Saturday, October 17, 2026

The Celestial Maiden Said, You Are a Thief of Fragrance

Bodhivriksha

Ashok Mishra

Mahatma Buddha always endeavored to ensure that none of his actions or behaviors caused distress to anyone. He sought to set an example for society through his exemplary conduct. Nevertheless, there were times when he, too, would inadvertently commit an error. Whenever someone pointed out such a mistake, he would express his gratitude. 

Once, while he was meditating by the side of a lotus pond, a cool, fragrant breeze—carrying the scent of the lotus blossoms—wafted toward him. He was deeply absorbed in meditation, feeling a profound sense of joy and spiritual immersion. At that moment, a celestial maiden appeared by the pond. She remarked to Gautama Buddha, "You did not seek permission from the owner of the pond to enjoy the fragrance of these lotuses. By inhaling this scent without consent, you are, in effect, stealing it. You are a 'thief of fragrance'."


 Before Buddha could respond, a village girl arrived, stepped into the pond, began plucking the lotus flowers, and muddied the water. Buddha observed, "That village girl has soiled the entire pond and damaged the flowers; yet, you stand there silently, while accusing me of being a 'thief of fragrance'." The celestial maiden replied, "You are a highly respected figure in society—a man well-versed in the Dharma and the principles of righteous conduct. 

That girl, however, is naive and uneducated; she lacks such knowledge, and therefore, her transgression is forgivable. But for someone like you—who understands the principles of righteousness—to act in such a manner is not excusable." Hearing this, Buddha bowed his head in shame. He apologized to the celestial maiden and promised never to repeat such a mistake.


देव कन्या बोली, आप गंध चोर हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने हमेशा यही प्रयास किया कि उनके किसी आचरण या व्यवहार से किसी को परेशानी न हो। वह आदर्श व्यवहार करके समाज के सामने एक उदाहरण पेश करें। इसके बावजूद कई बार उनसे भी चूक हो ही जाया करते थे। जब कोई उन्हें उस चूक के बारे में बताता या ध्यान दिलाता था, तो वह उसके प्रति आभारी हो जाया करते थे। एक बार की बात है। वह एक कमल सरोवर के किनारे बैठे हुए ध्यान कर रहे थे। 

कमल सरोवर से होकर आने वाली हवा ठंडी और सुगंधित थी। कमल पुष्प की सुगंध हवा के साथ होकर उन तक आती थी।वह उस समय अत्यंत प्रसन्न और भाव विभोर होकर ध्यान लगा रहे थे। उसी समय कमल सरोवर के पास देव कन्या आई। उसने गौतम बुद्ध से कहा कि आपने कमल का गंध ग्रहण करने के लिए तालाब के स्वामी से इजाजत नहीं ली थी। ऐसी स्थिति में आप सुगंध ग्रहण करके गंध चोरी कर रहे हैं। आप गंध चोर हैं। 

महात्मा बुद्ध कुछ कहते कि उसी समय एक ग्रामीण बाला आई और उसने तालाब में घुसकर कमल पुष्पों को तोड़ने लगी। उसने सरोवर को भी गंदा कर दिया। तब बुद्ध ने कहा कि उस ग्रामीण बाला ने पूरे तालाब को गंदा कर दिया। पुष्पों को भी क्षत-विक्षत कर दिया। फिर भी आप चुपचाप खड़ी हैं। और मुझे गंध चोर कह रही हैं। 

उस देव कन्या ने कहा, आप समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आप धर्म के ज्ञानी हैं, आप नीति के ज्ञाता है। वह लड़की तो अबोध है। अशिक्षित है, उसे ज्ञान नहीं है। इसलिए उसका अपराध क्षम्य है। लेकिन आप नीतिवान होने के बावजूद ऐसा करें, तो वह क्षम्य नहीं है। यह सुनकर बुद्ध का सिर लज्जा से झुक गया। उन्होंने देव कन्या से क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसी गलती न करने का वचन दिया।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील आर्थिक संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत

अशोक मिश्र

अमेरिका और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते का पहला चरण अंतिम रूप ले चुका है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इसकी पुष्टि की है। कानूनी मसौदा तैयार होने और कुछ अंतिम बारीकियों के बाद यह लागू होने वाला है। यह खबर मात्र समझौते की घोषणा नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत है। लंबे समय से चली आ रही बातचीत के बाद यह प्रगति स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके निहितार्थों को गहराई से समझना जरूरी है। 

भारत के लिए इस डील का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच का है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है और यदि यहां स्थायी बाजार पहुंच मिलती है तो लाखों रोजगार वाले क्षेत्रों में मांग बढ़ेगी, निवेश आएगा और भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में हिस्सेदारी मजबूत होगी। पहले उच्च टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों, खासकर कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण, फुटवियर और श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भारी नुकसान हो रहा था। 

टैरिफ घटकर करीब अठारह प्रतिशत रहने और कई उत्पादों पर शून्य शुल्क की संभावना से निर्यात बढ़ेगा। इससे लाखों नौकरियां पैदा हो सकती हैं, खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए। छोटे और मझोले उद्यमों को नई बाजार पहुंच मिलेगी। ऊर्जा, विमान और तकनीक उत्पादों की अमेरिकी खरीद से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी। वैश्विक माहौल में चीन से दूर जा रहे निवेश को आकर्षित करने में भी यह मददगार साबित हो सकता है। भारत की आतुरता के पीछे केवल निर्यात नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक दबाव भी है। 

थोक महंगाई, ऊर्जा आयात पर निर्भरता और वैश्विक बाजार में चीन प्लस वन की नीति ने भारत को पश्चिमी बाजारों से गहरे जुड़ाव के लिए प्रेरित किया है। इस डील का दूसरा पहलू उतना ही संवेदनशील है। अमेरिका लंबे समय से भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र में बाजार पहुंच, बौद्धिक संपदा अधिकारों में कड़े प्रावधान और डिजिटल व्यापार में डेटा के मुक्त प्रवाह की मांग करता रहा है। भारत के करोड़ों छोटे किसान और अमूल जैसी सहकारी व्यवस्था अमेरिकी सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों के सामने टिक नहीं पाएगी। इसी तरह सस्ती दवाओं के उत्पादन पर पेटेंट की सख्ती का असर पड़ सकता है। 

सबसे बड़ा नया जोखिम रूस से तेल और गैस खरीद पर अमेरिकी सीनेट में 86 वोटों से पास हुए कानून को लेकर है, जिसमें राष्ट्रपति को प्रतिबंध लगाने का अधिकार मिलता है। भारत को यह डील इसलिए करनी चाहिए क्योंकि अलग-थलग रहना संभव नहीं। विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ संतुलित व्यापार संबंध विकास की गति बनाए रखने में सहायक होंगे। यह सिर्फ टैरिफ कम करने का मामला नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी का आधार है। सही शर्तों पर लागू होने पर यह रोजगार, निर्यात और निवेश तीनों को प्रोत्साहन देगा। 

Friday, October 16, 2026

The Conviction That I, Too, Can Become a Buddha

The Bodhi Tree

Ashok Mishra

It is true that Gautama Buddha did not establish a new religion; the term "Buddhism" was coined long after his *parinirvana*. He simply pointed out a path to transcend suffering. All his teachings were rooted in his own personal experience. He articulated the four fundamental truths of life: birth, old age, illness, death, separation from loved ones, and encounters with the unpleasant—all these constitute suffering (*dukkha*). 

The root cause of this suffering is *trishna*—an insatiable, never-ending craving for "more and more." If this craving can be extinguished, then suffering, too, can come to an end. This state is known as *nirvana*, and there is a clear path to attain it. Centering his teachings on these core principles, the Buddha guided others. Once, while he was addressing a gathering of nearly ten thousand people, a young man arrived. He looked at the *Tathagata*, bowed before him, and offered his salutations. 

The Buddha asked, "For what purpose have you come?" The young man replied, "The purpose for which I came has been fulfilled. I have nothing left to ask, nothing left to seek." The Buddha inquired, "What has been fulfilled? What has transpired? Share this with others as well." Thousands were present at the gathering, yet no one had witnessed anything specific occurring. The young man explained, "I came here to transform myself, and now I have been transformed. 

A conviction has taken root within me: I, too, can become a Buddha. The Buddha who exists today—I could become that very being tomorrow. A new faith has been born within me. It was in search of this new hope that I came here; it was with this trust that I bowed at your feet. When I stood up, I was a changed man. Now, I return, carrying this profound conviction."

यह विश्वास हो गया, मैं भी बुद्ध हो सकता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यह सच है कि महात्मा बुद्ध ने कोई नया धर्म नहीं चलाया था। बौद्ध धर्म नाम तो उनके परिनिर्वाण के बहुत बाद दिया गया। उन्होंने दुख से बाहर निकलने का रास्ता बताया था। उनके सारे उपदेश अपने अनुभव पर ही आधारित रहे हैं। उन्होंने जीवन के चार सत्य बताए थे। बुद्ध ने कहा कि जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, प्रिय से बिछोह, अप्रिय का मिलना, जीवन में दु:ख है। दु:ख का कारण है तृष्णा और चाहिए और चाहिए की कभी न खत्म होने वाली प्यास। तृष्णा को खत्म किया जा सकता है, तो दु:ख भी खत्म हो सकता है। 

इसी अवस्था को निर्वाण कहते हैं। उस तक पहुँचने का एक स्पष्ट मार्ग है। इन बातों को ही मुख्य आधार बनाकर महात्मा बुद्ध लोगों को उपदेश के माध्यम से परिचित कराते रहे। एक बार की बात है। वह लगभग दस हजार लोगों की भीड़ को उपदेश दे रहे थे।  एक युवक आया। उसने तथागत को देखा, उनके सामने झुका और उन्हें प्रणाम किया। बुद्ध ने पूछा, किस लिए आए हो? युवक ने कहा कि जिस लिए आया था, वह इच्छा पूर्ण हुई। 


अब न कुछ पूछना है, न कुछ जानना है। बुद्ध ने कहा कि क्या पूर्ण हुआ, क्या घट गया। यह और को भी बता दो। उस समय सत्संग में हजारों लोग मौजूद थे। किसी ने भी कुछ घटते या होते नहीं देखा था। युवक ने कहा कि मैं अपने को बदलने आया था। अब मैं बदल गया हूं। 

मुझ में यह विश्वास पैदा हो गया है कि मैं भी बुद्ध हो सकता हूं। जो बुद्ध आज हैं, वह कल मैं हो सकता हूं। मुझ में एक नई श्रद्धा ने जन्म ले लिया है। मैं इसी नई आशा की तलाश में यहां आया था। इसी भरोसे से मैं चरणों में झुका था। जब खड़ा हुआ, तो मैं बदल गया। अब मैं एक विश्वास के साथ वापस जा रहा हूं।

रिश्तों में इतने असंवेदनशील और हिंसक क्यों होते जा रहे हैं लोग?

अशोक मिश्र

मेरठ के चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड का अंतत: फैसला आ गया। इस मामले में जिला जज अरविंद कुमार मिश्र की अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। सच कहा जाए, तो यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का अंत नहीं है। यह हमारे समय के सामाजिक, नैतिक और न्यायिक अंतर्द्वंद्व पर की गई एक तीखी टिप्पणी है। जिन दिनों यह मामला प्रकाश में आया था, पूरे देश में इसकी चर्चा हुई थी। चर्चा का कारण मुस्कान और साहिल द्वारा हत्या के दौरान की गई क्रूरता थी। 

एक मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत की हत्या उसकी ही पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल ने कर दी थी। शव के पाँच टुकड़े करने के बाद उसे सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपा दिया गया। अदालत ने इसे जघन्यतम अपराध मानते हुए रेयरेस्ट आॅफ रेयर की श्रेणी में रखा। दोनों अपराधियों को हत्या के साथ-साथ साक्ष्य छिपाने के आरोप में सात-सात साल की अतिरिक्त सजा भी सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराधी को उसके किए की सजा देना भी धर्म का कार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि जब प्रजा सोती है, तब भी कानून जागता रहता है। 

अदालत द्वारा की गयी यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा की प्रतिक्रिया होती है। जब प्रेम, जो मनुष्य को बेहतर बनाता है, वही स्वामित्व और वासना में बदलकर इतनी बर्बरता पर उतर आए कि एक इंसान को काटकर ड्रम में भर दिया जाए, तो कानून को यह संदेश देना पड़ता है कि मनुष्यता की एक सीमा है जिसके पार जाना अक्षम्य है। इस फैसले के दो मानवीय पहलू भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। पहला, सजा सुनते ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर मौजूद दोनों दोषियों का रो पड़ना और मुस्कान का यह कहना कि मेरी बच्चियों का ध्यान रखना। 

यह एक माँ की अंतिम चिंता थी, जो बताती है कि अपराधी भी अंतत: एक मनुष्य ही है। आवेश में उसने अपराध तो किया, लेकिन वह अपनी बेटियों के प्रति उतनी ही संवेदनशील है जितनी एक मां को होना चाहिए। दूसरा, मृतक सौरभ की माँ का यह कहना कि आज बेटे को न्याय मिला, जो एक परिवार के 591 दिन लंबे इंतजार और 126 सुनवाइयों के दर्द का अंत है। मृत्युदंड एक सभ्य समाज के लिए हमेशा एक दुखद घटना है। 

लेकिन यह फैसला एक स्पष्ट चेतावनी है कि वैवाहिक संबंधों में विश्वासघात का रास्ता कानूनन तलाक से निकलता है, हत्या से नहीं। प्रेम के नाम पर किया गया स्वार्थ जब किसी निर्दोष की जान ले लेता है, तो समाज को उसके खिलाफ सबसे कठोर शब्दों में बोलना ही पड़ता है। इस सजा ने पीड़ित परिवार को न्याय दिया है, पर साथ ही हम सबके सामने यह सवाल भी छोड़ा है कि हम अपने रिश्तों में इतने असंवेदनशील और हिंसक कैसे होते जा रहे हैं?

Thursday, October 15, 2026

Elderly woman became immortal by donating one rupee


‍Bodhi Tree

Ashok Mishra

After attaining enlightenment, Buddha gave his first sermon from Sarnath. It is said that only five people were present at that time. Later the number of Buddha's disciples reached lakhs. To accommodate these disciples, Mahatma Buddha and his wealthy supporters had established Sanghas, monasteries and viharas at many places. 

The name of the organization of disciples of Mahatma Buddha was 'Buddhist Sangha' or 'Bhikshu Sangha'. After his enlightenment, Buddha expanded and built Buddhist orders at various places in North India such as Magadha, Sarnath, Vaishali, Shravasti, Rajagriha, etc. At one place, when the need to build a Buddhist monastery was felt, Tathagata decided to collect money from the people for it. 

People donated generously for the construction of the Buddhist monastery. Nagar Seth also gave a lot of gold coins. An elderly woman came among these people. He lived his entire life in extreme poverty. Somehow he managed to earn his living and saved one rupee. That elderly woman brought one rupee and handed it over with great devotion for the construction of the Vihar. 

When everything was settled, Mahatma Buddha called his disciple and asked who had donated how much. That disciple said, Lord! Nagar Seth had donated several hundred gold coins, but this was not even one percent of his total wealth. Then Buddha asked who had given 100% donation. The disciple told that a poor elderly mother had donated one rupee. That was his life's savings. When the monastery was completed, the inscription on its door had the old woman's name inscribed at the top.

एक रुपया दान देकर अमर हो गई बुजुर्ग


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना सबसे पहला उपदेश सारनाथ से किया था। कहते हैं कि उस समय केवल पांच लोग ही मौजूद थे। बाद में बुद्ध के शिष्यों की संख्या लाखों में पहुंच गई थी। इन शिष्यों के रहने के लिए महात्मा बुद्ध और उनके धनवान समर्थकों ने कई स्थान पर संघ, मठ और विहारों की स्थापना की थी। महात्मा बुद्ध के शिष्यों के संगठन का नाम 'बौद्ध संघ' या 'भिक्षु संघ' था। 

बुद्ध ने अपने ज्ञान प्राप्ति के बाद, उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों जैसे मगध, सारनाथ, वैशाली, श्रावस्ती, राजगृह आदि पर बौद्ध संघ का विस्तार और निर्माण किया था। एक जगह जब बौद्ध विहार बनाने की जरूरत महसूस हुई, तो तथागत ने तय किया लोगों से इसके लिए धन एकत्रित किया जाएगा। लोगों ने बौद्ध विहार के निर्माण के लिए खुले मन से दान दिए। नगर सेठ ने भी काफी स्वर्ण मुद्राएं दीं। 

इन्हीं लोगों में एक बुजुर्ग महिला आई। उसने अपना पूरा जीवन अत्यंत निर्धनता में गुजारा था। किसी तरह अपना पेट पालकर उसने एक रुपया जमा किया था। उस बुजुर्ग महिला ने एक रुपया लाकर बड़ी श्रद्धा के साथ विहार निर्माण के लिए सौंप दिया। जब सब कुछ निपट गया, तो महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्य को बुलाकर पूछा कि किसने कितना दान दिया था। उस शिष्य ने बताया कि भगवन! 

नगर सेठ ने कई सौ स्वर्ण मुद्राएं दान दी थीं, लेकिन यह उनकी कुल संपत्ति का एक प्रतिशत भी नहीं था। तब बुद्ध ने पूछा कि शत-प्रतिशत किसने दान दिया था। शिष्य ने बताया कि एक गरीब बुजुर्ग माता ने एक रुपया दान दिया था। वह उनके जीवन भर की बचत थी। जब विहार का निर्माण पूरा हुआ, तो उसके दरवाजे पर लगाए गए शिलालेख में सबसे ऊपर उस बुजुर्ग महिला का नाम खुदा हुआ था।

फिर शुरू हुई खेत में पराली को जलाने से रोकने की कवायद

अशोक मिश्र

हरियाणा में पराली जलाने की परंपरा काफी पुरानी है। इसका सीधा संबंध फसल चक्र की समयबद्धता से है। प्रदेश में धान की कटाई के तुरंत बाद लगभग 15 से 20 दिन के भीतर गेहूं की बिजाई करनी होती है। इस छोटे से अंतराल में खेत को खाली करने का सबसे सस्ता और तेज तरीका किसान आग लगाना मानते रहे हैं। इधर एकाध दशक से जब कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई होने लगी है, तब से पराली जलाने की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है। यही कारण है कि हर साल रोकथाम की कवायद के बावजूद समस्या बनी रहती है। 

किसान पराली इसलिए जलाते हैं क्योंकि कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई के बाद खेत में करीब छह से आठ इंच के डंठल और बिखरी हुई पुआल बच जाती है। इसे हटाने के लिए हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, रोटावेटर या बेलर जैसी मशीनों की जरूरत होती है। ऐसी दशा में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए इस वर्ष भी प्रशासनिक स्तर पर अब तक की सबसे सख्त निगरानी व्यवस्था लागू की गई है। पूरे प्रदेश में जिला और ब्लॉक स्तर पर पराली सुरक्षा बल का गठन किया गया है। इसमें पुलिसकर्मी, कृषि विभाग के अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, नोडल और क्लस्टर अधिकारी तथा अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल हैं। 

यह बल खेतों में आग की घटनाओं की निगरानी और तत्काल कार्रवाई के लिए जिम्मेदार है। ग्राम स्तर पर कुल 8535 नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। हालांकि कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 8134 बताई गई है जो हॉटस्पॉट गांवों में प्रति अधिकारी 50 किसानों और सामान्य गांवों में सौ किसानों की जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे हैं। अब तक छह लाख से अधिक किसानों को इन अधिकारियों द्वारा कवर किया जा चुका है। प्रदूषण में पराली की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक आंकड़े मिले-जुले हैं। 

एक सामान्य धारणा है कि पराली दिल्ली-एनसीआर के धुंध का मुख्य कारण है, लेकिन शोध कुछ और बताते हैं। जनवरी 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन और नेचर इंडिया में प्रकाशित शोध के अनुसार पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष जलाने का योगदान दिल्ली-एनसीआर के कुल पीएम 2.5 में केवल लगभग 14 प्रतिशत है। 2015 से 2023 के बीच पराली जलाने की घटनाओं में 50 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद दिल्ली का पीएम 2.5 स्तर लगभग स्थिर रहा है, जो बताता है कि प्रदूषण के लिए अन्य स्रोत अधिक निर्णायक हैं। 

हरियाणा में प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार ने दंड और प्रोत्साहन दोनों का रास्ता अपनाया है। पराली जलाने पर पांच हजार से तीस हजार रुपये तक जुर्माना, रेड और येलो जोन का चिन्हीकरण और एफआईआर जैसी कार्रवाई के साथ ही ड्रोन से निगरानी शुरू की गई है। दूसरी ओर किसानों को प्रति एकड़ 1200 रुपये की प्रोत्साहन राशि, मशीनों पर 50 से 80 प्रतिशत तक सब्सिडी का लक्ष्य रखा गया है।  


Wednesday, October 14, 2026

कि मन थोड़ी धीर धरो

व्यंग्य
अशोक मिश्र

जब किसी लड़के या लड़की का विवाह तय होता है, तो उसके मन में फुरहरी छूटने लगती है। मन मतंग सा मतवाला हो उठता है। हर ओर सावन के अंधे की तरह उसे हर लड़की में होने वाली बीवी की छवि दिखाई देने लगती है। अंग अंग में टीस उठने लगती है। दिल में गुदगुदी होने लगती है। बिना पिये ही पूरी एकबोतल शराब जैसा नशा आंखों में उमड़ आता है। पग-धरते इधर हैं, पड़ता है। बात-बेबात हंसी छूट जाती है। लड़कियां सकुचा रहती हैं, नयन किसी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगते हैं।
विवाह तय होने के बाद एक व्यक्ति और बौराता है। और वह है लड़के का पिता। उसे नई नवेली समधन जो मिलने वाली होती है। समधी मिलन की रस्म निभाने की कल्पना ही रोमांचित कर देती है। मेरे मित्र रामभूल ने अपने बेटे की शादी में मुझे जिद करके बारात में चलने को बाध्य कर दिया। विवाह के दिन रस्मों को निभाते समय रामभूल की पत्नी, भाभियां, सालियां और सलहजें चुटकी लेने से बाज नहीं आ रही थीं। बात-बात पर ताने दिए जा रहे थे। रामभूल की पत्नी ने अपनी जेठानी से इशारा करते हुए छेड़ा, देखो दीदी! गाटर के पापा बाल और मूछें ऐसे रंग रहे हैं, मानो समधन देखते ही लट्टू हो जाएगी। तभी उनकी साली ने चुटकी ली-जाने दो दीदी जिसको जवानी में मैंने घास नहीं डाली, अब बुढ़ापे में समधन कहां घास डालने वाली है। सुना है कि जीजा की समधन बड़ी जबर है। जीजा जी को बगल में दबाकर एक मील तो दौड़ ही जाएगी।
शादी वाले दिन रामभूल बेटे से भी कहीं ज्यादा प्रफुल्लित नजर आ रहे थे। वह अपनी खुशी दबा नहीं पा रहे थे। वह अपने मन को बार-बार समझाते थे-तेरा कल समधन से मिलन होगा, कि मन थोड़ी धीर धरो। लेकिन मन था कि बावरा हो रहा था। पल काटे नहीं कट रहे थे। खैर, राम-राम करते हुए बेटे का विवाह संपन्न हुआ।
विदाई से ठीक पहले लड़की वालों ने रामभूल से कहा, चलिए समधी मिलन की रस्म भी पूरी कर ली जाए। रामभूल अपने भाइयों, जीजा और साले के साथ मंडप के नीचे आए। थाली में हल्दी, चावल, हरी दूब और कुछ रुपये रखकर उन्होंने पर्दे के रूप में तनी चादर के अंदर हाथ बढ़ाकर दिया, तो एक हाथ ने उनका हाथ पकड़कर पर्दे में ही खींच लिया। अरे--रे--रे करते हुए रामभूल का धड़ पर्दे के अंदर पहुंचा। उनका मुंह किसी महिला की नाभिस्थल से जा टकराया। पर्दे के पीछे खड़ी कुछ महिलाओं ने रामभूल को पूरा अंदर ही घसीट लिया। जब रामभूल पर्दे से बाहर आए, तो वह एकदम लुटे पिटे से थे। पूरा मुंह हल्दी और रंग से रंगा हुआ था। कपड़े तार-तार हो चुके थे। रामभूल के साथ आए लोगों ने बाहर जाना चाहा, तो पता चला कि दरवाजे की कुंडी तो बाहर से बंद है। और फिर उन लोगों पर महिलाएं ऐसे टूट पड़ी, मानो रणथंभौर के किले के बाहर खड़ी मुगल सेना पर क्षत्रियों की फौट टूट पड़ी हो। फिर उन लोगों का जो हाल हुआ, उसी कल्पना आप खुद कर सकते हैं। रामभूल ने कसम खाई कि अब अपने किसी बेटे के विवाह में समधी मिलन की रस्म नहीं निभाएंगे।