Friday, May 1, 2026

बिना चले श्रावस्ती पहुंच सकते हो?

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने आजीवन लोगों को सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह का ही संदेश दिया। उनका कहना था कि आपके पास जितना है, उतने में ही संतोष करो। सत्य बोलने वाले से बढ़कर कोई साहसी नहीं होता है। सत्य बोलना बड़े साहस का काम है। सत्य बोलने वाला ही अहिंसा का मर्म समझ सकता है। 

महात्मा बुद्ध की बातों का प्रभाव लोगों को बहुत पड़ता था क्योंकि वह आम लोगों की भाषा में आम जनजीवन से ही उदाहरण दिया करते थे। एक बार की बात है। वह किसी जगह प्रवचन दे रहे थे। उनका प्रवचन रोज होता था। करीब महीने भर हो गए थे उस स्थान पर प्रवचन देते हुए। 

एक दिन एक व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध से प्रवचन के बाद कहा कि तथागत! मेरे मन में एक जिज्ञासा है। आपका आदेश हो, तो मैं अपनी जिज्ञासा प्रकट करूं।  उसकी बात सुनकर गौतम बुद्ध ने कहा कि हां क्यों नहीं। तुम अपनी जिज्ञासा प्रकट कर सकते हो। बताओ क्या प्रश्न है। उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने आपका उपदेश लगभग एक महीने तक सुना। मुझ पर उसका कोई विशेष असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। 

उस आदमी की बात सुनकर महात्मा बुद्ध ने कहा कि यह बताओ, तुम कहां रहते हो?  उस व्यक्ति ने बताया कि वह श्रावस्ती में रहता है। तथागत ने पूछा कि यह बताओ, तुम श्रावस्ती कैसे जाते हो? उस व्यक्ति ने कहा कि कभी पैदल, तो कभी घोड़े पर आता जाता हूं। बुद्ध ने कहा कि क्या तुम यहां बैठे-बैठे श्रावस्ती पहुंच सकते हो? उस व्यक्ति ने कहा कि बिना चले कोई कैसे श्रावस्ती पहुंच सकता है। 

तब बुद्ध बोले, मेरी बातों को अमल में लाए बिना तुम जीवन में क्या हासिल कर सकते हो? अच्छी बातों को जब तक जीवन में उतारा न जाए, वह बेकार ही रहता है। उस व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध से कहा, भंते! मैं समझ गया कि आप मुझे क्या समझाना चाहते हैं।

क्रेडिट कार्ड के जाल में फंसकर अपना जीवन गंवा रहे नौनिहाल


अशोक मिश्र

आज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदल चुका है। नकदी की जगह प्लास्टिक मनी ने लिया है। लोगों को अब जेब में नकदी लेकर चलने की जरूरत भी नहीं रह गई है। यदि आपके पास डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड है, तो  आपको नकदी की फिक्र करने की आवश्यकता नहीं है। शहरों और कस्बों में लगे एटीएम या फिर आनलाइन कुछ भी खरीद सकते हैं। 

इस प्लास्टिक मनी ने कई तरह की समस्याएं भी पैदा की हैं। इसने लोगों को फिजूलखर्च भी बना दिया है। पहले लोग नकदी को खर्च करने से पहले दस बार सोचते थे, खर्चे का हिसाब-किताब लगाते थे और उसके बाद काफी सोच समझकर खरीदारी करते थे, लेकिन जब से क्रेडिट कार्ड ने अपने पैर फैलाए हैं, तब से खरीदारी की कोई लिमिट ही नहीं रही। लोग बिना कुछ सोचे समझे  अनलिमिटेड खरीदारी कर रहे हैं, पैसा उड़ा रहे हैं। 

इसी का खामियाजा राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के कुछ छात्रों ने भुगता है। सट्टेबाजी और अनलिमिटेड कर्ज ने एनआईटी के चार छात्रों की जान ले ली है। राज्य महिला आयोग ने खुलासा किया है कि आत्महत्या करके अपनी जान देने वाले छात्रों पर क्रेडिट कार्ड के सत्तर हजार रुपये से ज्यादा के कर्ज थे। इस कर्ज को चुकाने के लिए उन्हें दूसरे लोगों से कर्ज लेना पड़ता था। 

इस पर भी 36 प्रतिशत ब्याज भी देना पड़ता है। राज्य महिला आयोग का यह भी कहना है कि एनआईटी परिसर में जितने भी क्रेडिट कार्ड बनाए गए हैं, उसको बनाते समय अभिभावकों की इजाजत नहीं ली गई है। हाल में ही एनआईटी में आत्महत्या करने वाले चारों छात्रों के अभिभावकों का यही कहना है कि उनके बच्चों की मौत के पीछे क्रेडिट कार्ड ही है। एक अभिभावक ने कहा कि उन्होंने कुछ दिनों पहले क्रेडिट कार्ड का कर्ज चुकाने के लिए तीन किस्तों में 75 हजार रुपये दिए थे। इसके बावजूद उनके बेटे ने आत्महत्या कर ली। यह सच है कि लगभग सभी बैंक क्रेडिट कार्ड जारी करते हैं। 

इस क्रेडिट कार्ड से आप बैंक खाते में पैसा न होते हुए भी मनचाही रकम खर्च कर सकते हैं। एक निश्चि अवधि तक इस खर्च की गई रकम पर कोई ब्याज नहीं देना पड़ता है, लेकिन जैसे ही वह निश्चित अवधि बीतती है, बैंक वाले अपनी मनमाफिक ब्याज वसूलते हैं। कई बार तो ब्जाय की रकम ही मूल रकम से दोगुनी-तीनगुनी हो जाती है। एक बार जो क्रेडिट कार्ड के जाल में फंस जाता है, वह मकड़ी के जाले में फंसे जीव की तरह छटपटा तो सकता है, लेकिन उससे निकल नहीं सकता है। 

क्रेडिट कार्ड उन परिवारों के लिए एक मुसीबत साबित हो रहा है जो किसी तरह अपने खर्चों को सीमित करके अपने बेटा-बेटियों को ऐसे संस्थानों में पढ़ने के लिए भेजते हैं। नए माहौल में आने के बाद बच्चों के कदम बहक जाते हैं और वह सट्टेबाजी के साथ-साथ कई तरह के दुर्व्यसनों में लिप्त हो जाते हैं जिसका खामियाजा पूरा परिवार भोगता है।

सोशल मीडिया पर नीम-हकीम खतरा-ए-जान

30 अप्रैल को प्रभात खबर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

अशोक मिश्र

हमारे देश में अब डॉक्टरों की जरूरत ही नहीं रही। सोशल मीडिया पर एक से बढ़कर डॉक्टर मौजूद हैं। एक वीडियो में बाबा टाइप के एक योगी ने कहा कि दिन में दस-दस मिनट तक पांच छह बार अपने हाथ की पांचों अंगुलियों के नाखूनों को आपस में रगड़ो, डायबिटीज बीस दिन में छूमंतर हो जाएगी। सुबह सूर्योदय से पहले पांच मिनट तक नाखूनों को एक दूसरे से रगड़ने पर ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाता है, भले ही ब्लड प्रेशर कितना पुराना हो। अगर किसी माता-बहन का पीरियड अनियमित हो, ज्यादा पीड़ा होती हो, तो बस दिन में तीन बार नाखूनों को आपस में रगड़ो, न केवल पीरियड नियमित हो जाएगा, अगर बाल सफेद हो रहे हों, तो बाल भी पांचवें हफ्ते से काले होने शुरू हो जाएंगे।

बस, फिर क्या था? देश के लोग जुट गए सुबह-शाम, दोपहर-रात नाखून रगड़ने में। ट्रेन, मेट्रो, आफिस, घर, मैदान, जहां भी देखो, लोग नाखून रगड़ रहे हैं। मानो, नाखून रगड़ना राष्ट्रीय कर्म घोषित कर दिया गया हो। प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी प्रेम करने की जगह बैठे नाखून रगड़ रहे हैं। क्लास में टीचर पढ़ाने की जगह खुद तो नाखून रगड़ ही रहे हैं, बच्चों से भी नाखून रगड़वा रही हैं। पांच-सात साल की बच्चियां नाखून रगड़ रही हैं। भला, इन बच्चियों को अभी पीरियड से क्या लेना देना, लेकिन नहीं, नाखून रगड़ रही हैं, तो रगड़ रही हैं, उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है।

आज आफिस पहुंचा, तो मेरा एक साथी पिलपिलाए हुए पपीते की तरह मुंह लटकाए बैठा हुआ था। मैंने उससे पूछा, क्या हुआ? तुम्हारा मुंह क्यों लटका हुआ है, मानो कोई तुम्हारी भैंस खोल ले गया हो। उसने अपना दायां हाथ दिखाया जिसकी तीन अंगुलियों में पट्टी बंधी हुई थी। मैंने पूछा, यह क्या हुआ? 

उसने कहा, सर जी! एक बाबा के कहने पर मैं चार महीने से अपने दोनों हाथ की अंगुलियों को आपस में रगड़ रहा था। रगड़ते-रगड़ते नाखून इतने घिस गए कि चमड़ी दिखने लगी। डायबिटीज कम करने के चक्कर में नाखून तो गंवा ही बैठा, अब चमड़ी से खून आने लगा है। सारी अंगुलियां सूज गई हैं। डॉक्टर ने सभी अंगुलियों पर दवा लगाकर पट्टी बांध दी है। सर, मैं आज कोई खबर नहीं लिख पाऊंगा। मेरी पत्नी और बेटी की भी लगभग यही दशा है।

मुझे अपने साथी की बात सुनकर बहुत गुस्सा आया। लेकिन क्या करता? गुस्से पर काबू रखते हुए कहा, तुम तो पत्रकार हो, तुम्हें यह बात समझ में नहीं आई कि ऐसा करने से डायबिटीज कैसे ठीक हो जाएगा? साथी ने कहा कि बाबा ने कहा था कि नाखून के घर्षण से जो ऊष्मा पैदा होगी, वह धीरे-धीरे रक्त में प्रवेश करेगी, रक्त के जरिये अग्न्याशय में इंसुलिन बनने लगेगी। मैंने चीखते हुए कहा, तुम अहमक हो। अबे, नाखून रगड़ने से डायबिटीज, बीपी, किडनी, लिवर के रोग ठीक हो जाते, तो सारी दुनिया के डॉक्टर कटोरा लेकर भीख मांगते या नाखून रगड़ने की ट्रेनिंग सेंटर खोल लेते। तुम्हारे जैसे न जाने कितने बेवकूफ बाबाओं और स्वामियों के कहने पर लौकी का जूस पीकर अपनी किडनी और लीवर से हाथ धो बैठे हैं। सुबह, शाम, दोपहर जग भरकर करेले का जूस पीकर दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। इतना कहकर मैं बड़बड़ाता हुआ अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।


अमेरिका के शिकागो में जब उगा लाल सूरज


मई दिवस पर विशेष

अशोक मिश्र

पूंजीवाद के उदय-विकास का आधार मजदुर वर्ग का निर्मम और निरंकुश रक्त शोषण ही रहा है, तभी तो इसके आरंभिक चरण में सूर्योदय से सूर्यास्त तक मजदूरों से काम लिया जाता था। तब चूंकि मशीनों का विकास भी अपने आरंभिक चरण काल में था। अतएव पूंजीपति वर्ग के लिए मजदूरों के आवश्यक श्रम काल को कम करने और अतिरिक्त श्रम काल को लंबा करने के लिए कार्य दिवस को ही लंबा खींचना सबके कारगर तरीका था। यही वजह है कि पूंजीपति वर्ग मजदूरों को मशीनों का ही एक पुर्जा मानकर उनसे 17-18 घंटे तक काम लेता था। इससे कम घंटे काम करने पर मजदूरों को कई तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी जाती थीं। कई देशों में तो मजदूरों की हालत और भी खराब थी। उन्हें इंसान समझा ही नहीं जाता था। उनसे 20 घंटे काम लिया जाता था। 

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण काल में अमेरिका के मजदूर इसके खिलाफ आवाज उठाने लगे। असंतुष्ट मजदूरों ने अपना संगठन भी बनाना शुरू किया, ताकि पूंजीपतियों के खिलाफ संघर्ष तेज किया जा सके। 1820 से 1840 के बीच काम के घंटे कम कराने की मांग को लेकर लगातार हड़तालें हुईं। ये हड़तालें अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाईं, क्योंकि एक तो उनका संगठन मजबूत नहीं था और दूसरे उनमें वर्गीय चेतना का अभाव था। इस कमी को पूरा करने के लिए 1827 में सर्वप्रथम अमेरिका के औद्योगिक केंद्र फिलाडेल्फिया में मेकैनिकों की यूनियन का गठन गृह निर्माण उद्योग के मजदूरों की हड़ताल से हुई थी।

बाद में 1837 में पूरी दुनिया में पैदा हुए आर्थिक संकट की वजह से अमेरिकी सरकार दस घंटे का श्रम दिवस लागू करने पर विवश अवश्य हुई, परंतु कुछ ही स्थानों पर यह लागू हो सका। तो मजदूर आंदोलन पुन: तेज होने लगे। तब मजदूर संगठनों की आपसी सहमति से यह तय किया गया कि मजदूरों को काम के घंटे दस की बजाय आठ करने की मांग करनी चाहिए। यह मांग 1857 में काफी जोर पकड़ने लगी। पूरी दुनिया में इस मांग को मजदूरों का समर्थन मिलने लगा। अमेरिका से बाहर भी इस मांग को लेकर हड़तालें होने लगीं। यहां तक कि उस समय के सबसे पिछड़े देश आस्ट्रेलिया में मजदूरों ने 'आठ घंटा काम, आठ घंटा आराम और आठ घंटा मनोरंजन' का नारा बुलंद किया। इसी क्रम में अमेरिका में गृहयुद्ध के बाद 1866 में 20 अगस्त को 60 मजदूर ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों ने वाल्टिक मोर में एकत्र होकर नेशनल लेबर यूनियन गठित किया। इसके क्रांतिकारी नेता विलियम एच. सिलविश प्रथम अंतरराष्ट्रीय (जिसका नेतृत्व स्वयं कार्ल मार्क्स और एंगेल्स कर रहे थे) के साथ संबंध कायम कर अंतरराष्ट्रीय वर्गीय एकता कायम करने के प्रयासों में लग गए। सन 1869 में ही नेशनल लेबर यूनियन ने अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलन के साथ सहयोग करने का प्रस्ताव किया।

मालूम हो कि सितबंर 1866 में प्रथम अंतरराष्ट्रीय की जेनेवा कांग्रेस ने अपने एक पारित प्रस्ताव में कहा था कि काम का समय कानून के जरिये सीमाबद्ध करना एक प्राथमिक व्यवस्था है। इस तरह देखते-देखते आठ घंटे का आंदोलन एटलांटिक महासागर से प्रशांत महासागर तक और न्यू इंग्लैंड से कैलिफोर्निया तक फैल गया। तभी तो द्वितीय अंतरराष्ट्रीय की प्रथम कांग्रेस पेरिस में पहली मई 1886 को विशेष दिवस के तौर पर मनाने का फैसला लिया गया। इससे पूर्व अमेरिकन फेडरेशन आफ लेबर ने सन 1884 के सात अक्टूबर को एक प्रस्ताव पास कर 1886 की पहली मई से दैनिक आठ घंटे काम का दिन वैध मानने का प्रस्ताव पास किया था। 

इतिहास बताता है कि पहली मई 1886 को अमेरिका के शिकागो शहर में दुनिया भर से मजदूर आकर जमा हुए थे। अमेरिकी सरकार ने मजदूरों को सबक सिखाने के लिए उन पर गोलियां चलवाईं। कहते हैं कि इस गोलीबारी में लगभग एक लाख मजदूर शहीद हुए थे। शांति का प्रतीक मजदूरों का सफेद झंडा उनके ही खून से लाल हो गया। तभी से मजदूरों और मजदूर संगठनों ने अपने झंडे का रंग भी लाल कर दिया। शिकागों में शहीद हुए मजदूरों की शहादत रंग लाई और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों के चलते सारे संसार में क्रमश: आठ घंटे का श्रम समय लागू किया गया।