Monday, February 23, 2026

आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, काम से होती है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मैडम क्यूरी पहली महिला थीं जिन्हें भौतिक और रसायन का नोबल मिला था। पियरे क्यूरी से विवाह करने के बाद वह पूरी दुनिया में मैडम क्यूरी के नाम से जानी गईं। पोलैंड में जन्मी मैडम क्यूरी का वास्तविक नाम मारिया स्क्लाडोवका था। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। 

बड़ी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। यह पहला परिवार था जिसने पांच नोबेल पुरस्कार हासिल किया था। इतनी प्रसिद्धि के बावजूद मैडम क्यूरी सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करती थीं। पूरी दुनिया में ख्याति के बावजूद वह दिन-रात जब भी मौका मिलता था, वह अपने प्रयोगशाला में प्रयोग करती रहती थीं। पति-पत्नी दोनों वैज्ञानिक थे, इस वजह से दोनों एक दूसरे का बहुत सम्मान भी किया करते थे। 

एक बार की बात है। एक युवा पत्रकार उनका साक्षात्कार लेने उनके घर आया। उस समय मैडम क्यूरी एक बहुत ही साधारण कपड़े पहनकर बाहर बैठी हुई थीं। उस पत्रकार ने मैडम क्यूरी से पूछा कि क्या तुम यहां की नौकरानी हो? मैडम क्यूरी ने जवाब दिया है-हां, मैं इस घर की नौकरानी हूं। उस पत्रकार ने कहा कि क्या मैडम क्यूरी घर में हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-वह बाहर गई हैं। 

पत्रकार ने पूछा कि वह कब तक आएंगी? क्यूरी ने जवाब दिया-पता नहीं। पत्रकार ने फिर पूछा, कुछ कहकर गई हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-हां, उन्होंने कहा है कि आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, उसके काम से होती है। यह सुनते ही उस पत्रकार ने उन्हें गौर से देखा तो पता लगा कि यही तो मैडम क्यूरी हंै। वह उनकी सादगी से बहुत प्रभावित हुआ।

पेड़ों की अवैध कटान के चलते संकुचित हुआ वन्यजीव गलियारा

अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान के चलते वन्य जीवों का गलियारा काफी संकुचित हुआ है। यही वजह है कि अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीव यदा कदा मानव बस्तियों में घुस आते हैं। इससे कई बार जनहानि भी होती है। ज्यादातर मामलों में समय पर पता लग जाने की वजह से लोग उन्हें विभिन्न उपायों से जंगल की ओर भगा देते हैं। मानव हस्तक्षेप की वजह से वन्य जीवों के लिए स्वाभाविक ईको सिस्टम अरावली क्षेत्र में प्रभावित हो रहा है। 

लेकिन यह प्रभाव किस रूप में पड़ रहा है, वन्य जीवों की आबादी घट रही है या बढ़ रही है, इसका भी कोई सटीक आंकड़ा नहीं है क्योंकि सन 2017 से अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती ही नहीं हुई है। हालांकि यह जरूर कहा जा रहा है कि जल्दी ही अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती कराई जाएगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनकी आबादी कितनी बढ़ी या घटी। 

पुराने आंकड़े बताते हैं कि 2017 के सर्वे में 31 तेंदुए मिले थे। अनुमान है कि अब यह संख्या बढ़कर 80-90 के करीब हो सकती है। उस सर्वे में यह भी पता चला था कि सन 2017 में 167 नीलगाय, 126 लकड़बग्घे, 26 जंगली बिल्लियाँ, 91 पोरक्यूपाइन (साही), 50 नेवले, चार लोमड़ी, और 61 ताड़ के सिवेट भी रिकॉर्ड किए गए थे। रिपोर्ट में 14 चिंकारा और 23 मोर के साथ दूसरे जानवर दिखने की बात भी कही गई थी। ऐसा नहीं है कि सरकार ने वन्यजीवों की गिनती कराने का प्रयास नहीं किया था। 

2017 के बाद देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को सर्वे का काम सौंपा गया था। अरावली क्षेत्र में बड़े जोर-शोर से सर्वे भी किया गया था, लेकिन इंस्टीटूयूट ने अभी तक सर्वे रिपोर्ट भी जारी नहीं की है। प्रदेश सरकार ने कई बार सर्वे रिपोर्ट भी मांगी, लेकिन इंस्टीट्यूट ने जवाब देना उचित ही नहीं समझा। ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि एक बार नए सिरे से वन्यजीवों की गिनती कराई जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि वास्तविक स्थिति क्या है? यदि वन्य जीवों की संख्या घट रही है, तो इनकी जनसंख्या बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए। 

यह पता लगाया जाए कि वह कौन से कारण हैं जिनकी वजह से जीवों की संख्या घट रही है। उन कारणों को दूर करके वन्य जीवों की आबादी बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया जाए। यदि बढ़ रही है, तो भी उन कारणों को चिन्हित किया जाए, ताकि इसका उपयोग दूसरी जगहों पर किया जा सके। हमें दोनों हालात की जानकारी होनी चाहिए। पिछले कई सालों से अरावली क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। 

रसूख वाले लोग अपने फार्म हाउस, मैरिज हाल आदि बनवाकर वन्य जीवों के रहन-सहन को बाधित कर रहे हैं। वन्यजीव गलियारे में इंसानों के आवागमन की वजह से उन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

Sunday, February 22, 2026

अपनी समस्या तुम्हें खुद सुलझानी होगी


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मन की शांति, सुख और दुख जैसी भावनाएं प्रत्येक मनुष्य में पैदा होती हैं। लेकिन अगर किसी को सुख की अनुभूति हो रही है, तो वह किसी दूसरे के काम आने वाली नहीं है। यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति प्रसन्न है, तो उसकी अनुभूति उस व्यक्ति के माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी और बेटा-बेटी को नहीं होगी। 

हर व्यक्ति को अपना सुख-दुख खुद ही भोगना पड़ेगा। यही प्रकृति का नियम है। एक समय की बात है। एक सेठ किसी नगर में रहता था। उसने अपने जीवन में काफी धन कमाया था। उसका परिवार भी काफी सभ्य और सुशील था। लेकिन पता नहीं क्यों, उस सेठ के मन में शांति नहीं थी। 

वह हर समय परेशान रहता था। वह सोचता रहता था कि उसके मन को शांति कैसे मिले? एक दिन उसने सुना कि उसके शहर में एक साधु आए हैं। वह लोगों की समस्याओं का निराकरण करते हैं। सेठ भी अपनी समस्या को लेकर साधु के पास गया। साधु ने उसकी परेशानी सुनकर अगले दिन आने को कहा। सेठ अगले दिन साधु के पास पहुंचा, तो साधु ने कड़कती धूप में बिठा दिया और खुद पेड़ की छांव में बैठ गया। 

तीन चार घंटे बाद साधु ने अगले दिन दोबारा आने को कहा। अगले दिन सेठ को तो साधु ने भूखा-प्यासा रखा और खुद तरह-तरह के पकवान खाता रहा। साधु ने तीसरे दिन उसे आने को कहा। तीसरे दिन सेठ गुस्से से तमतमाता हुआ साधु के पास पहुंचा और बोला-मैं आपके पास अपनी समस्या का हल पाने आया था, आप तो मुझ पर अत्याचार कर रहे हैं। 

साधु ने कहा कि मैं आपको यही समझाना चाहता था कि आपको अपनी समस्या खुद ही सुलझानी होगी। आपको ऐसे कर्म करने होंगे जिससे आपके मन को शांति मिले। सेठ की समझ में अब बात आ गई थी।

दुष्कर्म पीड़िताएं सहानुभूति की हकदार, घृणा की नहीं

अशोक मिश्र

गुरुग्राम के सेक्टर 37 में गुरुवार को एक ऐसी घटना सामने आई जिससे लगा कि अब इंसान हैवान से भी बदतर होता जा रहा है। सेक्टर 37 में रहने वाले एक युवक ने तीन साल की मासूम बच्ची को पहले बहलाया-फुसलाया और घर से करीब साढ़े तीन किमी दूर ले जाकर पहले उसके साथ दुराचार किया और बाद में गला दबाकर हत्या कर दी। आरोपी युवक को पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पहचाना। 

इंसान अब इतना पतित हो गया है कि वह मासूम बच्चियों के साथ दुराचार करने में भी नहीं हिचक रहा है। गुरुवार को ही उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पचास  से अधिक बच्चों के यौन शोषण और उनकी वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डालने के दोषी पति-पत्नी को फांसी की सजा सुनाई गई है। बांदा जिला कोर्ट के जज तो इन हैवानों की करतूत से इतना नाराज थे कि उन्होंने कहा, इन दरिंदों को तब तक फांसी पर लटाए रखो, जब तक इनकी मौत न हो जाए। पति रामभवन सिंचाई विभाग में इंजीनियर था और उसकी पत्नी दुर्गावती हाउस वाइफ। सीबीआई ने इन दोनों को 18 नवंबर 2020 को गिरफ्तार किया था। 

इन दोनों पर बच्चों का यौन शोषण करने, अश्लील वीडियो बनाकर डार्क वेब पर बेचने का आरोप था। बताया जाता है कि पचास से अधिक बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए थे। ऐसे लोगों को फांसी की सजा ही मिलनी चाहिए थी। इन दोनों दोषियों ने बच्चों का जीवन नर्क बना दिया है। जितने बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए हैं, वह आजीवन इस घटना को भूल नहीं पाएंगे। बलात्कार और दुष्कर्म का दंश पीड़ितों को आजीवन सालता रहेगा। भारतीय समाज में बलात्कार का शिकार हुए लोग आजीवन सुख की नींद नहीं सो पाते हैं। 

यदि किसी पुरुष के साथ दुराचार होता है, तो वह समाज में अपना मुंह दिखाने के काबिल नहीं माना जाता है। ऐसा ही महिलाओं के साथ भी होता है। समाज और रिश्तेदार तो सबसे पहले पीड़िता को ही दोष देने लगते हैं। वह यह समझने को तैयार ही नहीं होते हैं कि पीड़िता किस परेशानी के दौर से गुजर रही है। उसकी मनस्थिति क्या है? पीड़िता के परिजन भी पहले मामले को दबाने का प्रयास करते हैं, ताकि समाज में उन्हें नीचा न देखना पड़े। वहीं दूसरी ओर बलात्कार करने वाला समाज में अपना सिर उठाकर चलता है, मानो उसने कोई बहादुरी का काम किया हो। समाज की यह दोहरी मानसिकता पीड़िता को और भी परेशान करती है। 

यहि किसी को पीड़िता के बारे में पता चल जाए, तो लोग उसे सहज उपलब्ध मान लेते हैं। कई बार तो पीड़िता को उन लोगों की भी हैवानियत का शिकार होना पड़ता है जिससे उसे सहायता की उम्मीद होती है। जब तक समाज अपनी दोहरी मानसिकता से मुक्त नहीं होता, तब तक दुष्कर्म पीड़िताओं को सहानुभूति और न्याय नहीं मिल सकता है। पीड़िताएं सहानुभूति और सम्मान की हकदार हैं, घृणा की नहीं।

Saturday, February 21, 2026

महात्मा बुद्ध ने सुप्पिया को दिलाई मुक्ति


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के एक शिष्य थे सुप्पिया। सुप्पिया का जन्म उस जाति में हुआ जिसमें पैदा हुए लोगों को मरे हुए पशुओं की खाल उतारना और उन्हें ठिकाने लगाना था। इसकी वजह से उन्हें बहुत अपमान सहना पड़ता था। उस समय का समाज छुआछूत और जाति-पाति के विचारों को बहुत मानता था। उच्च जाति के लोग अपने से निम्न जाति के लोगों को बहुत हेय दृष्टि से देखते थे। 

उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार भी होता था। सुप्पिया इस बात से बहुत परेशान थे। वह इस अपमान से मुक्त होना चाहते थे। एक दिन उन्होंने सुना कि उसके गांव के पास में ही महात्मा बुद्ध आए हैं, जो अपने उपदेशों से लोगों का जीवन बदल देते हैं। सुप्पिया के मन में भी इच्छा जागी कि वह उस संत से मिलें। लेकिन फिर उनके मन में आया कि लोग उन्हें उनसे मिलने नहीं देंगे। लेकिन वह अपने मन को कड़ा करके महात्मा बुद्ध से मिलने गए। 

महात्मा बुद्ध ने शांत स्वर में पूछा कि तुम कौन हो और मुझसे क्या चाहते हो। सुप्पिया ने अपनी दशा बताते हुए इन परेशानियों से मुक्ति की कामना प्रकट की। महात्मा बुद्ध  ने सुप्पिया को समझाते हुए कहा कि जब भी निर्मल मन से प्रत्येक व्यक्ति को  एक समान समझता है। लोगों के साथ दया, ममता और अहिंसक व्यवहार करता है, वह किस जाति में पैदा हुआ है, इससे कोई फर्कनहीं पड़ता है। 

मानवता का किसी जाति से कोई लेना देना नहीं है। सुप्पिया ने बुद्ध से कहा कि मैं मुक्त होना चाहता हूं। बुद्ध ने अपने संघ में भिक्षुक बना लिया। सुप्पिया ने बुद्ध के मार्गदर्शन में कठोर साधना की। वे संघ के अन्य भिक्षुओं की तरह नियमों का पालन करते थे और अपनी साधना में पूरी तरह से लीन रहते थे। 

बुद्ध ने उन्हें शिक्षा दी कि समस्त प्राणियों के प्रति करुणा और प्रेम का भाव रखना चाहिए और उनके दु:ख को समझकर उनकी मदद करनी चाहिए। धीरे-धीरे सुप्पिया ने अपनी साधना में प्रगति की और अंतत: उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। 

परीक्षा के तनाव में जी रहे विद्यार्थी शादियों में बज रहा कानफोड़ू डीजे


अशोक मिश्र

हरियाणा में जहां वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या बनता जा रहा है, वहीं ध्वनि प्रदूषण भी कम परेशान करने वाला नहीं है। सड़कों पर तेज हार्न बजाकर दौड़ती हुई गाड़ियां सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण पैदा करती हैं। हरियाणा में विशेषकर गुरुग्राम, फरीदाबाद और रोहतक जैसे शहरी व औद्योगिक क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर खतरनाक है, जो अक्सर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों (दिन में 55 डेसिबल से कम) से काफी ऊपर रहता है। इन दिनों शादियों का मौसम है। 

रात में निकलने वाली बारात के दौरान बजने वाले डीजे लोगों को काफी परेशानी में डाल रहा है। उच्च रक्तचाप की बीमारी से ग्रसित लोगों के हृदय में डीजे बजते समय कांपने लगते हैं। आसपास की इमारतों में कंपन पैदा होने लगता है। कई बार तो ऐसा महसूस होता है कि यदि तनिक भी डीजे का शोर अधिक हुआ, तो इमारत भरभरा कर गिर जाएगी। राज्य के औद्योगिक शहरों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा है। 

ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत वाहनों का हॉर्न, निर्माण कार्य और जनरेटर के साथ-साथ शादियों में बजने वाले डीजे हैं। ध्वनि प्रदूषण पर नजर रखने के लिए तो फरीदाबाद में पहले वास्तविक-समय ध्वनि निगरानी स्टेशन स्थापित किए गए हैं। वैसे तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग अलग मानक तय किए हैं, लेकिन इन मानकों का उल्लंघन हर जगह होता दिखाई दे जाएगा। बोर्ड के नियमानुसार, अस्पतालों के आसपास दिन में 50 डेसिबल और रात में 40 डेसिबल से कम ही शोर होना चाहिए ताकि मरीजों की नींद में किसी प्रकार का खलल न पड़े, लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। 

गाड़ियों के हॉर्न बजते रहते हैं। डीजे वाले भी अस्पताल का ध्यान नहीं रखते हैं। कुछ ही दिनों में राज्य में बोर्डों की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं। इसके बाद नौवीं और ग्यारहवीं की परीक्षाएं होंगी। छोटे बच्चों की भी परीक्षाएं निकट भविष्य में होनी हैं। बच्चे तनाव में हैं। जल्दी से जल्दी कोर्स पूरा करने का उन पर दबाव भी है। वह अधिक से अधिक समय तक पढ़ाई करना चाहते हैं। लेकिन उनके आसपास होने वाला शोर उनकी मेहनत पर पानी फेर रहा है। बच्चे ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं। 

ध्वनि प्रदूषण के चलते उनकी मानसिक शांति खत्म हो रही है। उनमें हाईपर टेंशन, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है। कई बार तो तनाव में वह उग्र भी हो रहे हैं। चिकित्सकों का यह भी कहना है कि तेज आवाज वाले डीजे या हाई डेसिबल वाली ध्वनि केवल कानों के पर्दे को ही नुकसान नहीं पहुंचाती है, बल्कि दिल के रोगियों के लिए कई बार जानलेवा हो जाती है। अचानक तेज आवाज होने से शरीर स्ट्रेस रिस्पांस सक्रिय करके एड्रेनॉलिन बढ़ाता है जिसकी वजह से धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। इससे लोगों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है।

Friday, February 20, 2026

मारिया और ब्रोन्या ने एक दूसरे को पढ़ाया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रेडियोधर्मिता शब्द गढ़ने वाली मारिया उर्फ मैडम क्यूरी ने पोलोनियम और रेडियम जैसे तत्वों की खोज की थी। मैडम क्यूरी वह पहली महिला थीं जिन्हें रसायन और भौतिकी दोनों में नोबेल पुरस्कार दिया गया था।  उनके पति पियरे क्यूरी को भी नोबल पुरस्कार दिया गया था। इनके पिता और दादा काफी प्रतिष्ठित और अमीर थे, लेकिन बाद में लड़ाई में भाग लेने की वजह से अपनी धन-संपत्ति गंवा बैठे थे। 

इसके चलते मारिया और ब्रोन्या को काफी संघर्ष करना पड़ा। उन दिनों पोलैंड रूस के अधीन हुआ करता था। महिलाओं का उच्च शिक्षा हासिल करना उन दिनों पोलैंड में काफी दुष्कर था। इन दोनों बहनों में पढ़ने की बहुत अधिक लगन थी। वह पढ़ना चाहती थीं, लेकिन पढ़ाई के लिए आवश्यक धनराशि नहीं थी। 

तब मारिया ने अपनी बहन ब्रोन्या से कहा कि तुम पेरिस जाकर मेडिकल की पढ़ाई करो। तुम्हारी पढ़ाई में जो खर्च आएगा, वह मैं करूंगी। इसके लिए मैं काम खोज लूंगी। पढ़ाई पूरी करने के बाद तुम मेरी पढ़ाई में मदद करना। दोनों बहनों ने एक दूसरे के सहारे अपने भाग्य को चमकाने का फैसला किया। ब्रोन्या पेरिस चली गई। मारिया ने एक नए शहर में एक अमीर परिवार के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। 

दिन में वह बच्चों को पढ़ाती थीं और रात में खुद पढ़ाई करती थीं। दो साल बाद ब्रोन्या डॉक्टर बनी तो उसने मारिया को उसने पेरिस बुला लिया। बस यहीं से मारिया के जीवन में बदलाव आया। उन्होंने अपने को विज्ञान की सेवा में झोंक दिया। बाद में उन्होंने पियरे क्यूरी से विवाह किया। अपनी बहन की सहायता से मारिया ने न केवल अपना मुकाम हासिल किया, बल्कि मानवता की बहुत बड़ी सेवा की। इनकी सेवा की पूरी दुनिया ने सराहना की।

हरियाणा में वायु प्रदूषण के चलते होने वाली बीमारियां चिंताजनक


अशोक मिश्र

हरियाणा के सत्रह जिलों में बुधवार को हुई बरसात की वजह से वायु प्रदूषण पर बहुत मामूली कमी आई है। ठंडक बीत जाने के बाद भी वायु गुणवत्ता सूचकांक संतोषजनक स्तर पर नहीं आ पाया है। यह हालत तब है, जब एक्यूआई पर प्रधानमंत्री कार्यालय से भी निगाह रखी जा रही है। हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में वायु प्रदूषण अब एक स्थायी समस्या बनता जा रहा है। इन राज्यों में वायु प्रदूषण के चलते होने वाली मौतों को सामान्य मानकर भुला दिया जाता है। 

अक्टूबर 2025 में जारी ग्लोबल बर्डन आॅफ डिजीज (जीबीडी) 2023 के आंकड़ों पर आधारित इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) ने अध्ययन किया तो पाया कि हरियाणा में महीन कणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण सामने आया है। अध्ययन में पाया गया कि राज्य में 27,130 मौतें खराब वायु गुणवत्ता से जुड़ी थीं, जो कुल मृत्यु दर का 13.5 प्रतिशत है। हरियाणा में रोकी जा सकने वाली मौतों का प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है, जो उच्च सिस्टोलिक रक्तचाप के बाद दूसरे स्थान पर है, जिसके कारण 2023 में 30,197 मौतें हुईं। 

वायु प्रदूषण के चलते हर साल हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़े का कैंसर और श्वांस संबंधी बीमारियों के कारण काफी मात्रा में लोगों की मौत हो जाती है। इन मौतों का कारण कहीं न कहीं वायु प्रदषण होता है। वायु प्रदूषण से लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोग अपने शरीर में सूजन और आक्सीडेटिव तनाव के शिकार हो सकती हैं। जिसकी वजह से कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं।  ऐसे लोगों को तंत्रिका तंत्र संबंधी विकार और मनोदशा का शिकार होना पड़ सकता है। चिकित्सकों का मानना है कि हरियाणा में वायु प्रदूषण कोई गौण स्वास्थ्य चिंता नहीं है, बल्कि यह रोके जा सकने वाले रोगों के बोझ का प्राथमिक कारण है। 

यह सही है कि पिछले कुछ वर्षों से सरकारी तौर पर वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन उसके परिणाम उतने सकारात्मक नहीं रहे जितने की अपेक्षा थी। यह सच है कि हरियाणा में पराली को जलाने की घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन फैक्ट्रियों, वाहनों और एयरकडीशन्स के जरिये फैलने वाला प्रदूषण नियंत्रित नहीं हो पा रहा है। प्रतिबंध के दिनों में सड़कों पर उड़ने वाली धूल और होने वाले अवैध निर्माण सारे प्रयास पर पानी फेर देते हैं। 

रोहतक, धारूहेड़ा, सोनीपत, गुरुग्राम, फरीदाबाद, और बहादुरगढ़ में वायु गुणवत्ता बेहद खराब रही है, जहाँ ज्यादातर दिनों में एआईक्यू 300-400 से ऊपर या इसके आसपास दर्ज किया गया है। यदि हरियाणा में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पा लिया जाए, तो प्रदूषण के चलते होने वाली बीमारियां और उससे होने वाली मौतों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।

Thursday, February 19, 2026

मित्र के लिए राक्षस ने किया आत्मसमर्पण

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद का महामंत्री यानी अमात्य था राक्षस। उसका नाम राक्षस क्यों पड़ा, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिलती है। कहा जाता है कि वह राज्य को सुरक्षित और संपन्न बनाने के लिए कठोर फैसले लेता था, शायद इसीलिए उसको लोग राक्षस कहने लगे थे। इसके चलते उसका वास्तविक नाम अज्ञात रहा और उसकी उपाधि ही उसका नाम हो गया। 

धनानंद के आमात्य राक्षस के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी विशाखदत्त के संस्कृत भाषा में लिखे गए नाटक मुद्राराक्षस में मिलती है। यह नाटक चौथी से छठवीं शताब्दी के बीच गुप्त काल में लिखा गया माना जाता है। नाटक के अनुसार, जब चाणक्य के संरक्षण में चंद्रगुप्त मौर्य ने धनानंद को पराजित कर दिया, तो चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बना दिया। 

धनानंद के मुख्य सलाहकार और प्रधान मंत्री राक्षस को चंद्रगुप्त पकड़ नहीं पाया था। अमात्य राक्षस ने दूसरे राजाओं के सहयोग से चंद्रगुप्त के खिलाफ कई अभियान चलाए। लेकिन वह चाणक्य की चतुराई की वजह से सफल नहीं हुआ। चाणक्य भी राक्षस को अपनी ओर मिलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने राक्षस के परममित्र सेठ चंदन दास को गिरफ्तार करवा लिया। चाणक्य ने घोषणा की कि कुछ दिनों बाद चंदनदास को मृत्यु दंड दिया जाएगा। जब यह जानकारी राक्षस को मिली, तो वह विचलित हो गया। 

उसने चंद्रगुप्त के सामने उपस्थित होकर चंदन दास को छोड़  देने का आग्रह किया। चाणक्य ने कहा कि इसके बदले तुम्हें चंद्रगुप्त के लिए कार्य करना होगा। राक्षस ने कहा कि मैं शत्रुपक्ष का अमात्य रहा हूं, आपका मुझ पर विश्वास कैसे होगा? चाणक्य ने कहा कि तुम्हारा कार्य ही विश्वास पैदा करेगा। इसके बाद राक्षस ने अधीनता स्वीकार कर ली।

आतंकवाद से निपटने के लिए सैनी सरकार ने कस ली कमर


अशोक मिश्र

आतंकवाद वैश्विक समस्या है। इस समस्या से कमोबेस सभी देश पीड़ित हैं। कुछ देश तो खुलेआम इसे प्रश्रय भी दे रहे हैं। ऐसे देशों में पाकिस्तान सबसे पहले गिना जाता है। दिक्कत यह है कि पाकिस्तान कभी हमारे ही देश का हिस्सा था और अब पड़ोसी है। स्वाभाविक है कि आतंकवादी घटनाओं का सबसे पहला दुष्प्रभाव हमारे देश को ही झेलना पड़ता है। मुंबई में ताज पर आतंकी हमला, संसद भवन, पुलवामा, पहलगाम और अभी हाल में हुआ दिल्ली ब्लास्ट जैसे न जाने की कितनी घटनाएं हमारे देश में हो चुकी हैं। इन सभी घटनाओं में किसी न किसी रूप में पाकिस्तान का हाथ पाया गया था। 

दिल्ली ब्लास्ट मामले में जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई थी। फरीदाबाद में स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी के कुछ प्रोफेसर्स दिल्ली ब्लास्ट मामले में मुख्य अपराधी पाए गए थे।  काफी मात्रा में विस्फोटक रसायन भी हरियाणा में बरामद किए गए थे। इन सब घटनाओं को ध्यान में रखते हुए सीएम नायब सिंह सैनी ने आतंकवाद विरोधी दस्ता गठित करने की इजाजत गृह विभाग को दे दी है। एटीएस का नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक करेंगे। 

गुरुग्राम में एक अलग एटीएस पुलिस स्टेशन बनाया जाएगा। राज्य सरकार की आतंकवाद के खिलाफ यह एक अच्छी पहल है। इससे राज्य में सक्रिय आतंकवादियों और उनके स्लीपर सेल्स को पकड़ने और आतंकी नेटवर्कको छिन्न-भिन्न करने में सफलता मिलेगी। वैसे अभी तक यह काम पुलिस, खुफिया विभाग और अन्य सुरक्षा से जुड़ी संस्थाएं करती रही हैं। इन संस्थाओं के पास पहले से ही अपने बहुत सारे काम होते हैं, इसलिए आतंकियों की पूरी तरह से निगरानी नहीं कर पा रही थीं। 

आतंकवाद विरोधी दस्ते का गठन होने के बाद प्रदेश में आतंकी घटनाओं को रोका जा सकेगा, इसकी उम्मीद हो चली है। एटीएस के पांच विंग होंगे। इस विंग में स्पेशल फोर्स, इंटेलीजेंस-आॅपरेशनल डिपार्टमेंट, रिसर्च-एनालिसिसि विंग और इन्वेस्टिगेशन मुख्य रूप से शामिल रहेंगे। एटीएस का मुख्य काम आतंकी हमलों पर तुरंत सही प्रतिक्रिया देना, आतंकवाद से जुड़े मामलों की अच्छी जांच करना और कोर्ट में सही तरीके से मुकदमा चलाना होगा, ताकि आतंकियों को उनके किए की सजा मिल सके। प्रदेश सरकार ने यह भी तय किया है कि पंचकुला में मुख्यालय के साथ सीआईडी ​​के अंतर्गत एक आतंकवाद-विरोधी दस्ता (एटीएस) सेंटर स्थापित किया जाएगा। 

एटीएस दस्ते के गठन के बाद आतंकियों के खिलाफ मुकम्मल कार्रवाई होगी। राज्य से आतंकी घटनाओं को होने से पूरा तरह रोक लग जाएगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। एटीएस में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों को आर्थिक लाभ प्रदान करने का भी राज्य सरकार ने फैसला लिया है, जो स्वागत योग्य है।