Wednesday, May 6, 2026

पर्यावरण बचाना है तो कंक्रीट का जंगल उगाने से बचना होगा

अशोक मिश्र

पंचकूला में सर्व समाज द्वारा आयोजित जनसभा में भाजपा के मेयर प्रत्याशी श्याम लाल बंसल के पक्ष में वोट का आह्वान करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हमारा लक्ष्य कंक्रीट के जंगल बनाना नहीं, बल्कि शहर को स्वच्छ बनाना है। सीएम सैनी ने बात तो पते की कही है, लेकिन क्या वास्तव में हरियाणा में ऐसा हो रहा है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि शहरों को हमेशा स्वच्छ रहना चाहिए। स्वच्छ शहर में रहने वाले व्यक्ति भी शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। 

हवा, पानी भी प्रदूषणरहित रहती है। इसके लिए जरूरी है कि शहरों की नालियां, सड़कें और गलियां स्वच्छ रहें। इधर उधर कूड़ा करकट न फेंके जाएं। स्थानीय निकायों और निजी संस्थाएं हर गली मोहल्ले से कचरा एकत्रित करके उसका समुचित निस्तारण करें। लोग नियत स्थान पर ही कूड़ा-करकट फेंकें। प्लास्टिक सहित अन्य कूड़ा करकट को आग न लगाया जाए। यह बात सीएम सैनी की बिल्कुल सही है, लेकिन जहां तक कंक्रीट का जंगल उगाने की बात है। राज्य में हर साल कंक्रीट के जंगल उगाए जा रहे हैं। 

कालोनियों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें कुछ वैध होती हैं, तो कुछ अवैध। सीमेंट की सड़कें बनाई जा रही हैं। खेती योग्य जमीनों पर कांप्लेक्स और कालोनियां बसाई जा रही हैं। राज्य में खेती और वन क्षेत्र का रकबा दिनों दिन कम होता जा रहा है। कालोनियों, घरों और सड़कों का रकबा बढ़ता जा रहा है। उद्योग-धंधे लगाए जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में उद्योग-धंधे नहीं लगने चाहिए। 

बिल्कुल लगने चाहिए, लेकिन वह इस तरह लगाए जाएं ताकि हमारे पर्यावरण को कतई नुकसान न पहुंचे। कारखाने और उद्योग मानकों पर खरे उतरने वाले होने चाहिए। इन उद्योगों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के निस्तारण और नियंत्रण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। उद्योगों से निकला रासायनिक कचरा नदियों और नालों में बहाया जाता है जिसकी वजह से नदियां प्रदूषित हो रही हैं। जिन स्थानों पर कालोनियां, घर, बाजार या उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं, उन स्थानों पर पहले से लगे पेड़-पौधों को काट दिया जाता है। 

राज्य में  इन सभी उद्योगों, कालोनियों और घरों  के निर्माण में सीमेंट का उपयोग किया जाता है। जब गर्मी का मौसम होता है, तो सीमेंट से बनी इमारतें और सड़कें सूरज की गर्मी को अवशोषित कर लेती हैं। रात में वह इस गर्मी को मुक्त करती हैं। इस तरह रिलीज होने वाली गर्मी हमारे ही वायु मंडल में रह जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि वायुमंडल गर्म रहने से हमारी पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है।

प्रकृति विज्ञानियों का कहना है कि आज से तीन-चार दशक पहले शहरों और गांवों में बनने वाले कच्ची मिट्टी और फूस से बनने वाले घर उर्ष्मा का परावर्तित कर देते थे जिससे पृथ्वी का तापमान नहीं बढ़ने पाता था।

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