Monday, September 14, 2026

संथाली का आत्मग्लानि धुल गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के वेलुवन में महात्मा बुद्ध को पधारना था। कुशी संघाराम में विशाल धर्मदीक्षा का आयोजन किया गया था। बहुत सारे लोग आए हुए थे। कौशल, मगध, कौशांबी, पंचनद और जेतवन विहारों से भारी संख्या में बौद्ध परिव्राजक वेलुवन पधारे थे। इन्हीं परिव्राजकों में संथाली भी थे। संथाली मगध के ही निवासी थे। उनके पिता प्रधान श्रेणिक थे। उनका भवन राज प्रासाद का भ्रम पैदा करता था। यहां समस्त प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं। वैभवशाली संथाली सब कुछ त्यागकर महात्मा बुद्ध की शरण में आए थे। 

धर्मदीक्षा की व्यवस्था के लिए सभी परिव्राजकों को कोई न कोई काम सौंपा गया। संथाली और वलैशी को उस दिन भिक्षा मांगने की जिम्मेदारी सौंपी गई। संथाली और वलैशी भिक्षा पात्र लेकर नगर की ओर निकल गए। नगर के द्वार द्वार भटकते हुए वह अपने घर के दरवाजे पर जा खड़े हुए। आज उनका अपना घर श्रीहीन प्रतीत हो रहा था। उन्होंने रुंधे हुए गले से आवाज लगाई-भवति भिक्षाम देहि जननी। 

यह चार शब्द कहते हुए संथाली का कंठ अवरुद्ध हो गया। पहली बार में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उन्होंने फिर आवाज लगाई, तो अंदर से आवाज आई-मां, संथाली आया है। संथाली आए हैं। इसके बाद उस घर में हलचल मच गई। मां, पिता, बहन, भाई और पत्नी सब दरवाजे पर आ खड़े हुए। शरीर पर एक वस्त्र, केशरहित सिर, हाथ में भिक्षा पात्र देखकर मां, पिता, भाई सब रोने लगे। 

पांच साल में पहली बार संथाली अपने घर के दरवाजे पर आए थे। संथाली ने उन्हें रोते हुए देखकर कहा, तात! मेरी साधना में अधूरी रह गई शायद, तभी तो आप रुदन कर रहे हैं। पिता ने अवरुद्ध कंठ से कहा, नहीं पुत्र! पांच साल में तुम्हारी अक्षय कीर्ति कमाई है। जो काम मुझे करना चाहिए था, वह तुम कर रहे हो। तुम इस देश के इतिहास हो। यह सुनकर संथाली का आत्मग्लानि धुल गया।

सड़कों पर घूमते लावारिस कुत्तों का बढ़ता जा रहा आतंक

अशोक मिश्र

शनिवार को बल्लभगढ़ के शाहुपुरा में दो छोटी बहनों को आवारा कुत्तों ने घेर लिया। दोनों ने तुरंत रैंप पर चढ़कर अपनी जान बचाई। सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें करीब छह साल के बच्चे के पीछे कुत्ता दौड़ता नजर आ रहा है और बच्चा ‘मम्मी बचाओ, मम्मी बचाओ’ चिल्ला रहा है। उसकी आवाज सुनकर घरवाले बाहर निकले और कुत्ते को भगाया। गनीमत यह रही कि बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। 

यह घटना अकेली नहीं है। प्रदेश भर में कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं और लोग भय के साये में जीने को मजबूर हैं। आज स्थिति यह है कि गली हो या बाजार, दिन हो या रात, लोगों को एक अनजाना डर घेरे रहता है। झुंड में घूमते आवारा कुत्ते अचानक किसी अकेले राहगीर, स्कूली बच्चे या बुजुर्ग पर हमला कर देते हैं। डॉग बाइट को लेकर अब शासन स्तर पर हलचल तेज हुई है, उन्होंने कुत्तों को झुंड बनाने से रोकने और जनसंख्या कम करने के उपाय करने शुरू कर दिए हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद हरियाणा के शहरी स्थानीय निकाय विभाग ने एक विस्तृत कार्ययोजना तय की है जिसके तहत प्रदेश के सभी 87 निकायों में कम से कम पांच हजार कुत्तों की क्षमता वाले आश्रय स्थल बनाए जाएंगे। सरकार का कहना है कि उसके पास अभी सभी कुत्तों को एक साथ शेल्टर में शिफ्ट करने के संसाधन नहीं हैं, इसलिए फिलहाल फोकस नसबंदी पर रहेगा। प्रदेश सरकार और स्थानीय निकाय आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए मुख्य रूप से एनिमल बर्थ कंट्रोल यानी एबीसी कार्यक्रम चला रहे हैं। इस कार्यक्रम के तहत नगर निगम और नगर परिषदें एजेंसियों को ठेका देकर कुत्तों को पकड़ती हैं, उनकी नसबंदी कराती हैं, रेबीज के टीके लगाती हैं, टैगिंग करती हैं और फिर उन्हें उसी क्षेत्र में छोड़ देती हैं जहां से पकड़ा गया था। 

एबीसी नियम 2023 के तहत यह काम वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से करने का प्रावधान है। केंद्र सरकार की 'स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट 2026-27' योजना के तहत 3000 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया है। इसके तहत देशभर में 30 सितंबर तक 2.46 करोड़ कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। 

हरियाणा को लगभग 58 हजार कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य मिला है। जमीन पर काम शुरू भी हुआ है। शाहुपुरा जैसी घटनाएं साफ दर्शाती हैं कि आम आदमी अभी असुरक्षित महसूस कर रहा है। सरकार की योजनाएं और प्रशासनिक गतिविधि हर जगह मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन और निरंतरता जरूरी है। नसबंदी अभियान को तेज करना, आक्रामक कुत्तों को तुरंत हटाना, शिकायतों का त्वरित निस्तारण और जागरूकता बढ़ाना ही इस आतंक से राहत दिलाने का रास्ता है। लोगों को भी इस मामले में जागरूक होना होगा।

Sunday, September 13, 2026

बुरा करने वाले के साथ होता है बुरा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध श्रावस्ती में विहार कर रहे थे। नित्य ही संध्या के समय जेतवन में बुद्ध का प्रवचन आयोजित किया जाता था। उन्हीं दिनों महापाल नाम का व्यापारी किसी काम से श्रावस्ती आया हुआ था। उसने महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना, तो वह बहुत अधिक प्रभावित हुआ। उसने सोचा कि मनुष्य योनि बहुत मुश्किल से मिलता है। व्यापार में अच्छे बुरे काम करते हुए जीवन को क्यों नष्ट किया जाए। वह अपने घर वापस गया और अपने भाई को व्यापार का सारा कार्यभार सौंपकर श्रावस्ती वापस आ गया। 

उसने महात्मा बुद्ध से शिष्य बनने की कामना की। बुद्ध ने उसकी इच्छा का सम्मान किया और शिष्य बना लिया। शिष्य बनने के बाद उसने आराधना शुरू की। उसने लेटकर सोना भी छोड़ दिया। बैठे बैठे साधना करता रहता था। कुछ दिनों के बाद आंखों में पीड़ा शुरू हुई। लोगों ने वैद्य को बुलाया। वैद्य ने कहा कि दवा के साथ नेत्र को विश्राम जरूरी है। लेकिन कुछ दिनों बाद महापाल की आंखें चली गईं। 

वह अंधा हो गया। अब वह महापाल की जगह चक्षुपाल कहा जाने लगा। जब वह आता जाता, तो उसके पैरों तले छोटे जीव दबकर मर जाते थे। अन्य शिष्यों ने महात्मा बुद्ध को यह बात बताई तो उन्होंने कहा कि वह देख नहीं सकता है, इसलिए उसका यह पाप क्षम्य है। शिष्यों के पूछने तथागत ने कहा कि पूर्व जन्म में महापाल एक वैद्य था। एक महिला इसके पास आंखों का इलाज कराने आई थी। 

उसने कहा था कि यदि उसकी आंखें ठीक हो गईं, तो वह आजीवन उसकी दासी बनकर रहेगी। आंखें ठीक होने पर महिला अपनी बात मुकर गई थी। तब वैद्य ने उसे एक ऐसी दवा दी जिससे उसकी दोनों आंखें चली गई। इस जन्म में महापाल को उसके पूर्व जन्म के पाप का ही दंड मिला है। जो किसी के साथ बुरा करता है, उसके साथ बुरा ही होता है।

मिलावटी खाद्य पदार्थों को लेकर सरकार सख्त, प्रशासन सतर्क

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने फैसला किया है कि मिलावट करने वालों के खिलाफ अभियान चलाया जाएगा। शरदकालीन तीज-त्यौहार भी नजदीक आ रहे हैं। पितृपक्ष, नवरात्र, दशहरा, दीपावली जैसे त्यौहार नजदीक ही हैं। इन त्यौहारों पर खाद्य पदार्थों और मिठाइयों की मांग काफी बढ़ जाती है। बाजार में मिठाई, दूध-पनीर, घी और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इसी मौके का फायदा उठाकर मिलावटखोर सक्रिय हो जाते हैं। ऊंची मांग और जल्दी बिक्री का दबाव उन्हें सस्ते विकल्प अपनाने का प्रलोभन देता है। 

हरियाणा सरकार ने इस खतरे को भांपते हुए खाद्य विभाग की टीमों के साथ पुलिस की मदद से विशेष अभियान चलाने का फैसला लिया है। चंडीगढ़ में मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी की अध्यक्षता में हुई राज्य स्तरीय सलाहकार समिति की बैठक में तय किया गया है कि त्यौहारी सीजन से पहले खाद्य पदार्थों की जांच और नमूना लेने की कार्रवाई तेज की जाएगी और इस बार अकेले खाद्य विभाग नहीं बल्कि पुलिस की टीमें भी साथ रहेंगी। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है क्योंकि पहले अक्सर व्यापारी सैंपल लेने आई टीमों से उलझ जाते थे या दबाव बनाकर कार्रवाई को टाल देते थे। 

पुलिस की मौजूदगी से औचक निरीक्षण को बल मिलेगा। हर साल ऐसे अभियान चलने के बावजूद मिलावट नहीं रुकने का कारण अर्थशास्त्र है। दशहरा, नवरात्र और दीपावली पर खोया, पनीर, घी और मिठाइयों की मांग इतनी अधिक हो जाती है कि वैध आपूर्ति कम पड़ जाती है। मांग और आपूर्ति के इस अंतर को पाटने के लिए नकली और सस्ता माल खपाया जाता है। इसके अलावा राज्य में जांच और दंड की प्रक्रिया काफी धीमी है। पहले सैंपल की रिपोर्ट आने में बीस दिन से अधिक लगते हैं और कई जिलों में खाद्य सुरक्षा अधिकारी का पद तक खाली रहता है। इस बार तुलनात्मक रूप से सरकार की कार्रवाई अधिक आक्रामक दिख रही है। 

पिछले वित्त वर्ष में ही मिलावट के मामलों में 2.35 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया और 265 मामलों में दोषसिद्धि हुई है। इस साल रणनीति असुरक्षित खाद्य की शीघ्र पहचान, लैब जांच को मजबूत करना और फील्ड निरीक्षण को प्रभावी बनाने पर केंद्रित है। जिलों में सीएम फ्लाइंग के साथ संयुक्त रेड, गोदामों पर छापे और खराब तेल को मौके पर नष्ट करने जैसी कार्रवाई इसी का हिस्सा हैं। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम जैसे शहरी जिलों में जहां मिठाई की बड़ी फैक्टरियां हैं, वहां वेयरहाउस स्तर पर ही निगरानी शुरू कर दी गई है। कुल मिलाकर, त्योहारों का मौसम स्वास्थ्य के लिए चुनौती भरा है, लेकिन सरकार की बढ़ती सख्ती, आधुनिक जांच सुविधाएं और पुलिस सहयोग से स्थिति में सुधार की उम्मीद है। उपभोक्ताओं को भी सतर्क रहना होगा, प्रमाणित और पैक किए हुए उत्पादों को प्राथमिकता देनी होगी तथा संदेह होने पर विभाग को सूचित करना होगा। मिलावट रोकना केवल प्रशासन का काम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

Saturday, September 12, 2026

पहले भोजन-चिकित्सा की व्यवस्था करो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध खुद तो वर्ष के आठ-नौ महीने सतत यात्रा पर रहते थे, लेकिन वह अपने शिष्यों को भी जगह-जगह भेजकर लोगों को आत्म कल्याण का मार्ग सुझाने के लिए भेजते रहते थे। तथागत का एक प्रिय शिष्य था कलभ्भन। वह हमेशा महात्मा बुद्ध के आदेशों का पालन करने को तत्पर रहता था। एक दिन महात्मा बुद्ध ने उसे बुलाया और कहा कि वत्स! यह संसार दुखियों से भरा पड़ा है। 

लोग अज्ञानवश कुरीतियों से जकड़े हुए हैं। अशिक्षा की वजह से वह अपना सुधार नहीं कर पा रहे हैं। तुम जाकर इन लोगों को जागृति का पाठ पढ़ाओ। लोगों के कल्याण का मार्ग इन्हें समझाओ। अपने गुरु की आज्ञा पाकर कलभ्भन चल पड़े। वह चलते-चलते एक गांव में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि चारों ओर गरीबी का साम्राज्य है। स्त्रियां पुरुषों के काम कर रही हैं। लोग अशिक्षित और कुरीतियों से ग्रसित थे। 

बच्चे बीमार और भुखमरी का शिकार लग रहे थे। बच्चे अध्ययन करने भी नहीं जाते थे। कलभ्भन ने कहा कि उन्हें सेवा का स्थान मिल गया। उन्होंने एक पेड़ के नीचे अपना सारा सामान रखा।  लोगों को यह खबर मिलते ही कि महात्मा बुद्ध के शिष्य कलभ्भन उनका दुख दूर करने आए हैं, वह उनके पास जमा हो गए। उन्होंने कलभ्भन के रहने की व्यवस्था की। 

अगले दिन सुबह कलभ्भन ने उपदेश देना शुरू किया। कुछ दिन बाद तो लोगों ने उनके पास आना ही बंद कर दिया। कलभ्भन लौटकर बुद्ध के पास पहुंचे और सारा हाल कह सुनाया। सब कुछ जानकर उन्होंने अपने दो अन्य शिष्यों को बुलाया और कहा कि अमुक गांव में जाकर लोगों के खाने-पीने और चिकित्सा की व्यवस्था करो। बच्चों के लिए पाठशाला खुलवाओ। उसके बाद जब वह निरोगी हो जाएं, तो उन्हें कर्म का रास्ता दिखाओ। इसके बाद उन्हें आत्म कल्याण का मार्ग बताना। अब कलभ्भन समझ गए कि उन्होंने क्या गलती की थी।

रिश्ते-नातों की टूटती डोर को फिर से बुनने की जरूरत


अशोक मिश्र

रिश्ते नातों की डोर धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। हम भाई-बहन, माता-पिता, मामा-मामी, चाचा-चाची जैसे रिश्तों को भूलते जा रहे हैं। जिस आंगन में बचपन बीता, अच्छे-बुरे दिन देखे, सहे और उससे उबर कर जीवन की पगडंडी पर आगे बढ़े। उसी आंगन के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए और भाई, बहन या अन्य निकट संबंधी दाह संस्कार तक रुकने से इनकार कर दें, तो इन रिश्तों की निरर्थकता समझ में आ जाती है। कुरुक्षेत्र के पिहोवा में सरस्वती तीर्थ के पास पिछले दस साल से अकेला जीवन गुजार रहे 71 वर्षीय जुगल किशोर की 4 सितंबर को मौत हो गई। 

दिल्ली के उत्तम नगर का रहने वाला यह अविवाहित वृद्ध बीमार पड़ा तो बाबा फरीद अनाथ आश्रम ने उसे अस्पताल पहुंचाया। अंतिम सांस लेने के बाद इकलौती बहन पुष्पा रानी अस्पताल पहुंचीं। भाई का शव देखा, फिर हाथ जोड़कर बोलीं—मेरे पास टाइम नहीं है, तबीयत खराब है, तुसी ही संस्कार कर दो, अस्थियां भी तुसी ले जाओ। और वह चली गईं। पुष्पा रानी उसी आंगन की बेटी हैं जिसने राखी पर रोना और भैया दूज पर भाई की लंबी उम्र की दुआएं करना सीखा था। फिर ऐसा क्या बदला कि वही आंखें जो भाई की एक खरोंच पर बरस पड़ती थीं, आज अंतिम विदाई पर भी सूखी रह गईं?  

यह सवाल नहीं बल्कि उस समाज के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो बात-बात में संस्कारों की दुहाई देता है। ऐसी घटनाओं के पीछे गहरी सांस्कृतिक और मानसिक सड़ांध भी है। व्यक्तिगत स्वार्थ, सुविधा का मोह और ‘मैं’ की संस्कृति ने ‘हम’ को पीछे धकेल दिया। मृत्यु के समय भी समय निकालना कठिन लगने लगा है। कुछ महीने पहले सोनीपत में बच्चों ने पिता के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया। करनाल में एक बहन की मौत पर भाई ने फोन पर कहा—अंतिम संस्कार कर देना, मैं नहीं आ सकता और मोबाइल बंद कर दिया। 

रोहतक में पिता के शव को लेकर भाई-बहन झगड़ पड़े। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, एक पैटर्न हैं। इनसे पता चलता है कि रिश्ते मर रहे हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां रिश्तों से विश्वास ही खो देंगी। मौत के समय कोई नहीं आएगा, बीमार पड़ने पर कोई नहीं पूछेगा। जीवन अकेला और ठंडा हो जाएगा। जुगल किशोर तो अपना जीवन पूरा करके चले गए, पर उनकी बहन एक दिन जरूर पछताएगी। 

जब रात में अकेले में बचपन की कोई याद कौंधेगी। जब राखी का वो धागा याद आएगा जो कभी भाई की कलाई पर बांधा था। पछतावे से बेहतर है, समय रहते संभल जाना। रिश्ते बोझ नहीं हैं, रिश्ते ही तो वो छत हैं जो तेज धूप में हमें जलने से बचाते हैं। अगर ये छत ही गिर गई, तो हम सब खुले आसमान के नीचे अकेले खड़े रह जाएंगे, सफल, व्यस्त, पर बिल्कुल अकेले। आइए, इस टूटती डोर को फिर से बुनें, एक फोन कॉल से, एक गले लगने से, एक माफी से।

Friday, September 11, 2026

यहां कोई किसी का नहीं होता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध जातक कथाओं में अश्मक महाजनपद के राजा अस्सक की एक कथा है। प्राचीन काल में अश्मक राज्य वर्तमान महाराष्ट्र और तेलंगाना क्षेत्र के बीच में गोदावरी नदी के तट पर स्थित था। पोटली इसकी राजधानी थी। राजा अस्सक की महारानी उब्बरा बहुत ही सुंदर थी। एक बार वह बीमार पड़ी तो सबने उसके स्वस्थ होने की प्रार्थना की। 

महारानी ने भी प्रार्थना की कि या तो मृत्यु हो जाए या फिर वह स्वस्थ हो जाए। लेकिन कोई प्रार्थना काम नहीं आई। उब्बरा की मौत हो गई। महाराज उब्बरा से बहुत अधिक प्रेम करते थे। वह अपनी महारानी की मृत्यु के बाद लगभग विक्षिप्त हो गए। वह केवल रोते रहते थे। महारानी का शव तेल में भिगोकर रख दिया गया ताकि खराब न हो। उन्हीं दिनों बोधिसत्व अश्मक राज्य में पहुंचे और उन्होंने माणवक नामक आदमी से पूछा कि पूरे राज्य में यह उदासी क्यों छाई हुई है। माणवक  ने सारी कथा सुनाई। तब बोधिसत्व ने कहा कि अपने राजा से जाकर कहो कि मैं जानता हूं, उनकी उब्बरा कहां है। यह बात सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। 

वह पालकी पर बैठकर बोधिसत्व के पास पहुंचा। उसने आतुरता से पूछा कि मेरी उब्बरा कहां है? बोधिसत्व ने योगबल से गुबरैले के रूप में जन्मी उब्बरी को वहां बुलाया और राजा को दिखाते हुए कहा कि यह देखो, तुम्हारी उब्बरा जो उस गुबरैले के पीछे आकर्षित होकर भागती जा रही है। बोधिसत्व ने गुबरी से पूछा, उब्बरा पूर्व जन्म में तुम कौन थी? गुबरी ने जवाब दिया-मैं राजा अस्सक की पटरानी थी। उस जन्म में मेरा पति परमेश्वर था। लेकिन इस जन्म में यह गुबरैला ही मेरा साथी है। 

तब बोधिसत्व ने राजा से कहा कि यहां कोई किसी का नहीं है। जब तक जीवन है,तब तक सभी अपने हैं। जीवन खत्म होने के बाद सारे रिश्ते नाते टूट जाते हैं। यहां कोई किसी का नहीं होता है। यह सुनकर राजा अस्सक को अपनी भूल का पता चला। उसने मोह त्यागकर उब्बरा का दाह संस्कार किया और अपनी प्रजा के हित में लग गया।

हवा साफ करने के लिए सबसे पहले नीयत साफ करना जरूरी

अशोक मिश्र

दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण रोकने के लिए जारी दिशा निर्देश का पालन न करने पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने  हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जाहिर की है। सीएक्यूएम ने इस संबंध में जवाब मांगा है। हरियाणा के जिलों में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। वायु स्वच्छ न होने की वजह से लोगों की सांसें घुटती जा रही हैं। कई प्रकार की बीमारियों से लोग पीड़ित हो रहे हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी सीएक्यूएम का हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताना और जवाब तलब करना कोई नई बात नहीं है। यह उस पुरानी और सड़ी हुई व्यवस्था का एक और प्रमाण है जहाँ दिशा निर्देश केवल कागजों पर जारी होते हैं और जमीन पर धूल बनकर उड़ जाते हैं। 

ग्रेड रिस्पांस एक्शन प्लान लागू होता है, बैठकें होती हैं, चेतावनियां दी जाती हैं, लेकिन फरीदाबाद, गुरुग्राम, पानीपत, सोनीपत और बहादुरगढ़ में एक्यूआई मीटर चार सौ पार कर जाता है तो सवाल सिर्फ हवा का नहीं रह जाता, सवाल पूरी प्रशासन प्रणाली की नीयत का बन जाता है। फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं पर कैमरे लगे हैं पर कैमरे बंद हैं, ईंट भट्ठों को जिगजैग तकनीक पर लाने का आदेश है पर रिश्वत देकर पुराने भट्ठे ही चल रहे हैं, कंस्ट्रक्शन साइट पर पानी का छिड़काव अनिवार्य है पर बिल्डर पानी की टंकी ही गायब कर देते हैं। 

यह लापरवाही नहीं, यह मिलीभगत है। सरकार को राजस्व चाहिए, उद्यमी को मुनाफा चाहिए और बीच में बोर्ड एक कमजोर मध्यस्थ बनकर रह गया है जो केवल नोटिस भेजता है और फाइल बंद कर देता है। हरियाणा के कई जिलों में वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है और लोग सांस लेने के लिए जूझ रहे हैं। बच्चे, बुजुर्ग और श्वसन रोगियों की तकलीफ बढ़ रही है, जबकि जिम्मेदार एजेंसियां कागजी कार्रवाई में उलझी नजर आती हैं। राज्य के लोग भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं। 

निजी वाहनों का अत्यधिक उपयोग, कचरा जलाना, खुले में कूड़ा फेंकना और जागरूकता की कमी प्रदूषण में योगदान देती है। जब नागरिक स्वयं नियमों का उल्लंघन करते हैं तो व्यवस्था पर सवाल उठाना एकतरफा हो जाता है। उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने, उत्सर्जन मानकों का पालन करने और आॅनलाइन निगरानी प्रणाली से जोड़ने के लिए समयबद्ध दबाव डालना होगा। सड़कों पर धूल नियंत्रण, मैकेनाइज्ड स्वीपिंग, कचरा प्रबंधन और पराली जलाने पर प्रभावी रोक को मजबूत करना चाहिए।

वायु प्रदूषण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह एक प्रबंधित आपदा है। इसका भुगतान आज दमा के मरीज, स्कूल जाते बच्चे और खेत में काम करने वाले मजदूर अपने फेफड़ों से कर रहे हैं। जब तक सरकार निर्देश जारी करने को ही काम मानती रहेगी, उद्यमी अनुपालन को खर्चा समझता रहेगा और नागरिक को केवल दोषी ठहराया जाता रहेगा, तब तक हर सर्दी में वही घुटन लौटेगी। हवा को साफ करने के लिए पहले नीयत को साफ करना पड़ेगा।

Thursday, September 10, 2026

व्रतधारी बनो, संकल्प लो और आगे बढ़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महानगरी तक्षशिला को दुल्हन की भांति सजाया गया था। नगर का हर निवासी महात्मा बुद्ध के दर्शन का अभिलाषी था। उससे भी ज्यादा चर्चा दस्यु अंगुलिमाल की थी जिसने तथागत के संपर्क में आने के बाद प्रव्रज्या धारण कर ली थी। लोग यह जानना चाहते थे कि अहिंसक के रूप में तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण करने वाला युवक दस्यु से भिक्षुक बनने के बाद कैसा दिखता है। श्रावस्ती के घने वन में पहली मुलाकात के बाद ही अंगुलिमाल ने दस्यु वृत्ति त्याग दी थी।

 तक्षशिला में अपने नवदीक्षित शिष्य अंगुलिमाल के साथ तथागत ने प्रवेश किया, तो जनों ने पुष्प वर्षा से उनका स्वागत किया। शाम को जब धर्म सभा शुरू हुई तो महात्मा बुद्ध  ने अंगुलिमाल की कथा बताते हुए कहा कि अंगुलिमाल का पूर्व कर्म उन लोगों से श्रेष्ठ था जो अव्रती हैं। उसने एक हजार अंगुलियों के संग्रह का व्रत धारण किया था। यद्यपि उसका व्रत और तरीका दोनों ही गलत थे क्योंकि इस कर्म में हिंसा थी। 

लेकिन जो लोग बिना किसी व्रत या उद्देश्य के अपना जीवन बिताते चले आ रहे हैं, उनसे अपने जीवन में कोई न कोई उद्देश्य रखने वाला श्रेष्ठ है। जो लोग व्रतहीन जीवन व्यतीत करते हैं, वह अपना जीवन अकारण बिताते हैं। दस्यु वृत्ति वाले जीवन को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह अमानवीय था। व्रतहीन व्यक्ति को आत्म तुष्टि से वंचित होना पड़ता है, आत्म तृप्ति से भी। 

अंगुलिमाल की व्रत निष्ठा से ही सद् और असद् के बीच के अंतरद्वंद्व में सद् की विजय हुई है। प्रेरणाहीन मन भूमि वाला व्यक्ति अंगुलिमाल के पूर्व कर्म से भी ज्यादा पतित है। इसलिए व्रतधारी बनो, संकल्प लो और आगे बढ़ो।

संवाद और आपसी समझ से दूर किया जा सकता है भाषा विवाद

अशोक मिश्र

फरीदाबाद में महिला आयोग की सोमवार को शुरू हुई दो दिवसीय कार्यशाला ‘शी इज ए चेंज मेकर’ में केरल विधानसभा की उपाध्यक्ष और कुछ महिला विधायकों द्वारा हिंदी में संचालन का विरोध किया गया। यह उस लंबे भाषा-विवाद की एक छोटी सी झलक है जो आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति और समाज के साथ चल रहा है। केरलम विधानसभा की उपाध्यक्ष सहित कई महिला विधायकों ने कार्यक्रम छोड़ दिया क्योंकि सत्र मुख्य रूप से हिंदी में चलाए जा रहे थे और अनुवाद की कोई व्यवस्था नहीं थी। 

विरोध करने वाली विधायकों ने कहा कि दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के प्रतिभागियों के लिए सामग्री समझना कठिन हो गया था। ऐसे विवाद की जड़ में इतिहास है। उससे भी ज्यादा इस मामले में गलतफहमी है। संविधान में कहीं भी हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है, अनुच्छेद 343 में उसे संघ की राजभाषा कहा गया है और अंग्रेजी को सह-राजभाषा के रूप में जारी रखने की व्यवस्था की गई थी। 


1965 में जब अंग्रेजी को हटाने की बात आई तो तमिलनाडु में बड़ा आंदोलन हुआ और अंतत: त्रिभाषा फार्मूला लाया गया। उत्तर भारत ने हिंदी को स्वाभाविक रूप से अपना लिया क्योंकि वह उसकी बोलियों के करीब थी, जबकि दक्षिण में हिंदी को एक नई, ऊपर से थोपी गई भाषा के रूप में देखा गया। वहीं से यह भावना बनी कि हिंदी थोपने का अर्थ है उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व थोपना। केरल की उपाध्यक्ष और अन्य विधायकों को हिंदी न समझ पाने की तकलीफ वास्तविक हो सकती है, उन्हें सच में हिंदी समझने में कठिनाई हुई हो, लेकिन उस वास्तविक कठिनाई को तुरंत एक राजनीतिक नैरेटिव में बदल देना ही राजनीति है। 

उन्हें ऐसा करने से हर हालत में बचना चाहिए था। हिंदी-भाषी क्षेत्रों में कभी-कभी यह भावना रहती है कि हिंदी सबसे व्यापक भाषा है इसलिए उसे राष्ट्र की एकता का माध्यम बनाना स्वाभाविक है। दोनों पक्षों के पास तर्क हैं। एक ओर विशाल आबादी हिंदी समझती या बोलती है, दूसरी ओर देश में बाईस अनुसूचित भाषाएं हैं। कई राज्य अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं। जब राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में केवल एक भाषा का इस्तेमाल होता है तो गैर-हिंदी भाषी प्रतिनिधि खुद को बाहर महसूस करते हैं। 


यह असुविधा वास्तविक है। इस समस्या का समाधान संभव है लेकिन इसके लिए व्यावहारिक सोच की जरूरत है। राष्ट्रीय कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से बहुभाषी व्यवस्था होनी चाहिए। हिंदी के साथ अंग्रेजी और जरूरत पड़ने पर अन्य प्रमुख भाषाओं में अनुवाद की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। प्रौद्योगिकी आज इतनी आगे बढ़ चुकी है कि वास्तविक समय का अनुवाद संभव है। फरीदाबाद वाली घटना याद दिलाती है कि राष्ट्रीय मंचों पर सबको बराबर भागीदारी का मौका मिलना चाहिए। 

जब प्रतिभागी अपनी बात समझ सकें और रख सकें तभी कार्यक्रम सार्थक बनते हैं। भाषाई संवेदनशीलता और व्यावहारिक व्यवस्था दोनों अपनाकर इस पुराने विवाद को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है। राजनीति अगर इसे और उलझाएगी तो समस्या बनी रहेगी, अगर संवाद और सुविधा पर ध्यान देगी तो समाधान की दिशा खुलेगी।