Monday, February 2, 2026

दारोगा ने संत दादू दयाल से मांगी क्षमा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

संत दादू दयाल को राजस्थान का कबीर कहा जाता है। कहा जाता है कि 1544 ईस्वी में गुजरात के अहमदाबाद में वह साबरमती नदी में बहते हुए एक ब्राह्मण लोधीराम को मिले थे। ब्राह्मण ने ही उनका पालन-पोषण किया था। उन्होंने दादूपंथी संप्रदाय की स्थापना की थी। 

संत दादू के गुरु स्वामी वृद्धानंद यानी बुड्डन बाबा को माना जाता है। वह पैदा भले ही गुजरात में हुए थे, लेकिन उनकी कर्मभूमि राजस्थान ही रही। कहते हैं कि किसी रियासत के एक दारोगा को संत दादू से मिलने और उन्हें अपना गुरु बनाने की इच्छा हुई। वह उस स्थान की ओर चला, जहां दादू रहते थे। दादू का निवास स्थान जंगल के आसपास था। वह जब बहुत आगे चला गया, तो उसने सोचा कि किसी से पूछ लिया जाए कि संत दादू कहां मिलेंगे? उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई। 

उसे एक बुजुर्ग व्यक्ति काम करता मिला। उसने कहा कि ऐ बुड्ढे! संत दादू कहां मिलेंगे। वह व्यक्ति अपने काम में व्यस्त था, तो उसने जवाब नहीं दिया। अब दारोगा को बहुत गुस्सा आया। दारोगा ने उस बुजुर्ग को खूब गालियां सुनाई। उसका मन हुआ कि इस बुड्ढे की खाल खींच ली जाए, लेकिन उसने अपने गुस्से पर काबू किया और किसी दूसरे से दादू के बारे में पूछने की बात सोचकर आगे बढ़ गया। 

कुछ दूर ही एक व्यक्ति आता दिखाई दिया, तो उसने दादू के बारे में पूछा। उस व्यक्ति ने कहा कि मैं भी दादू से मिलने आया हूं, लेकिन वह तो उधर ही मिलेंगे, जिधर से तुम आए हो। वह दोनों उस बुजुर्ग के पास पहुंचे, तो दारोगा बहुत शर्मिंदा हुआ। उसने संत दादू से क्षमा मांगी। दादू ने कहा कि जब कोई मिट्टी का घड़ा खरीदता है, तो वह भी ठोक बजाकर देख लेता है। तुम तो गुरु बनाने निकले थे। यह सुनकर दारोगा दादू के पैरों पर गिर पड़ा और कभी ऐसा व्यवहार न करने की शपथ ली।

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