Wednesday, February 18, 2026

ऊंच-नीच की भावना देश सेवा में बाधक


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सेवा करने के लिए मन में लगन और जोश जरूर होना चाहिए। देश सेवा के लिए तो बलिदान होने की भावना बहुत जरूरी है। जब तक देश को सर्वोच्च समझकर आत्मोत्सर्ग की भावना नहीं होगी, सच्ची देश सेवा नहीं की जा सकती है। देशवासियों को एक समान समझना भी देश सेवा की अनिवार्य शर्त है। ऊंची-नीच, अमीर गरीब की भावना देश सेवा में सबसे बड़ी बाधक है। एक बार की बात है। 

साबरमती आश्रम में गांधी जी लोगों की सेवा खुद किया करते थे। वह अपना काम तो खुद करते ही थे, लोगों को भी प्रेरित करते थे कि वह अपना काम खुद करें और सादगी से जीवन यापन करें। एक दिन की बात है। एक विदेशी युवक साबरमती आश्रम में आया और गांधी जी से बोला कि उसने उच्च शिक्षा हासिल की है। वह चाहता है कि साबरमती आश्रम में रहकर लोगों की सेवा करे। 

गांधी जी ने उसके लहजे से जान लिया कि युवक को अपनी उच्च शिक्षा और रहन सहन पर बहुत अभिमान है। उन्होंने युवक से कहा कि तुम गेहूं बीनने का काम करो। युवक को गांधी जी की यह बात अच्छी तो नहीं लगी, लेकिन वह गेहूं बीनने लगा। थोड़ी ही देर में वह उस काम से उकता गया। उसने गांधी जी के पास जाकर कहा कि थोड़ा जल्दी खा लेने की मेरी आदत है। इसलिए मैं खाना खाने की इजाजत चाहता हूं। 

गांधी जी ने कहा कि अभी थोड़ी देर में आश्रमवासियों के लिए भोजन तैयार हो जाएगा, तब सबके साथ बैठकर खाना खा लेना। युवक चुप रह गया। तब गांधी जी ने कहा कि तुम देश की सेवा करना चाहते हो, यह अच्छी बात है, लेकिन जब तक तुम अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को कमतर समझोगे, तो देश सेवा कैसे कर पाओगे। सबको अपने ही समान समझना चाहिए।

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