बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
हमारे देश को ब्रिटिश दासता से मुक्ति पाने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। हजारों युवकों ने देश की स्वाधीनता संग्राम के लिए अपना बलिदान दिया। इन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे अशफाक उल्ला खां। अशफाक का जन्म शाहजहांपुर के एक पठान खानदान में हुआ था। इनके परिवार में सभी लोग सरकारी नौकरी में थे। इनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था, लेकिन बचपन से ही अशफाक को ब्रिटिश दासता कचोटती रहती थी। वह उन लोगों की सहायता करने में आगे रहते थे जो लोग गुलामी से मुक्त होने के प्रयास में लगे हुए थे।इनकी मां मजहूरुन्निशाँ बेगम को बहुत खुशी हुई, लेकिन उन्हें डर भी था कि कहीं यह पुलिस के हाथों गिरफ्तार हुआ, तो ऐसा न हो कि यह अपने साथियों के बारे में बता दे। एक दिन उन्होंने अपने बेटे से कहा कि मैं तुम्हारी परीक्षा लूंगी। उनकी मां मजहूरुन्निशाँ बेगम ने एक दीपक जला दिया और उसकी लौ पर अशफाक को हाथ रखने को कहा।
लौ पर हाथ रखने के बाद जब मांस जलने लगा और अशफाक ने उफ तक नहीं किया, तो उनकी मां ने उन्हें गले से लगा लिया। बाद में अशफाक क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के संपर्कमें आए। क्रांतिकारियों की एक बैठक शाहजहांपुर में हुई जिसमें तय किया गया कि क्रांति को आगे बढ़ाने अंग्रेजी खजाना लूट लिया जाए। 9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन से जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया।
बाद में ज्यादातर क्रांतिकारी पकड़े गए। 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद की जेल में क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खां को फांसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय इतिहास में अमर हो गया।

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