Monday, November 2, 2026

इंडिया गठबंधन ने भीड़ से अपनी ताकत दिखाई, भाजपा ने सड़क से की घेराबंदी


अशोक मिश्र

एक नवंबर को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की रामलीला मैदान वाली महारैली और एनडीए की पश्चिमी दिल्ली में निकाली गई पदयात्रा, दोनों एक साथ चलीं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने नैरेटिव को मजबूती से पेश करने की कोशिश की। इंडिया गठबंधन का मुख्य नैरेटिव ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ या ‘चलो दिल्ली’ के इर्द-गिर्द घूमता रहा, जिसमें कथित वोट चोरी, मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में अनियमितताएं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग प्रमुख थी। राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव समेत कई बड़े नेताओं ने खुली गाड़ियों में मार्च किया, झंडे-बैनर लहराए गए और नारे गूंजे। 

आयोजकों ने लाखों की भीड़ का दावा किया जबकि पुलिस अनुमान करीब पचास हजार का रहा। वैसे इस महारैली में कई प्रदेशों के लोग भारी संख्या में शामिल हुए जिसमें युवा, बुजुर्ग, महिलाएं और हर समुदाय के लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। रैली ने विपक्षी एकजुटता का प्रदर्शन जरूर किया। महारैली ने मीडिया में अच्छा कवरेज पाया, लेकिन वास्तविक संख्या पर विवाद रहा। कुछ सहयोगी दलों की दूरी (खासकर आम आदमी पार्टी) ने पूर्ण एकता की तस्वीर को थोड़ा धुंधला किया। यह नैरेटिव अपने मूल समर्थकों और विपक्षी खेमे में तो मजबूत हुआ, लेकिन व्यापक जनता या तटस्थ वर्ग तक कितना पहुंचा, यह अभी स्पष्ट नहीं। 

चुनाव आयोग या सरकार पर तत्काल दबाव बनाने में यह सीमित रहा। इंडिया गठबंधन ने इस दिन को प्रतीकात्मक तौर पर चुना। रामलीला मैदान वही जगह है जहां से आंदोलन राष्ट्रीय चर्चा बनते हैं। गठबंधन का आरोप था कि देश में 'वोट चोरी' और वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की आड़ में लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है। इसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे तक की मांग उठाई गई। कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने इसके लिए 10 लाख तक लोगों के जुटने का दावा किया और राहुल गांधी सहित गठबंधन के सभी बड़े चेहरों को मंच पर उतारा। सुबह मिंटो रोड-कनॉट प्लेस चौराहे से मार्च निकालकर भीड़ को मैदान तक लाने की योजना बनाई गई, ताकि रैली सिर्फ एक सभा न होकर एक शक्ति प्रदर्शन लगे। इंडिया गठबंधन का नैरेटिव आंशिक रूप से मजबूत था, लेकिन पूरी तरह निर्णायक या व्यापक रूप से प्रभावी नहीं कहा जा सकता।

वोट चोरी, मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में कथित गड़बड़ी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग—यह मूल संदेश साफ, भावनात्मक और विपक्षी खेमे के लिए आकर्षक था। वहीं एनडीए ने पश्चिमी दिल्ली के हरि नगर से तिलक नगर की ओर पदयात्रा निकाली, जिसमें 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को याद करने और कांग्रेस पर संवेदनहीनता का आरोप लगाने पर जोर दिया गया। हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत नेताओं और सिख समुदाय के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। यह ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान का हिस्सा था। एनडीए का नैरेटिव इतिहास की याद दिलाते हुए विपक्ष को दोहरे मापदंड का आरोप लगाते हुए चलाया गया कि वे उसी तारीख के आसपास राजनीतिक रैली कर रहे हैं, जब सिख समुदाय के घाव ताजा हो जाते हैं। यह कदम इंडिया गठबंधन की रैली को अकेले समाचार चक्र पर हावी होने से रोकने में सफल रहा और एक समानांतर चर्चा खड़ी कर दी। 

सिख समुदाय और अपने कोर बेस में यह नैरेटिव प्रभावी रहा, क्योंकि यह भावनात्मक और ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा था। पूरे देश में इसी थीम पर कार्यक्रमों की श्रृंखला चलाने की योजना ने इसे स्थानीय घटना से आगे बढ़ाया। अब सवाल है कि कौन किस पर भारी रहा, तो इसका जवाब संख्या से ज्यादा संदेश में छिपा है। इंडिया गठबंधन भारी रहा नैरेटिव और सेंट्रलाइजेशन में। एक ही मैदान, एक ही मंच, एक ही मुद्दा-वोट चोरी। इससे मीडिया का पूरा फोकस दिल्ली पर केंद्रित हो गया, कैमरे रामलीला मैदान पर रहे और विपक्ष एकजुटता दिखाने में सफल रहा। इस तरह के केंद्रीकृत आयोजन से कार्यकर्ताओं में भावनात्मक उभार ज्यादा आता है, जो आने वाले चुनावों में बूथ तक ले जाने लायक ऊर्जा देता है। 

भाजपा भारी रही विस्तार और काउंटर-मोबिलाइजेशन में। उसने विपक्ष की रैली को दिल्ली तक सीमित नहीं रहने दिया। जिस दिन विपक्ष दिल्ली में भीड़ जुटा रहा था, उसी दिन भाजपा ने रोहतक, फरीदाबाद, दिल्ली के हरी नगर और देश के अन्य जिलों में पदयात्रा का आयोजन किया। भाजपा का तर्क सीधा था कि विपक्षी गठबंधन के मुद्दे को वह स्थानीय स्तर पर 'अराजकता' बनाम 'स्थिरता' की बहस में बदल देगी। पदयात्रा का मॉडल संघ और भाजपा के पुराने जनसंपर्क अभियान की याद दिलाता है, जहां छोटे-छोटे संपर्कों से बड़ा जनमत बनता है। एक महीने तक चलने वाला यह अभियान एक दिन की रैली की चमक को फीका करने की दीर्घकालिक रणनीति है। कुल मिलाकर देखा जाए तो 1 नवंबर को सुर्खियों पर कब्जा इंडिया गठबंधन का रहा, क्योंकि रामलीला मैदान की महारैली का दृश्य और पैमाना पदयात्रा के बिखरे हुए दृश्यों से ज्यादा टेलीविजन फ्रेंडली था। लेकिन जमीन पर असर के लिहाज से भाजपा की पदयात्रा ने विपक्ष के नैरेटिव को सिर्फ दिल्ली तक सीमित रखने से रोक दिया और उसे हर राज्य में चुनौती देने का आधार तैयार कर दिया। एक ने भीड़ से ताकत दिखाई, दूसरे ने सड़कों से घेराबंदी की।

Sunday, November 1, 2026

देश में तेजी से घोर गरीबी घटाने में एनएफएसए की बहुत बड़ी भूमिका


अशोक मिश्र

विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की ‘इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ’ रिपोर्ट बताती है कि भारत में अत्यधिक गरीबी की दर 2011 से 27.1 प्रतिशत थी, वह अब घटकर 2023 में 2.7 प्रतिशत रह गई है। इसके अनुसार 49.6 करोड़ लोग गरीबी की सीमारेखा से बाहर आए। रिपोर्ट इसे दुनिया में सबसे तेज गरीबी कमी की दरों में से एक बताती है। 2023 में अत्यधिक गरीबी रेखा से नीचे लगभग 7.5 करोड़ और 4.20 डॉलर वाली रेखा से नीचे लगभग 34 करोड़ लोग रह गए थे। बहुआयामी गरीबी (शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि को मिलाकर) भी घटी है। यह कमी मुख्य रूप से घरेलू खपत में मजबूत वृद्धि, रोजगार में बढ़ोतरी (विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के बीच) और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक हस्तांतरणों के विस्तार से जुड़ी बताई गई है। 

2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई, जो कार्यशील आयु वर्ग की वृद्धि से लगभग दोगुनी थी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रगति तेज रही, जिससे ग्रामीण-शहरी अंतर कुछ कम हुआ। रिपोर्ट भविष्य में भी गरीबी कम होने का अनुमान लगाती है। वास्तविक स्थिति में प्रगति तो हुई है, लेकिन चुनौतियां बाकी हैं। 2023 में ग्रामीण गरीबी (4.20 डॉलर रेखा पर) 19.3 प्रतिशत थी जबकि शहरी 8.6 प्रतिशत। गरीबी उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के क्षेत्र में केंद्रित हो गई है, जहां देश के लगभग 57 प्रतिशत गरीब रहते हैं। वेतन असमानता बनी हुई है—शीर्ष 10 प्रतिशत श्रमिकों की औसत कमाई निचले 10 प्रतिशत से लगभग 13 गुना अधिक थी। 

वास्तविक कमाई में खास बढ़ोतरी नहीं हुई और रोजगार वृद्धि अपेक्षाकृत कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में केंद्रित रही। युवा बेरोजगारी में हालिया बढ़ोतरी (खासकर ग्रामीण युवा महिलाओं में) भी दर्ज की गई। गरीबी अब कम शिक्षा, कम संपत्ति, अस्थिर रोजगार और ज्यादा आश्रितों वाले परिवारों में ज्यादा केंद्रित हो गई है। उच्चतर गरीबी रेखा (8.30 डॉलर प्रतिदिन) पर अभी भी बड़ी आबादी नीचे है। इस रिपोर्ट के बाद एक सवाल यह भी उठता है कि जब लगभग 50 करोड़ लोग गरीबी की सीमारेखा से बाहर हो गए हैं, तो फिर केंद्र सरकार देश के अस्सी करोड़ लोगों को प्रतिमाह पांच किलो मुफ्त राशन क्यों दे रही है? 

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि 80 करोड़ को मुफ्त राशन का आंकड़ा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, एनएफएसए से आता है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना मूलत: मार्च 2020 में कोविड के दौरान शुरू हुई थी, ताकि एनएफएसए के तहत कवर लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज मुफ्त में अतिरिक्त दिया जा सके। बाद में सरकार ने इसे ही जारी रखते हुए एक साल तक सभी एनएफएसए लाभार्थियों को अनाज मुफ्त देने का फैसला किया। यह 80 करोड़ कोई नई गरीबी गणना नहीं है, यह 2011 की जनगणना और उसके आधार पर बने राज्यों के कवरेज अनुपात का कानूनी हक है। इसमें अंत्योदय परिवार और प्राथमिकता वाले परिवार दोनों आते हैं। इनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो विश्व बैंक की 3 डॉलर या 4.20 डॉलर की रेखा से ऊपर आ चुके हैं, पर भारत की जीवन-यापन लागत, अनियमित रोजगार और स्वास्थ्य-शिक्षा के एक झटके में फिर से नीचे गिरने के जोखिम में हैं।  विश्व बैंक खुद अपनी रिपोर्ट में इस प्रगति का श्रेय बढ़े हुए उपभोग, महिला रोजगार और विस्तारित सामाजिक ट्रांसफर को देता है। यानी मुफ्त राशन गरीबी घटने के बावजूद जारी रहने वाली योजना नहीं, बल्कि गरीबी घटने का एक कारण भी है। 

राशन मिलने से परिवार की भोजन पर होने वाली नकद खर्च बचता है। उसी पैसे से वह शिक्षा, दवा या बेहतर भोजन पर खर्च कर पाता है और उपभोग सर्वेक्षण में वह गरीबी रेखा से ऊपर दिखता है। अगर कल राशन बंद हो जाए तो बहुत सारे परिवारों का वही उपभोग फिर से नीचे आ जाएगा, इसलिए इसे सुरक्षा कवच की तरह देखा जाता है, गरीबी प्रमाणपत्र की तरह नहीं। यहाँ एक और बारीक बात है। भारत में गरीबी केवल आय से नहीं, पोषण सुरक्षा से भी देखी जाती है। 4.20 डॉलर की रेखा पार करने का मतलब यह नहीं कि परिवार रोज संतुलित आहार ले पा रहा है। कुपोषण, एनीमिया, बच्चों में ठिगनापन जैसे संकेत बताते हैं कि अनाज की न्यूनतम उपलब्धता अभी राज्य की जिम्मेदारी है। सरकार के लिए 80 करोड़ को पांच किलो अनाज देना भूख के खिलाफ बीमा है, जबकि विश्व बैंक का आंकड़ा उपभोग के आधार पर आर्थिक गतिशीलता का संकेतक है। 

दोनों के पैमाने अलग हैं। गरीबी से बाहर आना एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें फिसलन बहुत है। एनएफएसए का दायरा जानबूझकर व्यापक रखा गया है ताकि जो अभी-अभी गरीबी रेखा पार किया है, वह किसी संकट में फिर से उसी में न गिर जाए। विरोधाभास तब बनता है जब हम दोनों आंकड़ों को एक ही तराजू पर तोलते हैं। सच यह है कि एक आंकड़ा बताता है कि सीढ़ी चढ़ी गई है, दूसरा बताता है कि सीढ़ी के नीचे जाल अभी भी लगा हुआ है। पिछले बारह सालों में 50 करोड़ लोगों का गरीबी के दायरे से बाहर आना, वाकई एक उपलब्धि है।


Saturday, October 31, 2026

नैरेटिव बदल पाएगी एक नवंबर को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की रैली?


अशोक मिश्र

इंडिया गठबंधन ने आज ‘सड़क पर संसद’ का आयोजन बरसात की वजह से टाल दिया है। सड़क पर संसद का आयोजन अब 31 अक्टूबर को होगा। एक नवंबर को रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली प्रस्तावित है। रैली में लगभग दस लाख लोगों के आने का दावा किया जा रहा है। एक नवंबर को प्रस्तावित रैली को लेकर जनमानस में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या प्रस्तावित रैली से देश में सत्ता परिवर्तन हो सकेगा? क्या रैलियां करके या सड़क पर संसद का आयोजन करके लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है? कुछ इसी तरह का सवाल भारतीय लोकतंत्र में हर बड़े आंदोलन के साथ उठता है। 

रैली समर्थकों का तर्क है कि जब संसद के भीतर विपक्ष की आवाज को पर्याप्त जगह नहीं मिलती, कार्यवाही बार-बार बाधित होती है या स्थगित कर दी जाती है, तो सड़क ही एकमात्र मंच बचता है जहां जनता से सीधा संवाद किया जा सके। रैली सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं है, वह नैरेटिव बनाने का औजार है। सड़क पर उतरने से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा आती है। मीडिया का ध्यान खिंचता है। सरकार पर नैतिक दबाव बनता है कि वह उठाए गए मुद्दों पर जवाब दे। इतिहास में भी कई बार देखा गया है कि संसद में अटके मुद्दों ने सड़क के दबाव से ही गति पकड़ी है, चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन रहा हो या किसान आंदोलन। इस लिहाज से विपक्ष का सड़क पर उतरना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही विस्तार है, उसका उल्लंघन नहीं। रैलियाँ जनसमर्थन जुटाने, मुद्दों को उजागर करने और राजनीतिक नैरेटिव बदलने का मजबूत माध्यम साबित होती हैं, लेकिन वे सीधे सत्ता नहीं बदलतीं। सत्ता का असली आधार चुनाव होते हैं जहाँ मतदाता फैसला करते हैं। 

रैलियाँ जनभावना को आकार दे सकती हैं, विपक्ष को एकजुट कर सकती हैं, लेकिन सरकार नहीं बदल सकती हैं। ऐतिहासिक उदाहरणों में जेपी आंदोलन ने आपातकाल के बाद राजनीतिक माहौल बदला, अन्ना हजारे के आंदोलन ने भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बनाया और किसान आंदोलन ने कृषि कानूनों को वापस लेने पर मजबूर किया। इससे विपक्ष की विश्वसनीयता बढ़ती है और सत्ता पक्ष को जवाबदेही का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर रैलियों की सीमाएं साफ हैं। वे अस्थायी शोर मचा सकती हैं लेकिन बिना संगठित चुनावी रणनीति और जमीनी स्तर पर काम के असर नहीं डालतीं। भीड़ जुटाना महंगा और चुनौतीपूर्ण होता है। अगर भागीदारी कम रहे या हिंसा हो जाए तो उल्टा असर पड़ता है। सत्ता पक्ष इसे अराजकता बताकर अपनी स्थिति मजबूत कर लेता है। व्यापारियों की शिकायतें, ट्रैफिक जाम या पुलिस कार्रवाई नकारात्मक छवि बना सकती है। 

भारत में संवैधानिक संस्थाओं को हटाने या बदलने की एक तय प्रक्रिया है। एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हो या मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी मुद्दा, वह चुनाव आयोग के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी को हटाने का प्रावधान भी बहुत स्पष्ट और कठिन रखा गया है। अनुच्छेद 324 और संबंधित कानूनों के तहत सीईसी को उसी तरह और उतनी ही कठिन प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, यानी संसद के दोनों सदनों में सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है। सिर्फ रैलियां करके, नारेबाजी करके या सड़क पर सांकेतिक संसद लगाकर इस संवैधानिक सुरक्षा कवच को भेदना कानूनी रूप से संभव नहीं है। सरकारें भी इस बात को जानती हैं, इसलिए सड़क के दबाव को वे अक्सर राजनीतिक शोर मानकर अनदेखा कर देती हैं। अक्टूबर 2026 के अंत में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ वोट चोरी और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के आरोपों पर अभियान चला रहे हैं। मांगें मुख्य रूप से सीईसी का इस्तीफा, एसआईआर पर रोक और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की हैं। 

कल की सड़क पर संसद या मॉक इम्पीचमेंट (नकली महाभियोग) का कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर प्रतीकात्मक कार्यक्रम है जिसमें पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार की अध्यक्षता में प्रस्ताव पेश करने और भाषणों की योजना है।  राजनीति में असल बदलाव तब आता है जब रैलियाँ चुनावी नतीजों में तब्दील हों। ये कार्यक्रम विपक्ष के लिए ताकत दिखाने और मुद्दा जीवित रखने का माध्यम हैं। सत्ता परिवर्तन का फैसला अंतत: मतदाता चुनाव के दौरान अपने मतपत्रों से करेंगे। दोनों पक्षों के दावों को आलोचनात्मक नजर से देखना जरूरी है क्योंकि आरोप और जवाब दोनों की जांच होनी चाहिए। कुल मिलाकर रैलियाँ सत्ता परिवर्तन का सहायक औजार हैं न कि मुख्य। वे दबाव और जागरूकता पैदा करती हैं लेकिन स्थायी बदलाव के लिए चुनाव, संगठन और जनविश्वास जरूरी होता है। लंबी अवधि में अगर मुद्दा व्यापक जनसमर्थन पा गया तो चुनावी सुधारों पर दबाव बढ़ेगा लेकिन अगर सीमित रहा तो यह सिर्फ विपक्षी प्रदर्शनों की श्रृंखला का एक और अध्याय रह जाएगा। 

Friday, October 30, 2026

सीजेपी को साथ लेने से पहले इंडिया ब्लाक को करना होगा मंथन


अशोक मिश्र

काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने इंडिया ब्लॉक की एक नवंबर को प्रस्तावित रैली को समर्थन देने के ऐलान कर दिया है। सीजेपी के इस समर्थन को केवल एक औपचारिक समर्थन से आगे की बात कही जा रही है। इसके साथ ही यह चर्चा भी तेज हो गई है कि सीजेपी आने वाले दिनों में औपचारिक रूप से इंडिया ब्लॉक का हिस्सा बन सकती है। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि सीजेपी एक कैडर आधारित बड़ी पार्टी नहीं है। उसकी पहचान एक व्यंग्यात्मक, व्यवस्था-विरोधी और खुद को सबसे कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रहने वाले आम नागरिक की प्रतीक के तौर पर रही है। यही वजह है कि उसके इस कदम के राजनीतिक मायने वोट प्रतिशत से ज्यादा संदेश और नैरेटिव के स्तर पर निकाले जा रहे हैं। 

अगर इंडिया ब्लॉक और कॉकरोच जनता पार्टी एक साथ आ जाएं तो भारतीय राजनीति में एक नई तरह की ऊर्जा और जटिलता दोनों पैदा हो सकती है। सीजेपी युवाओं, खासकर जेन जेड और मध्यम वर्ग के असंतुष्ट युवाओं का दबाव समूह है जो पारंपरिक पार्टी राजनीति से अलग रहकर शिक्षा व्यवस्था की खामियों, परीक्षाओं में लीक, बेरोजगारी और चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता रहा है। वह खुद को राजनीतिक दल नहीं मानता। सीजेपी नागरिक आंदोलन के रूप में काम करने पर जोर देती है। इंडिया ब्लॉक कांग्रेस समेत क्षेत्रीय दलों का गठबंधन है जो सत्ताधारी दल के खिलाफ संगठित विपक्ष की भूमिका निभाने की कोशिश करता है लेकिन आंतरिक मतभेदों, सीट बंटवारे और नेतृत्व के सवालों से समय समय पर जूझता रहता है। दोनों के एक साथ आने का मतलब होगा कि सड़क की युवा ऊर्जा और संसदीय-संगठनात्मक ताकत का मेल। इससे विपक्ष को एक व्यापक जनआधार मिल सकता है जो सिर्फ चुनावी गणित तक सीमित न रहकर मुद्दों पर लगातार दबाव बनाने में सक्षम हो। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सीजेपी निकट भविष्य में एक राजनीतिक दल के रूप में सामने आ सकती है जिस तरह अन्ना हजारे आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी उभरकर सामने आई थी।

 काकरोच जनता पार्टी के आम आदमी पार्टी की तरह एक पूर्ण राजनीतिक संगठन में तब्दील होने की संभावना पर बात करें तो दोनों के बनने की पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। हां, दोनों में कुछ समानताएं भी हैं जिनके कारण यह सवाल उठ रहा है। आम आदमी पार्टी का उदय एक बड़े जन-आंदोलन, इंडिया अगेंस्ट करप्शन से हुआ था। उसके पास शुरू से ही अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया जैसे पहचाने हुए चेहरे थे। एक स्पष्ट मुद्दा था भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल, और दिल्ली जैसे एक केंद्र शासित प्रदेश में केंद्रित होकर काम करने की रणनीति थी। संगठन के तौर पर उसने बहुत जल्दी बूथ स्तर तक कार्यकर्ता बनाए, चंदा मॉडल को पारदर्शी बनाया और एक कल्याणकारी मॉडल बिजली, पानी, शिक्षा को अपना मुख्य चुनावी वादा बनाया। काकरोच जनता पार्टी के पास ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है। 

अभी तक उसकी पहचान एक प्रेशर ग्रुप, एक व्यंग्यात्मक आंदोलन और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले समूह की ज्यादा है। उसके पास न तो कोई बड़ा चेहरा है जो राज्य स्तर पर वोट खींच सके, न ही कोई एक स्पष्ट प्रशासनिक मॉडल जिसे वह जनता के सामने रख सके।  काकरोच जनता पार्टी को भी अगर आम आदमी पार्टी की तरह बनना है तो उसे एक गंभीर सांगठनिक ढांचे में आना होगा। चुनाव आयोग में पंजीकरण, हिसाब-किताब, बूथ कमेटी और एक ऐसा चेहरा जो बहस में खड़ा हो सके। बिना इसके वह एक मीम पार्टी बनकर रह जाएगी, जो रैली में भीड़ तो बढ़ा देगी लेकिन वोट में नहीं बदलेगी। 

इस आधार पर कहा जा सकता है कि सीजेपी के आम आदमी पार्टी बनने की संभावना बहुत ही क्षीण है। एक नवंबर को होने वाली रैली के संदर्भ में सीजेपी और इंडिया ब्लाक के एक साथ आने को लेकर एनडीए में शामिल दल आलोचना भी कर रहे हैं। भाजपा और उसके अन्य सहयोगी दल इंडिया ब्लाक की गंभीरता और विश्वसनीयता को लेकर आलोचना कर रहे हैं। इंडिया ब्लॉक पहले से ही सीट बंटवारे, नेतृत्व और साझा एजेंडा जैसे मुद्दों पर आंतरिक खींचतान से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में एक ऐसी पार्टी जिसका नाम ही काकरोच जनता पार्टी है, को साथ लाने से एनडीए को यह कहने का मौका मिलेगा कि इंडिया ब्लॉक में राजनीतिक गंभीरता कम हो रही है। 

उसे भीड़ जुटाने के लिए ऐसे दलों का सहारा लेना पड़ रहा है जिसका कोई खास जनाधार भी नहीं है। यह भाजपा के उस नैरेटिव को भी बल दे सकता है कि विपक्षी गठबंधन विचारधारा नहीं बल्कि सिर्फ मोदी-विरोध के नाम पर बना एक अस्वाभाविक जमावड़ा है। इंडिया ब्लॉक के अंदर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच प्रतिस्पर्धा पहले से है और सीजेपी के शामिल होने से नेतृत्व और एजेंडा तय करने को लेकर और मतभेद उभर सकते हैं। कुछ दल सीजेपी को अपने युवा आधार को चुराने वाला मान सकते हैं जबकि कुछ इसे उपयोगी सहयोगी समझेंगे। 

Thursday, October 29, 2026

तूफान अर्नब ने मचाई तबाही, तटीय जैव विविधता को पहुंची भारी क्षति

अशोक मिश्र

बंगाल की खाड़ी से उठे अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान अर्नब ने बुधवार सुबह आंध्र प्रदेश के तट पर बापटला और विशाखापत्तनम के बीच यानम के दक्षिण-पश्चिम में दस्तक दी है। इससे आंध्र प्रदेश के तटीय जिलों जैसे काकीनाडा, कोनसीमा, पश्चिम गोदावरी, विशाखापत्तनम, अनकापल्ली, विजयनगरम और श्रीकाकुलम में भारी तबाही मची। सैकड़ों पेड़ उखड़ गए, बिजली के खंभे गिरे, सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, संचार व्यवस्था बाधित हुई और कई जगह बिजली आपूर्ति ठप हो गई। तूफान अर्नब में तीन लोगों की मौत हुई, एक पेड़ गिरने और दो करंट लगने से, जबकि 764 गांव प्रभावित हुए हैं।

लगभग 57 हजार लोगों को आंध्र प्रदेश में और कुल मिलाकर 87 हजार से अधिक को ओडिशा सहित राहत शिविरों में पहुंचाया गया है। तेज हवाओं ने सैकड़ों पेड़ उखाड़ दिए। बिजली के खंभे गिरा दिए। सड़कें क्षतिग्रस्त कीं और बिजली तथा संचार व्यवस्था बाधित कर दी जिससे तटीय जिलों जैसे काकीनाडा कोनसीमा विशाखापत्तनम अनकापल्ली विजयनगरम और श्रीकाकुलम में जनजीवन ठप हो गया। इस तूफान का पर्यावरण पर पहला और सबसे प्रत्यक्ष असर तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर दिखता है। काकीनाडा के पास उप्पाडा तटीय सड़क का समुद्री लहरों और तटीय कटाव के कारण बह जाना सिर्फ एक सड़क का टूटना नहीं है। यह बताता है कि कैसे तेज हवाओं के साथ उठी तीन से चार मीटर ऊंची तूफानी लहरों ने समुद्र तल को कई मीटर अंदर तक धकेल दिया है। विशाखापत्तनम, विजयनगरम, अनाकापल्ली और श्रीकाकुलम जैसे जिलों में सैकड़ों पेड़ उखड़ गए हैं। 

इसमें मैंग्रोव के पैच और कैसुरीना के रोपण भी शामिल हैं जो प्राकृतिक रूप से समुद्र के प्रहार को रोकते हैं। इन पेड़ों के गिरने से पक्षियों के घोसले, छोटे स्तनधारियों के आवास और तटीय जैव विविधता को तत्काल क्षति पहुंची है। लंबे समय में हवा के अवरोध के कमजोर होने से अगले मानसून या तूफान में कटाव और तेज होगा। कई जगहों पर 200 मिलीमीटर से अधिक भारी वर्षा ने नदियों में अचानक बाढ़ ला दी है जिससे मीठे पानी के तालाबों, खेतों और भूजल में खारे पानी का प्रवेश हुआ है। इससे आंध्र की उपजाऊ डेल्टा जमीन, विशेषकर गोदावरी-कृष्णा बेसिन में, लवणता बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है जो अगले एक-दो फसली चक्र तक पैदावार को प्रभावित कर सकता है। साथ ही जलभराव से रुके हुए पानी में कचरा, प्लास्टिक और कृषि रसायन घुल कर लैगून और एश्चुरी में पहुंच रहे हैं, जिससे मत्स्य प्रजनन क्षेत्रों में आॅक्सीजन की कमी और यूट्रोफिकेशन का खतरा बनता है। 

दूसरी ओर, अस्थायी रूप से देखें तो इस तरह के चक्रवात बंगाल की खाड़ी के गर्म पानी को ठंडा करते हैं, वायुमंडल की अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकालते हैं और सूखे पड़े आंतरिक इलाकों में जलाशयों को भर देते हैं, लेकिन यह लाभ तब अर्थहीन हो जाता है जब बाढ़ का पानी इतनी तेजी से आता है कि जमीन उसे सोख ही नहीं पाती। पर्यावरणीय दृष्टि से पेड़ों के उखड़ने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र क्षतिग्रस्त हुआ है जबकि बाढ़ के पानी से मिट्टी का कटाव और जल प्रदूषण का खतरा बढ़ा है। सकारात्मक पक्ष यह है कि समय पर चेतावनी निकासी तथा एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की तैनाती के कारण बड़े पैमाने पर जनहानि नहीं हुई। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने केंद्रीय मदद मांगकर पुनर्वास की प्रक्रिया तेज कर दी है।

कुल मिलाकर यह तूफान भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों की आपदा प्रबंधन क्षमताओं को परखता है तथा जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच तटीय राज्यों की अर्थव्यवस्था कृषि और सामाजिक व्यवस्था पर दीर्घकालिक दबाव डालने की क्षमता रखता है हालांकि तत्काल राहत कार्यों से सामान्य स्थिति बहाल होने की उम्मीद है। आर्थिकी पर इसका असर बहुस्तरीय है। सबसे पहले कृषि और मत्स्य पालन पर दिखता है। उत्तरी आंध्र में इस समय धान की कटाई से ठीक पहले की फसल खड़ी थी, मिर्च, मूंगफली और नारियल के बागान भी तैयार अवस्था में थे। तेज हवा और जलभराव से खड़ी फसल गिर गई है, अनाज में नमी बढ़ गई है और भंडारण में रखे बीज सड़ने लगे हैं, जिससे छोटे किसानों को दोहरी मार पड़ी है, एक तो तत्काल उपज का नुकसान और दूसरा अगले सीजन के लिए कर्ज का बोझ। 

31 मकानों के क्षतिग्रस्त होने का सरकारी आंकड़ा शुरूआती है, जमीनी स्तर पर कच्चे घरों, पोल्ट्री शेड और कोल्ड स्टोरेज को हुए नुकसान को जोड़ें तो आजीविका का नुकसान करोड़ों में पहुंचता है। समुद्र में मछली पकड़ने पर लगी रोक, नावों के टूटने और जेटियों के क्षतिग्रस्त होने से मछुआरा समुदाय, जो पहले ही मानसून के कारण कम दिनों तक समुद्र में जा पाता है, अब कम से कम 15 से 20 दिनों तक बेरोजगार रहेगा। ओडिशा में भी भारी बारिश और तेज हवाओं का असर पड़ा, जहां हजारों लोगों को निकाला गया तथा दक्षिणी जिलों में स्कूल बंद रखे गए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में भी अलर्ट जारी रहे तथा कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश की आशंका बनी रही। आर्थिक प्रभाव मुख्य रूप से कृषि, बुनियादी ढांचे और मत्स्य उद्योग पर पड़े। 

Wednesday, October 28, 2026

देश की दवा कंपनियों की मनमानी मरीजों के जीवन पर पड़ रही भारी

अशोक मिश्र

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान दवाओं की कीमतों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र सरकार से पूछा कि पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं की मदद क्यों कर रहा है। अदालत ने एमआरपी और रिटेलर को मिलने वाली कीमत यानी प्राइस टू रिटेलर (पीटीआर) के बीच भारी अंतर पर चिंता जताई। सचमुच एमआरपी और पीटीआर के बीच भारी अंतर मरीजों के लिए काफी चिंता का विषय है। कोई भी मरीज या उपभोक्ता जब इन दवाओं को खरीदता है, तो सारा भार उसे ही उठाना पड़ता है। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि भारत में कैसे एक ही दवा दो बिल्कुल अलग कीमतों पर बिकती है। 

एक उदाहरण अदालत में दिया गया कि एक इंजेक्शन की रिटेलर कीमत करीब 3,520 रुपये है, लेकिन उसकी एमआरपी 22,437 रुपये तय है। एक और कैंसर की दवा का उदाहरण और भी चौंकाने वाला था, जो रिटेलर को करीब 2,700 रुपये में मिलती है जबकि उसकी एमआरपी करीब 27,000 रुपये रखी गई थी, यानी लगभग दस गुना का अंतर। अदालत ने इस पर हैरानी जताते हुए इसे मरीजों के साथ दिनदहाड़े की गई डकैती कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ड्रग्स प्राइस कंट्रोल आॅर्डर 2013 की कमियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। 

कोर्ट ने कहा कि लोग इलाज के लिए घर-गहने बेचने को मजबूर हो जाते हैं। भारत में स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा दवाओं पर जाता है। आंकड़ों के अनुसार घरेलू दवा बाजार का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा ही सीधे मूल्य नियंत्रण के दायरे में आता है, जबकि शेष 83 प्रतिशत गैर-अनुसूचित दवाओं पर निर्माता शुरू में अपनी मर्जी से एमआरपी तय कर सकते हैं और बाद में सालाना 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की अनुमति होती है। अदालत ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी को लगभग निष्क्रिय बताया और सवाल किया कि सरकार की नजरों के सामने यह अंतर कैसे बना रहता है। यह अंतर आंकड़ों में नहीं, घर के बजट में दिखता है। भारत में इलाज पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 17 प्रतिशत सिर्फ दवाओं पर जाता है। 

यह दुनिया के कई विकसित देशों से कहीं अधिक है जहां बीमा या सरकारी खरीद इस बोझ को सोख लेती है। भारत में आज भी अधिकतर खर्च जेब से होता है। कैंसर, हृदय रोग, या लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में यह बोझ परिवार को कर्ज, संपत्ति बेचने और इलाज छोड़ने तक ले जाता है। सरकारी अस्पतालों में भी जब दवा बाहर से लिखी जाती है या जन औषधि केंद्र पर विकल्प नहीं मिलता, तो वही लूट दोहराई जाती है। रिटेलर का ऊंचा मार्जिन उसे उसी ब्रांड को बेचने के लिए प्रेरित करता है जिसमें उसे ज्यादा लाभ है, सस्ता जेनेरिक नहीं। भारत में दो तरह की दवाएं हैं। शेड्यूल्ड दवाएं, जिनकी लगभग 388 दवाओं की सीलिंग कीमत एनपीपीए तय करता है, और नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं, जो बाजार में 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखती हैं। नॉन-शेड्यूल्ड पर कंपनियां अपनी एमआरपी खुद तय करती हैं, बस सालाना बढ़ोतरी 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस नियम में ही खेल है। कंपनी कम पीटीआर पर दवा देकर रिटेलर और डॉक्टर को भारी मार्जिन का लालच देती है और एमआरपी ऊंची रखकर उस मार्जिन को वैध बना देती है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर केंद्र से पूछा कि पूरा तंत्र दवा निर्माताओं की मदद करने के लिए क्यों काम कर रहा है। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि नीति के अनुसार पूरे इकोसिस्टम को कड़े नियंत्रण में नहीं लाया जाना चाहिए। भारत में दवाओं की कीमतें विश्व स्तर पर तुलनात्मक रूप से कम मानी जाती हैं। एमआरपी और रिटेलर कीमत के बीच का अंतर केवल निर्माता का मुनाफा नहीं होता। इसमें स्टॉकिस्ट, वितरक, रिटेलर, परिवहन, भंडारण, क्रेडिट सुविधा, एक्सपायरी का जोखिम, कर और मार्केटिंग जैसे कई खर्च शामिल होते हैं। अगर मार्जिन बहुत सख्ती से सीमित कर दिए गए तो छोटी फार्मेसियां और वितरण नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। उद्योग का कहना है कि अनुसंधान, नए अणुओं का विकास और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पर्याप्त मार्जिन जरूरी है। 

ज्यादा नियंत्रण से निवेश घट सकता है, आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है और कुछ दवाएं बाजार से गायब भी हो सकती हैं। अब जरूरत है कि सरकार, नियामक एजेंसियां, उद्योग और उपभोक्ता संगठन मिलकर ऐसा ढांचा बनाएं जो अनावश्यक मुनाफाखोरी रोके, पारदर्शिता बढ़ाए और साथ ही दवाओं की उपलब्धता व गुणवत्ता बनाए रखे। केवल अदालती आदेश या सीमित नियंत्रण से समस्या हल नहीं होगी। व्यापक नीति, बेहतर निगरानी और सभी हितधारकों के बीच संवाद से ही स्वास्थ्य सेवाओं को ज्यादा न्यायसंगत बनाया जा सकता है। अदालत का इशारा साफ है कि जरूरी दवाओं को दो श्रेणियों में बांटकर एक को खुला छोड़ देना अब नहीं चलेगा। इलाज का 17 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर खर्च हो रहा है, यह आंकड़ा बताता है कि दवा महंगी नहीं, तो इलाज महंगा हो ही नहीं सकता। 

Tuesday, October 27, 2026

Kumarajiva: The Greatest Propagator of Buddhism


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Kumarajiva, who was born in Bihar, made a monumental contribution to the spread of Buddhism. Buddhist literature contains a wealth of information about him. A man of exceptional talent, Kumarajiva eventually went to study at Nalanda University. His insatiable thirst for knowledge led him to Taxila, where he not only pursued his education but also served as a teacher. 

It was during his time teaching at Taxila that he resolved to dedicate his innate, God-given talent to the propagation of the Buddhist faith. He immersed himself in the deep study of Buddhism and began spreading its teachings across the kingdoms and regions surrounding Taxila—a task that required him to master several Asian languages. 

Later, he decided to travel to China to propagate Buddhism. After an arduous and challenging journey, Kumarajiva arrived in China. He learned the Chinese language (Mandarin) and translated numerous Buddhist texts into Chinese. He would engage with the people, explaining the tenets of Buddhism and sharing the life and teachings of Gautama Buddha in their own language. 

Gradually, Buddhism began to take root and spread throughout China. In this endeavor, he secured the support of several influential figures and rulers. However, the path was far from easy; Kumarajiva often had to take significant risks. Even in China, he faced opposition from those who resisted the spread of Buddhism, yet he remained steadfast in his mission. Ultimately, he became the most prominent propagator of Buddhism in China, earning widespread acceptance among the people.

बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रचारक कुमार जीव


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में बिहार में जन्मे कुमार जीव का बहुत बड़ा योगदान है। बौद्ध साहित्य में इनके बारे में बहुत सारी जानकारियां दी गई हैं। बिहार में जन्मे कुमार जीव बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। समय आने पर वह नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने गए। ज्ञान हासिल करने की भूख इन्हें तक्षशिला तक ले गई। यहां इन्होंने शिक्षा हासिल की और बाद में अध्यापन कार्य भी यहीं किया। तक्षशिला में अध्यापन के दौरान ही इन्होंने निश्चय किया कि प्रकृति प्रदत्त इस प्रतिभा का उपयोग धर्म के प्रचार-प्रसार में करना चाहिए। 

उन्होंने बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन किया और उन्होंने तक्षशिला के आसपास के राज्यों और देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। इसके लिए इन्हें कई एशियाई भाषा को भी सीखना पड़ा। बाद में इन्होंने तय किया कि उन्हें चीन जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करना चाहिए। एक लंबी और कठिन यात्रा करके कुमार जीव चीन पहुंचे। उन्होंने चीनी भाषा मंदारिन सीखी और अनेक बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद भी किया। वह लोगों के बीच जाते और उन्हें उनकी ही भाषा में बौद्ध धर्म के बारे में बताते थे।

 महात्मा बुद्ध के उपदेश और जीवन चरित बताते थे। इससे धीरे-धीरे चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार होने लगा। उन्होंने इस काम में चीन के कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और राजाओं का सहयोग भी हासिल किया। लेकिन यह सब कुछ बहुत आसान भी नहीं रहा। कई बार कुमार जीव को बहुत बड़ा जोखिम भी उठाना पड़ा। 

चीन में भी इन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विरोधियों का सामना करना पड़ा। लेकिन कुमार जीव अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि कालांतर में यह चीन में बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रचारक साबित हुए और लोगों ने इन्हें स्वीकार भी कर लिया।

व्यक्तिगत टिप्पणियों से तार-तार होती है लोकतांत्रिक मर्यादा

अशोक मिश्र

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना में दिए गए बयान ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के स्वर को गर्मा दिया है। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के कार्यक्रम में जब खड़गे भाषण दे रहे थे और कथित वोट चोरी तथा एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी करने वालों को जेल भेजने की बात कर रहे थे, तभी सभा में मौजूद एक व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा कि मोदी कहीं नहीं जाएंगे। इस पर नाराज खड़गे ने जो टिप्पणी की, वह टिप्पणी तुरंत विवाद का विषय बन गई। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता का अपमान बताया और देशभर में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि खड़गे ने सारी मर्यादाएं तार-तार कर दी हैं। कांग्रेस के पास अब नीति नहीं, सिर्फ गाली-गलौज की राजनीति बची है। 

अन्य भाजपा नेताओं ने भी इसे अश्लील, अभद्र और लोकतांत्रिक मर्यादा के विरुद्ध करार दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस ने खड़गे का बचाव करते हुए कहा कि बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। खड़गे का इशारा प्रधानमंत्री के वैचारिक पिता यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर था। साथ ही पार्टी का दावा है कि पटना में पहले बीजेपी कार्यकर्ता ने खड़गे के दिवंगत पिता का अपमान किया था। इसके जवाब में यह प्रतिक्रिया आई थी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी इसे एक आम बोलचाल का मुहावरा बताया है, किसी के पिता का व्यक्तिगत अपमान नहीं। जब बहस नीतियों, जैसे एसआईआर में गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या चुनाव सुधार जैसे मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत और पारिवारिक टिप्पणियों पर आ जाती है, तो जनता का ध्यान असली सवालों से भटक जाता है। लगातार ऐसी भाषा से सार्वजनिक संवाद का स्तर गिरता है। 

राजनीति में शालीनता का मानक कमजोर होता है जिसे युवा पीढ़ी सामान्य मानने लगती है। समर्थक वर्ग में भावनात्मक ध्रुवीकरण बढ़ता है। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और पुतला दहन जैसे प्रतीकात्मक विरोध रोजमर्रा की राजनीति बन जाते हैं, जिससे सामाजिक विश्वास कम होता है। युवा और बच्चे, इन घटनाओं को देखकर यह संदेश ग्रहण करते हैं कि सत्ता के लिए कोई भी सीमा पार की जा सकती है। इससे समाज में असहिष्णुता बढ़ती है, विरोधी विचार रखने वाले लोगों के प्रति घृणा और नफरत की भावना मजबूत होती है। 

सार्वजनिक चर्चा मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई—से हटकर व्यक्तिगत हमलों और भावनात्मक आरोपों पर केंद्रित हो जाती है। नतीजतन लोकतंत्र कमजोर पड़ता है क्योंकि मतदाता मूल बहस के बजाय शोर और सनसनी से प्रभावित होते हैं। ऐसे विवाद से राजनीतिक दलों को तात्कालिक सुर्खियां तो मिल जाती हैं, लेकिन लोकतंत्र की दीर्घकालिक सेहत के लिए जरूरी विचार-विमर्श और समाधान खोजने की संस्कृति कमजोर पड़ती है। राजनीति का स्तर गिरता है और लोकतंत्र प्रभावित होता है।

Monday, October 26, 2026

How Does Jealousy Take Root in the Mind?


Bodhivriksha

Ashok Mishra

Among the many disciples of Gautama Buddha, Vakkula is a notable figure. While Sariputra was adept at delivering sermons, Vakkula did not possess this skill. It is said that he attained enlightenment just seven days after seeking refuge in the Buddha, and by the eighth day, he had attained the pure state of *Arhatship*. Vakkula Sthavira had a friend named Acela Kashyapa, an ascetic who always remained naked. 

The two met in Rajagriha when they were both eighty years old. Acela Kashyapa initiated a conversation, asking, "Friend Vakkula, how many years have passed since you became an ascetic?" Vakkula replied with ease, "Eighty years, my friend." Acela then asked, "In these eighty years, how many times have you engaged in sexual intercourse?" Vakkula answered, "Not even once. In the last eighty years, the thought of sexual desire has never once crossed my mind. 

To tell you the truth, in all these eighty years, not even a trace of malice toward anyone has ever arisen in my consciousness. I do not even know how thoughts of violence arise in people's minds. I do not know how to wear clothes in the manner of householders; 

I simply wear the robes as the monks do in the *viharas* (monasteries). I do not know what it is like to wear garments stitched with a needle, nor do I know how one is supposed to sit in the homes of householders. I cannot even recall a single instance of being ill over the past eighty years.

" It is said that among all of the Buddha’s disciples, Vakkula Sthavira was the healthiest. He had renounced all the comforts and luxuries of worldly life. Perhaps this is the reason why his age is stated as 160 years in Buddhist texts.