बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
प्राचीनकाल में एक ऋषि हुए हैं उद्दालक। इनके पुत्र का नाम श्वेतकेतु था। माना जाता है कि विवाह नामक संस्था की शुरुआत श्वेतकेतु ने किया था। उद्दालक का एक शिष्य था कहोड़। उन्होंने अपनी पुत्री सुजाता की शादी कहोड़ से कर दी थी। कहोड़ को संपूर्ण वेदों का ज्ञान था।एक दिन कहोड़ वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, तो उनकी पत्नी सुजाता के गर्भ से आवाज आई कि पिता जी, आप वेद मंत्र का गलत उच्चारण कर रहे हैं। इस बात से नाराज कहोड़ ने अपने पुत्र को आठ जगह से टेढ़ा होने का शाप दिया। उन दिनों मिथिलापुर में ह्रस्वरोमा के पुत्र सीरध्वज यानी जनक का शासन था।
कहते हैं कि अष्टावक्र भी अपने पिता कहोड़ के समान काफी विद्वान थे। अष्टावक्र के पिता को राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ में एक बंदी ने हरा दिया था जिसकी वजह से वह कारागार में बंद थे। अष्टावक्र अपने मामा श्वेतकेतु के साथ जब राजा जनक के दरबार में पहुंचे, तो उनको देखकर राजा जनक के सभी सभासद हंसने लगे। यह देखकर अष्टावक्र भी बहुत जोर से हंसने लगे।
हालांकि उस समय अष्टावक्र और श्वेतकेतु की उम्र बहुत कम थी। मामा-भांजे दोनों किशोर ही थे। राजा जनक ने गंभीरता से अष्टावक्र से पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैं? अष्टावक्र ने राजा जनक से पूछा कि महाराज! आप बता सकते हैं कि आपके दरबारी क्यों हंस रहे थे।
लोग कहते थे कि आपके दरबार में विद्वान रहते हैं, लेकिन यह तो निरे मूर्ख हैं। तब एक दरबारी ने कहा कि हम आपके शरीर को देखकर हंस रहे थे। अष्टावक्र ने कहा कि घड़े पर हंस रहे थे या कुम्हार पर? यह सुनकर सारे चुप रह गए। सभी जान गए कि दोनों बच्चे विद्वान हैं। बाद में बंदी से शास्त्रार्थ करके अष्टावक्र अपने पिता को आजाद करा लाए।

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