अशोक मिश्रअरावली की वादियों में बसे फरीदाबाद में 39वें सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प आत्मनिर्भर मेले का आगाज हो गया। मेले में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, सीएम नायब सिंह सैनी सहित भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला दशकों से भारत की सांस्कृतिक आत्मा, कलात्मक उत्कृष्टता और सभ्यतागत निरंतरता का जीवंत प्रतीक रहा है। यह उत्सव वसुधैव कुटुंबकम के उस शाश्वत भारतीय दर्शन को साकार करता है, जिसमें पूरी दुनिया को एक परिवार माना गया है।
यह मेला निर्माण करने वाले हाथों, नवाचार से भरे मस्तिष्कों और हमारी पहचान गढ़ने वाली परंपराओं को एक साझा मंच पर एकत्र करता है। यह सच है कि मेले भारतीय जीवन में सदियों से रचे-बसे हैं। पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक यदि प्राचीन इतिहास को खंगाला जाए,तो पता चलेगा कि भारतीय लोग सदियों से उत्सव प्रेमी रहे हैं। अपनी इसी उत्सव प्रियता के कारण तीन-तीन, चार-चार कोस के दायरे में मेले लगते रहे हैं। इन मेलों और हाट-बाजारों में लोग जहां अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भाग लेते थे, वहीं यह नाते-रिश्तेदारों के मिलन और उनसे जुड़ी जानकारियों के आदान-प्रदान के केंद्र भी हुआ करते थे।
तब सूचना संचार के माध्यम भी आज की तरह नहीं होते थे। गांव से मेले में गया व्यक्ति वहां लोगों से मेल-मुलाकात करता था, लोगों का हालचाल पूछकर संबंधित व्यक्ति तक सूचना पहुंचा देता था। गांवों और शहरों में लगने वाले मेलों के जरिये ही शहरी और ग्रामीण लोग अपनी जरूरतों के सामान खरीदा-बेचा करते थे। कृषि प्रधान देश होने के नाते इन मेलों में आकर किसान अपने उत्पादों को बेचकर नकदी प्राप्त करते थे और फिर उस नकदी से अपनी जरूरतों का सामान, कपड़ा, नमक, मिर्च-मसाले आदि खरीद लेता था।
यह मेले साप्ताहिक भी होते थे और मासिक भी। कुछ तीज-त्यौहारों पर भी मेलों की परंपरा हमारे भारतीय समाज में रही है। जहां तक सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प आत्मनिर्भर मेले की बात है, इस मेले में दूसरे प्रदेशों के लोग भी भाग लेते हैं। वह हरियाणा की समृद्ध संस्कृति, कला और शिल्प आदि से परिचित होते हैं। इस सांस्कृतिक आदान प्रदान से लोगों में प्रेमभाव बढ़ता है।
इससे लोगों में एकता की भावना मजबूत होती है। मेले के आयोजन के पीछे यही उद्देश्य है कि लोग एक दूसरे के सांस्कृतिक विरासत से परिचित हों, एक दूसरे की उन्नति में सहायक हों। वैसे तो सूरजकुंड का इतिहास दसवीं शताब्दी से जुड़ा है। तोमर वंश के शासक सूरजपाल ने इस कुंड का निर्माण करवाया था। पिछले लगभग चार दशक से यहां शिल्प मेला आयोजित किया जा रहा है।

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