Wednesday, September 30, 2026

ज्ञान का सागर तो अथाह है, आनंद!


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध का प्रिय शिष्य आनंद था। आनंद महात्मा बुद्ध का चचेरा भाई थी। गौतम बुद्ध के जीवन के अंतिम 25 वर्षों तक साये की तरह उनके साथ रहा। आनंद के पिता राजा शुक्लोदना (अमितोदना) महात्मा बुद्ध के चाचा थे। आनंद का बड़ा भाई देवदत्त था। पक्षी वाले प्रसंग में इसी देवदत्त की चर्चा होती है। 

प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों जैसे सुत्त पिटक आदि में आनंद को अत्यंत प्रखर बुद्धि का बताया गया है। उन्होंने तथागत के उपदेशों को अक्षरश: याद रखा था। पाली परंपरा के अनुसार, आनंद के प्रथम गुरु बेलट्ठसीस और पुन्ण मंतानीपुत्त थे । पुन्ण के उपदेशों से ही आनंद को सोतापन्न की अवस्था प्राप्त हुई, जो ज्ञानोदय से पूर्व की अवस्था है। आनंद ने बाद में पुन्ण के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध  और आनंद एक सघन वन से गुजर रहे थे। दोनों किसी बात पर चर्चा भी करते जा रहे थे। एकाएक आनंद ने पूछा, भगवन! आपने बहुत सारा ज्ञान अर्जित किया है। क्या आप मुझे अपना समस्त ज्ञान दे चुके हैं? बुद्ध ने जवाब देने की जगह आनंद से ही सवाल पूछ लिया, यह बताओ आनंद, इस वन में कितने सूखे पत्ते गिरे होंगे। हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं, उस वृक्ष से कितने सूखे पत्ते गिरे हैं और कितने सूखे पत्ते अभी ऊपर लटक रहे हैं? 

आनंद इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए। तब तथागत ने उनसे कहा कि दुनिया में ज्ञान का अथाह भंडार है। मैं उस अथाह भंडार से कितना ग्रहण कर पाया मैं नहीं कह सकता हूं। मैं तुम लोगों को कितना दे पाया, यह भी नहीं कह सकता हूं। इस अथाह ज्ञान सागर से जितना ग्रहण कर सको, उतना ग्रहण कर लो। संपूर्ण ज्ञान तो कोई एक व्यक्ति ग्रहण ही नहीं कर सकता है।

अब हरियाणा में खेत और घर तक पहुंचेगा ड्रोन कैपिटल का सपना

अशोक मिश्र

हरियाणा को ड्रोन कैपिटल बनाने की दिशा में सरकार ने अब कदम बढ़ा दिया है। 28 सितंबर को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि देश-विदेश में ड्रोन की बढ़ती जरूरतों तथा विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगिता को देखते हुए हरियाणा में ड्रोन निर्माण के क्षेत्र में रिसर्च पर विशेष फोकस किया जाएगा। हरियाणा को 'ड्रोन कैपिटल' बनाया जाएगा। यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि एक औद्योगिक रणनीति है। जब पूरी दुनिया में ड्रोन बनाने की होड़ लगी है, चीन बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहा है, अमेरिका और इजरायल रक्षा ड्रोन में आगे हैं, ऐसे में हरियाणा की योजना फायदेमंद इसलिए है क्योंकि वह केवल खरीददार नहीं, निर्माता बनने की सोच रहा है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा ड्रोन आयातक न बनकर यदि हिसार जैसे हब से युवाओं को निर्माण और ट्रेनिंग देगा तो लागत घटेगी, मेंटेनेंस लोकल होगा और युवाओं का पलायन रुकेगा। केंद्र की उदार ड्रोन नीति, पीएलआई योजना और हरियाणा की औद्योगिक जमीन, गुरुग्राम-मानेसर का इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरिडोर इस सपने को व्यावहारिक बनाते हैं। हिसार के सिसाय में देश के पहले और दक्षिण एशिया के सबसे बड़े ड्रोन प्रशिक्षण संस्थान और ड्रोन विनिर्माण यूनिट का ई-शुभारंभ हो चुका है, जहाँ अब तक 252 ड्रोन पायलट तथा 136 ड्रोन तकनीशियन तैयार किये जा चुके हैं। 

युवाओं के लिए इसका लाभ बहुस्तरीय है। दृश्या जैसी सरकारी कंपनी विभिन्न विभागों के उम्मीदवारों को ड्रोन पायलट ट्रेनिंग दे रही है। ड्रोन दीदी योजना के तहत पांच हजार महिलाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य है ही, साथ ही हरियाणा ड्रोन उद्यमी योजना के तहत अनुसूचित जाति वर्ग के 18 से 45 वर्ष के 500 युवाओं को बिल्कुल मुफ्त ड्रोन पायलट ट्रेनिंग, डीजीसीए सर्टिफिकेशन और ड्रोन खरीदने के लिए रियायती ऋण की सुविधा दी जा रही है। फसल निगरानी, कीटनाशक छिड़काव, स्वास्थ्य सेवाओं में दवा पहुंचाना, ट्रैफिक मॉनिटरिंग, आपदा प्रबंधन में राहत सामग्री गिराना और शादी-समारोह की फोटोग्राफी से लेकर घर की छत की लीकेज जांच तक ड्रोन आम जीवन में प्रवेश कर रहा है। 

कृषि क्षेत्र में ड्रोन का उपयोग सबसे अधिक व्यावहारिक है। हरियाणा कृषि विभाग ने एग्रीशक्ति नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत एक लाख एकड़ जमीन पर ड्रोन से एग्रोकेमिकल छिड़काव का लक्ष्य रखा है। परंपरागत स्प्रे में मजदूर को एक एकड़ में घंटों लगते हैं और जहर का असर शरीर पर पड़ता है, ड्रोन 10 मिनट में एक एकड़ कर देता है, 70 प्रतिशत पानी बचता है। 

निजी जीवन में ड्रोन का सीधा उपयोग कम है, पर अप्रत्यक्ष उपयोग बढ़ा है। जैसे-जैसे ड्रोन की लागत घटेगी और सर्विस मॉडल मजबूत होगा, आम किसान और आम नागरिक भी इसे मोबाइल की तरह किराये पर ले सकेगा, तभी हरियाणा का ड्रोन कैपिटल का सपना खेत और घर दोनों तक पहुंचेगा।

Tuesday, September 29, 2026

मैं अमरता की खेती करता हूं, वत्स!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ने जब भिक्षुक संघ का गठन किया, तो यह नियम बनाया कि हर भिक्षुक अपने भोजन के लिए भिक्षा मांगेगा। कुछ ग्रंथों में तो यह भी कहा गया है कि बौद्ध भिक्षु केवल एक ही घर से भिक्षा मांगेगा और जो कुछ उसे उस घर से मिलेगा, उसी पर  उसे उस दिन गुजारा करना पड़ेगा। 

अपने लिए भिक्षा मांगने के नियम से केवल बीमार और बहुत ज्यादा बुजुर्ग भिक्षु को ही छूट मिलती थी। गौतम बुद्ध अपने लिए नियम से भिक्षा मांगने जाया करते थे। संघ में रहने वाले भिक्षुओं को खाने-पीने के लिए एक बर्तन और पहनने के लिए दो वस्त्र ही मिलते थे। वस्त्र पुराना या फट जाने पर उसे फेंका नहीं जाता था, बल्कि यदि उसको दूसरे काम में उपयोग किया जाता था। वस्त्र तभी फेंका जाता था, जब वह किसी काम का नहीं रह जाता था। 

एक बार की बात है। गौतम बुद्ध काशी में उपदेश देने के लिए पहुंचे थे। नियम के अनुसार गौतम बुद्ध भिक्षा मांगने निकले। वह पहुंच गए काशी के एक संपन्न किसान के दरवाजे पर। उन्होंने भिक्षा के लिए गुहार लगाई। किसान घर से बाहर निकला और उसने कहा, मैं खेती पर दिन रात परिश्रम करता हूं। बीज बोता हूं। फसल की रखवाली करता हूं, तब जाकर मुझे खाने के लिए अनाज मिलता है। आप बिना खेती किए अनाज पाना चाहते हैं। 

बुद्ध ने कहा कि मैं आत्मा की खेती करता हूं। ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूं। उस फसल को तपस्या के जल से सींचता हूं। विनय मेरे हल की नोक, विचार शीलता फल है। मैं अमरता की खेती करता हूं, जहां न दुख है, न संताप। यह सुनकर किसान समझ गया कि उसके सामने युग प्रवर्तक महात्मा बुद्ध खड़े हैं। उसने गौतम को प्रणाम किया और भिक्षा लाकर दी।

सड़क हादसों का कारण बन रहे लावारिस पशु, जिम्मेदार कौन?

अशोक मिश्र

पलवल में 24 सितंबर की रात दो सांडों की लड़ाई से बचने के प्रयास में डिपो संचालक सुनील पांडेय की मौत हो गई। अभी लोग डिपो संचालक की मौत को भूल भी नहीं पाए थे कि ठीक दो दिन बाद 26 सितंबर को अमरपुर गांव के पास मोहना-अमरपुर मार्ग पर हुई दूसरी घटना ने हरियाणा की सड़कों पर लावारिस पशुओं के खतरे को फिर से सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। चांदहट थाना क्षेत्र में शनिवार शाम लावारिस पशु को बचाने के प्रयास में बाइक अनियंत्रित होकर सड़क किनारे पेड़ से टकरा गई। 

इस हादसे में बाइक सवार राजवीर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि हरकेश ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। ये दोनों घटनाएं अलग-अलग लगती हैं, लेकिन इनका मूल कारण एक ही है, सड़क पर बेसहारा गोवंश की मौजूदगी और उनका अनियंत्रित व्यवहार। हरियाणा में यह समस्या अब रोज की हकीकत बन चुकी है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो प्रदेश में हर महीने औसतन 10 लोग ऐसे हादसों में जान गंवा देते हैं। पिछले पांच महीनों में ही फरीदाबाद सहित पूरे प्रदेश में 17 लोगों की मौत लावारिस पशुओं के कारण हुए हादसों में हो चुकी है। 

ऐसी घटनाओं के लिए किसी एक व्यक्ति या निकाय को दोषी नहीं माना जा सकता है। सबसे पहली जिम्मेदारी तो उन पशुपालकों की है जो दूध देना बंद करने पर गाय को लावारिस छोड़ देते हैं। नंदी को तो पैदा होने के कुछ ही दिनों बाद खुला छोड़ दिया जाता है। इसके बाद नंबर आता है स्थानीय निकायों और पंचायतों का जिनके पास लावारिस पशुओं को पकड़ने की जिम्मेदारी है। 

यह संस्थाएं कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति ही करती हैं। पांच महीने में पूरे प्रदेश में पशु को सड़क पर छोड़ने वालों से केवल 62,600 रुपये जुर्माना वसूला गया है। यह आंकड़ा स्थानीय निकायों और पंचायतों की कारगुजारी का सबसे बेहतरीन प्रमाण है। लोगों में दंड का डर जैसे रह ही नहीं गया है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है जो दशकों से इस समस्या को अस्थायी समाधान करके अब तक टालती आ रही है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कई बार कहा है कि प्रदेश में बेसहारा गोवंश सड़कों पर नजर नहीं आना चाहिए, लेकिन सड़कों पर स्थिति जस की तस है। 

व्यवस्था से जुड़े लोग सीएम को भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। राज्य में होने वाले इन हादसों को रोका जा सकता है। लेकिन केवल नारे लगाने या एक-दो हफ्ते अभियान चलाने से बात नहीं बनेगी। सबसे पहले तो पशु की पहचान और मालिक की जवाबदेही तय करना बहुत जरूरी है। टैगिंग का विचार एकदम सही दिशा में है, लेकिन जब तक हर पशु की टैगिंग और आधार-लिंक्ड डाटाबेस नहीं बनता और जुर्माना वसूली वाकई सख्त नहीं होती, लोग पशु छोड़ते रहेंगे। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाए। केवल दान से काम चलने वाला नहीं है।

Monday, September 28, 2026

चिकित्स की जरूरत वहां, बीमारियां जहां

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ज्यादातर भ्रमण में ही रहते थे। वह केवल वर्षाकाल में ही एक जगह टिकते थे। वर्षाकाल में यात्रा आसान भी नहीं होती है। रास्ते जोखिम भरे और नदियां उफान पर होती हैं। ऐसी स्थिति में गौतम बुद्ध तीन महीने के लिए एक स्थान पर रुक जाते थे। जब उन्होंने भिक्षुक संघ की स्थापना की, तो उन्होंने नियम बनाया कि हर भिक्षु अपनी सुविधा और इच्छानुसार लोगों में धर्म प्रचार के लिए जा सकता है। 

वह अपनी इच्छित जगह पर जाकर लोगों को आत्म कल्याण और जीवन को सुखमय बनाए रखने के लिए प्रेरित करेगा। बौद्ध की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करेगा। यदि वह अपने इस कार्य में विफल हो जाता है, तो उसके स्थान पर कोई नया भिक्षुक भेजा जाएगा। पहले वाले भिक्षुक को आश्रम बुला लिया जाएगा और उसे प्रशिक्षण दिया जाएगा। एक दिन सभी भिक्षुओं को अपने अपने इच्छित स्थान के लिए निकलना था। 

गौतम बुद्ध के परम प्रिय शिष्य आनंद ने उस स्थान को चुना जहां पहले भी लोग धर्म का प्रचार प्रसार करने का प्रयास कर चुके थे और विफल रहे थे। वहां मौजूद लोगों ने आश्चर्य से उन्हें देखा और कहा, वहां के लोग किसी भी साधु-संत या विचारक को टिकने नहीं देते हैं। लोग किसी को भिक्षा भी नहीं देते हैं और आपस में लड़ते ही रहते हैं। वहां जाकर आप क्या करेंगे? आपको भी हो सकता है कि कुछ दिनों बाद विफल होकर लौटना पड़े।  

इस पर आनंद ने गंभीर होकर कहा कि चिकित्सक की जरूरत वहीं सबसे ज्यादा होती है, जहां बीमारियां होती हैं। धर्म का प्रचार करने की जरूरत वहां है जहां अधार्मिक लोग रहते हों। मेरी भी सबसे ज्यादा जरूरत उसी गांव में है, जहां के लोग बुराइयों से घिरे हुए हैं। यह सुनकर सारे लोग शांत हो गए।

नशे के खिलाफ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन में दौड़े लोग

अशोक मिश्र

आज फरीदाबाद में नशा मुक्ति के संदेश के साथ हुई हाफ मैराथन महज एक दौड़ नहीं थी, वह एक सामाजिक घोषणा थी। यह उस सामाजिक बुराई के खिलाफ घोषणा है जिसने हमारे प्रदेश के युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों को अपनी गिरफ्त में सदियों से जकड़ रखा है। सूरजकुंड मेला ग्राउंड से शुरू हुई इस नशा-मुक्त हरियाणा फरीदाबाद नमो मैराथन-2026 में 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर और 21 किलोमीटर की तीन श्रेणियां रखी गई थीं और आयोजकों के अनुसार जनसैलाब ऐसा उमड़ा कि एक साथ 1.35 लाख से अधिक लोगों ने दौड़ लगाई। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी रविवार की सुबह सूरजकुंड पहुंचे और ‘ड्रग-फ्री हरियाणा’ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन-2026 को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। 

इस दौरान भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन ने लोगों का उत्साह बढ़ाया। सच यह है कि कोई भी मैराथन सीधे किसी के हाथ से नशे की पुड़िया नहीं छीनती। इसका प्रभाव तत्काल और मापने योग्य नहीं होता। कितने लोगों ने इस दौड़ के बाद नशा छोड़ा, इसका कोई रजिस्टर नहीं बनता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि यह निरर्थक है। नशा एक अकेलेपन की बीमारी है, जो अंधेरे में पनपती है। जब सवा लाख लोग सुबह-सुबह सड़क पर एक साथ दौड़ते हैं, भारत माता की जय के जयघोष के साथ, तो वह अंधेरा टूटता है। युवा देखता है कि ऊर्जा का विकल्प भी है। दौड़, पसीना, समूह का उत्साह, यह सब नशे के विरुद्ध एक सकारात्मक नशा है। 

यह जागरूकता की पहली सीढ़ी है, अंतिम इलाज नहीं। ऐसी प्रतियोगिताओं का औचित्य इसी प्रतीकात्मक शक्ति में है कि राज्य यह कहना चाह रहा है कि हम लड़ रहे हैं और तुम अकेले नहीं हो। हरियाणा में 18 हजार 847 नशा पीड़ित हैं। यह तो केवल दर्ज आंकड़ा है। जमीन पर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। पंजाब से सटे होने के कारण ड्रग रूट, बेरोजगारी का दबाव, जिम और बॉडी बनाने के भ्रम में स्टेरॉयड और फिर नशे की ओर फिसलन और तेजी से बढ़ता शहरी अकेलापन, यह सब मिलकर हरियाणा को एक नए तरह के संकट में डाल रहा है। 

नशा मुक्ति अभियान को सफल बनाना है तो उसे दौड़ से आगे ले जाना होगा। इसे शर्म से निकालकर बीमारी के रूप में देखना सिखाना होगा। जैसे बुखार के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही नशे के लिए भी डॉक्टर के पास जाना होगा। इसके लिए हर प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर गोपनीय काउंसलिंग हो। स्कूलों में उत्तर रटाने के बजाय सवाल पूछने की आदत और जीवन कौशल सिखाना होगा, तनाव से कैसे निपटें, ना कैसे कहें। 

प्रयोगशालाओं को मंदिरों के बराबर सम्मान देना होगा। जब तक बच्चा यह नहीं देखेगा कि वैज्ञानिक सोच से भी जीवन सुधरता है, तब तक वह चमत्कारिक समाधान की ओर ही भागेगा। फरीदाबाद की यह दौड़ एक अच्छी शुरुआत है, पर दौड़ना ही काफी नहीं है, टिके रहना भी सीखना होगा।

Sunday, September 27, 2026

सुख-दुख में समान रहने का अभ्यास


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने जीवन भर लोगों को यह समझाने का प्रयास किया है कि लालसा ही हमारे दुखों का मूल है। जब हम जरूरत से ज्यादा संग्रह करते हैं, तो हमें उन वस्तुओं के प्रति मोह हो जाता है। जब वह वस्तु किसी कारण से नष्ट हो जाए या चोरी चली जाए, तो उसे हमें दुख होता है। हमें भविष्य या अतीत के बारे में सोचकर दुखी नहीं होना चाहिए। जो पल आप जी रहे हैं, वही आपका है। यदि वर्तमान को ही अच्छी तरह से जी लिया जाए, तो वह भविष्य को भी सुधारने की क्षमता रखता है। 

महात्मा बुद्ध के इस जीवन दर्शन को क्षणवाद के नाम से जाना जाता है। यदि हम अपने जीवन के बारे में विचार करें, तो महात्मा बुद्ध की बात सही नजर आती है। हम जीवन में अतीत या भविष्य को सोचकर परेशान होते रहते हैं, इससे वर्तमान जीवन का आनंद भी नहीं उठा पाते हैं। इसी तरह महात्मा बुद्ध इंसान को सुख और दुख में समान रहने का उपदेश दिया करते थे। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध कहीं जा रहे थे। उनके मन में पता नहीं क्या आया, वह अच्छी भली पगडंडी को छोड़कर नीचे चलने लगे। नीचे कंटीली झाड़ियां थीं। उस पर चलने से बुद्ध के पैरों में कांटे चुभने लगे। उनके साथ चल रहे लोग आश्चर्यचकित रह गए। उनके शिष्य आनंद ने पूछा, तात! आप पगडंडी छोड़कर कंटीले रास्ते पर क्यों चल रहे हैं। 

बुद्ध ने जवाब देते हुए कहा कि इंसान को इस पगडंडी पर सुख और दुख दोनों भोगने पड़ते हैं। सुखों के प्रति आशक्ति रखने से जब इंसान दुख में पड़ता है, तो वह अत्यंत दुखी हो जाता है। मैं कंटीले रास्ते पर इसलिए चल रहा हूं ताकि सुख और दुख का अभ्यास बना रहे। यह सुनकर उनके साथ चलने वाले समझ गए कि महात्मा बुद्ध उन्हें क्या समझाना चाहते हैं।

कीटनाशकों और रासायनिक खादों के ज्यादा उपयोग से बचें


अशोक मिश्र

हरियाणा की खेती हरित क्रांति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है और आज भी यह देश में रासायनिक आदानों के सर्वाधिक उपयोग वाले राज्यों में से एक है। सामान्य वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार फसल की जरूरत, मिट्टी परीक्षण और फसल चक्र के आधार पर ही खाद और कीटनाशक का उपयोग होना चाहिए, जिसमें संतुलित एनपीके लगभग 150 से 170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास माना जाता है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। पंजाब के बाद हरियाणा देश में सर्वाधिक कीटनाशक उपयोग करने वाला राज्य बन गया है। 

2000 से 2021 के बीच तकनीकी ग्रेड कीटनाशकों की वार्षिक खपत 4000 से 5025 टन के बीच स्थिर रूप से ऊंची रही है। इस अत्यधिक उपयोग का फसल और मिट्टी पर सीधा प्रभाव दिखता है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन से पौधा बढ़ता तो तेजी से है पर जड़ें कमजोर होती हैं, फसल कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है और किसान फिर और कीटनाशक डालता है, यह एक दुष्चक्र बन जाता है। मिट्टी में जैविक कार्बन घटता है, सूक्ष्म जीव मरते हैं, जलधारण क्षमता कम होती है और जमीन सख्त हो जाती है। 

इससे पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से दाने का भराव और पोषण गुणवत्ता दोनों गिरते हैं। अधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों का मानव शरीर पर प्रभाव दो तरीकों से होता है, प्रत्यक्ष छिड़काव के दौरान और अप्रत्यक्ष भोजन, पानी और दूध के जरिये। हरियाणा में किए गए अध्ययन में केवल दो से चार प्रतिशत किसान ही मास्क, दस्ताने और जूते जैसे सुरक्षात्मक कपड़े पहनते हैं, इसलिए त्वचा और सांस के जरिये अवशोषण आम है। जब ये अवशेष लंबे समय तक शरीर में जाते हैं तो वे अंत:स्रावी तंत्र को बाधित करते हैं यानी हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करने वाले रसायनों के रूप में काम करते हैं। 

हरियाणा और पंजाब दोनों में अत्यधिक रासायनिक खादों के उपयोग को कैंसर के मामलों का प्रमुख कारण माना गया है, जिसे पंजाब की कुख्यात कैंसर ट्रेन के उदाहरण से समझा जाता है जो रोगियों को लेकर जाती है। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री ने भी हरियाणा और पंजाब में कैंसर वृद्धि को अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जोड़ा है। अत्यधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों से जुड़े रोगों की सूची लंबी है। 

सरकारी स्वास्थ्य निगरानी में कैंसर के अलावा बांझपन, प्रजनन संबंधी विकार, गुर्दे की विफलता, तंत्रिका तंत्र के विकार, सांस की पुरानी बीमारियां, त्वचा रोग, दृष्टि दोष और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं बार-बार सामने आई हैं। एक ग्रामीण स्वास्थ्य अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि कीटनाशक विभिन्न पुराने रोगों जैसे कैंसर, बांझपन, गुर्दे की विफलता, प्रजनन समस्याओं और तंत्रिका विकारों से जुड़े हैं। 


Saturday, September 26, 2026

जो चलता ही नहीं, वह थकेगा कैसे?

बोधिवृक्ष़

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध आत्म ज्ञान प्राप्त करने में छह साल लगे। बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। वह सिद्धार्थ से बुद्ध कहे जाने लगे। इसके बाद उन्होंने अपना सबसे पहला उपदेश सारनाथ में दिया। कहते हैं कि जब उन्होंने अपना पहले उपदेश दिया था, तो उस समय केवल पांच शिष्य ही उपस्थित थे। 

इसके बाद तो मानो तथागत को एक तरह का जुनून सवार हो गया। वह चल पड़े पूरे भारतवर्ष को आत्म ज्ञान देने। वह चलते ही रहते थे। जहां रात हो गई, वहीं रुक गए। भिक्षा मांगकर खा लिया। किसी से भिक्षा नहीं मिली, तो भूखे रहकर रात गुजार ली। बस एक ही जुनून सवार था कि सबको आत्म ज्ञान देकर सबको मुक्ति दिलानी है। महात्मा बुद्ध का परम शिष्य आनंद भी उनके साथ गांव-गांव, शहर-शहर डोल रहा था। 

एक दिन उसने महात्मा बुद्ध से कहा कि जब से आपको ज्ञान प्राप्त हुआ है, आप सतत चलते ही रहते हैं। आप इससे थके या उकताए हुए नहीं प्रतीत होते हैं। आप रुकते भी नहीं हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि आपको थोड़ा विश्राम करना चाहिए? अपने शिष्य की बात सुनकर बुद्ध ने कहा कि जो चलेगा, वही थकेगा। जो चलेगा ही नहीं, वह थकेगा कैसे? बुद्ध का यह उत्तर सुनकर आनंद चकरा गया। 

उसने कहा कि मैंने आपको नित्य अपनी आंखों से चलते देखा है। यह सुनकर महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले, आनंद तुमने जिसको चलते हुए देखा है, वह शरीर है। बाहर से यह चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर की आत्मा तो स्थिर है। जब आत्मा चली ही नहीं तो थकेगी कैसे? शरीर तो आत्मा की छाया है। छाया के चलने से कोई थकता है क्या? बुद्ध की बात सुनकर आनंद समझ गया कि भंते  उसे क्या समझाना चाहते हैं।

दबे पांव हरियाणा में पांव जमाती जा रही हैं फेफड़े की बीमारियां


अशोक मिश्र

हरियाणा की मिट्टी में हमेशा से मेहनत और संघर्ष की खुशबू बसी रही है। खेतों में काम करने वाले किसान, कारखानों में पसीना बहाने वाले मजदूर, स्कूल जाते नन्हे बच्चे, सबकी सांसों में इस धरती की ताकत समाई हुई थी। लेकिन आज वही सांसें बोझ बनती जा रही हैं। अस्पतालों के गलियारों में खांसी की आवाजें गूंज रही हैं, ऑक्सीजन सिलेंडरों की मांग बढ़ रही है और युवाओं-बच्चों के फेफड़े कमजोर पड़ते जा रहे हैं। यह कोई अचानक आई आपदा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे गहराता जख्म है जो हर घर को छू रहा है। फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां अस्थमा, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और खासकर ट्यूबरकुलोसिस तेजी से फैल रही हैं। 

इनमें युवा और बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। आंकड़े कहते हैं कि फरीदाबाद जैसे स्मार्ट सिटी में ही फेफड़ों के कैंसर के मरीज एक साल में 22 प्रतिशत बढ़ गए, रोगी 1201 से बढ़कर 1515 तक पहुंच गएऔर कई जिलों में एक्यूआई 342 जैसे गंभीर स्तर तक पहुंच गया है, जहां अस्पतालों की ओपीडी में 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। सर्दियों में पराली का धुआं, दिवाली पर पटाखों का गुबार, पूरे साल फैक्ट्रियों से निकलता जहर और सड़कों पर गाड़ियों का धुआं, ये सब मिलकर एक अदृश्य चादर बन गए हैं। 

यह चादर बिना मास्क के हमारे फेफड़ों में उतर जाती है और वहीं जम जाती है। फेफड़े के रोगों के फैलने के एक नहीं, कई कारण एक-दूसरे में गूंथे हुए हैं। सबसे बड़ा कारण वह हवा है जो हम सांस के साथ पी रहे हैं। दूसरा कारण वह गरीबी और अनदेखी है जो टीबी को पालती है कमजोर पोषण, तंग घर, देर से जांच, और अधूरा इलाज। तीसरा कारण हमारी आदत है, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का और चूल्हे का धुआं। और चौथा, सबसे दर्दनाक कारण, वह चुप्पी है जो हम एक खांसी को दो हफ्ते से ज्यादा खींचने पर भी ओढ़ लेते हैं।  

एक अध्ययन के अनुसार हरियाणा में मौतों का एक बड़ा हिस्सा खराब हवा से जुड़ा पाया गया है। प्रदूषण फेफड़ों की सुरक्षात्मक परत को नष्ट करता है, जिससे संक्रमण आसानी से पकड़ लेता है। बच्चे और युवा, जिनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। हमें समझना होगा कि प्रदूषण और संक्रमण अलग-अलग दुश्मन नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रदूषण फेफड़े को कमजोर करता है, और कमजोर फेफड़े पर संक्रमण आसानी से घर बना लेता है। 

अगर हमें सच में अपने बच्चों को बचाना है तो हमें सिर्फ टीबी की दवा नहीं, साफ हवा का भी इलाज करना होगा, और सिर्फ सरकारी योजना नहीं, एक पड़ोसी का हाथ भी थामना होगा ताकि कोई मरीज अकेला न छूट जाए। हरियाणा की धरती उपजाऊ है, लोग मेहनती हैं। अगर प्रदूषण पर लगाम लगे, पराली प्रबंधन बेहतर हो, जागरूकता घर-घर पहुंचे और इलाज समय पर पूरा हो, तो सांसें फिर से हल्की हो सकती हैं।