Monday, July 13, 2026

जीवन में रात बहुत लंबी लगे, तो जुगनू को याद कीजिए


संजय मग्गू

आषाढ़ का महीना आधा बीत चुका है। पंद्रह दिन बाद सावन शुरू हो जाएगा। बरसात के दिनों में अंधेरे में चमक उठने वाले जुगनू अब शहरों में तो क्या, गांवों में भी कम दिखने लगे हैं। सदियों तक कवियों और साहित्यकारों के लिए आशा का प्रतीक रहे जुगनुओं को विकास ने निगल लिया है। शहरों और गांवों में बिजली की चमक ने उनके प्रजनन दर को प्रभावित किया है। कीट विशेषज्ञों का कहना है कि मई-जून में जुगनुओं का प्रजनन होता है। अंधेरी रात में अपने प्रकाश से मादा नर को खोजती है, लेकिन शहरों-गांवों में फैलती जा रही तीव्र रोशनी मादा को नर पहचानने में बाधा पैदा कर रही है। 

यही वजह है कि जुगनुओं की संख्या में भारी कमी आ रही है। कभी शहर और गांव में अंधेरी रातों में हरी, पीली और लाल रंग की रोशनी बिखेरते जुगनू अब यदा-कदा दिख जाएं, तो आप अपने को सौभाग्यशाली समझिए। मार्च 2026 में  भारत की पहली फायरफ्लाई यानी जुगनू चेकलिस्ट में जुगनुओं की 92 प्रजातियों का दस्तावेज तैयार किया गया है जिसमें से 61 प्रतिशत प्रजातियां भारत में ही पाई जाती हैं। जिस जगह जुगनू चमक रहे हों, तो माना जाता है कि उस स्थान का वातावरण हेल्दी है। प्रदूषण और प्रजनन दर में आई गिरावट ने जुगनुओं के सामने संकट पैदा कर दिया है। कभी वह भी जमाना था कि जब बच्चे जुगनुओं को मुट्ठी में कैद करके खिलखिलाते थे, मानो उन्होंने उजाले को कैद कर लिया हो। 

अंधेरी रात में यहां-वहां उड़ते-बैठे जुगनू इस बात का एहसास कराते थे कि अभी अंधेरा पूरी तरह हावी नहीं हुआ है। छोटी सी ही सही, उजाले की एक किरण अभी अंधेरे से अपनी पूरी ताकत से जूझ रही है। जुगनू का प्रयास भले ही छोटा हो, लेकिन जिस शिद्दत और जिजीविषा के साथ वह अंधेरे के खिलाफ मोर्चा लेते हैं, वह इंसानों में साहस जगाने के लिए काफी है। जुगनू आकार में बहुत छोटे होते हैं। न उनके पास सूरज जैसी ताकत है, न चांद जैसी चमक। फिर भी घनी काली रात में वे टिमटिमाकर अपना रास्ता खुद भी बनाते हैं और दूसरों को भी अपना रास्ता खुद तय करना सिखाते हैं। उनकी यही सबसे बड़ी उपयोगिता है मानव समाज के लिए। इंसान के सामने आ खड़ी हुई परेशानी के समय सबसे खतरनाक चीज निराशा है। निराशा आदमी को अंदर से तोड़ देती है। जुगनू हमें यही सिखाते हैं कि उजाला बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। 

एक छोटी सी पहल, एक अच्छा शब्द, एक मदद का हाथ भी किसी की रात बदल सकता है। अंधकार स्थायी नहीं होता। परेशानी भी हमेशा नहीं रहती। जरूरत है उस टिमटिमाहट को पहचानने की और उसे बुझने न देने की। क्योंकि एक जुगनू से दूसरे जुगनू तक रोशनी पहुंचती है और फिर वही रोशनी मिलकर सुबह बना देती है। इसलिए जब भी जीवन में रात बहुत लंबी लगे, तो याद रखिए। उम्मीद खत्म नहीं हुई है। कहीं न कहीं कोई जुगनू अभी भी टिमटिमा रहा है। बस उसे देखना है और खुद भी एक जुगनू बनना है।

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