अशोक मिश्रफरीदाबाद में चल रहे सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले के समापन में बस दो दिन ही बचे हैं। पिछले एक पखवाड़े से चल रहा यह मेला दुनिया का सबसे बड़ा हस्तशिल्प मेला माना जाता है। इस मेले में दुनिया भर से कला प्रेमी आते हैं। यह मेला भारत ही नहीं, दुनिया भर की संस्कृतियों का संगम जैसा प्रतीत होता है। दुनिया भर के लोग जब किसी जगह पहुंचते हैं, तो वह अपनी सभ्यता और संस्कृति की छाप तो छोड़ते ही हैं, जिस जगह गए हुए होते हैं, उस स्थान की भी सभ्यता और संस्कृति से परिचित होते हैं।
यही मेले का उद्देश्य भी होता है। सूरजकुंड मेले का भी उद्देश्य यही है। पिछले 39 साल से हर साल सूरजकुंड में लगने वाले मेले की ख्याति का कारण भी यही है। युवा पीढ़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से परिचित हो रहे हैं। सच कहा जाए, तो हमारे देश में मेले की अवधारणा सदियों पुरानी है। प्राचीनकाल में भारतीय क्षेत्र में जितनी भी सभ्यताएं थीं, उनमें मेले प्रमुख स्थान रखते थे।
कुछ पुरातत्वविदों का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी मेले लगाए जाते थे। इन मेलों में जहां लोग आमोद-प्रमोद के लिए आते थे, वहीं वह अपनी दैनिक जरूरतों की वस्तुएं भी खरीदते थे। मेले ठेले दैनिक जरूरतों की पूर्ति का माध्यम होने के साथ-साथ सूचनाओं के भी केंद्र हुआ करते थे। इन मेलों में आने वाले लोग अपने रिश्तेदारों से भी मिल लिया करते थे। जो लोग व्यस्तता के चलते अपने परिजनों से नहीं मिल पाते थे, वह मेले में जरूर जाते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि उनके परिजन और रिश्तेदार मेले में जरूर आएंगे। उन दिनों वैवाहिक रिश्ते भी बहुत ज्यादा दूर नहीं किए जाते थे ताकि जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की मदद के लिए जल्दी से जल्दी पहुंचा जा सके। चार-पांच किलोमीटर के ही दायरे में बहन, बेटियों की शादियां की जाती थीं। इसका कारण यह था कि उन दिनों आवागमन के साधन सर्वसुलभ नहीं थे।
इस वजह से दूरदराज के इलाके में शादियां नहीं की जाती थीं। ऐसी स्थिति यह मेले एक तरह से एक दूसरे से मिलने के साधन हुआ करते थे। दक्षिण से लेकर उत्तर तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अगर प्राचीन इतिहास खंगाला जाए, तो मेलों की गाथाएं जरूर मिलेंगी। लेकिन आज जब हम तकनीकी मामलों में बहुत आगे बढ़ चुके हैं, तो मेलों की महत्ता लगातार घटती जा रही है।
अब साप्ताहिक मेलों का भी आयोजन लगभग बंद हो चुका है। दैनिक जरूरतों की पूर्ति करने वाले मेलों की उपयोगिता खत्म सी होने लगी है क्योंकि मेलों का स्थान अब बड़े-बड़े बाजारों और आनलाइन कंपनियों ने ले लिया है। अब तो बाजार भी जाने की जरूरत नहीं रह गई है। मोबाइल के एक क्लिक पर जरूरत की सारी वस्तुएं हाजिर हो जाती हैं। मनोरंजन के इतने साधन हो गए हैं कि अब मेलों के माध्यम से मिलने वाला मनोरंजन फीका लगने लगा है।

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