Saturday, February 28, 2026

लोहिया ने अंग्रेजी हुकूमत की खोल दी पोल


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

डॉ. राम मनोहर लोहिया को समाजवादी विचारक माना जाता है। उनका जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर जिले में मारवाड़ी बनिया परिवार में हुआ था। जब वह दो साल के थे, तो उनकी माता का निधन हो गया। स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले उनके पिता हीरा लाल लोहिया ने दूसरा विवाह करने की जगह अपने बेटे के पालन पोषण का जिम्मा लिया। 

लोहिया ने बीएचयू से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की और 1929 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले विद्यासागर कालेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह इंग्लैंड चले गए, लेकिन वहां का वातावरण रास नहीं आया। तो वह जर्मनी के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में पीएडी करने चले गए। इस दौरान लोहिया का अपने पिता से पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। 

उनके पिता भारत में अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अत्याचार के बारे में अपने पत्रों में जिक्र किया करते थे। इससे लोहिया के मन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रोष पैदा होता चला गया। उसी दौरान एक घटना घटी। उन्हीं दिनों जिनेवा में लीग आफ नेशन्स का अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में कई देशों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भारत से बीकानेर के महाराज भी अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे। 

अधिवेशन में अंग्रेजी शासन की जमकर प्रशंसा की गई, इस बात को लोहिया बरदाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों की फांसी का उल्लेख किया। इससे दुनिया भर में अंग्रेजी हुकूमत की सच्चाई सबके सामने आई। भारत आने के बाद लोहिया ने स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी और समाजवादी विचारधारा को प्रसारित किया।

खनन मामले में सुप्रीमकोर्ट लेगा पहले विषय विशेषज्ञों की राय


अशोक मिश्र

अरावली पर्वत माला के संबंध में सुप्रीमकोर्ट ने बिलकुल उचित ही कहा है कि जब तक विशेषज्ञों की रिपोर्ट नहीं आ जाती है, तब तक अरावली क्षेत्र में सारी गतिविधियों को यथावत रखा जाए। गुरुवार को अरावली मामले की सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि कोर्ट इस बारे में विशेषज्ञों की राय लेगा कि अरावली क्षेत्र में खनन की इजाजत दी जा सकती है या नहीं। 

यदि खनन की इजाजत दी जा सकती है तो किस स्तर तक खनन की इजाजत दी जा सकती है। अरावली क्षेत्र में होने वाले खनन की देखरेख का जिम्मा किसका रहेगा,यह भी तय करना बहुत जरूरी है। बहरहाल, सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले में यथा स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने फैसले की भी समीक्षा करेगा। गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट ने जो कहा है, उससे लगता है कि अरावली क्षेत्र में खनन के मामले को लेकर कोर्ट पूरी तरह गंभीर है और जब तक वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाएगा, देखरेख की जिम्मेदारी तय नहीं हो जाएगी, तब तक वह किसी प्रकार की इजाजत नहीं देगा। 

सुप्रीमकोर्ट के रवैये से पर्यावरण प्रेमी और अरावली को बचाने की मुहिम में लगे लोगों को बहुत बड़ी राहत मिली है।  पिछले साल के नवंबर महीने में सुप्रीमकोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति द्वारा सुझाई गई परिभाषा को स्वीकार कर लिया था। नई परिभाषा के अनुसार, वही पहाड़ियां अरावली क्षेत्र के अंतर्गत मानी जाएंगी जिसकी स्थानीय ऊंचाई सौ मीटर या उससे अधिक हो। साथ ही दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों के पांच सौ मीटर के दायरे में होने पर ही उन्हें अरावली क्षेत्र में माना जाएगा। 

बाद में इस नई परिभाषा को लेकर विवाद पैदा हो गया। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में इसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। कुछ लोगों ने एक बार फिर अरावली क्षेत्र को बचाने के लिए सुप्रीमकोर्ट की ही शरण ली। इसका फायदा भी हुआ। अदालत ने अपने ही फैसले पर रोक लगाते हुए सुनवाई शुरू की है। इस बार की सुनवाई में हर पहलू पर खुद शीर्ष अदालत ध्यान दे रही है। वैसे यह बात सही है कि पिछले कुछ दशकों से अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान की वजह से यहां का जलवायु संतुलन गड़बड़ा गया है। 

इसका कारण अरावली क्षेत्र में दिनोंदिन बढ़ता अतिक्रमण, वनों की अवैध कटाई, अवैध खनन और शहरी संरचना का बढ़ता क्षेत्रफल माना जा रहा है। पिछले दिनों अरावली के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन पर सांकला फाउंडेशन में शोध किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैध खनन, वनों की कटाई और अरावली के इर्द-गिर्द किए गए पक्के निर्माणों ने भूजल रिचार्ज, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला है जिसकी वजह से अरावली पर्वत माला के पारिस्थितिक तंत्र बुरा असर डाला है। 

दरवाजे पर दस्तक दे रही है होली, उठिए ! जी खोलकर स्वागत कीजिए


अशोक मिश्र

लीजिए, वर्ष, महीना, सप्ताह और दिन की पगडंडियां तय करती हुई किसी नवयौवना की तरह होली आपके दरवाजे पर दस्तक दे रही है. उठिए और उसका खुले दिल से स्वागत कीजिए। फागुनी बयार ने आपके तन-मन को पहले से ही मदमस्त कर रखा है, ऐसे में फिर काहे का लिहाज और काहे का संकोच. उठिए, उन्हें प्रेम के रंग से सराबोर कर दीजिए, जिनसे साल भर आपने खुले मन से बात नहीं की है. कई महीने पहले किसी से हुई लड़ाई या 'तू.. तू.. मैं.. मैं' की गांठ अब भी आपके मन में अगर पड़ी हुई है. तो जनाब, उस गांठ को खोलिए और रंग, अबीर और गुलाल लेकर जुट जाइए। होलिकोत्सव मनाने को. फिर देखिए इस बार की होली में आपको कितना मजा आता है. हर साल फागुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला हर्षोल्लास का त्योहार होली इस बात का संदेश देता है कि परेशानियों और संकटों से घबराकर बैठ जाने का नाम नहीं है जिंदगी। जिंदगी तो होली के रंगों की तरह चारों ओर बिखरकर खुद हंसने-मुस्कुराने और लोगों को हंसने-मुस्कुराने पर मजबूर कर देने का नाम है,

जानते हैं, होलिकोत्सव का दूसरा नाम मदनोत्सव है. वैसे तो फाल्गुन का पूरा महीना ही कामदेव यानी मदन को समर्पित है. तन को कंपा देने वाली ठंड कम होते ही मन और तन में एक नए उत्साह का संचरण होने लगता है. फागुन महीने में वातावरण भी सुहावना होता है. न अधिक गर्मी और न ही अधिक सर्दी। बस, इसी लिए आम के साथ-साथ आदमी का मन भी बौराने लगता है। कहते हैं कि फागुन के महीने में साठ साल के पोपले मुंह वाले बाबा भी देवर लगने लगते हैं। हंसी ठिठोली, मनोविनोद का एक मदमस्त कर देने वाला दौर चलने लगता है। घूंघट की आड़ से नवयौवनाएं नयनों के तीर इतनी कसकर मारती हैं कि उसके इर्द-गिर्द मंडराने वाले रूप लोलुपों यानी भंवरों के जिगर के आरपार हो जाते हैं नयनों के ये तीर। सामाजिक वर्जनाएं कमजोर होने लगती हैं। मर्यादाओं का स्थान अश्लील गीत संगीत ले लेते हैं। लेकिन यह सब कुछ सिर्फ एक दिन के लिए होता है। कहीं-कहीं पर तो यह सिलसिला पूरे सात आठ दिन तक चलता है। इन दिनों ऐसा लगता है कि आदमी अपनी साल भर में संचित की गई विषय वासनाओं को अंतरमन से उलीच कर फिर साल भर के लिए पाक साफ हो जाना चाहता है। वैसे तो किसी न किसी रूप में होली पूरे देश में मनाई जाती है। 

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड, दिल्ली, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश आदि जगहों पर होली की छटा देखते ही बनती है. लेकिन उत्तर भारत में भी ब्रज (बरसाने की होली) और अवध की होली विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, विभिन्न क्षेत्रों में मनाई जाने वाली होलियों पर उस क्षेत्र में आराध्य देवों के गुणों का भी प्रभाव दिखाई देता है. अब ब्रज यानी बरसाने की होली को ही लें। यहां मनाई जाने वाली होली का रंग ही कुछ निराला है। ब्रज क्षेत्र में मथुरा, वृंदावन, नंदगांव और बरसाना (राधा के गांव) में बड़ी धूमधाम से होली मनाई जाती है. ब्रज क्षेत्र के आराध्य देव हैं कृष्ण. (वैसे तो पूरे देश में श्रीकृष्ण की आराधना-पूजा की जाती है।) ब्रजवासियों के नायक श्रीकृष्ण माखनचोर हैं, गोपियों के साथ रास रचाते हैं, लीलाएं करते हैं। मौका पड़ने पर अपनी मां से झूठ भी बोलते हैं। ऐसे में होली पर उनके इन गुणों का प्रभाव न पड़े, ऐसा हो ही नहीं सकता है। यही वजह है कि यहां के गीतों, लोकगीतों और फागों में मस्ती का पुट तो होता ही है, अश्लीलता भी खूब घुली-मिली होती है। ब्रज साहित्य में होली से जुड़े जितनी रचनाएं मिलती हैं, उनका एक अलग ही रंग है, ब्रज क्षेत्र में फागुन पूर्णिमा से पहले और उसके बाद आठ दिन तक महिलाओं, युवतियों, बच्चों, बूढ़ों और युवकों की भीड़ जो धमाल मचाती है, वह देखते ही बनता है। यहां की होलिकोत्सव में रंगों का इस्तेमाल तो होता ही है, अश्लील गीतों की भी भरमार होती है। 'नैन नचाय कहयो मुस्काय लला फिर अड़यो खेलन होरी...' जैसे गीत अब कहां सुनने को मिलते हैं। बड़े-बड़े डेक या लाउडस्पीकर लगाकर ऐसे-ऐसे गीत बजाए जाते हैं कि शर्म से आंखें गड़ जाती हैं. इन गीतों के बजने तक बेटी बाप से, भाई-बहन से आंख चुराने लगते हैं।

बरसाने की लठमार होली का कहना ही क्या है। पुरुष साल भर तक अपनी प्रियतमा की एक लाठी खाने का इंतजार करते हैं। होलिकोत्सव के दिन उनकी प्रियतमा भी बिना किसी लाज-शर्म के उन पर लाठियां बरसाती रहती है। पुरुष उसकी इस अदा पर सौ-सी जान से कुरबान होता जाता है और लाठियां खाता जाता है। रंगों, फूलों और अबीर-गुलाल से रची-बसी बरसाने की होली देखने तो दूरदराज से लोग आते हैं। विदेशी भी इसे देखने आते हैं, तो वे भी यहां के वातावरण की मस्ती में अपनी सुध-बुध खोकर होली खेलने लगते हैं।

वहीं अवध क्षेत्र के आराध्य देव श्रीराम हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। यही वजह है कि होलिकोत्सव कुछ दशक पहले तक मर्यादित था. लोकगीतों और फागों में एक मधुरता थी, शालीनता थी। अयोध्या के राजा दशरथ, उनकी तीनों रानियों, श्रीराम और उनके सभी भाइयों से संबंधित लोकगीत और फाग गाए जाते थे। इन गीतों और लोकगीतों की रचनाएं कब हुई, नहीं कहा जा सकता है। हां, गोस्वामी तुलसी की होली से संबंधित रचनाएं भी खूब गाई जाती थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे उसमें भी अश्लीलता और भौंडेपन का समावेश होने लगा है। आधुनिक परिवेश में होली का वह लालित्य कहीं खो सा गया है, जो आज से चार-पांच दशक पहले पूरे देश में देखने को मिलता था।

होली का उल्लास भी अब कुछ धीमा पड़ने लगा है। महंगाई ने होली के उल्लास को निगल सा लिया है। इन दिनों होली के नाम पर इतने आडंबर रखे जाने लगे हैं कि लोग उन आडंबरों के लिए अपने दैनिक खर्चों में कटौती करके भी उसे पूरा नहीं कर पाते हैं। शराब, मिठाइयों और अन्य दूसरे मद में खूब पैसा खर्च किया जाने लगा है। नशा करके होली मनाने की लत ने होलिकोत्सव की मस्ती को जैसे खत्म ही कर दिया है। नशे में झूमती युवकों की भीड़ से बचकर निकल जाने में ही अब लोग भलाई समझने लगे हैं। यदि हम नशे का सेवन किए बिना होलिकोत्सव मनाते हैं, उससे कहीं ज्यादा खुशी मिलती है। इन तमाम परेशानियों और दिक्कतों के बावजूद आइए, हम खुले मन से होली मनाएं। प्रेम के रंग में खुद तो सराबोर हों ही, दूसरों को भी उसी रंग से सराबोर कर दें।

Friday, February 27, 2026

सज्जन की उपाधि खरीदी या बेची नहीं जा सकती

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दुनिया के इतिहास में एक ऐसा भी राजा हुआ है जिसने उपाधियां पैसे लेकर बांटी थी। ऐसे राजा का नाम है जेम्स चार्ल्स स्टुअर्ट। इनका जन्म  सन 1566 में हुआ था। स्टुअर्ट एक लेखक भी थे। उन्होंने डेमोनोलॉजी (1597) और बेसिलिकॉन डोरॉन (1599) जैसी रचनाएँ लिखीं। उनके द्वारा प्रायोजित बाइबिल का अंग्रेजी अनुवाद 'किंग जेम्स संस्करण' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 

एलिजाबेथ प्रथम के निधन के बाद उन्हें राजगद्दी मिली थी, लेकिन बाद में वह स्कॉटलैंड, ब्रिटेन और आयरलैंड के शासक बने। तभी से उन्होंने अपने को ग्रेट ब्रिटेन का राजा कहना शुरू किया। यह तो सभी जानते हैं कि शासन व्यवस्था चलाने के लिए काफी धन की जरूरत होती है। 

राजकोष का धन बढ़ाने के लिए उन्होंने कई उपाय किए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसलिए उन्होंने लोगों से मोटी रकम लेकर उपाधियां बांटनी शुरू की। उन्होंने बहुत सारे लोगों को लॉर्ड, ड्यूक, प्रिंस जैसी तमाम उपाधियां पैसे लेकर बांटी। वह इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि इन उपाधियों को हासिल करने वाला व्यक्ति समाज में अपने अहंकार को तुष्ट करना चाहता है। 

उपाधि हासिल कर लेने से कोई महान नहीं हो जाता है। एक दिन वह दरबार मं बैठे तो एक आदमी ने आकर उनसे कहा कि  उसे सज्जन की उपाधि चाहिए। इसके लिए चाहे जितनी रकम खर्च करनी पड़े। स्टूअर्ट ने कहा कि मैं तुम्हें राजवंश से जुड़ी उपाधियां दे सकता हूं। तुम्हें लॉर्ड बना सकता हूं, ड्यूक बना सकता हूं, लेकिन सज्जन की उपाधि नहीं दे सकता हूं क्योंकि सज्जनता खरीदी या बेची नहीं सजा सकती है। इसे अपने कर्म और व्यवहार से कमाना पड़ता है। वह आदमी निराश होकर चला गया।

हरियाणा में सीएमश्री स्कूलों से गरीब बच्चों का सुधरेगा भविष्य


अशोक मिश्र

बेरोजगारी को छोड़कर देश में रहने वाले नागरिकों की दो प्रमुख समस्याएं हैं। पहली स्वास्थ्य और दूसरा शिक्षा। देश की बहुसंख्यक आबादी को स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का दंश झेलना पड़ता है। वहीं अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर भी उन्हें चिंतित होना पड़ता है। नागरिकों की शिक्षा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए सैनी सरकार ने सीएमश्री स्कूलों को खोलने की योजना तैयार की है। 

प्रदेश में पहले से ही 252 पीएमश्री स्कूल संचालित हैं। फिलहाल तो योजना के मुताबिक सीएमश्री स्कूल नए नहीं खोले जाएंगे, बल्कि जो सरकारी विद्यालय बंद हो गए हैं या कुछ सरकारी स्कूलों को ही अपग्रेड करके उन्हें सीएमश्री स्कूल बनाया जाएगा। इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में से 25 प्रतिशत गरीब छात्रों को मौका दिया जाएगा। इन्हें मुफ्त शिक्षा दी जाएगी। बाकी 75 प्रतिशत बच्चों से भी कम फीस ली जाएगी। वैसे यह योजना तो बहुत अच्छी है। 

यदि सरकारी स्कूलों को अपग्रेड कर दिया जाए, उनमें सुविधाएं बढ़ा दी जाएं, तो गरीब बच्चों को यहां पढ़ने की सुविधा मिलने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा। गरीब बच्चों को वैसे भी शिक्षा हासिल करने में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा का स्तर उठाने के लिए प्रदेश सरकार ने स्कूलों में नौ हजार से अधिक कमरे बनवाकर ढांचागत सुधार किए हैं, तो वहीं 'सीएम शाइन' जैसी पहल भी शुरू की गई है। इसके बावजूद सैनी सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। 

राज्य के सरकारी स्कूलों में 40 हजार से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं। इन पदों पर भर्तियां की जाएं, तो बच्चों की शिक्षा पूरी हो सकेगी। लगभग 298 स्कूलों में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है और 1,051 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर कैसा होगा, इसको समझा जा सकता है। यही नहीं, विभिन्न कक्षाओं के परिणाम शून्य रहने जैसी गंभीर चुनौतियां भी मौजूद हैं। पिछले सात वर्षों में 400 स्कूल मर्ज या बंद हुए हैं और लगभग पांच हजार कंप्यूटर लैब में इंटरनेट नहीं है। वैसे तो प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में सभी सुविधाएं होने का दावा करती है, लेकिन इस बात में आंशिक सच्चाई है। 

स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं की 18 प्रतिशत और शौचालयों की एक से दो प्रतिशत तक कमी है। जिन स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है, उन स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की परेशानी का समझा जा सकता है। अलग से लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था न होने की वजह से लड़कियां स्कूल आने से कतराने लगती हैं। कुछ लड़कियां तो स्कूल आना ही छोड़ देती हैं। कई स्कूलों की इमारतें काफी पुरानी हो चुकी हैं। ऐसे स्कूलों में हादसे का डर बना रहता है। बरसात के दिनों में यह डर और भी बढ़ जाता है।

Thursday, February 26, 2026

अमेरिका के संस्थापकों में से एक थे फ्रैंकलिन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बेंजामिन फ्रैंकलिन को अमेरिका के संस्थापकों में से एक माना जाता है। वह वैज्ञानिक होने के साथ-साथ लेखक, व्यंग्यकार, उद्यमी और राजनेता भी थे। उनका जन्म छह जनवरी 1706 में बोस्टन में हुआ था। उन्होंने बिजली की छड़, बाईफोकल्स, फ्रैंकलिन स्टोव, गाड़ी के ओडोमीटर और ग्लास 'आर्मोनिका' का आविष्कार किया। बेंजामिन के पिता जोशिया फ्रेंकलिन ने दो शादियां की थीं। 

दोनों पत्नियों से कुल मिलाकर उनकी 17 संतानें थीं। बेंजामिन के दस सगे भाई-बहन थे और वह अपनी मां के आखिरी पुत्र थे। बेंजामिन की अपने भाई जेम्स से नहीं पटती थी। जेम्स हमेशा बेंजामिन को लेकर कुछ न कुछ ताने मारता रहता था। इससे परेशान होकर बेंजामिन बोस्टन से भागकर फिलाडेल्फिया आ गया। 

फिलाडेल्फिया में उन्होंने काम पाने के लिए कई जगह हाथ-पांव मारे, लेकिन बात बनी नहीं। काम की तलाश में एक दिन बेंजामिन एक ऐसे प्रिंटर्स के यहां पहुंचे जिसके यहां कामकाज बंद पड़ा था। उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस से मालिक से काम मांगा, तो उसने कहा कि मेरी एक मशीन ंबंद पड़ी है। बेंजामिन ने मशीन देखने के बाद कहा कि इसे ठीक करने में दिन भर लग जाएगा, मैं पूरी दिहाड़ी लूंगा। 

मालिक मान गया। लेकिन बेंजामिन ने दोपहर में ही मशीन को ठीक कर दिया। मालिक ने जब पूरी दिहाड़ी दी, तो आधी दिहाड़ी वापस करते हुए कहा कि मेरा मेहनताना इतना ही बनता है। उनकी इस ईमानदारी से प्रिटिंग प्रेस का मालिक बहुत प्रभावित हुआ। उसने दूसरी मशीन ठीक करने को कहा। इस तरह परिश्रम करते हुए अंत में वह वैज्ञानिक, राजनेता,लेखक बन गए। उन्होंने 17 अप्रैल 1790 में दुनिया को अलविदा कह दिया।

कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है हरियाणा को नशामुक्त बनाना


अशोक मिश्र

मंगलवार को पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि पड़ोसी राज्य हरियाणा में नशीली दवाओं की बिक्री चिंता का विषय है। यह सच है कि हरियाणा में नशीले पदार्थोँ की बिक्री हो रही है, लेकिन कम से कम पंजाब को हरियाणा पर यह आरोप लगाने का हक नहीं है। पंजाब का नाम ही नशीले पदार्थों की बिक्री की वजह से ‘उड़ता पंजाब’ काफी पहले ही पड़ चुका था। नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले सपनों की रंगीन दुनिया में उड़ने लगते हैं, इसलिए नशे में डूबे रहने वाली अधिसंख्य आबादी की वजह से उस प्रदेश के नाम के साथ उड़ता शब्द जोड़ दिया जाता है। 

हरियाणा सरकार इस बात का भरसक प्रयास कर रही है कि राज्य से नशीले पदार्थों का समूल नाश कर दिया जाए। पंजाब में सक्रिय ड्रग माफिया हरियाणा में भी अपना नेटवर्ककायम किए हुए हैं। उधर राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी नशीले पदार्थ हरियाणा में आ रहे हैं। अफीम और पोस्त का छिलका राजस्थान, झारखंड,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से ही ज्यादातर आ रहे हैं। गांजा भांग की आपूर्ति हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों से हो रही है। इन दोनों प्रदेशों में अवैध रूप से गांजा ज्यादा पैदा किया जाता है। 

नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले लोग बड़े पैमाने पर हरियाणा में लाकर युवाओं को नशे का आदी बना रहे हैं। वैसे राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन के साथ-साथ स्वयंसेवी संस्थाएं बड़े पैमाने पर राज्य में नशामुक्ति अभियान चला रही हैं। स्कूल कालेजों और यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को खासतौर पर फोकस किया जा रहा है। उन्हें नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। 

स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों के आसपास नशीले पदार्थ बेचने वाले लोगों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। जिला स्तर पर खेल परिसरों और स्टेडियम पर भी पुलिस और नारकोटिक्स डिपार्टमेंट की निगाह रहती है। खिलाड़ियों पर भी नजर रखी जा रही है ताकि वह नशे के आदी बनकर अपना जीवन और करियर बरबाद न कर लें। राज्य सरकार ने जिलों में संचालित होने वाले अवैध वेलनेस सेंटरों पर भी कड़ी निगाह रखने का सख्त आदेश दिया है। 

संबंधित विभागों को निर्देश दिया जा चुका है कि वह जल्दी से जल्दी इन अवैध वेलनेस सेंटरों की जांच करके रिपोर्ट पेश करें। राज्य में नशे के कारोबार को रोकने के लिए पुलिस और नारकोटिक्स विभाग को अपना नेटवर्कबढ़ाना होगा। शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में भी नशीले पदार्थ का कारोबार बढ़ रहा है। नशा माफिया नशीले पदार्थ की सप्लाई और बिक्री के लिए महिलाओं का सहारा ले रहे हैं। इसका कारण यह है कि महिलाओं पर लोगों और प्रशासन का शक कम होता है। महिलाएं बड़ी चतुरता से नशीले पदार्थ की सप्लाई कर देती हैं।

Wednesday, February 25, 2026

ब्राह्मण की मदद करने को खतरे में डाला जीवन


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

छत्रपति शिवाजी में युद्ध नीति बनाने की असाधारण प्रतिभा थी। उनका जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। उनके पिता शाहजी राजे भोसले एक शक्तिशाली सामंत परिवार में जन्मे थे। शाहजी राजे की दो पत्नियां थीं। शिवाजी की माता जीजाबाई ने ही अपने पुत्र का पालन-पोषण किया था। 

बचपन से ही जीजाबाई ने अपने बेटे को युद्ध और रणनीति बनाने की शिक्षा दी थी। यह उस युग की मांग थी। शिवाजी का 1674 में रायगढ़ में राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति की उपाधि धारण की थी। उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब से कई लड़ाइयां लड़ी थीं। एक बार की बात है। मुगलों की सेना से बचने के लिए वह वेष बदलकर गांव-गांव घूम रहे थे। 

एक दिन वह एक ब्राह्मण के यहां रहने गए। ब्राह्मण काफी गरीब था। उसको अपना और अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन उसने शिवाजी को प्रतिदिन भरपेट भोजन कराया। कई दिनों तक वह खुद भूखा रहा। जब यह बात शिवाजी को पता चली, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। वह सोचने लगे कि इस ब्राह्मण की कैसे मदद की जाए। उन्होंने वहां के एक मुगल सूबेदार को पत्र लिखा कि इस ब्राह्मण के घर में शिवाजी छिपे हुए हैं। 

शिवाजी को गिरफ्तार कर लो, लेकिन इस ब्राह्मण को दो हजार अशर्फियां दे दो। मुगल सूबेदार ने दो हजार अशर्फियां देने के बाद शिवाजी को गिरफ्तार कर लिया। जब यह बात ब्राह्मण को पता चली तो वह फूटफूटकर रोने लगा। उसी दिन तानाजी ने हमला करके शिवाजी को कैद से छुड़ा लिया। इस तरह अपना जीवन खतरे में डालकर भी शिवाजी ने ब्राह्मण की मदद की। लोगों की मदद करने में शिवाजी हमेशा आगे रहते थे।

विवशता से उपजे क्रोध के कारण बढ़ रही आपराधिक घटनाएं

अशोक मिश्र

अंबाला कैंट में मामूली सी बात को लेकर हुई बहस के दौरान हुए झगड़े में बीच बचाव करने आए एक युवक की हमलावरों ने हत्या कर दी। वैसे तो यह घटना एक सामान्य घटना की ही तरह है। लेकिन इस घटना से आजकल युवाओं में छोटी-छोटी बात पर उग्र रूप धारण कर लेने की प्रवृत्ति का खुलासा होता है। रविवार को अंबाला कैंट के जगाधरी रोड पर सिया वाटिका में शादी रिसेप्शन पार्टी आयोजित की गई थी। सिया वाटिका पैलेस में डेकोरेशन का काम जसराज उर्फ जस्सा को मिला था। 

रविवार होने की वजह से अंबाला के जैन स्कूल में ड्राइवर का काम करने वाला सोनू भी अपने दोस्त जस्सा के साथ वहां आया हुआ था। पार्किंग एरिया में सात-आठ युवकों ने जस्सा को घेर लिया और बहस करने लगे। यह बहस थोड़ी देर में मारपीट में बदल गई। मारपीट होता देख सोनू और भूपेंद्र बीच-बचाव करने आए। हमलावरों ने सोनू को घेर कर चाकू से हमला किया। पीठ में चाकू घोंप देने से सोनू की तत्काल मौत हो गई और भूपेंद्र गंभीर घायल हो गया। हमलावर भाग खड़े हुए। 

लोगों का अनुमान है कि किसी छोटी-मोटी बात को लेकर हमलावरों में से किसी एक के साथ जस्सा की बहस हुई थी। इस बहस ने ही बात में विकराल रूप धारण कर लिया और बात हत्या तक पहुंच गई। पिछले कुछ दशकों से युवा पीढ़ी लगातार उग्र होती जा रही है। मामूली बात पर हत्या कर देने, आत्महत्या कर लेने या फिर मारपीट कर लेने जैसी घटनाएं अब सामान्य रूप से देखने को मिल रही हैं। इसके कई कारण भी बताए जाते हैं। जब से एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है और माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, ऐसी स्थिति में वह अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। 

कम से कम आठ-दस घंटे एकाकी जीवन बिताने वाले बच्चों के मन में अपने परिजनों को लेकर एक आक्रोश पनपने लगता है। ऐसी स्थिति में वह मनमानी करने पर उतारू हो जाते हैं। माता-पिता यदि उनके किसी काम का विरोध करते हैं, तो मन में पहले से ही संचित आक्रोश फूट पड़ता है और वह अपराध कर बैठते हैं। पढ़ाई लिखाई करने के बाद भी जब युवाओं को नौकरी नहीं मिलती है अथवा माता-पिता कोई स्वरोजगार करवा पाने में सक्षम नहीं होते हैं, तो वह अपराध की ओर मुड़ जाते हैं। अपना खर्च चलाने के लिए वह लूटपाट, हत्या, चोरी-डकैती जैसे अपराध में लिप्त हो जाते हैं। 

मोबाइल पर खेले जाने वाले कुछ गेम्स भी युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रहे हैं। वह दिमाग को इतना कुंठित कर देते हैं कि वह सही गलत का फैसला नहीं कर पाते हैं और अपराध कर बैठते हैं। अशिक्षा, गरीबी, बेकारी जैसी समस्याओं ने युवाओं को इतना निराश कर दिया है कि वह अपने को असहाय समझने लगे हैं। इस असहायता से उपजे क्रोध के कारण भी समाज में आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं।

Tuesday, February 24, 2026

चिकित्सक के साथ राजनेता भी थे एंटोनियो एगास मोनिज

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

एंटोनियो एगास मोनिज ने अपनी खोजों से मानवता की बहुत सेवा की। उन्होंने मस्तिष्क में होने वाली बीमारियों के इलाज और आपरेशन का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने ल्यूकोटॉमी नामक शल्य क्रिया विकसित की जिससे दिमागी बीमारियों के इलाज का रास्ता खुला। 

मोनिज को बचपन से ही दिमाग के रहस्यों को सुलझाने में दिलचस्पी थी। वह मनुष्य के दिमाग को सबसे रहस्यमय मानते थे। जब बड़े हुए तो भी उनके दिमाग में यही बात आती रही कि दिमाग में होने वाली बीमारियों का इलाज कैसे किया जाए और कैसे पता लगाया जाए कि दिमाग के अमुक हिस्से में परेशानी है। मोनिज का जन्म 29 नवंबर 1874 को पुर्तगाल में हुआ था। 

मोनिज ने स्नातक करने के बाद लिस्बन विश्ववद्यिालय में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर नियुक्त हुए। इसके बाद मोनिज की यात्रा कभी रुकी नहीं। करीब बारह साल तक बार-बार विफल होने के बाद 1927 में उन्होंने सेरेबल एंजियोग्राफी तकनीक विकसि की जिससे मस्तिष्क की रक्त नलिकाओं की तस्वीर लेना संभव हुआ। इस खोज ने चिकित्सा जगत में नई क्रांति लगा दी इससे मस्तिष्क के रोगों का इलाज संभव हो पाया। 

इस नई खोज के लिए सन 1929 में मोनिज को नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। मोनिज को बचपन से ही राजनीति में भी दिलचस्पी थी। वह लोकतंत्र के समर्थक थे। इसके लिए कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सन 1900 में वह सासंद चुने गए। उनका परिवार राजशाही का समर्थक था, लेकिन मोनिज लोकतंत्र समर्थक थे। वह स्पेन के राजदूत भी नियुक्त किए गए। 1917 में वह विदेश मामलों के मंत्री भी बनाए गए। 1919 को उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। 13 दिसंबर 1955 को 81 वर्ष की आयु में चिकित्सक और राजनेता मोनिज की मृत्यु हो गई।

सड़कों पर बेलगाम दौड़ती गाड़ियों पर कब लगेगा अंकुश?

अशोक मिश्र

पिछले शनिवार को दिल्ली में एक बेलगाम वर्ना कार ने डिलीवरी ब्वाय  हेम शंकर को कुचल दिया। इलेक्ट्रिक स्कूटी सवार हेम शंकर को टक्कर मारने के बाद भी कार सवार रुका नहीं। राजधानी दिल्ली में आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। अगर हादसों के आंकड़े इकट्ठे किए जाएं, तो पता चलता है कि हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों में अमीरजादों की एक अच्छी खासी संख्या है। कानपुर में ही दस करोड़ की गाड़ी में सवार शिवम मिश्रा ने एक युवक को कुचल दिया और मौके से भाग खड़ा हुआ। 

बाद में लोगों के दबाव पर शिवम मिश्रा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। उसे गिरफ्तार किया गया। हमारे देश और प्रदेश में ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। अमीर परिवार के लड़के-लड़कियां ट्रैफिक नियमों का पालन करना, अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। वह यह समझ लेते हैं कि पैसे के बल पर कुछ भी किया जा सकता है और कुछ भी हासिल किया जा सकता है। 

उन्हें अपने परिवार के पैसे और ओहदे पर बड़ा अभिमान होता है। लग्जरी गाड़ियों पर नंबर प्लेट तक ठीक ढंग से नहीं लगवाते हैं। बेतुकी नंबर प्लेटों को देखकर पता नहीं चलता है कि गाड़ी का नंबर क्या है? ट्रैफिक पुलिस कर्मी भी इन्हें देखकर अनदेखा कर देते हैं। नंबर प्लेटों के साथ खिलवाड़ तो जैसे आम बात हो गई है। कई गाड़ियों में तो नंबर प्लेट बहुत छोटी होती है और उसके ऊपर या नीचे बड़े बड़े अक्षरों में जाति या धर्म सूचक शब्द लिखा होता है, पार्टी का नाम लिखा होता है या फिर कोई धार्मिक चिह्न बना होता है। 

नंबर प्लेट के आसपास ही बड़े बड़े अक्षरों में अटपटे शब्द लिखे होते हैं। यह हाल पूरे हरियाणा का है। राज्य के हर जिले में ऐसी कई गाड़ियां देखने को मिल जाएंगी जिनका नंबर नजदीक से भी देखने पर पता नहीं चलता है। ऐसी स्थिति में इन गाड़ियों के मालिक यदि कोई हादसा करके भाग जाएं, तो इनका पता लगाना काफी मुश्किल होता है। राज्य के हर जिले के प्रमुख चौराहों पर सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं। इसके बावजूद इनके खिलाफ शायद ही कार्रवाई की जाती हो। केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के तहत गाड़ियों पर गलत, फैंसी, धार्मिक या अपठनीय नंबर प्लेट लगाने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। 

वैसे तो वाहनों पर हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट को अनिवार्य किया गया है, लेकिन ऐसी प्लेट बहुत ही कम गाड़ियों पर लगी मिलती है। नंबर प्लेट  पर अंग्रेजी अक्षर और अंक ही होने चाहिए, लेकिन कुछ लोग नंबर प्लेट पर ऐसी कलाकारी करवाते हैं कि उसे देखने पर पागल लिखा दिखाई देता है। ऐसी गाड़ियों को चलाना अपराध की श्रेणी में आता है। ट्रैफिक पुलिस यदा-कदा ऐसी गाड़ियों के खिलाफ मुहिम भी चलाती है, लेकिन गाड़ी मालिक जुर्माना अदा करने के बाद फिर से वही करने लगते हैं। ऐसे लोगों पर यदि भारी जुर्माना लगाया जाए या उनका लाइसेंस ही सस्पेंड कर दिया जाए, तो शायद सुधार हो सकता है।

Monday, February 23, 2026

आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, काम से होती है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मैडम क्यूरी पहली महिला थीं जिन्हें भौतिक और रसायन का नोबल मिला था। पियरे क्यूरी से विवाह करने के बाद वह पूरी दुनिया में मैडम क्यूरी के नाम से जानी गईं। पोलैंड में जन्मी मैडम क्यूरी का वास्तविक नाम मारिया स्क्लाडोवका था। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। 

बड़ी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। यह पहला परिवार था जिसने पांच नोबेल पुरस्कार हासिल किया था। इतनी प्रसिद्धि के बावजूद मैडम क्यूरी सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करती थीं। पूरी दुनिया में ख्याति के बावजूद वह दिन-रात जब भी मौका मिलता था, वह अपने प्रयोगशाला में प्रयोग करती रहती थीं। पति-पत्नी दोनों वैज्ञानिक थे, इस वजह से दोनों एक दूसरे का बहुत सम्मान भी किया करते थे। 

एक बार की बात है। एक युवा पत्रकार उनका साक्षात्कार लेने उनके घर आया। उस समय मैडम क्यूरी एक बहुत ही साधारण कपड़े पहनकर बाहर बैठी हुई थीं। उस पत्रकार ने मैडम क्यूरी से पूछा कि क्या तुम यहां की नौकरानी हो? मैडम क्यूरी ने जवाब दिया है-हां, मैं इस घर की नौकरानी हूं। उस पत्रकार ने कहा कि क्या मैडम क्यूरी घर में हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-वह बाहर गई हैं। 

पत्रकार ने पूछा कि वह कब तक आएंगी? क्यूरी ने जवाब दिया-पता नहीं। पत्रकार ने फिर पूछा, कुछ कहकर गई हैं? क्यूरी ने जवाब दिया-हां, उन्होंने कहा है कि आदमी की पहचान कपड़ों से नहीं, उसके काम से होती है। यह सुनते ही उस पत्रकार ने उन्हें गौर से देखा तो पता लगा कि यही तो मैडम क्यूरी हंै। वह उनकी सादगी से बहुत प्रभावित हुआ।

पेड़ों की अवैध कटान के चलते संकुचित हुआ वन्यजीव गलियारा

अशोक मिश्र

अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ों की कटान के चलते वन्य जीवों का गलियारा काफी संकुचित हुआ है। यही वजह है कि अरावली क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीव यदा कदा मानव बस्तियों में घुस आते हैं। इससे कई बार जनहानि भी होती है। ज्यादातर मामलों में समय पर पता लग जाने की वजह से लोग उन्हें विभिन्न उपायों से जंगल की ओर भगा देते हैं। मानव हस्तक्षेप की वजह से वन्य जीवों के लिए स्वाभाविक ईको सिस्टम अरावली क्षेत्र में प्रभावित हो रहा है। 

लेकिन यह प्रभाव किस रूप में पड़ रहा है, वन्य जीवों की आबादी घट रही है या बढ़ रही है, इसका भी कोई सटीक आंकड़ा नहीं है क्योंकि सन 2017 से अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती ही नहीं हुई है। हालांकि यह जरूर कहा जा रहा है कि जल्दी ही अरावली क्षेत्र के वन्य जीवों की गिनती कराई जाएगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनकी आबादी कितनी बढ़ी या घटी। 

पुराने आंकड़े बताते हैं कि 2017 के सर्वे में 31 तेंदुए मिले थे। अनुमान है कि अब यह संख्या बढ़कर 80-90 के करीब हो सकती है। उस सर्वे में यह भी पता चला था कि सन 2017 में 167 नीलगाय, 126 लकड़बग्घे, 26 जंगली बिल्लियाँ, 91 पोरक्यूपाइन (साही), 50 नेवले, चार लोमड़ी, और 61 ताड़ के सिवेट भी रिकॉर्ड किए गए थे। रिपोर्ट में 14 चिंकारा और 23 मोर के साथ दूसरे जानवर दिखने की बात भी कही गई थी। ऐसा नहीं है कि सरकार ने वन्यजीवों की गिनती कराने का प्रयास नहीं किया था। 

2017 के बाद देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया को सर्वे का काम सौंपा गया था। अरावली क्षेत्र में बड़े जोर-शोर से सर्वे भी किया गया था, लेकिन इंस्टीटूयूट ने अभी तक सर्वे रिपोर्ट भी जारी नहीं की है। प्रदेश सरकार ने कई बार सर्वे रिपोर्ट भी मांगी, लेकिन इंस्टीट्यूट ने जवाब देना उचित ही नहीं समझा। ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि एक बार नए सिरे से वन्यजीवों की गिनती कराई जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि वास्तविक स्थिति क्या है? यदि वन्य जीवों की संख्या घट रही है, तो इनकी जनसंख्या बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए। 

यह पता लगाया जाए कि वह कौन से कारण हैं जिनकी वजह से जीवों की संख्या घट रही है। उन कारणों को दूर करके वन्य जीवों की आबादी बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया जाए। यदि बढ़ रही है, तो भी उन कारणों को चिन्हित किया जाए, ताकि इसका उपयोग दूसरी जगहों पर किया जा सके। हमें दोनों हालात की जानकारी होनी चाहिए। पिछले कई सालों से अरावली क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। 

रसूख वाले लोग अपने फार्म हाउस, मैरिज हाल आदि बनवाकर वन्य जीवों के रहन-सहन को बाधित कर रहे हैं। वन्यजीव गलियारे में इंसानों के आवागमन की वजह से उन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

Sunday, February 22, 2026

अपनी समस्या तुम्हें खुद सुलझानी होगी


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मन की शांति, सुख और दुख जैसी भावनाएं प्रत्येक मनुष्य में पैदा होती हैं। लेकिन अगर किसी को सुख की अनुभूति हो रही है, तो वह किसी दूसरे के काम आने वाली नहीं है। यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति प्रसन्न है, तो उसकी अनुभूति उस व्यक्ति के माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी और बेटा-बेटी को नहीं होगी। 

हर व्यक्ति को अपना सुख-दुख खुद ही भोगना पड़ेगा। यही प्रकृति का नियम है। एक समय की बात है। एक सेठ किसी नगर में रहता था। उसने अपने जीवन में काफी धन कमाया था। उसका परिवार भी काफी सभ्य और सुशील था। लेकिन पता नहीं क्यों, उस सेठ के मन में शांति नहीं थी। 

वह हर समय परेशान रहता था। वह सोचता रहता था कि उसके मन को शांति कैसे मिले? एक दिन उसने सुना कि उसके शहर में एक साधु आए हैं। वह लोगों की समस्याओं का निराकरण करते हैं। सेठ भी अपनी समस्या को लेकर साधु के पास गया। साधु ने उसकी परेशानी सुनकर अगले दिन आने को कहा। सेठ अगले दिन साधु के पास पहुंचा, तो साधु ने कड़कती धूप में बिठा दिया और खुद पेड़ की छांव में बैठ गया। 

तीन चार घंटे बाद साधु ने अगले दिन दोबारा आने को कहा। अगले दिन सेठ को तो साधु ने भूखा-प्यासा रखा और खुद तरह-तरह के पकवान खाता रहा। साधु ने तीसरे दिन उसे आने को कहा। तीसरे दिन सेठ गुस्से से तमतमाता हुआ साधु के पास पहुंचा और बोला-मैं आपके पास अपनी समस्या का हल पाने आया था, आप तो मुझ पर अत्याचार कर रहे हैं। 

साधु ने कहा कि मैं आपको यही समझाना चाहता था कि आपको अपनी समस्या खुद ही सुलझानी होगी। आपको ऐसे कर्म करने होंगे जिससे आपके मन को शांति मिले। सेठ की समझ में अब बात आ गई थी।

दुष्कर्म पीड़िताएं सहानुभूति की हकदार, घृणा की नहीं

अशोक मिश्र

गुरुग्राम के सेक्टर 37 में गुरुवार को एक ऐसी घटना सामने आई जिससे लगा कि अब इंसान हैवान से भी बदतर होता जा रहा है। सेक्टर 37 में रहने वाले एक युवक ने तीन साल की मासूम बच्ची को पहले बहलाया-फुसलाया और घर से करीब साढ़े तीन किमी दूर ले जाकर पहले उसके साथ दुराचार किया और बाद में गला दबाकर हत्या कर दी। आरोपी युवक को पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पहचाना। 

इंसान अब इतना पतित हो गया है कि वह मासूम बच्चियों के साथ दुराचार करने में भी नहीं हिचक रहा है। गुरुवार को ही उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पचास  से अधिक बच्चों के यौन शोषण और उनकी वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डालने के दोषी पति-पत्नी को फांसी की सजा सुनाई गई है। बांदा जिला कोर्ट के जज तो इन हैवानों की करतूत से इतना नाराज थे कि उन्होंने कहा, इन दरिंदों को तब तक फांसी पर लटाए रखो, जब तक इनकी मौत न हो जाए। पति रामभवन सिंचाई विभाग में इंजीनियर था और उसकी पत्नी दुर्गावती हाउस वाइफ। सीबीआई ने इन दोनों को 18 नवंबर 2020 को गिरफ्तार किया था। 

इन दोनों पर बच्चों का यौन शोषण करने, अश्लील वीडियो बनाकर डार्क वेब पर बेचने का आरोप था। बताया जाता है कि पचास से अधिक बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए थे। ऐसे लोगों को फांसी की सजा ही मिलनी चाहिए थी। इन दोनों दोषियों ने बच्चों का जीवन नर्क बना दिया है। जितने बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए हैं, वह आजीवन इस घटना को भूल नहीं पाएंगे। बलात्कार और दुष्कर्म का दंश पीड़ितों को आजीवन सालता रहेगा। भारतीय समाज में बलात्कार का शिकार हुए लोग आजीवन सुख की नींद नहीं सो पाते हैं। 

यदि किसी पुरुष के साथ दुराचार होता है, तो वह समाज में अपना मुंह दिखाने के काबिल नहीं माना जाता है। ऐसा ही महिलाओं के साथ भी होता है। समाज और रिश्तेदार तो सबसे पहले पीड़िता को ही दोष देने लगते हैं। वह यह समझने को तैयार ही नहीं होते हैं कि पीड़िता किस परेशानी के दौर से गुजर रही है। उसकी मनस्थिति क्या है? पीड़िता के परिजन भी पहले मामले को दबाने का प्रयास करते हैं, ताकि समाज में उन्हें नीचा न देखना पड़े। वहीं दूसरी ओर बलात्कार करने वाला समाज में अपना सिर उठाकर चलता है, मानो उसने कोई बहादुरी का काम किया हो। समाज की यह दोहरी मानसिकता पीड़िता को और भी परेशान करती है। 

यहि किसी को पीड़िता के बारे में पता चल जाए, तो लोग उसे सहज उपलब्ध मान लेते हैं। कई बार तो पीड़िता को उन लोगों की भी हैवानियत का शिकार होना पड़ता है जिससे उसे सहायता की उम्मीद होती है। जब तक समाज अपनी दोहरी मानसिकता से मुक्त नहीं होता, तब तक दुष्कर्म पीड़िताओं को सहानुभूति और न्याय नहीं मिल सकता है। पीड़िताएं सहानुभूति और सम्मान की हकदार हैं, घृणा की नहीं।

Saturday, February 21, 2026

महात्मा बुद्ध ने सुप्पिया को दिलाई मुक्ति


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के एक शिष्य थे सुप्पिया। सुप्पिया का जन्म उस जाति में हुआ जिसमें पैदा हुए लोगों को मरे हुए पशुओं की खाल उतारना और उन्हें ठिकाने लगाना था। इसकी वजह से उन्हें बहुत अपमान सहना पड़ता था। उस समय का समाज छुआछूत और जाति-पाति के विचारों को बहुत मानता था। उच्च जाति के लोग अपने से निम्न जाति के लोगों को बहुत हेय दृष्टि से देखते थे। 

उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार भी होता था। सुप्पिया इस बात से बहुत परेशान थे। वह इस अपमान से मुक्त होना चाहते थे। एक दिन उन्होंने सुना कि उसके गांव के पास में ही महात्मा बुद्ध आए हैं, जो अपने उपदेशों से लोगों का जीवन बदल देते हैं। सुप्पिया के मन में भी इच्छा जागी कि वह उस संत से मिलें। लेकिन फिर उनके मन में आया कि लोग उन्हें उनसे मिलने नहीं देंगे। लेकिन वह अपने मन को कड़ा करके महात्मा बुद्ध से मिलने गए। 

महात्मा बुद्ध ने शांत स्वर में पूछा कि तुम कौन हो और मुझसे क्या चाहते हो। सुप्पिया ने अपनी दशा बताते हुए इन परेशानियों से मुक्ति की कामना प्रकट की। महात्मा बुद्ध  ने सुप्पिया को समझाते हुए कहा कि जब भी निर्मल मन से प्रत्येक व्यक्ति को  एक समान समझता है। लोगों के साथ दया, ममता और अहिंसक व्यवहार करता है, वह किस जाति में पैदा हुआ है, इससे कोई फर्कनहीं पड़ता है। 

मानवता का किसी जाति से कोई लेना देना नहीं है। सुप्पिया ने बुद्ध से कहा कि मैं मुक्त होना चाहता हूं। बुद्ध ने अपने संघ में भिक्षुक बना लिया। सुप्पिया ने बुद्ध के मार्गदर्शन में कठोर साधना की। वे संघ के अन्य भिक्षुओं की तरह नियमों का पालन करते थे और अपनी साधना में पूरी तरह से लीन रहते थे। 

बुद्ध ने उन्हें शिक्षा दी कि समस्त प्राणियों के प्रति करुणा और प्रेम का भाव रखना चाहिए और उनके दु:ख को समझकर उनकी मदद करनी चाहिए। धीरे-धीरे सुप्पिया ने अपनी साधना में प्रगति की और अंतत: उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। 

परीक्षा के तनाव में जी रहे विद्यार्थी शादियों में बज रहा कानफोड़ू डीजे


अशोक मिश्र

हरियाणा में जहां वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या बनता जा रहा है, वहीं ध्वनि प्रदूषण भी कम परेशान करने वाला नहीं है। सड़कों पर तेज हार्न बजाकर दौड़ती हुई गाड़ियां सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण पैदा करती हैं। हरियाणा में विशेषकर गुरुग्राम, फरीदाबाद और रोहतक जैसे शहरी व औद्योगिक क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर खतरनाक है, जो अक्सर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों (दिन में 55 डेसिबल से कम) से काफी ऊपर रहता है। इन दिनों शादियों का मौसम है। 

रात में निकलने वाली बारात के दौरान बजने वाले डीजे लोगों को काफी परेशानी में डाल रहा है। उच्च रक्तचाप की बीमारी से ग्रसित लोगों के हृदय में डीजे बजते समय कांपने लगते हैं। आसपास की इमारतों में कंपन पैदा होने लगता है। कई बार तो ऐसा महसूस होता है कि यदि तनिक भी डीजे का शोर अधिक हुआ, तो इमारत भरभरा कर गिर जाएगी। राज्य के औद्योगिक शहरों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा है। 

ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत वाहनों का हॉर्न, निर्माण कार्य और जनरेटर के साथ-साथ शादियों में बजने वाले डीजे हैं। ध्वनि प्रदूषण पर नजर रखने के लिए तो फरीदाबाद में पहले वास्तविक-समय ध्वनि निगरानी स्टेशन स्थापित किए गए हैं। वैसे तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग अलग मानक तय किए हैं, लेकिन इन मानकों का उल्लंघन हर जगह होता दिखाई दे जाएगा। बोर्ड के नियमानुसार, अस्पतालों के आसपास दिन में 50 डेसिबल और रात में 40 डेसिबल से कम ही शोर होना चाहिए ताकि मरीजों की नींद में किसी प्रकार का खलल न पड़े, लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। 

गाड़ियों के हॉर्न बजते रहते हैं। डीजे वाले भी अस्पताल का ध्यान नहीं रखते हैं। कुछ ही दिनों में राज्य में बोर्डों की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं। इसके बाद नौवीं और ग्यारहवीं की परीक्षाएं होंगी। छोटे बच्चों की भी परीक्षाएं निकट भविष्य में होनी हैं। बच्चे तनाव में हैं। जल्दी से जल्दी कोर्स पूरा करने का उन पर दबाव भी है। वह अधिक से अधिक समय तक पढ़ाई करना चाहते हैं। लेकिन उनके आसपास होने वाला शोर उनकी मेहनत पर पानी फेर रहा है। बच्चे ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं। 

ध्वनि प्रदूषण के चलते उनकी मानसिक शांति खत्म हो रही है। उनमें हाईपर टेंशन, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है। कई बार तो तनाव में वह उग्र भी हो रहे हैं। चिकित्सकों का यह भी कहना है कि तेज आवाज वाले डीजे या हाई डेसिबल वाली ध्वनि केवल कानों के पर्दे को ही नुकसान नहीं पहुंचाती है, बल्कि दिल के रोगियों के लिए कई बार जानलेवा हो जाती है। अचानक तेज आवाज होने से शरीर स्ट्रेस रिस्पांस सक्रिय करके एड्रेनॉलिन बढ़ाता है जिसकी वजह से धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। इससे लोगों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है।

Friday, February 20, 2026

मारिया और ब्रोन्या ने एक दूसरे को पढ़ाया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

रेडियोधर्मिता शब्द गढ़ने वाली मारिया उर्फ मैडम क्यूरी ने पोलोनियम और रेडियम जैसे तत्वों की खोज की थी। मैडम क्यूरी वह पहली महिला थीं जिन्हें रसायन और भौतिकी दोनों में नोबेल पुरस्कार दिया गया था।  उनके पति पियरे क्यूरी को भी नोबल पुरस्कार दिया गया था। इनके पिता और दादा काफी प्रतिष्ठित और अमीर थे, लेकिन बाद में लड़ाई में भाग लेने की वजह से अपनी धन-संपत्ति गंवा बैठे थे। 

इसके चलते मारिया और ब्रोन्या को काफी संघर्ष करना पड़ा। उन दिनों पोलैंड रूस के अधीन हुआ करता था। महिलाओं का उच्च शिक्षा हासिल करना उन दिनों पोलैंड में काफी दुष्कर था। इन दोनों बहनों में पढ़ने की बहुत अधिक लगन थी। वह पढ़ना चाहती थीं, लेकिन पढ़ाई के लिए आवश्यक धनराशि नहीं थी। 

तब मारिया ने अपनी बहन ब्रोन्या से कहा कि तुम पेरिस जाकर मेडिकल की पढ़ाई करो। तुम्हारी पढ़ाई में जो खर्च आएगा, वह मैं करूंगी। इसके लिए मैं काम खोज लूंगी। पढ़ाई पूरी करने के बाद तुम मेरी पढ़ाई में मदद करना। दोनों बहनों ने एक दूसरे के सहारे अपने भाग्य को चमकाने का फैसला किया। ब्रोन्या पेरिस चली गई। मारिया ने एक नए शहर में एक अमीर परिवार के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। 

दिन में वह बच्चों को पढ़ाती थीं और रात में खुद पढ़ाई करती थीं। दो साल बाद ब्रोन्या डॉक्टर बनी तो उसने मारिया को उसने पेरिस बुला लिया। बस यहीं से मारिया के जीवन में बदलाव आया। उन्होंने अपने को विज्ञान की सेवा में झोंक दिया। बाद में उन्होंने पियरे क्यूरी से विवाह किया। अपनी बहन की सहायता से मारिया ने न केवल अपना मुकाम हासिल किया, बल्कि मानवता की बहुत बड़ी सेवा की। इनकी सेवा की पूरी दुनिया ने सराहना की।

हरियाणा में वायु प्रदूषण के चलते होने वाली बीमारियां चिंताजनक


अशोक मिश्र

हरियाणा के सत्रह जिलों में बुधवार को हुई बरसात की वजह से वायु प्रदूषण पर बहुत मामूली कमी आई है। ठंडक बीत जाने के बाद भी वायु गुणवत्ता सूचकांक संतोषजनक स्तर पर नहीं आ पाया है। यह हालत तब है, जब एक्यूआई पर प्रधानमंत्री कार्यालय से भी निगाह रखी जा रही है। हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में वायु प्रदूषण अब एक स्थायी समस्या बनता जा रहा है। इन राज्यों में वायु प्रदूषण के चलते होने वाली मौतों को सामान्य मानकर भुला दिया जाता है। 

अक्टूबर 2025 में जारी ग्लोबल बर्डन आॅफ डिजीज (जीबीडी) 2023 के आंकड़ों पर आधारित इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) ने अध्ययन किया तो पाया कि हरियाणा में महीन कणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण सामने आया है। अध्ययन में पाया गया कि राज्य में 27,130 मौतें खराब वायु गुणवत्ता से जुड़ी थीं, जो कुल मृत्यु दर का 13.5 प्रतिशत है। हरियाणा में रोकी जा सकने वाली मौतों का प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है, जो उच्च सिस्टोलिक रक्तचाप के बाद दूसरे स्थान पर है, जिसके कारण 2023 में 30,197 मौतें हुईं। 

वायु प्रदूषण के चलते हर साल हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़े का कैंसर और श्वांस संबंधी बीमारियों के कारण काफी मात्रा में लोगों की मौत हो जाती है। इन मौतों का कारण कहीं न कहीं वायु प्रदषण होता है। वायु प्रदूषण से लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोग अपने शरीर में सूजन और आक्सीडेटिव तनाव के शिकार हो सकती हैं। जिसकी वजह से कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं।  ऐसे लोगों को तंत्रिका तंत्र संबंधी विकार और मनोदशा का शिकार होना पड़ सकता है। चिकित्सकों का मानना है कि हरियाणा में वायु प्रदूषण कोई गौण स्वास्थ्य चिंता नहीं है, बल्कि यह रोके जा सकने वाले रोगों के बोझ का प्राथमिक कारण है। 

यह सही है कि पिछले कुछ वर्षों से सरकारी तौर पर वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन उसके परिणाम उतने सकारात्मक नहीं रहे जितने की अपेक्षा थी। यह सच है कि हरियाणा में पराली को जलाने की घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन फैक्ट्रियों, वाहनों और एयरकडीशन्स के जरिये फैलने वाला प्रदूषण नियंत्रित नहीं हो पा रहा है। प्रतिबंध के दिनों में सड़कों पर उड़ने वाली धूल और होने वाले अवैध निर्माण सारे प्रयास पर पानी फेर देते हैं। 

रोहतक, धारूहेड़ा, सोनीपत, गुरुग्राम, फरीदाबाद, और बहादुरगढ़ में वायु गुणवत्ता बेहद खराब रही है, जहाँ ज्यादातर दिनों में एआईक्यू 300-400 से ऊपर या इसके आसपास दर्ज किया गया है। यदि हरियाणा में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पा लिया जाए, तो प्रदूषण के चलते होने वाली बीमारियां और उससे होने वाली मौतों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।

Thursday, February 19, 2026

मित्र के लिए राक्षस ने किया आत्मसमर्पण

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद का महामंत्री यानी अमात्य था राक्षस। उसका नाम राक्षस क्यों पड़ा, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिलती है। कहा जाता है कि वह राज्य को सुरक्षित और संपन्न बनाने के लिए कठोर फैसले लेता था, शायद इसीलिए उसको लोग राक्षस कहने लगे थे। इसके चलते उसका वास्तविक नाम अज्ञात रहा और उसकी उपाधि ही उसका नाम हो गया। 

धनानंद के आमात्य राक्षस के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी विशाखदत्त के संस्कृत भाषा में लिखे गए नाटक मुद्राराक्षस में मिलती है। यह नाटक चौथी से छठवीं शताब्दी के बीच गुप्त काल में लिखा गया माना जाता है। नाटक के अनुसार, जब चाणक्य के संरक्षण में चंद्रगुप्त मौर्य ने धनानंद को पराजित कर दिया, तो चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बना दिया। 

धनानंद के मुख्य सलाहकार और प्रधान मंत्री राक्षस को चंद्रगुप्त पकड़ नहीं पाया था। अमात्य राक्षस ने दूसरे राजाओं के सहयोग से चंद्रगुप्त के खिलाफ कई अभियान चलाए। लेकिन वह चाणक्य की चतुराई की वजह से सफल नहीं हुआ। चाणक्य भी राक्षस को अपनी ओर मिलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने राक्षस के परममित्र सेठ चंदन दास को गिरफ्तार करवा लिया। चाणक्य ने घोषणा की कि कुछ दिनों बाद चंदनदास को मृत्यु दंड दिया जाएगा। जब यह जानकारी राक्षस को मिली, तो वह विचलित हो गया। 

उसने चंद्रगुप्त के सामने उपस्थित होकर चंदन दास को छोड़  देने का आग्रह किया। चाणक्य ने कहा कि इसके बदले तुम्हें चंद्रगुप्त के लिए कार्य करना होगा। राक्षस ने कहा कि मैं शत्रुपक्ष का अमात्य रहा हूं, आपका मुझ पर विश्वास कैसे होगा? चाणक्य ने कहा कि तुम्हारा कार्य ही विश्वास पैदा करेगा। इसके बाद राक्षस ने अधीनता स्वीकार कर ली।

आतंकवाद से निपटने के लिए सैनी सरकार ने कस ली कमर


अशोक मिश्र

आतंकवाद वैश्विक समस्या है। इस समस्या से कमोबेस सभी देश पीड़ित हैं। कुछ देश तो खुलेआम इसे प्रश्रय भी दे रहे हैं। ऐसे देशों में पाकिस्तान सबसे पहले गिना जाता है। दिक्कत यह है कि पाकिस्तान कभी हमारे ही देश का हिस्सा था और अब पड़ोसी है। स्वाभाविक है कि आतंकवादी घटनाओं का सबसे पहला दुष्प्रभाव हमारे देश को ही झेलना पड़ता है। मुंबई में ताज पर आतंकी हमला, संसद भवन, पुलवामा, पहलगाम और अभी हाल में हुआ दिल्ली ब्लास्ट जैसे न जाने की कितनी घटनाएं हमारे देश में हो चुकी हैं। इन सभी घटनाओं में किसी न किसी रूप में पाकिस्तान का हाथ पाया गया था। 

दिल्ली ब्लास्ट मामले में जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई थी। फरीदाबाद में स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी के कुछ प्रोफेसर्स दिल्ली ब्लास्ट मामले में मुख्य अपराधी पाए गए थे।  काफी मात्रा में विस्फोटक रसायन भी हरियाणा में बरामद किए गए थे। इन सब घटनाओं को ध्यान में रखते हुए सीएम नायब सिंह सैनी ने आतंकवाद विरोधी दस्ता गठित करने की इजाजत गृह विभाग को दे दी है। एटीएस का नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक करेंगे। 

गुरुग्राम में एक अलग एटीएस पुलिस स्टेशन बनाया जाएगा। राज्य सरकार की आतंकवाद के खिलाफ यह एक अच्छी पहल है। इससे राज्य में सक्रिय आतंकवादियों और उनके स्लीपर सेल्स को पकड़ने और आतंकी नेटवर्कको छिन्न-भिन्न करने में सफलता मिलेगी। वैसे अभी तक यह काम पुलिस, खुफिया विभाग और अन्य सुरक्षा से जुड़ी संस्थाएं करती रही हैं। इन संस्थाओं के पास पहले से ही अपने बहुत सारे काम होते हैं, इसलिए आतंकियों की पूरी तरह से निगरानी नहीं कर पा रही थीं। 

आतंकवाद विरोधी दस्ते का गठन होने के बाद प्रदेश में आतंकी घटनाओं को रोका जा सकेगा, इसकी उम्मीद हो चली है। एटीएस के पांच विंग होंगे। इस विंग में स्पेशल फोर्स, इंटेलीजेंस-आॅपरेशनल डिपार्टमेंट, रिसर्च-एनालिसिसि विंग और इन्वेस्टिगेशन मुख्य रूप से शामिल रहेंगे। एटीएस का मुख्य काम आतंकी हमलों पर तुरंत सही प्रतिक्रिया देना, आतंकवाद से जुड़े मामलों की अच्छी जांच करना और कोर्ट में सही तरीके से मुकदमा चलाना होगा, ताकि आतंकियों को उनके किए की सजा मिल सके। प्रदेश सरकार ने यह भी तय किया है कि पंचकुला में मुख्यालय के साथ सीआईडी ​​के अंतर्गत एक आतंकवाद-विरोधी दस्ता (एटीएस) सेंटर स्थापित किया जाएगा। 

एटीएस दस्ते के गठन के बाद आतंकियों के खिलाफ मुकम्मल कार्रवाई होगी। राज्य से आतंकी घटनाओं को होने से पूरा तरह रोक लग जाएगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। एटीएस में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों को आर्थिक लाभ प्रदान करने का भी राज्य सरकार ने फैसला लिया है, जो स्वागत योग्य है।

Wednesday, February 18, 2026

ऊंच-नीच की भावना देश सेवा में बाधक


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सेवा करने के लिए मन में लगन और जोश जरूर होना चाहिए। देश सेवा के लिए तो बलिदान होने की भावना बहुत जरूरी है। जब तक देश को सर्वोच्च समझकर आत्मोत्सर्ग की भावना नहीं होगी, सच्ची देश सेवा नहीं की जा सकती है। देशवासियों को एक समान समझना भी देश सेवा की अनिवार्य शर्त है। ऊंची-नीच, अमीर गरीब की भावना देश सेवा में सबसे बड़ी बाधक है। एक बार की बात है। 

साबरमती आश्रम में गांधी जी लोगों की सेवा खुद किया करते थे। वह अपना काम तो खुद करते ही थे, लोगों को भी प्रेरित करते थे कि वह अपना काम खुद करें और सादगी से जीवन यापन करें। एक दिन की बात है। एक विदेशी युवक साबरमती आश्रम में आया और गांधी जी से बोला कि उसने उच्च शिक्षा हासिल की है। वह चाहता है कि साबरमती आश्रम में रहकर लोगों की सेवा करे। 

गांधी जी ने उसके लहजे से जान लिया कि युवक को अपनी उच्च शिक्षा और रहन सहन पर बहुत अभिमान है। उन्होंने युवक से कहा कि तुम गेहूं बीनने का काम करो। युवक को गांधी जी की यह बात अच्छी तो नहीं लगी, लेकिन वह गेहूं बीनने लगा। थोड़ी ही देर में वह उस काम से उकता गया। उसने गांधी जी के पास जाकर कहा कि थोड़ा जल्दी खा लेने की मेरी आदत है। इसलिए मैं खाना खाने की इजाजत चाहता हूं। 

गांधी जी ने कहा कि अभी थोड़ी देर में आश्रमवासियों के लिए भोजन तैयार हो जाएगा, तब सबके साथ बैठकर खाना खा लेना। युवक चुप रह गया। तब गांधी जी ने कहा कि तुम देश की सेवा करना चाहते हो, यह अच्छी बात है, लेकिन जब तक तुम अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को कमतर समझोगे, तो देश सेवा कैसे कर पाओगे। सबको अपने ही समान समझना चाहिए।

केमिकल फैक्ट्री में लगी आग से सबक सीखें प्रशासनिक अधिकारी


अशोक मिश्र

फरीदाबाद के सेक्टर 24 में सोमवार की शाम लगी भीषण आग ने प्रशासन की लापरवाही की पोल खोल दी है। एक निजी कंपनी में सीएनसी से मेटल शीट कटिंग के दौरान लगी आग में 42 से अधिक लोग बुरी तरह घायल हुए हैं। इनमें से कुछ लोगोंकी हालत काफी गंभीर है। हादसे के बारे में बताया जा रहा है कि मेटल शीट कटिंग के दौरान निकली चिन्गारी ने कुछ ही दूर रखे ड्रम में आग पकड़ ली। इसके बाद तो लगातार ड्रम किसी बम की तरह फटने लगे। 

चारों ओर चीख पुकार मच गई। घायल और झुलसे लोग बदहवाश होकर इधर-उधर बचने के लिए भागने लगे। इसी बीच किसी ने फायर ब्रिगेड और पुलिस को फोन करके हादसे की जानकारी दी। जानकारी मिलते ही पुलिस और फायर ब्रिगेड की गाड़ियां मौके पर पहुंची और बचाव और राहत का काम शुरू किया। लोगों का कहना है कि यदि फायर ब्रिगेड की गाड़ियां तत्परता से मौके पर नहीं पहुंचती, तो शायद हादसा और भी भयानक हो सकता था। इस एक घटना ने प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। 

प्रशासन को यह नहीं मालूम है कि सेक्टर-24 में चल रही यह फैक्ट्री अधिकृत एरिया में चलाई जा रही थी या अनधिकृत एरिया में। पूछने पर अधिकारी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ ले रहे हैं कि छानबीन करने के बाद ही पता चलेगा। अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि किस केमिकल की वजह से इतना बड़ा हादसा हुआ, इसकी भी जांच की जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि जिन ड्रमों की वजह से विस्फोट हुआ, उन ड्रमों में मशीन के पुर्जोँ को साफ करने वाले आयल के साथ-साथ कोई केमिकल भी था जिसकी वजह से इतनी तेजी से आग फैली और विस्फोट हुआ। 

वैसे इंडस्ट्रियल एरिया में भी अगर कोई केमिकल रखा जाता है, तो उसके लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। अगर किसी इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित फैक्ट्री, वर्कशाप या दुकान में कोई केमिकल या ज्वलनशील पदार्थ रखा जाता है, तो उस केमिकल का नाम जरूर लिखा जाता है। हर ड्रम पर केमिकल का नाम, उसका विवरण, खतरे का चिन्ह और चेतावनी का चिह्न बना होना चाहिए ताकि हर व्यक्ति कार्य करते समय सतर्क रहे। ड्रम में रखे केमिकल को उपयुक्त तापमान पर ही रखा जाना चाहिए ताकि किसी प्रकार की दुर्घटना की आशंका न रहे। वेंटिलेशन की भी पूरी व्यवस्था होनी चाहिए। 

इतना ही नहीं, उसके आसपास पार्किंग एरिया नहीं होनी चाहिए। किसी को स्मोकिंग की इजाजत भी नहीं देनी चाहिए। फैक्ट्रियों, वर्कशापों में आग से बचने के उपाय अवश्य किए जाने चाहिए। अधिकारियों को भी चाहिए कि वह समय समय पर ऐसी फैक्ट्रियों और वर्कशापों की जांच करते रहे। थोड़ी सी भी लापरवाही दिखे, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें ताकि ऐसी घटनाओं को होने से रोका जा सके।

Tuesday, February 17, 2026

विल्मा ने पोलियो को हराकर जीता गोल्ड

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अमेरिका के टेनेसी में 23 जून 1940 को पैदा हुई विल्मा ग्लोडीन रुडोल्फ को बचपन में काफी संघर्ष करना पड़ा। वह समय से पहले पैदा हुई थीं। बचपन में ही निमोनिया और पोलियो की वजह से बायां पैर कमजोर हो गया। वह सहारा लेकर ही चल पाती थीं। 

उनकी मां ब्लैंथ रुडोल्फ और पिता एड रुडोल्फ हमेशा उनका उत्साहवर्धन करते रहे। उन दिनों अमेरिका में स्पोर्ट्स को ज्यादा महत्व दिया जाता था जिसकी वजह से प्राइमरी स्कूल से ही बच्चों को खेलने का मौका दिया जाता था। जब वह बारह साल की हुईं तो एक दिन स्पोर्ट्स पीरियड में उन्होंने अपने टीचर से ओलिंपिक के बारे में जानना चाहा। शिक्षक उसकी बात पर हंस पड़े और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि तुम अपने पैरों को देखो, दौड़ना तो दूर ठीक से चल भी नहीं पाती हो। ओलिंपिक के बारे में जानकर तुम क्या करोगी। 

वहां मौजूद छात्र-छात्राएं भी उसका मजाक उड़ाने लगे। फिर तो स्कूल में सबने उसका मजाक उड़ाना शुरू किया। तब विल्मा ने अपने शिक्षक से कहा कि एक दिन आप सब मुझे ओलिंपिक में दौड़ते हुए और पदक जीतते हुए देखें। इसके बाद विल्मा ने पहले अपनी बैसाखी से छुटकारा पाने का प्रयास किया जिसमें वह काफी मेहनत के बाद सफल भी हो गईं। इसके बाद उन्होंने दौड़ने का अभ्यास शुरू किया। 

छोटी-मोटी प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेकर जीत हासिल की। इसके बाद 1960 में रोम में हुए ओलिंपिक में उन्होंने तीन प्रतिस्पर्धाओं भाग लेकर तीन स्वर्ण पदक जीते। एक ओलिंपिक में तीन स्वर्ण पदक जीतने वाली वह अमेरिका की पहली महिला बनीं। 12 नवंबर 1994 को 54 वर्ष की आयु में इस महान महिला धाविका की कैंसर से टेनेसी में मौत हो गई।

आग लगने पर धन-जन हानि कम करने को खुलेंगे नए फायर स्टेशन


अशोक मिश्र

अब मौसम धीरे-धीरे गरम होने लगा है। तापमान बढ़ने से लोगों ने राहत की सांस ली है। लेकिन आने वाले दिनों में यही गरमी जब प्रचंड रूप अख्तियार करेगी, तब आज सुखद लगने वाली गरमी परेशानी का सबब बन जाएगी। गरमी के मौसम में सबसे ज्यादा आगजनी की घटनाएं सामने आती हैं। मौसम गरम होने की वजह से सब चीजें सूख जाती हैं जिसकी वजह से एक हल्की सी चिन्गारी भयानक रूप धारण कर लेती है। वनों और खेतों में आग लगने की घटनाएं सबसे ज्यादा मार्च से लेकर जून महीने में होती हैं। कई बार किसी व्यक्ति की लापरवाही के चलते खेत में लगी आग कफी नुकसानदायक साबित होती है। 

गेहूं की फसल की मार्च और अप्रैल महीने से कटनी शुरू हो जाती है। कई बार खड़ी फसल में आग लग जाती है जिसको रोक पाना किसान और लोगों के वश की बात नहीं रहती है। कई सौ एकड़ फसल जलकर राख हो जाती है। किसान की मेहनत स्वाहा हो जाती है। इस स्थिति से निपटने के लिए सैनी सरकार ने प्रदेश में फायर स्टेशन की संख्या बढ़ाने का फैसला लिया है। शिवालिक क्षेत्र पंचकुला, अंबाला और यमुना नगर जैसे जिलों में नए फायर स्टेशन खोलने की योजना है। 

 वैसे पूरे प्रदेश में अभी तक केवल 89 फायर स्टेशन हैं, जो जनसंख्या और क्षेत्रफल को देखते हुए काफी कम प्रतीत होते हैं। इनमें से भी सबसे ज्यादा शहरी क्षेत्र में फायर स्टेशन हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में इनकी संख्या काफी कम है। प्रदेश में 59 फायर स्टेशन खोले जाएंगे जिसमें से बीस फायर स्टेशन एनसीआर इलाके में खोले जाएंगे। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इन नए फायर स्टेशनों को खोलने की मंजूरी दे चुके हैं। फायर स्टेशन खोलने का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों में लगने वाली आग पर जल्दी  से जल्दी काबू पाना है। 

कई बार यह भी देखने में आया है कि जब किसी खेत या औद्योगिक संस्थान में  आग लग जाती है, तो फायर ब्रिगेड को पहुंचने में काफी देर लगती है। इसका कारण फायर स्टेशन का बहुत दूर होना है। जब फायर ब्रिगेड चलती है, तो रास्ते में पड़ने वाली टूटी फूटी सड़कें, संकरे रास्ते और सड़कों पर हुआ अतिक्रमण उनकी रफ्तार को काफी धीमा कर देते हैं। ऐसी स्थिति जब तक फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंचती है, तब तक फसल या सामान जलकर स्वाहा हो चुका होता है। इस स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने पचास किमी के दायरे में फायर स्टेशन स्थापित करने का फैसला किया है। 

हालांकि यह भी दूरी कुछ ज्यादा ही है। दस-पंद्रह किमी के दायरे में एक फायर स्टेशन होने से आग लगने की घटनाओं पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में धन-जन की हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि आग लगने पर फायर ब्रिगेड जब तक पहुंचती है, तब तक सब कुछ जलकर राख हो चुका होता है।

Monday, February 16, 2026

साबूलाल ने तिरंगा फहराकर ही दम लिया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

देश को आजाद कराने के लिए हजारों युवाओं ने अपना बलिदान दिया है। देश के लगभग हर जिले से लोगों ने अंग्रेजी दासता से मुक्ति के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग किया है। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे साबू लाल जैन वैसखिया। साबूलाल का जन्म 1923 मध्य प्रदेश के सागर जिले के गढ़ा कोटा में हुआ था। 

साबूलाल ने पांचवीं तक पढ़ाई की थी। वह आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके पिता पूरन चंद की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी, इसलिए उनको पढ़ाई छोड़कर कामकाज में लगना पड़ा। बचपन में ही उनके मन में देशभक्ति भावना पैदा हो गई थी। बात 1942 की है। देश में क्रांति की आग धधक रही थी। अंग्रेजों के खिलाफ पूरे देश में रोष था। उन्हीं दिनों सागर में तय किया गया कि कल अंग्रेजी शासन के विरोध में एक जुलूस निकाला जाएगा, जो कलेक्ट्रेट तक जाएगा। 

इस जुलूस में बाबूलाल ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। सैकड़ों आदमियों का यह जुलूस जैसे ही कलेक्ट्रेट पहुंचा, बाबू लाल कलेक्ट्रेट की छत पर चढ़ गए। उस समय नीचे मौजूद पुलिस वालों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन वह छत तक पहुंचने में सफल हो गए। कलेक्ट्रेट पर लगेयूनियन जैक को उतार कर साबूलाल ने नीचे फेंक दिया। इस पर पुलिस वालों ने उन्हें चेतावनी दी, लेकिन इसी बीच वह यूनियन जैक की जगह पर तिरंगा लगाने में सफल हो गए। इतने में पुलिस वालों ने गोलियां चलानी शुरू की। 

एक गोली आकर साबूलाल जैन के सीने में लगी। भारत माता की जयकारे के साथ साबूलाल नीचे आ गिरे। उनकी उसी समय मौत हो गई। साबूलाल के शहीद होने की खबर सुनकर पूरा जिला शोकग्रस्त हो गया। उनकी शवयात्रा के दौरान उमड़ी भारी भीड़ को देखकर ब्रिटिश हुकूमत भी दहल गई।