Thursday, July 16, 2026

युवराज ने सीखी अनकहे को सुनने की कला

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अच्छा शासक वही है, जो अपनी प्रजा की परेशानियों को बिना कहे समझ जाए। जब कोई शासक अपने लोगों के दिल की बात सुनना सीख जाए, बिना उनके बोले, उनकी भावनाओं और जो दर्द बयाँ न किया गया हो उसे समझ ले, तो वह अच्छा शासक माना जाता है। प्रजा भी  अपने उसी राजा पर विश्वास करती है।  एक बार की बात है। चीन में एक राजा हुआ करता था। 

वह जब बूढ़ा हो चला, तो उसने सोचा कि अपने पुत्र को राजपाट सौंप देना चाहिए। लेकिन वह चाहता था कि उसका पुत्र एक अच्छा शासक बने। इसलिए वह अपने पुत्र को एक जेन के पास ले गया। जेन मास्टर वास्तव में बौद्ध धर्म की एक शाखा से जुड़े होते हैं, जो ध्यान लगाते हैं। जेन मास्टर ने राजकुमार को एक साल के लिए जंगल में भेज दिया। साल भर बाद जब राजकुमार लौटकर आया, तो जेन मास्टर ने पूछा कि तुम्हें जंगल में क्या सुनाई दिया। राजकुमार ने कहा कि मैंने कोयल को कूकते सुना। 

नदियों के बहते पानी की कल-कल ध्वनि सुनी। मेढकों का टर्राना सुना। भेड़ियों की आवाज सुनी। वह अपना अनुभव सुनाता चला गया। जेन मास्टर ने कहा कि तुम फिर एक साल के लिए जंगल में जाओ और कुछ नया सुनकर आओ। राजकुमार अब अपने घर लौटना चाहता था, लेकिन बेमन से वह एक बार फिर जंगल गया। शुरुआत में तो उसे कुछ नया नहीं सुनाई दिया। लेकिन जब उसने ध्यान लगाना सीख लिया, तो उसे बहुत कुछ सुनाई देने लगा। 

वह लौटकर आया और जेन मास्टर से कहा कि इस बार मैंने तितलियों की बातें सुनीं, कलियों का चटकना सुना, सूरज की किरणों को धरती पर उतरना सुना। जेन मास्टर ने कहा कि अब तुम राजा बनने के लायक हो गए हो। जो राजा  अनसुने को सुन लेता हो, वही अच्छा शासक हो सकता है।

हरित क्रांति की नई गाथा लिखने को तैयार हरियाणा

अशोक मिश्र

इन दिनों पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रही है। पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। ऐसे संकट के दौर में 17 जुलाई को हरियाणा में एक हरित विकास की एक नई क्रांति होने जा रही है। एक दिन बाद भारत हाईड्रोजन ट्रेन चलाने वाला आठवां देश हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नब्बे किमी की यात्रा करने वाली हाईड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे और हरियाणा को पहली हाईड्रोजन ट्रेन चलाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। निस्संदेह यह हरियाणा के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। 

अगर योजना, सुरक्षा और लागत का संतुलन बना रहा तो जींद-सोनीपत की यह 90 किमी की पटरी, पूरे हरियाणा के लिए 90 साल आगे की सोच बन सकती है। इसके लिए निस्संदेह केंद्र और राज्य सरकार बधाई के पात्र हंै। हाईड्रोजन ट्रेन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह डीजल और बिजली दोनों पर निर्भर नहीं है। इसमें लगे फ्यूल सेल हाईड्रोजन गैस से बिजली बनाते हैं। उसी से ट्रेन चलती है। इस प्रक्रिया में धुआं नहीं निकलता, सिर्फ पानी की भाप बनती है। इसका नतीजा यह निकलेगा कि नब्बे किमी की पटरी के आसपास इस ट्रेन की वजह से प्रदूषण नहीं होगा। कार्बन का उत्सर्जन ही नहीं होगा। 

अगर यह कहा जाए कि 17 जुलाई से चलने वाली हाईड्रोजन ट्रेन केवल एक रेलगाड़ी नहीं है, बल्कि हरियाणा के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक बहुत बड़ा कदम है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दिल्ली एनसीआर से सटे जिलों में डीजल इंजन और सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों की वजह से होने वाले प्रदूषण को कम करने में यह ट्रेन सहायक हो सकती है, यदि हाईड्रोजन गैस के माध्यम से चलने वाले वाहनों के इंजन ईजाद कर लिए जाएं तो निकट भविष्य में हरियाणा ही नहीं, देश के सभी राज्य शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य के करीब पहुंच जाएंगे। इससे पूरे देश के पर्यावरण में भारी सुधार होगा और लोगों को सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु उपलब्ध हो सकेगी। 

हाईड्रोजन ट्रेन की वजह से तेज और साफ सफर संभव हो सकेगा। इससे हरियाणा में उद्योग, शिक्षा और रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे। लोग कम समय में आ-जा सकेंगे और माल ढुलाई भी बेहतर होगी। अभी तो यह हरियाणा में केवल एक हाईड्रोजन ट्रेन की शुरुआत हो रही है। निकट भविष्य में हरियाणा के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी हाईड्रोजन ट्रेन का संचालन संभव होगा और पूरे देश की तस्वीर बदल जाएगी। हाईड्रोजन ट्रेन और वाहनों का संचालन शुरू होने पर देश की डीजल और पेट्रोल के आयात पर निर्भरता घटेगी और ईंधन घरेलू स्तर पर ही बनेगा। यदि ऐसा होता है तो देश में हाईड्रोजन प्लांट, रीफ्यूलिंग स्टेशन और रखरखाव से जुड़े नए उद्योग और नौकरियां पैदा होंगी। बहरहाल, 17 जुलाई को हरियाणा से देश में हरित क्रांति की मशाल जलने वाली है जो भविष्य में पूरे देश की तस्वीर बदल सकती है।

Wednesday, July 15, 2026

ज्ञान, धन और विश्वास की कथा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया में सबसे अमूल्य है विश्वास। एक बार किसी का विश्वास टूट जाए, तो फिर दोबारा विश्वास कायम नहीं होता है। यही वजह है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में विश्वास को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। विश्वास कायम रखना, एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इस संदर्भ में एक बहुत पुरानी कथा है। कहते हैं कि ज्ञान, धन और विश्वास नामक तीन मित्र थे। तीनों में प्रगाढ़ मित्रता थी। 

एक बार उन्होंने तय किया कि किसी मूल्यवान वस्तु की खोज की जाए। तो फिर क्या था? तीनों अपनी यात्रा पर निकल पड़े। काफी दूर-दूर तक भटकने के बाद एक राज्य में पहुंचे। उस राज्य के राजा के सामने तीनों मित्र खड़े हुए। राजा ने तीनों का परिचय पूछा, तो सबसे पहले ज्ञान आगे आया। उसने राजा और दरबारियों को ज्ञान की बहुत सारी बातें बताईं। 

राजा ज्ञान की बातों से बहुत प्रभावित हुए। इसके बाद धन की बारी आई। उसने राजा और दरबारियों के सामने ढेर सारा धन प्रस्तुत किया। सभी इतना धन देखकर धन से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने धन का ज्ञान से भी बढ़कर सम्मान किया। विश्वास की वेशभूषा भी बहुत साधारण थी। उसने लोगों को अपनी बातों से विश्वास दिलाना चाहा लेकिन कोई प्रभावित नहीं हुआ। 

कुछ समय बाद तीनों मित्र एक जंगल से गुजर रहे थे, तो डाकुओं ने उन पर हमला कर दिया। ज्ञान ने डाकुओं को समझाना चाहा, लेकिन उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। धन से भी सब कुछ छीन लिया गया। तब विश्वास आगे आया। उसने कहा कि आपने हमारा सब कुछ छीन लिया है, लेकिन एक बात याद रखना, अगर विश्वास टूट जाए, तो दोबारा कायम नहीं हो सकता है। डाकुओं पर विश्वास की बात का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने तीन मित्रों को आजाद कर दिया और लूटा गया सामान भी वापस कर दिया।

बरसात के दिनों में जल निकासी बन जाती है सबसे बड़ी समस्या


अशोक मिश्र

हरियाणा में बरसात ने सरकारी व्यवस्था की पोल खोल दी है। कई जिलों में सड़कों और गलियों में जलभराव ने लोगों के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। गुरुग्राम की सड़कें हों या मेवात, पलवल, फरीदाबाद के निचले इलाके, रोहतक और हिसार के कई गांव, हर जगह पानी भरना अब आम बात हो गई है। हरियाणा की भौगोलिक बनावट के कारण रोहतक, झज्जर और सोनीपत जैसे मध्यवर्ती इलाकों में प्राकृतिक जल निकासी की समस्या है, जिससे हर मानसून में निचले इलाकों में पानी भर जाता है। 

कुछ घंटे की बारिश भी कई इलाकों को घंटों के लिए तालाब में बदल देती है और इसके बाद शुरू होता है बीमारियों और दिक्कतों का सिलसिला।ग्रामीण इलाकों की दशा तो बरसात के दिनों में और भी खराब हो जाती है। खेतों में लंबा जलभराव होने से किसानों की खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं और मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती है। कई जिलों में कई बार पानी कई दिनों तक जमा रहता है। इस रुके हुए पानी में एडीज और एनोफिलिज मच्छरों के पनपने लगते हैं जिसकी वजह से डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है। बरसात के मौसम में सबसे बड़ी परेशानी पानी का दूषित हो जाना है। 

पीने वाले पानी में सीवर की गंदगी मिलने से पीलिया, टाइफाइड, हैजा और गैस्ट्रोएंटेराइटिस (पेट में संक्रमण और उल्टी-दस्त) जैसी बीमारियां होती हैं। दूषित पानी के संपर्कमें लंबे समय तक रहने से त्वचा पर चकत्ते, फंगल इंफेक्शन और आंखों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। अस्पतालों में ऐसे रोगियों की भरमार हो जाती है। सड़कों पर पानी भरने से लंबा ट्रैफिक जाम लगता है। भारी बरसात होने की वजह से कई बार सड़कें तक धंस जाती हैं। ऐसी स्थिति में सड़क दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। 

जल जमाव सिर्फ बीमारी ही नहीं लाता, रोजमर्रा की जिंदगी भी ठप कर देता है। स्कूल जाने वाले बच्चे कीचड़ और पानी से होकर गुजरते हैं। कई बार सड़कें बंद होने से बसें नहीं चलतीं और विद्यार्थियों की पढ़ाई छूट जाती है। दफ्तर जाने वाले लोग घंटों जाम में फंस रहते हैं। गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे औद्योगिक इलाकों में पानी भरने से फैक्टरियों में काम रुक जाता है, जिससे मजदूरों की दिहाड़ी भी जाती है। इस समस्या की जड़ में अव्यवस्थित शहरीकरण, नालों की सफाई न होना और जल निकासी की सही योजना का अभाव है। कई जगह नाले अतिक्रमण के कारण बंद हैं। कचरा डालने से वे जाम हो गए हैं। 

बारिश का पानी जमीन में नहीं जा पाता क्योंकि कंक्रीट के जंगल बढ़ गए हैं। समाधान के लिए सिर्फ  बरसात के बाद सफाई काफी नहीं है। हर जिले में बरसात से पहले नालों की सफाई, अतिक्रमण हटाना और पंपिंग स्टेशन दुरुस्त करने की मुहिम चलनी चाहिए। शहरी इलाकों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया जाए ताकि पानी जमीन में जाए। 

Tuesday, July 14, 2026

जब जरूरत हो, तभी करें किसी की मदद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बिना संघर्ष किए यदि किसी को कुछ प्राप्त होता है, तो वह उसके लिए उपयोगी साबित नहीं होता हैै। कुछ लोग दयावश उस जीव की भी मदद करने को तैयार रहते हैं जिसको सचमुच किसी मदद की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसे लोगों की यह दया भावना दूसरे व्यक्ति के लिए घातक सिद्ध होती है। सच कहा जाए, तो ऐसे लोगों का उद्देश्य बड़ा पवित्र होता है, लेकिन उसके परिणाम जरूर घातक होते हैं। 

एक बार की बात है। किसी गांव में एक व्यक्ति रहता था। वह स्वभाव से बड़ा दयालु था। वह हर किसी की मदद करने को तत्पर रहता था। कई बार तो वह ऐसे लोगों की मदद करने के लिए पहुंच जाता था जिसे किसी प्रकार की मदद की आवश्यकता नहीं होती थी। वह अपने घर के पास बने बगीचे में अक्सर जाया करता था। एक दिन उसने देखा कि बगीचे में तितली का कोकून पड़ा हुआ है। 

वह आदमी अब रोज जब बगीचे में जाता, वह उस कोकून को जरूर देखता था। एक दिन उसने देखा कि कोकून में हलका सा छेद हो गया है। कोकून के भीतर तितली बाहर आने के लिए बहुत संघर्ष कर रही है। वह कई घंटों तक बैठकर देखता रहा। आखिर में तितली थक हारकर बैठ गई। उस आदमी को तितली पर दया आई। उसने घर से कैंची लाकर उस छेद को काटकर बड़ा कर दिया। 

अब तितली तो बारह जरूर आई, लेकिन उसका सारा शरीर सूजा हुआ था। उसके पंख शरीर से चिपके हुए थे। जब तक वह तितली जिंदा रही, घिसट-घिसट कर चलती रही। वो आदमी अपनी दया और जल्दबाजी में ये नहीं समझ पाया की दरअसल कोकून से निकलने की प्रक्रिया को प्रकृति ने इतना कठिन इसलिए बनाया है ताकि ऐसा करने से तितली के शरीर में मौजूद तरल उसके पंखों में पहुंच सके और वो छेद से बाहर निकलते ही उड़ सके।

पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाली भारी बारिश हरियाणा के लिए मुसीबत

अशोक मिश्र

देशवासियों को इस बार मानसून ने ठेंगा दिखा दिया है। मौसम विभाग के मुताबिक अंतरिक्ष से लिए गए चित्र में उत्तर भारत से बादल गायब दिख रहे हैं। आशंका व्यक्त की गई है कि अगले एक सप्ताह तक उत्तर भारत में बरसात के आसार नहीं हैं। वहीं पर्वतीय इलाकों में न केवल भारी बारिश हो रही है, बल्कि बादल भी फट रहे हैं। इसकी वजह से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सहित पूर्वोत्तर राज्यों में भारी नुकसान हो रहा है। पर्वतीय राज्यों में भारी बरसात होने का खामियाजा हरियाणा जैसे राज्यों को भी भुगतना पड़ रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बरसात होने की वजह से हथनी कुंड बैराज से शुक्रवार को पचास हजार क्यूसेक पानी को छोड़ना पड़ा है। इसके चलते हरियाणा के कई जिलों में जलजमाव गया है। 

यमुना का पानी हथनीकुंड बैराज से छोड़े जाने के बाद पानीपत, सोनीपत और फरीदाबाद के निचले इलाकों में घुस जाता है। घग्गर हर बार सिरसा और फतेहाबाद में तबाही मचाता है। कारण सबको पता है। तटबंध कमजोर हैं, जल निकासी के नाले भरे पड़े हैं, अतिक्रमण के कारण नदियों का प्राकृतिक बहाव रुका हुआ है और ड्रेनेज सिस्टम बरसात से पहले साफ नहीं हुए। हरियाणा में भारी बारिश और पहाड़ों से आने वाले पानी के कारण घग्गर, यमुना, मारकंडा और टांगरी जैसी नदियां उफान पर हैं। 

नदियों का बढ़ता जलस्तर कई इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा कर रहा है, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। यमुना, घग्गर, मार्कंडा और टांगरी का पानी जब उफान पर आता है तो साथ में लाता है बाढ़, टूटे तटबंध, डूबे खेत और उजड़े घर। नदियों के उफान पर आने से भारी नुकसान होता है। इस लापरवाही की सबसे भारी कीमत आम आदमी चुकाता है। किसान का खेत पानी में डूब जाता है। साल भर की मेहनत एक रात में बह जाती है। मजदूर का घर गिर जाता है। 

बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है। बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।  ऐसा हो जाने के बाद प्रशासन फाइलें खोलता है, अधिकारियों-कर्मचारियों की मीटिंगें होती हैं, राहत पैकेज का ऐलान होता है, पर जमीन पर तैयारियां अक्सर आधी अधूरी ही रह जाती हैं। इस बार भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। हरियाणा के नदी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि हर साल बारिश के मौसम में उन्हें इस खतरे का सामना करना पड़ता है। वैसे तो नदियां हमेशा से जीवनदायिनी रही हैं। 

अगर उनके स्वाभाविक प्रवाह को बाधित न किया जाए, तो वह हमेशा मानव के लिए फायदेमंद रही हैं। लेकिन विकास के नाम पर लोगों ने नदियों के डूब क्षेत्र में पूरी बस्तियां बसा ली है। ऐसी स्थिति में जब नदियां उफान पर आती हैं, तो वह सब कुछ बहा ले जाने पर आमादा हो जाती हैं। हमें इस बात को समझना होगा, तभी नदियों के प्रकोप से बचा जा सकता है।

Monday, July 13, 2026

हां, मैं आपकी हत्या करने आया था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

शिवाजी राजे भोसले का राज्याभिषेक रायगढ़ में सन 1674 में हुआ था। यहीं पर उन्होंने मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी और राज्याभिेषक के बाद छत्रपति कहलाए। छत्रपति शिवाजी ने अपनी अनुशासित सेना और चतुर प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक खुशहाल राज्य की स्थापना की थी। उन्होंने मुगलों की भारी भरकम सेना का मुकाबला करने के लिए गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई थी जिससे मुगलों की सेना काफी खौफ खाती थी। एक बार की बात है। रात में वह अपने कक्ष में सो रहे थे। 

संयोग से उस समय सेनापति तानाजी पहरे पर थे। एक दस-बारह साल के एक बालक ने पहरेदारों की निगाह बचाकर शिवाजी के कक्ष में प्रवेश किया। उसने तलवार निकाली और शिवाजी पर हमला करने ही वाला था कि तानाजी की निगाह उस पर पड़ गई। तब तक शिवाजी की नींद भी खुल चुकी थी। बालक को बंदी बना लिया गया। शिवाजी ने उस बालक के हाथ में तलवार देखकर पूछा कि तुम मेरे कक्ष में इस तरह चोरी से क्यों आए थे। क्या तुम मेरी हत्या करना चाहते थे? 

बालक शिवाजी को देखकर डर गया। उसने डरते हुए कहा कि हां, मैं आपकी हत्या करने आया था। तब शिवाजी ने पूछा कि तुम मुझे क्यों मारना चाहते थे? तब बालक ने कहा कि मैं आपकी सेना के एक सैनिक का पुत्र हूं। मेरे पिता की लड़ाई में मौत हो गई है। मेरी मां बीमार हैं। मैं काम की तलाश में निकला था। आपके दुश्मनों ने मुझे पैसे देकर आपकी हत्या करने को कहा था। अभी आप मुझे छोड़ दीजिए, मैं अपनी मां से मिलकर कल सुबह हाजिर हो जाऊंगा। 

उस समय उसे छोड़ दिया गया। अगली सुबह नियत समय पर वह बालक दरबार में हाजिर हुआ। शिवाजी ने कहा कि यह हमारे वीर शहीद सैनिक का पुत्र है। भूल हमसे हुई। हम अपने सैनिकों के जीवन काल और उसके बाद उनके परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था करते हैं। मैं इस बालक की मृत्युदंड की सजा भी माफ करता हूं।

हरित विकास की ओर हरियाणा ने बढ़ाए मजबूती से कदम


अशोक मिश्र

हरियाणा ने बड़ी मजबूती से हरित विकास की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आगामी 17 जुलाई को हरियाणा देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन संचालित करने के मामले में गवाह बनने जा रहा है। यह ट्रेन जींद-सोनीपत रेलमार्ग पर चलाई जाएगी। यह डीजल के बजाय पानी और हाइड्रोजन से चलेगी जिससे प्रदूषण शून्य होगा यानी कार्बन का उत्सर्जन नहीं होगी। राज्य में जिस तरह सरकारी योजनाएं हरित विकास को ध्यान में रखकर संचालित की जा रही हैं, उससे उम्मीद है कि निकट भविष्य में हरियाणा की तस्वीर बदलेगी। वैसे भी सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आने तक यह हरित प्रदेश ही था। कहा जाता है कि हरियाणा शब्द भी हरियाली से ही आया है। 

राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और सतत कृषि के लिए सौ करोड़ रुपये के ग्रीन क्लाइमेट रेजिलिएंस फंड' की शुरुआत की है। इसका उद्देश्य प्रदूषण को कम करना और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना है। पिछले कुछ सालों में हरियाणा ने हरित विकास की दिशा में कई कदम उठाए हैं। आने वाले समय में इसी पर राज्य का भविष्य तय होगा। सबसे पहले सौर ऊर्जा के क्षेत्र में हरियाणा ने रफ्तार पकड़ी है। सरकारी इमारतों की छतों पर सोलर पैनल लगना, गांवों में सोलर स्ट्रीट लाइट और किसानों के लिए सोलर पंप योजना से न सिर्फ बिजली की बचत हो रही है बल्कि डीजल पर निर्भरता भी कम हुई है। 

गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों में इलेक्ट्रिक बसें और ई-आॅटो को बढ़ावा देना वायु प्रदूषण घटाने की दिशा में छोटा पर जरूरी कदम है। भूजल स्तर गिरना हरियाणा की सबसे गंभीर समस्या है। इसे देखते हुए माइक्रो इरिगेशन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और तालाबों के पुनरुद्धार पर काम शुरू हुआ है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार 'वन मित्र योजना' के तहत लोगों को पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए पैसे दे रही है। पूरे राज्य में पुराने पेड़ों की रक्षा के लिए 'प्राण वायु देवता पेंशन योजना' लागू है जिसमें 75 साल से पुराने पेड़ों का संरक्षण करने वालों को प्रतिवर्ष तीन हजार रुपये मिलते हैं। 

हरियाणा में वन क्षेत्र बढ़ाने का यह बहुत बढ़िया प्रयास है। बस, जरूरत इस बात की है कि पूरे राज्य में पेड़ों की अवैध कटाई को पूरी तरह नियंत्रित कर लिया जाए। सरकार वन क्षेत्र बढ़ाने का जितना प्रयास करती है, वन माफिया उतनी ही तेजी के साथ वनों की अवैध कटाई करके सरकार के प्रयासों पर पानी फेर देते हैं। अगर गांव-गांव में जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और सौर ऊर्जा को जन आंदोलन बनाया जाए तो बदलाव जमीनी स्तर पर दिखेगा। हरित विकास का मतलब विकास रोकना नहीं है। इसका मतलब है ऐसा विकास जो अगली पीढ़ी के लिए हवा, पानी और खेती की जमीन बचा कर रखे। उन्हें स्वस्थ जीवन दे।

जीवन में रात बहुत लंबी लगे, तो जुगनू को याद कीजिए


संजय मग्गू

आषाढ़ का महीना आधा बीत चुका है। पंद्रह दिन बाद सावन शुरू हो जाएगा। बरसात के दिनों में अंधेरे में चमक उठने वाले जुगनू अब शहरों में तो क्या, गांवों में भी कम दिखने लगे हैं। सदियों तक कवियों और साहित्यकारों के लिए आशा का प्रतीक रहे जुगनुओं को विकास ने निगल लिया है। शहरों और गांवों में बिजली की चमक ने उनके प्रजनन दर को प्रभावित किया है। कीट विशेषज्ञों का कहना है कि मई-जून में जुगनुओं का प्रजनन होता है। अंधेरी रात में अपने प्रकाश से मादा नर को खोजती है, लेकिन शहरों-गांवों में फैलती जा रही तीव्र रोशनी मादा को नर पहचानने में बाधा पैदा कर रही है। 

यही वजह है कि जुगनुओं की संख्या में भारी कमी आ रही है। कभी शहर और गांव में अंधेरी रातों में हरी, पीली और लाल रंग की रोशनी बिखेरते जुगनू अब यदा-कदा दिख जाएं, तो आप अपने को सौभाग्यशाली समझिए। मार्च 2026 में  भारत की पहली फायरफ्लाई यानी जुगनू चेकलिस्ट में जुगनुओं की 92 प्रजातियों का दस्तावेज तैयार किया गया है जिसमें से 61 प्रतिशत प्रजातियां भारत में ही पाई जाती हैं। जिस जगह जुगनू चमक रहे हों, तो माना जाता है कि उस स्थान का वातावरण हेल्दी है। प्रदूषण और प्रजनन दर में आई गिरावट ने जुगनुओं के सामने संकट पैदा कर दिया है। कभी वह भी जमाना था कि जब बच्चे जुगनुओं को मुट्ठी में कैद करके खिलखिलाते थे, मानो उन्होंने उजाले को कैद कर लिया हो। 

अंधेरी रात में यहां-वहां उड़ते-बैठे जुगनू इस बात का एहसास कराते थे कि अभी अंधेरा पूरी तरह हावी नहीं हुआ है। छोटी सी ही सही, उजाले की एक किरण अभी अंधेरे से अपनी पूरी ताकत से जूझ रही है। जुगनू का प्रयास भले ही छोटा हो, लेकिन जिस शिद्दत और जिजीविषा के साथ वह अंधेरे के खिलाफ मोर्चा लेते हैं, वह इंसानों में साहस जगाने के लिए काफी है। जुगनू आकार में बहुत छोटे होते हैं। न उनके पास सूरज जैसी ताकत है, न चांद जैसी चमक। फिर भी घनी काली रात में वे टिमटिमाकर अपना रास्ता खुद भी बनाते हैं और दूसरों को भी अपना रास्ता खुद तय करना सिखाते हैं। उनकी यही सबसे बड़ी उपयोगिता है मानव समाज के लिए। इंसान के सामने आ खड़ी हुई परेशानी के समय सबसे खतरनाक चीज निराशा है। निराशा आदमी को अंदर से तोड़ देती है। जुगनू हमें यही सिखाते हैं कि उजाला बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। 

एक छोटी सी पहल, एक अच्छा शब्द, एक मदद का हाथ भी किसी की रात बदल सकता है। अंधकार स्थायी नहीं होता। परेशानी भी हमेशा नहीं रहती। जरूरत है उस टिमटिमाहट को पहचानने की और उसे बुझने न देने की। क्योंकि एक जुगनू से दूसरे जुगनू तक रोशनी पहुंचती है और फिर वही रोशनी मिलकर सुबह बना देती है। इसलिए जब भी जीवन में रात बहुत लंबी लगे, तो याद रखिए। उम्मीद खत्म नहीं हुई है। कहीं न कहीं कोई जुगनू अभी भी टिमटिमा रहा है। बस उसे देखना है और खुद भी एक जुगनू बनना है।

Sunday, July 12, 2026

किसान और कुएं में गिरा गधा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संकट के समय यदि धैर्य रखा जाए, तो बड़ी से बड़ी समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। जो लोग संकट के समय अपना धैर्य खो देते हैं, वह परेशानी से निजात नहीं पा सकते हैं। धैर्य रखने वाला व्यक्ति हमेशा अपने काम में सफल होता है। बहुत पुराने समय की बात है। किसी गांव में एक किसान रहता था। उसने कई जानवरों के साथ-साथ एक गधा पाल रखा था। 

गधा काफी उम्र का हो गया था। अब किसान ने उससे काम लेना भी लगभग बंद कर दिया था। एक दिन जब गधा चरने गया, तो वह एक सूखे कुएं में गिर गया। गधा कुएं से निकलने का प्रयास करने लगा, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। उधर जब नियत समय पर गधा घर नहीं लौटा, तो किसान उसे खोजने निकला। खोजते-खोजते वह उस कुएं के पास पहुंचा, तो उसे कुएं में से गधे के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। 

कुएं को देखते ही किसान समझ गया कि इसमें से गधे को निकालने का प्रयास करना व्यर्थ है क्योंकि इतने गहरे कुएं से गधे का निकल पाना असंभव है। किसान ने यह भी सोचा कि गधा तो काफी बूढ़ा हो गया है। अब वह मेरे किसी काम का भी नहीं रह गया। इसलिए इसको निकालने की कोशिश करना बेकार है। यही सोचकर उसने गांववालों को बुलाया और कुएं को पाट देने की बात कही। 

लोगों ने कुएं में मिट्टी डालनी शुरू की। उधर कुएं में जैसी ही मिट्टी आती, गधा मिट्टी अपने शरीर से झाड़ देता। धीरे-धीरे गधा ऊपर आता चला गया। जब कुआं पूरी तरह पाट दिया गया, तो गधा उसमें से निकलकर जंगल की ओर चला गया। वह जान गया था कि किसान ने कुएं में मिट्टी उसे बचाने के लिए नहीं, बल्कि जिंदा दफन कर देने के लिए कुएं में मिट्टी डलवाई थी। गधे के जंगल चले जाने के बाद किसान को भी अपनी हरकत को लेकर पश्चाताप हुआ, लेकिन अब हो भी क्या सकता था।