बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
चीन में कई दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने अपने विचारों से चीन को बहुत प्रभावित किया है। चीन के कुछ प्रसिद्ध दार्शनिकों में कन्फ्यूशियस, लाओत्जू, सन त्जू, मेनसियस, मोजी जैसे लोग शामिल हैं। कन्फ्यूशियस को तो महात्मा बुद्ध का समकालीन माना जाता है।चीन के कुछ दार्शनिक ईसा पूर्व और कुछ पहली से लेकर पांचवीं ईस्वी तक पैदा हुए हैं। कन्फ्यूशियस चीन ही नहीं लगभग पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। ऐसे ही किसी एक दार्शनिक की कथा है। कहते हैं कि वह बहुत ही हंसमुख और फक्कड़ किस्म के दार्शनिक थे। वह किसी जगह बंधकर रहना भी पसंद नहीं करते थे। एक दिन की बात है। उस देश का राजा अपने लाव लश्कर के साथ घूमने निकला था।
उसने दार्शनिक को नदी के किनारे में मस्ती में बैठे हुए देखा, तो उसके पास गया। उसने काफी देर तक दार्शनिक से बात की। वह दार्शनिक की बातों से बहुत प्रभावित हुआ। घूमने फिरने के बाद जब राजा अपने महल में पहुंचा, तो उसे दार्शनिक की याद आई।
उसने एक मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि उस दार्शनिक को महल में पेश किया जाए। मंत्री ने अगले दिन दार्शनिक को राजमहल में पेश कर दिया। राजा ने उसका आवभगत किया और कहा कि मैं आपकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हूं। मैं आपको अपना प्रधानमंत्री बनाना चाहता हूं। दार्शनिक ने राज महल में इधर उधर देखा। उसकी निगाह एक कछुए की मूर्ति पर पड़ी।
उसने राजा से कहा कि एक बात बताइए। यदि इस कछुए में जान होती तो क्या यह यहां रुकता? राजा ने कहा कि नहीं। पानी का जीव है, पानी में ही रहना पसंद करता। तब दार्शनिक ने कहा कि क्या आपने मुझे कछुए से भी ज्यादा मूर्ख समझ लिया है। मैं अभी स्वतंत्र हूं। प्रधानमंत्री बनकर परतंत्रता और जिम्मेदारियों का बोझ क्यों उठाऊं। राजा उसकी बात समझ गया। उसने दार्शनिक को सम्मान के साथ विदा कर दिया।








