Saturday, July 11, 2026

कुष्ठ रोगियों के लिए समर्पित किया जीवन

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कभी अमर शहीद राजगुरु के साथी रहे बाबा आमटे अहिंसावादी महात्मा गांधी और विनोबा भावे से काफी प्रभावित रहे। महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपने को क्रांतिकारी आंदोलन से अलग कर लिया था और पूरी तरह अहिंसा के मार्ग पर चल पड़े थे। बाबा आमटे का पूरा नाम मुरलीधर देवीदास आमटे था। इनका जन्म 26 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में हुआ था। 

इनके उनके पिता देवीदास हरबाजी आमटे शासकीय सेवा में लेखपाल थे। बरोड़ा से पाँच-छ: मील दूर गोरजे गांव में उनकी जमींदारी थी। उनका बचपन बहुत ही ठाट-बाट से बीता। यह भी कहा जा सकता है कि बाबा आमटे चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए थे। लेकिन एलएलबी की पढ़ाई करने के बाद जब कर्मक्षेत्र में उतरे, तो उन्होंने गरीबों की सहायता, कुष्ठ रोगियों का इलाज ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। 

कहते हैं कि एक बार बाबा आमटे कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे कुष्ठ रोग से ग्रसित तुलसीदास पड़े हुए हैं। पहले तो वह भी आगे बढ़ गए, लेकिन उन्होंने फिर सोचा कि यदि तुलसी दास की जगह वह होते, तो क्या होता? बस, वह लौटकर तुलसीदास के पास आए और उन्होंने उन्हें उठाया। उसकी सेवा की। इस घटना के बाद उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। 

महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में उन्होंने आनंदवन नाम से कुष्ठ रोगियों के लिए एक आश्रम खोला। शुरुआत में इस आश्रम में सात कुष्ठ रोगी थे। आज 180 हेक्टेयर जमीन पर फैला आनन्दवन अपनी आवश्यकता की हर वस्तु स्वयं पैदा कर रहा है। 9 फरवरी 2008 में 94 वर्ष की आयु में बाबा आमटे ने संसार से विदा ली।

गर्मी से राहत तो मिली लेकिन जलभराव ने बढ़ा दी मुसीबत

अशोक मिश्र

पूरे देश में मानसून सक्रिय हो गया है। हरियाणा में भी लगभग सभी जिलों में बरसात हो रही है। भारी बरसात की वजह से कहीं पेड़ गिर रहे हैं, तो कहीं सड़कें धंस रही हैं। नालियां जाम होने की वजह से शहरों की गलियों में पानी जमा हुआ है। सड़कों पर बने गड्ढे राहगीरों के लिए मुसीबत साबित हो रहे हैं। हरियाणा में इस बार भी सड़कें बह गईं, गलियां तालाब बन गईं और गड्ढों में पानी भरकर लोगों की मुश्किलें दोगुनी हो गईं। गुरुग्राम से लेकर करनाल, फरीदाबाद से हिसार और रोहतक से अंबाला तक हालात एक जैसे हैं। 

भारी बरसात के कारण फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, सोनीपत और भिवानी जैसे जिलों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। लोगों को आने जाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बीते दिनों में फरीदाबाद में खेड़ी पुल धंसने से ट्रैफिक वन-वे करना पड़ा, गुरुग्राम में नरसिंहपुर के पास नेशनल हाईवे-48 धंस गया। इन सभी जिलों के निचले इलाकों और अंडरपास में भारी जलभराव हुआ है। पलवल में लगातार बारिश से सड़कें जलमग्न होने की खबर है जिसकी वजह से मुख्य मार्गों पर लंबा ट्रैफिक जाम देखा गया। 

सोनीपत के रोहट में प्राइमरी हेल्थ सेंटर की बिल्डिंग भरभरा कर गिर गई। यहां पर सड़कें तालाब बन गईं। ऐसी हालत में लोगों का आवागमन बाधित हो रहा है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए जलभराव वाली सड़कें मुसीबत का कारण बन रही हैं। ऐसी स्थिति में सड़कों के किनारे खुले मैनहोल हादसे को न्यौता दे रहे हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों में तो हालात शहरों से भी ज्यादा खराब हैं। गांव के कच्चे रास्ते कीचड़ से भरे हुए हैं। कीचड़ भरे रास्तों में आना-जाना काफी मुश्किल है। 

इन्हीं रास्तों से होकर दोपहिया और चारपहिया वाहन आ जा रहे हैं। इन्हीं रास्तों से होकर बच्चों को स्कूल आना-जाना पड़ रहा है। सब्जी और अन्य सामान बेचने वाले लोगों को भी इन्हीं रास्तों से होकर गुजरना पड़ रहा है। सिरसा, भिवानी, जींद जैसे जिलों में ग्रामीण सड़कों की हालत इतनी खराब है कि एंबुलेंस तक समय पर नहीं पहुंच पाती है। गांवों और शहरों में जलभराव की वजह से मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है। ऐसे में डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया जैसे रोगों के फलाने का खतरा बढ़ता जा रहा है। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हर साल बरसात से पहले करोड़ों रुपये सड़कों और नालियों की सफाई पर खर्च होने के दावे किए जाते हैं, फिर नतीजा वही क्यों रहता है। हर बार ऐसा क्यों महसूस होता है कि योजना कागजों तक सीमित रह जाती है। फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे तेजी से बढ़ते जिलों में शहरीकरण की रफ्तार के साथ बुनियादी सुविधाएं नहीं बढ़ीं। कई शहरों में पानी निकलने की जगहें बंद कर दी गईं, निचले इलाकों में कॉलोनियां बन गईं और नतीजा यह कि थोड़ी सी बारिश में ही घरों में पानी घुस जाता है।

Friday, July 10, 2026

तुम बेटी का ध्यान रखना


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एक मां दुनिया में सबसे ज्यादा अपनी संतान को प्यार करती है। अगर कभी उसके सामने पिता, पति और संतान में से किसी एक को चुनने की कठिन घड़ी आ जाए, तो वह निश्चित रूप से अपनी संतान को चुनेगी। ऐसी मान्यता है। कई मामलों में यह सत्य भी साबित हुआ है। एक बार की बात है। एक दंपति समुद्री जहाज पर यात्रा कर रहा था। समुद्री यात्रा के दौरान जहाज का निचला हिस्सा टूट गया। 

जहाज डूबने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने लाइफ बोट निकाली। ज्यादातर यात्री लाइफबोट पर चले गए। दंपति ने देखा कि लाइफबोट पर अब केवल एक ही आदमी की जगह है। दंपति ने एक दूसरे को देखा। पति ने पत्नी को तत्काल छलांग लगाई और लाइफबोट पर जा गिरा। डूबते जहाज पर खड़ी पत्नी ने अपने पति से केवल इतना कहा, बेटी का ध्यान रखना। इसके बाद जहाज डूब गया। 

उस महिला की मौत हो गई। लाइफबोट के सहारे पति किनारे पहुंचा। उसने अपनी बेटी का अच्छी तरह से पालन-पोषण किया। उसने अपनी बेटी के पालन-पोषण में किसी तरह की कमी नहीं रहने दी। एक दिन वह भी आया, जब उस आदमी की मौत हो गई। इस घटना को कई साल बीत गए। एक दिन जब उस आदमी की बेटी घर की सफाई कर रही थी, तो उसे एक डायरी मिली। उसको पढ़ने के बाद पता चला कि उसकी मां को एक गंभीर बीमारी हो गई थी। कुछ दिनों बाद उसकी मौत निश्चित थी। 

उसके पिता ने सोचा कि यदि मैं जहाज पर रुकता हूं, तो मेरी मौत निश्चित हो जाएगी। उधर पत्नी की भी मौत निश्चित है। ऐसी स्थिति में यदि वह बच जाता है, तो वह अपनी बेटी का पालन-पोषण कर सकता है। यही सोचकर उसने पत्नी को जहाज में ही छोड़कर लाइफबोट में कूदने का फैसला किया। उसकी पत्नी भी उसके फैसले से सहमत थी। लेकिन उसे जीवन भर अपनी पत्नी की कमी खलती रही।

सरकारी मशीनरी को चलाने में कम नहीं है संविदा कर्मियों की भूमिका

अशोक मिश्र

किसी भी महिला की गर्भावस्था की अवधि उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस समय महिला को सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की होती है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ रहे। मानसिक शांति के साथ-साथ परिवार का सहयोग और आर्थिक मजबूती बहुत जरूरी होती है। यदि महिला कार्यरत है, तो उसे सरकार या जिस संस्था में वह कार्यरत है, उससे भी उसे भरपूर सहयोग मिले। स्थायी कर्मचारियों को जो गर्भावस्था के दौरान सुविधाएं मिलती हैं, वह गर्भवती संविदा कर्मियों को भी मिले, ऐसी उम्मीद करना कोई गलत भी नहीं है। 

लेकिन हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चांदपुरा गांव के वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में  संविदा पर कार्यरत शिक्षिका को इस मामले में निराश ही होना पड़ा। शिक्षिका की नियुक्ति 16 मार्च 2024 को हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से हुई थी। नौकरी के दौरान उसे गर्भावस्था संबंधी गंभीर समस्याएं हो गईं। चिकित्सकों ने उसे नौ महीने तक बेड रेस्ट की सलाह दी। शिक्षिका ने डॉक्टर की सलाह के मुताबिक अपने विभाग से मेडिकल अवकाश मांगा, लेकिन उसे मेडिकल अवकाश देने की जगह 16 मार्च 2026 को नौकरी से ही हटा दिया गया। जबकि दूसरे संविदा कर्मियों की नियुक्ति अवधि बढ़ा दी गई। 15 अप्रैल 2026 को शिक्षिका ने बच्चे को जन्म दिया और वह अपने निष्कासन के खिलाफ अदालत गई। 

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मां बनने की कीमत नौकरी नहीं हो सकती है। अदालत ने शिक्षिका की सेवा को बहाल करने के साथ-साथ अन्य सुविधाएं प्रदान करने का आदेश दिया है। हरियाणा समेत देश के कई राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विभागों में हजारों महिलाएं संविदा के आधार पर काम कर रही हैं। ये नर्सें, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षिका और क्लर्क सरकारी मशीनरी को चलाने में उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं जितनी नियमित कर्मचारी। फर्क सिर्फ इतना है कि इनके पास नौकरी की सुरक्षा नहीं है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर कई बार प्रबंधन गर्भावस्था की सूचना मिलते ही अनुबंध खत्म कर देता है। तर्क दिया जाता है कि संविदा की अवधि पूरी हो गई या पद की जरूरत नहीं रही। 

पर संयोग इतना साफ होता है कि बर्खास्तगी का पत्र उसी महीने आता है जब महिला मातृत्व अवकाश मांगती है। समस्या यह भी है कि संविदा प्रणाली को लचीलेपन के नाम पर इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसमें सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान ही नहीं हैं। न पीएफ, न ईएसआई, न मातृत्व अवकाश। विभाग काम तो पूरा लेते हैं पर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं। गर्भवती महिला को काम से निकाल देना न केवल अमानवीय है बल्कि उस विकास के दावे को भी खोखला करता है जिसमें हम बेटी बचाओ और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। जब महिलाएं सशक्त होंगी, तो देश भी सशक्त और विकसित होगा।

नफरत को फैलने से रोक सकता है केवल खेल


संजय मग्गू

भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोगों के बीच नफरत का माहौल देखने को मिल रहा है। नफरती माहौल का कारण धर्म कतई नहीं है। दुनिया के किसी भी धर्म ने नहीं कहा कि तुम दूसरी जाति, धर्म, संप्रदाय या भाषा भाषी के साथ नफरत करो। लेकिन यह भी सच है कि दुनिया में नफरत बढ़ रही है। इसके पीछे केवल और केवल सियासत है। राजनीति अपने फायदे के लिए लोगों को आपस में लड़ा रही है। एक दूसरे से नफरत करने की सीख दे रही है, बढ़ावा दे रही है। ऐसी स्थिति में जब दुनिया भर के धर्म गुरु लोगों को यह शिक्षा दे रहे हैं कि एक इंसान का दूसरे इंसान से नफरत करना, धर्म के खिलाफ है, तो फिर नफरत का विस्तार रुक क्यों नहीं रहा है? 

इसका कारण यह है कि राजनीति ने अब धर्म का लबादा ओढ़ रखा है। धर्म में भी राजनीति का प्रवेश हो चुका है। ऐसी स्थिति में तमाम धर्म उपदेश, संत, महात्मा और धार्मिक गुरु विफल हो रहे हैं। तो सवाल यह उठता है कि क्या नफरत के विस्तार को रोका नहीं जा सकता है? जरूर रोका जा सकता है। नफरत के विस्तार पर अगर कोई रोक लगा सकता है, तो वह है खेल। खेल में ही वह कूबत है, जो नफरत के विस्तार को रोक सकता है। कोई भी खेल हो, उसे खेलने में दो या दो से अधिक लोगों की जरूरत पड़ती है। 

अगर आप खेलते समय खिलाड़ियों के हावभाव, क्रिया कलाप पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि एक सच्चा खिलाड़ी जब खेल रहा होता है, तो वह जाति, धर्म, भाषा, प्रांत और संप्रदाय जैसी बातों से ऊपर उठ चुका होता है। क्रिकेट हो या फुटबाल अथवा रग्बी जैसे खेल हों, जहां टीम की जरूरत होती है, तो उस टीम में एक ही भाषा-भाषी, एक ही प्रांत, एक ही धर्म-जाति अथवा संप्रदाय के खिलाड़ी नहीं होते हैं। विभिन्न जाति, धर्म या प्रांत के खिलाड़ी टीम में शामिल किए जाते हैं। जब खेल शुरू होता है, तो टीम का प्रत्येक सदस्य बस खिलाड़ी होता है। वह यह भूल जाता है कि वह किस धर्म का है, किस जाति का है और उसके साथी उससे भिन्न हैं। खेल के मैदान पर हर खिलाड़ी का साथी जोश और जुनून होता है। 

वह बस यही जानता है कि टीम का प्रत्येक सदस्य उसका साथी है और उसे हर हालत में प्रतियोगिता जीतनी है। उस समय कोई भी हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई नहीं होता है। दर्शक भी खेल देखते समय जातीयता, धार्मिकता, प्रांतीयता जैसी भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता की भावना से ओत प्रोत होते हैं। वह केवल अपने देश को जीतता हुआ देखना चाहते हैं। यदि मैं दो प्रांतों के बीच हो रहा है, तो हर दर्शक अपने प्रांत को ही जीतता हुआ देखने की ख्वाहिश रखते हैं। 

अच्छा प्रदर्शन होने पर विरोधी टीम की प्रशंसा करने में भी पीछे नहीं रहते हैं। इसका उदाहरण पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में कई बार सामने आ चुका है, जब खिलाड़ी ने सब कुछ भुलाकर प्रतिस्पर्धी टीम की तारीफ की है। खेल खिलाड़ी को एकजुट रहने का संदेश देती है, अलगाव या नफरत का नहीं। खेल ही लोगों में प्रेम का प्रस्फुटन करा सकता है। यह क्षमता केवल खेल में है।

Thursday, July 9, 2026

बेटे ने आलस्य के चलते नहीं काटी फसल

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

समय किसी का इंतजार नहीं करता है। जो समय पर अपना काम पूरा कर लेते हैं, वही सुखी रहते हैं। एक बार काम का समय निकल गया, तो फिर लाख प्रयास करने के बावजूद बीते हुए समय को वापस नहीं लाया जा सकता है। आलसी लोग अपने समय की कीमत नहीं समझते हैं। समय बीत जाने पर वह पछताते हैं। किसी गांव में एक किसान रहता था। वह बहुत मेहनती था। 

खेती-किसानी में वह सुविधा-असुविधा का ख्याल नहीं रखता था। यही वजह थी कि वह खेती करके भी अपने परिवार का बहुत अच्छी तरह से ख्याल रखता था। उसके एक बेटा था। बेटा बहुत आलसी था। वह हर काम को टालता रहता था। किसान उसे बार-बार समझाता था कि आलस्य करना ठीक नहीं है। इससे जीवन में सफलता नहीं मिलती है और लोग भी आलसी आदमी को पसंद नहीं करते हैं। इसके बावजूद बेटे का आलस्य दूर नहीं होता था। एक दिन की बात है। 

किसान को किसी काम से नगर जाना था। उसने अपने बेटे को बुलाया और कहा कि खेत में फसल तैयार खड़ी है। दिन में किसी भी समय बारिश हो सकती है। इसलिए नौकर को लेकर साथ लेकर खेत पर चले जाना और फसल कटवा लेना। उस समय तो बेटे ने काम करने के लिए हां कह दिया, लेकिन वह दिन भर लेटा ही रहा। उस रात जोर की बरसात हुई। अब रात में फसल काटी भी नहीं जा सकती थी। 

सुबह बेटा खेत में गया, तो देखा कि बरसात की वजह से फसल खराब हो गई है। तभी किसान भी नगर से आ पहुंचा। बेटा सिर झुकाए खड़ा हुआ था। उसे देखकर किसान हंसने लगा। बोला, मैं जानता था कि तुम फसल नहीं काटोगे, इसलिए पड़ोसी से फसल कटवाने के लिए कह गया था। बेटे ने पूछा कि यह फसल किसकी है। किसान ने कहा कि यह फसल दूसरे की है। उसने फसल तो काट ली थी, लेकिन घर नहीं ले जा पाया था। उस दिन से बेटे ने आलस्य छोड़ने की प्रतिज्ञा की और एक अच्छा किसान बन गया।

बार-बार बिजली कटौती से उद्यमियों की बढ़ रही परेशानी

अशोक मिश्र

हरियाणा में मानसूनी बरसात होने से लोगों को हीटवेव जैसी समस्या से मुक्ति तो मिली, लेकिन उमस बढ़ गई। उस पर चौबीस घंटे में सात-आठ घंटे लगने वाले बिजली कट ने परेशानी और बढ़ा दी है। लोगों को बिजली कटौती के चलते कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। आम नागरिकों के साथ-साथ बिजली कटौती की वजह से औद्योगिक क्षेत्र को भी परेशानी हो रही है। बिजली कटौती के चलते कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को कई-कई घंटे खाली बैठे रहना पड़ता है। 

गुड़गांव, फरीदाबाद, मानेसर, कुंडली, सोनीपत और हिसार जैसे क्षेत्र लाखों लोगों को रोजगार देते हैं। इन शहरों को  राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से इन औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली कटौती की समस्या ने उत्पादन की रफ्तार को धीमा कर दिया है। बिजली कटौती के चलते कारखानों की मशीनें बंद हो जाती हैं। उद्यमियों को डीजल जनरेटर चलाने पड़ते हैं। इससे उत्पादन खर्च 10 से 12 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच जाता है, जिससे उत्पादन लागत भारी मात्रा में बढ़ गई है। समस्या का मूल कारण मांग और उपलब्धता के बीच का बढ़ता फासला है। 

नतीजा यह है कि फैक्ट्रियों को तय शेड्यूल के अलावा भी कई बार बिना सूचना के बिजली बंद करनी पड़ रही है। एक बार मशीन रुकी तो उसे दोबारा शुरू करने में समय, कच्चा माल और मजदूरी तीनों बर्बाद होते हैं। दूसरी तरफ बिजली की मांग हर साल 7 से 8 फीसदी बढ़ रही है। नए उद्योग लग रहे हैं, डेटा सेंटर आ रहे हैं, मेट्रो और ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन भी जुड़ रहे हैं। पर ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। कई सब-स्टेशन पुराने हैं और लोड सहन नहीं कर पाते। पीक आॅवर्स में ट्रिपिंग और वोल्टेज की समस्या आम हो गई है। बिजली केवल एक सुविधा नहीं है, यह आज के उद्योग की सांस है। जब सांस ही अनियमित हो जाएगी तो उत्पादन, रोजगार और राजस्व तीनों प्रभावित होंगे। 

राज्य के औद्योगिक संगठनों का कहना है कि बार-बार की बिजली कटौती के चलते न केवल उत्पादन घट रहा है, बल्कि कामगारों की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। छोटे और मझोले कल-कारखानों पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है। माल समय पर न बनने से निर्यातकों और बड़े खरीदारों के आॅर्डर रद्द हो रहे हैं। छोटे और मझोले संस्थान ज्यादा देर तक जेनरेटर चलाना काफी महंगा साबित हो रहा है। इसके चलते कई छोटे और मझोले कल-कारखाने बंद हो रहे हैं। 

इसका समाधान तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक योजना दोनों से निकलेगा। हालांकि सरकार यमुनानगर और पानीपत में नए बिजलीघर बना रही है ताकि आने वाले समय में पर्याप्त बिजली मिल सके। राज्य सरकार अपनी ओर से बिजली कटौती को रोकने का भरपूर प्रयास कर रही है, लेकिन सफलता नहीं मिल रही है।

Wednesday, July 8, 2026

हमें विद्यार्थी की तरह सीखते रहना चाहिए


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत में जब किसी बहुत बुद्धिमान, तेज दिमाग या असाधारण व्यक्ति को लोग देखते हैं, तो कह उठते हैं कि यह तो बड़ा अफलातून है। अफलातून का वास्तविक नाम प्लेटो था। प्लेटो का जन्म लगभग 427 ईसा पूर्व प्राचीन यूनान में हुआ था। वे केवल दार्शनिक ही नहीं थे, बल्कि गणित, राजनीति, नैतिकता, शिक्षा और मानव जीवन पर गहरी सोच रखने वाले महान चिंतक थे। 

वह शुकरात के शिष्य थे। अरबी और फारसी भाषाओं में प्लेटो को अफलातून कहा गया और वहीं से यह शब्द भारत तक पहुँचा। उन्होंने अपने जीवनकाल में एक स्कूल खोला था जिसका नाम था एकेडमी। कहते हैं कि प्लेटो से मिलने दुनिया भर से विद्वान आते थे। सभी लोग उससे कुछ न कुछ सीखते रहते थे। लोग प्लेटो को अत्यधिक ज्ञानी मानते थे, लेकिन प्लेटो का मानना था कि कोई भी व्यक्ति ज्ञानी नहीं हो सकता है क्योंकि वह सब कुछ नहीं जान सकता है। 

एक दिन की बात है। प्लेटो के एक मित्र ने कहा कि मुझे आपकी एक बात समझ में नहीं आती है। सारे लोग आपसे ज्ञान लेने आते हैं। वह यहां से कुछ न कुछ सीखकर जाते हैं, लेकिन आप उनसे ही सवाल पूछने लगते हैं। छोटी से छोटी जानकारी हासिल करने का प्रयास करते हैं। जबकि आप खुद विद्वान हैं। ऐसी स्थिति में आपको भला इन लोगों से सीखने की क्या जरूरत है। 

यह सुनकर प्लेटो बड़ी जोर जोर से हंसने लगे। उन्होंने मित्र को समझाते हुए कहा कि हर आदमी अपने जीवन में सब कुछ नहीं सीख सकता है। हर व्यक्ति के पास कुछ न कुछ ऐसी जानकारी होती है, जो दूसरों के पास नहीं होती है। मैं वही जानकारी हासिल करने का प्रयास करता हूं। हमें एक विद्यार्थी की तरह कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए।

शहरी जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी है खुले में कचरा फेंकने की आदत

 
अशोक मिश्र

हरियाणा में मानसूनी बरसात होने लगी है। बरसात होने के बाद लोगों को गर्मी से थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन सड़कों और गलियों में भरे पानी ने नई मुसीबत खड़ी कर दी है। सड़कों पर बने गड्ढे और गाद से भरी नालियों की वजह से बरसाती पानी सड़कों पर जमा हो रहा है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने तीन महीने पहले ही स्थानीय निकायों को निर्देश दिया था कि प्रत्येक जिलों में नाले, नालियों की सफाई मानसून आने से पहले कर ली जाए ताकि किसी भी इलाके में जलभराव जैसी समस्या का सामना न करना पड़े। 

मुख्यमंत्री के आदेश पर कितना अमल किया गया, इसके पता राज्य के कई जिलों की सड़कों और गलियों में जमा हुआ पानी दे रहा है। नालियों में गाद के अलावा सड़कों पर फेंका गया कूड़ा-करकट बहकर इन नालियों में भर गया है जिसकी वजह से हालात और खराब हो गए हैं। हरियाणा में स्वच्छता के मानकों पर फरीदाबाद, पलवल, और कैथल सबसे फिसड्डी (फेल) साबित हुए हैं। राज्यव्यापी स्वच्छता सर्वेक्षण और केंद्र की रिपोर्ट में इन शहरों में कूड़ा प्रबंधन और सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई पाई गई है। 

हरियाणा विकास और औद्योगिक प्रगति के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है, लेकिन जब बात स्वच्छता की आती है तो तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आती है। स्वच्छ भारत मिशन और स्वच्छ सर्वेक्षण की रिपोर्टें हर साल यही बताती हैं कि हरियाणा के कई शहर स्वच्छता के बुनियादी मानकों पर भी खरे नहीं उतर पा रहे। कचरा निपटान, सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति, नालियों की सफाई और खुले में कचरा फेंकने की आदतें आज भी हमारे शहरी जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी बनी हुई हैं। 

राज्य के कई जिलों में हालत यह है कि कई दिनों तक कूड़ा पड़ा सड़ता रहता है, लेकिन उस कचरे का निपटान नहीं होता है। लोगों की आदत भी यह है कि वह अपने घर का कूड़ा सड़कों पर फेंक देते हैं जिसको आसपास रहने वाले लावारिस पशु और कुत्ते बिखरा देते हैं। जब तक सड़क पर कचरा फेंकना, सार्वजनिक जगहों को गंदा करना बंद नहीं होगा, तब तक स्थानीय निकाय चाहे जितनी कोशिश कर लें, स्वच्छता के मामले में रैंकिंग उच्च नहीं रहने वाली है। कई जिलों में सुबह झाड़ू लगती है और दोपहर तक वही कचरा फिर सड़क पर लौट आता है। स्वच्छता कोई एक दिन का अभियान नहीं है। 

यह रोज की आदत और प्रशासनिक अनुशासन मांगती है। सबसे पहले नगर निकायों को अपने सिस्टम को दुरुस्त करना होगा। उसके बाद नागरिकों को भी अपनी आदत में सुधार लाना होगा ताकि राज्य की सड़कों, गलियों और कालोनियों को स्वच्छ रखा जा सके। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक स्वच्छता रैंकिंग में हरियाणा को उच्च रैंक हासिल नहीं हो सकता है। इससे प्रदेश की छवि को भी बट्टा लगता है।

Tuesday, July 7, 2026

तुम कपास का अस्तित्व क्यों बिगाड़ते हो?

 
बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रकृति परिवर्तनशील है। हर समय प्रकृति में बदलाव होता रहता है। जिस वस्तु का आज अस्तित्व है, कल वह मिट जाएगा। स्वयं प्रकृति भी परिवर्तनशील है। जो बच्चा आज पैदा हुआ है, एक दिन जवान होगा, फिर अधेड़ और एक दिन बूढ़ा होकर मर जाएगा। यह प्रकृति का नियम है। इस बात को एक बूढ़ा राजा नहीं समझ पाया। 

बूढ़ा राजा काफी समय से बीमार रहने लगा। उसने काफी उपचार भी करवाया। कई वैद्य आए, लेकिन उसकी बीमारी को ठीक नहीं कर सके। राजा दिनोंदिन अपने जीवन को लेकर निराश होता जा रहा था। उन्हीं दिनों दरबार में एक ज्योतिषी आया। उसने राजा की हालत देखकर घोषणा की कि राजा की आयु केवल एक माह ही शेष है। यह सुनकर राजा और चिंतित हो गया। 

संयोग से एकाध दिन बाद संतों का एक समूह उधर से जा रहा था। उसने सोचा कि राजा से ही मिल लिया जाए। मिलने पर राजा ने अपनी सारी पीड़ा बताई, तो एक संत ने कहा कि आपकी तो लंबी आयु है। राजा ने पूछा कि कैसे? तो संत उसे एक जुलाहे के पास ले गए। संत ने जुलाहे से कहा कि माना कि तुम कपड़ा बुनते हो, लेकिन कपास के अस्तित्व को क्यों बिगाड़ देते हो? 

जुलाहा बोला, यदि मैं कपास का अस्तित्व नहीं बिगाड़ूं, तो कपड़ा कैसे बुनूंगा? कपास का अस्तित्व कुछ दिन बाद प्रकृति वैसे ही बिगाड़ देती। मैं कपास का अस्तित्व मिटाकर समाज के उपयोग में आने वाला कपड़ा बुनता हूं। तब संत ने राजा को समझाया कि ठीक इसी प्रकार एक दिन यह शरीर भी नष्ट हो जाएगा तो क्यों न इसका उपयोग किया जाए।

यह सुनकर राजा समझ गया कि संत उसे क्या समझाना चाहते हैं। उसने उसी दिन से चिंता करना छोड़ दिया और स्वस्थ हो गया।