बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
स्वामी हरिदास वृंदावन में रहते थे। वह कवि, संगीतकार और उच्चकोटि के कृष्ण उपासक थे। उनको सखी संप्रदाय का उपासक माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि वह ललिता सखी के अवतार थे। स्वामी हरिदास के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती है। बस, इतना पता चलता है कि इनका जन्म 1478 में हुआ था। प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे।तानसेन अकबर के दरबार में थे। अकबर को तानसेन का गायन बहुत प्रिय था, लेकिन उसने तानसेन के गुरु हरिदास के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। अकबर जानता था कि गुरु हरिदास उसके सामने कभी नहीं गाएंगे। वह आगरा भी उसके बुलाने पर नहीं आएंगे। एक बार किसी संदर्भ में गुरु हरिदास की चर्चा चल रही थी, तो अकबर ने तानसेन के सामने हरिदास का गायन सुनने की इच्छा जाहिर की।
तानसेन अपने गुरु के स्वभाव से भी परिचित थे। वह सोचने लगे कि अकबर की इच्छा कैसे पूरी की जाए। उन्होंने अकबर से कहा कि आपकी इच्छा जरूर पूरी हो सकती है, लेकिन आपको एक साधारण व्यक्ति की तरह वेष बदलकर मेरे साथ चलना होगा। एक दिन दोनों लोग वृंदावन पहुंचे। अकबर गुरु जी की कुटिया से बाहर खड़े हो गए। तानसेन अंदर गए और गुरु के समक्ष बैठकर गाने लगे।
उन्होंने एक पद जानबूझकर गलत गाया, तो हरिदास ने वाद्य यंत्र उठाकर खुद गाना शुरू किया। हरिदास का गायन सुनकर अकबर चकित रह गया। लौटते समय अकबर ने तानसेन से कहा कि गुरु जी के गायन में जो बात है, वह तुम्हारे गायन में नहीं है। तानसेन ने कहा कि मैं एक सम्राट के लिए गाता हूं। मेरे गुरु जी पूरी दुनिया के मालिक के लिए गाते हैं। यह बात सुनकर अकबर ने अपनी सहमति से सिर हिला दिया।

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