बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
कलकत्ता के जमींदार परिवार में 1913 को जन्मी बिभा चौधरी ने अपना पूरा जीवन विज्ञान को समर्पित कर दिया था। बिभा के पिता बाकूं बिहारी चौधरी और मां उर्मिला ने ब्रह्म समाज की सदस्यता ग्रहण कर ली थी जिसकी वजह से हिंदू समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया था। उनके पिता एक चिकित्सक थे। उनके माता-पिता यह मानते थे कि लड़कियों को भी पढ़ने-लिखने का पूरा अधिकार है।
बिभा की बचपन से ही विज्ञान में काफी रुचि थी। सन 1936 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में एमएससी करने वाली वह अकेली छात्रा थीं। पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद वह उसी भौतिकी विभाग में प्रोफेसर देवेन्द्र मोहन बसु की देखरेख में शोध करने के लिए जुड़ गईं। सन 1938 से 1942 तक दार्जिलिंग की ऊंची पहाड़ियों पर कास्मिक किरणों पर अध्ययन किया। उन्होंने मेसॉन नामक कण की पहचान की।
इससे जुड़े तीन शोधपत्र नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुए।इसके बात तो बिभा चौधरी का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हो गया। इसके बाद कई अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलनों में भाग लेने का मौका मिला। वह भारत की प्रमुख महिला वैज्ञानिक के रूप में पहचानी जाने लगी थीं। उन्होंने वर्ष 1955 में इटली में पीसा में आयोजित मूल अणुओं पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी भाग लिया।
विज्ञान के क्षेत्र में बिभा चौधरी ने बहुत अधिक योगदान दिया। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने 2019 में पृथ्वी से 340 प्रकाश वर्ष दूर एक तारे का नाम बिभा रखा है। यह किसी वैज्ञानिक के लिए सबसे बड़े सम्मान की बात है। आजीवन शोध कार्य में ही लगी रहने वाली बिभा चौधरी ने विवाह नहीं किया। 2 जून 1991 में कोलकाता में ही इस महान महिला वैज्ञानिक ने 77 साल की आयु में दुनिया छोड़ दी।

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