भी बुद्ध हो सकता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यह सच है कि महात्मा बुद्ध ने कोई नया धर्म नहीं चलाया था। बौद्ध धर्म नाम तो उनके परिनिर्वाण के बहुत बाद दिया गया। उन्होंने दुख से बाहर निकलने का रास्ता बताया था। उनके सारे उपदेश अपने अनुभव पर ही आधारित रहे हैं। उन्होंने जीवन के चार सत्य बताए थे। बुद्ध ने कहा कि जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, प्रिय से बिछोह, अप्रिय का मिलना, जीवन में दु:ख है। दु:ख का कारण है तृष्णा और चाहिए और चाहिए की कभी न खत्म होने वाली प्यास। तृष्णा को खत्म किया जा सकता है, तो दु:ख भी खत्म हो सकता है। 

इसी अवस्था को निर्वाण कहते हैं। उस तक पहुँचने का एक स्पष्ट मार्ग है। इन बातों को ही मुख्य आधार बनाकर महात्मा बुद्ध लोगों को उपदेश के माध्यम से परिचित कराते रहे। एक बार की बात है। वह लगभग दस हजार लोगों की भीड़ को उपदेश दे रहे थे।  एक युवक आया। उसने तथागत को देखा, उनके सामने झुका और उन्हें प्रणाम किया। बुद्ध ने पूछा, किस लिए आए हो? युवक ने कहा कि जिस लिए आया था, वह इच्छा पूर्ण हुई। 


अब न कुछ पूछना है, न कुछ जानना है। बुद्ध ने कहा कि क्या पूर्ण हुआ, क्या घट गया। यह और को भी बता दो। उस समय सत्संग में हजारों लोग मौजूद थे। किसी ने भी कुछ घटते या होते नहीं देखा था। युवक ने कहा कि मैं अपने को बदलने आया था। अब मैं बदल गया हूं। 

मुझ में यह विश्वास पैदा हो गया है कि मैं भी बुद्ध हो सकता हूं। जो बुद्ध आज हैं, वह कल मैं हो सकता हूं। मुझ में एक नई श्रद्धा ने जन्म ले लिया है। मैं इसी नई आशा की तलाश में यहां आया था। इसी भरोसे से मैं चरणों में झुका था। जब खड़ा हुआ, तो मैं बदल गया। अब मैं एक विश्वास के साथ वापस जा रहा हूं।

रिश्तों में इतने असंवेदनशील और हिंसक क्यों होते जा रहे हैं लोग?

अशोक मिश्र

मेरठ के चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड का अंतत: फैसला आ गया। इस मामले में जिला जज अरविंद कुमार मिश्र की अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। सच कहा जाए, तो यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का अंत नहीं है। यह हमारे समय के सामाजिक, नैतिक और न्यायिक अंतर्द्वंद्व पर की गई एक तीखी टिप्पणी है। जिन दिनों यह मामला प्रकाश में आया था, पूरे देश में इसकी चर्चा हुई थी। चर्चा का कारण मुस्कान और साहिल द्वारा हत्या के दौरान की गई क्रूरता थी। 

एक मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत की हत्या उसकी ही पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल ने कर दी थी। शव के पाँच टुकड़े करने के बाद उसे सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपा दिया गया। अदालत ने इसे जघन्यतम अपराध मानते हुए रेयरेस्ट आॅफ रेयर की श्रेणी में रखा। दोनों अपराधियों को हत्या के साथ-साथ साक्ष्य छिपाने के आरोप में सात-सात साल की अतिरिक्त सजा भी सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराधी को उसके किए की सजा देना भी धर्म का कार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि जब प्रजा सोती है, तब भी कानून जागता रहता है। 

अदालत द्वारा की गयी यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा की प्रतिक्रिया होती है। जब प्रेम, जो मनुष्य को बेहतर बनाता है, वही स्वामित्व और वासना में बदलकर इतनी बर्बरता पर उतर आए कि एक इंसान को काटकर ड्रम में भर दिया जाए, तो कानून को यह संदेश देना पड़ता है कि मनुष्यता की एक सीमा है जिसके पार जाना अक्षम्य है। इस फैसले के दो मानवीय पहलू भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। पहला, सजा सुनते ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर मौजूद दोनों दोषियों का रो पड़ना और मुस्कान का यह कहना कि मेरी बच्चियों का ध्यान रखना। 

यह एक माँ की अंतिम चिंता थी, जो बताती है कि अपराधी भी अंतत: एक मनुष्य ही है। आवेश में उसने अपराध तो किया, लेकिन वह अपनी बेटियों के प्रति उतनी ही संवेदनशील है जितनी एक मां को होना चाहिए। दूसरा, मृतक सौरभ की माँ का यह कहना कि आज बेटे को न्याय मिला, जो एक परिवार के 591 दिन लंबे इंतजार और 126 सुनवाइयों के दर्द का अंत है। मृत्युदंड एक सभ्य समाज के लिए हमेशा एक दुखद घटना है। 

लेकिन यह फैसला एक स्पष्ट चेतावनी है कि वैवाहिक संबंधों में विश्वासघात का रास्ता कानूनन तलाक से निकलता है, हत्या से नहीं। प्रेम के नाम पर किया गया स्वार्थ जब किसी निर्दोष की जान ले लेता है, तो समाज को उसके खिलाफ सबसे कठोर शब्दों में बोलना ही पड़ता है। इस सजा ने पीड़ित परिवार को न्याय दिया है, पर साथ ही हम सबके सामने यह सवाल भी छोड़ा है कि हम अपने रिश्तों में इतने असंवेदनशील और हिंसक कैसे होते जा रहे हैं?

Thursday, October 15, 2026

Elderly woman became immortal by donating one rupee


‍Bodhi Tree

Ashok Mishra

After attaining enlightenment, Buddha gave his first sermon from Sarnath. It is said that only five people were present at that time. Later the number of Buddha's disciples reached lakhs. To accommodate these disciples, Mahatma Buddha and his wealthy supporters had established Sanghas, monasteries and viharas at many places. 

The name of the organization of disciples of Mahatma Buddha was 'Buddhist Sangha' or 'Bhikshu Sangha'. After his enlightenment, Buddha expanded and built Buddhist orders at various places in North India such as Magadha, Sarnath, Vaishali, Shravasti, Rajagriha, etc. At one place, when the need to build a Buddhist monastery was felt, Tathagata decided to collect money from the people for it. 

People donated generously for the construction of the Buddhist monastery. Nagar Seth also gave a lot of gold coins. An elderly woman came among these people. He lived his entire life in extreme poverty. Somehow he managed to earn his living and saved one rupee. That elderly woman brought one rupee and handed it over with great devotion for the construction of the Vihar. 

When everything was settled, Mahatma Buddha called his disciple and asked who had donated how much. That disciple said, Lord! Nagar Seth had donated several hundred gold coins, but this was not even one percent of his total wealth. Then Buddha asked who had given 100% donation. The disciple told that a poor elderly mother had donated one rupee. That was his life's savings. When the monastery was completed, the inscription on its door had the old woman's name inscribed at the top.

एक रुपया दान देकर अमर हो गई बुजुर्ग


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना सबसे पहला उपदेश सारनाथ से किया था। कहते हैं कि उस समय केवल पांच लोग ही मौजूद थे। बाद में बुद्ध के शिष्यों की संख्या लाखों में पहुंच गई थी। इन शिष्यों के रहने के लिए महात्मा बुद्ध और उनके धनवान समर्थकों ने कई स्थान पर संघ, मठ और विहारों की स्थापना की थी। महात्मा बुद्ध के शिष्यों के संगठन का नाम 'बौद्ध संघ' या 'भिक्षु संघ' था। 

बुद्ध ने अपने ज्ञान प्राप्ति के बाद, उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों जैसे मगध, सारनाथ, वैशाली, श्रावस्ती, राजगृह आदि पर बौद्ध संघ का विस्तार और निर्माण किया था। एक जगह जब बौद्ध विहार बनाने की जरूरत महसूस हुई, तो तथागत ने तय किया लोगों से इसके लिए धन एकत्रित किया जाएगा। लोगों ने बौद्ध विहार के निर्माण के लिए खुले मन से दान दिए। नगर सेठ ने भी काफी स्वर्ण मुद्राएं दीं। 

इन्हीं लोगों में एक बुजुर्ग महिला आई। उसने अपना पूरा जीवन अत्यंत निर्धनता में गुजारा था। किसी तरह अपना पेट पालकर उसने एक रुपया जमा किया था। उस बुजुर्ग महिला ने एक रुपया लाकर बड़ी श्रद्धा के साथ विहार निर्माण के लिए सौंप दिया। जब सब कुछ निपट गया, तो महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्य को बुलाकर पूछा कि किसने कितना दान दिया था। उस शिष्य ने बताया कि भगवन! 

नगर सेठ ने कई सौ स्वर्ण मुद्राएं दान दी थीं, लेकिन यह उनकी कुल संपत्ति का एक प्रतिशत भी नहीं था। तब बुद्ध ने पूछा कि शत-प्रतिशत किसने दान दिया था। शिष्य ने बताया कि एक गरीब बुजुर्ग माता ने एक रुपया दान दिया था। वह उनके जीवन भर की बचत थी। जब विहार का निर्माण पूरा हुआ, तो उसके दरवाजे पर लगाए गए शिलालेख में सबसे ऊपर उस बुजुर्ग महिला का नाम खुदा हुआ था।

फिर शुरू हुई खेत में पराली को जलाने से रोकने की कवायद

अशोक मिश्र

हरियाणा में पराली जलाने की परंपरा काफी पुरानी है। इसका सीधा संबंध फसल चक्र की समयबद्धता से है। प्रदेश में धान की कटाई के तुरंत बाद लगभग 15 से 20 दिन के भीतर गेहूं की बिजाई करनी होती है। इस छोटे से अंतराल में खेत को खाली करने का सबसे सस्ता और तेज तरीका किसान आग लगाना मानते रहे हैं। इधर एकाध दशक से जब कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई होने लगी है, तब से पराली जलाने की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है। यही कारण है कि हर साल रोकथाम की कवायद के बावजूद समस्या बनी रहती है। 

किसान पराली इसलिए जलाते हैं क्योंकि कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई के बाद खेत में करीब छह से आठ इंच के डंठल और बिखरी हुई पुआल बच जाती है। इसे हटाने के लिए हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, रोटावेटर या बेलर जैसी मशीनों की जरूरत होती है। ऐसी दशा में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए इस वर्ष भी प्रशासनिक स्तर पर अब तक की सबसे सख्त निगरानी व्यवस्था लागू की गई है। पूरे प्रदेश में जिला और ब्लॉक स्तर पर पराली सुरक्षा बल का गठन किया गया है। इसमें पुलिसकर्मी, कृषि विभाग के अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, नोडल और क्लस्टर अधिकारी तथा अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल हैं। 

यह बल खेतों में आग की घटनाओं की निगरानी और तत्काल कार्रवाई के लिए जिम्मेदार है। ग्राम स्तर पर कुल 8535 नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। हालांकि कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 8134 बताई गई है जो हॉटस्पॉट गांवों में प्रति अधिकारी 50 किसानों और सामान्य गांवों में सौ किसानों की जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे हैं। अब तक छह लाख से अधिक किसानों को इन अधिकारियों द्वारा कवर किया जा चुका है। प्रदूषण में पराली की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक आंकड़े मिले-जुले हैं। 

एक सामान्य धारणा है कि पराली दिल्ली-एनसीआर के धुंध का मुख्य कारण है, लेकिन शोध कुछ और बताते हैं। जनवरी 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन और नेचर इंडिया में प्रकाशित शोध के अनुसार पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष जलाने का योगदान दिल्ली-एनसीआर के कुल पीएम 2.5 में केवल लगभग 14 प्रतिशत है। 2015 से 2023 के बीच पराली जलाने की घटनाओं में 50 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद दिल्ली का पीएम 2.5 स्तर लगभग स्थिर रहा है, जो बताता है कि प्रदूषण के लिए अन्य स्रोत अधिक निर्णायक हैं। 

हरियाणा में प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार ने दंड और प्रोत्साहन दोनों का रास्ता अपनाया है। पराली जलाने पर पांच हजार से तीस हजार रुपये तक जुर्माना, रेड और येलो जोन का चिन्हीकरण और एफआईआर जैसी कार्रवाई के साथ ही ड्रोन से निगरानी शुरू की गई है। दूसरी ओर किसानों को प्रति एकड़ 1200 रुपये की प्रोत्साहन राशि, मशीनों पर 50 से 80 प्रतिशत तक सब्सिडी का लक्ष्य रखा गया है।  


Wednesday, October 14, 2026

कि मन थोड़ी धीर धरो

व्यंग्य
अशोक मिश्र

जब किसी लड़के या लड़की का विवाह तय होता है, तो उसके मन में फुरहरी छूटने लगती है। मन मतंग सा मतवाला हो उठता है। हर ओर सावन के अंधे की तरह उसे हर लड़की में होने वाली बीवी की छवि दिखाई देने लगती है। अंग अंग में टीस उठने लगती है। दिल में गुदगुदी होने लगती है। बिना पिये ही पूरी एकबोतल शराब जैसा नशा आंखों में उमड़ आता है। पग-धरते इधर हैं, पड़ता है। बात-बेबात हंसी छूट जाती है। लड़कियां सकुचा रहती हैं, नयन किसी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगते हैं।
विवाह तय होने के बाद एक व्यक्ति और बौराता है। और वह है लड़के का पिता। उसे नई नवेली समधन जो मिलने वाली होती है। समधी मिलन की रस्म निभाने की कल्पना ही रोमांचित कर देती है। मेरे मित्र रामभूल ने अपने बेटे की शादी में मुझे जिद करके बारात में चलने को बाध्य कर दिया। विवाह के दिन रस्मों को निभाते समय रामभूल की पत्नी, भाभियां, सालियां और सलहजें चुटकी लेने से बाज नहीं आ रही थीं। बात-बात पर ताने दिए जा रहे थे। रामभूल की पत्नी ने अपनी जेठानी से इशारा करते हुए छेड़ा, देखो दीदी! गाटर के पापा बाल और मूछें ऐसे रंग रहे हैं, मानो समधन देखते ही लट्टू हो जाएगी। तभी उनकी साली ने चुटकी ली-जाने दो दीदी जिसको जवानी में मैंने घास नहीं डाली, अब बुढ़ापे में समधन कहां घास डालने वाली है। सुना है कि जीजा की समधन बड़ी जबर है। जीजा जी को बगल में दबाकर एक मील तो दौड़ ही जाएगी।
शादी वाले दिन रामभूल बेटे से भी कहीं ज्यादा प्रफुल्लित नजर आ रहे थे। वह अपनी खुशी दबा नहीं पा रहे थे। वह अपने मन को बार-बार समझाते थे-तेरा कल समधन से मिलन होगा, कि मन थोड़ी धीर धरो। लेकिन मन था कि बावरा हो रहा था। पल काटे नहीं कट रहे थे। खैर, राम-राम करते हुए बेटे का विवाह संपन्न हुआ।
विदाई से ठीक पहले लड़की वालों ने रामभूल से कहा, चलिए समधी मिलन की रस्म भी पूरी कर ली जाए। रामभूल अपने भाइयों, जीजा और साले के साथ मंडप के नीचे आए। थाली में हल्दी, चावल, हरी दूब और कुछ रुपये रखकर उन्होंने पर्दे के रूप में तनी चादर के अंदर हाथ बढ़ाकर दिया, तो एक हाथ ने उनका हाथ पकड़कर पर्दे में ही खींच लिया। अरे--रे--रे करते हुए रामभूल का धड़ पर्दे के अंदर पहुंचा। उनका मुंह किसी महिला की नाभिस्थल से जा टकराया। पर्दे के पीछे खड़ी कुछ महिलाओं ने रामभूल को पूरा अंदर ही घसीट लिया। जब रामभूल पर्दे से बाहर आए, तो वह एकदम लुटे पिटे से थे। पूरा मुंह हल्दी और रंग से रंगा हुआ था। कपड़े तार-तार हो चुके थे। रामभूल के साथ आए लोगों ने बाहर जाना चाहा, तो पता चला कि दरवाजे की कुंडी तो बाहर से बंद है। और फिर उन लोगों पर महिलाएं ऐसे टूट पड़ी, मानो रणथंभौर के किले के बाहर खड़ी मुगल सेना पर क्षत्रियों की फौट टूट पड़ी हो। फिर उन लोगों का जो हाल हुआ, उसी कल्पना आप खुद कर सकते हैं। रामभूल ने कसम खाई कि अब अपने किसी बेटे के विवाह में समधी मिलन की रस्म नहीं निभाएंगे।

Who will clean the body like kamandal?

bodhi tree

Ashok Mishra

Buddha was far away from religious rituals and Stoicism. He preferred simplicity over ostentation. The rules of his association were also very simple and non-discriminatory. He was beyond the boundaries of caste, varna and gotra. This is the reason why no one was discriminated against in his beggar association. He had to do his own work. This is the reason why he used to feed himself by begging. 

Once upon a time. He took his alms bowl and stood at the door of a city merchant. The Nagar Seth was very happy to see Mahatma Buddha. By the way, that Nagar Seth was very kind and a lover of humanity. He used to help people as far as possible. Despite this, there were some shortcomings in it also. He had heard a lot about Mahatma Buddha. 

He was also greatly influenced by the thoughts of Tathagata. When he saw Tathagata at his door, he thought that by giving donations to him, he too would be benefited. Buddha moved the alms bowl forward. The Nagar Seth saw that the vessel was filled with a lot of filth. He went inside with the vessel, scrubbed it clean and brought it to Buddha. 

Putting alms in the vessel he said, Lord! At least the alms bowl should be kept clean. Hearing this, Buddha smiled and said, the dirt in the alms bowl can be cleaned, but what should be done about the dirt that is filled in the body. Now he understood what the Tathagat was pointing towards. From that day onwards the Nagar Seth started internal cleaning. Over time, he gained a lot of prestige in the city.

शरीर रूपी कमंडल कौन साफ करेगा?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध धार्मिक कर्मकांड और वितंडावाद से कोसों दूर थे। वह आडंबर की जगह सादगी पसंद करते थे। उनके संघ के नियम भी बहुत सरल और भेदभाव रहित थे। वह जाति, वर्ण  और गोत्र की परिधि से भी बाहर थे। यही वजह है कि उनके भिक्षुक संघ में किसी के साथ कोई भेदभाव नहं किया जाता था। उन्हें अपना काम खुद करना पड़ता था। यही कारण है कि वह खुद भिक्षा मांगकर अपना उदर पूर्ति करते थे। 

एक बार की बात है। वह अपना भिक्षा पात्र लेकर एक नगर सेठ के दरवाजे पर जाकर खड़े हो गए। महात्मा बुद्ध को देखकर नगर सेठ बहुत प्रसन्न हुआ। वैसे वह नगर सेठ काफी दयालु और मानवता प्रेमी था। जहां तक संभव होता था, लोगों की सहायता किया करता था। इसके बावजूद कुछ न कुछ कमियां उसमें भी थीं। उसने महात्मा बुद्ध के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। 

वह तथागत के विचारों से प्रभावित भी बहुत था। उसने अपने दरवाजे पर तथागत को देखा, तो सोचा कि उन्हें दान देने से उसका भी कल्याण हो जाएगा। बुद्ध ने भिक्षा पात्र को आगे बढ़ाया। नगर सेठ ने देखा कि उस पात्र में काफी गंदगी भरी हुई है। वह पात्र लेकर अंदर गया और उसे रगड़-रगड़ कर साफ किया और उसे लेकर बुद्ध के पास आया। उसने पात्र में भिक्षा डालते हुए कहा, भगवन! कम से कम भिक्षा पात्र तो साफ रखना चाहिए। 

यह सुनकर बुद्ध मुस्कुराए और बोले, भिक्षा पात्र की गंदगी तो साफ की जा सकती है, लेकिन शरीर में जो गंदगी भरी हुई है, उसका क्या किया जाए। अब उसने समझ लिया कि तथागत किस बात की ओर इशारा कर रहे हैं। उस दिन के बाद से नगर सेठ ने आंतरिक सफाई शुरू कर दी। कालांतर में उसने नगर में काफी प्रतिष्ठा पाई।

बढ़ती महंगाई ने लोगों की पहले से झुकी कमर और झुका दिया


अशोक मिश्र

देश में महंगाई ने 23 महीने का रिकॉर्ड तोड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर यानि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स आधारित महंगाई 5.54 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो अक्टूबर 2024 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है और अगस्त के 4.83 प्रतिशत से काफी अधिक है। यह बढ़ोतरी लगातार आरबीआई के चार प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। हालांकि छह प्रतिशत की ऊपरी सीमा के भीतर है। यह 23 महीने का उच्चतम स्तर है। इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह खाने-पीने की चीजों का महंगा होना है। 

सितंबर में फूड इन्फ्लेशन यानि उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक 7.74 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो अगस्त में 5.97 प्रतिशत था। ग्रामीण भारत में यह असर और ज्यादा है, जहां कुल महंगाई 6.08 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 8.06 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि शहरी इलाकों में कुल महंगाई 4.88 प्रतिशत रही। रोजमर्रा की रसोई की थाली सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। प्याज की महंगाई सालाना आधार पर 108.09 प्रतिशत तक उछल गई, जो अगस्त में 48.78 प्रतिशत थी। इस महंगाई का असर ब्याज दरों पर भी दिख रहा है। 

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसी दबाव के कारण आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने हाल की समीक्षा में दरें बढ़ाने का फैसला सही ठहराया है। कर्ज महंगा होने से होम लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई बढ़ रही है, जबकि आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। महंगाई के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं। मौसमी सब्जियों और स्थानीय मंडियों से खरीदारी करना, प्याज-अदरक-लहसुन जैसी चीजों का थोक में मिल-जुल कर स्टोर करना, दालों और तेल में ब्रांड के बजाय गुणवत्ता देखकर विकल्प चुनना और खाने की बर्बादी कम करना सीधे तौर पर थाली की लागत घटाता है। 

सरकारी आंकड़ों पर नजर रखते हुए पीडीएस, मदर डेयरी के सफल स्टोर और एनसीएफ की रियायती बिक्री जैसी योजनाओं का उपयोग भी गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए राहत दे सकता है। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी दोनों लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। परिवार की आय बढ़ती महंगाई के अनुपात में नहीं बढ़ रही है। इसी वजह से युवाओं में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। लोग परेशान हैं। गरीबों को तो सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।  रोज की थाली का बजट ही बिगड़ जाता है। 

परिवार दाल, तेल और सब्जी की मात्रा घटाने लगते हैं, बच्चों के पोषण पर असर पड़ता है। मध्यम वर्ग की सैलरी महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ रही, लेकिन स्कूल की फीस, मकान का किराया, बिजली का बिल और कर्ज की ईएमआई लगातार बढ़ रही है। ब्याज दर बढ़ने से होम लोन और पर्सनल लोन महंगा हो गया है, इसलिए बचत लगभग खत्म हो रही है। गरीब परिवारों के लिए दिहाड़ी में काम मिलने पर भी हाथ में पैसा कम बचता है क्योंकि किराना और यातायात दोनों महंगे हैं। कई परिवार इलाज या बच्चों की पढ़ाई जैसे जरूरी खर्च टालने को मजबूर हो रहे हैं।