अशोेक मिश्र
पशु कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते थे। प्राचीन काल में खेती भी हल-बैल के सहारे होती थी। ऐसी स्थिति में ग्रामीण इलाकों में हर घर में पशु जरूर पाले जाते थे। दूध-दही के लिए गाय-भैंस पाले जाते थे। खेती के लिए बैलों को पाला जाता था। इनके गोबर से खेत की उर्वरता बढ़ाई जाती थी। आवश्यकता से अधिक होने पर गाय, बैल या भैंस को बेच करके किसान अतिरिक्त कमाई भी कर लेता था।बैलगाड़ी से उसकी आने-जाने की समस्या भी हल हो जाती थी और सामान की ढुलाई भी कर लिया करता था। जैसे-जैसे ग्रामीण जीवन में मशीनों का हस्तक्षेप बढ़ता गया, बैलों की उपयोगिता कम होती गई। धीरे-धीरे बैल खेती-किसानी के काम में अप्रासंगिक होते चले गए। अब यह किसानों के लिए एक बोझ की तरह हो गए। इनके चारे की व्यवस्था करना भी किसानों पर भारी पड़ने लगा।
ऐसी हालत में किसानों के सामने नर पशुओं को खुले में छोड़ देने का विकल्प ही बचा। बूचड़खाने भी सरकारी की सख्ती की वजह से बंद होते चले गए। ऐसी स्थिति में सड़कों और अन्य जगहों पर छोड़े गए पशु घूमने लगे। देश के कई राज्यों के साथ-साथ हरियाणा में भी लावारिस पशु एक बहुत बड़ी समस्या बन गए हैं। शहर और गांवों में गाय-भैंस पालने वाले लोग नर पशु को लावारिस छोड़ देते हैं। जिसकी वजह से लोगों को काफी परेशानी होती है। सड़कों और गलियों में घूमते लावारिस पशु कई बार हादसे का कारण बन जाते हैं।
सैनी सरकार कई बार यह घोषणा कर चुकी है कि सड़कों को लावारिस पशुओं से मुक्त कराया जाएगा, लेकिन हर बार घोषणा पर अमल नहीं हुआ। प्रदेश में गौशालाओं की संख्या भी पर्याप्त नहीं है। जो गौशालाएं संचालित भी हो रही हैं, उनमें भी क्षमता से अधिक पशु भरे हुए हैं जिसकी वजह से न तो उनकी अच्छी तरह से देखभाल हो पाती है और न ही उन्हें उचित चारा मिल पाता है। नतीजा यह होता है कि गौशालाओं में गायें कृषकाय हो जाती हैं। उनमें से कई तो बीमार होती हैं, लेकिन उनके इलाज की कोई समुचित व्यवस्था भी नहीं की जाती है। सरकार इन गौशालाओं को अच्छा खासा पैसा भी देती है।
हर गाय, नंदी और भैंस आदि के लिए अलग-अलग राशि तय की गई है। सरकार प्रदेश के इन गौशालाओं को करोड़ों रुपये हर साल मुहैया कराती है। इसके बावजूद हालात बदतर हैं। हरियाणा के लगभग हर जिले में सड़कों पर लावारिस पशु घूमते दिखाई देते हैं। यह झुंड बनाकर यहां-वहां खड़े रहते हैं। कई बार तो इन पशुओं की आपसी लड़ाई में उधर से गुजरने वाले राहगीर घायल हो जाते हैं। कई लोगों की तो ऐसे हादसों में मौत तक हो जाती है। लोग अपंग हो जाते हैं। प्रशासन और स्थानीय निकाय सरकार के दबाव में लावारिस पशुओं को पकड़ने का अभियान तो चलाते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद हालात पहले जैसे हो जाते हैं।

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