Thursday, May 7, 2026

हरियाणा में कुपोषण की समस्या से जूझ रहीं गर्भवती महिलाएं

अशोक मिश्र

हरियाणा में गर्भवती महिलाएं कुपोषण की समस्या से जूझ रही हैं। इसकी वजह से कम वजन के शिशु पैदा हो रहे हैं। ऐसे में कम वजन के पैदा होने वाले शिशुओं में से कुछ एक साल की उम्र में ही मौत का शिकार हो जाते हैं। अगर फरीदाबाद जिले की ही रिपोर्ट पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि दस महीने में जिले में कुल 44395 नवजात बच्चों के वजन की जांच की गई,  जिसमें से 6803 बच्चों का वजन ढाई किग्रा से कम पाया गया। 945 बच्चों का वजन 1.8 किग्रा से भी कम पाया गया। 

इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में गर्भवती महिलाओं के पोषण की क्या स्थिति है। भारत सरकार के पोषण ट्रैकर पोर्टल के अनुसार वर्ष 2025 में हरियाणा में पांच साल तक की उम्र के करीब 13.82 लाख बच्चों की जांच की गई। इनमें करीब 35 फीसदी बच्चे कुपोषित मिले। बच्चों के सेहत में ध्यान में रखकर केंद्र ने हरियाणा सरकार को व्यापक जागरूकता अभियान चलाने और पोषण अभियान पर विशेष दिशा-निर्देश दिए थे। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों की ऊंचाई, वजन, शरीर की बनावट को भी मापा गया, जिसमें करीब 22 फीसदी बच्चे बौनापन, सात फीसदी कम वजन, करीब तीन फीसदी कमजोर और तीन फीसदी के करीब अत्यधिक वजन यानि मोटापा के शिकार पाए गए। 

हरियाणा में पांच साल से कम उम्र के लगभग 40 प्रतिशत बच्चे कम वजन और कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी चिंताजनक है। अध्ययनों के अनुसार, बच्चों में कम वजन के मुख्य कारणों में मां में खून की कमी (एनीमिया) और गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी प्रमुख है। हालांकि राज्य सरकार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैय्या कराने की हरसंभव कोशिश कर रही है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आशा कार्यकर्ताओं के सहारे गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। सैनी सरकार 'मिशन पोषण 2.0' के तहत धन का आवंटन बढ़ा रही है, लेकिन सरकार के काफी प्रयास करने के बावजूद व्यवस्थागत खामियां दूर नहीं हो पा रही हैं। हरियाणा के घरों में खाने-पीने की कमी नहीं है। लेकिन बच्चों को क्या डाइट लेनी चाहिए, क्या नहीं, इस जानकारी का अभिभावकों में अभाव है। ज्यादातर लोग डेढ़ या दो साल तक बच्चे को दूध ही पिलाते हैं, जबकि छह महीने के बाद बच्चे को ऊपरी खाना शुरू कर देना चाहिए।

 मां बाप का मानना रहता है कि बच्चे को दूध पिलाओ, वो सारा दिन ऐसा करते हैं, जिसकी वजह से अन्य पोषक तत्वों की कमी रह जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत सारी गर्भवती महिलाएं अपनी जांच कराने में भी लापरवाही बरतती हैं। जिसके कारण उन्हें पता ही नहीं चल पता है कि उनमें किस पोषक तत्व की कमी है। नतीजा यह होता है कि उनका बच्चा कमजोर पैदा होता है।

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