Saturday, May 9, 2026

इक्कीस साल की उम्र में शहीद हो गईं प्रीतिलता

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रीतिलता वाडेदार एक ऐसी छात्रा थीं जिन्हें मरने के 80 साल बाद दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्रदान की गई थी। कोलकाता विश्वविद्यालय के अंग्रेज अधिकारियों ने उत्तीर्ण होने के बावजूद उनकी डिग्री पर रोक लगा दी थी। प्रीतिलता का जन्म 5 मई 1911 को चटगांव (अब बांग्लादेश में) के एक गरीब परिवार में हुआ था। 

कालेज की शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गई थीं। वह क्रांतिकारी सूर्य सेन और उनके साथी रामकृष्ण विश्वास से अकसर मिलने जाया करती थीं। वह उनके क्रांतिकारी दल की सक्रिय सदस्य भी थीं। इनमें भारत को स्वाधीन कराने की प्रबल आकांक्षा थी। 

जब अंग्रेजों ने इनकी स्नातक की डिग्री पर रोक लगा दी, तो इन्होंने एक स्कूल में अध्यापन शुरू किया। चटगांव के पहाड़तली इलाके में एक यूरोपियन क्लब था जिसमें अंग्रेजों को ही अंदर जाने की इजाजत थी। क्लब के बाहर एक बोर्ड लगा हुआ था जिसमें अंग्रेजी में लिखा हुआ था कि डाग्स एंड इंडियन्स आर नॉट एलाउड। कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित लिखा यह बोर्ड प्रीतिलता बाडेदार की आंखों में हमेशा खटकता था। 

उधर से गुजरते समय वह इस बोर्ड को देखकर आक्रोशित हो उठती थीं। एक दिन प्रीतिलता ने अपने साथियों के साथ पहाड़तली के इस क्लब पर सशस्त्र हमला बोल दिया। दोनों ओर से गोलियां चलने लगीं। इसी बीच एक गोली आकर प्रीतिलता को लगी जिससे वह घायल हो गईं। 

अंग्रेजों की यातनाओं और दल का भेद खुलने के भय से बचने के लिए वह साइनाइड साथ लेकर गई थीं। जब बचने की गुंजाइश नहीं बची, तो प्रीतिलता ने साइनाइड खाकर प्राण त्याग दिए। क्रांतिकारी प्रीतिलता 21 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गईं।

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