Wednesday, February 11, 2026

आसानी से हासिल नहीं होती उच्चता


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

उच्चता या श्रेष्ठता बहुत आसानी से हासिल नहीं होती है। इसके लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। समय के साथ-साथ लगन भी बहुत जरूरी होती है। यदि कोई व्यक्ति सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा है, तो इसका यही मतलब है कि उसने पूरा सफर तय किया है। बिना सफर तय किए कोई उस स्थान तक नहीं पहुंच सकता है।  इस संदर्भ में एक शिष्य की कथा है। किसी राज्य में एक गुरुकुल संचालित किया जा रहा था। 

गुरु का एक शिष्य नवदीक्षित हुआ था। अपने गुरु की ख्याति देखकर उसके मन भी आया कि मैं भी क्यों न एक गुरुकुल खोल लूं। मैं भी लोगों को दीक्षित करूं। लोग मुझे भी सम्मान देंगे। एक दिन उसने अपने गुरु के सामने अपने मन की बात को रखते हुए कहा कि गुरुदेव! गुरुदेव, मेरा भी मन करता है कि आपकी ही तरह मेरे भी कई शिष्य हों और सभी मुझे भी आप जैसा ही मान-सम्मान दें। 

अपने शिष्य की बात सुनकर गुरु मंद मंद मुस्कुराने लगे। वह समझ गए कि शिष्य के मन में ख्याति की लालसा पैदा हो गई है। गुरु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा- कई वर्षों की लंबी साधना के पश्चात अपनी योग्यता और विद्वता के बलबूते पर तुम्हें भी एक दिन यह सब प्राप्त हो सकता है। शिष्य ने कहा- इतने वर्षों बाद क्यों? मैं अभी ही अपने शिष्यों को दीक्षा क्यों नहीं दे सकता? गुरु ने अपने शिष्य को तख्त से उतरकर नीचे खड़ा होने को कहा। फिर स्वयं तख्त पर खड़े होकर कहा- जरा मुझे ऊपर वाले तख्त पर पहुंचा दो। 

शिष्य विचार में पड़ गया। फिर बोला- गुरुदेव! भला मैं खुद नीचे खड़ा हूं, फिर आपको ऊपर कैसे पहुंचा सकता हूं? इसके लिए तो पहले खुद मुझे ही ऊपर आना होगा। गुरु ने मुस्कुराकर कहा- ठीक इसी प्रकार यदि तुम किसी को अपना शिष्य बनाकर ऊपर उठाना चाहते हो, तो तुम्हारा उच्च स्तर पर होना भी आवश्यक है। शिष्य गुरु का आशय समझ गया। वह उनके चरणों में गिर गया। 

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