अशोक मिश्रबेरोजगारी को छोड़कर देश में रहने वाले नागरिकों की दो प्रमुख समस्याएं हैं। पहली स्वास्थ्य और दूसरा शिक्षा। देश की बहुसंख्यक आबादी को स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का दंश झेलना पड़ता है। वहीं अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर भी उन्हें चिंतित होना पड़ता है। नागरिकों की शिक्षा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए सैनी सरकार ने सीएमश्री स्कूलों को खोलने की योजना तैयार की है।
प्रदेश में पहले से ही 252 पीएमश्री स्कूल संचालित हैं। फिलहाल तो योजना के मुताबिक सीएमश्री स्कूल नए नहीं खोले जाएंगे, बल्कि जो सरकारी विद्यालय बंद हो गए हैं या कुछ सरकारी स्कूलों को ही अपग्रेड करके उन्हें सीएमश्री स्कूल बनाया जाएगा। इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में से 25 प्रतिशत गरीब छात्रों को मौका दिया जाएगा। इन्हें मुफ्त शिक्षा दी जाएगी। बाकी 75 प्रतिशत बच्चों से भी कम फीस ली जाएगी। वैसे यह योजना तो बहुत अच्छी है।
यदि सरकारी स्कूलों को अपग्रेड कर दिया जाए, उनमें सुविधाएं बढ़ा दी जाएं, तो गरीब बच्चों को यहां पढ़ने की सुविधा मिलने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा। गरीब बच्चों को वैसे भी शिक्षा हासिल करने में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा का स्तर उठाने के लिए प्रदेश सरकार ने स्कूलों में नौ हजार से अधिक कमरे बनवाकर ढांचागत सुधार किए हैं, तो वहीं 'सीएम शाइन' जैसी पहल भी शुरू की गई है। इसके बावजूद सैनी सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं।
राज्य के सरकारी स्कूलों में 40 हजार से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं। इन पदों पर भर्तियां की जाएं, तो बच्चों की शिक्षा पूरी हो सकेगी। लगभग 298 स्कूलों में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है और 1,051 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर कैसा होगा, इसको समझा जा सकता है। यही नहीं, विभिन्न कक्षाओं के परिणाम शून्य रहने जैसी गंभीर चुनौतियां भी मौजूद हैं। पिछले सात वर्षों में 400 स्कूल मर्ज या बंद हुए हैं और लगभग पांच हजार कंप्यूटर लैब में इंटरनेट नहीं है। वैसे तो प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में सभी सुविधाएं होने का दावा करती है, लेकिन इस बात में आंशिक सच्चाई है।
स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं की 18 प्रतिशत और शौचालयों की एक से दो प्रतिशत तक कमी है। जिन स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है, उन स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की परेशानी का समझा जा सकता है। अलग से लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था न होने की वजह से लड़कियां स्कूल आने से कतराने लगती हैं। कुछ लड़कियां तो स्कूल आना ही छोड़ देती हैं। कई स्कूलों की इमारतें काफी पुरानी हो चुकी हैं। ऐसे स्कूलों में हादसे का डर बना रहता है। बरसात के दिनों में यह डर और भी बढ़ जाता है।

No comments:
Post a Comment