Sunday, May 17, 2026

मैं कछुए से भी ज्यादा मूर्ख हूं क्या?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

चीन में कई दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने अपने विचारों से चीन को बहुत प्रभावित किया है। चीन के कुछ प्रसिद्ध दार्शनिकों में कन्फ्यूशियस, लाओत्जू,  सन त्जू, मेनसियस, मोजी जैसे लोग शामिल हैं। कन्फ्यूशियस को तो महात्मा बुद्ध का समकालीन माना जाता है। 

चीन के कुछ दार्शनिक ईसा पूर्व और कुछ पहली से लेकर पांचवीं ईस्वी तक पैदा हुए हैं। कन्फ्यूशियस चीन ही नहीं लगभग पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। ऐसे ही किसी एक दार्शनिक की कथा है। कहते हैं कि वह बहुत ही हंसमुख और फक्कड़ किस्म के दार्शनिक थे। वह किसी जगह बंधकर रहना भी पसंद नहीं करते थे। एक दिन की बात है। उस देश का राजा अपने लाव लश्कर के साथ घूमने निकला था। 

उसने दार्शनिक को नदी के किनारे में मस्ती में बैठे हुए देखा, तो उसके पास गया। उसने काफी देर तक दार्शनिक से बात की। वह दार्शनिक की बातों से बहुत प्रभावित हुआ। घूमने फिरने के बाद जब राजा अपने महल में पहुंचा, तो उसे दार्शनिक की याद आई। 

उसने एक मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि उस दार्शनिक को महल में पेश किया जाए। मंत्री ने अगले दिन दार्शनिक को राजमहल में पेश कर दिया। राजा ने उसका आवभगत किया और कहा कि मैं आपकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हूं। मैं आपको अपना प्रधानमंत्री बनाना चाहता हूं। दार्शनिक ने राज महल में इधर उधर देखा। उसकी निगाह एक कछुए की मूर्ति पर पड़ी। 

उसने राजा से कहा कि एक बात बताइए। यदि इस कछुए में जान होती तो क्या यह यहां रुकता? राजा ने कहा कि नहीं। पानी का जीव है, पानी में ही रहना पसंद करता। तब दार्शनिक ने कहा कि क्या आपने मुझे कछुए से भी ज्यादा मूर्ख समझ लिया है। मैं अभी स्वतंत्र हूं। प्रधानमंत्री बनकर परतंत्रता और जिम्मेदारियों का बोझ क्यों उठाऊं। राजा उसकी बात समझ गया। उसने दार्शनिक को सम्मान के साथ विदा कर दिया।

अरावली पर्वतमाला को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज

अशोक मिश्र

अरावली पर्वतमाला की जो वर्तमान स्थिति है, वह वास्तव में चिंताजनक है। सुप्रीम कोर्ट का अरावली में होने वाले वैध या अवैध खनन को लेकर चिंता जाहिर करना, साबित करता है कि यदि अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र से खिलवाड़ किया गया तो इसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। 

शुक्रवार को अरावली मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं को फिर से परिभाषित नहीं कर देती, तब तक अरावली के एक इंच हिस्से को भी खनन के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अरावली पहाड़ियों के लिए विवादास्पद सौ मीटर की ऊंचाई की परिभाषा को स्वीकार करने वाले अपने फैसले पर रोक लगाने के पांच महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई हो रही थी। 

न्यायालय ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट कहना है कि पर्यावरण से जुड़े इस संवेदनशील मामले पर वह पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही कोई अंतिम फैसला लेगा। 

गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए अरावली पर्वत शृंखलाओं का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि यह केवल  धरती पर उगी पत्थरों की केवल एक श्रृंखला भर नहीं है। यह उत्तर भारत में रहने वाले लोगों के लिए प्राकृतिक प्राणदायिनी भी है। अरावली एक बड़े भूभाग में रहने वाले लोगों को आक्सीजन प्रदान करने का सबसे बड़ा माध्यम भी है। अरावली पर्वत माला थार के रेगिस्तान को हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने से हजारों वर्षों से रोक रही है। 

अरावली पर्वत मामला दिल्ली और हरियाणा की उर्वरा भूमि को सदियों से रेगिस्तान बनने के खिलाफ एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी है। इस पर्वत शृंखला पर उगे लाखों पेड़ थार के रेगिस्तान से उठने वाले रेत के कणों को आगे बढ़ने से रोक देते हैं। अरावली में पिछले कई दशकों से हो रहे खनन और विस्फोटों के चलते न जाने कितने कई पहाड़ पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अवैध खनन या अवैध पेड़ों की कटाई वाले क्षेत्रों में भूजल स्तर  काफी हद तक गिर गया है। 

इन इलाकों में जमीन में जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। इससे इन इलाकों में रहने वाली आबादी को पानी की समस्या झेलनी पड़ रही है। खनन और पेड़ों की कटाई के चलते वन्यजीवों का स्वाभाविक आवास छिन रहा है। यही वजह है कि वनों में रहने वाले जानवर अब मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। वन्यजीवों और मानव में संघर्ष बढ़ रहा है।

Saturday, May 16, 2026

नेत्रहीन होकर भी बने महान संगीतकार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यदि मन में सच्ची लगन हो, तो कोई भी बाधा सफलता हासिल करने से नहीं रोक सकती है। दिव्यांग व्यक्ति भी सामान्य लोगों की तरह सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच सकता है। इसके सबसे बेहतरीन उदाहरण संगीतकार रवींद्र जैन थे। 

रवींद्र का जन्म 28 फरवरी 1944 को अलीगढ़ में हुआ था। जब उनका जन्म हुआ, तो उनके माता-पिता ने पाया कि उनका बेटा आंखें नहीं खोल रहा है। वह घबरा गए। उसको लेकर तुरंत नेत्र चिकित्सक के पास पहुंचे। चिकित्सक ने उनकी पलकों का आपरेशन तो कर दिया, लेकिन नेत्र ज्योति फिर भी नहीं आई। माता-पिता इससे निराश नहीं हुए। थोड़ा बड़ा होने पर उन्होंने अपने बेटे को हारमोनियम पकड़ा दिया। 

घर पर ही संगीत की शिक्षा दी जाने लगी। अलीगढ़ के ही दृष्टिबाधित स्कूल में पढ़ाई पूरी करने के बाद संगीत की उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता चले गए। दस वर्ष तक कठिन परिश्रम से हासिल हुई शिक्षा का उपयोग वह रेडियो स्टेशन पर गाने के लिए आडिशन देने लगे। 

कुछ समय तक रवींद्र जैन ने भजन भी गाए। रोजगार के लिए उन्होंने मुंबई का रुख किया और सन 1972 में वह फिल्मों में गाने लगे। भारत में सबसे प्रसिद्ध माने जाने वाले रामानंद सागर निर्देशित सीरियल रामायण  में संगीत देने के बाद तो वह घर-घर में पहचाने जाने लगे। 

रवींद्र जैन को सन 1985 में फिल्म राम तेरी गंगा मैली के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार भी मिला है। वर्ष 2015 में उनको पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह महान संगीतकार और गीतकार 9 अक्टूबर 2015 को 82 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गया। उनका संगीत आज भी अमर है।

लोगों की जागरूकता और सतर्कता से ही रुक सकती है साइबर ठगी


अशोक मिश्र

साइबर ठगों से पूरा देश त्रस्त है। देश का शायद ही कोई जिला हो, जहां रोज दो-चार साइबर ठगी की घटनाएं न हो रही हों। हरियाणा भी इससे अछूता नहीं है। सरकार, पुलिस और अन्य समाजसेवी संस्थाएं लोगों से साइबर ठगी के मामले में जागरूक होने की अपील करते हुए थक नहीं रही हैं, लेकिन लोगों के भीतर बैठा लालच उन्हें ठगों के चंगुल में फंसा रहा है। पुलिस जागरूकता अभियान चलाकर बार-बार समझा रही है कि अनजान वीडियो कॉल या व्हाट्सएप पर आए किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें। 

ट्राई या सीबीआई के नाम पर डराने वाले कॉल से बिल्कुल न डरें। सरकारी संस्थाएं किसी भी व्यक्ति से फोन पर संपर्क नहीं करते हैं। वे कभी फोन पर जांच भी नहीं करते है। सरकार विभिन्न माध्यमों से बार-बार बताती है कि किसी भी अनजान व्यक्ति को अपना बैंक विवरण, पिन या ओटीपी साझा न करें। इसके बावजूद लोग साइबर ठगी के शिकार हो जाते हैं। इसके पीछे लोगों की कम समय में ज्यादा धन कमाने की इच्छा भी है। किसी ने ह्वाट्सएप ग्रुप या किसी अन्य माध्यम से संपर्क किया। 

चिकनी-चुपड़ी बातें की, पूंजी निवेश में ज्यादा मुनाफा का लालच दिखाया, तो उसके झांसे में आकर अपनी पूंजी सौंप दी। लोग अपने सगे भाई-बहनों, माता-पिता पर पैसे के मामले में विश्वास नहीं करते हैं, लेकिन पता नहीं कैसे अनजान व्यक्ति पर भरोसा कर लेते हैं। सरकारी एजेंसियां साइबर ठगी के खिलाफ लगातार कार्रवाई करती रहती हैं। सरकार ने 2025 में 6,300 से अधिक मामले दर्ज किए थे। 1.5 लाख से अधिक फर्जी सिम/मोबाइल ब्लॉक किया जा चुका है। 1930 हेल्पलाइन के माध्यम से 40 प्रतिशत तक ठगी गई राशि को बैंक खातों में होल्ड/फ्रीज किया जा चुका है। 

हरियाणा पुलिस पर बढ़ते विश्वास के परिणामस्वरूप पिछले वर्ष 2025 में कुल 1,41,685 शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जो वर्ष 2024 की तुलना में 8.5 प्रतिशत अधिक थीं। गिरफ्तारी के मोर्चे पर वर्ष-2025 में हरियाणा पुलिस ने शानदार प्रदर्शन किया था। पिछले वर्ष कुल 8,022 साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। औसतन 22 अपराधियों की गिरफ्तारी प्रतिदिन की गई। इन सख्त कार्रवाइयों का सीधा असर यह हुआ कि साइबर ठगी की कुल राशि 980 करोड़ से घटकर 630 करोड़ रुपये रह गई। 

आंकड़े के आधार पर बात कही जाए, तो लोगों की 36 प्रतिशत जमा पंूजी को साइबर अपराधियों के खातों में जाने से रोका गया, जो प्रतिदिन लगभग एक करोड़ रुपये के आसपास पहुंचता है। वर्ष 2025 की शुरुआत में हरियाणा पुलिस द्वारा अपनाई गई पांच सूत्रीय रणनीति के तहत साइबर अपराध के पूरे इकोसिस्टम पर प्रहार किया गया। इसके अंतर्गत 1.50 लाख से अधिक मोबाइल नंबर, 12,326 आईएमईआई और 5,123 फर्जी वेबसाइट/सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक किए गए।

Friday, May 15, 2026

जीजा के साथ गोवा चली जाऊंगी


14 मई 2026 को दैनिक प्रभात खबर में प्रकाशित।
व्यंग्य

अशोक मिश्र

‘ना मानूं, ना मानूं, ना मानूं। मैं आपकी किसी कोई बात नहीं मानूंगी। आप झूठ बोलते हैं, फिर बहाना बनाकर निकल जाते हैं।’ घरैतिन नेता प्रतिपक्ष की तरह हाथ नचा-नचाकर बोल रही थीं। दरअसल, मैं भी गठबंधन के सहारे चल रही सरकार के मुखिया की तरह सिर झुकाए बैठा हुआ था। पत्नी और बेटा-बेटी का समर्थन लिए मेरी गृहस्थी रूपी सरकार चल भी नहीं सकती थी। गृहस्थी चलानी है, तो इन तीनों का सहयोग और समर्थन चाहिए। यह सभी जानते हैं कि दुनिया में सबसे कठिन काम पति होना है। पति और पिता को न जाने कितने समझौते करने पड़ते हैं। सुबह से ही मेरे घर में आपात बैठक चल रही थी। पत्नी, बेटा और बेटी तीनों गठबंधन धर्म का निर्वाह कर रहे थे। मेरे ही खिलाफ आक्रोश प्रदर्शन कर रहे थे।

मेरी आसंदी यानी जहां मैं बैठा हुआ था, वहां आकर मेरी बेटी मेरा कंधा झकझोरकर कह चुकी थी कि छुट्टियों में अगर आप हम सबको शिमला घुमाने नहीं ले गए, तो वह समर्थन वापस ले लेगी और मम्मी से कहकर मौसा जी के साथ गठबंधन करके नई सरकार बना लेगी।

पत्नी गोवा जाने की जिद पर अड़ी हुई थी। कह रही थी कि पिछले साल भी आपने गोवा ले जाने को कहा था। आखिरी समय पर आफिस का बहाना बनाकर टाल गए थे। इस बार अगर आपने आनाकानी की, तो मैं बच्चों को लेकर अपने जीजा के साथ गोवा घूमने चली जाऊंगी। बेटा बस इतना चाहता था कि इस बार की छुट्टियों में कहीं घूमने चला जाए, कोई स्थान विशेष उसकी च्वाइस में नहीं थी। मैं कई बार घरैतिन को समझा चुका था कि मेरी हालत पाकिस्तान जैसी है। वह तो अपनी गरीबी से  उबरने के लिए शराब बेच सकता है, लेकिन मेरे पास तो ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे बेचकर बच्चों को कहीं घुमाने ले जा सकूं। मेरी अर्थव्यवस्था सेंसेक्स की तरह ऊपर चढ़ ही नहीं रही है। महंगाई ने कमर तोड़ रखी है। मुद्रा अवमूल्यन रोज होता जा रहा है। बारह साल पहले जो सैलरी मिलती थी, उतनी ही मूल्य की सैलरी आज भी मिलती है। लेकिन परिवार वाले मेरी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। उन्हें तो लग रहा था कि भारत की तरह मेरी अर्थव्यवस्था पांच से सात ट्रिलियन डॉलर के बीच है। मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी हूं।

मेरी बेटी ने अपनी मां से कहा, मम्मी! बड़े मौसा जी से बात कीजिए। पूछिए कि वह हम सबको गोवा घुमाने ले जाने के लिए तैयार हैं? मौसी के साथ गोवा घूमने में मजा आ जाएगा। मैं तो जिंदगी में पहली बार समुद्र देखूंगी, कितना मजा आएगा। मैंने उस हालत में वॉक आउट करना ही उचित समझा। शाम को जब घर लौटा, तो पता चला कि घरैतिन ने अपने सहयोगी दलों यानी बेटा-बेटी को लेकर अपने जीजा-जीजी के साथ नई सरकार के गठन पर बातचीत करने के लिए गोवा जाने का फैसला किया है। मैं समझ गया कि मेरी अल्पमत की सरकार खतरे में है। मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी।

मन का अभिमान दूर हो चुका था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अभिमान वह दीमक है, जो व्यक्ति को धीरे-धीरे सफाचट कर जाता है। जिसे एक बार अभिमान हो गया, समझो कि वह पतन की ओर बढ़ चला है। उसके सुख-समृद्धि सब कुछ नष्ट होने वाला है। अभिमान पालने वाला यदि राजा भी हो, तो कुछ ही दिनों में वह रंक हो जाता है। 

किसी राज्य में राजा को अभिमान होने लगा। वैसे वह बहुत ही दयालु और गुणवान राजा था। उसने जीवन में कभी अपनी प्रजा के साथ राजा की तरह व्यवहार नहीं किया था। वह हमेशा अपनी प्रजा को पुत्रवत मानकर ही व्यवहार किया था। वह अपनी प्रजा का हर तरह से ख्याल रखता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका मन काफी चंचल हो रहा था। वह कई दिनों से अपने मन को साधने में लगा हुआ था। 

वह अपने राजा होने या राजकोष की संपदा पर कतई अभिमान नहीं करना चाहता था। लेकिन वह राजा था तो क्या हुआ, था तो इंसान ही। धीरे-धीरे उसके मन में अपने वैभव को लेकर अभिमान की भावना स्थायित्व पाने लगी। इसी कशमकश में वह अपने राजगुरु के पास पहुंचा। राजगुरु राजा को देखते ही सारा माजरा समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि तुम मेरी तीन बातों को हमेशा याद रखोगे, तो तुम सामान्य जीवन जी सकोगे। पहली बात यह है कि सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। 

दूसरी बात कि कभी भरपेट भोजन मत करना। तीसरी बात कि कम से कम सोना। सोने से बचे हुए समय में प्रजा की रक्षा करना। राजसी वैभव का मोह मत करना। जब जहां जैसा बिस्तर मिले, सो जाना। ऐसी स्थिति में तुम्हें घासफूस के बिस्तर पर भी अच्छी नींद आएगी। राजा अपने गुरु की बातों का मर्म समझ गया। उसने गुरु को प्रणाम किया और राज महल लौट आया। उसके मन का अभिमान दूर हो चुका था।

हवा में घुलने वाली अमोनिया गैस सांसों में घोल रही जहर

   

अशोक मिश्र

हरियाणा में वायु प्रदूषण के चलते सांस लेना भी दूभर होता जा रहा है। राज्य के औद्योगिक और शहरी इलाकों में हवा में घुली अमोनिया गैस लोगों की सांस घोट रही है। इसकी वजह से लोगों को कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। अमोनिया गैस के संपर्क  में आने वाले लोगों को  सांस लेने में तकलीफ होने के साथ-साथ खांसी, गले में जलन और छाती में जकड़न होती है। हवा में घुली अमोनिया गैस आंखों और त्वचा के लिए भी हानिकारक है। 

इसकी वजह से आंखों में तेज जलन पैदा होती है जिससे आंखों से पानी आने लगाता है। त्वचा में लालिमा आ सकती है जिससे खुजली भी हो सकती है। यही नहीं, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अमोनिया के संपर्क में रहे, तो वह दमा जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है। निमोनिया और फेफड़ों में पानी जमा होना आम बात है।  इनसान के तंत्रिका तंत्र पर भी बुरा असर पड़ सकता है। 

आंकड़े बताते हैं कि गुरुग्राम में हर दूसरा बच्चा श्वसन समस्याओं से जूझ रहा है। इसका बड़ा कारण प्रदूषित हवा है। रैस्पायर लिविंग साइंसिज की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि गुरुग्राम का सेक्टर-51 में कूड़े-कचरे के अंबार से बन रही जहरीली अमोनिया गैस का बड़ा हॉटस्पॉट बन चुका है। राज्य में पी. एम. 2.5 और पीएम 10 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से दोगुने से भी अधिक दर्ज किया गया है जबकि अमोनिया के स्तर में आठ फीसदी की बढ़ोतरी सामने आई है। गुरुग्राम के कुछ इलाके कूड़े के ढेरों और औद्योगिक कचरे के कारण अमोनिया के हॉटस्पॉट बन गए हैं।

इतना ही नहीं, फरीदाबाद, बहादुरगढ़, मानेसर और सोनीपत की औद्योगिक पट्टी इंसानों के लिए खतरे का कारण बनती जा रही है। इंसानों के स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण का बहुत बुरा असर हो रहा है। खेतों में यूरिया आधारित उर्वरकों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल हवा में अमोनिया गैस को बढ़ावा दे रहा है। खेतों में डाला गया उर्वरक बाद में हवा के संपर्क में आने के बाद अमोनिया गैस बनने का कारण है। पानीपत और सोनीपत के औद्योगिक बेल्ट में कपड़ा रंगाई इकाइयों और अन्य कारखानों से बिना उपचारित रसायन युक्त पानी यमुना नदी में छोड़ा जा रहा है जो हवा में अमोनिया का एक बड़ा स्रोत है। 

राज्य के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जमा कूड़े के अंबार से अमोनिया गैस का रिसाव होता है। कूड़े में पड़े अपशिष्ट जब सड़ने लगते हैं या उन पर सूरज की किरणें पड़ने से अपशिष्ट गर्म होता है, तब उससे अमोनिया गैस निकलती है। पशुधन अपशिष्ट से भी अमोनिया वायुमंडल में मिल रही है। ऐसी स्थिति में अगर बदलाव नहीं आया तो निकट भविष्य में लोगों को कई तरह की बीमारियों का शिकार होना पड़ सकता है। राज्य सरकार ऐसी स्थिति से बचने के लिए कई तरह के उपाय कर रही है। इसके बावजूद उद्योगों को भी इस काम में मदद करनी चाहिए और अपशिष्ट को नदी या खुले में फेंकने से बचना चाहिए।

Thursday, May 14, 2026

अरे! यह भोजन तो बासी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मित्रता का अर्थ यह नहीं है कि साथ घूमे-फिरे। सुख में मित्रता का दंभ भरा और जब संकट का समय आया, तो अपने मित्र से कन्नी काटकर निकल गए। मित्रता तो मित्र की मौत के बाद भी कायम रहती है।  दो मित्रों की एक बहुत ही अच्छी कथा है। किसी नगर में दो मित्र रहते थे। 

दोनों मित्र एक दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे। अमीरी-गरीबी या ऊंच-नीच की भावना उनमें कभी नहीं आई। संयोग की बात है। एक दिन एक मित्र की मौत हो गई। उम्र भी लगभग साठ के आसपास की हो गई थी। जीवित बचे मित्र को बहुत दुख हुआ। वह जानता था कि उसके मित्र का पुत्र आलसी और लापरवाह है। उसके मित्र ने काफी मेहनत करके खूब धन कमाया था। 

मित्र का पुत्र अपने आलस्य के चलते कुछ ही दिनों में सारे धन को खर्च कर बैठेगा। फिर कंगाली का जीवन जीना पड़ेगा। मित्र की मौत के कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति दिवंगत मित्र के घर गया। मित्र का पुत्र उसे जानता था। उसने बड़े सम्मान के साथ उसे बैठाया और आग्रह करते हुए कहा कि कुछ दिनों बाद त्यौहार आ रहा है। कृपया आप उस दिन भोजन पर पधारें। उस आदमी ने आग्रह स्वीकार कर लिया। जब वह व्यक्ति खाने पर बैठा, तो उसने पहला निवाला खाने के बाद कहा, अरे यह भोजन तो बासी है। 

मित्र के पुत्र ने कहा कि नहीं, यह तो अभी बनाया गया है। बासी कैसे हो सकता है। उस आदमी ने कहा कि इसमें गंध तो बरसों पुरानी आ रही है। मित्र का पुत्र समझ गया कि वह क्या कहना चाहते हैं। जिस धन से यह भोजन बना है, वह मेरे पिता का कमाया हुआ है। पुत्र ने अपने पिता के मित्र से कहा कि आप क्या कहना चाहते हैं, मैं समझ गया हूं। आप निश्चिंत रहें। मैं अपने पिता की संपत्ति में कमी नहीं आने दूंगा। मैं मेहनत करूंगा और अपनी कमाई से आपको भेजन कराऊंगा। यह सुनकर उस आदमी ने भोजन किया और संतुष्ट होकर अपने घर चाला गया।

जब तनावमुक्त रहेगा बच्चा तभी पढ़ाई में आगे बढ़ेगा बच्चा


अशोक मिश्र

यह सच है कि स्कूली बच्चों में तनाव बढ़ता जा रहा है। आज बच्चों के लिए सबसे जरूरी है कि वह खेलने-कूदने और पढ़ाई करने के साथ-साथ तनाव मुक्त रहें। केंद्र सरकार ने बच्चों को तनाव मुक्त रखने के लिए नई पहल करने का फैसला किया है। यह गाइडलाइन राज्यों से विचार-विमर्श करने के बाद जून के पहले सप्ताह में जारी हो सकता है। 

इस मामले में बच्चों को तनाव मुक्त रखने के लिए शिक्षा विभाग मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सहायता लेगा। इसके लिए गाइडलाइन तैयार की जा रही है। गाइडलाइन के मुताबिक, अब स्कूलों में बच्चों को केवल पढ़ाया ही नहीं जाएगा, बल्कि उनको तनाव मुक्त रहने के गुर सिखाए जाएंगे। अब स्कूलों में पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रखी जाएगी। शिक्षकों को भी स्वास्थ्य से जुड़ा विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वह स्कूल में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रख सकें। यदि कोई बच्चा तनावग्रस्त पाया जाता है, तो उसकी काउंसिलिंग की जाएगी। उसे मेडिटेशन सिखाया जाएगा। 

उसे खेलने-कूदने सहित अन्य गतिविधियों में लगाया जाएगा ताकि वह तनाव मुक्त हो सके। बच्चों को तनाव मुक्त रखने का सबसे बढ़िया तरीका उन्हें खेलने-कूदने की छूट देना है। खेलने-कूदने से बच्चों को मानसिक रूप से जहां संतोष प्राप्त होता है, तनाव कम होता है, वहीं उनका शारीरिक विकास भी होता है। दो-तीन दशक पहले तक स्कूली बच्चों पर कोई दबाव नहीं होता था। वह जी भरकर खेलते थे और मन भर पढ़ते थे। 

कहने का मतलब यह है कि जब तक उनका मन होता था, वह स्कूलों में पढ़ाई करते थे और जितनी मर्जी होती थी, उतना वह खेलते थे। उन दिनों रैंकिंग का दबाव भी बच्चों पर नहीं होता था। मां-पिता को बस इससे मतलब होता था कि उनका बच्चा पास हो गया है। फर्स्ट या सेकेंड आ गया, तो और अच्छी बात है। बच्चों पर किसी तरह का मानसिक दबाव नहीं रहने से उनका शारीरिक और मानसिक विकास भी अच्छी तरह होता था। जब वह उच्च शिक्षा ग्रहण करते थे, तो वह तनाव मुक्त रहते थे। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। 

नर्सरी और एलकेजी से ही माता-पिता अपने बच्चे पर अव्वल आने का दबाव डालने लगते हैं। यदि बच्चा किसी कारणवश पढ़ाई में पिछड़ जाता है, तो उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। उसकी दूसरे बच्चे से तुलना की जाती है। इससे बच्चा मनोवैज्ञानिक रूप से तनाव में आ जाता है। इतना ही नहीं, बच्चे को सुबह ही उठाकर पढ़ने के लिए बिठा दिया जाता है। 

उसके बाद उसे स्कूल भेज दिया जाता है। स्कूल में भी खेलने का मौका कम ही मिलता है। स्कूल से आने के कुछ ही देर बाद उसे ट्यूशन पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है। ट्यूशन से आने के बाद स्कूल और ट्यूशन का होमवर्क उसके सिर पर सवार हो जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चा तनावग्रस्त हो जाता है।

Wednesday, May 13, 2026

घड़े पर हंस रहे हो या कुम्हार पर?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्राचीनकाल में एक ऋषि हुए हैं उद्दालक। इनके पुत्र का नाम श्वेतकेतु था। माना जाता है कि विवाह नामक संस्था की शुरुआत श्वेतकेतु ने किया था। उद्दालक का एक शिष्य था कहोड़। उन्होंने अपनी पुत्री सुजाता की शादी कहोड़ से कर दी थी। कहोड़ को संपूर्ण वेदों का ज्ञान था। 

एक दिन कहोड़ वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, तो उनकी पत्नी सुजाता के गर्भ से आवाज आई कि पिता जी, आप वेद मंत्र का गलत उच्चारण कर रहे हैं। इस बात से नाराज कहोड़ ने अपने पुत्र को आठ जगह से टेढ़ा होने का शाप दिया। उन दिनों मिथिलापुर में ह्रस्वरोमा के पुत्र सीरध्वज यानी जनक का शासन था। 

कहते हैं कि अष्टावक्र भी अपने पिता कहोड़ के समान काफी विद्वान थे। अष्टावक्र के पिता को राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ में एक बंदी ने हरा दिया था जिसकी वजह से वह कारागार में बंद थे। अष्टावक्र अपने मामा श्वेतकेतु के साथ जब राजा जनक के दरबार में पहुंचे, तो उनको देखकर राजा जनक के सभी सभासद हंसने लगे। यह देखकर अष्टावक्र भी बहुत जोर से हंसने लगे। 

हालांकि उस समय अष्टावक्र और श्वेतकेतु की उम्र बहुत कम थी। मामा-भांजे दोनों किशोर ही थे। राजा जनक ने गंभीरता से अष्टावक्र से पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैं? अष्टावक्र ने राजा जनक से पूछा कि महाराज! आप बता सकते हैं कि आपके दरबारी क्यों हंस रहे थे। 

लोग कहते थे कि आपके दरबार में विद्वान रहते हैं, लेकिन यह तो निरे मूर्ख हैं। तब एक दरबारी ने कहा कि हम आपके शरीर को देखकर हंस रहे थे। अष्टावक्र ने कहा कि घड़े पर हंस रहे थे या कुम्हार पर? यह सुनकर सारे चुप रह गए। सभी जान गए कि दोनों बच्चे विद्वान हैं। बाद में बंदी से शास्त्रार्थ करके अष्टावक्र अपने पिता को आजाद करा लाए।

घरेलू कलह के चलते टूटते बिखरते जा रहे हैं परिवार

अशोक मिश्र

कई हजार साल पहले जब इंसान ने अपने को असुरक्षित महसूस किया, तो उसने परिवार नामक संस्था को जन्म दिया। परिवार को वर्तमान स्वरूप में आने में भी कई शताब्दियां लगीं। परिवार का मतलब होता है, हर प्रकार की समस्याओं और दिक्कतों को मिलजुलकर हल करना। परिवार ने न केवल विभिन्न प्रकार की विपत्तियों से इंसान की सुरक्षा की, बल्कि उसे सुकून का एहसास भी दिलाया। लेकिन पिछले दिनों से परिवार में जिस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं, उससे परिवार संस्था खुद संकटग्रस्त नजर आती है। 

परिवार की वजह से ही समाज में तमाम रिश्तों का निर्माण किया गया। हर रिश्ते की एक मर्यादा कायम की गई। लेकिन अब रिश्तों में कड़वाहट घुलती जा रही है। परिवार में कलह बढ़ती जा रही है। सोमवार को फरीदाबाद के दयालपुर गांव में एक व्यक्ति ने पहले अपने पांच साल के बच्चे की हत्या की और फिर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बताया जाता है कि मरने वाला अपनी पत्नी सहित अपने माता-पिता और भाई से झगड़ा करता था। उन सबसे मारपीट करता था जिसकी वजह से आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के मां-बाप, भाई और उसकी पत्नी अपने पांच साल के बेटे के साथ अलग रहते थे। 

मरने वाला व्यक्ति अपने पुस्तैनी घर में अकेला रहता था। दरअसल, ऐसी घटनाएं अब आम हो चली हैं। परिवार में पति-पत्नी, मां-पिता, भाई-बहनों के बीच सामंजस्य घटता जा रहा है। लोग छोटी-छोटी बातों पर उग्र हो रहे हैं। हत्या या आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं। जब से समाज में एकल परिवार का चलन बढ़ा है, तब से लड़के और लड़कियों में महत्वाकांक्षाओं ने उड़ान भरनी शुरू कर दी है। शिक्षित होना, अपने पैरों पर खड़ा होना, धन कमाने की लालसा होना किसी भी रूप में गलत नहीं है। 

लेकिन जब इसके चलते संबंधों में दरार आने लगे, तो परिवार के लोगों को सतर्क हो जाना चाहिए। आज पति हो या पत्नी, सबको अपने-अपने हिसाब से स्वतंत्रता चाहिए। कमाऊ महिलाएं अपनी कमाई को अपने मन मुताबिक खर्च करना चाहती हैं, लेकिन यदि पति इसमें बाधा डालता है, तो मनमुटाव हो जाता है। यही मनमुटाव बाद में एक ग्रंथि का रूप धारण कर लेता है। 

इससे परिवार में मारपीट, कहा सुनी और कई बाहर हत्या या आत्मघात जैसी घटनाओं में परिणत हो जाती है। जैसे-जैसे समाज में खुलापन आता जा रहा है, स्त्री-पुरुष की नजरों में परिवार और यौन संबंधों के मायने बदलते जा रहे हैं। अवैध संबंध रखना, शादीशुदा होते हुए भी गर्लफ्रेंड या ब्यायफ्रेंड रखना जैसी बातें सामान्य चलन मानी जाने लगी हैं। ऐसी स्थिति में परिवार में तनाव बढ़ना लाजिमी है। गरीबी, बेकारी जैसी समस्याओं के कारण भी परिवार में कलह मची रहती है। परिवार का कोई सदस्य अतिमहत्वाकांक्षी भी हो सकता है जिसकी वजह से परिवार में अनबन हो सकती है।

Tuesday, May 12, 2026

मौत का सौदागर अल्फ्रेड नोबेल मर गया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डायनामाइट के आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल की आम जनता में मौत का सौदागर के नाम से ख्याति थी। स्वीडन में 21 अक्टूबर 1833 को पैदा हुए अल्फ्रेड नोबेल एक उद्योगपति, रसायनज्ञ और वैज्ञानिक थे। अपने माता-पिता की आठ संतानों में वह और उनके दो भाई ही जीवित बच पाए थे। 

वह कठिन परिस्थितियों में अपनी शिक्षा पूरी कर पाने में सफल हुए थे। नोबेल ने स्वीडिश, फ्रेंच, रूसी, अंग्रेजी, जर्मन और इतालवी भाषाओं में दक्षता हासिल कर ली थी। वह अंग्रेजी में कविताएं भी लिखते थे। ​​एक बार की बात है। जब डायनामाइट का आविष्कार करने के बाद अल्फ्रेड नोबेल काफी बड़े उद्योगपति बन गए। उन्हीं दिनों उनके भाई लुडविग नोबेल की मृत्यु हो गई। 

मृत्यु का समाचार सुनकर लोगों ने शोक व्यक्त करने के लिए आना शुरू किया। मगर वह रोज की तरह अपनी बालकनी में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर एक हेडिंग पर पड़ी। लिखा था-मौत के सौदागर, डायनामाइट के आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल का निधन। अखबार के रिपोर्टर ने लुडविग की जगह अल्फ्रेड की मौत का समाचार लिखकर भेजा था जिसे संपादक ने प्रकाशित कर दिया था। 

खबर में सारी बातें लिखी थीं, बस मरने वाले का नाम ही गलत था। यह समाचार पढ़ने के बाद नोबेल सोचने लगे कि मौत के बाद मैं मौत का सौदागर नाम से पहचाना जाऊंगा। इस खबर का उन पर प्रभाव यह हुआ कि उन्होंने उस दिन से लोगों की समस्याओं का निदान करना शुरू कर दिया। 

उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति एक ट्रस्ट बनाकर सौंप दी। उसी ट्रस्ट ने नोबेल की मौत के पांच साल बाद भौतिक, रसायन, शांति, चिकित्सा और साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार देना शुरू किया।

चोरी छिपे पेड़ कटते रहेंगे तो कैसे हरियाणा में बढ़ेगा वनक्षेत्र

अशोक मिश्र

दुनिया भर की सरकारें, प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद चीख-चीख कर लोगों को सचेत कर रहे हैं कि प्रकृति में कार्बन डाई आक्साइड गैस का उत्सर्जन रोको। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जितना कम होगा, पर्यावरण संतुलन बरकरार रहेगा। जीवाश्म ईंधन का उपयोग तो बिल्कुल बंद करना होगा। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि हर क्षेत्र में लगभग बीस प्रतिशत क्षेत्रफल हराभरा हो यानी पेड़-पौधों की बहुलता हो। यही वजह है कि भारत में हर साल जून और जुलाई महीने में पौधरोपण कार्यक्रम चलाया जाता है। 

स्कूली बच्चों से लेकर सरकारी संस्थाएं पौधरोपण कार्यक्रम में भाग लेते हैं। बच्चों को हर साल रटवाया जाता है कि पौधरोपण करो, पर्यावरण बचाओ। हरियाणा भी पौधरोपण के मामले में किसी भी दूसरे राज्य से पीछे नहीं है। राज्य में हर साल करोड़ों पौधे रोपे जाते हैं। यदि इस हिसाब से देखा जाए, तो पिछले एक दशक में जितने पौधे रोपे गए हैं, उसके बाद तो प्रदेश में जंगल ही जंगल होने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं है। बल्कि कुछ रिपोर्ट तो बताती हैं कि राज्य का वन क्षेत्र घटता जा रहा है। 

इसका कारण यह माना जा सकता है कि पौधरोपण अभियान तो चलाए गए, लेकिन पौधों को रोपने के बाद उनकी देखभाल नहीं की गई। इसकी वजह से पौधे या तो सूख गए या फिर उन्हें जानवर चर गए। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ संस्थाओं ने पौधरोपण के आंकड़े ही गलत दिए हों। वन क्षेत्र ने बढ़ने का कारण यह भी है कि राज्य में जितने वन क्षेत्र हैं उनमें पेड़ों की कटाई अवैध तरीके से की जा रही है। यमुनानगर स्थित कलेसर के जंगल में खैर के 3253 पेड़ काट दिए गए। 

अखबारों में रिपोर्ट छपने के बाद वन विभाग की नींद खुली। पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव विभाग ने मामले की जांच की तो कलेसर जंगल में 1473 पेड़ों के ठूंठ नए पाए गए। इसका मतलब यह है कि यह पेड़ हाल ही में काटे गए हैं। जांच में 1780 ठूंठ पुराने मिले हैं यानी इतने सारे पेड़ बहुत पहले ही काटे गए थे। पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव विभाग ने अपनी जांच रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच और आवश्यक कार्रवाई करने की सिफारिश की है। 

अवैध पेड़ कटान के मामले में कई बार संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है। संबंधित विभाग ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन देता है। ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच के बाद कार्रवाई भी की जाती है, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से अवैध कटान शुरू हो जाती है। ऐसी स्थिति में यही किया जा सकता है कि पेड़ों की अवैध कटान को लेकर लोगों को जागरूक किया जाए। अधिक से अधिक पौधों को रोपने के बाद उनकी सुरक्षा की जाए। जब तक लोग जागरूक नहीं होंगे, राज्य में बीस प्रतिशत वन क्षेत्र का सपना अधूरा ही रहेगा।

Monday, May 11, 2026

बेहतर है, जमीन उसे वापस कर दो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बिहार के सीवान जिले में कायस्थ परिवार में जन्मे डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। इनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी दोनों भाषाओं के विद्वान थे। इनकी मां कमलेश्वरी देवी ने हमेशा गरीबों की मदद करने, एक आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा दी। हालांकि राजेंद्र बाबू को अपनी मां का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं मिला। 

मां की मौत के बाद इनका पालन पोषण बड़ी बहन ने किया। डॉ. राजेंद्र बाबू बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। सन 1905 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से राजेंद्र बाबू ने प्रथम श्रेणी की डिग्री हासिल की। राजेंद्र बाबू कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, कुशल अधिवक्ता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। 

बात उन दिनों की है, जब वह वकालत कर रहे थे। बचपन में मां से मिली शिक्षा और बड़ी बहन के पालन-पोषण का प्रभाव यह हुआ कि वकालत के दिनों में भी उन्होंने गरीबों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया। वह गरीबों और असहायों का मुकदमा कई बार मुफ्त लड़े थे और जीत भी दिलाई थी। एक दिन एक व्यक्ति राजेंद्र बाबू के किसी परिचित का पत्र लेकर उनसे मिला और उनसे मुकदमा लड़ने की गुजारिश की। 

राजेंद्र बाबू ने उससे कागजात मांगे जिसको पढ़ने के बाद पता चला कि वह आदमी जिस जमीन का मुकदमा लड़ने के लिए उसके पास आया है, किसी विधवा का है। राजेंद्र बाबू ने उस व्यक्ति से कहा कि तुमने कागजात तो बहुत चतुराई से बनवाया है। तुम मुकदमा जीत भी सकते हो, लेकिन अच्छा होगा कि उस विधवा को उसकी जमीन वापस कर दो। वह जमीन ही उसकी जीविका का आधार है। यह सुनकर उस व्यक्ति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। उसने विधवा की जमीन उसे वापस कर दी।

रिश्तों की मर्यादा का दिनोंदिन होता क्षरण चिंता का विषय

अशोक मिश्र

दुनिया का कोई भी समाज हो, रिश्तों की मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी हमेशा उस समाज के लोगों की रही है। हर रिश्ते की अपनी मर्यादा और सीमाएं होती हैं। समाज में रिश्तों की जरूरत इसलिए पड़ी ताकि विभिन्न प्रकार के संबंधों की एक गरिमा, मर्यादा और सीमाएं तय की जा सकें। जिस तरह का व्यवहार व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ कर सकता है, वैसा व्यवहार वह किसी दूसरे रिश्ते की महिला के साथ नहीं कर सकता है। 

मां, बहन, पत्नी, बेटी, मौसी, बुआ, साली, सलहज जैसे रिश्तों का मार्धुय बनाए रखने के लिए कुछ सीमाएं समाज ने तय कर रखी हैं। वर्तमान समाज में इन रिश्तों की मर्यादा का उल्लंघन करने वाला समाज में निंदा का पात्र ही नहीं होता है, बल्कि कानून भी अपराध की प्रकृति के अनुसार सजा देता है। समाज ने जीजा और साली या सलहज के बीच शिष्ट हास्य की इजाजत तो दी है, लेकिन उसे भी एक निश्चित दायरे में बांध कर रख दिया है ताकि समाज में एक संतुलन बना रहे। 

फरीदाबाद के बल्लभगढ़ निवासी एक किशोरी उत्तर प्रदेश के कासना थाना क्षेत्र में रहने वाले जीजा के घर कुछ दिनों तक रहने के लिए गई थी। जब वह नाबालिग थी, तो उसके जीजा ने अपनी साली के साथ दुष्कर्म किया। जीजा ने दुष्कर्म करते समय उसकी वीडियो बना ली। उस अश्लील वीडियो के आधार पर वह नाबालिग साली से दुष्कर्म करता रहा। जब उसकी साली की शादी हो गई, तो उसने दुष्कर्म की वीडियो साली के पति को भेजकर शादी तुड़वा दी। पीड़िता के माता-पिता ने किसी तरह उसकी सगाई दूसरी जगह तय की, तो जीजा ने फिर सगाई तुड़वा दी। 

अब पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। निकट संबंधों में दुष्कर्म या अवैध संबंधों के बारे में समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर खबरें आए दिन आती रहती हैं। इन खबरों से पता चलता है कि लोगों ने सामाजिक मर्यादा और लोकलाज ताख पर रख दिया है। ऐसा नहीं है कि पहले ऐसे घृणित कार्य नहीं होते थे, लेकिन तब सूचनाओं का विस्फोट नहीं होता था और घटनाएं भी बहुत कम ही होती थीं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से यौन अपराध की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है। 

कहते हैं कि सबसे ज्यादा खतरा बच्चियों को निकट संबंधियों से ही होता है। जीजा, फूफा, चाचा, मामा जैसे संबंधी कब मौके का फायदा उठा जाएं, कहा नहीं जा सकता है। ऐसा नहीं है कि निकट संबंधियों पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन सतर्कजरूर रहना चाहिए। जब से समाज में एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है, तब से इस तरह की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चियां और महिलाएं अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित रहती थीं। एक ही घर में कई परिवार साथ रहते थे। 

सभी एक दूसरे के सुख-दुख में भागीदार होते थे। एक दूसरे के साथ संबंध प्रगाढ़ हुआ करते थे। ऐसी स्थिति में किसी बाहरी या निकट संबंधी की हिम्मत नहीं होती थी, महिला या बच्चा की अपमान करने की।

Sunday, May 10, 2026

भविष्य नहीं, वर्तमान के बारे में सोचो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रवींद्रनाथ टैगोर केवल प्रख्यात कवि ही नहीं, बल्कि चित्रकार, संगीतकार और दार्शनिक थे। उनके परिवार में संगीतकार और उपन्यासकार भी थे। रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 9 मई 1871 को जोड़ासाकों ठाकुरबाड़ी में हुआ था। उनकी दो रचनाएं भारत में जन गण मन और बांग्लादेश में आमार सोनार बांग्ला राष्ट्रगान बनीं। रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबल पुरस्कार भी हासिल हुआ था। 

एक बार की बात है। एक शिष्य टैगोर के पास आया। वह बहुत ही चिंतित दिख रहा था। टैगोर ने अपने शिष्य से कहा कि तुम बहुत चिंतित दिखाई देते हो? क्या परेशानी है? मुझे बताओ, शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं। शिष्य ने कहा कि हां, गुरुदेव! मैं सचमुच बहुत दुखी हूं। रात भर मुझे नींद नहीं आती है। 

चिंता की वजह से मेरा मन अशांत रहता है। समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? टैगोर ने कहा कि तुम बताओ, चिंतित क्यों हो? उस शिष्य ने कहा कि गुरुदेव, मेरे मन में हमेशा चिंतन-मनन चलता रहता है। कई बार मैं यह सोचकर परेशान हो जाता हूं कि जब इस संसार की समस्त आत्माओं को जीवन-मरण से छुटकारा मिल जाएगा, तब क्या होगा? यह पृथ्वी तो जीवन विहीन हो जाएगी? 

टैगोर ने उसकी बात को ध्यान से सुना और फिर बोले, यह संसार असीमित है। परिवर्तन इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है। एक दिन पृथ्वी जीवन रहित हो जाएगी, ऐसा सोचना अज्ञानता है। तुम्हारा सवाल भविष्य से जुड़ा है। भविष्य में कब किसके साथ क्या होगा? इसके विषय में कौन बता सकता है। लोग भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान बरबाद कर लते हैं। व्यक्ति को अपने वर्तमान के बारे में सोचना चाहिए। यह सुनकर शिष्य संतुष्ट होकर चला गया।

हरियाणा के इकोसिस्टम को बचाने के लिए अवैध खनन रोकना जरूरी

अशोक मिश्र

पहाड़ हो, नदी हो, खेत हो या खलिहान, खनन माफियाओं की नजर से कुछ भी नहीं बचा है। पिछले कई वर्षों से खनन माफिया अरावली पहाड़ियों का सीना छलनी कर रहे हैं। नदियों से रेत निकालकर मुनाफा कमा रहे हैं। खेत की मिट्टी तक चोरी करके बेच रहे हैं। इन पर रोक लगाने के कई प्रयास सरकार और कोर्ट कर चुकी है। लेकिन शासन-प्रशासन की सक्रियता से कुछ दिनों तक खनन माफिया चुप बैठ जाते हैं, उसके बाद उनका कारोबार फिर चालू हो जाता है। हरियाणा में अवैध खनन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। 

खनन माफिया मुख्य रूप से यमुनानगर, पलवल, मेवात और अरावली पहाड़ियों में सक्रिय हैं। एक आंकड़े के अनुसार, अप्रैल 2019 से अक्टूबर 2024 तक 10,676 से अधिक मामले दर्ज किए गए। अवैध खनन करने वालों से इन वर्षों में सरकार ने लगभग 345.74 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अवैध खनन में लगे वर्ष 2025 में 1,186 से अधिक वाहन जब्त किए गए। इसके बावजूद प्रदेश में अवैध खनन पर रोक नहीं लग पाई है। सच कहा जाए, तो अवैध खनन पर कोई भी सरकार या प्रशासन तब तक रोक नहीं लगा सकती है, जब तक शहर और ग्रामीण क्षेत्र के लोग जागरूक नहीं होंगे। 

सरकार चप्पे-चप्पे पर पहरा नहीं बिठा सकती है। अवैध खनन रोकने के लिए जरूरी है कि जिस क्षेत्र में अवैध खनन हो रहा है, उसकी जानकारी प्रशासन तक पहुंचाएं। यदि कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो वह शासन से संपर्क करें। सरकार उनकी शिकायत पर कार्रवाई जरूर करेगी। वैसे पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने भी पिछले दिनों आदेश दिया है कि प्रदेश की सभी खनन साइट्स की अनिवार्य रूप से हर वर्ष ड्रोन मैपिंग करवाई जाए, ताकि अवैध खनन की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सके। 

कोर्ट का यह भी कहना है कि केवल तकनीक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक रिकॉर्डिंग के जरिए ही खनन नियमों के उल्लंघन को सही ढंग से पकड़ा और रोका जा सकता है। हाई कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वह तुरंत आवश्यक आदेश जारी कर राज्य की सभी खनन साइट्स की वार्षिक ड्रोन मैपिंग सुनिश्चित करें। हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए पूरे राज्य के खनन क्षेत्रों का वैज्ञानिक डेटा जुटा सकता है। 

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि अवैध खनन के कारण राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को भारी नुकसान हो रहा है। प्रदेश में बाढ़ का खतरा बढ़ता जा रहा है। प्रदेश में हो रहे अवैध खनन से सरकारी खजाने को भी भारी नुकसान हो रहा है। हालात यह है कि अरावली के जंगलों में अनुमत सीमा (78 मीटर) से कहीं अधिक, 250 मीटर तक खुदाई की जा रही है। प्रदेश के इकोसिस्टम को बचाने के लिए प्रदेश में हो रहे अवैध खनन को रोकना बहुत जरूरी है।

Saturday, May 9, 2026

इक्कीस साल की उम्र में शहीद हो गईं प्रीतिलता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रीतिलता वाडेदार एक ऐसी छात्रा थीं जिन्हें मरने के 80 साल बाद दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्रदान की गई थी। कोलकाता विश्वविद्यालय के अंग्रेज अधिकारियों ने उत्तीर्ण होने के बावजूद उनकी डिग्री पर रोक लगा दी थी। प्रीतिलता का जन्म 5 मई 1911 को चटगांव (अब बांग्लादेश में) के एक गरीब परिवार में हुआ था। 

कालेज की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गई थीं। वह क्रांतिकारी सूर्य सेन और उनके साथी रामकृष्ण विश्वास से अकसर मिलने जाया करती थीं। वह उनके क्रांतिकारी दल की सक्रिय सदस्य भी थीं। इनमें भारत को स्वाधीन कराने की प्रबल आकांक्षा थी। 

जब अंग्रेजों ने इनकी स्नातक की डिग्री पर रोक लगा दी, तो इन्होंने एक स्कूल में अध्यापन शुरू किया। चटगांव के पहाड़तली इलाके में एक यूरोपियन क्लब था जिसमें अंग्रेजों को ही अंदर जाने की इजाजत थी। क्लब के बाहर एक बोर्ड लगा हुआ था जिसमें अंग्रेजी में लिखा हुआ था कि डाग्स एंड इंडियन्स आर नॉट एलाउड। कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित लिखा यह बोर्ड प्रीतिलता बाडेदार की आंखों में हमेशा खटकता था। 

उधर से गुजरते समय वह इस बोर्ड को देखकर आक्रोशित हो उठती थीं। एक दिन प्रीतिलता ने अपने साथियों के साथ पहाड़तली के इस क्लब पर सशस्त्र हमला बोल दिया। दोनों ओर से गोलियां चलने लगीं। इसी बीच एक गोली आकर प्रीतिलता को लगी जिससे वह घायल हो गईं। 

अंग्रेजों की यातनाओं और दल का भेद खुलने के भय से बचने के लिए वह साइनाइड साथ लेकर गई थीं। जब बचने की गुंजाइश नहीं बची, तो प्रीतिलता ने साइनाइड खाकर प्राण त्याग दिए। क्रांतिकारी प्रीतिलता 21 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गईं।

हरियाणा में गेहूं के अवशेष जलाकर किसानों ने बढ़ा दिया प्रदूषण

अशोक मिश्र

प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है। दुनिया के कई देश प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। इससे उन देशों की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। जीडीपी गिर रही है। भारत में भी प्रदूषण की समस्या गहराती जा रही है। इसकी वजह से देश के कई हिस्सों में प्रदूषणजनित बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। इससे जहां परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, वहीं कार्यबल का भी नुकसान हो रहा है। 

हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोग प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। हरियाणा में प्रदूषण को रोकने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं, इसके बावजूद प्रदूषण से निजात नहीं मिल रही है। लोग धान की फसल के समय में पराली जलाने से बाज नहीं आते हैं, तो गेहूं की फसल के समय में गेहूं का फाना यानी उसके अवशेष डंठल जला रहे हैं। पिछले साल काफी प्रयास करने के बाद पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई थी। कुल 662 स्थानों पर धान की पराली जलाई गई थी।

लेकिन इस साल किसानों ने धान की पराली जलाने के मुकाबले में चार गुना ज्यादा गेहूं के अवशेष जला दिए हैं। पूरे प्रदेश में इस साल एक अप्रैल से छह मई के बीच 2683 स्थानों पर गेहूं के अवशेष जलाए जा चुके हैं। सबसे ज्यादा 441 मामले तो जींद जिले में पाए गए हैं। प्रदेश सरकार ने पराली हो या गेहूं के अवशेष जलाने पर प्रतिबंध लगा रखा है। प्रदेश सरकार ने किसान गेहूं के डंठल न जलाने पाएं, इसके लिए अधिकारियों की टीम बनाई थी। इस टीम को किसानों पर नजर रखनी थी, इसके बावजूद इतने ज्यादा स्थानों पर गेहूं के अवशेष जलाए गए। 

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पिछले दिनों हरियाणा के अधिकारियों से इस मामले में जवाब भी मांगा था। पिछले पांच साल से प्रदेश सरकार के काफी प्रयास करने के बाद पराली जलाने के मामले में काफी कमी आई थी। पराली जलाने की घटनाएं 3626 स्थानों से घटकर 662 पर आ गई थीं। अब गेहूं के अवशेष जलाने की घटनाओं ने सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सामने एक नई चिंता पैदा कर दी है। 

गेहूं के अवशेष को खेत में जलाने से पर्यावरण और मिट्टी को काफी नुकसान पहुंचता है। इसके खेतों में रहने वाले वे कीट भी मर जाते हैं, जो खेती के लिए काफी लाभदायक साबित होते हैं। इससे खेत की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो जाती है। वैसे यदि किसान चाहें तो गेहूं के अवशेष का सदुपयोग कर सकते हैं। वह गेहूं के डंठल से कम्पोस्ट खाद बना सकते हैं। इसके अलावा खेत में जुताई करके इन्हें मिट्टी में मिलाकर खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकते हैं। 

राज्य सरकार ने खेत में गेहूं के अवशेष जलाने वाले 552 किसानों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए दो सीजन तक मंडियों में एमएसपी पर अनाज बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया है। खेत या खेत के बाहर पराली या गेहूं का अवशेष जलाना, अपराध है। किसानों को ऐसा करने से बचना चाहिए।

Friday, May 8, 2026

विदेश में नौकरी दिलाने का झांसा देने वाले ट्रैवल एजेंटों की खैर नहीं

अशोक मिश्र

किसी भी तरह विदेश जाने की ललक पंजाब, हरियाणा और दक्षिण के राज्य केरलम के युवाओं में बहुत है। पंजाब और हरियाणा के युवा तो सोते-जागते अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, इजरायल, यूनाइटेड किंगडम, रूस और नार्वे जैसे देशों में जाने का सपना देखते रहते हैं। वे लोग सौभाग्यशाली हैं जिनको हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से विदेश भेजा जाता है। 

पिछले साल हरियाणा सरकार ने कौशल रोजगार निगम के जरिये सैकड़ों युवाओं को इजरायल और दुबई भेजा है। दुबई और इजरायल भेजे गए युवा पांच साल तक इन देशों में काम करेंगे। इन्हें अच्छी खासी तनख्वाह भी मिलेगी। लेकिन बहुत सारे ऐसे भी युवा हैं जो डंकी रूट से अमेरिका, कनाडा, रूस, आस्ट्रेलिया और अरब देशों में अच्छी खासी कमाई की चाह में जाते हैं। डंकी रूट से विदेश जाने वाले युवाओं को इसके लिए चालीस-पचास लाख रुपये खर्च करना पड़ता है। 

डंकी रूट से युवाओं को किसी भी देश में पहुंचाने का वायदा करने वाले फर्जी ट्रैवल एजेंट कई बार युवाओं की जान भी जोखिम में डाल देते हैं। इतना ही नहीं, पिछले तीन-साढ़े तीन साल में डंकी रूट से विदेश जाने की कोशिश करने वाले युवा करीब 1700 करोड़ रुपये गंवा चुके हैं। इस मामले में सबसे दुखद बात यह है कि जब गलत तरीके से किसी देश में जाने पर वहां की सरकार इन्हें पकड़ लेती है या भारत के लिए डिपोर्ट कर देती है, तो डिपोर्ट किए गए युवक के परिवार वाले प्रतिष्ठा के नाम पर चुप्पी साध लेते हैं। 

वह उस आदमी या ट्रैवल एजेंट के खिलाफ कार्रवाई तक नहीं करते हैं, जिसकी वजह से उनके बेटे की जिंदगी बरबाद हुई होती है। सरकार ने साल 2024 में विदेश भेजने में धोखाधड़ी के खिलाफ हरियाणा ट्रैवल एजेंट पंजीकरण और विनियमन विधेयक बनाया है। इसे विधानसभा में 28 फरवरी 2024 को पारित किया गया था। इसके तहत मानव तस्करी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने या धोखाधड़ी में दोषी पाए जाने पर ट्रैवल एजेंट को कम से कम तीन साल से लेकर अधिकतम दस साल की कैद हो सकती है। 

इसी तरह दो से पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। किसी व्यक्ति या एजेंसी को ट्रैवल एजेंट के रूप में काम करने के लिए सरकार से रजिस्ट्रेशन कराना होगा, जिसकी वैधता तीन साल की होगी, जिसके बाद रिन्यू करवाना होगा। धोखाधड़ी से अर्जित की गई ट्रैवल एजेंट की संपत्ति को जब्त भी किया जाएगा। लेकिन एक बार फिर सैनी सरकार ने ट्रैवल एजेंटों से जुड़े कानून में बदलाव किया है। 

यदि कोई ट्रैवल एजेंट विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर फर्जीवाड़ा करता है, नकली दस्तावेज बनाता है या फिर मानव तस्करी में लिप्त पाया जाता है, तो सात से दस साल की जेल या दो से पांच लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। नए कानून के मुताबिक, दोषी एजेंट की संपत्ति को जब्त करके पीड़ित को मुआवजा दिया जाएगा।

क्लर्क ने कहा, सबूत दो, तुम्हीं एमा काल्वे हो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी विवेकानंद की एक पुस्तक है मेमोरीज आफ यूरोपियन ट्रैवल। इसमें वह लिखते हैं कि एमा गरीब थीं लेकिन अद्भुत प्रतिभा संपन्न थीं। अपने सौंदर्य, यौवन, प्रतिभा और पवित्र आवाज की वजह से वे आज पश्चिम की सबसे कामयाब गायिका हैं। तकलीफों और मुफलिसी ने उन्हें सिखाया।

स्वामी जी ने जिस एमा के बारे में अपनी पुस्तक में लिखा है, वह थीं रोजा एमा काल्वे। इनका जन्म 15 अगस्त 1858 को एवेरान में हुआ था। इनके पिता एक इंजीनियर थे। यह फ्रांसीसी ओपेरा गायिका थीं। प्रसिद्ध होने के बाद उन्होंने बहुत धन कमाया,लेकिन 1894 में शिकागो में कार्यक्रम पेश करने के दौरान एमा की इकलौती पुत्री की आग लगने से मौत हो गई। इसके बाद उन्होंने चार बार आत्महत्या का प्रयास किया। 

इसी बीच उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई और उन्होंने उन्हें अवसाद से बाहर निकाला। कहते हैं कि जब वे अपने प्रसिद्धि के सर्वोच्च शिखर पर थीं, तो कैलिफोर्निया के एक छोटे शहर पहुंची। वह एक रजिस्टर्ड डाक आने वाली थी। पोस्टआफिस में पहुंचने पर उन्होंने डॉक के बारे में पूछताछ की और बताया कि वह एमा काल्वे हैं। पोस्ट आफिस के क्लर्कने उनसे उनके एमा काल्वे होने का सबूत मांगा। उन्होंने उस क्लर्क से विनम्रतापूर्वक कहा कि वही हैं एमा काल्वे। लेकिन क्लर्क नहीं माना। 

उसने कहा कि वह काल्वे जैसी नहीं दिखती हैं क्योंकि कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में उसने उन्हें देखा है। एमा ने बताया कि कार्यक्रम के समय मैं अधिक सुंदर दिखती हूं। इसके बाद एमा ने उस क्लर्क को वही गीत गाकर सुनाया। पूरा पोस्ट आफिस चकित रह गया। उस क्लर्क ने बाद में उनसे क्षमा मांगी और पत्र उन्हें सौंप दिया।

Thursday, May 7, 2026

तुम अपने श्वेत दोस्त के साथ नहीं खेल सकते


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्वेत अश्वेत का भेदभाव कोई नया नहीं है। आज दुनिया में कोई भी किसी के साथ रंग या नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहा है। अमेरिका, अफ्रीका और कई यूरोपीय देशों में नस्लभेद की भावना बहुत गहरे तक समाई हुई थी। काले लोगों को हर जगह अपमानित होना पड़ता था। 

गोरे लोग कई बार तो अपनी सीमाएं लांघकर काले लोगों को अपमानित करते थे। अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बड़ी मजबूती से लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर का जन्म 15 जनवरी 1929 को अटलांटा में हुआ था। उनके पिता पादरी थे। पिता की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी थी, इसलिए मार्टिन को बचपन में आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन बचपन में हुई एक घटना ने उनके बालमन पर बहुत प्रभाव डाला। 

जब वह छह साल के हुए और उन्हें स्कूल जाना पड़ा, तो पता चला कि पड़ोस में रहने वाले एक व्यापारी के पुत्र को गोरों के स्कूल में जाना होगा और मार्टिन को काले लोगों के स्कूल में। स्कूल जाने से पहले वह दोनों एक साथ खेलते थे, लेकिन बाद में दोनों को एक दूसरे के साथ खेलने से रोक दिया गया। इस घटना का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। 

बाद में उन्होंने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ जोरदार संघर्ष शुरू किया। उनके इस काम में आठवीं कक्षा में पढ़ाने वाली टीचर ब्रैडली ने नागरिक अधिकार की लड़ाई में उनका बहुत साथ दिया। टीचर की ही प्रेरणा से वह  अमेरिका में वंचितों को न्याय दिलाने में सफल हुए। उन्होंने जीवन भर रंगभेद के खिलाफ संघर्ष किया। 4 अप्रैल 1968 को एक हत्यारे ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर की गोली मारकर हत्या कर दी।

हरियाणा में कुपोषण की समस्या से जूझ रहीं गर्भवती महिलाएं

अशोक मिश्र

हरियाणा में गर्भवती महिलाएं कुपोषण की समस्या से जूझ रही हैं। इसकी वजह से कम वजन के शिशु पैदा हो रहे हैं। ऐसे में कम वजन के पैदा होने वाले शिशुओं में से कुछ एक साल की उम्र में ही मौत का शिकार हो जाते हैं। अगर फरीदाबाद जिले की ही रिपोर्ट पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि दस महीने में जिले में कुल 44395 नवजात बच्चों के वजन की जांच की गई,  जिसमें से 6803 बच्चों का वजन ढाई किग्रा से कम पाया गया। 945 बच्चों का वजन 1.8 किग्रा से भी कम पाया गया। 

इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में गर्भवती महिलाओं के पोषण की क्या स्थिति है। भारत सरकार के पोषण ट्रैकर पोर्टल के अनुसार वर्ष 2025 में हरियाणा में पांच साल तक की उम्र के करीब 13.82 लाख बच्चों की जांच की गई। इनमें करीब 35 फीसदी बच्चे कुपोषित मिले। बच्चों के सेहत में ध्यान में रखकर केंद्र ने हरियाणा सरकार को व्यापक जागरूकता अभियान चलाने और पोषण अभियान पर विशेष दिशा-निर्देश दिए थे। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों की ऊंचाई, वजन, शरीर की बनावट को भी मापा गया, जिसमें करीब 22 फीसदी बच्चे बौनापन, सात फीसदी कम वजन, करीब तीन फीसदी कमजोर और तीन फीसदी के करीब अत्यधिक वजन यानि मोटापा के शिकार पाए गए। 

हरियाणा में पांच साल से कम उम्र के लगभग 40 प्रतिशत बच्चे कम वजन और कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी चिंताजनक है। अध्ययनों के अनुसार, बच्चों में कम वजन के मुख्य कारणों में मां में खून की कमी (एनीमिया) और गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी प्रमुख है। हालांकि राज्य सरकार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैय्या कराने की हरसंभव कोशिश कर रही है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आशा कार्यकर्ताओं के सहारे गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। सैनी सरकार 'मिशन पोषण 2.0' के तहत धन का आवंटन बढ़ा रही है, लेकिन सरकार के काफी प्रयास करने के बावजूद व्यवस्थागत खामियां दूर नहीं हो पा रही हैं। हरियाणा के घरों में खाने-पीने की कमी नहीं है। लेकिन बच्चों को क्या डाइट लेनी चाहिए, क्या नहीं, इस जानकारी का अभिभावकों में अभाव है। ज्यादातर लोग डेढ़ या दो साल तक बच्चे को दूध ही पिलाते हैं, जबकि छह महीने के बाद बच्चे को ऊपरी खाना शुरू कर देना चाहिए।

 मां बाप का मानना रहता है कि बच्चे को दूध पिलाओ, वो सारा दिन ऐसा करते हैं, जिसकी वजह से अन्य पोषक तत्वों की कमी रह जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत सारी गर्भवती महिलाएं अपनी जांच कराने में भी लापरवाही बरतती हैं। जिसके कारण उन्हें पता ही नहीं चल पता है कि उनमें किस पोषक तत्व की कमी है। नतीजा यह होता है कि उनका बच्चा कमजोर पैदा होता है।

Wednesday, May 6, 2026

मेरा बेटा अनपढ़ है, खेती करता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

माता-पिता की सेवा करना, इनसान का परम कर्तव्य है। हमारे मां-बाप ने बहुत कष्ट उठाकर हमारा पालन-पोषण किया है। यदि हम उनके किसी काम न आए, तो फिर हमारा जीवन व्यर्थ है। एक बार की बात है। कुएं पर चार महिलाएं पानी भरने आईं। बात काफी पुरानी है। तब लोग पीने के पानी के लिए कुएं के पानी पर ही निर्भर रहते थे। चारों महिलाओं में बातचीत होने लगी। 

महिलाओं की बातचीत के दौरान चर्चा बेटों को लेकर चल निकली। एक महिला ने बड़े गर्व से अपने बेटे के बारे में बताते हुए कहा कि मेरा बेटा विश्वविद्यालय से पढ़कर आया है। पढ़ाई खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद उसे उसी विश्वविद्यालय में नौकरी मिल गई है। अब वह वहां पढ़ाने लगा है। तभी दूसरी महिला ने उसकी बात को काटते हुए कहा कि सुनो तो, मेरा बेटा वैज्ञानिक है। उसने विज्ञान की पढ़ाई की है। 

पढ़ने में वह काफी तेज है। कुछ ही दिनों बाद वह अपनी मेहनत और लगन से एक बड़ा वैज्ञानिक बन जाएगा। पूरी दुनिया में उसका नाम होगा। मैं भी कितनी भाग्यशाली हूं कि मेरा बेटा वैज्ञानिक है।  इतना कहकर दूसरी महिला चुप हुई, तो तीसरी महिला ने कहा कि मेरा बेटा भी पढ़ा-लिखा है। पड़ोस के गांव में पढ़ाता भी है। चौथी महिला चुप रही, तो महिलाओं ने उससे अपने बेटे के बारे में बताने को कहा। 

चौथी महिला ने संकोच में कहा, मेरा बेटा पढ़ा-लिखा नहीं है। वह खेती करता है। चारों महिलाएं पानी का घड़ा लेकर चल दीं। रास्ते में तीनों महिलाओं के बेटे मिलें। उन्होंने नमस्ते किया और आगे बढ़ गए। तभी चौथी महिला का बेटा आया और उसने अपनी मां से घड़ा लेता हुआ बोला, मां! पानी की जरूरत थी, तो मैं ला देता। आपने इतनी तकलीफ क्यों की? उस लड़के की बात को सुनकर तीनों महिलाएं समझ गई कि अनपढ़ होते हुए भी यह लड़का आज्ञाकारी है। तीनों महिलाओं का सिर लज्जा से झुक गया।

पर्यावरण बचाना है तो कंक्रीट का जंगल उगाने से बचना होगा

अशोक मिश्र

पंचकूला में सर्व समाज द्वारा आयोजित जनसभा में भाजपा के मेयर प्रत्याशी श्याम लाल बंसल के पक्ष में वोट का आह्वान करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हमारा लक्ष्य कंक्रीट के जंगल बनाना नहीं, बल्कि शहर को स्वच्छ बनाना है। सीएम सैनी ने बात तो पते की कही है, लेकिन क्या वास्तव में हरियाणा में ऐसा हो रहा है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि शहरों को हमेशा स्वच्छ रहना चाहिए। स्वच्छ शहर में रहने वाले व्यक्ति भी शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। 

हवा, पानी भी प्रदूषणरहित रहती है। इसके लिए जरूरी है कि शहरों की नालियां, सड़कें और गलियां स्वच्छ रहें। इधर उधर कूड़ा करकट न फेंके जाएं। स्थानीय निकायों और निजी संस्थाएं हर गली मोहल्ले से कचरा एकत्रित करके उसका समुचित निस्तारण करें। लोग नियत स्थान पर ही कूड़ा-करकट फेंकें। प्लास्टिक सहित अन्य कूड़ा करकट को आग न लगाया जाए। यह बात सीएम सैनी की बिल्कुल सही है, लेकिन जहां तक कंक्रीट का जंगल उगाने की बात है। राज्य में हर साल कंक्रीट के जंगल उगाए जा रहे हैं। 

कालोनियों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें कुछ वैध होती हैं, तो कुछ अवैध। सीमेंट की सड़कें बनाई जा रही हैं। खेती योग्य जमीनों पर कांप्लेक्स और कालोनियां बसाई जा रही हैं। राज्य में खेती और वन क्षेत्र का रकबा दिनों दिन कम होता जा रहा है। कालोनियों, घरों और सड़कों का रकबा बढ़ता जा रहा है। उद्योग-धंधे लगाए जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में उद्योग-धंधे नहीं लगने चाहिए। 

बिल्कुल लगने चाहिए, लेकिन वह इस तरह लगाए जाएं ताकि हमारे पर्यावरण को कतई नुकसान न पहुंचे। कारखाने और उद्योग मानकों पर खरे उतरने वाले होने चाहिए। इन उद्योगों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के निस्तारण और नियंत्रण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। उद्योगों से निकला रासायनिक कचरा नदियों और नालों में बहाया जाता है जिसकी वजह से नदियां प्रदूषित हो रही हैं। जिन स्थानों पर कालोनियां, घर, बाजार या उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं, उन स्थानों पर पहले से लगे पेड़-पौधों को काट दिया जाता है। 

राज्य में  इन सभी उद्योगों, कालोनियों और घरों  के निर्माण में सीमेंट का उपयोग किया जाता है। जब गर्मी का मौसम होता है, तो सीमेंट से बनी इमारतें और सड़कें सूरज की गर्मी को अवशोषित कर लेती हैं। रात में वह इस गर्मी को मुक्त करती हैं। इस तरह रिलीज होने वाली गर्मी हमारे ही वायु मंडल में रह जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि वायुमंडल गर्म रहने से हमारी पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है।

प्रकृति विज्ञानियों का कहना है कि आज से तीन-चार दशक पहले शहरों और गांवों में बनने वाले कच्ची मिट्टी और फूस से बनने वाले घर उर्ष्मा का परावर्तित कर देते थे जिससे पृथ्वी का तापमान नहीं बढ़ने पाता था।

अंतत: इंडिया गठबंधन के सारे पीएम मटेरियल ध्वस्त

संजय मग्गू

याद कीजिए, 23 जून 2023 को पटना में जब विपक्षी दलों के नेताओं का जमावड़ा हुआ था, तब नीतीश कुमार की भावभंगिमा क्या थी? यह बैठक नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई थी। दूसरी बैठक 17-18 जुलाई 2023 को कर्नाटक के बेंगलुरु में मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में हुई। तब नीतीश कुमार और उनके चेले-चपाटे उन्हें पीएम मटेरियल कहकर हवाई किले बांध रहे थे। 

बाद में जब विपक्षी दलों ने एकजुट होकर कांग्रेस को इंडिया गठबंधन का नेता चुना, तो उसके कुछ ही दिनों बाद नीतीश कुमार ने अपनी राह अलग कर ली। इसके बाद बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद को पीएम मटेरियल माना। वह कांग्रेस के नेतृत्व में भाजपा से लड़ने को तैयार नहीं थीं। क्षेत्रीय दल भी बेमन से इंडिया गठबंधन में शामिल हुए। आम आदमी पार्टी के केजरीवाल भी कांग्रेस को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्न: वाली स्थिति थी।  

इंडिया गठबंधन में अपने आपको पीएम मटेरियल या कांग्रेस को अपने नेतृत्व लायक न समझने वाले नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन आज कहां हैं? और कांग्रेस? सन 2023 के मुकाबले कांग्रेस आज कहीं ज्यादा मजबूत होकर उभरी है। तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। चौथी में बनने जा रही है। तब नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन में पीएम का चेहरा बनने से कमतर पर राजी नहीं थे, लेकिन भाजपा में क्या गए। मुख्यमंत्री पद तो गया ही, केवल राज्यसभा सांसद बनकर रह गए। केजरीवाल आज भारतीय राजनीति में अप्रांसगिक होते प्रतीत हो रहे हैं।

सात राज्यसभा सांसदों को भाजपा ने हड़प लिया। दिल्ली की सत्ता भी चली गई। पंजाब सरकार कब और कितने दिन चलेगी? अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या हालत होगी? कौन जानता है। उत्तर भारत में अपने बयानों से कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर देने वाले एमके स्टालिन चुनाव हार गए हैं। तमिलनाडु में सन 1971 के बाद पैदा हुई द्रविड़ राजनीति को पलीता लग चुका है। जोसेफ विजय तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं। कोई ताज्बुब नहीं है कि कांग्रेस स्टालिन का दामन छोड़कर विजय थलापति के साथ खड़ी हो जाए। वैसे उसे यह बहुत पहले कर लेना चाहिए था। 

रही बात ममता बनर्जी की। आज उन्होंने प्रेस काफ्रेंस में कहा कि मेरा लक्ष्य बिल्कुल साफ है। अब मैं एक आम व्यक्ति की तरह इंडिया गठबंधन को मजबूत करूंगी। अभी मेरे पास कोई पद नहीं है, इसलिए मैं एक सामान्य नागरिक हूं। ममता को चुनाव हारने के बाद इंडिया गठबंधन याद आ रहा है। अगर दो साल पहले ममता, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन, उमर अब्दुल्ला जैसे लोग अपना अहम त्यागकर खुले मन से इंडिया गठबंधन में शामिल हुए होते, तो शायद इस तरह अधोगति को प्राप्त नहीं हुए होते। 

लेकिन उस समय तो सब पीएम मटेरियल बनने का ख्याब देख रहे थे। भाजपा ने एक-एक करके सबको निपटा दिया। अब पीएम मोदी ने अखिलेश की ओर इशारा किया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में देखते हैं क्या होता है?