Wednesday, August 19, 2026

अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उब्बिरी का जन्म श्रावस्ती के कुलीन राजवंश में हुआ था। वह अप्रतिम सुंदरी थी। जो भी उसे देखता, वह मंत्रमुग्ध होकर बस देखता ही रह जाता था। जब वह पूर्ण युवती हुई तो उसका विवाह कौशल नरेश के साथ हुआ। कौशल नरेश उब्बिरी को पाकर अपने को धन्य महसूस करने लगे। 

अभी उसे कौशलपुर के अंत:पुर में आए एक वर्ष ही हुआ था कि वह गर्भवती हो गई। उसके गर्भवती होने की खबर पाकर प्रजा में अपार हर्ष हुआ। समय आने पर उनसे एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया जीवंती। जब जीवंती एक वर्ष की हुई, तो उसने अपनी चपलता और सुंदरता से राजपरिवार का मन मोह लिया। कौशल नरेश ने उब्बिरी को राजमहिषी की पदवी प्रदान की और भव्य शोभायात्रा निकाली। 

कहते हैं कि सौभाग्य के साथ-साथ कभी कभी दुर्भाग्य भी आता है। एक वर्ष की जीवंती की अचानक मृत्यु हो गई। महारानी उब्बिरी पुत्री के शोक में विक्षिप्त हो गई। वह श्मशान घाट पर विलाप करती, अम्म जीवे जीवंती तुम कहां हो? उब्बिरी ने राजमहल छोड़ दिया। शोक विह्वल क्षत-विक्षत देह लिए वह श्मशानघाट में चिल्लाती रहती। संयोग से उधर से एक दिन महात्मा बुद्ध निकले। वह उब्बिरी की करुण कथा से परिचित थे। 

वह श्मशानघाट पहुंचे और उब्बिरी से बोले, पुत्री! तुम बता सकती हो, इस श्मशानघाट में कितने लोगों का दाह संस्कार हुआ है। उसने कहा, नहीं देव! तथागत ने कहा, अगर तुम्हारी तरह सभी लोग शोक विह्वल हो जाएं तो सृष्टि कैसे चलेगी?  अच्छा बताओ, जीवंती के आत्म तत्व को तुम खोज सकती हो? उब्बिरी ने कहा, नहीं देव नहीं। तथागत बोले, तो उठो, आत्म तत्व को खोजने का प्रयास करो। यह सुनकर उब्बिरी की आंख खुल गई। वह मोह माया त्यागकर आत्म साधना में निरत हो गई और पूर्णता प्राप्त करके ही लौटी।

आखिर रेलवे ट्रैक को पार करने की आदत कब बदलेंगे लोग?

अशोक मिश्र

रेलवे ट्रैक पार करने की आदत लोगों में बहुत पुरानी है। जब से रेल गाड़ियों का परिचालन शुरू हुआ है, तब से लोग रेलवे ट्रैक को पार करते चले आ रहे हैं। तीन चार दशक पहले तक रेल विभाग के पास इतनी सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन अब रेलवे ने बहुत सारा विकास कर लिया है। देश के लगभग हर रेलवे स्टेशन पर जरूरत के अनुसार फुट ओवरब्रिज का निर्माण कर लिया है। इसके बावजूद लोग स्टेशन पर रेलवे ट्रैक पार करने से नहीं चूकते हैं। यह प्रवृत्ति हरियाणा में भी पाई जाती है। 

अक्सर हरियाणा में रेलवे ट्रैक पार करते समय होने वाले हादसे की खबरें आती रहती हैं। अकेले दिल्ली-एनसीआर सर्कल में, जिसमें हरियाणा के फरीदाबाद, गुड़गांव, पानीपत, सोनीपत और अंबाला जैसे बड़े जिले आते हैं, साल 2024 में रेलवे ट्रैक पार करने पर 2210 मामले दर्ज किए गए और इतने ही लोगों की गिरफ्तारी हुई, वहीं ट्रेन से कटकर 2562 लोगों की मौत हुई और 666 लोग घायल हुए। साल 2025 में यह संख्या और बढ़ी, 4260 केस दर्ज हुए और ट्रेन की चपेट में आने से 2402 मौतें और 582 लोगों के घायल होने की खबर है। 

लोगों को रेलवे ट्रैक पार करने की इतनी जल्दी क्यों रहती है, यह सवाल मनोवैज्ञानिक से ज्यादा सामाजिक है। रेलवे ट्रैक पार करते समय व्यक्ति को लगता है कि ट्रेन अभी दूर है, वह निकल जाएगा। रिपोर्ट बताती है कि आज सबसे बड़ा कारण मोबाइल पर बात करते हुए या गाना सुनते हुए ट्रैक पार करना है। हरियाणा के कई स्टेशनों पर फुट ओवर ब्रिज या अंडरपास एक किलोमीटर दूर है, भारी सामान, बच्चों या बुजुर्गों के साथ कोई इतना घूमना नहीं चाहता, इसलिए वह पटरियों को ही शॉर्टकट बना लेता है। 

भीड़ का अनुसरण की आदत लोगों को संकट में डाल देती है। जब एक व्यक्ति कूदता है तो दस उसके पीछे कूदते हैं। रेलवे प्रशासन खुद मानता है कि लोग सुरक्षा निर्देशों का उल्लंघन करते हैं, ओवरब्रिज से बचते हैं और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का उपयोग करते हुए ट्रैक पार करते हैं। इस मामले में बचाव का रास्ता केवल सजा नहीं, बल्कि रोकथाम और आदत में बदलाव है। 

रेलवे ने पिछले कुछ सालों में 6,191 किमी ट्रैक पर फेंसिंग लगाई है और पटरियों के किनारे बाड़ लगाया है, पर हरियाणा जैसे सघन आबादी वाले राज्य में यह अभी काफी नहीं है। सबसे जरूरी है हर छोटे-बड़े स्टेशन के पास 300-500 मीटर की दूरी पर फुट ओवर ब्रिज और अंडरपास बनाना, स्टेशनों के नजदीक खुले एरिया में तार और बाउंड्री वॉल लगाना, जिसके लिए रेलवे लगातार सिफारिश करती रही है। लोगों को खुद समझना होगा कि दो मिनट की बचत के लिए पूरा जीवन दांव पर लगाना कोई समझदारी नहीं। वीणा के तार की तरह जीवन भी मध्यम गति में ही सुरक्षित और मधुर रहता है, अति की जल्दबाजी में वह टूट ही जाता है।


Tuesday, August 18, 2026

वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध का राजकुमार श्रोण अत्यंत विलासी था। वह अपने महल से बाहर नहीं निकलता था। हमेशा भोग विलास में ही लगा रहता था। सुंदर किशोरियां उसके आगे पीछे घूमती रहती थीं। उसकी पत्नी अत्यंत सुंदरी थी। वह भी अपने पति का हर तरह से ख्याल रखती थी। राजकुमार श्रोण अत्यंत घमंडी किस्म का था। वह किसी का भी अपमान करने में तनिक भी संकोच नहीं करता था। वह वय का भी ध्यान नहीं रखता था। 

महाराज अपने पुत्र की आदत से बहुत परेशान थे। वह वीणा बहुत बढ़िया बजाता था। एक दिन उसने महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना, तो उसका मन बदल गया। उसने प्रवज्या धारण कर ली। भिक्षु हो गया। जब सारे भिक्षु दिन में एक बार भोजन करते थे, तो वह दो दिन बाद भोजन करता था। वह नंगे पैर चलता था। 

जब सारे भिक्षु पेड़ की छाया में बैठ जाते थे, तो वह कड़ी धूप में खड़ा रहता था। जिससे उसका सुकोमल शरीर सूखकर कांटा हो गया। उसके पैरों से मवाद बहने लगा, लेकिन वह अविचलित रहा। यह बात जब महात्मा बुद्ध को पता चली, तो उन्होंने श्रोण को अपने पास बुलाया और कहा, भंते! मैंने सुना है कि तुम वीणा बहुत सुमधुर बजाते हो। यदि वीणा के तारों को ढीला छोड़ दिया जाए, तो क्या होगा? 

श्रोण ने कहा कि वह नहीं बजेंगे। उनसे स्वर ही नहीं फूटेगा। तथागत ने फिर पूछा, यदि तारों को अधिक कस दिया जाए तो क्या होगा? श्रोण ने कहा कि तार टूट जाएंगे। बुद्ध ने कहा कि शरीर भी तो एक वीणा है। यदि तुम इसको अधिक कष्ट दोगे, तो शरीर टूट जाएगा। नष्ट हो जाएगा। यह सुनकर श्रोण समझ गया कि महात्मा बुद्ध  उसे क्या समझाना चाहते हैं। उस दिन के बाद श्रोण ने अन्य भिक्षुओं के समान आचरण  करने लगा।

हरियाणा के किसी जिले में भूजल की गुणवत्ता उत्तम श्रेणी में नहीं

अशोक मिश्र

हरियाणा में जल स्तर का लगातार नीचे जाना ही चिंताजनक नहीं है, बल्कि भूजल की गुणवत्ता भी अब डराने लगी है। राज्य की धरती के नीचे पानी का भंडार जितना भरता है, उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार हरियाणा में सालाना भूजल पुनर्भरण 10.27 बीसीएम आंका गया है जबकि दोहन 12.72 बीसीएम तक पहुंच चुका है यानी राज्य अपने भूजल संसाधन का करीब 137 प्रतिशत उपयोग कर रहा है। यह गिरावट पूरे प्रदेश में एक जैसी नहीं है लेकिन 14 जिले सबसे अधिक दबाव में हैं जिनमें अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, भिवानी, जींद, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सोनीपत, सिरसा, पानीपत, फतेहाबाद और झज्जर शामिल हैं। 

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कुलपति प्रो. बलदेवराज कांबोज ने विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा तैयार हरियाणा के भूजल गुणवत्ता मानचित्र का अनावरण किया है। इस मानचित्र की नींव छह वर्षों के अथक फील्ड सर्वे पर टिकी है। वैज्ञानिकों ने गांव स्तर पर जीपीएस लोकेशन के आधार पर भूजल के नमूने एकत्र किए और आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल के दिशा-निदेर्शों के अनुसार उनका विश्लेषण किया। पिछला ऐसा मानचित्र 1992 में बना था। 

पूरे हरियाणा में केवल 31.83 प्रतिशत भूजल ही अच्छी गुणवत्ता श्रेणी में आता है जो अधिकांश फसलों की सिंचाई के लिए उपयुक्त है। लगभग 30.04 प्रतिशत भूजल सीमांत लवणीय पाया गया है जिसे उचित प्रबंधन के साथ लवण-सहिष्णु फसलों के लिए उपयोग किया जा सकता है। विस्तृत वर्गीकरण बताता है कि 6.04 प्रतिशत खारा पानी, 19.50 प्रतिशत उच्च एसएआर खारा पानी, 5.67 प्रतिशत हल्का क्षारीय, 1.66 प्रतिशत क्षारीय और 5.26 प्रतिशत अत्यधिक क्षारीय पानी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मानचित्र में गुणवत्ता को अच्छे, सीमांत लवणीय, लवणीय, उच्च एसएआर लवणीय, सीमांत क्षारीय, क्षारीय और उच्च क्षारीय वर्गों में बांटा गया है। 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा का कोई भी जिला शत-प्रतिशत उत्तम श्रेणी में नहीं है। 31.83 प्रतिशत अच्छे पानी का यह आंकड़ा पूरे प्रदेश के नमूनों का औसत है, किसी एक जिले का नहीं। इसका असर सीधे किसान के नलकूप पर, पीने के पानी की गुणवत्ता पर और खेत की मिट्टी पर पड़ रहा है। जब मीठे पानी की परत नीचे चली जाती है तो नीचे का खारा और क्षारीय पानी ऊपर आ जाता है जिससे न केवल सिंचाई बल्कि स्वास्थ्य का संकट भी बढ़ता है। वैज्ञानिकों ने खारे और अधिक सोडियम वाले पानी वाले क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता के हिसाब से खेती करने और मिट्टी सुधार के उपाय अपनाने की सलाह दी है। यदि किसान वैज्ञानिकों की सलाह के हिसाब से खेती करें, तो पानी की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।

Monday, August 17, 2026

गणिका से भिक्षुणी बनी आम्रपाली

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आम्रपाली वैशाली नगर की राजनृत्यांगना थी। बौद्ध साहित्य में उसका नाम अंबपाली और अंबापालिका भी मिलता है। कहा जाता है कि किसी ने आम्रपाली को जन्म लेते ही शाही उपवन में आम के पेड़ के नीचे लाकर डाल दिया था। इसलिए उसका नाम आम्रपाली पड़ा। उसे सबसे पहले राजा के माली महानामन ने देखा। वह उसे अपने गांव ले गया और उसका पालन पोषण करने लगा। 

वह उस समय निस्संतान था। वह जब किशोरावस्था में पहुंच तो उसके सौंदर्य की ख्याति पूरे राज्य में फैल गई। वैशाली में राजनृत्यांगना के लिए प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी, उस प्रतियोगिता में आम्रपाली ने नृत्य किया और उसे उसकी मर्जी के बिना जनपदकल्याणी पद के लिए चुन लिया गया। हालांकि उस समय वह पुष्पक कुमार नामक युवक से प्यार करती थी और उसकी शादी होने वाली थी। 

मजबूरन उसे राज गणिका जैसे कर्म के लिए विवश होना पड़ा। यही वजह है कि वह लिच्छवि पुरुषों से घृणा करती थी। एक दिन सबने सुना कि वैशाली नगर में महात्मा बुद्ध पधार रहे हैं। आम्रपाली ने महात्मा बुद्ध से उसके यहां भोजन करने का निमंत्रण दिया जिसे तथागत ने स्वीकार कर लिया। यह सुनकर वैशाली नगर के सामंत और धनाढ्य लोग क्रोधित हो उठे। 

उन्होंने एक लाख कार्षापण (तत्कालीन मुद्रा) देने का लोभ दिया, लेकिन आम्रपाली ने स्वीकार नहीं किया। नियत समय पर बुद्ध  ने उसके यहां भोजन किया। बाद में बुद्ध ने उसके त्याग और भक्ति को देखते हुए भिक्षुणी होने की अनुमति प्रदान कर दी। वह अपना सब कुछ त्यागकर एक भिक्षुणी हो गई। हिंदी साहित्य में आम्रपाली को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है।

महिला, युवा और किसान खुशहाल होगा, तभी विकसित होगा भारत


अशोक मिश्र

पंद्रह अगस्त को हांसी में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी प्रदेशवासियों को संबोधित करते हुए महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के सपने को पूरा करने की दिशा में हरियाणा बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। आज हरियाणा देश का सबसे पसंदीदा औद्योगिक और निवेश गंतव्य बन गया है। सरकार की उद्योग मित्र नीतियों, पारदर्शी व्यवस्था और बेहतर कानून व्यवस्था के कारण देश-विदेश की बड़ी कंपनियां हरियाणा में निवेश करने के लिए उत्साहित हैं। 

इससे प्रदेश में न केवल बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हो रहे हैं बल्कि हमारे युवाओं के लिए रोजगार के लाखों अवसर भी पैदा हो रहे हैं, जो विकसित भारत की नींव को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विकास का अर्थ केवल फैक्ट्रियां और सड़कें बनाना ही नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति का विकास है। इसी सोच के साथ प्रदेश में शिक्षा, खेल और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाया जा रहा है, बेटियों के लिए सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा रही है, वहीं हर जिले में खेल स्टेडियम और प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से हरियाणा को खेलों की राजधानी के रूप में और मजबूत किया जा रहा है। 

स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए हर जिले में मेडिकल कॉलेज और बेहतर अस्पतालों की सुविधा आम आदमी तक पहुंचाई जा रही है। मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि प्रदेश सरकार का लक्ष्य सिर्फ आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। विकसित भारत की परिकल्पना तभी पूरी होगी जब हर नागरिक स्वस्थ, शिक्षित और सशक्त होगा। इस विकास यात्रा में सबसे बड़ी नई दिशा महिला सशक्तिकरण को मिली है। सरकार ने महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं बल्कि विकास की भागीदार बनाया है। 

स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, लाडो लक्ष्मी जैसी योजनाओं से बेटियों का भविष्य सुरक्षित किया जा रहा है और सरकारी नौकरियों व पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर उन्हें निर्णय लेने की शक्ति दी जा रही है। आज हरियाणा की महिला खेत से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी पहचान बना रही है। हरियाणा की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं। उनकी सफलता अन्य बेटियों को भी आगे बढ़कर कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दे रही है। 

साथ ही प्रदेश सरकार ने किसानों के हित में भी कई ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। किसान हमारे अन्नदाता हैं। उनकी समृद्धि के बिना विकसित भारत की कल्पना अधूरी है। फसलों का समय पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उठान, खराब फसलों का तुरंत मुआवजा, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा और नहरों व ट्यूबवेलों के माध्यम से हर खेत तक पानी पहुंचाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। जब किसान खुशहाल होगा, महिला सशक्त होगी, युवा शिक्षित और स्वस्थ होगा तभी हरियाणा सही मायने में विकसित भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर तेजी से आगे बढ़ेगा।

Sunday, August 16, 2026

आदर पाने का आधार नहीं हो सकती जाति

 

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने लगभग पचास वर्ष तक देश के विभिन्न भागों में घूम घूमकर लोककल्याण के लिए मानव धर्म का प्रचार-प्रसार किया। महात्मा बुद्ध एक स्थान पर बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं रुकते थे। वह लोगों को सत्य, अहिंसा और जरूरत से ज्यादा संचय न करने का उपदेश दिया करते थे। उनके संघ में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता था। वह स्त्री-पुरुष और जातिगत भावना से ऊपर उठकर लोगों से व्यवहार किया करते थे। 

एक बार की बात है। भिक्षुक संघ में कुछ लोगों में इस बात को लेकर विवाद पैदा हो गया कि प्रथम आसन और भोजन का प्रथम परोसा किसे दिया जाए? भिक्षुक संघ में जितने लोग थे, उतने मत थे। इस बारे में किसी ने कहा कि ब्राह्मण को पहला आसन और पहला भोजन दिया जाए क्योंकि जातीयता में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। किसी ने क्षत्रिय का पक्ष लिया, तो किसी ने वैश्य और दलित जातियों का। 

सभी अपने-अपने विचारों पर अडिग था। कोई किसी से हार मानने वाला नहीं था। ऐसी स्थिति में बात जब बिगड़ने लगी, तो कुछ लोगों ने तथागत से इस बारे में सलाह लेने की बात कही। सब लोग महात्मा बुद्ध के पास पहुंचे। महात्मा बुद्ध ने सबकी बातें बड़ी गंभीरता से सुनी। 

उन्होंने कहा कि संघ में जाति के आधार पर भेदभाव करना बहुत गलत है। संघ में जिसने पहले प्रवज्या ली है और लोककल्याण में जो सबसे आगे रहता हो, वही प्रथम आसन और भोजन का प्रथम परोसा पाने का हकदार है। भले ही वह किसी भी कुल या जाति में पैदा हुआ हो। बुद्ध की इस व्यवस्था से सभी लोग सहमत हो गए। इसका परिणाम यहहुआ कि बौद्ध का प्रसार भारत ही नहीं, भारत के बाहर भी हुआ।

स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा के वीरों ने भी दी थी शहादत



अशोक मिश्र

आज हम 80वां स्वाधीनता दिवस मना रहे हैं। भारत को स्वाधीन कराने में हमारे देश के हजारों युवाओं ने अपना बलिदान दिया था। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समय तक चलने वाला स्वाधीनता संग्राम शायद भारत का ही था। ढाई तीन सौ साल के स्वाधीनता संग्राम में देश के हर कोने से लोगों ने अपना बलिदान दिया था। इन्हीं लोगों के बलिदान का परिणाम था कि अंग्रेजों को मजबूर होकर 15 अगस्त 1947 को हमारे देश को आजाद करना पड़ा। 

स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा का भी योगदान कम नहीं था। भले ही वह उस समय पंजाब प्रांत का हिस्सा रहा हो। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा (तब पंजाब का हिस्सा) सबसे पहले बिगुल बजाने वाले क्षेत्रों में से एक था। 10 मई 1857 को मेरठ में क्रांति शुरू होने के कुछ ही घंटों बाद अंबाला छावनी में भी विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी थी। अंबाला से निकली यह आग देखते ही देखते गुड़गांव, रोहतक, हिसार, करनाल और पानीपत तक फैल गई थी। रेवाड़ी के राव तुलाराम ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया। अपने छोटे से राज्य के साधनों से एक बड़ी सेना खड़ी की। 

उन्होंने नारनौल के पास नसीबपुर में अंग्रेजी सेना से डटकर लोहा लिया। उनके साथ झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खान, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह और फर्रुखनगर के नवाब अहमद अली खान ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला। अंग्रेजों ने इन तीनों वीरों को दिल्ली के चांदनी चौक पर सरेआम फांसी दी थी, पर वे हरियाणा के लोगों के दिलों में अमर हो गए। महात्मा गांधी के आह्वान पर हरियाणा पूरी तरह से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गया। 1919 में रॉलेट एक्ट के विरोध में रोहतक, भिवानी और अंबाला में बड़ी हड़तालें हुईं। 1920-21 के असहयोग आंदोलन में हरियाणा के किसानों, छात्रों और वकीलों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 

चौधरी छोटूराम, पंडित नेकीराम शर्मा, लाला दौलतराम और सर शादीलाल जैसे नेताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागृत किया। पंडित नेकीराम शर्मा को तो हरियाणा केसरी कहा जाता था, जिन्होंने भिवानी से संदेश नामक पत्र निकालकर अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में अंबाला, करनाल और रोहतक में नमक कानून तोड़ा गया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में तो हरियाणा के हर जिले से जत्थे जेल गए। हिसार के हांसी में तो छात्रों ने तहसील पर तिरंगा फहरा दिया था। 

आजाद हिंद फौज में भी हरियाणा के हजारों जवान शामिल थे, जिनमें मेजर सूरजमल जैसे अनेक वीरों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। यही कारण है कि हरियाणा को वीरों और किसानों की धरती कहा जाता है, जिसने देश की आजादी के लिए अपना खून और पसीना दोनों दिया। स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में देश के अनेक प्रदेशों की तरह हरियाणा का भी नाम अग्रगण्य माना जाता है।

Friday, August 14, 2026

बुद्ध को गुरु बनाने में मुझे कोई संकोच नहीं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने कहा है कि जो कुछ दिखता है, उसमें दुख छिपा हुआ है। जो कुछ दृश्यमान है, वह जल्दी ही नष्ट हो जाने वाला है। ऐसी स्थिति में जब सब कुछ नष्ट हो जाने वाला है, तो उसके फंदे में पड़ा ही क्यों जाए। तपस्या या उपवास से इन स्थितियों को बदला नहीं जा सकता है। तो फिर तपस्या या उपवास करने का कोई मतलब भी नहीं है। इन स्थितियों से छुटकारा केवल मन से ही पाया जा सकता है। इसलिए मन को शुद्ध रखना चाहिए। 

उन दिनों मगध में कस्सप और नादिंकस्सप नाम के दो अत्यंत प्रसिद्ध साधु रहते थे। इन दोनों साधुओं की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी। इनके पांच-पांच सौ शिष्य थे। कस्सप और नादिंकस्सप का आदर मगध नरेश बिंबसार भी करते थे। एक दिन जब महात्मा बुद्ध अपने प्रवचन दे रहे थे, तो इन दोनों साधुओं ने भी उपदेश का श्रवण किया। इन दोनों साधुओं को महात्मा बुद्ध की बात सही लगी। 

इन दोनों ने बुद्ध को अपना गुरु बना लिया। अब यह दोनों साधु महात्मा बुद्ध के साथ ही रहने लगे। कुछ दिनों बाद संयोग से महात्मा बुद्ध बिंबसार की राजधानी राजगृह पहुंचे तो तथागत के साथ इन दोनों साधुओं को देखकर उन्हें बहुत आश्यर्य हुआ। उन्होंने महात्मा बुद्ध के साथ-साथ इन दोनों साधुओं का भी बड़े आदर के साथ स्वागत किया। एकांत मिलने पर बिंबसार ने कस्सप से पूछा-मेरी समझ में यह नहीं  आ रहा है कि एक वृद्ध साधु किसी नवयुवक का शिष्य कैसे हो सकता है। 

इस पर कस्सप ने जवाब देते हुए कहा कि बुद्ध ने हृदय को निर्मल रखते हुए लोक कल्याण की भावना से काम करने का रास्ता सुझाया जो मुझे उचित लगा। इसलिए मुझे बुद्ध को अपना गुरु बनाने में किसी प्रकार का संकोच नहीं है।


युवाओं को बरबाद कर रहा है ऑनलाइन गेम्स का फैलता जाल


अशोक मिश्र

हरियाणा में ऑनलाइन गेम्स का जाल फैलता जा रहा है। इससे काफी परिवार बरबाद हो रहे हैं। आनलाइन गेमिंग की लत में लोग अपनी जमा पूंजी तक लुटा रहे हैं। आनलाइन गेम अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या बन चुका है। गांव के खेतों से लेकर शहरों के दफ्तरों, खेल के मैदानों, घर और अन्य जगहों पर युवा अपने मोबाइल पर दिन-रात गेम खेलते दिखते हैं। शुरुआत में यह शौक छोटे-मोटे इनाम और टाइमपास के लिए होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह लत में बदल जाता है जहां व्यक्ति अपनी पूरी कमाई, बचत और फिर उधार लिया पैसा भी दांव पर लगा देता है। 

जब हार का कर्ज सिर पर चढ़ता है और वापसी का कोई रास्ता नजर नहीं आता तो कई लोग गहरे अवसाद में चले जाते हैं और कुछ तो आत्महत्या जैसा कठोर कदम भी उठा लेते हैं। फरीदाबाद एक व्यक्ति ने आनलाइन गेमिंग की लत के चक्कर में अपनी पूरी तनख्वाह दो घंटे में गंवा दी। इसके साथ ही उस पर पचास हजार रुपये का कर्ज भी हो गया। इस हताशा में उसने मंगलवार शाम को अगस्त क्रांति एक्सप्रेस के सामने कूदकर अपनी जान दे दी। आत्महत्या करने वाला व्यक्ति काफी दिनों से कर्ज की वजह से परेशान था। 

उसकी पत्नी ने उसे समझाया भी था कि वह दोनों मिलकर धीरे-धीरे कर्ज चुका देंगे। बस, उसे आनलाइन गेम खेलना बंद करना होगा। इसके बावजूद उस व्यक्ति की गेम खेलने की आदत नहीं छूटी। इस प्रवृत्ति के बढ़ने के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे पहला कारण है स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की हर हाथ तक पहुंच। हरियाणा में बेरोजगारी और अर्द्ध-बेरोजगारी के कारण बहुत से युवाओं के पास समय तो है पर स्थिर आय का साधन नहीं, ऐसे में जल्दी पैसा कमाने का लालच उन्हें इन गेम्स की ओर खींचता है। 

हरियाणा में सबसे ज्यादा प्रचलित गेम्स दो तरह के हैं। एक तरफ कौशल के नाम पर खेले जाने वाले पैसे वाले गेम्स हैं तो दूसरी तरफ बैटल रॉयल और युवाओं में लोकप्रिय गेम्स हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए केवल सरकार ही नहीं बल्कि परिवार और समाज को भी मिलकर काम करना होगा। परिवारों को चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल उपयोग पर नजर रखें। उनके बैंक लेन-देन की जानकारी रखें और खुलकर पैसे के बारे में बात करें। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल लिटरेसी और वित्तीय साक्षरता के बारे में बताया जाए कि कैसे ये गेम्स लत बनाते हैं। 

जो व्यक्ति कर्ज में फंस गया है, उसे अकेला छोड़ने के बजाय मनोवैज्ञानिक परामर्श और नशा मुक्ति केंद्रों जैसी सहायता देनी होगी, ताकि वह शर्म के कारण आत्महत्या की ओर न जाए। अगर समय रहते समाज, परिवार और सरकार ने मिलकर इस आॅनलाइन जुए की लत पर काबू नहीं पाया तो यह मेहनती युवाओं की कमाई और भविष्य दोनों को निगल जाएगी।

Thursday, August 13, 2026

मानव कल्याण के लिए संन्यासी बने गौतम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बात लगभग ढाई हजार साल पहले की है। शाक्य नरेशों की राजधानी कपिलवस्तु के राजमार्ग पर एक रथ दौड़ता हुआ चला जा रहा था। उस रथ पर राजकुमार गौतम विराजमान थे। युवा हो जाने के बाद शायद पहली बार राजकुमार सिद्धार्थ राजमहल से बाहर निकले थे। अब तक राजमहल से बाहरी दुनिया उनके लिए अपरिचित थी। उनके पिता को किसी ज्योतिषी ने बताया था कि आपका पुत्र चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर महान संन्यासी। पुत्र संन्यासी न बने, इसके लिए आमोद-प्रमोद की सारी व्यवस्थाएं की गई थीं। 

उस युग की सबसे सुंदर स्त्री यशोधरा से उसका विवाह हुआ था। एक दिन राजकुमार सिद्धार्थ नगर भ्रमण की जिद कर बैठे, तो पिता शुद्धोधन को अनुमति देनी पड़ी। कुछ दूर जाने पर राजकुमार गौतम ने देखा कि एक व्यक्ति एकदम जर्जर अवस्था में झुकी कमर के साथ लकड़ी से टेकता हुआ चला जा रहा है। वह लोगों से रोटी मांग रहा था, लेकिन शरारती लड़के उसे ढेले मार रहे थे। 

राजकुमार ने सारथी से पूछा, तो उसने बताया कि एक दिन सबको जरावस्था से गुजरना पड़ेगा। इससे कोई बच नहीं सकता है। आगे जाने पर उन्होंने एक शव को जाते देखा। पूछने पर सारथी ने बताया कि एक दिन सबको मरना है। इससे मुक्ति संभव नहीं है। कुछ दूर चलने पर उन्होंने एक गर्भवती स्त्री को अशक्त देखा, तो उन्होंने कारण पूछा। 

सारथी ने बताया कि बीमारी की वजह से यह महिला अशक्त हो गई है। इन बातों का राजकुमार गौतम पर बहुत प्रभाव पड़ा। एक दिन आधी रात में अपना सब कुछ छोड़कर गौतम संन्यासी बनने के लिए निकल पड़े ताकि दुनिया को रोग-शोक से मुक्ति का मार्ग तलाश सकें। यह मानव कल्याण के लिए अपने सुखों का अप्रतिम त्याग था।

सड़कों पर घूम रहे लावारिस पशु साबित हो रहे जानलेवा


अशोक मिश्र

सदियों से हरियाणा पशुपालन के मामले में अग्रणी रहा है। यहां लगभग हर घर में दूध-दही और मक्खन का उपयोग होता रहा है। सबसे ज्यादा पशु शायद आज भी हरियाणा में ही पाए जाते हैं। शहरीकरण और औद्योगिक विकास के चलते लोगों ने अब पशुओं को पालना कम कर दिया है। यहां दूध और दूध उत्पादों का कारोबार सबसे ज्यादा होता है। लेकिन पशुपालक जब तक पशु दूध देने लायक रहता है, तब तक उसकी देखभाल करते हैं। जहां पशु ने दूध देना बंद किया, उसे लावारिस सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। 

हरियाणा की सड़कों पर घूम रहे बेसहारा पशु अब जान-माल के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। हाल के महीनों में रेवाड़ी में दुकान जा रहे युवक को गाय ने सींगों पर उछालने और करीब एक मिनट तक कुचला था। यह घटना सीसीटीवी में कैद हुई थी और सोशल मीडिया पर काफी वायरल भी हुई थी। इसी जिले में पिछले दिनों रिटायर्ड कैप्टन जगराम यादव गाय ने कुचल दिया था जिनकी आज मौत हो गई है। बुजुर्ग दुकानदार प्रताप सिंह यादव गाय के हमले में घायल हो गए थे जिनकी बाद में मौत हो गई थी। 

फरीदाबाद में भी स्कूटी सवार कारोबारी आशु खत्री की मौत गोवंश की टक्कर के बाद हो गई थी। इस समस्या का निवारण केवल गौशाला खोलने से नहीं होगा। पूरे हरियाणा के लिए एक मुकम्मल व्यवस्था पैदा करना होगा। सबसे पहले तो पशुपालकों की जिम्मेदारी तय करनी होगी ताकि हर पालतू गोवंश की ईयर टैगिंग, उसका आधार जैसे रजिस्ट्रेशन और छोड़ने पर भारी जुर्माना लगना चाहिए। गौशालाओं को भी केवल दान पर निर्भर रहने वाला बनाने की जगह आत्मनिर्भर इकाई बनाना होगा। गोबर से बायो सीएनजी, खाद, अगरबत्ती और गौमूत्र से कीट नियंत्रक जैसे उत्पादों पर सरकारी खरीद गारंटी मिलनी चाहिए। 

सरकारी स्तर पर प्रयास पिछले दो-तीन वर्षों में तेज हुए हैं। हरियाणा सरकार का स्पष्ट लक्ष्य प्रदेश को बेसहारा गो-मुक्त बनाना बताया गया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी कई बार हरियाणा की सड़कों को लावारिस पशु मुक्त बनाने की घोषणा कर चुके हैं। इसके लिए प्रशासन, गौशालाएं और समाज मिलकर काम करें, यह निर्देश दिया गया है। प्रदेश में 619 पंजीकृत गौशालाओं के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में 228 करोड़ 58 लाख रुपये की चारा अनुदान राशि जारी की गई है और ढांचागत सुधार के लिए अलग से बजट दिया जा रहा है। इसके बावजूद हालत सुधर नहीं रही है। 

सबसे बड़ा बदलाव मुआवजे की नीति में आया है। दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय परिवार सुरक्षा योजना यानी दयालु-2 के तहत अब बेसहारा गाय, सांड, भैंस, नीलगाय और आवारा कुत्तों के हमले से मृत्यु, चोट या दिव्यांगता होने पर प्रभावित परिवार को पांच लाख रुपये तक का मुआवजा देने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इतना सब कुछ करने के बाद भी हादसे कम नहीं हो पा रहे हैं।

Wednesday, August 12, 2026

दुखी जनों की सेवा से होगा आत्म कल्याण

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध को आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्होंने प्रथम धर्म चक्र प्रवर्तन में जिज्ञासुओं को आत्म कल्याण मार्ग पर चलने को प्रेरित किया। नतीजा यह हुआ कि हजारों लोग ‘धर्मं शरणं गच्छामि’ का उद्घोष करते हुए आगे आए और इस तरह भिक्षु संघ का निर्माण हुआ। इस संघ में रहने वाले लोग भिक्षु कहे जाने लगे। मानव कल्याण ही इन भिक्षुओं का परम ध्येय था। महात्मा बुद्ध प्रत्येक भिक्षु का ध्यान रखते थे। तथागत के प्रिय शिष्यों में भदंत आनंद थे जो काफी विद्वान और ऊर्जावान थे। 

वह ज्यादातर बुद्ध के साथ ही रहते थे। एक दिन महात्मा बुद्ध ने एक भिक्षुक के बारे में पूछा कि वह आज नहीं दिखाई दिया। भदंत आनंद ने उत्तर दिया, भंते! वह अतिसार से पीड़ित है। इस वजह से वह आज दिखाई नहीं दिया है। महात्मा बुद्ध ने कहा कि चलो, उससे देख आएं। 

यह कहकर तथागत अपने शिष्य भदंत आनंद के साथ उस भिक्षुक की कुटिया में पहुंचे। कुटिया में पहुंचने पर बुद्ध ने देखा कि वह अपने ही मल-मूत्र में लिपटा हुआ पड़ा है। बुद्ध ने उससे पूछा कि तुम्हें क्या हुआ है? उस भिक्षुक ने बताया कि भगवन! मैं अतिसार से पीड़ित हूं। बुद्ध ने पूछा कि तुम्हारी सेवा करने कोई क्यों नहीं आया? उस भिक्षुक ने कहा कि सभी आत्म कल्याण की साधना में लगे हुए हैं। ऐसा वे कहते हैं। 

बुद्ध ने आनंद से घड़े में जल मंगाया और उस भिक्षुक का शरीर धोया। उसके मल-मूत्र को साफ किया। शाम को उन्होंने सभी भिक्षुओं को एकत्रित करके कहा कि तप साधना करने से मोक्ष या आत्म कल्याण की प्राप्ति होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानता हूं। सच्चे हृदय से दुखी जनों की सेवा करने से आत्म कल्याण की प्राप्ति जरूर होगी। एक भिक्षुक के बीमार होने और किसी के उसकी सेवा न करने का प्रसंग जानकर सभी भिक्षुक लज्जित हो उठे।

पैदल चलने वालों के लिए कब सुरक्षित होंगी सड़कें?


अशोक मिश्र

तेज रफ्तार गाड़ियों से लोगों के कुचले जाने की घटनाएं अब लोगों में भय पैदा करने लगी हैं। सड़क पर चलने वाले लोग अब अपने आपको असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। कब और कहां सड़क पर चलती हुई गाड़ी कुचल दे, इसका कोई ठिकाना भी नहीं है। फरीदाबाद के मेवला महाराजपुर में सड़क के किनारे खड़े तीन लोगों को तेज रफ्तार थार ने रविवार को कुचल दिया था। यह तीनों लोग मार्निंग वॉक पर निकले थे। इनमें से एक व्यक्ति की मौत हो गई। मार्निंग वॉक पर निकले इन तीन लोगों को सपने में भी यह अंदेशा नहीं रहा होगा कि उनके साथ ऐसी घटना होने वाली है। 

ऐसी घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण गाड़ी को ताकत और स्टेटस सिंबल समझने की मानसिकता है। थार जैसी बड़ी एसयूवी युवाओं में काफी लोकप्रिय है। इन गाड़ियों से वह शो ऑफ, दबंगई और सड़क पर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश करते हैं। थार जैसी गाड़ियों से स्टंट करने, खाई में गिरने, नशे में लोगों को कुचलने और ड्रिफ्ट करते हुए लोगों की जान जोखिम में डालने जैसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। सड़क पर होने वाले ज्यादातर हादसों के पीछे वाहन चालकों का नशे में होना है। 

इसके साथ ही हमारे शहरों में बुनियादी ढांचे की कमी भी जिम्मेदार है। राज्य के कई जिलों की घनी आबादी वाले इलाकों में सड़क पर चलने वालों के लिए न तो सुरक्षित फुटपाथ है, न फुट ओवर ब्रिज, न स्पीड ब्रेकर और न ही स्पीड कैमरे। लोग मजबूरन मुख्य सड़क या सर्विस लेन पर ही चलते हैं। इसका समाज पर असर बहुत गहरा और खतरनाक है। जब सुबह टहलने निकला एक बुजुर्ग या एक आम कर्मचारी सड़क पर ही कुचल दिया जाता है, तो लोगों के मन में असुरक्षा बैठ जाती है। 

लोग अपने बच्चों को साइकिल चलाने या बुजुर्गों को पार्क तक अकेले भेजने से डरने लगते हैं। इससे एक पूरी पीढ़ी का खुली हवा में निकलना, पैदल चलना और स्वस्थ रहना बंद हो जाता है। ऐसी घटनाएं कानून और सिस्टम पर से भरोसा कमजोर करती हैं। लोग सोचने लगते हैं कि सड़क पर चलने वाला गरीब पैदल यात्री और बड़ी गाड़ी में बैठा अमीर चालक कानून की नजर में बराबर नहीं हैं। यह खाई जब बढ़ती है, तो गुस्सा, आक्रोश और सड़क पर ही बदला लेने की प्रवृत्ति पैदा होती है। 

ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल चालान काटना काफी नहीं है। सबसे पहले लाइसेंस सिस्टम को सख्त करना होगा। चालक की पहली गलती पर ही कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। टेस्ट के बिना लाइसेंस और बिना हेलमेट-बेल्ट के गाड़ी चलाने वाले को गिरफ्तार करके जेल भेज देना चाहिए। शराब पीकर या नशे में गाड़ी चलाने पर गाड़ी को तुरंत सीज और लंबे समय के लिए लाइसेंस रद्द करने का नियम लागू हो ताकि लोगों को सबक मिल सके।

Tuesday, August 11, 2026

मत-मतांतर का समन्वय ही धर्म है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती आज एक जिला है। पहले वह बहराइच जिले का ही एक अंग था। श्रावस्ती देश की एक प्राचीन नगरी है। यहां कई प्रतापी राजाओं ने राज्य किया था। कहते हैं कि श्रीराम के पुत्र कुश ने श्रावस्ती नगरी बसाई थी। इस बात की सत्यता तो इतिहासकार और पुरातत्वविद ही कर सकते हैं। बात उस समय की है, जब महात्मा बुद्ध श्रावस्ती में चौमासा बिताने के लिए आया करते थे। 

तथागत वर्षाकाल में किसी स्थान पर ठहर जाया करते थे, बाकी महीनों में वह भ्रमण किया करते थे। एक दिन महात्मा बुद्ध सघन एकांत में बने एक संघाराम में विश्राम कर रहे थे। तभी एक भिक्षु ने आकर महात्मा बुद्ध से निवेदन किया-भगवन! सम्राट चंद्रचूड आपके दर्शन करना चाहते हैं। वह समाज में फैले विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर की वजह से धर्म को लेकर विभ्रमित हो रहे हैं। 

वह आपसे  उसका समाधान चाहते हैं। यह सुनकर बुद्ध ने कहा कि तात! चंद्रचूड एक महान धर्मात्मा सम्राट हैं। उनको तत्काल यहां लाओ। थोड़ी देर बाद चंद्रचूड आकर एक सामान्य व्यक्ति की तरह एक किनारे बैठ गए। महात्मा बुद्ध ने उनका कुशल क्षेम पूछा और उनके ठहरने की व्यवस्था कर दी। अगले दिन सम्राट चंद्रचूड ने  देखा कि कुछ दृष्टिविहीन लोगों के बीच एक हाथी खड़ा है और बुद्ध के निर्देश पर सब हाथी को स्पर्श कर रहे हैं। 

बुद्ध ने उन दृष्टिबाधित लोगों से हाथी के बारे में पूछा, तो जिसने जो अंग छुआ था, हाथी को वैसा ही बताया। यह देखकर चंद्रचूड हंस पड़े। तब बुद्ध ने कहा कि सम्राट! यह विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर का समन्वय ही धर्म है। इसलिए आपको इन मत-मतांतरों के चलते भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। धर्म का सनातन स्वरूप भी ऐसा ही है। यह सुनकर चंद्रचूड संतुष्ट हुए और राज्य को लौट गए।

चार-पांच साल की बच्चियों को पीरियड्स आना गंभीर चेतावनी

अशोक मिश्र

यह  हरियाणा के लिए ही नहीं, पूरे उत्तर भारत के लिए गंभीर चेतावनी है कि अब चार-पांच साल की मासूम बच्चियों को पीरियड्स आने लगे हैं और पांच-छह साल के लड़कों को दाढ़ी मूंछ के लक्षण उभरने लगे हैं। यह कोई चिकित्सा संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि  पूरे समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है। इसे चिकित्सा विज्ञान में प्रिकॉशियस प्यूबर्टी यानी असामयिक यौवन कहा जाता है। पीजीआई रोहतक के पीडियाट्रिक एंडो क्रायनोलॉजी विभाग में बच्चों को विशेष टीके लगाकर हार्मोन की गति को नियंत्रित किया जा रहा है। विभाग में हर महीने करीब छह नए बच्चे अपना इलाज कराने के लिए पहुंच रहे हैं। 

देश भर के पीडियाट्रिक एंडोक्राइन सेंटरों के आंकड़ों के अनुसार कोविड काल में इस तरह के मामलों में तीन गुना तक बढ़ोतरी देखी गई है, जहां पहले 4208 बच्चों में से 59 में ऐसे लक्षण थे, वहीं कोविड के दौरान 3053 में से 155 बच्चों में समय से पहले यौवन के लक्षण मिले। हरियाणा भी इस राष्ट्रीय प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। यहां के शहरी जिलों जैसे गुड़गांव, फरीदाबाद, पानीपत में बाल रोग विशेषज्ञों के पास ऐसे केस लगातार आ रहे हैं। इसका असर केवल शारीरिक नहीं है। छोटी उम्र में हार्मोनल बदलाव से बच्चों की हड्डियों की ग्रोथ प्लेट जल्दी बंद हो जाती है जिससे उनकी अंतिम लंबाई कम रह जाती है। 

साथ ही मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन, समाज से कटाव और बचपन छिनने जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी आती हैं। यह समय है कि हम इसे सामान्य समझकर अनदेखा न करें। समय से पहले बच्चों में यौवन के लक्षणों का प्रकट होने का सबसे बड़ा कारण बच्चों में बढ़ता मोटापा है। शोध बताते हैं कि हाई-फैट डाइट और बढ़ा हुआ बीएमआई लड़कियों में असामयिक यौवन का सबसे महत्वपूर्ण रिस्क फैक्टर है। हरियाणा में खान-पान की परंपरा में घी-दूध का अधिक उपयोग होता है।

साथ ही आजकल बाजार में मिलने वाला पशुओं से प्राप्त दूध जिसमें दूध बढ़ाने के लिए हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं, यह लड़कियों में हार्मोनल गड़बड़ी पैदा कर रहा है। कई शोधों में पाया गया है कि तीन से सात साल तक के बच्चों को अधिक एनिमल फैट खिलाने से हार्मोनल असंतुलन और जल्दी प्यूबर्टी का खतरा बढ़ जाता है। हरियाणा के खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, प्लास्टिक की बोतलों में गर्म दूध या पानी पीना, सैनिटाइजर और कॉस्मेटिक्स का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों में यह लक्षण दिखने के प्रमुख कारण हैं। 

यह सब बच्चों के नाजुक अंत:स्रावी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। यही नहीं, जीवनशैली में बदलाव, देर रात तक जागना, नींद की कमी, दिन भर स्क्रीन पर रहना, शारीरिक गतिविधि का अभाव भी बच्चों को जल्द युवा बना रहा है। यदि किसी भी मासूम बच्चे में हार्मोनल गड़बड़ी के संकेत मिलें, तो तुरंत चिकित्सक के पास जाकर इलाज कराएं।

Monday, August 10, 2026

बेटी क्षेम! आत्मोद्धार का मार्ग अवश्य मिलेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के राजा बिंबसार का पूरा महल सजाया गया था। नगर का हर नागरिक महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए उत्साहित था। तथागत ने महाराज के अतिथि गृह की जगह बेलवन में रहना चुना था। महाराज बिंबसार भी अपनी सजधज के साथ तैयार हो चुके थे। नगर, महल और स्वयं राजा की सजधज के सामने राज्याभिषेक के समय हुई सजावट फीकी पड़ रही थी। महाराज अपने महल से निकल कर महारानी क्षेमा के रंग महल में पहुंचे। 

उन्होंने देखा कि महारानी क्षेमा अपने अंत:पुर के स्वाध्याय कक्ष में अन्यमनस्क सी लेटी आचार्य धर्मपाल का जीवन दर्शन पढ़ रही थीं। महाराज बिंबसार ने उन्हें अभी तैयार हुआ नहीं देखा, तो बोल पड़े, प्रियतमे! अभी तुम तैयार नहीं हुई? जिसके स्वागत को सारा नगर उमड़ पड़ा है, उसके स्वागत के लिए तुम अभी तक तैयार नहीं हो। क्षेमा सांगल नरेश की राज कन्या थी। 

सांगल नरेश महात्मा बुद्ध के परमप्रिय शिष्यों में से एक थे। महारानी क्षेमा का बुद्ध के प्रति यह उपेक्षा का भाव सम्राट बिंबसार को चकित कर रहा था। क्षेमा ने उपेक्षा भाव से करवट लेते हुए कहा कि बुद्ध के सामने जाने से क्या लाभ है। वह यही कहेंगे कि यह संसार मिथ्या है। संसार का सौंदर्य मिथ्या है। ऐसी स्थिति में हम सांसारिक जीव उनके सामने जाकर क्या करेंगे। 


महारानी को अपने सौंदर्य पर अत्यधिक अभिमान था। संयोग से इसी समय उन्हें झपकी आ गई। झपकी के दौरान ही उन्होंने देखा कि बुद्ध को एक अत्यंत रूपसी अप्सरा चंवर डुला रही है। उन्होंने एक ही पल में अप्सरा का बचपन, जवानी और बुढ़ापा तीनों देखा। 

बुढ़ापे में धंसी आंखें, सफेद केश, जर्जर काया देखकर वह कांप उठी। क्षेमा की नींद टूट गई। वह यह देखकर कांप उठी। उसके सौंदर्य का अभिमान चकनाचूर हो गया। क्षेमा दूसरे क्षण बुद्ध के चरणों में पड़ी क्षमा के साथ आत्मोद्धार का मार्ग पूछ रही थी। बुद्ध बोले, बेटी क्षेम, पहले वाह्य सौंदर्य से बाहर तो निकलो। आत्मोद्धार का मार्ग अवश्य मिलेगा।

परिवार में आया बिखराव बन रहा युवाओं में उग्रता का कारण


अशोक मिश्र

कोई यह सोच भी नहीं सकता है कि बच्चे! सिगरेट पीना तुम्हारे लिए हानिकारक है। इसे मत पियो कहने पर कोई नाबालिग थोड़ी देर बाद युवक पर चाकू से हमला कर दे। युवक की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई। आरोपी नाबालिग केवल नौवीं कक्षा पास है और तीन-चार महीने पहले उसने अपने मोहल्ले में लोगों पर धाक जमाने के लिए दिल्ली से चाकू खरीदा था। हरियाणा में पिछले कुछ सालों में युवाओं से जुड़ी हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। कभी रील के लिए झगड़ा, कभी पुरानी रंजिश, कभी सिर्फ ‘तूने मुझे घूरा क्यों’ जैसी मामूली बात पर हत्या ऐसी घटनाएं अब अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल रही हैं। 

सिगरेट पीने से मना करने पर एक नाबालिग के हाथ में चाकू आ जाना और एक हंसते-खेलते युवक की जान चले जाना हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर हमारे हाथों में पल रहे बच्चों के मन में इतना गुस्सा, इतनी हिंसा कहां से आ रही है। यह सवाल सिर्फ उस एक नाबालिग का नहीं, बल्कि पूरे हरियाणा के बदलते युवा मानस का है। इस उग्रता के पीछे परिवार का बिखराव भी एक बड़ा कारण है। जब से परिवार बिखरने लगे हैं, तब से बच्चों और युवाओं के स्वभाव में तब्दीली आ रही है। 

पहले संयुक्त परिवार में दादा-ताऊ की एक नजर ही बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए काफी थी। वह उन्हें संस्कारित करते रहते थे। अब एकल परिवारों में माता-पिता अपनी नौकरी और संघर्ष में व्यस्त हैं। घर पर बच्चों के पास पूरा दिन मोबाइल और इंटरनेट है। लोगों का आपसी संवाद भी धीरे-धीरे कम या खत्म होता जा रहा है। घर में बच्चा क्या देख रहा है, क्या सोच रहा है, किससे मिल रहा है, यह जानने का समय ही अभिभावकों के पास नहीं है। जब घर में उसकी बात नहीं सुनी जाती, तो वह बाहर अपनी धाक जमाकर, डराकर अपनी बात मनवाना सीख जाता हैं। 

इस उग्रता को बढ़ावा देता है उन्हें सहजता से मिल जाने वाला नशा। बीड़ी-सिगरेट जैसी छोटी लत से शुरू होकर यह सिलसिला नशे की गोलियों और दूसरे सिंथेटिक नशे तक पहुंच रहा है। एनसीआर की बेल्ट में इन चीजों की उपलब्धता चिंताजनक रूप से आसान हो गई है। नशे की हालत में सही और गलत की समझ खत्म हो जाती है और छोटा सा गुस्सा भी जानलेवा बन जाता है।  

समाज में एक अजीब सा डर बैठ गया है। अब लोग पार्क में, गली में गलत होते देखकर भी टोकने से कतराते हैं, सोचते हैं कि कौन झगड़ा मोल ले, पता नहीं सामने वाले के पास क्या है। यह चुप्पी धीरे-धीरे पूरे समाज को कायर और असुरक्षित बना रही है। इससे बचने का यही तरीका है कि हम रोज आधा घंटा बिना मोबाइल के अपने बच्चों से बात करें, उनके दोस्तों को जानें, उन्हें खेल के मैदान तक फिर से ले जाएं। जहाँ पसीना बहेगा तो सड़क पर खून नहीं बहेगा, यही इसका इलाज है। यही तरीका उनकी उग्रता को कम कर सकता है। 

Sunday, August 9, 2026

कृपण का दान स्वीकार नहीं करते बुद्ध

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

वैशाली गणराज्य की विजय पताका चतुर्दिक फहरा रही थी। वैशाली राज्य के दंडनायक उग्रतेजा जिधर से घूम जाता, उस ओर सबके सिर भय से झुक जाते थे। लोगों में दंडनायक उग्रतेजा का इतना भय था कि बड़े बडेÞ राजा भी उसके सामने टिकने का साहस नहीं कर सकते थे। उन्हीं दिनों महात्मा बुद्ध वैशाली नगर में अपने संघ के भिक्षुओं के साथ भ्रमण कर रहे थे। 

महात्मा बुद्ध का मुखमंडल चमक रहा था। सब मौन साधे तथागत की वाणी का श्रवण कर रहे थे। इतने में संघ के आश्रम में तेज गति से अश्व पर सवार दंडनायक उग्रतेजा ने प्रवेश किया। कुछ दूर चलने के बाद दंडनायक पदाति चलकर गौतम बुद्ध के सामने प्रस्तुत हुए। तथागत ने अपनी दृष्टि उठाई। दंडनायक ने विनीत स्वर में कहा, प्रभु! भिक्षु संघ का स्वागत करने का सौभाग्य मांगने आपके समक्ष आया है यह जन आपके पास। 

महात्मा बुद्ध ने शांत स्वर में कहा, भंते! बुद्ध किसी कृपण की भिक्षा स्वीकार नहीं करते हैं। किसी भी बुद्ध ने आज तक किसी कृपण की भिक्षा स्वीकार नहीं की है। यह सुनकर जन समूह आश्चर्यचकित रह गया। लोगों को लगा कि अभी थोड़ी देर में बुद्ध का सिर कटकर नीचे गिर जाएगा। 

दंडनायक ने बुद्ध को सिर नवाया और वापस लौट पड़ा। जब वह अपने शिविर में पहुंचा, तब तक यह बात पूरे वैशाली में फैल चुकी थी कि उग्रतेजा को भिक्षुक ने कृपण कहा है। एक सैनिक ने कहा कि उस भिक्षुक का सिर काट लूं। दंडनायक ने सैनिक को डपट दिया। दंडनायक घर पहुंचा और उसने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और बुद्ध के आश्रम में आ खड़ा हुआ। अगले दिन संघ से भिक्षुओं में एक भिक्षु और एक भिक्षुणी की बढ़ोतरी हो गई।



हरियाणा में आपराधिक गिरोहों की बढ़ती सक्रियता से हाईकोर्ट चिंतित

अशोक मिश्र

हरियाणा के विभिन्न जिलों में आपराधिक गिरोहों और उनके स्लीपर सेल की सक्रियता को देखते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार के सामने काफी चिंता जताई है। हाईकोर्ट ने फरीदाबाद, पलवल और गुरुग्राम जैसे जिलों में सक्रिय आपराधिक गिरोहों पर अंकुश लगाने के लिए अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए, इसका विस्तृत ब्यौरा राज्य सरकार से मांगा है। हरियाणा में संगठित अपराध का इतिहास कोई बहुत पुराना नहीं है। पहले राज्य में असंगठित अपराध जरूर छिटपुट पढ़ने-सुनने को मिल जाते थे। 

अस्सी और नब्बे के दशक तक यहाँ अपराध मुख्य रूप से जमीन विवाद, आपसी रंजिश और जातिगत वर्चस्व तक सीमित था। ज्यादातर अपराध आनर किलिंग की वजह से होते थे। लेकिन पिछले दो दशक में जैसे-जैसे राज्य का औद्योगिक विकास होता गया, संगठित गिरोहों ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं। एनसीआर के विस्तार, रियल एस्टेट में अकूत पैसे के आने और राजनीतिक संरक्षण ने इसे पेशेवर गैंगस्टरवाद में बदल दिया। गुरुग्राम, फरीदाबाद, रोहतक, झज्जर, सोनीपत और पानीपत जैसे जिले इस बदलाव के केंद्र बने, जहाँ जमीन की कीमतें रातों-रात करोड़ों में पहुँच गईं और कब्जा, वसूली और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग एक उद्योग बन गया। 

इस हालात ने अपराध के नए अर्थशास्त्र को जन्म दिया। राज्य में पैदा होने वाले आपराधिक गिरोहों ने शुरुआती दौर में पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रिय गिरोहों की कार्यशैली को अपनाया।  हरियाणा और दूसरे राज्यों में सक्रिय गैंग्स की अर्थव्यवस्था चार स्तंभों पर टिकी होती है। पहला है जमीन पर जबरन कब्जा और प्रॉपर्टी विवादों में किसी एक पक्ष के लिए हथियारबंद मदद देना। दूसरा है व्यापारियों, बिल्डरों, शराब ठेकेदारों और बड़े किसानों से रंगदारी वसूलना। 

इनकार करने पर उनको डराना-धमकाना और जरूरत पड़ने पर हत्या कर देना। तीसरा है हथियारों की तस्करी, जो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से होती है। चौथा है सोशल मीडिया पर दहशत का प्रचार करना। सोशल मीडिया पर इनका जितना प्रचार होता है, वह अपनी पकड़ उतनी ही मजबूत करते चलते हैं। हरियाणवी गैंगस्टर खुद सामने आने के बजाय इंस्टाग्राम, फेसबुक पर हथियारों के साथ फोटो, गैंगस्टर रैप गानों और लाइव वीडियो के जरिए अपना खौफ बनाते हैं। 

यह कम उम्र के युवाओं को बहुत आकर्षित करता है, जो जल्दी पैसा, नाम और पहचान की चाह में इस रास्ते पर आ जाते हैं। राज्य सरकार और पुलिस ने इस चुनौती से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कड़ी मेहनत की है। सरकार ने हरियाणा स्पेशल टास्क फोर्स, साइबर सेल और स्पेशल सेल को मजबूत करके कई बड़े एनकाउंटर किए हैं। विदेशों में बैठे गैंगस्टरों के प्रत्यर्पण के प्रयास और गैंगस्टरों की संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई भी की है।


Saturday, August 8, 2026

शाश्वत आनंद तो शाश्वत सत्य में है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

घटना बहुत पुरानी है। इतनी पुरानी कि इस घटना का संबंध महात्मा बुद्ध से है। यह घटना उस समय घटी थी, जब उरुबल में महात्मा बुद्ध एक जंगल के भीतर हिस्से में तपस्यारत थे। कथा यह है कि उरुबल के ही कुछ धनी लोगों ने वन विहार का कार्यक्रम बनाया। सभी धनिक युवा थे। वन विहार का उद्देश्य मनोरंजन करना था। 

कुछ लोगों ने मनोरंजन के लिए गणिकाओं (वेश्या) की भी व्यवस्था की थी। इन धनिकों में से कुछ लोग अपनी पत्नी को भी वन विहार के लिए साथ लाए थे। वन विहार के दौरान सबने मदिरापान किया। आमोद प्रमोद के बीच में एक वेश्या को मौका लगा, तो उसने धनिकों के स्वर्ण आभूषण और मुद्राएं बटोरी और लेकर भाग खड़ी हुई। जब धनिकों को होश आया, तो वह परेशान हो उठे। वह उस गणिका की खोज में जंगल की ओर दौड़े। साथ में वह गणिका को कोसत हुए भी जा रहे थे। 

जब वह जंगल के लगभग बीच में पहुंचे, तो उन्हें वातावरण में शांति से महसूस हुई। उनके चित्त को भी शांति का अनुभव हुआ। उन्होंने देखा कि एक कृशकाय व्यक्ति ध्यान की मुद्रा में बैठा हुआ है। उसके चेहरे पर कांति विराजमान है। उनके शीश अपने आप झुकते चले गए। उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि आपने किसी को इधर से भागते देखा है? वह व्यक्ति महात्मा बुद्ध थे। बुद्ध ने कहा कि आपको और अपने सिवा किसी को नहीं देखा। तब उन्होंने बुद्ध को सारी बात बताई। 

बुद्ध ने कहा कि वन विहार किसलिए? यह तो विषय भोग है, इसमें सुख कहां है। शाश्वत आनंद तो शाश्वत सत्य से ही मिलेगा। यदि तुम शाश्वत सत्य की खोज करो, तो तुम्हें स्वर्ण आभूषण के चोरी हो जाने का दुख नहीं होगा। यह सुनकर उन धनिकों को अपने कृत्य पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने बुद्ध से कहा कि वह उन्हें प्रवज्या देने का अनुरोध किया।

सड़कों और गलियों में जमा पानी से डेंगू और मलेरिया का बढ़ा खतरा

अशोक मिश्र

पिछले दो दिनों से हरियाणा के अधिकांश जिलों में अच्छी बारिश हो रही है। इससे लोगों को गर्मी से थोड़ी राहत मिल गई है। तापमान में भी गिरावट आई है। लेकिन बरसात के कारण लोगों का घर से निकलना मुुश्किल हो रहा है क्योंकि मुख्य सड़कों से लेकर गलियों की सड़कों पर पानी भरा हुआ है। लोगों के घरों में भी बरसाती पानी जमा हो रहा है। इससे लोग परेशान हैं। सड़कें तालाब बन गई हैं। दो दिन की लगातार बारिश के बाद प्रदेश की अधिकतर सड़कों का नक्शा ही बदल गया है। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम, रोहतक, पानीपत से लेकर हिसार तक हर शहर में मुख्य सड़कों और अंदरूनी गलियों में घुटने तक पानी भर गया है। जहां सड़क थोड़ी ऊंची है वहां भी बड़े-बड़े गड्ढे पानी में छिप गए हैं, जो राहगीरों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। सीवर ओवरफ्लो होने से सड़कों और गलियों में भरा पानी काला और बदबूदार हो गया है जिससे फैलने वाली दुर्गंध से यहां रहने वाले लोग काफी परेशान हैं। इनमें बीमारी फैलने का भी खतरा है। हर साल बरसात के मौसम में शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा जलभराव और सड़कों परबने गड्ढे की वजह से बाधित हो रही है। सावन के पवित्र महीने में हरियाणा के लाखों शिवभक्त हरिद्वार से गंगाजल लेकर आ रहे हैं, लेकिन उनके रास्ते में जगह-जगह पानी और कीचड़ भरा है। 

सड़कों के ठीकठाक न होने की वजह से नंगे पांव चल रहे कांवड़ियों का संतुलन बिगड़ रहा है। पैरों में छाले और संक्रमण की शिकायत बढ़ रही है। यह कांवडियों की अपने आराध्य भोलेनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा ही है जो इतनी तकलीफ सहकर भी अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। आम आदमी के लिए यह बारिश किसी आफत से आफत से कम नहीं है। जब मई-जून में प्रचंड गर्मी पड़ रही थी, तो यही आम जनता बरसात के इंतजार में आकाश की ओर टकटकी लगाए निहार रही थी। 

अब जब बरसात हो रही है, तो वह अव्यवस्था का रोना रो रही है। भारी बरसात और सड़कों पर जमा पानी की वजह से एक तरफ स्कूल जाने वाले बच्चों और दफ्तर जाने वाले लोगों को घंटों जाम में फंसना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ कांवड़ मार्गों पर लगाए गए डायवर्जन के कारण शहरों के अंदर का पूरा ट्रैफिक सिस्टम चरमरा गया है। बरसात के दिनों में जगह-जगह पानी भर जाने से लोगों को परेशानी का सामना करने पड़ रहा है। 

पानी में देर तक रहने से मच्छर और बीमारियों का खतरा बढ़ गया है, कई जगहों से डेंगू और वायरल बुखार के मामले भी सामने आने लगे हैं। सड़कों और गलियों में पानी भर जाने से डेंगू और मलेरिया के मच्छरों की तादाद बढ़ रही है। इससे लगभग सभी जिलों में बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। कई जगहों से डेंगू और वायरल बुखार के मामले भी सामने आने लगे हैं। इससे निपटारा पाना आसान भी नहीं दिख रहा है।

Friday, August 7, 2026

और यशोधरा नहीं आई मिलने


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लोककल्याण के लिए जब महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु से निकले, तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूरे बारह साल तक बुद्ध भ्रमण करते रहे। इसी दौरान उन्हें आत्मबोध हुआ। उन्होंने मानव कल्याण का मार्ग खोजा।  दीन-दुखियों की पीड़ा का निवारण किया। लोगों को अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। यह सब कुछ करते हुए बारह साल बीत गए। एक दिन कपिलवस्तु के लोगों ने सुना कि उनका राजकुमार सिद्धार्थ नगर में आ रहा है। 

राजा शुद्धोधन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। महात्मा बुद्ध की मौसी और राजा शुद्धोधन की दूसरी पत्नी महाप्रजापति गौतमी की आंखें अपने पाल्य पुत्र को देखने के लिए व्याकुल थीं। सिद्धार्थ के जन्म के बाद महारानी महामाया यानी महादेवी की मौत हो जाने की वजह से राजा शुद्धोधन ने गौतमी से विवाह कर लिया था। सिद्धार्थ का पालन-पोषण भी मौसी गौतमी ने ही किया था। 


तथागत के नगर आगमन की सूचना पाकर नगरवासी उत्तेजित थे। वह अपने राजकुमार को देखने के लिए लालायित थे। राजदरबार में नियत समय पर राजा शुद्धोधन अपने पूरे परिवार और सभासदों के साथ-साथ उपस्थित हुए। राज दरबार के बाहर विशाल जनसमूह उपस्थित था। तभी भिक्षु वेश में तथागत का आगमन हुआ। उन्होंने संन्यासी धर्म के अनुरूप सबका अभिवादन किया और स्वीकार भी किया। वह सबसे प्रेम से मिले। लेकिन उनकी आंखें यशोधरा को खोज रही थीं। 

उससे मिलने सब आए थे। पुत्र राहुल भी एक ओर सकुचाया सा खड़ा अपने पिता को देख रहा था। लेकिन मानिनी यशोधरा वहां नहीं आई थी। वह क्यों जाए उनसे मिलने? जिसने छोड़ा था, वही आकर मिलेगा? उसने तो त्यागा नहीं था? महात्मा बुद्ध समझ गए कि मानिनी यशोधरा अंत:पुर से बाहर निकलकर मिलने नहीं आएगी। उन्हें ही उसके पास जाना होगा।

पहाड़ी इलाकों में हो रही बरसात से उफान पर हरियाणा की नदियां


अशोक मिश्र

हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश हो रही है। इसकी वजह से पहाड़ी इलाकों से अचानक पानी आ जाने से हरियाणा में बहने वाली नदियां उफान पर हैं। बारिश और नदियों के उफान में आने से हरिया के कई जिलों में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। पहाड़ों में हो रहे भूस्खलन और मूसलाधार बारिश के कारण नदियों का जलस्तर खतरे के निशान तक पहुंच रहा है। हालात यह है कि हरियाणा की लगभग सभी प्रमुख नदियां उफान पर बह रही हैं। इसका सबसे पहला दबाव यमुना नदी पर बने हथिनीकुंड बैराज पर पड़ा है। मंगलवार को यमुनानगर स्थित हथिनी कुंड बैराज पर नदी का बहाव अचानक तेज हो गया था। 

कुछ ही घंटों में जल प्रवाह 34,364  क्यूसेक से बढ़कर 79,629 क्यूसेक तक पहुंच गया था। बढ़ते जलस्तर को देखते हुए सिंचाई विभाग को एहतियात के तौर पर बैराज के 18 में से 16 गेट खोलने पड़े और अतिरिक्त पानी को दिल्ली की ओर छोड़ना पड़ा। अब यह पानी दिल्ली तक पहुंचने वाला है। इसी तरह शिवालिक पहाड़ियों से निकलने वाली बरसाती नदियां घग्गर, मारकंडा, टांगरी, सोम, पाथराला और कौशल्या भी पूरे उफान पर हैं। अंबाला में मारकंडा खतरे के निशान के आसपास और टांगरी तीन फीट ऊपर बह रही थी। 

कुरुक्षेत्र के शाहाबाद में मारकंडा 26 हजार क्यूसेक से ज्यादा के वेग से बह रही है, तो कैथल में घग्गर का जलस्तर डेंजर लेवल के आसपास है। सिरसा के ओटू हेड पर भी घग्गर में लगातार बढ़ोतरी की खबर है। हरियाणा की नदियां जब भी उफान पर आती हैं, तो इन नदियों के आसपास बसे शहरों में सबसे ज्यादा खतरा पैदा हो जाता है। यमुना के रास्ते में पड़ने वाले यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, फरीदाबाद और पलवल में सबसे ज्यादा खतरा होता है। हरियाणा में बाढ़ आने पर सबसे ज्यादा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। अगस्त का महीना धान की फसल के लिए बेहद अहम होता है। 

इस बार खेतों में पानी भरने से सैकड़ों एकड़ से ज्यादा में लगी खरीफ की फसल जलमग्न होने की खबर है। इससे हजारों किसान प्रभावित हुए हैं। यमुनानगर, करनाल, सोनीपत और अंबाला-कुरुक्षेत्र बेल्ट में धान के साथ-साथ चारा और सब्जियों की फसलें भी डूब गई हैं। हर साल नदियों के साथ आई रेत खेतों में जमा हो जाती है जिससे जमीन की उर्वरता पर लंबे समय तक असर पड़ता है। किसान चिंतित हैं कि पानी उतरने के बाद भी खेतों में नमी और कीचड़ के कारण दोबारा बुवाई करना मुश्किल होगा। आम लोगों की परेशानी भी कम नहीं है। नदी किनारे बसे निचले गांवों में रहने वाले लोगों को प्रशासन ने सतर्क रहने को कहा है। जलभराव के कारण पशुओं के लिए चारे की कमी हो गई है और मच्छरों के बढ़ने से बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। 

Thursday, August 6, 2026

शुभे! तुम अधीर क्यों होती हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एक थी पट्टाचारा। बहुत ही सुंदर और चतुर पट्टाचारा को किशोरावस्था में ही पड़ोस के एक युवक से प्रेम हो गया। माता-पिता का ज्ञात हुआ, तो उन्होंने बहुत रोका-टोका, समझाया, लेकिन पट्टाचारा नहीं मानी। वह अपने प्रेमी से विवाह पर अड़ी रही। एक दिन रात्रि में वह अपने प्रेमी के साथ घर से निकल पड़ी। दोनों ने दूसरे नगर में जाकर अपनी गृहस्थी बसाई। दो साल बात पट्टाचारा गर्भवती हो गई। उसने अपने पति से कहा कि दोनों अपने नगर लौट चलते हैं। पति ने कहा, वहां जाने पर केवल अपमान ही मिलेगा। 

इस तरह दो साल और बीत गए। एक बार फिर पट्टाचारा को गर्भ ठहरा, तो उसने समय नजदीक आने पर पति से एक बार फिर पितृगृह चलने का अनुरोध किया। इस बार पति भी मान गया। दोनों अपने शहर की ओर चल पड़े। रास्ता लंबा था और मार्ग में एक घना बीहड़ जंगल था। दोनों अपने बच्चे के साथ एक पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे कि तभी पट्टाचारा को प्रसव वेदना शुरू हो गई। 

इस बार भी बेटा जन्मा। उस समय आग की जरूरत पड़ी, तो पति लकड़ियां बीनने गया, तो उसे सर्प ने डस लिया। मजबूरन पति की लाश को नदी में बहाया और दोनों बच्चों के साथ नदी पार करने लगी। वह दोनों बच्चों को एक साथ नदी पार नहीं करा सकती थी, तो वह नवजात बच्चे को लेकर उस पार गई और उसे एक जगह पत्तों से ढककर बड़े बेटे के पास आने लगी। तभी उनका बड़ा बेटा नदी में बह गया और नवजात बच्चे को सियार लेकर भाग गया। जब वह मायके पहुंची, तो पता चला कि उसके माता-पिता की मौत हो चुकी है। उसके भाई की मौत भी उसी दिन हुई थी। सास ससुर भी बूढ़े हो चुके थे।

इस दुख में वह पागल हो गई। कुछ लोग उसे लेकर महात्मा बुद्ध के पास पहुंचे। बुद्ध ने कहा, शुभे! तुम अधीर क्यों होती हो? एक दिन मरना सबको है और अकेले ही मरना है। आश्रम में कुछ दिन रहने के बाद पट्टाचारा का मन स्थिर हुआ, तो बुद्ध उसे भिक्षुणी बना लिया।