बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
देश को आजाद कराने के लिए हजारों युवकों ने अपना बलिदान दिया। किसी ने अंग्रेजों की गोलियों का सामना किया, किसी ने फांसी का फंदा चूमा, तो किसी ने जेल में अगणित यातनाएं सही। इतने बलिदान के बाद ही देश स्वतंत्र हुआ। बंगाल में स्वाधीनता संग्राम के दौरान जो क्रांतिकारी किसी कारणवश पकड़े जाते थे, उन पर अंग्रेज बहुत जुल्म ढाते थे। कोलकाता में ऐसा ही एक पुलिस इंस्पेक्टर था नृपेंद्र नाथ घोष।वह क्रांतिकारियों से बहुत घृणा करता था। इससे पहले क्रांतिकारी कोलकाता के हेड कांस्टेबल हरिपद डे को मौत के घाट उतार चुके थे। नृपेन्द्रनाथ को पता लग गया था कि क्रांतिकारी अब उसके पीछे पड़ गये हैं। वह बहुत भयभीत हो गया था। अब वह चौकन्ना हो गया था। तब क्रांतिकारी प्रतुल गांगुली, रवि सेन, निर्मल राय तथा निर्मलकांत राय ने तय किया कि थोड़े दिन बीतने दिया जाए।
कुछ समय बीतने पर जब वह असावधान हो जाएगा, तब उसका शिकार करना ठीक रहेगा। 19 जनवरी, 1944 को हर दिन की तरह इंस्पेक्टर नृपेन्द्रनाथ ने अपना काम निबटाया। उसने अपने कार्यालय से निकलकर घर जाने के लिए ट्राम पकड़ी। ट्राम रात के पौने आठ बजे ग्रे स्ट्रीट और शोभा बाजार चौराहे पर रुकी। नृपेन्द्रनाथ आराम से उतरकर अपने घर की ओर चल दिया।
क्रांतिकारी निर्मलकांत राय उस दिन उसका पीछा कर रहे थे। वह नृपेन्द्रनाथ के सामने आए और एक गोली उसके सिर में दाग दी। नृपेन्द्रनाथ धरती पर गिर पड़ा, तो निर्मलराय ने दूसरी गोली उसके सीने पर मारी। नृपेन्द्रनाथ की वहीं मृत्यु हो गयी। निर्मलकांत शोर मचाने लगे, कोई हमारे साहब को बचाओ, हत्यारे का पकड़ो। फिर वह भीड़ में स्वयं छिपाया और फरार हो गए। आगे चलकर पुलिस ने संदेह में एक निर्दोष युवक को पकड़ा, उसे मारा-पीटा, लेकिन सबूत न होने से छूट गया।

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