Sunday, June 28, 2026

सुश्रुत ने की दुनिया में पहली प्लास्टिक सर्जरी

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि शल्य चिकित्सा के जनक सुश्रुत  थे। सुश्रुत  का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व कन्नौज में हुआ था। इनके गुरु धन्वंतरि थे। सुश्रुत के जन्म के समय को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कोई इन्हें ईसा पूर्व पहली शताब्दी का मानते हैं। एक बार की बात है। वह कहीं जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक हिरन घायल पड़ा हुआ है। 

उन्होंने उस हिरन के घाव पर औषधियों का लेप लगाया और उसकी देखभाल की। जब हिरन ठीक हो गया, तो उसे जंगल में छोड़ दिया। तभी उनके मन में आया कि जब औषधियों से जानवरों को ठीक किया जा सकता है, तो इंसानों की बीमारियों को क्यों नहीं ठीक किया जा सकता है। 

उन्होंने अपने गुरु प्रसिद्ध चिकित्सक धन्वंतरि से इस बारे में बात की, तो धन्वंतरि ने कहा कि बेटा! चिकित्सा केवल एक काम नहीं है, यह दुखी इंसानों को आराम पहुंचाने का महान कार्य है। उसी समय से उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में निपुणता हासिल करने के लिए शल्य क्रिया सीखने की कोशिश करनी शुरू कर दी। इसके लिए वह तरबूज, कद्दू और खीरा आदि पर चीरा लगाते और उसे सिलने की कोशिश करते। 

कई बार सिलाई अच्छी नहीं होती थी। लेकिन बार-बार प्रयास करने से वह धीरे-धीरे निपुण हो गए। काफी समय बाद एक दिन जब वह आराम कर रहे थे तो उनके दरवाजे पर एक घायल सैनिक आया। उसकी युद्ध में नाक कट गई थी। वह चिंतित था कि अब वह पहले जैसा नहीं दिखेगा। सुश्रत ने उसे धीर बंधाया। उन्होंने चेहरे की त्वचा से नई नाक बनाई और उसकी कटी नाक पर लगा दी। धीरे-धीरे सैनिक स्वस्थ हो गया। यह शायद दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी थी। इस घटना के बाद सुश्रुत अमर हो गए?

बिजली कट से लोग परेशान उद्योगों को हो रहा नुकसान

अशोक मिश्र

प्री मानसून बरसात नहीं होने की वजह से हरियाणा में गर्मी कम नहीं हो रही है। पूरे राज्य में पारा लगभग 40 के आसपास ही बना हुआ है। न्यूनतम तापमान भी 26 डिग्री के आसपास ही दर्ज किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में गर्मी और उमस बढ़ती जा रही है। गर्मी की वजह से होने वाली बीमारियों के चलते अस्पतालों में मरीजों की भरमार है। उल्टी, दस्त, पेट दर्द और कई प्रकार के संक्रामक रोगों के शिकार मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। ऐसी स्थिति बार-बार लगने वाले कट से मरीज ही नहीं, आम लोग भी काफी परेशानी झेल रहे हैं। 

अघोषित कट की वजह से जहां लोगों को परेशानी हो रही है, वहीं उद्योग-धंधों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। हरियाणा में बिजली की मांग हर साल नई ऊंचाई छू रही है। हरियाणा पावर परचेज सेंटर (एचपीपीसी) के अनुसार 2026-27 की गर्मी में पीक डिमांड 16,454 मेगावाट तक पहुंच सकती है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण का अनुमान भी 16,337 मेगावाट है।  पिछले साल 2025 की गर्मी में अधिकतम मांग 15,300 मेगावाट थी। यानी एक साल में 1,150 मेगावाट से ज्यादा का उछाल आया है। राज्य में  जैसे जैसे बिजली खपत बढ़ रही है, वैसे-वैसे उपलब्धाता भी काफी तेजी से बढ़ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य के पास ताप-विद्युत (थर्मल), गैस और नवीकरणीय ऊर्जा को मिलाकर 16,552 मेगावाट से ज्यादा की बिजली उपलब्ध है। 

इसका लक्ष्य 9,929 मेगावाट परंपरागत और 6,622 मेगावाट नवीकरणीय यानी हाइड्रो, सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोत हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि सन 2030 तक अधिकतम मांग 19,481 मेगावाट तक पहुंच जाएगी। सरकार के मुताबिक राज्य के पास कुल मिलाकर पर्याप्त बिजली उपलब्ध है, लेकिन मई-जून जैसी भीषण गर्मियों में कुछ उच्च खपत वाले दिनों में पीक डिमांड और ऊर्जा की कमी भी देखी गई। सरकार उपलब्धता बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रही है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने फतेहाबाद में परमाणु ऊर्जा परियोजना और भी कई थर्मल विस्तार परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। 

इसके बावजूद शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में बार-बार लगने वाले अघोषित बिजली कट  सारी हकीकत बयान कर देते हैं। पंद्रह जून की मियाद खत्म होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने धान की फसल बोनी शुरू कर दी है। फसल की सिंचाई के लिए पानी चाहिए। इसके लिए ट्यूबवेल चलाना पड़ेगा। बिजली न आने से सिंचाई प्रभावित हो रही है। हालांकि यह भी सही है कि प्रचंड गर्मी के चलते ट्रांसफार्मर आदि जल्दी गर्म हो जाते हैं और उनमें आग लगने की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। इसके बावजूद लगने वाले बिजली कट से उद्योगों को भी भारी नुकसान हो रहा है। मशीनें बंद रहने से जहां उत्पादन प्रभावित होता है, वहीं कामगार भी खाली बैठे रहते हैं।

चल हट नासपीटे!

-अशोक मिश्र
जेठ की भरी दुपहरिया में पैदल डग भरते हुए रामभूल उपाध्याय कार्यालय की ओर चले जा रहे थे। उनका पूरा शरीर स्वेदयुक्त होकर चिपचिपायमान हो रहा था। आधी दूरी तय करने के बाद उनकी हिम्मत जवाब दे गई, तो वे नीम के एक पेड़ के नीचे खड़ा होकर सुस्ताने लगे। वायुदेव की कृपा से जैसे ही स्वेद बिंदु सूखे। उन्होंने काक प्रवृत्ति अख्तियार कर ली। उन्हें नीम वृक्ष से मात्र दस कदम की दूरी पर महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अमर काव्य कृति ‘वह तोड़ती पत्थर’ की नायिका के दर्शन हो गए। वह पत्थर तोड़ने की बजाय सड़क के किनारे बोरी बिछाकर धूप में बैठी सब्जियां बेच रही थी। श्याम वर्णी काया पर चमकती पसीने की बूंदें, पैरों की फटी बिवाइयां, अस्त व्यस्त केश, तंबाकू या गुटखा चबाने से चितकबरी हो गईं दंतावलियां मिलकर पीड़ा और करुणा का एक कोलाज रच रहे थे। रामभूल के मन में उसके प्रति सहानुभूति की विलुप्त सरस्वती अनायास बह निकली।
रामभूल सोचने लगा। अगर यह महिला सुबह-शाम महकउवा साबून से नहाए, बालों में बढ़िया क्वालिटी का शैंपू लगाए, तो इसकी काया कैसी निखर उठेगी। अगर गोरेपन की क्रीम भी सुबह, दोपहर, शाम और रात को नियमित रूप से लगाए, तो यह गोरी दिखाई देने लगेगी। विज्ञापन में तो हीरोइन क्रीम लगाने से पहले तो एकदम उल्टे तवे जैसी दिखती है। मगर क्रीम बनाने वालों का कमाल देखिए, इधर क्रीम हाथ, पैर और चेहरे पर पुता, उधर कालापन संघनित कोहरे की तरह गायब होने लगता है। पैंतीस-चालीस सेंकेड के विज्ञापन में जितनी गोरी होती हीरोइन को दिखाया जाता है, अगर उसका चालीस फीसदी यह सब्जी बेचने वाली गोरी हो जाए, तो इसके चेहरे की लुनाई और त्वचा की चिकनाई थोड़ा और निखर उठेगी। और अगर कहीं यह एलेवेरा-फेलोवेरा का जेल लगाकर सुबह-शाम मुंह धोए, कुछ तेल-फुलेल, इत्र-वित्र लगा ले, तो इसकी कंचनी काया के आकर्षण में ही ग्राहक सौ-पचास रुपये की सब्जी ज्यादा खरीद लेंगे।
रामभूल उपाध्याय आई टॉनिक लेने की गरज से सब्जी वाली के नजदीक गए और बोले, ’इधर पेड़ की छाया में क्यों नहीं लगा लेती अपनी दुकान?’ उसने उदासीन भाव से कहा, ’जिसके घर के सामने यह पेड़ है, उस घर की औरत वहां दुकान लगाने पर झगड़ा करती है।’ रामभूल ने शब्दों में शहद घोलते हुए कहा, ’तो फिर बांस-बल्ली लगाकर पन्नी-वन्नी क्यों नहीं तान लेती?’ रामभूल की बात सुनकर चेहरे पर रंचमात्र क्रोध का भाव झलका, ’पुलिस और नगर पालिका वाले बांस-बल्ली, छानी-छप्पर उजाड़ जाते हैं। सब्जियां छितरा देते हैं, नालियों में फेंक जाते है। उन्हें इकट्ठा कर धोती हूं और बेचती हूं।’
‘धूप में बैठने से देखो तुम्हारा शरीर काला पड़ गया है। कंडे की आंच में भुना हुआ भांटा लग रही हो।’ रामभूल ने उसकी श्याम वर्णी काया को निहारते हुए कहा, ‘अगर तुम अपने शरीर का ख्याल रखो। ब्यूटी पार्लर में जाकर पेडिक्योर, मेनिक्योर, आईब्रो सेटिंग करवा लो, फिर देखो, ग्राहकों की संख्या कैसे बढ़ती है।’ यह सुनकर उसने अपने अस्त व्यस्त कपड़ों को संभाला और गुर्राती हुई बोली-‘चल हट नासपीटे! तुम जैसों को रोज धनिये के साथ फ्री बेच लेती हूं। बड़ा आया सहानुभूति जाने वाला।’ यह सुनते ही रामभूल ने चुपचाप खिसक लेने में ही भलाई समझी।
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Saturday, June 27, 2026

रंगभेद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के ही समानरंगभेद  और मानवाधिकार के समर्थन में काम करने वाले डेसमंड एमपिलो टूटू को उनके कार्यों के लिए नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था।  वह दक्षिण अफ्रीका के एक एंग्लिकन बिशप और धर्मशास्त्री थे। टुटू का जन्म दक्षिण अफ्रीका के क्लर्कडॉर्प में एक गरीब परिवार में हुआ था, जहाँ उनकी मिश्रित खोसा और मोत्स्वाना वंश की वंशावली थी। 

वयस्क होने पर उन्होंने शिक्षक के रूप में प्रशिक्षण लिया और नोमालिजो लेआ शेनक्सेन से विवाह किया जिनसे उनके कई बच्चे हुए। 1962 में वे किंग्स कॉलेज लंदन में धर्मशास्त्र का अध्ययन करने के लिए यूनाइटेड किंगडम चले गए । 1966 में वे दक्षिणी अफ्रीका लौट आए। वह अपने पिता के काफी करीब थे, लेकिन उनके शराब पीने और अपनी पत्नी से मारपीट करने की आदत से वह अपने पिता से नाराज भी रहते थे। 

उन दिनों अफ्रीका में रंगभेद चरम पर था। गोरे लोग अश्वेतों के साथ बुरा व्यवहार करते थे। एक बार की बात है। वह बचपन में अपने पिता के साथ कहीं जा रहे थे।  तभी उन्होंने देखा कि सामने से एक श्वेत पादरी ट्रेवर हडलस्टन चले आ रहे हैं। डेसमंड ने देखा कि उनके पिता को देखते ही पादरी ने अपनी टोपी उतारी और अभिवादन किया। यह एक तरह से दक्षिण अफ्रीका में आश्चर्य की बात है। 

डेसमंड ने अपने पिता से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति सभी मनुष्य को समान समझता है। रंग के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करता है। बस,यहीं से डेसमंड में रंगभेद की भावना के खिालाफ लड़ने की प्रेरणा मिली। उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़कर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति को खत्म कराया।

क्षणिक आवेश में होने वाले अपराध पर कैसे लगे अंकुश?

अशोक मिश्र

नेहा कुमारी का अपराध केवल इतना था कि उसने अपने पति अमित को ड्यूटी पर जाने को कहा था। अमित उस दिन ड्यूटी पर नहीं जाना चाहता था। बस, इसी बात पर अमित ने छह महीने की गर्भवती अपनी पत्नी की हत्या कर दी। पहले उसने चुन्नी से नेहा का गला दबाया। उसके बाद पानी से भरी बाल्टी में उसका मुंह दबाकर मार डाला। बिहार के मुजफ्फरनगर की रहने वाली नेहा एक महीने पहले अपने पति के साथ फरीदाबाद के पल्ला थाना क्षेत्र स्थित पंचशील कालोनी में रहने आई थी। 

पत्नी की हत्या का आरोपी अमित फरार है। आज नहीं तो कल अमित गिरफ्तार किया जाएगा। उस पर अपनी पत्नी और गर्भस्थ शिशु की हत्या का मुकदमा चलेगा। भले ही हत्या का आरोपी अमित और मारी गई नेहा बिहार के मूल निवासी रहे हों, लेकिन हरियाणा में भी इस तरह की हत्याएं होती रहती हैं। यह किसी एक प्रांत या जिले की कहानी नहीं है। लगभग पूरे देश में ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। अक्सर देखा गया है कि मानसिक दबाव, अहंकार, शराब की लत और घरेलू विवाद के चलते पुरुष अपनी पत्नी की हत्या कर बैठते हैं। 

इस तरह की घटनाओं में होता यह है कि कई बार पति का इरादा पत्नी की हत्या करने का नहीं होता है, लेकिन वह उत्तेजना में आकर हत्या कर बैठता है। वह अनचाहे ऐसी जगह पर वार कर बैठता है जिससे पत्नी की मौत हो जाती है। कई बार पति अपनी पत्नी के किरदार पर शक करते हैं और इस शक में आकर हत्या जैसा कदम उठाते हैं। कई बार तो बात इससे उलट भी होती है। पत्नी को अपने पति के चरित्र पर शक होता है या उसे प्रमाण मिल जाता है, तो अपनी पत्नी से छुटकारा पाने के लिए वह हत्या जैसा कुकृत्य कर बैठता है। 

हरियाणा में घरेलू हिंसा व्यवस्थित और दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति का हिस्सा है। शराब या दूसरे किस्म के नशे आदी लोग पत्नी के विरोध करने पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मारपीट के साथ-साथ हत्या जैसी घटनाएं भी घटित हो जाती हैं। एक आंकड़े के अनुसार, प्रदेश में लगभाग 37 प्रतिशत महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें से शायद ही कोई महिला घरेलू हिंसा रोकने के लिए कदम उठाती हो। वह इसे भाग्य का लिखा या नियति मानकर चुपचाप सहती रहती है।

 नीति आयोग की सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू हिंसा के कारण महिलाएं आत्महत्या या अचानक हुए हमलों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शिकार होती हैं। हरियाणा सरकार ने पिछले पांच-छह साल में कन्या भ्रूण हत्या रोककर यह साबित कर दिया है कि कानून से बदलाव लाया जा सकता है। अब जरूरत यह है कि स्त्री के खिलाफ किसी भी प्रकार का अपराध होने पर आरोपी को सख्त से सख्त सजा दी जाए।

Friday, June 26, 2026

फुटबाल के सितारे तुलसीदास बलराम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तुलसीदास बलराम को भारतीय फुटबॉल को स्वर्ण युग में लाने का श्रेय दिया जाता है। बलराम का जन्म 4 अक्टूबर, 1936 को ब्रिटिश-अधिकृत हैदराबाद के सिकंदराबाद के पास अम्मुगुडा गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। गरीबी के बावजूद बचपन से ही उन्हें फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था। तमाम परेशानियों के बावजूद बलराम ने लल्लागुडा वर्कशॉप ग्राउंड में फुटबॉल खेलना शुरू किया। 

उन्होंने शुरुआती दौर से ही हैदराबादी शैली के वन-टच फुटबॉल का अभ्यास किया। सिकंदराबाद लीग में सिविलियंस और आर्मी इलेवन के बीच हुए एक मैच के दौरान उन्हें पहचान मिली। उस समय उनके परिवार की हालत यह थी कि फुटबॉल मैच खेलने के लिए उनके पास जूते नहीं थे। बिना जूतों के फुटबॉल मैच खेलना लगभग असंभव था। आखिरकार बहुत सोच-समझकर वह सिकंदराबाद के ही एक जूते बनाने वाले के पास पहुंचे। 

उन्होंने जूते बनाने वाले को अपनी सारी स्थिति बताई। उससे कहा कि यदि उसे जूते नहीं मिले, तो वह टूर्नामेंट नहीं खेल पाएगा। उससे कोई पुराना जूता देने की विनती की। जूता बनाने वाले ने कहा कि उसके पास कोई पुराना जूता नहीं है। अगर वह कहीं से पुलिस का पुराना जूता ले आए, तो वह उसे पहनने लायक बना देगा। काफी प्रयास के बाद उसकी मुलाकात एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी से हुई। 

उसकी व्यथा-कथा सुनकर पुलिसकर्मी ने अपना पुराना जूता दिया। मरम्मत करने वाले ने दो रुपये में जूता ठीक कर दिया। उस टूर्नामेंट में बलराम ने गोल पर गोल मारकर सबको हैरान कर दिया। बाद में प्रसिद्ध कोच सैयद अब्दुल के मार्गदर्शन में वह 1956 में संतोष ट्राफी और मेलबर्न ओलंपिक तक पहुंचा। बलराम ने भारत के लिए कुल 33 मैच खेले और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 12 गोल किए।  बलराम का निधन 16 फरवरी 2023 को 86 वर्ष की आयु में हुआ।

खुले में बचा-खुचा खाना फेंकने वालों पर लगे भारी भरकम जुर्माना

अशोक मिश्र

घर के बाहर अगर किसी महिला का बच्चा खेल रहा है, तो उसे हर समय यही डर बना रहता है कि उसका बच्चा सुरक्षित है या नहीं। हरियाणा के किसी भी जिले में सुबह सड़कों पर टहलना, बच्चों का पार्कों में खेलना, अकेले कहीं आना जाना दुश्वार हो रहा है। हर मां को यही डर सताता रहता है कि घर से बाहर निकले उसके बच्चों को कहीं कुत्ता काट न ले। फरीदाबाद हो या गुरुग्राम, सोनीपत हो या कुरुक्षेत्र, सब जगह एक जैसे हालात हैं। पिछले पांच साल में कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। 

कुत्ते के काटने पर जब घायल व्यक्ति सरकारी अस्पताल पहुंचता है, तो उसे एक लंबी लाइन मिलती है। निजी अस्पतालों में एंटी रैबीज का इंजेक्शन पांच हजार से कम में नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में गरीब आदमी के लिए पांच हजार रुपये खर्च कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। फिर भी किसी तरह गरीब आदमी इंजेक्शन के लिए पैसे का जुगाड़ करता है। पशुपालन विभाग द्वारा 2019 से 2023 तक किए गए एक अध्ययन के अनुसार, राज्य में आवारा कुत्तों की संख्या लगभग 1.8 मिलियन होने का अनुमान है। 

एक अनुमान के मुताबिक, पूरे हरियाणा में प्रतिवर्ष 1.43 लाख से अधिक कुत्ते के काटने के मामले होते हैं, लेकिन इनमें से सरकारी रजिस्टर पर काफी कम ही दर्ज हो पाते हैं। इसलिए वास्तविक आंकड़ों का पता ही नहीं चल पाता है। बहुत सारे लोग कुत्ते के काटने पर झाड़-फूंक में लग जाते हैं या फिर निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं।  प्रदेश में नगर निगम की एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल योजना केवल कागजों पर ही चल रही है। सन 2023 में फरीदाबाद नगर निगम ने दावा किया था कि जिले में 15 हजार कुत्तों की नसबंदी की गई थी। 

अभी हाल में ही दावा किया गया कि इस वर्ष लगभग सात हजार कुत्तों की नसबंदी की गई है। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि हर गली में हर महीने कई पिल्ले पैदा हो रहे हैं। कुत्तों का सबसे बड़ा अड्डा कूड़े का ढेर होता है। लोग, होटल या ढाबा चलाने वाले लोग अपने घर और रेस्टोरेंट का बचा हुआ कचरा, सड़ी रोटियां, मांस के टुकड़े आदि कूड़े के ढेर पर फेंक देते हैं। 

नगर निगम नियमित रूप से कूड़ा कचरा नहीं उठाता है जिसकी वजह  से कूड़े के ढेर के आसपास कुत्तों के झुंड जमा हो जाते हैं। उधर से गुजरने वाले लोगों पर कुत्तों का झुंड हमला करता है। बहुत सारे लोग डाग लवर होने का दम भरते हैं। घर से ही बचा खुचा खाना सड़क पर डाल देते हैं। जब इनके द्वारा पाले गए कुत्ते किसी को काट लेते है, तो यही डाग लवर यह कहकर अपनी जान छुड़ा लेते हैं कि इन लोगों ने कुत्ते को उकसाया होगा। उसको पत्थर मारा होगा। ऐसे लोगों से यही अपील की जा सकती है कि यदि कुत्तों से प्यार है तो सड़क पर नहीं, तय जगह खिलाओ। खुले में खाना फेंकने वालों पर भारी भरकम जुर्माना लगना चाहिए। 

Wednesday, June 24, 2026

एक दीपक से जले सैकड़ों दीपक

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया में जितने भी बदलाव हुए हैं, उनकी शुरुआत एक छोटे से कदम से ही हुई है। किसी भी देश, समाज में जब भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है, तो उसके पीछे किसी व्यक्ति का छोटा सा प्रयास ही रहा होगा। इसके बाद उस व्यक्ति के साथ लोग जुड़ते गए होंगे और समाज, देश में बहुत भारी परिवर्तन आया होगा। यह बात ध्रुव सत्य है। बदलाव की प्रक्रिया किसी एक से शुरू होती है और वह पूरे समाज को प्रभावित करती है। 

इस संबध में एक बहुत ही रोचक प्रसंग है। किसी गांव में एक बुजुर्ग रहता था। वह घोर आशावादी था। निराशा के क्षणों में भी वह आशा का दामन नहीं छोड़ता था। वह शाम होने पर अपने घर के दरवाजे पर रोज एक दीपक जलाता था। लोग उसको पागल समझते थे। बुजुर्ग दीपक जलाने के बाद उसे देखता रहता था, जब तक दीपक बुझ नहीं जाता था। 

एक दिन एक युवक से रहा नहीं गया और वह बुजुर्ग के पास पहुंचकर उससे बोला, बाबा! केवल एक दीपक जलाने से क्या होगा? पूरे गांव में तो रोशनी नहीं हो जाएगी। बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा कि अंधेरा खत्म करना मेरा काम नहीं है। दीपक जलाने से कम से कम कहीं तो उजाला है। 

एक दिन गांव में बहुत तेज आंधी आई। लोगों ने देखा कि बुजुर्ग का दीपक तेज आंधी में भी जल रहा है। युवक फिर बुजुर्ग के पास गया और पूछा, बाबा! आपका दीपक कैसे जल रहा है? बुजुर्ग ने कहा कि मैंने अपने दोनों हाथों से दीपक को बुझने से बचाया था।  युवक ने कहा कि बाबा, इस एक दीपक से पूरी दुनिया का अंधेरा दूर नहीं हो सकता। 

बुजुर्ग ने कहा कि मेरे मन में तो अंधेरा नहीं है। इससे प्रभावित होकर युवक ने भी दीपक जलाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते कुछ दिनों में सभी गांव वालों ने दीपक जलाना शुरू कर दिया। कल तक जो गांव अंधेरे में डूबा रहता था, आज वह दीपकों की रोशनी से जगमगा रहा था।

किसी हादसे का इंतजार न करें बचाव की कर लें पूरी तैयारियां


 अशोक मिश्र

गरमी के दिनों में आगजनी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। मार्च से लेकर जून तक देश में कई बड़े हादसे हो चुके हैं। सोमवार को ही लखनऊ के अलीगंज इलाके में स्थित कोचिंग संस्थान में लगी आग से 15 लोगों की जान चली गई। इनमें सबसे ज्यादा छात्र-छात्राएं थीं। डिजिटल लॉक डोर नहीं खुलने और चारों ओर धुआं भर जाने की वजह से इन स्टूडेंट का दम घुट गया और मौत हो गई। 

कुछ स्टूडेंट्स ने जान बचाने के लिए बाहर छलांग लगा दी। बुरी तरह घायल होकर अस्पताल में भर्ती हैं। इसी तरह 3 जून को सुबह दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में अवैध रूप से संचालित हो रहे फ्लोरिश होटल एवं गेस्ट हाउस में लगी आग में 21 लोगों की मौत हो गई। इनमें से ज्यादातर विदेशी नागरिक थे। गुरुग्राम के ही आठ लोगों की मौत हुई थी जो एक ही परिवार के थे। मई महीने में दिल्ली के विवेक विहार में कमरे में लगे एसी का कंप्रेशर फटने से लगी आग में नौ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। 

पिछले साल जुलाई 2025 में फरीदाबाद के सेक्टर-16 स्थित एक निजी कोचिंग सेंटर  में आग लगी थी। कोचिंग सेंटर में लगी आग का कारण शार्ट सर्किट बताया गया था। संतोष की बात यह है कि समय रहते आग बुझा ली गई और जनहानि नहीं हुई। मई 2025 में करनाल जिले के एक कोचिंग सेंटर में भी आग लगने की घटना हुई थी, लेकिन समय रहते आग पर काबू पा लिया गया था। कोचिंग सेंटर में जब आग लगी थी, तब पांच सौ स्टूडेंट वहां मौजूद थे। हरियाणा के प्रत्येक जिले में सैकड़ों कोचिंग संस्थान चलाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ द ज्ञानम, आईसीएस कोचिंग सेंटर, करियर पॉवर, राइस एकेडमी जैसे चर्चित संस्थान हैं। 

जिलों में वैध-अवैध रूप से संचालित होने वाले कोचिंग संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए हरियाणा सरकार ने 'हरियाणा रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन आॅफ प्राइवेट कोचिंग इंस्टिट्यूट्स बिल' लागू किया है। संस्थानों के लिए अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र और उचित वेंटिलेशन वाले बुनियादी ढांचे का होना अनिवार्य है। संस्थानों में फर्स्ट-आइड किट और आपातकालीन चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। परिसरों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाना और सुरक्षा गार्ड तैनात करना शामिल है। 

छात्रों की शिकायतों को सुनने और समाधान करने के लिए एक आंतरिक शिकायत निवारण समिति का गठन की बात भी कही गई। पूरे राज्य में हजारों संख्या में संचालित वैध-अवैध कोचिंग संस्थान नियमों का कितना पालन करते हैं, यह जांच का विषय है। कई जिलों में तो कोचिंग संस्थान ऐसी जगहों पर संचालित हो रहे हैं, जब पर आपदा आने पर फायर ब्रिगेड या पुलिस की गाड़ियों का पहुंच पाना असंभव है। कोचिंग संस्थानों में आपदा के समय निकलने के लिए दूसरा रास्ता भी नहीं है। ऐसे संस्थानों में कोई भी हादसा हो सकता है।

Tuesday, June 23, 2026

संन्यासी मार्टिन लूथर ने दिया अहिंसा का संदेश

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर किसी ने कोई पाप किया है, उसके पापों के परिणाम से छुटकारा पोप या चर्च नहीं दे सकते हैं। दुनिया में अगर किसी के पापों के लिए कोई माफी या सजा दे सकता है, तो वह ईसा ही पाप मुक्ति दे हैं। जर्मन संन्यासी, पादरी और धर्म प्रचारक मार्टिन लूथर ने खुलेआम पोप की आलोचना करते हुए यह बात कही थी। संन्यासी मार्टिन लूथर का जन्म  1483 को जर्मनी में हुआ था। 

उनके पिता हैंस लूथर एक खदान में मजदूर थे। हैंस लूथर के आठ बच्चे थे जिसमें मार्टिन दूसरे थे। उन्होंने चर्च के पादरियों के अविवाहित रहने का भी विरोध किया। और सन 1524 ई. में उन्होंने कैथरिन बोरा से विवाह किया। तब तक रोम सन 1520 में लूथर का कैथोलिक चर्च से बहिष्कार की घोषणा कर चुका था। इस बहिष्कार के बाद ही वह एक नए संप्रदाय का नेतृत्व करने लगे थे। 

इससे जर्मनी के लोग उनसे काफी नाराज रहते थे। वह जहां भी जाते उनका विरोध किया जाता था। एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। उनकी धर्म की नई व्याख्या से नाराज लोगों ने उन पर और उनके शिष्यों का विरोध किया। इस दौरान उन पर पत्थर भी फेंके गए। वह लोग जहां भी जाते थे, लोग उनका विरोध करने के लिए आ खड़े होते थे। 

इससे परेशान एक शिष्य ने लूथर से कहा कि इन लोगों को इनकी ही भाषा में जवाब देना चाहिए। संत लूथर ने कहा कि यदि हम भी उनके जैसा ही व्यवहार करने लगे, तो फिर उनमें और हम में क्या फर्क रह जाएगा। वे हमसे नाराज हैं। हम अपने प्रेम, सद्भाव और सहिष्णुता से ही उनके क्रोध को कम या समाप्त कर सकते हैं। यह सुनकर शिष्यों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने हिंसा न करने का संकल्प लिया।