Tuesday, May 12, 2026

मौत का सौदागर अल्फ्रेड नोबेल मर गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डायनामाइट के आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल की आम जनता में मौत का सौदागर के नाम से ख्याति थी। स्वीडन में 21 अक्टूबर 1833 को पैदा हुए अल्फ्रेड नोबेल एक उद्योगपति, रसायनज्ञ और वैज्ञानिक थे। अपने माता-पिता की आठ संतानों में वह और उनके दो भाई ही जीवित बच पाए थे। 

वह कठिन परिस्थितियों में अपनी शिक्षा पूरी कर पाने में सफल हुए थे। नोबेल ने स्वीडिश, फ्रेंच, रूसी, अंग्रेजी, जर्मन और इतालवी भाषाओं में दक्षता हासिल कर ली थी। वह अंग्रेजी में कविताएं भी लिखते थे। ​​एक बार की बात है। जब डायनामाइट का आविष्कार करने के बाद अल्फ्रेड नोबेल काफी बड़े उद्योगपति बन गए। उन्हीं दिनों उनके भाई लुडविग नोबेल की मृत्यु हो गई। 

मृत्यु का समाचार सुनकर लोगों ने शोक व्यक्त करने के लिए आना शुरू किया। मगर वह रोज की तरह अपनी बालकनी में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर एक हेडिंग पर पड़ी। लिखा था-मौत के सौदागर, डायनामाइट के आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल का निधन। अखबार के रिपोर्टर ने लुडविग की जगह अल्फ्रेड की मौत का समाचार लिखकर भेजा था जिसे संपादक ने प्रकाशित कर दिया था। 

खबर में सारी बातें लिखी थीं, बस मरने वाले का नाम ही गलत था। यह समाचार पढ़ने के बाद नोबेल सोचने लगे कि मौत के बाद मैं मौत का सौदागर नाम से पहचाना जाऊंगा। इस खबर का उन पर प्रभाव यह हुआ कि उन्होंने उस दिन से लोगों की समस्याओं का निदान करना शुरू कर दिया। 

उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति एक ट्रस्ट बनाकर सौंप दी। उसी ट्रस्ट ने नोबेल की मौत के पांच साल बाद भौतिक, रसायन, शांति, चिकित्सा और साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार देना शुरू किया।

चोरी छिपे पेड़ कटते रहेंगे तो कैसे हरियाणा में बढ़ेगा वनक्षेत्र

अशोक मिश्र

दुनिया भर की सरकारें, प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद चीख-चीख कर लोगों को सचेत कर रहे हैं कि प्रकृति में कार्बन डाई आक्साइड गैस का उत्सर्जन रोको। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जितना कम होगा, पर्यावरण संतुलन बरकरार रहेगा। जीवाश्म ईंधन का उपयोग तो बिल्कुल बंद करना होगा। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि हर क्षेत्र में लगभग बीस प्रतिशत क्षेत्रफल हराभरा हो यानी पेड़-पौधों की बहुलता हो। यही वजह है कि भारत में हर साल जून और जुलाई महीने में पौधरोपण कार्यक्रम चलाया जाता है। 

स्कूली बच्चों से लेकर सरकारी संस्थाएं पौधरोपण कार्यक्रम में भाग लेते हैं। बच्चों को हर साल रटवाया जाता है कि पौधरोपण करो, पर्यावरण बचाओ। हरियाणा भी पौधरोपण के मामले में किसी भी दूसरे राज्य से पीछे नहीं है। राज्य में हर साल करोड़ों पौधे रोपे जाते हैं। यदि इस हिसाब से देखा जाए, तो पिछले एक दशक में जितने पौधे रोपे गए हैं, उसके बाद तो प्रदेश में जंगल ही जंगल होने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं है। बल्कि कुछ रिपोर्ट तो बताती हैं कि राज्य का वन क्षेत्र घटता जा रहा है। 

इसका कारण यह माना जा सकता है कि पौधरोपण अभियान तो चलाए गए, लेकिन पौधों को रोपने के बाद उनकी देखभाल नहीं की गई। इसकी वजह से पौधे या तो सूख गए या फिर उन्हें जानवर चर गए। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ संस्थाओं ने पौधरोपण के आंकड़े ही गलत दिए हों। वन क्षेत्र ने बढ़ने का कारण यह भी है कि राज्य में जितने वन क्षेत्र हैं उनमें पेड़ों की कटाई अवैध तरीके से की जा रही है। यमुनानगर स्थित कलेसर के जंगल में खैर के 3253 पेड़ काट दिए गए। 

अखबारों में रिपोर्ट छपने के बाद वन विभाग की नींद खुली। पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव विभाग ने मामले की जांच की तो कलेसर जंगल में 1473 पेड़ों के ठूंठ नए पाए गए। इसका मतलब यह है कि यह पेड़ हाल ही में काटे गए हैं। जांच में 1780 ठूंठ पुराने मिले हैं यानी इतने सारे पेड़ बहुत पहले ही काटे गए थे। पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव विभाग ने अपनी जांच रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच और आवश्यक कार्रवाई करने की सिफारिश की है। 

अवैध पेड़ कटान के मामले में कई बार संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है। संबंधित विभाग ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन देता है। ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच के बाद कार्रवाई भी की जाती है, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से अवैध कटान शुरू हो जाती है। ऐसी स्थिति में यही किया जा सकता है कि पेड़ों की अवैध कटान को लेकर लोगों को जागरूक किया जाए। अधिक से अधिक पौधों को रोपने के बाद उनकी सुरक्षा की जाए। जब तक लोग जागरूक नहीं होंगे, राज्य में बीस प्रतिशत वन क्षेत्र का सपना अधूरा ही रहेगा।

Monday, May 11, 2026

बेहतर है, जमीन उसे वापस कर दो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बिहार के सीवान जिले में कायस्थ परिवार में जन्मे डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। इनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी दोनों भाषाओं के विद्वान थे। इनकी मां कमलेश्वरी देवी ने हमेशा गरीबों की मदद करने, एक आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा दी। हालांकि राजेंद्र बाबू को अपनी मां का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं मिला। 

मां की मौत के बाद इनका पालन पोषण बड़ी बहन ने किया। डॉ. राजेंद्र बाबू बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। सन 1905 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से राजेंद्र बाबू ने प्रथम श्रेणी की डिग्री हासिल की। राजेंद्र बाबू कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, कुशल अधिवक्ता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। 

बात उन दिनों की है, जब वह वकालत कर रहे थे। बचपन में मां से मिली शिक्षा और बड़ी बहन के पालन-पोषण का प्रभाव यह हुआ कि वकालत के दिनों में भी उन्होंने गरीबों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया। वह गरीबों और असहायों का मुकदमा कई बार मुफ्त लड़े थे और जीत भी दिलाई थी। एक दिन एक व्यक्ति राजेंद्र बाबू के किसी परिचित का पत्र लेकर उनसे मिला और उनसे मुकदमा लड़ने की गुजारिश की। 

राजेंद्र बाबू ने उससे कागजात मांगे जिसको पढ़ने के बाद पता चला कि वह आदमी जिस जमीन का मुकदमा लड़ने के लिए उसके पास आया है, किसी विधवा का है। राजेंद्र बाबू ने उस व्यक्ति से कहा कि तुमने कागजात तो बहुत चतुराई से बनवाया है। तुम मुकदमा जीत भी सकते हो, लेकिन अच्छा होगा कि उस विधवा को उसकी जमीन वापस कर दो। वह जमीन ही उसकी जीविका का आधार है। यह सुनकर उस व्यक्ति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। उसने विधवा की जमीन उसे वापस कर दी।

रिश्तों की मर्यादा का दिनोंदिन होता क्षरण चिंता का विषय

अशोक मिश्र

दुनिया का कोई भी समाज हो, रिश्तों की मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी हमेशा उस समाज के लोगों की रही है। हर रिश्ते की अपनी मर्यादा और सीमाएं होती हैं। समाज में रिश्तों की जरूरत इसलिए पड़ी ताकि विभिन्न प्रकार के संबंधों की एक गरिमा, मर्यादा और सीमाएं तय की जा सकें। जिस तरह का व्यवहार व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ कर सकता है, वैसा व्यवहार वह किसी दूसरे रिश्ते की महिला के साथ नहीं कर सकता है। 

मां, बहन, पत्नी, बेटी, मौसी, बुआ, साली, सलहज जैसे रिश्तों का मार्धुय बनाए रखने के लिए कुछ सीमाएं समाज ने तय कर रखी हैं। वर्तमान समाज में इन रिश्तों की मर्यादा का उल्लंघन करने वाला समाज में निंदा का पात्र ही नहीं होता है, बल्कि कानून भी अपराध की प्रकृति के अनुसार सजा देता है। समाज ने जीजा और साली या सलहज के बीच शिष्ट हास्य की इजाजत तो दी है, लेकिन उसे भी एक निश्चित दायरे में बांध कर रख दिया है ताकि समाज में एक संतुलन बना रहे। 

फरीदाबाद के बल्लभगढ़ निवासी एक किशोरी उत्तर प्रदेश के कासना थाना क्षेत्र में रहने वाले जीजा के घर कुछ दिनों तक रहने के लिए गई थी। जब वह नाबालिग थी, तो उसके जीजा ने अपनी साली के साथ दुष्कर्म किया। जीजा ने दुष्कर्म करते समय उसकी वीडियो बना ली। उस अश्लील वीडियो के आधार पर वह नाबालिग साली से दुष्कर्म करता रहा। जब उसकी साली की शादी हो गई, तो उसने दुष्कर्म की वीडियो साली के पति को भेजकर शादी तुड़वा दी। पीड़िता के माता-पिता ने किसी तरह उसकी सगाई दूसरी जगह तय की, तो जीजा ने फिर सगाई तुड़वा दी। 

अब पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। निकट संबंधों में दुष्कर्म या अवैध संबंधों के बारे में समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर खबरें आए दिन आती रहती हैं। इन खबरों से पता चलता है कि लोगों ने सामाजिक मर्यादा और लोकलाज ताख पर रख दिया है। ऐसा नहीं है कि पहले ऐसे घृणित कार्य नहीं होते थे, लेकिन तब सूचनाओं का विस्फोट नहीं होता था और घटनाएं भी बहुत कम ही होती थीं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से यौन अपराध की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है। 

कहते हैं कि सबसे ज्यादा खतरा बच्चियों को निकट संबंधियों से ही होता है। जीजा, फूफा, चाचा, मामा जैसे संबंधी कब मौके का फायदा उठा जाएं, कहा नहीं जा सकता है। ऐसा नहीं है कि निकट संबंधियों पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन सतर्कजरूर रहना चाहिए। जब से समाज में एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है, तब से इस तरह की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चियां और महिलाएं अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित रहती थीं। एक ही घर में कई परिवार साथ रहते थे। 

सभी एक दूसरे के सुख-दुख में भागीदार होते थे। एक दूसरे के साथ संबंध प्रगाढ़ हुआ करते थे। ऐसी स्थिति में किसी बाहरी या निकट संबंधी की हिम्मत नहीं होती थी, महिला या बच्चा की अपमान करने की।

Sunday, May 10, 2026

भविष्य नहीं, वर्तमान के बारे में सोचो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रवींद्रनाथ टैगोर केवल प्रख्यात कवि ही नहीं, बल्कि चित्रकार, संगीतकार और दार्शनिक थे। उनके परिवार में संगीतकार और उपन्यासकार भी थे। रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 9 मई 1871 को जोड़ासाकों ठाकुरबाड़ी में हुआ था। उनकी दो रचनाएं भारत में जन गण मन और बांग्लादेश में आमार सोनार बांग्ला राष्ट्रगान बनीं। रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबल पुरस्कार भी हासिल हुआ था। 

एक बार की बात है। एक शिष्य टैगोर के पास आया। वह बहुत ही चिंतित दिख रहा था। टैगोर ने अपने शिष्य से कहा कि तुम बहुत चिंतित दिखाई देते हो? क्या परेशानी है? मुझे बताओ, शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं। शिष्य ने कहा कि हां, गुरुदेव! मैं सचमुच बहुत दुखी हूं। रात भर मुझे नींद नहीं आती है। 

चिंता की वजह से मेरा मन अशांत रहता है। समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? टैगोर ने कहा कि तुम बताओ, चिंतित क्यों हो? उस शिष्य ने कहा कि गुरुदेव, मेरे मन में हमेशा चिंतन-मनन चलता रहता है। कई बार मैं यह सोचकर परेशान हो जाता हूं कि जब इस संसार की समस्त आत्माओं को जीवन-मरण से छुटकारा मिल जाएगा, तब क्या होगा? यह पृथ्वी तो जीवन विहीन हो जाएगी? 

टैगोर ने उसकी बात को ध्यान से सुना और फिर बोले, यह संसार असीमित है। परिवर्तन इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है। एक दिन पृथ्वी जीवन रहित हो जाएगी, ऐसा सोचना अज्ञानता है। तुम्हारा सवाल भविष्य से जुड़ा है। भविष्य में कब किसके साथ क्या होगा? इसके विषय में कौन बता सकता है। लोग भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान बरबाद कर लते हैं। व्यक्ति को अपने वर्तमान के बारे में सोचना चाहिए। यह सुनकर शिष्य संतुष्ट होकर चला गया।

हरियाणा के इकोसिस्टम को बचाने के लिए अवैध खनन रोकना जरूरी

अशोक मिश्र

पहाड़ हो, नदी हो, खेत हो या खलिहान, खनन माफियाओं की नजर से कुछ भी नहीं बचा है। पिछले कई वर्षों से खनन माफिया अरावली पहाड़ियों का सीना छलनी कर रहे हैं। नदियों से रेत निकालकर मुनाफा कमा रहे हैं। खेत की मिट्टी तक चोरी करके बेच रहे हैं। इन पर रोक लगाने के कई प्रयास सरकार और कोर्ट कर चुकी है। लेकिन शासन-प्रशासन की सक्रियता से कुछ दिनों तक खनन माफिया चुप बैठ जाते हैं, उसके बाद उनका कारोबार फिर चालू हो जाता है। हरियाणा में अवैध खनन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। 

खनन माफिया मुख्य रूप से यमुनानगर, पलवल, मेवात और अरावली पहाड़ियों में सक्रिय हैं। एक आंकड़े के अनुसार, अप्रैल 2019 से अक्टूबर 2024 तक 10,676 से अधिक मामले दर्ज किए गए। अवैध खनन करने वालों से इन वर्षों में सरकार ने लगभग 345.74 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अवैध खनन में लगे वर्ष 2025 में 1,186 से अधिक वाहन जब्त किए गए। इसके बावजूद प्रदेश में अवैध खनन पर रोक नहीं लग पाई है। सच कहा जाए, तो अवैध खनन पर कोई भी सरकार या प्रशासन तब तक रोक नहीं लगा सकती है, जब तक शहर और ग्रामीण क्षेत्र के लोग जागरूक नहीं होंगे। 

सरकार चप्पे-चप्पे पर पहरा नहीं बिठा सकती है। अवैध खनन रोकने के लिए जरूरी है कि जिस क्षेत्र में अवैध खनन हो रहा है, उसकी जानकारी प्रशासन तक पहुंचाएं। यदि कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो वह शासन से संपर्क करें। सरकार उनकी शिकायत पर कार्रवाई जरूर करेगी। वैसे पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने भी पिछले दिनों आदेश दिया है कि प्रदेश की सभी खनन साइट्स की अनिवार्य रूप से हर वर्ष ड्रोन मैपिंग करवाई जाए, ताकि अवैध खनन की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सके। 

कोर्ट का यह भी कहना है कि केवल तकनीक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक रिकॉर्डिंग के जरिए ही खनन नियमों के उल्लंघन को सही ढंग से पकड़ा और रोका जा सकता है। हाई कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वह तुरंत आवश्यक आदेश जारी कर राज्य की सभी खनन साइट्स की वार्षिक ड्रोन मैपिंग सुनिश्चित करें। हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए पूरे राज्य के खनन क्षेत्रों का वैज्ञानिक डेटा जुटा सकता है। 

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि अवैध खनन के कारण राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को भारी नुकसान हो रहा है। प्रदेश में बाढ़ का खतरा बढ़ता जा रहा है। प्रदेश में हो रहे अवैध खनन से सरकारी खजाने को भी भारी नुकसान हो रहा है। हालात यह है कि अरावली के जंगलों में अनुमत सीमा (78 मीटर) से कहीं अधिक, 250 मीटर तक खुदाई की जा रही है। प्रदेश के इकोसिस्टम को बचाने के लिए प्रदेश में हो रहे अवैध खनन को रोकना बहुत जरूरी है।

Saturday, May 9, 2026

इक्कीस साल की उम्र में शहीद हो गईं प्रीतिलता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रीतिलता वाडेदार एक ऐसी छात्रा थीं जिन्हें मरने के 80 साल बाद दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्रदान की गई थी। कोलकाता विश्वविद्यालय के अंग्रेज अधिकारियों ने उत्तीर्ण होने के बावजूद उनकी डिग्री पर रोक लगा दी थी। प्रीतिलता का जन्म 5 मई 1911 को चटगांव (अब बांग्लादेश में) के एक गरीब परिवार में हुआ था। 

कालेज की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गई थीं। वह क्रांतिकारी सूर्य सेन और उनके साथी रामकृष्ण विश्वास से अकसर मिलने जाया करती थीं। वह उनके क्रांतिकारी दल की सक्रिय सदस्य भी थीं। इनमें भारत को स्वाधीन कराने की प्रबल आकांक्षा थी। 

जब अंग्रेजों ने इनकी स्नातक की डिग्री पर रोक लगा दी, तो इन्होंने एक स्कूल में अध्यापन शुरू किया। चटगांव के पहाड़तली इलाके में एक यूरोपियन क्लब था जिसमें अंग्रेजों को ही अंदर जाने की इजाजत थी। क्लब के बाहर एक बोर्ड लगा हुआ था जिसमें अंग्रेजी में लिखा हुआ था कि डाग्स एंड इंडियन्स आर नॉट एलाउड। कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित लिखा यह बोर्ड प्रीतिलता बाडेदार की आंखों में हमेशा खटकता था। 

उधर से गुजरते समय वह इस बोर्ड को देखकर आक्रोशित हो उठती थीं। एक दिन प्रीतिलता ने अपने साथियों के साथ पहाड़तली के इस क्लब पर सशस्त्र हमला बोल दिया। दोनों ओर से गोलियां चलने लगीं। इसी बीच एक गोली आकर प्रीतिलता को लगी जिससे वह घायल हो गईं। 

अंग्रेजों की यातनाओं और दल का भेद खुलने के भय से बचने के लिए वह साइनाइड साथ लेकर गई थीं। जब बचने की गुंजाइश नहीं बची, तो प्रीतिलता ने साइनाइड खाकर प्राण त्याग दिए। क्रांतिकारी प्रीतिलता 21 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गईं।

हरियाणा में गेहूं के अवशेष जलाकर किसानों ने बढ़ा दिया प्रदूषण

अशोक मिश्र

प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है। दुनिया के कई देश प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। इससे उन देशों की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। जीडीपी गिर रही है। भारत में भी प्रदूषण की समस्या गहराती जा रही है। इसकी वजह से देश के कई हिस्सों में प्रदूषणजनित बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। इससे जहां परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, वहीं कार्यबल का भी नुकसान हो रहा है। 

हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोग प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। हरियाणा में प्रदूषण को रोकने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं, इसके बावजूद प्रदूषण से निजात नहीं मिल रही है। लोग धान की फसल के समय में पराली जलाने से बाज नहीं आते हैं, तो गेहूं की फसल के समय में गेहूं का फाना यानी उसके अवशेष डंठल जला रहे हैं। पिछले साल काफी प्रयास करने के बाद पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई थी। कुल 662 स्थानों पर धान की पराली जलाई गई थी।

लेकिन इस साल किसानों ने धान की पराली जलाने के मुकाबले में चार गुना ज्यादा गेहूं के अवशेष जला दिए हैं। पूरे प्रदेश में इस साल एक अप्रैल से छह मई के बीच 2683 स्थानों पर गेहूं के अवशेष जलाए जा चुके हैं। सबसे ज्यादा 441 मामले तो जींद जिले में पाए गए हैं। प्रदेश सरकार ने पराली हो या गेहूं के अवशेष जलाने पर प्रतिबंध लगा रखा है। प्रदेश सरकार ने किसान गेहूं के डंठल न जलाने पाएं, इसके लिए अधिकारियों की टीम बनाई थी। इस टीम को किसानों पर नजर रखनी थी, इसके बावजूद इतने ज्यादा स्थानों पर गेहूं के अवशेष जलाए गए। 

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पिछले दिनों हरियाणा के अधिकारियों से इस मामले में जवाब भी मांगा था। पिछले पांच साल से प्रदेश सरकार के काफी प्रयास करने के बाद पराली जलाने के मामले में काफी कमी आई थी। पराली जलाने की घटनाएं 3626 स्थानों से घटकर 662 पर आ गई थीं। अब गेहूं के अवशेष जलाने की घटनाओं ने सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सामने एक नई चिंता पैदा कर दी है। 

गेहूं के अवशेष को खेत में जलाने से पर्यावरण और मिट्टी को काफी नुकसान पहुंचता है। इसके खेतों में रहने वाले वे कीट भी मर जाते हैं, जो खेती के लिए काफी लाभदायक साबित होते हैं। इससे खेत की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो जाती है। वैसे यदि किसान चाहें तो गेहूं के अवशेष का सदुपयोग कर सकते हैं। वह गेहूं के डंठल से कम्पोस्ट खाद बना सकते हैं। इसके अलावा खेत में जुताई करके इन्हें मिट्टी में मिलाकर खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकते हैं। 

राज्य सरकार ने खेत में गेहूं के अवशेष जलाने वाले 552 किसानों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए दो सीजन तक मंडियों में एमएसपी पर अनाज बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया है। खेत या खेत के बाहर पराली या गेहूं का अवशेष जलाना, अपराध है। किसानों को ऐसा करने से बचना चाहिए।

Friday, May 8, 2026

विदेश में नौकरी दिलाने का झांसा देने वाले ट्रैवल एजेंटों की खैर नहीं

अशोक मिश्र

किसी भी तरह विदेश जाने की ललक पंजाब, हरियाणा और दक्षिण के राज्य केरलम के युवाओं में बहुत है। पंजाब और हरियाणा के युवा तो सोते-जागते अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, इजरायल, यूनाइटेड किंगडम, रूस और नार्वे जैसे देशों में जाने का सपना देखते रहते हैं। वे लोग सौभाग्यशाली हैं जिनको हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से विदेश भेजा जाता है। 

पिछले साल हरियाणा सरकार ने कौशल रोजगार निगम के जरिये सैकड़ों युवाओं को इजरायल और दुबई भेजा है। दुबई और इजरायल भेजे गए युवा पांच साल तक इन देशों में काम करेंगे। इन्हें अच्छी खासी तनख्वाह भी मिलेगी। लेकिन बहुत सारे ऐसे भी युवा हैं जो डंकी रूट से अमेरिका, कनाडा, रूस, आस्ट्रेलिया और अरब देशों में अच्छी खासी कमाई की चाह में जाते हैं। डंकी रूट से विदेश जाने वाले युवाओं को इसके लिए चालीस-पचास लाख रुपये खर्च करना पड़ता है। 

डंकी रूट से युवाओं को किसी भी देश में पहुंचाने का वायदा करने वाले फर्जी ट्रैवल एजेंट कई बार युवाओं की जान भी जोखिम में डाल देते हैं। इतना ही नहीं, पिछले तीन-साढ़े तीन साल में डंकी रूट से विदेश जाने की कोशिश करने वाले युवा करीब 1700 करोड़ रुपये गंवा चुके हैं। इस मामले में सबसे दुखद बात यह है कि जब गलत तरीके से किसी देश में जाने पर वहां की सरकार इन्हें पकड़ लेती है या भारत के लिए डिपोर्ट कर देती है, तो डिपोर्ट किए गए युवक के परिवार वाले प्रतिष्ठा के नाम पर चुप्पी साध लेते हैं। 

वह उस आदमी या ट्रैवल एजेंट के खिलाफ कार्रवाई तक नहीं करते हैं, जिसकी वजह से उनके बेटे की जिंदगी बरबाद हुई होती है। सरकार ने साल 2024 में विदेश भेजने में धोखाधड़ी के खिलाफ हरियाणा ट्रैवल एजेंट पंजीकरण और विनियमन विधेयक बनाया है। इसे विधानसभा में 28 फरवरी 2024 को पारित किया गया था। इसके तहत मानव तस्करी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने या धोखाधड़ी में दोषी पाए जाने पर ट्रैवल एजेंट को कम से कम तीन साल से लेकर अधिकतम दस साल की कैद हो सकती है। 

इसी तरह दो से पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। किसी व्यक्ति या एजेंसी को ट्रैवल एजेंट के रूप में काम करने के लिए सरकार से रजिस्ट्रेशन कराना होगा, जिसकी वैधता तीन साल की होगी, जिसके बाद रिन्यू करवाना होगा। धोखाधड़ी से अर्जित की गई ट्रैवल एजेंट की संपत्ति को जब्त भी किया जाएगा। लेकिन एक बार फिर सैनी सरकार ने ट्रैवल एजेंटों से जुड़े कानून में बदलाव किया है। 

यदि कोई ट्रैवल एजेंट विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर फर्जीवाड़ा करता है, नकली दस्तावेज बनाता है या फिर मानव तस्करी में लिप्त पाया जाता है, तो सात से दस साल की जेल या दो से पांच लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। नए कानून के मुताबिक, दोषी एजेंट की संपत्ति को जब्त करके पीड़ित को मुआवजा दिया जाएगा।

क्लर्क ने कहा, सबूत दो, तुम्हीं एमा काल्वे हो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी विवेकानंद की एक पुस्तक है मेमोरीज आफ यूरोपियन ट्रैवल। इसमें वह लिखते हैं कि एमा गरीब थीं लेकिन अद्भुत प्रतिभा संपन्न थीं। अपने सौंदर्य, यौवन, प्रतिभा और पवित्र आवाज की वजह से वे आज पश्चिम की सबसे कामयाब गायिका हैं। तकलीफों और मुफलिसी ने उन्हें सिखाया।

स्वामी जी ने जिस एमा के बारे में अपनी पुस्तक में लिखा है, वह थीं रोजा एमा काल्वे। इनका जन्म 15 अगस्त 1858 को एवेरान में हुआ था। इनके पिता एक इंजीनियर थे। यह फ्रांसीसी ओपेरा गायिका थीं। प्रसिद्ध होने के बाद उन्होंने बहुत धन कमाया,लेकिन 1894 में शिकागो में कार्यक्रम पेश करने के दौरान एमा की इकलौती पुत्री की आग लगने से मौत हो गई। इसके बाद उन्होंने चार बार आत्महत्या का प्रयास किया। 

इसी बीच उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई और उन्होंने उन्हें अवसाद से बाहर निकाला। कहते हैं कि जब वे अपने प्रसिद्धि के सर्वोच्च शिखर पर थीं, तो कैलिफोर्निया के एक छोटे शहर पहुंची। वह एक रजिस्टर्ड डाक आने वाली थी। पोस्टआफिस में पहुंचने पर उन्होंने डॉक के बारे में पूछताछ की और बताया कि वह एमा काल्वे हैं। पोस्ट आफिस के क्लर्कने उनसे उनके एमा काल्वे होने का सबूत मांगा। उन्होंने उस क्लर्क से विनम्रतापूर्वक कहा कि वही हैं एमा काल्वे। लेकिन क्लर्क नहीं माना। 

उसने कहा कि वह काल्वे जैसी नहीं दिखती हैं क्योंकि कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में उसने उन्हें देखा है। एमा ने बताया कि कार्यक्रम के समय मैं अधिक सुंदर दिखती हूं। इसके बाद एमा ने उस क्लर्क को वही गीत गाकर सुनाया। पूरा पोस्ट आफिस चकित रह गया। उस क्लर्क ने बाद में उनसे क्षमा मांगी और पत्र उन्हें सौंप दिया।