भारत में भी बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने के लिए नियम बनाने पर विचार किया जा रहा है। बच्चों के ज्यादा मोबाइल या कंप्यूटर पर समय बिताने की वजह से वह अवसाद के शिकार हो रहे हैं। गाजियाबाद के साहिबाबाद इलाके में रहने वाली तीन नाबालिग लड़कियों निशिका, पाखी और प्राची ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। वह कोरियन गेम्स के पीछे दीवानी थीं। इन तीनों बहनों की दीवानगी इस हद तक थी कि वह हर समय कोरियन गेम्स खेलती रहती थीं। इन्होंने तो गूगल के सहारे कोरियन भाषा भी सीख ली थी और आपस में कोरियन भाषा में बातचीत भी करती थीं।
तीन साल पहले फेल हो जाने की वजह से इनकी पढ़ाई छूट गई थी। पंद्रह दिन पहले इनके पिता ने इनका मोबाइल छीन लिया था जिससी वजह से यह तीनों बहनें परेशान थी और अंतत: मंगलवार की देर रात दो बजे तीनों बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने उन अभिभावकों को चिंता में डाल दिया है जिनके बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय आन स्क्रीन बिताते हैं। वैसे कुछ लोगों की आदत होती है, बच्चों को बिजी रखने के लिए वह अपना मोबाइल पकड़ा देते हैं।
वह यह भी जांचने की जहमत नहीं उठाते हैं कि उनके बच्चों ने मोबाइल या कंप्यूटर पर क्या देखा, क्या पढ़ा? गेमिंग की लत ते चलते बच्चों के आत्महत्या कर लेने की बहुत सारी घटनाएं देश और विदेश में हो चुकी हैं। पिछले एक दशक से टॉरगेट देने वाले गेम्स बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। ब्ल्यू वेल चैलेंज, द पास आउट चैलेंज, द सॉल्ट ऐंड आइस चैलेंज, द फायर चैलेंज और द कटिंग चैलेंज जैसे गेम्स बच्चों को टारगेट देकर आत्महत्या करने को प्रेरित करते हैं। वैसे तो ब्ल्यू वेल चैलेंज की शुुरुआत पिछले दो महीने से ही हुई है, लेकिन अब तक इस चैलेंज की वजह से 130 जानें जा चुकी हैं।
द पास आउट चैलेंज को चोकिंग गेम भी कहा जाता है। इसमें बच्चों को अपना गला दबाना होता है। हर साल अमेरिका में 250 से 1000 तक जानें चली जाती हैं। द साल्ट एंड आइस चैलेंज भी बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। द फायर चैलेंज में युवाओं को अपने शरीर पर आग लगाना होता है। द कटिंग चैलेंज गेम में भाग लेने वाले को अपने शरीर पर घाव करना होता है। जैसे-जैसे गेम आगे बढ़ता है, खेल अधिक से अधिक खतरनाक होता जाता है।

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