Saturday, May 2, 2026

भिक्षा मांगने के अलावा कोई काम नहीं है क्या?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी रामदास का बचपन का नाम नारायण सूर्याजी पंत ठोसर था। संन्यास ग्रहण करने के बाद उनका नाम स्वामी रामदास रखा गया। उन्हें समर्थ गुरु रामदास के नाम से भी जाना जाता है। वह मराठा वीर छत्रपति शिवाजी के गुरु भी थे। स्वामी रामदास एक कवि, संत और दार्शनिक भी थे। स्वामी रामदास ने दासबोध, आत्माराम, मनोबोध आदि ग्रंथों की रचना की है। 

स्वामी जी का जन्म 1606 में महाराष्ट्र के जालना जिले के जांब गांव में कुलकर्णी ब्राह्मण के यहां हुआ था। इन्होंने बारह साल की उम्र में ही तपस्या शुरू कर दी थी। इनका एक नियम था कि वह प्रतिदिन पांच घर से ही भिक्षा मांगते थे। हर घर से कुछ न कुछ भिक्षा जरूर ग्रहण करते थे। एक दिन की बात है। वह एक घर में भिक्षा मंगाने गए। उस घर में थोड़ी देर पहले पति-पत्नी में लड़ाई हुई थी। 

पत्नी काफी गुस्से में थी। तभी स्वामी रामदास ने भिक्षा के लिए गुहार लगाई। वह महिला गुस्से से बाहर आई और कहा कि तुम लोगों को भिक्षा मांगने के अलावा कोई काम नहीं है क्या? जाओ, मेरे घर से कोई भिक्षा नहीं मिलेगी। स्वामी जी ने शांत भाव से कहा कि मैं भिक्षा जरूर लेकर जाऊंगा। उस समय महिला कमरे में पोछा लगा रहा थी। वह पोछा लगाने वाला कपड़ा लेकर आई और उनके भिक्षा पात्र में डाल दिया। 

स्वामी जी प्रसन्न मन से उस कपड़े को लेकर नदी के किनारे गए। उसे अच्छी तरह से साफ किया, सुखाया  और उसे लेकर मंदिर में आ गए। उस कपड़े की बाती बनाकर मंदिर में दिया जला दिया। उधर वह महिला स्वामी जी के जाने के बाद बहुत पछताई। 

वह  उन्हें खोजते हुए मंदिर पहुंची और चरणों में गिरकर कहा कि मैंने आप जैसे महापुरुष को भला बुरा कहा, मुझे माफ कर दें। स्वामी जी ने कहा किआज मुझे आपने बहुत अच्छी भिक्षा दी। अनाज देतीं तो मेरे ही काम आता। इससे काफी लोगों का भला हुआ।

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