Thursday, May 14, 2026

जब तनावमुक्त रहेगा बच्चा तभी पढ़ाई में आगे बढ़ेगा बच्चा


अशोक मिश्र

यह सच है कि स्कूली बच्चों में तनाव बढ़ता जा रहा है। आज बच्चों के लिए सबसे जरूरी है कि वह खेलने-कूदने और पढ़ाई करने के साथ-साथ तनाव मुक्त रहें। केंद्र सरकार ने बच्चों को तनाव मुक्त रखने के लिए नई पहल करने का फैसला किया है। यह गाइडलाइन राज्यों से विचार-विमर्श करने के बाद जून के पहले सप्ताह में जारी हो सकता है। 

इस मामले में बच्चों को तनाव मुक्त रखने के लिए शिक्षा विभाग मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सहायता लेगा। इसके लिए गाइडलाइन तैयार की जा रही है। गाइडलाइन के मुताबिक, अब स्कूलों में बच्चों को केवल पढ़ाया ही नहीं जाएगा, बल्कि उनको तनाव मुक्त रहने के गुर सिखाए जाएंगे। अब स्कूलों में पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रखी जाएगी। शिक्षकों को भी स्वास्थ्य से जुड़ा विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वह स्कूल में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रख सकें। यदि कोई बच्चा तनावग्रस्त पाया जाता है, तो उसकी काउंसिलिंग की जाएगी। उसे मेडिटेशन सिखाया जाएगा। 

उसे खेलने-कूदने सहित अन्य गतिविधियों में लगाया जाएगा ताकि वह तनाव मुक्त हो सके। बच्चों को तनाव मुक्त रखने का सबसे बढ़िया तरीका उन्हें खेलने-कूदने की छूट देना है। खेलने-कूदने से बच्चों को मानसिक रूप से जहां संतोष प्राप्त होता है, तनाव कम होता है, वहीं उनका शारीरिक विकास भी होता है। दो-तीन दशक पहले तक स्कूली बच्चों पर कोई दबाव नहीं होता था। वह जी भरकर खेलते थे और मन भर पढ़ते थे। 

कहने का मतलब यह है कि जब तक उनका मन होता था, वह स्कूलों में पढ़ाई करते थे और जितनी मर्जी होती थी, उतना वह खेलते थे। उन दिनों रैंकिंग का दबाव भी बच्चों पर नहीं होता था। मां-पिता को बस इससे मतलब होता था कि उनका बच्चा पास हो गया है। फर्स्ट या सेकेंड आ गया, तो और अच्छी बात है। बच्चों पर किसी तरह का मानसिक दबाव नहीं रहने से उनका शारीरिक और मानसिक विकास भी अच्छी तरह होता था। जब वह उच्च शिक्षा ग्रहण करते थे, तो वह तनाव मुक्त रहते थे। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। 

नर्सरी और एलकेजी से ही माता-पिता अपने बच्चे पर अव्वल आने का दबाव डालने लगते हैं। यदि बच्चा किसी कारणवश पढ़ाई में पिछड़ जाता है, तो उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। उसकी दूसरे बच्चे से तुलना की जाती है। इससे बच्चा मनोवैज्ञानिक रूप से तनाव में आ जाता है। इतना ही नहीं, बच्चे को सुबह ही उठाकर पढ़ने के लिए बिठा दिया जाता है। 

उसके बाद उसे स्कूल भेज दिया जाता है। स्कूल में भी खेलने का मौका कम ही मिलता है। स्कूल से आने के कुछ ही देर बाद उसे ट्यूशन पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है। ट्यूशन से आने के बाद स्कूल और ट्यूशन का होमवर्क उसके सिर पर सवार हो जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चा तनावग्रस्त हो जाता है।

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