बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
मन की शांति, सुख और दुख जैसी भावनाएं प्रत्येक मनुष्य में पैदा होती हैं। लेकिन अगर किसी को सुख की अनुभूति हो रही है, तो वह किसी दूसरे के काम आने वाली नहीं है। यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति प्रसन्न है, तो उसकी अनुभूति उस व्यक्ति के माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी और बेटा-बेटी को नहीं होगी।हर व्यक्ति को अपना सुख-दुख खुद ही भोगना पड़ेगा। यही प्रकृति का नियम है। एक समय की बात है। एक सेठ किसी नगर में रहता था। उसने अपने जीवन में काफी धन कमाया था। उसका परिवार भी काफी सभ्य और सुशील था। लेकिन पता नहीं क्यों, उस सेठ के मन में शांति नहीं थी।
वह हर समय परेशान रहता था। वह सोचता रहता था कि उसके मन को शांति कैसे मिले? एक दिन उसने सुना कि उसके शहर में एक साधु आए हैं। वह लोगों की समस्याओं का निराकरण करते हैं। सेठ भी अपनी समस्या को लेकर साधु के पास गया। साधु ने उसकी परेशानी सुनकर अगले दिन आने को कहा। सेठ अगले दिन साधु के पास पहुंचा, तो साधु ने कड़कती धूप में बिठा दिया और खुद पेड़ की छांव में बैठ गया।
तीन चार घंटे बाद साधु ने अगले दिन दोबारा आने को कहा। अगले दिन सेठ को तो साधु ने भूखा-प्यासा रखा और खुद तरह-तरह के पकवान खाता रहा। साधु ने तीसरे दिन उसे आने को कहा। तीसरे दिन सेठ गुस्से से तमतमाता हुआ साधु के पास पहुंचा और बोला-मैं आपके पास अपनी समस्या का हल पाने आया था, आप तो मुझ पर अत्याचार कर रहे हैं।
साधु ने कहा कि मैं आपको यही समझाना चाहता था कि आपको अपनी समस्या खुद ही सुलझानी होगी। आपको ऐसे कर्म करने होंगे जिससे आपके मन को शांति मिले। सेठ की समझ में अब बात आ गई थी।


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