Sunday, May 3, 2026

कभी राजा पर भी विपत्ति आ सकती है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजा भोज परमार राजवंश के शासक थे। कहते हैं कि इन्होंने भोजपुर नगर बसाया था। प्रारंभ में भोजपुर का नाम भोजपाल नगर था। यह परमार वंशी राजा सिंधुल के पुत्र थे। इनकी माता का नाम सावित्री था। जब यह पांच साल के थे, तो इनके माता-पिता की मौत हो गई थी और राज्य का भार इनके चाचा मुंज के कंधों पर आ गया था। 

राज्य के लोभ में मुंज ने इन्हें मारने का आदेश दे दिया था, लेकिन बधिक की दयालुता से यह बच गए थे। बाद में मुंज का भी हृदय परिवर्तन हुआ। वह राजपाट भोज को सौंपकर जंगल में रहने चला गया। यह एक बहुश्रुत कथा है। एक दिन की बात है। 

राजा भोज अपने महल में भोजन कर रहे थे, तभी कहीं से एक मधुमक्खी उड़ती हुई आई और राजा के सामने बैठकर उसने स्वभावगत अपने हाथ-पैर रगड़ते हुए सिर पर लगाने लगी। राजा भोज ने पुरोहित से इसका मतलब पूछा, तो पुरोहित ने कहा कि यह कहना चाह रही है कि मैंने इतनी मेहनत से मधु इकट्ठा किया था, जिसे लोग लूटकर ले गए। इसलिए आप जैसे राजाओं को संचय नहीं करना चाहिए। 

उस दिन से राजा भोज ने गुणी व्यक्तियों और निर्धनों को दान करना शुरू कर दिया। कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति राजा भोज के यहां से खाली हाथ नहीं जाता था। भोज के दोनों हाथ राजकोष लुटाने से कोषाध्यक्ष चिंतित हो गया। उसने एक दिन राजकोष के दरवाजे पर लिखा-राजा को आपात स्थिति के लिए धन बचाकर रखना चाहिए। 

कभी कभी दुर्भाग्य से धनवानों पर भी विपत्ति आ सकती है। यह पढ़कर भोज ने लिखवाया कि यदि दुर्भाग्य से धनवानों पर विपत्ति आ सकती है, तो संचित कोष भी नष्ट हो सकता है। इसके बाद कोषाध्यक्ष ने कभी चिंता नहीं की। राजा भोज पहले की तरह दान करते रहे।

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