बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
कहा जाता है कि बुरी आदतें बहुत आसानी से ग्रहण की जा सकती है, लेकिन अच्छी आदतों को ग्रहण करने में समय भी लगता है और परेशानी भी होती है। अच्छी आदतें बड़ी जल्दी छूट जाती हैं, लेकिन बुरी आदतों से छुटकारा बहुत मुश्किल से मिलता है। यही जीवन का कड़वा सच है।
एक बार की बात है। एक धनी व्यापारी का पुत्र बुरी संगत में रहकर बिगड़ गया था। उसके पिता ने बड़ी ईमानदारी और मेहनत से काफी पैसा कमाया था। उसने जीवन भर लोगों की सहायता भी की थी। अपने बिगड़े हुए पुत्र को सुधारने की बहुत ज्यादा कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुआ। अपने बेटे को लेकर वह काफी चिंतित रहने लगा।
एक दिन उसने सुना कि नगर में एक महात्मा आए हैं जो लोगों की समस्याओं का समाधान करते हैं। व्यापारी एक दिन जाकर महात्मा से मिला। उनसे अपनी समस्या बताई। महात्मा ने कहा कि कल अपने पुत्र को अमुक बाग में भेज दो। उसे समझाने का प्रयास करूंगा। अगले दिन व्यापारी ने अपने पुत्र को बताए गए बाग में भेज दिया। महात्मा से जाकर व्यापारी पुत्र मिला। दोनों बाग में टहलने लगे। महात्मा ने एक छोटे पौधे की ओर इशारा करते हुए कहा कि इसे उखाड़ दो। व्यापारी पुत्र ने उस पौधे को बड़ी आसानी से एक झटके में उखाड़ दिया। थोड़ी दूर जाने पर महात्मा ने थोड़ा बड़े पौधे को उखाड़ने को कहा। उसे भी उसने उखाड़ दिया। बाद में थोड़ा बड़ा पौधा दिया, तो उसे उखाड़ने में थोड़ी मेहनत लगी, लेकिन उसे भी उखाड़ दिया। आखिर में महात्मा ने पेड़ को उखाड़ने को कहा, तो वह पेड़ को उखाड़ नहीं पाया। तब महात्मा ने कहा कि बुरी आदतों की भी यही स्थिति होती है। जब बुराई जीवन में अपनी जड़ें जमा लेंगी, तो उन्हें उखाड़ना मुश्किल हो जाएगा। यह सुनने के बाद व्यापारी पुत्र की आंख खुल गई।

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