Friday, July 31, 2026

प्रोफेसर के आगे नहीं झुके बिधानचंद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डॉ. बिधान चंद राय का जन्म पटना के बांकीपुर में एक बंगाली कायस्थ परिवार में 1882 में हुआ था। वह एक महान चिकित्सक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह पश्चिम बंगाल के वह दूसरे मुख्यमंत्री थे जो अपने मृत्युपर्यंत बारह साल तक अपने पद पर बने रहे। बिधानचंद राय को आधुनिक बंगाल का निर्माता कहा जाता है। संयोग की बात है कि बिधान चंद का जन्म और मृत्यु एक जुलाई को ही हुई थी। 

भारत सरकार ने उन्हें 1961 में भारत रत्न से सम्मानित किया था। बिधान चंद के माता-पिता ब्रह्मसमाजी थे जिसका प्रभाव उनके जीवन पर काफी गहरा पड़ा था। उनके पिता डिप्टी कमिश्नर थे, लेकिन अपनी दानशीलता के कारण हमेशा आर्थिक दबाव में रहे। स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने बहुत ही कठिन परिश्रम के बाद कलकत्ता मेडिकल कालेज में प्रवेश पाया। 

अपनी प्रतिभा और सादगी के चलते वह जल्दी ही अध्यापकों और छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए। वह सत्यवादी थे। चाहे जो परिस्थितियां हों, वह हमेशा सत्य ही बोलते थे। एक बार की बात है। उनके एक प्रोफेसर की वजह से कार दुर्घटना हो गई। उस समय बिधानचंद राय वहीं मौजूद थे। प्रोफेसर ने बिधानचंद को अपने पक्ष में गवाही देने को कहा। 

बिधानचंद ने सच कहना ही स्वीकार किया। प्रोफेसर ने बहुत धमकाया, परीक्षा में फेल करने की धमकी दी, लेकिन वह अडिग रहे। अदालत में उन्होंने वही कहा, जो देखा था। नतीजा यह हुआ कि प्रोफेसर दंडित किया गया। प्रोफेसर ने दुर्भावना वश उन्हें उस साल परीक्षा में फेल कर दिया। उनका एक साल बरबाद गया, लेकिन वह बाद में परीक्षा पास करके एक योग्य चिकित्सक बने। गरीबों की चिकित्सा वह बिना फीस लिए करते थे।

यदि सुरक्षा नहीं, तो किसी काम का नहीं है एक पेड़ मां के नाम पौधरोपण

अशोक मिश्र

मां और धरती दोनों में बड़ी साम्यता है। एक इंसान को जन्म देती है, दूसरी हवा, पानी और अनाज के जरिये जीवन को आगे बढ़ाती है। इसी नजरिये को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 जून 2024 को पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में देश भर में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान शुरू किया था। इसके माध्यम से जन्म देने वाली मां की स्मृति को बनाए रखते हुए प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना था। ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया गया कि वह अपनी मां के नाम पर हर साल एक पौधरोपण अवश्य करें। रोपा गया पौधा जब पेड़ बन जाएगा, तो उनके मां की स्मृतियां पेड़ के माध्यम से जीवित रहेंगी। 

हरियाणा में भी लोगों ने इस मुहिम को साकार बनाने की ठान ली। हरियाणा को पहले चरण में 1.6 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य मिला था, लेकिन राज्य ने 1.87 करोड़ पौधे लगाकर सबको चकित कर दिया था। पूरे राज्य में बड़, पीपल, गुलमोहर, नीम और फलदार पौधे लगाए गए जिससे यह साफ हुआ कि लोगों ने इसे सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भावनात्मक जिम्मेदारी मान लिया था।  

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 26 जुलाई 2026 को यमुनानगर पुलिस लाइन में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधारोपण किया। इस अवसर पर उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि पौधे सिर्फ पर्यावरण नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं। हर नागरिक से जीवन में कम से कम एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल जरूर करनी चाहिए। सरकार ने इस मुहिम को होल आॅफ गवर्नमेंट और होल आॅफ सोसाइटी मॉडल पर चलाया। इस तरह का संदेश जब मुखिया से गांव तक जाता है तो लोगों में जिम्मेदारी का भाव आता है। सरकार ने इसे केवल अपील नहीं रहने दिया, संस्थागत बनाया है। 

वन विभाग को नोडल बनाकर मनरेगा, जल शक्ति अभियान, स्वच्छ भारत मिशन, अमृत सरोवर और राष्ट्रीय हरित राजमार्ग मिशन से जोड़ा गया है, ताकि गड्ढा खोदने से लेकर पानी देने तक की जिम्मेदारी बँटे। सबसे प्रयोगधर्मी कदम वन मित्र योजना रही, जहाँ पौधा लगाने पर 20 रुपये और उसकी देखभाल सौंपने पर 10 रुपये प्रति पौधा प्रोत्साहन दिया गया। इससे लोगों की आय बढ़ी और पौधों को सुरक्षा भी मिली। कई जिलों से यह भी खबरें आ रही हैं कि काफी संख्या में रोपे गए पौधे सूख चुके हैं या फिर अपने स्थान से गायब हैं। 

सवाल यह भी है कि क्या पौधरोपण का लक्ष्य पूरा हुआ। संख्यात्मक के लिहाज से हरियाणा ने हर चरण में अपना कोटा पूरा किया है। कई बार उससे आगे भी निकला है। नहरों, अमृत सरोवरों और स्कूल परिसरों में लगे पौधों की देखभाल अपेक्षाकृत बेहतर है, जबकि सड़क किनारे और खुले मैदानों में गर्मी और पानी की कमी से क्षति भी हुई है। कुछ मामले तो केवल फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रहे, इसके बाद ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी गई।

Thursday, July 30, 2026

अदालत का आदेश नहीं मानते, तो हंटर से पिटवाता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बंगाल के एक सुल्तान हुए थे गयासुद्दीन आजम शाह। इनकी न्यायप्रियता की कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। गयासुद्दीन इलियास शाही वंश के तीसरे सबसे प्रभावशाली शासक थे। इन्होंने बंगाल पर 1390 से 1410-11 ईस्वी तक शासन किया था। गियासुद्दीन आजम शाह सिकंदर शाह और उनकी एक हिंदू पत्नी के पुत्र थे। इनके सत्रह सौतेले भाई थे। अपने पिता के शासनकाल में उन्होंने मयमनसिंह जिले के राज्यपाल के रूप में कार्य किया और वहाँ गियासपुर नामक एक टकसाल की स्थापना की थी। 

कहते हैं कि गयासुद्दीन रोज तीरंदाजी का अभ्यास किया करते थे। एक दिन दुर्योग से उनका तीर लक्ष्य से भटककर एक विधवा के इकलौते बेटे को जा लगा। बेटे की तीर लगने से मौत हो गई। उस महिला ने अपने बेटे की मौत को लेकर शहर के काजी के यहां न्याय दिलाने के लिए गुहार लगाई। शहर काजी ने समन भेजकर सुल्तान गयासुद्दीन को अपनी अदालत में तलब किया। 

सुल्तान भी साधारण कपड़े में अदालत में आए और एक आरोपी की तरह कठघरे में खड़े हो गए। न्यायालय की कार्रवाई शुरू हुई। तमाम गवाहों और सुबूतों के आधार पर सुल्तान दोषी पाए गए। काजी ने सुल्तान को विधवा के भरणपोषण के लिए उचित मुआवजा देने का आदेश दिया। सुल्तान ने आदेश मान लिया। जब मामला निपट गया, तो सुल्तान ने अपने कपड़ों में छिपी तलवार निकालकर काजी को दिखाते हुए कहा कि अगर आज आप डर जाते और न्याय नहीं करते, तो इसी तलवार से आपका गला काट देता। 

तब काजी ने अपनी गद्दी से हंटर निकालकर दिखाते हुए कहा कि यदि आप अदालत का फैसला नहीं मानते, तो इसी हंटर से पिटवाता। यह सुनकर सुल्तान ने काजी को गले लगा लिया और उसके न्याय की खूब प्रशंसा की।

नई औद्योगिक नीति से रोजगार सृजन की अपार संभावनाएं

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने नई औद्योगिक नीति लांच कर दी है। हरियाणा प्रगतिशील एमएसएमई एवं निर्यात संवर्धन नीति केवल एक सरकारी घोषणा मानना भूल होगी। नई औद्योगिक नीति प्रदेश की अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने वाला कदम साबित होने वाला है। 55 हजार करोड़ के शुरुआती निवेश और पांच लाख करोड़ के बड़े लक्ष्य वाली इस ‘मेक इन हरियाणा 2026’ नीति का सबसे बड़ा संदेश है कि अब निवेश सिर्फ गुरुग्राम-मानेसर तक सीमित नहीं रहेगा। इसका लाभ राज्य के लगभग सभी जिलों को मिलेगा। नई औद्योगिक नीति से विजन 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में भी सफलता मिलेगी। 

नई औद्योगिक नीति का सबसे ज्यादा लाभ रोजगारऔर प्रति व्यक्ति आय के क्षेत्र में दिखाई देगा। सैनी सरकार नई नीचि से खुद 10 लाख नौकरियों के सृजन का लक्ष्य बता रही है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, एआई, डेटा सेंटर, फार्मा और खिलौना निर्माण जैसे नए सेक्टर शामिल हैं। इतने भारी भरकम पूंजी निवेश के बाद जब लोकल युवाओं को स्थानीय फैक्ट्रियों में स्किल्ड नौकरी मिलेगी, तो इसके पूरे प्रदेश में पलायन घटेगा। इन फैक्ट्रियों में उत्पादित माल की खपत बढ़ेगी, जो स्थानीय लोगों की आय में सीधे इजाफा करेगा। रोजगार सृजन से जहां प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी, वहीं दूसरे प्रदेशों और विदेश में इन उत्पादों का निर्यात करने से विदेशी मुद्रा का भंडार भी बढ़ेगा। नई औद्योगिक नीति में रोजगार को लेकर सरकार का लक्ष्य साफ है। 

अगले पांच साल में 10 लाख नए रोजगार पैदा करने की दिशा में नई औद्योगिक नीति एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। इसका सबसे ज्यादा जोर उन सेक्टरों पर है जहाँ कम पूंजी में ज्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। इसमें सबसे आगे मैन्युफैक्चरिंग और आॅटोमोबाइल,इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपोनेंट सेक्टर है। फरीदाबाद-गुरुग्राम-मानेसर बेल्ट में पहले से मौजूद फैक्ट्रियों के विस्तार और नई आईएमटी बनने से असेंबलिंग, वेल्डिंग, मेंटेनेंस जैसे कामों में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होगा। राज्य में दूसरा बड़ा क्षेत्र खिलौना निर्माण, फार्मा और कृषि आधारित उद्योग है। 

इन क्षेत्रों में पूंजी निवेश के बाद रोजगार सृजन की अपार संभावनाएं हैं। ये सभी श्रम आधारित उद्योग हैं और एमएसएमई के जरिए गांव-कस्बों तक नौकरियों पहुंचेंगी और लोगों का जीवन स्तर अच्छा होगा। हरियाणा की नई 'मेक इन हरियाणा 2026' नीति का फोकस अब पारंपरिक उद्योग से हटकर भविष्य के उद्योगों पर ज्यादा है, इसलिए इसका फायदा चुनिंदा नहीं बल्कि एक पूरी चेन को होगा। सरकार ने इसी वजह से रोजगार सब्सिडी और एसजीएसटी रिफंड को नीति से जोड़ा है ताकि कंपनियां हरियाणा के युवाओं को ही प्राथमिकता दें। सरकार ने महिला उद्यमियों, अनुसूचित जाति, दिव्यांग, पूर्व सैनिकों जैसे तमाम लोगों के लिए विशेष प्रोत्साहन प्रावधान किए हैं।


Wednesday, July 29, 2026

अंतत: पर्वत पर चढ़ने में कामयाब हो गया

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जीवन में हर किसी के सामने कोई न कोई समस्या जरूर सामने आती है। अगर व्यक्ति को हल करने के लिए पहला कदम उठाता है, वही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। अपने लक्ष्य की ओर उठा पहला कदम ही उसको आधी सफलता दिला देता है। यदि वह पहला कदम नहीं उठाता तो सफलता कैसे हासिल होती। किसी गांव में एक युवक रहता था। उस गांव के सामने एक पर्वत था। 

वह उस पर्वत पर चढ़कर अपने गांव का नाम रोशन करना चाहता था। लेकिन गांव के लोग उसको हर बार हतोत्साहित कर देते थे। इसके कारण उसमें धीरे-धीरे साहस की कमी होती गई और वह अपने साहस पर ही शंका करने लगा। संयोग से उस रास्ते से एक दिन एक साधु गुजरा। 

वह थोड़ी देर के लिए उस गांव में भी गया। मुलाकात के दौरान उस युवक ने अपने मन की सारी बात साधु को बताई। यह सुनकर साधु ने कुछ दिन गांव में रहने का निश्चय किया। साधु उसे गांव के बाहर ले गया और एक बड़े से पत्थर को उठाने को कहा। युवक ने कहा कि इतना बड़ा पत्थर मैं कैसे उठा सकता हूं। साधु ने कहा कि तुम इसे उठा नहीं सकते, तो क्या हुआ? ढकेल तो सकते हो। 

साधु के कहने पर युवक रोज पत्थर को ढकेलने का प्रयास करता रहा। कुछ दिन बाद साधु ने युवक से कहा कि अब तुम पर्वत की चढ़ाई शुरू करो। युवक ने पर्वत की चढ़ाई शुरू की और अंतत: वह पर्वत पर चढ़ने में कामयाब हो गया। जब युवक वापस आया, तो उसने साधु से कहा कि आपने मुझे पत्थर ढकेलने के लिए क्यों कहा था? साधु ने कहा कि पत्थर ढकेलने से तुम्हारा शरीर मजबूत हुआ। जब शरीर मजबूत हुआ, तो तुम्हारा साहस लौट आया। आज पर्वत पर चढ़ने में सफल हुए हो, तो इसका कारण यह है कि तुमने पत्थर को ढकेलने के लिए पहला कदम उठाया था। यही तुम्हारी सफलता का राज है।

कांवड़ यात्रा को सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने की तैयारी

अशोक मिश्र

सावन का पवित्र महीना कल यानी 30 जुलाई से शुरू हो रहा है। सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं। जो भी भक्त भगवान शिव की सच्चे मन और पूरी आस्था के साथ पूजा करता है, भगवान उसकी मनोकामना अवश्य पूरी करते हैं। यही वजह है कि शिवभक्त सावन में भगवान को प्रसन्न करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं। इसके लिए वे तमाम परेशानियां सहकर भी गंगा जल लाते हैं और अपने देवाधिदेव भगवान शंकर को अर्पित करते हैं। 

हर साल की तरह देश-प्रदेश के करोड़ों शिव भक्त कल से कांवड़ यात्रा पर निकलेंगे। वैसे तो हरियाणा में गंगा का कोई तट नहीं है, लेकिन यह उत्तराखंड, यूपी और दिल्ली को जोड़ने वाला सबसे अहम ट्रांजिट राज्य है। इसलिए हर साल लाखों कांवड़िए हरिद्वार-ऋषिकेश से गंगाजल लेकर यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, रोहतक, हिसार, भिवानी और गुरुग्राम-मानेसर होते हुए अपने-अपने शिव मंदिरों तक जाते हैं। हर साल की तरह राज्य प्रशासन की तरफ से कांवड़ियों के रूट पर गड्ढे भरवाने, सड़क किनारे झाड़ियां साफ कराने, स्ट्रीट लाइट, पीने का पानी, शौचालय, बिजली और सात्विक भोजन के शिविर लगाने के निर्देश दिए गए हैं। 

डीजे की आवाज और कांवड़ की ऊंचाई तय सीमा में रखने को कहा गया है ताकि यातायात बाधित न हो। कुछ दिन पहले मेरठ में पांच राज्यों के आला अधिकारियों की एक संयुक्त बैठक हुई थी जिसमें कांवड़ियों की यात्रा को सुरक्षित संपन्न कराने के लिए पूरा प्लान तैयार किया गया था। हरियाणा के सामने संतुलन साधने की चुनौती है, एक तरफ कांवड़ियों को सम्मान, सुरक्षा और सुविधा देनी है, दूसरी तरफ स्कूल, अस्पताल और रोजमर्रा की आवाजाही बाधित न हो इसका ध्यान रखना है। 

अगर समय से रूट की जानकारी, साफ-सफाई और स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से सेवा शिविर लगें और कांवड़िए भी अनुशासन बनाए रखें तो यह यात्रा वाकई सेवा और सौहार्द का उदाहरण बन सकती है। सैनी सरकार ने जो व्यवस्था की है, उसको देखते हुए यही लगता है कि इस बार भी पूरे राज्य में कांवड़ यात्रा सुरक्षित, सुविधाजनक और बाधारहित होगी। यदि राज्य और राज्य के बाहर से आने वाले कांवड़िए अनुशासन में रहे, निस्संदेह सरकार उनको हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए तत्पर है। सावन का महीना वैसे भी आस्था और विश्वास का है। सात्विकता और शुद्ध आचरण की अपेक्षा इस महीने में हर किसी से की जा सकती है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने पूरे कांवड़ रूट पर मीट और शराब की दुकानें पूरी तरह बंद रखने का आदेश जारी किया है। सुरक्षा के लिहाज से इस बार इंतजाम पहले से कहीं ज्यादा कड़े और तकनीक आधारित हैं। हरियाणा पुलिस ने भी इसे चुनौती के रूप में लेते हुए कांवड़ यात्रा को अबाधित संपन्न कराने की चुनौती स्वीकार की है।

Tuesday, July 28, 2026

प्रजा को आलसी मत बनाइए, महाराज

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अगर किसी को आलसी और कामचोर बनाना है, तो सबसे उत्तम यही होगा कि उसकी मूलभूत जरूरतों को पूरा करना शुरू कर दो। धीरे-धीरे वह आदमी काम-धंधा छोड़कर पूरी तरह उस अनुदान पर निर्भर हो जाएगा, तो उसे दिया जा रहा है। आलसी आदमी यही सोचने लगेगा कि जब घर बैठे जरूरतें पूरी हो रही हैं, तो वह काम धंधा क्यों करे। एक राजा ने अपनी प्रजा के साथ ऐसा ही किया था। 

बहुत पुरानी बात है। एक राजा अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखता था। वह अपने राज गुरु की बात बहुत मानता था। एक बार उसके मन में आया कि गरीब लोगों की मदद की जाए। उसने महल के बाहर सोने के सिक्कों से भरा थाल रखवाकर घोषणा की कि जिसको जरूरत हो, वह एक मुट्ठी सोने के सिक्के ले जा सकता है। नतीजा यह हुआ कि लोग काम-धंधा छोड़कर स्वर्ण मुद्रा लेने निकल पड़े। 

कुछ दिनों बाद यह बात राजगुरु को पता चली, तोवह वेष बदलकर वहां पहुंचे। एक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा ली और चल पड़े। थोड़ी दूर जाने के बाद वह लौटे और स्वर्ण मुद्रा जमीन पर पटक दी। पूछने पर राजगुरु ने कहा कि सोचता हूं, शादी कर लूं। लेकिन इतनी स्वर्ण मुद्रा से क्या होगा? तब राजा ने कहा कि एक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा और ले लो। थोड़ी दूर जाने के बाद वह फिर वापस आए और बोले, शादी करूंगा, तो घर भी चाहिए। 

राजा ने एक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा और लेने को कहा। इस बार भी वही हुआ। लौटने के बाद बोले, शादी के बाद बच्चे भी तो होंगे, उनका क्या करूंगा। राजा नेएक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा और लेने को कहा। तब राजगुरु असली वेष में आए और बोले, इस तरह स्वर्ण मुद्राएं बांटकर आप लोगों को आलसी बना रहे हैं। इन मुद्राओं का उपयोग लोगों को काम दिलाने में कीजिए तो बेहतर रहेगा। यह सुनकर राजा की आंखें खुल गईं।

हरियाणा में लगातार गहराता जा रहा है भूगर्भ जल संकट

अशोक मिश्र

हरियाणा में भूगर्भ जलसंकट लगातार बढ़ता जा रहा है। गुरुग्राम जिले के मानेसर क्षेत्र में कई गांवों का भूगर्भ जलस्तर सात सौ फीट नीचे पहुंच गया है। गांव नाहरपुर कासन, कांकरौला, शिकोहपुर और हयातपुर में अंडरग्राउंड टैंक बनाए गए हैं जिससे सप्लाई के लिए पाइप डालकर लोगों को पानी मुहैया कराया जाएगा। मानेसर इलाके में हालत यह है कि पानी की कमी की वजह से लोग पलायन करने पर मजबूर हैं। यह कोई अचानक घटी घटना नहीं है। भूगर्भ जलस्तर लगातार नीचे जाने की प्रक्रिया दशकों से चल रही थी। 

उसके परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं। यह प्रक्रिया जब अपने चरम पर पहुंची है, तब लोगों को होश आया है कि हम लगातार संकट में घिरते जा रहे हैं। रिपोर्टें बताती हैं कि मानेसर के वार्ड 13 के गांव खोह जैसे इलाकों में तो हालात इससे भी बुरे हैं, जहां भूजल स्तर आठ सौ से एक हजार फुट तक पहुंच चुका है और सभी बोरवेल से पानी आना बंद हो गया है। सच तो यह है कि मानेसर की यह कहानी धीरे-धीरे पूरे राज्य की कहानी में तब्दील होती जा रही है। 

केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 142 में से 85 ब्लॉक ओवर-एक्सप्लॉइटेड यानी अति-दोहित श्रेणी में हैं। गुड़गांव, फरीदाबाद, सोनीपत, करनाल और कुरुक्षेत्र के कई हिस्सों में वॉटर लेवल हर साल 1 से 3 फीट तक नीचे जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह खेती है। धान-गेहूं का चक्र और ट्यूबवेल पर मुफ्त या सस्ती बिजली ने पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। किसानों ने हरित क्रांति के नाम पर गैर जरूरी पानी का दोहन किया। नतीजा यह हुआ कि धरती के नीचे से पानी खींचते रहे, अपना काम चलाते रहे, लेकिन रिचार्ज करने की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। 

इसके लिए केवल खेती ही जिम्मेदार नहीं है। राज्य के हर जिले में लगी छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों ने अपने उपयोग के लिए अंधाधुंध जल दोहन किया। खेती की जमीन पर बसी बड़ी बड़ी कालोनियों और बस्तियों में रहने वाले लोगों ने भी पानी का कम दोहन नहीं किया है। घरों, फैक्ट्रियों और कंस्ट्रक्शन के लिए बोरवेल गहरे होते गए और रिचार्ज के लिए तालाब, जोहड़ और बारिश का पानी जमीन में नहीं जा पा रहा क्योंकि कंक्रीट बढ़ती जा रही है। जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट खुद कहती है कि दक्षिण हरियाणा में भूजल दोहन खतरनाक स्तर पर है और गुरुग्राम व फरीदाबाद जैसी जमीन के रेगिस्तान बनने का खतरा मंडराने लगा है। 

एक अध्ययन बताता है कि 2003 से 2020 के बीच अकेले पंजाब-हरियाणा ने 64.6 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल खो दिया है। यह कोई आंकड़ा नहीं, आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का पानी है जो हमने बिना सोचे खर्च कर दिया। यदि हमने अभी ध्यान नहीं दिया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें जरूर कोसेंगी। हमें अभी से ही पानी की बचत पर पूरा ध्यान देना होगा, ताकि हरियाणा का पानी बचा रहे।

Monday, July 27, 2026

मित्र मोर! दुनिया में कोई भी पूर्ण नहीं है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इस संसार में कोई भी पूर्ण नहीं है। कुछ न कुछ कमियां हर प्राणी में होती है। हर प्राणी में कोई न कोई खूबी भी होती है। हर प्राणी का इस प्रकृति में कोई न कोई उपयोग है। किसी जंगल में एक मोर रहता था। वह  अपने प्राकृतिक स्वभाव की वजह से नाचता बहुत अच्छा था। एक दिन जब रिमझिम-रिमझिम बरसात हो रही थी, तो वह मोर नाचने लगा। बरसात होती रही और मोर मगन होकर नाचता रहा। 

जब मोर नाच रहा था, तो उसके नृत्य को देखने वाला वैसे तो कोई नहीं था, लेकिन झाड़ियों के पीछे छिपा हुआ एक कछुआ जरूर नाच देख रहा था। जब जी भरकर मोर नाच चुका, तो कछुआ झाड़ियों से निकला। वह अपने धीमे कदमों से मोर के पास पहुंचा और कहा, मोर भाई! आप नाचते बहुत अच्छा हैं। मैं संयोग से झाड़ियों के पीछे से आपका नृत्य देख रहा था। कछुए की बात सुनकर मोर उदास हो गया। 

उसकी उदासी देखकर कछुए ने कहा, भाई इतना अच्छा नाचने के बाद भी आप उदास क्यों हैं? क्या परेशानी है? मोर ने कहा कि मेरा शरीर तो बहुत सुंदर है, लेकिन मेरे पैर और आवाज बहुत भद्दी है। मेरी आवाज सुनते ही सारे जीव-जंतु भाग जाते हैं। जबकि कोयल की आवाज कितनी मधुर है। सभी प्रसन्न होकर उसकी आवाज को सुनते हैं। 

तब कछुए ने कहा कि भाई, इसके लिए उदास मत हो। मैं जमीन पर कछुए के मुकाबले में धीमे चलता हूं, लेकिन यदि पानी में दौड़ हो, तो कौन जीतेगा, यह तो तुम जानते हो। हर प्राणी में कोई न कोई कमी होती है। किसी की आवाज अच्छी है, तो शरीर अच्छा नहीं है। कोमल कंठ से गाने वाली कोयल कितनी काली होती है, यह तो आप जानते ही होंगे। कोयल को भी अपने कालेपन पर अफसोस होता होगा। यह सुनकर मोर की उदासी दूर हो गई और वह फिर  नाचने लगा।

युवाओं को रोजगार देने की ओर अग्रसर हरियाणा सरकार

अशोक मिश्र


हरियाणा में लगातार दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नायब सिंह सैनी ने एक मीडिया संस्थान से बात करते हुए दावा किया कि पिछले 21 माह के कार्यकाल में उनकी सरकार ने साठ हजार युवाओं को बिना किसी खर्ची-पर्ची के नौकरियां दी हैं। हाल में ही उन्होंने 1500 शिक्षकों को नौकरी देने की बात कही। सीएम सैनी का कहना है कि युवाओं को रोजगार देना, उनकी सरकार की प्राथमिकताओं में है। वह राज्य के हर युवा को रोजगार देने का प्रयास कर रहे हैं। भविष्य में भी राज्य के बेरोजागर युवाओं को बिना पर्ची-खर्ची के पारदर्शिता के साथ रोजगार के अवसर मिलते रहेंगे। 

हरियाणा में बेरोजगारी एक प्रमुख मुद्दा है। इस मुद्दे को लेकर विधानसभा और सड़क पर सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर हमलावर रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा बेरोजगारी में पड़ोसी राज्यों से बेहतर स्थिति में है। विधानसभा में उन्होंने अक्टूबर-दिसंबर 2024 की पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया था कि हरियाणा की बेरोजगारी दर 4.7 प्रतिशत, जबकि राष्ट्रीय औसत 6.4 प्रतिशत है। सरकार पीएलएफएस की रिपोर्ट को ही सही मानती है। जबकि विपक्ष जब भी प्रदेश में बेरोजगारी की बात करता है, तो वह सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़े को उद्धृत करता है। सीएमआईई के आंकड़ों में हरियाणा की बेरोजगारी दर कई बार देश में सबसे ऊंची, 35.7 प्रतिशत से लेकर 37.4 प्रतिशत तक दिखाई गई है, जबकि सरकार के अपने पीएलएफएस में सितंबर 2025 तक यह 15.4 प्रतिशत बताई गई थी। 

दोनों सर्वेक्षणों की पद्धति अलग है, इसलिए अंतर स्वाभाविक है, राज्य के युवाओं में जिस तरह रोजगार को लेकर बेचैनी है, उससे यह बात साफ हो जाती है कि राज्य सरकार को अभी रोजगार सृजन के मामले में और मेहनत करनी होगी। सरकारी नौकरी हरियाणा में सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल है। जिसे सरकारी नौकरी मिल जाती है, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा काफी बढ़ जाती है। लोग उसको सम्मान की निगाह से देखने लगते हैं। इसलिए सीएम सैनी द्वारा 60,000 भर्तियां बेरोजगार युवाओं के लिए बड़ी राहत जरूर हैं, खासकर ग्रुप सी और डी जैसी भर्तियों में।

 लेकिन हर साल लाखों युवाओं के अपनी पढ़ाई पूरी करके रोजगार बाजार में आने के कारण सरकारी नौकरी से ही बेरोजगारी खत्म नहीं होती। इसके लिए निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे, तभी बेरोजगारी को दूर करने में सफलता मिलेगी। उद्योगों में निवेश, एमएसएमई को बढ़ावा, कौशल को बाजार की जरूरत से जोड़ना और निजी क्षेत्र में पारदर्शी भर्ती जरूरी है। हरियाणा के पास लोकेशन, इंफ्रास्ट्रक्चर और कुशल कार्यबल बहुत ज्यादा है। अगर इसे रोजगार से जोड़ने में राज्य सरकार सफल हो जाती है, तो नारा नौकरी का संकट बदलकर नौकरी का अवसर बन सकता है।

Sunday, July 26, 2026

आधी तज सारी को धावे,आधी मिले न सारी पावे

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इंसान के पास जो कुछ उपलब्ध है, उस पर संतोष करना चाहिए। अगर उसके पास एक रोटी है और निकट भविष्य में दो रोटी मिलने की आशा है, तो दो रोटी के चक्कर में एक रोटी को त्यागना नहीं चाहिए। ऐसी स्थिति में यह भी हो सकता है कि एक रोटी हाथ से निकल जाए और दो रोटी भी नहीं मिले। लेकिन इंसान अक्सर ऐसे लालच में फंस जाता है कि वह अपने पास जो कुछ भी है, उसे भी गंवा बैठता है। 

किसी गांव में एक शिकार रहता था। उसके गांव के पास में ही एक बहुत बड़ा जंगल था। उस जंगल में हिंस्र पशुओं के साथ-साथ अन्य जानवर भी रहते थे। शिकारी दो-तीन दिन में एक बार जरूर शिकार करने जंगल में जाया करता था। लेकिन वह जंगल में बहुत देर तक नहीं ठहरता था। उसे अंदेशा था कि यदि वह जंगल में ज्यादा देर तक रुका तो शेर, चीता या तेंदुआ उसे मारकर खा जाएगा। इसलिए वह जंगल में बहुत अंदर भी नहीं जाता था। 

एक दिन की बात है। वह जंगल में शिकार करने गया। काफी प्रयास के बाद भी उसके हाथ कोई शिकार नहीं लगा। वह काफी परेशान हो गया। अब वह थक भी गया था। तभी उसकी निगाह एक पेड़ पर पड़ी। उस पेड़ की डाल पर एक पक्षी बैठा था। उसने चुपके से जाकर पक्षी को पकड़ लिया। शिकारी पक्षी को लेकर जंगल के बाहर आया, तो उसने देखा कि एक हिरन सोया हुआ है। 

उसके पास एक ही तीर बचा हुआ था। उसने सोचा कि यदि पक्षी को छोड़कर हिरन का शिकार कर लूं, तो दो दिन खाने की व्यवस्था हो जाएगी। उसने पक्षी को उड़ा दिया और हिरन का निशाना लगाया। उधर हिरन को भी शिकार की भनक लग गई थी। वह तीर लगने से पहले उठा और भाग गया। अब शिकारी के पास पछताने के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचा था।

डिजिटल इंडिया की चमक के पीछे पैर पसार रही साइबर ठगी

अशोक मिश्र

हरियाणा में साइबर अपराधियों का जाल फैलता जा रहा है। इनके चंगुल में फंसने वालों में जहां अधेड़ लोग होते हैं, वहीं युवा भी इनके शिकार हो रहे हैं। फरीदाबाद में पिछले ढाई साल में साइबर ठगों ने 42 हजार से अधिक लोगों से 2.12 अरब रुपये ठग लिए हैं। इसके बावजूद ठगी का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। इस मामले में विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकतर लोग शेयर बाजार में भारी मुनाफा, घर बैठे कमाई, क्रेडिट कार्ड लिमिट बढ़ाने और आनलाइन निवेश के झांसे में आकर अपनी जमा पूंजी गंवा रहे हैं। 

कभी नूंह-मेवात का इलाका साइबर ठगी का पर्याय था। आज गुरुग्राम, फरीदाबाद, हिसार से लेकर पंचकूला तक कोई जिला अछूता नहीं है। डिजिटल इंडिया की चमक के पीछे एक काला साया बहुत तेजी से पसर रहा है और हरियाणा इसका सबसे बड़ा गवाह बन रहा है। अब ठगी की दुकान सड़क पर नहीं, मोबाइल की स्क्रीन पर लगती है। एक कॉल, एक लिंक, एक ओटीपी और पल भर में बैंक खाता साफ, साइबर ठगों की यही कार्य प्रणाली है।

 पिछले पांच साल में साइबर ठगों ने राज्य के आम लोगों से करोड़ों रुपये लूटे हैं और यह जाल हर साल और फैलता गया। वैसे तो साइबर ठगी के जरिये लोगों ने कितनी रकम गंवाई है, इसका आधिकारिक आंकड़ा तो सभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन एक मोटे अनुमान के अनुसार पिछले पांच साल में हरियाणा के लोगों से 2,200 से 2,500 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी हो चुकी है। यह सरकारी पोर्टल पर दर्ज आंकड़ा है, असली नुकसान इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि शर्म और झंझट के कारण 70 प्रतिशत लोग रिपोर्ट ही नहीं करते हैं। 

साइबर ठगों को गिरफ्तार करने और पीड़ित व्यक्ति का पैसा वापस दिलाने के मामले में हरियाणा पुलिस ने सराहनीय कार्य किया है। उसने राष्ट्रीय स्तर पर एक मिसाल कायम की है। साइबर ठगी के मामले में केंद्र का औसत रिफंड रेट 3.85 से आठ प्रतिशत है, जबकि हरियाणा का रिफंड रेट 31 से 38 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यानी हर तीन में से एक पीड़ित को उसका पैसा वापस मिला। हरियाणा पुलिस ने 2025 में ठगे गए पैसे का 36 प्रतिशत हिस्सा रियल टाइम में ब्लॉक कर दिया, जबकि दूसरे नंबर के राज्य की दर सिर्फ 27 प्रतिशत थी। शुरुआती छह घंटे में अगर पीड़ित व्यक्ति शिकायत कर देता है, तो हरियाणा पुलिस अब तक 70 प्रतिशत तक पैसा ब्लॉक करने में सफल रही है। 

इसी सख्ती से 2025 में कुल ठगी की रकम 980 करोड़ से घटकर 630 करोड़ रुपये रह गई यानी 350 करोड़ रुपये ठगे जाने से बचा लिए गए थे। हरियाणा पुलिस ने देश के सामने यह साबित कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो साइबर अपराध में भी रिकवरी संभव है। इसके बावजूद हरियाणा पुलिस को अभी और सक्रिय होना पड़ेगा।

Saturday, July 25, 2026

जो अपनी मेहनत का खाते हैं, मुझसे श्रेष्ठ हैं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पाकिस्तान और उत्तर भारत में हातिम ताई एक जाना पहचाना नाम है। हातिम ताई से जुड़ी किस्से-कहानियां बड़े शौक से सुनी-सुनाई जाती है। छठी शताब्दी में अरब में पैदा हुए हातिमताई अपनी दानशीलता के लिए काफी प्रसिद्ध थे। अरब देशों में हातिमताई आज भी नायक की तरह याद किए जाते हैं। अरब की ताई जनजाति पैदा हुए हातिम का पूरा नाम हातिम बिन अब्दुल्लाह बिन साद अल ताई था। कहा जाता है कि उनके पुत्र अदी बिन हातिम ताई थे, जो इस्लामिक पैगंबर मुहम्मद के साथी थे।

 वह एक शासक होने के साथ-साथ कवि भी थे। उनके पास जो भी व्यक्ति मदद मांगने आता था, वह खाली हाथ नहीं जाता था। यदि उनका कोई दुश्मन भी उनसे मदद मांगता था, तो वह उदार मन से उसकी मदद करते थे। एक दिन जब वह अपने मित्रों के साथ बैठे थे, तो उनके एक मित्र ने पूछा कि हातिम, क्या तुम किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हो, जो तुमसे भी श्रेष्ठ हो। 

हातिम ताई ने हंसते हुए कहा, हां! मैं ऐसे आदमी को जानता हूं जो मुझसे भी काफी अच्छा है। मित्र के पूछने पर उन्होंने बताया कि एक बार मैंने अपने महल में बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। उस भोज में बहुत सारे लोग आए। सबने पकवान का स्वाद लिया। शाम होने से पहले मैं घूमने निकला, तो देखा कि एक व्यक्ति लकड़ी काटकर घर ले जा रहा था। मैंने उससे कहा कि आज हातिम ताई ने भोज दिया था, तुम वहां जाकर खाना खा सकते थे। कम से कम आज मेहनत करने से बच जाते। 

उस आदमी ने कहा कि मैं अपनी मेहनत की कमाई खाता हूं। मैं दिन भर में जो कुछ अर्जित करता हूं, उससे अपना और अपने परिवार का पेट भरता हूं। मुझे किसी के यहां भोज पर जाने की जरूरत नहीं है। उस आदमी को देखकर मैंने जाना कि बहुत सारे लोग जो अपनी मेहनत का खाते हैं। वह मुझसे श्रेष्ठ हैं।

सेव अरावली के स्वयंसेवकों ने पाली गांव में कायम की नई मिसाल

अशोक मिश्र

फरीदाबाद के पाली गांव में सेव अरावली संस्था के स्वयंसेवकों ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने आज से पांच साल पहले पाली गांव के आसपास अरावली क्षेत्र में बंजर पड़ी जमीनों पर ढाई हजार पौधों को रोपकर एक नई शुरुआत की थी। आज वह बंजर इलाका हराभरा हो गया है। यह अरावली पर्वतमाला को हराभरा करने की एक नायाब मिसाल है। संस्था के स्वयंसेवकों की अटूट मेहनत और लगन की वजह से दस से बारह फुट ऊंचे ढाई हजार से अधिक देशी पेड़ों का एक विशाल मिनी फारेस्ट तैयार हो गया है। 

इसके लिए सेव अरावली के स्वयंसेवकों की जितनी तारीफ की जाए, वह कम ही है। हरियाणा में अरावली की बंजर होती पहाड़ियों पर अब हरियाली लौटाने का जो संकल्प दिख रहा है, वह केवल पौधरोपण का आंकड़ा नहीं बल्कि मरुस्थलीकरण के खिलाफ एक दीवार खड़ी करने जैसा है। हरियाणा की अरावली पहाड़ियां कभी राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक ढाल थीं, लेकिन खनन, अतिक्रमण और अनदेखी के कारण दक्षिण हरियाणा की बड़ी जमीन बंजर और झाड़-झंखाड़ में बदल गई। अब इसी बंजर जमीन पर हरियाणा सरकार अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर पौधरोपण कर रही है। 

इसका मकसद सिर्फ  पेड़ लगाना नहीं, बल्कि थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकना, धूल भरी आंधियों को थामना और भूजल को बचाना है। केंद्र की अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत हरियाणा ने अपने पाँच जिलों  गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ में फैली 33,706 हेक्टेयर रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया की जीआईएस मैपिंग कराई थी जिसमें से 24,990 हेक्टेयर यानी लगभग 61,750 एकड़ जमीन बंजर पाई गई थी। सेव अरावली जैसी संस्थाएँ भी देशी पौधे लगाकर इस सरकारी प्रयास में जन-भागीदारी जोड़ रही हैं। राज्य के पांचों जिलों में खेजड़ी, बबूल, धोक, बेर जैसी स्थानीय प्रजातियां लगाई जा रही हैं क्योंकि ये कम पानी में भी जीवित रहती हैं और मिट्टी को बांधती हैं। 

अरावली का पुनर्जीवन केवल एकड़ गिनने का विषय नहीं, बल्कि उस पारिस्थितिक दीवार को फिर खड़ा करने का प्रश्न है जो थार को दिल्ली तक आने से सदियों से रोकती आई है। अरावली एनसीआर के लिए प्राकृतिक दीवार का काम करती है। जब यहां हरियाली बढ़ती है तो पश्चिमी राजस्थान से आने वाली धूल और गर्म हवाएं सीधे दिल्ली-गुरुग्राम तक नहीं पहुंचतीं। वायु गुणवत्ता में मामूली सुधार, तापमान में कमी और पक्षियों-वन्यजीवों की वापसी इसके शुरुआती संकेत हैं। भूजल के लिहाज से यह और भी अहम है। सेव अरावली जैसी कुछ और संस्थाएं यदि हरियाणा में सक्रिय हो जाएं, तो अरावली क्षेत्र के साथ-साथ पूरे राज्य को हराभरा बनाना कोई कठिन नहीं होगा।

Friday, July 24, 2026

दान देने वाले की भावना देखो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आजकल सोशल मीडिया पर तमाम ऐसी पोस्ट देखने को मिल जाती हैं जिसमें कोई स्त्री या पुरुष किसी गरीब को कुछ वस्तु या खाने-पीने की वस्तु दे रहा होता है। लोग छोटी से छोटी चीज का दान देते समय वीडियो बनाते हैं या फोटो खींचते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं। ऐसी पोस्ट उनकी मानसिकता को दर्शाता है। दान देते समय मन की भावना पवित्र होनी चाहिए। 

एक समय की बात है। किसी गुरुकुल में आचार्य अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। उसी समय नगर का एक बड़ा व्यापारी अपने सेवकों के साथ आया। आचार्य ने उसका ठीक वैसे ही स्वागत किया, जैसा कि वह अन्य लोगों का किया करते थे। अमीर व्यापारी अपने साथ कई तरह फल, मिष्टान्न और अनाज की कई बोरियां थीं। आचार्य ने अपने शिष्यों से कहकर व्यापारी द्वारा लाए गए उपहार को भंडार गृह में रखवा लिया। कुछ देर रहकर व्यापारी अपने सेवकों के साथ चला गया। संयोग से व्यापारी के जाने के कुछ देर बाद एक बुजुर्ग महिला एक कटोरे में थोड़ा सा भात लेकर आई। वह अत्यंत गरीब थी।

उसे देखते ही आचार्य अपने आसन से उठे और उस बुजुर्ग महिला के पास जाकर उसको प्रणाम किया। बुजुर्ग महिला द्वारा लाए गए भात को वह बड़े प्रेम से खाने लगे। भात खाने के बाद बुजुर्ग महिला का कटोरा धोकर आचार्य ने आदर सहित लौटा दिया। वह महिला चली गई। तब एक शिष्य ने कहा कि गुरु जी! व्यापारी के उपहार की ओर तो आपने देखा नहीं, लेकिन बुजुर्ग महिला का थोड़ा सा भात लेने आप खुद उठकर उसके पास गए, ऐसा क्यों? आचार्य ने कहा कि व्यापारी के दान में अहंकार का भाव था। 

उसने जो कुछ भी दिया है, वह उसके धन का मामूली हिस्सा है। लेकिन महिला का थोड़ा सा भात उसके पूरे दिन की कमाई थी। किसी का दान नहीं, उसकी भावना देखनी चाहिए। बुजुर्ग महिला की भावना पवित्र थी, व्यापारी की भावना में अहंकार था।

हरियाणा में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नी होगी एक लंबी लड़ाई

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कमर कस ली है। एंटी करप्शन ब्यूरो ने प्रदेश के 140 भ्रष्ट अधिकारियों की बाकायदा सूची भी बना ली है। भ्रष्टाचार किसी भी राज्य में हो, उस प्रदेश की शासन और अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर देता है। भ्रष्टाचार हमेशा गरीब जनता के लिए हानिकारक साबित होता है। रिश्वत देकर अमीर और अपराधी प्रवृत्ति के लोग अपना काम करा लेते हैं। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है, जो कमजोर और गरीब होते हैं। यह स्थिति किसी भी कल्याणकारी राज्य के लिए अच्छी नहीं होती है। सैनी सरकार ने भी सरकारी भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश एंटी करप्शन ब्यूरो को दे दिया है। 

ब्यूरो प्रमुख अरशिंदर सिंह चावला की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में राज्य भर के ऐसे 140 अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची तैयार की गई है जिनके खिलाफ बिना रिश्वत लिए काम न करने की बार-बार शिकायतें मिल रही हैं। इन सभी अधिकारियों पर विशेष खुफिया निगरानी रखी जा रही है। पिछले दिनों राज्य में अब तक का एक बहुत बड़ा 661 करोड़ रुपये का वित्तीय घोटाला सामने आया था जिसमें सरकारी विभागों के फंड को निजी बैंकों में अवैध रूप से डायवर्ट किया गया था। 

इस करोड़ों के घोटाले में कथित संलिप्तता और अनियमितताओं के कारण वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पंकज अग्रवाल, राम कुमार सिंह (आरके सिंह) और प्रदीप कुमार (प्रदीप डागर) को निलंबित किया जा चुका है। पंचकूला नगर निगम के पूर्व कमिश्नर आरके सिंह और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व सदस्य सचिव प्रदीप कुमार को गिरफ्तार किया है। इन पर सरकारी पैसों की फर्जी एफडी बनाकर शेल कंपनियों में ट्रांसफर करने का आरोप है। प्रदेश के 140 अधिकारियों की सूची सामने आने से यह उम्मीद जगी है कि अब शिकंजा ऊपर तक जाएगा। इनमें राजस्व, पीडब्ल्यूडी, नगर निगम, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी शामिल हैं। 

वैसे तो एसीबी हर महीने स्टिंग करती है, रिश्वत लेते पटवारी, क्लर्क और इंजीनियर पकड़े जाते हैं। दिक्कत यह है कि पकड़े जाने वाले हमेशा निचले और मध्य स्तर के कर्मचारी होते हैं। हरियाणा युवा और औद्योगिक प्रदेश है। यहां निवेश तभी आएगा जब फाइलें समय पर चलेंगी। जब एक उद्यमी को ठडउ के लिए महीने भर चक्कर काटने पड़ें और अंत में चाय-पानी की मांग हो, तो वह उद्योग दूसरे राज्य में चला जाता है। 

हरियाणा ने खेल, कृषि और स्टार्टअप में नाम कमाया है। पर एक भ्रष्ट अधिकारी पूरे विभाग की छवि खराब कर देता है। हरियाणा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़नी होगी। शुरुआत नीचे से नहीं ऊपर से करनी होगी, तभी व्यवस्था सुधरेगी।

Thursday, July 23, 2026

पिता जी! लकड़ी का कटोरा बना रहा हूं

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहते हैं कि इनसान जो बोता है, उसे जीवन में काटना जरूर पड़ता है। जो अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करता है, तो संभव है कि उसकी संतान भी अपने माता-पिता की देखभाल न करे। ऐसा हर मामले में तो संभव नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में यह बात सच हो सकती है। कहते हैं कि किसी जगह पर एक फकीर रहता था। जीवन भर गांव-गांव शहर-शहर भटकता रहा। 

एक दिन ऐसा भी आया, जब वह बूढ़ा हो गया। अब उसमें चलने-फिरने की ताकत नहीं रही। उसने सोचा कि अब भटकने से बेहतर है कि वह अपने परिवार के पास लौट जाए। उस समय उसके परिवार में बेटा-बहू और छह-सात साल का पौत्र था। घर लौटने पर उसके बेटे-बहू ने बेमन से घर में रख लिया। खाना खाते समय उस फकीर के हाथ कांपते थे। जब वह चम्मच से खाना निकालता, तो कुछ न कुछ मेज या फर्श पर गिर जाता। पानी या दूध पीने के लिए गिलास  उठाता, तो वह भी मेज पर गिर जाता। मेज और फर्श पर खाना वगैरह गिरने से बहू को सफाई करनी पड़ती थी। कई बरतन भी हाथ से छूटकर टूट चुके थे। 

फकीर की बहू ने अपने पति से कहकर बूढ़े फकीर को एक छोटी मेज पर खाने के लिए बैठा दिया। उसके बर्तन भी लकड़ी के थे। खाने का चम्मच भी लकड़ी का बनवा लिया। इससे बूढ़ा फकीर बहुत दुखी हुआ, लेकिन कर भी क्या सकता था। काफी दिन बीत गए। एक दिन बेटे ने अपने पुत्र को लकड़ी का कटोरा बनाते देखा, तो पूछा, बेटे! तुम क्या कर रहे हो। 

उसके बेटे ने जवाब दिया कि पिता जी, कटोरा बना रहा हूं। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, तो आपको भी इसमें खाने को दिया करूंगा। फकीर का बेटा यह सुनकर अवाक रह गया। अपने बेटे की बात सुनकर पति-पत्नी बहुत परेशान हो गए। उस दिन से बूढ़े फकीर को अलग मेज पर बैठकर खाने की जरूरत नहीं पड़ी। जब तक बूढ़ा फकीर जिंदा रहा, बहू-बेटे ने बहुत ख्याल रखा।

विकल्प नहीं, हरियाणा की जरूरत बन चुकी है प्राकृतिक खेती

अशोक मिश्र

प्राचीनकाल में जब हल से जुताई करके खेती करने की पद्धति का विकास नहीं हुआ था, तब लोग प्राकृतिक खेती करते थे। वह खेतों और अन्य खाली जगहों पर बीज का छिड़काव कर दिया करते थे। अनुकूल मौसम में यह बीज अंकुरित होकर बढ़ते रहते थे और समय आने पर लोग उस फसल को काट लेते थे। बाकी अवशेष को वह यो ही छोड़ देते थे, जो अगली फसल के लिए खाद का काम करते थे। 

आज भी प्राकृतिक खेती इसी तरह से की जाती है। प्राकृतिक खेती में यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों जैसे कृत्रिम रसायनों का बिल्कुल उपयोग नहीं होता है। इन रासायनिक खादों की जगह मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए खेत में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और देसी गाय के गोबर-मूत्र का उपयोग किया जाता है। हरियाणा की सैनी सरकार ने 2026-27 तक एक लाख एकड़ भूमि को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए अब तक लगभग दो लाख किसानों ने तीन लाख एकड़ भूमि के लिए पोर्टल पर पंजीकरण कराया है। 

एक जानकारी के अनुसार राज्य में लगभग 24 हजार किसान 44 हजार एकड़ भूमि में अभी प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हर पंचायत ने अपनी कुल भूमि का 10 प्रतिशत या कम से कम एक एकड़ हिस्सा प्राकृतिक खेती के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया है। प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके माध्यम से पैदा हुई फसल हानिकारक रसायनों से पूरी तरह मुक्त होती है जिससे गंभीर किस्म की बीमारियों के होने का खतरा नहीं रहता है। 

प्राकृतिक खेती पूरी तरह से पारिस्थितिकी पर आधारित है। देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल के आटे और मिट्टी के मिश्रण से 'जीवामृत' (तरल उर्वरक) और 'बीजामृत' (बीज उपचार) तैयार किए जाते हैं, जो मिट्टी में सूक्ष्मजीवों को बढ़ाते हैं। प्राकृतिक खेती अन्य पद्धतियों की अपेक्षा सस्ती और सुरक्षित है। यही वजह है कि  राज्य सरकार रसायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते खर्च, घटते भूजल और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट के के कारण पिछले कुछ सालों से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। 

प्राकृतिक खेती में रासायनिक खाद, कीटनाशक और सिंचाई पर खर्च 40 से 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है। प्राकृतिक खेती से कार्बन उत्सर्जन घटता है, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च कम होता है। राज्य सरकार का मानना है कि अगर एक लाख एकड़ का लक्ष्य पूरा हुआ तो खाद और बिजली सब्सिडी में करोड़ों की बचत होगी और निर्यात के लिए जैविक उत्पादों का बाजार भी खुलेगा। राज्य की अर्थव्यवस्था को कम लागत, बेहतर स्वास्थ्य और टिकाऊ पानी की दिशा में ले जाएगी। प्राकृतिक खेती आज विकल्प नहीं, जरूरत बन चुकी है।

Wednesday, July 22, 2026

मैं भविष्य की चिंता नहीं करता, इसलिए खुश हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने कहा है कि जो पल आप जी रहे हैं, वही पल आपका है। जो बीत गया, वह बीत गया। वह दोबारा वापस आने से रहा। जो भविष्य के गर्भ में है, उस पर आपका कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में जो वर्तमान है, उसी को अच्छी तरह से जीना चाहिए। वर्तमान को संवारकर ही अच्छे भविष्य की रूपरेखा तय की जा सकती है। दर्शन में इसे बुद्ध का क्षणवाद कहा जाता है। 

इस संदर्भ में एक रोचक कथा है। किसी राज्य का राजा अत्यंत धनवान था। वह अपने राज्य की प्रजा के लिए भी जरूरत पड़ने पर कल्याणकारी काम करता था। इसके बावजूद वह खुश नहीं था। वह अपनी नाखुशी का कारण भी समझ नहीं पाता था। धीरे-धीरे उसके मन में निराशा बढ़ती जा रही थी। एक दिन उसने अपने राज्य के एक बुद्धिमान व्यक्ति के सामने अपनी समस्या रखी। 

उस बुद्धिमान व्यक्ति ने राजा से कहा कि कल सुबह महल के बाहर जो व्यक्ति खुश दिखाई दे, उसके साथ एक दिन गुजारिये। आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा। अगले दिन राजमहल के बाहर राजा खड़ा हुआ। तभी उसने देखा कि एक लकड़हारा अपने सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादे हुए जा रहा है। सिर पर बोझ होने के बावजूद वह गुनगुना रहा था। 

राजा ने उस लकड़हारे से पूछा कि तुम इतने गरीब हो, रात का खाना मिलेगा या नहीं, इसकी भी गारंटी नहीं है। इसके बावजूद तुम खुश दिख रहे हो। क्या कारण है? उस लकड़हारे ने कहा कि मैं स्वस्थ हूं। अपनी मेहनत की कमाई खाता हूं। मैं यह कतई नहीं सोचता हूं कि कल क्या होगा। मैं आज में ही मस्त रहता हूं। इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं होती है। यह सुनकर राजा समझ गया किउसकी बीमारी का कारण क्या है। उसी दिन से वह भविष्य की चिंता छोड़कर प्रजा के पालन पर अधिक ध्यान देने लगा।

जागरूक नागरिक ही सड़कों और नालियों को रख सकते हैं स्वच्छ

अशोक मिश्र

बरसात के दिन हैं। हरियाणा के प्रत्येक जिले में सड़कों पर कीचड़, जलभराव और नालियों का जाम होना, आम बात है। सीएम नायब सिंह सैनी बरसात आने से पूर्व ही कई बार स्थानीय निकायों को चेतावनी दे चुके थे कि मानसून आने से पहले ही नाले, नालियों और सड़कों की सफाई हो जानी चाहिए। इसके बावजूद हर जिले से बरसात के बाद जलभराव जैसी समस्या से लोगों को जूझना पड़ रहा है। इसके लिए काफी हद तक स्थानीय निकायों के अधिकारी और कर्मचारी जिम्मेदार हैं, तो वहीं नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। 

जब तक नागरिकों में ‘मेरा कचरा, मेरी जिम्मेदारी’ वाली सोच पैदा नहीं होगी, तब तक प्रत्येक जिले में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी कचरे के ढेर और गंदी नालियों से निजात नहीं मिलेगी। सच कहा जाए, तो स्वच्छ हरियाणा का सपना तब सच होगा, जब सरकार के साथ हर नागरिक अपने दरवाजे से सफाई शुरू करेगा। वैसे तो प्रदेश में स्वच्छता के नाम पर हर साल हर जिले में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। राज्य में बड़ी जोर-शोर से स्वच्छ भारत मिशन भी चलाया जाता है।

 नेता, अधिकारी और कुछ सामाजिक संस्थाएं किसी दिन सड़कों पर झाड़ू लगाकर स्वच्छता का संदेश भी देती हैं। अखबारों और टीवी चैनलों पर झाडू बुहारते हुए फोटो और खबर भी प्रकाशित हो जाती है। उसके चंद घंटों बाद वह सड़क फिर से अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है। स्वच्छता के नाम पर नगर निकायों का बजट, सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह, कचरा उठाने के ठेके, डोर-टू-डोर कलेक्शन, सेग्रीगेशन प्लांट और जागरूकता अभियान जैसे सारे उपाय किए जाते हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर कागज पर दिखते हैं, वास्तविकता में नहीं। गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और करनाल को स्मार्ट सिटी कहा जाता है। इसके बावजूद सुबह सड़क पर निकलते ही कूड़े के ढेर, नालों में प्लास्टिक और खाली प्लॉट में कचरे का पहाड़ आमतौर पर दिख ही जाता है। 

अकेले गुरुग्राम में कचरा प्रबंधन और सफाई के लिए 315 से 350 करोड़ रुपये तक वार्षिक खर्च होता है। फरीदाबाद में भी सौ से 125 करोड़ प्रति वर्ष खर्च होने का अनुमान है। राज्य सरकार 'स्वच्छ भारत मिशन' (शहरी और ग्रामीण) के तहत सालाना करोड़ों रुपये आवंटित करती है। इतने भारी बजट के बाद भी सड़कों पर कूड़ा बिखरा हुआ दिखाई दे, तो सचमुच यही समझना चाहिए कि स्थानीय प्रशासन अपने काम में लापरवाही बरत रहा है। सारा दोष सफाई कर्मचारियों का ही नहीं है। 

सच कहा जाए, तो राज्य के नागरिकों की लापरवाह आदत की वजह से भी सड़कों, गलियों और मैदानों में सफाई नहीं रह पाती है। ठेले वाले, दुकानदार और बिल्डिंग मैटेरियल वाले भी कचरा उठाने की फीस बचाने के लिए रात में सड़क किनारे डाल जाते हैं। 

Tuesday, July 21, 2026

नरसंहार देखकर व्यथित हो उठा अशोक

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक को पहले चंड अशोक के नाम से जाना जाता था। अशोक बचपन से ही अत्यंत महत्वाकांक्षी था। वह चक्रवर्ती सम्राट बिंदुसार और रानी धर्मा का पुत्र था। रानी धर्मा क्षत्रिय कुल की नहीं थी, इसलिए उसका बहुत अधिक सम्मान भी नहीं था। 

वैसे तो इतिहास में अशोक के सौ भाई बताए गए हैं, लेकिन तीन भाइयों सुसीम, अशोक और तिष्य के ही नाम मिलते हैं। तिष्य अशोक का छोटा सगा भाई था। कहते हैं कि जब अशोक निर्वासन झेल रहा था, उसी दौरान उसके सौतेले भाइयों ने अशोक की मां की हत्या कर दी। यह समाचार सुनकर अशोक राजमहल लौटा और उसने अपने सभी भाइयों की हत्या कर दी और खुद को सम्राट घोषित कर दिया। 

आठ साल के शासन में उसने अपने राज्य का विस्तार ईरान तक लिया था। उसने अपने शासन को आठ प्रांतों में बांट दिया था। सम्राट बनने के आठवें साल में सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। कहते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद एक लाख पचास हजार लोग बंदी बनाकर कलिंग से निर्वासित कर दिए गए थे। युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे। डेढ़ लाख सैनिक घायल हुए थे। 

कलिंग में जिधर नजर जाती थी, उस ओर या तो शव दिखाई देते थे या फिर कराहते हुए घायल सैनिक। यह दृश्य अशोक ने देखा तो उसका मन द्रवित हो उठा। उसने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त से इसका उपाय पूछा, तो उन्होंने महात्मा बुद्ध का मार्ग अपनाने की सलाह दी। वह बौद्ध के नजदीक आता गया और अंतत: उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके बाद वह मानवता की सेवा में लग गया। इस तरह चंड अशोक से देवप्रिय अशोक में बदल गया। सम्राट अशोक द्वारा खुदवाए गए 33 शिलालेख अब तक प्राप्त हो चुके हैं।

अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक नालों को बहने देने में ही हमारी भलाई


अशोक मिश्र

अरावली की पहाड़ियों ने सदियों से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली को प्राणवायु प्रदान की है। इनकी प्राकृतिक नालियों ने इन चारों राज्यों के भूगर्भ जल स्तर को बनाए रखने में सैकड़ों साल तक अहम भूमिका निभाई है। मानसूनी मौसम में इन नालियों के जरिये बरसाती पानी धरती के नीचे जाकर भूगर्भ जल स्तर को स्थिर रखता रहा है, लेकिन अब यह प्रक्रिया बाधित होने लगी है। लोगों ने इन नालियों पर अतिक्रमण करके स्वाभाविक प्रवाह को बाधित किया है जिसकी वजह से भूगर्भ जल स्तर घटता जा रहा है। 

गुड़गांव से फरीदाबाद तक फैली अरावली की तलहटी में सैकड़ों प्राकृतिक नाले थे जो मानसून का पानी बिना किसी बाधा के यमुना और अन्य निचले क्षेत्रों तक पहुंचा देते थे। पिछले दो दशकों में इन नालों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। कॉलोनियां, इंडस्ट्रियल प्लॉट, सड़कें और रिसॉर्ट बन गए और नालों को पाटकर या मोड़कर कंक्रीट के नीचे दबा दिया गया। नतीजा सामने है। अब जब थोड़ी तेज बारिश होती है तो गुरुग्राम का साइबर सिटी, द्वारका एक्सप्रेसवे और फरीदाबाद के निचले इलाके पानी में डूब जाते हैं। 

पहले बरसात के दिनों में प्राकृतिक नालियों के माध्यम से जमीन पर उतरता था जिसे धरती सोख लेती थी। लेकिन अब अरावली के इर्द-गिर्द कंक्रीट का जंगल उग आने की वजह से अरावली की नालियों से निकला पानी सीधे नालों में चला जाता है और सारा पानी व्यर्थ चला जाता है। यही कारण है कि हरियाणा का भूजल स्तर संकट में आता चला जा रहा है। कई इलाके डार्क जोन में आ चुके हैं। बरसात के दिनों में कई जिलों में लोग पानी के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। यह स्थिति किसी विडंबना से कम नहीं है। 

अरावली वन्यजीवों का कॉरिडोर है। नालों के बंद होने से जानवरों के पानी पीने के स्रोत खत्म हुए हैं और उनका प्राकृतिक रास्ता टूटा है। पानी और भोजन की तलाश में अब वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इस स्थिइत से बचने के लिए जरूरी है कि अरावली क्षेत्र की प्राकृतिक नालियों की पहचान की जाए, उनको संरक्षित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहले ही कह चुके हैं कि अरावली के सभी प्राकृतिक नालों की पहचान कर उन्हें प्रोटेक्टेड घोषित किया जाए। 

सैटेलाइट मैपिंग और ड्रोन सर्वे से 2010 से पहले के नक्शों के आधार पर नालों की पुरानी जमीन चिह्नित की जा सकती है। अगर अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक जल प्रवाह मार्ग को बचाया नहीं गया तो हर मानसून में राज्य के शहर डूबेंगे, भूजल और घटेगा और गर्मी और बढ़ेगी। सरकार, कोर्ट, नागरिक और उद्योग अगर मिलकर नालों को उनका रास्ता वापस दें तो अरावली फिर से हरियाणा की ढाल बन सकती है। नहीं तो हम हर साल बाढ़ और सूखे दोनों का दंश झेलते रहेंगे।

Monday, July 20, 2026

गुरु बोले, तब मैं दो सौ स्वर्ण मुद्राएं लूंगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हर गुरु की यही इच्छा होती है कि जो भी शिष्य उसके पास शिक्षा प्राप्त करने आए, वह बिल्कुल कोरा हो। एक दम खाली स्लेट की तरह। वह कुछ भी न जानता हो, तो गुरु को सिाखाने में काफी सहूलियत होती है क्योंकि जिसको शुरुआत से शिक्षा हासिल करनी है, वह गुरु की बातों को ध्यान से सुनेगा। जिसे थोड़ा बहुत ज्ञान होगा, वह गुरु से सवाल भी करेगा और संतुष्ट न होने पर वह गुरु पर अविश्वास भी करेगा। 

एक बार की बात है। किसी राज्य में एक युवक रहता था। उसे संगीत का थोड़ा बहुत ज्ञान था। वह अपने संगीत ज्ञान को बढ़ाना चाहता था। वह चाहता था कि अपने संगीत के ज्ञान से दुनिया को चमत्कृत कर दे। यह सोचकर वह एक महान संगीतज्ञ के पास गया। उसने संगीतज्ञ गुरु के सामने अपनी इच्छा प्रकट की। संगीतज्ञ ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि मैं तुम्हें संगीत सिखा दो दूंगा, लेकिन उसके लिए धन देना होगा। 

युवक ने गुरु से कहा, ठीक है। मैं आपको संगीत सिखाने का शुल्क जरूर दूंगा। गुरुदेव कितना शुल्क मुझे देना होगा। गुरु ने कहा कि सौ स्वर्ण मुद्राएं। युवक ने कहा कि सौ स्वर्ण मुद्राएं हैं तो बहुत ज्यादा, लेकिन मैं प्रस्तुत कर दूंगा। वैसे भी मैं संगीत के बारे में थोड़ा बहुत जानता हूं। यह सुनते ही गुरु ने कहा कि अब तो मैं दो सौ स्वर्ण मुद्राएं लूंगा। युवक ने कहा कि मैं थोड़ा बहुत जानता हूं, तो आपको कम शुल्क लेना चाहिए था क्योंकि मेहनत कम करनी पड़ेगी। आप शुल्क दोगुना कर रहे हैं। 

गुरु ने कहा कि जो तुमने थोड़ा बहुत सीख रखा है, उसको मिटाने में मुझे काफी मेहनत करनी पड़ेगी। अगर कुछ नया सीखना है, तो पुराने को मिटाना होगा। तभी तुम ठीक से सीख पाओगे। यह सुनकर युवक निरुत्तर हो गया।

जनभागीदारी से हरियाणा में बढ़ाया जा सकता है हरित आवरण क्षेत्र

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने वन संरक्षण, हरित आवरण बढ़ाने और पौधरोपण अभियान में जनभागीदारी बढ़ाने की मुहिम तेज कर दी है। सीएम नायब सिंह सैनी व्यक्तिगत रूप से भी वन क्षेत्र बढ़ाने के प्रयासों की मानिटरिंग कर रहे हैं। वन विभाग की समीक्षा बैठक में भी उन्होंने प्रदेश में हरित आवरण बढ़ाने की दिशा में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं। हरियाणा ने पहली बार सौ करोड़ रुपये के ग्रीन क्लाइमेट रेजिलिएंट फंड के बजट का प्रावधान किया है। राज्य सरकार ने प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए राज्य में 2.10 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। 

यह अभियान ‘एक पेड़ मां के नाम’ के तहत चलाया जा रहा है। इसके बावजूद हरियाणा और पंजाब में हरित आवरण में गिरावट देखी जा रही है। हरियाणा में केवल 7.48 प्रतिशत वन और वृक्ष आवरण है, जबकि पंजाब में यह और भी कम यानी 6.59 प्रतिशत है। भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा का कुल वन क्षेत्र 1,603 वर्ग किमी है जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र 44,212 वर्ग किमी का लगभग 3.63 प्रतिशत है। यही वजह है कि हरियाणा को अक्सर खेतों और फैक्ट्रियों का प्रदेश कहा जाता है, जंगलों का नहीं। 

हरियाणा सरकार हर साल जुलाई में वन महोत्सव मनाती है और ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों के तहत बड़े पैमाने पर पौधारोपण करती है। लेकिन इस मामले में सबसे जरूरी यह है कि वन महोत्सव या दूसरे किसी अवसरों पक केवल पौधा लगाना ही काफी नहीं है। जब तक रोपा गया पौधा जड़ पकड़कर पेड़ का रुप न ले ले, तब तक उसकी देखभाल करना भी जरूरी है। अगर रोपे गए पौधे की देखभाल नहीं की गई, तो पौधे को गाय, भैंस और बकरी जैसे पशु चट कर जाते हैं। 

राज्य सरकार ने कैंपा यानी कि क्षतिपूर्ति वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण योजना के तहत बीस लाख पौधों को रोपने का लक्ष्य निर्धारित किया है। हरियाणा में भूजल घट रहा है, गर्मी बढ़ रही है। ऐसे में खेजड़ी, शीशम, नीम और बड़ जैसे स्थानीय प्रजातियों पर फोकस जरूरी है। साथ ही शहरी क्षेत्रों में पार्क, सड़क किनारे और स्कूल-कॉलेज की खाली जमीन को ‘मियावाकी वन’ में बदला जा सकता है। 

मियावाकी जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित एक पौधरोपण तकनीक है। इसके तहत बहुत छोटे से शहरी भूखंड में भी देशी पौधों को अत्यधिक सघन रूप से लगाया जाता है। यह सामान्य पारंपरिक जंगलों की तुलना में दस गुना तेजी से बढ़ते हैं और 30 गुना अधिक घने होते हैं। वन महोत्सव ने जनजागरूकता और पौधारोपण में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन जब तक लगाए गए पौधों को वन का दर्जा नहीं मिलेगा और समुदाय की भागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक हरियाणा के हरित मानचित्र पर बड़ा बदलाव नहीं आएगा। 

Sunday, July 19, 2026

पत्थर बोला, उफ! मुझे मत मारो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जीवन में कुछ हासिल करने के लिए कष्ट सहना पड़ता है, प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। जो कष्ट से घबरा जाता है, वह कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है। वह तिरस्कार का भागी होता है। वहीं जिसने विपरीत परिस्थितियों से जूझकर सफलता पाई है, वह पूजा के योग्य माना जाता है। एक कथा है। कहते हैं कि किसी राज्य में एक नामी मूर्तिकार रहता था। 

मूर्तिकार की मूर्तियां एकदम जीवंत लगती थीं। जो भी उसकी बनाई हुई मूर्तियों को देखता, सराहना किए बिना नहीं रह सकता था। एक दिन मूर्तिकार कहीं जा रहा था। काफी देर तक चलते रहने की वजह से वह थक गया। थोड़ी देर सुस्ताने के लिए एक पेड़ की छांव में बैठ गया। उसने उस पेड़ के आसपास देखा, तो उसे काफी बड़े-बड़े पत्थर दिखाई दिए। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद उसने एक पत्थर को उठाया। 

उसने जैसे ही पहली हथौड़ी का प्रहार किया, पत्थर ने रोते हुए गुहार लगाई, मुझे मत मारो। दूसरा वार होते ही पत्थर ने कहा कि मुझे आपकी हथौड़ी से पीड़ा पहुंच रही है। मुझे मत मारो। पत्थर की बात सुनकर मूर्तिकार ने उसे छोड़ दिया। उसने दूसरा पत्थर उठाया और वह उसे तराशने लगा। कठिन मेहनत के बाद मूर्तिकार ने उस पत्थर को एक देवी का रूप दे दिया। उस मूर्ति को वहीं छोड़कर वह आगे बढ़ गया। कुछ साल इस घटना को बीत गए। एक दिन वह फिर उस रास्ते से गुजरा। 

उसने देखा कि लोगों ने उस मूर्ति की पूजा-अर्चना शुरू कर दी है। लोग उस पर फूल और नैवेद्य आदि चढ़ा रहे हैं। जो पत्थर रोया था, उस पर  लोग मूर्ति पर चढ़ाने के लिए नारियल फोड़ते हैं। यह देखकर पत्थर पछता रहा था। सच ही कहा गया है कि बिना कष्ट सहे, जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होता है।

हरियाणा में हरित परिवहन का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल

 

अशोक मिश्र

दिल्ली एनसीआर में हर साल प्रदूषण की स्थिति काफी गंभीर हो जाती है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रदूषण के चलते लोगों का दम घुटने लगता है। बच्चे और बूढ़े हलकान हो जाते हैं। हरियाणा ने अब इससे निजात पाने की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। निकट भविष्य में हरित विकास की ओर बढ़ा कदम उसे प्रदूषण की समस्या से निजात दिलाएगा। हरियाणा सरकार 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतों को स्वच्छ और नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने की दिशा में अग्रसर है। 

राज्य सरकार अगले चार वर्ष तक सरकारी बसों में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक बसों की करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके लिए पूरे राज्य में 789 से अधिक इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन और पॉइंट सफलतापूर्वक स्थापित किए जा चुके हैं। गुरुग्राम, फरीदाबाद और पंचकूला में ई-बसें और ई-आटो सड़कों पर उतर चुके हैं। चार्जिंग स्टेशनों का नेटवर्क धीरे-धीरे फैल रहा है। अगर नीतियों का साथ मिला तो हरियाणा अगले पांच साल में देश का ग्रीन मोबिलिटी हब बन सकता है। हरियाणा ने अब तय कर लिया है कि गुरुग्राम-दिल्ली की जहरीली हवा, फरीदाबाद की फैक्ट्रियों से निकलते धुएं से वह निजात पाकर रहेगा। 

राज्य में विकास का रंग अब हरा हो चला है। ऐसे में हरित परिवहन प्रदेश के लिए मजबूरी भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।हरियाणा वैसे भी देश का आटो हब है। मानेसर, गुरुग्राम, फरीदाबाद और कुंडली में पहले से ही दुनिया की बड़ी आटो कंपनियां हैं। अब यही कंपनियां इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन की तरफ मुड़ रही हैं। इन कंपनियों के सहारे राज्य को हरित विकास की रफ्तार को तेज किया जा सकता है। हरित परिवहन केवल प्रदूषण घटाएगा ही नहीं, यह लाखों हाथों को काम भी देगा। ईवी बैटरी, मोटर, कंट्रोलर और हाइड्रोजन फ्यूल सेल के निर्माण में इंजीनियरों से लेकर आईटीआई पास तकनीशियनों तक की जरूरत होगी। 

अनुमान है कि मानेसर-धरुहेड़ा की आटो बेल्ट में ही अगले कुछ सालों में 50 से 70 हजार प्रत्यक्ष नौकरियां बन सकती हैं। इसके साथ चार्जिंग स्टेशन और हाइड्रोजन रीफ्यूलिंग स्टेशन लगाने, चलाने और उनकी देखरेख के लिए 20 हजार लोगों को काम मिलेगा। कुल मिलाकर आने वाले 5 से 7 साल में हरित परिवहन के कारण हरियाणा में 1.2 से 1.5 लाख नए रोजगार सृजित हो सकते हैं और इनमें से बड़ी संख्या उन युवाओं के लिए होगी जिन्होंने 12वीं या आईटीआई की है। 

नीति आयोग के एक अनुमान के अनुसार यदि हरियाणा हरित परिवहन में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश करता है तो 2030 तक राज्य की प्रति व्यक्ति आय में 8 से 12 प्रतिशत तक अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। मजबूत नीतिगत फैसलों और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश के कारण, राज्य में हरित परिवहन का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।