Monday, May 18, 2026

आलसी आदमी से कुछ नहीं हो सकता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पंचतंत्र का एक सूत्र वाक्य है-उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी:, दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति। उद्यम करने वाले पुरुषों को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है। कायर लोग ही यह कहते हैं कि जो भाग्य में लिखा होगा, वही होगा। भाग्य किसी को धनवान या सुखी नहीं बनाता है। उद्यम करने से ही मनुष्य सफल होता है। किसी गांव में एक व्यक्ति रहता था। वैसे तो वह भला आदमी था। 

लोगों की समय-समय पर सहायता भी किया करता था। लोगों के साथ हिल मिलकर रहने में विश्वास करता था। मृदुभाषी भी था। लेकिन उसमें एक ही अवगुण था। वह हर काम को टालता रहता था। जब तक मजबूरी न हो जाए, तब तक वह हर काम को टाल देता था। एक बार की बात है। उसके गांव में एक साधु आया। उस व्यक्ति ने साधु की सात दिनों तक खूब सेवा की। 

वह साधु की बातों से काफी प्रभावित था। जब साधु गांव से जाने लगा तो उसने उस व्यक्ति को पारस पत्थर देते हुए कहा कि तुम सात दिनों तक पारस पत्थर की सहायता से जितना चाहो, लोहे को सोने में बदल सकते हो। उस आदमी ने अगले दिन घर में लोहा खोजा तो बहुत कम लोहा मिला। उसने उस लोहे को सोने में बदलकर और लोहा खरीदने बाजार गया। 

बाजार में लोहे के दाम उसे बहुत ज्यादा लगे। वह लौट आया। अगले दिन गया, तो लोहे के भाव पिछले दिन से भी ज्यादा लगे। उसने लोहा नहीं खरीदा। इस तरह सात दिन बीत गया। आठवें दिन साधु दरवाजे पर आ खड़ा हुआ और पारस पत्थर वापस मांगा। उस आदमी ने कहा कि मैं तो अभी तक कुछ कर भी नहीं पाया। साधु ने कहा कि तुम्हारीजगह कोई दूसरा होता, तो न जाने कितने लोहे को सोने में बदल चुका होता। तुम जैसे आलसी से कुछ नहीं हो सकता है। उस आदमी ने साधु से एक दिन की मोहलत मांगी, लेकिन साधु तैयार नहीं हुआ। अपना पारस पत्थर लेकर चला गया।

न जाने कब लावारिस पशुओं से मुक्त होंगी हरियाणा की सड़कें?

अशोेक मिश्र

पशु कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते थे। प्राचीन काल में खेती भी हल-बैल के सहारे होती थी। ऐसी स्थिति में ग्रामीण इलाकों में हर घर में पशु जरूर पाले जाते थे। दूध-दही के लिए गाय-भैंस पाले जाते थे। खेती के लिए बैलों को पाला जाता था। इनके गोबर से खेत की उर्वरता बढ़ाई जाती थी। आवश्यकता से अधिक होने पर गाय, बैल या भैंस को बेच करके किसान अतिरिक्त कमाई भी कर लेता था। 

बैलगाड़ी से उसकी आने-जाने की समस्या भी हल हो जाती थी और सामान की ढुलाई भी कर लिया करता था। जैसे-जैसे ग्रामीण जीवन में मशीनों का हस्तक्षेप बढ़ता गया, बैलों की उपयोगिता कम होती गई। धीरे-धीरे बैल खेती-किसानी के काम में अप्रासंगिक होते चले गए। अब यह किसानों के लिए एक बोझ की तरह हो गए। इनके चारे की व्यवस्था करना भी किसानों पर भारी पड़ने लगा। 

ऐसी हालत में किसानों के सामने नर पशुओं को खुले में छोड़ देने का विकल्प ही बचा। बूचड़खाने भी सरकारी की सख्ती की वजह से बंद होते चले गए। ऐसी स्थिति में सड़कों और अन्य जगहों पर छोड़े गए पशु घूमने लगे। देश के कई राज्यों के साथ-साथ हरियाणा में भी लावारिस पशु एक बहुत बड़ी समस्या बन गए हैं। शहर और गांवों में गाय-भैंस पालने वाले लोग नर पशु को लावारिस छोड़ देते हैं। जिसकी वजह से लोगों को काफी परेशानी होती है। सड़कों और गलियों में घूमते लावारिस पशु कई बार हादसे का कारण बन जाते हैं। 

सैनी सरकार कई बार यह घोषणा कर चुकी है कि सड़कों को लावारिस पशुओं से मुक्त कराया जाएगा, लेकिन हर बार घोषणा पर अमल नहीं हुआ। प्रदेश में गौशालाओं की संख्या भी पर्याप्त नहीं है। जो गौशालाएं संचालित भी हो रही हैं, उनमें भी क्षमता से अधिक पशु भरे हुए हैं जिसकी वजह से न तो उनकी अच्छी तरह से देखभाल हो पाती है और न ही उन्हें उचित चारा मिल पाता है। नतीजा यह होता है कि गौशालाओं में गायें कृषकाय हो जाती हैं। उनमें से कई तो बीमार होती हैं, लेकिन उनके इलाज की कोई समुचित व्यवस्था भी नहीं की जाती है। सरकार इन गौशालाओं को अच्छा खासा पैसा भी देती है। 

हर गाय, नंदी और भैंस आदि के लिए अलग-अलग राशि तय की गई है। सरकार प्रदेश के इन गौशालाओं को करोड़ों रुपये हर साल मुहैया कराती है। इसके बावजूद हालात बदतर हैं। हरियाणा के लगभग हर जिले में सड़कों पर लावारिस पशु घूमते दिखाई देते हैं। यह झुंड बनाकर यहां-वहां खड़े रहते हैं। कई बार तो इन पशुओं की आपसी लड़ाई में उधर से गुजरने वाले राहगीर घायल हो जाते हैं। कई लोगों की तो ऐसे हादसों में मौत तक हो जाती है। लोग अपंग हो जाते हैं। प्रशासन और स्थानीय निकाय सरकार के दबाव में लावारिस पशुओं को पकड़ने का अभियान तो चलाते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद हालात पहले जैसे हो जाते हैं।

Sunday, May 17, 2026

मैं कछुए से भी ज्यादा मूर्ख हूं क्या?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

चीन में कई दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने अपने विचारों से चीन को बहुत प्रभावित किया है। चीन के कुछ प्रसिद्ध दार्शनिकों में कन्फ्यूशियस, लाओत्जू,  सन त्जू, मेनसियस, मोजी जैसे लोग शामिल हैं। कन्फ्यूशियस को तो महात्मा बुद्ध का समकालीन माना जाता है। 

चीन के कुछ दार्शनिक ईसा पूर्व और कुछ पहली से लेकर पांचवीं ईस्वी तक पैदा हुए हैं। कन्फ्यूशियस चीन ही नहीं लगभग पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। ऐसे ही किसी एक दार्शनिक की कथा है। कहते हैं कि वह बहुत ही हंसमुख और फक्कड़ किस्म के दार्शनिक थे। वह किसी जगह बंधकर रहना भी पसंद नहीं करते थे। एक दिन की बात है। उस देश का राजा अपने लाव लश्कर के साथ घूमने निकला था। 

उसने दार्शनिक को नदी के किनारे में मस्ती में बैठे हुए देखा, तो उसके पास गया। उसने काफी देर तक दार्शनिक से बात की। वह दार्शनिक की बातों से बहुत प्रभावित हुआ। घूमने फिरने के बाद जब राजा अपने महल में पहुंचा, तो उसे दार्शनिक की याद आई। 

उसने एक मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि उस दार्शनिक को महल में पेश किया जाए। मंत्री ने अगले दिन दार्शनिक को राजमहल में पेश कर दिया। राजा ने उसका आवभगत किया और कहा कि मैं आपकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हूं। मैं आपको अपना प्रधानमंत्री बनाना चाहता हूं। दार्शनिक ने राज महल में इधर उधर देखा। उसकी निगाह एक कछुए की मूर्ति पर पड़ी। 

उसने राजा से कहा कि एक बात बताइए। यदि इस कछुए में जान होती तो क्या यह यहां रुकता? राजा ने कहा कि नहीं। पानी का जीव है, पानी में ही रहना पसंद करता। तब दार्शनिक ने कहा कि क्या आपने मुझे कछुए से भी ज्यादा मूर्ख समझ लिया है। मैं अभी स्वतंत्र हूं। प्रधानमंत्री बनकर परतंत्रता और जिम्मेदारियों का बोझ क्यों उठाऊं। राजा उसकी बात समझ गया। उसने दार्शनिक को सम्मान के साथ विदा कर दिया।

अरावली पर्वतमाला को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज

अशोक मिश्र

अरावली पर्वतमाला की जो वर्तमान स्थिति है, वह वास्तव में चिंताजनक है। सुप्रीम कोर्ट का अरावली में होने वाले वैध या अवैध खनन को लेकर चिंता जाहिर करना, साबित करता है कि यदि अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र से खिलवाड़ किया गया तो इसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। 

शुक्रवार को अरावली मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं को फिर से परिभाषित नहीं कर देती, तब तक अरावली के एक इंच हिस्से को भी खनन के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अरावली पहाड़ियों के लिए विवादास्पद सौ मीटर की ऊंचाई की परिभाषा को स्वीकार करने वाले अपने फैसले पर रोक लगाने के पांच महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई हो रही थी। 

न्यायालय ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट कहना है कि पर्यावरण से जुड़े इस संवेदनशील मामले पर वह पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही कोई अंतिम फैसला लेगा। 

गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए अरावली पर्वत शृंखलाओं का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि यह केवल  धरती पर उगी पत्थरों की केवल एक श्रृंखला भर नहीं है। यह उत्तर भारत में रहने वाले लोगों के लिए प्राकृतिक प्राणदायिनी भी है। अरावली एक बड़े भूभाग में रहने वाले लोगों को आक्सीजन प्रदान करने का सबसे बड़ा माध्यम भी है। अरावली पर्वत माला थार के रेगिस्तान को हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने से हजारों वर्षों से रोक रही है। 

अरावली पर्वत मामला दिल्ली और हरियाणा की उर्वरा भूमि को सदियों से रेगिस्तान बनने के खिलाफ एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी है। इस पर्वत शृंखला पर उगे लाखों पेड़ थार के रेगिस्तान से उठने वाले रेत के कणों को आगे बढ़ने से रोक देते हैं। अरावली में पिछले कई दशकों से हो रहे खनन और विस्फोटों के चलते न जाने कितने कई पहाड़ पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अवैध खनन या अवैध पेड़ों की कटाई वाले क्षेत्रों में भूजल स्तर  काफी हद तक गिर गया है। 

इन इलाकों में जमीन में जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। इससे इन इलाकों में रहने वाली आबादी को पानी की समस्या झेलनी पड़ रही है। खनन और पेड़ों की कटाई के चलते वन्यजीवों का स्वाभाविक आवास छिन रहा है। यही वजह है कि वनों में रहने वाले जानवर अब मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। वन्यजीवों और मानव में संघर्ष बढ़ रहा है।

Saturday, May 16, 2026

नेत्रहीन होकर भी बने महान संगीतकार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यदि मन में सच्ची लगन हो, तो कोई भी बाधा सफलता हासिल करने से नहीं रोक सकती है। दिव्यांग व्यक्ति भी सामान्य लोगों की तरह सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच सकता है। इसके सबसे बेहतरीन उदाहरण संगीतकार रवींद्र जैन थे। 

रवींद्र का जन्म 28 फरवरी 1944 को अलीगढ़ में हुआ था। जब उनका जन्म हुआ, तो उनके माता-पिता ने पाया कि उनका बेटा आंखें नहीं खोल रहा है। वह घबरा गए। उसको लेकर तुरंत नेत्र चिकित्सक के पास पहुंचे। चिकित्सक ने उनकी पलकों का आपरेशन तो कर दिया, लेकिन नेत्र ज्योति फिर भी नहीं आई। माता-पिता इससे निराश नहीं हुए। थोड़ा बड़ा होने पर उन्होंने अपने बेटे को हारमोनियम पकड़ा दिया। 

घर पर ही संगीत की शिक्षा दी जाने लगी। अलीगढ़ के ही दृष्टिबाधित स्कूल में पढ़ाई पूरी करने के बाद संगीत की उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता चले गए। दस वर्ष तक कठिन परिश्रम से हासिल हुई शिक्षा का उपयोग वह रेडियो स्टेशन पर गाने के लिए आडिशन देने लगे। 

कुछ समय तक रवींद्र जैन ने भजन भी गाए। रोजगार के लिए उन्होंने मुंबई का रुख किया और सन 1972 में वह फिल्मों में गाने लगे। भारत में सबसे प्रसिद्ध माने जाने वाले रामानंद सागर निर्देशित सीरियल रामायण  में संगीत देने के बाद तो वह घर-घर में पहचाने जाने लगे। 

रवींद्र जैन को सन 1985 में फिल्म राम तेरी गंगा मैली के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार भी मिला है। वर्ष 2015 में उनको पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह महान संगीतकार और गीतकार 9 अक्टूबर 2015 को 82 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गया। उनका संगीत आज भी अमर है।

लोगों की जागरूकता और सतर्कता से ही रुक सकती है साइबर ठगी


अशोक मिश्र

साइबर ठगों से पूरा देश त्रस्त है। देश का शायद ही कोई जिला हो, जहां रोज दो-चार साइबर ठगी की घटनाएं न हो रही हों। हरियाणा भी इससे अछूता नहीं है। सरकार, पुलिस और अन्य समाजसेवी संस्थाएं लोगों से साइबर ठगी के मामले में जागरूक होने की अपील करते हुए थक नहीं रही हैं, लेकिन लोगों के भीतर बैठा लालच उन्हें ठगों के चंगुल में फंसा रहा है। पुलिस जागरूकता अभियान चलाकर बार-बार समझा रही है कि अनजान वीडियो कॉल या व्हाट्सएप पर आए किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें। 

ट्राई या सीबीआई के नाम पर डराने वाले कॉल से बिल्कुल न डरें। सरकारी संस्थाएं किसी भी व्यक्ति से फोन पर संपर्क नहीं करते हैं। वे कभी फोन पर जांच भी नहीं करते है। सरकार विभिन्न माध्यमों से बार-बार बताती है कि किसी भी अनजान व्यक्ति को अपना बैंक विवरण, पिन या ओटीपी साझा न करें। इसके बावजूद लोग साइबर ठगी के शिकार हो जाते हैं। इसके पीछे लोगों की कम समय में ज्यादा धन कमाने की इच्छा भी है। किसी ने ह्वाट्सएप ग्रुप या किसी अन्य माध्यम से संपर्क किया। 

चिकनी-चुपड़ी बातें की, पूंजी निवेश में ज्यादा मुनाफा का लालच दिखाया, तो उसके झांसे में आकर अपनी पूंजी सौंप दी। लोग अपने सगे भाई-बहनों, माता-पिता पर पैसे के मामले में विश्वास नहीं करते हैं, लेकिन पता नहीं कैसे अनजान व्यक्ति पर भरोसा कर लेते हैं। सरकारी एजेंसियां साइबर ठगी के खिलाफ लगातार कार्रवाई करती रहती हैं। सरकार ने 2025 में 6,300 से अधिक मामले दर्ज किए थे। 1.5 लाख से अधिक फर्जी सिम/मोबाइल ब्लॉक किया जा चुका है। 1930 हेल्पलाइन के माध्यम से 40 प्रतिशत तक ठगी गई राशि को बैंक खातों में होल्ड/फ्रीज किया जा चुका है। 

हरियाणा पुलिस पर बढ़ते विश्वास के परिणामस्वरूप पिछले वर्ष 2025 में कुल 1,41,685 शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जो वर्ष 2024 की तुलना में 8.5 प्रतिशत अधिक थीं। गिरफ्तारी के मोर्चे पर वर्ष-2025 में हरियाणा पुलिस ने शानदार प्रदर्शन किया था। पिछले वर्ष कुल 8,022 साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। औसतन 22 अपराधियों की गिरफ्तारी प्रतिदिन की गई। इन सख्त कार्रवाइयों का सीधा असर यह हुआ कि साइबर ठगी की कुल राशि 980 करोड़ से घटकर 630 करोड़ रुपये रह गई। 

आंकड़े के आधार पर बात कही जाए, तो लोगों की 36 प्रतिशत जमा पंूजी को साइबर अपराधियों के खातों में जाने से रोका गया, जो प्रतिदिन लगभग एक करोड़ रुपये के आसपास पहुंचता है। वर्ष 2025 की शुरुआत में हरियाणा पुलिस द्वारा अपनाई गई पांच सूत्रीय रणनीति के तहत साइबर अपराध के पूरे इकोसिस्टम पर प्रहार किया गया। इसके अंतर्गत 1.50 लाख से अधिक मोबाइल नंबर, 12,326 आईएमईआई और 5,123 फर्जी वेबसाइट/सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक किए गए।

Friday, May 15, 2026

जीजा के साथ गोवा चली जाऊंगी


14 मई 2026 को दैनिक प्रभात खबर में प्रकाशित।
व्यंग्य

अशोक मिश्र

‘ना मानूं, ना मानूं, ना मानूं। मैं आपकी किसी कोई बात नहीं मानूंगी। आप झूठ बोलते हैं, फिर बहाना बनाकर निकल जाते हैं।’ घरैतिन नेता प्रतिपक्ष की तरह हाथ नचा-नचाकर बोल रही थीं। दरअसल, मैं भी गठबंधन के सहारे चल रही सरकार के मुखिया की तरह सिर झुकाए बैठा हुआ था। पत्नी और बेटा-बेटी का समर्थन लिए मेरी गृहस्थी रूपी सरकार चल भी नहीं सकती थी। गृहस्थी चलानी है, तो इन तीनों का सहयोग और समर्थन चाहिए। यह सभी जानते हैं कि दुनिया में सबसे कठिन काम पति होना है। पति और पिता को न जाने कितने समझौते करने पड़ते हैं। सुबह से ही मेरे घर में आपात बैठक चल रही थी। पत्नी, बेटा और बेटी तीनों गठबंधन धर्म का निर्वाह कर रहे थे। मेरे ही खिलाफ आक्रोश प्रदर्शन कर रहे थे।

मेरी आसंदी यानी जहां मैं बैठा हुआ था, वहां आकर मेरी बेटी मेरा कंधा झकझोरकर कह चुकी थी कि छुट्टियों में अगर आप हम सबको शिमला घुमाने नहीं ले गए, तो वह समर्थन वापस ले लेगी और मम्मी से कहकर मौसा जी के साथ गठबंधन करके नई सरकार बना लेगी।

पत्नी गोवा जाने की जिद पर अड़ी हुई थी। कह रही थी कि पिछले साल भी आपने गोवा ले जाने को कहा था। आखिरी समय पर आफिस का बहाना बनाकर टाल गए थे। इस बार अगर आपने आनाकानी की, तो मैं बच्चों को लेकर अपने जीजा के साथ गोवा घूमने चली जाऊंगी। बेटा बस इतना चाहता था कि इस बार की छुट्टियों में कहीं घूमने चला जाए, कोई स्थान विशेष उसकी च्वाइस में नहीं थी। मैं कई बार घरैतिन को समझा चुका था कि मेरी हालत पाकिस्तान जैसी है। वह तो अपनी गरीबी से  उबरने के लिए शराब बेच सकता है, लेकिन मेरे पास तो ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे बेचकर बच्चों को कहीं घुमाने ले जा सकूं। मेरी अर्थव्यवस्था सेंसेक्स की तरह ऊपर चढ़ ही नहीं रही है। महंगाई ने कमर तोड़ रखी है। मुद्रा अवमूल्यन रोज होता जा रहा है। बारह साल पहले जो सैलरी मिलती थी, उतनी ही मूल्य की सैलरी आज भी मिलती है। लेकिन परिवार वाले मेरी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। उन्हें तो लग रहा था कि भारत की तरह मेरी अर्थव्यवस्था पांच से सात ट्रिलियन डॉलर के बीच है। मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी हूं।

मेरी बेटी ने अपनी मां से कहा, मम्मी! बड़े मौसा जी से बात कीजिए। पूछिए कि वह हम सबको गोवा घुमाने ले जाने के लिए तैयार हैं? मौसी के साथ गोवा घूमने में मजा आ जाएगा। मैं तो जिंदगी में पहली बार समुद्र देखूंगी, कितना मजा आएगा। मैंने उस हालत में वॉक आउट करना ही उचित समझा। शाम को जब घर लौटा, तो पता चला कि घरैतिन ने अपने सहयोगी दलों यानी बेटा-बेटी को लेकर अपने जीजा-जीजी के साथ नई सरकार के गठन पर बातचीत करने के लिए गोवा जाने का फैसला किया है। मैं समझ गया कि मेरी अल्पमत की सरकार खतरे में है। मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी।

मन का अभिमान दूर हो चुका था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अभिमान वह दीमक है, जो व्यक्ति को धीरे-धीरे सफाचट कर जाता है। जिसे एक बार अभिमान हो गया, समझो कि वह पतन की ओर बढ़ चला है। उसके सुख-समृद्धि सब कुछ नष्ट होने वाला है। अभिमान पालने वाला यदि राजा भी हो, तो कुछ ही दिनों में वह रंक हो जाता है। 

किसी राज्य में राजा को अभिमान होने लगा। वैसे वह बहुत ही दयालु और गुणवान राजा था। उसने जीवन में कभी अपनी प्रजा के साथ राजा की तरह व्यवहार नहीं किया था। वह हमेशा अपनी प्रजा को पुत्रवत मानकर ही व्यवहार किया था। वह अपनी प्रजा का हर तरह से ख्याल रखता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका मन काफी चंचल हो रहा था। वह कई दिनों से अपने मन को साधने में लगा हुआ था। 

वह अपने राजा होने या राजकोष की संपदा पर कतई अभिमान नहीं करना चाहता था। लेकिन वह राजा था तो क्या हुआ, था तो इंसान ही। धीरे-धीरे उसके मन में अपने वैभव को लेकर अभिमान की भावना स्थायित्व पाने लगी। इसी कशमकश में वह अपने राजगुरु के पास पहुंचा। राजगुरु राजा को देखते ही सारा माजरा समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि तुम मेरी तीन बातों को हमेशा याद रखोगे, तो तुम सामान्य जीवन जी सकोगे। पहली बात यह है कि सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। 

दूसरी बात कि कभी भरपेट भोजन मत करना। तीसरी बात कि कम से कम सोना। सोने से बचे हुए समय में प्रजा की रक्षा करना। राजसी वैभव का मोह मत करना। जब जहां जैसा बिस्तर मिले, सो जाना। ऐसी स्थिति में तुम्हें घासफूस के बिस्तर पर भी अच्छी नींद आएगी। राजा अपने गुरु की बातों का मर्म समझ गया। उसने गुरु को प्रणाम किया और राज महल लौट आया। उसके मन का अभिमान दूर हो चुका था।

हवा में घुलने वाली अमोनिया गैस सांसों में घोल रही जहर

   

अशोक मिश्र

हरियाणा में वायु प्रदूषण के चलते सांस लेना भी दूभर होता जा रहा है। राज्य के औद्योगिक और शहरी इलाकों में हवा में घुली अमोनिया गैस लोगों की सांस घोट रही है। इसकी वजह से लोगों को कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। अमोनिया गैस के संपर्क  में आने वाले लोगों को  सांस लेने में तकलीफ होने के साथ-साथ खांसी, गले में जलन और छाती में जकड़न होती है। हवा में घुली अमोनिया गैस आंखों और त्वचा के लिए भी हानिकारक है। 

इसकी वजह से आंखों में तेज जलन पैदा होती है जिससे आंखों से पानी आने लगाता है। त्वचा में लालिमा आ सकती है जिससे खुजली भी हो सकती है। यही नहीं, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अमोनिया के संपर्क में रहे, तो वह दमा जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है। निमोनिया और फेफड़ों में पानी जमा होना आम बात है।  इनसान के तंत्रिका तंत्र पर भी बुरा असर पड़ सकता है। 

आंकड़े बताते हैं कि गुरुग्राम में हर दूसरा बच्चा श्वसन समस्याओं से जूझ रहा है। इसका बड़ा कारण प्रदूषित हवा है। रैस्पायर लिविंग साइंसिज की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि गुरुग्राम का सेक्टर-51 में कूड़े-कचरे के अंबार से बन रही जहरीली अमोनिया गैस का बड़ा हॉटस्पॉट बन चुका है। राज्य में पी. एम. 2.5 और पीएम 10 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से दोगुने से भी अधिक दर्ज किया गया है जबकि अमोनिया के स्तर में आठ फीसदी की बढ़ोतरी सामने आई है। गुरुग्राम के कुछ इलाके कूड़े के ढेरों और औद्योगिक कचरे के कारण अमोनिया के हॉटस्पॉट बन गए हैं।

इतना ही नहीं, फरीदाबाद, बहादुरगढ़, मानेसर और सोनीपत की औद्योगिक पट्टी इंसानों के लिए खतरे का कारण बनती जा रही है। इंसानों के स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण का बहुत बुरा असर हो रहा है। खेतों में यूरिया आधारित उर्वरकों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल हवा में अमोनिया गैस को बढ़ावा दे रहा है। खेतों में डाला गया उर्वरक बाद में हवा के संपर्क में आने के बाद अमोनिया गैस बनने का कारण है। पानीपत और सोनीपत के औद्योगिक बेल्ट में कपड़ा रंगाई इकाइयों और अन्य कारखानों से बिना उपचारित रसायन युक्त पानी यमुना नदी में छोड़ा जा रहा है जो हवा में अमोनिया का एक बड़ा स्रोत है। 

राज्य के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जमा कूड़े के अंबार से अमोनिया गैस का रिसाव होता है। कूड़े में पड़े अपशिष्ट जब सड़ने लगते हैं या उन पर सूरज की किरणें पड़ने से अपशिष्ट गर्म होता है, तब उससे अमोनिया गैस निकलती है। पशुधन अपशिष्ट से भी अमोनिया वायुमंडल में मिल रही है। ऐसी स्थिति में अगर बदलाव नहीं आया तो निकट भविष्य में लोगों को कई तरह की बीमारियों का शिकार होना पड़ सकता है। राज्य सरकार ऐसी स्थिति से बचने के लिए कई तरह के उपाय कर रही है। इसके बावजूद उद्योगों को भी इस काम में मदद करनी चाहिए और अपशिष्ट को नदी या खुले में फेंकने से बचना चाहिए।

Thursday, May 14, 2026

अरे! यह भोजन तो बासी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मित्रता का अर्थ यह नहीं है कि साथ घूमे-फिरे। सुख में मित्रता का दंभ भरा और जब संकट का समय आया, तो अपने मित्र से कन्नी काटकर निकल गए। मित्रता तो मित्र की मौत के बाद भी कायम रहती है।  दो मित्रों की एक बहुत ही अच्छी कथा है। किसी नगर में दो मित्र रहते थे। 

दोनों मित्र एक दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे। अमीरी-गरीबी या ऊंच-नीच की भावना उनमें कभी नहीं आई। संयोग की बात है। एक दिन एक मित्र की मौत हो गई। उम्र भी लगभग साठ के आसपास की हो गई थी। जीवित बचे मित्र को बहुत दुख हुआ। वह जानता था कि उसके मित्र का पुत्र आलसी और लापरवाह है। उसके मित्र ने काफी मेहनत करके खूब धन कमाया था। 

मित्र का पुत्र अपने आलस्य के चलते कुछ ही दिनों में सारे धन को खर्च कर बैठेगा। फिर कंगाली का जीवन जीना पड़ेगा। मित्र की मौत के कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति दिवंगत मित्र के घर गया। मित्र का पुत्र उसे जानता था। उसने बड़े सम्मान के साथ उसे बैठाया और आग्रह करते हुए कहा कि कुछ दिनों बाद त्यौहार आ रहा है। कृपया आप उस दिन भोजन पर पधारें। उस आदमी ने आग्रह स्वीकार कर लिया। जब वह व्यक्ति खाने पर बैठा, तो उसने पहला निवाला खाने के बाद कहा, अरे यह भोजन तो बासी है। 

मित्र के पुत्र ने कहा कि नहीं, यह तो अभी बनाया गया है। बासी कैसे हो सकता है। उस आदमी ने कहा कि इसमें गंध तो बरसों पुरानी आ रही है। मित्र का पुत्र समझ गया कि वह क्या कहना चाहते हैं। जिस धन से यह भोजन बना है, वह मेरे पिता का कमाया हुआ है। पुत्र ने अपने पिता के मित्र से कहा कि आप क्या कहना चाहते हैं, मैं समझ गया हूं। आप निश्चिंत रहें। मैं अपने पिता की संपत्ति में कमी नहीं आने दूंगा। मैं मेहनत करूंगा और अपनी कमाई से आपको भेजन कराऊंगा। यह सुनकर उस आदमी ने भोजन किया और संतुष्ट होकर अपने घर चाला गया।