रविवार होने की वजह से अंबाला के जैन स्कूल में ड्राइवर का काम करने वाला सोनू भी अपने दोस्त जस्सा के साथ वहां आया हुआ था। पार्किंग एरिया में सात-आठ युवकों ने जस्सा को घेर लिया और बहस करने लगे। यह बहस थोड़ी देर में मारपीट में बदल गई। मारपीट होता देख सोनू और भूपेंद्र बीच-बचाव करने आए। हमलावरों ने सोनू को घेर कर चाकू से हमला किया। पीठ में चाकू घोंप देने से सोनू की तत्काल मौत हो गई और भूपेंद्र गंभीर घायल हो गया। हमलावर भाग खड़े हुए।
लोगों का अनुमान है कि किसी छोटी-मोटी बात को लेकर हमलावरों में से किसी एक के साथ जस्सा की बहस हुई थी। इस बहस ने ही बात में विकराल रूप धारण कर लिया और बात हत्या तक पहुंच गई। पिछले कुछ दशकों से युवा पीढ़ी लगातार उग्र होती जा रही है। मामूली बात पर हत्या कर देने, आत्महत्या कर लेने या फिर मारपीट कर लेने जैसी घटनाएं अब सामान्य रूप से देखने को मिल रही हैं। इसके कई कारण भी बताए जाते हैं। जब से एकल परिवार का चलन शुरू हुआ है और माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, ऐसी स्थिति में वह अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।
कम से कम आठ-दस घंटे एकाकी जीवन बिताने वाले बच्चों के मन में अपने परिजनों को लेकर एक आक्रोश पनपने लगता है। ऐसी स्थिति में वह मनमानी करने पर उतारू हो जाते हैं। माता-पिता यदि उनके किसी काम का विरोध करते हैं, तो मन में पहले से ही संचित आक्रोश फूट पड़ता है और वह अपराध कर बैठते हैं। पढ़ाई लिखाई करने के बाद भी जब युवाओं को नौकरी नहीं मिलती है अथवा माता-पिता कोई स्वरोजगार करवा पाने में सक्षम नहीं होते हैं, तो वह अपराध की ओर मुड़ जाते हैं। अपना खर्च चलाने के लिए वह लूटपाट, हत्या, चोरी-डकैती जैसे अपराध में लिप्त हो जाते हैं।
मोबाइल पर खेले जाने वाले कुछ गेम्स भी युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रहे हैं। वह दिमाग को इतना कुंठित कर देते हैं कि वह सही गलत का फैसला नहीं कर पाते हैं और अपराध कर बैठते हैं। अशिक्षा, गरीबी, बेकारी जैसी समस्याओं ने युवाओं को इतना निराश कर दिया है कि वह अपने को असहाय समझने लगे हैं। इस असहायता से उपजे क्रोध के कारण भी समाज में आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं।
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