इंसान अब इतना पतित हो गया है कि वह मासूम बच्चियों के साथ दुराचार करने में भी नहीं हिचक रहा है। गुरुवार को ही उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पचास से अधिक बच्चों के यौन शोषण और उनकी वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डालने के दोषी पति-पत्नी को फांसी की सजा सुनाई गई है। बांदा जिला कोर्ट के जज तो इन हैवानों की करतूत से इतना नाराज थे कि उन्होंने कहा, इन दरिंदों को तब तक फांसी पर लटाए रखो, जब तक इनकी मौत न हो जाए। पति रामभवन सिंचाई विभाग में इंजीनियर था और उसकी पत्नी दुर्गावती हाउस वाइफ। सीबीआई ने इन दोनों को 18 नवंबर 2020 को गिरफ्तार किया था।
इन दोनों पर बच्चों का यौन शोषण करने, अश्लील वीडियो बनाकर डार्क वेब पर बेचने का आरोप था। बताया जाता है कि पचास से अधिक बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए थे। ऐसे लोगों को फांसी की सजा ही मिलनी चाहिए थी। इन दोनों दोषियों ने बच्चों का जीवन नर्क बना दिया है। जितने बच्चे इनकी दरिंदगी का शिकार हुए हैं, वह आजीवन इस घटना को भूल नहीं पाएंगे। बलात्कार और दुष्कर्म का दंश पीड़ितों को आजीवन सालता रहेगा। भारतीय समाज में बलात्कार का शिकार हुए लोग आजीवन सुख की नींद नहीं सो पाते हैं।
यदि किसी पुरुष के साथ दुराचार होता है, तो वह समाज में अपना मुंह दिखाने के काबिल नहीं माना जाता है। ऐसा ही महिलाओं के साथ भी होता है। समाज और रिश्तेदार तो सबसे पहले पीड़िता को ही दोष देने लगते हैं। वह यह समझने को तैयार ही नहीं होते हैं कि पीड़िता किस परेशानी के दौर से गुजर रही है। उसकी मनस्थिति क्या है? पीड़िता के परिजन भी पहले मामले को दबाने का प्रयास करते हैं, ताकि समाज में उन्हें नीचा न देखना पड़े। वहीं दूसरी ओर बलात्कार करने वाला समाज में अपना सिर उठाकर चलता है, मानो उसने कोई बहादुरी का काम किया हो। समाज की यह दोहरी मानसिकता पीड़िता को और भी परेशान करती है।
यहि किसी को पीड़िता के बारे में पता चल जाए, तो लोग उसे सहज उपलब्ध मान लेते हैं। कई बार तो पीड़िता को उन लोगों की भी हैवानियत का शिकार होना पड़ता है जिससे उसे सहायता की उम्मीद होती है। जब तक समाज अपनी दोहरी मानसिकता से मुक्त नहीं होता, तब तक दुष्कर्म पीड़िताओं को सहानुभूति और न्याय नहीं मिल सकता है। पीड़िताएं सहानुभूति और सम्मान की हकदार हैं, घृणा की नहीं।

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