बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद का महामंत्री यानी अमात्य था राक्षस। उसका नाम राक्षस क्यों पड़ा, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिलती है। कहा जाता है कि वह राज्य को सुरक्षित और संपन्न बनाने के लिए कठोर फैसले लेता था, शायद इसीलिए उसको लोग राक्षस कहने लगे थे। इसके चलते उसका वास्तविक नाम अज्ञात रहा और उसकी उपाधि ही उसका नाम हो गया।धनानंद के आमात्य राक्षस के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी विशाखदत्त के संस्कृत भाषा में लिखे गए नाटक मुद्राराक्षस में मिलती है। यह नाटक चौथी से छठवीं शताब्दी के बीच गुप्त काल में लिखा गया माना जाता है। नाटक के अनुसार, जब चाणक्य के संरक्षण में चंद्रगुप्त मौर्य ने धनानंद को पराजित कर दिया, तो चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बना दिया।
धनानंद के मुख्य सलाहकार और प्रधान मंत्री राक्षस को चंद्रगुप्त पकड़ नहीं पाया था। अमात्य राक्षस ने दूसरे राजाओं के सहयोग से चंद्रगुप्त के खिलाफ कई अभियान चलाए। लेकिन वह चाणक्य की चतुराई की वजह से सफल नहीं हुआ। चाणक्य भी राक्षस को अपनी ओर मिलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने राक्षस के परममित्र सेठ चंदन दास को गिरफ्तार करवा लिया। चाणक्य ने घोषणा की कि कुछ दिनों बाद चंदनदास को मृत्यु दंड दिया जाएगा। जब यह जानकारी राक्षस को मिली, तो वह विचलित हो गया।
उसने चंद्रगुप्त के सामने उपस्थित होकर चंदन दास को छोड़ देने का आग्रह किया। चाणक्य ने कहा कि इसके बदले तुम्हें चंद्रगुप्त के लिए कार्य करना होगा। राक्षस ने कहा कि मैं शत्रुपक्ष का अमात्य रहा हूं, आपका मुझ पर विश्वास कैसे होगा? चाणक्य ने कहा कि तुम्हारा कार्य ही विश्वास पैदा करेगा। इसके बाद राक्षस ने अधीनता स्वीकार कर ली।

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